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Hindi Social Story : अस्‍पताल का जनरल वार्ड और वो तीन दिन

Hindi Social Story : मैंने चाय का आखिरी घूंट पिया और आदत के अनुसार उस को मुंह में घुमाया तो मेरे सामने के बैड पर लेटा बालक हंस दिया. मैं ने जल्दी से चाय को गले उतारा और इशारे से पूछा, ‘क्या?’ वह फिर हंस दिया, बोला, ‘चाय को मुंह में रखने और घुमाने से आप मुझे मानव विकास क्रम के पहले चरण से लगे.’ उस की बात सुन कर मैं भी हंस दिया.

अस्पताल का जनरल वार्ड है यह. कई रोगी हैं यहां. मैं तो 2 दिनों पहले ही आया हूं. कई रोगी तो महीनों से भरती हैं. यह लड़का भी 7 दिनों से भरती है. इस को कुत्ते ने काटा था तो इस के पिताजी इसे बावसी के पास ले गए थे. यहां ज्यादातर लोग पशु के काटने, बुखार आने, पेटदर्द जैसी बीमारियों पर पहले आस्था के केंद्र पर जाते हैं. जब मामला बिगड़ जाता है तो डाक्टर के पास आते हैं. ठीक होने पर डाक्टर को नहीं, बावसी को ही प्रसाद चढ़ाते हैं. तो इस लड़के को कुत्ते ने काटा. बावसी ने कुत्ते के काटे पर फूंक मारी और कहा, ‘जाओ, ठीक हो जाएगा.’ सब ने बावसी की जय की और टापरे चले गए थे. पर कुछ दिनों बाद मामला बिगड़ गया. कुत्ता पागल था, सो, लड़के को रेबीज हो गया, तो इसे यहां अस्पताल लाया गया.

अस्पताल में एक संस्था द्वारा मुफ्त में दिए जाने वाले भोजन का वितरण शुरू हुआ और लड़के के पिताजी भोजन लेने चले गए.

मेरे पास के बिस्तर पर एक 14 साल की लड़की है, जिस को उस के ही रिश्तेदारों ने जम कर पीटा है. स्वयंसेवी संस्था, पुलिस, नेता, प्रशासन के लोग उस से मिलने लगातार आते रहते हैं. किसी ने बताया कि प्रेम का मामला है, लेकिन परंपरा, सम्मान से जुड़ा है. यहां यह परंपरा है कि गांव के लड़केलड़की भाईबहन माने जाते हैं. यह लड़की गांव के ही एक लड़के से प्रेम करती है. लड़का भी जीजान से इस को चाहता था. जब गांव के बड़ेबुजुर्गों को पता लगा तो दोनों को समझाया कि यह प्रेम गलत है. वे शादी नहीं कर सकते. पर ये दोनों नहीं माने. एक दिन दोनों ने जहर खा लिया. प्रेमी तो मर गया लेकिन प्रेमिका बच गई, जो अब यहां है. लड़की बहुत दबाव में है.

परंपराएं कितनों का ही खून करती हैं, कितने ही अरमानों का गला दबा देती हैं, कितनी ही उम्मीदों को कोख में ही मार देती हैं. हर व्यक्ति जन्म लेते ही ऐसे कितने ही बोझों को ले कर बड़ा होता है. आजकल के युवा कहां मानते हैं ऐसी पुरानी बातों को. यह बात मांबाप, रिश्तेदार और समाज के ठेकेदार नहीं मानते हैं, इसलिए ऐसी घटनाएं होती हैं.

फिर ग्रामीण लड़केलड़कियां शारीरिक संबंधों को कम उम्र में ही समझ जाते हैं. क्योंकि वे एक कमरे के टापरे में मांबाप, भाईभाभी को सैक्स करते देखते हैं. प्राइवेसी तो होती नहीं है, तो वे भी इसे करने लगते हैं. फिर परिवार, गांव के सम्मान की रक्षा के लिए लड़केलड़कियां पेड़ों पर लटके दिखते हैं, जहर खा लेते हैं या दुष्कर्म के मुकदमे दायर हो जाते हैं.

वार्ड में और भी मरीज हैं जिन से मिलनेजुलने का, आनेजाने वालों का तांता लगा रहता है. ऊंची आवाज में बातचीत होती रहती है. दूसरे मरीजों की तकलीफ का खयाल नहीं रखा जाता है. कभीकभी नर्स चुप रहने को कहती है, तो कुछ देर शांति रहती है, फिर वही सब शुरू हो जाता है. कुछ बुजुर्ग बीड़ी पीते हैं. गार्ड उन से बीड़ी छीन लेते हैं. लेकिन चोरीछिपे फिर वार्ड में ये वस्तुएं आ ही जाती हैं. सभी जानते हैं इन से होने वाले नुकसान, लेकिन नशा होता ही ऐसा है जिस से दिमाग बंद हो जाता है. इंसान अच्छाबुरा, सहीगलत कुछ नहीं देखता.

लधमाके ले कर बड़ा हुजूम वार्ड में घुस आया. जिस बैड पर लड़का लेटा था, वहां पूजापाठ होने लगी, कर्मकांड किया जाने लगा. भोपा आटे के पिंड बना कर लाया था जिसे बैड के चारों तरफ घुमाया जाने लगा. वैसे, लड़के को बैड से हटा दिया गया था.

जब वे लोग चले गए तो लड़के को वापस बैड पर लिटा दिया गया. जानकारी मिली कि 10 साल पहले एक लड़के की इसी बैड पर मृत्यु हो गई थी और भोपा ने उस के परिजनों को बताया कि लड़के की आत्मा भटक रही है, उस की मुक्ति करनी है, इसलिए यह कर्मकांड किया गया.

अस्पताल का प्रशासन, गार्ड सभी मूकदर्शक बने देख रहे थे, मरीजों की तकलीफ से उन को कोई मतलब नहीं था. आत्मा ले जाई जा चुकी थी और वार्ड के ज्यादातर लोग इस कर्मकांड की प्रशंसा कर रहे थे. कैसा समाज हम ने बनाया है जहां पाखंड के नाम पर होने वाले अंधविश्वास के आगे दूसरों की तकलीफ की कोई सुनवाई नहीं है.

मैं पूरे दिन विचलित रहा, उत्तेजित रहा. मेरे पक्ष में लोग ज्यादा नहीं थे, इसलिए प्रशासन से शिकायत करने पर मेरी सुनवाई नहीं हुई थी. लोकतंत्र में बहुमत की ही सुनवाई होती है. उस के लिए गलतसही कुछ नहीं होता. मैं बेचैनी से करवटें बदलता रहा.

शाम के डाक्टर राउंड पर आए. जब उन को मैं ने यह परेशानी बताई तो वे हंस कर बोले, ‘‘आप को कल छुट्टी मिल जाएगी, घर जा कर चिंतनमनन करते रहना.’’ वे बेफिक्री से दूसरे रोगियों को देखने लगे. Hindi Social Story :

Hindi Family Story : मेट्रो – कसूरवार चश्‍मा

Hindi Family Story : ‘‘अरे,संभल कर बेटा,’’ मैट्रो में तेजी से चढ़ती प्रिया के धक्के से आहत बुजुर्ग महिला बोलीं.

प्रिया जल्दी में आगे बढ़ गई. बुजुर्ग महिला को यह बात अखर गई. वे उस के करीब जा कर बोलीं, ‘‘बेटा, चाहे कितनी भी जल्दी हो पर कभी शिष्टाचार नहीं भूलने चाहिए. तुम ने एक तो मुझे धक्का मार कर मेरा चश्मा गिरा दिया उस पर मेरे कहने के बावजूद मुझ से माफी मांगने के बजाय आंखें दिखा रही हो.’’

अब तो प्रिया ने उन्हें और भी ज्यादा गुस्से से देखा. मैं जानती हूं, प्रिया को गुस्सा बहुत जल्दी आता है. इस में उस की कोई गलती नहीं. वह घर की इकलौती लाडली बेटी है. गजब की खूबसूरत और होशियार भी. वह जल्दी नाराज होती है तो सामान्य भी तुरंत हो जाती है. उसे किसी की टोकाटाकी या जोर से बोलना पसंद नहीं. इस के अलावा उसे किसी से हारना या पीछे रहना भी नहीं भाता.

जो चाहती उसे पा कर रहती. मैं उसे अच्छी तरह समझती हूं. इसीलिए सदैव उस के पीछे रहती हूं. आगे चलने या रास्ते में आने का प्रयास नहीं करती.

मुझे जिंदगी ने भी कुछ ऐसा ही बनाया है. बचपन में अपनी मां को खो दिया था. पिता ने दूसरी शादी कर ली. सौतेली मां को मैं बिलकुल नहीं भाती थी. मैं दिखने में भी खूबसूरत नहीं. एक ही उम्र की होने के बावजूद मुझ में और प्रिया में दिनरात का अंतर है. वह दूध सी सफेद, खूबसूरत, नाजुक, बड़ीबड़ी आंखों वाली और मैं साधारण सी हर चीज में औसत हूं.

जाहिर है, पापा की लाडली भी प्रिया ही थी. मेरे प्रति तो वे केवल अपनी जिम्मेदारी ही निभा रहे थे. पर मैं ने बचपन से ही अपनी परिस्थितियों से समझौता करना सीख लिया था. मुझे किसी की कोई बात बुरी नहीं लगती. सब की परवाह करती पर इस बात की परवाह कभी नहीं करती कि मेरे साथ कौन कैसा व्यवहार कर रहा है. जिंदगी जीने का एक अलग ही तरीका था मेरा. शायद यही वजह थी कि प्रिया मुझ से बहुत खुश रहती. मैं अकसर उस की सुरक्षाकवच बन कर खड़ी रहती.

आज भी ऐसा ही हुआ. प्रिया को बचाने के लिए मैं सामने आ गई, ‘‘नहींनहीं आंटीजी, आप प्लीज उसे कुछ मत कहिए. प्रिया ने आप को देखा नहीं था. वह जल्दी में थी. उस की तरफ से मैं आप से माफी मांगती हूं, प्लीज, माफ कर दीजिए.’’

‘‘बेटा जब गलती तूने की ही नहीं तो माफी क्यों मांग रही है? तूने तो उलटा मुझे मेरा गिरा चश्मा उठा कर दिया. तेरे जैसी बच्चियों की वजह से ही दुनिया में बुजुर्गों के प्रति सम्मान बाकी है वरना इस के जैसी लड़कियां तो…’’

‘‘मेरे जैसी से क्या मतलब है आप का? ओल्ड लेडी, गले ही पड़ गई हो,’’ बुजुर्ग महिला को झिड़कती हुई प्रिया आगे बढ़ गई.

मुझे प्रिया की यह बात बहुत बुरी लगी. मैं ने बुजुर्ग महिला को सहारा देते हुए खाली पड़ी सीट पर बैठाया और उन्हें चश्मा पहना कर प्रिया के पास लौट आई.

हम दोनों जल्दीजल्दी घर पहुंचे. प्रिया का मूड औफ हो गया था. पर मैं उसे लगातार चियरअप करने का प्रयास करती रही.

मैं सिर्फ प्रिया की रक्षक या पीछे चलने वाली सहायिका ही नहीं थी वरन उस की सहेली और सब से बड़ी राजदार भी थी. वह अपने दिल की हर बात सब से पहले मुझ से ही शेयर करती. मैं उस के प्रेम संबंधों की एकमात्र गवाह थी. उसे बौयफ्रैंड से मिलने कब जाना है, कैसे इस बात को घर में सब से छिपाना है और आनेजाने का कैसे प्रबंध करना है, इन सब बातों का खयाल मुझे ही रखना होता था.

प्रिया का पहला बौयफ्रैंड 8वीं क्लास में उस के साथ पढ़ने वाला प्रिंस था. उसी ने पीछे पड़ कर प्रिया को प्रोपोज किया था. उस की कहानी करीब 4 सालों तक चली. फिर प्रिया ने उसे डिच कर दिया. दूसरा बौयफ्रैंड वर्तमान में भी प्रिया के साथ था. अमीर घर का इकलौता चिराग वैभव नाम के अनुरूप ही वैभवशाली था. प्रिया की खूबसूरती से आकर्षित वैभव ने जब प्रोपोज किया तो प्रिया मना नहीं कर सकी.

आज भी प्रिया उस के साथ रिश्ता निभा रही है पर दिल से उस से जुड़ नहीं सकी है. बस दोनों के बीच टाइमपास रिलेशनशिप ही है. प्रिया की नजरें किसी और को ही तलाशती रहती हैं.

उस दिन हमें अपनी कजिन की शादी में नोएडा जाना था. मम्मी ने पहले ही ताकीद कर दी थी कि दोनों बहनें समय पर तैयार हो जाएं. प्रिया के लिए पापा बेहद खूबसूरत नीले रंग का गाउन ले आए थे जबकि मैं ने अपनी पुरानी मैरून ड्रैस निकाल ली.

नई ड्रैस प्रिया की कमजोरी है. इसी वजह से जब भी पापा प्रिया को पार्टी में ले जाना चाहते तो इसी तरह एक नई ड्रैस उस के बैड पर चुपके से रख आते.

आज भी प्रिया ने नई डै्रस देखी तो खुशी से उछल पड़ी. जल्दी से तैयार हो कर निकली तो सब दंग रह गए. बहुत खूबसूरत लग रही थी.

‘‘आज तो तू बहुतों का कत्ल कर के आएगी,’’ मैं ने प्यार से उसे छेड़ा तो वह मुझे बांहों में भर कर बोली, ‘‘बहुतों का कत्ल कर के क्या करना है, मुझे तो बस अपने उसी सपनों के राजकुमार की ख्वाहिश है जिसे देखते ही मेरी नजरें झपकना भूल जाएं.’’

‘‘जरूर मिलेगा मैडम, मगर अभी सपनों की दुनिया से जरा बाहर निकलिए और पार्टी में चलिए. क्या पता वहीं कोई आप का इंतजार कर रहा हो,’’ मैं ने उसे छेड़ते हुए कहा तो वह हंस पड़ी.

पार्टी में पहुंच कर हम मस्ती करने लगे. करीब 1 घंटा बीत चुका था. अचानक प्रिया मेरी बांह पकड़ कर खींचती हुई मुझे अलग ले गई और कानों में फुसफुसा कर बोली, ‘‘प्रज्ञा वह देखो सामने. ब्लू सूट पहने मेरे सपनों का राजकुमार खड़ा है. मुझे तो बस इसी से शादी करनी है.’’

मैं खुशी से उछल पड़ी, ‘‘सच प्रिया? तो क्या तेरी तलाश पूरी हुई?’’

‘‘हां,’’ प्रिया ने शरमाते हुए कहा.

सामने खड़ा नौजवान वाकई बहुत हैंडसम और खुशमिजाज लग रहा था. मैं ने कहा, ‘‘मुझे तेरी पसंद पर नाज है प्रिया, मैं पता लगाती हूं कि यह है कौन? वैसे तब तक तुझे उस से दोस्ती करने का प्रयास करना चाहिए.’’

वह रोंआसी हो कर बोली, ‘‘यार यही तो समस्या है. वह पहला लड़का है जो मुझे भाव नहीं दे रहा. मैं ने 1-2 बार प्रयास किया पर वह अपने घर वालों में ही व्यस्त है.’’

‘‘यार कुछ लड़के शर्मीले होते हैं. हो सकता है वह दूसरे लड़कों की तरह बोल्ड न हो जो पहली मुलाकात में ही दोस्ती के लिए उतावले हो उठते हैं.’’

‘‘यार तभी तो यह लड़का मुझे और भी ज्यादा पसंद आ रहा है. दिल कर रहा है कि किसी भी तरह यह मेरा बन जाए.’’

