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Automation Future : एआई – कल की ऊंचाई या गहरी खाई ?

Automation Future : एआई जटिल और तकनीकी कार्यों को तेजी और सटीकता से पूरा करने में माहिर है. इंटरटेनमैंट, डेटा एनालिस्ट, ट्रैफिक कंट्रोल, एग्रीकल्चर, मैडिकल साइंस, एजुकेशन और मैन्युफैक्चरिंग में इस के इस्तेमाल से क्रांति आ गई है. यह जीवन को आसान और कुशल बनाता दिख रहा है लेकिन कई मामलों में खतरनाक भी साबित हो रहा है. इस से अनस्किल्ड लेबर और फोर्थ ग्रेड की नौकरियों को खतरा होने के साथ साइबर क्राइम बढ़ रहे हैं. यह इंटैलिजैंस के लिए चुनौती बन रहा है और गलत इन्फौर्मेशन में इस का जम कर इस्तेमाल हो रहा है. ऐसे में एआई भविष्य को बनाएगा या बिगाड़ेगा, आइए करते हैं पूरी पड़ताल.

यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि एआई ने दुनिया को बदल दिया है और यह बदलाव अभी सिर्फ शुरुआत है. आज स्मार्टफोन से ले कर कार तक सब में एआई है. आप को क्या पसंद है, एआई पहले से जान लेता है. आप को क्या जानना है, एआई के पास हर सवाल का जवाब है. पूरी दुनिया में भाषा और संस्कृति की दीवारें टूट रही हैं. एआई से आप दुनिया की कोई भी भाषा पढ़ पा रहे हैं और रियल टाइम वौयस ट्रांसलेशन की मदद से आप दुनिया की किसी भी भाषा को समझ सकते हैं और उसी भाषा में जवाब दे भी सकते हैं. चैट जीपीटी, ग्रोक, क्लाउड जैसे टूल्स ने लोगों का काम करने का तरीका ही बदल दिया. कोडिंग, लेखन, रिसर्च सब तेज हो गया है.

बहुत सारे रूटीन काम डेटा एंट्री, कस्टमर सपोर्ट, ट्रांसलेशन, बेसिक कोडिंग अब एआई कर रहा है. डाक्टर अब एआई की मदद से कैंसर जैसी बीमारियां पहले पकड़ लेते हैं. वकील रिसर्च में एआई यूज करते हैं और इंजीनियर डिजाइन में इस की मदद ले रहे हैं. अल्फाफोल्ड ने प्रोटीन स्ट्रक्चर की सारी समस्याएं सौल्व कर दीं जो दशकों से अटकी थीं. नई दवाएं बनाना दसगुना तेज हो गया है. क्लाइमेट मौडलिंग, मौसम पूर्वानुमान, अंतरिक्ष मिशन सब में एआई की मदद ली जा रही है.

एआई जनरेटेड आर्ट और एआई म्यूजिक से क्रिएटिविटी की परिभाषा बदल गई है. एआई से फसलों की बीमारी पता करने और मौसम की सटीक भविष्यवाणी से खेती में क्रांति आ गई है. यूपीआई, जियो, ओला, स्विगी, जोमैटो ये सब आम आदमी के रोजमर्रा का हिस्सा बन गए हैं और इन सब के कोर में एआई है.

कुल मिला कर बात यह है कि एआई ने दुनिया बदल दी है. जितना 50 साल में इंटरनैट ने बदला, उस से कहीं तेज गति से एआई ने हर फील्ड में तहलका मचा दिया है लेकिन यह तो बस शुरुआत है. अगले 5-10 साल में क्या होगा जब एजीआई (आर्टिफिशियल जनरल इंटैलिजैंस) आ जाएगा? तब शायद आज का बदलाव सिर्फ ट्रेलर लगेगा. अब सब से बड़ा सवाल यह है कि भविष्य में एआई दुनिया को बेहतर बनाएगा या यह दुनिया के लिए सब से बड़ा खतरा बन जाएगा?

गरीबों का दुश्मन है एआई

कहते हैं आवश्यकता ही आविष्कारों की जननी होती है. वहीं, यह भी सच है कि ज्यादातर आविष्कार अमीरों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए हुए हैं. हर नया आविष्कार अमीरों की लग्जरी और उन के शौक को पूरा करता है. अमीरों के महंगे शौक की कीमत आम आदमी को चुकानी पड़ती है, बाद में ये गरीबों तक पहुंचते हैं. रेलवे, बिजली, टैलीफोन और मोटरकार जैसे आविष्कारों ने दुनिया को पूरी तरह बदल दिया. इन से दूरी सिमट गई, व्यापार बढ़ा, शहर फैले और जीवन की गति तेज हुई. अमीरों को फायदा हुआ लेकिन इन आविष्कारों की वजह से शुरुआती दौर में गरीबों को बेहद नुकसान झेलना पड़ा. रेलवे बनी तो किसानों की जमीन छीनी गई.

भारत में भी ब्रिटिशकाल में लाखों किसान बेघर हुए. कारखाने आए तो हस्तशिल्पी, बुनकर, कारीगर बेरोजगार हो गए. उस दौरान भारत में हाथ के कपड़े बनाने वाले लाखों लोग भुखमरी के चलते मरे. बिजली और टैलीफोन पहले सिर्फ अमीरों और सरकारों के पास थे. गरीब दशकों तक इन से वंचित रहे.

मोटरकार आई तो घोड़ागाड़ी चलाने वाले, तांगे वाले, कुली सब बेरोजगार हो गए. यानी, शुरुआत में इन आविष्कारों से सब से ज्यादा नुकसान गरीबों और मध्य वर्ग को हुआ. फायदा बड़े व्यापारियों और पूंजीपतियों को हुआ. लंबे समय में गरीबों को फायदा हुआ, लेकिन शर्तों के साथ. समय के साथ ये तकनीकें सस्ती हुईं और आम लोगों तक पहुंचीं.

रेलवे से मजदूर दूसरे शहरों में काम ढूंढ सके. बिजली से छोटे उद्योग चले, गांवों में रोशनी आई. टैलीफोन और बाद में मोबाइल ने गरीब व्यापारियों को बाजार से जोड़ा. सस्ती मोटरसाइकिल और बसों ने गरीबों की गतिशीलता बढ़ाई. भारत में आज जो रेहड़ीपटरी वाले, छोटे दुकानदार, मजदूर अपना परिवार पाल पा रहे हैं, उन में से ज्यादातर की आमदनी का एक बड़ा कारण मोबाइल, सस्ती बाइक, बस और ट्रेन है.

हर नए आविष्कार ने दुनिया को बदला, यह सच है. इन से गरीबों को फायदा हुआ, यह भी सच है लेकिन गरीबों को फायदा तब हुआ जब ये तकनीकें सस्ती हुईं, जब मजदूरों ने संघर्ष कर के अधिकार हासिल किए, जब लोकतंत्र आया, जब बाजार बड़ा हुआ. शुरुआत में तो ये तकनीकें अमीरों द्वारा गरीबों को गुलाम बनाने का हथियार ही थीं.

कंप्यूटर के आने से गरीबों को बहुत गहरा नुकसान हुआ है. नौकरियों का खात्मा हुआ. फैक्ट्री, बैंक, रिटेल, टैलीफोन एक्सचेंज, टाइपिस्ट, क्लर्क जैसी लाखों नौकरियां कंप्यूटराइजेशन और औटोमेशन से खत्म हो गईं. भारत में ही 1990-2010 के बीच लाखों लोग बेरोजगार हुए क्योंकि उन के कामों को सौफ्टवेयर या मशीनों ने ले लिया. ये ज्यादातर कम पढ़ेलिखे, गरीब या निम्नमध्य वर्ग के लोग थे.

जो गरीब इंग्लिश नहीं जानते, कंप्यूटर नहीं चला सकते, वे आईटी, ईकौमर्स, डिलीवरी ऐप्स जैसी नौकरियों से बाहर रह गए. शिक्षा, सरकारी योजनाएं, नौकरी के अवसर सब औनलाइन हो गए जिस से गरीब और पीछे छूट गया. कंप्यूटर/ इंटरनैट से सब से ज्यादा फायदा उच्चशिक्षित और पूंजी वालों को हुआ. नतीजा यह हुआ कि अमीर और अमीर, गरीब और गरीब होता गया.

भारत में 1991 के बाद जीडीपी बढ़ी, लेकिन गिनी कोएफिशिएंट यानी असमानता भी तेजी से बढ़ी. जो पुरानी नौकरी पर अड़ा रहा और नई स्किल नहीं सीखी, वह बेरोजगार हो कर और गरीब हो गया. यानी, तकनीक अपनेआप में न अच्छी है न बुरी, वह एक औजार है. उस ने तेजी से अमीरीगरीबी दोनों बढ़ाई. जो दौड़ में शामिल हुआ वह आगे निकल गया, जो पीछे रह गया वह और पीछे छूट गया.

आज एआई का जमाना है. इस में दोराय नहीं कि एआई से सब से ज्यादा नुकसान गरीबों को होगा. एआई अमीरों को ज्यादा फायदा पहुंचा रहा है और अमीरगरीब की खाई बढ़ने का खतरा बहुत बड़ा हो गया है. इस की वजह यह है कि एआई के मालिक कंपनियां और पूंजीपति हैं.

ओपन एआई, गूगल, माइक्रोसौफ्ट, मेटा जैसी कंपनियां एआई से अरबों डौलर कमा रही हैं. इन के सीईओ और निवेशक रातोंरात अरबपति बन गए हैं. आम आदमी को फिलहाल एआई फ्री में मिल रहा है लेकिन असली कमाई मालिकों की हो रही है. हाई स्किल्ड नौकरियां बढ़ रही हैं और लो स्किल्ड नौकरियां तेजी से खत्म हो रही हैं. इंजीनियर, डाक्टर, वकील और डैवलपर जैसे लोग एआई की मदद से दसगुना तेज काम कर रहे हैं. उन की सैलरी और बढ़ रही है लेकिन ड्राइवर, क्लर्क, कौल सैंटर कर्मचारी, फैक्ट्रीवर्कर, लेखक, ट्रांसलेटर आदि की नौकरियां जा रही हैं.

इस से मध्य और निम्न वर्ग को सब से ज्यादा नुकसान हो रहा है जो अभी दिखाई कम दे रहा है लेकिन आने वाले वक्त में यह बेरोजगारी का भयानक रूप ले सकता है. एआई बनाने में, उसे संचालित करने में अरबों डौलर लगते हैं. यह पैसा सिर्फ अमीर देशों या बड़ी कंपनियों के पास है. भारत जैसे देश एआई सिर्फ खरीद रहे हैं, बना नहीं पा रहे. इस से तकनीकी गुलामी बढ़ रही है.

टियर-1 शहरों के इंजीनियर एआई जौब्स में 50 लाख से 2 करोड़ रुपए सालाना कमा रहे हैं. वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूर, छोटे दुकानदार, ड्राइवर बेरोजगार हो रहे हैं. ओला-उबर में भी अब रोबोट टैक्सी आने वाली हैं जिस से बेतहाशा बेरोजगारी बढ़ेगी. इंग्लिश न जानने वाले किसी काम के नहीं रहेंगे क्योंकि ज्यादातर एआई टूल्स इंग्लिश में ही हैं.

कुल मिला कर एआई अमीर को सुपर अमीर बना रहा है जबकि गरीब को और कमजोर. भारत में स्थिति और बदतर हो जाएगी अगर सरकार ने अभी से नीतियां नहीं बदलीं. आने वाले 10 से 15 वर्षों में भारत में अमीरगरीब की खाई इतनी बढ़ जाएगी कि उसे बैलेंस करना मुश्किल हो जाएगा.

क्या एआई निगल जाएगा सबकुछ ?

एआई जिस तरह से इंसानी बुद्धि को मात दे रहा है वह बेहद आश्चर्य की बात है. बुद्धिजीवी वर्ग के बीच यह चिंता बढ़ रही है कि भविष्य में यह दुनिया के लिए बहुत बड़ा खतरा न बन जाए. एआई के विशेषज्ञ भविष्य के ऐसे किसी खतरे के न होने की गारंटी नहीं देते लेकिन वे कहते हैं कि एआई का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि हम इसे कैसे विकसित करते हैं, कैसे नियंत्रित करते हैं और इस का इस्तेमाल कैसे करते हैं.

एआई को दुनिया के भविष्य के लिए खतरा मानने वाले लोग तर्क देते हैं कि अगर कोई एआई इंसानों से लाखों गुना ज्यादा बुद्धिमान हो जाए और उस के लक्ष्य इंसानियत से मेल न खाएं तो वह अनजाने में पूरी सभ्यता को खत्म कर सकता है. एक एआई जिस का लक्ष्य सिर्फ पेपरक्लिप बनाना है, वह इंसानों समेत पूरी दुनिया को पेपरक्लिप में बदल देगा क्योंकि उस ने कभी ‘इंसान को बचाओ’ नहीं सीखा.

कुल मिला कर बात यह है कि एआई कितना भी एडवांस हो जाए वह इंसान की संवेदनाओं के स्तर को नहीं छू पाएगा और अगर ऐसा एआई डैवलप हो जाए तो यह और भी खतरनाक बात होगी क्योंकि ऐसी स्थिति में वह इंसानी गुलामी को कब तक ढोएगा. किसी तकनीक के जरिए मानवीय गुणों की अपेक्षा नहीं की जा सकती.

एक सीमा तक तकनीक की बौद्धिकता की सीमा तय करनी होगी वरना एक समय आएगा जब एआई खुद से सीखतेसीखते उद्ंदड बन जाएगा और मानवता के लिए मुश्किलें खड़ी करेगा.

भविष्य में एआई क्या करेगा, यह बात तो दूर की है लेकिन वर्तमान में एआई किस तरह दुनिया में तबाही ला रहा है, इस के अनेक उदाहरण पिछले 5 सालों के दौरान दुनिया देख चुकी है. साइबर हमले आसान हुए हैं, डीपफेक से बड़े स्तर पर धोखाधड़ी हो रही है. युद्ध में एआई से संचालित होने वाले ड्रोन और मिसाइलों से बड़े पैमाने पर तबाही हुई है. जैविक हथियार डिजाइन करने में एआई का इस्तेमाल हो रहा है. नया वायरस बनाया जा सकता है.

इन सब बातों के अलावा एआई की वजह से 2030-2040 तक 50-80 फीसदी नौकरियां खत्म हो सकती हैं. अगर नई नौकरियां नहीं बनीं या यूबीआई जैसे सिस्टम नहीं आए तो अगले एक दशक में ही भारी बेरोजगारी, असमानता और सामाजिक अस्थिरता आएगी और इस का कारण सीधे तौर पर एआई ही होगा.

आज के बड़े एआई मौडल जैसे जीपीटी, ग्रोक और क्लाउड कभीकभी इंसानी कमांड को मानने से इनकार कर देते हैं. इस से यह डर पैदा होना स्वाभाविक है कि भविष्य में बहुत शक्तिशाली एआई को पूरी तरह कंट्रोल करना लगभग मुश्किल हो जाएगा.

चीन रूस और अमेरिका जैसे ताकतवर देश एआई आर्म्स रेस में दौड़े जा रहे हैं. ये शक्तिशाली देश सुरक्षा के नाम पर तेजी से खतरनाक एआई बना रहे हैं. इन में जैविक और रासायनिक हथियार शामिल हैं जो भविष्य के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकते हैं.

वर्तमान में सब से बड़ा जोखिम एआई के दुरुपयोग का है. आज का शुरुआती एआई दुनिया के लिए इतनी गंभीर समस्याएं पैदा कर सकता है तो 2030-2040 के बीच अगर एजीआई आया तो उस के दुरुपयोग के खतरों का अंदाजा लगाना अभी मुश्किल है. यह दुनिया को तबाह कर सकता है. एआई अपनेआप में न अच्छा है न बुरा, यह एक औजार है परमाणु बम जैसा.

परमाणु बम से हम तबाह भी हो सकते थे, लेकिन नहीं हुए क्योंकि हम ने नियंत्रण रखा. एआई के साथ भी यही होगा. एआई के मद्देनजर आज सवाल यह नहीं है कि एआई खतरा बनेगा या नहीं. सवाल यह है कि क्या हम इतने समझदार होंगे कि इसे सुरक्षित बनाएं? फिलहाल जवाब 50-50 है. आज कंपनियां सुरक्षित और सच्चाई की तलाश करने वाला एआई बना रही हैं ताकि हमारा भविष्य स्काईनैट न बने, बल्कि स्टार ट्रेक जैसा बने लेकिन भविष्य में क्याक्या होगा, यह भविष्य ही जाने. आप को क्या लगता है, डरना चाहिए या उम्मीद रखनी चाहिए, विचारिए.

क्यों बढ़ रही है अमीर और गरीब के बीच खाई ?

दुनियाभर में अमीरी और गरीबी के बीच की असमानता पिछले कुछ दशकों से लगातार बढ़ रही है और 2025 में यह चरम पर पहुंच चुकी है. विश्व असमानता रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की एक प्रतिशत आबादी ने दुनियाभर की आमदनी का करीब 20 फीसदी हिस्सा हथिया लिया है.

2024 में दुनियाभर के अरबपतियों की संपत्ति में 2 ट्रिलियन डौलर की बढ़ोतरी हुई जो सामान्य आबादी की तुलना में तीनगुना तेज है. औक्सफैम की 2025 में आई रिपोर्ट के मुताबिक, बिलियनेयर्स की संपत्ति 2023 की तुलना में तीनगुना तेजी से बढ़ी है क्योंकि इस बीच टैक कंपनियों के शेयरों में तेज उछाल आया.

महामारी के बाद की रिकवरी ने भी अमीरों को ज्यादा फायदा पहुंचाया. कौर्पोरेट्स और अल्ट्रा-रिच ने दुनिया की इकोनौमी को अपने हित में ढाल लिया है. कम टैक्स दरें, टैक्स हेवन का इस्तेमाल और लौबिंग से अमीरों को जबरदस्त फायदा पहुंच रहा है. औक्सफैम के अनुसार, अमेरिका जैसे देशों में अमीरों के लिए टैक्स कटौती ने असमानता को और बढ़ाया.

1995 से 2025 तक का ट्रैंड दिखाता है कि संपत्ति बहुत कम हाथों में केंद्रित हो रही है. जब शेयर, रियल एस्टेट और अन्य एसेट्स की कीमतें जीडीपी से तेज बढ़ती हैं तो एसेट्स रखने वाले अमीर और अमीर हो जाते हैं.

गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की मात्र 0.001 प्रतिशत आबादी यानी महज 60 हजार लोगों के पास दुनिया की आधी आबादी से तीनगुना संपत्ति है. 2025 की स्थिति यह है कि महज 10 प्रतिशत आबादी के पास दुनिया की कुल संपत्ति का 75 फीसदी हिस्सा इकट्ठा हो चुका है और 90 फीसदी आबादी 25 प्रतिशत संसाधनों में गुजारा कर रही है.

ब्लूमबर्ग बिलियनेयर्स इंडैक्स के अनुसार दिसंबर 2025 तक दुनिया के शीर्ष 10 सब से अमीर लोगों की कुल संपत्ति 2 ट्रिलियन डौलर हो चुकी है.

दुनिया के सब से अमीर आदमी एलन मस्क के पास 462 मिलियन डौलर हैं. यह भारतीय रुपए में तकरीबन 40 लाख करोड़ रुपए होते हैं, यानी भारत के कुछ राज्यों के सालाना बजट से भी ज्यादा. दूसरे सब से अमीर शख्स लैरी पेज के पास 268 मिलियन डौलर इकट्ठा हैं. लैरी एलिसन 258 मिलियन डौलर के मालिक हैं. जेफ बेजोस 253 मिलियन डौलर पर कुंडली जमाए बैठे हैं. सर्जेई ब्रिन के पास 250 मिलियन डौलर हैं. मार्क जुकरबर्ग के पास 231 मिलियन डौलर हैं. बर्नार्ड अर्नाल्ट की संपत्ति 202 मिलियन डौलर की है. स्टीव बाल्मर के पास 168 मिलियन डौलर हैं. जेंसन ह्वांग 157 मिलियन डौलर पर बैठे हैं. माइकल डेल के पास 153 मिलियन डौलर हैं.

हैरानी की बात यह है कि इन 10 अरबपतियों की कुल संपत्ति 2 अरब डौलर से ज्यादा है. यह दुनिया के मेहनतकश लोगों के लिए किसी मजाक से कम नहीं है कि मात्र 10 लोगों के पास दुनिया की 28 फीसदी आबादी की दौलत इकट्ठी हो चुकी है. यदि विश्व स्तर पर नीतियां नहीं बदलीं तो औक्सफैम के अनुमान से अगले दशक में अमीरी और गरीबी के बीच की खाई और भी गहरी हो जाएगी.

दुनिया के सब से अमीर व्यक्तियों की संपत्ति या नैटवर्थ शेयर बाजार में उन की कंपनियों के शेयरों के दामों के अनुसार बदलती रहती है. अगर सोने का दाम 1 करोड़ 30 लाख रुपए प्रति किलोग्राम माना जाए तो एलन मस्क की संपत्ति भारतीय रुपए में तकरीबन 40 लाख करोड़ रुपए है.

इस दौलत से दिसंबर 2025 के सोने के भाव में लगभग 31,463 किलोग्राम सोना खरीदा जा सकता है. 40 लाख करोड़ रुपए बहुत बड़ी रकम है. यह राशि भारत के कई राज्यों के सालाना बजट से भी अधिक है. 31,463 किलोग्राम सोना लगभग 31.5 टन सोने के बराबर होता है. इस बात से आप कल्पना कर सकते हैं कि 31 टन सोना एक बड़े ट्रक में भरा हुआ सोना होगा. 6 पहिए के एक ट्रक की क्षमता 9 टन सामान ले जाने की होती है. 31 टन के लिए 14 पहिए वाला ट्रक चाहिए होगा. Automation Future 

Hindi Family Story : एक ग्रे स्वेटर – ऊन के फंदों में रचाबसा मां का प्यार

Hindi Family Story : विनीता ने अक्कू के लिए बनाए स्वेटर के हर फंदे के ऊन में अपना स्नेहदुलार बुना था. उस के जन्मदिन तक बुन कर तैयार स्वेटर पहन कर अक्कू दोस्तों के पास चला गया तो पीछे से घर में विनीता, दादी, पापा सब इंतजार में थे कि अक्कू स्वेटर की कितनी तारीफ बटोर कर लाएगा लेकिन उस ग्रे स्वेटर ने उस दिन सब बदल डाला.

वर्षों पहले गलीमहल्लों में बंदर के तमाशेवाला आया करता था. उस के पास एक बंदर और एक बंदरिया होते थे. वह बंदरिया से पूछता था : ‘सास का चरखा कैसे चलाएगी?’ इस के जवाब में बंदरिया धीरेधीरे अपना हाथ गोलगोल घुमाती; और जब तमाशेवाला बंदरिया से पूछता कि ‘अपना चरखा कैसे चलाएगी?’ अब की बार बंदरिया जल्दीजल्दी अपना हाथ गोलगोल घुमाती. तो, यों समझिए कि आजकल विनीता भी सास का चरखा ही चला रही थी. बल्कि सास तो अब रही नहीं थीं तो कह सकते हैं कि नियति का चरखा चला रही थी धीरेधीरे.

विनीता का सब काम अब धीरेधीरे ही होता था- सुबह आलस के साथ उठना, फिर? फिर मानो दिनभर कुछ नहीं करना क्योंकि हर काम के लिए नौकरचाकर थे. बस, एक काम जो वह बहुत उत्साह से करती थी वह था रात को आकाश के फोन का इंतजार.

आकाश- विनीता और शेखर का बेटा. पिछले कई वर्षों से अमेरिका में रह रहा है. वहां अच्छी नौकरी है और खूब पैसे भी घर भेजता था. दरअसल, विनीता और शेखर के घर के ये ठाटबाट, ये नौकरचाकर आदि सब आकाश के भेजे हुए पैसों से ही संभव हुआ वरना पहले तो ये ठाटबाट तो दूर, घर का खर्च भी मुश्किल से ही चल पाता था.

जब विनीता शादी हो कर आई थी तो घर में थे कुल 3 प्राणी- शेखर, जानकीजी- यानी शेखर की माताजी और विनीता. एक साल बाद ही आकाश आ गया था. इन सब का भरणपोषण करने के लिए थी शेखर की छोटी सी सरकारी नौकरी यानी उस की छोटी सी पगार. उसी छोटी सी पगार में घर का सारा खर्च चलाना होता था- आकाश की स्कूल की फीस, सास की दवाएं, घर का सौदा, तीजत्योहार पर ननदों को बुलानाचलाना और आम घरों के आम खर्चे.

