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Family Story In Hindi: जरा सा मोहत्याग- मां को किसकी चिंता सता रही थी?

Family Story In Hindi: बहुत दिनों से नीमा से बात नहीं हो पा रही थी. जब भी फोन मिलाने की सोचती कोई न कोई काम आ जाता. नीमा मेरी छोटी बहन है और मेरी बहुत प्रिय है.

‘‘मौसी की चिंता न करो मां. वे अच्छीभली होंगी तभी उन का फोन नहीं आया. कोई दुखतकलीफ होती तो रोनाधोना कर ही लेतीं.’’

मानव ने हंस कर बात उड़ा दी तो मुझे जरा रुक कर उस का चेहरा देखना पड़ा. आजकल के बच्चे बड़े समझदार और जागरूक हो गए हैं, यह मैं समझती हूं और यह सत्य मुझे खुशी भी देता है. हमारा बचपन इतना चुस्त कहां था, जो किसी रिश्तेदार को 1-2 मुलाकातों में ही जांचपरख जाते. हम तो आसानी से बुद्धू बन जाते थे और फिर संयुक्त परिवारों में बच्चों का संपर्क ज्यादातर बच्चों के साथ ही रहता था. बड़े सदस्य आपस में क्या मनमुटाव या क्या मेलमिलाप कर के कैसेकैसे गृहस्थी की गाड़ी खींच रहे हैं, हमें पता ही नहीं होता था. आजकल 4 सदस्यों के परिवार में किस के माथे पर कितने बल आए और किस ने किसे कितनी बार आंखें तरेर कर देखा बच्चों को सब समझ में आता है.

‘‘मैं ने कल मौसी को मौल में देखा था. शायद बैंक में जल्दी छुट्टी हो गई होगी. खूब सारी शौपिंग कर के लदीफंदी घूम रही थीं. उन की 2 सहयोगी भी साथ थीं.’’

‘‘तुम से बात हुई क्या?’’

‘‘नहीं. मैं तीसरे माले पर था और मौसी दूसरे माले पर.’’

‘‘कोई और भी तो हो सकती है? तुम ने ऊपर से नीचे कैसे देख लिया?’’

‘‘अरे, अंधा हूं क्या मैं जो ऊपर से नीचे दिखाई न दे? अच्छीखासी हंसतेबतियाते जा रही थीं… और आप जब भी फोन करती हैं रोनाधोना शुरू कर देती हैं कि मर गए, बरबाद हो गए. जो समय सुखी होगा उसे आप से कभी नहीं बांटती और जब जरा सी भी तकलीफ होगी तो उसे रोरो कर आप से कहेंगी. मौसी जैसे इनसान की क्या चिंता करनी… छोड़ो उन की चिंता. उन का फोन नहीं आया तो इस का मतलब है कि वे राजीखुशी ही होंगी.’’

मैं ने अपने बेटे को जरा सा झिड़क दिया और फिर बात टाल दी. मगर सच कहूं तो उस का कहना गलत भी नहीं था. सच ही समझा है उस ने अपनी मौसी को. अपनी जरा सी भी परेशानी पर हायतोबा मचा कर रोनाधोना उसे खूब सुहाता है. लेकिन बड़ी से बड़ी खुशी पचा जाना उस ने पता नहीं कहां से सीख लिया. कहती खुशी जाहिर नहीं करनी चाहिए नजर लग जाती है. किस की नजर लग जाती है? क्या हमारी? हम जो उस के शुभचिंतक हैं, हम जिन्हें अपनी परेशानी सुनासुना कर वह अपना मन हलका करती है, क्या हमारी नजर लगेगी उसे? अंधविश्वासी कहीं की. अभी पिछले हफ्ते ही तो बता रही थी कि मार्च महीने की वजह से हाथ बड़ा तंग है. कुछ रुपए चाहिए. मेरे पास कुछ जमाराशि है, जिसे मैं ने किसी आड़े वक्त के लिए सब से छिपा कर रखा है. उस में से कुछ रुपए उसे देने का मन बना भी लिया था. मैं जानती हूं रुपए शायद ही वापस आएं. यदि आएंगे भी तो किस्तों में और वे भी नीमा को जब सुविधा होगी तब. छोटी बहन है मेरी. मातापिता ने मरने से पहले समझाया था कि छोटी बहन को बेटी समझना. मुझ से 10 साल छोटी है. मैं उस की मां नहीं हूं, फिर भी कभीकभी मां बन कर उस की गलती पर परदा डाल देती हूं, जिस पर मेरे पति भी हंस पड़ते हैं और मेरा बेटा भी.

‘‘तुम बहुत भोली हो शुभा. अपनी बहन से प्यार करो, मगर उसे इतना स्वार्थी मत बनाओ कि उस का ही चरित्र उस के लिए मुश्किल हो जाए. मातापिता को भी अपनी संतान के चरित्रनिर्माण में सख्ती से काम लेना पड़ता है तो क्या वे उस के दुश्मन हो जाते हैं, जो तुम उस की गलती पर उसे राह नहीं दिखातीं?’’

‘‘मैं क्या राह दिखाऊं? पढ़ीलिखी है और बैंक में काम करती है. छोटी बच्ची नहीं है वह जो मैं उसे समझाऊं. सब का अपनाअपना स्वभाव होता है.’’

‘‘सब का अपनाअपना स्वभाव होता है तो फिर रहने दो न उसे उस के स्वभाव के साथ. गलती करती है तो उसे उस की जिम्मेदारी भी लेने दो. तुम तो उसे शह देती हो. यह मुझे बुरा लगता है.’’

मैं मानती हूं कि उमेश का खीजना सही है, मगर क्या करूं? मन का एक कोना बहन के लिए ममत्व से उबर ही नहीं पाता. मैं उसे बच्ची नहीं मानती. फिर भी बच्ची ही समझ कर उस की गलती ढकती रहती हूं. सोचा था क्व10-20 हजार उसे दे दूंगी. कह रही थी कि मार्च महीने में सारी की सारी तनख्वाह इनकम टैक्स में चली गई. घर का खर्च कैसे चलेगा? क्या वह इस सत्य से अवगत नहीं थी कि मार्च महीने में इनकम टैक्स कटता है? उस के लिए तैयारी क्या लोग पहले से नहीं करते हैं? पशुपक्षी भी अपनी जरूरत के लिए जुगाड़ करते हैं. तो क्या बरसात के मौसम के लिए छाते का इंतजाम नीमा के पड़ोसी या मित्र करेंगे? सिर मेरा है तो उस की सुरक्षा का प्रबंध भी मुझे ही करना चाहिए न. मैं हैरान हूं कि उस के पास तो घर खर्च के लिए भी पैसे नहीं थे और मानव ने बताया मौसी मौल में खरीदारी कर रही थीं. सामान से लदीफंदी घूम रही थीं तो शौपिंग के लिए पैसे कहां से आए?

सच कहते हैं उमेश कि कहीं मैं ही तो उसे नहीं बिगाड़ रही. उस के कान मरोड़ उसे उस की गलती का एहसास तो कराना ही चाहिए न. कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं, जिन के बिना गुजारा नहीं चलता. लेकिन वही हमें तकलीफ भी देते हैं. गले में स्थापित नासूर ऐसा ही तो होता है, जिसे काट कर फेंका नहीं जा सकता. उसी के साथ जीने की हमें आदत डालनी पड़ती है. निभातेनिभाते बस हम ही निभाते चलते जाते हैं और लेने वाले का मुंह सिरसा के मुंह जैसा खुलता ही जाता है.

40 की होने को आई नीमा. कब अपनी गलत आदतें छोड़ेगी? शायद कभी नहीं. मगर उस की वजह से अकसर मेरी अपनी गृहस्थी में कई बार अव्यवस्था आ जाती है. अकसर किसी के पैर पसारने की वजह से अगर मेरी भी चादर छोटी पड़ जाए तो कुसूर मेरा ही है. मैं ने अपनी चादर में उसे पैर पसारने ही क्यों दिए? मातापिता ही हैं जो औलाद के कान मरोड़ कर सही रास्ते पर लाने का दुस्साहस कर सकते हैं. वैसे तो एक उम्र के बाद सब की बुद्धि इतनी परिपक्व हो ही जाती है कि चाहे तो पिता का कहा भी न माने तो पिता कुछ नहीं कर सकता. मगर बच्चे के कान तक हाथ ले जाने का अधिकार उसे अवश्य होता है.

मैं ने शाम को कुछ सोचा और फिर नीमा के घर का रुख कर लिया. फोन कर के बताया नहीं कि मैं आ रही हूं. मानव कोचिंग क्लास जाता हुआ मुझे स्कूटर पर छोड़ता गया. नीमा तब स्तब्ध रह गई जब उस ने अपने फ्लैट का द्वार खोला.

‘‘दीदी, आप?’’

नीमा ने आगेपीछे ऐसे देखा जैसे उम्मीद से भी परे कुछ देख लिया.

‘‘दीदी आप? आप ने फोन भी नहीं किया?’’

‘‘बस सोचा तुझे हैरान कर दूं. अंदर तो आने दे… दरवाजे पर ही खड़ा कर दिया.’’

उसे एक तरफ हटा कर मैं अंदर चली आई. सामने उस का कोई सहयोगी था. मेज पर खानेपीने का सामान सजा था. होटल से मंगाया गया था. जिन डब्बों में आया था उन्हीं में खाया भी जा रहा था. पुरानी आदत है नीमा की, कभी प्लेट में सजा कर सलीके से मेज पर नहीं रखती. समोसेपकौड़े तो लिफाफे में ही पेश कर देती है. पेट में ही जाना है. क्यों बरतन जूठे किए जाएं? मुझे देख वह पुरुष सहसा असहज हो गया. सोचता होगा कैसी बदतमीज है नीमा की बहन एकाएक सिर पर चढ़ आई.

‘‘अपना घर है मेरा… फोन कर के आने की क्या तुक थी भला? बस बैठबैठे मन हुआ तो चली आई. क्यों तुम कहीं जाने वाली थी क्या?’’

मैं ने दोनों का चेहरा पढ़ा. पढ़ लिया मैं ने कुछ अनचाहा घट गया है उन के साथ.

‘‘तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं थी, इसलिए सोचा देख आऊं.’’

‘‘हां, विजय भी हालचाल पूछने ही आए हैं. ये मेरे सहयोगी हैं.’’

मेरे ही प्रश्न ने नीमा को राह दिखा दी. मैं ने तबीयत का पूछा तो उस ने झट से हालचाल पूछने के लिए आए सहयोगी की स्थिति साफ कर दी वरना झट से उसे कोई बहाना नहीं सूझ रहा था. मेरी बहन है नीमा. भला उसी के रंगढंग मैं नहीं पहचानूंगी? बचपन से उस की 1-1 हरकत मैं उस का चेहरा पढ़ कर ही भांप जाती हूं. 10 साल छोटी बहन मेरी बहुत लाडली है. 10 साल तक मेरे मातापिता मात्र एक ही संतान के साथ संतुष्ट थे. मैं ही अकेलेपन की वजह से बीमार रहने लगी थी. मौसी और बूआ सब की 2-2 संतानें थीं और मेरे घर में मैं अकेली. बड़ों में बैठती तो वे मुझे उठा देते कि चलो अंदर जा कर खेलो. क्या खेलो? किस के साथ खेलो? बेजान खिलौने और बेजान किताबें… किसी जानदार की दरकार होने लगी थी मुझे. मैं चिड़ीचिड़ी रहती थी, जिस का इलाज था भाई या बहन.

भाई या बहन आने वाला हुआ तो मातापिता ने मुझे समझाना शुरू कर दिया कि सारी जिम्मेदारी सिर्फ मेरी ही होगी. अपना सुखदुख भूल मैं नीमा के ही सुख में खो गई. 10 साल की उम्र से ही मुझ पर इतनी जिम्मेदारी आ गई कि अपनी हर इच्छा मुझे व्यर्थ लगती. ‘‘तुम उस की मां नहीं हो शुभा… जो उस के मातापिता थे वही तुम्हारे भी थे,’’ उमेश अकसर समझाते हैं मुझे.

अवचेतन में गहरी बैठा दी गई थी मातापिता द्वारा यह भावना कि नीमा उसी के लिए संसार में लाई गई है. मुझे याद है अगर हम सब खाना खा रहे होते और नीमा कपड़े गंदे कर देती तो रोटी छोड़ कर उस के कपड़े मां नहीं मैं बदलती थी. जबकि आज सोचती हूं क्या वह मेरा काम था? क्या यह मातापिता का फर्ज नहीं था? क्या बहन ला कर देना मेरे मातापिता का मुझ पर एहसान था? इतना ज्यादा कर्ज जिसे 40 साल से मैं उतारतेउतारते थक गई हूं और कर्ज है कि खत्म ही नहीं होता है.

‘‘आओ दीदी बैठो न,’’ अनमनी सी बोली नीमा.

मेरी नजर सोफे पर पड़े लिफाफों पर पड़ी. जहां से खरीदे गए थे उन पर उसी मौल का पता था जिस के बारे में मानव ने मुझे बताया था. कुछ खुले परिधान बिखरे पड़े थे आसपास. शायद नीमा उन्हें पहनपहन कर देख रही थी या फिर दिखा रही थी.

छटी इंद्री ने मुझे एक संकेत सा दिया… यह पुरुष नीमा की जिंदगी में क्या स्थान रखता है? क्या इसी को नीमा नए कपड़े पहनपहन कर दिखा रही थी.

‘‘क्या बुखार था तुम्हें? आजकल मौसम बदल रहा है… वायरल हो गया होगा,’’ कह मैं ने कपड़ों को धकेल कर एक तरफ किया.

उसी पल वह पुरुष उठ पड़ा, ‘‘अच्छा, मैं चलता हूं.’’

‘‘अरे बैठिए न… आप अपना खानापीना तो पूरा कीजिए. बैठो नीमा,’’ मेरा स्वर थोड़ा बदल गया होगा, जिस पर दोनों ने मुझे बड़ी गौर से देखा.

उस पुरुष ने कुछ नहीं कहा और फिर चला गया. नीमा भी अनमनी सी लगी मुझे.

‘‘बीमार थी तो यह फास्ट फूड क्यों खा रही हो तुम?’’ डब्बों में पड़े नूडल्स और मंचूरियन पर मेरी नजर पड़ी. उन डब्बों में 1 ही चम्मच रखा था. जाहिर है, दोनों 1 ही चम्मच से खा रहे थे.

