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GST Rate Cuts: जीएसटी कटौती राहत नहीं, जनता को छलने का प्रयास

GST Rate Cuts: सरकार द्वारा हाल ही में रियल एस्टेट क्षेत्र में जीएसटी दरों में की गई कटौती को आम लोगों के लिए “राहत” बताया जा रहा है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इस दावे के बिल्कुल विपरीत है। यह फैसला वास्तविक सुधार से ज़्यादा भ्रम फैलाने वाला प्रचार साबित हो रहा है।

दरअसल, निर्माण क्षेत्र में उपयोग होने वाले कई कच्चे माल की दरें अब पहले से ज़्यादा बढ़ा दी गई हैं। जो सामान पहले 12% जीएसटी पर मिलता था, अब वही 18% जीएसटी के दायरे में आ गया है। ऐसे में निर्माण कंपनियों की लागत घटने की बजाय बढ़ रही है। नतीजतन, बिल्डर्स अब अपने प्रोजेक्ट्स की कीमतें बढ़ा रहे हैं ताकि बढ़े कर का बोझ उपभोक्ताओं पर डाला जा सके।

सरकार के प्रचार के मुताबिक ईंट, टाइल और रेत जैसी वस्तुएँ सस्ती हुई हैं, लेकिन यह केवल पुराने स्टॉक पर लागू है। नए निर्माण की लागत में कोई ठोस कमी नहीं आई है।

छोटे बिल्डर्स और डेवलपर्स अब इनपुट टैक्स क्रेडिट की उलझनों से जूझ रहे हैं, जिससे परियोजनाओं की गति और धीमी हो रही है। खरीदारों को राहत देने की बजाय यह व्यवस्था उन्हें और अधिक भ्रमित कर रही है, क्योंकि टैक्स संरचना और भी जटिल हो गई है।

त्योहारी सीजन में इसे निवेश का “स्वर्ण अवसर” बताकर प्रचारित किया जा रहा है, लेकिन सच्चाई यह है कि यह कदम केवल सस्ते घर के सपने दिखाने वाला एक राजनीतिक दांव है। जमीन और स्टाम्प ड्यूटी पर कोई राहत नहीं होने के कारण कुल लागत में कोई ठोस कमी नहीं आई है।

रियल एस्टेट क्षेत्र पहले ही मंदी और अविश्वास से जूझ रहा था। ऐसे में जीएसटी कटौती का यह निर्णय विकास से ज़्यादा जनता को खुश करने का दिखावा प्रतीत होता है। GST Rate Cuts.

Hindi Family Story: जूमजूम झूम वाला- लड़कियों की फोटो खींचना कैसे पड़ गया भारी?

Hindi Family Story: रोहित ने शान से अपना नया स्मार्टफोन निकाल कर अपने दोस्तों को दिखाया और बोला, ‘‘यह देखो, पूरे 45 हजार रुपए का है.’’

‘‘पूरे 45 हजार का?’’ रमन की आंखें आश्चर्य से फैल गईं, ‘‘आखिर ऐसा क्या खास है इस मोबाइल में?’’

‘‘6 इंच स्क्रीन, 4 जीबी रैम, 32 जीबी आरओएम, 16 एमपी ड्यूल सिम, 13 मेगापिक्सल कैमरा…’’ रोहित अपने नए फोन की खासीयतें बताने लगा.

रोहित के पापा शहर के बड़े व्यापारी थे. रोहित मुंह में सोने का चम्मच ले कर पैदा हुआ था. उस की जेब हमेशा नोटों से भरी रहती थी इसलिए वह खूब ऐश करता था.

रोहित के पापा भी यह जानते थे, लेकिन उन्होंने कभी रोहित को टोका नहीं. उन का मानना था कि कुछ समय बाद तो रोहित को ही उन का व्यापार संभालना है इसलिए अभी जितनी मौजमस्ती करनी है कर ले.

पापा की छूट का रोहित पर बुरा असर पड़ रहा था. वह पढ़नेलिखने के बजाय नएनए दोस्त बनाने और मस्ती करने में लगा रहता.

आज भी वही हो रहा था. क्लास बंक कर के रोहित कैंटीन में दोस्तों के साथ बैठा अपनी शेखी बघारता हुआ उन्हें अपने नए मोबाइल की खूबियां बता रहा था. उस के दोस्त भी उस के मोबाइल की तारीफ के पुल बांधने में जुटे थे.

‘‘यार, मानना पड़ेगा, तुम्हारे पापा तुम्हें बहुत प्यार करते हैं. तभी तो तुम्हारी हर ख्वाहिश पूरी कर देते हैं,’’ सनी ने मोबाइल को देखते हुए कहा.

‘‘क्या बात करते हो यार, मेरी तो ज्यादातर ख्वाहिशें अधूरी हैं,’’ रोहित बोला.

‘‘कार, सूट, कीमती घडि़यां, विदेशी चश्मे और नोटों की गड्डियां सबकुछ तो तुम्हें हासिल है जिन के बारे में हम लोग सोच भी नहीं सकते. इस के बाद भी तुम्हारी कौन सी ख्वाहिश अधूरी रह गई है?’’ उमंग ने जानना चाहा.

‘‘कार, माईफुट. एक कार पकड़ा दी और पिछले 2 साल से उसे ढो रहा हूं,’’ रोहित ने बुरा सा मुंह बनाया. फिर लंबी सांस भरते हुए बोला, ‘‘मेरी तो ख्वाहिश है कि मेरा अपना एक प्राइवेट जैट हो, जिस पर बैठ कर मैं वीकऐंड मनाने यूरोप जाऊं. स्विट्जरलैंड में अपना एक खूबसूरत सा विला हो, जहां गर्लफ्रैंड के साथ छुट्टियां मनाने जाऊं.’’