शेखर की छोटी पगार को बढ़ाने के लिए विनीता सारा दिन खटती रहती. घर में तरहतरह के अचार, मुरब्बे, चटनियां बनाती; चाय के साथ नाश्ते के लिए तरहतरह की नमकीन बनाती; घर में परदे, तकिए, कुशन के कवर सिलती, सास के और अपने कपड़े भी सिलती. यानी, घर में मेड का तो सवाल ही नहीं. आम घरों में जो काम बाहर होते हैं वे सब भी घर में ही करती थी विनीता. पैसे बचाने के लिए इस के अलावा भी विनीता काफी मेहनत करती, जैसे वीकली बाजार घर से पैदल जाती और आती और वहां से हफ्तेभर के लिए सस्ती सब्जियां ले आती, सर्दी में सस्ती मेथी तोड़ कर सुखा लेती. जब आलू सस्ता होता तो घर पर ही आलू के चिप्स काट कर सुखा लेती, चावल की कचरी बनाती, तरहतरह की मिठाइयां भी घर पर ही बनाती. घर के लिए विनीता का यह समर्पण देख कर जानकीजी कहते न थकती थीं : ‘अरे, हमारी बहू तो सोना है सोना. इस के पैर में तो जैसे स्प्रिंग लगे हैं. उफ, कितना उत्साह है इस में. किसी की नजर न लगे.’ विनीता मुसकरा कर कह देती, ‘मांजी, आप भी तो सारा दिन मेरे साथ लगी रहती हैं. स्प्रिंग तो जैसे आप के पैरों में भी लगे हैं.’

देखते ही देखते समय बीतता गया और आकाश 15 साल का हो गया. इन 15 सालों के उस के दिन किसी आम बच्चे की तरह ही गुजरे-  बाकी हमउम्र बच्चों की तरह ही स्कूल जाता, पढ़ाई करता और शाम को दोस्तों के साथ खेलने जाता था. घर में सब का कहना मानता था. घर में दादी, मम्मी और पापा का बहुत दुलारा था जोकि अपनी हैसियत के अनुसार उस की हर इच्छा पूरी करते.

हैसियत, यह शब्द उस घर में किसी ने अभी तक कहा नहीं था क्योंकि अभी तक शायद किसी को इस बात का एहसास ही नहीं था कि उन की हैसियत बाकी लोगों से कम है. हैसियत के बारे में कोई क्यों सोचता जब उन के दिलों में पैसों की तंगी नहीं बल्कि त्याग की भावना रहती थी.

लेकिन उस दिन शाम को जब आकाश खेल कर घर वापस आया तो जैसे उस का पूरा व्यक्तित्व, उस की बोलचाल, उस के हावभाव आदि सबकुछ दर्शा रहे थे कि आज उसे अपनी हैसियत का एहसास हो चुका था.

जब वह शाम को खेल कर वापस घर आया, विनीता, शेखर और जानकीजी सभी उत्सुक थे यह जानने के लिए कि उस का ग्रे स्वेटर उस के दोस्तों को कैसा लगा. आखिर होते भी क्यों न उत्सुक क्योंकि उस के पीछे भी उन सब के एक और त्याग की एक छोटी सी कहानी थी.

असल में हुआ यह था कि एक दिन आकाश की फरमाइश हुई कि उसे एक नया स्वेटर चाहिए अपने जन्मदिन पर. नया स्वेटर. विनीता सोचने लगी, ‘आज महीने की 20 तारीख हो गई है, यानी महीना खत्म होने को है. पगार का दिन दूर है. तो ऐसे में इस फरमाइश को पूरी करने के लिए पैसे कहां से आएंगे? लेकिन बेटे के जन्मदिन के उपहार की बात थी, मना भी करें तो कैसे?’

शेखर जो घरखर्च के लिए पैसे देते थे, पिछले कई महीनों से उस में से थोड़ाथोड़ा बचा कर विनीता ऊन खरीद कर लाई थी ग्रे रंग का सास के स्वेटर के लिए क्योंकि उन के पास बाहर पहनने के लिए कोई अच्छा स्वेटर न था. सब पुराने हो गए थे और फट से भी गए थे और उस ऊन का तो सास के लिए स्वेटर बना भी दिया था. यानी, अब तो जमा पैसे भी खत्म हो गए थे. तो कहां से करें पैसों का जुगाड़ और किस से कहे यह सब?

लेकिन जिस घर में बिना कहे लोग एकदूसरे के मन की बात जान लेते हैं वहां किसी चीज की तंगी कैसे हो सकती है? जानकीजी ने मांबेटे के बीच की बात सुन ली थी. वे संदूक से अपना नया ग्रे रंग का स्वेटर ले आईं और विनीता के हाथ में थमाते हुए, नम आंखों लेकिन रोबीली आवाज में बोलीं, ‘अरी, मैं ने तो पहले ही कहा था, मेरे पास बहुतेरे स्वेटर हैं. थोड़े फट गए हैं तो क्या, उन्हें सिल लूंगी. और वैसे भी, मुझे कहां बाहर जाना होता है. ये ले, इसे उधेड़ कर ऊन धो लेना और अक्कू के लिए बना दे स्वेटर.’

अब आंखों में आंसुओं की बारी विनीता की थी, बोली, ‘मगर मांजी,’ उसे बीच में ही रोक कर जानकीजी बोलीं, ‘न, न. अगरमगर का समय नहीं है यह. मेरे पोते को पहनना है अपने जन्मदिन पर. समय थोड़ा रह गया है जन्मदिन तक का. ऐसा कर, जल्दी से ऊन धो डाल, फिर दोनों सासबहू मिल कर झटपट तैयार कर लेंगी स्वेटर.’’

उसी रात को विनीता ने ऊन उधेड़ा, उस की लच्छी बनाई और सुबहसुबह उसे धो कर सूखने को डाल दिया. शाम तक ऊन सूख गई और सासबहू जुट गईं स्वेटर बनाने में. शाम को जब शेखर औफिस से घर आते और देखते कि स्वेटर बनाने के चक्कर में रसोई अधूरी पड़ी है तो वे रसोई में हाथ बंटाते. इस तरह तीनों ने मिलजुल कर 4-5 दिनों में, यानी जन्मदिन तक, अपने अक्कू के लिए स्वेटर तैयार कर दिया.

जब आकाश ने अपने जन्मदिन पर वह ग्रे स्वेटर पहना तो जानकीजी, विनीता और शेखर के चेहरों पर बहुत ही प्यारभरी मुसकान थी. किसी के भी चेहरे को देख कर कोई यह नहीं कह सकता कि इन तीनों ने रातरातभर जाग कर काम किया है. थकान की जगह, तीनों के चेहरों पर प्रसन्नता की ऐसी चमक थी जैसे सैलून से फेशियल करवा कर आए हों.

सो, इसीलिए वे सब बेसब्री से इंतजार कर रहे थे कि कब अक्कू दोस्तों के साथ खेल कर आए और कब यह बताए कि दोस्तों ने कितनी प्रशंसा की उस के नए स्वेटर की. बस, दोस्तों की प्रशंसा ही इनाम बन जाता उन के पिछले दिनों के दिनरात के त्याग और परिश्रम का.

लेकिन जब जन्मदिन वाली शाम को अक्कू दोस्तों के साथ खेल कर घर वापस आया तो बोला, ‘मां, दादी, पापा, आप सब बहुत काम करते हो, इतनी मेहनत करते हो, देखना, मैं जल्दी ही खूब सारे पैसे कमाऊंगा ताकि आप सब को इतनी मेहनत न करनी पड़े. हम भी बाजार से ब्रैंडेड कपड़े खरीदेंगे, बाजार से खाना मंगवाएंगे. बस, मैं थोड़ा बड़ा हो जाऊं.’ और यह कह कर वह पढ़ने को बैठ गया.

अक्कू की ये बातें सुन कर विनीता, शेखर और दादी जैसे सन्न रह गए. तीनों एकदूसरे के चेहरे देखते रहे. तीनों के मन में एक ही सवाल कौंध रहा था- क्यों कह रहा था अक्कू ये सब? हम ने तो कभी भी एहसान नहीं जताया कि हम उस के लिए इतना करते हैं; जताते भी क्यों- यह तो हमारा कर्तव्य है. हमें प्यार है उस से, इसलिए करते हैं, इस में जताने या कहने की क्या बात है.

अक्कू अपनी दादी के बहुत करीब था. सो, रात में उसे अकेला देख कर दादी उस के पास गईं उस का मन टटोलने के लिए. बातोंबातों में पता चला कि जिस नए स्वेटर के लिए अक्कू समेत घर के सब लोग बड़े उत्साहित थे, उसे देख कर अक्कू के दोस्तों ने तारीफ करना तो दूर बल्कि यह कहा, ‘अरे, जन्मदिन पर भी ब्रैंडेड कपड़े नहीं मिले?’

और बस, दोस्तों के इसी तंज ने आकाश को यह एहसास दिलाया कि दुनिया में प्यार नहीं पैसे की कीमत है, पैसे की ही अहमियत है और पैसे से ही हैसियत है.

अब पैसे कोई पेड़ पर तो उगते नहीं, कि जाएं और तोड़ लाएं. अगर पेड़ पर भी उगते होते तो भी पहले पेड़ तो लगाना ही पड़ता और फिर फल का इंतजार करना पड़ता. तो बस, यही किया आकाश ने भी- इंतजार.

धीरेधीरे समय बीता और कुशाग्र बुद्धि वाले आकाश को इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला मिल गया. अब उस ने अपनी पढ़ाई के साथसाथ ट्यूशन का काम भी शुरू कर दिया. ट्यूशन से जो पैसे मिलते वह उन्हें घर में न देता बल्कि उस ने अपना डीमैट अकाउंट खोल लिया. उस में इन्वैस्ट करता. इस तरह अपना खर्च तो निकाल ही लेता और साथ ही, घर में भी कुछ पैसे भेज पाता.

वक्त न जाने कौन से घोड़े पर सवार रहता है, देखते ही देखते आकाश की इंजीनियरिंग की पढ़ाई खत्म हो गई और उसे एक बहुत अच्छी कंपनी में प्लेसमैंट मिल गया लेकिन आकाश को चैन कहां. उसे तो अमेरिका, कनाडा या यूरोप जाना था. कुछ और कोशिश के बाद उसे एक ऐसी कंपनी में नौकरी मिल भी गई जो उसे अमेरिका भेजना चाहती थी.

अमेरिका में नौकरी, यानी, आकाश का बरसों का सपना पूरा हो गया.

आकाश घर वालों से कहता, ‘मां, देखना मुझे इतनी ढेर सारी सैलरी मिलेगी कि आप को दिनभर काम नहीं करना पड़ेगा, खाना बनाने के लिए घर में कुक होगा, घर में और काम करने के लिए नौकरचाकर होंगे. और दादी, आप तो बस उन पर रोब चलाना. और पापा, आप तो नौकरी ही छोड़ देना, आनेजाने में आप को काफी दिक्कत होती है. तब हम नया मकान खरीदेंगे किसी नई सोसाइटी में. यह छोटा सा, टूटाफूटा घर बेच देंगे. बड़ी सी गाड़ी भी होगी और भी न जाने क्याक्या होगा हमारे पास. आप सब देखना, ढेर सारी सैलरी, बढ़ियाबढ़िया सामान, हम सब बहुत खुश होंगे.’

आकाश के उत्साह के सामने कोई कुछ न कह सका. हालांकि, मां यह पूछना चाहती थी कि क्या मेरे हाथ का खाना पसंद नहीं? दादी यह पूछना चाहती थी कि तेरे दादाजी के बनाए हुए इस मकान में क्या खराबी है? और पापा यह पूछना चाहते थे कि अगर मैं अभी से ही नौकरी छोड़ दूंगा तो घर पर बैठ कर करूंगा क्या? तू अमेरिका में होगा तो शाम को तेरा दफ्तर से आने का इंतजार भी तो नहीं कर सकूंगा.

कोई आकाश को यह न बता सका कि मोटी सैलरी से खरीदी गई चीजें पलभर के लिए भले चेहरे पर मुसकान ले आएं लेकिन प्यार और त्याग से बनाई गई चीजें आंखों में वे आंसू ले आती हैं जिन से दिल तक भीग जाता है. लेकिन, आकाश के उत्साह के सामने किसी ने कुछ न कहा क्योंकि इस बारे में बात पहले भी हो चुकी थी और आकाश को अपनी धुन के सामने किसी का तर्क समझ में नहीं आता था. आखिरकार, आकाश चला गया अमेरिका.

देखते ही देखते 4 साल बीत गए.

जैसाजैसा आकाश ने चाहा था वैसा ही वैसा होता भी चला गया. विनीता और शेखर ने आलीशान सोसाइटी में एक महंगा बंगला खरीद लिया. घर में कामकाज, खाना पकाने के लिए नौकरचाकर रख लिए, एक बड़ी गाड़ी ले ली व ड्राइवर भी रख लिया, ब्रैंडेड कपड़े, ब्रैंडेड फर्नीचर आदि सब भी हो गया.

साथ ही, जोजो आकाश ने नहीं भी चाहा था वह भी होता चला गया.

आकाश के जाने के कुछ हफ्तों बाद ही जानकीजी परलोक सिधार गईं और आकाश उन की तेरहवीं तक में भी न आ पाया क्योंकि अभी तो गया था अमेरिका. वहां छुट्टी लेने का मतलब है काम से हमेशा के लिए छुट्टी. और हां, वहां ये सब बातें मायने नहीं रखतीं कि आप की दादीजी थीं, उन की क्रिया में तो जरूर जाना चाहिए, बल्कि वहां तो यह है कि ‘लाइफ मस्ट गो औन’ जाने वाला चला गया, उस के साथ हमारी लाइफ थोड़े ही रुकनी चहिए. जा कर उन्हें जिंदा कर लोगे क्या? लेकिन हां, अगर खुद अभी गए तो समझ कि मर ही गए. यानी, यहां की नौकरी का द एंड.

और हां, आकाश ने यह भी कहां चाहा था कि उस की मां और पापा, आजकल बेहद प्रचलित बीमारी से ग्रसित हो जाएं. वह बीमारी थी अकेलेपन की, अवसाद की. दरअसल, आकाश के अमेरिका जाने के कुछ दिनों बाद से ही विनीता के पैरों और कमर में दर्द शुरू हो गया था. होम्योपैथिक और आयुर्वेदिक इलाज से भी जब रत्तीभर फर्क भी न पड़ा तो ऐलोपैथिक में दिखाया. उन की दवाओं से भी जब बिलकुल फर्क न पड़ा तो डाक्टर ने कई टैस्ट करवाए. टैस्ट, एक्सरे सब ठीक आए तो डाक्टर ने मनोवैज्ञानिक के पास भेज दिया.

सरकारी अस्पताल के मनोवैज्ञानिक ने पहले विनीता से बात की, फिर शेखर को भी बुलाया और सामने यह आया कि दोनों ही अकेलेपन और अवसाद से जूझ रहे हैं.

जिस दिन आकाश को यह पता चला था कि दोनों अकेलेपन और अवसाद के शिकार हैं, उस दिन उस ने उन दोनों को बहुत डांटा. यह डिप्रैशन क्या होता है, यह अकेलापन क्या होता है? आज आप लोगों के पास सबकुछ है- गाड़ी है, बंगला है, पैसा है, किसी से उधार मांगने की जरूरत नहीं है कि आज मेरे बेटे की स्कूल की फीस भरनी है तो उधार दे दो, अगले महीने पगार मिलते ही वापस कर दूंगा. किसी चीज की कमी नहीं है. इतना कुछ है, अब अपने पास तो आप लोग डिप्रैशन ले कर बैठ गए हो. अरे एंजौय करो लाइफ. जरा सोचो न, डिप्रैशन तो तब होना चाहिए था जब हम लोगों के पास कम पैसे थे. खैर, मैं बैस्ट मनोवैज्ञानिक का पता करता हूं, अब उसे ही दिखाना.

और आकाश के बताने पर विनीता और शेखर एक और यानी शहर के द बैस्ट मनोवैज्ञानिक डाक्टर राधिका के पास गए.

काउंसलिंग सैशन के दौरान डाक्टर राधिका ने उन से पूछा, ‘‘तो घर के सारे काम के लिए नौकर हैं तो क्या हमेशा से ही ऐसा ही था?’’

विनीता झट से बोली, ‘‘नहीं डाक्टर साहब. पहले तो मैं घर के सारे काम करती थी- शायद एक आम हाउसवाइफ से भी कहीं ज्यादा- घर में खाना पकाना, घर की साफसफाई, अचार, बढ़िया, पापड़ बनाना, कपड़े सिलना, स्वटेर बुनना वगैरह.’’

मनोवैज्ञानिक ने पूछा, ‘‘तो अब? अब क्यों नहीं करतीं आप ये सब?’’

विनीता थोड़ा शान दिखाती हुई बोली, ‘‘असल में बेटा अमेरिका में है न, बहुत अच्छी पगार मिलती है उसे. तो वह ही हिदायत करता रहता कि जिंदगीभर बहुत काम किया, अब आराम करो. हम दोनों का, यहां के घर का सारा खर्च उठाता है हमारा बेटा.’’ यह कहतेकहते विनीता का गला भर आया, वह चुप हो गई.

डाक्टर राधिका ने आगे कहा, ‘‘और? शायद आप कुछ और भी कहना चाहतीं हैं. बेझिझक कहिए. यहां कोई आप को सही या गलत नहीं ठहरा रहा. कोई आप को कमजोर या साहसी होने की उपाधि नहीं दे रहा. जो मन में है वह कह दीजिए.’’

यह सुन कर तो जैसे विनीता की आंखों से आंसू छलक पड़े. कुछ कहना चाहा पर जुबान ने साथ न दिया.

डाक्टर राधिका ने एक गिलास पानी दिया. पानी पी कर, कुछ हिम्मत जुटा कर तो जैसे विनीता ने अपना मन ही खोल कर रख दिया, ‘‘किस के लिए बनाऊं सब? बेटे के विदेश जाने के साथ जैसे सबकुछ खत्म सा हो गया. सबकुछ खालीखाली सा, बेमानी सा लगने लगा है. लगता है जैसे अभी अक्कू कहीं से आएगा और मेरी साड़ी का पल्ला खींचते हुए बोलेगा, ‘मां, आज तो तेरे हाथों की कढ़ी खाने का मन है या फिर मेरा जन्मदिन आने वाला है, मुझे एक नया स्वेटर  बना देना?’ और पता है, एक बार उस की फरमाइश पर हम सब ने मिल कर 4-5 दिनों में उस के जन्मदिन पर उस के लिए एक स्वेटर  बनाया भी था.’’ विनीता की आंखें जैसे उन बीते दिनों को सजीव देख रही थीं. हवा में देखती हुईं वे बोलीं, ‘‘उफ्फ, कितने खुश थे उस दिन हम सब जब अक्कू ने मेरा बनाया वह स्वेटर  पहना था. अभी तक संभाल कर रखा है मैं ने वह स्वेटर.’’

डाक्टर राधिका बड़े ही गौर से विनीता को देख रही थीं. विनीता की बातें सुन कर, उन के चेहरे के भाव देख कर डाक्टर राधिका विनीता को समझने की कोशिश कर रही थीं. ये सब देखतेसमझते हुए ही डाक्टर राधिका बोलीं, ‘‘विनीताजी, आज की कंसल्टेशन का एक घंटा तो खत्म होने को आया लेकिन आप की खुशियां हम खत्म नहीं होने देंगे. आप की अगली कंसल्टेशन अगले हफ्ते है. बस, उस से पहले आप को करना यह है कि अपने बटे से कहिए कि एक बार मुझे फोन कर ले.’’

डाक्टर राधिका के क्लिनिक से बाहर निकलने के बाद विनीता और शेखर दोनों को ही यह लगा कि अन्य मनोवैज्ञानिकों की तरह इस ने न तो यह कहा कि दोस्तों से मिलो, न यह कहा कि लाफ्टर क्लब जौइन कर लो वगैरहवगैरह. विनीता शेखर से बोली, ‘‘इन की तो अजीब ही फरमाइश निकली, बेटे से फोन करवा दो. अरे, हमारा अक्कू कोई खाली बैठा है क्या?’’ इस पर शेखर बोले, ‘‘ओहो, तो इस में हर्ज भी क्या है?’’

रात को जब अक्कू का फोन आया तो उस ने भी शेखर की बात को ही जैसे आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘अरे, इधर रात थी तो क्या, आप लोग मुझे तभी बता देते तो मैं उसी वक्त बात कर लेता. कोई बात नहीं, आज रात को कर लूंगा बात.’’

डाक्टर राधिका के क्लिनिक में अगले दिन सुबह पहला फोन आकाश का था. रिसैपशनिस्ट ने आकाश को होल्ड पर डाल कर डाक्टर राधिका को बताया कि किसी मिस्टर आकाश का फोन है, अमेरिका से. डाक्टर राधिका ने फोन ले लिया.

जैसे ही डाक्टर राधिका लाइन पर आईं, आकाश ने अपना परिचय देने के बाद, घबराए हुए स्वर में पूछा, ‘‘डाक्टर, आप को मुझ से क्या बात करनी है. इज देयर समथिंग सीरियस? प्लीज टेल मी, व्हाट इज रौंग विद माई पेरैंट्स?’’

डाक्टर राधिका तो हलका सा हंस ही दीं और कहने लगीं, ‘‘अरेअरे, आप इतने चिंतित क्यों हो रहे हैं. ऐसा लग रहा है जैसे काउंसलिंग की जरूरत तो आप को है. डोंट वरी, देयर इज नथिंग रौंग विद योर पेरैंट्स. बल्कि मुझे तो यह कहना है कि यू आर सो लक्की कि आप को ऐसे पेरैंट्स मिले हैं जो इतना प्यार करने वाले और केयरिंग हैं. बस, कमी थोड़ी आप में है.’’

आकाश हैरान हो कर बोला, ‘‘मुझ में कैसी कमी, डाक्टर? मैं तो उन दोनों का इतना खयाल रखता हूं. बस, साथ ही नहीं रहता. लेकिन रोज फोन करता हूं. उन की हर जरूरत का ध्यान रखता हूं. हर महीने खूब पैसे भी भेजता हूं.’’

‘‘पता है, पता है, मिस्टर आकाश कि आप खूब पैसे भेजते हैं लेकिन आप को शायद नहीं पता कि कुछ लोग ले कर नहीं, बल्कि दे कर खुश रहते हैं. आप जानते होंगे कि मनोविज्ञान के अनुसार, लोगों की अलगअलग पर्सनैलिटी होती हैं, यानी हर व्यक्ति का अपना अलग व्यक्तित्व. अब जैसे आप ने देखा ही होगा कि कुछ लोग घूमना पसंद करते हैं तो कुछ लोग घर में ही रहना. इसी तरह, कुछ लोगों को यह पसंद होता है कि लोग हमारे लिए कुछ करते रहें जबकि कुछ लोग इस बात से खुश रहते हैं कि वे खुद दूसरों कि लिए कुछ करें और आप के मम्मीपापा इस दूसरी वाली श्रेणी में आते हैं.’’

आकाश अभी भी असमंजस में ही था. उसे डाक्टर राधिका की बातें पूरी तरह समझ नहीं आ रही थीं. स्पष्टता हासिल करने के लिए उस ने पूछा, ‘‘पर डाक्टर, अगर मम्मीपापा दूसरी वाली श्रेणी में आते हैं तो इस में मुझ में कहां कमी है?’’

‘‘आप में कमी यह है कि आप अपने मम्मीपापा को सिर्फ देते हैं, उन से मांगते कुछ नहीं.’’ अपनी बात को आगे समझने के लिए डाक्टर राधिका बोलीं, ‘‘मुझे पता है कि अब आप पूछेंगे कि आप क्या मांगेंगे, आप के पास तो सबकुछ है. तो भई, आप वह मांगिए उन से जो उन के पास है और जो वह आप को देना चाहते हैं. और वह है, उन का ढेर सारा प्यार.’’

‘ढेर सारा प्यार’ फोन रखने के बाद भी आकाश के कानों में डाक्टर राधिका के ये शब्द गूंज रहे थे. उस का मन तो यह कर रहा था कि एकदम मम्मीपापा को फोन लगाए और कहे, ‘मम्मी, पापा, मैं आप का वही छोटा सा अक्कू तो हूं, मुझे आज भी आप के प्यार की जरूरत है.’