‘‘तू फिक्र मत कर. मैं इस के बारे में सारी बात पता करती हूं. सारी कुंडली निकलवा लूंगी,’’ मैं ने उस लड़के की तरफ देखते हुए कहा.

जल्द ही कोशिश कर के मैं ने उस लड़के से जुड़ी काफी जानकारी इकट्ठी कर ली. वह हमारी कजिन के फ्रैंड का भाई था. उस का नाम मयूर था.

वह कहां काम करता है, कहां रहता है, क्या पसंद है, घर में कौनकौन हैं जैसी बातें मैं ने प्रिया को बता दीं. प्रिया ने फेसबुक, लिंक्डइन जैसी सोशल मीडिया साइट्स पर जा कर उस लड़के के बारे में और भी जानकारी ले ली. प्रिया ने फेसबुक पर मयूर को फ्रैंड रिक्वैस्ट भी भेजी पर उस ने स्वीकार नहीं की.

अब तो मैं अकसर देखती कि प्रिया उस लड़के के ही खयालों में खोई रहती है. उसी की तसवीरें देखती रहती है या उस की डिटेल्स ढूंढ़ रही होती है. मुझे समझ में आ गया कि प्रिया को उस लड़के से वास्तव में प्यार हो गया है.

एक दिन मैं ने यह बात पापा को बता दी और आग्रह किया कि वे उस लड़के के घर प्रिया का रिश्ता ले कर जाएं. पापा ने उस के परिवार वालों से बात चलाई तो पता चला कि वे लोग भी मयूर के लिए लड़की ढूंढ़ रहे हैं. पापा ने अपनी तरफ से प्रिया के लिए उन्हें प्रपोजल दिया.

रविवार के दिन मयूर और उस के परिवार वाले प्रिया को देखने आने वाले थे. प्रिया बहुत खुश थी. अपनी सब से अच्छी ड्रैस पहन कर वह तैयार हुई. मैं ने बहुत जतन से उस का मेकअप किया. मेकअप कर के बालों को खुला छोड़ दिया. वह बेहद खूबसूरत लग रही थी.

मगर आज पहली दफा प्रिया मुझे नर्वस दिखाई दे रही थी. जब प्रिया को उन के सामने लाया गया तो मयूर और उस की मां एकटक उसे देखते रह गए. मैं भी पास ही खड़ी थी. मयूर ने तो कुछ नहीं कहा पर उस की मां ने बगैर किसी औपचारिक बातचीत के जो कहा उसे सुन कर हम सब सकते में आ गए.

लड़के की मां ने कहा, ‘‘खूबसूरती और आकर्षण तो लड़की में कूटकूट कर भरा है, मगर आगे कोई बात की जाए उस से पहले ही क्षमा मांगते हुए मैं यह रिश्ता अस्वीकार करती हूं.’’

प्रिया का चेहरा उतर गया. पापा भी इस अप्रत्याशित इनकार से हैरान थे. अजीब मुझे भी बहुत लग रहा था. आखिर प्रिया जैसी खूबसूरत और पढ़ीलिखी बड़े घर की लड़की को पाना किसी के लिए भी हार्दिक प्रसन्नता की बात होती और फिर प्रिया भी तो इस रिश्ते के लिए कितनी उत्साहित थी.

पापा ने हाथ जोड़ते हुए धीरे से पूछा, ‘‘इस इनकार की वजह तो बता दीजिए. आखिर मेरी बच्ची में कमी क्या है?’’

लड़के की मां ने बात बदली और मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘‘मुझे यह लड़की पसंद है. यदि आप चाहें तो मैं इसे अपनी बहू बनाना पसंद करूंगी. आप घर में बात कर के जब चाहें अपना जवाब दे देना.’’

पापा ने उम्मीद के साथ मयूर की ओर देखा तो वह भी हाथ जोड़ता हुआ बोला, ‘‘अंकल, जैसा मम्मी कह रही हैं मेरा जवाब भी वही है. मैं भी चाहूंगा कि प्रज्ञा जैसी लड़की ही मेरी जीवनसाथी बने.’’

प्रिया रोती हुई अंदर भाग गई. मैं भी उस के पीछेपीछे अंदर चली गई. उन्हें बिदा कर मम्मीपापा भी जल्दी से प्रिया के कमरे में आ गए.

मगर प्रिया किसी से भी बात करने को तैयार नहीं थी. रोती हुई बोली, ‘‘प्लीज, आप लोग बाहर जाएं, मैं अभी अकेली रहना चाहती हूं.’’

हम सब बाहर आ गए. इस समय मेरी स्थिति अजीब हो रही थी. समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या कहूं. कुसूरवार न होते हुए भी आज मैं सब की आंखों में चुभ रही थी. मम्मी मुझे खा जाने वाली नजरों से देख रही थीं तो प्रिया भी नजरें चुरा रही थी. मुझे रात भर नींद नहीं आई.

अगली सुबह भी प्रिया बहुत उदास दिखी. उस की नजरों में दोषी मैं ही थी और यह बात सहन करना मेरे लिए बहुत कठिन था. मैं ने तय किया कि मैं मयूर के घर वालों के इनकार की वजह जान कर रहूंगी. प्रिया को छोड़ कर उन्होंने मुझे क्यों चुना जबकि प्रिया मुझ से लाख गुना ज्यादा खूबसूरत और स्मार्ट है, होशियार है. मैं तो कुछ भी नहीं.

बात की तह तक पहुंचने का फैसला कर मैं मयूर के घर पहुंच गई. बहुत आलीशान और खूबसूरत घर था उन का. महरी ने दरवाजा खोला और मुझे अंदर आने को कहा. घर बहुत करीने से सजा था. मैं ड्राइंगरूम का जायजा ले रही थी कि तभी बगल के कमरे से चश्मा पोंछती बुजुर्ग महिला निकलीं.

मुझे उन्हें पहचानने में एक पल भी नहीं लगा. यह तो मैट्रो वाली वही बुजुर्ग महिला थीं जिन का चश्मा कुछ दिन पहले प्रिया ने गिरा दिया था. मैं ने उन्हें चश्मा उठा कर दिया था. मुझे सहसा सारी बात समझ में आने लगी कि क्यों प्रिया को रिजैक्ट कर उन्होंने मुझे चुना.

सामने से मयूर की मां निकलीं. मुसकराती हुई बोलीं, ‘‘बेटा, मैं समझ सकती हूं कि तू क्या पूछने आई है. शायद तुझे अपने सवाल का जवाब मिल भी गया होगा. दरअसल, उस दिन मैट्रो में मैं भी वहीं थी और सब कुछ अपनी नजरों से देखा था. खूबसूरती, रंगरूप, धन, इन सब से ऊपर एक चीज होती है और वह है संस्कार. हमें एक सभ्य और व्यवहारकुशल बहू चाहिए बिलकुल तुम्हारे जैसी.’’

मैं ने आगे बढ़ कर दोनों के पांव छूने चाहे पर अम्मांजी ने मुझे गले से लगा लिया.

घर पहुंची तो प्रिया ने पहले की तरह रूखेपन से मेरी तरफ देखा और फिर अपने काम में लग गई.

मैं उस के पास जा कर धीरे से बोली, ‘‘कल के इनकार की वजह जानने मैं मयूर के घर गई थी. तुझे याद हैं वे बुजुर्ग महिला, जिन का चश्मा मैट्रो में तेरी टक्कर से नीचे गिर गया था? दरअसल, वे बुजुर्ग महिला मयूर की दादी हैं और इसी वजह से उन्होंने तुझे न कह दिया.

पर तू परेशान मत हो प्रिया. तेरी पसंद के लड़के को मैं कभी अपना नहीं बनाऊंगी. मैं न कह कर आई हूं.’’

प्रिया खामोशी से मेरी तरफ देखती रही. उस की आंखों में रूखेपन की जगह बेचारगी और अफसोस ने ले ली थी. थोड़ी देर चुप बैठने के बाद वह धीरे से उठी और मुझे गले लगाती हुई बोली, ‘‘पागल है क्या? इतने अच्छे रिश्ते के लिए कभी न नहीं करते. मैं करवाऊंगी मयूर से तेरी शादी.’’

मैं आश्चर्य से उसे देखने लगी तो वह मुसकराती हुई बोली, ‘‘आज तक तू मेरे लिए जीती रही है. आज समय है कि मैं भी तेरे लिए कुछ अच्छा करूं. खबरदार जो न कहा.’’

मेरे दिल पर पड़ा बोझ हट गया था. मैं ने आगे बढ़ कर उसे गले से लगा लिया. Hindi Family Story :

Governance Issues : किस काम का ‘स्टील फ्रेम ऑफ इंडिया’ जैसा ढांचा, पीएम करें मुख्य सचिवों की बैठक, फिर क्या करेंगे सीएम ?

Governance Issues : ब्यूरोक्रेसी का भी अपना एक प्रोटोकॉल होता है. प्रदेश का मुख्य सचिव मुख्यमंत्री के प्रति जवाबदेह होता है. ऐसे में जब प्रधानमंत्री सीधे प्रदेश के मुख्य सचिवों से रूबरू हो कर उन मीटिंग लेते हैं, उन्हें दिशा-निर्देश देते हैं तो इस से मुख्यमंत्री की सीमाओं का हनन होता है.

नई दिल्ली के मंडपम सभागार में 26-28 दिसंबर 2025 को 5वीं मुख्य सचिवों की तीन दिवसीय नेशनल कांफ्रेंस का आयोजन किया गया. इसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की. इसमें सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के चीफ सेक्रेटरी, सीनियर अधिकारी, पॉलिसी बनाने वाले और डोमेन एक्सपर्ट मौजूद थे.

प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार मुख्य सचिवों की 5वीं कॉन्फ्रेंस की मेन थीम ‘विकसित भारत के लिए मानव पूंजी’ था. इस कार्यक्रम का मकसद प्रधानमंत्री के कोऑपरेटिव फेडरलिज्म के विजन पर आधारित, स्ट्रक्चर्ड और लगातार बातचीत के जरिए केंद्र-राज्य के समन्वय को मजबूत करना है. यह कान्फ्रेंस एक ऐसे फोरम की तरह काम करती है जहां केंद्र और राज्य दोनों मिलकर काम करते हैं.

इसके जरिए देश की मानव पूंजी को ज्यादा से ज्यादा प्रयोग करने, मजबूत बनाने, भविष्य के लिए तैयार करने के लिए एक यूनिफाइड रोडमैप बनाते हैं.

मुख्य सचिवों के साथ प्रधानमंत्री की इस बातचीत का मकसद देश को अपनी आबादी को सिर्फ डेमोग्राफिक डिविडेंड के तौर पर देखने से आगे ले जाना है. इसके बजाय ‘एजुकेशन सिस्टम को मजबूत करने, स्किल्स को आगे बढ़ाने और देश भर में भविष्य में रोजगार के मौके पैदा करने के लिए पक्की स्ट्रेटेजी बनाकर नागरिकों को तैयार करना है.

इसके लिए पांच जरूरी क्षेत्रों पर खास जोर दिया जाएगा. इसमें बचपन की शिक्षा, स्कूलिंग, स्किलिंग, हायर एजुकेशन, और स्पोर्ट्स और एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज शामिल है. राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए बेस्ट प्रैक्टिस और एक्शनेबल स्ट्रैटेजी पर डिटेल में चर्चा की गई. इसके अलावा मुख्य रिफार्म और ग्रोथ-ओरिएंटेड सब्जेक्ट पर छह स्पेशल सेशन शेड्यूल किए गए थे. जिनमें राज्यों में डीरेगुलेशनय गवर्नेंस में टेक्नोलौजी मौके, रिस्क और मिटिगेशनय स्मार्ट सप्लाई चेन और मार्केट लिंकेज के लिए एग्रीस्टैकय एक राज्य, एक वर्ल्ड क्लास टूरिस्ट डेस्टिनेशनय और आत्मनिर्भर भारत प्लान शामिल थे.

मुख्य सचिवों की नेशनल कॉन्फ्रेंस पिछले चार सालों से हर साल आयोजित की जा रही है. पहली कान्फ्रेंस जून 2022 में धर्मशाला में हुई थी, इसके बाद जनवरी 2023, दिसंबर 2023 और दिसंबर 2024 में नई दिल्ली में हुई. यह बैठक असल में राज्य सरकार और मुख्यमंत्रियों के अधिकार क्षेत्र में दखल है. इसके जरिए देश के आधारभूत ढांचे में वैसा ही बदलाव करने का प्रयास करने का काम किया जा रहा है जैसे वन नेशन वन इलेक्शन, वन नेशन वन टैक्स और वन नेशन वन राशन का है.

राज्य के अधीन होता है मुख्य सचिव :

मुख्य सचिव राज्य का सबसे बड़ा प्रशासनिक पद होता है. यह राज्य के मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद के आधीन होता है. इसकी नियुक्ति भले ही केंद्र सरकार के द्वारा होती हो पर यह राज्य सरकार के नियंत्रण में होता है. भारत संघीय ढांचे वाले देश है. इस कारण केंद्र सीधे दखल नहीं दे सकता है. संविधान ने राज्य और केंद्र को अलग-अलग अधिकार दिए हैं.

संविधान के अनुसार केंद्र अनुच्छेद 256 के तहत राज्यों को केंद्र के कानूनों का पालन करने को कह सकता है. राष्ट्रीय महत्व वाले मसलों में राज्यों को निर्देश दे सकता है. इसके अलावा अनुच्छेद 352 और 356 के तहत राष्ट्रपति शासन और इमरजेंसी में केंद्र का दखल बढ़ जाता है.

केंद्र सरकार जब मनमाने तरह से प्रदेश के मुख्य सचिव के साथ व्यवहार करता है तो प्रदेश सरकार के साथ उसका टकराव हो जाता है. 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चक्रवात से पैदा हुए हालातों की समीक्षा के लिए चक्रवात प्रभावित राज्यों के मुख्य सचिवों के साथ मीटिंग कर रहे थे.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मीटिंग में आई और तुरंत ही चली गई. पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव आलापन बंद्योपाध्याय भी मीटिंग में शामिल नहीं हुए. इससे खफा होकर केंद्र सरकार ने दिल्ली पहुंचने का आदेश दिया. मुख्य सचिव पर प्रोटोकॉल न मानने का आरोप लगा था. आलापन बंद्योपाध्याय ने दिल्ली जाने की जगह पर रिटायरमेंट ले लिया. इसके बाद ममता बनर्जी ने उनको अपना सलाहकार बना लिया.

तमिलनाडु में डीएमके और एआईएडीएमके दोनों सरकारों के समय मुख्य सचिवों के कार्यकाल विस्तार को लेकर केंद्र के साथ खींचतान चलता रहता है. 2020-22 में केरल में केंद्र सरकार की योजनाओं को लेकर मुख्य सचिव स्तर के अफसरों पर टिप्पणी को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों के बीच टकराव होता रहा है.

दिल्ली में जब के अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री थे तो एलजी के साथ उनके टकराव में एक बड़ा मुद्दा मुख्य सचिव का होता था. आईएएस और आईपीएस दोनो में कैडर कंट्रोल केंद्र सरकार के पास होता है. इस कारण यह टकराव होता रहता है.

जनता के हित में नहीं है केंद्र का टकराव :

इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी में कहा गया है कि ‘संघीय ढांचे में राज्यों की प्रशासनिक स्वायत्तता का सम्मान होना चाहिए. राष्ट्रीय एकता के लिए संघीयता जरूरी होती है.’ जब केंद्र में पीएम और पीएमओ राज्यों के मुख्य सचिव या दूसरे अफसरों के साथ सीधे दिशा-निर्देश देते हैं तो अफसरों की सीमा रेखा का सवाल उठता है. इसके पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रदेशों के डीजीपी के साथ भी मीटिंग कर चुके हैं. जब भी केंद्र की सरकार और प्रधानमंत्री राज्यों से अधिक ताकतवर होते हैं यह टकराव होने लगता है.