‘‘कुछ काम था तुम से इसलिए फोन पर बात नहीं की… मुझे कुछ रुपए चाहिए थे… मानव की कोचिंग क्लास के लिए… तुम्हारी तरफ मेरे कुल मिला कर 40 हजार रुपए बनते हैं. तुम तो जानती हो मार्च का महीना है.’’ नीमा ने मुझे विचित्र सी नजरों से देखा जैसे मुझे पहली बार देख रही हो… चूंकि मैं ने कभी रुपए वापस नहीं मांगे थे, इसलिए उस ने भी कभी वापस करना जरूरी नहीं समझा. मैं बड़ी गौर से नीमा का चेहरा पढ़ रही थी. मैं उस की शाम बरबाद कर चुकी थी और संभवतया नैतिक पतन का सत्य भी मेरी समझ में आ गया था. अफसोस हो रहा है मुझे. एक ही मातापिता की संतान हैं हम दोनों बहनें और चरित्र इतना अलगअलग… एक ही घर की हवा और एक ही बरतन से खाया गया खाना खून में इतना अलगअलग प्रभाव कैसे छोड़ गया.

‘‘मेरे पास पैसे कहां…?’’ नीमा ने जरा सी जबान खोली.

‘‘क्यों? अकेली जान हो तुम. पति और बेटा अलग शहर में रहते हैं… उस पर तुम एक पैसा भी खर्च नहीं करती… कहां जाते हैं सारे पैसे?’’

नीमा अवाक थी. सदा उसी की पक्षधर उस की बहन आज कैसी जबान बोलने लगी. बोलना तो मैं सदा ही चाहती थी, मगर एक आवरण था झीना सा खुशफहमी का कि शायद वक्त रहते नीमा का दिमाग ठीक हो जाए. उस का परिवार और मेरा परिवार तो सदा ही उस के आचरण से नाराज था बस एक मैं ही उस के लिए डूबते को तिनके का सहारा जैसी थी और आज वह सहारा भी मैं ने छीन लिया.

‘‘पाईपाई कर जमा किए हैं मैं ने पैसे… मानव के दाखिले में कितना खर्चा होने वाला है, जानती हो न? मेरी मदद न करो, लेकिन मेरे रुपए लौटा दो. बस उन से मेरा काम हो जाएगा,’’ कह कर मैं उठ गई. काटो तो खून नहीं रहा नीमा में. मेरा व्यवहार भी कभी ऐसा होगा, उस ने सपने में भी नहीं सोचा होगा. उस की हसीन होती शाम का अंजाम ऐसा होगा, यह भी उस की कल्पना से परे था. कुछ उत्तर होता तो देती न. चुपचाप बैठ गई. उस के लिए मैं एक विशालकाय स्तंभ थी जिस की ओट में छिप वह अपने पति के सारे आक्षेप झुठला देती थी.

‘‘देखो न दीदी अजय कुछ समझते ही नहीं हैं…’’

अजय निरीह से रह जाते थे. नीमा की उचितअनुचित मांगों पर. नारी सम्मान की रक्षा पर बोलना तो आजकल फैशन बनता जा रहा है. लेकिन सोचती हूं जहां पुरुष नारी की वजह से पिस रहा है उस पर कोई कानून कोई सभा कब होगी? अपने मोह पर कभी जीत क्यों नहीं पाई मैं. कम से कम गलत को गलत कहना तो मेरा फर्ज था न, उस से परहेज क्यों रखा मैं ने? अफसोस हो रहा था मुझे. दम घुटने लगा मेरा नीमा के घर में… ऐसा लग रहा था कोई नकारात्मक किरण मेरे वजूद को भेद रही है. मातापिता की निशानी अपनी बहन के वजूद से मुझे ऐसी अनुभूति पहले कभी नहीं हुई. सच कहूं तो ऐसा लगता रहा मांपिताजी के रूप में नीमा ही है मेरी सब कुछ और शायद यही अनुभूति मेरा सब से बड़ा दोष रही. कब तक अपना दोष मैं न स्वीकारूं? नीमा की भलाई के लिए ही उस से हाथ खींचना चाहिए मुझे… तभी वह कुछ सही कर पाएगी…

‘‘दीदी बैठो न.’’

‘‘नहीं नीमा… मुझे देर हो रही है… बस इतना ही काम था,’’ कह नीमा का बढ़ा हाथ झटक मैं बाहर चली आई. गले तक आवेग था. रिकशे वाले को मुश्किल से अपना रास्ता समझा पाई. आंसू पोंछ मैं ने मुड़ कर देखा. पीछे कोई नहीं था, जो मुझे रोकता. मुझे खुशी भी हुई जो नीमा पीछे नहीं आई. बैठी सोच रही होगी कि यह दीदी ने कैसी मांग कर दी… पहले के दिए न लौटा पाए न सही कम से कम और तो नहीं मांगेगी न… एक भारी बोझ जैसे उतर गया कंधों पर से… मन और तन दोनों हलके हो गए. खुल कर सांस ली मैं ने कि शायद अब नीमा का कायापलट हो जाए. Family Story In Hindi.

Beautiful Love Story In Hindi: 2 रातें- रोहित से क्यों नफरत करने लगी श्रेया?

Beautiful Love Story In Hindi: सुबह के 9 बज रहे थे जब मेरी नींद लगातार बजती डोरबेल से खुली। आदतन मैं ने अनामिका को आवाज लगानी चाही लेकिन मुझे याद आया कि वह अब कभी नहीं आएगी। अभी 3 दिन पहले ही तो हमारा तलाक हुआ था। मैं उठा, दरवाजा खोला तो देखा एक 18-20 साला अनजान लड़की बदहवास सी खड़ी थी,”नानी को अटैक आया है, प्लीज हैल्प मी…”

पहले तो मुझे कुछ समझ नहीं आया, जब समझा तो मेरे मुंह से निकला,”तुम हो कौन? नानी कहां है तुम्हारी?”

“नवीनजी की भांजी हूं, मामामामी दिल्ली गए हैं…”

नवीन मेरे पड़ोसी हैं. सरकारी अफसर हैं और हमउम्र होने के कारण अच्छी मित्रता भी है उन से। मैं ने भीतर जा कर अपना पर्स लिया, पैर में चप्पलें डालीं और चल पड़ा उस के साथ। वहां जा कर देखा तो पाया कि आंटी सोफे पर पसीने से लथपथ अपने सीने को दबाए बैठी थीं। मैं ने तुरंत पास के अस्पताल में फोन किया। लड़की बेहद घबराई हुई थी। मैं ने उसे सांत्वना देते हुए कहा,”चिंता मत करो, अभी ऐंबुलैंस आ रही है।”

अस्पताल पहुंचते ही उन का ट्रीटमैंट शुरू हो गया, फिर मैं ने लड़की से पूछा कि नवीन को फोन किया, तो उस ने बताया कि बात हो गई है। मामामामी अभी वापस रवाना हो रहे हैं। मैं ने अंदाज लगाया कि दिल्ली से जयपुर बाई रोड 4 से 5 घंटे तो लग ही जाएंगे। इसी बीच डाक्टर ने आ कर बताया कि चिंता की बात नहीं है माइल्ड अटैक है, अब वे ठीक हैं। कुछ दवाएं, रजिस्ट्रैशन इत्यादि काम मैं ने निबटा दिए थे। तभी आईसीयू से एक नर्स आ कर बोली,”श्रेया से उस की नानी मिलना चाहती है।”

लड़की यानी श्रेया अंदर गई और 20 मिनट के बाद लौटी तो शांत व आश्वस्त लग रही थी। उस ने कहा कि माफी चाहती हूं आप को परेशान करना पड़ा। मैं ने कहा,”नवीन की मां भी मेरी मां जैसी है, इस में क्या परेशानी है। बस, चाय नहीं पी है तो…”

वह फिर हंसती हुई बोली,”आप चाय पी कर आइए।”

“ठीक है,” कह कर मैं जाने लगा, तो अचानक मुझे याद आया कि श्रेया ने भी चाय नही पी होगी। मैं ने कहा, “तुम भी चलो, यहां कुछ काम तो नहीं है हमारा, कुछ होगा तो मेरे पास फोन आ जाएगा।”

“चलिए…”

कैंटीन में चाय पीते वक्त मैं ने ध्यान दिया, श्रेया बेहद सुंदर थी। लंबी व छरहरी और सिंदूर मिले दूधिया वर्ण की। मैं ने उस से कई सवाल पूछ डाले कि कहां रहती हो, क्या कर रही हो, यहां कब आई वगैरह। उस ने बताया कि जोधपुर से है, कल शाम को ही आई है, ग्रैजुएशन हुआ है आगे की पढ़ाई यहीं से करनी है। मामा कल रात ही दिल्ली गए हैं। जैसाकि मैं जानता था कि नवीन का ससुराल है दिल्ली।

अब कुछ अपनी बातें…
मैं 35 साल का हूं और म्यूजिशियन हूं। अपने पेशे में ज्यादा सफल नहीं हूं, पत्नी अनामिका से लव मैरिज की थी। वह सरकारी स्कूल में टीचर है और मेरा ससुराल यहीं जयपुर में ही था। वह चाहती थी कि मैं म्यूजिक को छोड़ कुछ कामधंधा करूं। वह बच्चा भी चाहती थी और इन्हीं 2 बातों को ले कर झगड़े होते रहते थे। अपने भीतर मैं समझता था कि वह सही है लेकिन अपना पैशन और अपना मेल ईगो छोड़ते नहीं बना।

खैर, इसी बीच श्रेया ने कहा कि वह 10 मिनट में आती है तो लगा कि वाशरूम गई होगी। मुझे सिगरेट की तलब उठ रही थी। मैं अस्पताल से बाहर चला आया। वहां बाहर ही एक दुकान से मैं ने सिगरेट ली और उसी के पीछे चला गया पीने। वहां मैं ने देखा कि श्रेया खड़ी सिगरेट पी रही है। मुझे देख कर वह एकबारगी सकपका गई लेकिन मुसकराते हुए बोली,”मामा को मत बताना…”

मैं ने पूछ लिया,”कौनसा ब्रैंड पीती हो? रूटीन में पीती हो?” मैं जानता हूं कि यह एक गंदी लत है मगर चाह कर भी इसे छोङ नहीं पा रहा था। कह सकते हैं कि सिगरेट ने मुझे अपनी गिरफ्त में ले लिया था। यह भी सही है कि सिगरेट की लत पहले फैशन में लोग करते हैं और फिर यह एक गंदी लत बन जाती है, यह जानते हुए कि यह स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह है।

खैर, वह बोली,”हां… कोई सी भी ब्रैंड पी लेती हूं…” सिगरेट खत्म कर हम अस्पताल गए। करीब 2 घंटे बाद नवीन और उस की पत्नी पंहुच गए और मैं और श्रेया घर लौट आए। नहा कर, खाना औनलाइन मंगवा कर शाम को करीब 4 बजे मैं श्रेया को ले कर वापस अस्पताल गया। तय हुआ कि नवीन और भाभी घर जा कर रैस्ट करेंगे और रात को वापस आएंगे। तब मैं और श्रेया घर चले जाएंगे। नवीन के घर पर मेड थी तो चिंता की कोई बात नहीं थी। रात को करीब 11 बजे श्रेया का फोन आया,”सिगरेट है आप के पास? ले कर छत पर आओ,” उस ने अधिकारपूर्ण स्वर में कहा।

नवीन और मेरे घर की छतों की मुंडेर एक ही थी। अपनी छत की दीवार कूद कर मैं गया तो वह छत पर बिछे एक बिस्तर पर बैठी थी। सिगरेट पीतेपीते उस ने मुझ से बेशुमार सवाल कर डाले,”बीवी कहां है, मामी बता रही थी कि लव मैरिज की है, प्यार कैसे हुआ, शादी कैसे की, तुम्हारे शौक क्याक्या हैं…”

मैं ने बिना लागलपेट के सब कह सुनाया। यह भी कि अनामिका से पहले भी मेरी कई आशनाई थी और यह भी कि मेरा उस से तलाक हो गया है। बस यह बात यहां किसी को पता नहीं है। अब सवाल करने की मेरी बारी थी। मैं ने पहले पढ़ाई से संबंधित सवाल पूछे, फिर उस की हौबीज के बारे में जाना, परिवार के बारे में जाना, अचानक से मैं ने पूछा,”कोई बौयफ्रैंड नहीं है…”

उस ने जवाब दिया,”अभी तो नहीं पर कई रह चुके, किसी को मैं ने छोड़ दिया, किसी ने मुझे। चलता रहता है… तुम को बनना है?”

मैं सीधा प्रश्न सुन कर हड़बड़ा गया। मैं ने उस के चेहरे की ओर देखते हुए कुछ जवाब देना चाहा तो देखा वह हंस रही थी। मुझे यह तो नहीं पता कि वह क्या सोच रही थी लेकिन कयास मेरा यही था कि वह मुझ से मजाक कर रही थी। आखिर थी ही वह इतनी जीवंत और स्वछंद। इसी तरह सिगरेट और बातें। कब रात गुजर गई पता ही नहीं चला। सुबह जब सूरज अपने पर निकालने की तैयारी में था तो उस ने मुझे कहा,” जाओ, कुछ देर सो भी लो। अस्पताल चलोगे?”

मैं स्वीकृति देते कहते हुए अपनी छत की तरफ का रुख किया। वह भी उठ कर नीचे जाने लगी। जातेजाते रुकी और बोली,”थैंक्यू, यह रात बड़ी शानदार थी…”

अगले दिन मैं 11 बजे सो कर उठा, चाय बना कर पी और तैयार हो कर नवीन के घर गया तो भाभी घर पर थीं। उन्होंने बताया कि नवीन अस्पताल ही है और श्रेया गई थी तभी मैं घर आई हूं। मैं भी अस्पताल निकल पड़ा और नवीन को मैं ने जबरदस्ती घर भेज दिया। नवीन ने बताया कि कल छुट्टी मिल जाएगी मम्मी को। सुन कर अच्छा लगा। मैं और श्रेया रात को 8 बजे अस्पताल से आए, रास्ते में वह मुझ से कह रही थी कि आज वह जल्दी सोएगी, थकान हो रही है। मुझे भी थकान हो रही थी तो मैं घर जाते ही सो गया।

रात को करीब 11 बजे अचानक से मेरी आंखें खुली, उस वक्त न जाने क्यों मुझे अनामिका की याद आई। अकेलेपन के भयावह एहसास ने मुझे जकड़ लिया, सीना भारी होने लगा, मुझे घुटन होने लगी। अनायास ही मैं ने मोबाइल उठाया और श्रेया को व्हाट्सऐप पर मैसेज किया,”सो गई क्या?”

2 मिनट बाद ही उस का जवाब आया,”नहीं, बस सोने जा रही थी।”

“तुम नहीं सोए?”

“सो गया था, बेचैनी से आंखें खुल गईं।”

“क्यों, क्या हुआ? परेशान हो?”