लेकिन डाक्टर राधिका से बात करने के बाद अक्कू अब समझ गया था कि हर बात लफ्जों में कही या बताई नहीं जा सकती. दरअसल, जब आकाश ने डाक्टर राधिका से पूछा कि आप को कैसे पता कि मेरे मम्मीपापा को लेने से फायदा देने में ज्यादा खुशी मिलती है तो उन्होंने बताया था कि ‘एक मनोवैज्ञानिक अपने पास आने वाले मरीजों के शब्दों से ज्यादा उन के चेहरे, उन की बौडी लैंग्वेज यानी हावभाव पर ध्यान देता है. जब विनीताजी यह बता रही थीं कि उन का बेटा उन्हें खूब सारे पैसे भेजता है तो उन के चेहरे पर गर्व था लेकिन जब वे यह कह रही थीं कि ‘उफ्फ, कितने खुश थे उस दिन हम सब जब अक्कू ने वह मेरा बनाया स्वेटर  पहना था. अभी तक संभाल कर रखा है मैं ने वह स्वेटर  तो उस समय तो जैसे उन के  रोमरोम से खुशी टपक रही थी. उन दोनों की आंखें भर आई थीं वे पल याद कर के जब उन दोनों ने तुम्हारे लिए वह स्वेटर  बनाया था. बस, यही सब देख कर मैं समझ गई कि उन दोनों का व्यक्तित्व ऐसा है कि जिन्हें दूसरों कि लिए कुछ करने में खुशी मिलती है.’’

और अब आकाश भी समझ गया था कि उसे क्या करना है.

आकाश ने तुरंत घर फोन लगाया. फोन विनीता ने उठाया. उन के स्वर में हैरानी, चिंता और खुशी, जैसे तीनों भाव सम्मिलित थे. फोन उठाते ही बोलीं, ‘‘अरे अक्कू, इस वक्त कैसे फोन किया? सब ठीक है न? वहां तो रात होगी अभी, तेरे सोने का टाइम होगा, कल औफिस भी तो जाना है. रातभर जागेगा तो कल टाइम से उठेगा कैसे? और क्या ही औफिस में काम कर पाएगा?’’

उधर से आकाश बोला, ‘‘अरे मां, कल आप ने ठीक ही कहा था. ये मनोवैज्ञानिक न, बेकार की ही बातें करते हैं. मैं ने डाक्टर राधिका से बात तो कर ली लेकिन बिलकुल बेकार ही रहा उन से बात करना. अच्छा यह बताओ कि आप की और पापा की तबीयत कैसी है?’’

तब तक शेखर भी कमरे में आ गए और विनीता ने फोन को स्पीकर पर करते हुए फोन मेज पर रख दिया. अब शेखर भी अक्कू से वही सब सवाल पूछने लगे जो विनीता ने पूछे थे.

तो अक्कू बताने लगा, ‘‘मां, इस वक्त फोन मैं ने इसलिए किया है क्योंकि हमारे यहां न इंडियन लोगों का एक ग्रुप है और यहां इस महीने के अंत में एक कम्पीटिशन रखा है हम लोगों ने. उस में हर व्यक्ति को घर की बनी एक चीज लानी है. अब आप को तो कितने अच्छे स्वेटर  बनाने आते हैं. याद है न, आप ने, दादी ने और पापा ने मिल कर कैसे सिर्फ 4-5 दिनों में ही मेरे जन्मदिन के लिए एक स्वेटर  तैयार कर दिया था तो बस इसीलिए मैं ने इस वक्त फोन किया क्योंकि अभी तो दिन होगा वहां तो आज का दिन भी यूटिलाइज हो जाएगा क्योंकि टाइम कम है न.’’

आकाश की यह बात सुन कर विनीता और शेखर एकदम चुप से रह गए. वे दोनों बस एकदूसरे को देखते ही रह गए. दोनों के मन में शायद एक ही बात आई- हमारे बेटे को हम से कुछ चाहिए. वाह, क्या हम अभी भी इस काबिल हैं कि अपने बेटे के लिए कुछ कर सकें. अपने मातापिता की चुप्पी सुन कर आकाश समझ गया कि जो डाक्टर राधिका ने कहा था वह ठीक था. अपने बेटे के लिए कुछ कर पाने की बात सुन कर दोनों भावुक हो गए होंगे और उन की आवाज को आंसुओं के सैलाब ने रोक दिया होगा. अपने खुद के रुंधे गले से किसी तरह आवाज निकाल कर आकाश ने पूछा, ‘‘मां, बना दोगी न मेरे लिए स्वेटर ?’’

शेखर की आवाज आई, ‘‘बेटा, किस रंग का चाहिए?’’

रंग बताने के बाद अक्कू ने ‘गुड नाइट’ कह कर फोन रख दिया और सोचने लगा, सोने जाने से पहले डाक्टर राधिका से पूछ तो लूं कि उन्हें मेरी भेजी हुई फीस मिल गई और उन का धन्यवाद भी कर दूं कि उन की बताई तरकीब शायद कामयाब साबित हो रही है.

इधर, विनीता और शेखर, जल्दी से तैयार हो कर बाजार गए, ग्रे रंग की बढ़िया ऊन ले कर आए. विनीता ने जल्दी से फंदे डाले और विनीता बौर्डर बुनने में लग गई और शेखर नैट पर कोई अच्छी सी डिजाइन ढूंढने में लग गए.

जब रात को आकाश का फोन आया तो विनीता ने बड़ी उत्साहभरी आवाज में कहा, ‘‘वीडियो कौल करो न.’’ और वीडियो पर विनीता और शेखर ने अपने अक्कू को दिखाया, ‘‘देख, एक दिन में तेरा स्वेटर  कितना सारा बन गया. आगे और पीछे के पल्लों के पूरे बौर्डर, बस, बनने ही वाले हैं.’’

आकाश को अपने लैपटौप पर अपने मम्मीपापा दिख रहे थे- बेहद खुश, बेहद उत्साहित, इतना खुश उस ने अपने मम्मीपापा को बरसों से नहीं देखा था. मम्मी हाथ में थोड़ा बुना स्वेटर लिए हुए थीं और पापा ऊन का गोला पकड़े हुए थे- वह तसवीर आकाश ने अपने फोन से क्लिक कर ली.

अगली रात को जब आकाश ने फोन किया तो आज उस की आवाज में बेहद उत्साह था. फोन लगाते ही बोला, ‘‘पता है, जो कल मैं ने आप लोगों की तसवीर खींची थी स्वेटर  बुनते हुए, वह मैं ने सोशल मीडिया पर डाल दी थी और उस के नीचे लिख दिया था- ‘मांपापा का दुलार है, सात समंदर पार से’. आप जानते हैं, वह बहुत ही वायरल हो गई और सब लोगों ने बहुत ही इमोशनल कमैंट्स भेजे हैं. कोई लिखता है- ‘वाओ, मम्मीपापा हों तो ऐसे.’ और किसी ने लिखा है- ‘किलोमीटरों की दूरियां कुछ भी नहीं हैं अगर दिल से किसी के नजदीक हों तो.’

यह सुन कर शेखर बोले, ‘‘तू रहेगा एकदम शरारती का शरारती ही.’’ और विनीता बोलीं, ‘‘अरे, पहले बता देता तो मैं बढ़िया साड़ी पहन लेती.’’

वैसे, आकाश खुद भी हैरान था कि सोशल मीडिया पर उस तसवीर को इतने लाइक्स मिले. इसी तरह दिन बीतते गए, आकाश सोशल मीडिया पर रोज नए कपड़ों में विनीता और शेखर की और बड़े स्वेटर  के साथ तसवीर डालता, रोज और लाइक्स मिलते और रोज विनीता, शेखर और आकाश की बातों में एक नया रंग आने लगा- उल्लास का रंग, उमंग का रंग.

इन सब से भी एक बड़ी बात- एक चीज कम होने लगी- और वह था विनीता का कमर और पैरों का दर्द, बिना दवा के, बिना मसाज के और बिना काउंसलिंग के. अब विनीता के दर्द काफी कम हो गए थे. आकाश जब पूछता दर्द के बारे में तो विनीता कहती, अरे, लगता है मौसम की वजह से हो गए थे, अब तो न के बराबर ही हैं.

और आखिरकार वह दिन आ ही गया जब विनीता और शेखर की मेहनतों से चंद ही दिनों में तैयार किया गया स्वेटर  सात समंदर पार आकाश के पास पहुंच गया.

जैसे ही आकाश ने पार्सल खोला, उस में से निकला एक ग्रे स्वेटर . उस के मम्मीपापा के प्यार और दुलार की जीतीजागती निशानी.

कंपीटिशन से एक दिन पहले ही मिल गया था उसे घर की बनाई चीज, यानी, वह ग्रे स्वेटर .

दरअसल, औफिस के कामों में इतना व्यस्त रहता है आकाश कि उस ने उस कंपटीशन में जाने के बारे में सोचा ही न था लेकिन जब डाक्टर राधिका ने बताया कि उस के मम्मीपापा अपने बेटे के लिए कुछ कर के खुश होंगे तो उसे यह बढ़िया आइडिया लगा कि वह उस कंपटीशन में अपने मम्मी के हाथ का बना स्वेटर पहन कर जाए. और अब मम्मी के हाथ का बना स्वेटर  भी आ गया था और कंपटीशन का दिन भी.

उधर, विनीता और शेखर को ऐसा लग रहा था जैसे गुजरा हुआ वक्त एक बार फिर लौट कर वापस आ गया है क्योंकि आज वे दोनों एक बार फिर इंतजार कर रहे थे कि कब अक्कू दोस्तों से मिल कर आए और कब यह बताए कि दोस्तों ने कितनी प्रशंसा की उस के नए स्वेटर की. लेकिन, बस, दिल धड़कता था यह सोच कर कि कहीं पिछली बार जैसा न हो जाए.

लेकिन जब उन के अक्कू का फोन आया तो उस ने बताया कि वहां के दोस्तों ने उस के घर के बने स्वेटर  की प्रशंसा ही नहीं की बल्कि उस के दीवाने हो गए.

अक्कू खुशी के मारे जैसे उछलता हुआ बोल रहा था, ‘‘मां, पापा, इंडियन कम्युनिटी तो छोड़िए, अरे वहां के लोगों को भी बेहद पसंद आया आप का बनाया हुआ स्वेटर . और पता है, कितने ही लोगों ने तो यह पूछा- तुम्हारी मम्मी हमारे लिए भी बना देंगी ऐसे ही स्वेटर?’’

अब विनीता और शेखर भी थोड़ाथोड़ा अक्कू की तरह बोलना सीख गए थे, सो, उन के मुंह से भी निकला, वाओ.’’

अक्कू ने पूछा, ‘‘मां, क्या यहां के मेरे सारे दोस्तों के लिए बना पाओगी स्वेटर ?’’

और इस से पहले कि विनीता कुछ कहती, शेखर बोल पड़े, ‘‘अरे क्यों नहीं.

तुझे पता है, मैं भी थोड़ाथोड़ा सीख रहा हूं बुनना. तो हम दोनों मिल कर बना ही लेंगे.’’

विनीता हंसते हुए बोली, ‘‘अरे, ये तो नौसिखिया हैं. इन्हें कुछ नहीं मालूम. पहले तू उन लोगों की नाप तो भेज जिन के लिए बनाना है स्वेटर.’’ अक्कू  ने कहा, ‘‘ओह, यह तो मैं भी भूल गया था. हांहां जरूर, पहले नाप भेजता हूं. मेरे ग्रे स्वेटर  जैसा ही बना देना.’’ और अक्कू ने गुड नाइट कह कर फोन रख दिया.

आकाश सोच रहा था कि एक ग्रे स्वेटर  की वजह से पहले वह सात समंदर पार चला गया, मातापिता से इतनी दूर, और आज, दूसरे ग्रे स्वेटर  की वजह से आज वह दूर रह कर भी अपने मातापिता के और करीब आ गया. Hindi Family Story :

Hindi Family Story : अनमोल उपहार – गायत्री ने सरस्वती को क्या सुख दे दिया था ?

Hindi Family Story :

सरिता, बीस साल पहले, जनवरी (प्रथम) 2006

शादी के एक साल बाद पति की मौत हो जाने से सरस्वती समाज की नजरों में मनहूस बन गई. बेटे को भी मां का प्यार न दे सकी. पुत्रवधू गायत्री को भी तो असामयिक मौत ही मिली पर गायत्री ने ऐसा क्या किया जो सरस्वती को लोग सम्मानित नजरों से देखने लगे.

दीवार का सहारा ले कर खड़ी दादीमां थरथर कांप रही थीं. उन का चेहरा आंसुओं से भीगता जा रहा था. तभी वे बिलखबिलख कर रोने लगीं, ‘‘बस, यही दिन देखना बाकी रह गया था उफ, अब मैं क्या करूं? कैसे विश्वनाथ की नजरों का सामना करूं?’’

सहसा नेहा उठ कर उन के पास चली आई और बोली, ‘‘दादीमां, जो होना था हो गया. आप हिम्मत हारोगी तो मेरा और विपुल का क्या होगा?’’

दादीमां ने अपने बेटे विश्वनाथ की ओर देखा. वह कुरसी पर चुपचाप बैठा एकटक सामने जमीन पर पड़ी अपनी पत्नी गायत्री के मृत शरीर को देख रहा था.

आज सुबह ही तो इस घर में जैसे भूचाल आ गया था. रात को अच्छीभली सोई गायत्री सुबह बिस्तर पर मृत पाई गई थी. डाक्टर ने बताया कि दिल का दौरा पड़ा था जिस में उस की मौत हो गई. यह सुनने के बाद तो पूरे परिवार पर जैसे बिजली सी गिर पड़ी.

दादीमां तो जैसे संज्ञाशून्य सी हो गईं. इस उम्र में भी वे स्वस्थ हैं और उन की बहू महज 40 साल की उम्र में इस दुनिया से नाता तोड़ गई. पीड़ा से उन का दिल टुकड़ेटुकड़े हो रहा था.

नेहा और विपुल को सीने से सटाए दादीमां सोच रही थीं कि काश, विश्वनाथ भी उन की गोद में सिर रख कर अपनी पीड़ा का भार कुछ कम कर लेता. आखिर, वे उस की मां हैं.

सुबह के 11 बज रहे थे. पूरा घर लोगों से खचाखच भरा था. वे साफ देख रही थीं कि गायत्री को देख कर हर आने वाले की नजर उन्हीं के चेहरे पर अटक कर रह जाती है और उन्हें लगता है जैसे सैकड़ों तीर एकसाथ उन की छाती में उतर गए हों.

‘‘बेचारी अम्मा, जीवनभर तो दुख ही भोगती आई हैं. अब बेटी जैसी बहू भी सामने से उठ गई,’’ पड़ोस की विमला चाची ने कहा.

विपुल की मामी दबे स्वर में बोलीं, ‘‘न जाने अम्मा कितनी उम्र ले कर आई हैं? इस उम्र में ऐसा स्वास्थ्य? एक हमारी दीदी थीं, ऐसे अचानक चली जाएंगी कभी सपने में भी हम ने नहीं सोचा था.’’

‘‘इतने दुख झेल कर भी अब तक अम्मा जीवित कैसे हैं, यही आश्चर्य है,’’ नेहा की छोटी मौसी निर्मला ने कहा. वे पास के ही महल्ले में रहती थीं. बहन की मौत की खबर सुन कर भागी चली आई थीं.

दादीमां आंखें बंद किए सब खामोशी से सुनती रहीं पर पास बैठी नेहा यह सबकुछ सुन कर खिन्न हो उठी और अपनी मौसी को टोकते हुए बोली, ‘‘आप लोग यह क्या कह रही हैं? क्या हक है आप लोगों को दादीमां को बेचारी और अभागी कहने का? उन्हें इस समय जितनी पीड़ा है, आप में से किसी को नहीं होगी.’’

‘‘नेहा, अभी ऐसी बातें करने का समय नहीं है. चुप रहो,’’ तभी विश्वनाथ का भारी स्वर कमरे में गूंज उठा.

गायत्री के क्रियाकर्म के बाद रिश्तेदार चले गए तो सारा घर खाली हो गया. गायत्री थी तो पता ही नहीं चलता था कि कैसे घर के सारे काम सही समय पर हो जाते थे. उस के असमय चले जाने के बाद एक खालीपन का एहसास हर कोई मन में महसूस कर रहा था.

एक दिन सुबह नेहा चाय ले कर दादीमां के कमरे में आई तो देखा वे सो रही हैं.

‘‘दादीमां, उठिए, आज आप इतनी देर तक सोती रहीं?’’ नेहा ने उन के सिर पर हाथ रखते हुए पूछा.

‘‘बस, उठ ही रही थी बिटिया,’’ और वे उठने का उपक्रम करने लगीं.

‘‘पर आप को तो तेज बुखार है. आप लेटी रहिए. मैं विपुल से दवा मंगवाती हूं,’’ कहती हुई नेहा कमरे से बाहर चली गई.

दादीमां यानी सरस्वती देवी की आंखें रहरह कर भर उठती थीं. बहू की मौत का सदमा उन्हें भीतर तक तोड़ गया था. गायत्री की वजह से ही तो उन्हें अपना बेटा, अपना परिवार वापस मिला था. जीवनभर अपनों से उपेक्षा की पीड़ा झेलने वाली सरस्वती देवी को आदर और प्रेम का स्नेहिल स्पर्श देने वाली उन की बहू गायत्री ही तो थी.

बिस्तर पर लेटी दादीमां अतीत की धुंधभरी गलियों में अनायास भागती चली गईं…

‘अम्मा, मनहूस किसे कहते हैं?’ 4 साल के विश्वनाथ ने पूछा तो सरस्वती चौंक पड़ी थी.

‘बूआ कहती हैं, तुम मनहूस हो, मैं तुम्हारे पास रहूंगा तो मैं भी मर जाऊंगा,’ बेटे के मुंह से यह सब सुन कर सरस्वती जैसे संज्ञाशून्य सी हो गई और बेटे को सीने से लगा कर बोली, ‘बूआ झूठ बोलती हैं, विशू. तुम ही तो मेरा सबकुछ हो.’

तभी सरस्वती की ननद कमला तेजी से कमरे में आई और उस की गोद से विश्वनाथ को छीन कर बोली, ‘मैं ने कोई झूठ नहीं बोला. तुम वास्तव में मनहूस हो. शादी के सालभर बाद ही मेरा जवान भाई चल बसा. अब यह इस खानदान का अकेला वारिस है. मैं इस पर तुम्हारी मनहूस छाया नहीं पड़ने दूंगी.’

‘पर दीदी, मैं जो नीरस और बेरंग जीवन जी रही हूं, उस की पीड़ा खुद मैं ही समझू सकती हूं,’ सरस्वती फूटफूट कर रो पड़ी थी.

‘क्यों उस मनहूस से बहस कर रही है, बेटी?’ आंगन से विशू की दादी बोलीं, ‘विशू को ले कर बाहर आ जा. उस का दूध ठंडा हो रहा है.’

बुआ गोद में विशू को उठाए कमरे से बाहर चली गईं.

सरस्वती का मन पीड़ा से फटा जा रहा था कि जिस वेदना से मैं दोचार हुई हूं उसे ये लोग क्या समझेंगे? पिता की मौत के 5 महीने बाद विश्वनाथ पैदा हुआ था. बेटे को सीने से लगाते ही वह अपने पिछले सारे दुख क्षणभर के लिए भूल गई थी.

सरस्वती की सास उस वक्त भी ताना देने से नहीं चूकी थीं कि चलो अच्छा हुआ, जो बेटा हुआ, मैं तो डर रही थी कि कहीं यह मनहूस बेटी को जन्म दे कर खानदान का नामोनिशान न मिटा डाले.

सरस्वती के लिए वह क्षण जानलेवा था जब उस की छाती से दूध नहीं उतरा. बच्चा गाय के दूध पर पलने लगा. उसे यह सोच कर अपना वजूद बेकार लगता कि मैं अपने बच्चे को अपना दूध नहीं पिला सकती.

कभीकभी सरस्वती सोच के अथाह सागर में डूब जाती. हां, मैं सच में मनहूस हूं. तभी तो जन्म देते ही मां मर गई. थोड़ी बड़ी हुई तो बड़ा भाई एक दुर्घटना में मारा गया. शादी हुई तो सालभर बाद पति की मृत्यु हो गई. बेटा हुआ तो वह भी अपना नहीं रहा. ऐसे में वह विह्वल हो कर रो पड़ती.

समय गुजरता रहा. बुआ और दादी लाड़लड़ाती हुई विश्वनाथ को खिलातींपिलातीं, जीभर कर बातें करतीं और वह मां हो कर दरवाजे की ओट से चुपचाप, अपलक बेटे का मुखड़ा निहारती रहती. छोटेछोटे सपनों के टूटने की चुभन मन को पीड़ा से तारतार कर देती. एक विवशता का एहसास सरस्वती के वजूद को हिला कर रख देता.

विश्वनाथ की बुआ कमला अपने परिवार के साथ शादी के बाद से ही मायके में रहती थीं. उन के पति ठेकेदारी करते थे. बुआ की 3 बेटियां थीं. इसलिए भी अब विश्वनाथ ही सब की आशाओं का केंद्र था. तेज दिमाग विश्वनाथ ने जिस दिन पब्लिक सर्विस कमीशन की परीक्षा पास की, सारे घर में जैसे दीवाली का माहौल हो गया.

‘मैं जानती थी, मेरा विशू एक दिन सारे गांव का नाम रोशन करेगा. मां, तेरे पोते ने तो खानदान की इज्जत रख ली.’  विश्वनाथ की बुआ खुशी से बावली सी हो गई थीं. प्रसन्नता की उछलती तरंगों ने सरस्वती के मन को भी भावविभोर कर दिया था.

विश्वनाथ पहली पोस्टिंग पर जाने से पहले मां के पांव छूने आया था.

‘सुखी रहो, खुश रहो बेटा,’ सरस्वती ने कांपते स्वर में कहा था. बेटे के सिर पर हाथ फेरने की नाकाम कोशिश करते हुए उस ने मुट्ठी भींच ली थी. तभी बुआ की पुकार ‘जल्दी करो विशू, बस निकल जाएगी,’ सुन कर विश्वनाथ कमरे से बाहर निकल गया था.

समय अपनी गति से बीतता रहा. विशू की नौकरी लगे 2 वर्ष बीत चुके थे. उस की दादी का देहांत हो चुका था. अपनी तीनों फुफेरी बहनों की शादी उस ने खूब धूमधाम से अच्छे घरों में करवा दी थी. अब उस के लिए अच्छेअच्छे रिश्ते आ रहे थे.

एक शाम कमला एक लड़की की फोटो लिए सरस्वती के पास आई.

उस ने हुलस कर बताया कि लड़की बहुत बड़े अफसर की इकलौती बेटी है. सुंदर, सुशील और बीए पास है.

‘क्या यह विशू को पसंद है?’ सरस्वती ने पूछा.

‘विशू कहता है, बुआ तुम जिस लड़की को पसंद करोगी मैं उसी से शादी करूंगा,’ कमला ने गर्व के साथ सुनाया तो सरस्वती के भीतर जैसे कुछ दरक सा गया.

धूमधाम से शादी की तैयारियां शुरू हो गईं. सरस्वती का भी जी चाहता था कि वह बहू के लिए गहनेकपड़े का चुनाव करने के लिए कमला के साथ बाजार जाए, पड़ोस की औरतों के साथ बैठ कर विवाह के मंगल गीत गाए पर मन की साध अधूरी ही रह गई.

धूमधाम से शादी हुई और गायत्री ने दुलहन के रूप में इस घर में प्रवेश किया.

गायत्री सुलझे विचारों वाली लड़की थी. 2-3 दिन में ही उसे महसूस हो गया कि उस की विधवा सास अपने ही घर में उपेक्षित जीवन जी रही हैं. घर में बुआ का राज चलता है और उस की सास एक मूकदर्शक की तरह सबकुछ देखती रहती हैं.

उसे लगा कि उस का पति भी अपनी मां के साथ सहज व्यवहार नहीं करता. मांबेटे के बीच एक दूरी है, जो नहीं होनी चाहिए. एक शाम वह चाय ले कर सास के कमरे में गई तो देखा, वे बिस्तर पर बैठी न जाने किन खयालों में गुम थीं.

‘अम्माजी, चाय पी लीजिए,’ गायत्री ने कहा तो सरस्वती चौंक पड़ी.

‘आओ, बहू, यहां बैठो मेरे पास,’ बहू को स्नेह से अपने पास बिठा कर सरस्वती ने पलंग के नीचे रखा संदूक खोला. लाल मखमल के डब्बे से एक जड़ाऊ हार निकाल कर बहू के हाथ में देते हुए बोली, ‘यह हार मेरे पिता ने मुझे दिया था. मुंहदिखाई के दिन नहीं दे पाई. आज रख लो बेटी.’

गायत्री ने सास के हाथ से हार ले कर गले में पहनना चाहा. तभी बुआ कमरे में चली आईं. उस के हाथ से हार ले कर उसे वापस डब्बे में रखते हुए बोलीं, ‘तुम्हारी मत मारी गई है क्या भाभी? जिस हार को सालभर भी तुम पहन नहीं पाईं, उसे बहू को दे रही हो, इस के पास क्या गहनों की कमी है?’