आईएएस का सिलेक्शन केंद्र सरकार के द्वारा राज्य सरकारों के लिए किया जाता है. हर राज्य की प्रशासनिक जरूरतें अलग होती हैं. इसलिए इनका सिलेक्शन राज्य कैडर के हिसाब से किया जाता है. जिससे अधिकारी एक ही राज्य में 10-15 साल तक या उससे अधिक समय तक काम कर सके.

यह राज्य की जरूरतों को समझ कर योजनाएं बना सके. जिससे जनता को सही लाभ हो सके. कौडर नियुक्त का कारण है कि यह राज्य सरकार के आधीन काम करते है.

राज्य के मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल की जरूरतों के हिसाब से इनको विकास कार्य करने होते हैं. मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल हर पांच साल में जनता से चुन कर आता है. जब वह अच्छा काम नहीं करेगा तो जनता उसको चुनेगी नहीं. ऐसे में सरकारों को जनता के हिसाब से उनकी जरूरत की योजनाएं बनानी होती हैं. योजनाओं को लागू करने का काम आईएएस अफसरों का होता है. अगर अफसर केंद्र सरकार के अनुसार काम करने लगेंगे तो प्रदेश की जनता के हित वाले काम नहीं होंगे. राज्यों का उनकी जरूरत के हिसाब से विकास नहीं हो सकेगा.

दुनिया के दूसरे देशों में नहीं है आईएएस जैसी सर्विस :

आईएएस और आईपीएस परीक्षाओं की शुरुआत ब्रिटिश काल में 1855 में हुई थी. उस समय इसको आईसीएस के नाम से जाना जाता था. इसके जरिए अंग्रेज भारत में अफसरों का चुनाव करते थे. उस समय इसका नाम इंडियन सिविल सर्विसेज था. यह पहले लंदन में होती थी. इसमें चुने गए अफसर खुद को अंग्रेज ही समझते थे. 1922 में पहली बार यह परीक्षा भारत में हुई.1926 में फेडरल पब्लिक सर्विस कमीशन बना जो इन अफसरों का चुनाव करता था.

आजादी के बाद 1950 में इसका नाम इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस आईएएस कर दिया गया. यह परीक्षा यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन यूपीएससी के द्वारा कराई जान लगी.

भारत में आईएएस के स्वीकृत 6,858 पद है. इनमें करीब 5,542 अधिकारी कार्यरत हैं आईपीएस के स्वीकृत पदों की संख्या 5,055 है. जिनमें 4,469 अधिकारी कार्यरत हैं. यहां आईएएस को भगवान जैसे अधिकार प्राप्त है. यह लौबी खुद को खुदा से कम नहीं समझती हैं. जब नेता अनाड़ी हो जिनको काम का अनुभव न हो तो यह लौबी उनको अपने अनुसार चलाने की कोशिश करती है. आईएएस लॉबी ने धीरे-धीरे हर सरकारी विभाग में अपनी पकड़ बना ली है. आज देश का पीएमओं ही पूरे देश को चला रहा है.

आजादी के बाद भले ही इस परीक्षा का नाम बदल दिया गया हो पर इसके राज करने का काम बदस्तूर पहले की ही तरह से जारी रहा. यह अफसर खुद को सरकार से भी ऊपर समझते रहे है. 1949 में अयोध्या राम मंदिर विवाद में उस समय फैजाबाद के डीएम रहे केके नायर ने प्रधानमंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का आदेश मानने से इंकार कर दिया. जिसके बाद विवादित जगह पर मूर्तियां रखी रही.

आईएएस अफसरों के सामने विषय विशेषज्ञ कोई अहमियत नहीं रखते हैं. यही नहीं रिटायरमेंट के बाद यह अपनी अहमियत बनाने की पूरी योजना बनाकर चलते हैं. हेल्थ विभाग हो या पर्यावरण या कोई और यह अफसर ही वहां प्रभाव रखते हैं. डॉक्टर, वैज्ञानिक और अर्थशास्त्री को यह अपने से कमतर समझते हैं. दुनिया के और किसी देश में आईएएस और आईपीएस जैसी सर्विस नहीं है.

अंग्रेजों ने अपने देश में आईएएस जैसी व्यवस्था नहीं की है. यहां आईएएस जैसी सीधी भर्ती नहीं होती हैं. यहां कैबिनेट सेक्रेटरी स्तर के पदों के लिए स्क्रीनिंग और इंटरव्यू के जरिए उच्च योग्यता वाले लोगों का सिलेक्शन होता है. जो वहां आईएएस अधिकारियों की तरह ही नीतियां बनाते और लागू करते हैं.

इंग्लैंड की ही तरह अमेरिका में भी उच्च पदों पर नियुक्तियां मेरिट और अनुभव के आधार पर होती है. फ्रांस में कम उम्र में ही सिविल सेवाओं में चयन होता है और मेरिट को प्राथमिकता दी जाती है.

सरकार कांग्रेस की रही हो या भाजपा की उसको चलाने का काम आईएएस करता है. 75 साल में देश के जो हालात रहे हैं उसका सबसे बड़ा कारण आईएएस अफसर हैं. वह जिस तरह की योजनाएं बनाते हैं उनका सही तरह से अनुपालन नहीं हो पाता है. इसकी जिम्मेदारी आईएएस अफसरों की होती है. इसके बावजूद देश की हालत के लिए आईएएस को जिम्मेदार नहीं माना जाता है. देश की हालत का जिम्मेदार नेताओं को ठहराकर उनको गाली दी जाती है.

आजादी के 75 साल के बाद भी अगर देश हालात यह हैं तो आईएएस और आईपीएस नौकरियों की समीक्षा क्यों नहीं होती? ऐसे में आईएएस सिस्टम को खत्म करने की जरूरत है. यह अभी भी अंग्रेजियत की पहचान और उनकी ठसक को ढो रहे हैं. देश की गरीब जनता से जुड़ नहीं पाए हैं. आज भी यह काडर दूसरे नौकरों से खुद को अलग समझता है. इनके रौब में लाट साहब वाली सोच बनी हुई है. रिटायर होने के बाद भी अपनी ताकत बनाए रखने के कारण नेताओं के सामने सही तरह से जनता की बात नहीं रखते हैं. जिससे देश का विकास प्रभावित होता है.

आईएएस की परीक्षा में आरक्षण के बाद भी एससी और ओबीसी जाति के अफसरों को प्रभावी पद नहीं दिए जाते हैं. लोकसभा में बजट सत्र के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि देश का बजट बनाने वाले अफसरों में एससी और ओबीसी अफसर नहीं होते हैं. इस कारण बजट में उस समाज की अनदेखी की जाती है. अगड़े अफसरों को एससी और ओबीसी की जरूरतें और मजबूरी का पता ही नहीं होता है. सच्चाई यह है कि इन जातियों के अफसर भी वहां पहुंच कर खुद को अगड़ों से भी बड़ा समझने लगते हैं. जिससे जरूरतमंद लोगों का लाभ नहीं मिलता.

अगर इन अफसरों ने जाति-गणना का काम किया होता तो क्या नेता इनको रोक सकता था? ऐसे कई काम है जिसको अफसर इधर का उधर कर देते हैं. जिसका नतीजा देश की जनता को भुगतना पड़ रहा है. ऐसे में आईएएस कैडर को खत्म करके नई जरूरत और सिद्धांत के आधार पर अफसरों का चुनाव हो.

अंग्रेजों द्वारा बनाई गई सेवा में सेवा कम और राजशाही की ठसक ज्यादा है. दूसरे क्षेत्र की अच्छी प्रतिभाओं को यह अपना प्रतिद्वंदी मानकर आगे आने नहीं देते हैं. यह भले ही खुद को ‘स्टील फ्रेम ऑफ इंडिया’ समझते हैं, असल में यह व्यवस्था में लगे वह घुन है जो अंग्रेजियत में फंस कर देश को खोखला कर रहे हैं. Governance Issues :

Hindi Social Story : नथ – नाक की नथ कैसे मुन्नी की शादी में कोहराम की वजह बन गई ?

Hindi Social Story : उस दिन बैंक से नोटिस आया कि बैंक की शाखा का स्थानांतरण हो रहा है. जिन ग्राहकों के लौकर हैं वे उसे खाली कर दें. सो पतिदेव लौकर से सारा सामान उठा कर घर ले आए. जैसे वेतनयाफ्ता, पेंशनप्राप्ता 60-70 वर्षीय बूढ़े के लौकर में कुछ फिक्स डिपौजिट के कागज तथा 2 बेटियों के विवाह उपरांत कुछ बचेखुचे गहनों के नाम पर टूटे कंगन, कान का एक बुंदा या फिर चांदी के सिक्के, इतना ही पड़ा था. उन दिनों, टिन के बने टौफी के डब्बे आया करते थे और वे बड़े उपयोगी सिद्ध होते थे, हमारे पिताजी तथा जेठ आदि सब की शेविंग का सामान उन्हीं डब्बों में सदियों रखा जाता रहा है, आज भी जंग लगे उन डब्बों से बिछुड़ना उन्हें पीड़ा पहुंचा जाता है, और उन्हीं डब्बों में सुरक्षित रखे जाते थे गहनेजेवर. वैसा ही डब्बा, जिस में सफेद रुई, जो अब पीली पड़ गई थी और लाल पतंगी कागज (फटा हुआ), ‘गुदड़ी में लाल’ मुहावरे को चरितार्थ करता हुआ, घर लाया गया तो हम ने अपनी जायदाद के मनोहारी दर्शन किए. एक गले की हंसली, जिस में सोना कम पीतल ज्यादा थी, सुनार ने बेईमानी की थी, कान के 2 झुमके अलगअलग भांति के, एकआध चूड़ी, दोचार अजीबोगरीब दिखने वाली अंगूठियां और अचानक दिखी 9 नगीनों जडि़त नाक की समूची नथ.

‘‘अरे, यह तो वही नथ है जोे रश्मि भाभी ने मेरी शादी पर पहनी थी,’’ अपनी हथेली पर उस को बड़े दुलार से लिटाया, उस का सौंदर्य निहारा. अनुपम रूपमति नथ. उस डब्बे की एकमात्र शोभा. अचानक यादों की बरात हमारी अपनी बरात के साथ, बैंडबाजे के साथ, मानस पर उमड़ पड़ी. याद आया वह दिन जब हमें दुलहन बनाया जा रहा था, नातेरिश्तेदारों से घर भरा था. दादीजी तो रही नहीं थीं, सो घर की सब से बड़ी या यों कहिए चौधराहट छांटने वाली बड़ी ताईजी, पुरखों के गांव से स्पैशली बुलाई गई थीं क्योंकि उन की सब से छोटी देवरानी यानी कि हमारी अम्मा को तो शादीब्याह करने की अक्ल नहीं थी. 7 बच्चों को जन्म देने वाली, उन्हें उच्चतम शिक्षा से पारंगत करने की क्षमता तो अम्मा कर सकती थीं किंतु शादीब्याह में ऊंचनीच का उन्हें क्या ज्ञान धरा था भला? रस्मों की भरमार, दिनभर में पच्चीसों रस्में, उन रस्मों में तो जैसे ताईजी ने पीएचडी कर रखी थी और मजाल कि उन की बात कोई टाल दे. अच्छेभले शिक्षित पिताजी, जो भौतिक शास्त्र के प्रोफैसर थे, न कोई देवीदेवता को मानते थे न किसी प्रपंच में पड़ते थे किंतु उस समय बेटी के ब्याह पर जैसा ताईजी ने कहा उन्होंने भी वैसा ही किया, शायद शिष्टतावश. लेकिन 21 वर्षीय, अंगरेजी में एमए पास मौडर्न कन्या को ताईजी की कोई बात फूटी आंख नहीं सुहाती थी.

गौर पूजा के समय ताईजी ने हुक्म दिया, ‘सिर धो कर नहाओ और सीधा बिना किसी को छुए, आंगन में बनी वेदी के पटरे पर बैठ जाओ.’ कन्या यानी मैं ने विद्रोह किया, शोर मचाया, ‘कल ही सिर धोया था.’  परंतु ताईजी ने एक नहीं सुनी, अम्मा सिर पर पल्ला रखे मुझे घूर रही थीं, मानो कह रही हों – मेरी इज्जत का फालूदा मत बना. झक मार कर मुझे दोबारा सिर धोना पड़ा और सफेद तौलिया बालों में लपेट कर आज्ञाकारी पुत्री का सा रोल अदा करने आंगन में बिछे पटरे पर बैठने का उपक्रम करने लगी. अभी आधी ही बैठी थी कि ताईजी ने झपट कर मेरे सिर पर बंधा तौलिया खींच कर खोल दिया, ‘अरे, घोर अपशुगन, सिर पर सफेद कपड़ा बांध कर क्यों बैठ गई?’ काटो तो खून नहीं, क्रोध से भुनभुनाती हुई कन्या वेदी से उठ खड़ी हुई,  ‘नहीं करनी मुझे ऐसी शादी, यह भी कोई तरीका है, कोई मैनर्स नहीं है? एक हजार टोनेटोटके लगा रखे हैं, तंग कर दिया.’

रिश्तेदारों में फुसफुसाहट शुरू हो गई, ‘हाय कैसी बेहया लड़की है,’  चाची, बूआ, पड़ोसिनों में यह ‘बे्रकिंग न्यूज’ की भांति करंट सी दौड़ गई. बड़ी मुश्किल से मौसी ने समझाबुझा कर गौरी पूजा की रस्म करवाई, सिर के गीले बालों पर गुलाबी दुपट्टा डाल कर. ऐसा लग रहा था जैसे सफेद तौलिया बांधने मात्र से मैं विधवा हो जाऊंगी. रीतिरिवाज, विवाहित जीवन में मंगल लाने वाली ‘इंश्योरैंस कंपनियों’ जैसी हैं कि प्रीमियम नहीं भरा तो विवाह टूट जाएगा. 33 करोड़ देवीदेवताओं को मनाना क्या इतना सरल होता है? कभी चंद्रमा को प्रसन्न किया जाता, कभी पुरखों को, कभी दीवार पर थापे, कभी गेहूं, हल्दी, चावल की शामत आती, शुभअशुभ नेग. पता नहीं कौन सी किताबों में ये सब लिखा था. और ताईजी को इतना याद कैसे रहता था? गांव से ताईजी बड़ेबडे पतीले, कड़ाही, ढेरों बरतनों के साथ रिकशा पर लद कर आई थीं.

मिसरानीजी, जिन का काम रसोई में चूल्हा मैनेज करना था और दूसरा उन का परमप्रिय काम था जब कोई शगुन का समय आया वे बेसुरी ढोलक बजाने बैठ जातीं. वे अपनी सफेद किनारी वाली धोती का पल्ला मुंह में दबा कर इतना बेसुरा गातीं कि उपस्थित श्रोता हंसी नहीं दबा पाते  मिसरानीजी से मजा लेने के लिए लड़केलड़कियां मनोरंजन करने की खातिर उन से फरमाइश करते. ‘मिसरानीजी, वह वाला गीत गाना.’ ले दे कर उन्हें एक ही तो ‘बन्नी’ आती थी और वे बड़ी खुश हो कर राग अलापने लगतीं. ‘पटरे पे बैठी लाड़ो भजन करे…’ और सब का हंसहंस कर बुरा हाल हो जाता. आखिर ‘लाड़ो’ अपनी शादी पर भजन क्यों कर रही होगी? कोई सोचे क्या संन्यास लेने जा रही थी? आखिर बरात आने का समय हुआ. दुलहन का इंस्पैक्शन करने ताईजी तथा पूरा प्रपंची स्त्री समाज नख से शिख तक बारीकी से जांच करने कमरे में आया. बड़े यत्न से मेरी प्रिय सखी ने मेरा शृंगार किया था. उस ने कहीं कोई कसर नहीं छोड़ी थी किंतु उसे क्या पता कि कमी किस कोने से टपक पड़ेगी.

