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दीवाली स्पेशल -भाग 3 : जिंदगी जीने का हक

‘‘अब तो बस कुछ ही महीने रह गए हैं प्रणव की परीक्षा में,’’ केशव ने दिलासे के स्वर में कहा, ‘‘तुम चाहो तो इस दौरान मायके हो आओ.’’

‘‘नहीं, पापाजी, उस की जरूरत नहीं है. बस, रात को यह थोड़ा सा वक्त अकेले गुजारना मुश्किल हो जाता है लेकिन अब इस समय आप के साथ घूमा करूंगी, गपें मारते हुए.’’

‘‘मैं बहुत तेज चलता हूं. थक जाओगी.’’

‘‘चलिए, देखते हैं.’’

कुछ दूर जाने के बाद, एक कौटेज में से एक प्रौढ़ महिला निकलती हुई दिखाई दीं. प्रिया पहचान गई. मालिनी नामबियार थीं, जो उस की शादी की दावत में आई थीं तब पापाजी ने बताया था कि ये सब भाई आज जो कुछ भी हैं मालिनीजी की कृपा से हैं. यह इन की गणित की अध्यापिका और स्कूल की प्राचार्या हैं, बहुत मेहनत की है इन्होंने इन सब पर.

मगर पापाजी ने जिस कृतज्ञता से आभार प्रकट किया था, किसी भी भाई ने मालिनीजी की खातिर में उतनी रुचि नहीं दिखाई थी.

उन्हें देख कर मालिनीजी रुक गईं. पापाजी ने उस का परिचय करवाया. मालिनीजी भी उन के साथ टहलते हुए प्रिया से बातें करने लगीं. कुछ देर के बाद केशव को टांगें घसीटते देख कर बोलीं, ‘‘थक गए? चलिए, कौफी पी जाए.’’

‘‘मगर कौफी यहां कहां मिलेगी?’’ प्रिया ने पूछा.

‘‘मेरे घर पर.’’

प्रिया ने केशव की ओर देखा, वह बगैर कुछ कहे मालिनी के पीछे उस के घर में चले गए. जब मालिनीजी कौफी लाने अंदर गईं तो प्रिया ने पूछा, ‘‘आप पहले भी यहां आ चुके हैं, पापा?’’

केशव सकपकाए.

‘‘बच्चों की पढ़ाई के सिलसिले में आना पड़ता था. इसी तरह जानपहचान हो गई तो आनाजाना बना हुआ है.’’

‘‘आंटी ने शादी नहीं की?’’

‘‘अभी तक तो नहीं.’’

प्रिया ने कहना चाहा कि अब इस उम्र में क्या करेंगी लेकिन तब तक मालिनीजी कौफी की ट्रौली धकेलती हुई आ गईं. जितनी जल्दी वह कौफी लाई थीं उस से लगता था कि तैयारी पहले से थी. प्रिया को कच्चे केले के चिप्स बहुत पसंद आए.

‘‘किसी छुट्टी के दिन आ जाना, बनाना सिखा दूंगी,’’ मालिनी ने कहा.

‘‘तरीका बता देने से भी चलेगा, आंटी. अब तो रोज घूमते हुए आप से मुलाकात हुआ करेगी सो किसी रोज पूछ लूंगी,’’ प्रिया ने चिप्स खाते हुए कहा.

मालिनी ने चौंक कर उस की ओर देखा.

‘‘तुम रोज सैर करने आया करोगी?’’

‘‘हां, आंटी?’’

‘‘अरे, नहीं, 2 रोज में ऊब जाएगी,’’ केशव हंसे.

‘‘नहीं, पापाजी. ऊबी तो अकेले छत पर टहलते हुए हूं.’’

‘‘तुम छत पर अकेली क्यों टहलती हो?’’ मालिनी ने भौंहें चढ़ा कर पूछा.

जवाब केशव ने दिया कि प्रणव परीक्षा की तैयारी के लिए रात को देर तक पढ़ता है और तब तक समय गुजारने को यह टहलती रहती है. टीवी कब तक देखे और उपन्यास पढ़ने का इसे शौक नहीं है.

‘‘मगर प्रणव रात को क्यों पढ़ता है?’’

‘‘सुबह जल्दी उठ कर पढ़ने की उसे आदत नहीं है और दिन में आफिस जाता है,’’ केशव ने बताया.

‘‘आफिस में 5 बजे के बाद आप सब मुवक्किल से मिल कर उन की समस्याएं सुनते हो न?’’ मालिनीजी ने पूछा, ‘‘अगर चंद महीने प्रणव वह समस्याएं न सुने तो कुछ फर्क पड़ेगा क्या? काम तो उसे वही करना है जो आप बताओगे. सो कल से उसे 5 बजे से पढ़ने की छुट्टी दे दो ताकि रात को मियांबीवी समय से सो सकें.’’

‘‘यह तो है…’’

‘‘तो फिर कल से ही प्रणव को स्टडी लीव दो ताकि किसी का भी रुटीन खराब न हो,’’ मालिनीजी का स्वर आदेशात्मक था, होता भी क्यों न, प्राचार्य थीं.

प्रिया ने सिटपिटाए से केशव को देख कर मुश्किल से हंसी रोकी.

‘‘हां, यही ठीक रहेगा. लाइबे्ररी तो आफिस में ही है. वहीं से किताबें ला कर घर पर पढ़ता है, कल कह दूंगा कि दिन भर लाइबे्ररी में बैठ कर पढ़ता रहे, कुछ जरूरी काम होगा तो बुला लूंगा,’’ केशव बोले.

लौटते हुए केशव ने प्रिया से कहा कि वह प्रणव को न बताए कि मालिनीजी ने उस की स्टडी लीव की सिफारिश की है, नहीं तो चिढ़ जाएगा.

‘‘टीचर से सभी बच्चे चिढ़ते हैं और स्कूल छोड़ने के बाद तो उन की हर बात हस्तक्षेप लगती है.’’

‘‘यह बात तो है, पापाजी. वैसे यह बताने की भी जरूरत नहीं है कि हम मालिनीजी से मिले थे,’’ प्रिया ने केशव को आश्वस्त किया.