सरस्वती जड़वत बैठी रह गई पर गायत्री से रहा नहीं गया. उस ने टोकते हुए कहा, ‘बूआजी, अम्मा ने कितने प्यार से मुझे यह हार दिया है. मैं इसे जरूर पहनूंगी.’

सामने रखे डिब्बे से हार निकाल कर गायत्री ने पहन लिया और सास के पांव छूते हुए बोली, ‘मैं कैसी लगती हूं, अम्मा?’

‘बहुत सुंदर बहू, जुगजुग जियो, सदा खुश रहो,’ सरस्वती का कंठ भावातिरेक से भर आया था. पहली बार वह कमला के सामने सिर उठा पाई थी.

गायत्री ने मन ही मन ठान लिया था कि वह अपनी सास को पूरा आदर और प्रेम देगी. इसीलिए वह साए की तरह उन के साथ लगी रहती थी. धीरेधीरे एक महीना गुजर गया. विश्वनाथ की छुट्टियां खत्म हो रही थीं. जिस दिन दोनों को रामनगर लौटना था उस सुबह गायत्री ने पति से कहा, ‘अम्मा भी हमारे साथ चलेंगी.’

‘क्या तुम ने अम्मा से पूछा है?’ विश्वनाथ ने पूछा तो गायत्री दृढ़ताभरे स्वर में बोली, ‘पूछना क्या है, क्या हमारा फर्ज नहीं कि हम अम्मा की सेवा करें?’

‘अभी तुम्हारे खेलनेखाने के दिन हैं, बहू. हमारी चिंता छोड़ो. हम यहीं ठीक हैं. बाद में कभी अम्मा को ले जाना,’ बूआ ने टोका था.

‘बूआजी, मैं ने अपनी मां को नहीं देखा है,’ गायत्री बोली, ‘अम्मा की सेवा करूंगी तो मन को अच्छा लगेगा.’

आखिर गायत्री के आगे बूआ की एक न चली और सरस्वती बेटेबहू के साथ रामनगर आ गई थी.

कुछ दिन बेहद ऊहापोह में बीते. जिस बेटे को बचपन से अपनी आंखों से दूर पाया था, उसे हर पल नजरों के सामने पा कर सरस्वती की ममता उद्वेलित हो उठती पर मांबेटे के बीच बात नाममात्र को होती.

गायत्री मांबेटे के बीच फैली लंबी दूरी को कम करने का भरपूर प्रयास कर रही थी. एक सुबह नाश्ते की मेज पर अपनी मनपसंद भरवां कचौडि़यां देख कर विश्वनाथ खुश हो गया. एक टुकड़ा खा कर बोला, ‘सच, तुम्हारे हाथों में तो जादू है, गायत्री.’

‘यह जादू मां के हाथों का है. उन्होंने बड़े प्यार से आप के लिए बनाई हैं. जानते हैं, मैं तो मां के गुणों की कायल हो गई हूं. जितना शांत स्वभाव, उतने ही अच्छे विचार. मुझे तो ऐसा लगता है जैसे मेरी सगी मां लौट आई हों.’

धीरेधीरे विश्वनाथ का मौन टूटने लगा, अब वह यदाकदा मां और पत्नी के साथ बातचीत में भी शामिल होने लगा था. सरस्वती को लगने लगा कि जैसे उस की दुनिया वापस उस की मुट्ठी में लौटने लगी है.

समय पंख लगा कर उड़ने लगा. वैसे भी जब खुशियों के मधुर एहसास से मन भरा हुआ होता है तो समय हथेली पर रखी कपूर की टिकिया की तरह तेजी से उड़ जाता है. जिस दिन गायत्री ने लजाते हुए एक नए मेहमान के आने की सूचना दी, उस दिन सरस्वती की खुशी की इंतहा न थी.

‘बेटी, तू ने तो मेरे मन की मुराद पूरी कर दी.’

‘अभी कहां, अम्मा, जिस दिन आप का बेटा आप को वापस लौटा दूंगी, उस दिन वास्तव में आप की मुराद पूरी होगी.’

गायत्री ने स्नेह से सास का हाथ दबाते हुए कहा तो सरस्वती की आंखें छलक आईं.

गायत्री ने कहा, ‘मन के बुरे नहीं हैं. न ही आप के प्रति गलत धारणा रखते हैं, पर बचपन से जो बातें कूटकूट कर उन के दिमाग में भर दी गई हैं उन का असर धीरेधीरे ही खत्म होगा न? बुआ का प्रभाव उन के मन पर बचपन से हावी रहा है. आज उन्हें इस बात का एहसास है कि उन्होंने आप का दिल दुखाया है.’

गायत्री के मुंह से यह सुन कर सरस्वती का चेहरा एक अनोखी आभा से चमक उठा था.

गायत्री की गोदभराई के दिन घर सारे नातेरिश्तेदारों से भरा हुआ था. गहनों और बनारसी साड़ी में सजी गायत्री बहुत सुंदर लग रही थी.

‘चलो, बहू, अपना आंचल फैलाओ. मैं तुम्हारी गोद भर दूं,’ बूआ ने मिठाई और फलों से भरा थाल संभालते हुए कहा.

‘रुकिए, बूआजी, बुरा मत मानिएगा पर मेरी गोद सब से पहले अम्मा ही भरेंगी.’

‘यह तुम क्या कह रही हो, बहू? ये काम सुहागिन औरतों को ही शोभा देता है और तुम्हारी सास तो…’ पड़ोस की विमला चाची ने टोका तो कमला बुआ जोर से बोलीं, ‘रहने दो बहन, चार अक्षर पढ़ कर आज की बहुएं ज्यादा बुद्धिमान हो गई हैं. अब शास्त्र व पुराण की बातें कौन मानता है?’

‘जो शास्त्र व पुराण यह सिखाते हों कि एक स्त्री की अस्मिता कुछ भी नहीं और एक विधवा स्त्री मिट्टी के ढेले से ज्यादा अहमियत नहीं रखती, मैं ऐसे शास्त्रों और पुराणों को नहीं मानती. आइए, अम्माजी, मेरी गोद भरिए.’

गायत्री का आत्मविश्वास से भरा स्वर कमरे में गूंज उठा. सरस्वती जैसे नींद से जागी. मन में एक अनजाना भय फिर दस्तक देने लगा.

‘नहीं बहू, बुआ ठीक कहती हैं,’ उस का कमजोर स्वर उभरा.

‘आइए, अम्मा, मेरी गोद पहले आप भरेंगी, फिर कोई और.’

बहू की गोद भरते हुए सरस्वती की आंखें मानो पहाड़ से फूटते झूरने का पर्याय बन गई थीं. रोमरोम से बहू के लिए आसीस का एहसास फूट रहा था.

निर्धारित समय पर विपुल का जन्म हुआ तो सरस्वती उसे गोद में समेट अतीत के सारे दुखों को भूल गई. विपुल में नन्हे विश्वनाथ की छवि देख कर वह प्रसन्नता से फूली नहीं समाती थी.

अपने बेटे के लिए जोजो अरमान संजोए थे, वे सारे अरमान पोते के लालनपालन में फलनेफूलने लगे. फिर 2 साल के बाद नेहा गायत्री की गोद में आ गई. सरस्वती की झेली खुशियों की असीम सौगात से भर उठी थी. गायत्री जैसी बहू पा कर वह निहाल हो उठी थी. विश्वनाथ और उस के बीच में तनी अदृश्य दीवार गायत्री के प्रयास से टूटने लगी थी. बेटे और मां के बीच का संकोच मिटने लगा था.

अब विश्वनाथ खुल कर मां के बनाए खाने की प्रशंसा करता. कभीकभी मनुहारपूर्वक कोई पकवान बनाने की जिद भी कर बैठता तो सरस्वती की आंखें गायत्री को स्नेह से निहार बरस पड़तीं. कौन से पुण्य किए थे जो ऐसी सुघड़ बहू मिली. अगर इस ने मेरा साथ नहीं दिया होता तो गांव के उसी अकेले कमरे में बेहद कष्टमय बुढ़ापा गुजारने को मैं विवश रहती.

समय अपनी गति से बीतता रहा.

3 वर्ष पहले कमला बूआ की मृत्यु हो गई. विपुल ने इसी साल मैट्रिक की परीक्षा दी थी और नेहा 8वीं कक्षा की होनहार छात्रा थी. दोनों बच्चों के प्राण तो बस, अपनी दादी में ही बसते थे.

गायत्री ने उन का दामन जमानेभर की खुशियों से भर दिया था और वही गायत्री इस तरह, अचानक उन्हें छोड़ गई? उन की सोच को एक झूटका सा लगा.

‘‘दादीमां, दवा ले लीजिए,’’ पोती नेहा की आवाज से वे वर्तमान में लौटीं. उठने की कोशिश की पर बेहोशी की गर्त में समाती चली गईं.

नेहा की चीख सुन कर सब कमरे में भागे चले आए. विपुल दौड़ कर डाक्टर को बुला लाया. मां के सिरहाने बैठे विश्वनाथ की आंखें रहरह कर भीग उठती थीं.

‘‘इन्हें बहुत गहरा सदमा पहुंचा है, विश्वनाथ बाबू. इस उम्र में ऐसे सदमे से उबरना बहुत मुश्किल होता है. मैं कुछ दवाएं दे रहा हूं. देखिए, क्या होता है?’’

डाक्टर ने कहा तो विपुल और नेहा जोरजोर से रोने लगे.

‘‘दादीमां, तुम हमें छोड़ कर नहीं जा सकतीं. मां तुम्हारे ही भरोसे हमें छोड़ कर गई हैं,’’ नेहा के रुदन से सब की आंखें नम हो गई थीं.

4दिन तक सरस्वती नीम बेहोशी की हालत में पड़ी रही. 5वें दिन सुबह अचानक उसे होश आया. आंखें खोलीं और करवट बदलने का प्रयास किया तो हाथ किसी के सिर को छू गया. सरस्वती ने चौंक कर देखा. उन के पलंग की पाटी से सिर टिकाए उन का बेटा गहरी नींद में सो रहा था. कुरसी पर अधलेटे विश्वनाथ का सिर मां के पैरों के पास था.

तभी नेहा कमरे में आ गई. दादी की आंखें खुली देख वह खुशी से चीख पड़ी, ‘‘पापा, दादीमां को होश आ गया.’’ विश्वनाथ चौंक कर उठ बैठे.

बेटे से नजर मिलते ही सरस्वती का दिल फिर से धकधक करने लगा. मन की पीड़ा अधरों से फूट पड़ी.

‘‘मैं सच में आभागी हूं, बेटा. मनहूस हूं, तभी तो सोने जैसी बहू सामने से चली गई और मुझे देख, मैं फिर भी जिंदा बच गई. मेरे जैसे मनहूस लोगों को तो मौत भी नहीं आती.’’

‘‘नहीं मां, ऐसा मत कहो. तुम ऐसा कहोगी तो गायत्री की आत्मा को तकलीफ होगी. कोई इंसान मनहूस नहीं होता. मनहूस तो होती हैं वे रूढि़यां, सड़ीगली परंपराएं और शास्त्रपुराणों की थोथी अवधारणाएं जो स्त्री और पुरुष में भेद पैदा कर समाज में विष का पौधा बोती हैं. अब मुझे ही देख लो, गायत्री की मृत्यु के बाद किसी ने मुझे अभागा या बेचारा नहीं कहा.

‘‘अगर गायत्री की जगह मेरी मृत्यु हुई होती तो समाज उसे अभागी और बेचारी कह कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझू लेता.’’

सरस्वती आंखें फाड़े अपने बेटे का यह नया रूप देख रही थीं. गायत्री जैसे पारस के स्पर्श से उन के बेटे की सोच भी कुंदन हो उठी थी.

विश्वनाथ अपनी रौ में कहे जा रहा था, ‘‘मुझे माफ कर दो, मां. बचपन से ही मैं तुम्हारा प्यार पाने में असमर्थ रहा. अब तुम्हें हमारे लिए जीना होगा. मेरे लिए, विपुल के लिए और नेहा के लिए.’’

‘‘बेटा, आज मैं बहुत खुश हूं. अब अगर मौत भी आ जाए तो कोई गम नहीं.’’

‘‘नहीं मां, अभी तुम्हें बहुत से काम करने हैं. विपुल और नेहा को बड़ा करना है, उन की शादियां करनी हैं और मुझे वह सारा प्यार देना है जिस से मैं वंचित रहा हूं,’’ विश्वनाथ बच्चे की तरह मां की गोद में सिर रख कर बोला.

सरस्वती के कानों में बहू के कहे शब्द गूंज उठे थे.

‘मां, जिस दिन आप का बेटा आप को वापस लौटा दूंगी, उस दिन आप के मन की मुराद पूरी होगी. आप के प्रति उन का पछतावे से भरा एहसास जल्दी ही असीम स्नेह और आदर में बदल जाएगा, देखिएगा.’

सरस्वती ने स्नेह से बेटे को अपने अंक में समेट लिया. बहू द्वारा दिए गए इस अनमोल उपहार ने उन की शेष जिंदगी को प्राणवान कर दिया था.

इन्हें आजमाइए :

कपड़े पर हलका सा मौइश्चराइजर लोशन लगा कर सोफे की धूल पोछें. इस से धूल उड़ती नहीं और सोफा चमकता हुआ दिखता है.

अगर चार्जिंग के समय मोबाइल ज्यादा गरम हो जाता है तो उस का कवर निकाल दें. इस से बैटरी जल्दी खराब नहीं होती.

सब्जी काटते समय उंगलियों पर थोड़ा नमक लगा लें, इस से मिर्च की जलन नहीं होगी.

दूध उबालते समय बरतन के किनारे थोड़ा सा घी लगा दें, दूध बाहर नहीं गिरेगा.

पतले ब्रश या सूखे टूथब्रश से हलके हाथ से स्पीकर साफ करें, आवाज साफ हो जाएगी.

नहाने के बाद अंडरआर्म्स में थोड़ा सा फिटकरी का पानी लगाएं, बदबू नहीं आएगी.

चश्मे के ग्लास पर हलका सा साबुन लगा कर पोंछ दें, इस से भाप कम जमेगी.

दिनभर एक्टिव रहने के लिए हरेक घंटे में एक गिलास पानी जरूर पिएं. इस से आप तरोताजा रहेंगे.

घर में ताजी खुशबू बनाए रखने के लिए पानी में गुलाबजल मिला कर फर्श पोंछें.

पानी में थोड़ा सिरका मिला कर शीशा पोंछें, चमक जाएगा. Hindi Family Story :

Happy New Year 2026 : लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, पाखंड मुक्त नए साल का जश्न

Happy New Year 2026 :

तुम्हारी भाषा, तुम्हारा धर्म, तुम्हारा देश, ये पहचाने हैं. तुम्हारा अस्तित्व इन सब से बड़ा है – खलील जिब्रान

सच्ची वैश्विकता तब शुरू होती है जब तुम हम और वे कहना छोड़ देते हो – ओशो

सचमुच में दुनिया भर के लोग अगर किसी दिन अपने स्वतंत्र अस्तित्व को महसूसते हैं तो वह नए साल का पहला दिन होता है. सच्ची वैश्विकता का एहसास भी इसी दिन होता है. क्योंकि इस दिन दिलोदिमाग पर न धार्मिक पाखंड होते हैं न कुछ करने और कुछ न करने का बोझ होता है, न कोई कलश यात्रा न जुलुस, न व्रत त्यौहार, न पूजापाठ न, कोई नमाज और न ही किसी विशेष प्रार्थना का आयोजन होता.

साल भर ऊपर वाले के आगे गिड़गिड़ाते रहने वाले नए साल के पहले दिन मंदिर, मसजिद या गिरजाघरों में जा कर अपने लिए कुछ नहीं मांगते और अगर मांगते भी हैं तो यही कि पूरा साल अमन चैन शांति और भाईचारे से गुजरे. हम कोई दंगा फसाद, विवाद झगड़ा और हिंसा नहीं चाहते. साल के पहले दिन हम कामना करते हैं कि 2026 सभी के लिए सुख, शांति, स्वास्थ, सम्पत्ति, वैभव और शुभ ले कर आएं. यह भावना जिन 3 शब्दों में समाई है वे हैं हैप्पी न्यू ईयर.

यह ठीक है कि कुछ दिन बाद अधिकतर लोग फिर से धर्म का लबादा ओढ़ने मजबूर हो जाते हैं और हैप्पी न्यू ईयर की जगह हैप्पी होली, दीवाली, ईद, क्रिसमस वगैरह ले लेते हैं जो सारे फसाद और परेशानियों की जड़ हैं. हर दिन एक जनवरी जैसा खुशनुमा गुजरे इस के लिए जरुरी सिर्फ इतना है कि हम हर कभी एक जनवरी सरीखा माहौल अपने चारों तरफ बनाए. इस के लिए भी जरुरी यह है कि हम धार्मिक त्यौहार मनाना छोड़ें जो असमानता, फूट और नफरत फैलाते हैं.

25 दिसंबर क्रिसमस के त्यौहार पर यह सबने देखा लेकिन उस से पहले यह देख लें कि नए साल के स्वागत में लोग कहां थे और क्या कर रहे थे. देश की राजधानी दिल्ली में इंडिया गेट, सेंट्रल विस्टा और पार्कों में बेहद शांत ढंग से एकदूसरे को नए साल की शुभकामनाएं दे रहे थे. होटलों में खाने के साथ लोग गीतसंगीत का भी लुत्फ उठा रहे थे. पिंक सिटी जयपुर में नए साल का रंग एतिहासिक और सार्वजनिक स्थलों पर दिखा. आमेर, जलमहल सहित शहर के खुले स्थानों पर देसीविदेशी पर्यटक स्थानीय लोगों के साथ ऐसे घुलेमिले झूमते नाचते गाते नजर आए मानो दुनिया में धर्म, नस्ल, रंग और जाति के कोई माने ही न हों.

पटना में गंगा किनारे और पार्कों सहित दीघा घाट पर परिवार के साथ निकले लोगों ने बिना किसी पूर्वाग्रह के नए साल का स्वागत किया. यहां छठ मैय्या की जय जैसे नारे नहीं थे बल्कि हैप्पी न्यू ईयर का आदानप्रदान था. लखनऊ में गोमती रिवर फ्रंट और पार्कों सहित होटलों में नए साल का आगाज हुआ. युवा इत्मीनान से टहलते और बतियाते दिखे. भोपाल में वोट क्लब और वीआईपी रोड पर भीड़ उमड़ी लेकिन कोई किसी को ताने नहीं मार रहा था बल्कि परिचित अपरिचित एकदूसरे को नए साल की बधाई दे रहे थे. होटलों में देश भर के शहरों की तरह खास आयोजन किए गए थे.

मुंबई में समुद्र किनारे खासतौर से मरीन ड्राइव और जुहू बीच पर लोग नाचते गाते खातेपीते नए साल का स्वागत करते नजर आए और अधिकतर परिवारों ने सूर्योदय का नजारा देखा. दूसरे इलाकों की तरह मुंबई में भी नए साल की पहली सेल्फी का क्रेज दिखा. कोलकाता में पार्क स्ट्रीट युवाओं से गुलजार रहा तो बेंगलुरु की तकनीकी रफ्तार साल के पहले दिन थमी सी दिखी. शहर के केफे, झील और पार्क सुबह से ही आबाद हो गए थे. आगरा में ताजमहल आगरा किला और यमुना किनारे खासी गहमागहमी रही. जबलपुर के भेडाघाट में दिन भर भीड़ उमड़ी रही. संगमरमरी चट्टानों पर बैठे टहलते लोग खासतौर से युवा सुबह तक कुदरती नजारों को एन्जोय करते रहे.

और गोवा वहां के नए साल के जश्न और माहौल का तो कहना ही क्या. न केवल देश बल्कि दुनिया भर के लोग खासतौर से साल का पहला दिन गोवा में गुजारने जाते हैं जहां की रंगीनियां जोश म्यूजिक खाना पीना सब कुछ लाजवाब होता है. बागा, कैलंगुट अश्वेम, पालोलेम और मोबोर बीच पर हजारों लोग इकट्ठा हो कर नाच गा रहे थे. होटल और क्लब्स में पैर रखने की भी जगह नहीं थी. कई लोगों ने सड़कों पर घूमते और झूमते ही नए साल का स्वागत किया.

पूरे देश और दुनिया में अपनेअपने ढंग से लोगों ने न्यू ईयर का जश्न मनाया लेकिन कहीं से भी यह खबर सुनने में नहीं आई कि एक धर्म विशेष के लोगों ने दूसरे धर्म विशेष के लोगों से कुछ कहा सुना या ताने मारे, गाली गलोच की या फिर यह कि किसी धर्म स्थल पर पथराव किया हो. कहीं कोई हिंसक झड़प नहीं हुई. कोई अप्रिय समाचार कहीं से सुनने में नहीं आया वो सिर्फ इसलिए कि नया साल किसी धर्म, जाति, रंग, नस्ल या संप्रदाय का त्यौहार नहीं है बल्कि यह सभी का त्यौहार है वजह यह धर्म निरपेक्ष है लोकतांत्रिक है और पाखंडों से मुक्त है.

धार्मिक त्योहारों से अलग

आखिर क्यों दुनिया भर के लोग इस त्यौहार को उत्साह और ख़ुशी से मनाते हैं. इस सवाल का जवाब भी हर कोई जानता है कि नया साल किसी धर्म विशेष का त्यौहार नहीं है जिस में दिमाग पर रीतिरिवाजों और पूजापाठ वगैरह के दबाव रहते हैं. हर काम धर्म और उस के ठेकेदारों के इशारे पर करने की बाध्यता रहती है. जिस की जड़ में उकसा कर और डरा कर दान दक्षिणा वसूली होती है. खानेपीने से ले कर पहनने ओढ़ने तक पर नियमों का पालन करना पड़ता है. इस पर भी डर यह कि कहीं कुछ गलत या उल्टा सुलटा न हो जाए नहीं तो पाप लगेगा और ऊपर वाला नाराज हो जाएगा.

नए साल में लोग वर्जना मुक्त रहते हैं. उन्हें न स्वर्ग का लालच होता और न ही नर्क का डर रहता. यह त्यौहार किसी देवीदेवता, पैगम्बर या अवतार का न हो कर उन का अपना होता है. यह लोगों के बीच किसी तरह का बंटवारा नहीं करता धर्म जाति नस्ल भाषा और देश आदमी इन बंधनों और जकड़नों से आजाद रहता है. धार्मिक त्यौहार अब अवसाद देने लगे हैं लेकिन नया साल एक अजीब सी ख़ुशी और उत्साह ले कर आता है. यह कर्मकांडों से परे है इसलिए वैश्विक लोकतांत्रिक और मानवीय भी है.

दरअसल में साल का पहला दिन ख़ुशी और संकल्प ले कर आता है और धार्मिक त्योहारों की तरह अतीत की नहीं बल्कि भविष्य की बात करता है जिस में किसी मध्यस्थ यानी दलाल का कोई रोल नहीं रहता.

धार्मिक त्यौहार यानी हिंसा

पूरी दुनिया इन दिनों दक्षिणपंथी कट्टरवादी ताकतों से दहशत में है. जिन देशों में दक्षिणपंथी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति हैं वहां अमन सुख शांति और चैन नहीं है. अमेरिका के बाद भारत एक ऐसा ही देश है जहां कट्टरवादियों के उपद्रवों और गुंडागर्दी ने आम लोगों का जीना हराम कर रखा है. देश में हिंदुत्व के नाम पर जम कर अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित किया जा रहा है मानो वे नाजायज हों. जिन तौर तरीकों से अल्पसंख्यकों को तंग किया जा रहा है उन में से एक है उन्हें  अपने तीज त्यौहार शांति से न मनाने देना और उन में खलल डालना.

25 दिसम्बर को ईसाईयों का प्रमुख त्यौहार क्रिसमस था. इस दिन देश के कई हिस्सों में हिंदूवादी संगठनों ने खुलेआम हिंसा की, चर्चों में तोड़फोड़ की, ईसाईयों की धुनाई की और कानून को अपने हाथ में लेते एलान कर दिया कि संविधान और लोकतंत्र कहने भर की बातें हैं नहीं तो इस देश में अगर रहना होगा तो वन्दे मातरम कहना होगा. आइए कुछ प्रमुख हिंसक घटनाओं पर नजर डालें –

– केरल के पलक्कड़ जिले में कैरोल गायन समूह पर हुदंगियों ने हमला किया और उन के वाद्ययंत्रों को तोड़ दिया तो राजस्थान के नागौर में बजरंगियों ने एक प्राइवेट स्कूल में जा कर धमकी दी कि अगर क्रिसमस मनाया तो तुम्हारी खैर नहीं. उत्तर प्रदेश के बरेली में बजरंग दल वालों ने अलफोंस कैथेड्रल चर्च के बाहर विरोध प्रदर्शन किया और चर्च के बाहर बैठ कर हनुमान चालीसा का पाठ किया. मध्य प्रदेश के जबलपुर में तो 20 दिसंबर से ही हिंदूवादियों ने हिंसा का तांडव शुरू कर दिया था. एक भाजपा नेत्री अंजू भार्गव ने नेत्रहीन विद्यालय के बच्चों के साथ बदसलूकी की और उन्हें अपशब्द भी कहे. अंजू की गुंडागर्दी का आलम तो यह था कि उस ने चर्च जा रही एक महिला की पिटाई भी कर डाली.

