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Hindi Family Story : संकर्षण – आशीष की पत्नी ने किस के बच्चे को जन्म दिया ?

Hindi Family Story : अपने बचपन के मित्र गगन के यहां से लौटते हुए मेरे पति बारबार एक ही प्रश्न किए जा रहे थे, ‘‘अरे देखो न संकर्षण की शक्लसूरत, व्यवहार सब कुछ गगन से कितना मिलताजुलता है. लगता है जैसे उस का डुप्लिकेट हो. बस नाक तुम्हारी तरह है. मेरा तो जैसे उसे कुछ मिला ही नहीं.’’

‘‘मिला क्यों नहीं है? बुद्धि तुम्हारी तरह ही है. तुम्हारी ही तरह जहीन है.’’

‘‘हां, वह तो है, पर फिर भी शक्लसूरत और आदतें कुछ तो मिलनी चाहिए थीं.’’

‘‘शक्लसूरत और आदतें तो इनसान के अपनेअपने परिवेश के अनुसार बनती हैं और हो सकता है उस के गर्भ में आने के बाद से ही मैं ने उसे गगन भाई साहब को देने का मन बना लिया था. इसी कारण उन जैसी शक्लसूरत हो गई हो.’’

‘‘हां, तुम ठीक कहती हो, पर यार तुम बहुत महान हो. खुशीखुशी अपना बच्चा गगन की झोली में डाल दिया.’’

‘‘क्या करूं? मुझ से उन लोगों की तकलीफ देखी नहीं जा रही थी. गगन भाई साहब और श्रुति भाभी को हम लोगों ने कोई गैर नहीं समझा. आप के लंदन रहने के दौरान हमारे पिताजी और हमारे बच्चों का कितना ध्यान रखा.’’

‘‘हां, यह बात तो है. गगन और भाभीजी के साथ कभी पराएपन का बोध नहीं हुआ. फिर भी एक मां के लिए अपनी संतान किसी और को दे देना बड़े जीवट का काम है. मेरा तो आज भी मन कर रहा था कि उसे अपने साथ लेते चलूं.’’

‘‘कैसी बात करते हैं आप? देखा नहीं कैसे गगन भाई साहब और श्रुति भाभीजी की पूरी दुनिया उसी के इर्दगिर्द सिमट कर रह गई है.’’

‘‘सच कह रही हो और संकर्षण भी उन्हीं को अपने मातापिता समझता है. अपने असली मातापिता के बारे में जानता भी नहीं.’’

शुक्र है मेरे पति को किसी प्रकार का शक नहीं हुआ वरना मैं तो डर ही गई थी कि कहीं यह राज उन पर उजागर न हो जाए कि संकर्षण के पिता वास्तव में गगन ही हैं. आज 17 वर्षों के वैवाहिक जीवन में यही एक ऐसा राज है जिसे मैं ने अपने पति से छिपा कर रखा है और शायद अंतिम भी. इस रहस्य को हम परिस्थितिवश हुई गलती की संज्ञा तो दे सकते हैं, पर अपराध की कतई नहीं. फिर भी जानती हूं इस रहस्य से परदा उठने पर 2 परिवार तबाह हो जाएंगे, इसलिए इस रहस्य को सीने में दबाए रखे हूं.

गगन इन के बचपन के मित्र हैं. गगन जहां दुबलेपतले, शांत और कुछकुछ पढ़ने में कमजोर थे वहीं मेरे पति गुस्सैल, कदकाठी के अच्छे और जहीन थे. घर का परिवेश भी दोनों का नितांत भिन्न था. गगन एक गरीब परिवार से संबंध रखते थे और मेरे पति उच्च मध्यवर्गीय परिवार से. इतनी भिन्नताएं होते हुए भी दोनों की दोस्ती मिसाल देने लायक थी. गगन को कोई भूल से भी कुछ कह देता तो उस की खैर नहीं होती. वहीं मेरे पति आशीष की कही हुई हर बात गगन के लिए ब्रह्मवाक्य से कम नहीं होती.

धीरेधीरे समय बीता और मेरे पति का आईएएस में चयन हो गया और गगन ने अपना छोटामोटा बिजनैस शुरू किया, जिस में हमारे ससुर ने भी आर्थिक सहयोग दिया. मेरी सास की मृत्यु मेरे पति के पढ़ते समय ही हो गई थी. उस समय गगन की मां ने ही मेरे पति को मां का प्यार दिया और ससुर भी कभी गगन को अपने परिवार से अलग नहीं समझते थे और कहते थे कि कुदरत ने उन्हें 2 बेटे दिए हैं. एक आशीष और दूसरा गगन.

संयोग देखो कि दोनों के विवाह के बाद जब मैं और श्रुति आईं तो भी उन दोनों के परिवार में किसी प्रकार का भी अलगाव न आया. मेरी और श्रुति की अच्छी बनती थी. हालांकि जब भी लोग हम चारों की मित्रता को देखते तो कहते कि यह मैत्री भी शायद कुदरत का चमत्कार है, जहां 2 भिन्न परिवेश और भिन्न सोच वाले व्यक्ति अभिन्न हो गए थे. मुझे पति के तबादलों के कारण कई शहरों में रहना पड़ा. ऐसे में ससुर अकेले पड़ गए थे. उन्हें अपना शहर छोड़ कर यों शहरशहर भटकना गंवारा न था. ऐसे में गगन और उन की पत्नी ही उन का पूरा खयाल रखते, बेटेबहू की कमी महसूस न होने देते.

समय बीतता रहा. जहां मैं 2 बच्चों की मां बन गई, वहीं गगन की पत्नी को कई बार गर्भ तो ठहरा पर गर्भपात हो गया. डाक्टर का कहना था कि उन की पत्नी की कोख में कुछ ऐसी गड़बड़ी है कि वह गर्भ पनपने ही नहीं देती. हर बार गर्भपात के बाद दोनों पतिपत्नी बहुत मायूस हो जाते. गगन की पत्नी श्रुति का तो और भी बुरा हाल हो जाता. एक तो गर्भपात की कमजोरी और दूसरा मानसिक अवसाद. दिन पर दिन उन का स्वास्थ्य गिरने लगा. डाक्टर ने सलाह दी कि अब खुद के बच्चे के बारे में भूल जाएं. या तो कोई बच्चा गोद ले लें या किराए की कोख का प्रबंध कर लें वरना पत्नी के जीवन पर संकट आ सकता है.

पर उन पतिपत्नी को डाक्टर की बात रास नहीं आई. गगन मुझ से कहते, ‘‘भाभी अब मैडिकल साइंस ने बहुत तरक्की कर ली है. अगर कुछ कमी है तो क्या वह दवा से दूर हो सकती है. इस शहर के सब डाक्टर पागल हैं. मैं देश के सब से बड़े गाइनोकोलौजिस्ट को दिखाऊंगा, देखिएगा हमारे घर भी अपने बच्चे की किलकारियां गूजेंगी.’’

और सच में उन्होंने देश के सब से मशहूर गाइनोकोलौजिस्ट को दिखाया. उन्होंने आशा बंधाई कि टाइम लगेगा, पर सब कुछ ठीक हो जाएगा. इधर मेरे पति को डैपुटेशन पर 3 सालों के लिए लंदन जाना पड़ा. मैं नहीं जा सकी. बच्चे पढ़ने लायक हो गए थे और ससुर भी अस्वस्थ रहने लगे थे. अब उन्हें केवल गगन के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता था. आखिर हम पतिपत्नी का भी तो कोई उत्तरदायित्व था.

आशीष के लंदन प्रवास के दौरान ही ससुर की मृत्यु हो गई. किसी प्रकार कुछ दिनों की छुट्टी ले कर आशीष आए फिर चले गए. इधर गगन की पत्नी को पुन: गर्भ ठहरा. अब की बार हर प्रकार की सावधानी बरती गई. गगन अपनी पत्नी को जमीन पर पांव ही नहीं धरने देते. वैसे डाक्टर ने भी कंप्लीट बैड रैस्ट के लिए कह रखा था.

डाक्टर ने अल्ट्रासाउंड वगैरह करवाने को भी मन कर दिया था ताकि उस की रेज से भी गर्भ को नुकसान न पहुंचे. धीरेधीरे गर्भ पूरे समय का हो गया. गगन, उन की पत्नी और उन की मां का चेहरा बच्चे के आने की खुशी में पुलकित रहने लगा. प्रसन्नता मुझे भी कम न थी.

नियत समय में श्रुति को प्रसववेदना शुरू हो गई. लगता था सब कुछ सामान्य हो जाएगा. मैं भी अपने बच्चों को मां के पास छोड़ कर गगन के परिवार के साथ थी. आखिरकार इस मुश्किल घड़ी में मैं उन का साथ न देती तो कौन देता. पर 1 हफ्ते तक प्रसववेदना का कोई परिणाम न निकला. डाक्टर भी सामान्य डिलिवरी की प्रतीक्षा करतेकरते थक गई थीं.

अंत में उन्होंने औपरेशन का फैसला लिया और औपरेशन से जिस बच्चे ने जन्म लिया, वह भयानक शक्ल वाला 2 सिर और 3 हाथ का बालक था. जन्म लेते ही उस ने इतने जोर का रुदन किया कि सारी नर्सें उसे वहीं छोड़ कर डर कर भाग गईं.

डाक्टर ने यह खबर गगन को दी. गगन भी बच्चे को देख कर हैरान रह गए. यह तो अच्छा हुआ कि बच्चा आधे घंटे में ही इस दुनिया से चल दिया. गगन की पत्नी बेहोश थीं.

गगन जब बच्चे को दफना कर लौटे तो इतने थकेहारे, बेबस लग रहे थे कि पूछो मत.

गगन की मां ने मुझ से कहा, ‘‘सीमा तुम गगन को ले कर घर जाओ. बहुत परेशान है वह. थोड़ा आराम करेगा तो इस परेशानी से निकलेगा. मैं हौस्पिटल में रुकती हूं.’’

मैं ने विरोध भी किया, ‘‘आंटी, आप और गगन भाई साहब चले जाएं. मैं यहां रुकती हूं.’’

मगर गगन एकदम से उठ कर खड़े हो गए. बोले, ‘‘चलिए भाभी चलते हैं.’’

मैं और गगन कमरे में आ गए. कमरे में आ कर मैं ने गगन के ऊपर सांत्वना भरा हाथ रखा

भर था कि उन का इतनी देर का रोका सब्र का बांध टूट गया.

वे मेरी गोद में सिर रख कर फफकफफक कर रोने लगे, ‘‘मैं क्या करूं भाभी? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है. श्रुति जब होश में आएगी तो मैं उसे क्या जवाब दूंगा? इस से अच्छा होता वह गर्भ में आया ही न होता… श्रुति क्या यह सदमा बरदाश्त कर पाएगी? मुझे उस की बड़ी फिक्र हो रही है. उस का सामना करने की हिम्मत मुझ में नहीं है. मैं कहीं चला जाऊंगा. भाभी आप ही उसे संभालिएगा.’’

मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि किन शब्दों में उन्हें सांत्वना दूं. केवल उन के बाल सहलाती रही. हम दोनों को ही उस मुद्रा में झपकी सी आ गई और उस दौरान कब प्रकृति और पुरुष का मिलन हो गया हम दोनों ही समझ न पाए. गगन अपराधबोध से भर उठे थे. अपराधबोध मुझे भी कम न था, क्योंकि जो कुछ भी हम दोनों के बीच हुआ था उसे न तो बलात्कार की संज्ञा दी जा सकती थी और न ही बेवफाई की. हम दोनों ही समानरूप से अपराधी थे… परिस्थितियों के षड्यंत्र का शिकार.

गगन अपनी पत्नी को ले कर दूर किसी पर्वतीय स्थल पर चले गए थे. आशीष को कुछ दिन बाद ही लंदन से लौटना था और हम लोगों को ले कर वापस जाना था, क्योंकि आशीष को वहां पर काफी अच्छी जौब मिल गई थी. उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया था. मुझे देश और इतनी अच्छी नौकरी छोड़ कर विदेश जाना स्वीकार न था, पर आशीष पर तो पैसे और विदेश का भूत सवार था. आशीष आए तभी मुझे पता चला कि मैं फिर से मां बनने वाली हूं. मुझे अच्छी तरह से पता था कि यह बच्चा गगन का है.

आशीष को पता चला तो वे आश्चर्य में पड़ गए. बोले, ‘‘इतनी सावधानियों के बाद ऐसा कैसे हो सकता है?’’

मैं ने कहा, ‘‘अब हो गया है तो क्या करें?’’

आशीष बोले, ‘‘अबौर्शन करवा लो. अभी नए देश में खुद को और बच्चों को ऐडजस्ट करने में समय लगेगा. यह सब झमेला कैसे चल पाएगा?’’

मैं ने कहा, ‘‘मैं एक बात सोचती हूं. श्रुति भाभी बहुत दुखी हैं, डिप्रैशन में आ गई हैं, शायद अब उन का दूसरा बच्चा हो भी न? तो क्यों न हम इस बच्चे को उन लोगों को दे दें.’’

‘‘तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं है? अपना बच्चा कोई कैसे दूसरे को दे सकता है?’’ आशीष बोले.

‘‘क्यों? वे लोग कोई गैर तो नहीं हैं… फिर तुम अबौर्शन कराने की बात कर रहे थे… कम से कम जीवित तो रहेगा और उन लोगों के जीवन में खुशियां भर देगा.’’

‘‘वह तो ठीक है,’’ आशीष ने हथियार डालते हुए कहा, ‘‘पर क्या गगन और भाभी इस के लिए मान जाएंगे?’’

‘‘चलिए, बात कर के देखते हैं.’’

जब हम लोगों ने गगन भाई साहब और श्रुति भाभी से इस संबंध में बात की तो वे विश्वास न कर सके.

गगन बोले, ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है भाभी? आप अपना बच्चा हमें दे देंगे.’’

मैं ने कहा, ‘‘हमारा और आप का बच्चा अलग थोड़े ही है.’’

मेरी इस बात पर गगन ने चौंक कर मेरी आंखों में देखा. मैं ने भी उन की आंखों में देखते हुए अपनी बात जारी रखी, ‘‘कृष्ण के भाई बलराम की कहानी जानते हैं न? उन्हें संकर्षण विधि द्वारा देवकी के गर्भ से रोहिणी के गर्भ में प्रतिस्थापित कर दिया गया था तो यही समझिए कि यह आप लोगों का ही बच्चा है, केवल गर्भ में मेरे है. अगर बेटा होगा तो आप लोग नाम संकर्षण ही रखिएगा.’’