‘‘यार, तुम्हारे पापा इतने अमीर हैं. तुम्हारा यह ख्वाब वे एक दिन जरूर पूरा करेंगे,’’ रमन ने कहा.

‘‘तुम्हारे मुंह में घीशक्कर,’’ रोहित ने रमन की पीठ थपथपाई, फिर बैरे को बुला कर सभी के लिए एकएक बर्गर और कोल्ड ड्रिंक का और्डर दिया, जबकि एकएक पिज्जा वे पहले ही खा चुके थे.

‘‘अरे भाई, किस चीज की दावत चल रही है,’’ तभी हेमंत ने कैंटीन में प्रवेश करते हुए पूछा.

‘‘रोहित 45 हजार का नया मोबाइल फोन लाया है. ऐसा मोबाइल पूरे शहर में किसी के पास नहीं होगा,’’ दीपक ने कोल्ड ड्रिंक का घूंट पीने के बाद मुंह पोंछते हुए बताया.

‘‘ऐसी क्या खास बात है इस में?’’ हेमंत ने करीब आ कर एक कुरसी पर बैठते हुए पूछा, तो रोहित से पहले रमन उस की खूबियां गिनाने लगा.

हेमंत ने मोबाइल हाथ में ले कर गौर से देखा. फिर बोला, ‘‘यार, तुम्हारे पिछले स्मार्टफोन में भी तो यही सब फीचर्स थे.’’

‘‘हां, लेकिन यह 4जी फ्रैंडली है और इस का कैमरा जूम वाला है. इस से तुम यहीं बैठेबैठे फोन के कैमरे को जूम कर दूर का फोटो भी साफसाफ खींच सकते हो और कोई तुम्हें देख भी नहीं पाएगा,’’ रोहित ने रहस्यमय अंदाज में फुसफुसाते हुए बताया.

‘‘कोई देख नहीं पाएगा तो उस से क्या फायदा होगा?’’ हेमंत ने पूछा.

‘‘यार, तू भी न पूरा घोंचू है,’’ रोहित ने कहा और फिर आगे बढ़ कर हेमंत की जेब से उस का मोबाइल निकाल कर उस के हाथ में रखते हुए बोला, ‘‘वह देख, तेरी क्लास की लड़की आ रही है. जा उस का एक फोटो खींच ला.’’

‘‘अबे, मरवाएगा क्या? कोई फोटो खींचते हुए देख लेगा तो जूते तो पड़ेंगे ही कालेज से भी निकाल दिया जाऊंगा,’’ हेमंत ने हड़बड़ाते हुए अपना मोबाइल अपनी जेब में वापस रख लिया.

रोहित ने ठहाका लगाया और बोला, ‘‘बेटा, यही खास बात है मेरे फोन में कि यहीं बैठेबैठे जूम कर के किसी का भी फोटो खींच लो और उसे व्हाट्सऐप ग्रुप पर डाल दो ताकि सारे दोस्त उसे देख कर झूम सकें.’’

‘‘अरे वाह, तब तो इस फोन का नाम जूमजूम झूम वाला रख दो,’’ हेमंत का चेहरा खिल उठा. फिर वह खुशामदी स्वर में बोला, ‘‘यार, एक मिनट के लिए अपना फोन देना जरा इस लड़की का एक फोटो खींच लूं. क्लास में तो यह लिफ्ट ही नहीं देती,’’ हेमंत ने एक लड़की की ओर इशारा करते हुए कहा.

‘‘छोड़ न यार. इस का क्या फोटो खींचना. यह लड़की तो रोज वाली है. बगल में जो गर्ल्स कालेज है वहां की लड़कियां बहुत नकचढ़ी हैं. सीधे मुंह बात ही नहीं करतीं. चल उन में से किसी खास पीस का फोटो खींच कर करते हैं कैमरे का उद्घाटन,’’ रोहित ने अपने दिल की बात सब के सामने रखी.

‘‘अरे वाह, आइडिया अच्छा है,’’ हेमंत चहकते हुए बोला, ‘‘ला, यह शुभ काम मैं ही कर दूं. बदले में तुम जो कहोगे कर दूंगा.’’

‘‘चल तू भी क्या याद करेगा,’’ रोहित ने मोबाइल हेमंत को पकड़ाया और बोला, ‘‘बस, एक शर्त है, फोटो जोरदार होना चाहिए. अगर सब को पसंद नहीं आया तो आज के नाश्ते का बिल तुझे भरना होगा.’’

‘‘मंजूर है,’’ हेमंत ने कहा और सभी दोस्तों की ओर इशारा करते हुए बोला, ‘‘चलो, सभी बाउंड्री वाल के पास. जिस का कहोगे उस का फोटो खींच दूंगा.’’

‘‘इतने लोग गर्ल्स कालेज के पास जाएंगे तो पकड़े जाएंगे. तुम अकेले जाओ और चुपचाप फोटो खींच लाओ,’’ रोहित ने समझाया.

‘‘ठीक है,’’ हेमंत ने सिर हिलाया और मोबाइल ले कर सधे कदमों से ऐसे बाहर निकल गया जैसे किसी मोरचे पर जा रहा हो.

उस के कैंटीन से बाहर निकलते ही रोहित ने कहा, ‘‘यह अपने को बहुत तीसमारखां समझता है. आज इसे बकरा बनाना है. यह चाहे जितनी खूबसूरत लड़की का फोटो खींच कर लाए, सब उसे रिजैक्ट कर देना. फिर आज का बिल इसे ही भरना पड़ेगा.’’