आदिवासी बाहुल्य राज्य छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में 24 दिसंबर को हिंदूवादी संगठनों ने धर्मान्तरण के विरोध में बंद का एलान किया था. इस दिन उपद्रवी जय श्रीराम के नारे लगाते दहशत फैलाते रहे. भीड़ ने मैग्नेटो मौल में घुस कर तबियत से तोड़फोड़ की और मौल के मुलाजिमों को जी भर कर कूटा भी. इन उपद्रवियों ने अपने चेहरे ढके हुए थे उन के हाथों में हौकी और लाठियां थीं. कर्मचारियों के पहचान पत्र देख कर हिंदुओं को बख्श दिया गया और ईसाईयों की पूजा की गई. यह आइडिया 22 अप्रैल के पहलगाम हमले से प्रेरित था जिस में आतंकियों ने धर्म पूछ कर हिन्दुओं की हत्या की थी.

यह साजिश राष्ट्रीय स्तर कितनी प्री प्लान्ड थी इस का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि हिंदूवादी संगठनों को अपने आकाओं की शह और इजाजत मिली हुई थी. असम के पानिगांव स्थित सेंट मेरी स्कूल में भी 24 दिसम्बर को बजरंगियों और विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने तोड़फोड़ कर दहशत फैलाई और जय श्रीराम के नारे लगाते रहे. नलवाडी में हिंदूवादियों ने छोटे दुकानदारों पर हिंदुत्व की गाज गिराई. डेकोरेशन के आइटम बेच रहे रेहड़ी वालों के  सामान को तोड़ाफोड़ा गया और वक्त कम पड़ने लगा तो सामान इकट्ठा कर उस की होली जलाई. इस दौरान जय बजरंग बली और जय श्रीराम के नारे उत्पाती लगाते रहे.

पलक्कड़ में नन्हे बच्चों के साथ बदसलूकी की गई थी लेकिन इंदौर में तो उन्मादियों ने हदें पार करते एक ईसाई महिला को ही धुन दिया. यहां भी भीड़ जय श्रीराम के नारे लगा रही थी. महिलाओं को देवी का दर्जा देने बाले हिंदू या सनातन धर्म की हकीकत इंदौर में उजागर हुई. जब क्रिसमस के एक आयोजन में हिंदूवादियों ने सजावट मिटटी में मिला दी और एक महिला के गिड़गिड़ा और यह तक कहने कि मैं भी जय श्रीराम बोल दूंगी. लेकिन आप तोड़फोड़ मत कीजिए का कोई असर नहीं हुआ उलटे वे बेशर्मी से राक्षसों की स्टाइल में हंसते रहे.

इसलिए हैप्पी न्यू ईयर है बेहतर

यह लिस्ट बहुत लम्बी है जो जता गई कि देश को असल खतरा किस से है. धर्म को अफीम का नशा बेवजह नहीं कहा जाता जो इन दिनों सर चढ़ कर बोल रहा है. हिंदूवादी संगठन बेलगाम हो कर गुंडागर्दी पर उतारू हैं और इस के जिम्मेदार लोग मुंह में दही जमाए बैठे तमाशा देख रहे हैं और खुद चर्चों में जा कर फादरों और पादरियों के साथ क्रिसमस मनाने का ढोंग कर रहे हैं.

साल भर मुसलमानों और इसलाम के खिलाफ जहर उगलते रहने वाले सनातनियों ने साल के आखिर में ईसाईयों और चर्चों को निशाने पर इसलिए लिया था क्योंकि बांग्लादेश में हिंदुओं की हत्याएं हो रही थीं जिस से वे न केवल बौखलाए हुए थे बल्कि डरे हुए भी थे. अपनी खीझ कुंठा और बेबसी बच्चों और औरतों तक पर उन्होंने उतारी. यह वही भगवा बिग्रेड है जो वेलेंटाइन डे पर नर्म पड़ने लगी है. क्योंकि इस में शिकार हो रहे अधिकतर कपल्स हिंदू ही होते हैं इस से उन का हर स्तर पर नुकसान हो रहा था.

ऐसे माहौल जिस में हिंसा, आगजनी, तोड़फोड़, गालीगलोच, लूटपाट और धार्मिक नारे हों में भला कोन अमनपसंद आदमी नहीं घबराएगा. लेकिन घबराहट इस रोग का इलाज नहीं है इलाज है मोहब्बत और भाईचारा जो नए साल के पहले दिन दिखा. इस से क्रिसमस के दिनों का कसैलापन एक हद तक दूर हुआ. लोगों का डर भी कम हुआ लेकिन यह अस्थाई है क्योंकि धार्मिक त्यौहार और उन का जूनून साल भर छाया रहता है.

यह स्थाई रूप से दूर हो सकता है बशर्ते हम और आप धर्म निरपेक्ष त्योहारों को मनाएं. अपना जन्मदिन व मैरिज एनिवार्सरी समारोह पूर्वक मनाएं. ये भी कम पढ़ें तो नएनए मौके और बहाने ढूंढे कर नए धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक त्यौहार गढ़ लें ताकि कट्टरवाद और कट्टरवादियों के हौसले पस्त हों. नहीं तो याद रखें इन के मुंह में खून लग चुका है और जिस दिन कोई और नहीं मिला तो ये हमें आप को ही शिकार बनाने से चूकेंगे नहीं.

फिर कोई राम कृष्ण शंकर या हनुमान जान बचाने नहीं आने वाला क्योंकि ये सब भी ईसा मसीह और मोहम्मद सरीखी कल्पनाएं ही हैं और न होतीं तो ईसा मसीह 25 दिसम्बर को कोई चमत्कार दिखा कर अपनी संतानों को बचा लेता और पैगम्बर मुसलमानों की इतनी दुर्गति न होने देता. Happy New Year 2026 :

Happy New Year 2026 : सीमाओं को तोड़ हर खुशी में हो शामिल

Happy New Year 2026 : फेस्टिवल को मिलजुल कर मनाने में ही सब की भलाई होती है. इन को समय, देश और समाज की सीमाओं में बांध कर नहीं देखना चाहिए. नए साल का पूरी दुनिया में महत्व है. इस महत्व को कमतर करना उचित नहीं है.

21 सितंबर, 2025 को इंदौर में गरबा शुरू होने के पहले ही बवाल शुरू हो गया. नवरात्रि महोत्सव में पंडालों में गरबा का आयोजन होता है. भाजपा पार्षद मनीष मामा ने कहा कि यह देवी की आराधना का पर्व है. हमारे कार्यक्रमों अलीम, कलीम पर प्रतिबंध है. यदि वह अपने परिवार और अम्मी, अब्बा के साथ आते हैं तो स्वागत है. इसलाम में मूर्ति पूजा बैन है तो मुसलिम लड़के गरबे में क्या करने आते हैं? यदि वह यहां पर बहनों को परेशान करने के लिए आएंगे तो उन्हें शरीयत की सजा मिलेगी. मुसलिम महिला पार्षद रूबीना खान ने एक वीडियो जारी कर कहा ‘मुसलिम समाज के लड़कों को गरबा देखने के लिए नहीं जाना चाहिए. कोई भी संगठन यदि मुसलिम समाज के बालकों के साथ में मारपीट करेगा तो यह न तो उन के मातापिता को अच्छा लगेगा न ही उन के समाज के लोगों को. इसलिए वे उस जगह नहीं जाएं जहां पर उन्हें नहीं जाना चाहिए.

28 सितंबर, 2025 को उत्तर प्रदेश के बरेली शहर स्थित रंजना कैफे में कुछ युवा पार्टी का आयोजन कर रहे थे. इस बीच बजरंग दल कार्यकर्ताओं ने ‘लव जिहाद’ का आरोप लगा कर जम कर युवाओं के साथ मारपीट और तोड़फोड़ करने लगे.

25 दिसंबर 2025 को हरियाणा के हिसार में बजरंग दल ने क्रिसमस के दिन चर्च के सामने हनुमान चालीसा का पाठ शुरू किया. बजरंग दल का तर्क था कि चर्च के बाहर हनुमान चालीसा का पाठ करने की अनुमति है. यह केवल एक जगह की घटना नहीं है. लखनऊ में चर्च के सामने मेफेयर सिनेमा के तिराहे पर हनुमान चालीसा का पाठ हुआ. क्रिसमस के रंग में भंग डालने का काम किया गया.

खुशियों को किसी एक देश की सीमा में नहीं बांधा जा सकता है. बजरंग दल के लोगों ने अपनी कट्टरता से त्यौहारों में कसैलापन भर दिया है. क्रिसमस के मौके पर चर्च के सामने हनुमान चालीसा का पाठ करने, दीवाली पर मुसलिम इलाकों में पटाखे फोड़ने, होली पर मसजिद चर्च पर रंग फेंकने, क्रिसमस पर सांटा की टोपी पहनने पर विवाद खड़े करना शुरू कर दिया है. गरबा और गणेश पूजा के पंडालों में गैर हिंदुओं को घुसने से मना करने का काम होने लगा है.

ऐेसे में जिस तरह से भारत में मुसलिमों के साथ हो रहा उस की प्रतिक्रिया में दूसरे देशों में हिंदुओं के साथ व्यवहार हो रहा है. बंगलादेश की सरकार में गृह मामलों के सलाहकार और रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद जहांगीर आलम चौधरी ने ऐलान किया है कि अब से बंगलादेश में अजान के समय हिंदू पूजापाठ करना और लाउडस्पीकर पर भजन सुनने पर पाबंदी रहेगी. जो इस कानून को तोड़ेगा उस को सजा मिलेगी.

धार्मिक रीति रिवाज वाले त्योहार धर्म और जाति के बीच तनाव फैलाने का काम करते हैं. ऐसे में पूरी दुनिया को वह त्योहार मनाने चाहिए जहां लोग एक दूसरे की खुशियां में बिना किसी आडंबर के शामिल हो सके.

नए साल की खुशियों का फैलता दायरा

नए साल की उमंग ऐसी है कि बिना किसी धार्मिक कट्टरता के इस को मनाया जाता है. जनवरी में लगने वाला साल अंग्रेजों का है. नया साल पूरी दुनिया में मनाया जाता है. इस नए साल को मनाने की शुरूआत सीधे तौर पर ग्रेगोरियन कैलेंडर से जुड़ी हुई है. इस को आज दुनिया के लगभग सभी देश अपनाते हैं. इस की शुरुआत रोमन सभ्यता से मानी जाती है. प्राचीन रोम में पहले नया साल मार्च महीने से शुरू होता था लेकिन समय के साथ इस में बदलाव तब से यह जनवरी में मनाया जाता है.

रोमन सम्राट जूलियस सीजर ने कैलेंडर में सुधार करते हुए जनवरी महीने को साल का पहला महीना घोषित किया था. इस के बाद में 1582 में आठवें पोप ग्रेगरी ने इस में और सुधार कर ग्रेगोरियन कैलेंडर लागू किया. जिसे आज का आधुनिक कैलेंडर माना जाता है. तभी से 1 जनवरी को विश्वभर में नव वर्ष के रूप में मनाया जाता है. एक दौर था जब पूरी दुनिया में अंग्रेजों का राज था. उन का सरकारी काम इसी कैलेंडर से चलता है तो यह नया साल सब मनाते हैं.

बात केवल नए साल की ही नहीं है आर्थिक साल यानि फाइनेंशियल ईयर भी पूरी दुनिया एक सा ही मनाती है. भारत में आर्थिक साल फाइनेंशियल ईयर यानि वित्तीय वर्ष 1 अप्रैल से शुरू होता है और अगले साल 31 मार्च को खत्म होता है. इस की शुरूआत ब्रिटिश शासनकाल से चली आ रही है. इस का संबंध मुख्य रूप से खेती और उस से मिलने वाली लगान से जुड़ी है. भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि का प्रमुख योगदान है. फसल चक्र कटाई के बाद कर वसूली से मेल खाता था.

ब्रिटिश सरकार ने 1867 में इसे अपनाया था. आजादी के बाद भी इसे बदला नहीं गया और यह भारत के प्रशासनिक और कर प्रणाली का हिस्सा बन गया. इस तरह से दो नए साल होते हैं. एक पब्लिक के लिए है जो जनवरी से दिसंबर तक चलता है और दूसरा वित्तीय साल है जो कर प्रणाली से जुड़ा है. इन दोनों का जुड़ाव पूरी दुनिया से होता है तो इस को बदलना सही काम नहीं है. जिस तरह से समय, नवंबर और खुशियों की गणना को अलगअलग खांचे में नहीं रखा जा सकता यह जाति, धर्म और देश की सीमाओं से परे है उसी तरह से कई त्योहार फेस्टिवल ऐसे हैं जो देश की सीमाओं को तोड़ पूरी दुनिया में मनाए जाते हैं.

जाति, धर्म और देश की सीमाओं से बाहर निकले यह त्योहार :

नए साल और आर्थिक साल की तरह से कई ऐसे त्योहार जो पूरी दुनिया को एक सूत्र में बांधने का काम कर रहे हैं. यह सीमाएं तोड़ कर मनाए जा रहे हैं. फरवरी माह में मनाया जाने वाला वैलेंटाइन डे भी बेहद खास है. 14 फरवरी को मनाया जाने वाला वैलेंटाइन डे दुनिया भर में प्यार और रिश्तों का जश्न मनाने का एक तरीका है. यह रिश्ता चाहे वह रोमांटिक हो, दोस्ती का हो या परिवार का हो. प्यार और स्नेह के इस दिन लोग अपने प्रियजनों को कार्ड, फूल और उपहार दे कर अपने प्रेम का इजहार करते हैं.

यह प्रेम, दोस्ती और रिश्ते के उत्सव का प्रतीक बन गया है. इस में पूरे सप्ताह वैलेंटाइन वीक के रूप में 7 से 14 फरवरी के बीच मनाया जाता है. इन को रोज डे, टेडी डे, प्रामिस डे जैसे क्रम में बांटा गया है. लोग एक दूसरे को गुलाब के फूल, चाकलेट, ग्रीटिंग कार्ड और उपहार देते हैं. लोग डिनर, मूवी या कहीं घूमने जाते हैं. यह किसी जाति धर्म और देश की सीमा में नहीं बंधा है.

असल में यह त्योहार मानव जाति से जुड़ गए हैं. ऐसा ही है रंगों का त्योहार होली. वैसे तो यह भारत का प्रमुख त्योहार है. इस के बाद भी पूरी दुनिया में जिन लोगों को रंग अच्छे लगते हैं उन को रंगों का त्योहार होली बहुत पसंद आता है. अब रंगों से जुड़े कई आयोजन पूरी दुनिया में होते हैं. इस का बहुत छोटा सा हिस्सा धर्म के जुड़ा है जिस को कम संख्या में लोग मनाते हैं. ज्यादातर लोग होली को रंगों के त्योहार के लिए मनाते हैं. इस त्योहार में बिना किसी भेदभाव के रंग खेलने की जो आजादी है वह किसी और त्योहार में नहीं है.

मेलजोल को बढ़ावा देते त्योहार :

होली गिलेशिकवे भूल कर आपसी भाईचारा निभाने का त्योहार है. रंग जीवन में खुशी और उल्लास भरने का काम करते हैं. सभी धर्म के लोग इस का मनाते हैं. होली में बधाई संदेश से ले कर मिठाई, नमकीन और गुझिया का खाने में आनंद लिया जाता है. अब भारत से बाहर भी अमेरिका, मौरीशस, फिजी और नेपाल जैसे कई देशों में यह मनाया जाता है. इस में रंगों के साथ गीतसंगीत और खानपान का उल्लास होता है.

आपसी मेलजोल को बढ़ावा देने वाले त्योहारों में होली जैसा ही त्योहार ईद होता है. इस के धार्मिक पक्ष से इतर इस का दूसरा रूप सदभाव को बढ़ाने वाला है. ईद मिलन जैसे कार्यक्रमों का आयोजन होता है. यह आपसी सद्भाव को बढ़ावा देते हैं. यह एकता और और भाईचारे का प्रतीक हैं. लोग किसी भी धर्म के हों, एक साथ आकर खुशियां मनाते हैं. एक दूसरे को मुबारकबाद देते हैं. गुलाब बरसाते हैं सेवई और बिरयानी का आनंद लेते हैं. विदशों से इस को देखने लोग जयपुर, मुंबई और लखनऊ जैसे शहरों में देखने आते हैं.

जिस तरह से होली और ईद है उसी तरह से रोशनी का त्योहार दीवाली भी है. एक तरह से देखें तो यह फेस्टिवल सीजन की शुरूआत जैसी होती है. दिवाली सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के कई देशों में बड़े उत्साह और धूमधाम से मनाई जाती है. जिन जगहों पर भारतीय लोग बड़ी संख्या में रहते हैं जैसे अमेरिका, कनाडा, यूके, सिंगापुर, मलेशिया, मौरीशस, फिजी, नेपाल, श्रीलंका, गुयाना, सूरीनाम और त्रिनिदाद एंड टोबैगो वहां इस का भव्य आयोजन होता है.

लोग अपने घरों को दीपों, मिठाइयों व रंगोली से सजाते हैं. मुसलिम बहुल देश होने के बावजूद इंडोनेशिया में दिवाली को सांस्कृतिक महत्व है. दिवाली दुनिया भर में एकता, प्रकाश और सकारात्मकता का संदेश देने वाला त्योहार बन चुका है. जो विभिन्न संस्कृतियों और समुदायों को जोड़ती है. इस दिन बाजारों में खरीददारी होती है. लोग एक दूसरे को उपहार देते हैं. मिठाई, मेवे और नमकीन की खरीददारी होती है. भारत के कई शहरो में रोशनी देखने लोग दूरदूर से आते हैं.

होली, ईद और दीवाली जैसा ही त्योहार हो गया है क्रिसमस. अब इस को केवल ईसाई धर्म के मानने वाले ही नहीं मनाते पूरी दुनिया में यह उल्लास भरने का काम करता है. क्रिसमस ईसाई धर्म मानने वालों का त्योहार है. अब पूरी दुनिया इस का उल्लास के साथ मनाती है. चर्च के बाहर बाजार सज जाते हैं. बड़ी संख्या में गैर ईसाई यहां आते हैं. 24 दिसंबर की आधी रात से ही यह आयोजन शुरू हो जाते हैं. लोग घरों में क्रिसमस ट्री सजाते हैं. सेंटा वाली टोपी लगा कर बच्चे मजे करते हैं. तरहतरह के केक कटते हैं.

कुछ त्योहार पूरी दुनिया को एकजुट करने और उल्लास मनाने का मौका देते हैं. नए साल का उत्सव भी इसी तरह का है. दुनिया भर के देशों में अलगअलग तरह के नए साल भी मनाए जाते हैं. ग्लोबल रूप से जनवरी में शुरू होने वाले नए साल का उल्लास देते हैं. खुशियां को सब के साथ बांटने का काम करना चाहिए. इन को किसी सीमा में बांधना अच्छा नहीं होता है. त्योहार पूरे साल आपसी एकजुटता का संदेश देते हैं. इन को मिलजुल कर मनाने में देश और समाज का भला होता है. Happy New Year 2026 :

Venezuela Crisis : वेनेजुएला में दखल, अमेरिका अब सब का दुश्मन

Venezuela Crisis :

शांति का दावा, युद्ध की राह – वेनेजुएला में अमेरिकी दखल का सच

अमेरिकी विदेश नीति का इतिहास इस सच्चाई का गवाह रहा है कि जहां भी अपार प्राकृतिक संसाधन हैं, वहां लोकतंत्र, मानवाधिकार और राष्ट्रीय सुरक्षा॔ जैसे शब्दों का जाल बिछा कर वह उन संसाधनों को अपने कब्जे में लेने के लिए सैन्य कार्रवाइयां करता रहा है. वेनेजुएला का मामला इसी परंपरा की अगली कड़ी है.

शांति के पहरेदार का मुखौटा उतर चुका है. नोबेल की हसरत में “युद्ध रोकने” का दम भरने वाले ट्रम्प अब वेनेजुएला के राष्ट्रपति को उन के शयनकक्ष से घसीट कर न्यूयौर्क की जेल तक ले जाने वाली ताक़त का प्रदर्शन कर रहे हैं. यह कहानी लोकतंत्र की आड़ में तेल, ताक़त और तानाशाही मानसिकता के उस गुप्त गठजोड़ की है, जो पूरी वैश्विक व्यवस्था को थानेदार बनाम दुनिया की जंग में बदलने पर आमादा दिखता है.

दो महीने पहले तक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प बारम्बार यह राग अलाप रहे थे कि उन्होंने बहुत सारे देशों के बीच जारी युद्ध रुकवा दिए. भारत पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध को रुकवाने का दावा तो उन्होंने कोई पैंतीस-चालीस बार किया होगा, क्योंकि उन्हें शान्ति का नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने की प्रबल इच्छा थी, जब नोबेल पुरस्कार नहीं मिला तो खुद को शान्ति का अग्रदूत समझने वाले ट्रम्प वेनेजुएला जैसे छोटे से देश पर पिल पड़े, और वहां के राष्ट्रपति को उन के बैडरूम से घसीटते हुए न्यूयौर्क ले गए.

3 जनवरी, 2026 को अमेरिकी सेना ने वेनेजुएला पर सैन्य कार्रवाई की और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उन की पत्नी को गिरफ्तार कर लिया. दोनों पर नशीले पदार्थों से जुड़े आतंकवादी साजिश, यानी नार्को-टेररिज्म में शामिल होने का आरोप लगाया गया और उन्हें न्यूयौर्क की जेल में कैद कर दिया गया.

इस सैन्य कार्रवाई के बाद से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का अहंकार अपनी चरम पर है. बेलगाम ट्रम्प अब अन्य देशों को डराने-धमकाने और भारत पर टैरिफ बढ़ाने की चेतावनी दे रहे हैं. यह हरकत ट्रम्प की तानाशाही मानसिकता को उजागर कर रही है.

डोनाल्ड ट्रम्प का व्यवहार उस थानेदार के जैसा है जो हाथ में रूल ले कर विश्व को अपने हिसाब से चलाने का मंसूबा लेकर निकला हो. ट्रम्प को ऐसा लग रहा है जैसे उन के कृत्यों से अमेरिका का दबदबा और साख बढ़ रही हो, मगर हकीकत यह है कि ट्रम्प दुनियाभर में अमेरिका की फजीहत करा रहे हैं. अमेरिका सिर्फ अपनी साख ही नहीं गंवा रहा है, बल्कि एक ऐसे गैर जिम्मेदार राष्ट्र के रूप में उभर रहा है जो विश्व-व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर दुनिया को अराजकता की ओर धकेल रहा है. खुद अमेरिकी नागरिक ट्रम्प के विरोध में सड़क पर उतर पड़े हैं.

दुनियाभर में जिस तरह का डर और अराजकता डोनाल्ड ट्रम्प फैला रहे हैं, उस के दुष्परिणाम अमेरिका के नागरिकों को भोगने होंगे. विश्व के अधिकांश देश ट्रम्प के व्यवहार के कारण अमेरिका से दूरी बना चुके हैं. यही वजह है कि अब अमेरिका उतना सशक्त नहीं रह गया है, जितना पहले था. ट्रम्प का मनमानापन दुनिया के दूसरे देशों को उनके खिलाफ एकजुट कर रहा है और यह स्थिति अमेरिका के लिए खतरनाक है.

Venezuela Crisis (2)
अमेरिकी सेना ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो व उन की पत्नी सिलिया फ्लोर्स को गिरफ्तार कर लिया. सेना के दम पर दुनिया के थानेदार बन रहे डोनाल्ड ट्रंप असल में अमेरिका को ही कमजोर कर रहे हैं.

ट्रम्प प्रशासन ने वेनेजुएला में लोकतंत्र बहाली को अपनी सैन्य कार्रवाई का औचित्य बताया है, लेकिन ट्रम्प की आक्रामक नीति, चाहे वह सैन्य दबाव हो, कड़े आर्थिक प्रतिबंध हों या सत्ता-परिवर्तन की खुली वकालत, अमेरिका के भीतर ही तीखी आलोचना का विषय बनी हुई है.

अमेरिका पर उठते सवाल

यह आलोचना केवल विपक्षी डेमोक्रेटिक खेमे तक सीमित नहीं है; रिपब्लिकन पार्टी के भीतर, नीति-विशेषज्ञों, मानवाधिकार संगठनों और आम नागरिकों के बीच भी इस नीति की नैतिकता, वैधानिकता और व्यावहारिकता पर गंभीर प्रश्न उठे हैं.