“नहीं, परेशान तो नहीं बस अकेला सा महसूस कर रहा हूं।”

“मैं समझती हूं, चिंता मत करो, सब सही हो जाएगा।”

अचानक से मेरे मन में जाने क्या आया, मैं ने उस से कहा,”आई नीड ए हग ऐंड किस यू…”

उधर से कोई जवाब नहीं आया, जबकि उस ने मैसेज देख लिया था। मैं ने इंतजार किया और मुझे घबराहट होने लगी कि कहीं उस की बेबाकी को मैं ने गलत समझ लिया और उस ने नवीन को अगर यह सब कह दिया तो…इस के आगे मैं सोच नहीं पाया। फिर से मैं ने उसे मैसेज किया,”हैलो, आई वाज किडिंग। आई एम रियली सौरी। डौंट माइंड प्लीज…” यह मैसेज भी सीन हुआ और रिप्लाई नहीं आया। मेरे दिल में गुड़गुड़ होने लगी। नींद तो पहले ही गायब हो गई थी। आधे घंटे बाद उस का मैसेज आया,”छत पर आओ…”

मैं डरतेझिझकते छत पर गया। वह सिगरेट पी रही थी। उस ने इशारे से कहा कि इधर आ जाओ। मैं दीवार कूद कर उस के पास गया। उस ने सिगरेट फेंकी, अपना चेहरा जरा सा उठाया और बांहें फैला दीं। मैं ने उसे अपने आलिंगन में लिया। मैं ने उस के होंठों पर होंठ रख दिए। उस को उसी तरह पकड़े मैं ने नीचे बिछे बिस्तर पर लिटा दिया। रात को 3 बजे मैं ने उठते हुए उस से कहा,”जाओ सो जाओ तुम, थकी हुई हो। वह उठी, अपने कपड़े ठीक किए और जातेजाते उस ने पलट कर मुझे देखा और बाय बोल कर नीचे चली गई।

अगली सुबह मैं 12 बजे सो कर उठा था। नवीन का फोन आया हुआ था। बात की तो पता चला कि आंटी को अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया था और वे लोग घर आ गए थे। मुझे बीती रात याद आई तो चेहरे पर मुसकान आ गई। श्रेया के बारे में सोचतेसोचते ही तैयार हो कर नवीन के घर गया। श्रेया ने मुझ से आंखें भी न मिलाई, मैं थोड़ा हैरान हुआ थोड़ा परेशान। वापस घर आ कर उसे फोन किया तो बिजी टोन सुनाई दी। कई बार फोन करने के बाद समझ आया कि उस ने मेरा नंबर ब्लैक लिस्ट में डाल दिया है। ऐसा ही व्हाट्सऐप में था। मुझे लगा कि यह क्या हुआ, क्या मैं ने जबरदस्ती कुछ किया था? अचानक मुझे लगा कि मैं उस से बेहद प्यार करने लगा हूं और उस के बिना रह नही पाऊंगा।

हर दिन मेरी बेचैनी बढ़ने लगी और उस से बात करने के लिए में रोज आंटी की तबियत पूछने के बहाने नवीन के घर जाता रहा, पूरीपूरी शाम और रात छत पर घूमता था लेकिन वह नजर नहीं आती। मेरा हाल दीवानों सा हो गया था। आखिर एक दिन मुझे वह सुपर मार्केट में मिल गई। मैं ने उस का रास्ता रोक लिया। उस का हाथ कस कर जकड़ लिया,”तुम मुझे अवाइड क्यों कर रही हो? ऐसा क्यों कर रही हो तुम मेरे साथ?”

“तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरा हाथ पकड़ने की, हो कौन तुम? मैं तुम को जानती तक नहीं,” गुस्से से तमतमाते हुए उस ने कहा तो मैं आश्चर्य से अधिक रुआंसा हो गया।

“यह क्या कह रही हो तुम श्रेया, ऐसा मत कहो, मैं तुम से प्यार करता हूं, तुम्हारे बिना मैं रह नहीं पाऊंगा, प्लीज…” मैं लगभग रोने लगा था। मैं ने एक पल के लिए उस के चेहरे पर करुणा देखी, लगा वह अभी रो देगी और मेरे सीने से आ लगेगी, लेकिन अगले ही पल उस का चेहरा पत्थर सा सपाट हो गया। उस ने शांत और स्थिर स्वर में कहा,”तुम ने मुझे प्यार नहीं किया रोहित, मैं ने प्यार नहीं किया। हां, तुम ने प्यार नहीं किया। प्यार शीतल होता है, तुम प्यासे हो, प्यार तृप्त होता है, तुम अतृप्त हो, प्यार पूरा होता है, तुम अधूरे हो…”

“यह सब तुम क्या कह रही हो, क्यों कह रही हो, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा। हम ने बहुत प्यारे लम्हे साथ बिताए हैं, हम ने अपना सबकुछ शेयर किया है। हम ने सिर्फ 2 ही रातें साथ बिताई है रोहित, पहली रात मुझे तुम से प्यार होने लगा था, बहुत प्यारे लगे थे तुम, बिलकुल वैसे ही जिस के साथ मैं सहज रह सकूं, जिस को बता सकूं कि मेरा हर राज, हर दुख, हर सपना, लेकिन तुम ने जो कुछ मुझे दिया वह सब अगली ही रात वापस ले लिया यानी हिसाब बराबर।

मैं थके पांव वापस घर आ कर बिस्तर पर निढाल लेट गया। सच तो कह रही थी वह। मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा था और इस सिगरेट की गंदी लत पर भी। मैं उठा और सिगरेट के डब्बे को डस्टबिन में फेंक दिया। Beautiful Love Story In Hindi.

लेखक- सूरज नाहट

Family Story In Hindi: धक्का- मनीषा के त्याग को लेकर जितेन ने क्या कहा?

Family Story In Hindi: ‘‘खैर, खुशी तो हमें तुम्हारी हर सफलता पर होती रही है और यूनेस्को (संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन) द्वारा तुम्हारे चुने जाने पर अब हमें गर्व भी हो रहा है मगर एक बात रह-रह कर खटक रही है,’’ उदयशंकर अपनी बात को प्रभावशाली बनाने के लिए बीच में थोड़ा रुक गए, ‘‘तुम्हारे इतने दूर जाने के बाद तुम्हारी मम्मी एकदम अकेली रह जाएंगी.’’

‘‘छोडि़ए भी, उदय भैया, अकेली रह जाऊंगी? आप सब जो हैं यहां,’’ मनीषा जल्दी से बोली. अपने मन की बात उदयशंकर की जबान पर आती देख कर वह विह्वल हो उठी थी.

‘‘हम तो खैर मरते दम तक यहीं रहेंगे. लेकिन हम में और जितेन में बहुत फर्क है.’’

‘‘वह फर्क तो आप की नजरों में होगा, चाचाजी. पापा के गुजरने के बाद मैंने आप को ही उन की जगह समझा है. आप को अपना बुजुर्ग और मम्मी का संरक्षक समझता हूं,’’ जितेन बोला.

‘‘लीजिए, उदय भैया. अब आप केवल राजन के मित्र ही नहीं, जितेन द्वारा बनाए गए मेरे संरक्षक भी हो गए हैं,’’ मनीषा हंसी.

‘‘उसमें मुझे कोई एतराज नहीं है, मनीषा. मुझसे जो भी हो सकेगा तुम्हारे लिए करूंगा. मगर, मनीषा, मैं या मेरे बच्चे हमेशा गैर रहेंगे. सोचता हूं अगर जितेन यूनेस्को की नौकरी का विचार छोड़ दे तो कैसा रहे?’’

‘‘क्या बात कर रहे हैं, चाचाजी? लोग तो ऐसी नौकरी का सपना देखते रहते हैं, इसके लिए नाक रगड़ने को तैयार रहते हैं और मुझे तो फिर इस नौकरी के लिए खास बुलाया गया है और आप कहते हैं कि मैं न जाऊं. कमाल है,’’ जितेन चिढ़कर बोला.

‘‘लेकिन, तुम्हारी यह नौकरी भी क्या बुरी है? यहां भी तुम्हें खास बुलाया गया था और आगे तरक्की के मौके भी बहुत हैं. भविष्य तो तुम्हारा यहां भी उज्ज्वल है.’’

‘‘चाचाजी, आप ने अपने क्लब का स्विमिंग पूल भी देखा है और समुद्र भी. सो, दोनों का फर्क भी आप समझते ही होंगे,’’ जितेन मुसकराया.

‘‘मैं तो समझता हूं, बरखुरदार, लेकिन लगता है तुम नहीं समझते. क्लब के स्विमिंग पूल का पानी अकसर बदला जाता है, सो साफ-सुथरा रहता है. मगर समुद्र में तो दुनिया-जहान का कचरा बह कर जाता है. फिर उस में तूफान भी हैं, चट्टानें भी और खतरनाक समुद्री जीव भी. यूनेस्को की नौकरी का मतलब है पिछड़े देशों में जा कर अविकसित चीजों का विकास करना, पिछड़ी जातियों का आधुनिकीकरण करना. काफी टेढ़ा काम होगा.’’

‘‘जिंदगी में तरक्की करने के लिए टेढ़े और मुश्किल काम तो करने ही पड़ते हैं, चाचाजी. और फिर जिन्हें समुद्र में तैरने का शौक पड़ जाए वे स्विमिंग पूल में नहीं तैर पाते.’’

‘‘यही सोच कर तो कह रहा हूं, बेटे, कि तुम समुद्र के शौक में मत पड़ो. उस में फंस कर तुम मनीषा से बहुत दूर हो जाओगे. माना कि अब संपर्क साधनों की कमी नहीं, लगता है मानो आमनेसामने बैठ कर बातें कर रहे हैं. फिर भी, दूरी तो दूरी ही है. राजन के गुजरने के बाद मनीषा सिर्फ तुम्हारे लिए ही जी रही है. तुम्हारा क्या खयाल है? सिर्फ आपसी बातचीत के सहारे वह जी सकेगी, टूट नहीं जाएगी?’’

‘‘जानता हूं, चाचाजी. तभी तो मम्मी को आप के सुपुर्द कर के जा रहा हूं. मैं कोशिश करूंगा कि जल्दी ही इन्हें वहां बुला लूं.’’

‘‘और भी ज्यादा परेशान होने को. यहां की इतने साल की प्रभुत्व की नौकरी, पुराने दोस्त और रिश्ते छोड़ कर नए माहौल को अपनाना मनीषा के लिए आसान होगा? अगर कोई अच्छी जगह होती तो भी ठीक था, लेकिन तुम तो अफ्रीकी या अरब इलाकों में ही जाओगे. वहां खुश रहना मनीषा के लिए मुमकिन न होगा.’’

‘‘फिर भी हालात से समझौता तो करना ही पड़ेगा, चाचाजी. महज इस वजह से कि मेरे जाने से मम्मी अकेली रह जाएंगी, इत्तफाक से मिला यह सुनहरा अवसर मैं छोड़ने वाला नहीं हूं.’’

‘‘बहुत अच्छा हुआ, यह बात तू ने मम्मी के जाने के बाद कही,’’ उदयशंकर ने एक गहरी सांस खींच कर कहा.

‘‘क्यों? मम्मी तो स्वयं ही यह नहीं चाहेंगी कि उन की वजह से मेरा कैरियर खराब हो या मैं जिंदगी में आगे न बढ़ सकूं.’’

‘‘बेशक, लेकिन जो बात तुम ने अभी कही थी न, वही तुम्हारे पापा ने उन्हें आज से 25 वर्षों पहले बताई थी.’’

उसे सुन कर उन्हें राजन की याद आ जाना स्वाभाविक ही था. दरवाजे के पीछे खड़ी मनीषा का दिल धक्क से हो गया.

‘‘क्या बताया था पापा ने मम्मी को?’’ जितेन आश्चर्य से पूछ रहा था.

नीषा ने चाहा कि वह जा कर उदयशंकर को रोक दे. उस ने जो बात उदयशंकर को अपना घनिष्ठ मित्र समझ कर बताई थी उसे जितेन को बताने का उदय को कोई हक नहीं था. वह नहीं चाहती थी कि यह बात सुन कर जितेन उदारता अथवा एहसान के बोझ से दब जाए और मनीषा के प्रति उतना कृतज्ञ न हो पाने की वजह से उस के दिल में अपराधभावना आ जाए, मगर मनीषा के पैर जैसे जमीन से चिपक कर रह गए.

उदयशंकर बता रहे थे, ‘‘तुम्हारी मम्मी कितनी मेधावी थीं, शायद इस का तुम्हें अंदाजा भी नहीं होगा. उन जैसी प्रतिभाशाली लड़की को इतनी जल्दी प्यार और शादी के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए था और अगर शादी कर भी ली थी तो कम से कम घर और बच्चों के मोह से तो बचे ही रहना चाहिए था. पर मनीषा ने घर और बच्चों के चक्कर में अपनी प्रतिभा आम घरेलू औरतों की तरह नष्ट कर दी.’’

‘‘खैर, यह तो आप ज्यादती कर रहे हैं, चाचाजी. मम्मी आम घरेलू औरत एकदम नहीं हैं,’’ जितेन ने प्रतिवाद किया, ‘‘मगर पापा ने क्या कहा था, वह बताइए न?’’

‘‘वही बता रहा हूं. तुम्हारी मम्मी ने कभी तुम से जिक्र भी नहीं किया होगा कि उन्हें एक बार हाइडलबर्ग के इंस्टिट्यूट औफ एडवांस्ड साइंसैज ऐंड टैक्नोलौजी में पीएचडी के लिए चुना गया था. तुम्हारी दादी और राजन ने तुम्हारी पूरी देखभाल करने का आश्वासन दिया था.  फिर भी मनीषा जाने को तैयार नहीं हुईं, महज तुम्हारी वजह से.’’

‘‘मैं उस समय कितना बड़ा था?’’

‘‘यही कोई 5-6 महीने के यानी जिस उम्र में मां ही होती है जो दूध पिला दे. और दूध तुम बोतल से पीते थे. सो, तुम्हारी दादी और पापा तुम्हारी देखभाल मजे से कर सकते थे. लेकिन तुम्हारी मम्मी को तसल्ली नहीं हो रही थी. उन के अपने शब्दों में कहूं तो ‘इतने छोटे बच्चे को छोड़ने को मन नहीं मानता. वह मुझे पहचानने लग गया है. मेरे जाने के बाद वह मुझे जरूर ढूंढ़ेगा. बोल तो सकता नहीं कि कुछ पूछ सके या बताए जाने पर समझ सके. उस के दिल पर न जाने इस का क्या असर पड़ेगा? हो सकता है इस से उस के दिल में कोई हीनभावना उत्पन्न हो जाए और मैं नहीं चाहती कि मेरा बेटा किसी हीनभावना के साथ बड़ा हो. मैं, डा. मनीषा, एक जानीमानी औयल टैक्नोलौजिस्ट की जगह एक स्वस्थ, होनहार बच्चे की मां कहलाना ज्यादा पसंद करूंगी.’’’

मनीषा और ज्यादा नहीं सुन सकी. उसे उस शाम की अपनी और राजन की बातचीत याद हो आई.

‘तुम्हारा बच्चा अभी तुम्हें ढूंढ़ने, कुछ सोचने और ग्रंथि बनाने की उम्र में नहीं है. पर जब वह कुछ सोचनेसमझने की उम्र में पहुंचेगा तब वह अपनी ही जिंदगी जीना चाहेगा और तुम्हारी खुशी के लिए अपनी किसी भी खुशी का गला नहीं घोंटेगा. यह समझ लो, मनीषा,’ राजन ने उसे समझाना चाहा था.