मगर न श्रुति को और न ही आशीष को इतनी पौराणिक कथाओं का ज्ञान था, केवल मैं और गगन ही इस अंतनिहित भाव को समझ सके. फिर मैं ने कहा, ‘‘मुझे पूरा विश्वास है कि आप लोग उसे पूरा प्यार देंगे.’’

बच्चे की कल्पना मात्र से गगन की पत्नी की आंखों में चमक आ गई. बोलीं, ‘‘सच भाभी क्या आप ऐसा कर पाएंगी?’’

‘‘क्यों नहीं? आप कोई गैर थोड़ी न हैं.’’

आपसी सहमति बनी कि मैं अभी आशीष के साथ नहीं जाऊंगी. बच्चे को जन्म देने पर उसे श्रुति को सौंप लंदन जाऊंगी. मैं ने ऐसा किया भी. बच्चे को हौस्पिटल से निकलते ही श्रुति की गोद में डाल दिया और आशीष के पास बच्चों के साथ लंदन चली गई.

तब से कई बार भारत आना हुआ पर मायके से ही हो कर लौट गई. डरती थी कहीं मेरा मातृत्व न जाग जाए. कभीकभी इस बात पर क्षोभ भी होता कि मैं ने बेकार ही अपने बच्चे को पराई गोद में डाल दिया. फिर लगता शायद मैं ने ठीक ही किया, नहीं तो उसे देख कर एक अपराधभाव मन में हमेशा बना रहता.

आशीष सारे तथ्यों से अनजान थे. तभी तो उन का पितृत्व जबतब अपने बच्चे से मिलने को बेचैन हो उठता. उन्हीं की जिद थी कि अब की बार गगनजी के यहां जाने का कार्यक्रम बना. संकर्षण से मिल कर आशीष की प्रतिक्रिया से मुझे तो डर ही लग गया था कि कहीं इस रहस्य से परदा न उठ जाए और 2 परिवारों की सुखशांति भंग हो जाए.

मगर आशीष के मुझ पर और गगन पर अटूट विश्वास ने उन की सोच की दिशा इस ओर नहीं मोड़ी वरना मैं फंस जाती, क्योंकि आज तक न तो मैं ने कभी उन से झूठ बोला है और न ही कोई बात छिपाई है, विश्वासघात तो दूर की बात है और इतना तो मैं आज भी मन से कह सकती हूं कि मैं ने और गगन ने न तो कोई विश्वासघात किया है और न ही कोई बेवफाई. गलती जरूर हुई है. पर हां यह बात छिपाने को विवश जरूर हूं, क्योंकि इस गलती का पता लगने पर

2 परिवार व्यर्थ में विघटन की कगार पर पहुंच जाएंगे. इसीलिए मैं इस विषय पर एकदम चुप हूं. Hindi Family Story :

Sydney Terror Attack : सिडनी में आतंकी हमला; धार्मिक कट्टरता फिर कटघरे में

Sydney Terror Attack : सिडनी में यहूदियों पर हुआ आतंकी हमला हमें एक बार फिर यह सोचने को मजबूर करता है कि क्या हम धर्म को इंसानियत से ऊपर रख रहे हैं? अगर ऐसा नहीं, तो हार हमारी है, चाहे पीड़ित कोई भी समुदाय क्यों न हो.

ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में बोंडी बीच पर हुए आतंकी हमले में 16 लोगों की मौत हुई है और 40 से ज्यादा लोग घायल हैं. यह हमला उस वक्त हुआ जब वहां यहूदी समुदाय का “हनुक्का” त्योहार मनाया जा रहा था. हनुक्का एक पारंपरिक यहूदी प्रकाश उत्सव है. जिसे बोंडी बीच पर “हनुका बाय द सी” नाम से मनाया जा रहा था. तभी यहां दो या शायद तीन हमलावरों ने आम लोगों पर गोलीबारी करनी शुरू कर दी. महिलाएं, बूढ़े, जवान और मासूम बच्चे उन की गोलियों का शिकार हो कर मौत की गोद में सो गए. हमला करने वाले दो आतंकी जिनमें से एक मारा गया और दूसरा घायल अवस्था में कस्टडी में है, आपस में बाप-बेटे थे.

साजिद (50 साल) और नवीद अकरम (24 साल) दोनों पाकिस्तानी मूल के थे और लम्बे समय से आस्ट्रेलिया में रह रहे थे. दोनों के पास ऑस्ट्रेलिया की नागरिकता थी. एक आतंकी जो भागने में सफल हुआ उसके बारे में अभी कोई खबर नहीं है. ऑस्ट्रेलियाई पुलिस के मुताबिक साजिद के पास 6 बंदूकों के वैध लाइसेंस थे. ये सभी हथियार वह साथ ले कर आया था.

गौरतलब है कि पिछले कई महीने से ऑस्ट्रेलिया के यहूदी समुदाय के लोग यह शिकायत कर रहे थे कि वहां यहूदी-विरोधी घटनाएं तेज़ी से बढ़ रही हैं. इजरायल पर हमास के हमले के बाद से ही आस्ट्रेलिया में यहूदियों को अपने लिए खतरे का अहसास होना शुरू हो गया था. बीते एक साल में ऑस्ट्रेलिया में 1,600 से ज्यादा यहूदी-विरोधी घटनाएं दर्ज हुई हैं, जिनमें दर्जनों हमले और तोड़फोड़ की घटनाएं और सैकड़ों अपमानजनक या धमकी भरे मामले शामिल हैं.

7 अक्तूबर 2023 को इजराइल पर हमास के हमले के बाद जिस तरह निर्दोष फिलिस्तीनियों का खात्मा करने की नीयत से इजरायल सरकार ने फिलिस्तीन में खून की नदियां बहाईं, उस से अनेक देशों में यहूदियों के खिलाफ हमले, तोड़फोड़ और डरानेधमकाने जैसी घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं. आस्ट्रेलिया में तो ऐसी घटनाएं तीन गुना बढ़ी हैं. पिछले साल सिडनी और मेलबर्न में यहूदियों के खिलाफ हमलों ने देश को हिला दिया था. इन शहरों में आस्ट्रेलिया की 85 फीसदी यहूदी आबादी रहती है. आम यहूदी नागरिकों पर इन हमलों ने ऑस्ट्रेलिया जैसे बहुसांस्कृतिक और क़ानून-प्रधान देश को झकझोर दिया है. ये घटनाएं किसी एक समुदाय के विरुद्ध अपराध भर नहीं हैं, बल्कि यह इंसानियत और लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा आघात हैं. सवाल यह भी है कि आखिर यहूदियों के प्रति इतनी नफरत क्यों है? और इस के लिए खुद यहूदी किसी हद तक ज़िम्मेदार हैं?

यहूदियों के ख़िलाफ़ नफ़रत कोई नई परिघटना नहीं है. यूरोप में मध्ययुग से ले कर आधुनिक काल तक यहूदियों को कभी “ईसा-विरोधी”, कभी “सूदख़ोर”, तो कभी “षड्यंत्रकारी” बताकर निशाना बनाया गया. प्लेग जैसी महामारियों से ले कर आर्थिक संकटों तक, हर असहजता का दोष यहूदियों पर मढ़ दिया गया. इस ऐतिहासिक अन्याय की चरम परिणति नाजी जर्मनी का होलोकास्ट था, जिसमें साठ लाख से अधिक यहूदियों की हत्या हुई. और इस सब के पीछे हर धर्म की संकीर्ण सोच जिम्मेदार है.

आज के दौर में यह नफ़रत नए रूप में सामने आती है. इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष, विशेष कर गाजा में होने वाली हिंसा ने दुनिया भर में भावनाएं भड़काई हैं. इजराइल सरकार की नीतियों के प्रति रोष कई जगहों पर यहूदियों के खिलाफ नफरत में बदल गया है, जबकि इजरायल की सरकार और दुनिया भर के यहूदी एक नहीं हैं. सोशल मीडिया ने इस प्रक्रिया को और तेज किया है तो वहीं आधे-अधूरे वीडियो, भड़काऊ पोस्ट बिना किसी संदर्भ के फैलते रहते हैं. नतीजा यह कि कट्टरपंथी समूह, चाहे वे अति दक्षिणपंथी हों या धार्मिक उग्रवादी, इस माहौल का लाभ उठा कर यहूदियों को सामूहिक अपराधी के रूप में चित्रित करते हैं और अपने धर्म के ‘असुरी ज्ञान’ के प्रकाश में खून की होली खेलते हैं.

सिडनी की घटना यह उजागर करती है कि आधुनिक समाजों में धार्मिक पहचान को ले कर असहिष्णुता किस हद तक बढ़ चुकी है. सोशल मीडिया और उग्र राजनीतिक भाषणों ने नफरत को वैधता दी है. धार्मिक अफवाहों, आधे-अधूरे सच और षड्यंत्र सिद्धांत ने कम समझदार लोगों के मन में, जो संख्या में कहीं अधिक हैं, डर और गुस्सा भर दिया है, जो अंततः हिंसा के रूप में सामने आता है. सिडनी जैसे बहुसांस्कृतिक और शांत माने जाने वाले शहर में यहूदियों को निशाना बना कर किया गया आतंकी हमला पूरी दुनिया के लिए एक चेतावनी है. ये बेहद खतरनाक है कि एक पिता इस्लामिक जिहाद के नाम पर अपने 24 साल के बेटे के साथ आतंकी हमला करने निकलता है. बोंडी बीच की तस्वीरें हमें इसी साल 22 अप्रैल को भारत में हुए पहलगाम आतंकी हमले की याद दिलाती हैं. उस हमले में भी आतंकियों ने धर्म पूछकर हिंदुओं को बेरहमी से मारा था. भारत के भीतरी क्षेत्रों में धर्म पूछ कर होने वाली मुसलमानों की मॉब लिंचिंग भी धर्म की ‘असुरी शक्तियों’ का तांडव है.

आतंकवाद का इतिहास बताता है कि उस का कोई एक धर्म नहीं है, बल्कि वह सभी धर्मों में निवास करता है. वह कभी इसलाम के नाम पर सामने आता है, कभी ईसाई पहचान के साथ, कभी यहूदी विरोध के रूप में और कभी किसी और धार्मिक या वैचारिक आवरण में. सिडनी की घटना भी इसी सिलसिले की एक कड़ी है, जहां यहूदियों को केवल उन की धार्मिक पहचान के कारण निशाना बनाया गया. यह नफ़रत किसी एक देश या समाज तक सीमित नहीं है; यह वैश्विक स्तर पर फैलती  बीमारी है, जो असुरक्षा, डर और अफवाहों के सहारे पनपती है.

हालांकि दुनिया भर के यहूदी न तो एक जैसी राजनीति रखते हैं, न एक जैसे विचार. आस्ट्रेलिया, अमेरिका या भारत में रहने वाला आम यहूदी नागरिक न गाजा पर बम गिराता है, न वैश्विक नीतियों तय करता है. हां, परन्तु यह भी सच है कि कुछ यहूदी संगठन या प्रभावशाली लौबी समूह, विशेष कर पश्चिमी देशों में, इजराइली सरकार की हर कार्रवाई का बिना शर्त बचाव करते दिखाई देते हैं. इस से आलोचना और नफरत के बीच की रेखा धुंधली होती है. आलोचना का जवाब संवाद से दिया जाना चाहिए, दमन से नहीं. और कुछ संगठनों या व्यक्तियों के रुख़ के कारण पूरे यहूदी समाज को निशाने पर लेना सरासर अन्याय है.

यहूदियों के खिलाफ बढ़ती हिंसा सिर्फ यहूदियों की समस्या नहीं है. इतिहास गवाह है कि नफरत की आग एक बार भड़की तो वह किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं रहती है. आज यहूदी निशाने पर हैं, कल कोई और हो सकता है. लोकतंत्र की परीक्षा यहीं होती है कि वह अल्पसंख्यकों को कितना सुरक्षित रख पाता है.

सिडनी में यहूदियों पर हुआ आतंकी हमला हमें एक बार फिर यह सोचने को मजबूर करता है कि क्या हम धर्म को इंसानियत से ऊपर रख रहे हैं. अगर ऐसा नहीं, तो हार हमारी है, चाहे पीड़ित कोई भी समुदाय क्यों न हो. आतंक का जवाब इंसानी मूल्यों की मज़बूत पुनर्स्थापना है. यही एकमात्र रास्ता है जिस से भविष्य में ऐसे हमलों की पुनरावृत्ति रोकी जा सकती है.

आस्ट्रेलिया जैसे देशों में यह घटनाएं चेतावनी है कि बहुसंस्कृतिवाद सिर्फ़ नारा नहीं, रोजमर्रा की जिम्मेदारी है. कानून का सख्त पालन, घृणा अपराधों पर त्वरित कार्रवाई और शिक्षा के जरिये इतिहास की सही समझ पैदा करना ही सही रास्ता है. Sydney Terror Attack :

Terrorism In India : लाल किला धमाका; जारी हैं आतंकवादी हमले

Terrorism In India : 10 नवंबर की शाम दिल्ली में हुए आतंकी बम ब्लास्ट से पूरा देश दहल गया. धमाका लाल किले के नजदीक बने मेट्रो स्टेशन के पास हुआ. इस आतंकी हमले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

10 नवंबर की शाम 6.52 बजे दिल्ली स्थित लाल किले के पास मेट्रो स्टेशन के गेट न. 1 के सामने भीड़ भरी सड़क पर विस्फोटकों से भरी हुंडई आई-20 कार में हुआ धमाका इतना भयावह था कि उस के 100 मीटर के दायरे में आने वाले तमाम वाहनों के परखच्चे उड़ गए. सड़क पर गाड़ियां और अन्य वाहन धूं धूं कर जल उठे. लाल किले के समीप ट्रैफिक लाइट पर रुकने के बाद उस कार में अचानक विस्फोट हुआ था.

इस धमाके में 13 लोग मारे गए और 2 दर्जन से ज्यादा घायल हो कर अस्पताल में पड़े हैं. विस्फोट इतना जबरदस्त था कि आसपास के भवनों की खिड़कियां टूट गईं. पुलिस के मुताबिक उस कार में 3 लोग सवार थे जिन के शरीर के चिथड़े उड़ गए.

यह भारत पर हुआ एक और फिदायीन हमला था, जिस को आतंकी हमला घोषित करने में मोदी सरकार को 48 घंटे का समय लग गया जबकि पिछले पहलगाम हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर चलाने वाली मोदी सरकार ने कहा था कि अब यदि कोई आतंकी हमला भारत पर हुआ तो उसे युद्ध के रूप में देखा जाएगा और पाकिस्तान इस के लिए तैयार रहे.