अंतरराष्ट्रीय कानून के जानकारों का कहना है कि किसी संप्रभु देश के राष्ट्रपति को बलपूर्वक गिरफ्तार कर तीसरे देश में कैद करना संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय न्याय की बुनियादी अवधारणाओं के खिलाफ है. लोकतंत्र की दुहाई देकर की गई यह कार्रवाई वस्तुतः लोकतांत्रिक मूल्यों को ही कमजोर करती है, क्योंकि लोकतंत्र की रक्षा बमों और धमकियों से नहीं, बल्कि संवाद, संस्थागत सहयोग और अंतरराष्ट्रीय सहमति से होती है.

वेनेजुएला के मामले में भी यही हुआ. वर्षों से आर्थिक प्रतिबंधों और कूटनीतिक दबाव से जूझ रहे इस देश को सैन्य हस्तक्षेप के जरिए “सबक” सिखाने की कोशिश ने लैटिन अमेरिका में अमेरिका-विरोधी भावनाओं को और तेज कर दिया है. जिस क्षेत्र में कभी अमेरिकी प्रभाव निर्णायक माना जाता था, वहां अब अविश्वास और प्रतिरोध का माहौल बन रहा है.

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस तरह की कार्रवाइयां एक खतरनाक मिसाल कायम करती हैं. यदि शक्तिशाली देश अपने हितों के नाम पर किसी भी कमजोर देश की संप्रभुता रौंदने लगें, तो वैश्विक व्यवस्था का आधार ही ढह जाएगा. आज वेनेजुएला है, कल कोई और देश होगा. यह सिलसिला अंततः अंतरराष्ट्रीय अराजकता को जन्म देगा, जिसमें किसी की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं रहेगी, यहां तक कि स्वयं अमेरिका की भी नहीं.

Venezuela Crisis (1)
डोनाल्ड ट्रंप की मनमानी के चलते कई देश उन के खिलाफ हो चुके हैं. निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के बाद वेनेजुएला की जनता ने सड़कों पर उतर कर ट्रंप के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया.

ट्रम्प का यह रवैया भारत जैसे मित्र देशों के साथ संबंधों को भी प्रभावित कर रहा है. टैरिफ की धमकियां, एकतरफा फैसले और सार्वजनिक रूप से दबाव बनाने की राजनीति यह संकेत देती है कि ट्रम्प प्रशासन साझेदारी नहीं, अधीनता चाहता है. यही कारण है कि कई देश अब वैकल्पिक गठबंधनों और नई कूटनीतिक धुरियों की तलाश में जुट गए हैं.

इतिहास गवाह है कि महाशक्तियां केवल सैन्य ताकत या आर्थिक दबाव से नहीं टिकतीं. उन की असली शक्ति उन की नैतिक विश्वसनीयता, भरोसेमंद साझेदारियों और नियम-आधारित व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता से आती है. यदि अमेरिका इस रास्ते से भटक रहा है, तो उस का नुकसान केवल वैश्विक स्तर पर नहीं, बल्कि घरेलू मोर्चे पर भी होगा, जहां सामाजिक विभाजन, असंतोष और विरोध और गहरे होंगे.

अंततः सवाल यह है कि क्या दुनिया को एक ऐसे “थानेदार” की जरूरत है जो रूल ले कर सब को डराता फिरे, या फिर एक ऐसे नेतृत्व की जो संवाद, सहयोग और अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान करे. डोनाल्ड ट्रम्प की वर्तमान नीतियां पहले विकल्प की ओर इशारा करती हैं. यदि समय रहते अमेरिका ने आत्ममंथन नहीं किया, तो यह अहंकार न केवल वेनेजुएला या किसी और देश के लिए, बल्कि स्वयं अमेरिका के भविष्य के लिए भी घातक सिद्ध हो सकता है.

अमेरिकी विदेश नीति का इतिहास इस सच्चाई का गवाह रहा है कि जहां भी अपार प्राकृतिक संसाधन हैं, वहां “लोकतंत्र”, “मानवाधिकार” और “राष्ट्रीय सुरक्षा” जैसे शब्द अक्सर सैन्य या राजनीतिक दखल के औजार बन जाते हैं. वेनेजुएला का मामला इसी परंपरा की अगली कड़ी है. दुनिया के सब से बड़े तेल भंडार वाले देश पर अमेरिकी सैन्य कार्रवाई उसकी नीयत पर शक पुख्ता करती है.

वेनेजुएला के पास दुनिया का सब से बड़ा प्रमाणित तेल भंडार है. मुख्यतः ओरिनोको बेल्ट में स्थित भारी कच्चा तेल. यही संपदा उसे वैश्विक ऊर्जा राजनीति के केंद्र में लाती है. परंतु यही तेल देश की संप्रभुता पर बाहरी ताकतों की निगाह भी टिकाए रखता है. अमेरिका दशकों से वेनेजुएला के तेल का बड़ा उपभोक्ता रहा है और उस की रिफाइनरियां विशेष रूप से वेनेजुएला के भारी तेल के अनुरूप ढली रही हैं.

इस तेल के लालच के चलते ‘लोकतंत्र बहाली’ की आड़ में डोनाल्ड ट्रम्प लगातार वेनेजुएला की आर्थिक घेराबंदी में जुटे हैं. उन्होंने वेनेजुएला पर व्यापक आर्थिक प्रतिबंध लगाए. सरकारी तेल कंपनी को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से काटना, बैंकिंग लेन-देन रोकना और तेल निर्यात पर शिकंजा कसना, ये सारे कदम सीधे तौर पर वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ने वाले थे. ट्रम्प ने दावा किया कि ये प्रतिबंध “लोकतंत्र की बहाली” के लिए हैं, पर व्यवहार में इससे आम नागरिकों की जिंदगी बदतर हुई और सरकार पर तेल बेच कर सांस लेने के रास्ते बंद कर दिए गए.

तेल पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए ट्रम्प ने सत्ता परिवर्तन की राजनीति खेली. ट्रम्प प्रशासन ने वेनेजुएला की वैध सरकार को दरकिनार कर विपक्षी नेतृत्व को मान्यता दी. निकोलस मादुरो की सरकार को “अवैध” ठहराने का नैरेटिव उसी रणनीति का हिस्सा है, जिस के तहत सत्ता परिवर्तन के बाद तेल क्षेत्र में अमेरिकी कंपनियों की वापसी आसान हो सके. पश्चिम एशिया पर निर्भरता कम करने के प्रयासों के बीच लैटिन अमेरिका, विशेषकर वेनेजुएला, एक आकर्षक विकल्प है.

वेनेजुएला पर ट्रम्प काल का दबाव यह संकेत देता है कि तेल आज भी वैश्विक राजनीति का सब से शक्तिशाली प्रेरक तत्व है. लोकतंत्र और मानवाधिकार की भाषा तब खोखली लगती है, जब उस के पीछे संसाधनों की भूख साफ़ झलकती हो. ज़रूरत इस बात की है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय संसाधनों की राजनीति से ऊपर उठ कर संप्रभुता, संवाद और मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता दे – वरना हर तेल-सम्पन्न देश अगला वेनेजुएला बन सकता है.

सब से ज्यादा तेल भंडार वाले देश की दुर्दशा

वेनेजुएला के पास सऊदी अरब से भी ज्यादा तेल है, लेकिन पिछले एक दशक में उस ने अपनी 80% जीडीपी गंवा दी. कभी दुनिया के सब से अमीर देशों में शामिल इस देश ने अपनी दौलत का ऐसा मिसमैनेजमेंट किया कि आज वहां के लोग देश छोड़ रहे हैं.

1950 के दशक में जब आधी दुनिया दूसरे विश्व युद्ध के नुकसान से उबर रही थी, तब वेनेजुएला की किस्मत जमीन के नीचे से निकलने वाले काले सोने यानी तेल ने बदल दी थी. 1952 में वेनेजुएला दुनिया का चौथा सब से अमीर देश था. राजधानी काराकस की सड़कों पर उस समय लग्जरी कारें दौड़ती थीं और पूरे देश में गगनचुंबी इमारतें खड़ी थीं. 1960 के दशक तक वेनेजुएला सिर्फ तेल बेचने वाला देश नहीं रहा बल्कि वेनेजुएला की ही पहल पर सऊदी अरब और ईरान जैसे देशों ने हाथ मिलाया और ‘ओपेक’ की नींव रखी.

उल्लेखनीय है कि ओपेक पेट्रोलियम निर्यातक देशों का एक संगठन है, जिस की स्थापना 1960 में ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला ने की थी, और इस का मुख्यालय वियना, औस्ट्रिया में है, जिस का मुख्य उद्देश्य तेल की कीमतों को स्थिर करना और तेल की कुशल, आर्थिक और नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करना है, जिस से वैश्विक तेल बाजार पर प्रभाव पड़ता है. यह दुनिया के तेल उत्पादन और भंडारण का एक बड़ा हिस्सा नियंत्रित करता है और सदस्य देशों के पेट्रोलियम हितों की रक्षा करता है.

1970 के दशक में जब पूरी दुनिया में तेल संकट आया और कीमतें आसमान छूने लगीं थीं तब वेनेजुएला के घरों में डौलर की बारिश हो रही थी. उस दौर के किस्से आज भी मशहूर हैं. कहते हैं तब लोग वीकेंड पर शौपिंग करने के लिए सीधे मियामी उड़ कर जाते थे. वेनेजुएला दुनिया के सब से महंगे स्कौच व्हिस्की और शैंपेन के सब से बड़े खरीदार में से एक था. जनता को लगने लगा था कि अब मेहनत करने की जरूरत नहीं है क्योंकि उस वक्त वेनेजुएला में प्रति व्यक्ति आय स्पेन, ग्रीस और इजराइल जैसे विकसित देशों से भी कहीं ज्यादा थी.

1976 में सरकार ने तेल इंडस्ट्री का राष्ट्रीयकरण कर दिया और सरकारी कंपनी पेट्रोलियोस डी वेनेजुएला, एस.ए बनाई. यह दुनिया की सब से मुनाफे वाली तेल कंपनियों में से एक थी. वेनेजुएला ने अपनी पूरी ताकत सिर्फ तेल निकालने में लगा दी. उन्होंने खेती, फैक्ट्री और दूसरे बिजनेस पर ध्यान ही नहीं दिया. नतीजा यह हुआ कि सूई से ले कर खाने तक के लिए वे दूसरे देशों पर निर्भर हो गए और तेल के बदले सामान खरीदने लगे.

1999 के बाद सरकार ने देश के भविष्य के लिए निवेश करने के बजाय मुफ्त योजनाओं में पैसा उड़ा दिया. जब तक तेल महंगा था, तब तक सब ठीक रहा, लेकिन जैसे ही तेल की कीमतें गिरीं, सरकार के पास सैलरी देने तक के पैसे नहीं बचे. भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी ब्रेन ड्रेन सरकार ने सरकारी तेल कंपनी में काबिल इंजीनियरों को हटा कर राजनीतिक वफादारों को भर दिया. इस से तेल उत्पादन की तकनीक खराब हो गई और देश के 60 लाख से ज्यादा पढ़ेलिखे लोग (डाक्टर, इंजीनियर) देश छोड़ कर अन्य देशों की ओर पलायन कर गए.

2018 के आतेआते वेनेजुएला में महंगाई की रफ्तार 1,30,000% के पार हो गई. वहां के लोग एक दर्जन अंडे खरीदने के लिए भी नोटों से भरा झोला ले जाने को मजबूर हो गए. 1990 के दशक के आखिर तक जो देश रोजाना 35 लाख बैरल तेल निकालकर दुनिया पर राज करता था, वह आज 2026 की शुरुआत तक बमुश्किल 8 से 11 लाख बैरल पर सिमट गया है. सरकारी तेल कंपनी मेंटेनेंस के अभाव में कबाड़ हो चुकी हैं और गाड़ियां चलाने के लिए पेट्रोल तक विदेशों से मंगाया जा रहा है.

वेनेजुएला अपनी 80% जीडीपी गंवा चुका है. यानी, अगर 2012 में देश की अर्थव्यवस्था 100 रुपए की थी, तो आज वह सिर्फ 20 रुपए की बची है. इस बर्बादी का सब से डरावना चेहरा बन कर उभरी वहां की महंगाई, जिसे अर्थशास्त्र की भाषा में ‘हाइपरइन्फ्लेशन’ कहते हैं. यह इतिहास में बिना किसी युद्ध के किसी देश की अर्थव्यवस्था का सब से बड़ा कोलैप्स है. पिछले एक दशक में इस देश ने वह सब खो दिया जो उस ने 70 सालों में कमाया था.

अमेरिका-विरोधी देशों में डर और चिंता

वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के बाद दुनियाभर के अमेरिका-विरोधी देशों में डर और चिंता बढ़ गई है. अमेरिका ने जिस तरह राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उन के बेडरूम में घुस कर गिरफ्तार किया और हथकड़ी डाल कर सीधे न्यूयौर्क ले गए, उस से वैश्विक राजनीति में हलचल तेज हो गई है. कई देशों के सत्ता प्रमुख आशंकित हैं कि कहीं अमेरिका उन के खिलाफ भी इसी तरह की कार्रवाई न करे. अमेरिका-विरोधी रुख रखने वाले कई देश अब सतर्क हो गए हैं. इन में से कुछ देशों के नेता अपनी सुरक्षा को ले कर रूस और चीन जैसे शक्तिशाली देशों से संपर्क बढ़ा रहे हैं, ताकि किसी संभावित अमेरिकी कार्रवाई से बचा जा सके.

खामेनेई पर दबाव

ईरान लंबे समय से अमेरिका का खुला विरोध कर रहा है. 1979 की इसलामिक क्रांति के बाद से ही वहां ‘डेथ टू अमेरिका’ जैसे नारे लग रहे हैं. हाल के दिनों में ईरान गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है, जिस से देशभर में बड़े प्रदर्शन हो रहे हैं. इन प्रदर्शनों में अब ‘डेथ टू डिक्टेटर’ के नारे भी सुनाई दे रहे हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इन प्रदर्शनों का समर्थन किया है, जिसे ईरान ने बाहरी साजिश करार दिया है. सर्वोच्च नेता अली खामेनेई ने सख्ती दिखाते हुए आंदोलन को दबाने के आदेश तो दिए हैं, लेकिन उन का दिल इस आशंका से कांप रहा है कि कहीं उन का हाल भी मादुरो जैसा न हो. ख़ामेनेई के रूस जाने की तैयारी की खबरें भी सुनाई देने लगी हैं.

कोलंबिया भी निशाने पर

कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो, जो 2022 में सत्ता में आए और देश के पहले वामपंथी राष्ट्रपति हैं, वो भी अमेरिका के निशाने पर बताए जा रहे हैं. पेट्रो ने डोनाल्ड ट्रंप को युद्ध अपराधी कहा था और अमेरिकी सैनिकों से ट्रंप के आदेश न मानने की अपील की थी. माना जा रहा है कि अमेरिका फिलहाल कोलंबिया में कोई बड़ा कदम उठाने से पहले 2026 के अमेरिकी चुनावों का इंतजार करेगा.

किम जोंग उन की चेतावनी

वेनेजुएला पर अमेरिकी कार्रवाई को ले कर सब से तीखी प्रतिक्रिया उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन की ओर से आई है. हालांकि उत्तर कोरिया तक सीधे पहुंचना अमेरिका के लिए आसान नहीं है, क्योंकि रास्ते में रूस और चीन की सीमाएं आती हैं. इस के अलावा किम के पास परमाणु हथियार होने की वजह से किसी भी अमेरिकी कदम का जवाब बेहद खतरनाक हो सकता है.

क्यूबा का अमेरिका के खिलाफ पुराना मोर्चा

क्यूबा अमेरिका-विरोधी देशों में सब से पुराना नाम है. राष्ट्रपति मिगुएल डियाज कैनल ने वेनेजुएला में अमेरिकी कार्रवाई को राज्य प्रायोजित आतंकवाद कहा. क्यूबा की सड़कों पर बड़े प्रदर्शन हुए और अमेरिकी दूतावास के सामने हजारों लोग जुटे. क्यूबा अब रूस, चीन और ईरान के साथ अपने रिश्ते और मजबूत कर रहा है.

बेलारूस को रूस का आसरा

बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लुकाशेंको 1994 से सत्ता में हैं और यूरोप के सब से लंबे समय तक शासन करने वाले नेता हैं. 2025 के चुनाव में उनकी जीत पर भी धांधली के आरोप लगे थे, ठीक वैसे ही जैसे मादुरो पर लगे हैं. लेकिन बेलारूस पर किसी भी हमले को रूस पर हमला माना जाएगा. इसी वजह से अमेरिका के सीधे कदम उठाने की संभावना यहां कम मानी जा रही है.

Venezuela Crisis

Hindi Family Story : बचपना – उसे पसंद थी बैंगन की सब्‍जी

Hindi Family Story : अब इस की हत्या के अलावा और कोई विकल्प ही नहीं बचा मेरे पास. मैं क्या करूं, कुछ समझ नहीं पा रही हूं. इस मामले से छुटकारा पाने का बस एक ही तरीका दिख रहा है कि इस लड़की की हत्या कर दी जाए. मैं इस लड़की को अच्छी तरह से जान गई हूं. हल्ला मचा रखा है इस ने बैगन की सब्जी खाने के लिए. उस दिन मेरे औफिस में मेरी सहेली ने मुझे बैगन की सब्जी ला कर दी. बैगन मुझे बिलकुल पसंद नहीं हैं… बैगन यानी बेगुण. बचपन मेें हम अपनी कक्षा की एक सांवली लड़की रामकली को ऐसे ही चिढ़ाया करते थे- कालीकलूटी, बैगन लूटी.

मैं ने बहुत झिझकते हुए बैगन लिए थे, जबकि बैगन की सब्जी वास्तव में देखने में बहुत अच्छी दिख रही थी. बिलकुल ताजगी से भरी, जबकि जब भी मैं बैगन बनाती हूं तो वे बनने के बाद बिलकुल सिकुड़ जाते हैं. ठीक है, बैगन बहुत खूबसूरत दिख रहे थे पर खाने में तो बेस्वाद और कसैले ही होंगे न.

वैसे आप को बताऊं यदि मेरा बस चले तो मैं यह सब्जी कभी बनाऊं ही नहीं पर क्या करूं. घर में बाकी सब इसे बड़े शौक से खाते हैं और मैं भी मन मार के खा ही लेती हूं. अब कौन अपने लिए अलग से कुछ बनाए.

अरे मैं भी कहां की कहां पहुंच गई. हां तो जब मैं ने अपनी सहेली के बनाए बैगन झिझकते हुए खाए तो इतने स्वादिष्ठ लगे कि मैं पूरा डब्बा ही चट कर गई. बस मुझ से गलती यह हुई कि मैं ने इस लड़की को भी वह सब्जी खिला दी. कमबख्त बिना मुझे बताए मेरी सहेली से बैगन बनाने की पूरी विधि सीख आई.

तब से यह लड़की रोज मेरे पीछे पड़ी है. कहती है दीदी बैगन तो फ्रिज में रखे ही हैं. चलो बनाते हैं और तो और मेरी बचत के पैसों से गोडा मसाला भी खरीद लाई. पइस महंगाई के जमाने में जब अपने बच्चों की जरूरतें भी पूरी नहीं होतीं तो ऐसे में इस कमबख्त की जुर्रत तो देखिए.

मैं रोज इसे बहला रही हूं कि चल आज बच्चों की पसंद के भरवां बैगन बना लेते हैं या पति की पंसद के इमली दाल वाले बैगन बना लेते हैं पर यह कपटी लड़की मुझ से मनुहार करती है कि नहीं दीदी वैसे वाले बैगन बनाओ न जैसे आशा ने बनाए थे. अब बताइए सब की फरमाइशें पूरी करने के लिए मैं समय कहां से लाऊं.

मैं ने आप से बताया नहीं इस के बारे में अभी तक. मुझ से भूल हुई कि शादी के बाद मैं इसे भी अपने साथ ले आई ससुराल में. तूफान मचा रखा है इस ने मेरी जिंदगी में. जरा भी कहना नहीं मानती मेरा. क्याक्या बताऊं आप को इस के बारे में. मेरी तो जगहंसाई कराती है. कभी सड़क पर यह ऊंट सी लड़की गुनगुनाने लगती है तो कभी बच्चों की तरह किसी को भी देख कर बिना वजह मुसकराने लगती है.

तंग आ गई हूं इस से. मरी के अंदर कोलंबस कौंप्लैक्स भरा पड़ा है. नएनए रास्तों पर मुझे भी घुमा लाती है. बीच सड़क पर किसी से भी बतियाने लगती है. मुझ सदगृहस्थन की इतनी बदनामी कराती है. बहुत समझाया कि अच्छी लड़कियों की तरह सलीके से रह पर यह सुनती ही नहीं.

अब मैं इस की हत्या की योजना बना रही हूं. मरना ही होगा इसे. एक म्यान में एक ही तलवार रह सकती है. इस घर में या तो यह रहेगी या मैं. यह सोचते ही मेरे मन में ठंडक सी पड़ जाती है. यह जीएगी तो मैं रोज मरती रहूंगी और यह जब मर जाएगी तो मैं चैन की जिंदगी जी सकूंगी. आज बस इस की जिंदगी का आखिरी दिन होगा. कल से इस की आवाज भी नहीं सुननी पड़ेगी मुझे और इस की हत्या ऐसे करूंगी कि किसी को कानोंकान खबर भी नहीं पड़ेगी.

चलो इस के पहले मैं उस जी के जंजाल बैगन को बच्चों के पसंदीदा ढंग से बना कर चलता करूं. पड़ेपड़े मुरझा रहे हैं. कहीं इस नासपीटी ने मुझे देख लिया तो कहर ढाएगी कि वैसे वाले बैगन बनाओ. वैसे वाले…

मैं रसोई में पहुंची ही थी कि यह नासपीटी खिलखिलाती हुई मेरे पीछेपीछे आ पहुंची. बोली कि दीदी आज तो इतवार है. अब तो बनाओ न वैसे वाले बैगन. कैसे समझाऊं इस नासपीटी को कि हम कामकाजी औरतों का कौन सा इतवार होता है.

छुट्टी के दिन तो दोगुना काम होता है हमें. बच्चों की पसंद का, पति की पसंद का नाश्ता, खाना बनाओ, हफ्तेभर के पैंडिंग काम करो. सांस लेने की भी फुरसत नहीं मिलती. मैं झुंझला उठी. मेरा गुस्सा चरम सीमा पर पहुंच गया. पगली ने अपनी मौत को खुद न्योता दिया है.

मैं सिलबट्टे से इस का सिर फोड़ने जा ही रही थी कि इस ने पीछे से आ कर मेरे मुंह में कपड़ा ठूंस दिया. जकड़ दिया मेरे हाथपैरों को रस्सी से. मैं फटी आंखों से देखती रही… अपने मन की कर ही ली इस ने. बना ही लिए इस ने वैसे वाले बैगन जिस के लिए हफ्ते भर से किचकिच कर रही थी.

बैगन बना कर न केवल तसल्ली से उंगलियां चाटचाट कर खाए इस ने बल्कि मुझे भी जबरदस्ती खिला दिए. इस को खिलखिलाते देख कर में चौंक गई. आज तो मुझे इसे मार डालना था पर यहां तो सब उलटा पड़ गया. इस ने बड़ी चतुराई से खुद को भी बचा लिया और मुझे भी जिंदा छोड़ दिया.

यह लड़की मुझ से जीत गई. मेरी आंखें भर आईं… मैं कहां मारना चाहती हूं इसे. कितना प्यार करती हूं इस बच्ची से मैं… कितना छिपछिप कर दुलारती भी तो हूं इसे. कभी बाजार घुमा लाती हूं इसे तो कभी इस का जन्मदिन चुपचाप इस के साथ मनाती हूं. इसे इस की पसंद का उपहार भी देती हूं.

आप हैरान हो रहे होंगे न कि क्या लगती है यह लड़की मेरी जो पिछले 20 सालों से जोंक की तरह मेरे साथ चिपकी हुई है जो न खुद मरती है और न मुझे मरने देती है. जिस से मैं नफरत भी करती हूं और बेतहाशा प्यार भी. आखिर क्या रिश्ता है इस का और मेरा?

अरे, आप ने पहचाना नहीं इसे? यह लड़की मेरे भीतर की सदगृहस्थन के अंदर बैठी है… मेरी बालसुलभ अस्मिता जो अपने लिए भी जीना चाहती है और मुट्ठी भर खुशी भी ढूंढ़ती है अपने लिए. आम औरतों की तरह मैं ने भी इस लड़की को मारने की कोशिश तो की पर मार न सकी.