देखते ही ताईजी गरजीं, ‘नथ कहां है? नाक सूनी क्यों है? मामा के यहां से नथ आनी चाहिए थी?’ अब तो मानो कोहराम मच गया, एक बार फिर खुसुरफुसुर होने लगी, ‘हाय, नथ नहीं आई भात में?’ अम्मा के पीहर वालों को नीचा दिखाने का इस से बढि़या मौका और क्या हो सकता था. बेचारी अम्मा का चेहरा फक पड़ गया. अपनी सास को संकट में देख कर, रश्मि भाभी भाग कर अपनी नथ ले आईं और दुलहन को यानी मुझे पहना दी. सब ने राहत की सांस ली. उधर बैंडबाजे की आवाज कानों में पड़ते ही सब के सब बरात देखने भाग खड़े हुए. जैसेतैसे ब्याह पूर्ण हुआ और विदाई के गमगीन वातावरण के चलते जिसे देखो वही टसुए बहा रहा था. हमारे यहां लोगों को झूठमूठ का रोना खूब आता है. क्षणभर में रोने लगते हैं, क्षणभर में हंसने. विदा होती कन्या ने भी कुछ आंसू ताईजी के डर के मारे अपने नेत्रों से टपकाए. सोचा, रोना तो पड़ेगा वरना ताईजी कहेंगी, कैसी बेशर्म है. विदाई की तमाम रस्में खत्म हो चुकीं और मेरे पैर घर की दहलीज पार करने ही वाले थे कि एक क्षीण सी आवाज में किसी ने टोका, ‘रश्मि की नाक की नथ तो निकाल लो.’ यह सुनते ही ताईजी एकदम मैदानेजंग में आ खड़ी हुईं और बोलीं, ‘इस नथ में मुन्नी की भांवर पड़ गई है, अब यह इस की नाक से नहीं उतारी जा सकती.’

किस में इतना दमखम था कि हिटलरी ताईजी की अवज्ञा कर सकता. सो, मुन्नी यानी मेरी विदाई उसी नथ में हो गई. आज नथ को देखते ही मुन्नी को पूरी दास्तान-ए-नथ याद हो आई. व्यंग्य करते हुए मैं ने पति से कहा, ‘‘वाह रे ताईजी, वाह, आप का तर्क. इसी नथ में तो रश्मि भाभी के भी फेरे हुए होंगे, तब उसे पहनाने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं हुई?’’ पति उवाच, ‘‘होती भी क्यों? रश्मि भाभी तो बहू ठहरीं. बहू का जेवर बेटी को पहनाने में उन्हें क्यों और कैसे एतराज होता?’’ मुझे अपने पर क्रोध आया. क्या मैं भी इन दकियानूसी अंधविश्वासों से ग्रसित थी? मैं ने तब क्यों विरोध नहीं किया था और अब तक क्यों नहीं नथ वापस की? ढेरों प्रश्न मुझे विचलित करने लगे. मेरे विवाह को आज 47 वर्ष हो गए हैं, आज उस नथ का खयाल आया? आज मैं चेती हूं? अपने को धिक्कारते हुए मैं ने निश्चय किया कि अगली बार जब भी रश्मि भाभी से मिलूंगी तो उन की नथ उन्हें लौटा दूंगी. कथा का समापन पतिदेव ने यों कह कर किया कि पिछले 47 वर्षों से रश्मि भाभी का और तुम्हारा, ‘सुहाग’ बैंक के घटाटोप छोटे से लौकर में बंद पड़ा रहा. Hindi Social Story :

Hindi Social Story : डूबते किनारे – सौम्या और रेवती के बच कौन आ गया था ?

Hindi Social Story : दुनिया कितनी छोटी है, इस का अंदाजा महाबलेश्वर में तब हुआ, जब बारिश में भीगने से बचने के लिए दुकान की टप्परों के नीचे शरण लेती रेवती को देखा. जयपुर में वह और रेवती एक ही औफिस में काम करते थे. आज काफी समय बाद पर्यटन स्थल की अनजान जगह पर रेवती से मिलना एक बड़ा इत्तिफाक और रोमांचकारी था. खुशी से बौराती सौम्या रेवती के गले लगते हुए बोली, “कहां रही इतने दिन…? कितना फोन लगाया तुझ को, लगता ही नहीं था… कैसी हो तुम?”

“मैं बिलकुल ठीक हूं… हां, इधर बहुत व्यस्त रही… बेटी रिया की शादी में अपना होश ही नहीं था.”“बड़ी खराब हो… बेटी की शादी में निमंत्रण तक नहीं भेजा…” सौम्या की शिकायत पर वह मुसकरा दी.“आप लोग बातें करो. मैं गरमागरम भुट्टे ले आता हूं…” सौम्या के पति सलिल ने भुट्टे के बहाने दोनों सहेलियों को अकेले छोड़ना बेहतर समझा.

“हाय, कित्ते दिन बाद मिले हैं… समझ नहीं आ रहा, कहां से बातें शुरू करूं… यहां कब तक हो और कैसे आई हो…”“आज ही निकलना है… मैं कैब का इंतजार कर रही हूं… दरअसल, यहां एक रिश्तेदार के पास आई थी… फंक्शन था…”“अकेले…” सौम्या ने आश्चर्य से पूछा.

“और क्या, इन के पास समय कहां है, जब देखो बिजनैस… अब बेटे ने संभाल लिया है, तो इन्हें कुछ आराम है.”“सुन न रेवती, मेरे होटल चलते हैं, गप्पें मारेंगे…”नहीं यार सौम्या, बिलकुल समय नहीं है….” कहते हुए वह मोबाइल पर अपने कैब की लोकेशन देखने लगी और हड़बड़ा कर बोली, “कैब आ गई…” रेवती मोबाइल से कैब वाले को अपनी लोकेशन बताने लगी.

“हां भैया, लोकेशन पर ही हूं. हां… हां… बस थोड़ा सा आगे आइए, मैं आप को देख रही हूं…” रेवती को अपने कैब ड्राइवर को दिशानिर्देश देते हुए सौम्या ने उसे अजीब नजरों से देखा.सौम्या की ओर देखे बगैर ही रेवती ने बैग में अपने मोबाइल को सरकाते हुए कहा, “यहां की चाय ले जाना और स्ट्राबेरी भी… वैसे, कहांकहां घूमी हो. छोटी सी तो जगह है… बरसात में तो लगता है हम बादलों में हैं…” कह कर वह कैब की ओर देखने लगी.

सौम्या उस से ढेर सारी बातें करना चाहती थी, पर दोनों सहेलियों के बीच वो कैब ड्राइवर किसी खलनायक सा आ गया.कैब ड्राइवर के आते ही रेवती उस के कंधे पर हाथ रखती हुई, “चलो, फिर मिलते हैं.” कह कर चलती बनी.अरसे बाद मिलने पर क्या कैब छोड़ी नहीं जा सकती थी, यह क्षोभ मिलने की खुशी पर भारी पड़ गया.

“अरे, तुम अकेली खड़ी हो, तुम्हारी सहेली कहां गई…” दोनों हाथों में भुट्टा पकड़े सलिल पूछ रहे थे, “चली गई, उसे कुछ ज्यादा ही जल्दी थी…”“चलो, तुम दोनों भुट्टे खा लो…” कहते हुए सलिल ने उसे भुट्टा पकडाया.

बारिश थम चुकी थी. सलिल आसपास के खूबसूरत नजारों में खो गए. पर, सौम्या का व्यथित मन रेवती के उदासीन व्यवहार का आकलन करने में लगा हुआ था. संपर्क सूत्र का आदानप्रदान हुए बगैर कब मिलेंगे, कैसे मिलेंगे? जैसे अनुत्तरित प्रश्न उस के पाले में डाल कर यों हड़बड़ी में निकल जाना उसे बड़ा अजीब लगा. लगा ही नहीं, कभी दोनों में घनिष्ठता थी. न कुछ जानने की ललक… न बताने की उत्सुकता… रेवती का अतिऔपचारिक व्यवहार सौम्या को अच्छा नहीं लगा.

जयपुर से दिल्ली शिफ्ट होने के बाद वह जब भी रेवती को फोन करती, वह पूरे उत्साह के साथ अपने सुखदुख उस से साझा करती… फोन पर लंबीलंबी बेतकल्लुफ बातचीत में जहां सौम्या दिल्ली जैसी नई जगह पर मन न लगने का रोना रोती, वहीं रेवती अपनी नौकरी की व्यस्तता की भागादौड़ी के बारे में बताती.

रिटायरमेंट का समय नजदीक आने पर लोग जहां भविष्य की चिंता में डूबते हैं, वहीं रेवती खुश थी कि रिटायरमेंट के बाद खूब आराम करेगी… रिटायरमेंट के पलों को सुकून से जिएगी और अपने पति आकाश के साथ खूब घूमेगी. इधर कुछ सालों से रेवती से उस का संपर्क टूट गया. जो नंबर उस के पास था, उस से उस का फोन नहीं लगता था.

सौम्या को पुराने दिन याद आए. उस के और रेवती के बीच कितनी अच्छी मित्रता थी. दोनों एकदूसरे के सुखदुख की साझीदार थीं.जब सलिल का ट्रांसफर दिल्ली हुआ, तो वह बहुत दुखी हुई. उस वक्त रेवती ने उसे समझाया, “परिस्थितियोंवश हमें कोई निर्णय लेना हो, तो उस के पीछे खुश होने के कारण ढूंढ़ लेने चाहिए.

‘‘अब देखो न, आकाश मेरे घर में खाली बैठने के खिलाफ हैं. उन का मानना है कि काम सिर्फ पैसों के लिए नहीं किया जाता. काम करने से क्रियाशीलता बनी रहती है.

“आकाश औरत की आजादी के पक्ष में हैं. क्या इतना मेरे लिए काफी नहीं… उन की सकारात्मक सोच के चलते मैं अलवर से जयपुर अपडाउन कर पाती हूं.

“मैं खुश हूं कि आकाश खुले विचारों के हैं. वहीं दूसरी ओर तुझे नौकरी छोड़नी पड़ रही है, क्योंकि सलिल को दूसरे शहर में तबादले पर जाना है. इस समझौते के पीछे सकारात्मक सोच यह होनी चाहिए कि सलिल और तुम्हें टुकड़ोंटुकड़ों में जीवन जीने को नहीं मिलेगा.”

“तुम कुछ भी कहो, मैं तो खालिस समझौता ही कहूंगी… एक मिनट को मेरी बात छोड़ दो… उधर आकाश क्या चाहते हैं, ये भी छोड़ दो. बस दिल से कहो, अपने लिए तुम्हारा अपना मन क्या कहता है,” सौम्या की बात सुन कर रेवती फीकी हंसी हंस कर बोली, “इस भागदौड़ में क्या रखा है… कहने को आजाद हूं. आकाश जैसी खुली विस्तृत सोच वाला पति मिला है, फिर भी जीवन आसान कहां है. 60-65 किलोमीटर रोज के आनेजाने में कब दिन शुरू होता है, कब खत्म, कुछ पता ही नहीं चलता.

“कभीकभी मन में कसक उठती है कि कब वो दिन आएगा, जब मैं रिटायरमेंट के बाद उन्मुक्त जीवन जिऊंगी. चिड़ियों की चहचहाहट सुनूंगी, चाय के कप से धीमेधीमे चुसकियां भरूंगी. बरसती बूंदों की टपटप सुनूंगी.

‘‘अपने जानपहचान के लोगों से संपर्क बढ़ाऊंगी. कुछ छूटा हुआ समेटूंगी. कुछ बेवजह यों ही छोड़ दूंगी. ऐसे में जब बच्चे हायर स्टडीज के लिए बाहर हैं… आकाश के साथ बिना प्लानिंग कहीं निकल जाऊंगी… एकदूसरे का अकेलापन दूर करते हुए सुकून से जिऊंगी.

‘‘आकाश का बस चले, तो रिटायरमेंट के बाद भी मुझे व्यस्त रखें… जबकि मैं सुकून चाहती हूं. अब तो उस दिन का इंतजार है, जब मेरा फेयरवेल होगा…” कह कर रेवती अपने फुरसती दिनों की कल्पना में डूब गई.

“क्या हुआ…? तुम इतनी चुपचुप सी क्यों हो…” सलिल के टोकने पर मन का पंक्षी अतीत से वर्तमान में फुदक कर आ गया.

“थकान सी हो रही है सलिल, होटल चल कर आराम करते हैं…” सौम्या के कहने पर सलिल उस के साथ वापस होटल में आ गए.

रात को डिनर के लिए डाइनिंग एरिया की ओर जाते समय सहसा ही सलिल के मुंह से निकला, “अरे, आज तो वाकई इत्तिफाक का दिन है.”

सलिल के इशारे पर सौम्या की नजरें उठीं, तो बुरी तरह चौंक गई… कौरीडोर में रेवती अपने रूम का लौक खोलती दिखी. पीठ उन की तरफ होने से रेवती सौम्या और सलिल को देख नहीं पाई…

सलिल उस की बेचैनी देख कर बोले, “अगर तुम्हें लगता है कि वह तुम्हें एवौइड कर रही है, तो समझदारी इसी में है कि तुम उन की भावनाओं का खयाल करते हुए उन्हें शर्मिंदा न करो…”

पर, सौम्या को चैन कहां था. रात 9 बजे वह रेवती के कमरे का दरवाजा खटखटा आई.

दरवाजा खुलते ही विस्मय, शर्मिंदगी और हड़बड़ाहट भरे भाव लिए खड़ी रेवती को परे धकेलती वह बेधड़क अंदर आ गई और नाराजगी भरे भाव में व्यंग्यात्मक स्वर में बोली, “तू तो अपने रिश्तेदार के यहां आई है. वहां जगह नहीं होगी, तभी शायद होटल में रुकी है. वह भी उस होटल में, जिस में हम ठहरे हैं. शायद वे… तू तो आज निकलने वाली थी न…”

“तू क्या लेगी, चाय बनाऊं…” रेवती के कहने पर सौम्या उस का हाथ पकड़ कर कहने लगी, “इतने दिनों बाद मुझ से मिली है. क्या मन नहीं करता बातें करने का… जान सकती हूं, वजह क्या है मुझे एवौइड करने की…”

वह सकपकाते हुए बोली, “ऐसी कोई बात नहीं है यार… क्यों एवौइड करूंगी तुझे? रिश्तेदार से मिलने जरूर आई थी, पर रुकी होटल में हूं. इस में कौन सी बड़ी बात है.”

यह सुन कर दो पल के लिए सौम्या रेवती को घूरती रही, फिर सहसा ही उस का हाथ पकड़ कर बोली, “क्या हुआ है तुझे, सब ठीक तो है न…”

“हां… हां, बिलकुल ठीक है…”

“सच बता, अकेले आई है क्या?”

“हां, बिलकुल…”

“बच्चे और पति कहां हैं?”

“बताया तो… बेटी रिया की शादी हो गई और बेटा रोहन एमबीए कर के फैमिली बिजनैस में है.