‘उस की नौबत ही नहीं आएगी, राजन. मेरी और मेरे बेटे की खुशियां अलगअलग नहीं होंगी. बेटे की खुशी ही मेरी खुशी होगी,’ उस ने बड़े दर्द से क था.

‘यानी तुम अपना अस्तित्व अपने बेटे के लिए ऐसे ही लुप्त कर दोगी. याद रखो, मनीषा, चंद सालों के बाद तुम पाओगी कि न तुम्हारे पास बेटा है और न अपना अस्तित्व, और फिर तुम अस्तित्वविहीन हो कर शून्य में भटकती फिरोगी, खुद को और अपने बेटे को कोसती जिस के लिए तुम ने स्वयं को नष्ट कर दिया.’

‘नहीं, मैं बेटे की ख्याति, सुख और समृद्धि के सागर में तैरूंगी. जब मेरा बेटा गर्व से यह कहेगा कि आज मैं जो कुछ भी हूं अपनी मम्मी की वजह से हूं तो उस समय मेरे गौरव की सीमा की कल्पना भी नहीं की जा सकती.’

‘यह सब तुम्हारी खुशफहमी है, मनीषा. जब तक तुम्हारा बेटा बड़ा होगा उस समय तक अपनी सफलता का श्रेय दूसरों को देने का चलन ही नहीं रहेगा. तुम्हारा बेटा कहेगा कि मैं जो कुछ भी हूं अपनी मेहनत और अपनी बुद्धि के बल पर हूं. यदि मांबाप ने बुद्धि के विकास के लिए कुछ सुविधाएं जुटा दी थीं तो यह उन की जिम्मेदारी थी. उन्होंने अपनी मरजी से हमें पैदा किया है, हमारे कहने से नहीं.’

‘चलिए, आप की यह बात भी मान ली. लेकिन दूर से चुप रह कर भी तो अपने बेटे की सुखसमृद्धि का आनंद उठाया जा सकता है.’

‘हां, अगर दूर और तटस्थ रह कर उस की खुशी में खुश रह सकती हो, तो बात अलग है. लेकिन अगर तुम चाहो कि तुम ने उस के लिए जो त्याग किया है उस के प्रतिदानस्वरूप वह भी तुम्हारे लिए कुछ त्याग कर के दे, तो नामुमकिन है. जहां तक मेरा खयाल है, वह अधिक समय तक तुम्हारे पास भी नहीं रहेगा. आजकल पढ़ाई काफी विस्तृत हो रही है.’

‘चलिए, बेटा रहे न रहे, बेटे के पापा तो मेरे पास ही रहेंगे न?’ मनीषा ने कहा था और सफाई से बात बदल दी थी. ‘वैसे मूर्खताओं में साथ देने के पक्ष में मैं नहीं हूं लेकिन तुम्हारा साथ तो देना ही पड़ेगा,’ राजन हंस कर बोले थे.

लेकिन, कहां दे पाए थे राजन साथ. जितेन अभी कालेज के प्रथम वर्ष में ही था कि एक दिन सड़क दुर्घटना में बुरी तरह घायल हो कर वे उस का साथ छोड़ गए थे.

‘‘मम्मी, कहां हो तुम?’’ जितेन के उत्तेजित स्वर से मनीषा चौंक पड़ी. कर दिया न उदयशंकर ने सर्वनाश. जितेन को बता दिया और अब वह कहने आ रहा है कि यूनेस्को की नौकरी से इनकार कर देगा. मनीषा ने मन ही मन फैसला किया कि वह उसे क्या कह कर और क्याक्या कसमें दे कर जाने को मजबूर करेगी.

‘‘हां, बेटे, क्या बात है?’’

‘‘उदय चाचा कह रहे थे कि तुम ने मेरे लिए जीवन में आया एक सुनहरा मौका खो दिया?’’

‘‘हां, मगर वह मैं ने तुम्हारे लिए नहीं, अपनी ममता के लिए किया था. उस का तुम पर कोई एहसान नहीं है.’’

‘‘तुम एहसान की बात कर रही हो, मम्मी, और मैं समझता हूं कि इस से बड़ा मेरा कोई और उपकार नहीं कर सकती थीं,’’ जितेन तड़प कर बोला, ‘‘मैं आप को काफी समझदार औरत समझता था, लेकिन आप भी बस प्यार में ही बच्चे का भला समझने वाली औरत निकलीं. उस समय आप ने शायद यह नहीं सोचा कि आप की ज्यादा लियाकत का असर आप के बेटे के भविष्य पर क्या पड़ेगा?’’

जितेन की बात सुन कर मनीषा चुप रही, तो वह फिर बोला, ‘‘आज अगर आप के पास डौक्टरेट की डिगरी होती तो शायद पापा के गुजरने के बाद आप की पुरानी यूनिवर्सिटी आप को बुला लेती. हम लोग वहीं जा कर रहने लगते और मैं बजाय अफ्रीकीएशियाई देशों में जा कर, एक पश्चिमी औद्योगिक देश में काम करने का मौका पाता. यही नहीं, मेरी पढ़ाई पर इस का काफी असर पड़ता. निश्चित ही आप की आय तब ज्यादा होती. घर में ही एक प्रयोगशाला बनाने की जो मेरी तमन्ना थी, वह अगर हमारे पास ज्यादा पैसा होता तो पूरी हो जाती और उस का असर मेरे रिजल्ट पर भी पड़ता.’’ जितेन के स्वर में भर्त्सना थी.

‘‘हमेशा ही विश्वविद्यालय में फर्स्ट आता है. अरे छोड़ भी. उस से ज्यादा अच्छा रिजल्ट और क्या लाता?’’ मनीषा ने हंस कर बात टालनी चाही.

‘‘वही तो आप समझने की कोशिश नहीं करतीं. 85 प्रतिशत अंकों की जगह 95 प्रतिशत अंक पाना क्या बेहतर नहीं है? खैर, आप जो भी कहिए, आप ने वह फैलोशिप अस्वीकार कर के मेरा जो अहित किया है उस के लिए मैं आप को कभी माफ नहीं कर सकता,’’ कह कर जितेन तेजी से बाहर चला गया.

मनीषा जैसे टूट कर कुरसी पर गिर पड़ी. जितेन की कृतघ्नता या उदासीनता के लिए वह अपने को बरसों से तैयार करती आ रही थी, पर उस के इस आरोप के धक्के को सह सकना जरा मुश्किल था. Family Story In Hindi.

Hindi Family Story: फर्ज- क्या उस्मान निभा पाया अपने बेटे होने का फर्ज?

Hindi Family Story: जयपुर के सिटी अस्पताल में उस्मान का इलाज चलते 15 दिनों से भी ज्यादा हो गए थे लेकिन उस की तबीयत में सुधार नहीं हो रहा था.

आईसीयू वार्ड के सामने परेशान सरफराज लगातार इधर से उधर चक्कर लगा रहे थे. बेचैनी में कभी डाक्टरों से अपने बेटे की जिंदगी की भीख मांगते तो कभी फर्श पर बैठ कर फूटफूट कर रोने लग जाते.

उधर, अस्पताल के एक कोने में खड़ी उस्मान की मां फरजाना भी बेटे की सलामती के लिए नर्सों की खुशामद कर रही थी. तभी आईसीयू वार्ड से डाक्टर बाहर निकले तो सरफराज उन के पीछेपीछे दौड़े और उन के पैर पकड़ कर गिड़गिड़ाते हुए कहने लगे, ‘‘डाक्टर साहब, मेरे उस्मान को बचा लो. कुछ भी करो. उस के इलाज में कमी नहीं होनी चाहिए.’’

डाक्टर ने उन्हें उठा कर तसल्ली देते हुए कहा, ‘‘देखिए अंकल, हम आप के बेटे को बचाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं. उस की हालत अभी भी गंभीर बनी हुई है. औपरेशन और दवाओं को मिला कर कुल 5 लाख रुपए का खर्चा आएगा.’’

 

‘‘कैसे भी हो, आप मेरे बेटे को बचा लो, डाक्टर साहब. मैं 1-2 दिनों में पैसों का इंतजाम करता हूं,’’ सरफराज ने हाथ जोड़ कर कहा.

काफी भागदौड़ के बाद भी जब सरफराज से सिर्फ 2 लाख रुपयों का ही इंतजाम हो सका तो निराश हो कर उस ने बेटी नजमा को मदद के लिए दिल्ली फोन मिलाया. उधर से फोन पर दामाद अनवर की आवाज आई.

‘‘हैलो अब्बू, क्या हुआ, कैसे फोन किया?’’

‘‘बेटा अनवर, उस्मान की हालत ज्यादा ही खराब है. उस के औपरेशन और इलाज के लिए 5 लाख रुपयों की जरूरत थी. हम से 2 लाख रुपयों का ही इंतजाम हो सका. बेटा…’’ और सरफराज का गला भर आया.

इस के पहले कि उन की बात पूरी होती, उधर से अनवर ने कहा, ‘‘अब्बू, आप बिलकुल फिक्र न करें. मैं तो आ नहीं पाऊंगा, लेकिन नजमा कल सुबह पैसे ले कर आप के पास पहुंच जाएगी.’’

दूसरे दिन नजमा पैसे ले कर जयपुर पहुंच गई. आखिरकार सफल औपरेशन के बाद डाक्टरों ने उस्मान को बचा लिया.

धीरेधीरे 10 साल गुजर गए. इस बीच सरफराज ने गांव की कुछ जमीन बेच कर उस्मान को इंजीनियरिंग की पढ़ाई करवाई और मुंबई एअरपोर्ट पर उस की नौकरी लग गई. उस ने अपने साथ काम करने वाली लड़की रेणु से शादी भी कर ली और ससुराल में ही रहने लगा.

इस के बाद उस्मान का मांबाप से मिलने आना बंद हो गया. कई बार वे बीमार हुए. उसे खबर भी दी, फिर भी वह नहीं आया. ईद, बकरीद तक पर भी वह फोन पर भी मुबारकबाद नहीं देता.

एक दिन सुबह टैलीफोन की घंटी बजी. सरफराज ने फोन उठाया उधर से उस्मान बोल रहा था, ‘‘हैलो अब्बा, कैसे हैं आप सब लोग? अब्बा, मुझे एक परेशानी आ गई है. मुझे 10 लाख रुपयों की सख्त जरूरत है. मैं 1-2 दिनों में पैसे लेने आ जाता हूं.’’

‘‘बेटा, तेरे औपरेशन के वक्त नजमा से उधार लिए 3 लाख रुपए चुकाने ही मुश्किल हो रहा है. ऐसे में मुझ से 10 लाख रुपयों का इंतजाम नहीं हो सकेगा. मैं मजबूर हूं बेटा,’’ सरफराज ने कहा.

इस के आगे सरफराज कुछ बोलते, उस्मान गुस्से से भड़क उठा, ‘‘अब्बा, मुझे आप से यही उम्मीद थी. मुझे पता था कि आप यही कहोगे. आप ने जिंदगी में मेरे लिए किया ही क्या है?’’ और उस ने फोन काट दिया.

अपने बेटे की ऐसी बातें सुन कर सरफराज को गहरा सदमा लगा. वे गुमसुम रहने लगे. घर में पड़े बड़बड़ाते रहते.

एक दिन अचानक शाम को सीने में दर्द के बाद वे लड़खड़ा कर गिर पड़े तो बीवी फरजाना ने उन्हें पलंग पर लिटा दिया. कुछ देर बाद आए डाक्टर ने जांच की और कहा, ‘‘चाचाजी की तबीयत ज्यादा खराब है, उन्हें बड़े अस्पताल ले जाना पड़ेगा.’’

डाक्टर साहब की बात सुन कर घबराई फरजाना ने बेटे उस्मान को फोन कर बीमार बाप से मिलने आने की अपील करते हुए आखिरी वक्त होने की दुहाई भी दी.

जवाब में उधर से फोन पर उस्मान ने अम्मी से काफी भलाबुरा कहा. गुस्से में भरे उस्मान ने यह तक कह दिया, ‘‘आप लोगों से अब मेरा कोई रिश्ता नहीं है. आइंदा मुझे फोन भी मत करना.’’

यह सुन कर फरजाना पसीने से लथपथ हो गई. वो चकरा कर जमीन पर बैठ गई. कुछ देर बाद अपनेआप को संभाल कर उस ने नजमा को दिल्ली फोन किया, ‘‘हैलो नजमा, बेटी, तेरे अब्बा की तबीयत बहुत खराब है. तू अनवर से इजाजत ले कर कुछ दिनों के लिए यहां आ जा. तेरे अब्बा तुझे बारबार याद कर रहे हैं.’’

नजमा ने उधर से फौरन जवाब दिया, ‘‘अम्मी आप बिलकुल मत घबराना. मैं आज ही शाम तक अनवर के साथ आप के पास पहुंच जाऊंगी.’’

शाम होतेहोते नजमा और अनवर जब  घर पर पहुंचे तो खानदान के लोग सरफराज के पलंग के आसपास बैठे थे. नजमा भाग कर अब्बा से लिपट गई. दोनों बापबेटी बड़ी देर तक रोते रहे.

‘‘देखो अब्बा, मैं आ गई हूं. आप अब मेरे साथ दिल्ली चलोगे. वहां हम आप को बढि़या इलाज करवाएंगे. आप बहुत जल्दी ठीक हो जाओगे,’’ नजमा ने रोतेरोते कहा.

आंखें खोलने की कोशिश करते सरफराज बड़ी देर तक नजमा के सिर पर हाथ फेरते रहे. आंखों से टपकते आंसुओं को पोंछ कर बुझी आवाज में उन्होंने कहा, ‘‘नजमा बेटी, अब मैं कहीं नहीं जाऊंगा. अब तू जो आ गई है. मुझे सुकून से मौत आ जाएगी.’’

‘‘ऐसा मत बोलो, अब्बा. आप को कुछ नहीं होगा,’’ यह कह कर नजमा ने अब्बा का सिर अपनी गोद में रख लिया. अम्मी को बुला कर उस ने कह दिया, ‘‘अम्मी आप ने खूब खिदमत कर ली. अब मुझे अपना फर्ज अदा करने दो.’’

उस के बाद तो नजमा ने अब्बा सरफराज की खिदमत में दिनरात एक कर दिए. टाइम पर दवा, चाय, नाश्ता, खाना, नहलाना और घंटों तक पैर दबाते रहना, सारी रात पलंग पर बैठ कर जागना उस का रोजाना का काम हो गया.

कई बार सरफराज ने नजमा से ये सब करने से मना भी किया पर नजमा यही कहती, ‘‘अब्बा, आप ने हमारे लिए क्या नहीं किया. आप भी हमें अपने हाथों से खिलाते, नहलाते, स्कूल ले जाते, कंधों पर बैठा कर घुमाते थे. सबकुछ तो किया. अब मेरा फर्ज अदा करने का वक्त है. मुझे मत रोको, अब्बा.’’