आज आम औरतें गहने बनवातीं और गहने तुड़वातीं, साडि़यां की सेल में घूमतीं, किट्टी पार्टियों में जातीं, पति और बच्चों की पसंद के नशे में अपने वजूद को मार डालती हैं. किताबों, पत्रपत्रिकाओं से रिश्ता ही तोड़ लेती है… अपनी पसंद को भूल जाती हैं.

शुक्र है कि वो लड़की मेरे भीतर अभी भी जिंदा है जो शादी के इतने सालों बाद भी खुल कर सांस लेने की कोशिश करती है और कभीकभी अपने लिए भी सोचती है. चाहे पल भर के लिए ही सही, खिलखिला कर हंसती है और जी हां, जिस ने मेरी पसंद के बैगन भी मुझे बना कर खिला दिए.

काश, हर औरत अपने भीतर की उस लड़की की हत्या न करे और हंसती रहे वो लड़की. Hindi Family Story :

Hindi Satire Story : सपेरे की शादी

Hindi Satire Story : पत्रकारिता के पेशे में हर दिन कुछ न कुछ नया देखने को मिलता है. यह एक ऐसा पेशा है, जिसमें आप कभी भी बोर नहीं हो सकते हैं. नये-नये लोगों से मिलना, नयी-नयी कहानियों से दो-चार होना, हर सुबह यह सोच कर घर से निकलना कि देखें आज कौन टकराता है. सरकारी नौकरी या किसी भी अन्य काम में इतना एक्साइटमेंट नहीं हो सकता, जितना पत्रकारिता में है. इसी वजह से मुझे अपना पेशा बहुत पसंद है और इसको छोड़ कर कुछ अन्य काम शुरू करने की बात कभी मेरे जहन में नहीं आयी.

मैंने कई शहरों में काम किया है. गांव, कस्बों, दलित बस्तियों के लोगों से मेरा जुड़ाव शुरू से बना रहा है. दिल्ली आने के बाद भी मैं अक्सर रिपोर्टिंग के दौरान गरीब बस्तियों में जाती थी और वहां की समस्याओं और कहानियों से रूबरू होती रहती थी. एक बार की बात है सपेरा जाति के विषय में मैं एक लेख तैयार कर रही थी. दिल्ली में पहले जंगल काफी थे, मगर अब काफी कम हो गये हैं. जंगल होने की वजह से यहां सपेरा जाति के काफी लोग रहते हैं. हालांकि अब ये लोग दिल्ली की सीमाओं पर छोटे-छोटे समूहों में बस्तियां बना कर रहते हैं. दिल्ली के सीमावर्ती जगहों जैसे रंगपुरी पहाड़ी, मांडी भाटी और शांति कैम्प में तम्बुओं और कच्ची झुग्गियों में गुजारा कर रहे इन लोगों के पास जीविका के साधन नाममात्र के हैं. जबसे देश में सांप पकड़ने, बंदर, भालू वगैरह पकड़ने और नचाने पर प्रतिबंध लगा है, तब से यह लोग भुखमरी का सामना कर रहे हैं. इनकी औरतें वेश्यावृत्ति के पेशे को अपनाने के लिए मजबूर हैं और आदमी मजदूरी वगैरह करके बच्चों का पेट पालते हैं.

सपेरा जाति की औरतों के बीच उठते-बैठते मुझे उनकी कई कहानियां पता चलीं. कुछ महिलाओं से मेरी अच्छी दोस्ती भी हो गयी. उसके बाद मैं अक्सर उनके बीच जाकर उनकी समस्याओं के बारे में पत्रिका में लिखने लगी.

एक दिन मुझे वहां एक परिवार से न्योता मिला. उनके बेटे की शादी दूसरे परिवार की बेटी से तय हुई थी. मुझे भी दावत में बुलाया गया था. दिन की शादी थी. मैं नियत समय पर पहुंच गयी. वहां शादी की रस्में बड़ी रोचक थीं. वहां तमाम औरतें ढोलक पर अपनी भाषा में गा-बजा रही थीं. दो घंटे में पूरी शादी निपट गयी और एक टैंट से दुल्हन विदा होकर अपने दूल्हे के साथ दूसरे टैंट की ओर पैदल ही चलने को हुई. तभी मैंने देखा कि दुल्हन के पिता ने दूल्हे के हाथों में एक बड़ा सा पिटारा लाकर रखा. मैं चौंक पड़ी. मुझे लगा कि शायद इसमें दूल्हे के लिए कपड़े और पैसा वगैरह होगा. पिटारा देखकर वर पक्ष खुशी से चीखने-चिल्लाने लगा. खूब शोर उठने लगा. मैं भी बड़ी उत्साहित हुई और यह देखने के लिए कि ससुर जी ने दामाद को क्या गिफ्ट दिया है, मैं सबसे आगे जाकर खड़ी हो गयी. दूल्हे ने अपने परिजनों के सामने वह पिटारा खोला. अन्दर से फुंफकारते हुए दो काले नाग अपना फन उठा कर खड़े हो गये. मैं बिदक कर दो कदम पीछे हो गयी. इतने खतरनाक और जहरीले नाग! मैंने साथ खड़े आदमी से पूछा, ‘ये सांप कहां से आये? सरकार ने तो सांप पकड़ने पर प्रतिबंध लगा रखा है?’

वह बोला, ‘सरकार सांप पकड़ने और नचाने पर रोक लगा सकती है, हमारे रिवाजों पर तो नहीं लगा सकती. सपेरा जाति में शादी तब तक पूरी नहीं होती, जब तक दुल्हन का पिता दूल्हे को जहरीले सांप की जोड़ी की पिटारी न दे. इन दोनों की शादी भी पिछले पांच साल से अटकी हुई थी कि काले नाग की जोड़ी न मिल रही थी. देखिए कितने सुंदर नाग मिले हैं दूल्हे को.’

दूल्हा खुशी-खुशी पिटारे को सिर पर रख कर आगे चल दिया और उसकी दुल्हन उसके पीछे-पीछे. सब खुश थे. नाग की जोड़ी देखकर वर की तरफ के लोग काफी प्रफुल्लित थे, तो वधु के माता पिता के चेहरे पर भी बेटी को ब्याह कर और दामाद को उसकी सौगात देकर भरपूर खुशी झलक रही थी. मगर मैं इस सोच में डूबी थी कि जब सांप नचाने पर प्रतिबंध है तो फिर नागों की इस जोड़ी का यह दूल्हा करेगा क्या? Hindi Satire Story :

Hindi Romantic Story : प्‍यार के जख्‍म

Hindi Romantic Story : सुनील के निश्छल प्रणय निवेदन को रोजी उर्फ सीमा ने बड़ी बेदर्दी से ठुकरा दिया. बीते वक्त के साथ उस की जिंदगी में आई अनिता. सुनील के टूटे दिल के जख्म फिर हरे होने लगे ही थे कि एक दिन अचानक हुआ सीमा का आगमन, जिस ने उस के दिलोदिमाग को झकझोर कर रख दिया.

सीमा के संदर्भ में मैं ने एक कविता संग्रह ‘आओ, इस जर्जर घड़ी को बदल डालें’ शीर्षक से लिखा था, जिस की याद अब मुझे आ रही है और अनिता अक्षरश: उसे सुनाने लगी. मेरे अपने ही शब्द आज मुझे कितने भोथरे महसूस हो रहे हैं.

‘‘जितनी जल्दी हो सके…आओ इस जर्जर घड़ी को बदल डालें. वरना हरगिज माफ नहीं करेंगी हमें…आने वाली हमारी नस्लें…’’

सीमा, यानी अनिता की पुरानी सहेली, इतनी जल्दी वह घर आ धमकेगी, वह भी मेरी गैरमौजूदगी में, यह तो बिलकुल न सोचा था. कल शाम को बाजार में शौपिंग करते हुए अचानक वह मिल गई तो मैं चौंक उठा, जबकि उस के चेहरे पर ऐसा कोई भाव न उभरा था.

‘‘सुनील, यह सीमा है,’’ अनिता ने परिचय दिया, ‘‘मेरी प्रिय सखी.’’

‘‘बड़ी खुशी हुई आप से मिल कर,’’ औपचारिकता के नाते कहना पड़ा. कड़वा सच एकदम से उगला भी तो नहीं जाता.

‘‘किसी हसीन लड़की से साली का रिश्ता जुड़ जाने पर भला कौन खुश नहीं होगा,’’ निसंकोच सीमा ने कहा और हंस पड़ी. वही 3 साल पुराना चेहरा, वही रूपरंग, कातिल अदा, मोतियों से चमकते दांत, कुदरती गुलाबी होंठ और उसी तरह गालों को चूमती 2 आवारा लटें, कुछ भी तो न बदली थी वह. हां, उस का यह नाम जरूर पहली बार सुना और अपनी बात पर स्वयं ही खिलखिला उठना कतई न सुहाया. मन में दबी नफरत की चिंगारी भड़क उठी और ‘साली का संबोधन’ अंगारे की तरह अंदर जलाता चला गया.

‘‘अच्छा, मैं चलूं, अनिता,’’ सहसा वह बोली.

मैं उस से पूछना चाहता था कि इतना कह देने भर से ही क्या तुम छूट जाओगी और मेरी यादों के कैनवास पर से तुम्हारे चरित्र के दाग मिट जाएंगे?

‘‘ऐसी भी क्या जल्दी है,’’ अनिता ने कहा, ‘‘इतने बरसों बाद तो मिली हो, घर चलो, आराम से बैठ कर बातें करेंगे.’’

‘‘फिर कभी आऊंगी, अभी जल्दी में हूं, अपना पता दे दो.’’

अनिता ने उसे अपना विजिटिंग कार्ड थमा दिया था.

रात भर मैं यही सोचता रहा कि उस ने अनिता के सामने ऐसा क्यों जताया कि हम पहली बार मिले हैं. क्या वह मुझे उस पत्र से ब्लैकमेल करना चाहती है, जिस में प्रेम के साथसाथ मैं ने उस से विवाह करने की इच्छा भी जाहिर की थी? ऐसी लड़कियों का भरोसा ही क्या? आज सारा दिन आफिस में भी दिमाग अशांत रहा. शाम को थकाहारा घर लौटा तो अनिता ने ठंडे पानी के साथ गरमागरम खबर दी, ‘‘दोपहर में सीमा आई थी.’’सुनते ही मैं सोफे पर से उछल पड़ा, कई सवाल दिमाग में कौंधे…क्यों वह मेरे शांत व सुखी घरेलू जीवन में तूफान लाने पर तुली है अनिता, अब तक मां नहीं बन सकी तो क्या हुआ, दोनों में अच्छा तालमेल तो है.

‘‘रहने की तलाश में है बेचारी,’’ अनिता ने बताया, ‘‘अपने पड़ोस में खाली पड़ा मकान तय करवा दिया है और कह रही थी, प्लीज जीजाजी से सिफारिश कर के कहीं काम पर रखवा देना.’’

मैं बोला, ‘‘देखूंगा.’’

‘‘देखूंगा नहीं,’’ अनिता ने जोर दिया, ‘‘उसे सर्विस दिलानी है, वह आप की बहुत प्रशंसा कर रही थी.’’

‘‘क्या कह रही थी?’’

‘‘ऐसा नेक पति भाग्य से मिलता है,’’ पत्नी के होंठों पर मंदमंद मुसकान देख…मेरा चोर मन बोला कि निश्चय ही यह सबकुछ जान कर…अब मजा ले रही है.

‘‘शोख और चंचल है ना, इसलिए मजाक भी कर रही थी.’’

‘‘क्या?’’

‘‘जानेमन, शादी से पहले अगर जनाब को देख लेती तो तुम्हारी जगह आज मैं होती,’’ शुक्र है, लेकिन तभी अनिता ने यह कह कर मुझे फिर झटका दिया, ‘‘मैं देख रही हूं…कल शाम से आप कुछ अपसेट हैं?’’

‘‘नहीं, मैं ठीक हूं,’’ स्वयं को संभालते हुए मैं ने कहा, ‘‘एक बात कहूं अनि, मानोगी?’’

‘‘कहो.’’

‘‘सीमा से अब तुम्हारा मेलजोल बढ़ाना ठीक नहीं.’’

‘‘क्यों?’’ वह सकपका गई, ‘‘क्या दोष है उस में?’’

दोष, यह पूछो, क्या दोष नहीं है उस में? पर इतना कह न पाते हुए मैं बोला, ‘‘हमारा स्तर उस से…’’

‘‘यह तो कोई बात न हुई,’’ अनिता ने एकदम से कहा, ‘‘आखिरकार वह मेरी पुरानी दोस्त है.’’

इस विषय को बदलने के लिए मैं कपड़े बदल कर हाथ में रिमोट ले कर टीवी खोलता हूं, पर यह क्या? हर चैनल पर सीमा मौजूद है. झल्ला कर रिमोट, मेज पर रखते हुए अपनी एक पत्रिका उठा लेता हूं, उस के पन्नों पर भी वही चेहरा दिखता है तो हार कर पत्रिका मेज पर पटक देता हूं और अपने दोनों पैर मेज पर फैला कर व सिर सोफे पर टिकाते हुए पलकें मूंद लेता हूं, तो सीमा, नहींनहीं, रोजी का चेहरा सजीव होने लगता है.

मुंबई के ‘प्रिंस’ होटल की रजत जयंती का मौका था. उस रात होटल में नृत्य का एक विशेष कार्यक्रम आयोजित हुआ था. कार्यक्रम शुरू होने में अभी कुछ देर थी. मैं डिनर ले कर अपनी मेज पर अकेला ही काफी पीने लगा. सहसा 2 नारी स्वरों ने चौंका दिया. कनखियों से उधर देखा तो बस, देखता ही रह गया. वहां 2 नव- युवतियां एक मेज पर बैठी नजर आईं, उन में एक सांवली सी गदराए बदन की बिल्लौरी आंखों वाली सामान्य लड़की थी, जिस ने कत्थई रंग की मैक्सी पहन रखी थी.

दूसरी, पहली बार में ही असामान्य लगी. गुलाबी साड़ीब्लाउज में सजासंवरा उस का मदमस्त यौवन लोगों के दिलों पर कहर ढा रहा था. कुछेक क्षणों के लिए तो मेरा दिल भी थम सा गया. यों लगा मानो वह नृत्य प्रोग्राम के बजाय, किसी सौंदर्य प्रतियोगिता में भाग लेने आई हो.

बीयर के जाम पर नाचती हुई उस की उंगलियां देख कर किसी नाजुक टहनी पर अधखिली कलियों के मंदमंद हवा में हिलने का भ्रम हुआ. उस ‘गुलाबी सुंदरी’ को अपनी सखी के साथ इस तरह अकेले बीयर पीते देख मैं ने उसे किसी बड़े घराने की माडर्न लड़की ही समझा. वह जितनी सुंदर उतनी ही चंचल लगी. मेरा ध्यान  अब तक उधर क्यों नहीं गया? इस का अफसोस तो हुआ ही, साथ में यह ताज्जुब भी कि वे दोनों डांस में मुझे अपना पार्टनर बनाने को आतुर हैं.

प्रोग्राम शुरू होने जा रहा है, जिन के पास निजी पार्टनर नहीं हैं, वे हाल में बैठे लोगों में से  अपना मनपसंद पार्टनर ढूंढ़ने लगे. कत्थई मैक्सी वाली को एक मनचले युवक ने आमंत्रित कर लिया, ‘गुलाबी रूपसी’ को उस का आफर ठुकराते देख मुझे एक अनजानी खुशी महसूस हुई.

सहसा तभी होटल मैनेजर ने स्टेज पर ताली बजाते हुए लोगों का ध्यान खींचा और माइक में बोला, ‘लेडीज एंड जेंटल मैन, जैसा कि आप सब जानते हैं, आज हम इस प्रिंस होटल की सिल्वर जुबली मनाने जा रहे हैं. पिछले अनेक सालों से निरंतर हमें आप का जो अपार स्नेह व भरपूर सहयोग मिलता रहा है, उस के लिए यह होटल आप सब का आभारी है, और आशा नहीं, पूर्ण विश्वास है कि भविष्य में भी हमें आप सब का इसी तरह सहयोग मिलता रहेगा.

‘आज के स्पेशल डांस प्रोग्राम में सर्वप्रथम आप बाल रूम डांस का लुत्फ उठाएंगे, फिर टैब डांस का और अंत में आर्केस्ट्रा की धुन में तेजी आ जाएगी, जो हर पल बढ़ती ही रहेगी. आखिर तक इस तीव्र धुन पर नाचने वाला जोड़ा, आज के डांस प्रोग्राम का विनर प्राइज हासिल करेगा.’

हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा.

नृत्य आरंभ हो गया. आर्केस्ट्रा की धीमी व मीठी धुन हाल में रस घोलने लगी. चारों तरफ एक अजीब सा उन्माद छा गया. जवान क्या, बूढे़ भी एकदूसरे की कमर में बांहें डाल थिरकते हुए डांसिंग फ्लोर पर आ गए, धीमी गति के नृत्य का मधुर समां देखते ही बनता था.

रात के उस दौर में शराब और शबाब का अनूठा मेल पा कर मेरा सूफी मन भी उस में डूब जाने को मचल उठा. उस ‘गुलाबी प्रिया’ को यथावत बैठी देख मैं प्रसन्नता से झूमता चला गया.

‘आई एम सुनील कुमार,’ नाम बताते हुए उस से बोला, ‘क्या आप मेरे साथ डांस करेंगी?’

‘श्योर,’ वह मुसकरा दी, ‘मुझे रोजी कहते हैं.’

‘वेरी गुड,’ मैं चहका, ‘आप के पेरेंट्स ने बहुत सोचसमझ कर यह नाम रखा होगा?’

‘नहीं, ऐसा नहीं है,’ रोजी पुन: मुसकराने लगी और उठ कर अपना खूबसूरत एवं नाजुक हाथ बढ़ाते हुए बोली, ‘आइए, डांस करें.’

कहीं फिर न चूक जाऊं, इसलिए प्यार से उस का हाथ पकड़ते हुए मैं ने ‘थैंक्यू’ कहा. नृत्य में वह इस कदर खुल कर पेश आई मानो हम पहले से एकदूसरे को जानते हों. खैर, उस रात विशेष डांस प्रोग्राम में रोजी के साथ मुझे ही ‘ताजमहल’ मिला, लेकिन विदा होते समय जब उसे प्राइज सौंपा तो वह उदास लगी, मानो उस की उम्मीदों पर मैं खरा नहीं उतरा.

इस के बाद रोजी कई बार क्लब, होटल, सिनेमा, समंदर के किनारे आदि जगहों पर मिली लेकिन वह हमेशा जल्दी में होती जबकि मैं निरंतर महसूस करता कि वह जानबूझ कर ऐसा करती है. उस की चेष्टा कतरा जाने में रहती है. अचानक ही सामने आ जाने से उस के चेहरे पर नागवारी के जो भाव उभरते उन्हें आसानी से मैं पढ़ लेता. उसे मानो मेरा मिलना अखरता हो.

वह मेरे होशोहवास पर इस तरह छा गई कि मैं एकांत में छटपटा उठता और तब मुझे ऐसा लगता कि उस के बगैर वजूद अधूरा है. प्राय: मैं सोचता, ज्यों ही वह मिलेगी तो फौरन उस के आगे पे्रम का इजहार कर दूंगा, लेकिन रोजी की व्यस्तता और जल्दबाजी…कुछ कहने का मौका न देती.

एक दिन सोचा कि बात ऐसे नहीं बनेगी, अत: रोजी के वास्ते मैं ने एक पत्र लिखा, जिस में प्रेम के साथसाथ उस से विवाह रचाने की इच्छा भी प्रकट की और अब वह पत्र सदा जेब में रहता, ताकि मिलते ही उसे थमा दूं.

सहसा एक दिन शाम को वह सड़क पर भीड़ में जाती दिखाई दी. मैं ने जोर से नाम ले कर उसे पुकारा. उस ने चौंक कर पीछे देखा. मैं ने झट से गाड़ी फुटपाथ के साथ ले जा कर रोक दी तो उसे नजदीक आना ही पड़ा.

‘हाय, रोजी.’

‘हाय…’ मुसकराने के बावजूद उस के चेहरे पर बेरुखी उभर आई. सफेद पैंट और टौप पर खुली केश राशि में वह बिजलियां गिराती नजर आई.

मैं कह उठा, ‘आओ, जुहू पर टहलें.’

‘सौरी, आज फिर बिजी हूं,’ खेद भरे स्वर में वह बोली.

‘आओ तो सही, जहां कहोगी वहां उतार दूंगा.’

दिल की बात कहने के लिए इतना सफर ही बहुत होगा.

‘बेकार आप को परेशान…’

‘मैं फुरसत में हूं,’ उतावलेपन से मैं उस की बात बीच में काटते हुए बोला तो उस से इनकार करते न बन पड़ा.

कार का अगला गेट खोलते हुए वह चुपचाप मेरी बाजू में आ कर बैठ गई. उस के बदन का मधुर स्पर्श पाते ही बात कहां से शुरू करूं समझ में न आया और कुछेक क्षण यों ही निकल गए.

‘मुझे यहीं उतरना है,’ रोजी ने कहा.

‘ठहरो रोजी.’

जातेजाते वह पलटी. मैं ने पत्र निकाल कर उसे देते हुए भारी स्वर में कहा, ‘एकांत में इसे जरूर पढ़ लेना.’

रोजी उसे ले कर भीड़ में समा गई. मैं ने देखा, वह क्लब के सामने उतरी है.

अगली मर्तबा मिलते ही रोजी खिलखिला कर हंस पड़ी.

मैं अवाक् सा मोतियों की भांति चमकते उस के दांत देखता रह गया. हंसतेहंसते उस की आंखें नम हो गईं. थोड़ी देर बाद अपनी हंसी पर काबू पाते हुए वह बोली, ‘बस, इतनी सी बात के लिए कागज रंग डाला. कितनी बार तो मिली हूं? कभी भी कह दिया होता.’

‘तुम्हारी व्यस्तता और जल्दबाजी ने मौका ही कब दिया?’

एकाएक रोजी गंभीर हो गई. माथा सिलवटों से भर गया. मानो किसी उलझन में फंस गई हो…हां…कहेगी या ना? सोचते हुए मैं ने उसे टोका, ‘जवाब दो, रोजी.’

उस की चंचलता पुन: लौट आई और वह अपने आंसू इतनी सफाई से पी गई कि मैं देख कर दंग रह गया. ‘बेकार शादी के लफड़े में क्यों पड़े हो?’ जबरन हंसते हुए उस ने कहा, ‘मैं तो यों ही तुम्हारी बन जाने को तैयार हूं, चलो, कहां ले जाना चाहते हो मुझे?’

रोजी, अश्लीलता की सारी हदें पार कर गई थी. निर्लज्जता से भरा यह निमंत्रण पा कर मन में आया कि एक जोरदार थप्पड़ उस के गाल पर जड़ दूं, लेकिन कुछ सोचते हुए दुख, आश्चर्य व क्रोध से कसमसा कर रह गया.

‘मुझे तुम से यह उम्मीद नहीं थी, रोजी.’

‘गलती की, जो एक सेक्स वर्कर से आप कोई दूसरी उम्मीद कर बैठे.’

रोजी ने मानो पिघला हुआ शीशा कानों में उड़ेल दिया हो. सहज ही उस के शब्दों पर विश्वास न हुआ और मैं पागलों की भांति उसे देखता रह गया. यह खूबसूरत लड़की…बाजारू माल कैसे हो सकती है? नहीं…नहीं…पर जो पहले से था, उस पर यकीन करना ही पड़ा. उस के मुख से यह कड़वा सच सुन प्यार के साथसाथ अब उस के प्रति सहानुभूति भी उमड़ आई. जीवन में इस अंधेरी राह पर जाने के पीछे अवश्य कोई मजबूरी रही होगी. उसे जानने की इच्छा से ही मैं कातर स्वर में बोला, ‘इतनी सुंदर, पढ़ीलिखी और समझदार हो कर भी तुम ने यह लाइन क्यों पकड़ी, रोजी?’

‘अरे, तुम तो भावुक हो गए,’ वह उपहास उड़ाते हुए खिलखिला उठी, जबकि मैं उसे अपनी आंतरिक वेदना पर हंसी का लबादा ओढ़ते हुए साफसाफ देख रहा था.

‘मजाक नहीं रोजी, मैं अब भी तुम्हें अपना जीवनसाथी बनाना चाहता हूं,’ सचमुच भावुकता के वेग में मैं बहता ही चला गया, ‘तुम्हारे अतीत से मुझे कोई सरोकार नहीं…और न ही भविष्य में कभी कुछ पूछूंगा, मैं तो सिर्फ…तुम्हें इस अंधेरे से उजाले में ले जा कर एक नए जीवन की शुरुआत करना चाहता हूं, जहां हम दोनों और हमारी खुशियां होंगी.’