यह सुन सभी ने ठहाका लगाया और हेमंत के वापस आने का इंतजार करने लगे.

थोड़ी देर बाद ही रमन, दीपक, उमंग और सनी के मोबाइल पर हेमंत का व्हाट्सऐप मैसेज आया.

‘‘अरे वाह, क्या पटाखा फोटो खींचा है,’’ कहते हुए रमन ने रोहित को फोटो दिखाया तो वह सन्न रह गया. दरअसल, उस कालेज में उस की बहन तान्या भी पढ़ती थी और हेमंत ने उसी का फोटो खींच कर व्हाट्सऐप ग्रुप पर डाल दिया था वह भी उसी के नंबर से.

‘‘अबे, यह क्या कर दिया इस घोंचू ने, मेरी ही बहन का फोटो खींच कर व्हाट्सऐप ग्रुप पर डाल दिया. अब तक तो यह फोटो पचासों लड़कों के पास पहुंच चुका होगा,’’ रोहित ने दोस्तों को बताया तो सभी परेशान हो गए.

‘‘क्या यह तुम्हारी बहन है, ओह नो,’’ कहते हुए सभी ने अपनेअपने मोबाइल जेब में रख लिए.

‘‘मैं इस कमीने को छोडूंगा नहीं,’’ रोहित के जबड़े भिंच गए और आंखें लाल अंगारा हो उठीं.

जैसे ही हेमंत कैंटीन में दाखिल हुआ, उसे देखते ही रोहित तेजी से उस की ओर लपका और उस के चेहरे पर घूंसा जड़ दिया.

‘‘यह क्या मजाक है?’’ हेमंत बोला.

‘‘मजाक तो तू ने किया है, जो अब तुझे बहुत महंगा पड़ने वाला है,’’ गुस्से से कांपते हुए रोहित ने हेमंत पर लातघूंसों की बरसात कर दी.

हेमंत की समझ में ही नहीं आ रहा था कि रोहित उसे मार क्यों रहा है. अचानक हेमंत ने रोहित को पूरी ताकत से धक्का दिया तो वह दूर जा गिरा. फिर हेमंत उसे घूरते हुए बोला, ‘‘तू पागल हो गया है क्या, जो मारपीट कर रहा है. आखिर बात क्या है?’’

‘‘पागल तो तू हो गया है, जो तूने मेरी बहन का फोटो व्हाट्सऐप ग्रुप पर डाला है,’’ रोहित उसे खा जाने वाले लहजे में बोला तो हेमंत की आंखें आश्चर्य से फैल गईं, ‘‘क्या रोहित वह तुम्हारी बहन है. मुझे तो पता नहीं था और न ही मैं उसे पहचानता हूं, उफ, यह क्या हो गया?’’ हेमंत ने अपना सिर पकड़ लिया. उस की आंखों में पाश्चात्ताप साफ झलक रहा था.

वह रोहित के पास पहुंच भर्राए स्वर में बोला, ‘‘रोहित, मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई है. तेरी बहन मेरी बहन हुई. मैं ने अपनी बहन को ही बदनाम कर दिया. मुझे माफ कर दे.’’

‘‘यह क्या तमाशा हो रहा है यहां पर?’’ तभी प्रिंसिपल साहब की कड़क आवाज सुनाई पड़ी. मारपीट होते देख कैंटीन का मैनेजर उन्हें बुला लाया था.

‘‘जी, कुछ नहीं. वह हम लोगों का आपसी मामला था,’’ रोहित हड़बड़ाते हुए उठ खड़ा हुआ.

‘‘आपसी मामले इस तरह निबटाए जाते हैं?’’ प्रिंसिपल साहब ने दोनों को डांटा. फिर बोले, ‘‘तुम लोग मेरे औफिस में आओ.’’

रोहित और हेमंत प्रिंसिपल साहब के पीछेपीछे उन के औफिस में गए. पूरी बात सुन कर प्रिंसिपल साहब का चेहरा गंभीर हो गया. उन्होंने फोन कर के फौरन दोनों के पापा को स्कूल में बुला लिया.

‘‘अंकल, मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई. मुझे नहीं पता था कि वह रोहित की बहन है. अगर पता होता तो उस का फोटो कभी न खींचता,’’ हेमंत ने रोहित के पापा के आगे हाथ जोड़ते हुए कहा.

‘‘तड़ाक,’’ इस से पहले कि वे कुछ कह पाते हेमंत के पापा उस के गाल पर तमाचा जड़ते हुए चीखे, ‘‘अगर तुझे पता भी होता तो तू किसी दूसरी लड़की का फोटो खींच लेता,  वह भी तो किसी न किसी की बहन होती. शर्म नहीं आती ऐसी हरकत करते हुए.’’

‘‘भाई साहब, गलती इस की नहीं बल्कि मेरी है. मैं ने ही रोहित को इतनी छूट दे रखी है कि यह अच्छेबुरे का भेद भूल गया है. आज इस की बहन का फोटो खिंच गया तो इसे तकलीफ हो रही है, लेकिन यही फोटो किसी और की बहन का होता तो इसे आनंद आ रहा होता,’’ रोहित के पापा ने आगे आ कर हेमंत के पापा का हाथ थाम लिया.

‘‘तुम लोगों को सोचना चाहिए कि जिन लड़कियों के साथ तुम छेड़छाड़ करते हो वे भी किसी न किसी की बहन होती हैं. तुम लोगों की हरकतों से उन्हें कितनी तकलीफ होती होगी, सोचा है कभी?’’ प्रिंसिपल साहब ने भी कड़े स्वर में डांटा.

‘‘सर, हमें माफ कर दीजिए,’’ रोहित ने हाथ जोड़ते हुए कहा.