अगले रोज से प्रणव ने रात को पढ़ना छोड़ दिया. प्रिया ने मन ही मन मालिनीजी को धन्यवाद दिया. जिस रोज प्रणव की परीक्षा खत्म हुई, रात के खाने के बाद केशव ने उस से पूछा, ‘‘अब क्या इरादा है, कहीं घूमने जाओगे?’’

‘‘जाना तो है पापा, लेकिन रिजल्ट निकलने के बाद.’’

‘‘तो फिर कल मुझ से पूरा काम समझ लो, वैसे तो तुम सब संभाल ही लोगे फिर भी कुछ समस्या हो तो इन दोनों से पूछ लेना,’’ केशव ने अभिनव और प्रभव की ओर देखा, ‘‘तुम लोगों के पास वैसे तो अपना बहुत काम है लेकिन इसे कुछ परेशानी हो तो वक्त निकाल कर देख लेना, कुछ ही दिनों की बात है. मैं जल्दी आने की कोशिश करूंगा.’’

‘‘आप कहीं जा रहे हैं, पापा?’’ सभी ने एकसाथ चौंक कर पूछा.

‘‘हां, कोच्चि,’’ केशव मुसकराए, ‘‘शादी करने और फिर हनीमून…’’

‘‘शादी और आप… और वह भी अब?’’ अभिनव ने बात काटी, ‘‘जब करने की उम्र थी तब तो करी नहीं.’’

‘‘क्योंकि तब तुम सब को संभालना था. अब तुम्हें संभालने वालियां आ गई हैं तो मैं भी खुद को संभालने वाली ला सकता हूं. कोच्चि के नाम पर समझ ही गए होंगे कि मैं मालिनी की बात कर रहा हूं,’’ कह कर केशव रोज की तरह घूमने चले गए.

‘‘अगर पापा कोच्चि का नाम न लेते तो भी मैं समझ जाता कि किस की बात कर रहे हैं,’’ प्रभव ने दांत पीसते हुए कहा, ‘‘वह औरत हमेशा से ही हमारी मां बनने की कोशिश में थी. मैं ने आप को बताया भी था भैया और आप ने कहा था कि आप इस घर में उस की घुसपैठ कभी नहीं होने देंगे.’’

‘‘तो होने दी क्या?’’ अभिनव ने चिढ़े स्वर में पूछा, ‘‘वह हमारे घर न आए इसलिए कभी अपनी या तुम्हारे जन्मदिन की दावत नहीं होने दी. हालांकि त्योहार के दिन किसी रिश्तेदार के घर जाना मुझे बिलकुल पसंद नहीं था लेकिन उस औरत से बचने के लिए मैं बारबार बूआ या मौसी के घर जाने की जलालत भी झेल लेता था. अगर पता होता कि हमारी शादी के बाद वह हमारी मां की जगह ले लेगी तो मैं न अपनी शादी करता न तुम्हें करने देता.’’

‘‘लेकिन अब तो हम सब की शादी हो गई है और पापा अपनी करने जा रहे हैं,’’ प्रणव बोला.

‘‘हम जाने देंगे तब न? हम अपनी मां की जगह उस औरत को कभी नहीं लेने देंगे,’’ प्रभव बोला.

‘‘सवाल ही नहीं उठता,’’ अभिनव ने जोड़ा.

‘‘मगर करोगे क्या? अपनी शादियां खारिज?’’ प्रणव ने पूछा.

‘‘उस से कुछ फर्क नहीं पड़ेगा,’’ जूही बोली, ‘‘क्योंकि पापाजी की जिम्मेदारी आप लोगों को सुव्यवस्थित करने तक थी, जो उन्होंने बखूबी पूरी कर दी. अब अगर आप उस में कुछ फेरबदल करना चाहते हो तो वह आप की अपनी समस्या है. उस से पापाजी को कुछ लेनादेना नहीं है.’’

‘‘उस सुव्यवस्था में फेरबदल हम नहीं पापा कर रहे हैं और वह हम करने नहीं देंगे,’’ अभिनव ने कहा.

‘‘मगर कैसे?’’ प्रणव ने पूछा.

‘‘कैसे भी, सवाल मत कर यार, सोचने दे,’’ प्रभव झुंझला कर बोला. फिर सोचने और सुझावों की प्रक्रिया बहस में बदल गई और बहस झगड़े में बदलती तब तक केशव आ गए, वह बहुत खुश लग रहे थे.

‘‘अच्छा हुआ तुम सब यहीं मिल गए. मैं और मालिनी परसों कोच्चि जा रहे हैं, शादी तो बहुत सादगी से करेंगे मगर यहां रिसेप्शन में तो तुम लोग सादगी चलने नहीं दोगे,’’ केशव हंसे, ‘‘खैर, मैं तुम लोगों को अपनी मां के स्वागत की तैयारी के लिए काफी समय दे दूंगा.’’

‘‘मगर पापा…’’

‘‘अभी मगरवगर कुछ नहीं, अभिनव. मैं अब सोने या यह कहो सपने देखने जा रहा हूं,’’ यह कहते हुए केशव अपने कमरे में चले गए.

‘‘पापाजी बहुत खुश हैं,’’ जूही ने कहा, ‘‘मुझे नहीं लगता वह आप के कहने से अपना इरादा बदलेंगे.’’

‘‘आप ठीक कहती हैं सो बदलने को कह कर हमें उन की खुशी में खलल नहीं डालना चाहिए,’’ सपना बोली.

‘‘और चुपचाप उन्हें अपनी मां की जगह उस औरत को देते हुए देखते रहना चाहिए?’’ अभिनव ने तिक्त स्वर में पूछा.

‘‘उन मां की जगह जिन की शक्ल भी आप को या तो धुंधली सी याद होगी या जिन्हें आप तसवीर के सहारे पहचानते हैं? उन की खातिर आप उन पापाजी की खुशी छीन रहे हैं जो अपनी भावनाओं और खुशियों का गला घोंट कर हर पल आप की आंखों के सामने रहे ताकि आप को आप की मां की कमी महसूस न हो?’’ अब तक चुप बैठी प्रिया ने पूछा, ‘‘महज इसलिए न कि मालिनीजी आप की टीचर थीं और उन्हें या उन के अनुशासन को ले कर आप सब पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं?’’

