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Bihar SIR Issue: बिहार में एसआईआर से क्यों परेशान हुए बंगाली मुसलिम?

Bihar SIR Issue: पश्चिम बंगाल में मुसलिम जोड़ों द्वारा स्पैशल मैरिज एक्ट के तहत शादी के रजिस्ट्रेशन में अचानक बढ़ोतरी दर्ज की गई है. यह बिहार की तर्ज पर बंगाल में होने वाले एसआईआर की वजह से पैदा हुई चिंताओं का नतीजा है. कई मुसलिम जोड़े अब काजी से निकाह का रजिस्ट्रेशन करवाने की बजाय सरकारी सर्टिफिकेट को प्राथमिकता दे रहे हैं.

ताज़ा आंकड़ों के अनुसार पश्चिम बंगाल में उन मुसलिम जोड़ों की संख्या तेजी से बढ़ी है जो अपनी शादी को स्पैशल मैरिज एक्ट 1954 के तहत रजिस्टर करा रहे हैं. आम तौर पर यह कानून अलग धर्मों के विवाह या सिविल मामलों के लिए इस्तेमाल किया जाता है लेकिन अब बड़ी संख्या में एक ही धर्म के मुसलिम जोड़े भी इसी कानून का सहारा ले रहे हैं.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, नवंबर 2024 से अक्टूबर 2025 के बीच राज्यभर में 1130 मुसलिम जोड़ों ने स्पैशल मैरिज एक्ट की धारा 16 के तहत आवेदन दिया. इन में से 609 आवेदन जुलाई से अक्तूबर 2025 के बीच आए यानी ठीक उसी समय जब बिहार में वोटर लिस्ट की विशेष जांच चल रही थी.

बंगाल में मुसलिम शादियां ‘बंगाल मुहम्मदान मैरिजेज एंड डिवोर्सेस रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1876’ के तहत रजिस्टर्ड होती हैं जिन में सरकारी तौर पर नियुक्त काजी या मुसलिम मैरिज रजिस्ट्रार रजिस्ट्रेशन करता है. यह प्रमाणपत्र कानूनी रूप से मान्य होता है, लेकिन इस में पता और पहचान से जुड़ी जानकारी अकसर अधूरी रहती है. इसी वजह से कई संस्थान इसे पहचान प्रमाण के तौर पर कमजोर मानते हैं. इसके उलट, स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत जारी सर्टिफिकेट में पता, पहचान और नागरिकता से जुड़े डिटेल्स बेहद औथेंटिक और स्पष्ट रहते हैं. Bihar SIR Issue.

Patanjali Ads Case: विज्ञापन में बाबा रामदेव का झूठ… हाईकोर्ट बोला, “विज्ञापन हटाओ”

Patanjali Ads Case: पतंजलि के स्पैशल च्यवनप्राश के एड में ‘चलो, धोखा खाओ’ जैसे कैची फ्रेज इस्तेमाल किए गए थे. इस एड में बाबा रामदेव ये कहते दिख रहे हैं कि ‘ज्यादातर लोग च्यवनप्राश के नाम पर धोखा खा रहे हैं’ पतंजलि के इस भ्रामक विज्ञापन के खिलाफ डाबर इंडिया ने हाईकोर्ट में शिकायत अपील की थी. कोर्ट ने इस विज्ञापन को देखा और कहा कि ये दूसरे प्रोडक्ट्स को फेक या कमतर दिखाने की कोशिश है. डाबर का च्यवनप्राश भी इस में आ जाता है, जो अनफेयर है.

डाबर का आरोप था कि पतंजलि अपने विज्ञापन में डाबर के च्यवनप्राश को ‘सामान्य’ और आयुर्वेद की परंपरा से दूर बता कर प्रोडक्ट की छवि को नुकसान पहुंचा रहा है. इस विज्ञापन में स्वामी रामदेव खुद यह कहते नजर आते हैं कि जिन्हें आयुर्वेद और वेदों का ज्ञान नहीं वे च्यवनप्राश कैसे बना सकते हैं?

एक आम आदमी की नजर से देखें तो ये एड इम्प्रेशन क्रिएट करता है कि दूसरे प्रोडक्ट्स सिर्फ धोखा हैं. हाईकोर्ट ने पतंजलि को 72 घंटों में इस एड को नैशनल टीवी चैनल्स, स्ट्रीमिंग प्लेटफौर्म्स, डिजिटल, प्रिंट मीडिया और सोशल मीडिया अकाउंट्स, फेसबुक, यूट्यूब और इंस्टाग्राम जैसे सभी शोशल प्लेटफौर्म से हटाने का निर्देश दिया.

जस्टिस तेजस करिया की बेंच ने कहा कि आप तुलना करने वाला विज्ञापन चला सकते हैं, लेकिन दूसरों को नीचा दिखाने वाला या गलत और भ्रामक स्टेटमेंट्स नहीं चलेंगे. पतंजलि के विज्ञापन पर यह रोक फरवरी 2026 तक लागू रहेगी.

डाबर और पतंजलि के बीच च्यवनप्राश मार्केट में काफी समय से टेंशन चल रही है. डाबर करीब 60% हिस्सेदारी के साथ इस सेगमेंट में मार्केट लीडर है, जबकि पतंजलि ने हाल ही में अपना स्पैशल च्यवनप्राश लौन्च किया. डाबर का कहना है कि पतंजलि का एडवर्टाइजमेंट न सिर्फ उन के प्रोडक्ट को बुरा दिखाता है, बल्कि पूरे च्यवनप्राश कैटेगरी को ‘धोखा’ कह कर उन की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है. ये केस कमर्शियल डिस्पैरेजमेंट का है, जहां एक कंपनी दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश करती है.

इस केस की अगली सुनवाई 26 फरवरी 2026 को होगी. तब मेरिट्स पर आर्ग्युमैंट्स होंगे और परमानेंट रिलीफ मिल सकता है. यह केस इंडस्ट्री के लिए बेंचमार्क सेट कर सकता है, जहां ब्रांड्स एकदूसरे को टारगेट करते हैं. डाबर को राहत मिली है, लेकिन पतंजलि अपील कर सकता है. मार्केट में च्यवनप्राश सेल्स पर असर पड़ेगा, क्योंकि कंज्यूमर्स अब विज्ञापनों पर ज्यादा सतर्क होंगे.

इस तरह के भ्रामक विज्ञापन और प्रचार पर बाबा रामदेव को पहले भी कोर्ट से फटकार लग चुकी है लेकिन अपनी दुकानदारी के लिए बाबा रामदेव लगातार ऐसे दुष्प्रचार करते आए हैं. अगस्त 2022 में इंडियन मैडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी तब आरोप लगे थे कि पतंजलि कोविड और दूसरी बीमारियों के इलाज के झूठे दावे कर रही है.

नवंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने पतंजलि को भ्रामक विज्ञापनों पर रोक लगाने का आदेश दिया, लेकिन आदेश के बाद भी कंपनी ने प्रचार जारी रखा.

27 फरवरी 2024 को कोर्ट ने पतंजलि को फिर फटकार लगाई और बाबा रामदेव-आचार्य बालकृष्ण को व्यक्तिगत रूप से हाजिर होने का आदेश दिया. मार्च-अप्रैल 2024 में कोर्ट ने अवमानना की कार्रवाई की. 2025 में बाबा रामदेव और बालकृष्ण ने कोर्ट में माफीनामा दिया तब कोर्ट ने केस बंद किया. Patanjali Ads Case.

Red Fort Incident: चौकस व्यवस्था की पोल खोलता लाल किला धमाका

Red Fort Incident: 10 नवम्बर की शाम दिल्ली में हुए आतंकी बम ब्लास्ट से पूरा देश दहल गया. धमाका लालकिला के नजदीक बने मेट्रो स्टेशन के पास हुआ. इस आतंकी हमले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

10 नवम्बर की शाम 6.52 पर दिल्ली के लाल किले के पास मेट्रो स्टेशन के गेट न. 1 के सामने भीड़ भरी सड़क पर विस्फोटकों से भरी हुंडई आई-20 कार में हुआ धमाका इतना भयावह था कि उस के 100 मीटर के दायरे में आने वाले तमाम वाहनों के परखच्चे उड़ गए. सड़क पर गाड़ियां और अन्य वाहन धूंधूं कर जल उठे. लाल किले के समीप ट्रैफिक लाइट पर रुकने के बाद उस कार में अचानक विस्फोट हुआ था. इस धमाके में 13 लोग मारे गए और दो दर्जन से ज्यादा घायल हो कर अस्पताल में पड़े हैं. विस्फोट इतना जबरदस्त था कि आसपास के भवनों की खिड़कियां टूट गईं. पुलिस के मुताबिक उस कार में 3 लोग सवार थे जिन के शरीर के चीथड़े उड़ गए. यह भारत पर हुआ एक और फिदायीन हमला था, जिस को आतंकी हमला घोषित करने में मोदी सरकार को 48 घंटे का समय लग गया. जबकि पिछले पहलगाम हमले के बाद औपरेशन सिंदूर चलाने वाली मोदी सरकार ने कहा था कि अब यदि कोई आतंकी हमला भारत पर हुआ तो उसे युद्ध के रूप में देखा जाएगा और पाकिस्तान इस के लिए तैयार रहे.

हैरानी की बात यह है कि चौकीदार सरकार के तमाम चौकन्नेपन के बाद भी भारत में आतंकवाद रुकने का नाम नहीं ले रहा है. और इस बार तो आतंकी कोई बाहर से आए लोग नहीं, बल्कि अपने ही देश के लोग है, जो पढ़ेलिखे, डाक्टर-इंजीनियर की डिग्री लिए हुए हैं और बकायदा देश के अनेक संस्थानों में कार्यरत हैं. घटना के बाद जो लोग पकड़े जा रहे हैं उन में कोई फरीदाबाद में डाक्टर है, कोई कानपुर में, कोई जम्मू-कश्मीर में तो कोई लखनऊ में. इन के घरों से भारी मात्रा में विस्फोटक सामग्री और हथियार बरामद हुए हैं. हद तो यह है कि देश में सालों से चल रहे कई मैडिकल शिक्षण संस्थानों के नाम भी आतंकवाद की पैदावार तैयार करने में सामने आ रहा है.

क्या हमारी इंटेलिजेंस एजेंसियों, लोकल पुलिस, लोकल इंटेलिजेंस और सरकार पर सवाल नहीं उठने चाहिए? तीनतीन टन विस्फोटक और हथियार आतंकी डाक्टरों के घरों से बरामद हुआ, आखिर इतनी चौकन्नी सरकार के होते हुए इतना बड़ा जखीरा उन के घरों तक यह पहुंचा कैसे? खैर, मोदी सरकार तो आज तक उस सवाल का जवाब भी नहीं दे पाई कि 14 फरवरी 2019 को पुलवामा में सीआरपीएफ जवानों को ले जा रही बस पर हुए हमले में भारी मात्रा में प्रयुक्त विस्फोटक वहां तक कैसे पहुंचा?

देश में हुए हर आतंकी हमले में बेक़सूर गरीब जनता मारी जाती है और अनेक घायल हो कर लम्बे समय तक अपने खर्चे पर अस्पताल में पड़े रहते हैं. लोगों के अंगभंग हो जाते हैं. कितनों के घर उजड़ जाते हैं. बच्चे अनाथ हो जाते हैं. औरतें विधवा हो जाती हैं. मांबाप अपने जिगर के टुकड़ों को खो कर हमेशा के लिए बेबस और हताशा की जिंदगी में कैद हो जाते हैं. आतंकी हमलों में मरने वाले हिंदू भी होते हैं और मुसलमान भी.

इस बार के धमाके में भी हिंदू और मुसलमान दोनों कौमों के लोग मारे गए. मरने वालों में अधिकांश लोग अपने घर के अकेले कमाने वाले थे. वे जो किसी दुकान में काम करते थे, रिक्शा चलाते थे, ठेला खींचते थे या अपने घर जाने की राह में थे और लाल बत्ती पर रुके हुए थे.

28 साल के मोहसिन मलिक जो मूल रूप से मेरठ के रहने वाले थे, पिछले कुछ सालों से दिल्ली के सिविल लाइन्स में रह कर लाल किले के नजदीक ई-रिक्शा चलाया करते थे. जब ब्लास्ट हुआ मोहसिन उस वाहन से चंद मीटर की दूरी पर खड़े थे. धमाके ने मोहसिन को कई फुट ऊपर उछाल दिया. उस का पूरा शरीर झुलस कर काला पड़ गया. हाथपैर चीथड़े हो कर शरीर से अलग हो गए. उस का चेहरा पहचानने लायक नहीं रह गया था. पुलिस को उस का फोन जमीन पर पड़ा मिला तो उस से परिजनों को एलएनजेपी अस्पताल पहुंचने के लिए कहा गया. रात के साढ़े 12 बजे डाक्टर ने इमरजेंसी वार्ड में मोहसिन की मौत की पुष्टि की. मोहसिन की बहन रोते हुए वार्ड के बाहर निकली. वह चीख रही थीं, ”मेरा भाई चला गया, अब उस के छोटेछोटे बच्चों को कौन देखेगा. भाभी को कैसे बताऊंगी?” रोतेरोते वह बेहोश हो कर गिर पड़ी. उस के साथ आए रिश्तेदार उस को संभालते हुए बाहर लाए.

दिनेश मिश्रा लाल किले के पास चावड़ी बाजार में शादी के कार्ड की दुकान पर काम करते थे. उम्र तकरीबन 35 साल थी. मूल रूप से उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती के रहने वाले दिनेश पिछले 15 सालों से दिल्ली में गुजरबसर कर रहे थे. घर में उन की पत्नी और तीन छोटे बच्चे हैं. दिनेश मिश्रा धमाके में मारे गए. लालकिले के नजदीक विस्फोट की खबर सुन कर उन के भाई ने जब आठ बजे उन को फोन किया तब दिनेश का फोन उठा नहीं. वह भाई को लगातार फोन करता रहा. 11 बजे किसी और ने फोन उठाया और उस को लोक नायक जयप्रकाश अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में आने के लिए कहा. गुड्डू अस्पताल पहुंचा तो उस को मोर्चरी में भेज दिया गया जहां जमीन पर उस के भाई दिनेश मिश्रा की लाश पड़ी थी.

मोहम्मद जुम्मन लालकिला इलाके में रिक्शा चलाता था. बिहार के रहने वाले जुम्मन का पूरा शरीर जल कर काला पड़ गया था. मोर्चरी में काफी तलाशने के बाद उस की पत्नी ने जुम्मन के शरीर से चिपके कपड़े के कुछ टुकड़ों से उस की पहचान की. वह कहती है, ”कोई भी लाश ऐसी नहीं थी कि देख कर कुछ पता चल सके. हम ने कपड़ों के कुछ टुकड़ों से अपने पति को पहचाना. उस का न सिर था, न पैर…” कह कर वह सिहर उठती है. जुम्मन की मौत से उस की पत्नी और 5 बच्चे गहरे सदमे में हैं.

संदीप अग्रवाल को अपने समधी लोकेश अग्रवाल का शव मोर्चरी में मिला. उन्होंने बताया, ”पहले जब मैं मौर्चरी में पहुंचा तो वहां मौजूद लोगों ने मुझे अंदर नहीं जाने दिया. लेकिन फिर दो पुलिस कौन्स्टेबल ने मेरी मदद की. अंदर कई शव जमीन पर पड़े थे. एकएक कर के मैं ने सभी शवों के ऊपर से चादर हटा कर पहचान करनी शुरू की. ज्यादातर शवों की स्थिति ऐसी थी कि उन्हें चेहरे से पहचानना मुश्किल था. मैं ने लोकेश को उन के कपड़ों से पहचाना.

घटना वाले दिन लोकेश अपने एक रिश्तेदार को देखने दिल्ली के गंगा राम अस्पताल गए थे. अस्पताल से लौटते समय उन्होंने अपने एक दोस्त अशोक कुमार को फोन कर के बुलाया. अशोक गाड़ी ले कर आ रहे थे मगर सड़क पर भीषण जाम होने के कारण अशोक ने लोकेश से चांदनी चौक के पास मिलने की बात कही. दोनों की यहां मुलाक़ात तो हुई पर चंद मिनट बाद हुए धमाके ने दोनों की जान ले ली. 55 वर्षीय लोकेश अग्रवाल उत्तर प्रदेश के अमरोहा के हसनपुर के रहने वाले थे.

35 वर्षीय अशोक कुमार भी उत्तर प्रदेश के अमरोहा के रहने वाले थे और दिल्ली में एक बस कंडक्टर के रूप में दिल्ली ट्रांसपोर्ट कौरपोरेशन (डीटीसी) के लिए काम करते थे. अशोक के 3 बच्चे हैं. अशोक अपनी ड्यूटी पूरी कर के घर लौट रहे थे, जब लोकेश ने फोन कर के उन्हें बुलाया. वह कौल उन के लिए मौत की कौल बन गई.

बिहार के समस्तीपुर का मूल निवासी 22 साल का पंकज साहनी एक प्राइवेट कैब ड्राइवर था. पंकज कैब से पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन जा रहा था, जब लाल बत्ती होने पर वह रुका और आतंक का शिकार हो गया.