‘‘हां सर. हम लोग अब ऐसी गलती कभी नहीं करेंगे,’’ हेमंत ने भी हाथ जोड़ कर माफी मांगी.

‘‘लेकिन फोटो वायरल होने से तान्या की जो बदनामी हुई उस का क्या होगा?’’ प्रिंसिपल साहब ने पूछा.

‘‘सर, फोटो मैं ने केवल अपनी क्लास के दोस्तों के ग्रुप पर ही डाला था. मैं अभी सब से हाथ जोड़ कर विनती करूंगा कि मेरी बहन का फोटो डिलीट कर दें,’’ हेमंत ने कहा.

‘‘ठीक है, जल्दी करो,’’ प्रिंसिपल साहब ने आज्ञा दी तो दोनों दौड़ते हुए क्लास में जा कर दोस्तों से फोटो डिलीट करने का आग्रह करने लगे. लेकिन अन्य दोस्तों से मामला पता चलने पर उन्होंने पहले ही ग्रुप से फोटो डिलीट कर दिया था.

‘‘घबराओ नहीं रोहित, तुम्हारी बहन हमारी भी बहन है. हम भी नहीं चाहेंगे कि उस के साथ गलत हो. साथ ही हम ने भी ऐसी छेड़खानी से तोबा करने की सोच ली है,’’ रमन सब की ओर से बोला. अब तक प्रिंसिपल साहब और हेमंत व रोहित के पापा भी क्लास में पहुंच गए थे. दोनों के पापा के चेहरों पर जहां पश्चात्ताप के भाव थे वहीं वे संकल्पित थे कि जरूरत से ज्यादा छूट दे कर बच्चों को बिगाड़ेंगे नहीं. साथ ही यह सुकून भी था कि बच्चों को अपनी गलती का एहसास हो गया है. रोहित और हेमंत की आंखें भी शर्म से झुकी हुई थीं. Hindi Family Story.

Hindi Social Story: बलि- नरसिंह ने खिड़की से क्या देखा था?

Hindi Social Story: दिसंबर का महीना था. दोपहर के 2 बजे थे. सूरज चमक रहा था. अकसर 4 बजे खेतों पर आने वाला नरसिंह उस दिन 2 बजे ही आ गया था. खेत सुनसान पड़ा था. वहां सिंचाई का नामोनिशान नहीं दिखाई दे रहा था. ट्यूबवैल के चलने की भी आवाज नहीं आ रही थी. शायद बिजली नहीं थी. लेकिन उस समय तो कभी भी बिजली नहीं जाती थी. फिर क्या हुआ था? नरसिंह को कुछ समझ नहीं आया. नरसिंह ने एक बार फिर पूरे खेत पर अपनी नजर दौड़ाई. नौकर दुर्गा कहीं नहीं दिखाई दिया. बिजली नहीं होने की वजह से शायद वह अपने घर चला गया होगा.

बिजली का जायजा लेने के लिए नरसिंह ट्यूबवैल के कमरे की ओर बढ़ा. वहां दरवाजे पर ताला नहीं था, केवल सांकल लगाई जाती थी. हैरत की बात थी कि सांकल खुली हुई थी. नरसिंह कमरे का दरवाजा खोलने ही जा रहा था कि भीतर से किसी औरत और मर्द की हंसीठिठौली की आवाज सुनाई दी. नरसिंह ने अपना हाथ पीछे खींच लिया और दीवार में बने एक बड़े सूराख से भीतर देखने लगा. भीतर का नजारा देखते ही नरसिंह आगबबूला हो गया. उस का पूरा बदन पसीने से तरबतर हो गया. दरअसल, भीतर बिछी खाट पर उस की बेटी मालती और नौकर दुर्गा एकदूसरे से चिपके पड़े थे. उन के बदन पर एक भी कपड़ा नहीं था. नरसिंह को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि मालती कालेज जाने के बहाने यहां नौकर दुर्गा के साथ कब से गुल खिला रही है. इसी उधेड़बुन में वह चुपके से वापस हो लिया और घर की तरफ चल दिया.

इधर दुर्गा मालती से कह रहा था, ‘‘मालकिन, आप बड़े घर की बेटी हैं. ऐसी गलती करना हम दोनों के लिए ठीक नहीं है.’’

‘‘दुर्गा, मैं तुम से प्यार करती हूं. मैं जानती हूं कि हमारी शादी कभी नहीं हो सकती. मेरे घर वाले नहीं मानेंगे. तुम्हारी बिरादरी के लोग भी नहीं मानेंगे. अगर हम घर से भी भागे, तो वे लोग हमें ढूंढ़ कर मार डालेंगे,’’ मालती अपने कपड़े पहनते हुए बोली.

‘‘तो भी मालकिन, ऐसा चोरीछिपे कब तक चलता रहेगा. आप रोज मेरे साथ यहां कमरे में समय बिताती हैं. अगर किसी को पता चलेगा तो…’’

‘‘तो क्या होगा…?’’ मालती बोली.

‘‘मुझे अपनी जान की परवाह नहीं है, पर आप का क्या होगा…’’ नौकर दुर्गा ने कहा.