“और पति आकाश…”

“बिलकुल बढ़िया हैं आकाश…”

उस के बाद कुछ पल के लिए चुप्पी छा गई, एक अनावश्यक सी चुप्पी… सौम्या उस के चेहरे को ध्यान से देखने लगी. दोपहर बाद की चंद पलों की मुलाकात में वह हंसी तो थी, पर उस की हंसी आंखों तक नहीं पहुंची थी.
अजीब सी गंभीरता ओढ़े, मुरझाया चेहरा और सूखी भावहीन आंखें, औपचारिकता में लिपटा रूखासूखा व्यवहार देख कर वह फुसफुसाई, “चेहरा कैसा मुरझा गया है. कहां गया तेरा सुकून वाला फंडा… मैं समझती हूं कि एक बार काम करने की आदत पड़ जाए न, तो घर बैठना बिलकुल नहीं सुहाता… आकाशजी अपने बिजनैस में व्यस्त होंगे और तू खालीपन सा महसूस करती होगी…”

यह सब सुन कर रेवती मुसकराती रही… उसे ध्यान से देख कर सौम्या बोली, “मत मुसकरा इतना… कुछ चल रहा है तेरे दिल में तो बता दे…”

इतना सुन मुसकराती रेवती के भीतर जमा दर्द सखी के स्नेहिल स्पर्श से झरझर आंसू छलकने लगे. सौम्या उसे रोते देख हैरान रह गई, फिर बिना पूछे ही उसे सीने से लगा लिया.

कुछ देर तक दोनों सहेलियां मौन रहीं. फिर कुछ देर बाद रेवती बोली, “क्या कहूं तुझ से, और कह के भी क्या फायदा…”

“मन हलका होगा और क्या…” सौम्या के कहते ही जब दर्द का गुबार निकला, तो वह सन्न रह गई, लगा जैसे पैरों के नीचे से धरती सरक गई…

रेवती अतीत के अवांछित प्रसंग को उस के साथ साझा कर रही थी…

रेवती के औफिस का आखिरी दिन था… वह बड़े उमंगों से भरी घर से निकली. औफिस पहुंचने पर उस का जोरदार स्वागत हुआ.

भावभीनी विदाई की पार्टी के बाद तकरीबन 12 बजे बौस ने कहा, “मुझे अलवर में कुछ काम है. तुम चाहो तो मैं तुम्हें घर छोड़ सकता हूं, लेकिन तुम को अभी निकलना होगा…’’

फूलों के हार, बुके और गिफ्ट को देखते हुए उसे बौस के साथ जाने में ही समझदारी लगी… आखिरी दिन उस को जल्दी घर जाने की छूट मिलना कौम्प्लीमैंट्री था. उस ने झट से हां कर दी.

वह जल्दी घर पहुंच कर आकाश को सरप्राइज करना चाहती थी. पर, खुद सरप्राइज हो गई, जब बड़ी देर तक घंटी बजाने के बाद आकाश ने दरवाजा खोला. शाम के साढ़े 6 और 7 बजे के बीच आने वाली पत्नी को 2 बजे दरवाजे पर देख कर उस के बोल नहीं फूटे…

रेवती घर के भीतर गई, तो बेडरूम में अपने ही बिस्तर पर अपनी कालोनी की एक औरत को देख गुस्से से पागल हो गई… आकाश और उस औरत के अस्तव्यस्त कपड़े और हुलिए को देखने के बाद किसी सफाई की कोई आवश्यकता नहीं रह गई थी.

आकाश का यह रूप और राज जान कर उस का वह ‘अस्तित्व’ हिल गया, जिसे सुरक्षित रखने के लिए आकाश उसे नौकरी करने के लिए प्रेरित करता था. नौकरी की प्रेरणा के पीछे इतना घिनौना उद्देश्य जान कर वह विक्षिप्त सी हो गई… जिस आकाश को देख कर वह जीती थी, उस आकाश ने उसे जीतेजी मार दिया था. नौकरी करने वह जाती थी और आजादी आकाश को मिलती थी ऐयाशियां करने की.

रेवती को फूटफूट कर रोते देख सौम्या ने उस के कंधे को पकड़ कर जोर से हिला कर पूछा, “तू ने इतना घिनौना सच जानने के बाद भी उस के साथ रहने का निर्णय क्यों लिया…

“मैं ने उस का चुनाव नहीं किया सौम्या, मैं ने उस पद प्रतिष्ठा और बच्चों की शांति के लिए उन के भविष्य का चुनाव किया है, जिस को कमाने में मेरी पूरी उम्र लग गई. दुनिया के सामने वह मेरे आदर्श पति थे और आज भी हैं… जबकि हम एक घर में दो अजनबी हैं. हम दोनों एकदूसरे का इस्तेमाल सामाजिक प्रतिष्ठा के चलते ही करते हैं.”

“क्या उसे अपनी गलती का एहसास है?”

“पकड़े जाने के बाद गलती का एहसास किसे नहीं होगा… उसे भी वही डर है, जो मुझे है कि ये बात बाहर आई तो समाज में क्या प्रतिष्ठा रह जाएगी? इसलिए वह अपनी गलती मान कर माफी मांग रहा है, पर मैं कैसे मान लूं कि जिस पति पर आंख मूंद कर मैं ने भरोसा किया, उस ने मेरी पीठ पर छुरा भोंका है… मेरे साथ विश्वासघात किया है… अपने दिल में उस के दिए नागफनी के कांटे ले कर मैं जगहजगह सुकून की तलाश में भटक रही हूं, पर सुकून नहीं मिलता है.
सोतेजागते उस का छल, उस के कुचक्र के कांटे मेरे दिल को घायल कर देते हैं. जिन सुकून के दो शब्द उस से बतियाने को तरसती थी, वो अब ख्वाब बन गए…

मैं ने अपने फोन के सिम को तोड़ कर फेंक दिया था इस भय से कि कहीं किसी जानने वाले का फोन न आ जाए… कहीं वह मेरी आवाज से मेरे मन के भीतर चल रहे तूफान को भांप न जाए… कहीं भावावेश में मैं वो सब न उगल दूं, जिसे छिपाने के लिए हम जद्दोजेहद कर रहे हैं.
मेरे स्वाभाविक स्वभाव के विपरीत उपजते कसैलेपन को भांप कर आज लोग यहां तक कि मेरे अपने बच्चे बढ़ती उम्र की देन मानने लगे हैं.

रेवती की आपबीती सुन कर वाकई सौम्या का दिल भर आया था. वह उस के हाथों को सहलाती हुई बोली, “खुद को शांत रखना अपने हाथों में है. जब साथ रह ही रहे हो, तो जो हो गया उसे भूलने की कोशिश करो.”

“कहना आसान है. आदत के अनुरूप उस के प्रति अपनत्व कभी उभरता भी है, तो अतीत की कंटीली झाड़ियां मुझे लहूलुहान कर देती हैं. मैं दूसरों के सामने हंसतीमुसकराती जरूर हूं, पर सच यह है कि मैं जहां भी रहूं, कुछ भी करूं, नागफनी के दंशों की पीड़ा से मुक्ति नहीं पाती हूं… जब भी उस से बात होती है तब… क्यों, कब, कैसे जैसे प्रश्नों में उलझ कर रह जाती हूं. हम जब भी बात करते हैं, अतीत में उलझ कर रह जाते हैं और कड़वा अतीत नासूर बन कर रिसता है,” रेवती की मनोदशा देख कर सौम्या ने बात बदलने की चेष्टा करते हुए पूछा, “अच्छा, ये तो बता कि तुम महाबलेश्वर कैसे आई हो? कोई है क्या यहां…?”

“अरे, कोई नहीं है यहां… मैं अकसर यहां की शांत वादियों में अपने अशांत मन को सुकून पहुंचाने की कोशिश में आ जाती हूं… आकाश भी चाहते हैं कि मेरा मन शांत हो, मैं फिर से पहले वाली हो जाऊं…

‘‘उन्होंने मुझे विश्वास दिलाने की पूरी कोशिश की कि मेरी जगह उन के दिल में वही है, जो पहले थी. तू बता कि मैं इस छलावे को कैसे सच मान लूं.

“जो मैं वाकई उस के दिल में होती, तो वो मेरे लिए अपने बहकते कदमों को रोक लेता, पर मेरी नौकरी में उस ने सुविधा ढूंढ़ कर मेरे साथ छल किया.

“तू बता, उस के लंबे समय तक चले आ रहे सोचेसमझे छल को कैसे भूल जाऊं…”
रहरह कर रेवती के मन के घाव रिसते रहे. विगत के दोहराव से छाई मनहूसियत दूर करने के लिए सौम्या ने रेवती के दोनों बच्चो की बातें आरंभ कीं, तो उस के चेहरे पर रौनक आ गई.

सौम्या को अच्छा लगा कि उस के मन का एक हिस्सा अभी भी जिंदा है. शायद इस हिस्से के भरोसे जीवन बीत जाए. एकदूसरे को अपनीअपनी कहसुन लेने के बाद अब दोनों शांत थीं.
रेवती कौफी बनाने लगी, तो सौम्या की नजर दीवार पर लगी पेंटिंग पर टिक गई. पेंटिंग में उफनती लहरों के बीच एक स्त्री अकेली नाव खे रही थी… उस पेंटिंग में नदी के किनारे नहीं दिख रहे थे.

उसे लगा, मानो नाव में रेवती हो और वह अपने जीवन की नैया को किनारे लगाने में पूरी शक्ति झोंक रही हो… किनारा देखते ही उस के चेहरे पर खुशी की झलक आई, थकावट से भरे मनमस्तिष्क, शरीर विश्राम करने को बेकल हो गए, पर नाव का किनारों पर पहुंचना उस की किस्मत में शायद नहीं था. नाव किनारे लगती, उस से पहले ही किनारों ने डूबना आरंभ कर दिया था. उस स्त्री की विडंबना देख सौम्या की आंखों में न चाहते हुए भी आंसू भरते चले गए. Hindi Social Story :

Hindi Social Story : संयुक्त खाता – भाटिया अंकल के साथ क्या हुआ था ?

Hindi Social Story : दोपहर का समय था. मैं औफिस में खाना खत्म कर के जल्दीजल्दी अपनी फाइलें इकट्ठी कर रही थी.

बस 15 मिनट में एक जरूरी मीटिंग अटैंड करनी थी. इतने में ही फोन की घंटी बजी.

‘‘उफ्फ… अब यह किस का फोन आ गया?‘‘ परेशान हो कर मैं ने फोन उठाया, तो उधर से कमला आंटी की आवाज सुनाई पड़ी.

कमला आंटी के साथ हमारे परिवार का बहुत पुराना रिश्ता है. उन के पति और मेरे पिता बचपन में स्कूल में साथ पढ़ते थे.

आंटी की आवाज से मेरा माथा ठनका. आंटी कुछ उदास सी लग रही थीं और मैं जल्दी में थी. पर फिर भी आवाज को भरसक मुलायम बना कर मैं ने कहा, ‘‘हां आंटी, बताइए कैसी हैं आप?‘‘

‘‘बेटा, मैं तो ठीक हूं, पर तुम्हारे अंकल की तबीयत काफी खराब है. हम लोग पिछले 10 दिन से अस्पताल में ही हैं,‘‘ बोलतेबोलते उन का गला भर्रा गया, तो मुझे भी चिंता हो गई.

‘‘क्या हुआ आंटी? कुछ सीरियस तो नहीं है?‘‘

‘‘सीरियस ही है बेटा. उन को एक हफ्ते पहले दिल का दौरा पड़ा था और अब… अब लकवा मार गया है. कुछ बोल भी नहीं पा रहे हैं. डाक्टर भी कुछ उम्मीद नहीं दिला रहे हैं,‘‘ कहते हुए उन का गला रुंध गया.

‘‘आंटी, आप फिक्र मत कीजिए. अंकल ठीक हो जाएंगे. आप हिम्मत रखिए. मैं शाम को आती हूं आप से मिलने,‘‘ एक तरफ मैं उन्हें दिलासा दिला रही थी, वहीं दूसरी तरफ अपनी घड़ी देख रही थी.

मीटिंग का समय होने वाला था और मेरे बौस देर से आने वालों की तो बखिया ही उधेड़ देते थे. किसी तरह भागतेभागते मीटिंग में पहुंची, पर मेरा दिमाग कमला आंटी और भाटिया अंकल की तरफ ही लगा रहा.

मीटिंग समाप्त होतेहोते शाम हो गई. मैं ने सोचा, घर जाते हुए अस्पताल की तरफ से निकल चलती हूं. वहां जा कर देखा, तो अंकल की हालत सचमुच काफी खराब थी. डाक्टरों ने लगभग जवाब दे दिया था. अस्पताल से निकलते हुए मैं ने कहा, ‘‘आंटी, किसी चीज की जरूरत हो तो बताइए.‘‘

कमला आंटी पहले तो कुछ हिचकिचाईं, पर फिर बोलीं, ‘‘बेटा, एक हफ्ते से अंकल अस्पताल में पड़े हैं. अब तुम से क्या छिपाना? मेरे पास जितना पैसा घर में था, सब इलाज में खर्च हो गया है. इन के अकाउंट में तो पैसा है, परंतु निकालें कैसे? यह तो चेक पर दस्तखत नहीं कर सकते और एटीएम कार्ड का पिन भी बस इन्हें ही पता है. इन का खाता तुम्हारे ही बैंक में है. यह रही इन की पासबुक और चेकबुक. क्या तुम बैंक से पैसे निकालने में कुछ मदद कर सकती हो?‘‘ कहते हुए आंटी ने पासबुक और चेकबुक दोनों मेरे हाथ में रख दी. आंटी को पता था कि मैं उसी बैंक में नौकरी करती हूं.

‘‘आंटी, आप का भी अंकल के साथ जौइंट अकाउंट तो होगा ना? आप चेक साइन कर दीजिए, मैं कल बैंक खुलते ही आप के पास पैसे भिजवा दूंगी.‘‘

‘‘नहीं बेटा, नहीं. वही तो नहीं है. तुम्हें तो पता ही है, मैं तो इन के कामों में कभी दखल नहीं देती. इन्होंने कभी कहा नहीं और न ही मुझे कभी जरूरत महसूस हुई. बैंक का सारा काम तो अंकल खुद ही करते थे. पर पैसे तो इन के इलाज के लिए ही चाहिए. तुम तो बैंक में ही नौकरी करती हो. किसी तरह पैसा बैंक से निकलवा दोगी ना?‘‘ आंटी ने इतनी मासूमियत भरी उम्मीद से मेरी ओर देखा, तो मुझे समझ न आया कि मैं क्या करूं. बस चेक ले कर सोचती हुई घर आ गई.

घर जा कर चेक फिर से देखा और बैंक की शाखा का नाम पढ़ा तो याद आया कि वहां का मैनेजर तो मुझे अच्छी तरह से जानता है. झटपट मैं ने उसे फोन किया और सारी स्थिति समझाई. उस ने तुरंत मौके की नजाकत समझी और मुझे आश्वासन दिया, ‘‘कोई बात नहीं. मैं भाटिया साहब को अच्छी तरह जानता हूं. उन के सारे खाते हमारी ब्रांच में ही हैं. सुबह बैंक खुलते ही मैं खुद भाटिया साहब के पास अस्पताल चला जाऊंगा और उन के दस्तखत करवा कर पैसे उन के पास भिजवा दूंगा. आप बिलकुल फिक्र मत कीजिए.‘‘

बैंक के निर्देशों के अनुसार यदि कोई खाताधारी किसी कारण से दस्तखत करने की हालत में नहीं होता है तो कोई अधिकारी अपने सामने उस का अंगूठा लगवा कर उस के खाते से पैसे निकालने के लिए अधिकृत कर सकता है. वह मैनेजर इन निर्देशों से भलीभांति अवगत था, और भाटिया अंकल की मदद करने के लिए भी तैयार था, यह जान कर मुझे बहुत तसल्ली हुई और मैं चैन की नींद सो गई.