हैरानी की बात यह है कि ‘चौकीदार’ सरकार के तमाम चौकन्नेपन के बाद भी भारत में आतंकवाद रुकने का नाम नहीं ले रहा और इस बार तो आतंकी कोई बाहर से आए लोग नहीं, बल्कि अपने ही देश के लोग है, जो पढ़े लिखे, डॉक्टर-इंजीनियर की डिग्री लिए हुए हैं और बाकायदा देश के अनेक संस्थानों में कार्यरत हैं.

घटना के बाद जो लोग पकड़े जा रहे हैं उन में कोई फरीदाबाद में डॉक्टर है, कोई कानपुर में, कोई जम्मू कश्मीर में तो कोई लखनऊ में. इन के घरों से भारी मात्रा में विस्फोटक सामग्री और हथियार बरामद हुए हैं. हद तो यह है कि देश में सालों से चल रहे कई मेडिकल शिक्षण संस्थानों के नाम भी आतंकवाद की पैदावार तैयार करने में सामने आ रहा है.

पहलगाम में जब 26 सैलानियों को चुन चुन कर मारा गया था, तब आतंकवादियों ने साफ शब्दों में उन के परिवारों को धमकियां दी थीं पर यहां इस मामले में इन पंक्तियों को लिखे जाने तक यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि आखिर अल फतह विश्वविद्यालय से जुड़े आतंकियों का मकसद था क्या?

यह सवाल जरूरी इसलिए है कि आतंकवादियों की समझ का तो पता चले कि उन का गुस्सा केंद्र सरकार पर है, हिंदू संगठनों पर है, हिंदू जनता है या सिर्फ बेमतलब का जिहादी जुनून है कि बम विस्फोट करना आता है तो किसी को धमका दो.

तीन-तीन टन विस्फोटक और हथियार आतंकी डॉक्टरों के घरों से बरामद हुआ. आखिर इतना बड़ा जखीरा उन के घरों तक यह पहुंचा कैसे? वैसे मोदी सरकार तो आज तक उस सवाल का जवाब भी नहीं दे पाई कि 14 फरवरी, 2019 को पुलवामा में सीआरपीएफ जवानों को ले जा रही बस पर हुए हमले में भारी मात्रा में प्रयुक्त विस्फोटक वहां तक कैसे पहुंचा? वहां निशाने पर कम से कम सैनिक तो थे, यहां लाल किले के विस्फोट में कौन निशाने पर था, पता नहीं.

देश में हुए हर आतंकी हमले में बेकुसूर गरीब जनता मारी जाती है और अनेक घायल हो कर लंबे समय तक अपने खर्चे पर अस्पताल में पड़े रहते हैं. लोगों के अंग भंग हो जाते हैं. कितनों के घर उजड़ जाते हैं. बच्चे अनाथ हो जाते हैं. औरतें विधवा हो जाती हैं. मां बाप अपने जिगर के टुकड़ों को खो कर हमेशा के लिए बेबस और हताशा की जिंदगी में कैद हो जाते हैं. आतंकी हमलों में मरने वाले हिंदू भी होते हैं और मुसलमान भी.

हिंदुओं को मारने की घटनाओं को तो एक बार समझा जा सकता है पर जामा मस्जिद और लाल किले के बीच की जगह-जगह मुसलमानों की संख्या हर समय ज्यादा रहती है, आखिर विस्फोट किस गुस्से में किया गया होगा क्योंकि इस बार के धमाके में भी हिंदू और मुसलमान दोनों कौमों के लोग मारे गए. मरने वालों में अधिकांश लोग अपने घर के अकेले कमाने वाले थे. वे जो किसी दुकान में काम करते थे, रिक्शा चलाते थे, ठेला खींचते थे या अपने घर जाने की राह में थे और लाल बत्ती पर रुके हुए थे.

28 साल के मोहसिन मलिक जो मूल रूप से मेरठ के रहने वाले थे, पिछले कुछ सालों से दिल्ली के सिविल लाइन्स में रह कर लाल किले के नजदीक ई-रिक्शा चलाया करते थे. जब ब्लास्ट हुआ, मोहसिन उस वाहन से चंद मीटर की दूरी पर खड़े थे. धमाके ने मोहसिन को कई फीट ऊपर उछाल दिया. उस का पूरा शरीर ?ालस कर काला पड़ गया. हाथ पैर चिथड़े हो कर शरीर से अलग हो गए. उस का चेहरा पहचानने लायक नहीं रह गया था.

पुलिस को उस का फोन जमीन पर पड़ा मिला तो उस से परिजनों को एलएनजेपी अस्पताल पहुंचने के लिए कहा गया. रात के साढ़े 12 बजे डॉक्टर ने इमरजेंसी वार्ड में मोहसिन की मौत की पुष्टि की. मोहसिन की बहन रोते हुए वार्ड के बाहर निकली. वह चीख रही थी, ‘‘मेरा भाई चला गया, अब उस के छोटे-छोटे बच्चों को कौन देखेगा. भाभी को कैसे बताऊंगी?’’ रोतेरोते वह बेहोश हो कर गिर पड़ी. उस के साथ आए रिश्तेदार उस को संभालते हुए बाहर लाए.

दिनेश मिश्रा लाल किले के पास चावड़ी बाजार में शादी के कार्ड की दुकान पर काम करते थे. उम्र तकरीबन 35 साल थी. मूल रूप से उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती के रहने वाले दिनेश पिछले 15 सालों से दिल्ली में गुजर बसर कर रहे थे. घर में उन की पत्नी और 3 छोटे बच्चे हैं. दिनेश मिश्रा धमाके में मारे गए. लाल किले के नजदीक विस्फोट की खबर सुन कर उन के भाई ने जब 8 बजे उन को फोन किया तब दिनेश का फोन उठा नहीं. वह भाई को लगातार फोन करता रहा. 11 बजे किसी और ने फोन उठाया और उस को लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में आने के लिए कहा. गुड्डू अस्पताल पहुंचा तो उस को मोर्चरी में भेज दिया गया जहां जमीन पर उस के भाई दिनेश मिश्रा की लाश पड़ी थी.

मोहम्मद जुम्मन लाल किला इलाके में रिक्शा चलाता था. बिहार के रहने वाले जुम्मन का पूरा शरीर जल कर काला पड़ गया था. मोर्चरी में काफी तलाशने के बाद उस की पत्नी ने जुम्मन के शरीर से चिपके कपड़े के कुछ टुकड़ों से उस की पहचान की. वह कहती है, ‘‘कोई भी लाश ऐसी नहीं थी कि देख कर कुछ पता चल सके. हम ने कपड़ों के कुछ टुकड़ों से अपने पति को पहचाना. उस का न सिर था, न पैर’ कह कर वह सिहर उठती है. जुम्मन की मौत से उस की पत्नी और 5 बच्चे गहरे सदमे में हैं.

आतंकवादी को क्या यह एहसास नहीं था कि इस के आसपास के वाहनों में हिंदू-मुस्लिम दोनों होंगे?

इसी तरह की कहानियां दूसरे शिकारों की हैं जिन की चर्चा पिछले दिनों मीडिया में जम कर हुई, जिन में संदीप अग्रवाल, लोकेश, अशोक कुमार, पंकज साहनी, जगदीश कटारिया शामिल हैं.

आतंकवाद की जड़ में धर्म

आज दुनिया का हर दूसरा देश आतंकवाद से त्रस्त है. यह एक वैश्विक संकट है और इस की जड़ है धर्म. हर धर्म अपने को दूसरे से श्रेष्ठ बताता है. श्रेष्ठ बने रहने के लिए वह दूसरे पर वार करता है, उसे डराता है, खौफ पैदा कर के अपने आगे झाकाने की कोशिश करता है. ईसाई, यहूदी, मुसलमान, हिंदू सब अपने को दूसरे से श्रेष्ठ घोषित करने की होड़ में सदियों से निर्दोष मनुष्यों का खून बहा रहे हैं. जितने भी देश धर्म को आगे रख कर चल रहे हैं, वहां दहशतगर्दी का बोलबाला है. औरतों पर जुल्म, बच्चों पर जुल्म और धर्म के खिलाफ बोलने वालों के सिर कलम करने की परंपरा है. चीन और जापान जैसे देशों से आतंकी हमलों की खबरें नहीं आतीं शायद इसलिए कि वे धर्म में नहीं, कर्म में विश्वास करते हैं.

धर्मतंत्र में फंसे लोग हमेशा ही मारकाट करेंगे क्योंकि उन की धर्म की पुस्तकों में यही सब भरा हुआ है.  दुनिया का कोई ऐसा धर्म या धर्मग्रंथ नहीं है जिस में खून खराबा का जिक्र न हो. कोई भी धर्म ऐसा नहीं है जो बिना मार-काट, बिना खून खराबे के अस्तित्व में आया हो. तो जिस की नींव ही कत्लोगारत पर रखी गई हो वह ऊपर से भले प्रेम सौहार्द व भाईचारे की बात करता रहे, असल में वह दूसरे धर्म संप्रदाय को तुच्छ मान कर खत्म करने की कुत्सित विचारधारा को ही आगे बढ़ाता है. आप धर्मग्रंथों में लिखे शब्दों में फेरबदल नहीं कर सकते. कुछ गलत लिखा है तो आप उस पर सवाल नहीं उठा सकते.

संविधान का सहारा

लोकतंत्र इस मायने में थोड़ा उदार है. संविधान की किताब में यदि किसी को कुछ गलत लगता है तो वह उसे अदालत में चुनौती दे सकता है. धर्मग्रंथ में लिखे हुए पर सवाल उठाना मना है. वह गलत भी है तो उस को बदला नहीं जा सकता. संविधान में बदलने की गुंजाइश होती है. सो, आतंकवाद से मुक्ति चाहिए तो धर्म का झंडाबरदार नहीं, बल्कि संविधान का पालनकर्ता बनना होगा.

सरकार अपने शासनकाल की सफलता के चाहे जितने ढोल क्यों न पीटे परंतु यह एक कड़वी सच्चाई है कि देश की आम जनता इन दिनों अपने आप में जितनी बेचैनी महसूस कर रही है तथा स्वयं को जितना असहाय महसूस कर रही है, उतना विचलित समाज पहले कभी नहीं देखा गया.

जम्मू-कश्मीर, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार, हरियाणा, राजस्थान तथा पूर्वोत्तर के कई राज्यों से लगातार आने वाले समाचार अपने आप में यह जानने के लिए काफी हैं कि देश में इस समय चारों ओर एक धुआं सा उठ रहा है. सत्तालोलुपता में हिंदू-मुस्लिम के बीच खाई को ज्यादा से ज्यादा चौड़ा करने की मुहिम चल रही है और यह मुहिम धर्म का झंडा उठा कर ही पूरी की जा सकती है. संविधान तो सब को एक नजर से देखता है.

अगर संविधान की राह पर चल कर इस लोकतंत्र को चलाया जा रहा होता तो आज जांच एजेंसियां धर्म के कारोबारियों के इशारे पर नाचने से बची रहतीं और देश की सुरक्षा का जो जिम्मा उन के कंधों पर है, उस काम को वे अपने पूरे अधिकार और कर्तव्यनिष्ठा के साथ पूरा करतीं. अगर कानून का डर बनाए रखा जाता तो मजाल है कि कोई अपनी कार में विस्फोटक रख कर एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने की हिम्मत भी कर पाता. मगर यहां कानून का खौफ किसे है?

गौरतलब है लाल किले वाली रोड पर आतंकी धमाके के एक दिन पहले ही दिल्ली से सटे फरीदाबाद में 2 अलग-अलग जगहों से 2,923 किलो विस्फोटक बरामद हुआ था. पहले फरीदाबाद के एक घर से 360 किलो विस्फोटक मिला, फिर दूसरे घर से 2,563 किलो विस्फोटक मिला. पहली कार्रवाई में एक डॉक्टर के घर से हथियार और 360 किलो विस्फोटक पदार्थ बरामद किया गया.

यह बरामदगी दिल्ली-एनसीआर पुलिस ने नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर पुलिस ने आ कर की. जिस के घर से यह बरामद हुआ वह एक डॉक्टर है. इस के बाद हुई दूसरी कार्रवाई में फरीदाबाद के एक अन्य घर से 2,563 किलो विस्फोटक बरामद किया गया. इस से पहले अनंतनाग के सरकारी मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर आदिल के लॉकर से एक एके-47 राइफल बरामद हुई थी. आदिल की गिरफ्तारी के बाद एक दूसरे डॉक्टर को भी पकड़ा गया था. अभी यह छापेमारी चल ही रही थी कि लाल किला मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर 1 के पास हुए तेज धमाके ने देश को हिला कर रख दिया.

बड़ी बात यह है कि अब तक जिन्हें पकड़ा गया है उन में से एक भी घुसपैठिया नहीं है. सब यहीं पैदा हुए हैं और शायद सदियों से इसी इलाके में रह रहे हैं जो भारत में है. पढ़े-लिखे इन युवाओं को यह महारत तो होगी ही कि उन के इस काम की वजह से एक पूरी जमात को शक की निगाह से देखा जाएगा. फिर भी ऐसा किया गया, तो गुस्से को समझना भी होगा.

आतंकवादी घटना को अंजाम देने के लिए बड़ा जिगर चाहिए, बड़ी तैयारी की जरूरत होती है. इतनी बड़ी मात्रा में विस्फोटक सामग्री और हथियार देश की राजधानी और उस से सटे राज्यों में आतंकी ले कर बैठे हुए थे. पता नहीं और कहां-कहां ऐसे जखीरे छिपा कर रखे गए हैं. यह काम करना आसान नहीं है.  सुरक्षा बलों की आंख में धूल झांक कर आतंकी इतनी बड़ी विस्फोटकों की खेप देश के भीतरी स्थानों तक आराम से पहुंचा देते हैं. कहीं कोई चेकिंग नहीं, कोई रोकटोक नहीं. जब तक कुछ खबर होती है और कहीं छापेमारी शुरू होती है, आतंकी किसी न किसी करतूत को अंजाम दे चुके होते हैं. जाहिर है, फरीदाबाद में छापेमारी के बाद जब 3 टन विस्फोटक जब्त होने की खबर बाहर आई तो अन्य जगहों पर छिपे बैठे आतंकियों ने स्थान बदलने शुरू कर दिए होंगे. पूरी आशंका है कि इसी कड़ी में लालकिले वाला विस्फोट हो गया हो या जानबूझ कर किया गया हो. यह भी हो सकता है जब पुलिस, इंटेलिजेंस और मीडिया का पूरा ध्यान इस घटना पर केंद्रित रहा हो, देश में छिपे बैठे आतंकियों ने स्थान भी बदल लिए हों और हथियार व बारूद भी दूसरी जगहों पर स्थानांतरित कर दिए हों. Terrorism In India :

Jassi Weds Jassi Movie Review : “पंजाबी शादी के इर्द गिर्द घूमती हिंदी फिल्म”

Jassi Weds Jassi Movie Review : पंजाबी शादी-ब्याहों में मौज-मस्ती खूब होती है. खाना-पीना तो तगड़ा होता ही है, कुड़ियां सज धज कर भंगड़ा करती हैं, बैंड वालों के साथ नाचती हैं. ‘आंख मारे, वो लड़की आंख मारे…’ वाली बातें तो इन शादियों में आम हैं. इन पंजाबी कुढि़यों के कपड़े तो देखो, लिश्कारे मारते हैं.