कोई कुछ नहीं बोला.

‘‘जूही दीदी, सपना भाभी, सास के आने से सब से ज्यादा समस्या हमें ही आएगी न?’’ प्रिया ने पूछा, ‘‘क्या पापाजी की खुशी की खातिर हम वह बरदाश्त नहीं कर सकतीं?’’

‘‘पापाजी को अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीने का पूरा हक है और हम उन के लिए कुछ भी सह सकती हैं,’’ सपना बोली.

‘‘सहना तब जब कोई समस्या आएगी,’’ जूही ने उठते हुए कहा, ‘‘फिलहाल तो चल कर इन सब का मूड ठीक करो ताकि कल से यह भी पापाजी की खुशी में शामिल हो सकें.’’

तीनों भाइयों ने मुसकरा कर एकदूसरे को देखा, कहने को अब कुछ बचा ही नहीं था.

Bigg Boss 16 : साजिद खान की एंट्री पर सोना महापात्रा ने दिया ये रिएक्शन

बॉलीवुड के मशहूर एक्टर सलमान खान का शो बिग बॉस 16 काफी ज्यादा चर्चा में बना हुआ है,इस शो को देखने के लिए फैंस काफी ज्यादा एक्साइटेड रहते हैं. इस बार नृमित और गौतम शो का हिस्सा बने हुए हैं. इसके साथ ही कई सारे सितारे इस शो का हिस्सा बने हैं.

इस लिस्ट में साजिद खान भी शामिल हैं, लेकिन शो में आते ही साजिद खान के खिलाफ यूजर्स ही नही कई सेलेब्स भी बोलना शुरू कर दिए. सभी साजिद के आने पर नाराजगी जता रहे हैं. साजिद के शामिल होते ही सोनामहापात्रा ने अपनी नाराजगी दिखाई है.

उन्होंने साजिद खान के साथ साथ अनु मलिक को भी आड़े लिया है, सोना माहापात्रा ने ट्विट करते हुए कहा था कि ये साजिद हैं जो टीवी पर आ रहे हैं, इससे पहले इन पर मीटू जैसे आरोप लगाएं हैं. भारतीय चैनल पूरी तरह भ्रष्ट हो चुकी है.

बता दें कि साजिद खान पर मीटू के आरोप लग चुके हैं, बताया गया था कि वह कास्टिंग काउच के शिकार हो चुके हैं. इसके साथ ही उन्हें न्यूड फोटो शेयर करने के भी आरोप लगाए जा चुके हैं.

लंबे समय बाद दिखा राज कुंद्रा का फेस तो लोगों ने कहीं ये बात

बॉलीवुड एक्ट्रेस शिल्पा शेट्टी के पति काफी लंबे समय बाद सोशल मीडिया पर बिना मास्क के नजर आ रहे हैं, इस वीडियो में राज कुंद्रा दुर्गाआष्टमी पर अपनी बेटी शमीषा के पैर धोते नजर आ रहे हैं.

इस वीडियो को शिल्पा शेट्टी ने अपने सोशल मीडिया पर शेयर किया है, वीडियो में राज कुंद्रा अपनी बेटी के पैर पोछ रहे हैं. यह वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है. राज कुंद्रा बिना मास्क के दिखाई दिए हैं.

इससे पहले शिल्पा शेट्टी के पति राज कुंद्रा को कई बार देखा गया है, बता दें कि राज कुंद्रा जबसे विवाद में फंसे थें, तबसे वह कभी पब्लिक के सामने नहीं आ रहे थें. इस विवाद में वह क महीनों तक जेल में रहकर भी आएं थें,

इस विवाद के बाद शिल्पा शेट्टी की फिल्म हंगामा 2 पर काफी ज्यादा असर पड़ा था, बता दें कि शिल्पा शेट्टी ने राज कुंद्रा के विवाद की वजह से वह अपनी जज की कुर्सी को छोड़ दिया था,

शिल्पा शेट्टी आएं दिन सोशल मीडिया पर काफी ज्यादा एक्टिव रहती हैं. हमेशा अपने बच्चों के साथ तस्वीर शेयर करती रहती हैं. खैर शिल्पा अब अपनेे जीवन में काफी ज्यादा आगे बढ़ चुकी हैं.

मैं पिछले 3 महीनों से अपने गिरते बालों से बहुत परेशान हूं, कोई उपाय बताएं?

07सवाल

मैं 25 वर्षीय विवाहित महिला हूं. पिछले 3 महीनों से मैं अपने गिरते बालों से बहुत परेशान हूं. मुझे ऐसा कोई उपाय बताएं जिस से मेरे बालों को पोषण मिलने के साथसाथ उन का गिरना भी बंद हो जाए?

जवाब

बालों के गिरने के कई कारण हो सकते हैं जैसे कोई बीमारी, भोजन में पोषक तत्त्वों का अभाव, बालों की ठीक से देखभाल न होना आदि. गिरते बालों को पोषण देने के लिए आप भोजन में पौष्टिक तत्त्व लें. फल, दूध, प्रोटीन युक्त पदार्थ अधिक से अधिक लें. इस के अलावा बालों की देखभाल हेतु मेहंदी को अंडे के साथ मिला कर पेस्ट बनाएं और बालों में 1 घंटे तक लगाए रखें व बाद में शैंपू से धो लें. इस से बालों को पोषण मिलेगा व वे घने और मजबूत होंगे.

सप्ताह में एक बार औलिव औयल या कोकोनट औयल से बालों की जड़ों में मसाज करें. बाद में हौट टौवेल लपेटें.