सुबह दफ्तर जाने की जगह मैं ने कार अस्पताल की ओर मोड़ ली. मुझे बहुत खुशी हुई, जब 9 बजते ही बैंक का मैनेजर भी वहां पहुंच गया. उस के हाथ में विड्राल फार्म था, जामुनी स्याही वाला इंकपैड भी था. बेचारा पूरी तैयारी से आया था. आते ही उस ने भाटिया अंकल से खूब गर्मजोशी से नमस्ते की, तो अंकल के चेहरे पर भी कुछ पहचान वाले भाव आते दिखे. फिर मैनेजर ने कहा, ‘‘भाटिया साहब, आप के अकाउंट से 25,000 रुपए निकाल कर आप की मैडम को दे दूं?‘‘

जवाब में जब अंकल ने अपना सिर नकारात्मक तरीके से हिलाया, तो मैनेजर समेत हम सब सकते में आ गए.

उस ने फिर कहा, ‘‘भाटिया साहब, आप के इलाज के लिए आप की मैडम को पैसा चाहिए. आप के अकाउंट से पैसे निकाल कर दे दूं?‘‘ जवाब फिर नकारात्मक था.

बेचारे मैनेजर ने 3-4 बार प्रयास किया, पर हर बार भाटिया अंकल ने सिर हिला कर साफ मना कर दिया. उस ने हार न मानी और फिर कहा, ‘‘भाटिया साहब, आप को पता है कि यह पैसा आप के इलाज के लिए ही चाहिए?‘‘

भाटिया अंकल ने अब सकारात्मक सिर हिलाया, परंतु पैसे देने के नाम पर जवाब में फिर ना ही मिला.

हालांकि यह अकाउंट भाटिया अंकल के अपने अकेले के नाम में ही था, उन्होंने उस पर कोई नौमिनेशन भी नहीं कर रखा था. बैंक मैनेजर ने आखिरी कोशिश की, ‘‘भाटिया साहब, आप की मैडम को इस अकाउंट में नौमिनी बना दूं?‘‘ जवाब अब भी नकारात्मक था.

‘‘आप का अकाउंट कमलाजी के साथ जौइंट कर दूं?‘‘ जवाब में फिर नहीं. ताज्जुब की बात तो यह कि भाटिया अंकल, जो कल तक न कुछ बोल रहे थे और न ही समझ रहे थे, बैंक से पैसे निकालने के मामले में आज सिर हिला कर साफ जवाब दे रहे थे.

मैनेजर ने मेरी ओर लाचारी से देखा और हम दोनों कमरे के बाहर आ गए. खाते से पैसे निकालने में मैनेजर ने अपनी मजबूरी जाहिर कर दी, ‘‘मैडम, अच्छा हुआ, आप यहां आ गईं, नहीं तो शायद आप मेरा भी विश्वास नहीं करतीं. आप ने खुद अपनी आंखों से देखा है. भाटिया साहब तो साफ मना कर रहे हैं. ऐसे में कोई भी उन के अकाउंट से पैसे निकालने की अनुमति कैसे दे सकता है?‘‘

मैनेजर की बात तो सोलह आने खरी थी. बैंक मैनेजर तो वापस बैंक चला गया और मैं अंदर जा कर कमला आंटी को उस की लाचारी समझाने की व्यर्थ कोशिश करने लगी.

अस्पताल से लौटते समय मैं उन्हें अपने पास से 10,000 रुपए दे आई. साथ ही, आश्वासन भी कि जितने रुपए चाहिए, आप मुझे बता दीजिएगा, आखिर अंकल का इलाज तो करवाना ही है.

शाम को बैंक से लौटते हुए मैं कमला आंटी के पास फिर गई. वे अभी भी दुखी थीं. मैं ने भी उन से पूछ ही लिया, ‘‘आंटी, आप ने कभी अंकल को अकाउंट जौइंट करने के लिए नहीं कहा क्या?‘‘

‘‘कहा था बेटा. कई बार कहा था, पर वह मेरी कब मानते हैं? हमेशा यही कहते हैं कि मैं क्या इतनी जल्दी मरने जा रहा हूं? एक बार शायद यह भी कह रहे थे कि यह मेरा पेंशन अकाउंट है, जौइंट नहीं हो सकता है.‘‘

‘‘नहींनहीं आंटी, शायद उन्हें पता नहीं है. अभी तो पेंशन अकाउंट भी जौइंट हो सकता है. चलो, अंकल ठीक हो जाएंगे, तब उन का और आप का अकाउंट जौइंट करवा देंगे और नौमिनेशन भी करवा देंगे,‘‘ कह कर मैं घर आ गई.

रास्तेभर गाड़ी चलाते हुए मैं यही सोचती रही कि भाटिया अंकल वैसे तो आंटी का इतना खयाल रखते हैं, पर इतनी महत्वपूर्ण बात पर कैसे ध्यान नहीं दिया?

कुछ दिन और निकल गए. भाटिया अंकल की तबीयत और बिगड़ती गई. आखिरकार, लगभग 10 दिन बाद उन्होंने अंतिम सांस ले ली और कमला आंटी को रोताबिलखता छोड़ परलोक सिधार गए.

पति के जाने के अकथनीय दुख के साथसाथ आंटी के पास अस्पताल का बड़ा सा बिल भी आ गया. उन का अंतिम संस्कार होने तक आंटी के ऊपर कर्जा काफी बढ़ गया था.

घर की सदस्य जैसी होने के नाते मैं लगभग रोज ही उन के पास जा रही थी और मैं ने जो पहला काम किया, वह यह कि भाटिया अंकल के सभी खाते बंद करवा के उन्हें कमला आंटी के नाम करवाया. इन कामों में बहुत से फार्म पूरे करने पड़ते हैं, पर बैंक में नौकरी करने की वजह से मुझे उन सब की जानकारी थी. आंटी को सिर्फ इन्डेमिनिटी बांड, एफिडेविट, हेयरशिप सर्टिफिकेट आदि पर अनगिनत दस्तखत ही करने पड़े थे, जो मुझ में पूरा भरोसा होने के कारण वे करती चली गईं और रिकौर्ड टाइम में मैं ने भाटिया अंकल के सभी खाते आंटी के नाम में करवा दिए. आंटी ने चैन की सांस ली और सारे कर्जों का भुगतान कर दिया. अपने खातों में उन्होंने नौमिनी भी मनोनीत कर लिया. अंकल के शेयर्स, म्यूच्यूअल फंड्स आदि का भी यही हाल था.

सब को ठीक करने में कुछ समय अवश्य लगा, पर मुझे यह सब काम पूरा कर के बहुत ही संतोष मिला.

भाटिया अंकल सरकारी नौकरी से रिटायर हुए थे. अब आंटी की फैमिली पेंशन भी आनी शुरू हो गई थी. और तो और, उन्होंने एटीएम से पैसे निकालना, चेक जमा करना और पासबुक में एंट्री कराना भी सीख लिया था. सार यह कि उन का जीवन एक ढर्रे पर चल निकला था.

इस बात को कई महीने निकल गए, पर एक बात मेरे दिल को बारबार कचोटती रही. ऐसा क्या था कि अंकल ने अपने अकाउंट से पैसे नहीं निकालने दिए. फिर एक बार मौका निकाल कर मैं ने आंटी से पूछ ही लिया.

यह सुन कर आंटी सकपका कर चुपचाप जमीन की ओर देखने लगीं. मुझे लगा कि शायद मुझे यह सवाल नहीं पूछना चाहिए था, पर कुछ क्षण पश्चात आंटी जैसे हिम्मत बटोर कर बोलीं, ‘‘बेटा, क्या बताऊं? पैसा चीज ही ऐसी है. जब अपने ही सगे धोखा देते हैं, तब शायद आदमी के मन से सभी लोगों पर से विश्वास उठ जाता है. इन के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था.‘‘

मैं चुपचाप आंटी की ओर देखती रही. मेरी उत्सुकता और अधिक जानने के लिए बढ़ गई थी.

आंटी आगे बोलीं, ‘‘जब तुम्हारे अंकल मैडिकल की पढ़ाई कर रहे थे, उन के पिता यानी मेरे ससुरजी बहुत बीमार थे. पैसों की जरूरत पड़ती रहती थी. इसलिए उन्होंने अपनी चेकबुक ब्लैंक साइन कर के रख दी थी. मेरे जेठ के हाथ वो चेकबुक पड़ गई और उन्होंने अकाउंट से सारे पैसे निकाल लिए. ना ससुरजी के इलाज के लिए पैसे बचे और न इन की पढ़ाई के लिए. मेरी सास पैसेपैसे के लिए मोहताज हो गईं. फिर अपने अपने जेवर बेच कर उन्होंने इन की मैडिकल की पढ़ाई पूरी करवाई और साथ ही सीख भी दी कि पैसे के मामले में किसी पर भी विश्वास नहीं करना, अपनी बीवी पर भी नहीं.

“तुम्हारे अंकल ने शायद अपनी जिंदगी के उस कड़वे सत्य को आत्मसात कर लिया था और अपनी मां की सीख को भी. इसीलिए वह अपने पैसे पर अपना पूरा नियंत्रण रखते थे और उस लकवे की हालत में भी उन के अंतर्मन में वही एहसास रहा होगा.“

अब सबकुछ शीशे की तरह साफ था, पर आंटी तनाव में लग रही थीं. मैं ने बात बदली, ‘‘चलिए छोड़िए आंटी, मैं आप को चाय बना कर पिलाती हूं.‘‘

समय बीतता गया, कमला आंटी की मनोस्थिति अब लगभग ठीक हो गई थी और अपने काम संभालने से उन में एक नए आत्मविश्वास का संचार भी हो रहा था. वैसे तो कमला आंटी पढ़ीलिखी थीं, हिंदी साहित्य में उन्होंने स्नातकोत्तर स्तर तक पढ़ाई की थी, परंतु पिछले 40 सालों में केवल घरबार में ही विलीन रहने से उन का जो आत्मविश्वास खो सा गया था, धीरेधीरे वापस आने लगा था.

मैं जब भी उन से मिलने जाती, मुझे यही खयाल बारबार सताता था कि हरेक व्यक्ति भलीभांति जानता है कि उसे एक दिन इस दुनिया से जाना ही है. बुढ़ापे की तो छोडो, जिंदगी का तो कभी कोई भरोसा नहीं है. पर फिर भी अपनी मृत्यु के पश्चात अपने प्रियजनों की आर्थिक सुरक्षा के बारे में कितने लोग सोचते हैं? छोटीछोटी चीजें हैं जैसे कि अपना बैंक खाता जौइंट करवाना, अपने सभी खातों, शेयर्स, म्यूच्यूअल फंड आदि में नौमिनी का पंजीकरण करवाना आदि. साथ ही, अपनी वसीयत करना भी तो कितना महत्त्वपूर्ण काम है. पर इन सब के बारे में ज्यादातर लोग सोचते ही नहीं हैं? अब कमला आंटी को ही ले लीजिए. उन बिचारी को तो यह भी पता नहीं था कि वे फैमिली पेंशन की हकदार हैं, अंकल के पीपीओ वगैरह की जानकारी तो बहुत दूर की बातें हैं. लोग जिंदा रहते हुए अपने परिवार का कितना खयाल रखते हैं, परंतु कभी यह नहीं सोचते कि मेरे मरने के बाद उन का क्या होगा?

धीरेधीरे समय निकलता गया और कमला आंटी के जीवन में सबकुछ सामान्य सा हो गया. उन के घर मेरा आनाजाना भी कम हो गया, पर अचानक एक दिन आंटी का फोन आया, ‘‘बेटा, शाम को दफ्तर से लौटते हुए कुछ देर के लिए घर आ सकती हो क्या?‘‘

‘‘हां… हां, जरूर आंटी. कोई खास बात है क्या?‘‘

‘‘नहीं, कुछ खास नहीं, पर शाम को आना जरूर,‘‘ आवाज से आंटी खुश लग रही थीं.

शाम को जब मैं उन के घर पहुंची, तो उन्होंने मेरे आगे लड्डू रख दिए. चेहरे पर बड़ी सी मुसकान थी.

‘‘लड्डू किस खुशी में आंटी?‘‘ मैं ने कौतूहलवश पूछा, तो एक प्यारी सी मुसकान उन के चेहरे पर फैल गई.

‘‘पहले लड्डू खाओ बेटा,‘‘ बहुत दिन बाद कमला आंटी को इतना खुश देखा था. दिल को अच्छा लगा.

लड्डू बहुत स्वादिष्ठ थे. एक के बाद मैं ने दूसरा भी उठा लिया. तब तक आंटी अंदर के कमरे में गईं और लौट कर सरिता मैगजीन की एक प्रति मेरे हाथ में रख दी.

‘‘यह देखो, तुम्हारी आंटी अब लेखिका बन गई है. मेरी पहली कहानी इस में छपी है.‘‘

‘‘आप की कहानी…? वाह आंटी, वाह. बधाई हो.‘‘

‘‘हां, कहानी क्या, आपबीती ही समझ लो. मैं ने सोचा कि क्यों न सब लोगों को बताऊं कि पैसे के मामले में पत्नी के साथ साझेदारी न करने से क्या होता है? और संयुक्त खाता न खोलने से उस को कितनी परेशानी हो सकती है. वैसे ही कोरोना वायरस इतना फैला हुआ है, क्या पता किस का नंबर कब लग जाए. तुम्हारी मदद न मिलती, तो मैं पता नहीं क्या करती. जैसा मेरे साथ हुआ, ऐसा किसी के साथ न हो,‘‘ कहतेकहते कमला आंटी की आंखें नम हो चली थीं और साथ में मेरी भी. Hindi Social Story :

Hindi Family Story : सीमा रेखा – क्या धीरेन दा को इस बात का एहसास हो पाया ?

Hindi Family Story : ‘‘सो मू, उठ जाओ बाबू…’’ धीरेन दा लगातार आवाज दिए जा रहे थे जिस से रूपल की नींद में बाधा पड़ने लगी तो वह कसमसाती हुई सोमेन के आगोश से न चाहते हुए भी अलग हो गई और पति सोमेन को लगभग धकियाती हुई बोली, ‘‘अब जाओ, उठो भी, नहीं तो तुम्हारे दादा सुबहसुबह पूरे घर को सिर पर उठा लेंगे. छुट्टी वाले दिन भी आराम नहीं करने देते.’’

सोमेन अंगड़ाई लेता हुआ उठ बैठा और ‘आया दादा’ कहता हुआ बाथरूम की ओर लपका. जब फे्रश हो कर जोगिंग करने के लिए टै्रकसूट और जूते पहन कर कमरे से बाहर निकला तो दादा रोज की तरह गरम चाय लिए उस का इंतजार करते मिले. उसे देखते ही मुसकरा कर प्यालों में चाय डालते हुए बोले, ‘‘सोमू, रूपल और बच्चों से भी क्यों नहीं कहता कि सुबह जल्दी उठ कर कुछ देर व्यायाम कर लें. सुबह की ताजा हवा से दिन भर तरावट महसूस होती है और साथ में स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है.’’ ‘‘दादा, रोज तो उन्हें जल्दी जागना ही पड़ता है, सो कम से कम रविवार को उन्हें नींद का मजा लेने दीजिए. चलिए, हम दोनों जोगिंग पर चलते हैं,’’ कहता हुआ सोमेन चाय की खाली प्याली रख कर उठ खड़ा हुआ.