‘जस्सी वेड्स जस्सी’ पंजाबी शादी के इर्द गिर्द घूमती हिंदी फिल्म है. इस में 1990 के दशक के प्रेम पत्र, हास्य और दिलों को खुश करने वाले पल हैं. फिल्म कॉमेडी से भरी है. शादी में जहां मस्ती होगी, कौमेडी तो अपने आप शुरू हो जाती है.

एक अच्छे हास्य के लिए शोर शराबे की नहीं बल्कि अच्छी लेखनी, ईमानदार अभिनय और पसंदीदा कहानी की जरूरत होती है. यह फिल्म हमें उस जमाने की याद दिलाती है जब प्रेमी जोड़े छिप छिप कर आपस में मिलते थे. अपना प्यार प्रेम पत्रों के जरिए जाहिर करते थे. हद से हद बगीचों में गाने गा लिए जाते थे- ‘तू कितने बरस की, मैं 16 बरस की – तू कितने बरस का, मैं 17 बरस का…’, ‘मिल गए नैना अब की बरस न कहना…’ आदि. आज के सिनेमाई दौर में सिर्फ एक गुदगुदी मुस्कान-सी बन कर उभरती है यह फिल्म. फिल्म दर्शकों को 90 के दशक की याद दिलाती है. फिल्म की कहानी उत्तराखंड के हल्द्वानी शहर की है.

कहानी जसप्रीत उर्फ जस्सी (हर्षवर्धन सिंह) की है जो एक निराश और हताश प्रेमी है, उसे सच्चे प्यार की तलाश है. उस की चाहत उसे जसमीत (रहमत रतन) तक ले जाती है. लेकिन उन के बीच आ जाता है एक और जस्सी यानी जसविंदर जस्सी (सिकंदर खेर). इस के बाद शुरू होती है गलतफहमियों का दौर. इसी दौरान जस्सी सहगल (रणवीर शौरी) और उस की पत्नी स्वीटी (ग्रुशा कपूर) से टकरा जाता है जो शादी से पहले ही ऊब चुके हैं. सब के जीवन में एक तूफान सा आ जाता है और यही दर्शकों को मजा देता है. कहानी त्रिकोणीय उलझन में फंस कर रह जाती है.

इस कहानी की पृष्ठभूमि 1996 की है. उस वक्त युवक युवतियां कैसेट सुनते थे, दोस्तों के साथ तंबोला खेलते थे. ये छोटे छोटे दृश्य उस टाइम की यादें ताजा करते हैं. ‘जस्सी वेड्स जस्सी’ भी दर्शकों को अपने बचपन या युवावस्था की याद दिलाती है.

फिल्म का निर्देशन बढ़िया है. फिल्म का संगीत अच्छा है. सिनेमेटोग्राफी अच्छी है. Jassi Weds Jassi Movie Review :

Baramulla Movie Review : “आतंकवाद का इंटीरियर सिहरन पैदा करता है”

Baramulla Movie Review : यह एक सुपरनैचुरल क्राइम फिल्म है. ‘सुपर नैचुरल’ शब्द उन व्यक्तियों, वस्तुओं या घटनाओं के लिए प्रयुक्त होता है जिन्हें कुछ लोग वास्तविक मानते हैं हालांकि वे प्रकृति से परे होते हैं जैसे कि दिव्य, जादुई प्राणी आदि. इस फिल्म में कोई भूत प्रेत या डराने वाली चीजें नहीं हैं. आप को इस में थ्रिल मिलेगा. फिल्म देखते वक्त आप उत्सुक रहेंगे कि आगे क्या होने वाला है.

बारामूला कश्मीर घाटी का एक जिला है. यह कश्मीर घाटी के लिए एक प्रवेशद्वार रहा है. यहां जब-तब पाकिस्तानी आतंकवादियों की घुसपैठ होती रही है. यह शहर झेलम नदी के किनारे बसा है. निर्देशक आदित्य सुहास जांबले ने इस से पहले ‘आर्टिकल 370’, ‘द कश्मीर फाइल्स’, ‘उरी द सर्जिकल स्ट्राइक’ जैसी उम्दा फिल्में बनाई हैं.

‘बारामूला’ कश्मीर की बर्फ से ढकी घाटियों में बनी एक रहस्यमय फिल्म है, जिस में डर भी है और इमोशंस भी. फिल्म में पुरानी यादें, कश्मीरी पंडितों का दर्द और अलौकिक घटनाएं एक साथ जोड़ते हैं.

कश्मीर की हसीन वादियां अपने दामन में कई जख्म समेटे हुए हैं. कश्मीरी बच्चों का पत्थरबाज बनना हो या कश्मीरी पंडितों का वहां से पलायन, ‘बारामूला’ इन्हीं जख्मों पर मरहम लगाती नजर आती है. घाटी में बच्चों का ब्रेनवाश कर के उन्हें आतंकवादी बनाने से ले कर इस फिल्म की कहानी 90 के दशक में पंडितों के कत्लेआम से जुड़ती है.

‘बारामूला’ की कहानी एक भूतपूर्व एमएलए के मासूम बेटे के गायब होने से शुरू होती है. इस केस को सुलझाने के लिए डीएसपी रिदवान शफी (मानव कौल) अपनी पत्नी गुलनार (भाषा सुम्बली), बेटी नूरी (अरिस्ता मेहता) और अयान (रोहन सिंह) के साथ बारामूला पहुंचता है. रिदवान के पड़ताल करते करते वहां कई और बच्चे गायब हो जाते हैं. वहीं जिस घर में रिदवान का परिवार रहता है वहां गुलनार और उस के बच्चों को अजीबोगरीब साए दिखते हैं. उन्हें उन सायों की परछाइयां भी दिखती है. अजीब आवाजें सुनाई पड़ती हैं, बच्चों का व्यवहार बदल जाता है मगर रिदवान इन सब पर विश्वास नहीं करता.

रिदवान और उस की बेटी के रिश्ते एक हादसे की वजह से सामान्य नहीं हैं. दिखाई देने वाले ये साए कौन हैं, बच्चों के गायब होने से उन का क्या कनेक्शन है, निर्देशक ने इस सब पर रहस्य का परदा डाला हुआ है. क्लाइमैक्स में जाकर रहस्य का पर्दाफाश होता है. क्लाइमैक्स का आधा घंटा असरदार है और झकझोरता है. अंत में रिदवान न सिर्फ अपनी खोई बेटी को ढूंढ़ निकालता है बल्कि बाकी बच्चों का पता भी लगा लेता है.

मध्यांतर से पहले फिल्म रोचक है, मध्यांतर के बाद यह भटकाने का काम करती है. कश्मीर पर अब तक बनी बाकी फिल्मों से यह काफी अलग है.

मानव कौल का किरदार इस माहौल में दर्शकों को उलझाए रखता है. कहानी में कश्मीर की दंतकथाओं में से निकले शैतानी किरदार पासिकदार को उठाया है. इस किरदार को कश्मीर की रियलिटी की कहानियों से बुना गया है. इस कहानी में पुलिस वालों के दर्द को भी बयां किया गया है. फिल्म का संपादन चुस्त है. सिनेमेटोग्राफी एक किरदार की तरह है. कश्मीर की वादियों और अंधेरे को कहानी से जोड़ा गया है. घर का इंटीरियर सिहरन पैदा करता है.

आदित्य सुहास जांबले का निर्देशन अच्छा है. निर्देशक ने अंत तक सस्पेंस बनाए रखा है. मानव कौल अपने किरदार में पूरी तरह फिट है. वह खुद बारामूला का निवासी है. भाषा सुम्बली ने गुलनार के किरदार में एक ऐसी औरत का किरदार निभाया है जो डरी हुई भी है और मजबूत भी. कहीं-कहीं कहानी धीमी हो जाती है. Baramulla Movie Review :

De De Pyaar De 2 Movie Review : “अब ऐसी फिल्में कम बन रहीं”

De De Pyaar De 2 Movie Review : वर्ष 2019 में ‘देदे प्यार दे’ के नाम से एक फिल्म आ चुकी है और अब इस फिल्म की सीक्वल ‘देदे प्यार दे 2’ आई है. इस बार कुछ कलाकार तो पहले भाग वाले हैं, कुछ को नया जोड़ा गया है. यह एक रोमांटिक कॉमेडी मूवी है, जो दर्शकों को मनोरंजन परोसती है. इस में फैमिली कॉमेडी है, उम्र के फासले हैं. यह फिल्म रिश्तों की भी बात करती है.

‘प्यार दे दे, हमें प्यार दे…’ वर्ष 1984 में आई फिल्म ‘शराबी’ का यह गाना खूब चला था. इसे अमिताभ बच्चन और जयाप्रदा पर फिल्माया गया था. मनचले यह गाना गा कर लड़कियों को छेड़ा करते थे. इस गाने को किशोर कुमार और आशा भोंसले ने गाया था.

बॉलीवुड में इस तरह की रोमांटिक फिल्में अब कम ही बन रही हैं. काफी समय बाद हिंदी सिनेमा में एक रोमांटिक कॉमेडी फिल्म देखने को मिली है जिस में अच्छा ह्यूमर है जो अश्लील नहीं है. एक जवान और कमसिन युवती अपने से दोगुने आदमी को अपना जीवनसाथी बनाने का फैसला कर ले तो उथलपुथल मचनी तय है. इसी गड़बड़झले को कॉमेडी, इमोशन और मनोरंजक तरीके से पेश किया गया है. यह फिल्म मध्यांतर से पहले तो दर्शकों को खूब हंसाती है मगर मध्यांतर के बाद लड़खड़ा जाती है.

फिल्म की कहानी आयशा (रकुल प्रीत सिंह) की है, जो 27 वर्ष की हो गई है. उसे 52 साल के तलाकशुदा एनआरआई इन्वेस्टर आशीष मेहरा (अजय देवगन) से प्यार हो जाता है. वह उस से शादी करना चाहती है लेकिन मुश्किल यह है कि माता पिता की रजामंदी कैसे हासिल की जाए. पहले पार्ट में आशीष मेहरा अपनी गर्लफ्रेंड को अपने परिवार वालों से मिलवाता है. उन्हें मनाने में काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है और काफी फनी सीन क्रिएट होते हैं.

अब इस इस के सेकंड पार्ट में उस की गर्लफ्रेंड आयशा आशीष को अपने परिवार से मिलवाने का फैसला करती है. मुश्किल यह है कि परिवार वाले मौडर्न और पढ़े लिखे हैं मगर उन के लिए उम्र से दोगुने से शादी की बात पचा पाना बेहद मुश्किल है. और चूंकि वे आधुनिक होने का क्लेम करते हैं तो इस बात को जगजाहिर भी नहीं करना चाहते.

आयशा अपनी भाभी किट्टू (इशिता दत्ता) की डिलीवरी का समय चुनती है ताकि इस खुशी के मौके पर उस की मम्मी (गौतमी कपूर) और पापा (आर माधवन) उस के रिश्ते के लिए हां कह दें. पहले तो परिवार वालों का रिएक्शन कुछ और था लेकिन आखिरकार वे उन दोनों की शादी के लिए राजी हो जाते हैं.

मतलब, यह लव स्टोरी आयशा के घर आ पहुंची है. शादी के लिए आशीष (अजय देवगन) को आयशा के परिवार की हां चाहिए. आर माधवन और गौतमी आयशा के पेरेंट्स हैं. अपनी बेटी के अफेयर से उन्हें कोई समस्या नहीं है, मगर क्या भारतीय समाज को यह मंजूर होगा?

फिल्म की यह कहानी प्रिडिक्टेबल है. एक ही विषय को घुमा फिरा कर 2 बार बनाना दर्शकों को बेवकूफ बनाने जैसा है. मगर विषय दिलचस्प जरूर है. तरुण जैन और लव रंजन ने ‘दे दे प्यार दे’ की कहानी को इस तरह लिखा है कि प्रोग्रेसिव पेरेंट्स के ईगो और मॉडर्न लव स्टोरी में टकराव दिखाया जा सके.

फिल्म शुरू होते ही जावेद जाफरी (जो पहली फिल्म में अजय देवगन के दोस्त बने हैं) मजेदार तरीके से पिछली फिल्म का रीकैप देता है. अजय देवगन की ही ‘सिंघम’ को कौमेडी के लिए यूज किया गया है. अजय देवगन की पत्नी काजोल कॉमेडी का हिस्सा है. जावेद जाफरी का बेटा मीजान जाफरी ऐसे लड़के की भूमिका में है जिसे आयशा को पटाने के लिए उस के पापा ने काम पर लगा रखा है. फिल्म यह बताने की कोशिश करती है कि प्यार आखिर है क्या. फिल्म उन्हें जरूर अच्छी लग सकती है जो जवान लड़कियों के साथ प्यार करने की हसरतें रखते हैं.

पूरी फिल्म में चटपटे संवाद हैं. फिल्म का नायक तो अजय देवगन है मगर माहौल आर माधवन ने बनाया है. आयशा की मां बनी गौतमी का काम भी बढ़िया है. अजय देवगन लवर की भूमिका में मैच्योर है.

फिल्म कहीं कहीं धीमी हो जाती है. क्लाइमैक्स भी धीमा है. किरदार कन्फ्यूज लगते हैं. रकुल प्रीत सिंह खूबसूरत लगी है. गाने फिल्म को स्लो करते हैं मगर सुनने में वे अच्छे हैं. कुछ सीन बेहद लंबे और गैरजरूरी हैं. सिनेमेटोग्राफी अच्छी है. De De Pyaar De 2 Movie Review :

120 Bahadur Movie Review : “इमोशनल करती भारत-पाक युद्ध की कहानी”

120 Bahadur Movie Review : आजकल तीसरे विश्वयुद्ध की संभावना के बादल दुनिया पर मंडरा रहे हैं. कई देश आपस में लड़ रहे हैं. परमाणु परीक्षण हो रहे हैं, खासकर अमेरिका और रूस में तो आपस में ठन गई है. पहले सिर्फ रूस-यूक्रेन युद्ध हो रहा था मगर जब से अमेरिका में खब्ती राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता संभाली है, तब से उस ने कई देशों को आपस में भिड़ा दिया है ताकि युद्ध चलता रहे और अमेरिका के हथियार लगातार बिकते रहें.