टौवेल ठंडा हो जाने पर माइल्ड शैंपू से बालों को धो लें. इस से बालों की जड़ों को पोषण मिलेगा और उन का गिरना बंद होगा. साथ ही सिर की त्वचा को भी साफ रखें, क्योंकि गंदे व उलझे बाल अधिक टूटते हैं.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

जुताई और बोआई के लिए बैटरी से चलने वाला कल्टीवेटर और प्लांट

टरी से चलने वाला कल्टीवेटर और प्लांटर ] भानु प्रकाश राणा खेती से पैदावार बढ़ाने और खेती को आसान बनने के लिए अनेक तरह के आधुनिक कृषि यंत्रों का प्रयोग बढ़ता जा रहा है, जिस से फसल की लागत में कमी आती है और फसल पैदावार में इजाफा होता है. इस दिशा में अनेक कृषि विशेषज्ञ और कृषि संस्थान भी काम करते रहे हैं. अभी हाल के दिनों में छत्तीसगढ़ कृषि विश्वविद्यालय ने किसानों के लिए जुताई और बोआई के लिए पशुचलित बैटरी से चलने वाली कल्टीवेटर और प्लांटर मशीन बनाई हैं. इन दोनों कृषि यंत्रों को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा लौंच किया गया.

इन दोनों ही कृषि यंत्रों को इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कृषि अभियांत्रिकी महाविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा बनाया गया है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, इन यंत्रों के इस्तेमाल से किसानों को खेती के काम में लगने वाले समय और लागत में भी कमी होगी. पशुचलित बैटरी आपरेटेड कल्टीवेटर आमतौर पर छोटे और मंझले किसान खेत की जुताई के लिए देशी हल का उपयोग करते हैं. इस के बाद पाटा लगाया जाता है. कई दफा इस दौरान खेत में ढेले टूट नहीं पाते. इस से बीज बोने के समय कठिनाई होती है और पूरी तरह से नहीं उग पाता. जो बीज बड़े ढेले के नीचे आ गया, वह अंकुरित ही नहीं हो पाता. ऐसे में दूसरी जुताई के समय पशुचलित बैटरी आपरेटेड कल्टीवेटर किसानों की इस समस्या का निदान कर सकता है. इस यंत्र में 750 वाट (1 एचपी) की मोटर लगी होती है और 48 वोल्ट पावर की बैटरी लगाई गई है. साथ ही, किसान को बैठने के लिए एक सीट भी लगी होती है. इस कल्टीवेटर की मदद से एक हेक्टेयर खेत को 5-7 घंटे में जोता जा सकता है.

चूंकि इस यंत्र में बैटरी का इस्तेमाल होता है, इसलिए मवेशियों को भी कम ताकत लगानी पड़ती है और किसान यंत्र की सीट पर बैठ कर आसानी से खेत की जुताई कर सकता है. पशुचलित बैटरी आपरेटेड प्लांटर इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के माहिर वैज्ञानिक द्वारा पशुचलित बैटरी आपरेटेड प्लांटर भी बनाया गया है. इस यंत्र की विशेषताएं इस प्रकार से हैं : किसान इस यंत्र की मदद से कतारबद्ध बीज से बीज की दूरी बनाए रखते हुए बोआई कर सकता है. फसल के अनुसार बीज बोते समय कतार से कतार के बीच की दूरी को 20 से 50 सैंटीमीटर तक सैट कर सकते हैं. पशुचलित बैटरी आपरेटेड प्लांटर की कीमत तकरीबन 20-25 हजार रुपए तक बताई गई है. किसानों को कितना मिलता है अनुदान छत्तीसगढ़ में कम जोत वाले और सीमांत किसानों के लिए कृषि यंत्र सब्सिडी योजना चलाई जा रही है.

इस योजना के तहत राज्य के किसानों को सरकार की ओर से कृषि उपकरणों की खरीद पर अलगअलग कृषि उपकरणों पर 40 फीसदी से ले कर 70 फीसदी तक सब्सिडी का लाभ दिया जाता है. इस सब्सिडी की राशि का भुगतान किसान के बैंक खाते में आवेदन करने के बाद आता है. जो भी किसान इस योजना का लाभ लेना चाहते हैं, वे अपने नजदीकी कृषि विभाग से संपर्क कर अधिक जानकारी ले कर इस का लाभ ले सकते हैं. ठ्ठ ड्रोन से होगा छिड़काव एग्रीकल्चर ड्रोन के माध्यम से 4 एकड़ खेतों में आधे घंटे के भीतर दवा का छिड़काव हो सकेगा.

अमूमन एक किसान को इस के लिए एक एकड़ के लिए 3 घंटे का वक्त लगता है. मशीन के माध्यम से दवा की मात्रा भी निर्धारित की जा सकेगी. एग्रीकल्चर ड्रोन सौल्यूशन के साथ ही एग्री एंबुलैंस भी होगी, जिस में एग्रीकल्चर लैब की सुविधा भी होगी. इस में किसान सौइल टैस्टिंग आदि करा सकेंगे. इस में खेतीकिसानी के लिए संपूर्ण सुविधा होगी. इस में जैविक खाद की उपलब्धता भी होगी.

प्रतीक्षा-भाग 1 : नंदिता के बीमारी के दौरान राजेंद्र ने क्या सहयोग दिया

नंदिता की बीमारी के दौरान राजेंद्र के अनमोल योगदान ने माधवेश को उस का ऋणी बना दिया था, इसीलिए जब माधवेश ने उसे नंदिता से मिलवाया तो बहुत कम समय में ही दोनों के बीच गहरी आत्मीयता देख वह संदेह में पड़ गया. आखिर क्या संबंध था नंदिता का राजेंद्र से? बहुधा नंदिता सिरदर्द की शिकायत करती रहती थी. लेकिन एक दिन जब वह अचेत हो गई तो शीघ्र ही डाक्टर से परामर्श लेना पड़ा. आननफानन अनेक जांचें की गईं और डाक्टर ने बताया कि मेरी पत्नी के मस्तिष्क में गांठ है जिस का एकमात्र उपचार औपरेशन है.