दिल्ली के श्रीनिवासपुरी के रहने वाले 34 वर्षीय अमर कटारिया का लालकिले के पास अपना फार्मा का बिजनेस था. 4 साल पहले ही उस की शादी हुई थी और उस का 3 साल का नन्हा सा बेटा है. उस दिन अमर दुकान बंद कर के घर के लिए निकला था. अमर के पिता जगदीश कटारिया कहते हैं, ” क्या हुआ, कैसे हुआ रब जाने. 10 मिनट पहले ही वह फोन पर मुझ से बात कर रहा था. लेकिन फिर कुछ समय बाद जब हम ने उस को फोन किया तो उस का फोन महिला पुलिसकर्मी ने उठाया. उन्होंने ही हमें घटना की सूचना दी और कहा कि अमर का फ़ोन उन्हें सड़क पर गिरा हुआ मिला था. महिला पुलिसकर्मी ने हमें एलएनजेपी अस्पताल आने के लिए कहा. एलएनजेपी अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड के बाहर हम घंटों खड़े रहे, लेकिन हमें अपने बेटे के बारे में किसी तरह की कोई जानकारी नहीं दी गई.”

जगदीश कटारिया अस्पताल प्रबंधन के रवैये पर सवाल खड़े करते हुए कहते हैं, ”उन के लिए दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और देश के गृहमंत्री अमित शाह का ध्यान रखना ज़्यादा जरूरी था. वे अंदर थे और इमरजेंसी वार्ड के बाहर 30-40 लोग अपने परिजनों की सुध लेने के लिए संघर्ष कर रहे थे. मगर अस्पताल प्रबंधन उन्हें अपने लोगों से मिलने नहीं दे रहा था. कई घंटे बाद हमें अमर की लाश मोर्चरी में मिली. चेहरा तो पहचानने लायक ही नहीं था. उस के हाथ पर बने टैटू से मैं ने उस को पहचाना. उस की पत्नी सदमे में है. बच्चा बारबार पापापापा की रट लगा कर रो देता है. क्या कहूं उस से?” कह कर जगदीश फफक पड़े.

आज दुनिया का हर दूसरा देश आतंकवाद से त्रस्त है. यह एक वैश्विक संकट है और इस की जड़ है धर्म. हर धर्म अपने को दूसरे से श्रेष्ठ बताता है. श्रेष्ठ बने रहने के लिए वह दूसरे पर वार करता है, उसे डराता है, खौफ पैदा कर के अपने आगे झुकाने की कोशिश करता है. ईसाई, यहूदी, मुसलमान, हिंदू सब अपने को दूसरे से श्रेष्ठ घोषित करने की होड़ में सदियों से निर्दोष मनुष्यों का खून बहा रहे हैं. जितने भी देश धर्म को आगे रख कर चल रहे हैं, वहां दहशतगर्दी का बोलबाला है. औरतों पर जुल्म, बच्चों पर जुल्म और धर्म के खिलाफ बोलने वालों के सिर कलम करने की परम्परा है. चीन और जापान जैसे देशों से आतंकी हमलों की ख़बरें नहीं आतीं क्योंकि वे धर्म में नहीं कर्म में विश्वास करते हैं.

धर्मतंत्र में फंसे लोग हमेशा ही मारकाट करेंगे क्योंकि उन की धर्म की पुस्तकों में यही सब भरा हुआ है.  दुनिया का कोई ऐसा धर्म या धर्म ग्रंथ नहीं है जिस में खून खराबा न हो. कोई भी धर्म ऐसा नहीं है जो बिना मारकाट, बिना खूनखराबे के अस्तित्व में आया हो. तो जिस की नींव ही कत्लो-गारत पर रखी गई हो, वह ऊपर से भले प्रेम-सौहार्द और भाईचारे की बात करता रहे, असल में वह दूसरे धर्म-सम्प्रदाय को तुच्छ मान कर ख़त्म करने की कुत्सित विचारधारा को ही आगे बढ़ाता है. आप धर्मग्रंथों में लिखे शब्दों में फेरबदल नहीं कर सकते हैं. कुछ गलत लिखा है तो आप उस पर सवाल नहीं उठा सकते हैं.

लोकतंत्र इस मायने में थोड़ा उदार है. क्योंकि संविधान की किताब में यदि किसी को कुछ गलत लगता है तो वह उसे अदालत में चुनौती दे सकता है. परन्तु धर्मग्रन्थ में लिखे हुए पर सवाल उठाना मना है. वह गलत भी है तो उस को बदला नहीं जा सकता है. संविधान में बदलने की गुंजाइश होती है. इसलिए आतंकवाद से मुक्ति चाहिए तो धर्म का झंडाबरदार नहीं बल्कि संविधान का पालनकर्ता बनाना होगा.

मोदी सरकार अपने शासनकाल की सफलता के चाहे जितने ढोल क्यों न पीटे परंतु यह एक कड़वी सच्चाई है कि देश की आम जनता इन दिनों अपनेआप में जितनी बेचैनी महसूस कर रही है तथा स्वयं को जितना असहाय महसूस कर रही है, उतना विचलित समाज पहले कभी नहीं देखा गया. जम्मू-कश्मीर, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार, हरियाणा, राजस्थान तथा पूर्वोत्तर के कई राज्यों से लगातार आने वाले समाचार अपनेआप में यह जानने के लिए काफी हैं कि देश में इस समय चारों ओर एक धुआं सा उठ रहा है. सत्तालोलुपता में हिंदूमुसलिम के बीच खाई को ज्यादा से ज्यादा चौड़ा करने की मुहिम चल रही है. और यह मुहिम धर्म का झंडा उठा कर ही पूरी की जा सकती है. संविधान तो सब को एक नजर से देखता है.

अगर संविधान की राह पर चल कर इस लोकतंत्र को चलाया जा रहा होता तो आज जांच एजेंसियां धर्म के कारोबारियों के इशारे पर नाचने से बची रहतीं और देश की सुरक्षा का जो जिम्मा उन के कंधों पर है, उस काम को वह अपने पूरे अधिकार और कर्तव्यनिष्ठा के साथ पूरा करतीं. अगर कानून का डर बनाए रखा जाता तो मजाल है कि कोई अपनी कार में विस्फोटक रख कर एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने की हिम्मत भी कर पाता? मगर यहां कानून का खौफ किसे है? सड़क पर मौजूद पुलिसकर्मी वाहनों से धनवसूली में जुटे रहते हैं. हरा पत्ता हाथ में आया नहीं कि वाहन का रास्ता साफ. फिर चाहे उस में आरडीएक्स हो या एके-47.

गौरतलब है लालकिले वाली रोड पर आतंकी धमाके के एक दिन पहले ही दिल्ली से सटे फरीदाबाद में 2 अलगअलग जगहों से 2923 किलो विस्फोटक बरामद हुआ था. पहले फरीदाबाद के एक घर से 360 किलो विस्फोटक मिला, फिर दूसरे घर से 2563 किलो विस्फोटक मिला. पहली कार्रवाई में एक डाक्टर के घर से हथियार और 360 किलो विस्फोटक पदार्थ बरामद किया गया. यह बरामदगी दिल्ली-एनसीआर पुलिस ने नहीं बल्कि जम्मू-कश्मीर पुलिस ने आ कर की. जिस के घर से यह बरामद हुआ वह एक डाक्टर है. इस के बाद हुई दूसरी कार्रवाई में फरीदाबाद के एक अन्य घर से 2563 किलो विस्फोटक बरामद किया गया. इस से पहले अनंतनाग के सरकारी मेडिकल कौलेज में डाक्टर आदिल के लौकर से एक एके-47 राइफल बरामद हुई थी. आदिल की गिरफ्तारी के बाद एक दूसरे डाक्टर को भी पकड़ा गया था. अभी ये छापेमारी चल ही रही थी कि लाल किला मेट्रो स्टेशन गेट नंबर 1 के पास हुए तेज धमाके ने देश को हिला कर दिया.

इतनी बड़ी मात्रा में विस्फोटक सामग्री और हथियार देश की राजधानी और उस से सटे हुए राज्यों में आतंकी ले कर बैठे हुए थे, और भी पता नहीं कहांकहां ऐसे जखीरे छुपा कर रखे गए हैं, मगर लोकल पुलिस, लोकल इंटेलिजेंस और देश की तमाम खुफिया एजेंसियों को उन की कुछ खबर नहीं है. सीमा सुरक्षा बल की आंख में धूल झोंक कर आतंकी इतनी बड़े विस्फोटकों की खेप देश के भीतरी स्थानों तक आराम से पहुंचा देते हैं. कहीं कोई चेकिंग नहीं, कोई रोकटोक नहीं. जब तक कुछ खबर होती है और कहीं छापेमारी शुरू होती है, आतंकी किसी न किसी कारनामे को अंजाम दे चुके होते हैं. जाहिर है फरीदाबाद में छापेमारी के बाद जब तीन टन विस्फोटक जब्त होने की खबर बाहर आई, अन्य जगहों पर छिपे बैठे आतंकियों ने स्थान बदलने शुरू कर दिए होंगे. पूरी आशंका है कि इसी कड़ी में लाल किले वाला विस्फोट हो गया हो, या जानबूझ कर किया गया हो. यह भी हो सकता है जब पुलिस, इंटेलिजेंस और मीडिया का पूरा ध्यान इस घटना पर केंद्रित रहा हो, देश में छिपे बैठे आतंकियों ने स्थान भी बदल लिए हों और हथियार और बारूद भी दूसरी जगहों पर स्थानांतरित कर दिए गए हों. Red Fort Incident.

Hindi Family Story: भाग्यश्री- किस कारण मालती देवी ने लिया इतना बड़ा फैसला?

Hindi Family Story: शाम का वक्त था भाग्यश्री के घर पर काफी चहलपहल थी. सभी सेवक भागभाग कर काम कर रहे थे. घर की सजावट देखने लायक थी. उसी समय वह कालेज से घर आई. यों कोलकाता का धर्मतल्ला काफी भीड़भाड़ वाला इलाका है। यही वजह थी कि उसे घर आतेआते देर हो गई थी. भाग्यश्री के पिता वहीं पर एक साधारण व्यापारी थे। वे दहेज के लिए पैसे इकट्ठा करने से ज्यादा अपनी दोनों बेटियों को शिक्षित करने पर जोर देते थे और इस में वे कामयाब भी रहे. भाग्यश्री को अपने घर में किए गए सजावट आदि के बारे में कुछ नहीं पता था.

‘‘अरे वाह, आज इतनी सजावट? कोई खास बात है क्या?’’ चारों तरफ नजर दौड़ाते हुए भाग्यश्री ने पूछा.

‘‘शायद तेरी शादी का खयाल दिल में आया है, इसीलिए मम्मी ने लड़के वालों को बुलाया है…’’ छोटी बहन दिव्या फिल्मी अंदाज में बोलती हुई उसे छेड़ने लगी।

‘‘मां, इस बार कौन आ रहा है तुम्हारी इस कालीकलूटी बेटी को देखने के लिए? कितनी नुमाइश करनी है आप को… क्यों नहीं थक जातीं आप?’’ कंधे से बैग उतार कर पैर पटकते हुए भाग्यश्री ने रोष प्रकट किया.

‘‘बेटा, बड़े अच्छे लोग हैं। तुम्हारी मौसी के सुसराल वाले हैं. लड़का मानव यहीं यादवपुर में अपना कारोबार करता है। बहुत पैसे वाले लोग हैं।

“अच्छी बात क्या है पता है? तुम्हारे रंग से उन्हें कोई ऐतराज नहीं है बेटा,’’ मां ने उसे समझाते हुए लड़के और उस के पूरे खानदान की जानकारी दी, जिस में भाग्यश्री की कोई दिलचस्पी नहीं थी.

‘‘यह क्या बात हुई… मुझ से पूछा भी नहीं और रिश्ता तय कर दिया? अभी तो स्नातक का आखिरी साल चल रहा है और उस के बाद मुझे कानून की पढ़ाई करनी है…’’ वह बोले जा रही थी.

‘‘हां पढ़ लेना, एक बार रिश्ता हो जाए उस के बाद सबकुछ करना। किस ने रोका है तुम्हें,’’ मां ने बीच में ही टोका.

‘‘और हर बार यही अच्छे और संस्कारी लोग न तुुम्हारी बेटी को डार्क कौंप्लैक्शन का खिताब दे कर चले जाते हैं…रहम करो मां,’’ भाग्यश्री पैर पटकती हुई अपने कमरे में चली गई.
वहां बिस्तर पर उस के लिए एक सुंदर गुलाबी साड़ी रखी हुई थी।

“अब क्या इसे भी पहनना होगा,’’ वह लगभग चिल्ला कर बोली.

उस ने अपनेआप को आईने में देखा। लंबा कद, छरहरा बदन, पतले होंठ लेकिन सब से ऊपर उस का सांवला रंग… उस ने आईने से नजरें फेर लीं.
तभी गैस्टरूम से पापा की आवाज आई, ‘‘मेहमान आ गए.’’

पापा की आवाज सुनते ही भाग्यश्री का मन स्थिर हो गया। फिर वही सब होगा। लड़के वालों को सबकुछ पसंद आएगा पर सांवली रंगत के आगे सब कुछ फीका पड़ जाएगा. वह अनमने ढंग से तैयार हो गई। उस की खूबसूरती गुलाबी साड़ी में और निखर गई थी। उस के तीखे नैननक्श किसी का भी दिल चुराने लिए काफी थे.

शरबत का गिलास लिए जैसे ही वह अंदर आई, मानव की नजरें भाग्यश्री पर स्थिर हो गईं। दोनों की आंखें चार हुईं, दिल की धड़कनों ने एकसाथ धड़क कर एकदूसरे का अभिनंदन किया. मानव को भाग्यश्री देखते ही पसंद आ गई थी. दोनों पक्षों में बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ ही था कि भाग्यश्री ने अपनी बात रख दी,”मुझे आप सभी से कुछ कहना है… मैं पहले अपनी पढ़ाई पूरी करूंगी और एक सफल वकील बनने के बाद ही शादी करूंगी,’’ भाग्यश्री ने तनिक ऊंची आवाज में अपनी बात रखी, जिसे सुन सभी स्तब्ध हो गए.

मानव के घर वाले जहां बड़ी मुश्किल से उस के सांवले रंग से समझौता कर लड़की के घरेलू होने की बात पर राजी हो कर रिश्ता ले कर आए थे, वहीं उस का मुखर हो कर बोलना एवं पढ़ाई और नौकरी वाली बात को सभी के समक्ष बेबाक हो कर रखना उन से बरदाश्त नहीं हुआ.

मानव की मां मालती देवी बोलीें, ‘‘लड़कियों को घर के काम ही शोभा देते हैं और हमारा मानव इतना कमा लेता है कि उस की गृहस्थी अच्छे से गुजरबसर हो जाएगी। तुम्हारी नौकरी हमें…’’ वाक्य पूरा भी नहीं हुआ था कि भाग्यश्री उठ खड़ी हुई. मालती देवी का इशारा साफ था। न तो वह भाग्यश्री को आगे पढ़ने की अनुमति दे रही थीं और न ही एक सफल वकील बनने की इजाजत जोकि भाग्यश्री का सपना था। ऐसे घर में शादी कर अपने सपनों को कुचलना उसे कतई मंजूर नहीं था.

उस ने उन की शर्तों पर शादी करने से इनकार कर दिया और अपने कमरे में चली गई। भाग्यश्री के इस व्यवहार को मालती देवी ने अपना अपमान समझ लिया और मानव का हाथ पकड़ कर खींचती हुईं कमरे से बाहर निकल गईं.

पर मानव का दिल तो वहीं भाग्यश्री के पास छूट गया था। उस ने घर पहुंचते ही भाग्यश्री के मोबाइल पर मैसेज किया…

“प्रिए भाग्यश्री,

‘‘मुझे आप के सपनों के साथ कदम से कदम मिला कर चलना है। मां पुराने खयालात की हैं लेकिन मेरा यकीन कीजिए कि मैं उन्हें मना लूंगा। आप बस वह कीजिए जो आप का दिल चाहता है और हां, कहीं अगर मेरी जरूरत महसूस हो तो एक बार आवाज जरूर दें.

“एक बात और… मैं मां के खिलाफ जा कर आप से शादी कर तो सकता हूं पर करना नहीं चाहता। थोड़ा समय दीजिए, मैं सबकुछ ठीक कर लूंगा। यकीन मानिए, मैं बारात ले कर आप के घर ही आऊंगा। आशा है तब तक आप भी मेरा इंतजार करेंगी.’’

“आप का और सिर्फ आप का
मानव.”

‘‘सामने तो कुछ बोला न गया, पीठ पीछे हल्ला बोल… बहुत देखे ऐसे आशिक आवारा,” कहते हुए वह संदेश को मिटाने लगी पर हाथ रुक गया। पहली बार किसी से इतनी आत्मीयता मिली थी, कैसे जाने देती भला.