ऐसे दौर में वार फिल्में भी कुछ ज्यादा बनने लगी हैं. पहले कोई वार फिल्म कभी कभी ही देखने को मिलती थी. तब लोग देशभक्ति का गाना गुनगुनाया करते थे- ‘कर चले हम फिदा जान ओ तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथिय’. 1964 में आई फिल्म ‘हकीकत’ का यह गाना आज भी गुनगुनाया जाता है.

उस के बाद ‘हिंदुस्तान की कसम’, ‘बौर्डर’ जैसी न जाने कितनी वार फिल्में बनीं और सराही गईं. फरहान अख्तर की ‘120 बहादुर’ फिल्म पर ‘बौर्डर’ फिल्म का प्रभाव साफ दिखता है. ‘बौर्डर’ फिल्म 1971 के युद्ध पर आधारित थी. इस फिल्म को देखने के लिए इतनी भीड़ थिएटरों में उमड़ी कि संभाले न संभल सकी. फिल्म ‘120 बहादुर’ लद्दाख के रेजांग ला दर्रे के पास हुए भारत चीन युद्ध पर बनी है.

1962 के भारत चीन युद्ध के दौरान रेजांग ला दर्रे में चीनी सैनिकों ने एक भारतीय चौकी पर हमला कर दिया था. कठोर परिस्थितियों में भी भारतीय जवानों ने हार न मानी और चीनी सैनिकों का मुकाबला किया. कई चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था.

उस युद्ध के बाद लगभग 3 महीनों तक बर्फ की चादरों से ढके बंकर में 120 जवान दफ्न रहे थे. बाद में बर्फ पिघलने पर सेना के अन्य अधिकारियों के साथ साथ लोगों को भी पता चला कि रेजांगला के युद्ध में किस तरह 13 कुमाऊं रेजीमेंट के 120 सैनिकों ने भारत माता की रक्षा करते हुए अपनी जानें गंवाई. चीन के 500 सैनिक मारे गए. 1962 का यह युद्ध चीन की सबसे बड़ी क्षति मानी जाती है. चीन को भारत को आंखें दिखाने से पहले 1962 का युद्ध याद कर लेना चाहिए. आज के वार टाइम में यह एक एजेंडा फिल्म है और बिल्कुल सच्ची घटना है. फिल्म में बेहतरीन सिनेमेटोग्राफी, लाजवाब सीन हैं. वीएफएक्स की क्वालिटी अच्छी है. ऐक्शन सीन अच्छे हैं. क्लाइमेक्स हिला कर रख देगा.

फरहान अख्तर 120 कलाकारों के साथ कमाल के लगे हैं. उस ने मेजर शैतान सिंह की भूमिका निभाई है. मगर उन की संवाद अदायगी अच्छी नहीं है. वहीं राशि खन्ना, विवान भटैना, अंकित सिवाय, अजिंक्य देव भी अहम रोल में हैं. फिल्म की कहानी अमिताभ बच्चन के मुंह से कहलवाई गई है जो कहीं-कहीं इमोशनल कर देती है. मध्यांतर से पहले कुछ हास्य के पल हैं. बैकग्राउंड में गूंजता भावनात्मक संगीत है. 120 Bahadur Movie Review :

Hindi Social Story : माधवी – उसकी छोटी सी दुनिया में क्यों आग लग गई थी ?

Hindi Social Story : दिन भर स्कूल की झांय झांय से थक कर माधवी उसी भवन की ऊपरी मंजिल पर बने अपने कमरे में पहुंची. काम वाली को चाय बनाने को कह कर सोफे पर पसर गई. चाय पी कर वह थकान मिटाना चाहती थी. चूंकि इस समय उस का मन किसी से बात करने का बिल्कुल नहीं था इसीलिए ऊपर आते समय मेन गेट में वह ताला लगा आई थी.

अभी मुश्किल से 2-3 मिनट ही हुए होंगे कि टेलीफोन की घंटी बज उठी. घंटी को सुन कर उसे यह तो लग गया कि ट्रंक काल है फिर भी रिसीवर उठाने का मन न हुआ. उस ने सोचा कि काम वाली से कह कर फोन पर मना करवा दे कि घर पर कोई नही, तभी घंटी बंद हो गई. एक बार रुक कर फिर बजी. वह खीज कर उठी और टेलीफोन का चोंगा उठा कर कान से लगाया. फोन जबलपुर से उस की ननद का था. माधवी ने जैसे ही ‘हैलो’ कहा उस की ननद बोली, ‘‘भाभी, तुम जल्दी आ जाओ. मां बहुत याद कर रही हैं.’’

‘‘मांजी को क्या हुआ?’’ माधवी ने हड़बड़ा कर पूछा.

‘‘लगता है अंतिम समय है,’’ ननद जल्दी में बोली, ‘‘तुम्हें देखना चाहती हैं.’’

‘‘अच्छा,’’ कह कर माधवी ने फोन रख दिया.

घड़ी में देखा, 4 बज रहे थे. जबलपुर के लिए ट्रेन रात को 10 बजे थी. माधवी ने टे्रवल एजेंट को फोन कर 2 बर्थ बुक करने को कहा.

माधवी की आंखों में रह रह कर सास का चेहरा घूमने लगा. उस ने अपनी सास के दोनों रूप देखे हैं. पहले हंस कर दिल से प्यार करने वाली मां का और फिर बिस्तर पर पड़ी एक असहाय बूढ़ी औरत का.

वह पहले माधवी के साथ ही रहा करती थीं. माधवी के पति राघव 3 भाइयों में दूसरे नंबर के थे. बड़े बेटे की नौकरी तबादले वाली थी. तीसरा बेटा बंटी अभी बहुत छोटा था. राघव की भोपाल में बी.एच.ई.एल. में स्थायी नौकरी थी. मां अपने छोटे बेटे को ले कर राघव के साथ भोपाल में ही सेटल हो गई थीं लेकिन यह साथ ज्यादा दिन न चला. 3 साल बाद ही एक सड़क दुर्घटना ने राघव का जीवन छीन लिया.

माधवी को बी.एच.ई.एल. से कुछ पैसा जरूर मिला पर अनुकंपा नियुक्ति नहीं मिली. सास ने परिस्थिति को भांपा और बंटी को ले कर बड़े बेटे के पास चली गईं. माधवी ने पति के मिले पैसे से एक मकान खरीदा. कुछ लोन ले कर दूसरी मंजिल बनवाई. खुद ऊपर रहने लगीं और नीचे एक स्कूल शुरू कर दिया. पति की मौत के बाद माधवी की सारी दुनिया अपनी बेटी और स्कूल में सिमट गई.

पहले तो सास से माधवी की थोड़ी बहुत बात हो जाया करती थी पर धीरे धीरे काम की व्यस्तता से यह अंतर बढ़ने लगा. माधवी की ससुराल मानो छूट गई थी. जेठ और देवर ने फोन पर हालचाल पूछने के अलावा और कोई सुध नहीं ली. मकान, जमीन जायदाद या दूसरी पारिवारिक संपत्तियों में हिस्सेदारी तो दूर, किसी ने यह तक नहीं पूछा कि कैसे गुजारा कर रही है या स्कूल कैसा चल रहा है.

इस उपेक्षा के बाद भी माधवी को कहीं न कहीं अपनों से एक स्नेहिल स्पर्श की उम्मीद होती.

सहानुभूति और विश्वास से भरे दो शब्दों की चाहत होती. अपने काम और उपलब्धियों पर शाबाशी की अपेक्षा तो हर व्यक्ति करता है किंतु माधवी की जिंदगी में यह सब कुछ नहीं था. उसे खुद रोना था और खुद चुप हो जाना था.

माधवी ने अपनी छोटी सी दुनिया बहुत मेहनत से बनाई थी. एक दिन भी इस से बाहर रहना उस के लिए मुश्किल था. उस ने कई बार बाहर जा कर घूमने का मन बनाया पर न जा सकी. आज जाना जरूरी था क्योंकि सास की हालत चिंताजनक थी और उन्होंने उसे मिलने के लिए बुलाया भी था.

ट्रेन ने सुबह 6 बजे जबलपुर उतारा. वह बेटी को ले कर प्लेटफार्म पर बने लेडीज वेटिंग रूम में गई. वहीं तैयार हुई. बेटी को भी तैयार किया और जेठ जी के घर फोन मिलाया. फोन जेठानी ने उठाया. बातचीत में ही जेठानी ने अस्पताल का नाम पता बताते हुए कहा, ‘‘हम सब भी घर से रवाना हो रहे हैं.’’

माधवी को जेठानी के मन की बात समझते देर न लगी. इसीलिए वह स्टेशन के बाहर से ऑटो पकड़ कर सीधे अस्पताल पहुंची. उस समय डॉक्टर राउंड पर थे अत: कुछ देर उसे बाहर ही रुकना पड़ा. डॉक्टर के जाने के बाद माधवी भीतर पहुंची.

सास को ड्रिप लगी थी. ऑक्सीजन की नली से श्वास चल रही थी. गले के कैंसर ने भोजन पानी की नली को रोक कर रख दिया था. उन की जबान भी उल्ट गई थी. वह केवल देख सकती थीं और इशारे से ही बातें कर रही थीं. पिछले 4 दिन से यही हालत थी. लगता था अब गईं, तब गईं.

माधवी ने पास जा कर उन का हाथ छुआ. पसीने और चिपचिपाहट से उसे अजीब सा लगा. उस की नजर बालों पर गई तो लगा महीनों से कंघी ही नहीं हुई है. होती भी कैसे. वह पिछले 6 माह से बिस्तर पर जो थीं.

माधवी ने आवाज दी. उन्होंने आंखें खोलीं तो देख कर लगा कि पहचानने की कोशिश कर रही हैं.

‘‘मैं हूं, मांजी माधवी, आप की पोती को ले कर आई हूं.’’

सुन कर उन्हें संतोष हुआ फिर हाथ उठाया और इशारे से कुछ कहा तो माधवी को लगा कि शायद पानी मांग रही हैं.

माधवी ने पूछा, ‘‘पानी चाहिए?’’

उन्होंने  हां में सिर हिलाया. माधवी ने पानी का गिलास उठाया ही था कि वहां मौजूद परिजनों ने उसे रोक दिया. कहा, ‘‘डाक्टर ने ऊपर से कुछ भी देने के लिए मना किया है.’’

माधवी का हाथ रुक गया. उस ने विवशता से सास की ओर देखा.

सास ने माधवी की बेबसी समझ ली थी और समझतीं भी क्यों नहीं, पिछले 4 दिन से यही तो वह समझ रही थीं. हर आगंतुक से वह पानी मांगतीं. आगंतुक पानी देने की कोशिश भी करता किंतु वहां मौजूद डॉक्टर और नर्स रोक देते थे और मांजी को निराश हो कर अपनी आंखें मूंद लेनी पड़तीं. सास की इस बेबसी पर माधवी का मन भर आया.

तभी ननद ने कहा, ‘‘छोटी भाभी, आप घर जा कर कुछ आराम कर लें, रात भर का सफर कर के आई हैं, थकी होंगी.’’

पहले माधवी ने भी यही सोचा था किंतु सास की हालत देख कर उस का मन जाने का न हुआ. वह बोली, ‘‘नहीं, ठीक हूं.’’

माधवी वहीं रुक गई. वह स्टूल खींच कर मांजी के पैरों के पास बैठ गई. मन हुआ कि उन के पैर दबाए. माधवी ने जैसे ही कंबल हटाए दुर्गंध उस की नाक को छू गई. उस ने थोड़ा और कंबल सरका कर देखा तो बिस्तर में काफी गंदगी थी. मां जी के प्रति यह उस का दूसरा अनुभव था. इस से पहले माधवी हाथ में चिपचिपाहट और बालों में बेतरतीब लटें देख चुकी थी.

माधवी को अब समझने में कोई कठिनाई नहीं हुई कि सास का बचना मुश्किल है. तमाम रिश्तेदार भी इस हकीकत को जान गए थे. इसीलिए सारे लोग खबर लगते ही पहुंच चुके थे.

गले के कैंसर में ऑपरेशन जोखिम से भरा होता है, उस में भी यदि श्वास नली को जकड़ लेने वाला ट्यूमर हो तो जोखिम सौ फीसदी तक हो जाता है.

माधवी का मन मांजी के प्रति करुणा से भर गया. उसे ग्लानि इस बात की थी कि यदि मां जी को मरना है तो क्यों उन की इच्छाओं को मार कर और उन्हें गंदगी में पटक कर मौत की प्रतीक्षा की जा रही है. क्या हम उन्हें एक स्वस्थ और अच्छा माहौल नहीं दे सकते? वह जानती थी कि एक उम्र के बाद बड़े बूढ़ों की बीमारी में केवल बेटा बेटी या

बहुएं ही कुछ कर सकती हैं. उन के अलावा कोई और कुछ नहीं कर सकता. नौकरों के काम तो केवल औपचारिक होते हैं.

यहां स्वजनों के पास समय नहीं था. यदि था भी तो इच्छाशक्ति का अभाव और अहंकार आड़े आता था. लोग आते, हालचाल पूछते, डॉक्टरों और नर्सों से बात करते, बैठ कर अपनी दिनचर्या की व्यस्तता गिनाते और चले जाते.

माधवी का मन हुआ कि फौरन डिटॉल के पानी से मां जी को नहला दे. पर कमरे में जेठ, ननदोई और दूसरे पुरुषों की मौजूदगी देख कर वह चुप रह गई.

दोपहर को देखभाल करने वाले तमाम पुरुष चले गए. जेठानी भी मेहमानों के खाने का इंतजाम करने के लिए घर जा चुकी थीं. कमरे में माधवी, ननद और देवर बंटी के अलावा कोई न बचा.

माधवी ने मन ही मन कुछ निर्णय किया और वार्ड बॉय को आवाज दे कर गुनगुना पानी, डिटॉल और स्पंज लाने को कहा. वह खुद नर्स के पास जा कर एक कैंची मांग लाई और सब से पहले माधवी ने कैंची से मां जी के सारे बाल काट कर छोटे छोटे कर दिए. साबुन के स्पंज से सिर साफ किया और कपूर का तेल लगाया. फिर शरीर पर स्पंज किया. सूखे, साफ तौलिया से बदन पोंछा और हलके हाथ से हाथ पांव में तेल की मालिश कर दी. साफ और धुले कपड़े पहना दिए. बिस्तर की चादर और रबड़ बदली. पाउडर छिड़का. कमरे का फर्श धुलवाया. अब मां जी में ताजगी झलक उठी थी. माधवी शाम तक वहीं रही.