‘‘मुझे कुछ नहीं होगा. और कुछ होगा भी तो तब देखा जाएगा. तब तक तो ऐसे ही चलने दो,’’ इतना कह कर मालती ने दुर्गा के होंठ चूम लिए. इस के बाद उस ने अपनी किताबें उठाईं और वहां से चली गई. दुर्गा ने पानी की मोटर चालू कर दी. खेतों में पानी चलने लगा था. वह फावड़ा ले कर कमरे से बाहर आ गया. दुर्गा और मालती का यह रिश्ता पिछले 6 महीने से गाढ़े से और गाढ़ा होता जा रहा था. नरसिंह के गांव के लोग हर साल अपने ग्राम देवता ‘अम्मोरू’ का उत्सव धूमधाम से मनाते थे. उस दिन गांव के सभी लोग गांव से बाहर बने देवी के मंदिर में ही रहते थे. उस मंदिर के चारों ओर नीम, पीपल, इमली वगैरह के बड़ेबड़े पेड़ लगे हुए थे. उत्सव वाले दिन गांव के हर घर की औरतें सुबहसवेरे नहा लेती थीं. वे नएनए कपड़े पहनती थीं. बड़ीबड़ी टोकरियों में देवी के भोग ‘बोनम’ का सामान रखती थीं. मंदिर के पेड़ों के नीचे 3 ईंटों से चूल्हा बनाया जाता था. मिट्टी के नए बरतनों में चावल, दाल, गुड़, नमक, हलदी वगैरह से देवी के लिए ‘बोनम’ पकाया जाता था.

नए घड़ों को धो कर उन्हें कुमकुम, हलदी और फूलों से सजाया जाता था. पकाए गए ‘बोनम’ को उन घड़ों में भरा जाता था. इस के बाद 3 या 5 के हिसाब से औरतें उन घड़ों को अपने सिर पर रखती थीं. ऐसा करने वाली औरतें सुबह से व्रत रखती थीं. उन के नए कपड़ों पर सोने चांदी के गहने भी होते थे. वे गले में फूलों के हार पहनती थीं. कुछ औरतें पैरों में घुंघरू भी बांधती थीं. हर औरत के हाथ में नीम की डंडी होती थी. इन औरतों के साथ इन के परिवार वाले भी होते थे. जुलूस में ढोलक और शहनाई बजाने वाले भी होते थे. लोग उन की धुन पर नाचते थे. कुछ औरतों में तो खुद ‘अम्मोरू’ आ जाता था. पुजारी ‘अम्मोरू’ को उतारने के लिए उन औरतों पर हलदी, कुमकुम, पवित्र पानी छिड़कता था और नीम की डंडी से हौलेहौले मारता था. पूरा जुलूस देवी के मंदिर की परिक्रमा करता था. मंदिर के बाहर चटाइयां बिछाई जाती थीं. पुजारी घड़ों में से निकाल कर आधा ‘बोनम’ चटाई पर निकाल कर रख देता था. फिर लोग जहां ‘बोनम’ पकाते थे, वहां जमा होते थे. वे पुजारी द्वारा वापस किए गए ‘बोनम’ को देवी का प्रसाद समझ कर खाते थे.

हर घर से एक मर्द नहाधो कर, नए कपड़े पहन कर सिर पर पगड़ी बांधता था. वह माथे पर कुमकुम का तिलक लगाता था. वह गले में नीम और फूलों की माला पहनता था. हाथ में नीम की डंडी पकड़ता था और देवी पर बलि चढ़ाने के लिए मुरगे, बकरी और शराब ले जाता था. तब तक देवी के मंदिर के सामने 2 पुजारी अपने हाथ में तलवार ले कर तैयार रहते थे. वहां नीम के पेड़ के नीचे ‘बलिवेदी’ थी. बलि चढ़ाने वाले जानवर का गला ‘बलिवेदी’ पर रख दिया जाता था और जानवर को मजबूती से पकड़ लिया जाता था. पुजारी अपनी तलवार से जानवर का गला काटता था. जानवर की कटी मुंडी देवी की तरफ गिरती थी और वह आदमी जानवर का धड़ वाला हिस्सा ले जाता था. यह सब सिलसिलेवार चलता रहता था. उस समय पुजारी और उन के हाथ की तलवार खून से लथपथ हो जाती थी. मंदिर के सामने खून की धारा बहती रहती थी. वहां का नजारा एकदम डरावना होता था.

उस दिन दुर्गा भी रगड़रगड़ कर नहाया था. उस ने नए कपड़े पहने थे. सिर पर पगड़ी बंधी थी. माथे पर तिलक लगाया था. उस ने 6 महीने से पाले एक बड़े से मुरगे को भी हलदी और कुमकुम लगाया था. उस के हाथ में शराब की एक बोतल भी थी. मंदिर में देवी की जयजयकार हो रही थी. लोग नाचगा रहे थे. शराब का सेवन भी हो रहा था. सुबह से शराब पीतेपीते पुजारी भी नशे में धुत्त थे. उन को सिर्फ ‘बलिवेदी’ पर रखे जानवर के सिर ही दिखाई दे रहे थे. दुर्गा लाइन में खड़ा था. जब उस की बारी आई, तो उस ने मुरगे को ‘बलिवेदी’ पर रखा. पुजारी ने तलवार उठाई. लेकिन यह क्या… मुरगे की गरदन के साथसाथ दुर्गा की गरदन भी काट दी गई. उस का जिस्म कुछ देर तड़प कर शांत हो गया. दुर्गा की ऐसी दर्दनाक मौत देख कर मंदिर में शोर मच गया. पुजारियों का शराब का नशा उतर गया. तलवारें नीचे गिर गईं. वे डर से थरथर कांप रहे थे.