‘‘डाक्टर साहब, कब तक करा लेना चाहिए औपरेशन,’’ मैं ने पूछा. ‘‘जल्दी से जल्दी. मैं अन्य जांचें भी लिख देता हूं. 3 यूनिट खून की व्यवस्था भी करनी पड़ेगी. सारी तैयारियों के बाद मु?ा से मिल लीजिएगा. औपरेशन की तारीख तय कर ली जाएगी.’’ डाक्टर का यह संक्षिप्त सा उत्तर मु?ो किसी बड़े अनिष्ट का आभास दे गया. जांच से पता चला कि नंदिता का रक्त समूह ‘एबी नैगेटिव’ है जो एक दुर्लभ रक्त समूह है. सगेसंबंधियों एवं इष्ट मित्रों से सिर्फ 2 यूनिट रक्त की व्यवस्था हो पाई. आखिरकार, अखबारों में यह सोच कर अपील छपवाई कि शायद कोई रक्तदाता मेरी सहायता के लिए आगे आए. करीब एक सप्ताह बाद 35-36 साल का राजेंद्र नाम का एक युवक मेरे पास आया. उस ने सहर्ष रक्तदान किया और जब जाने लगा तो मैं ने आग्रह किया, ‘‘राजेंद्रजी, अपने रक्तदान से आप ने न केवल मेरी पत्नी की ही प्राण रक्षा की बल्कि मु?ो भी पुनर्जीवन दिया है.

मैं आप का आजीवन ऋणी तो रहूंगा किंतु आग्रह करूंगा कि आप एक बार घर अवश्य आइए. अपनी पत्नी से भी आप की भेंट करवाता कि आप ही वे शख्स हैं.’’ कहता हुआ मैं भावुक हो उठा था. ‘‘माधवेशजी, पहली बात तो यह कि मु?ा से आप उम्र में बड़े हैं. मु?ो केवल राजेंद्र कहिए. दूसरी बात, आप के घर कभी अवश्य आऊंगा और आप की पत्नी से भी भेंट करूंगा. उन्हें मेरी शुभकामनाएं कहिएगा,’’ राजेंद्र ने विनम्रता से कहा और चला गया. मैं ने अभी नंदिता से रोग की जटिलता के बारे में कुछ नहीं बताया था. एक दिन जब मैं घर लौटा तो पाया कि नंदिता और राजेंद्र आपस में बातें कर रहे हैं.

नंदिता बहुत खुश नजर आ रही थी. मु?ो भी काफी खुशी हुई. राजेंद्र ने मु?ो देखा तो खड़़ा हो कर मेरा अभिवादन किया. कुछ देर ठहरा और फिर चला गया. अब अकसर ही राजेंद्र मेरे घर आने लगा. कभी मु?ा से भेंट होती. कभी बिना मिले ही चला जाता. अकसर उस का आनाजाना मेरी गैरमौजूदगी में ही होता था, यह मु?ो कुछ असहज सा लगा. औपचारिकता का परिचय इतनी शीघ्रता से इतनी घनिष्ठता में परिवर्तित हो जाएगा, मु?ो इस का रंचमात्र भी आभास न था.

कभीकभी मेरे मन में संदेह का फन खड़ा होता कि कहीं नंदिता और राजेंद्र पूर्व परिचित तो नहीं, लेकिन अगले ही क्षण मैं उस खड़े फन को कुचल देता. मेरा अंतर्मन कहने लगता, तुम व्यर्थ शक कर रहे हो. नंदिता 18 वर्षों से तुम्हारी ब्याहता है, उसे भटकना होता तो वह अपनी यौवनावस्था में ही भटक गई होती. अब जब उस की जीवन संध्या समीप ही है तब भला वह क्यों भटकेगी? फिर भला एक रोगिणी से राजेंद्र इतनी प्रगाढ़ता क्यों रखना चाहेगा.

 

Adipurush: प्रभास और कृति की अफेयर की खबरे आई सामने, फैंस हुए एक्साइडेट

साउथ  सुपर स्टार प्रभास और कृति सेनन की अपकमिंग फिल्म आदिपुरुष का टीजर  रिलीज हो गया है, इस खास मौके पर फिल्म की टीम अयोध्या पहुंची थी, जहां पर उनका स्वागत भव्य किया गया है. इस फिल्म के टीजर में प्रभास के साथ कृति सेनन काफी ज्यादा खूबसूरत लग रह हैं.

जबकी टीजर में प्रभास में कुर्ता पहने नजर आ रहे हैं, जब कृति सेनन प्रभास का हाथ थामें पहुंची तो सभी लोग इस दृश्य को देखने के लिए बेताब थें, यह तस्वीर सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रही है.

जब प्रभास और कृति सेनन ने एक साथ मंच पर कदम रखा तो लोग देख कर दंग रह गए, फैंस को इस फिल्म का अब बेसब्री से इंतजार है. जबरदस्त बात ये है कि मौके पर प्रभास ने कृति सेनन का हाथ थामा था, जिसे देख लोगों ने खूब चिल्लाया, इनकी जोड़ी खूब पसंद कि जा रही है.

इससे पहले प्रभास और कृति को कभी एक साथ पर्दे पर नहीं देखा गया था, दोनों को साथ में देखकर फैंस खूब उत्साहित हैं. दोनों साथ में एक खूबसूरत कपल की तरह लग रहे थें.

प्रभास ने बेहद नजाकत के साथ कृति का हाथ पकड़ा था, जिसे देखकर लोगों को लग रहा है कि प्रभास औऱ कृति का कुछ चल रहा है.

Bigg Boss 16: घर में शुरू हुई कैट फाइट , जानें पूरा मामला

सलमान खान का सबसे चर्चित शो बिग बॉस 16 शुरू हो चुका है, फैंस इस शो को देखने के लिए काफी दिनों से इंतजार कर रहे थें, हमेशा की तरह इस बार भी शो विवादों में रहा है. इस शो की शुरुआत होते ही गौतम और निममित के बच कैट फाइट शुरू हो गई है.

इन दोनों की लड़ाई को देखकर फैंस अभी से कयास लगा सकते हैं कि आगे शो में क्या होने वाला है. पहले दिन निमृत को घर के काम की जिम्मेदारी सौप गई थी, लेकिन  अर्चा गौतम से उसकी जमकर फाइट हो गई काम को लेकर,

 

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इससे पहले अर्चना गौतम शो में खाना बनाने का काम कर रही थी, जो की कुछ कंटेस्टेंट को पसंद नहीं आ रहा था, इसके साथ ही शो में पहले दिन प्रैक कॉल से खूब परेशान किया गया, पहलो प्रैक कॉल शालिन भट्ट को गया, जो आमिर खान के नाम से गया वहीं दूसका कॉल टीना दत्ता को गया. जिसके बाद और भी बहुत सारे कंटेस्टेंट को कॉल किया गया.