इस बात को बीते लगभग 7 साल हो गए थे. भाग्यश्री ने वह मुकाम हासिल कर लिया था, जिस के लिए उस ने शादी के कई रिश्ते को ठुकराया था. वैसे इन 7 सालों में मानव ने कभी उसे अकेलेपन का एहसास होने नहीं दिया था. दोनों औपचारिक रूप से मिलते व एकदूसरे का हालचाल लेते रहते थे. यह बात और थी कि मालती देवी इन बातों से बिलकुल अनजान थीं. भाग्यश्री अपने सपनों को साकार करती सिविल कोर्ट में प्रैक्टिस करने लगी थी. उस की छोटी बहन का विवाह अच्छे घराने में हो गया था.

उस दिन सुबह के करीब 10 बजे थे। मालती देवी रोजमर्रा के कामों के लिए अपने नौकरों पर हुक्म चला रही थीं। तभी उन की बेटी कामिनी रोतेबिलखते मुख्य दरवाजे से अंदर आई.

‘‘मां, अब मैं कभी ससुराल वापस नहीं जाऊंगी,’’ चेहरे पर खून जमने से बने स्याह धब्बे साफ नजर आ रहे थे.

कामिनी मानव की बड़ी बहन थी. कहने को तो शादी के 8 साल हो गए थे लेकिन 1 भी साल ऐसा नहीं गुजरा था जब कामिनी को सताया न गया हो और कामिनी रोतीबिलखती घर न आई हो. हर बार उसे समझा दिया जाता, हाथ जोड़े जाते थे और समझाबुझा कर उसे ससुराल भेज दिया जाता था।

‘‘लोग क्या कहेंगे… बेटी की डोली मायके से निकलती है और अर्थी ससुराल से,’’ मालती देवी हर बार इन्हीं बातों का वास्ता दे कर कामिनी को सुसराल भेज देती थीं और यही वजह थी कि उन्होंने भाग्यश्री का रिश्ता ठुकरा दिया था क्योंकि वह समाज के नियमों के विरुद्ध जा कर पढ़ना चाहती थी, अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी, वकील बनना चाहती थी। मगर आज कामिनी के इस दशा ने कोई ठोस कदम लेने पर उन्हें मजबूर कर दिया था.

‘‘राजू…राजू…’’ मालती देवी ने ड्राइवर को जोर से आवाज लगाई.

‘‘जी मैम साहब…’’ राजू दौड़ कर आया.

‘‘गाड़ी निकालो,’’ मालती देवी ने आदेश दिया.

‘‘कामिनी, गाड़ी में बैठो,’’ मालती देवी ने पर्स हाथ में लेते हुए कहा.

राजू गाड़ी निकाल कर खड़ा था। दोनों मांबेटी गाड़ी में बैठ गए। गाड़ी चलने लगी.

‘‘कहां जाना है मैम साहब?’’ ड्राइवर ने डरतेडरते पूछा.

‘‘सिविल कोर्ट,’’ मालती देवी ने आत्मविश्वास के साथ कहा.

कामिनी उन के चेहरे को आश्चर्य से देखने लगी, क्योंकि उसे लग रहा था कि इस बार भी मां उसे ससुराल छोड़ने जा रही हैं और उस ने यह भी सोच लिया था कि इस बार अर्थी निकलने वाली बात को वह सच कर दिखाएगी.

लेकिन मां द्वारा सिविल कोर्ट का जिक्र करने से वह अपने अंदर संतोष का अनुभव करने लगी। अब तक वह दूर बैठी थी। करीब आ कर वह मां से लिपट कर रोने लगी.

सिविल कोर्ट के आगू राजू ने गाड़ी रोक दी. मालती देवी कामिनी का हाथ पकड़े लगभग दौड़ती हुई चल रही थीं. मन में केवल यही था कि इस बार बेटी को इस नकली रिश्ते से आजाद करना है, तलाक दिलवा कर ही चैन लेगी। जहां न पति का प्यार है, न सासससुर का स्नेह फिर क्यों बनी रहे वहां? उन्हें सारी बातें याद आ रही थीं कि किस तरह से कामिनी को बहू न समझ बेटी समझने का वादा किया था उस के ससुराल वालों ने लेकिन खोखले वादों के अलावा कुछ भी नहीं दिया था. मालती देवी के आंखों के आगे चलचित्र की तरह सारे दृश्य घूमने लगे थे.

कामिनी का हाथ थामे सिविल कोर्ट के बड़े से दरवाजे से अंदर चली गईं वह। सभी वकील अपनेअपने क्लाइंट के साथ व्यस्त थे. किस से अपनी बात कहे, किसी को तो नहीं जानतीं वे. तभी उन की नजर एक नेम प्लेट पर पड़ी ‘भाग्यश्री।’

नाम को दोहराया उन्होंने. यादों के मानस पटल पर धूल जम चुकी थी। उसे झाड़ा तो तसवीर साफ हो गई। वे लगभग दौड़ती हुई उस के पास पहुंचीं. भाग्यश्री के आगे हाथ जोड़ कर खड़ी हो गईं. उन्हें ऐसी स्थिति में देख कर भाग्यश्री हड़बड़ा कर उठ कर खड़ी हो गई. वह समझ नहीं पा रही थी कि मालवी देवी ऐसे क्यों खड़ी हैं? कई सवाल एकसाथ सामने आजा रहे थे.

‘‘आप बैठ जाइए न मैडम,’’ भाग्यश्री ने औपचारिकता निभाई.

‘मैडम कहा उस ने। लगता है, मुझे नहीं पहचाना,’ मन ही मन सोचने लगीं मालवी देवी.

मालती देवी ने पर्स से फोन निकाला और नंबर डायल करने लगीं,”मानव, तुम जहां कहीं भी हो यहां आ जाओ? पता राजू से पूछ लेना,’’ जल्दबाजी में केवल इतना ही बोल पाईं वह.

“मां, क्या हुआ?” मानव ने कभी मां को इस तरह बात करते नहीं सुना था. वह भी घबरा गया.

आधे घंटे में मानव उन सब के सामने था. भाग्यश्री ने मालती देवी को पानी पिलाया, उन्हें शांत किया और फिर एकएक जानकारी उन से लेने लगी.
मामला दहेज उत्पीड़न का था.

‘‘मैडम देखिए, हमारे पास 2 रास्ते हैं, एक तो आप जा कर पुलिस थाने में शिकायत दर्ज करवाएं और आगे कानूनी काररवाई की लंबी प्रक्रिया होगी फिर जो फैसला होगा वह हमें मानना ही होगा। दूसरा, मैं कामिनीजी के ससुराल वालों से मिल कर उन्हें न्यायिक प्रक्रिया के साथ समझाऊं, क्योंकि किसी का घर टूटे यह कोई नहीं चाहता, मैं तो बिलकुल भी नहीं। आगे आप जैसा कहें,’’ भाग्यश्री बोले जा रही थी, जिसे मालवी देवी सुन कर निहाल हुई जा रही थीं और उन्हें अपने किए पर ग्लानि भी हो रही थी.

‘‘बेटा, तुुम्हें जो ठीक लगे वही करो,’’ मालती देवी बोलीं।

भाग्यश्री मानव के साथ जा कर कामिनी के ससुराल वालों से मिली. काले कोर्ट वाले को देखते ही वे सिहर गए थे. रहीसही कसर उस के रौबीले अंदाज ने पूरी कर दी थी. उस ने उन्हें दहेज उत्पीड़न पर लगने वाले धाराओं के बारे में बताया। न मानने की स्थिति में होने वाले दुष्परिणामों की भी जानकारी दी. ‘मरता क्या न करता…’ नतीजा यह हुआ कि कामिनी के ससुराल वाले उन की हर बात मानने के लिए तैयार हो गए.

कामिनी के लिए 6 महीने का पूरा आराम, साथ ही पति द्वारा खाना बना कर खिलाए जाने की हिदायत एवं देखभाल करने की जिम्मेदारी सासससुर के ऊपर दे कर साथ ही दहेज में दी गई पूरी रकम को कामिनी के बैंक खाते में भेजने का आदेश दे कर भाग्यश्री और मानव वापस आ गए थे.

यह सब देख मालती देवी की आंखों में भाग्यश्री के लिए ढेर सारा प्यार उमड़ रहा था. जब उन्हें पश्चाताप करने का कोई और रास्ता नहीं दिखा तो एक दिन बेटे से बोलीं,‘‘मानव, मैं भाग्यश्री को बहू बनाना चाहती हूं, वह मान तो जाएगी न?”

‘‘मां, पिछले 7 सालों से वह भी हमारा ही इंतजार कर रही है.’’

‘‘सच मानव,’’ सजल नेत्रों से कहा मालती देवी ने.

उत्तर में मानव ने कुछ फोटोज दिखाए जिस में वे साथसाथ थे. भाग्यश्री के घर जा कर उस की मां से उन्होंने जो कुछ भी कहा वह काबिलेतारीफ थी,
‘‘मुझे अपने बेटे के लिए आप की होनहार और काबिल बेटी का हाथ चाहिए। आशा है, आप मुझे मना नहीं करेंगी.’’

भाग्यश्री की मां ने नम आंखों से मालती देवी को गले से लगा लिया था. मालती देवी ने भाग्यश्री के गले में सोने का हार पहनाया, ‘‘अब से मैं तुम्हारी मां हूं। मुझे मैडम मत कहना प्लीज,” मालती देवी ने याचना भरे शब्दों में कहा.

मानव वहीं सोफे पर बैठा मुसकरा रहा था। जैसे ही एकांत मिला तो बोल पड़ा, ‘‘कहा था न मैं ने बारात ले कर आप के घर ही आऊंगा…’’

भाग्यश्री क्या कहती भला… शरमा कर दोनों हाथों से चेहरे को ढंक लिया था उस ने.

‘‘वाह…वाह… जी, क्या जोड़ी है बनाई… भैया और भाभी को बधाई हो बधाई…” दिव्या ने फिल्मी अंदाज में गा कर दोनों को साथ खड़ा किया। फिर दोनों ने घर के सभी बड़े सदस्यों का आशीर्वाद लिया. माहौल बेहद खुशनुमा लग रहा था। Hindi Family Story.

Hindi Family Story: काम की आदत- क्या चंदन अपने बेटे को पैसे भेज सका?

Hindi Family Story: दोपहर के खाने के बाद चंदन की तबियत सुस्त होने लगी, बदन टूटने लगा और दर्द भी करने लगा. उसे अहसास हो गया कि बुखार है. काम बंद कर वह कुरसी पर आराम करने लगा. सहपाठियों ने घर जाने की सलाह दी. चंदन ने पैरासिटामोल की एक गोली ली और थोड़ी देर आराम किया. दवा से तबियत में थोड़ा फर्क महसूस हुआ तो वह औफिस से घर के लिए निकल आया.

घर पहुंचने से पहले चंदन ने डाक्टर को फोन किया. डाक्टर अपने क्लिनिक पर थे. वह डाक्टर से क्लिनिक पर मिले.

डाक्टर चंदन से उम्र में छोटे थे और चंदन को अंकल कह कर पुकारते थे. डाक्टर ने पूछा, “अंकल, कैसी तबियत है?”

चंदन ने अपनी तबियत के बारे में बताया. डाक्टर ने निरीक्षण किया. देखने के बाद डाक्टर ने कहा, “अंकल, बुखार तो अभी भी 100 डिगरी है और ब्लड प्रेशर भी अधिक है. ब्लड प्रेशर की दवाई नियम से रोज लेते हो न अंकल?”

चंदन डाक्टर से बोले, “ब्लड प्रेशर की दवा तो हर रोज नियम से लेता हूं.”

डाक्टर ने कहा, “मैं दवा लिख रहा हूं. तीन दिन तक लो, फिर मुझे दिखाना. अगर बुखार तेज हो या उतरे नहीं, तो टैस्ट करवा लेना. मैं लिख देता हूं. आप आराम पूरा करो. औफिस से 2-3 दिन की छुट्टी लो, तब तबियत जल्दी ठीक होगी.”

चंदन ने पूछा, “कोई घबराने की बात तो नहीं है?”

डाक्टर ने कहा, “अभी तो मौसम का बुखार लग रहा है. दवा लो और आराम करो. आंटी कैसी है?”

चंदन ने कहा, “ठीक है.”

चंदन ने कैमिस्ट से दवा ली और घर पहुंचा. चांदनी घर पर नहीं थी. फोन किया. चांदनी सोसाइटी के मंदिर में थी. एक बच्चे के हाथ घर की चाबी भेज दी.

बच्चे ने कहा कि अंकल चाबी आंटी ने भेजी है. मंदिर में कीर्तन हो रहा है. आंटी एक घंटे बाद आएगी.

चंदन ने घर का दरवाजा खोला और दवा लेने के पश्चात आराम करने के लिए बिस्तर पर लेट गया और कुछ पल बाद नींद आ गई.
लगभग डेढ़ घंटे बाद चांदनी घर लौटी. चंदन को देख कर वह बोली, “आज जल्दी आ गए?”

चंदन ने कहा, “हां, बुखार हो गया औफिस में, इसलिए जल्दी आ गया.”

चांदनी बोली, “चलो, डाक्टर के पास चल कर दवा ले लो.”

चंदन ने कहा, “मैं सीधे डाक्टर के पास ही गया था. दवा ले ली.”

चांदनी पूछ बैठी, “क्या कहा डाक्टर ने?”

चंदन ने कहा, “दवा से बुखार न उतरे, तब टैस्ट करवाने को कहा है.”

चांदनी ने कहा, “खिचड़ी बना देती हूं. थोड़ा हलका खाने के बाद जल्दी सो जाओ.”

चंदन सो जाता है. रात के तकरीबन डेढ़ बजे चंदन की नींद खुलती है. पसीने से तरबतर चंदन कंबल को उतार कर एक ओर करता है. बुखार उतर गया था. कमजोरी के कारण कुछ देर करवटें बदल कर फिर से नींद आ गई. चांदनी सो रही थी. चंदन ने उसे उठाया नहीं.

सुबह चांदनी अपनी दिनचर्या के मुताबिक साढ़े 5 बजे उठ गई. चंदन सो रहा था. तकरीबन साढ़े 8 बजे वह उठा.

चांदनी ने पूछा, “तबियत कैसी है?”

चंदन ने कहा, “कमजोरी बहुत लग रही है.”

चांदनी बोली, “आज और कल दो दिन की औफिस से छुट्टी ले लो. फिर शनिवार, रविवार की छुट्टी है ही. पूरे 4 दिन आराम करो.”

चंदन ने कहा, “छुट्टी की ईमेल सब से पहले भेजता हूं.”

चंदन ने मोबाइल से 2 दिन की छुट्टी के लिए ईमेल लिखी और औफिस भेज दी और आराम करने लगा.

चांदनी बोली, “स्नान कर लो. बदन खुल जाएगा. पसीने से भीगे कपड़े भी बदल लो.”

थोड़ी देर बाद चंदन नहा कर के कपड़े बदल लेता है. नाश्ते में दलिया खाया और समाचारपत्र पढ़ने लगा.

चंदन ने मुश्किल से साढ़े 10 बजे तक आराम किया होगा, फिर उस के बाद औफिस से एक के बाद एक फोन आने लगे और चंदन फोन पर ही व्यस्त हो गया. चन्दन ने अपना लैपटौप भी खोला और काम करने लगा.

चांदनी यह देख कर झुंझला गई और थर्मामीटर चंदन के मुंह में डाल दिया. 2 मिनट बाद भी जब चांदनी ने थर्मामीटर नहीं निकाला, तब चंदन ने खुद ही मुंह से निकाल कर तापमान देखा.

चंदन ने थर्मामीटर देखते हुए कहा, “बुखार नहीं है.”

चांदनी बोली, “पिछले 2 घंटे से देख रही हूं. डाक्टर साहब ने आराम करने को कहा है… और आप यह आराम कर रहे हैं. घर में पूरा दफ्तर खोल लिया है. जब आराम नहीं करना, तब छुट्टी क्यों ली, दफ्तर चले जाओ. टिफिन पैक कर देती हूं.”

चंदन ने मुसकराते हुए कहा, “नाराज क्यों हो गई?”

चांदनी बोली, “मेरी नाराजगी से कोई फर्क पड़े तब कहूं कि नाराज हूं.”

चंदन बोला, “तुम्हें तो मालूम है कि प्राइवेट नौकरी में आदमी का तेल निकाल लेते हैं. काम करना पड़ता है.”

चांदनी बोली, “मगर, तुम इनसान हो, तबियत ठीक नहीं, कम से कम एक दिन तो बख्श दो. कोई सुपरमैन तो हो नहीं कि बिना रुके हर पल सृष्टि चलानी है.”

चंदन ने कहा, “कोई नहीं समझता, खासकर जिन के पल्ले दाने जरूरत से अधिक होते हैं. हम नौकर ठहरे, मालिक की निगाह में हमारी औकात कुछ नहीं है. 2-2 साल तक तनख्वाह बढ़ाते नहीं. जवान लड़केलड़कियां इसीलिए हर साल या 2 साल में नौकरी बदल लेते हैं. उन पर घर के दायित्व नहीं होते. अब उम्र 57 साल हो गई है. इस उम्र में नौकरियां भी आसानी से नहीं मिलती. आजकल युवाओं पर विशेष ध्यान है. 40 साल के ऊपर वाले मेरी श्रेणी में आ गए हैं, तभी तो काम किए जा रहे हैं.”