गांव का मुखिया नरसिंह वहां आया. पुलिस बुलाई गई. पंचनामा हुआ. अफसरों की जेबें भर गईं. ‘ऐसा नहीं होना चाहिए था, पर देवी की यही इच्छा थी. हम कुछ नहीं कर सकते. दुर्गा धन्य था, जो देवी की बलि चढ़ गया,’ पंचनामे में ऐसा लिखा गया. नरसिंह ने दस्तखत कर दिए. इस घटना के कुछ दिन बाद नरसिंह ने पुजारी को अपने खेत पर बुलाया और उसे एक महीने के भीतर नया पक्का मकान बना कर दिए. 2 महीने के बाद नरसिंह ने अपनी बेटी मालती की धूमधाम से शादी की. पूरा गांव शादी में आया था. नरसिंह ने अपनी बेटी की शादी में उस पुजारी की पत्नी को 10 तोले सोने का हार दिया और एक चमचमाती कार भी. शादी के समय मालती 3 महीने के पेट से थी. उस के पेट में दुर्गा का अंश पल रहा था. पर चिंता किसे थी, जब देवी की कृपा थी न. Hindi Social Story.

Hindi Social Story: गर जरा बता देतीं- निशा किस बात से डरी-सहमी थी?

Hindi Social Story: ‘‘कुलक्षणी,अभी से जवानी फूट पड़ी… शर्म नहीं आई तुझे  बाप तो चला गया और मेरे ऊपर यह मुसीबत… किस से कहूं  क्या करूं ’’

पड़ोसिन अचला के रोनेचिल्लाने की आवाजें सुन कर मैं ने उन के घर की घंटी बजाई. उन से हमारे बहुत ही अच्छे संबंध थे. दरवाजा खोलते ही मुझे देख कर वे रोते हुए बोलीं, ‘‘कहीं का नहीं छोड़ा इस ने मुझे… पिता तो चल बसे हैं… मेरा तो कुछ खयाल करती  मैं क्या इस के बारे में नहीं सोचती हूं  इसी के लिए तो जी रही हूं.’’

मैं ने पूछा, ‘‘पर हुआ क्या है ’’

‘‘अरे, पेट से है यह,’’ कह वे जोरजोर से रोने लगीं.

मैं भी सुन कर हैरान रह गई. फिर पूछा, ‘‘कैसे  कहां ’’

‘‘इसी से पूछो. मुझे तो कुछ बताती ही नहीं.’’

‘‘आप शांत रहें… मैं इसे अपने घर ले जाती हूं. वहां इस से सब कुछ प्यार से पूछती हूं,’’ कह मैं उसे अपने घर ले गई. निशा डरीसहमी चुपचाप मेरे साथ चल दी. घर आ कर मैं ने उसे अपने साथ खाना खिलाया. जिस तरह से वह बड़ेबड़े निवाले खा रही थी उस से मालूम होता था सुबह से कुछ नहीं खाया है बेचारी ने. जब वह खाना खा चुकी तो मैं ने प्यार से पूछा, ‘‘सचसच बताओ यह किस का काम है  डरो नहीं.’’

उस के मुंह से सिर्फ एक ही शब्द निकला, ‘‘मामा.’’

‘‘क्या यह सच है ’’

वह बोली, ‘‘हां, मामा घर आते रहते थे. कभी चौकलेट लाते, कभी नई ड्रैस, तो कभी घुमाने ले जाते. मैं सोचती थी यह सब उन का लाडप्यार है… फिर एक दिन मां घर में नहीं थीं… और बस… मैं ने उन्हें मना भी किया, पर नहीं माने उलटे बाद में बोले कि मां को मत बताना… वे मर जाएंगी… मैं तुम से माफी मांगता हूं… फिर कभी ऐसा न होगा. यह सुन कर मैं बहुत डर गई और फिर मां को कुछ नहीं बताया,’’ और फिर वह जोरजोर से रोने लगी.

मात्र 13 वर्ष की थी बेचारी. अभी तो जवानी की दहलीज पर कदम ही रखा था. कैसे समझती वह सब, जब 42 वर्षीय मामा न समझा फिर मैं उसे समझाते हुए बोली, ‘‘धैर्य रखो, सब ठीक हो जाएगा… मैं तुम्हारी मां से बात करती हूं… तुम यहीं रहो.’’ फिर जब मैं ने उस के घर जा कर उस की मां अचला को सच बताया तो उन के तो जैसे पैरों तले से जमीन खिसक गई. बोलीं, ‘‘क्या  काश, मेरी अभी मौत हो जाए,’’ और फिर दहाड़ें मार कर रोने लगीं.

मैं उन्हें धैर्य बंधाते हुए बोली, ‘‘चलिए, निशा से बात कीजिए.’’ थोड़ी ही देर बाद निशा अपनी मां की छाती से लग रोते हुए बोली, ‘‘मां, तुम ने बोला तुम देर शाम बाहर मत जाओ, मैं नहीं गई. स्कूल से सीधे घर आओ, मैं आई. दुपट्टा ठीक से लो, मैं ने लिया. महल्ले के लड़कों से मत बोलो, मैं नहीं बोली. पर तुम ने यह कभी नहीं कहा कि मामा, चाचा, फूफा, मौसा आदि से भी दूर रहो. मैं कैसे समझती कि जिन की गोद में खेल कर बड़ी हुई वे ही ऐसा करेंगे  अगर तुम बता देतीं तो यह न होता मां.’’

अचला अपने माथे पर जोर से हाथ मारते हुए बोलीं, ‘‘तुम ठीक कह रही हो बेटी… तुम्हारी कोई गलती नहीं… सब ठीक हो जाएगा… हम कोई उपाय सोचते हैं… तुम डरो नहीं, तुम्हारी मां तुम्हारे साथ है,’’ कह अचला ने मेरी तरफ ऐसे देखा गोया पूछ रही हों कि तुम्हीं बताओ क्या करें. तब मैं ने उन का हाथ थाम कर कहा, ‘‘घबराएं नहीं, यह मेरी भी बच्ची है. मेरी जानपहचान की डाक्टर हैं. सब ठीक हो जाएगा…’’ Hindi Social Story.