बेटी की बात सुन कर सरफराज चुप हो गए. इधर, सरफराज की हालत दिन पर दिन गिरती चली गई. उन का खानापीना तक बंद हो गया.

एक दिन दोपहर के वक्त नजमा अब्बा का सिर गोद में ले कर चम्मच से पानी पिला रही थी. तभी घर के बाहर कार के रुकने की आवाज सुनाई दी.

कुछ देर बाद उस्मान एक वकील को साथ ले कर अंदर आया. उस के हाथ में टाइप किए हुए कुछ कागजात थे. अचानक बरसों बाद बिना इत्तला दिए उस को घर आया देख कर सभी खुश हो रहे थे.

दरवाजे से घुसते ही वह लपक कर सरफराज के नजदीक जा कर आवाज देने लगा, ‘‘अब्बा, उठो, आंखे खोलो, इन कागजात पर दस्तखत करना है. उठो, उठो,’’ यह कह कर उस ने हाथ पकड़ कर उन्हें पैन देना चाहा.

नजमा ने रोक कर पूछा, ‘‘भाईजान, ये कैसे कागजात हैं?’’

लेकिन वह किसी की बिना सुने अब्बा को आवाजें देता रहा.

सरफराज ने आंखें खोलीं. उस्मान की तरफ एक नजर देखा. और अचानक उन के हाथ में दिए कागजात और पैन नीचे गिर पड़े. उन का हाथ बेदम हो कर लटक गया. यह देख नजमा चिल्लाई, ‘‘अब्बा, अब्बा, हमें अकेला छोड़ कर मत जाओ.’’ और घर में कुहराम मच गया. नजमा बोली, ‘‘भाईजान जो मकान आप अपने नाम कराना चाहते थे वह तो 10 साल पहले अब्बू ने आप के नाम कर दिया था. आप अब फिक्र न करो.’’

ये सब देख कर उस्मान ने फुरती से अब्बा के बिना दस्तखत रह गए कागजात उठाए और वकील के साथ बिना पीछे देखे बाहर निकल गया.

फरजाना, नजमा और अनवर भाग कर पीछेपीछे आए लेकिन तब तक कार रवाना हो गई.

तीनों दरवाजे में खड़े कार की पीछे उड़ी धूल के गुबार में चकाचौंधभरी शहरी मतलब परस्त दुनिया की आंधी में फर्ज और रिश्तों की मजबूत दीवार को भरभरा कर गिरते हुए देखते रह गए. Hindi Family Story.

Hindi Story: पाई को सलाम- मुश्किलों में इस तरह होती है सच्चे दोस्त की पहचान

Hindi Story: सऊदी अरब के एक अस्पताल में काम करते हुए मुझे अलगअलग देशों के लोगों के साथ काम करने का मौका मिला. मेरे महकमे में कुल 27 मुलाजिम थे, जिन में 13 सऊदी, 5 भारतीय, 6 फिलीपीनी और 3 पाकिस्तानी थे.

यों तो सभी आपस में अंगरेजी में ही बातें किया करते थे, लेकिन हम भारतीयों की इन तीनों पाकिस्तानियों से खूब जमती थी. एक तो भाषा भी तकरीबन एकजैसी थी और हम लोगों का खानापीना भी एकजैसा ही था.

हमारे महकमे का सब से नापसंद मुलाजिम एक पाकिस्तानी कामरान था, जिसे सभी ‘पाई’ के नाम से बुलाते थे.

क्या सऊदी, क्या फिलीपीनी, यहां तक कि बाकी दोनों पाकिस्तानी भी उस को पसंद नहीं करते थे.

वैसे तो ‘पाई’ हमारे साथ ही रहता और खातापीता था, लेकिन कोई भी उस की हरकतें पसंद नहीं करता था. काम में तो वह अच्छा था, लेकिन जानबूझ कर सब से आसान काम चुनता और मुश्किल काम को कम ही हाथ लगता.

अब मैडिकल ट्रांसक्रिप्शन है ही ऐसा काम, जिस में मुश्किल फाइल करना कोई भी पसंद नहीं करता, लेकिन चूंकि काम तो खत्म करना ही होता है, तो सभी लोग मिलबांट कर मुश्किल काम कर लेते. लेकिन मजाल है, जो ‘पाई’ किसी मुश्किल फाइल को हाथ में ले ले.

‘पाई’ कुरसी पर बैठ कर आसान फाइल का इंतजार करता रहता और जैसे ही कोई आसान फाइल आती, झट से उस को अपने नाम कर लेता. उस की इसी हरकत की वजह से सभी उस से चिढ़ने लगे थे.

भारतीय पवन हो या फिलीपीनी गुलिवर या फिर सऊदी लड़की सैनब, सभी उस की इस बात पर उस से नाराज रहते. इस के अलावा ‘पाई’ एक नंबर का कंजूस था. कभीकभार सभी लोग मिल कर किसी साथी मुलाजिम को कोई पार्टी देते, तो ‘पाई’ एक पैसा भी न देता.

वह बोलता, ‘‘मैं यहां क्या इन लोगों के लिए कमाने आया हूं?’’

पार्टी के लिए एक पैसा भले ही न देता हो, पार्टी में खानेपीने में सब से आगे रहता. ‘पाई’ खुद भी जानता था कि कोई उस को पसंद नहीं करता, लेकिन इस से उस को कोई फर्क नहीं पड़ता था.

शुक्रवार को सऊदी अरब में छुट्टी रहती है. मैं भी उस दिन अपने घर में ही था कि पवन का फोन आया.

फोन पर उस के रोने की आवाज सुन कर मैं परेशान हो गया. उस की सिसकियां कुछ कम हुईं, तो उस ने बताया कि उस का 10 साल का बेटा घर से गायब है. पता नहीं, किसी ने उस को किडनैप कर लिया है या वह खुद ही कहीं चला गया है, किसी को भी नहीं पता था.

मैं तुरंत पवन के कमरे में पहुंचा. जल्दी ही सरफराज, गुलिवर और नावेद भी वहां पहुंच गए. सभी पवन को तसल्ली दे रहे थे.

तभी पवन के घर से फोन आया. किसी ने उस के घर खबर दी कि उस का बेटा कोचीन जाने वाली बस में देखा गया है. सभी की राय थी कि पवन को तुरंत भारत जाना चाहिए.

मैनेजर सुसान से बात की गई. उन्होंने तुरंत पवन के जाने के लिए वीजा का इंतजाम किया. सरफराज अपनी गाड़ी में पवन और मुझे ले कर हैड औफिस गए और वीजा ले आए.

अब बड़ा सवाल था भारत जाने के लिए टिकट का इंतजाम करना. महीने का आखिरी हफ्ता चल रहा था और हम सभी अपनीअपनी तनख्वाह अपनेअपने देश को भेज चुके थे. सभी के पास थोड़ेबहुत पैसे बचे हुए थे, जो कि टिकट की आधी रकम भी नहीं होती.

मैं और सरफराज अपनेअपने जानने वालों को फोन कर रहे थे कि तभी वहां ‘पाई’ आ गया. हम में से किसी ने भी उस को पवन के बारे में नहीं बताया था. एक तो शायद इसलिए कि ‘पाई’ और पवन की कुछ खास बनती नहीं थी, दूसरे, इसलिए भी कि उस से हमें किसी मदद की उम्मीद भी नहीं थी.

‘पाई’ पवन से उस के बेटे के बारे में पूछताछ कर रहा था. बातोंबातों में उस को पता चला कि भारत जाने के लिए टिकट के पैसे कम पड़ रहे हैं. हम लोग अपनेअपने फोन पर मसरूफ थे और पता ही नहीं चला कि कब ‘पाई’ उठ कर वहां से चला गया.

‘‘उस को लगा होगा कि उस से कोई पैसे न मांग ले,’’ फिलीपीनी गुलिवर ने अपने विचार रखे.

तकरीबन 10 मिनट बाद ‘पाई’ आया और पवन के हाथ में 5 हजार रियाल रख दिए और कहने लगा, ‘‘जाओ, जल्दी से टिकट ले लो, ताकि आज की ही फ्लाइट मिल जाए. अगर और पैसों की जरूरत हो, तो बेझिझक बता देना. मैं अपने पैसे इकट्ठा 2-3 महीने में ही भेजता हूं, इसलिए अभी मेरे पास और भी पैसे हैं.’’

यह सुन कर पवन भावुक हो गया और ‘पाई’ को गले लगा लिया, ‘‘शुक्रिया ‘पाई’, मुसीबत के समय में मेरी मदद कर के तुम ने मुझे जिंदगीभर का कर्जदार बना लिया है.’’

‘‘कर्ज कैसा, हम सब एक परिवार ही तो हैं. मुसीबत के समय अगर हम एकदूसरे की मदद नहीं करेंगे, तो कौन करेगा?’’

‘पाई’ का यह रूप देख कर मेरे मन में उस के प्रति जितनी भी बुरी भावनाएं थीं, तुरंत दूर हो गईं.

किसी ने सच ही कहा है कि दोस्त की पहचान मुसीबत के समय में ही होती है. और मुसीबत की इस घड़ी में पवन की मदद कर के ‘पाई’ ने अपने सच्चे दोस्त होने का सुबूत दे दिया.

‘पाई’ के इस अच्छे काम से मेरा मन उस के लिए श्रद्धा से भर गया. Hindi Story

Hindi Religious Story: सनातन- अमृत या विष?

Hindi Religious Story: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के पुत्र व भूतपूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि के पौत्र उदयनिधि के सनातन कहे जाने वाले धर्म की आलोचना पर बिफरना शुरू कर दिया है. नरेंद्र मोदी ने विधानसभा चुनावों के दौरान एक नेता के व्यक्तिगत बयान, जो असल में सच है और जमीनी है, को विपक्षी दलों के एक मंच ‘इंडिया’ से जोड़ कर धर्म की राजनीति फिर शुरू कर दी.

सनातन धर्म क्या और कैसा है, इस के लिए भेदभाव ढूंढ़ने की जरूरत ज्यादा नहीं. इस की खबरें तो वैसे ही आसमान से टपकती रहती हैं जैसे कबूतरों की बीटें.

ओडिशा के हिंदुओं के प्रिय पुरी के जगन्नाथ मंदिर में तीनों भगवानों की मूर्तियों को 15 सितंबर, 2023 को दिनभर भूखा रहना पड़ा क्योंकि जो भोग सुबह 8.30 बजे लगता था, शाम को 5.30 बजे लगा. कारण था पुजारियों की हड़ताल.

सर्वशक्तिमान लौर्ड जगन्नाथ के सर्व शक्तिमान पुजारियों की शिकायत थी कि एक दिन पहले एक पुजारी जिस ने 2017 में इंटरकास्ट शादी की थी, मंदिर में जबरन घुस कर पूजा कर आया था. इस पर नाराज पुरोहितों ने हड़ताल कर दी और सर्वशक्तिमान लौर्ड जगन्नाथ को भोग तक नहीं लगाया.

जब मंदिर के चीफ एडमिनिस्ट्रेटर रंजन दास ने मंदिर की शुद्धि का वादा किया और अपने ही धर्म, अपनी ही जाति के एक पुजारी के प्रवेश से दूषित हो गए लौर्ड जगन्नाथ में फिर से पूजा करने का वादा किया, तो मामला सुलझ. हां, इस दौरान जगन्नाथ मंदिर में रखीं हुंडियों में पैसे पड़ते रहे क्योंकि भक्तों को नहीं रोका गया, मामला पैसे का जो था.

क्या यही सनातन धर्म है जिस का पक्ष प्रधानमंत्री रख रहे हैं जो एक पुजारी को अछूत मान लेता है जिस ने अंतर्जातीय विवाह कर लिया? क्या इसे ही बराबरी कहते हैं? क्या उस धर्म की रक्षा हो सकती है जो नीची जाति की औरत के एक पुजारी से विवाह को धर्म का एक बड़ा पाप समझता हो कि वह उक्त पुजारी को अब सर्वशक्तिमान लार्ड जगन्नाथ के लायक नहीं समझता.

इस पुजारी, जो सनातन धर्म और उस के ठेकेदारों का साथी था, को उसी के साथियों ने इसलिए रिजैक्ट कर दिया कि उस ने एक दूसरी जाति की लड़की से विवाह कर लिया. क्या यही सनातन धर्म है जो हमें आज 21वीं सदी में विरासत में मिला है और जिस के सहारे मई 2024 में या जल्दी नरेंद्र मोदी अमृतमंथन से अमृत निकालना चाह रहे हैं?

वैसे, अगर बात अमृतमंथन की करें तो क्या सनातन धर्म यह सिखाता है कि पहले दस्युओं के साथ बराबर की साझेदारी करो और फिर मोहिनी अवतार बन कर अमृत झटक ले जाओ?

सनातन धर्म के प्रचारक क्या यह बताएंगे कि जो धर्म हमें आज मिला है उस में कहां क्या विशेषता है? वैसे ईसाई, बौद्ध धर्म, इसलाम व जोरैस्ट्रियन धर्मों के मानने वालों की आज सैकड़ों खराबियां निकाली जा सकती हैं, लेकिन उन से कई गुना ज्यादा सनातन धर्म में निकाली जा सकती हैं. इस में अंगरेजों और मुगलों को दोष देने का बहाना न बनाइए. इस के लिए सिर्फ ग्रंथ पढ़ लीजिए जिन से सनातन धर्म का पानी बहता है और यह देख लें कि वह अमृत है या विष? Hindi Religious Story

Social Media Reels: रील्स मार रही हैं गानों की मधुरता, फैल रहा है नंगापन

Social Media Reels: सोशल मीडिया पर रील्स तेजी से पौपुलर हो रही हैं. यह बिजनैस का भी टूल्स बन गया है. इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब पर रील्स सब से अधिक ट्रैंड हो रही हैं. कई बड़े सोशल ब्रांड इस प्लेटफौर्म पर डैवलप हुए हैं. रील्स से लोग की कमाई हो रही है. क्रिकेट सुपरस्टार विराट कोहली एक इंस्टाग्राम पोस्ट से लगभग 9 करोड़ रुपए कमाते हैं. दुनियाभर में इंस्टाग्राम के एक्टिव यूजर्स की संख्या 2 अरब है. भारत में ये 32 करोड़ रुपए के आसपास है. सोशल मीडिया की बढ़ती पहुंच के चलते रील्स लोकप्रिय हो रही हैं.

सोशल मीडिया पर तमाम इंफ्लुएंसर्स हैं जिन का काम लोगों का प्रचार कर के पैसा कमाना होता है. इस वजह से रील्स के जरिए इंफ्लुएंसर्स पहले अपने फौलोअर्स बढ़ाते हैं, इस के बाद पैसा कमाते हैं. इंफ्लुएंसर्स रील्स के अलावा फोटो, वीडियो और स्टारी पोस्ट कर के प्रचार का काम करते हैं. स्टोरीज 24 घंटे तक ही लाइव रहती है. रील्स के लिए नौर्मल म्यूजिक के अलावा ट्रेंडिंग म्यूजिक का सहारा भी लिया जाता है. यह आजकल सब से अधिक पौपुलर है.