बता दें कि इस शो में सभी कंटेस्टेंट काफी ज्यादा मजेदार हैं, वहीं इस शो को देखने के लिए लोग काफी . पहले से उत्सुक हैं, इस बार शो को थीम सर्कस रखा गया है

मुहरा : भवानीराम को क्यों गुस्सा आ रहा था?

‘‘अरे गणपत, आजकल देख रहा हूं, तेरे तेवर बदलेबदले लग रहे हैं,’’ आखिर भवानीराम ने कई दिनों से मन में दबी बात कह ही डाली.

गणपत ने कोई जवाब नहीं दिया. जब काफी देर तक कोई जवाब न मिला तो थोड़ी नाराजगी से भवानीराम बोले, ‘‘क्यों रे गणपत, कुछ जवाब क्यों नहीं दे रहा है. गूंगा हो गया है क्या?’’

‘‘हम गांव के सरपंच हैं,’’ गणपत ने धीरे से उत्तर दिया.

‘‘हां, तू सरपंच है, यह मैं ने कब कहा कि तू सरपंच नहीं है पर तुझे सरपंच बनाया किस ने?’’ कहते हुए भवानीराम ने गणपत को घूरते हुए देखा. गणपत की भवानीराम से आंखें मिलाने की हिम्मत नहीं हो रही थी. यह देख भवानीराम फिर बोले, ‘‘बोल, तुझे सरपंच किस ने बनाया. आजकल तुझे क्या हो गया है. चल, इस कागज पर अंगूठा लगा.’’

‘‘नहीं, आप ने हम से अंगूठा लगवालगवा कर प्रशासन को खूब चूना लगाया है,’’ उलटा आरोप लगाते हुए गणपत बोला.

‘‘किस ने कान भर दिए तेरे?’’ भवानीराम नाराजगी से बोले, ‘‘चल, लगा अंगूठा.’’

‘‘कहा न, नहीं लगाएंगे,’’ गणपत अकड़कते हुए बोला.

‘‘क्या कहा, नहीं लगाएगा?’’ गुस्से से भवानीराम बोले, ‘‘यह मत भूल कि तू आज मेरी वजह से सरपंच बना है. मैं कहता हूं चुपचाप अंगूठा लगा दे.’’

‘‘कहा न मैं नहीं लगाऊंगा,’’ कह कर गणपत ने एक बार फिर इनकार कर दिया.

भवानीराम को इस से गुस्सा आया और बोले, ‘‘अच्छा, हमारी बिल्ली हमीं से म्याऊं. ठीक है, मत लगा अंगूठा, मैं भी देखता हूं तू कैसे सरपंचगीरी कर पाता है.’’

भवानीराम का गुस्से से तमतमाया चेहरा देख कर गणपत एक क्षण भी नहीं रुका और वहां से चला गया. भवानीराम गुस्से से फनफनाते रहे. भवानीराम ने सोचा, ‘निश्चित ही इस के किसी ने कान भर दिए हैं वरना यह आज इस तरह का व्यवहार न करता, आज जो कुछ वह है, उन की बदौलत ही तो है.’ पूरे गांव में भवानीराम का दबदबा था. एक तो वे गांव के सब से संपन्न किसान थे साथ ही राजनीति से भी जुड़े हुए थे. वे चुनाव से पहले ही सरपंच बनने के लिए जमीन तैयार करने लगे थे. मगर ऐन चुनाव के समय घोषणा हुई कि गांव के सरपंच पद के लिए इस बार अनुसूचित जाति का व्यक्ति ही मान्य होगा, तो इस से भवानीराम के सारे अरमानों पर पानी फिर गया. अब उन्हें एक ऐसे व्यक्ति की तलाश थी जो उन की हां में हां मिलाए और सरपंच पद पर कार्य करे. अंतत: उन्हें ऐसा मुहरा अपने ही घर में मिल गया. यह था गणपत, जो उन के यहां खेती एवं पशुओं की देखरेख का काम करता था. अत: भवानीप्रसाद ने उसे बुला कर कहा, ‘‘गणपत, हम तुम्हें ऊंचा उठाना चाहते हैं, तुम्हारा उधार करना चाहते हैं. अत: हम तुम्हें गांव का सरपंच बनाना चाहते हैं.’’

‘‘सच मालिक,’’ पलभर के लिए गणपत की आंखें चमकीं. फिर वह इनकार करते हुए बोला, ‘‘नहीं मालिक, चुनाव लड़ने के लिए मेरे पास पैसा कहां है?’’

‘‘हां, तुम ठीक कहते हो. लेकिन तुम्हें तो खड़ा होना है, क्योंकि तुम अनुसूचित जाति से हो. मैं सामान्य होने के कारण खड़ा नहीं हो सकता. अत: मेरी जगह तुम खड़े होओगे और पैसा मैं लगाऊंगा.’’

‘‘सच मालिक,’’ खुशी से गणपत की आंखें चमक उठीं.

‘‘हां गणपत, मैं तुम्हें सरपंच बनाऊंगा. कल तुम्हें फौर्म भरने शहर चलना है,’’ कह कर भवानीराम ने गणपत को मना लिया. गणपत भी खुशीखुशी मान गया. फिर गांव में जोरशोर से प्रचार शुरू हो गया. मगर मुख्य लड़ाई गणपत और राधेश्याम में थी. भवानीराम ने गणपत को जिताने के लिए अपनी सारी ताकत झोंक दी. इधर राधेश्याम भी एड़ीचोटी का जोर लगा रहा था. दलितों की इस लड़ाई में उच्चवर्ग के लोग आनंद ले रहे थे. प्रचार में दोनों ही एकदूसरे से कम नहीं पड़ रहे थे, जिस चौपाल पर कभी पंचों के फैसले हुआ करते थे, आज वहां राजनीति के तीर चल रहे थे. टीवी, इंटरनैट ने गांव को इतना जागरूक बना दिया था कि जरा सी खबर विस्फोट का काम कर रही थी. गणपत लड़ जरूर रहा था, मगर प्रतिष्ठा भवानीराम की दांव पर लगी हुई थी. गांव वाले अच्छी तरह जानते थे कि जीतने के बाद गणपत सरपंच जरूर कहलाएगा, मगर असली सरपंच भवानीराम होंगे. गांव की पंचायत में बैठ कर वे ही फैसला लेंगे. गणपत तो उन का मुहरा बन कर रहेगा.