Hindi Family Story: अंदाज- बहू रंचना की सूझबूझ की दिलचस्प कहानी

Hindi Family Story: ‘‘जब 6 बजे के करीब मोहित ड्राइंगरूम में पहुंचा तो उस ने अपने परिवार वालों का मूड एक बार फिर से खराब पाया.

अपने सहयोगियों के दबाव में आ कर रंजना ने अपने पति मोहित को फोन किया, ‘‘ये सब लोग कल पार्टी देने की मांग कर रहे हैं. मैं इन्हें क्या जवाब दूं?’’

‘‘मम्मीपापा की इजाजत के बगैर किसी को घर बुलाना ठीक नहीं रहेगा,’’ मोहित की आवाज में परेशानी के भाव साफ झलक रहे थे.

‘‘फिर इन की पार्टी कब होगी?’’

‘‘इस बारे में रात को बैठ कर फैसला करते हैं.’’

‘‘ओ.के.’’

रंजना ने फोन काट कर मोहित का फैसला बताया तो सब उस के पीछे पड़ गए, ‘‘अरे, हम मुफ्त में पार्टी नहीं खाएंगे. बाकायदा गिफ्ट ले कर आएंगे, यार.’’

‘‘अपनी सास से इतना डर कर तू कभी खुश नहीं रह पाएगी,’’ उन लोगों ने जब इस तरह का मजाक करते हुए रंजना की खिंचाई शुरू की तो उसे अजीब सा जोश आ गया. बोली, ‘‘मेरा सिर खाना बंद करो. मेरी बात ध्यान से सुनो. कल रविवार रात 8 बजे सागर रत्ना में तुम सब डिनर के लिए आमंत्रित हो. कोई भी गिफ्ट घर भूल कर न आए.’’ रंजना की इस घोषणा का सब ने तालियां बजा कर स्वागत किया था.

कुछ देर बाद अकेले में संगीता मैडम ने उस से पूछा, ‘‘दावत देने का वादा कर के तुम ने अपनेआप को मुसीबत में तो नहीं फंसा लिया है?’’

‘‘अब जो होगा देखा जाएगा, दीदी,’’ रंजना ने मुसकराते हुए जवाब दिया.

‘‘अगर घर में टैंशन ज्यादा बढ़ती लगे तो मुझे फोन कर देना. मैं सब को पार्टी कैंसल हो जाने की खबर दे दूंगी. कल के दिन बस तुम रोनाधोना बिलकुल मत करना, प्लीज.’’

‘‘जितने आंसू बहाने थे, मैं ने पिछले साल पहली वर्षगांठ पर बहा लिए थे दीदी. आप को तो सब मालूम ही है.’’

‘‘उसी दिन की यादें तो मुझे परेशान कर रही हैं, माई डियर.’’

‘‘आप मेरी चिंता न करें, क्योंकि मैं साल भर में बहुत बदल गई हूं.’’

‘‘सचमुच तुम बहुत बदल गई हो, रंजना? सास की नाराजगी, ससुर की डांट या ननद की दिल को छलनी करने वाली बातों की कल्पना कर के तुम आज कतई परेशान नजर नहीं आ रही हो.’’

‘‘टैंशन, चिंता और डर जैसे रोग अब मैं नहीं पालती हूं, दीदी. कल रात दावत जरूर होगी. आप जीजाजी और बच्चों के साथ वक्त से पहुंच जाना,’’ कह रंजना उन का कंधा प्यार से दबा कर अपनी सीट पर चली गई. रंजना ने बिना इजाजत अपने सहयोगियों को पार्टी देने का फैसला किया है, इस खबर को सुन कर उस की सास गुस्से से फट पड़ीं, ‘‘हम से पूछे बिना ऐसा फैसला करने का तुम्हें कोई हक नहीं है, बहू. अगर यहां के कायदेकानून से नहीं चलना है, तो अपना अलग रहने का बंदोबस्त कर लो.’’

‘‘मम्मी, वे सब बुरी तरह पीछे पड़े थे. आप को बहुत बुरा लग रहा है, तो मैं फोन कर के सब को पार्टी कैंसल करने की खबर कर दूंगी,’’ शांत भाव से जवाब दे कर रंजना उन के सामने से हट कर रसोई में काम करने चली गई. उस की सास ने उसे भलाबुरा कहना जारी रखा तो उन की बेटी महक ने उन्हें डांट दिया, ‘‘मम्मी, जब भाभी अपनी मनमरजी करने पर तुली हुई हैं, तो तुम बेकार में शोर मचा कर अपना और हम सब का दिमाग क्यों खराब कर रही हो? तुम यहां उन्हें डांट रही हो और उधर वे रसोई में गाना गुनगुना रही हैं. अपनी बेइज्जती कराने में तुम्हें क्या मजा आ रहा है?’’ अपनी बेटी की ऐसी गुस्सा बढ़ाने वाली बात सुन कर रंजना की सास का पारा और ज्यादा चढ़ गया और वे देर तक उस के खिलाफ बड़बड़ाती रहीं.

रंजना ने एक भी शब्द मुंह से नहीं निकाला. अपना काम समाप्त कर उस ने खाना मेज पर लगा दिया. ‘‘खाना तैयार है,’’ उस की ऊंची आवाज सुन कर सब डाइनिंगटेबल पर आ तो गए, पर उन के चेहरों पर नाराजगी के भाव साफ नजर आ रहे थे. रंजना ने उस दिन एक फुलका ज्यादा खाया. उस के ससुरजी ने टैंशन खत्म करने के इरादे से हलकाफुलका वार्त्तालाप शुरू करने की कोशिश की तो उन की पत्नी ने उन्हें घूर कर चुप करा दिया. रंजना की खामोशी ने

झगड़े को बढ़ने नहीं दिया. उस की सास को अगर जरा सा मौका मिल जाता तो वे यकीनन भारी क्लेश जरूर करतीं. महक की कड़वी बातों का जवाब उस ने हर बार मुसकराते हुए मीठी आवाज में दिया.