चंदन के तर्क सुन कर चांदनी चुप हो गई.

दोपहर में भी चंदन को आराम नहीं मिला. थोड़ीथोड़ी देर में फोन बजता रहता. चांदनी कुढ़ कर दूसरे कमरे में आराम करने लगी. चंदन पूरा दिन औफिस के काम घर पर करता रहा. बीच में वह थोड़ी सी झपकी ले लेता था. शाम के 6 बजे चंदन को काम से फुरसत मिली.

चंदन और चांदनी अकेले दिल्ली में रह रहे हैं. बेटा प्रीत बैंगलुरू में और बेटी शालिनी पुणे में रह रहे हैं. दोनों आईटी कंपनी में हैं और विवाहित हैं. चंदन प्राइवेट कंपनी में कार्यरत है. 19 साल की उम्र में बीकौम की डिगरी लेने के तुरंत बाद चंदन ने नौकरी करनी शुरू की. घर की माली हालत कमजोर थी. कालेज के समय अपनी पढाई का खर्च ट्यूशन की कमाई से पूरा किया और घर में भी आर्थिक सहयोग दिया. नौकरी के साथ एमकौम और फिर एमबीए किया. 4-5 कंपनियां बदली और धीरेधीरे उन्नति की सीढ़ियां चढ़ते आज चंदन एक शीर्ष पद पर है.

38 सालों के अनुभव के साथ चंदन का सम्मान कंपनी में सहपाठियों के साथ मैनेजमेंट भी करती है. विनम्र स्वभाव के चंदन विपरीत परिस्थितियों में भी हंसते हुए काम करते रहते थे. अपने लिए कुछ भी चाह नहीं रखी. पहले अपने मातापिता और फिर बच्चों के लिए पूरा जीवन समर्पित कर दिया. अपने लिए शायद ही कुछ मांगा हो चंदन ने, इसीलिए चांदनी के रूप में जीवनसाथी मिला, जिस ने चंदन का पूरा खयाल रखा.

बीमारी में पूरा दिन चंदन औफिस का काम करता रहा. शाम के 6 बजे नींद आ गई. चांदनी ने चंदन को आराम करने दिया. साढ़े 8 बजे चंदन उठा.

चांदनी बोली, “हाय सुपरमैन कैसे हो?”

सुन कर चंदन मुसकरा दिया, कहा कुछ नहीं. आराम करने से और दवाई से तबियत में सुधार हुआ.

चंदन बोला, “कुछ बेहतर महसूस हो रहा है.”

चांदनी बोली, “खाना खा लो, फिर रात की दवा खा कर सो जाना. आज तुम ने बीमारी में भी दोगुना काम किया है. अब जवानी का जोश मत दिखाओ. उम्र के मुताबिक काम करना चाहिए.”

चंदन ने मुसकरा कर सिर हिला दिया. खाना खाने के बाद चंदन को नींद नहीं आ रही थी. अभी तो वह सो कर उठा था. चांदनी और चंदन दोनों टीवी सीरियल देखने लगे. साढ़े 9 बजे बेटे प्रीत का फोन आया. पिता और बेटे की फोन पर चांदनी बात सुनती रही.

चांदनी बोली, “क्या हुआ…? प्रीत रुपए क्यों मांग रहा था?”

चंदन ने कहा, “वह कह रहा था कि खर्च अधिक हो गया. मकान बदला, उस का किराया और सिक्योरिटी में खर्च हो गया. कार लोन की किस्त भी देनी है.”

चांदनी बोली, “अच्छी तनख्वाह है, मियांबीवी दोनों कमाते हैं. आखिर खर्च कहां करते हैं? मुझे तो समझ नहीं आता. इतना कमाने के बाद भी बाप से मांगते शर्म नहीं आती. फोन मिलाया और रुपए मांग लिया. तुम ने मना क्यों नहीं किया?”

चंदन ने कहा, “कह रहा था कि उधार दे दो. 2-3 महीने में लौटा देगा.”

चांदनी बोली, “मैं जैसे समझती नहीं हूं. उधार मांग कर रुपए लिए किस ने वापस करने और बाप ने बेटे से क्या मांगने?”

चंदन ने उदारता दिखाते हुए कहा, “दे देगा.”

चांदनी बोली, “खर्च सीमित रखें. हम ने भी तो 2 कमरों में गुजारा किया है. मातापिता, हम और दो बच्चे. जितनी चादर थी, पैर कभी बाहर नहीं निकाले. अभी तो कोई उन पर बोझ नहीं है, कोई जिम्मेदारी नहीं है, तब यह हाल है. छोटे मकान में रह लें, छोटी कार ले लें. अपना रुतबा दिखाना है. झूठी शान के साथ जीना है. घर में खाना बनाना नहीं, हर रोज होटल में खाना है. महंगे कपड़े, क्या बताऊं और.”

चंदन ने कहा, “मैं समझ सकता हूं.”

चांदनी बोली, “3 साल में दोनों बच्चों की शादी की. सारी जमापूंजी खर्च हो गई. घर में सफेदी करवानी है, दीवारों से पपड़ी उतर रही है. हर महीने उसे टालते जा रहे हैं. उन को सब आराम चाहिए. क्या हमें कुछ नहीं चाहिए?

चंदन ने कहा, “चाहिए तो, लेकिन हमारा बचपन थोड़े अभाव में बीता. हम ने सब कुछ स्वयं बनाया. बच्चों को हम ने सबकुछ दिया, इसीलिए उन्हें अभाव में रहने की आदत नहीं है.”

चांदनी बोली, “आप हमेशा तो उन की मदद कर नहीं सकते. 3 साल बाद आप रिटायर हो जाओगे, तब हम अपना गुजारा कैसे करेंगे. कुछ सोचा है? बच्चों के जो हालात हैं, उन से मुझे एक रुपए की भी उम्मीद नहीं है. उन्हें आप की तनख्वाह पता है. और यह भी मालूम है कि आप अधिक खर्च करते नहीं, इसीलिए मांग रख दी. उन को इतनी समझ तो आनी चाहिए.”

चंदन ने फिर कहा, “उधार मांग रहा है, वापस कर देगा.”

चांदनी बोली, “वापस कर देगा. वापस करने के कुछ दिन बाद फिर मांग लेगा. यह सिलसिला चलता रहेगा. मैं बच्चों की मानसिकता समझ रही हूं.”

चंदन ने कहा, “हमारा सबकुछ बच्चों का ही तो है.”

चांदनी बोली, “मानती हूं कि है, परंतु अपने लिए कुछ रखो नहीं तो…?”

चंदन ने मुसकराते हुए कहा, “दिल छोटा न कर. आज पहली बार ऐसा क्यों सोच रही हो?”

चांदनी बोली, “इसलिए कि उम्र बढ़ती जा रही है और अब अधिक बोझ उठाने की हिम्मत नहीं है.”

चंदन बात को समझता है, परंतु उस की आदत. उस ने लैपटौप खोला और इंटरनेट बैंकिंग से रुपए बेटे के खाते में भेज दिए. Hindi Family Story.

Hindi Family Story: चमत्कारी दादू- अम्मा जी ने अकाउंटैंट को क्यों हटाया नौकरी से?

Hindi Family Story: “हाय माय स्वीटी, दादू! आज आप इतना डल कैसे दिख रही हो? मैं तो मूड बना कर आया था आप के साथ बैडमिंटन खेलूंगा, लेकिन आप तो कुछ परेशान दिख रही हो”

“अरे बेटा, कुश, बस तेरी इस लाड़ली बहन कुहु की फिक्र हो रही है. ये कुहु अंशुल के साथ अपने रिश्ते में इतना आगे बढ़ चुकी है पर अंशुल के पेरैंट्स इस रिश्ते से खुश नहीं. अब जब तक लड़के के मांबाप खुशीखुशी बहू को अपनाने के लिए राजी नहीं होते, तो भला कोई रिश्ता अंजाम तक कैसे पहुंचेगा. मुझे तो बस यही फिक्र खाए जा रही है. मेरी तो कल्पना से परे है कि आज के जमाने में भी किसी की इतनी पिछड़ी सोच हो सकती है. आजकल जाति में ऊंचनीच भला कौन सोचता है. वे ऊंचे गोत्र वाले ब्राह्मण हैं, तो हम भी कोई नीची जात के तो नहीं.”

“अरे दादू, इकलौते बेटे को नाराज कर वे कहां जाएंगे, मान जाएंगे देरसवेर. आप टैंशन मत लो, वरना नाहक आप का बीपी बढ़ जाएगा. चलो थोड़ी देर बैडमिंटन खेलते हैं, मेरी अच्छी दादू.”

बैडमिंटन खेलतेखेलते भी पोती की चिंता ने आभा जी का पीछा नहीं छोड़ा.

करीबन आधे घंटे खेल कर, तरोताजा हो कर उन्होंने अंशुल को घर बुला कर उस से उस की शादी के मुद्दे पर गंभीर चर्चा की.

“अंशुल, तुम्हारा क्या फैसला है? मैं तो हर तरह से तुम्हारे पेरैंट्स को समझा कर हार गई. अब तो बस एक ही रास्ता बचता है. अगर तुम कुहु के साथ कोर्ट मैरिज कर के उन के सामने जाओ, तो उन्हें मजबूरन तुम्हारी शादी के लिए तैयार होना ही होगा. मुझे तो इस के अलावा कोई और विकल्प नजर नहीं आ रहा.”

“दादी, इस की जरूरत नहीं पड़ेगी. अगर मैं बस उन से यह कह दूं कि मैं कुहू के साथ कोर्ट मैरिज करने के लिए कोर्ट में अर्जी दे रहा हूं तो उन के पास हमारी शादी के लिए हामी भरने के अलावा कोई चारा न बचेगा.”

“ठीक है, बेटा. जैसा तुम चाहो.”

अंशुल ने उसी दिन अपने पेरैंट्स को कोर्ट मैरिज की धमकी दी और उस की सोच के मुताबिक कुहु के साथ उस के विवाह के लिए उन का प्रतिरोध ताश के पत्तों के महल की भांति ढह गया.

आज आभाजी बेहद खुश थीं. आज ही तो कुहु के होने वाले सासससुर अपने बेटे के साथ खुशीखुशी रोके की तिथि निश्चित कर के अभीअभी गए थे.

“दादू, दादू, अब तो खुश? अब तो आप की समस्या हल हो गई न?”

“हां बेटा. आज मैं बहुत खुश हूं. आज कुहु की शादी की मेरी बरसों पुरानी साध पूरी हुई.”

“हां दादू, मैं भी बहुत खुश हूं. आप तो वाकई में अमेज़िंग हो. आप के पास हर समस्या का तोड़ है,” पोते ने लड़ियाते हुए उन की गोद में लेटते हुए कहा.

तभी उन की एक पड़ोसिन वंदिता का फोन उन के पास आया.

“हैलो दीदी, प्रणाम.”

“प्रणाम वंदिता. कहो, कैसे याद किया?”

“दीदी, रुनझुन को ले कर मन में कुछ उलझन थी. तो मैं उसी बाबत आप से सलाह लेना चाह रही थी.”

“हांहां, बोलो. निस्संकोच बोलो.”

“दीदी, रुनझुन को घर आए 3 महीने हो चले, लेकिन वह ससुराल जाने का नाम ही नहीं लेती. जब भी मैं कहती हूं, बेटा, दामाद जी को तुम्हारे बिना परेशानी हो रही होगी, वह कह देती है, ‘अरे मां, आप के दामादजी के पास उन की मां और बहनें हैं न. वे मुझ से ज्यादा उन के साथ खुश रहते हैं. मेरा फिलहाल उन के पास जाने का मन नहीं.’

“अब आप ही बताओ दीदी, शादी के बाद लड़की का इतने इतने दिन मायके में रहना क्या सही है?”

“हूं, तो यह बात है. चलो, शाम को बिटिया को ले कर घर आ जाओ. मैं उसे समझाती हूं.”

आभाजी ने रुनझुन को समझाया, “बेटा, शादी एक बेहद जिम्मेदारीभरा रिश्ता है, जिसे बेहद समझदारी और धैर्य से निभाना पड़ता है. तुम्हें ससुराल या दामाद जी से क्या परेशानी है?”

“ताई जी, ससुराल में मुझे बहुत घुटन महसूस होती है. सुबह 7 प्राणियों का खाना बना कर जाओ और रात को फिर वही रूटीन. इधर आजकल मेरे औफिस में बेहद व्यस्त दिनचर्या चल रही है. वर्षांत होने की वजह से औडिटिंग के सिलसिले में दसदस घंटों की ड्यूटी देनी पड़ रही है. तो सुबह 9 बजे की निकलीनिकली रात के 7 बजे ही घर लौट पाती हूं. अब आप ही बताइए, मैं रसोई का काम कैसे करूं? इतना लेट आने पर सासुजी कलह करती हैं. मुझे नौकरी छोड़ने के लिए धमकाती हैं. तो मैं अभी वापस नहीं जा रही.”

“बेटा, बुरा मत मानना. शादी के बाद घरपरिवार की जिम्मेदारी से मुंह मोड़ना क्या सही है? औफिस के काम की आड़ ले कर अगर तुम मायके से ससुराल जाना ही नहीं चाहो, तो यह तो अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ना हुआ न बेटा?”

“आंटीजी, मैं आप की बात से पूरी तरह सहमत हूं. आप ही बताइए, बारहबारह घंटे घर से बाहर बिता कर मैं रसोई का काम कैसे करूं. मैं अपनी यह इतनी अच्छी नौकरी छोड़ने वाली तो बिलकुल हूं नहीं.”

रुनझुन की ये बातें सुन अम्मा जी ने वंदिता से उस के दामाद अमेय से मिलने की इच्छा जाहिर की.

अगले दिन दामाद अमेय के अपने घर आने पर आभाजी ने औपचारिक कुशलक्षेम के बाद उस से कहा, “अमेयजी, हमारी बिटिया की जिम्मेदारी पूरी तरह से आप के ऊपर है. इसे बस यह गिला है कि 12 घंटे घर बाहर रहने के बाद इस में दोनों वक्त की रसोई निबटाने की हिम्मत नहीं बचती. अब आप ही बताइए, वह पूरी तरह से गलत तो नहीं?”

“आंटीजी, घर के काम की वजह से मायके आ कर बैठ जाना क्या सही है? मैं तो इसे समझासमझा कर हार गया. लेकिन यह घर चलने को तैयार ही नहीं होती.”

इस पर आभा जी ने उसे समझाया कि वह खाना बनाने के लिए एक सहायिका का इंतजाम करे.

घर पहुंच कर अमेय ने यह बात मां के समक्ष रखी. सब की सहमति से यह फैसला हुआ कि एक सहायिका खाना बनाने में रुनझुन की मदद करने के लिए रखी जाएगी.

इस निर्णय को अमेय के मुंह से सुनने के बाद वंदिता ने आभाजी का लाखलाख शुक्रिया अदा किया कि उन के मशवरे से उन की बेटी का घर उजड़ने से बच गया.

आभा जी वंदिता के घर से लौट कर अपने कमरे में आराम ही कर रही थीं, कि तभी उन का बेटा घर में घुसा.

“क्या हुआ बेटा, बेहद थके थके नजर आ रहे हो?”

“अरे मां, औफिस में अकाउंट में भारी गड़बड़ी नजर आ रही है. लेकिन अकाउंटैंट उसे ठीक तरह से समझ नहीं पा रहे. मैं भी सुबह से वही गड़बड़ पकड़ने की कोशिश में लगा हुआ था, लेकिन पकड़ नहीं पाया.”

“ओ बेटा, तूने मुझे क्यों नहीं बुलवा लिया औफिस? तुझे तो पता है, ऐसी गड़बड़ी ढूंढने में मैं माहिर हूं. आखिर मेरी एमकौम की डिग्री कब काम आएगी?”

“मां, अब बारबार आप को औफिस के कामों में उलझाने का मन नहीं करता.”

“अरे बेटा, तू नाहक ही परेशान होता रहता है. ले चल, अभी अपने लैपटौप पर तेरा अकाउंट चैक करती हूं.”

आभाजी ने पूरे दिन लग कर अकाउंट की बारीकी से जांच कर उस में की गई भयंकर हेराफेरी पकड़ ली.

अकाउंट की गहन छानबीन से पता चला कि उन के नए मैनेजर ने बेहद चतुराई से एक बड़ी रकम का गबन किया था.

अम्मा जी ने फौरन ही बेईमान अकाउंटैंट को नौकरी से हटा दिया, और एक नया ईमानदार अकाउंटैंट को नियुक्त कर दिया.

पूरे दिन अकाउंट की जांच करतेकरते अम्माजी पस्त हो आराम कर रही थीं, कि तभी उन की बहू की चचेरी बहन की बिन मांबाप की बेटी सलोनी मुदित मन कहते हुए उन के पास आई, “अम्मू, अम्मू, यह देखो मेरा नीट का रिजल्ट आ गया. मुझे पूरे स्टेट में 5वीं पोजीशन मिली है.” इस बिन मांबाप की बच्ची को उन्होंने बचपन में ही गोद ले कर पाला था.