सोशल मीडिया पर रील्स बना कर फेमस हो रहे लोगों के लिए कमाई का जरिया खुल जाता है. यही वजह है कि छोटेछोटे गांवकस्बे के लड़केलड़कियां रील्स बनाते रहते हैं.

रील्स के जरिए रातोंरात फेमस हो कर इंफ्लुएंसर्स की कैटेगरी मिल जाती है. इस के बाद प्रचार करने के बदले पैसा मिलता है. सैक्स, बोल्ड विषय, गालियां, देहाती कहावतें, स्ट्रीट फूड और मोटिवेशनल स्पीच भी रील्स में खूब पसंद की जाती हैं. रातोंरात फेमस होने की चाह में संगीत की आत्मा मर रही है.

म्यूजिक के साथ है रील्स का गहरा रिश्ता

20 सैकंड से ले कर 50 सैकंड में ही रील्स का सफर खत्म हो जाता है. इस से मुखड़े भले ही फेमस हो जाएं लेकिन गीत और संगीत की आत्मा खत्म हो जाती है. इस की वजह यह है कि गानों का मजा उस के पूरी सुनने में होता है. गाने लिखने वाला पहले गाना लिखता है इस के बाद संगीतकार उस को धुन देता है तब गायक गाता है. इस के बाद उस का फिल्माकंन होता है. यह काम पूरे इत्मीनान और तैयारी से होता है. गाने पर डांस करने वाले को भी कोरियोग्राफर स्टेप्स सिखाता है. तब उस डांस की शूटिंग होती है. इस के बाद दर्शकों तक पहुंचता है. तो गाने और डांस दोनों को देख कर मजा आता है.

रील्स में यही काम अचानक होता है. 5 से 7 मिनट तक के गाने को 20 से 50 सैकंड में समेट दिया जाता है. इतने कम समय में गाने की पहली लाइन ही आ पाती है. म्यूजिक भी केवल एकदो लाइन का ही हो पाता है. रील्स में न पूरा गाना सुनाई देता है और न ही म्यूजिक समझ आता है. इस से गीत, संगीत और एक्टिंग तीनों की आत्मा मर रही है.

मोबाइल में सिमट गई पूरी दुनिया में अचानक सब कुछ रिकौर्ड हो जाता है. सोशल मीडिया पर गाने और म्यूजिक दोनों मिल जाते हैं. आधेअधूरे डांस कर के तैयार रील्स को सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया जाता है. देखने वाले भी इस आधेअधूरे मैटेरियल को खुश हो कर देखते हैं, जिस के बाद म्यूजिक ट्रेंडिंग में जाता है.

नए गायक ले रहे रील्स का सहारा

रील्स में वैसे तो हर तरह के गाने आ रहे हैं. सब से ज्यादा सुने जाने वाले गानों में पंजाबी और भोजपुरी गाने हैं. लोकगीतों को ज्यादा पसंद किया जा रहा है. यह लोगों की समझ में आ जाते हैं और थिरकने के लिए मजबूर कर देते हैं. नए गायक कलाकार अपने गानों के प्रचार के लिए रील्स का सहारा लेते हैं. रील्स के ट्रेंडिंग यानी वायरल होने पर गाने भी सुने जाने लगते हैं. इन की रीच मिलियंस में होती है. इस के बाद यह गाने गायक की कमाई का जरिया बन जाते हैं.

रील्स के साथ सब से बड़ी बात यह होती है कि देखने वाले को अगर लत लग गई तो वह जब देखना शुरु करता है तो उसे छोड़ना मुश्किल हो जाता है. एक के बाद दूसरी रील स्क्रोल कर के आगे बढ़ाई जाने लगती है. जिस तरह के गाने वाली रील्स को ठहर कर देखते हैं सोशल मीडिया आप की पसंद समझ कर उसी तरह की रील्स दिखाने लगती है. दर्शकों को पसंद आने वाली खूबियों के बीच रील्स गीत, संगीत और एक्टिंग की आत्मा को मारने का काम कर रही है. वायरल होने वाली खूबियों के बीच इस के नुकसान अभी समझ नहीं आ रहे हैं. Social Media Reels

Hindi Story: आस्तीन का सांप

Hindi Story: रात के 2 बज रहे थे. घर के सभी लोग गहरी नींद में थे. रीमा चुपचाप उठी और बगल वाले कमरे में चली गई. उस कमरे में उस का देवर सूरज सो रहा था. रीमा सूरज के बगल में आ कर लेट गई और उस के बालों में उंगलियां फिराने लगी. उस के लगातार ऐसा करते रहने से सूरज जाग गया और बगल में अपनी भाभी को लेटा देख धीरेधीरे मुसकराने लगा. एकदूसरे को सहलाते और चूमते रहने के बाद देवरभाभी ने जब तक ताकत रही जम कर एकदूसरे के साथ खेले. दोनों को एकदूसरे के साथ लेटे हुए सुबह के 5 बज चुके थे. रीमा जब अपने कमरे में जाने लगी, तो सूरज ने उसे पकड़ कर फिर से घसीट लिया. ‘‘जाने दो न, तुम्हारे भैया जाग गए होंगे,’’ रीमा ने इठलाते हुए कहा. ‘‘अरे भाभी, जाग गए होंगे तो जागने दो न उन्हें. मैं ने तुम्हें पाने के लिए कितनाकुछ किया है. वैसे भी उन को यह सब हमारा प्लान समझ में नहीं आएगा. इतने स्मार्ट नहीं हैं वे,’’ सूरज ने अंगड़ाई लेते हुए कहा.

सूरज की इस बात पर दोनों ही खिलखिला कर हंसने लगे और रीमा अपनी साड़ी और पल्लू सही कर के अपने कमरे में चली गई, जहां उस का पति बिरज सो रहा था. उस ने एक नजर अपने पति की ओर डाली और उस के माथे को चूम लिया. बिरज ने आंखें खोलीं और कहने लगा, ‘‘रीमा, तुम मुझे कितना प्यार करती हो. रोज मेरे माथे पर चूम कर जगाती हो. मुझे यह बहुत अच्छा लगता है. मैं कितना खुशनसीब हूं, जो मुझे तुम्हारी जैसी पत्नी मिली,’’ यह कह कर बिरज ने रीमा को अपनी बांहों में भर लिया. बिरज और सूरज का कपड़ों का कारोबार था. बिरज बहुत ही सीधा और सज्जन था, जबकि सूरज एक आवारा और गलत संगत में पड़ कर इधरउधर पैसे बरबाद करने वाला लड़का बन गया था. सारा कारोबार बिरज ने ही संभाल रखा था, जबकि सूरज सिर्फ इधरउधर घूमता और दोस्तों पर पैसे लुटाता था. सूरज को एक लड़की से प्यार भी हो गया था, जिस से वह शादी करना चाहता था.

वह लड़की और कोई नहीं, बल्कि बाद में उस की भाभी बन चुकी रीमा ही थी, पर उस समय जब सूरज ने रीमा के घर वालों से अपनी शादी की बात कही तो रीमा के पिताजी ने साफ मना कर दिया था, ‘हम तुम्हारे जैसे आवारा लड़के से अपनी बेटी की शादी नहीं करेंगे.’ पर, सूरज और रीमा के लिए एकदूसरे के बिना रह पाना नामुमकिन था. जब दोनों को अपनी शादी हो पाना मुश्किल लगा, तो दोनों ने आपसी रजामंदी से एक योजना बनाई. हालांकि बिरज और सूरज दोनों सगे भाई थे, पर उन में काफी खुलापन था. लड़कियों को ले कर भी आपस में काफी हंसीमजाक भी चल जाता था. इसी बात का फायदा सूरज ने उठा लिया और अपने मोबाइल फोन में रीमा का फोटो दिखाया. फोटो देखते ही बिरज को रीमा बहुत पसंद आ गई. ‘‘अरे सूरज, यह लड़की तो बहुत खूबसूरत है,’’ बिरज ने उतावला होते हुए कहा. ‘‘हां भैया, खूबसूरत तो है. पसंद हो, तो बात चलाऊं?’’ सूरज ने पांसा फेंका. ‘‘अरे, नहींनहीं. ये सब अच्छी बातें नहीं हैं,’’ बिरज थोड़ा शरमा सा गया. ‘‘अरे भैया, शरमा क्यों रहे हो? यह इस का ह्वाट्सएप नंबर है और चैटिंग शुरू कर दो,’’ सूरज ने एक और दांव फेंका. बिरज सीधासादा लड़का था.

जमाने की हवा उसे लगी नहीं थी, इसलिए उसे सूरज की चाल समझ में नहीं आई. उस ने धीरेधीरे रीमा से फोन पर बातें शुरू कर दीं. रीमा ने भी बिरज को अपने प्रेम में गिरफ्तार कर लिया और जब ऐसा लगने लगा कि वह रीमा के बिना नहीं रह पाएगा, तब उस ने खुद ही अपनी मां से अपने मन की बात कह दी. बिरज के पिता की मौत 4 साल पहले ही हो चुकी थी. बड़े दिनों के बाद बिरज की मां ने उस की आंखों में कोई चमक देखी थी, इसलिए वे बिरज को मना न कर पाईं और शादी के लिए न सिर्फ हां कर दी, बल्कि खुद ही रिश्ता ले कर रीमा के घर पहुंच गईं. रीमा के घर वालों को भी कोई दिक्कत नहीं हुई और जब उन्होंने रीमा का मन टटोला तो उस की भी रजामंदी देख रीमा के घर वालों ने रीमा और बिरज की शादी करा दी. सुहागरात के दिन जब बिरज अपने कमरे में पहुंचा और रीमा का चेहरा देख जब उस ने संबंध बनाना चाहा, तो रीमा ने मना कर दिया. ‘‘क्या आप ने सिर्फ शरीर के लिए मुझ से शादी की है?’’ रीमा ने बिरज से धीरे से पूछा. नई दुलहन से बिरज को ऐसे सवाल की उम्मीद नहीं थी, इसलिए वह एकदम सकपका सा गया. ‘‘नहीं, लेकिन दोस्त कहते हैं कि पहली रात में यह सब जरूरी होता है,’’ बिरज ने शरमाते हुए कहा. ‘‘देखिए, मुझे अभी पढ़ाई करनी है, इसलिए मैं इन सब कामों में नहीं पड़ना चाहती हूं. जब मेरा रिजल्ट आ जाएगा, तभी हमारे बीच में कोई संबंध बन सकेगा,’

’ रीमा ने समझाने वाले अंदाज में कहा. बिरज भोला था. वह रीमा की बातों में आ गया और यही समझता रहा कि रीमा पढ़ाई में बिजी है, इसलिए उस ने फिर संबंध बनाने के लिए जबरदस्ती नहीं की. लेकिन बिरज को क्या पता था कि उस का भाई सूरज ही उस के साथ दुश्मनी कर रहा है. बिरज तो अपने काम में बिजी रहता और रीमा और सूरज जवानी के मजे लूट रहे थे. अब उन लोगों को किसी की परवाह नहीं थी. वैसे भी सूरज और रीमा में भाभीदेवर का रिश्ता था, इसलिए मां को भी शक नहीं हुआ. रीमा कभीकभी डाक्टर को दिखाने को कहती तो बिरज यही कह देता कि आज दुकान पर बहुत काम है. तुम सूरज के साथ चली जाना. फिर क्या था, रीमा और सूरज घर से निकल जाते और किसी होटल में 3-4 घंटे मजे कर के लौट आते. किसी ने सोचा भी न था कि एक प्रेमी जोड़ा अपने प्रेम को कायम रखने के लिए किस कदर गंदे खेल को अंजाम दे सकता है. बिरज और रीमा की शादी को एक साल बीत चुका था,

पर उसे अभी तक रीमा के शरीर का सुख नहीं मिला था. जब बिरज से न रहा गया तो उस ने शरमाते हुए यह बात अपनी मां से बता दी. बिरज की मां को कुछ अजीब सा तो लगा, पर उन्होंने सोचा कि पढ़नेलिखने वाली लड़की है, अभी से बच्चों के चक्कर में नहीं पड़ना चाहती, यह सोच कर उन्होंने उलटे ही बिरज को समझा दिया. एक दिन की बात है. बिरज शाम को दुकान बंद कर के घर लौट रहा था. रीमा के लिए गजरा लेने के लिए वह एक दुकान की तरफ बढ़ा, तभी एक पान की गुमटी के पीछे से सूरज की आवाज आती हुई सुनाई दी, जो अपने दोस्तों के साथ मस्ती कर रहा था. बिरज वहीं रुक कर सूरज की बातें सुनने लगा. एक दोस्त सूरज से कह रहा था, ‘‘अरे भाई सूरज, दिमाग हो तो तेरे जैसा. कैसे अपनी गर्लफ्रैंड को तुम ने अपनी भाभी बना लिया और अब तो जब चाहे जितनी चाहे उतनी बार मौज ले सकता है.’’ ‘‘अरे यार, मैं यह सब नहीं करना चाहता था, पर रीमा का बाप मुझ जैसे आवारा लड़के से अपनी लड़की की शादी करना ही नहीं चाहता था, इसलिए मुझे उस की शादी अपने भैया से करवाने का यह नाटक करना पड़ा,’’ सूरज नशे में सब कहे जा रहा था. बिरज के कानों में मानो किसी ने पिघला सीसा भर दिया था. ‘‘लेकिन… दोस्तो, रीमा भी बड़ी चालाक निकली. उस ने आज तक भैया को अपना शरीर छूने तक नहीं दिया है, पर उसे क्या मालूम कि रीमा के सीने पर मैं कई बार अपनी कलाकारी दिखा चुका हूं और आगे भी दिखाता रहूंगा,’

’ इतना कह कर सूरज जोरजोर से हंसने लगा. अपने खिलाफ इतना बड़ा धोखा होने की उम्मीद बिरज को सपने में भी नहीं थी और जिस तरह से सूरज ने रीमा के लिए गलत बातें कह रखी थीं, उन से बिरज का खून उबाल मारने लगा था. ‘‘बेईमान, कमीने, धोखेबाज, भाई हो कर तू ने भाई को धोखा दिया,’’ चिल्लाते हुए बिरज ने सूरज को एक जोरदार तमाचा मार दिया. अपने दोस्तों के सामने हुई इस बेइज्जती को सूरज सहन नहीं कर पाया और उस ने भी बिरज पर हाथ छोड़ दिया. दोनों भाई आपस में ही लातघूंसे चलाने लगे. सूरज का खून गरम तो था ही, उस पर शराब ने और भी गरमी चढ़ा रखी थी और ये गरमी तब शांत हुई, जब उस ने शराब की टूटी बोतल अपने भाई बिरज के सीने में उतार दी. दर्द से छटपटाता बिरज खून से नहा उठा था और कुछ देर में वह शांत हो गया. उस की मौत हो चुकी थी. सामने भाई बिरज की लाश देख कर सूरज पहले तो घबराया, पर बाद में पुलिस की कार्यवाही और इस झमेले से बचने के लिए उस ने प्लान बनाया. सूरज और उस के दोस्तों ने पुलिस में यह बताया कि कोई लूटने के मकसद से बिरज का खून कर गया है और पर्स, मोबाइल फोन, घड़ी वगैरह भी उन लोगों ने ठिकाने लगा दिया. बिरज अपने हाथ में एक सोने की अंगूठी पहने रहता था, जिस पर सूरज का दिल आ गया,