यद्यपि मां जी के बाल काटना किसी को पसंद नहीं आया पर माधवी ने जिस लगन के साथ साफ सफाई की थी यह बात सारे रिश्तेदारों को पसंद आई. वे माधवी की सराहना किए बिना न रह सके. हां, बाल काटने पर जेठ के तीखे शब्द जरूर सुनने पड़े. माधवी ने उन की बातों का कोई जवाब नहीं दिया और ननद के साथ घर आ गई.

अगले दिन सुबह 9 बजे माधवी अस्पताल पहुंची और थोड़ी देर बाद ही फिर सफाई में जुट गई. दोपहर को मां जी ने पानी मांगा. माधवी ने डॉक्टर की हिदायत का हवाला दे कर कहा, ‘‘आप ठीक हो जाइए, फिर खूब पानी पी लीजिएगा.’’ पर इस बार मां जी नहीं मानीं. उन्होंने इशारे से ही हाथ जोड़े और ऐसा संकेत किया मानो पांव पड़ रही हैं.

माधवी से रहा न गया. उस के आंसू बह निकले. उस ने बिना किसी की परवा किए कप भर कर पानी मांजी को दे दिया. ननद और जेठानी दोनों को यह जान कर आश्चर्य हुआ कि सारा पानी गले से नीचे उतर गया, जबकि कैंसर से गला पूरी तरह अवरुद्ध था. पानी भीतर जाते ही मांजी को मानो नई जान आई. उन में कुछ चेतना सी दिखी और चेहरे पर हंसी भी. जेठानी और ननद दोनों ने कुछ कुछ बातें भी कीं. ‘‘अब आप जल्दी ही अच्छी होने वाली हो. देखिए, गला खुल गया.’’

तभी मांजी ने इशारा कर के फिर कुछ मांगा. माधवी ने पानी और दूसरी चीजों के नाम बताए तो उन्होंने सभी वस्तुओं को इनकार कर किया. माधवी ने पूछा, ‘‘दूध,’’ उन्होंने हां में सिर हिलाया. माधवी ने तुरंत दूध मंगाया.

इस बार जेठानी ने सख्ती से मना किया और कहा, ‘‘पानी तो ठीक है, पर दूध बिना डॉक्टर से पूछे न दो.’’ पर माधवी को जाने कौन सा जुनून सवार था कि उस ने बिना किसी की परवाह किए मां जी को उसी कप में दूध भी दे दिया. दूध भी गले से नीचे चला गया. मां जी के चेहरे पर एक अजीब संतोष उभरा. उन्होंने इशारे से बेटे बेटियों को बुलाया. बाकी तो वहां थे, जेठ और बंटी नहीं थे. उन्हें भी टेलीफोन कर के घर से बुला लिया गया.

मां जी ने पहले जेठ का हाथ ननद के सिर पर रखवाया फिर माधवी को बुलाया और फिर बंटी को. उन्होंने माधवी का हाथ पकड़ा और बंटी का हाथ माधवी के हाथ में दे कर उस की ओर कातर निगाहों से देखने लगीं. मानो कह रही हों, ‘‘अब मेरे बेटे का तुम ही ध्यान रखना.’’

माधवी का मन भर आया. आंखों में नमी छलक आई…उस ने कहा, ‘‘आप चिंता न करें, बंटी मेरे बेटे की तरह है.’’ फिर उस ने निगाह बंटी की ओर फेरी, तो उसे अपनी ओर देखता पाया. भीतर से माधवी का मातृत्व उमड़ पड़ा. तभी मां जी के हाथ से माधवी का हाथ छूट गया. माधवी चौकी. उस ने मां जी की गर्दन को एक ओर ढुलकते हुए देखा. कमरे में सभी चीख पड़े, ‘‘मां जी.’’ जेठ माधवी की ओर देख कर दहाड़े, ‘‘तू ने मार डाला मां को. आखिर क्यों पिलाया पानी और क्यों दिया दूध?’’

माधवी को कुछ न सूझा. वह सहमी सी बुत की तरह खड़ी रही. रह रह कर उसे मां जी के संकेत याद आते रहे. उस ने सोचा कि उस ने कोई गलत काम नहीं किया. यदि मां जी की मौत करीब थी तो उन्हें क्यों भूखा प्यासा मरने दिया जाए. लोग तो घर से बाहर किसी को भूखा प्यासा नहीं जाने देते, तब जिंदगी के इस महाप्रयाण पर वह कैसे मांजी को भूखा प्यासा जाने देती?

वहां मौजूद महिलाएं रोने लगीं. जेठ जी का बड़बड़ाना जारी था. माधवी से सुना न गया. वह बाहर की ओर चल दी. अभी वह दरवाजे के करीब ही आई थी कि उस के दोनों हाथों को किसी ने छुआ. उस ने देखा कि उस के दाएं हाथ की उंगली देवर बंटी ने और बाएं हाथ की उंगली बेटी नीलम ने पकड़ रखी थी. Hindi Social Story :

Emotional Hindi Kahani : मां जैसी आंटी

Emotional Hindi Kahani : गरीब राघव के प्रति मीना के मन में पता नहीं क्यों ममता उमड़ आई थी. उस ने राघव को हर तरह से मदद दे कर पढ़ाई पूरी करने का पूरा मौका दिया. क्या राघव मीना के इस उपकार को कभी उतार सका?

बहुत दिनों बाद अचानक माधुरी का आना मीना को सुखद लगा था. दोचार दिन तो यों ही गपशप में निकल गए थे. माधुरी दीदी यहां अपने किसी संबंधी के यहां विवाह समारोह में शामिल होने आई थीं. जिद कर के वे मीना और उस के पति दीपक को भी अपने साथ ले गईं. फिर शादी के बाद मीना ने जिद कर उन्हें 2 दिन और रोक लिया था. दीपक किसी काम से बाहर चले गए तो माधुरी रुक गई थीं.

‘‘और सुना, सब ठीकठाक तो चल रहा है न,’’ माधुरी ने कहा, ‘‘अब तो दोनों बेटियों का ब्याह कर के तुम लोग भी फ्री हो गए हो. खूब घूमोफिरो. अब क्यों घर में बंधे हुए हो?’’

‘‘दीदी, अब आप से क्या छिपाना,’’ मीना कुछ गंभीर हो कर कहने लगी, ‘‘आप तो जानती ही हैं कि दोनों बेटियों की शादी में काफी खर्च हुआ है. अब दीपक रिटायर भी हो गए हैं. सीमित पैंशन मिलती है. किसी तरह खर्च चल रहा है, बस. कोई आकस्मिक खर्चा आ जाता है तो उस के लिए भी सोचना पड़ता है.’’

माधुरी बीच में ही टोक कर बोलीं, ‘‘देख मीना, तू अपनेआप को थोड़ा बदल, बेटियों के कमरे खाली पड़े हैं, उन्हें किराए पर दे. इस शहर में बच्चों की कोचिंग का अच्छा माहौल है. तुम्हारे घर के बिलकुल पास कोचिंग क्लासें चल रही हैं. बच्चे फौरन किराए पर कमरा ले लेंगे. उन से अच्छा किराया तो मिलेगा ही, घर की सुरक्षा भी बनी रहेगी.’’

माधुरी की बात मीना को भी ठीक लगने लगी थी. उसे खुद आश्चर्य हुआ कि अब तक इस तरह उस ने सोचा क्यों नहीं. ठीक है, दीपक घर को किराए पर देने के पक्ष में नहीं हैं पर 2 कमरे बच्चों को देने में क्या हर्ज है. बाथरूम तो अलग

है ही. माधुरी दीदी के जाते ही पति से बात कर के मीना ने अखबार में विज्ञापन दे दिया.

‘‘देखो मीना, मैं तुम्हारे कार्यक्षेत्र में दखल नहीं दूंगा,’’ दीपक बोले, ‘‘पर निर्णय तुम्हारा ही है सो सोचसम झ कर लेना. क्या किराया होगा, किसे देना है, सारा सिरदर्द तुम्हारा ही होगा, सम झीं.’’

‘‘हां बाबा, सब सम झ गई हूं, किराए पर भी मेरा ही अधिकार होगा, जैसा चाहूं खर्च करूंगी.’’

दीपक तब हंस कर रह गए थे.

विज्ञापन छपने के कुछ ही दिनों बाद  दोनों कमरे किराए पर उठ गए थे. निखिल और सुबोध दोनों बच्चे मीना को संभ्रांत परिवार के लगे थे. किराया भी ठीकठाक मिल गया था.

मीना खुश थी. किराएदार के रूप में बच्चों के आने से उस का अकेलापन थोड़ा कम हो गया था. दीपक ने तो अपना मन लगाने के लिए एक संस्था जौइन कर ली थी. पर वह घर में अकेली बोर हो जाती थी. दोनों बेटियों के जाने के बाद तो अकेलापन वैसे भी अधिक खलने लगा था.

शीना का उस दिन फोन आया तो कह रही थी, ‘‘मां, आप ने ठीक किया जो कमरे किराए पर दे दिए. अब आप और पापा कुछ दिनों के लिए चेन्नई घूमने आ जाएं, काफी सालों से आप लोग कहीं घूमने भी नहीं गए.’’

‘‘हां, अब घूमने का प्रोग्राम बनाएंगे उधर का. रीना भी जिद कर रही है बेंगलुरु आने की,’’ मीना का स्वर उत्साह से भरा था.

फोन सुनने के बाद मीना बाहर लौन में आ कर गमले ठीक करते हुए सोचने लगी कि दीपक से बात करेगी कि बेटियां इतनी जिद कर रही हैं तो चलो, उन के पास घूम आएं.

तभी बाहर का फाटक खोल कर एक दुबलापतला, कुछ ठिगने कद का लड़का अंदर आया था.

‘‘कहो, क्या काम है? किस से मिलना है?’’

‘‘जी, आंटी, मैं राघव हूं. यहां जगदीश कोचिंग में एडमिशन लिया है. मु झे कमरा चाहिए था.’’

‘‘देखो बेटे, यहां तो कोई कमरा खाली नहीं है. 2 कमरे थे जो अब किराए पर चढ़ चुके हैं,’’ मीना ने गमलों में पानी डालते हुए वहीं से जवाब दे दिया.

वह लड़का थोड़ी देर खड़ा रहा था पर मीना अंदर चली गईं. दूसरे दिन दीपक के बाजार जाने के बाद यों ही मीना अखबार ले कर बाहर लौन में आई तो फिर वही लड़का दिखा था.

‘‘हां, कहो? अब क्या बात है?’’

‘‘आंटी, मैं इतने बड़े मकान में कहीं भी रह लूंगा. अभी तो मेरा सामान भी रेलवे स्टेशन पर ही पड़ा है,’’ उस के स्वर में अनुनय का भाव था.

‘‘कहा न, कोई कमरा खाली नहीं है.’’

‘‘पर यह,’’ कह कर उस ने छोटे से गैराज की तरफ इशारा किया था.

मीना का ध्यान भी अब उधर गया. मकान में यह हिस्सा कार के लिए रखा था. कार तो आ नहीं पाई. हां, पर शीना की शादी के समय इस में एक मामूली सा दरवाजा लगा कर कमरे का रूप दे दिया था. हलवाई और नौकरों के लिए पीछे एक कामचलाऊ टौयलेट भी बना था. अब यह हिस्सा घर के फालतू सामान के लिए था.

‘‘इस में रह लोगे, पढ़ाई हो जाएगी?’’ मीना ने आश्चर्य से पूछा था.

‘‘हां, क्यों नहीं, लाइट तो होगी न.’’

वह लड़का अब अंदर आ गया था. गैराज देख कर वह उत्साहित था, कहने लगा, ‘‘यह मेज और कुरसी तो मेरे काम आ जाएगी और यह तख्त भी.’’

मीना सम झ नहीं पा रही थी कि क्या कहे.

लड़के ने जेब से कुछ नोट निकाले और कहने लगा, ‘‘आंटी, ये 500 रुपए तो आप रख लीजिए. मैं 800 रुपए से ज्यादा किराया आप को नहीं दे पाऊंगा. बाकी 300 रुपए मैं एकदो दिनों में दे दूंगा. अब सामान ले आऊं?’’

500 रुपए हाथ में ले कर मीना अचंभित थी. चलो, एक किराएदार और सही. बाद में इस हिस्से को भी ठीक करा देगी तो इस का भी अच्छा किराया मिल जाएगा.

घंटेभर बाद ही वह एक रिकशे पर अपना सामान ले आया था. मीना ने देखा, एक टिन का बक्सा, एक बड़ा सा पुराना बैग और एक पुरानी चादर की गठरी में कुछ सामान बंधा हुआ दिख रहा था.

‘‘ठीक है, सामान रख दो. अभी नौकरानी आती होगी तो मैं सफाई करवा दूंगी.’’

‘‘आंटी, मुझे  झाड़ू दे दीजिए. मैं खुद

ही साफ कर लूंगा.’’

खैर, नौकरानी के आने के बाद थोड़ा फालतू सामान मीना ने बाहर निकलवा लिया और ढंग की मेजकुरसी उसे पढ़ाई के लिए दे दी. राघव ने भी अपना सामान जमा लिया था.

शाम को जब मीना ने दीपक से जिक्र किया तो उन्होंने हंस कर कहा था, ‘‘देखो, अधिक लालच मत करना. वैसे यह तुम्हारा क्षेत्र है तो मैं कुछ नहीं बोलूंगा.’’

मीना को यह लड़का निखिल और सुबोध से काफी अलग लगा था. रहता भी दोनों से अलगथलग ही था जबकि तीनों एक ही क्लास में पढ़ते थे.

उस दिन शाम को बिजली चली गई तो मीना बाहर बरामदे में आ गई थी. निखिल और सुबोध बैडमिंटन खेल रहे थे. अंधेरे की वजह से राघव भी बाहर आ गया था पर दोनों ने उसे अनदेखा कर दिया. वह दूर कोने में चुपचाप खड़ा था. फिर मीना ने ही आवाज दे कर उसे पास बुलाया.

‘‘तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है? मन तो लग गया न?’’

‘‘मन तो आंटी लगाना ही है. मां ने इतनी जिद कर के पढ़ने भेजा है, खर्चा किया है.’’

‘‘अच्छा, और कौनकौन हैं घर में?’’

‘‘बस, मां ही हैं. पिताजी तो बचपन में ही नहीं रहे. मां ने ही सिलाईबुनाई कर के पढ़ाया. मैं तो चाह रहा था कि वहीं आगे की पढ़ाई कर लूं पर मां को पता नहीं किस ने इस शहर की आईआईटी क्लास की जानकारी दे दी थी और कह दिया कि तुम्हारा बेटा पढ़ने में होशियार है, उसे भेज दो. बस, मां को जिद सवार हो गई,’’ मां की याद में उस का स्वर भर्रा गया था.