“ओह, इतनी बढ़िया पोजीशन! सब तेरी कड़ी मेहनत का नतीजा है मेरी लाड़ो. आज तेरी इस शानदार सफलता का जश्न मनाने वृद्धाश्रम चलेंगे. अरे कुश, ओ कुश बेटा, 5 किलो मिठाई ले आना बाज़ार से. सलोनी की यह सफलता कोई मामूली नहीं. पूरे पड़ोस में मिठाई बंटवाऊंगी. ले, ये रुपए ले और जा कर झटपट मिठाई ले आ.”

“हां दादू, हां दादू, तनिक ठंड रखो. अभी बाज़ार जा कर लाता हूं. यह चुहिया अब डाक्टर बनेगी! न बाबा न, मैं तो कभी अपना इलाज इस से नहीं करवाने वाला. इस नीमहकीम की दवाई से कहीं अपना पत्ता ही साफ़ हो गया, तो हो गया अपना बेड़ा गर्क,” कुश ने सलोनी को खिलखिलाते हुए छेड़ा.

“अम्मू, देखो, यह शैतान क्या कह रहा है? बेटू 5वीं पोजीशन आई है मेरी पूरे स्टेट में. कोई छोटीमोटी बात नहीं है यह. मैं तो हार्ट सर्जन बनूंगी.”

“हा…हा…हा…, हार्ट सर्जन! हार्ट खोल कर सिलना भूल जाएगी तो मरीज की तो हो गई छुट्टी!” कुश ने सलोनी को फिर से चिढ़ाया, और वह उसे एक धौल जमाने के लिए उस के पीछेपीछे भागी.

कुछ ही देर में वह नम आंखों से दादी के पास आ कर बैठ गई, और उस ने झुक कर उन के चरण स्पर्श कर लिए. “दादू, अगर आप मुझ अनाथ को अपने घर में ला कर सहारा न देतीं, तो मेरा कुछ न होता.”

“ऐसा नहीं कहते, बेटा.” यह कह कर अम्मा जी ने सलोनी को गले से लगा लिया.

तभी कुश का कोई फोन आया और वह अम्माजी से यह कहते हुए घर से भाग छूटा, “दादू, बहुत जरूरी काम है. मुझे अभी जाना पड़ेगा. लौट कर आते हुए मिठाई लेता आऊंगा.”

“अरे बेटा, यह तो बता दे जा कहां रहा है इतनी जल्दबाजी मैं?”

“आता हूं, दादू. फिर आप को बताता हूं.”

10 बजे घर से गया कुश दोपहर के 3 बजे हैरानपरेशान घर लौटा.

उस का तनावग्रस्त चेहरा देख अम्माजी ने उस से पूछा, “क्या बात है, बेटा? इतने टैंशन में क्यों दिख रहा है?”

“कुछ नहीं, दादू. बस, ऐसे ही,” उस ने बात टालते हुए कहा.

“अपनी दादू को नहीं बताएगा? कोई प्रौब्लम तो जरूर है जो तू इतना टैंशन में दिख रहा है.”

“अरे दादू, वह मेरी फास्ट फ्रैंड रितुपर्णा है न, उस की कुछ प्रौब्लम है. अब मेरी समझ में नहीं आ रहा इसे सौल्व करूं तो कैसे करूं?”

“अरे बेटा, मुझे बता तो सही, तेरी क्या परेशानी है?”

बेहद सकुचातेझिझकते कुश ने अम्मा जी को बताया, “यह रितुपर्णा वैसे तो बहुत अच्छी है, मेरी उस की बहुत पटती है. बस दादू, वह खर्चीली बहुत है. होस्टल में रहती है न. घर से पैसे आते ही वह पहले तो उन्हें नईनई ड्रैसेस व महंगेमहंगे कौस्मेटिक में उड़ा देती है. फिर पैसे खत्म होने पर मुझ से मांगती है. उस पर मेरे नहींनहीं करतेकरते 12 हज़ार रुपए उधार हो गए हैं. अब आप ही बताओ, दादू, पापा मुझे बेहिसाब पैसे तो देते नहीं. वह तो हर महीने अपने रुपए महीने की शुरुआत में ही खर्च कर लेती है. आज भी वह मुझ से जिद कर रही थी कि मैं उस के अगले माह के कालेज ऐक्सकर्शन के लिए रुपए जमा कर दूं. जब मैं ने इस के लिए हामी नहीं भरी, तो उस ने मुझे दस बातें सुना दीं. खूब लड़ीझगड़ी मुझ से.”

“क्या? रुपए न देने की वजह से लड़ीझगड़ी? बातें सुनाई? अरे फिर तो वह सही लड़की नहीं, बेटा. उस से दोस्ती रखना ठीक नहीं. उस से धीरेधीरे दोस्ती तोड़ दे.”

“अरे दादू, उस से दोस्ती तोड़ना आसान नहीं,” कुश ने बेहद मायूसी से कहा.

“क्यों भई? किसी से फ्रैंडशिप रखने की जबरदस्ती थोड़े ही है?”

“अरे दादू, आप समझ नहीं रहीं. वह मेरी खास फ्रैंड है,” इस बार वह तनिक हिचकतेअटकते बोला.

“खास फ्रैंड क्या? तेरा उस से कहीं प्यार व्यार का कोई चक्कर तो नहीं चल रहा?”

“हां दादू. कुछ ऐसा ही समझ लो. पहले तो मुझे उस पर भयंकर क्रश आया हुआ था, लेकिन अब जब से वह मुझ से हर महीने रुपए मांगने लगी है, और नहीं देने पर मुझ से झगड़ने लगी है, तो मेरे प्यार का बुखार उतरने लगा है.”

“वह तो उतरेगा ही, बेटा. हां, एक बात बताओ, तुम मानते हो न कि हर प्यार का अंजाम शादी होना चाहिए?”

“हां दादू, औब्वियसली.”

“साथ ही तुम यह भी मानते हो कि आप को शादी का रिश्ता ऐसे शख्स से जोड़ना चाहिए जिस का वैल्यू सिस्टम पुख्ता हो?”

“यसयस दादू. विदाउट फ़ेल.”

“तुम्हारी इस रितुपर्णा का वैल्यू सिस्टम मुझे बहुत खोखला नजर आ रहा है. जो लड़की बातबात पर अपने बौयफ्रैंड से रुपए मांगती हो. नहीं मिलने पर बुरी तरह से लड़तीझगड़ती हो, उस की वैल्यूज़ में कोई दम नहीं, बेटा. अभी तो तुम्हारी शादी भी नहीं हुई, तो वह किस हक से तुम से रुपए मांगती है और लड़तीझगड़ती है? यह तो उस की बेहद गैरजिम्मेदाराना हरकत है. समझ रहे हो न बेटा, मैं क्या कहना चाह रही हूं?”

“जी दादू. बिलकुल समझ रहा हूं.”

“उस से तू ब्रेकअप कर ले, बेटा. नहीं तो उस से तेरा रिश्ता तुझे जिंदगीभर नासूर की तरह दुख देगा.”

“हां दादू. सोच तो मैं भी यही रहा हूं. पर मैं उस से अपने रिश्ते में इतना आगे बढ़ चुका हूं कि अब पीछे कैसे लौटूं, समझ नहीं पा रहा.”

“तुझे कुछ नहीं करना, बेटा. बस, तू उस से साफसाफ कह दे कि मैं तुम जैसी उड़ाऊ, गैरजिम्मेदार और झगड़ालू लड़की से कोई रिश्ता नहीं रखना चाहता.”

“अरे दादू. यह इतना आसान नहीं.”

“मुश्किल भी नहीं. बस, तुझे यह कहना होगा कि अगर तुम ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा तो मेरी दादी तुम्हारे पेरैंट्स को तुम्हारे ऊपर मेरे 12 हज़ार रुपए की बकाया रकम के बारे में बता देंगी. बस, तेरा इतना कहते ही वह तेरी जिंदगी से दुम दबा कर नौ दो ग्यारह हो जाएगी.”

इस पर कुश ने अम्मा जी के हाथ चूमते हुए कहा, “वाह दादू. मान गया मैं आप को. कितना धांसू आइडिया दिया है आप ने. लव यू, दादू. मैं कल ही उसे साफसाफ लफ्जों में यही कहता हूं और उस से अपनी जान छुड़ाता हूं.”

लाड़ले पोते की यह बात सुन कर अम्माजी की आंखें चमक उठीं. और उन्होंने राहत की सांस ली.

तभी उन की एक सहेली दीपा का फोन आ गया.

“अरे आभाजी, आज कालोनी के मंदिर में कीर्तनभजन का कार्यक्रम रखा है. आप तो कभी इन धर्म के कामों में कोई रुचि ही नहीं लेती हो. घर ही घर में घुसी रहती हो. ऐसी भी क्या व्यस्तता भई, जो बुढ़ापे में परलोक सुधारने की भी सुध न रहे.”

“अरे दीपाजी, परलोक किस ने देखा है? मैं तो अपना यही लोक सुधारने की जुगत भिड़ाने में लगी रहती हूं. घरपरिवार में आएदिन कोई न कोई मसला होता ही रहता है. अब घर की बड़ीबुजुर्ग होने के नाते मेरा ही तो फर्ज है न, उस की उलझनों को सुलझाने का. मुझे तो भई माफ करो. मेरे अपने ही काम बहुत हैं. मेरे पास इन फ़ालतू की चीजों के लिए बिलकुल वक़्त नहीं.”

तभी कुश बाहर से आया और दादी से बोला, “दादू, आप का फ़ौर्मूला तो वाकई हिट रहा. मैं ने जैसे ही उधारी की बात उस के पेरैंट्स को बताने की धमकी दी, वह भीगी बिल्ली बन गई. मैं ने उस से कह दिया, “मैं तुम्हारा नंबर ब्लौक कर रहा हूं. अब कभी मुझे कौंटैक्ट करने की कोशिश मत करना.”

“ओ दादू, लव यू. आप तो वाकई में चमत्कारी हो.” Hindi Family Story.

Hindi Romantic Story: जीत गया जंगवीर

Hindi Romantic Story: ‘‘खत आया है…खत आया है,’’ पिंजरे में बैठी सारिका शोर मचाए जा रही थी. दोपहर के भोजन के बाद तनिक लेटी ही थी कि सारिका ने चीखना शुरू कर दिया तो जेठ की दोपहरी में कमरे की ठंडक छोड़ मुख्यद्वार तक जाना पड़ा.

देखा, छोटी भाभी का पत्र था और सब बातें छोड़ एक ही पंक्ति आंखों से दिल में खंजर सी उतर गई, ‘दीदी आप की सखी जगवीरी का इंतकाल हो गया. सुना है, बड़ा कष्ट पाया बेचारी ने.’ पढ़ते ही आंखें बरसने लगीं. पत्र के अक्षर आंसुओं से धुल गए. पत्र एक ओर रख कर मन के सैलाब को आंखों से बाहर निकलने की छूट दे कर 25 वर्ष पहले के वक्त के गलियारे में खो गई मैं.

जगवीरी मेरी सखी ही नहीं बल्कि सच्ची शुभचिंतक, बहन और संरक्षिका भी थी. जब से मिली थी संरक्षण ही तो किया था मेरा. जयपुर मेडिकल कालेज का वह पहला दिन था. सीनियर लड़केलड़कियों का दल रैगिंग के लिए सामने खड़ा था. मैं नए छात्रछात्राओं के पीछे दुबकी खड़ी थी. औरों की दुर्गति देख कर पसीने से तरबतर सोच रही थी कि अभी घर भाग जाऊं.

वैसे भी मैं देहातनुमा कसबे की लड़की, सब से अलग दिखाई दे रही थी. मेरा नंबर भी आना ही था. मुझे देखते ही एक बोला, ‘अरे, यह तो बहनजी हैं.’ ‘नहीं, यार, माताजी हैं.’ ऐसी ही तरहतरह की आवाजें सुन कर मेरे पैर कांपे और मैं धड़ाम से गिरी. एक लड़का मेरी ओर लपका, तभी एक कड़कती आवाज आई, ‘इसे छोड़ो. कोई इस की रैगिंग नहीं करेगा.’

‘क्यों, तेरी कुछ लगती है यह?’ एक फैशनेबल तितली ने मुंह बना कर पूछा तो तड़ाक से एक चांटा उस के गाल पर पड़ा. ‘चलो भाई, इस के कौन मुंह लगे,’ कहते हुए सब वहां से चले गए. मैं ने अपनी त्राणकर्ता को देखा. लड़कों जैसा डीलडौल, पर लंबी वेणी बता रही थी कि वह लड़की है. उस ने प्यार से मुझे उठाया, परिचय पूछा, फिर बोली, ‘मेरा नाम जगवीरी है. सब लोग मुझे जंगवीर कहते हैं. तुम चिंता मत करो. अब तुम्हें कोई कुछ भी नहीं कहेगा और कोई काम या परेशानी हो तो मुझे बताना.’

सचमुच उस के बाद मुझे किसी ने परेशान नहीं किया. होस्टल में जगवीरी ने सीनियर विंग में अपने कमरे के पास ही मुझे कमरा दिलवा दिया. मुझे दूसरे जूनियर्स की तरह अपना कमरा किसी से शेयर भी नहीं करना पड़ा. मेस में भी अच्छाखासा ध्यान रखा जाता. लड़कियां मुझे से खिंचीखिंची रहतीं. कभीकभी फुसफुसाहट भी सुनाई पड़ती, ‘जगवीरी की नई ‘वो’ आ रही है.’ लड़के मुझे देख कर कन्नी काटते. इन सब बातों को दरकिनार कर मैं ने स्वयं को पढ़ाई में डुबो दिया. थोड़े दिनों में ही मेरी गिनती कुशाग्र छात्रछात्राओं में होने लगी और सभी प्रोफेसर मुझे पहचानने तथा महत्त्व भी देने लगे.

जगवीरी कालेज में कभीकभी ही दिखाई पड़ती. 4-5 लड़कियां हमेशा उस के आगेपीछे होतीं.

एक बार जगवीरी मुझे कैंटीन खींच ले गई. वहां बैठे सभी लड़केलड़कियों ने उस के सामने अपनी फरमाइशें ऐसे रखनी शुरू कर दीं जैसे वह सब की अम्मां हो. उस ने भी उदारता से कैंटीन वाले को फरमान सुना दिया, ‘भाई, जो कुछ भी ये बच्चे मांगें, खिलापिला दे.’

मैं समझा गई कि जगवीरी किसी धनी परिवार की लाड़ली है. वह कई बार मेरे कमरे में आ बैठती. सिर पर हाथ फेरती. हाथों को सहलाती, मेरा चेहरा हथेलियों में ले मुझे एकटक निहारती, किसी रोमांटिक सिनेमा के दृश्य की सी उस की ये हरकतें मुझे विचित्र लगतीं. उस से इन हरकतों को अच्छी अथवा बुरी की परिसीमा में न बांध पाने पर भी मैं सिहर जाती. मैं कहती, ‘प्लीज हमें पढ़ने दीजिए.’ तो वह कहती, ‘मुनिया, जयपुर आई है तो शहर भी तो देख, मौजमस्ती भी कर. हर समय पढ़ेगी तो दिमाग चल जाएगा.’

वह कई बार मुझे गुलाबी शहर के सुंदर बाजार घुमाने ले गई. छोटीबड़ी चौपड़, जौहरी बाजार, एम.आई. रोड ले जाती और मेरे मना करतेकरते भी वह कुछ कपड़े खरीद ही देती मेरे लिए. यह सब अच्छा भी लगता और डर भी लगा रहता.

एक बार 3 दिन की छुट्टियां पड़ीं तो आसपास की सभी लड़कियां घर चली गईं. जगवीरी मुझे राजमंदिर में पिक्चर दिखाने ले गई. उमराव जान लगी हुई थी. मैं उस के दृश्यों में खोई हुई थी कि मुझे अपने चेहरे पर गरम सांसों का एहसास हुआ. जगवीरी के हाथ मेरी गरदन से नीचे की ओर फिसल रहे थे. मुझे लगने लगा जैसे कोई सांप मेरे सीने पर रेंग रहा है. जिस बात की आशंका उस की हरकतों से होती थी, वह सामने थी. मैं उस का हाथ झाटक अंधेरे में ही गिरतीपड़ती बाहर भागी. आज फिर मन हो रहा था कि घर लौट जाऊं.

मैं रो कर मन का गुबार निकाल भी न पाई थी कि जगवीरी आ धमकी. मुझे एक गुडि़या की तरह जबरदस्ती गोद में बिठा कर बोली, ‘क्यों रो रही हो मुनिया? पिक्चर छोड़ कर भाग आईं.’

‘हमें यह सब अच्छा नहीं लगता, दीदी. हमारे मम्मीपापा बहुत गरीब हैं. यदि हम डाक्टर नहीं बन पाए या हमारे विषय में उन्होंने कुछ ऐसावैसा सुना तो…’ मैं ने सुबकते हुए कह ही दिया.