राजनीति की यह हवा गांव के वातावरण को दूषित कर रही थी, यह बात गांव के बुजुर्ग अच्छी तरह समझ रहे थे. जिस गांव में कभी शांति, अमन और भाईचारा था, वहां सभी अब एकदूसरे की जान के दुश्मन बन गए थे. आखिर तनाव के माहौल में चुनाव संपन्न हुए. प्रतिष्ठा की इस लड़ाई में गणपत जीत गया, लेकिन यह जीत गणपत की नहीं, भवानीराम की थी. गांव वाले गणपत को नहीं असली सरपंच भवानीराम को ही मानते हैं. मगर 8 दिन तक जीत की खुमारी भवानीराम के सिर से नहीं उतरी. उधर, अब गणपत नौकर नहीं सरपंच हो गया था. गांव की पंचायत में वह कुरसी पर बैठने लगा था, लेकिन भवानीराम भी उस के साथ रहता. वह अपनी गाड़ी में बैठा कर गणपत को शहर की मीटिंग में ले जाता था.

ऐसे ही 3 साल बीत गए. भवानीराम के कारण पंचायत को जो पैसा मिला, उस से निर्माण कार्य भी करवाए गए. गणपत से अंगूठा लगवा कर भवानीराम शासकीय योजनाओं को चूना भी लगाता रहा. मगर पंचायत में राधेश्याम के चुने पंच बगावत भी करते रहे. भवानीराम ने किसी की परवा नहीं की, क्योंकि गांव वाले व स्वयं भवानीराम जानते थे कि गणपत तो उन का मुहरा है. जब चाहें उस से कहीं भी अंगूठा लगवा सकते हैं. भवानीराम द्वारा गणपत से अंगूठा लगवा कर शासन का पैसा डकारने पर राधेश्याम के पंच गणपत पर चढ़ बैठे. उन्होंने सलाह ही नहीं दी बल्कि चिल्ला कर कहा,‘‘तुम कब तक भवानीराम के मुहरे बने रहोगे. तुम उन का मुहरा मत बनो, कहीं वे एक दिन तुम्हें जेल की हवा न खिला दें.’’ गणपत अंगूठा लगाने के अलावा कुछ नहीं जानता था. अत: उस की हालत सांपछछूंदर जैसी हो गई थी. एक तो पंचायत के सदस्य उस पर आक्रमण करते रहे, दूसरा शहर में जब भी पंचायत में जाता था, तब वह अपना मजबूत पक्ष नहीं रख पाता था. भवानीराम उस के साथ होते, तो अवश्य मजबूती से पक्ष रखते थे. मगर शासन ने यह निर्णय लिया जब भी शहर की मीटिंग में सरपंच को बुलाया जाए, तब सरपंच आए, उस का प्रतिनिधि या अन्य कोई सरपंच के साथ न आए. ऐसे में गणपत की हालत पतली रहती थी.

इधर भवानीराम के प्रति गणपत के मन में विद्रोह के अंकुर फूट रहे थे. वह अवसर की प्रतीक्षा में था कि कैसे भवानीराम से अपना पिंड छुड़ाए, क्योंकि अभी तक सब उसी पर उंगली उठा रहे थे. आज इसी का नतीजा था कि उस ने भवानीराम से पिंड छुड़ा लिया था. जब गणपत घर पहुंचा तो उस की पत्नी रामकली बोली, ‘‘क्या कहा मालिक ने?’’ ‘‘उन से संबंध तोड़ आया हूं रामकली. मैं उन के कारण बदनाम हो रहा था. सभी मुझे कह रहे थे कि भवानीराम के साए से बचो, तुम्हें बदनाम कर देंगे. जेल की हवा खिला देंगे. तब मैं ने सोचा क्यों न भवानीराम से संबंध तोड़ लूं.’’

‘‘और तुम ने लोगों की बात मान ली,’’ रामकली समझाते हुए बोली, ‘‘लोगों का क्या है, उन्हें तो बदनाम करने में मजा आता है. यह मत भूलो कि भवानीराम के कारण ही आप सरपंच बने हैं, जिन्होंने 3 साल में गांव में खूब काम भी करवाए हैं. एक बात कह देती हूं, भवानीराम से पंगा ले कर आप ने अच्छा नहीं किया, क्योंकि उन के पास आप के खिलाफ वे सारे सुबूत हैं, जिन पर आप ने अंगूठा लगाया है. वे आप को कानूनी पचड़े में फंसा सकते हैं. मेरी मानो तो जा कर भवानीरामजी से माफी मांग आओ.’’

‘‘यह तुम कह रही हो रामकली?’’ गुस्से से गणपत बोला, ‘‘शासन को कितना चूना लगाया है उन्होंने, यह तुम नहीं समझोगी.’’

‘‘मैं नहीं, तुम भी नहीं समझ रहे हो. एक तो तुम्हें आता कुछ नहीं है. अत: एक बार फिर कहती हूं, भवानीरामजी आप को कानूनी मुश्किल में डाल सकते हैं. सोच लो.’’

रामकली की बात सुन कर गणपत सोच में पड़ गया. रामकली उस जैसी अंगूठाछाप नहीं है. वह कुछ पढ़ीलिखी होने के साथ अक्ल भी रखती है. भवानीराम से उस की दुश्मनी उलटी भी पड़ सकती है. यह तो उस ने कभी सोचा ही नहीं था. शासकीय गबन में भवानीराम उसे जेल भी पहुंचा सकते हैं. 3 साल तो उस ने निकाल दिए हैं. अब 2 साल बचे हैं. वे भी निकल जाएंगे. जातेजाते भवानीराम ने उन्हें धमकी देते हुए कहा भी था, ‘मत लगा अंगूठा. कैसे सरपंचगीरी करता है, देखता हूं.’