इसलिए वह अंगूठी सूरज ने पुलिस को न दे कर अपने पास रख ली. पुलिस ने भी सूरज की बात को सच मान लिया और लूट का केस मान कर केस बंद कर दिया. बिरज की मां ने भी अपनी फूटी किस्मत समझ कर आंसू पोंछ लिए. बिरज के मरने के बाद मां एकदम अकेली हो गई थीं और वे रीमा के कमरे में ही सोने लगी थीं. मां के रीमा के साथ में सोने से सूरज और रीमा का बनाबनाया खेल चौपट सा दिखने लगा, क्योंकि अब उन दोनों को जिस्मानी जरूरतें पूरी करने की आजादी नहीं मिल पा रही थी, इसलिए सूरज ने मन ही मन एक दूसरा प्लान बनाया. ‘‘मां, बिरज भैया के जाने के बाद से आप बड़े अशांत रहने लगी हो, आप को शांति मिले, इसलिए चलो, मैं आप को और भाभी को हरिद्वार घुमा लाता हूं. ‘‘कुछ दिन आश्रम में रहेंगे तो मन भी हलका हो जाएगा,’’ सूरज ने मासूमियत भरे लहजे में अपनी मां से कहा. ‘‘अरे बेटा, मैं अब बूढ़ी हड्डियां ले कर कहां जाऊंगी. तुम और रीमा ही हो आओ, मैं यहीं रह कर घर की देखभाल करूंगी,’’ मां ने कहा. अंधे को क्या चाहिए दो आंखें. सूरज और रीमा जो चाहते थे, वही उन को मिल गया. फिर क्या था, दोनों ने खूब रुपयापैसा इकट्ठा किया और निकल पड़े शांति की तलाश में.

पहले तो शहर में जा कर उन्होंने होटल में कमरा लिया और जी भर कर अपने जिस्मों की प्यास बुझाई. इधर सूरज की मां घर में अकेली होने के चलते घर की साफसफाई में लग गईं. सफाई के दौरान उन्हें सूरज के कमरे की अलमारी में बिरज की वह अंगूठी मिली, जो सूरज उस को मारने के बाद ले आया था. अचानक से बिरज को लूट लिया जाना, जबकि बिरज कई सालों से उस रास्ते से आताजाता था और आज अचानक से बिरज की अंगूठी का सूरज की अलमारी में मिलना मां के दिल में शक सा पैदा कर गया. मां ने कमरे को और खंगाला तो पाया कि उस की बहू रीमा की चुन्नी भी सूरज के कपड़ों में मिली. मां समझ गई कि क्या मामला है. लेकिन, वे कर क्या सकती थीं. उन्होंने सूरज के दोस्तों को घर पर बुलाया और बातोंबातों में सारा भेद उगलवा लिया. अब उन के पास एक ही उपाय था, दोनों की शादी कर देना, ताकि देवरभाभी का खेल किसी को पता नहीं चले. मां को मालूम था कि अब रीमा के मातापिता भी कुछ न कहेंगे, क्योंकि वे विधवा बेटी का बोझ क्यों संभालेंगे. Hindi Story

Bihar Election 2025: लीडर फेस की जरूरत क्यों?

Bihar Election 2025: बात लोकसभा चुनाव की हो या फिर विधानसभा चुनाव की, हर बार यह रणनीति बनाई जाती है कि मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री का फेस कौन होगा? बिहार चुनाव के पहले राजग और महागठबंधन में इस बात की होड़ लगी थी कि कौन उन का सीएम फेस होगा? भारतीय जनता पार्टी की अगुआई वाले राजग में प्रमुख दल जदयू नेता नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री है. उन की अगुआई में ही बिहार विधानसभा का चुनाव लड़ा जाएगा. भाजपा के नेता, रणनीतिकार और देश के गृहमंत्री अमित शाह ने नीतीश कुमार के सीएम फेस पर कहा कि ‘सीएम फेस का चुनाव बाद में होगा?’

भाजपा और राजग के नेता बारबार यह सवाल उठा रहे थे कि महागठबंधन का सीएम फेस कौन होगा. इस के पीछे की वजह यह जानना नहीं था कि राजद नेता तेजस्वी यादव को कांग्रेस सीएम फेस के रूप में आगे करेगी या नहीं, उन की रणनीति यह थी कि सीएम फेस के बहाने महागठबंधन में झगड़े होने लगें और वह चुनाव न जीत सके. कांग्रेस ने तेजस्वी यादव को सीएम फेस घोषित कर के महागठबंधन को कमजोर होने से बचा लिया. सवाल उठता है कि आखिर सीएम फेस घोषित करने की जरूरत क्यों होती है?

देश में लोकतंत्र है, यहां जनता जिस को चुन कर भेजेगी वही मुख्यमंत्री बनेगा. फिर चुनाव से पहले ही सीएम-पीएम फेस के घोषित करने की जरूरत क्यों पडती है? राजतंत्र में यह होता है कि राजा अपना उत्तराधिकारी चुनता है. लोकतंत्र में धर्म के प्रभाव के चलते हर बार एक चमत्कारी नेता की तलाश होती है. धर्म हमें चमत्कार के बारे में बताता है. वह यह चाहता है कि हमारा चमत्कारों में यकीन बना रहे. रामायण और महाभारत में यही सिखाया गया कि भगवान अवतार लेंगे, वही जनता का भला करेंगे.

धर्म का प्रभाव ऐसा पड़ा कि संविधान से अलग राजनीति में चमत्कारी लीडर की जरूरत होती है. बिना चमत्कारी लीडर के राजनीतिक दल आगे बढ नहीं पाते. देश के आजाद होने के बाद कांग्रेस ने जवाहरलाल नेहरू को चमत्कारी नेता के रूप सामने किया. इस के बाद यह व्यवस्था आगे बढती रही. कांग्रेस ने जवाहरलाल नेहरू के बाद इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी चमत्कारी नेता के रूप में सामने पेश किए जिन के बिना कांग्रेस की कल्पना ही नहीं की जा सकती.

दूसरी तरफ भाजपा की कल्पना बिना आरएसएस के नहीं हो सकती. हर चुनाव में इस बात को पुख्ता किया जाता है कि जब तक चुनाव में भाजपा के पीछे आरएसएस यानी संघ की ताकत नहीं लगेगी, पार्टी चुनाव नहीं जीतेगी. भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेई 3 बार देश के प्रधानमंत्री बने. पहली बार 13 दिन, दूसरी बार 13 माह और फिर तीसरी बार 5 साल वे प्रधानमंत्री रहे. इस के बाद भी उन की गिनती चमत्कारी नेता के रूप में नहीं बन पाई.

2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने. उस के बाद भाजपा का सारा प्रयास उन को चमत्कारी नेता के रूप में प्रस्तुत करने का रहा. अब चाहे देश का चुनाव हो या प्रदेश का या फिर गांव और महल्ले का, बिना नरेंद्र मोदी के वह पूरा नहीं माना जा रहा. अब प्रदेश के चुनाव में भी वहां ऐसे ही चमत्कारी नेता की तलाश रहती है. यही वजह थी कि बिहार में महागठबंधन को तेजस्वी यादव को अपना सीएम फेस घोषित करना पडा. यह संविधान और समाज दोनों की अवधारणा के खिलाफ है. लोकतंत्र का मतलब होता है सामूहिक जिम्मेदारी, जिस में जनता के चुने प्रतिनिधि ही सरकार चलाने का काम करते हैं. मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री जैसे पद केवल व्ययवस्था चलाने के लिए हैं. वैसे, देखें तो यह केवल मंत्री जैसे ही हैं.

संविधान ने मुख्यमंत्री पद पर क्या कहा?

संविधान में मुख्यमंत्री के फेस को ले कर कोई बडी भूमिका नहीं दी गई है. जो प्रक्रिया प्रधानमंत्री चुने जाने की है वही मुख्यमंत्री की मान ली गई है. संविधान के अनुच्छेद 164 के अनुसार राज्यपाल राज्य विधानसभा में बहुमत दल के नेता को मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्त करते हैं. सब से पहले बहुमत प्राप्त करने वाले दल के विधायक अपना नेता चुनते हैं. यह नेता ही मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनता है. अगर किसी एक दल को बहुमत हासिल नहीं होता है तो राज्यपाल अपने विवेक का उपयोग कर के किसी ऐसे नेता को आमंत्रित कर सकते हैं जो सदन में अपना बहुमत साबित कर सके. राज्यपाल बहुमत की पुष्टि होने पर उस नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त करते हैं.
चमत्कारी लीडर की तलाश में कई बार राजनीतिक दल उन नेताओं को मुख्यमंत्री घोषित कर देते हैं जो विधानसभा या विधान परिषद दोनों सदनों के सदस्य नहीं रहते हैं. यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ राजनीतिक दलों की चाल जैसी है. संविधान कहता है कि विधायक या सांसद अपना नेता चुनेंगे. ऐसे में राजनीतिक दल उस को मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री कैसे बना सकते हैं जो उन सदनों का सदस्य ही न हो. मुख्यमंत्री के रूप में कई बार यह देखा गया है कि उस नेता को सीएम घोषित किया जाता है जो सदन का सदस्य ही नहीं होता है.

संविधान पर हावी पार्टीतंत्र!

आवश्यक यह होता है कि मुख्यमंत्री की कुरसी पर बैठने वाले को 6 महीने के भीतर राज्य विधानमंडल (विधानसभा या विधान परिषद) का सदस्य बनना आवश्यक होता है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को जब 2017 में उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया तो वे विधानसभा और विधान परिषद के सदस्य नहीं थे. यही नहीं, उन के साथ डिप्टी सीएम बने केशव प्रसाद मौर्य और डाक्टर दिनेश शर्मा भी विधानसभा और विधान परिषद के सदस्य नहीं थे. अब भाजपा को 2017 के विधानसभा चुनाव जीत कर आए विधायकों में से एक भी ऐसा नहीं मिला जिस को वह मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री बना सके.

योगी आदित्यनाथ गोरखपुर के सांसद थे. वे लगातार 5वीं बार गोरखपुर से लोकसभा चुनाव जीत रहे थे. विधानसभा चुनाव वे कभी नहीं लडे थे. केशव प्रसाद मौर्य फूलपुर लोकसभा सीट से सांसद थे. डाक्टर दिनेश शर्मा राज्यसभा के सदस्य थे. इन तीनों के लिए यह आवश्यक था कि वे 6 माह के भीतर विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य बनें. पार्टी ने अपने इन तीनों ही नेताओं को उन के सांसद पद से इस्तीफा दिलवा कर व विधान परिषद के सदस्य बना कर मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के पद पर बनाए रखा. पार्टियों ने इस नियम का रास्ता निकाल लिया कि मुख्यमंत्री बनने के लिए नेता को विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य होना चाहिए.

25 जुलाई, 1997 को जब बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले में शमिल होने के कारण मुख्यमंत्री की कुरसी छोडनी पडी तो सब से बडा सवाल उठा कि अब बिहार का मुख्यमंत्री कौन होगा? लालू प्रसाद यादव जानते थे कि यदि उन की जगह किसी और ने मुख्यमंत्री की कुरसी संभाली तो वापस सत्ता पाना मुश्किल हो जाएगा और उन की पार्टी बिखर जाएगी. लालू प्रसाद यादव के बच्चे उस समय इस काबिल नहीं थे कि उन को कुरसी सौंपी जा सके. ऐसे में लालू को भी एक चमत्कारी चेहरे की जरूरत थी जो न केवल मुख्यमंत्री की कुरसी बल्कि पार्टी और बिहार को भी संभाल सके.

तब लालू प्रसाद यादव ने अपनी पत्नी राबडी देवी का नाम आगे बढाया. राबडी देवी का राजनीति से कोई लेनादेना नहीं था. न ही वे बिहार में विधानसभा या विधान परिषद की सदस्य थीं. मुख्यमंत्री बनने के बाद राबडी देवी ने विधान परिषद् की सदस्यता ली. इस के बाद वे राघवपुर विधानसभा सीट से चुनाव लडी और विधायक बनीं. झारखंड में भी यही हुआ. 2024 में मनीलौंड्रिंग केस में जब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जेल गए तो अपने बेहद करीबी चंपाई सोरेन को झारखंड का मुख्यमंत्री बना दिया. 5 माह बाद जब हेमंत सोरेन जमानत पर बाहर आए तो चंपाई सोरेन ने मुख्यमंत्री की कुरसी छोड दी और हेमंत सोरेन झारखंड के मुख्यमंत्री बन गए.

संविधान से अलग राजनीतिक दलों ने मुख्यमंत्री बनाने के पीछे उस चेहरे को देखना शुरू किया जो चमत्कारी जीत दिला सके. कई बार जीत दिलाने वालों को भी पार्टीतंत्र मुख्यमंत्री नहीं बनाता. उत्तर प्रदेश में किसी कांग्रेसी नेता ने 5 साल तक मुख्यमंत्री की कुरसी नहीं सभाली. 1980 के दशक में कांग्रेस का मुख्यमंत्री 2 साल से अधिक पद पर रहने नहीं दिया गया. 5 साल मुख्यमंत्री रहने वालों में पहला नाम मायावती, दूसरा नाम अखिलेश यादव और तीसरा नाम योगी आदित्यनाथ का है. 5 साल मुख्यमंत्री रहने के बाद दूसरे कार्यकाल में बहुमत से सरकार बनाने वालों में योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री हैं.

इस से यह पता चलता है कि मुख्यमंत्री की कुरसी के लिए किसी फेस को रखने की जरूरत नहीं होती है. मुख्यमंत्री भी केवल मंत्री जैसा होता है. महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस कभी मुख्यमंत्री रहे तो कभी डिप्टी सीएम और फिर सीएम. यही एकनाथ शिंदे के साथ दोहराया गया. मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चैहान पार्टी को चुनाव जिता कर लाए लेकिन मुख्यमंत्री बन गए मोहन यादव. मुख्यमंत्री की कुरसी पार्टी की मुहताज है. संविधान का कोई दखल नहीं रह गया है.