‘अच्छा, चल चुप हो जा. अब कभी ऐसा नहीं होगा. तुम हमें बहुत प्यारी लगती हो, गुडि़या सी. आज से तुम हमारी छोटी बहन, असल में हमारे 5 भाई हैं. पांचों हम से बड़े, हमें प्यार बहुत मिलता है पर हम किसे लाड़लड़ाएं,’ कह कर उस ने मेरा माथा चूम लिया. सचमुच उस चुंबन में मां की महक थी.

जगवीरी से हर प्रकार का संरक्षण और लाड़प्यार पाते कब 5 साल बीत गए पता ही न चला. प्रशिक्षण पूरा होने को था तभी बूआ की लड़की के विवाह में मुझे दिल्ली जाना पड़ा. वहां कुणाल ने, जो दिल्ली में डाक्टर थे, मुझे पसंद कर उसी मंडप में ब्याह रचा लिया. मेरी शादी में शामिल न हो पाने के कारण जगवीरी पहले तो रूठी फिर कुणाल और मुझा को महंगेमहंगे उपहारों से लाद दिया.

मैं दिल्ली आ गई. जगवीरी 7 साल में भी डाक्टर न बन पाई, तब उस के भाई उसे हठ कर के घर ले गए और उस का विवाह तय कर दिया. उस के विवाह के निमंत्रणपत्र के साथ जगवीरी का स्नेह, अनुरोध भरा लंबा सा पत्र भी था. मैं ने कुणाल को बता रखा था कि यदि जगवीरी न होती तो पहले दिन ही मैं कालेज से भाग आई होती. मुझे डाक्टर बनाने का श्रेय मातापिता के साथसाथ जगवीरी को भी है.

जयपुर से लगभग 58 किलोमीटर दूर के एक गांव में थी जगवीरी के पिता की शानदार हवेली. पूरे गांव में सफाई और सजावट हो रही थी. मुझे और पति को बेटीदामाद सा सम्मानसत्कार मिला. जगवीरी का पति बहुत ही सुंदर, सजीला युवक था. बातचीत में बहुत विनम्र और कुशल. पता चला सूरत और अहमदाबाद में उस की कपड़े की मिलें हैं.

सोचा था जगवीरी सुंदर और संपन्न ससुराल में रचबस जाएगी, पर कहां? हर हफ्ते उस का लंबाचौड़ा पत्र आ जाता, जिस में ससुराल की उबाऊ व्यस्तताओं और मारवाड़ी रिवाजों के बंधनों का रोना होता. सुहाग, सुख या उत्साह का कोई रंग उस में ढूंढ़े न मिलता. गृहस्थसुख विधाता शायद जगवीरी की कुंडली में लिखना ही भूल गया था. तभी तो साल भी न बीता कि उस का पति उसे छोड़ गया. पता चला कि शरीर से तंदुरुस्त दिखाई देने वाला उस का पति गजराज ब्लडकैंसर से पीडि़त था. हर साल छह महीने बाद चिकित्सा के लिए वह अमेरिका जाता था. अब भी वह विशेष वायुयान से पत्नी और डाक्टर के साथ अमेरिका जा रहा था. रास्ते में ही उसे काल ने घेर लिया. सारा व्यापार जेठ संभालता था, मिलों और संपत्ति में हिस्सा देने के लिए वह जगवीरी से जो चाहता था वह तो शायद जगवीरी ने गजराज को भी नहीं दिया था. वह उस के लिए बनी ही कहां थी.

एक दिन जगवीरी दिल्ली आ पहुंची. वही पुराना मर्दाना लिबास. अब बाल भी लड़कों की तरह रख लिए थे. उस के व्यवहार में वैधव्य की कोई वेदना, उदासी या चिंता नहीं दिखी. मेरी बेटी मान्या साल भर की भी न थी. उस के लिए हम ने आया रखी हुई थी.

जगवीरी जब आती तो 10-15 दिन से पहले न जाती. मेरे या कुणाल के ड्यूटी से लौटने तक वह आया को अपने पास उलझाए रखती. मान्या की इस उपेक्षा से कुणाल को बहुत क्रोध आता. बुरा तो मुझे भी बहुत लगता था पर जगवीरी के उपकार याद कर चुप रह जाती. धीरेधीरे जगवीरी का दिल्ली आगमन और प्रवास बढ़ता जा रहा था और कुणाल का गुस्सा भी. सब से अधिक तनाव तो इस कारण होता था कि जगवीरी आते ही हमारे डबल बैड पर जम जाती और कहती, ‘यार, कुणाल, तुम तो सदा ही कनक के पास रहते हो, इस पर हमारा भी हक है. दोचार दिन ड्राइंगरूम में ही सो जाओ.’

 

कुणाल उस के पागलपन से चिढ़ते ही थे, उस का नाम भी उन्होंने डाक्टर पगलानंद रख रखा था. परंतु उस की ऐसी हरकतों से तो कुणाल को संदेह हो गया. मैं ने लाख समझाया कि वह मुझे छोटी बहन मानती है पर शक का जहर कुणाल के दिलोदिमाग में बढ़ता ही चला गया और एक दिन उन्होंने कह ही दिया, ‘कनक, तुम्हें मुझे में और जगवीरी में से एक को चुनना होगा. यदि तुम मुझे चाहती हो तो उस से स्पष्ट कह दो कि तुम से कोई संबंध न रखे और यहां कभी न आए, अन्यथा मैं यहां से चला जाऊंगा.’

यह तो अच्छा हुआ कि जगवीरी से कुछ कहने की जरूरत नहीं पड़ी. उस के भाइयों के प्रयास से उसे ससुराल की संपत्ति में से अच्छीखासी रकम मिल गई. वह नेपाल चली गई. वहां उस ने एक बहुत बड़ा नर्सिंगहोम बना लिया. 10-15 दिन में वहां से उस के 3-4 पत्र आ गए, जिन में हम दोनों को यहां से दोगुने वेतन पर नेपाल आ जाने का आग्रह था.

मुझे पता था कि जगवीरी एक स्थान पर टिक कर रहने वाली नहीं है. वह भारत आते ही मेरे पास आ धमकेगी. फिर वही क्लेश और तनाव होगा और दांव पर लग जाएगी मेरी गृहस्थी. हम ने मकान बदला, संयोग से एक नए अस्पताल में मुझे और कुणाल को नियुक्ति भी मिल गई. मेरा अनुमान ठीक था. रमता जोगी जैसी जगवीरी नेपाल में 4 साल भी न टिकी. दिल्ली में हमें ढूंढ़ने में असफल रही तो मेरे मायके जा पहुंची. मैं ने भाईभाभियों को कुणाल की नापसंदगी और नाराजगी बता कर जगवीरी को हमारा पता एवं फोन नंबर देने के लिए कतई मना किया हुआ था.

जगवीरी ने मेरे मायके के बहुत चक्कर लगाए, चीखी, चिल्लाई, पागलों जैसी चेष्टाएं कीं परंतु हमारा पता न पा सकी. तब हार कर उस ने वहीं नर्सिंगहोम खोल लिया. शायद इस आशा से कि कभी तो वह मुझे से वहां मिल सकेगी. मैं इतनी भयभीत हो गई, उस पागल के प्रेम से कि वारत्योहार पर भी मायके जाना छूट सा गया. हां, भाभियों के फोन तथा यदाकदा आने वाले पत्रों से अपनी अनोखी सखी के समाचार अवश्य मिल जाते थे जो मन को विषाद से भर जाते.

उस के नर्सिंगहोम में मुफ्तखोर ही अधिक आते थे. जगवीरी की दयालुता का लाभ उठा कर इलाज कराते और पीठ पीछे उस का उपहास करते. कुछ आदतें तो जगवीरी की ऐसी थीं ही कि कोई लेडी डाक्टर, सुंदर नर्स वहां टिक न पाती. सुना था किसी शांति नाम की नर्स को पूरा नर्सिंगहोम, रुपएपैसे उस ने सौंप दिए. वे दोनों पतिपत्नी की तरह खुल्लमखुल्ला रहते हैं. बहुत बदनामी हो रही है जगवीरी की. भाभी कहतीं कि हमें तो यह सोच कर ही शर्म आती है कि वह तुम्हारी सखी है. सुनसुन कर बहुत दुख होता, परंतु अभी तो बहुत कुछ सुनना शेष था. एक दिन पता चला कि शांति ने जगवीरी का नर्सिंगहोम, कोठी, कुल संपत्ति अपने नाम करा कर उसे पागल करार दे दिया. पागलखाने में यातनाएं झेलते हुए उस ने मुझे बहुत याद किया. उस के भाइयों को जब इस स्थिति का पता किसी प्रकार चला तो वे अपनी नाजों पली बहन को लेने पहुंचे. पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी, अनंत यात्रा पर निकल चुकी थी जगवीरी.

मैं सोच रही थी कि एक ममत्व भरे हृदय की नारी सामान्य स्त्री का, गृहिणी का, मां का जीवन किस कारण नहीं जी सकी. उस के अंतस में छिपे जंगवीर ने उसे कहीं का न छोड़ा. तभी मेरी आंख लग गई और मैं ने देखा जगवीरी कई पैकेटों से लदीफंदी मेरे सिरहाने आ बैठी, ‘जाओ, मैं नहीं बोलती, इतने दिन बाद आई हो,’ मैं ने कहा. वह बोली, ‘तुम ने ही तो मना किया था. अब आ गई हूं, न जाऊंगी कहीं.’

तभी मुझे मान्या की आवाज सुनाई दी, ‘‘मम्मा, किस से बात कर रही हो?’’ आंखें खोल कर देखा शाम हो गई थी. Hindi Romantic Story.

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Hindi Family Story: भारत और पाकिस्तान के बीच पुन: एक दोस्ती का पैगाम. एक बार फिर से दिल्लीलाहौर बस सेवा शुरू होने जा रही है. जैसे ही रात के समाचारों में यह खबर सुनाई दी, रसोई में काम करतेकरते मेरे हाथ अचानक रुक गए. दिल में उठी हूक के साथ मां की ओर देखा तो उन का सपाट व शांत चेहरा थोड़ी देर के लिए हिला और फिर पहले जैसा शांत हो गया. आज के समाचार ने मुझे 2 साल पीछे धकेल दिया. वे सारी घटनाएं, जिन्होंने इस परिवार की दुनिया ही बदल दी, मेरी आंखों के सामने सिनेमा की तसवीर की तरह घूमने लगीं.

हम 2 बहन और 1 भाई थे. मातापिता का लाड़प्यार हर पल हमें मिलता रहता था. मैं सब से छोटी थी. भैया व दीदी जुड़वां थे. दीदी मात्र 4 मिनट भैया से बड़ी थीं. बचपन से ही वे आपस में काफी घुलेमिले थे पर झगड़े भी दोनों में खूब होते थे.

मैं उन दोनों से 7 साल छोटी होने के कारण दोनों की लाड़ली थी. मुझे तो शायद याद भी नहीं कि मेरी लड़ाई उन दोनों से कभी हुई हो. संजय भैया पढ़ाई में काफी होशियार थे. यद्यपि दीदी भी पढ़ने में तेज थीं किंतु उन का मन खेलकूद की ओर अधिक लगता था. जिला स्तर पर खेलतेखेलते कई बार उन का चुनाव राज्य स्तर पर भी हुआ जोकि मां को कभी अच्छा नहीं लगा क्योंकि मुझे व दीदी को ले कर मां की सोच पापा से थोड़ी संकरी थी. खासकर तब जब दीदी को खेलने के लिए अपने शहर से बाहर जाने की बात होती थी, तब भैया का साथ ही मां और पापा के प्रतिरोध को हटा पाता था और इस तरह दीदी को बाहर जा कर खेलने का मौका मिलता था.

मलयेशिया की राजधानी क्वालालम्पुर में कई देशों की टीमें आई थीं. वहीं पर दीदी की मुलाकात अनुपम से हुई जो किसी पाकिस्तानी खिलाड़ी का रिश्तेदार था और उस के साथ ही क्वालालम्पुर आया था. दोनों की मुलाकात काफी दिलचस्प थी. दिन में दोनों एकसाथ कौफी पीने जाया करते थे. चेहरे के नैननक्श अपने जैसे होने के कारण दोनों ने एकदूसरे से बात करने में दिलचस्पी दिखाई. धीरेधीरे दोनों ने ही महसूस किया कि उन में दोस्ती के अलावा कुछ और भी है. इसी तरह 7 दिन की मुलाकात में ही उन का प्यार परवान चढ़ने लगा था. दीदी जब लौट कर आईं तो कुछ बदलीबदली सी थीं. मां की अनुभवी आंखों को समझते देर न लगी कि दीदी के मन में कुछ उथलपुथल मची है. मां के थोड़े से प्रयासों से पता चला कि दीदी जिसे चाहती हैं वह पाकिस्तानी हिंदू है. यद्यपि लड़का पाकिस्तान में इंजीनियर है पर वह पाकिस्तान से बाहर किसी अच्छी नौकरी की तलाश में है. कुल मिला कर लड़का किसी भी तरफ से अनदेखा करने योग्य न था. बस, उस का पाकिस्तानी होना ही सब के लिए चुभने वाली बात थी.

यहां भी भैया ने दीदी का साथ दिया. आखिर एक दिन हम सब को छोड़ कर दीदी अपने ससुराल चली गई. हालांकि पाकिस्तान के नाम से दीदी के मन में भी थोड़ा अलग विचार आया था लेकिन वहां ऐसा कुछ नहीं था. अनुपम के परिवार ने दीदी का खुले दिल से स्वागत किया. एक खिलाड़ी के रूप में दीदी की शोहरत वहां पर भी थी, तो तालमेल बैठाने में दीदी को कोई परेशानी नहीं हुई.

दीदी के जाते ही पूरा घर सूना हो गया. भैया का मन नहीं लगता तो दीदी के घर का चक्कर लगा आते थे. मां कहतीं कि बेटी के घर इतनी जल्दीजल्दी जाना ठीक नहीं, पर भैया का यही उत्तर होता कि देखो न मां, दीदी के ससुराल जाते ही हमारी सरकार ने भारतपाकिस्तान के बीच बस सेवा शुरू कर दी है.

पढ़ाई समाप्त कर भैया ने भी नौकरी की तलाश शुरू कर दी. हमारा मध्यवर्गीय परिवार था. घर की आर्थिक स्थिति को देखते हुए भैया को नौकरी की जरूरत महसूस होने लगी. उन के प्रथम श्रेणी में पास होने के प्रमाणपत्र भी उन्हें कोई नौकरी नहीं दिला सके तो उन्होंने सोचा, जब तक नौकरी नहीं मिलती क्यों न राजनीति में ही हाथपांव मारे जाएं. कालिज में 2 बार उपाध्यक्ष पद पर रह चुके थे. ऐसे में उन्हें अपने दोस्त समीर की याद आई, जोकि उन के साथ कालिज में अध्यक्ष पद के लिए चुना गया था.

समीर हमारे घर भी काफी आताजाता था. उस के पिता विधायक थे. भैया को लगा, वे शायद कुछ मदद कर सकते हैं. पर भैया ने एक बात नोट नहीं की, वह थी कि दीदी की शादी होते ही समीर ने भैया के साथ अपनी दोस्ती काफी सीमित कर ली थी.

समीर के पिता ने आश्वासन दिया कि अच्छी नौकरी में वे भैया की मदद करेंगे, यदि कोई बात नहीं बनी तो राजनीति में तो शामिल कर ही लेंगे. इसी दौरान किसी काम के सिलसिले में भैया को दीदी के घर जाना पड़ा. इस बार समीर भी उन के साथ पाकिस्तान गया. दीदी के ससुराल वाले बड़ी आत्मीयता के साथ समीर से मिले. केवल बाबूजी यानी दीदी के ससुर से समीर की ज्यादा बातचीत नहीं हो सकी क्योंकि वे उस दौरान सरहदी मामलों को ले कर काफी व्यस्त थे और 2 ही दिन बाद भैया व समीर को वापस भारत आना था.

वापस आ कर भैया जब समीर के घर गए तो उस के पिता ने घुसते ही उन से सीधे सवाल पूछा, ‘संजय, क्या तुम बता सकते हो कि तुम्हारी बहन क्या जासूसी करती है?’

उन के मुंह से यह सवाल सुन कर भैया सन्न रह गए. उन्हें सपने में भी इस तरह के सवाल की उम्मीद नहीं थी. अत: वह पूछ बैठे, ‘अंकल, आप के इस तरह सवाल पूछने का मतलब क्या है?’

‘बड़े भोले हो तुम, संजय,’ वह बोले, ‘तुम्हारी बहन की शादी को 2 साल हो गए. अभी तक तुम वास्तविकता से अनजान हो. अरे, उस पाकिस्तानी ने जानबूझ कर तुम्हारी बहन को फंसाया है ताकि पत्नी के सहारे वह भारत की सारी गतिविधियों की खबर लेता रहेगा. यही नहीं उस का ससुर सेना में अधिकारी है. इसलिए उस ने तुम्हारी बहन को अपने घर की बहू बनाना स्वीकार किया ताकि देश के अंदर की जानकारी उसे हो सके.’