‘‘क्या सोच रहे हो?’’ रामकली उसे चुप देख कर बोली. ‘‘हां, तुम ठीक कहती हो, रामकली. लोगों के बहकावे में आ कर मुझे मालिक से पंगा नहीं लेना चाहिए था. मैं अभी जाता हूं और मालिक से माफी मांग आता हूं. साथ ही उस कागज पर अंगूठा भी तो लगाना है मुझे,’’ कह कर गणपत बाहर निकल गया. रामकली व्यंग्य से मुसकराती रह गई.

राजस्थान: जादूगर अशोक गहलोत का “खेला”

अभी तक यह माना जाता रहा है कि किसी भी राजनीतिक दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष अथवा कहें “आलाकमान” या फिर “सुप्रीमो” का पद सबसे अहम और महत्वपूर्ण होता है. मगर अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष का पद सोने की प्लेट में सजाकर के अशोक गहलोत को दिया जा रहा था जिसे उन्होंने ठुकरा दिया. और वह भी कुछ इस तरह की राजस्थान मुख्यमंत्री का पद बड़ा है और इसके लिए उन्होंने अपनी 50 साल की राजनीतिक जीवन की प्रतिष्ठा को दांव पर लगा दिया और चाहत है कि मुख्यमंत्री पद बना रहे.

भारतीय राजनीति में यह एक ऐसा समय है, जब राजनीति विज्ञान के छात्रों को साथ ही देश को यह देखने समझने को मिल रहा है कि एक राजनीतिक पार्टी जिस का लंबा इतिहास है और जो सबसे लंबे समय तक देश की सत्ता पर बनी रही अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए लगभग राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का नाम तय था.

मगर देखा यह जा रहा था कि जैसे ही अध्यक्ष पद के लिए अशोक गहलोत का नाम आगे बढ़ने लगा वह स्वयं पीछे हटने लगे और यह बात खुलकर कहीं की मुख्यमंत्री पद और राष्ट्रीय अध्यक्ष दोनों पदों पर अशोक गहलोत रह सकते हैं.

ऐसे समय में राहुल गांधी परिदृश्य में उभरते हैं और कहते हैं कि कांग्रेस का यह नियम है कि “एक व्यक्ति एक पद” जिसे अशोक गहलोत बिना नानुकुर के स्वीकार कर लेते हैं.

यहां सब ठीक-ठाक दिखाई देता रहा मगर कांग्रेस के अंदर खाने में कुछ और ही खिचड़ी पक रही थी. आज देश के सामने जो दृश्य- ब- दृश्य राजनीतिक खेल देखा गया वह अपने आप में राजनीति का एक ऐसा अध्याय है जिसे शायद कभी भुलाया नहीं जा पाएगा और जब जब राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव होगा अशोक गहलोत की चर्चा होगी. इस तरह उन्होंने अपने मुख्यमंत्री पद को बनाए रखने के लिए एक खेल खेला, यह खेल सब ने देखा है, मगर उसके भीतर का सच, आपको हम इस रिपोर्ट में बताने जा रहे है.

एक राजनीतिक जादूगर

सच तो यह है कि अशोक गहलोत राजनीति में आने से पूर्व एक छोटे से जादूगर थे और सड़कों पर जादू का खेल दिखाया करते थे . किसी फिल्म के सुखद अंत की तरह उनकी जिंदगी में ट्विस्ट हुआ और कांग्रेस पार्टी में आने के बाद  धीरे-धीरे आगे बढ़ते चले गए और राजस्थान के मुख्यमंत्री बन गए. सभी जानते हैं कि वर्तमान में कांग्रेस गांधी परिवार आलाकमान के सबसे चहेते शख्स हैं. यही कारण है कि अशोक गहलोत को सोनिया गांधी राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनाने के लिए तैयार थे. अंदर खाने का सच राजनीति के पैंतरे बाजी को देखने वाले समझते हैं. मगर जैसे कि किसी कहानी में आपने पढ़ा होगा कि किसी एक शख्स की जान तोते में थी वैसे ही शायद मुख्यमंत्री के रूप में अशोक गहलोत की जान या कहें राजनीति में उनकी चाहत मुख्यमंत्री पद तक सीमित थी या यह भी कह सकते हैं कि अशोक गहलोत यह जानते हैं कि  कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद कितना कांटो भरा है और मुख्यमंत्री पद की सुख सुविधाओं को छोड़कर प्रदेश की राजनीति से राष्ट्रीय राजनीति में अध्यक्ष की भूमिका का निर्वाहन उनके लिए कितना चुनौती भरा होगा और हो सकता है वे सारी बाजी ही हार जाए.

तो राजनीति के पटल पर राजस्थान के इस जादूगर ने जो खेल दिखाया उसे देख कर के सब दंग रह गए राजस्थान में जिस तरह विधायकों ने सचिन पायलट के खिलाफ खड़े होकर के विधानसभा अध्यक्ष को अपना इस्तीफा सौंप दिया यह दृश्य देख कर के लोगों की मानो धड़कन बढ़ गई.

और तो और कांग्रेसी आलाकमान श्रीमती सोनिया गांधी और राहुल गांधी दोनों ही मानो क्षुब्ध हो उठे. मगर राजनीति की त्रासदी देखिए इसके बाद जैसा कि होना था अशोक गहलोत अध्यक्ष पद से छुटकारा तो पा ही गए उन पर आलाकमान ने कोई गाज भी नहीं गिराई है.

हां, कहने के लिए आलाकमान ने राजस्थान के 3 बड़े कांग्रेस के चेहरों को नोटिस जो थमा दिया है. हो सकता है छोटी बड़ी कार्रवाई भी हो मगर सबसे बड़ी बात यह है कि इस सारे जादू को दिखाने वाले जादूगर अशोक गहलोत का बाल भी बांका नहीं हुआ और वह अपना खेल दिखा कर मुस्कुराते हुए मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे शान से अट्टहास लगा रहे हैं .

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