‘‘अच्छा, चलो, अब मां का सपना पूरा करो,’’ मीना के मुंह से भी निकल ही गया था. सुबोध और निखिल भी थोड़े अचंभित थे कि वह राघव से क्या बात कर रही है.

एक दिन नौकरानी ने आ कर कहा, ‘‘दीदी, देखो न गैराज से धुआं सा निकल रहा है.’’

‘‘धुआं,’’ मीना घबरा गई और रसोई में गैस बंद कर के वह बाहर आई. हां, धुआं तो है पर राघव क्या अंदर नहीं है.

मीना ने जा कर देखा तो वह एक स्टोव पर कुछ बना रहा था. कैरोसिन का बत्ती वाला स्टोव धुआं कर रहा था.

‘‘यह क्या कर रहे हो?’’

चौंक कर मीना को देखते हुए राघव बोला, ‘‘आंटी, खाना बना रहा हूं.’’

‘‘यहां तो सभी बच्चे टिफिन मंगाते हैं. तुम खाना बना रहे हो तो फिर पढ़ाई कब करोगे.’’

‘‘आंटी, अभी मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं. टिफिन महंगा पड़ता है तो सोचा कि एक समय खाना बना लूंगा. शाम को भी वही खा लूंगा. यह स्टोव भी अभी ले कर आया हूं,’’ राघव धीमे स्वर में बोला. राघव की यह मजबूरी मीना को  झक झोर गई.

‘‘देखो, तुम्हारी मां जब रुपए भेज दे तब किराया दे देना. अभी ये रुपए रखो और कल से टिफिन सिस्टम शुरू कर दो, सम झे.’’

मीना ने राघव के रुपए ला कर उसे वापस कर दिए.

राघव डबडबाई आंखों से मीना को देखता रह गया.

बाद में मीना ने सोचा कि पता नहीं क्यों मांबाप पढ़ाई की होड़ में बच्चों को इतनी दूर भेज देते हैं. इस शहर में इतने बच्चे आईआईटी की पढ़ाई के लिए आ कर रह रहे हैं. गरीब मातापिता भी अपना पेट काट कर उन्हें पैसा भेजते हैं. अब राघव पता नहीं पढ़ने में कैसा हो पर गरीब मां खर्च तो कर ही रही है.

महीनेभर बाद मीना की मुलाकात गीता से हो गई. गीता उस की बड़ी बेटी शीना की सहेली थी और आजकल जगदीश कोचिंग में पढ़ा रही थी. कभीकभार शीना का हालचाल जानने घर आ जाती थी.

‘‘तेरी क्लास में राघव नाम का भी कोई लड़का है क्या? कैसा है पढ़ाई में? टैस्ट में क्या रैंक आ रही है?’’ मीना ने पूछ ही लिया.

‘‘कौन, राघव प्रकाश, वह जो बिहार से आया है. हां, आंटी, पढ़ाई में तो तेज लगता है. वैसे तो केमिस्ट्री की कक्षा ले रही हूं पर जगदीशजी उस की तारीफ कर रहे थे कि अंकगणित में बहुत तेज है. गरीब सा बच्चा है.’’

मीना चुप हो गई थी. ठीक है, पढ़ने में अच्छा ही होगा.

कुछ दिनों बाद राघव किराए के रुपए ले कर आया तो मीना ने पूछा, ‘‘तुम्हारे टिफिन का इंतजाम तो है न?’’

‘‘हां, आंटी, पास वाले ढाबे से मंगा लेता हूं.’’

‘‘चलो, सस्ता ही सही. खाना तो ठीक मिल जाता होगा?’’ फिर मीना ने निखिल और सुबोध को बुला कर कहा था, ‘‘यह राघव भी यहां पढ़ने आया है. तुम लोग इस से भी दोस्ती करो. पढ़ाई में भी अच्छा है. शाम को खेलो तो इसे भी अपनी कंपनी दो.’’

‘‘ठीक है, आंटी,’’ सुबोध ने कुछ अनमने मन से कहा था.

इस के 2 दिन बाद ही निखिल हंसता हुआ आया और कहने लगा, ‘‘आंटी, आप तो रघु की तारीफ कर रही थीं, पता है इस बार उस के टैस्ट में बहुत कम नंबर आए हैं. जगदीश सर ने उसे सब के सामने डांटा है.’’

‘‘अच्छा,’’ कह कर मीना खामोश हो गई तो निखिल चला गया. उस के बाद वह उठ कर राघव के कमरे की ओर चल दी. जा कर देखा तो राघव की आंखें लाल थीं. वह काफी देर से रो रहा था.

‘‘क्या हुआ, क्या बात हुई?’’

‘‘आंटी, मैं अब पढ़ नहीं पाऊंगा. मैं ने गलती की जो यहां आ गया. आज सर ने मु झे बुरी तरह से डांटा है.’’

‘‘पर तुम्हारे तो नंबर अच्छे आ रहे थे?’

‘‘आंटी, पहले मैं आगे बैठता था तो सब सम झ में आ जाता था. अब कुछ लड़कों ने शिकायत कर दी तो सर ने मु झे पीछे बिठा दिया. वहां से मु झे कुछ दिखता ही नहीं है, न कुछ सम झ में आ पाता है. मैं क्या करूं?’’

‘‘दिखता नहीं है, क्या आंखें कमजोर हैं?’’

‘‘पता नहीं, आंटी.’’

‘‘पता नहीं है तो डाक्टर को दिखाओ.’’

‘‘आंटी, पैसे कहां हैं. मां जो पैसे भेजती हैं उन से मुश्किल से खाने व पढ़ाई का काम चल पाता है. मैं तो अब लौट जाऊंगा,’’ कह कर वह फिर रो पड़ा था.

‘‘चलो, मेरे साथ,’’ मीना उठ खड़ी हुई थी. रिकशे में उसे ले कर पास के आंखों के एक डाक्टर के यहां पहुंच गई और आंखें चैक करवाईं तो पता चला कि उसे तो मायोपिया है.

‘‘चश्मा तो इसे बहुत पहले ही लेना था. इतना नंबर न बढ़ता.’’

‘‘ठीक है डाक्टर साहब, अब आप इस का चश्मा बनवा दें.’’

घर आ कर मीना ने राघव से कहा था, ‘‘कल ही जा कर अपना चश्मा ले आना, सम झे. और ये रुपए रखो. दूसरी बात यह कि इतना दबदब कर मत रहो कि दूसरे बच्चे तुम्हारी  झूठी शिकायत करें, सम झे.’’

राघव कुछ बोल नहीं पा रहा था.  झुक कर उस ने मीना के पैर छूने चाहे तो वह पीछे हट गई थी.

‘‘जाओ, मन लगा कर पढ़ो. अब नंबर कम नहीं आने चाहिए.’’

अब कोचिंग क्लासेस भी खत्म होने को थीं. बच्चे अपनेअपने शहर जा कर परीक्षा देंगे. यही तय था. राघव भी अब अपने घर जाने की तैयारी में था. निखिल और सुबोध से भी उस की दोस्ती हो गई थी.

सुबोध ने ही आ कर कहा कि  आंटी, राघव की तबीयत खराब हो रही है.

‘‘क्यों, क्या हुआ?’’

‘‘पता नहीं, हम ने 2-2 रजाइयां ओढ़ा दीं, फिर भी थरथर कांप रहा है.’’

मीना ने आ कर देखा.

‘‘अरे, लगता है तुम्हें मलेरिया हो गया है. दवाई ली थी?’’

‘‘जी, आंटी, डिस्पैंसरी से लाया तो था और कल तक तो तबीयत ठीक हो गई थी, पर अचानक फिर खराब हो गई. पता नहीं घर भी जा पाऊंगा या नहीं. परीक्षा भी अगले हफ्ते है. दे भी पाऊंगा या नहीं.’’

कंपकंपाते स्वर में राघव बड़बड़ा रहा था. मीना ने फोन कर के डाक्टर को वहीं बुला लिया फिर निखिल को भेज कर बाजार से दवा मंगवाई.

दूध और खिचड़ी देने के बाद दवा दी और बोली, ‘‘तुम अब आराम करो. बिलकुल ठीक हो जाओगे. परीक्षा भी दोगे, सम झे.’’

काफी देर राघव के पास बैठ कर वह उसे सम झाती रही थी. मीना खुद सम झ नहीं पाई थी कि इस लड़के के साथ ऐसी ममता सी क्यों हो गई है उसे.

दूसरे दिन राघव का बुखार उतर गया था. 2 दिन मीना ने उसे और रोक लिया था कि कमजोरी दूर हो जाए.

जाते समय जब राघव पैर छूने आया तब भी मीना ने यही कहा था कि खूब मन लगा कर पढ़ना.

बच्चों के जाने के बाद कमरे सूने तो हो गए थे पर मीना अब संतुष्ट थी कि 2 महीने बाद फिर दूसरे बच्चे आ जाएंगे. घर फिर आबाद हो जाएगा. गैराज वाले कमरे को भी अब और ठीक करवा लेगी.

आईआईटी का परिणाम आया तो पता चला कि राघव की रैंकिंग अच्छी आई है. निखिल और सुबोध रह गए थे.

राघव का पत्र भी आया था. उसे कानपुर आईआईटी में प्रवेश मिल गया था. स्कौलरशिप भी मिल गई थी.

‘ऐसे ही मन लगा कर पढ़ते रहना,’ मीना ने भी दो लाइन का उत्तर भेज दिया था. दीवाली पर कभीकभार राघव के कार्ड आ जाते. अब तो दूसरे बच्चे कमरों में आ गए थे. मीना भी पुरानी बातों को भूल सी गई थी. बस, गैराज को देख कर कभीकभार उन्हें राघव की याद आ जाती. समय गुजरता रहा था.

दरवाजे पर उस दिन सुबहसुबह ही घंटी बजी थी.

‘‘आंटी, मैं हूं राघव. पहचाना नहीं आप ने?’’

‘‘राघव,’’ आश्चर्यभरे स्वर के साथ मीना ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा था. दुबलापतला शरीर थोड़ा भर गया था. आंखों पर चश्मा तो था पर चेहरे पर दमक बढ़ गई थी.

‘‘आओ, बेटा, कैसे हो, आज कैसे अचानक याद आ गई हम लोगों की?’’

‘‘आंटी, आप की याद तो हरदम आती रहती है. आप नहीं होतीं तो शायद मैं यहां तक पहुंच ही नहीं पाता. मेरा कोर्स पूरा हो गया है और आप ने कहा कि मन लगा कर पढ़ना तो फाइनल में भी सबकुछ ठीक रहा. कैंपस इंटरव्यू में चयन हो कर नौकरी भी मिल गई है.’’

‘‘अच्छा, इतनी सारी खुशखबरी एकसाथ,’’ कह कर मीना हंसी थी.

‘‘हां, आंटी, पर मेरी एक इच्छा है कि जब मु झे डिगरी मिले तो आप और अंकल भी वहां हों, आप लोगों से यही प्रार्थना करने के लिए मैं यहां खुद आया हूं.’’

‘‘पर, बेटा…’’ मीना इतना ही बोलतेबोलते अचकचा गई थी.

‘‘नहीं आंटी, न मत कहिए. मैं तो आप के लिए टिकट भी बुक करा रहा हूं. आज आपलोगों की वजह से ही तो इस लायक हो पाया हूं. मैं जानता हूं कि जबजब मैं लड़खड़ाया, आप ने मु झे संभाला. एक मां थीं जिन्होंने जिद कर के मु झे इस शहर में भेजा और फिर आप हैं. मां तो आज यह दिन देखने को रही नहीं पर आप तो हैं, आप मेरी मां समान हैं.’’

राघव का भावुक स्वर सुन कर मीना भी पिघल गई थी. शब्द भी कंठ में आ कर फंस गए थे.शायद ‘मां’ शब्द की सार्थकता का बोध यह बेटा उन्हें करा रहा था. Emotional Hindi Kahani :

Family Story In Hindi : फांस – कामरान और सुल्तान अपने अब्बू से क्यों मिलना चाह रहे थे?

Family Story In Hindi : जनवरी के दिन थे. कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी. दीवार घड़ी ने थोड़ी देर पहले ही रात के 12 बजने की घोषणा की थी. कामरान और सुल्तान अभी अभी सोए थे. कामरान इस वर्ष 12वीं में था और सुल्तान 10वीं में. दोनों की बोर्ड की परीक्षाएं थीं. मैं ने आरंभ से ही उन में प्रतिदिन 1 घंटा अभ्यास करने की आदत डाल रखी थी.

केवल शनिवार को उन की छुट्टी होती थी. 1 घंटा अभ्यास करने के बाद वे हम लोगों के साथ मिल कर ताश या कैरम खेलते या कॉमिक्स पढ़ते थे. दोनों ही अपनी अपनी कक्षा में प्रथम आते थे और अपनी परीक्षाओं में वे दोनों विशेष योग्यता सूची में आएंगे, इस का हमें पूरा विश्वास था.

मैं पढ़ाई में हमेशा से कच्ची रही थी. हमारा जमाना और था. तब लड़कियों पर बहुत पाबंदियां थीं. घर से स्कूल, स्कूल से घर. न अध्यापकों से अधिक बात करो, न साथी लड़कों से मेलजोल बढ़ाओ. न कोई घर में पढ़ाने वाला था, न मार्गदर्शन करने वाला. अब्बू खेती बाड़ी के कामों में व्यस्त रहते थे और दोनों भाई शहर के विद्यालयों में छात्रावास में रह कर पढ़ते थे.

10वीं पास किया ही था कि सलमान  से विवाह हो गया. बच्चे भी जल्दी जल्दी हो गए. सलमान अपने कारोबार के कारण अधिकतर दौरे पर रहते. मुझे मां और पिता दोनों का ही दायित्व निभाना पड़ता. मेरे बच्चे परीक्षा में अच्छे अंक लाएं, खूब पढ़ेंलिखें, इस के लिए मैं ने उन पर कभी जबरदस्ती नहीं की, बल्कि कुछ ऐसी आदतें उन में डाल दीं, जिस से वे स्वयं धीरे धीरे अपने जीवन का उद्देश्य निर्धारित करते गए.

इतना अवश्य था कि अभ्यास के समय मुझे साथ जागना पड़ता. जब तक वे पढ़ाई करते तब तक मैं सवेरे के लिए सब्जी काट कर फ्रिज में रख देती या पुस्तकें पढ़ती रहती. मार्च में परीक्षा थी. अब वे दोनों रात को 11 बजे तक पढ़ते. मैं ने आधा घंटा पहले ही दोनों को गरम दूध पीने को दिया था. उन के लेटते ही मैं भी लेट गई थी, पर नींद आंखों से कोसों दूर थी.