‘यह सब बेबुनियाद बातें हैं,’ इतना कह कर भैया घर वापस आ गए. पर जासूस वाली बात उन के दिल में कहीं चुभ गई. भैया ने नोट किया कि दीदी अपने ससुर से काफी हिलीमिली हैं. लगता ही नहीं कि दीदी उन की बहू हैं. वह उन के आफिस भी आतीजाती हैं. बाबूजी भी दीदी से काफी प्यार जताते हैं और जब भी मैं दीदी से मिलने जाता हूं तो मुझ से बात करने का भी उन के पास समय नहीं रहता. शक का छोटा बुलबुला जब कुछ बड़ा हुआ तो भैया दीदी से फोन पर घर के हालचाल से ज्यादा भारत के अंदर की खबरों के बारे में बात करते. दीदी सिर्फ सुनतीं और हां हूं में ही जवाब देतीं तो भैया को लगता कि दीदी पहले जैसी नहीं रहीं, सिर्फ पाकिस्तानी बन कर रह गई हैं.

पिछली बार जब समीर घर आया तो भैया से कहने लगा कि देख संजय, पिताजी की बातों में कुछ तो दम है. जब मैं तेरे साथ दीदी के घर गया था तो शायद तू ने ध्यान नहीं दिया हो, किंतु मैं ने ऐसी कई बातें नोट कीं जोकि मुझे शक करने को मजबूर कर रही थीं. जैसे तेरी दीदी के साथ उन के ससुराल वालों का हमेशा हिंदुस्तानी खबरों पर बात करना. और हमारे देश में भी उतारचढ़ाव होते रहे हैं, उन के बारे में विस्तार से चर्चा करना.

भैया उस की बातें चुपचाप सुनते रहे थे. एक बार भैया ने दीदी को फोन किया व जानबूझ कर अपनी नौकरी व देश के माहौल के बारे में बात करने लगे. थोड़ी देर तक दीदी उन की बातें सुनती रहीं फिर एकाएक भैया की बात काट कर वह बीच में ही बोल पड़ीं, ‘संजय, मैं तुम से रात में बात करती हूं, अभी मुझे कुछ जरूरी काम के सिलसिले में बाहर जाना है.’

अब तो भैया के मन में शक के बीज पनपने लगे. उन्होंने गौर किया कि आमतौर पर दीदी मेरा फोन नहीं काटतीं पर आज जब मैं ने थोड़ी अपने देश के अंदर की कुछ बातें उन्हें बताईं तो मेरा फोन काट कर फौरन अपने बाबूजी को खबर देने चली गईं.

इस दौरान जीजाजी को अमेरिका में नौकरी मिल गई. पतिपत्नी अमेरिका चले गए. वहां पर पाकिस्तानी ग्रुप एसोसिएशन के कारण काफी पाकिस्तानी लोग मिले. इन सब से वहां पर दीदी का मन लगने लगा. पिछली बार फोन कर के जब दीदी ने इस ग्रुप के बारे में भैया को बताया तो वह बीच में ही बोल पड़े, ‘तुम कोई इंडियन ग्रुप क्यों नहीं ज्वाइन करतीं? ऐसा तो है नहीं कि अमेरिका में इंडियन नहीं हैं.’

भैया की यह बात सुन कर दीदी बोली थीं, ‘क्या फर्क पड़ता है…मात्र एक दीवार से दिल नहीं बंटते. वैसे भी बाहर आ कर सब एक ही लगते हैं…क्या हिंदुस्तानी क्या पाकिस्तानी.’

अब भैया का शक अंदर ही अंदर साकार रूप लेने लगा. इधर हम सब इन बातों से काफी अनजान थे. भैया परेशान दिखते तो हम सब को यही लगता कि नौकरी को ले कर परेशान हैं. वह जब भी दीदी से बात करते तो दीदी जानबूझ कर चिढ़ाने के लिए पाकिस्तानी ग्रुप की बातें ज्यादा किया करती थीं. पर उन्हें क्या पता कि यही सब बातें एक दिन उन की जान की दुश्मन बन जाएंगी.

समीर व उस के पिता की बातें सुनतेसुनते भैया के अंदर एक कट्टर विचारधारा ने जन्म ले लिया था. दीदी कुछ दिनों के लिए घर आ रही थीं. उन्हें पहले अपनी ससुराल पाकिस्तान जाना था फिर मायके यानी हिंदुस्तान आना था. उन का प्लान कुछ ऐसा बना कि वह पहले मायके आ गईं और एक हफ्ते रह कर अपनी ससुराल चली गईं.

‘देखा संजय, तुम्हारी बहन पहले अपनी ससुराल जाने वाली थी फिर यहां हिंदुस्तान आती पर नहीं, यदि वह ऐसा करती तो यहां की ताजा खबरें कैसे अपने ससुर को दे पाती? वाह, मान गए तुम्हारी बहन को,’ ऐसा कह कर समीर के पिता ने जोर से ठहाका लगाया.

इस घटना के दूसरे ही दिन भैया मां से बोले, ‘मैं दीदी से मिलने पाकिस्तान जा रहा हूं. हो सका तो साथ ले कर आऊंगा.’

‘अभी तो हफ्ते भर रह कर गई है. थोड़ा उसे अपने ससुराल वालों के साथ भी रहने दे. वरना वे क्या सोचेंगे?’ मां बोलीं.

भैया ने मां की बात अनसुनी कर दी. मां को लगा शायद भाईबहन का प्यार उमड़ रहा है.

दीदी के घर पहुंच कर उन के घर वालों से भैया बोले कि घर पर पापा की तबीयत अचानक खराब हो गई है इसलिए कुछ दिनों के लिए दीदी को ले कर जा रहा हूं. जल्दी ही वापस छोड़ जाऊंगा.

जीजाजी तो नहीं आए पर भैया दीदी को ले कर लाहौर से दिल्ली वाली बस पर बैठ गए. बस में ही भैया ने दीदी से उलटेसीधे सवाल करने शुरू कर दिए. दीदी को लगा, यों ही पूछ रहा है पर उन के चेहरे पर गुस्सा व ऊंची होती आवाज से दीदी हैरान रह गईं. फिर भी उन्होंने भैया से यही कहा, ‘इस बस में तो ऐसी बातें मत करो, संजय, और भी पाकिस्तानी बैठे हैं.’

भैया को उस समय किसी की परवा नहीं थी. उन्हें सिर्फ अपने ढेरों सवालों के जवाब चाहिए थे. किसी तरह दीदी, भैया को धीरे बोलने के लिए राजी कर पाईं.

‘सुनो संजय, मुझे अपना घर सब से प्यारा है. भले ही वह पाकिस्तान में क्यों न हो और सब से ज्यादा घर वाले, ससुराल वाले प्यारे हैं,’ इतना कह दीदी चुप हो कर खिड़की से बाहर की ओर देखने लगीं. भैया भी चुपचाप बैठ गए.

लाहौर से निकलने के बाद विश्राम के लिए एक स्थान पर बस रुकी. सभी यात्री नीचे उतर कर सड़क पार करने लगे. भैया व दीदी दूसरे यात्रियों से थोड़ा पीछे थे क्योंकि दोनों का मूड खराब था. वे एकदूसरे से बात भी नहीं कर रहे थे. जैसे ही दीदी व भैया सड़क पार करने लगे कि सामने से दूसरी बस को आती देख वे रुक गए.

सामने से आती बस उन्हें क्रास करने वाली थी कि जाने कहां से भैया के हाथों में हैवानी शक्ति आ गई और पूरे जोर से उन्होंने दीदी को बस के सामने धकेल दिया पर दीदी ने बचाव के लिए भैया की बांह भी जोर से थाम ली, दोनों एकसाथ बीच सड़क पर बस के आगे जा गिरे और दोनों को रौंदती हुई बस आगे चली गई. इस हादसे को देख कर सारे यात्री सन्न रह गए. आननफानन में एंबुलेंस बुलाई गई. दोनों में प्राण अभी बाकी थे.

‘यह क्या किया मेरे भैया, अपनी बहन पर इतना विश्वास नहीं,’ दीदी रोरो कर, अटकअटक कर बोलती रहीं मानो जाने से पहले सारी गलतफहमी दूर कर देना चाहती थीं, ‘यह तुम्हारा ही दिया संस्कार है न मां कि पति का घर ही शादी के बाद अपना घर होता है व उस के घर वाले अपने. बोलो न मां, मेरी क्या गलती है? अरे, मैं तो बाबूजी को खाना देने उन के आफिस जाया करती थी. उन के कोई बेटी नहीं थी इसी से वह मुझे बेटी बना कर रखते थे. वे लोग तो बहुत ही सीधे हैं मेरे भैया. हमेशा मुझे मानसम्मान देते रहे हैं.’

‘मुझे माफ करना, दीदी, मैं लोगों की बातों में न आ कर काश, अपने दिल की सुनता,’ इतना कह कर भैया भी अटकअटक कर रोने लगे.

कुछ ही पल बाद दोनों भाईबहन शांत हो गए. एकसाथ ही इस दुनिया में आए थे और साथ ही चले गए.

मांपापा को तो जैसे होश ही नहीं रहा. उन की आंखों के सामने ही उन की 2 संतानों ने अपनी जान गंवा दी, महज एक गलतफहमी के कारण. मैं पागलों की भांति कभी मां को देखती, कभी पापा को चुप कराती. एक ही पल में सबकुछ बिखर गया.

दूसरे दिन समाचार की सुर्खियों में छाया रहा, ‘देश की भूतपूर्व खिलाड़ी की उस के भाई के साथ बस दुर्घटना में दर्दनाक मौत.’

तब से समीर हमारे घर नहीं आया. आता भी क्यों, उस की मनोकामना जो पूरी हो चुकी थी. उजड़ा तो हमारा घर था.

घड़ी ने 10 बजने का अलार्म दिया, मेरी तंद्रा भंग हुई. अभी तक मम्मीपापा ने खाना नहीं खाया है. उन्होंने अपने को बंद कमरे में समेट लिया है. वहीं उन की सुबह होती है, वहीं रात होती है. उन्हें अपनी परवा नहीं है किंतु मुझे तो है. आखिर, मेरे अलावा उन्हें देखने वाला और कौन है? Hindi Family Story.

Hindi Social Story: चांद पर जाने का ख्याल पहले किस शायर के दिलोदिमाग में आया था?

Hindi Social Story: साल 1962 में प्रदर्शित कमाल अमरोही की फिल्म ‘पाकीजा’ में मशहूर शायर कैफ भोपाली ने मीना कुमारी और राजकुमार से यह गाना गवाया था,”चलो दिलदार चलो चांद के पार चलो… हम हैं तैयार चलो…”

जैसे ही चंद्रयान 3 ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर लैंड किया तो साबित यह हुआ कि सपने देखते तो साहित्यकार हैं पर उन्हें सच कर दिखाने का माद्दा सिर्फ वैज्ञानिकों में ही होता है।

चांद पर जा कर हम ने अपनी श्रेष्ठता, योग्यता और प्रतिभा साबित भी कर दी है जिस पर दीवाली जैसी आतिशबाजी स्वाभाविक बात थी। हर किसी ने इस कामयाबी को अपने लिहाज से भुनाया जिस से लगा कि इस जश्न के पीछे भी पूर्वाग्रह है. हम एकदूसरे को बधाई नहीं दे रहे बल्कि एकदूसरे को नीचा दिखाने की मानसिकता प्रदर्शित कर रहे हैं.

वैज्ञानिक उपलब्धियों का श्रेय लेने की होड़ तो कुछ इस तरह थी मानो किसी हाटबाजार में टमाटर लुट रहे हों। इस की शुरुआत 20 अगस्त से ही शुरू हो गई थी। देशभर के मंदिरों में पूजापाठ, यज्ञ और हवनों का दौर था। कई जगह तो शिव के अभिषेक भी हुए जिन के गले में चंद्रमा टाई की तरह लटका रहता है। फिर 21, 22 और 23 अगस्त आतेआते तो लोग पगला उठे। हर जगह से आह्वान होने लगा कि चलो फलां मंदिर में चंद्रयान 3 की सफल लैंडिंग के लिए विशेष अनुष्ठान और कर्मकांड किए जा रहे हैं। कई भक्तों ने तो कांवड़ यात्राएं तक आयोजित कर डालीं।

चंद्रमा हमारे लिए आस्था का विषय रहा है। उस के नाम पर व्रत, तीज, त्योहार और दानदक्षिणा बेहद आम हैं। अब इस की पोल खुलने जा रही थी तो धर्म के दुकानदार घबरा उठे। लिहाजा, उन्होंने भजनकीर्तन कर यह जताने की कोशिशों में कोई कमी नहीं छोड़ी कि वैज्ञानिक तो निमित्त और माध्यम मात्र हैं। दरअसल, ईश्वर ऐसा चाहता है और बिना उस की परमिशन के चांद को छू पाना नामुमकिन है। यह और बात है कि चंद्रयान की सफलता के आयोजनों में भी दोनों हाथों से दक्षिणा बटोरी गई. भले ही सालों पहले कोई नील आर्मस्ट्रांग चांद पर उतरा था लेकिन अब हमारी बारी थी और बगैर हरि इच्छा के यह या कोई और मिशन कामयाब हो जाए ऐसा हम होने नहीं देंगे।

तो चंद्रयान 3 यों ही चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर लैंड नहीं कर गया बल्कि इस के लिए भक्तों ने 72 घंटे बड़ी मेहनत की। देश के गलीमोहल्लों तक में लोग इकट्ठा थे। कुछ को तो यह भी नहीं मालूम था कि वे क्यों पूजापाठ का हिस्सा बने हैं। ये वे लोग हैं जो कहीं भी कभी भी उस मंदिर के प्रांगण में हाथ जोड़े जा खड़े होते हैं जहां से सुबहशाम आरती की आवाज आ रही होती है। इन्हें नहीं मालूम कि लैंडर और रोवर किस बला के नाम हैं। इन्हें यह जरूर मालूम है कि अक्षत कब चढ़ाए जाते हैं और स्वाहा कब बोला जाता है।

काशी, उज्जैन, मथुरा, वृंदावन, प्रयागराज, नासिक, हरिद्वार, ऋषिकेष सहित अयोध्या में भी स्पैशल अनुष्ठान हुए। वैज्ञानिकों की मेहनत पर भगवान पानी न फेर दे इस के लिए फायर ब्रैंड साध्वी ऋतंभरा ने मथुरा में कई बार हनुमान चालीसा का पाठ किया तो अयोध्या में तपस्वी छावनी के जगतगुरू आचार्य परमहंस के नेतृत्व में चारों वेदों की ऋचाओं का पाठ साधुसंतों ने किया। इस पर भी जी नहीं भरा तो महामंत्र और विजयमंत्र का भी पाठनवाचन किया गया।

छुटभैयों से ले कर ब्रैंडेड मंदिरों में हर कैटिगिरी के साधुसंतों ने ऐसा समां बांधा, इतना होहल्ला मचाया कि एक बार तो लगा कि कहीं सचमुच में भगवान खासतौर से कल्कि अवतार जिस की जयंती पिछले दिनों मनाई गई थी, धरती पर आ कर इन भक्तों के पांव यह कहते न पकड लें कि मुझे बख्शो मेरे बच्चो, चंद्रयान 3 सफल होगा इस का मैं वरदान देता हूं।

सारा श्रेय सनातनी ही ले जा रहे हैं, यह खयाल आते ही मुसलिम धर्मगुरू भी जंग के इस मैदान में कूद पड़े और जगहजगह मसजिदों में विशेष नमाज होने लगी। इस से आम मुसलमानों में भी जोश आया कि देश हमारा भी है और कहीं ऐसा न हो कि कल को हमें इस बिना पर भी न लताड़ा जाने लगे कि तुम ने तो चंद्रयान 3 की कामयाबी के लिए नमाज तक नहीं पढ़ी। इसलिए तुम देशभक्त नहीं हो। देखते ही देखते देशभर के लाखों मुसलमानों के हाथ ऊपर उठे और गंगाजमुनी तहजीब की मिसाल कायम हो गई। हालांकि इस ड्रामे का भी कोई मतलब नहीं था लेकिन इतना जरूर साबित हुआ कि कम से कम विज्ञान का कचरा करने के मुद्दे पर सभी धर्म एक हैं और सहमत हैं कि विज्ञान और तर्क हमारी रोजीरोटी को निगल जाएंगे इसलिए उसे पूजापाठ और नमाजोंदुआओं की चादर से इतना ढंक दो कि लोगों को सिर्फ अपनेअपने ऊपरवाले दिखें।

इसरो के वे नीचे वाले और उन की ये कोशिशें नही दिखें जिन से यह साबित होता है कि चंद्रमा कोई देवता नहीं बल्कि एक उपग्रह है जिस के दक्षिणी ध्रुव पर पानी और कैमिकल्स वगैरह हैं और जहां आइंदा कभी आदमी का रहना मुमकिन है।

एक दिन में ही पूजापाठ का यह रोग कोरोना वायरस से भी ज्यादा फैला। जैन मंदिरों में पूजापाठ हुआ, गुरुद्वारों में अरदास का दौर चला। केंद्रीय मंत्री हरदीप पूरी इस बाबत खासतौर से दिल्ली के गुरूद्वारे बंगला साहिब गए। और तो और रांची में आदिवासियों ने अपनी आराध्य सरना मां से प्रार्थना की। कुछ गिरिजाघरों में भी प्रार्थना की गई।