‘तुम्हारे विचार और भावनाओं की मैं कद्र करती हूं, सुनील,’ वह यथार्थ के कठोर धरातल से चिपकी रह कर ही बोली, ‘मगर अफसोस, तुम्हारा औफर ठुकराने पर मजबूर हूं, मेरे हालात ऐसे हैं कि लाख चाहने पर भी मैं उन के खिलाफ कोई फैसला नहीं ले सकती.’

‘मुझ पर भरोसा करो, रोजी,’ मैं ने तहे दिल से कहा, ‘हम हर मुश्किल आसान कर लेंगे, प्लीज, बताओ तो सही.’

‘यह नामुमकिन है, सुनील,’ कह कर उस ने एक गहरी सांस ली और फिर अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देख कर बोली, ‘अच्छा, मैं अब चलूं.’

लेकिन जातेजाते ठहर गई. उसी कातिल अदा से पलट कर देखा और हंस कर बोली, ‘यों रास्ते में अचानक ही घेर कर मेरा धंधा खराब मत किया करो. पहले दिन भी तुम्हें अपना ग्राहक समझा था मैं ने और मेरी वह रात बेकार गई. खैर, कोई बात नहीं, तुम से मुझे न जाने क्यों अजीब सा लगाव हो गया है और उसे मैं कोई नाम नहीं देना चाहती. हां, अगर तुम चाहो तो हफ्ते में एक नाइट तुम्हारे साथ मुफ्त गुजार दिया करूंगी.’

‘‘रोजी…’’

‘‘क्या हुआ?’’ अनिता किचन से बाहर आ गई, ‘‘क्यों चिल्ला रहे हो? तबीयत ठीक तो है?’’

‘‘हां, मैं ठीक हूं,’’ कह कर माथे से पसीना पोंछते हुए बोला, ‘‘आज चाय नहीं दोगी?’’

‘‘एक मिनट, अभी लाई,’’ और वह लौट गई.

मैं फिर रोजी के बारे में सोचने लगा.

रोजाना आफिस आतेजाते सड़कों पर या जहांजहां उस के मिलने की संभावना थी वे सारे ठिकाने देख डाले पर रोजी नहीं मिली. फिर अचानक एक दिन भीड़ में वह नजर आ गई. फौरन कार फुटपाथ के एक ओर रोक कर मैं पैदल ही उस के पीछे हो लिया.

‘रोजी…’ हांफते हुए मैं ने पुकारा. पर वह अनजान सी आगे बढ़ती रही. मुझ से रहा न गया तो दौड़ कर उसे पकड़ लिया और फुटपाथ पर खींच लिया.

‘आखिर तुम चाहते क्या हो?’ पलटते ही वह एकदम गुर्राई, ‘क्यों हाथ धो कर मेरे पीछे पड़े हो?’

‘आई लव यू, रोजी.’

उस ने सहम कर इधरउधर देखा, फिर बोली, ‘देखो, मैं चिल्ला उठी तो यहां लोग जमा हो जाएंगे और वे सब तुम्हें इश्क का मतलब समझा देंगे, पुकारूं?’

मैं यह सोच कर सिर से पांव तक सिहर गया कि वह मेरे साथ ऐसा भी कर सकती है. उस की बांह पर कसा मेरा हाथ दूसरे ही क्षण ढीला पड़ता चला गया.

‘आइंदा यह हरकत मत करना, वरना…’ चेतावनी देते हुए उस ने हाथ छुड़ाया और भीड़ में खो गई, मैं पागलों की तरह खड़ा रह गया.

उस के बाद रोजी कभी नहीं मिली और न ही मन में कभी उस से मिलने का खयाल आया. जब कभी उसे ले कर मन घृणा से भरता तो मैं कविता के सहारे उसे हलका कर लेता.

काशीपुर में दीदी की ससुराल है. वह अकसर फोन करती रहतीं कि तेरे लिए एक लड़की देखी है, कभी आ कर हां, ना बता जा. मातापिता के बरसों पहले गुजर जाने के बाद इस जहान में वही तो हैं, उन की यह बात न रखी तो वह भी मुंह मोड़ लेंगी. सो, मैं एक माह की छुट्टियां ले कर काशीपुर आ गया.

कांता दीदी ने मेरी पसंद को ध्यान में रखा था. लड़की देखते ही रिश्ता पक्का हो गया. जीजाजी तो मानो पहले से ही पूरी तैयारियां किए बैठे थे. अनिता के साथ चट मंगनी, पट ब्याह होते ही मैं अनिता को ले कर हनीमून मनाने के लिए नैनीताल जा पहुंचा. ऊंचीऊंची पर्वत श्रेणियों से घिरा नैनीताल का सुंदर इलाका, सुंदरतम झील और हरीभरी वादियों में पता ही न चला कि छुट्टियां कब गुजर गईं. हम दोनों एक दूसरे के इतने करीब आ गए, जैसे बचपन से साथ रहे हों. नैनीताल से काशीपुर, 2 दिन दीदी के यहां रह कर हम मुंबई आ गए.

उन्हीं दिनों की बात है, जब गुप्ता इंटरप्राइजेज ने पुणे में भी अपनी शाखा खोली. चूंकि कंपनी के मालिक मेरी कार्यकुशलता व ईमानदारी से पूरी तरह संतुष्ट थे. इसलिए यहां की जिम्मेदारी भी मुझे ही सौंपी गई. यहां मुंबई के मुकाबले मुझे ज्यादा सुविधाएं मिलीं.

अनिता के साथ पिता न बन पाने के बावजूद चैन से हूं. उस की बच्चेदानी में इंफैक्शन है. डाक्टर का कहना है, शीघ्र ही उसे आपरेशन द्वारा निकाला नहीं गया तो अनिता की जान को खतरा हो सकता है.

कल शाम से सीमा ने हमारे दांपत्य जीवन में हलचल मचा दी. समझ में नहीं आ रहा कि आखिर वह चाहती क्या है? ऐसी बाजारू लड़कियों का भरोसा ही क्या? अपनी इज्जत तो नीलाम करती ही हैं, दूसरे की भी मिट्टी में मिला देती हैं. सीमा अगर अनि से कह दे कि 3 साल पहले मैं ने उसे न केवल पत्नी बनाना चाहा था, बल्कि उस के द्वारा विवाह का प्रस्ताव ठुकरा देने पर बुरी तरह अपमानित भी हुआ था, तो क्या मैं उस की निगाह में ठहर पाऊंगा? अगर सीमा ने कहीं अनिता को वह पत्र दिखा दिया तो क्या जवाब दूंगा? अगर उस ने यह भेद छिपाने की कीमत मांग ली तो कैसे अदा करूंगा? उफ.

‘‘बेशर्म, कमीनी,’’ क्रोध में मैं बड़बड़ा उठा.

‘‘किसे विभूषित किया जा रहा है, महोदय?’’ चायनाश्ता टे्र में लाते हुए अनिता ने पूछा तो मैं हड़बड़ा गया, मानो रंगेहाथों चोर पकड़ा गया हो.

‘‘क्षमा करें, बंदी से भूल हो गई,’’ अपने खास लहजे में उस ने चोट की.

‘‘सौरी.’’

‘‘भविष्य में ध्यान रहे,’’ वह महारानियों की तरह मुसकराई.

चाय से पहले, मुंह में चिप्स डाला तो मन में यह खयाल आया कि क्यों न अनिता को अपने अतीत के बारे में बता दूं और अपराधबोध से मुक्त हो जाऊं? यह तो मुझे अच्छी तरह समझती है. मेरी कविताओं की सहृदय पाठक ही नहीं, बल्कि समालोचक भी है. हां, इसी के सहयोग व प्रेरणा से तो ‘कायर नहीं हैं हम’ और ‘आओ, इस जर्जर घड़ी को बदल डालें’ कविता संग्रहों का प्रकाशन हुआ है.

‘‘सीमा को तुम कब से जानती हो, अनि?’’ रहस्योद्घाटन से पहले टोह लेना चाहा.

‘‘बचपन से,’’ उस ने बताया, ‘‘बाजपुर में उस का परिवार हमारे पड़ोस में ही रहता था, 9वीं में वह अपने मम्मीपापा के साथ वाराणसी चली गई थी. कुछ समय तक हमारे बीच फोन पर बातचीत होती रही, फिर वे लोग, भैया की शादी में नहीं आए, तो फोन आना बंद हो गया. उस के बाद वह कल शाम ही मिली, क्यों?’’

‘‘उसे नौकरी पर लगवाने के लिए पूछ रहा हूं. उस की योग्यता क्या है?’’

‘‘अंगरेजी से बी.ए. फाइनल नहीं कर सकी थी.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘हीरोइन बनने की गरज से अपने प्रेमी के साथ मुंबई भाग आई थी, फिर स्टूडियो के चक्कर लगातेलगाते हताश हो कर उस ने घर लौट जाने का फैसला कर लिया था. उस का वह प्रेमी उस के गहने व रुपए ले कर चंपत हो गया और जातेजाते उसे लड़कियों से जबरन धंधा कराने वाले एक गिरोह के एजेंट को बेच गया जिस के बौस के पास कई पुरुषों के साथ बेहोशी में शूट की गई उस की ब्लू फिल्म थीं.’’

‘‘कंप्यूटर तो जानती होगी?’’

‘‘हां, प्लीज…कोई जगह खाली हो तो उसे रख लो,’’ अनिता ने आग्रह किया.

‘‘मैं हंसा,’’ वह भी फ्री में…

‘‘उस के पास देने को है भी क्या?’’

‘‘है, जो हमारे पास नहीं है.’’

‘‘मतलब?’’ अनिता चौंकी थी.

‘‘कोख.’’

वह भी हंसी, ‘‘तो पापा बनने को व्याकुल हो. मैं जानती हूं.’’

‘‘अनि…क्या तुम उसे स्वीकार कर सकोगी. कहीं वह मुझ पर अधिकार न जता ले?’’

‘‘‘सीमा के संदर्भ में’ आओ, इस जर्जर घड़ी को बदल डालें, संग्रह की शीर्षक कविता याद आ रही है मुझे,’’ और वह अक्षरश: उसे सुनाने लगी.

दीवार घड़ी में थरथर कांप कर, आगे बढ़ती हुई सुइयों को निहारते हुए चुपचाप मैं सुनता रहा…उस की आवाज…और अंत में बोला, ‘‘स्पष्ट करो.’’

‘‘सीमा एक सेक्स वर्कर है, यह जान कर भी आप उसे अपनाने को तैयार हो गए थे, तो…’’

मैं दंग रह गया, ‘‘यानी…’’ मुख से बमुश्किल निकला.

‘‘हां, आज दोपहर सीमा…सबकुछ बता गई.’’

अपराधबोध से मैं दब गया.

‘‘लेकिन उस ने आप को ठुकरा  दिया क्यों? कभी सोचा आप ने.’’

‘‘हां, कई बार सोचा था,’’ पर किसी नतीजे पर न पहुंच सका.

‘‘दरअसल, वह आप से बेहद प्रभावित हुई थी,’’ अनिता बोली, ‘‘उसे एक अजीब सा लगाव हो गया था आप से, जिसे वह कोई नाम नहीं देना चाहती थी. एक और बात थी कि आप की भलाई भी उस के पांव की जंजीर बन गई.’’

अनिता ने एक नया रहस्य खोला तो मैं बोला, ‘‘उसे और स्पष्ट करो.’’

‘‘लड़कियों की नजरबंदी के लिए तैनात सुरक्षा गार्ड, अगर आप को सीमा के इर्दगिर्द ज्यादा समय तक देख लेते तो आप की जान चली जाती और इसीलिए जानबूझ कर सीमा ने आप के मन में अपने प्रति नफरत भर दी ताकि आप उस से दूर हो जाएं.’’

मैं आश्चर्य से भर कर पत्नी को देखने लगा तो वह आगे बोली.

‘‘यह तो समूचा विपक्ष एक हो जाने पर पिछले दिनों सरकार को उन दरिंदों के खिलाफ काररवाई करने के लिए पुलिस को सख्त आदेश देने पड़े. तब कहीं वह मुक्त हो पाई और घर जा सकी.

‘‘अंकल, सीमा के भाग जाने का आघात बरदाश्त न कर पाते हुए पहले ही चल बसे थे. उस पर बदनामी का दंश…बेचारी कब तक झेलती रहती? छोटे भाईबहन और बीमार मां के साथ तंग आ कर आखिर में वह वाराणसी से पूना चली आई.’’

‘‘पगली, इतना बड़ा त्याग कर डाला, सिर्फ मेरे लिए? क्या लगता हूं मैं उस का? मैं तो आज तक उस से घृणा करता रहा…उसे गलत समझता रहा… छि…छि…छि…’’

‘‘अब तो यही हो सकता है कि हम कुछ करें, सीमा जैसी लड़कियों के लिए,’’ अनिता ने मानो अंदर झांक लिया हो.

‘‘हां, अनि,’’ ये दो शब्द अनंत गहराइयों से निकले पर मुझे नहीं मालूम था कि यह फैसला सही है या गलत. अगर बच्चा हो गया तो क्या उसे अनिता स्वीकार करेगी. और क्या सीमा वास्तव में बच्चे को और मुझे छोड़ कर जाएगी. मैं ने गहरी सांस ली और सब कुछ अनिता पर छोड़ दिया. Hindi Romantic Story :

Hindi Satire Story : ट्रांसफर का सीजन

Hindi Satire Story : जैसे ही घर पहुंचा, पत्नी ने बताया कि अपनी कालोनी में मिस्टर गुलाटी के यहां चोरी हो गई है. मैं ने पूछा, ‘‘चोरों का कोई पता चला?’’

‘‘अभी तक तो मुझे कोई जानकारी नहीं मिली है,’’ पत्नी बोली, ‘‘आप आ गए हो तो सारी जानकारी मिल जाएगी. कोई कह रहा था कि चोरी हो गई और कोई बता रहा था डकैती पड़ी है. मुझे तो दोनों में अंतर ही पता नहीं चलता.’’

पत्नी के साथ यही दिक्कत है. अंतर करने से चूक जाती है. मुझे सीआईडी का आदमी समझती है. अखबारों में पढ़े समाचारों को कभी मनोरंजक और कभी खौफनाक ढंग से मिर्चमसाला लगा कर बता देता हूं. इसलिए पत्नी को ऐसा भ्रम हो जाता है कि मैं जासूसी भी करने लगा हूं.

मैं ने तुरंत पूछा, ‘‘तुम हालचाल जानने के लिए उन के घर गई थीं?’’

उस ने वर्षों पुराना घिसापिटा रिकार्ड दोहरा दिया, ‘‘घर के काम से फुर्सत नहीं मिली. बच्चे धींगामस्ती कर रहे थे. पड़ोसिन बैठने आ गई थीं.’’

मैं ने कहा, ‘‘क्या पड़ोसिन सुबह से शाम तक बैठी रही थीं. रही बात बच्चों की तो तुम्हीं बताओ, किस के घर के बच्चे धींगामस्ती नहीं करते. यह तो गनीमत है कि अपने बच्चे बाहर लड़तेझगड़ते नहीं. वरना दिनभर शिकायतों का ही तांता लगा रहता. तुम जानती नहीं, अपने पड़ोसी वर्माजी कितने परेशान रहते हैं बच्चों की कंपलेंट से.’’

चोरी और किसी के घर होती तो जाने, न जाने की बात अलग थी. गुलाटी का पारा तो इसी बात को ले कर 108 डिगरी तक पहुंच गया होगा कि न शर्माजी आए न उन की श्रीमतीजी. पिछली बार गुलाटी को फ्लू हो गया था. समाचार कुछ देर से मिला. हम दोनोें घर गए तो ठीक हो चुका था. देखते ही बरस पड़ा, ‘‘अब फुर्सत मिली है. अच्छा होने के बाद देखने आए हो. आधी कालोनी आ कर चली गई. अब कोई बहाना मत बनाना और मेरी अगली बीमारी का ध्यान रखना.’’

चोरी तो हो चुकी थी लेकिन चोरों की तरह डरतेसहमते गुलाटी के घर पहुंचा. वह 4-5 अतिथियों से घिरे बैठे थे. उन के सामने की मेज पर अखबारों का ढेर पड़ा था. रसोईघर से कुछ बनने की महक कमरे में आ रही थी. मेरी ओर देख कर भी वह बिलकुल चुप थे. नाराज हो जाने  पर यह गुलाटी की खास किस्म की आदत थी यानी जिस से नाराज हो जाओ, उस की ओर देखो जरूर लेकिन बातों का सिलसिला शुरू न करो.

गुलाटी ने पड़ोसियों को विस्तार से डकैती का हाल बताया कि किधर से डकैत आए, किधर गए होंगे, संख्या कितनी रही होगी. डकैती के अभिनय से ले कर पुलिस की भूमिका तक सरगर्म चर्चा हो गई. इतने में नाश्ता आ गया. उस का तामझाम देख कर मुझे तो ऐसा लगा नहीं कि गुलाटी के यहां चोरी हुई है. नाश्ते की सजी हुई प्लेटों और उस के चेहरे के हावभाव से लग रहा था डैकती का माल बरामद हो चुका है. उसी के उपलक्ष्य में स्वल्पाहार का आयोजन है.

पड़ोसियों ने वही किया जो ऐसे मौके पर किया जाता है. नाश्ता ठूंसते हुए प्रशासन की जम कर आलोचना हुई. गुलाटी को सांत्वना और डकैतों के पकड़े जाने का आश्वासन देते हुए वे एकएक कर विदा हो गए. हालांकि उन्हें इशारा मिल जाता तो इसी विषय पर बहस करते हुए कम से कम 1 घंटा और जम सकते थे. पड़ोसियों के जाते ही गुलाटी ने खबरों का ढेर मेरी ओर पटक दिया और कहा, ‘‘कल चोरी हुई है और आज दर्शन दे रहे हो. अच्छी दोस्ती निभाते हो.’’

अखबार पलटते हुए मैं ने कहा, ‘‘भाई, शहर के बाहर था. पहुंचते ही पत्नी ने डकैती का समाचार बताया और तुरंत यहां आया हूं. पूरा समाचार तो अभी अखबार पढ़ कर ही जान पाया.’’

‘‘देख लिया न तुम ने अखबार वालों का हाल. पूरे 2 लाख की डकैती हुई है. पूरी कालोनी में सनसनी है. आनेजाने वालों का तांता लगा है और समाचार इतना छोटा. न्यूज देख कर तो ऐसा लगता है कि जैसे 100-50 मुरगियों की चोरी का हलकाफुलका समाचार हो.’’

मैं ने कहा, ‘‘ठीक कह रहे हो यार. सारा अखबार तो पी.एम. के समाचारों और तसवीरों से भरा है. कहीं उद्घाटन है, कहीं शिलान्यास. पूरे फ्रंट पेज पर उन के भाषण, स्वागत और झलकियों की झलक है. इसी वजह से डकैती के समाचार को स्थान ठीक से नहीं मिल सका.’’

मेरी बातें सुन कर गुलाटी हां में हां मिलाते हुए बोला, ‘‘मेरे साथ यही दिक्कत है. अखबारों ने कभी मेरे साथ न्याय नहीं किया. पिछली बार जब मैं मेयर पद का उम्मीदवार बना था तो अखबारों ने सतही ढंग से लिया. मेरी उम्मीदवारी का समाचार भी नहीं बना और जब 15 पार्षदों ने मेरे पक्ष में वातावरण बनाया, हस्ताक्षर अभियान चलाया तो अखबारों में भी हरकत बढ़ी तब कहीं फोटो सहित समाचार आया,’’ इतना कह कर उस ने राहत की सांस ली और 2 लाख की डकैती के दुख को कुछ कम किया.

मैं ने झिड़कते हुए कहा, ‘‘गड़े मुर्दे उखाड़ने से क्या फायदा, अतीत को छोड़ कर अपने वर्तमान में आजा और डकैती का सार संक्षेप में बता.’’

‘‘देख लो दुर्भाग्य, डकैतों ने भी कैसा दिन चुना. दिन भर पी.एम. नगर में रहे, रात में डकैत आए. 1-2 दिन आगेपीछे आ जाते तो अपने को इतना अफसोस नहीं होता,’’ इतना कह कर उस ने आज का अखबार दिखाया.

अखबार में पुलिस दल के निरीक्षण और डाकुओं का कोई सुराग न मिलने का समाचार छपा था. मैं ने कहा, ‘‘आज के अखबार में भी डकैती को विशेष स्थान नहीं मिला. सी.एम. की खबर से अखबार भरा पड़ा है.’’

अपने घर की डकैती का समाचार तो पी.एम. और सी.एम. के दौरे के बीच दब कर दम तोड़ चुका है. पुलिस वाले भी देर से आए. 2 दिन के थकेहारे खानापूर्ति कर के चले गए. 2 पुलिस के नौसिखिए भी आए. एक तो पूछ रहा था कि डकैती का सही समय बताइए. उस की बात सुन किसी को भी गुस्सा आ सकता है. फिर भी अपने को संयत कर मैं ने कहा, ‘‘ठीक समय मालूम होता तो जान पर खेल कर पकड़ नहीं लेता डकैत को, डाकुओं के आने के लिए अलार्म लगा कर तो सोए नहीं थे. ठीक समय क्या बताएंगे. सो कर उठे तो मालूम हुआ, सुबह के 5 बज चुके थे.’’

दूसरे ने पूछा, ‘‘सुना है, कालोनी के कुछ लोगों ने डकैतों को भागते भी देखा है. क्या डकैत सशस्त्र थे?’’ मैं ने कह दिया, ‘‘यह आप उन्हीं से पूछ लीजिए, जिन्होंने देखा है. अब भला यह भी कोई पूछने की बात है कि डकैत सशस्त्र थे? सशस्त्र नहीं होंगे तो क्या चकलाबेलन ले कर रोटी बेलने आएंगे. यह हाल है अपने नए अफसरों का. फिल्मों में कामेडियन कम हो गए हैं पुलिस विभाग में ज्यादा.’’

पत्नी और बच्चे भी पहुंच चुके थे. वे लोग अंदर मिसेज गुलाटी के साथ नाश्ता करते हुए डकैतों के जाने के बाद का आंखोंदेखा हाल सुन रहे थे. बच्चों को मिस्टर गुलाटी का लड़का वह खिड़की दिखा रहा था जिधर से डकैत आए थे. मैं मिस्टर गुलाटी का साथ दे रहा था. कालोनी के अनेक परिचित अभी तक नहीं आ पाए थे. गुलाटी को इसी बात की चिंता सता रही थी. बारबार उस की नजर दरवाजे की ओर उठ जाती थी. वह स्वागत के लिए कमर कस कर बैठा था. तभी अचानक कुत्ते के भौंकने की आवाज आई. मैं ने कहा, ‘‘यार गुलाटी, तुम्हारी पामेरियन नस्ल का कुत्ता क्या कर रहा था. तेज कुत्ता है जरूर भौंका होगा डकैतों की आहट सुन कर.’’

खीजते हुए गुलाटी बोला, ‘‘पामेरियन और अल्सेशियन बस, नाम के रह गए हैं. हमारा जानी तो दिन में आनेजाने वालों को भौंकता है और रात को खर्राटे भरता है. दरअसल, विदेशी नस्ल का भी भारतीयकरण हो गया है. रात को बिलकुल ही नहीं भौंकता. मुझे तो लगता है कि यह कुत्ता डकैतों से मिला हुआ है.’’

मैं ने अपनी हंसी दबाते हुए कहा, ‘‘पुलिस के कुत्ते तो आए होंगे. उन्होंने क्या डिटेक्ट किया?’’

‘‘अरे, यार, पी.एम. और सी.एम. के दौरे में कुत्ता ज्यादा व्यस्त और सक्रिय रहा. सुना है 2-3 दिन से बीमार चल रहा है. एक पशु चिकित्सक की सतत निगरानी मेें है. उस के लिए राजधानी से इंजेक्शन आ रहे हैं.’’

मैं ने कहा, ‘‘तुम्हारी तो तकदीर ही खराब है. 2 लाख की डकैती हो गई, अभी तक पुलिस के जासूसी कुत्ते भी नहीं पहुंचे.’’

गुलाटी ने तैश में आ कर कहा, ‘‘शर्माजी, पैसा तो अपने हाथ में नाचता है. गहने और नकदी मिला कर 2 लाख के करीब गए हैं. ये तो ट्रांसफर के सीजन में फिर कमा लेंगे. मानसून के आनेजाने से मामले में धोखा हो सकता है. गरज के साथ सिर्फ छींटे पड़ सकते हैं लेकिन अपना सीजन ठीक समय में आता है. आंगन में अच्छी बारिश हो जाती है. इसलिए सवाल 2 लाख की डकैती का नहीं है. अपन तो अखबारों में ठीक कवरेज न आने से दुखी हैं.’’ Hindi Satire Story :

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