2 दिन से सलमान ने फोन नहीं किया था. वह जहां कहीं भी होते, वहां से प्रतिदिन फोन पर बात करना उन का नियम था. इधर अब्बू की भी कोई खबर नहीं मिली थी. न जाने क्यों मन अब्बू को बहुत याद कर रहा था. मैं थोड़ी ही देर सोई होऊंगी कि घंटी की आवाज के साथ ही चौकीदार का स्वर कानों में पड़ा, ‘‘बीबीजी, तार ले लीजिए.’’

मैं ने उठ कर द्वार खोला और तार लिया. बब्बन चचा का तार था. अब्बू की हालत खराब बता कर फौरन आने के लिए लिखा था. मैं ने घड़ी पर नजर डाली. रात के 2 बज रहे थे. मैं ने तुरंत निर्णय ले लिया कि सवेरे 5 बजे वाली गाड़ी से निकल पड़ूंगी. चौकीदार से मैं ने बाबू और उस की पत्नी को बुलाने के लिए कहा. वह नौकरों के लिए बने मकानों की ओर गया और मैं ने कामरान को धीरे से जगाया. वह उठा और पूछने लगा, ‘‘क्या बात है, अम्मी? आप इतनी परेशान क्यों हैं?’’

मैं ने कहा, ‘‘बेटे, तुम्हारे नानाजान की तबीयत खराब है. मैं सवेरे की गाड़ी से चली जाऊं?’’

‘‘जरूर जाइए, अम्मी, नानाजान अकेले हैं,’’ वह बोला.

‘‘पर, बेटे, तुम लोगों की पढ़ाई?’’

‘‘अम्मी, हम दोनों बराबर पढ़ाई करेंगे, आप हमारी बिलकुल चिंता न करें.’’

कामरान को सुल्तान की देखभाल करने को कह कर मैं ने बाबू और उस की पत्नी को घर सौंपा और थोड़ा सा सामान ले कर स्टेशन की राह ली. स्टेशन 3 किलोमीटर दूर था और सवारी मिलने की कोई संभावना नहीं थी. बाबू ने मेरा बक्सा संभाला और हम लोग निकल पड़े.

2 किलोमीटर चलने के बाद शहर दिखाई देने लगा. होटलों के चूल्हों में आग सुलगनी शुरू हो गई थी. एक रिक्शा दिखाई दिया. रिकशा वाला बैठा बैठा ऊंघ रहा था. दोनों पांव लंबे कर के सीट पर फैला रखे थे. बाबू ने उसे बहुत आवाजें दीं, तब कहीं वह जागा. पर स्टेशन चलने से उस ने इनकार कर दिया, ‘‘बहुत सर्दी है,’’ कह कर वह फिर सो गया.

थोड़ी दूरी पर एक दूसरा रिकशा वाला मिला, जो होटल की भट्ठी के सामने खड़ा आग ताप रहा था. बाबू के बोलने पर उस ने चाय पिए बिना वहां से हटने से इनकार कर दिया, जबकि चाय कब बनेगी इस का कोई पता न था. गाड़ी का समय करीब था. मैं और बाबू तेजी से कदम बढ़ाने लगे. तभी एक तख्ती पर मेरी दृष्टि जा पड़ी.

ठंडी राख के ढेर के एक तरफ एक कुत्ता बेखबर सो रहा था और दूसरी तरफ रिकशा वाला एक पतली सी चादर ओढ़े सो रहा था. करीब ही रिक्शा खड़ा था, जिस पर गत्ते की एक तख्ती लटक रही थी. कुछ कुछ रोशनी में मैं ने पढ़ा, ‘‘आप को रिक्शा की जरूरत है और मुझे पैसों की, मुझे सोता देख कर उठाने में हिचकिचाइए मत.’’

बाबू ने उसे आवाज दी. वह एक आवाज में उठ बैठा और चादर लपेट कर रखता हुआ बोला, ‘‘बैठिए, बहनजी, कहां चलना है? भाव ताव न करें, जो मुनासिब समझें दे दें.’’

मैं बाबू को वापस लौटने को कह कर रिक्शे में बैठ गई. रास्ते में मैं ने उस से पूछा, ‘‘तुम ने यह तख्ती क्यों लगा रखी है?’’

वह बोला, ‘‘कभीकभी मैं इतनी गहरी नींद में होता हूं कि सवारी के उठाने पर भी नहीं जागता. इस से बड़ी मुश्किल का सामना करना पड़ता है.’’

उस की बातचीत से वह किसी अच्छे घराने का लड़का लग रहा था. मुझे उस के बारे में जानने की सहज ही उत्सुकता हुई. जो कुछ उस ने बताया वह बहुत ही आश्चर्यजनक था. वह एक साधारण गरीब परिवार से था और एक विद्यालय में चपरासी था. जो वेतन मिलता था उस में पत्नी व बच्चों का पेट बड़ी मुश्किल से भर पाता था. पिछले दिनों उस की बहन को उस के पति ने तलाक दे कर वापस मायके भेज दिया था, उसे कोई बीमारी थी, जिस के लिए रोज 15 रुपए की दवाई लानी पड़ती थी.

‘‘मेरी बहन केवल 18 वर्ष की है, बहनजी, उस ने अभी जिंदगी में देखा ही क्या है? मैं उसे मरने नहीं देना चाहता. इसलिए रात को अपने दोस्त का यह रिक्शा चलाता हूं. 15 रुपए हाथ आते ही घर लौट जाता हूं, इतने रुपए न मिलें तो रिक्शे पर यह तख्ती लगा कर सो जाता हूं ताकि कोई सवारी हाथ से न चली जाए.’’

मेरा मन श्रद्धा से झुक गया. मैं ने मुक्तकंठ से उस की प्रशंसा की. मन में सोचा कि लौटने पर सलमान से कह कर उसे किसी जगह चौकीदार लगवा दूंगी. उस से विदा ली तो मन में कहीं एक फांस गड़ी सी रह गई. कोई बात दिल में खटक रही थी. पर क्या, पकड़ में ही नहीं आ रही थी. गाड़ी में बैठी तो अब्बू की याद रहरह कर आने लगी.

मेरे दोनों बड़े भाई कनाडा और इंडोनेशिया में सिले सिलाए कपड़ों का कारोबार करते थे. अब्बू को हर महीने नियमित रूप से पैसे भेजते और साल दो साल में आ कर मिल भी जाते. अम्मा तो बहुत चाहती थीं कि दोनों भाभियों में से कोई उन के  पास रहे, पर किसी ने भी यहां रहना पसंद न किया. बेटों से जुदाई अम्मां के लिए जानलेवा सिद्ध हुई.

अम्मां के जाते ही अब्बू नितांत अकेले रह गए. मैं उन्हें अपने पास रखना चाहती थी, पर उन्होंने बेटी के घर रहना पसंद नहीं किया. मैं और सलमान महीने दो महीने में जा कर उन से मिल आते. मैं ने हमेशा यह बात महसूस की कि जितना मेरे मिलने पर वह खुश होते, उस से कहीं ज्यादा मेरे बिछड़ने पर वह रोते. पर मैं करती भी क्या? अपने घर, अपने पति और बच्चों के लिए मुझे लौटना ही पड़ता.

घर पहुंची तो बाहरी द्वार खुला हुआ मिला. मैं अब्बू के कमरे की ओर बढ़ी ही थी कि बब्बन चचा की आवाज ने मेरे कदम जड़ कर दिए, ‘‘तुम तो सठिया गए हो. दवाइयां जो लाभ पहुंचाएंगी वह क्या बच्चों की याद कर सकेगी?’’

‘‘मैं कहां याद करता हूं, बब्बन?’’ अब्बू की आवाज बहुत धीमी थी.

‘‘क्या मैं सुनता नहीं? नींद में बेटों से, पोते पोतियों से बातें करते रहते हो. क्या तुम्हारे याद करने से वे लोग तुम्हारे पास लौट आएंगे?’’

बब्बन चचा की बात में वजन था. इसीलिए अब्बू ने शायद अपनी कमजोरी स्वीकार करते हुए कहा, ‘‘बब्बन, दोनों बच्चे जब छोटे थे तब उन्हें उंगली पकड़ कर चलना सिखाता था और सोचता था कि जब मैं बूढ़ा हो जाऊंगा तो ये दोनों बच्चे दोनों तरफ से थाम कर मुझे चलाएंगे. वे कपड़े गीले कर देते थे तो सोचता था कि मेरी बीमारी में ये ही हाथ कभी मेरे कपड़े बदलेंगे. अपने हाथों से छोटेछोटे कौर बना कर उन के मुंह में देता था और सोचता था ये ही बच्चे बड़े हो कर मुझे दवा पिलाएंगे…’’

‘‘बस करो, मेरे दोस्त,’’ बब्बन चचा की आवाज भर्रा गई, ‘‘इनसान को पेड़ लगा कर स्वयं फल खाने की इच्छा नहीं करनी चाहिए. आज का जमाना ऐसा है कि बच्चों को पाल पोस कर बड़ा करना, मां बाप को कर्तव्य समझ कर करना चाहिए. बच्चों से उन के कर्तव्य की बात करना ही गलत है. दोस्त, मेरा ख्याल है इस प्रकार एकांत में पड़े रहने से कहीं अच्छा है कि तुम अपनी बेटी के पास चले जाओ.’’

अब्बू बहुत देर तक कुछ नहीं बोले. उन का उत्तर सुनने के लिए मैं बेताब हो गई. बहुत देर बाद वह बोले, ‘‘बिटिया ने तो मुझ से कई बार कहा पर मुझे अच्छा नहीं लगता दामाद के घर रहना, इसीलिए इनकार करता रहा. अब मैं स्वयं उस से कैसे कहूं? बब्बन, बिटिया के बच्चे मुझे चाहते भी बहुत हैं. मैं यहां नहीं रहना चाहता पर अब बेटी से कह भी तो नहीं सकता.’’

‘‘मैं बात करूंगा बिटिया से,’’ बब्बन चचा बोले तो अब्बू ने तड़प कर उन्हें रोक दिया, ‘‘नहीं, ऐसा न करना, बब्बन, बेटी जब ससुराल जाती है तो मां बाप से संबंध रखने में उसे बड़ा चौकस रहना पड़ता है. उसे मायके की इज्जत रखने के साथ ससुराल की इज्जत भी निभानी पड़ती है. बात रुपए पैसे की नहीं. बेटे मुझे कितना रुपया भेजते हैं, पर मैं बैंक से निकालता हूं कभी? पड़े रहें, उन्हीं के काम आएंगे. मैं बेटों से अपनी व्यथा नहीं कहता. बेटी तो ससुराल की इज्जत है, उस से क्या कहूं?’’

मौन के वे क्षण न जाने कितने लंबे हो गए. मैं कोई आहट किए बिना खड़ी थी और भीतर अब्बू और बब्बन चचा मौन भाषा में बात कर रहे थे. कोई 40 मिनट के बाद मैं अपने हवास में लौटी और कमरे में दाखिल हो गई.

‘‘अरे, बिटिया, आ गई,’’ बब्बन चचा के स्वर से अब्बू की आंख खुल गई. मैं उन के पास बैठ कर रोने लगी, वे सभी बातें याद कर जो अभी पिछले 40 मिनट से सुन रही थी. जब बहुत देर तक मेरा रोना नहीं रुका तो अब्बू भी घबरा गए, ‘‘क्या बात है, बिटिया? क्यों इतना रोए जा रही है?’’

‘‘अब्बू, आप के दामाद और बच्चों ने मुझे घर से निकाल दिया है,’’ मैं ठीक ऐसे ही बोली जैसे कोई मंझी हुई अभिनेत्री किसी फिल्म में कहा करती है.

‘‘क्या कह रही है, बेटी?’’ अब्बू एकदम घबरा गए.

मुझे डर लगा कि कहीं सदमा न लग जाए उन्हें, तुरंत बनावटी रुलाई रोते हुए बोली, ‘‘हां, अब्बू, उन लोगों ने कहा है, तुम्हारे अब्बू वहां अकेले बीमार पड़े रहते हैं और मैं ठाट से रहती हूं. इस के लिए मुझे शर्म आनी चाहिए.’’

‘‘अरे वाह, यह भी कोई बात हुई,’’ अब्बू सचमुच हैरान थे.

‘‘मुझ से कहा है अपने अब्बू को ले कर आओगी तो घर में घुसने देंगे, नहीं तो नहीं.’’ मैं ने बच्चों की तरह ठुनकते हुए कहा, ‘‘अब्बू, आप को कितनी बार कहा है, मेरे साथ चल कर रहिए. पर आप सुनते ही नहीं. क्या आप मुझ से मेरा घर छुड़वा देंगे? यहां सब लोग ताने देते हैं. मेरी सास कहती है, ‘जो अपने बाप की नहीं हुई वह सास ससुर की क्या होगी? जो बाप की सेवा नहीं करती वह बेटी क्या हुई?’’’

अब्बू किसी सोच में पड़ गए, ‘‘बिटिया, सच बता, कामरान और सुल्तान मेरी याद करते हैं?’’

‘‘अरे अब्बू, उन्हीं दोनों ने तो अपने अब्बा को बहकाया है. एक दिन बोले, ‘हम दोनों भी बड़े हो कर आप लोगों को अकेला छोड़ देंगे.’ यह सुन कर आप के दामाद डर गए और मुझे यहां भेज दिया. तो फिर आप क्या कहते हैं, अब्बू?’’ मैं ने अब्बू का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा.

‘‘बेटी, बेटों के होते हुए मैं बेटी के घर रहूं यह अच्छा नहीं लगता.’’ अब्बू का मन नहीं मान रहा था.

मेरा मन पुन: भर आया, ‘‘ठीक है, अब्बू, हमेशा के लिए न सही, पर उस समय तक मेरे घर चल कर रहिए जब तक बड़े भैया आप को लेने नहीं आ जाते.’’

‘‘क्या? बब्बू आ रहा है यहां? कब?’’ अब्बू भावविह्ल हो कर बोले.

‘‘मैं ने बड़े भैया, छोटे भैया दोनों को पत्र लिखा था. बड़े भैया अगले महीने आ कर आप को अपने साथ ले जाएंगे. फिर पता नहीं कब आप की सेवा का अवसर मिले, इसलिए तब तक मेरे घर चल कर रहिए. 20-22 दिन की ही तो बात है.’’

अब्बू बब्बन चचा का सहारा ले कर उठ बैठे. बब्बन चचा मेरी ओर यों देख रहे थे जैसे वह मेरे मन पर टंगी उस तख्ती को स्पष्ट देख रहे हों जिस पर लिखा है- ‘‘मुझे पितृ छाया की जरूरत है.’’

रिक्शे वाले से मिलने के बाद से जो फांस मन में गड़ कर पीड़ा पहुंचा रही थी वह अब निकल चुकी थी. Family Story In Hindi :

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