योगगुरू बाबा रामदेव ने भी बहती गंगा में हाथ धोते हरिद्वार में हवन कर डाला। अच्छा तो उन का यह बताना न रहा कि चंद्रमा पर इतनी दुर्लभ जड़ीबूटियां पाई जाती हैं जो संजीवनी से भी ज्यादा करामाती और कारगर होती हैं। जैसे ही चांद पर आवाजाही आम होगी तो वे और बालकृष्ण वहां जा कर इन्हें लाएंगे और पतंजलि चांद की जड़ीबूटियों से बने प्रोडक्ट लांच करेगी।

माहौल स्कूलकालेजों में भी गरमाया जहां शासन के आदेश पर छात्र और अध्यापक टीवी स्क्रीन के सामने बैठे समोसा कुतरते अगले आइटम का इंतजार कर रहे थे जो 23 अगस्त को ठीक 6 बज कर 4 मिनट के कुछ देर ही बाद नुमाया हुआ। यह देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे जिन के स्क्रीन पर प्रगट होते ही लगा कि प्रार्थनाएं, पूजापाठ और दुआएं जाया नहीं गई हैं। कम से कम नीचे वाले तो प्रगट हुए. मोदीजी ने संक्षिप्त और सारगर्भित संस्कृतनुमा भाषण दिया। तब वे दक्षिण अफ्रीका में सरकारी दौरे पर थे। लेकिन गौरतलब यह कि देश को और चंद्रयान को नहीं भूले थे।

उन्होंने लगभग वही कहा जो मथुरा में आसीन आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने चंद्रयान 3 की सफलता के बाद कहा था। जिस का सार यह है कि यह उपलब्धि वैश्विक अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए भी मील का पत्थर है। इस का एक सार यह भी है कि हम ने विश्वगुरू बनने की तरफ एक कदम और बढ़ा दिया है। इसलिए भारत जो भी करता है पूरी दुनिया के लिए करता है। रही बात इसरो की तो उस के चीफ एस सोमनाथ तो पहले से ही वेदपुराणों में आस्था जताते रहे हैं कि नया कुछ नहीं है सबकुछ वेदों में पहले से ही लिखा है।

असल में हम विश्वगुरू तो तब से ही हैं जब विश्व नाम की कोई चीज अस्तित्व में ही नहीं थी। अफसोस तो इस बात का है कि हमारे ज्ञानविज्ञान को यूरोप और दूसरे विदेशियों ने चुराया। सोमनाथ की मानें तो दुनिया में जितने भी वैज्ञानिक आविष्कार हुए हैं वे हमारे वेदों और पूर्वजों की देन हैं। हम कभी उन्नत विज्ञान के मालिक हुआ करते थे।

इस बाबत वे गिना भी सकते हैं कि संजय ने धृतराष्ट्र को महाभारत का जो आखों देखा हाल सुनाया था वह दरअसल आज की तरह का आम वीडियो कौल था। लेकिन वे चाह कर भी यह नहीं बता सकते कि पौराणिक युग में खीर और कान के मैल से बच्चे कैसे पैदा हो जाते थे? किसी योद्धा का एक सिर कटता था तो दूसरा वह भी हुबहू कैसे आ जुड़ता था? किसी बच्चे की गरदन पर हाथी का सिर वह भी भारीभरकम सूंङ सहित कैसे जोड़ दिया जाता था?

ऐसे सवाल अंतहीन हैं जिन का चंद्रयान 3 की सफलता का श्रेय लेने वाले लीडर से इतना ताल्लुकभर है कि यह सब था लेकिन हम अज्ञानी वक्त रहते इसे न समझ पाए और न ही संभाल पाए। जाहिर है, सोमनाथ भी आस्था या किसी लालच, दबाव या विवशता के चलते वह भाषा बोल रहे हैं जो प्रमाण और परिणाम नहीं बल्कि मान्यताओं को थोपती है।

हम कथित तौर पर लुटे इसलिए कि हम आज भी जातपात, धर्म के पचड़े में पड़े हैं। यह मिशन इसरो टीम की मेहनत, प्रतिभा और कोशिशों से कामयाब नहीं हुआ बल्कि ईश्वर कृपा से हुआ है जिस के लिए खुद सोमनाथ जुलाई में खासतौर से तिरुपति के मंदिर में पूजापाठ कर के आए थे। हरि ने उन की सुन ली तो मुमकिन है कि वे जल्द ही मन्नत पूरी होने पर फिर तिरुपति जाएं और सूर्य मिशन की तैयारियों में जुट जाएं जिसे हनुमान ने फल समझ कर मुंह में ले लिया था। इस पर वे या कोई और यही कहेगा कि हनुमान का मुंह फायर प्रूफ था।

अब अहम सवाल यह कि हम बच्चों को क्या पढ़ाएं और युवाओं को क्या समझाएं यह कि एक तरफ तो चंद्रमा उपग्रह साबित हो चुका है और भारत ने उस के दक्षिणी ध्रुव पर दस्तक दे दी है। दूसरी तरह हमारे धर्मग्रंथ कहते हैं कि चंद्रमा ब्रह्मा के मानसपुत्रों में से एक अत्रि की संतान था जिस की शादी कर्दम मुनि की बेटी अनुसुईया से हुई थी। चंद्रमा इन्हीं दोनों का बेटा है। चंद्रमा की शादी दक्ष प्रजापति की 27 बेटियों से हुई थी जिन्हें नक्षत्र कहा और माना जाता है।

कुछ लोगों ने तो चंद्रमा पर जमीन बेचने और खरीदने का भी कारोबार शुरू कर दिया है। चंद्रयान 3 की कामयाबी के बाद तो लगता है कि चंद्रमा रियल एस्टेट का केंद्र बन कर रह जाएगा।

लेकिन 23 अगस्त को एक खास बात यह भी हुई है कि हमारी धार्मिक और पौराणिक मान्यताएं ध्वस्त हो गई हैं लेकिन इस से लोग तार्किक सोच पाएंगे ऐसा लग नहीं रहा। यह बात 1 नवंबर को करवाचौथ पर सिद्ध भी हो जाना है। इस दिन महिलाएं चंद्रमा का पूजापाठ करेंगी गणेश चतुर्थी पर लोग चंद्रमा को देखने से बचते हैं क्योंकि एक और किस्से के मुताबिक इस दिन चांद को जो देखता है उस पर चोरी का आरोप लगता है। ऐसे मौकों पर हंसीमजाक भी होगा जो 23 अगस्त से ही शुरू हो गया है।

एक वायरल मीम में कुछ महिलाएं बैठी बतिया रही हैं कि चंद्रमा पर अगर बस जाएंगे तो करवाचौथ पर पूजापाठ किस का करेंगे? एक और पोस्ट में उन प्रेमियों को नसीहत दी जा रही है जो माशूका के लिए चांदतारे तोड़ कर लाने का सनातनी पुरातनी वादा करते हैं। एक पोस्ट में कहा गया कि चंद्रयान से मैसेज आया है कि किसी की भी पत्नी या प्रेमिका की शक्ल चांद से नहीं मिलती है। अब तक सारे मर्द औरतों को वेबकूफ बनाते रहे थे।

लोगों ने चंद्रयान के रोमांचक क्षणों को जिया है तो बाद में उस पर स्वस्थ हंसीमजाक भी जम कर किया है लेकिन इस पर राजनीति भी जम कर हुई जिस की शुरुआत न्यूज चैनल्स पर बाइट्स दे रहे आम लोगों ने की कि यह तो मोदीजी का कमाल है। हम उन्हें बधाई देते हैं व उन का आभार व्यक्त करते हैं। मोदीजी के स्क्रीन पर अवतरित होने के बाद तो भक्त ऊपरवाले को भूल कर नीचेवाले इन भगवान का गुणगान करते दिखे. मानो मोदीजी न होते या न चाहते तो चंद्रयान अभियान परवान नहीं चढ़ पाता।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने तो मोदीजी का आभार व्यक्त करते सभी अखबारों में एक पेज का सरकारी विज्ञापन भी छपवा दिया। चाटुकारिता, खुशामद और व्यक्तिपूजा की इस से बड़ी मिसाल शायद ही कहीं मिले। इस खेल में बेचारा इसरो औपचारिक बधाई का पात्र बन कर रह गया।

इस पर विपक्ष को मिर्ची लगनी स्वभाविक बात थी कि महज प्रधानमंत्री होने के नाते मोदीजी सारा श्रेय हकदार न होते हुए भी ले जा रहे हैं तो उन्होंने अपनी शुभकामनाओं में इसरो और वैज्ञानिकों को बधाई पर खासा जोर दिया कि कहीं सचमुच में लोग यह न मान बैठें कि यह मोदीजी का चमत्कार है। राहुल गांधी ने तो अपने संदेश में खासतौर से यह कहा कि अंतरिक्ष गतिविधियों ने 1962 में जोर पकड़ा था वे अब फलीभूत हो रही हैं। इस बहाने उन्होंने अपने पूर्वजों के योगदान को याद दिलाने की कोशिश की।

लेकिन नेहरू, इंदिरा और राजीव गांधी भगवा गैंग के लिए कोसने के किरदार भर हैं। उन्हें तभी याद किया जाता है जब किसी परेशानी का ठीकरा फोड़ना होता है। ऐसे में राहुल को यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि चंद्रयान की सफलता और इसरो के गठन का श्रेय उन के पुरखों को देने की जहमत कोई उठाएगा।

अब चांद पर बसने की सुगबुगाहट ने कईयों को रोमांचित कर दिया है। लोग मीना कुमारी और राजकुमार की तरह चांद पर बसने जाने को तैयार हैं क्योंकि वे धरती की आपाधापी, नफरत और रोजरोज दुश्वार होती जिंदगी से आजिज आ चुके हैं। लेकिन लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि अगर आदमी चांद पर बसा तो वह धरती से धर्म और भगवान जरूर ले जाएगा और वहां भी मंदिरमसजिद और चर्च वगैरह बनाएगा। फिर शुरू होगा जातपात का फसाद, धार्मिक दुकानदारी और रंगभेद सहित अमीरीगरीबी का भी भेदभाव। आज जो कल्पना है वह साकार भी होती है यह बात कैफ भोपाली के सच होते शेर से भी साबित होती है लेकिन चांद पर आदमी की रिहायश पर कैसेकैसे गुल खिलेंगे यह तो आप के साथ मुझे भी इंतजार है। Hindi Social Story.

The Taj Story Movie Review : ऊलजलूल मुद्दों को सैंसेशनलाइज्ड करती मूवी

The Taj Story Movie Review : ताजमहल से भला कौन परिचित न होगा. सफेद संगमरमर से बने ताजमहल को मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी बीवी मुमताज महल की याद में 1632 में यमुना किनारे, आगरा में बनवाया था. वर्ष 1648 में बन कर तैयार हुए ताजमहल के चारों ओर सुंदर बगीचे हैं. हर साल लाखों दर्शक देशविदेश से इसे देखने आते हैं.

ताजमहल भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के आगरा शहर में स्थित एक विश्व धरोहर मकबरा और विश्व के 7 अजूबों में से एक है. इस का निर्माण 17वीं सदी में मुगल सम्राट शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज महल की याद में करवाया था.

‘द ताज स्टोरी’ फिल्म में परेश रावल ने मुख्य भूमिका निभाई है. फिल्म ऊलजलूल ऐतिहासिक बहस पैदा करने की कोशिश करती है, सैंसेशनलाइज्ड करती है. जबकि, कहानी कमजोर है. फिल्म को सत्य की खोज में एक अदालत महागाथा के रूप में वर्णित किया गया है जो ताजमहल पर सवाल उठाती है. फिल्म कोर्टरूम  ड्रामा है.

फिल्म में कई जायज मुद्दों को उठाया गया है, जैसे इतिहास के पाठ्यक्रम में हिंदू राजाओं का जिक्र कम क्यों है? मुगल राजाओं द्वारा अनगिनत लोगों को मार डालने का जिक्र क्यों नहीं है? ताजमहल में 2 कब्रें क्यों हैं? मगर किसी भी सवाल का जवाब नहीं दिया गया है.

जिस तरह पूरे देश में मुसलिम स्मारकों/मसजिदों को देश के कट्टर हिंदू इन्हें हिंदुओं के स्मारक या मंदिर बता कर विवाद खड़े करते आ रहे हैं, ताजमहल, जिसे सारी दुनिया जानती है कि इसे मुगल बादशाह शाहजहां ने बनवाया, ठीक उसी प्रकार ताजमहल के बारे में भी विवाद खड़े करने की कोशिश की जा रही है.

फिल्म के खिलाफ याचिकाएं भी दायर की गई हैं जिन में दावा किया है कि फिल्म ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़मरोड़ कर पेश करती है. ताजमहल के इतिहास पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं कि ताजमहल वास्तव में तेजोमहालय नामक एक शिव मंदिर था जिसे शाहजहां ने अधिगृहीत कर लिया था.

इस तरह के विवाद उठा कर हमारे देश के कट्टर हिंदू नेता, जिन में कुकुरमुत्तों की तरह उग आए दक्षिणपंथी संगठन भी हैं, देश में हिंदूमुसलिमों के दिलों में जहर डालने का काम कर रहे हैं. अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता में बैठी पार्टी की इन कट्टर हिंदूवादियों को शह मिली हुई है.

इस फिल्म में बरसों पहले बने ताजमहल के बारे में बहस को जिंदा करने की कोशिश की जा रही है. फिल्म में आगरा का टूर गाइड विष्णु दास (परेश रावल) यह कहता नजर आता है कि यह सिर्फ फिल्म नहीं बल्कि देश का मुद्दा है. मगर सवाल उठता है कि इस प्यार की निशानी को फिर से टटोलने की क्या जरूरत है? क्या यह हम सब के लिए गर्व की बात नहीं कि ताजमहल जैसा स्मारक हमारे देश में है? या यह पचाने में दिक्कत हो रही है कि मुगलों के बनाए इस स्मारक को दुनियाभर में पहचान मिली हुई है?

1959 में आगरा से शुरू हुई कहानी आगरा के टूर गाइड विष्णु दास और उस के गाइड बेटे अविनाश (नमित दास) के इर्दगिर्द घूमती है. वह रोजाना टूरिस्टों को ताजमहल की रोमांटिक कहानियां सुनाता है. एक दिन उस के दिमाग में तूफान सा उठता है कि जो किताबों में पढ़ाया जा रहा है, वह सब गलत है. सच्चाई को साबित करने के लिए विष्णु दास कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर करता है. उस का दावा है कि ताजमहल मकबरा नहीं, यह एक प्राचीन जगह है जिसे हिंदू राजा ने बनवाया था. उस का कहना है कि ताजमहल का डीएनए टैस्ट कराया जाए.

कहानी वर्तमान में आती है. विष्णु गाइड एसोसिएशन का चुनाव लड़ने वाला होता है. एक इंटरव्यू में जब उस से ताजमहल के निचले हिस्से के बारे में पूछा जाता है तो वह ऐसी किसी भी बात से इनकार करता है. विष्णु का वीडियो वायरल हो जाता है. गाइड एसोसिएशन वाले नाराज हो जाते हैं. मामला अदालत तक पहुंचता है.

फिल्म के अंत में कुछ अखबारों के लेखों द्वारा कई याचिकाओं का जिक्र कर फिल्म की कहानी को एक आधार देने का काम किया गया है. उन याचिकाओं में ताजमहल को मंदिर घोषित किया गया है, कभी वहां जलाभिषेक और आरती करने की बात की गई है. कई याचिकाएं विचाराधीन हैं.

फिल्म बेमतलब मुद्दे पर बनाई गई है. ऐसा जान पड़ता है कि इसे बनाया ही इसलिए गया है ताकि सस्ती चर्चाओं में शामिल कर लिया जा सके. हालांकि, पटकथा बांधे रखने वाली है. फिल्म के संवाद दमदार हैं. फिल्म में कोई खास जानकारी नहीं मिलती.

फिल्म मध्यांतर से पहले दर्शकों का ध्यान खींचती है. मध्यांतर के बाद तर्कवितर्कों और लंबी कोर्टरूम की कार्रवाई से दर्शक परेशान होने लगते हैं. कैमरा वर्क बढ़िया है. तकनीकी दृष्टि से फिल्म और बेहतर हो सकती थी. परेश रावल ने अच्छी ऐक्टिंग की है. जाकिर हुसैन ने एडवोकेट अनवर रशीद की भूमिका खूबसूरती से निभाई है. अन्य कलाकार अपनीअपनी भूमिकाओं में फिट हैं.

फिल्म का निर्देशन बढ़िया है. कोर्टरूम ड्रामा को गंभीरता से फिल्माया गया है. संगीत दमदार है. सिनेमेटोग्राफी बढ़िया है. संवाद फिल्म की जान हैं. अगर आप की रुचि इतिहास में है तो यह फिल्म आप के लिए है. The Taj Story Movie Review.

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