दोनों भाइयों ने नजदीक के पार्क में धीमी गति से जोगिंग की. फिर धीरेन दा बैंच पर बैठ कर हाथपांव हिलाने लगे और उन के पास ही सोमेन एक्सरसाइज करने लगा. धीरेन दा 55 से ऊपर के हो चले थे और सोमेन भी 34 बसंत पार कर चुका था. लेकिन धीरेन दा हरपल सोमेन का ऐसे खयाल रखते जैसे वह कोई नादान बालक हो. धीरेन दा की दुनिया सोमेन से शुरू हो कर उसी पर खत्म हो जाती थी. कुदरत की इच्छा के आगे किसी का बस नहीं चलता. धीरेन दा के जन्म के बाद काफी कोशिशों के बावजूद उन के मातापिता की कोई दूसरी संतान नहीं हुई फिर भी वे डाक्टर की सलाह पर दवा लेते रहे और फिर 16 साल बाद अचानक सोमेन का जन्म हुआ.

सोमेन के जन्म से धीरेन दा बहुत खुश थे मानो सोमेन के रूप में उन्हें कोई जीताजागता खिलौना मिल गया हो. उन के बाबूजी की माली हालत कुछ खास अच्छी नहीं थी इसलिए मां को ही घर का हर काम करना पड़ता था. ऐसे में मां का हाथ बंटाने के लिए धीरेन दा ने सोमेन की सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली थी. सोमेन ज्यादातर समय धीरेन दा की गोद में होता या जहां वह पढ़ते थे उन के पास ही पालने में सोया या खेलता रहता.

देखतेदेखते सोमेन 4 साल का हो गया. धीरेन दा उस दिन बहुत खुश थे क्योंकि बी. काम. फाइनल में उन्होंने अपने विश्वविद्यालय में टाप किया था. घर आ कर जब उन्होंने यह खबर मांबाबूजी को सुनाई तो वे बहुत खुश हुए. इस खुशी को अपने पड़ासियों के साथ बांटने के लिए वे दोनों मिठाई लेने ऐसे निकले कि कफन ओढ़ कर घर वापस आए. रास्ते में एक बस ने उन्हें बुरी तरह से कुचल दिया था. एक पल को धीरेन दा को यों लगा मानो उन का सबकुछ खत्म हो गया. पर मासूम सोमेन को बिलखते देख उन्हें भाई से पिता रूप में परिवर्तित होने में तनिक भी वक्त नहीं लगा. उसी वक्त उन्होंने मन ही मन प्रण किया कि वह न सोमेन को अनाथ होने देंगे और न ही कभी उसे मातापिता की कमी महसूस होने देंगे.

इस घटना के कुछ महीनों बाद ही धीरेन दा की बैंक में नौकरी लग गई. नौकरी मिलने के 1 साल बाद उन्होंने रजनी के साथ विवाह रचा लिया. रजनी के गृहप्रवेश करते ही धीरेन दा की दुनिया बदल गई. सोमेन को भी रजनी भाभी कम और मां ज्यादा लगतीं. 2 साल का प्यार भरा समय कैसे गुजर गया, पता ही न चला. एक दिन रजनी को अपने भीतर एक नवजीवन के पनपने का एहसास हुआ तो धीरेन दा की खुशियों की सीमा न रही. सोमेन को भी चाचा बनने की बेहद खुशी थी. पर उन लोगों की सारी खुशियां रेत के घरौंदे की तरह पलक झपकते ही बिखर गईं. एक दिन रजनी बारिश में भीगते कपड़ों को समेटने गई और फिसल कर गिर पड़ी. अंदरूनी चोट इतनी गहरी थी कि लाख कोशिशों के बावजूद डाक्टर मां और बच्चे में से किसी को नहीं बचा सके.

रजनी की मौत के बाद धीरेन दा ने किसी भी स्त्री के लिए अपने दिल के दरवाजे हमेशाहमेशा को बंद कर लिए. अब उन के जीने का मकसद सिर्फ और सिर्फ सोमेन था. अब वह सोमेन की नींद सोते और जागते थे. उस की हर जरूरत का ध्यान रखना, उसे खुश रखना और उस के विकास के बारे में चिंतनमनन करना ही जैसे उन का एकमात्र ध्येय रह गया था. कंप्यूटर इंजीनियरिंग की पढ़ाई खत्म होते ही जब सोमेन को एक बड़ी इंटरनेशनल कंपनी में नौकरी मिल गई तो सोमेन से कहीं ज्यादा खुशी धीरेन दा को हुई. सोमेन के प्रति उन की बस आखिरी जिम्मेदारी बाकी रह गई थी और वह जिम्मेदारी थी सोमेन की शादी.

साल भर बाद धीरेन दा ने अपने मित्र रमेशजी की मदद से आखिर रूपल जैसी गुणवती, सुंदर और मासूम लड़की को अपने अनुज के लिए तलाश ही लिया. रूपल के रूप में उन्हें एक बेटी का ही रूप नजर आता. रूपल थी भी इतनी प्यारी और नेकदिल कि सोमेन और धीरेन दा के दिलों में बसने के लिए उसे जरा भी वक्त नहीं लगा. सबकुछ ठीक चल रहा था. रूपल को कुछ अखरता था तो वह धीरेन दा का सोमेन को ले कर जरूरत से ज्यादा पजेसिव होना. भाई के प्यार में वह इस कदर डूबे हुए थे कि अकसर रूपल की उपस्थिति को नजरअंदाज कर जाते. वह भूल जाते कि उन की तरह रूपल भी सुबह से सोेमेन का इंतजार कर रही है. पति को देखने को व्याकुल उस नवविवाहिता की आंखें शाम से ही दरवाजे पर टिकी हुई हैं.

सोमेन भी घर आते ही रूपल को बांहों में ले कर प्यार की बौछार कर देने को आतुर रहता पर घर में प्रवेश करते ही धीरेन दा को अपना इंतजार करते बैठा देखता तो मर्यादा के तहत मन को वश में कर वहीं बैठ जाता और उन से वार्तालाप में मस्त हो जाता. बीच में कभी कपड़े बदलने के बहाने से तो कभी बाथरूम जाने के बहाने से अंदर जा कर झुंझलाईबौखलाई रूपल पर ऐसे तेज गति से चुंबनों की झड़ी लगा देता कि रूपल सारा गुस्सा भूल कर कह उठती, ‘‘अब बस भी करो मेरे सुपर फास्ट राजधानी एक्सप्रेस, बाहर भैया चाय के लिए प्रतीक्षा कर रहे हैं.’’ फिर दोनों भाई शतरंज खेलते. इस बीच खाना बना कर रूपल बेमन से टीवी का चैनल बदलती रहती. कभी सोमेन आवाज लगाता तो चाय या पानी दे जाती. उस की मनोस्थिति से सर्वथा अनजान धीरेन दा शतरंज की बिसात पर नजरें जमाए हुए कहते, ‘‘रूपल, तुम भी शतरंज खेलना सीख जाओ तो मजा आ जाए.’’

‘‘जी दादा, सीखूंगी,’’ संक्षिप्त सा उत्तर दे कर वह वापस अंदर की ओर मुड़ जाती. तब सोमेन का मन शतरंज छोड़ कर उठ जाने को करता. वह चाहता कि रूठी हुई रूपल को हंसाए, गुदगुदाए पर दादा का एकाकीपन अकसर उस के मन पर अंकुश लगा देता. रात को अपने अंतरंग क्षणों में वह रूपल को मना लेता और समझा भी देता कि धीरेन दा ने सिर्फ मेरे लिए अपनी सारी खुशियों की आहुति दे दी. अब हमारे किसी काम से उन्हें यह एहसास नहीं होना चाहिए कि हम उन की परवा या कद्र नहीं करते. रूपल ने भी धीरेधीरे यह सोच कर नाराज होना छोड़ दिया कि जब बच्चे हो जाएंगे तब सब ठीक हो जाएगा पर वैसा कुछ हुआ नहीं. पिंकी व बंटी के होने के बाद भी धीरेन दा की वजह से सोमेन रूपल को वक्त नहीं दे पाता.

यों ही और 8 साल बीत गए. अब तो पिंकी 10 और बंटी 8 साल के हो गए थे. अगर बच्चे कहते, ‘‘पापा, हमें किसी बच्चों के पार्क में या चिडि़याघर दिखाने ले चलिए,’’ तो सोमेन का जवाब होता कि बेटे, हम वहां जाएंगे तो ताऊजी अकेले हो जाएंगे.

‘‘तो फिर ताऊजी को भी साथ में ले चलिए न,’’ पिंकी ठुनकती हुई कहती. इस पर सोमेन प्यार से उसे समझाते हुए कहता, ‘‘बेटे, इस उम्र में ज्यादा चलनाफिरना ताऊजी को थका देता है. हम फिर कभी जाएंगे,’’ और वह दिन बच्चों के लिए कभी नहीं आया था.

यह सब देखसुन कर रूपल कुढ़ कर रह जाती. उस ने अपनी सारी इच्छाएं दफन कर डालीं पर अब बच्चों के चेहरों पर छाई मायूसी उस के मन में धीरेन दा के लिए आक्रोश भर देती. इन सब का परिणाम यह हुआ कि धीरेधीरे रूपल के व्यवहार में अंतर आने लगा और बोली में भी कड़वापन झलकने लगा.

धीरेन दा कुछ महीनों से रूपल के व्यवहार में आए परिवर्तन को देख रहे थे पर बहुत सोचने पर भी उस की तह तक नहीं पहुंच पाए. अंत में हार कर उन्होंने अपने मित्र रमेश से परामर्श करने की सोची. रमेश से उन का कोई दुराव- छिपाव न था. एक बार फिर रमेश ने उन्हें मर्यादा और व्यावहारिक ज्ञान से रूबरू कराया. रमेश ने धीरेन दा की कही हरेक बातें ध्यान से सुनीं और उन से उन के और घर के हर सदस्यों की दिनचर्या के बारे में विस्तार से जानकारी हासिल की, फिर थोड़ी देर के लिए खामोश हो गए. पल भर के मौन के बाद धीरेन दा को समझाने के लहजे में बोले, ‘‘देख, धीरेन, ऐसा नहीं है कि रूपल अब तुम्हें बड़े भाई का मान नहीं देती. पर मेरे यार, तुम एक बात भूल गए कि कोई भी इनसान किसी एक का नहीं होता.

‘‘सोमेन की शादी से पहले की बात और थी. तब तुम्हारे सिवा उस का कोई नहीं था लेकिन विवाह के बाद वह किसी का पति और किसी का पिता बन गया. तुम्हारी ही तरह पिंकी, बंटी और रूपल को सोमेन से विभिन्न अपेक्षाएं हैं जो वह सिर्फ इसलिए पूरी नहीं कर पा रहा कि कहीं तुम स्वयं को उपेक्षित न समझ बैठो. उलटे तुम्हें हमेशा खुश रखने के प्रयास में वह न तो अच्छा पति साबित हो रहा है और न ही एक अच्छा पिता. हर रिश्ता एक मर्यादा और सीमारेखा से बंधा होता है जिस का अतिक्रमण बिखराव और ऊब की स्थिति ला देता है. ‘‘मेरे यार, अनजाने ही सही, तुम भी रिश्तों की सीमारेखा को लांघने लगे हो. माना कि तुम्हारी नीयत में कोई खोट नहीं पर कौन सी ऐसी पत्नी होगी जो कुछ वक्त अपने पति के साथ अकेले बिताना नहीं चाहेगी या फिर कौन से बच्चे अपने पापा के साथ कहीं घूमने नहीं जाना चाहेंगे. कहते हैं न, जब आंख खुली तभी सवेरा समझो. अब भी देर नहीं हुई है. तुम्हारे घर की खोती हुई खुशियां और रूपल की निगाहों में तुम्हारे प्रति सम्मान फिर से वापस आ सकता है. बस, तुम अपने और सोमेन के रिश्ते को थोड़ा विस्तृत कर लो. खुले मन से अपने साथ रूपल और बच्चों को समाहित कर लो…’’

सहसा धीरेन दा के चेहरे पर एक चमक आ गई और वह रमेशजी को बीच में ही टोकते हुए बोले, ‘‘बस यार, मेरी आंखें खोलने के लिए तुम्हारा बहुतबहुत धन्यवाद. अब मैं चलता हूं, पहले ही बहुत देर हो चुकी है…अब मैं और देर नहीं करना चाहता,’’ फिर तेजतेज कदमों से वह घर की ओर चल पड़े मानो भागते हुए समय को खींच कर पीछे ले जाएंगे. रमेशजी ने जाते हुए अपने मित्र को और रोकना उचित नहीं समझा और मुसकरा पड़े.

अगले दिन रविवार था. सालों के नियम को भंग करते हुए धीरेन दा अकेले ही सुबहसुबह कहीं गायब हो गए. रूपल की नींद खुली तो सुबह के 8 बज रहे थे. वह उठ कर पूरे घर का एक चक्कर लगा आई. बाहर का दरवाजा भी यों ही उढ़का हुआ था. घबरा कर उस ने सोमेन को जगाया, ‘‘सुनोसुनो, जल्दी उठो, 8 बज गए हैं और दादा का कहीं पता नहीं है. दरवाजा भी खुला हुआ है.’’ सोमेन घबरा कर उठ बैठा. बच्चे भी मम्मीपापा के बीच का होहल्ला सुन कर जाग गए. सब मिल कर सोचने लगे कि धीरेन दा कहां जा सकते हैं? आखिर 10 बजे घर के बाहर आटो रुकने की आवाज आई. पिंकी व बंटी दरवाजे से बाहर झांक कर चिल्लाए, ‘‘ताऊजी आ गए, ताऊजी आ गए.’’

सोमेन और रूपल ने चैन की सांस ली. धीरेन दा के घर में घुसते ही रूपल ने सवालों की झड़ी लगा दी, ‘‘दादा, आप कहां चले गए थे? कह कर क्यों नहीं गए? हम से नाराज हैं क्या? क्या हम से कोई गलती हो गई?’’

धीरेन दा मुसकराते हुए बोले, ‘‘अरे, नहीं बेटा, ऐसी कोई बात नहीं है. मैं तो अपनी गलती सुधारने गया था.’’ कुछ न समझने की स्थिति में सोमेन और रूपल एकदूसरे का मुंह देखने लगे.

धीरेन दा बोले, ‘‘अरे, बाबा, मैं तुम लोगों को सरप्राइज देना चाहता था इसलिए ‘सिंह इज किंग’ की 2 टिकटें लाया हूं. आइनोक्स में यह फिल्म लगी है, आज तुम दोनों देख आना.’’ रूपल की आंखें आश्चर्य और खुशी से भर गईं. आज तक उसे आइनोक्स में फिल्म देखने का मौका जो नसीब नहीं हुआ था. वह तो कहीं भी आनेजाने की उम्मीद ही छोड़ बैठी थी.

‘‘पर दादा, बच्चे और आप…’’ ‘‘उस की तुम चिंता मत करो. हम तीनों आज ‘एडवेंचर आइलैंड’ जाएंगे, बाहर खाना खाएंगे और खूब मस्ती करेंगे. क्यों बच्चो?’’

‘‘दादाजी, आप कितने अच्छे हैं?’’ यह कहते हुए दोनों बच्चे धीरेन दा के पैरों से लिपट गए तो धीरेन दा भावुक हो उठे. Hindi Family Story :

Hindi Family Story : पड़ोसिन – पति की बात सुनकर सुधा क्यों घबराई ?

Hindi Family Story : रविवार को सुबह ही घर की घंटी ने हम सब को जगा दिया. मैं दरवाजा खोलने के लिए उठने लगी तो पति ने कहा, ‘‘रुको, मैं देखता हूं. हो सकता है अखबार वाला हिसाब लेने आया हो. उस की खबर लेता हूं. महीने में 5-6 दिन पेपर नहीं डाला उस ने. ’’

पति अखबार वाले को कोसते हुए दरवाजा खोलने चले गए. मैं ने फिर चादर से मुंह ढक लिया.