बिहार का चुनाव नीतीश कुमार ने नाम पर लडा जा रहा लेकिन यह तय नहीं है कि वे मुख्यमंत्री होंगे भी. सपा-बसपा-राजद-टीएमसी जैसे दलों में यह तय है कि अगर वे सरकार बनाते हैं तो मुख्यमंत्री कौन होगा. जनता के मन में हमेशा यह चाहत रहती है कि कोई चमत्कारी नेता आए और वह चुनाव जिता सके. कई साल पहले दिल्ली की जनता ने अरविंद केजरीवाल में यह छवि देखी और उन को चुनाव जिता दिया.

असल में मुख्यमंत्री का काम मंत्रिमंडल की सलाह पर काम करना होता है. कई मुख्यमंत्री मंत्रिमंडल की सलाह की जगह अपने फैसले ही चलाते हैं. यह संगठनात्मक रूप से काम करने की शैली नहीं है. मुख्यमंत्री मंत्रिमंडल का मुखिया होता है जो राज्य सरकार का प्रमुख होता है. वह सरकार की नीतियों को लागू करने, कानूनों को बनाए रखने और राज्य के प्रशासन का मार्गदर्शन करने के लिए जिम्मेदार होता है. वह राज्यपाल और मंत्रिपरिषद के बीच एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करता है. वह राज्यपाल को विधानसभा का सत्र बुलाने या स्थगित करने की सलाह देता है. किसी भी समय राज्यपाल को विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर सकता है.

मुख्यमंत्री के फेस पर बहस पूरी तरह से बेमानी बात होती है. इस के फेस में चमत्कारी चेहरा देखने की जगह पर उस चेहरे को देखना चाहिए जो सब को साथ ले कर चल सके. केंद्र और प्रदेश के बीच काम कर सके. यह काम कोई भी अनुभवी और अच्छा नेता कर सकता है. ऐसे में चुनाव के पहले सीएम फेस की बहस केवल दूसरे पक्ष को नुकसान पहुंचाने, उन के अंदर फूट डालने के लिए होती है. इस का प्रदेश के विकास और शासन व्यवस्था से कोई बहुत मतलब नहीं होता है. जनता नेताओं से चमत्कार की उम्मीद करती है जिस में उस के हाथ निराशा ही आती है.

Story In Hindi: साग और मेथी वाला टोडा – बीबी की सांस फूल रही थी

Story In Hindi: ‘‘ले भोलू, साग खा ले मेथी वाले टोडे (मक्की की रोटी) के साथ, अपने हाथ से बना कर लाई हूं,’’  मुड़ेतुड़े पुराने अखबार के कागज में मक्की से बनी रोटियां और स्टील के डब्बे में सरसों का साग टेबल पर रखते हुए बीबी बोली. उस की c. चेहरे से वह कुछ परेशान और थकीथकी सी दिख रही थी.

‘‘पैरी पैणा,’’ बीबी के अचानक सामने आते ही वह कुरसी से आदर सहित खड़ा हो गया.

‘‘पैरी पैणा बीबीजी,’’ उस के पास बैठे उस के मित्र ने बीबी को न जानते हुए भी बड़े सत्कार से कहा.

‘‘जीते रहो मेरे बच्चो,’’ बीबी ने भोलू के सिर पर हाथ फेरा, फिर मातृत्व वाले अंदाज में उस का माथा चूम लिया और प्यार से उसे अपने सीने से लगा लिया. फिर उस के समीप बैठे उस के मित्र के सिर पर हाथ फेरा. इतने में औफिस का चपरासी बीबी के लिए कुरसी ले आया. बीबी कुरसी के उग्र भाग पर ऐसे बैठी जैसे अभी उठने वाली हो.

‘‘बीबी, आराम से बैठ जाओ,’’ भोलू ने आग्रहपूर्वक कहा. औफिस का वातावरण एकदम ममताभरी आभा से सराबोर हो उठा. हर चीज जैसे आशीर्वाद के आभामंडल से जगमगा उठी.

‘‘बीबी, और सुनाओ, क्या हालचाल है आप का?’’

‘‘बस, ठीक है पुत्र, तुम सुनाओ अपना, मेरी बहूरानी और बच्चों का क्या हाल है?’’

‘‘बीबी, सब ठीक हैं, बच्चे और तुम्हारी बहूरानी भी.’’

‘‘बड़ा काका अब क्या करता है, बेटा?’’

‘‘बीबी, इंजीनियरिंग कर रहा है.’’

‘‘अच्छा है, और छोटा?’’ बीबी ने बड़ी आत्मीयता से पूछा.

‘‘बीबी, वह अभी 12वीं कर रहा है.’’

‘‘भोलू, तुम्हें मां की तो बहुत याद आती होगी?’’ बीबी ने चेहरे पर संवेदना लाते हुए पूछा.

‘‘हां, बीबी, बहुत याद आती है मां की, मेरी मां बहुत अच्छी थी. उस के जैसा कोई नहीं है, बीबी. मेरा छोटा बेटा भी मां को बहुत याद करता है. बहुत स्नेह था उस का दादी से. अब भी वह अकसर दादी को याद कर के आंख भर लेता है,’’ भोलू ने भावुकता से कहा.

‘‘बहुत अच्छी थी तुम्हारी मां, भोलू. बहुत प्यारसत्कार था उस के पास. बंदे को पहचानने वाली औरत थी. बहुत दूर की नजर रखती थी,’’ बीबी ने अंतहीन दृष्टि से औफिस की दीवार पर लगी घड़ी को ताकते हुए कहा.

‘‘हां बीबी, यह तो आप ने ठीक कहा. जो उस से एक बार मिलता, वह उसे कभी भी न भूल पाता,’’ भोलू लगातार बीबी से बतियाता रहा. पास बैठा उस का मित्र मुंह से कुछ भी ना बोला. बस, उन की बातें सुनता रहा. उसे ऐसी बातों में बहुत आनंद आ रहा था. उस ने ऐसी बातें पहले कभी नहीं सुनी थीं. औफिस का वातावरण कमाल का था. किसी का मन भी वहां से जाने को न था.

‘‘बीबी और सुनाओ, मेहर कैसा है?’’

‘‘ठीक है, पुत्र काम पर जाता है अब.’’

‘‘कहां जाता है काम पर, बीबी?’’

‘‘एक धार्मिक स्थल पर सेवादार का काम करता है. सुबह 8 बजे जाता है और शाम को 6 बजे घर लौटता है.’’

‘‘बीबी, अब तो शराब नहीं पीता होगा, मेहर?’’

‘‘नहीं पुत्र, अब नहीं पीता.’’

‘‘चलो, अच्छा है, अपना घर संभालता है.’’

‘‘हां पुत्र’’ बीबी कुछ देर खामोश रही. फिर थोड़ी देर बाद बोली,‘‘बहुत दुख देखे थे तुम्हारी मां ने बेटा. तुम ने भी बहुत मेहनत की थी अपनी मां के साथ. बच्चे अच्छे हों तो मांबाप का जीवन सफल हो जाता है, बेटा. जीवन ही नहीं, बल्कि उन का मरना भी सार्थक हो जाता है,’’ बीबी भावनाओं के समंदर में डूबती जा रही थी.

‘‘हां बीबी, यह बात तो ठीक है.’’

‘‘चलो, तेरी मां इस बात से तो सुख की सांस ले कर गई है इस दुनिया से, अशके पुत्र अशके तेरे,’’ बीबी ने गर्व से गरदन उठा कर कहा.

‘‘बीबी, बहुत मुश्किल से छुड़वाई थी तुम ने मेहर की शराब, कितना इलाज करवाया था तुम ने उस का.’’

‘‘हां पुत्र, बहुत बुरे दिन देखे हैं. लेकिन हालातों के आगे तो किसी की भी नहीं चलती है न. बेटा, बिना मर्द के इस दुनिया में जीना बहुत कठिन है. उस पर यदि औलाद अच्छी न निकले, तो फिर पूछो मत कि क्या गुजरती है. मैं बता नहीं सकती. मु झे मालूम है कि मैं ने कैसे समय बिताया है. अनपढ़ औरत थी मैं. भरी जवानी में विधवा हो गई. मत पूछो, पुत्र.’’

‘‘हां, यह तो ठीक है, बीबी.’’

‘‘हां पुत्र, लेकिन सफेद लिबासों में भेडि़ए ही फिरते हैं. मैं ने देखा है उन दरिंदों को. ये वो लोग हैं जो इंसानियत के दुश्मन हैं और समाज को खोखला कर रहे हैं. ये वो लोग हैं जो अपने थोड़े से फायदे के लिए लोगों को मौत के मुंह में  झोंक देते हैं.’’

‘‘हां बीबी, यह तो तुम ने ठीक कहा.’’

‘‘यही वे लोग हैं जिन्होंने मेहर को नशे की आदत लगा दी थी. मैंबर तो थे ये धार्मिक स्थल के और मेहर से काम करवाते थे घर का और थोड़ी पिला कर देररात तक काम करवाते रहते. बस वहां लग गई उस को नशे की लत,’’ बीबी व्यथित हृदय से सारी बातें बताती रही और अपना मन हलका करती रही. बीबी की बातों से ऐसा लग रहा था जैसे आज तक किसी ने भी उस का दुख सुना न हो. बातें करतेकरते बीबी की आंखें भर आईं. वह ऐसे बातें कर रही थी जैसे किसी अपने हमदर्द से बातें कर रही हो. भोलू उस की बातें बड़ी आत्मीयता से सुन रहा था.

भोलू को याद है जब वह छोटा सा था तो बीबी उस के घर दूध ले कर आया करती थी क्योंकि मेहर का बाप कुछ वर्ष पहले मर चुका था. मेहर के अलावा उस की 2 लड़कियां भी थीं. एक मेहर से बड़ी और एक छोटी. थोड़ा बड़ा होने पर मेहर दूध ले कर आने लगा था.

भोलू की मां और बीबी के बीच बहुत अच्छा रिश्ता बन गया था. दोनों विधवा थीं. दोनों का दुख एकजैसा ही था. दोनों का परिवार जीवन के बड़े संघर्षों से गुजर रहा था. आहिस्ताआहिस्ता भोलू ने अपने पिता के कारोबार को संभाल लिया और मेहर किसी धार्मिकस्थल में सेवादार के काम पर लग गया. औफिस का वातावरण अभी भी मोहममता की सुगंध से महक रहा था.

‘‘बीबी, बहूरानी के बारे में सुनाओ, ठीक है, सेवा करती है आप की?’’

‘‘बहूरानी तो ठीक है, घर अच्छे से संभालती है, मेरी सेवा भी बहुत करती है पर…?’’

‘‘पर क्या?’’ भोलू ने बीबी के कंठ में रुकी आधीअधूरी बात को निकालने का प्रयत्न करना चाहा.

‘‘क्या बताऊं, बेटा…’’ वह कुछ रुकी, फिर बोली, ‘‘क्या बताऊं, मेरी लड़कियों से नहीं बनती उस की,’’ बीबी यह बोलतेबोलते एकदम दुखी सी हो गई.

‘‘बीबी, फिर क्या हुआ, दुखी मत हो, अपना घर तो संभालती है न, तेरे पोतेपोतियों को तो संभालती है न, तेरे बेटे से तो ठीक है न,’’ भोलू ने बीबी को सांत्वना देते हुए कहा.

‘‘पुत्र, अपने जायो से तो प्यार जानवर भी करते हैं, मजा तो तब है जब दूसरों के लिए कुछ किया जाए,’’ बीबी कर्कश स्वर में बोली.

‘‘चलो बीबी, फिक्र न किया करो.’’

‘‘नहीं पुत्र, उस की मेरी बेटियों से नहीं बनती, यह सोच कर मेरा मन बहुत दुखी होता है, वे कौन सा इस से कुछ मांग रही हैं, कुदरत का दिया सबकुछ तो है उन के पास. दो बोल ही तो बोलने होते हैं मीठे. और क्या चाहिए उन को. सारी जमीनजायदाद तो दे दी उन्होंने लिख कर इन को, फिर भी ऐसा हो तो किसे बुरा न लगेगा, भला?’’ बीबी प्रश्नचिह्न चेहरे पर लाते हुए बोली. उस की आंखों से जैसे नाराजगी के दो मोती छलकने को ही थे.

‘‘बीबी, तू चिंता मत किया कर, तेरी बेटियां अपने घर में सुखी हैं न, और तुम्हें क्या चाहिए?’’

‘‘हां बेटा, छोटा जमाई थोड़ा गुस्से वाला है पर फिर भी ठीक है, रोटी तो कमा कर खिला रहा है न.’’

‘‘चलो बीबी, आहिस्ताआहिस्ता सब ठीक हो जाएगा, चिंता मत किया करो.’’

‘‘पुत्र, घर से बेटियां अगर नाराज हो कर जाएं तो तुम्हें क्या पता कि मां के दिल पर क्या बीतती है,’’ बीबी की आंखों में अटके आंसू आखिर छलक ही पड़े.

‘‘बीबी, समय के साथ सब ठीक हो जाएगा,’’ भोलू ने बीबी को सांत्वना देते हुए कहा.

‘‘माताजी, चिंता मत करो, सब ठीक हो जाएगा, अच्छा बीबी, पैरी पैणा,’’ भोलू के पास बैठे उस के दोस्त से भी जैसे रहा न गया. इतना कह वह वहां से चला गया. उस के बोलने से माहौल में कुछ बदलाव आया.

‘‘भोलू, चल साग और मेथीवाला टोडा (मक्की की रोटी) खा ले अब, मैं खुद अपने हाथों से बना कर लाई हूं. बहूरानी तो काम कर रही थी, मैं ही जल्दीजल्दी बना लाई. सोचा, आज भोलू से मिल कर आती हूं. बहुत मन कर रहा था तुम से मिलने का,’’ बीबी अपनी सारी परेशानियों से बाहर आ कर बोली, ‘‘अच्छा पुत्र, चलती हूं, बहुत देर हो गई, बहूरानी इंतजार करती होगी,’’ बीबी दुपट्टे से अपनी आंखें पोंछती हुई बोली.

‘‘साग टोडा मु झे बहुत स्वादिष्ठ लगता है,’’ भोलू ने टोडे वाले मुड़ेतुड़े अखबार वाले पैकेट और साग वाले डब्बे की सुगंध लेते हुए कहा.

‘‘बेटा, मां के हाथ का है, स्वाद क्यों नहीं होगा?’’

‘‘बीबी, सच बता, मेहर अब कोई नशा तो नहीं करता न?’’

‘‘रहने दे, परदा ही रहने दे, बेटा. क्या बताऊं, अब तुम से क्या छिपाना, पता नहीं कहां से गोलियां ले कर खाता है नशे की. अब मैं क्या करूं?’’ बाहर खड़े मेहर के स्कूटर पर बैठने से पहले बीबी ने भोलू के कान मे पास आ कर कहा. भोलू दूर तक बीबी को स्कूटर पर जाते हुए देखता रहा. भोलू के मस्तिष्क की दूरी में कुछ चलता रहा जिसे भोलू हल करने का प्रयास करता है. पर नशे पर किसी का बस काबू है? जो एक बार फंस गया, निकल ही नहीं पाता. Story In Hindi

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