‘‘सुधासुधा, जरा बाहर आना,’’ पति की आवाज सुन कर मैं चादर को एक ओर फेंक कर जल्दी से बाहर आ गई. दरवाजे पर सीमा को खड़ी देख मुझे अजीब लगा.

‘‘भाभीजी, आप अब तक सो रही हैं? चलो जाने दो. यह देखो मैं आप सब के लिए इडलीसांभर बना कर लाई हूं,’’ कह कर सीमा ने 2 बड़े बरतन मेरी ओर बढ़ा दिए. न चाहते हुए भी मुझे बरतन पकड़ने पड़े.

‘‘अच्छा भाभीजी मैं चलती हूं,’’ कह कर सीमा चली गई.

‘‘क्या बात है सुधा… नई पड़ोसिन से अच्छी बन रही है तुम्हारी …थोड़े दिन पहले कोफ्ते और आज इडलीसांभर …बढि़या है,’’ पति ने अखबार के पन्ने पलटते हुए कहा, पर मैं मन ही मन कुढ़ रही थी.

सीमा को हमारे पड़ोस में आए अभी 1 महीना ही हुआ है, पर वह हर किसी से कुछ ज्यादा ही खुलने की कोशिश करती है खासकर मुझ से, क्योंकि हम आमनेसामने के पड़ोसी थे. इसीलिए वह बिना बताए बिना बुलाए किसी भी वक्त मेरे घर आ धमकती, कभी कुछ देने तो कभी कुछ लेने. हम पिछले 5 सालों से यहां रह रहे हैं. इस कालोनी में सब अपने में मस्त रहते हैं. किसी को किसी से कोई लेनादेना नहीं. बस कभीकभार महिलाओं की किट्टी पार्टी में या फिर कालोनी के पार्क में शाम को मिल जाते हैं. इतने सालों में मैं शायद ही कभी किसी के घर गई हूं. इसीलिए सीमा की यह आदत आजकल चर्चा का विषय बनी हुई थी.

रविवार को सारा दिन आराम करने में निकल गया. शाम को बच्चों ने पार्क चलने को कहा तो पति भी तैयार हो गए. बच्चे और मेरे पति फुटबौल खेलने में व्यस्त हो गए, तो मैं कालोनी की महिलाओं के साथ बातों में लग गई.

‘‘और सुधाजी, आप की पड़ोसिन के क्या हालचाल हैं… यार, सच में कमाल की औरत है. आज सुबहसुबह आ कर इडलीसांभर दे गई… सारी नींद खराब कर दी हम सब की,’’ कह हमारे घर से 4 मकान छोड़ कर रहने वाली एकता ने बुरा सा मुंह बनाया.

‘‘अरे अच्छा ही हुआ जो इडली दे गई. मेरी नाश्ता बनाने की छुट्टी हो गई,’’ पड़ोसिन सविता हंसते हुए बोली.

‘‘अरे बरतन देखे थे …आज स्टील के बरतन कौन इस्तेमाल करता है? हमारी तो सारी क्रौकरी विदेशी है… बच्चे तो स्टील के बरतन देखते ही चिढ़ गए,’’ एकता बोली.

आजकल कालोनी में जब भी महिलाओं का ग्रुप कहीं एकसाथ नजर आए तो समझ लीजिए सीमा ही चर्चा का विषय होगी. कमाल है यह सीमा भी.

तभी सामने से सीमा आती दिखी तो एकता दबी जबान में बोली, ‘‘देखो तो जरा इसे… इस का दुपट्टा कहीं से भी सूट से मेल नहीं खा रहा… कैसी गंवार लग रही है यह.’’

‘‘क्या हाल हैं भाभीजी… आप सब को इडली कैसी लगी?’’ सीमा ने बहुत उत्साह से पूछा.

‘‘अरे, कमाल का जादू है तुम्हारे हाथों में सीमा… बहुत अच्छा खाना बना लेती हो तुम…’’ सब ने एक ही सुर में सीमा की तारीफ की. फिर थोड़ी देर बाद उस के जाने पर सभी उस का मजाक उड़ाते हुए हंसने लगीं.

कुछ दिन बाद कालोनी के शादी के हौल में एकता ने अपने बेटे का जन्मदिन मनाया. हर कोई बनठन कर पहुंचा. सीमा इतनी चटक रंग की साड़ी और इतने भारी गहने पहन कर आई गोया किसी शादी में आई हो. फिर एक बार वह सब के बीच मजाक का पात्र बन गई. आए दिन कालोनी में उस का या उस के पति का यों ही मजाक उड़ता. पूरी कालोनी की कारें साफ करने के लिए हम सब ने मिल कर 2 लोगों को रखा हुआ था. पर सीमा का पति दिन में 2-3 बार खुद अपनी कार साफ करता था. आए दिन कालोनी में सीमा का मजाक उड़ता और मैं भी उस में शामिल होती. हालांकि सीमा की काफी बातें मुझे अच्छी लगतीं पर कहीं सब इस की तरह मेरा भी मजाक न उड़ाएं, इसलिए मैं उस से दूरी बनाए रखती.

कुछ दिन बाद मेरी बूआ सास को दिल का दौरा पड़ा. उन्हें अस्पताल में दाखिल कराया गया. देवर का फोन आते ही मैं और मेरे पति अस्पताल भागे. वहां हमें काफी समय लग गया. मैं ने घड़ी देखी तो खयाल आया कि बच्चे स्कूल से आते ही होंगे. जल्दबाजी में मैं चाबी चौकीदार को देना भूल गई. मुझे उसे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं. मैं ने एकता को फोन किया तो वह बोली कि यार सौरी मुझे शौपिंग के लिए जाना है. अभी घर पर ताला ही लगा रही थी और उस ने फोन काट दिया. एकता के अलावा मेरे पास और किसी का फोन नंबर नहीं था. मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा था कि इतने सालों में मैं ने किसी का फोन नंबर लेने की भी कोशिश नहीं की. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं. फिर मैं ने इन से कार की चाबी ली और घर चल दी. रास्ते में जाम ने दुखी कर दिया. घर पहुंचतेपहुंचते काफी देर हो गई.

सोच रही थी कि बच्चे 1 घंटे से दरवाजे पर खड़े होंगे. खुद पर बहुत गुस्सा आ रहा था. कार पार्क कर के घर पहुंची तो दरवाजे पर बच्चे नहीं थे. मैं घबरा उठी कि बच्चे कहां जा सकते हैं. पति को फोन मिलाने लगी तो देखा कि किसी अनजान नंबर से 4 मिस कालें आई थीं और 1 मैसेज भी था कि मम्मी आप, फोन क्यों नहीं उठा रहीं… हम सीमा आंटी के घर में हैं. मैसेज पढ़ कर मेरी जान में जान आई. मैं सीमा के घर पहुंची तो बच्चे खाना खा कर टीवी देख रहे थे.

‘‘अरे भाभी, आप कहां चली गई थीं? बच्चे स्कूल से आ कर घंटी बजा रहे थे, तो मैं यहां ले आई. भाभी, आप मुझे बोल जातीं तो जल्दी घर नहीं आना पड़ता… अच्छा जाने दो… 1 मिनट रुको,’’ कह सीमा अंदर जा कर एक डब्बा ले आई. बोली, ‘‘भाभी, आप थक गई हैं… इस में सब्जीरोटी है. आप खा कर आराम कर लेना.’’

मैं उसे थैंक्यू कह कर बच्चों को ले कर घर आ गई. बच्चे कपड़े बदल कर पढ़ने बैठ गए. मैं मेज पर रखे डब्बे को देख रही थी. स्टील का डब्बा बिलकुल वैसा जैसा हम स्कूल ले कर जाते थे… मुझे याद है कि जब मां घर नहीं होती थीं, तो हम अपने पड़ोसी के घर खाना खा लेते थे और अगर मां को देर से आना होता था तो वहीं सो भी जाते थे. कभी घर मेरी पसंद की सब्जी नहीं बनी होती थी, तो साथ वाली लीला चाची के घर जा कर खाना खा आती थी. कभी मां या पिताजी की तबीयत ठीक नहीं होती थी तो लीला चाची, कमला मौसी हमारा घर संभाल लेती थीं. मां अकसर कहती थीं कि सुधि हारी बीमारी में रिश्तेदारों से पहले पड़ोसी काम आते हैं. पर अब देखो कालोनी में अगर कोई मर भी जाए तो उस का पता भी कालोनी के नोटिस बोर्ड से चलता है. मैं ने एक ठंडी सांस ली और डब्बा खोल कर खाना खा लिया.

अगले दिन बच्चों के स्कूल जाने से पहले मैं उन को सीमा के घर ले गई और बोली, ‘‘देखो बच्चों स्कूल से सीधा सीमा मौसी के घर आना …और सीमा बच्चो का खयाल रखना. मुझे आज अस्पताल में देर हो जाएगी.’’ मेरी बात सुन कर सीमा के चेहरे पर खुशी के भाव आ गए, तो मेरे पर संतोष के. Hindi Family Story :

Hindi Family Story : बिन तुम्हारे – नीपा को भी यह तय करना है कि वह किस तरफ मुड़े

Hindi Family Story : ‘‘ममा, लेकिन आप यह कैसे कह सकती हो कि आजकल के बच्चे पेरैंट्स के प्रति गैरजिम्मेदार हैं. किसी को चाहने का मतलब यह तो नहीं कि बच्चे पेरैंट्स के प्रति जिम्मेदार नहीं हैं. लव अफेयर्स उन की जिंदगी का एक हिस्सा है, पेरैंट्स अपनी जगह हैं. ‘‘पेरैंट्स को जिन बातों से दुख पहुंचता है, बच्चे वही करें और कहें कि वे जिम्मेदार हैं.’’

‘‘ममा, पेरैंट्स की पसंदनापसंद पर बच्चे क्या खुद को वार दें? पेरैंट्स को भी हर वक्त अपनी पसंदनापसंद बच्चों पर नहीं थोपनी चाहिए.’’ ‘‘अभी तू ने अपनी जिस फ्रैंड की बात की, उसी की सोचो, 19 साल की लड़की और लड़का भी 19 साल का, पेरैंट्स ने उन्हें बड़ी उम्मीदों से होस्टल भेजा कि पढ़ कर वे कैरियर बनाएं. अब दोनों अपने पेरैंट्स से झूठ बोल कर अलग फ्लैट में साथ रह रहे हैं. कोर्स किसी तरह पूरा कर भी लें तो क्या दिलदिमाग के भटकाव की वजह से बढि़या कैरियर बन पाएगा उन का? उम्र का यह आकर्षण एक पड़ाव के बाद जिंदगी के कठिन संघर्ष के सामने हथियार डालेगा ही, उस वक्त बीते हुए ये साल उन्हें बरबाद ही लगेंगे.’’

‘‘लगे भी तो क्या ममा? अभी वे खुश हैं तो क्यों न खुश हो लें? आगे की जिंदगी किस ने देखी है ममा.’’ ‘‘यानी जो लोग भविष्य को संवारने के लिए मेहनत करते हैं वे मूर्ख हैं.’’

‘‘हो सकते हैं या नहीं भी, सवाल है किसे क्या चाहिए.’’ नीपा अपनी बेटी रूबी की दलीलों के आगे पस्त पड़ गई थी. बेटी ने अपनी सहेली की घटना सुनाई तो उसे भी रूबी की चिंता सताने लगी. वह भी तो उसी पीजी में रहती है. उस के अनुसार अब ऐसा तो अकसर हो रहा है. जाने क्या इसे लिवइन कह रहे हैं सब. पेरैंट्स बिना जाने बच्चों की फीस, बिल सबकुछ चुकाते जा रहे हैं और बच्चे अपनी मरजी के मालिक हैं.

नीपा को इतना तनाव, इतना भय क्यों सताने लगा है. किस बात की आशंका है, क्यों दिल घबरा रहा है? रूबी अपनी अलग स्ट्रौंग सोच रखती है इसलिए? या इसलिए कि गरमी की छुट्टियों में घर आ कर रूबी ने ममा के दिमाग को भरपूर रिपेयर करने की कोशिश की. नीपा क्यों बेटी के चेहरे को बारबार पढ़ने की कोशिश कर रही है? अपने पति अनादि से वह कुछ कहना चाहती है पर चुप हो जाती है. कहीं रूबी ने खुद की सिचुएशन का ही सहेली के नाम से… नहींनहीं, उस ने अपनी बेटी को बड़े अच्छे संस्कार दिए हैं, वह अपनी मां को इस तरह दुख नहीं दे सकती. 3-4 दिनों से रूबी से बात नहीं हो पा रही थी. वीडियो कौल तो उस ने बंद ही कर दी थी जाने कितने महीनों से. फोन में गड़बड़ी की बात कह कर टाल जाती. अब इतने दिन खोजखबर न मिलने पर नीपा की बेचैनी बढ़ गई. अनादि से सारी बातें कहनी पड़ीं उसे. उन्होंने पीजी की एक लड़की को फोन किया. पता चला, कालेज में 4 दिनों की छुट्टी देख रूबी दोस्तों के साथ कहीं घूमने गई है, इसलिए फोन पर बात नहीं हो सकती रूबी से.

मामला जटिल देख दोनों दूसरे शहर में रह रही बेटी के पीजी पहुंचे. पर बेटी वहां कहां. वह तो किसी लड़के के साथ एक फ्लैट किराए पर ले कर रहती है. लड़का उसी की क्लास का है. अनादि स्तब्ध थे और नीपा का सिर चकरा गया. धम्म से नीचे जमीन पर बैठ गई. उबकाई से बेहोशी सी छाने लगी थी उस पर. दिल की धड़कनें चीख रही थीं बेसुध.

अब क्या? बेटी के पास उन्हें जाना था. बेटी के बिना या बेटी के इन कृत्यों के बिना? इकलौती बेटी के बिना जी पाना तो इन दोनों के लिए बहुत मुश्किल था. बेटी की उमंगें अभी आजादी की दलीलों के बीच पंख झपट रही हैं, वह तो पीछे नहीं मुड़ेगी. ममापापा बेटी के पास पहुंचे तो रूबी ने न ही उन की आंखों में देखा और न ही दिल ने दिल से बात करने की कोशिश की.

नीपा ने खुद को समझाया. वक्त की मांग थी, वरना उन की आंखों की ज्योति आज इस तरह आंखें फेर ले…लड़का निहार भी वहीं था. उन्हें तो उस में ऐसा कुछ भी नहीं दिखा जो रूबी ने उस में देखा था. हो सकता है नीपा न देख पा रही हो. फिर समझाया खुद को उस ने. भविष्य क्या? ‘‘आगे चल कर शादी करोगे बेटा रूबी से? कुछ सोचा है?’’

‘‘ममा, आगे देखना बंद करें आप. आज में जीना सीखें यही काफी है. अभी हम पढ़ते हुए पार्टटाइम जौब भी करेंगे. आप अगर हमारी मदद करेंगे तो हम आप से जुड़े रहेंगे. निहार ने भी घर वालों को बता दिया है. मजबूरी हो गई तो पढ़ाई छोड़ देंगे. अभी हम साथ ही रहेंगे जब तक जमा. अब आप की मरजी.’’ नीपा की आंखों में धुंधलका सा छाने लगा. ये आंसू थे या दर्द का सैलाब? वह कुछ समझ नहीं पा रही थी. बस, इतना ही समझ पाई कि बेटी से दोनों को बेइंतहा प्यार है. और इस प्यार के लिए उन्हें किसी शर्त की जरूरत नहीं थी. Hindi Family Story :

Hindi Family Story : वो कोना – क्यों काले हो गए नीरा की जिंदगी के कुछ पुराने पन्ने ?

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