शयनकक्ष में मोहित ने भी अपनी नाराजगी जाहिर की, ‘‘किसी और की न सही पर तुम्हें कोई भी फैसला करने से पहले मेरी इजाजत तो लेनी ही चाहिए थी. मैं कल तुम्हारे साथ पार्टी में शामिल नहीं होऊंगा.’’

‘‘तुम्हारी जैसी मरजी,’’ रंजना ने शरारती मुसकान होंठों पर सजा कर जवाब दिया और फिर एक चुंबन उस के गाल पर अंकित कर बाथरूम में घुस गई. रात ठीक 12 बजे रंजना के मोबाइल के अलार्म से दोनों की नींद टूट गई.

‘‘यह अलार्म क्यों बज रहा है?’’ मोहित ने नाराजगी भरे स्वर में पूछा.

‘‘हैपी मैरिज ऐनिवर्सरी, स्वीट हार्ट,’’ उस के कान के पर होंठों ले जा कर रंजना ने रोमांटिक स्वर में अपने जीवनसाथी को शुभकामनाएं दीं. रंजना के बदन से उठ रही सुगंध और महकती सांसों की गरमाहट ने चंद मिनटों में जादू सा असर किया और फिर अपनी नाराजगी भुला कर मोहित ने उसे अपनी बांहों के मजबूत बंधन में कैद कर लिया. रंजना ने उसे ऐसे मस्त अंदाज में जी भर कर प्यार किया कि पूरी तरह से तृप्त नजर आ रहे मोहित को कहना ही पड़ा, ‘‘आज के लिए एक बेहतरीन तोहफा देने के लिए शुक्रिया, जानेमन.’’

‘‘आज चलोगे न मेरे साथ?’’ रंजना ने प्यार भरे स्वर में पूछा.

‘‘पार्टी में? मोहित ने सारा लाड़प्यार भुला कर माथे में बल डाल लिए.’’

‘‘मैं पार्क में जाने की बात कर रही हूं, जी.’’

‘‘वहां तो मैं जरूर चलूंगा.’’

‘‘आप कितने अच्छे हो,’’ रंजना ने उस से चिपक कर बड़े संतोष भरे अंदाज में आंखें मूंद लीं. रंजना सुबह 6 बजे उठ कर बड़े मन से तैयार हुई. आंखें खुलते ही मोहित ने उसे सजधज कर तैयार देखा तो उस का चेहरा खुशी से खिल उठा.

‘‘यू आर वैरी ब्यूटीफुल,’’ अपने जीवनसाथी के मुंह से ऐसी तारीफ सुन कर रंजना का मन खुशी से नाच उठा. खुद को मस्ती के मूड में आ रहे मोहित की पकड़ से बचाते हुए रंजना हंसती हुई कमरे से बाहर निकल गई.  उस ने पहले किचन में जा कर सब के लिए चाय बनाई, फिर अपने सासससुर के कमरे में गई और दोनों के पैर छू कर आशीर्वाद लिया.  चाय का कप हाथ में पकड़ते हुए उस की सास ने चिढ़े से लहजे में पूछा, ‘‘क्या सुबहसुबह मायके जा रही हो, बहू?’’

‘‘हम तो पार्क जा रहे हैं मम्मी,’’ रंजना ने बड़ी मीठी आवाज में जवाब दिया. सास के बोलने से पहले ही उस के ससुरजी बोल पड़े, ‘‘बिलकुल जाओ, बहू. सुबहसुबह घूमना अच्छा रहता है.’’

‘‘हम जाएं, मम्मी?’’

‘‘किसी काम को करने से पहले तुम ने मेरी इजाजत कब से लेनी शुरू कर दी, बहू?’’ सास नाराजगी जाहिर करने का यह मौका भी नहीं चूकीं.

‘‘आप नाराज न हुआ करो मुझ से, मम्मी. हम जल्दी लौट आएंगे,’’ किसी किशोरी की तरह रंजना अपनी सास के गले लगी और फिर प्रसन्न अंदाज में मुसकराती हुई अपने कमरे की तरफ चली गई. वह मोहित के साथ पार्क गई जहां दोनों के बहुत से साथी सुबह का मजा ले रहे थे. फिर उस की फरमाइश पर मोहित ने उसे गोकुल हलवाई के यहां आलूकचौड़ी का नाश्ता कराया. दोनों की वापसी करीब 2 घंटे बाद हुई. सब के लिए वे आलूकचौड़ी का नाश्ता पैक करा लाए थे. लेकिन यह बात उस की सास और ननद की नाराजगी खत्म कराने में असफल रही थी.

दोनों रंजना से सीधे मुंह बात नहीं कर रही थीं. ससुरजी की आंखों में भी कोई चिंता के भाव साफ पढ़ सकता था. उन्हें अपनी पत्नी और बेटी का व्यवहार जरा भी पसंद नहीं आ रहा था, पर चुप रहना उन की मजबूरी थी. वे अगर रंजना के पक्ष में 1 शब्द भी बोलते, तो मांबेटी दोनों हाथ धो कर उन के पीछे पड़ जातीं. सजीधजी रंजना अपनी मस्ती में दोपहर का भोजन तैयार करने के लिए रसोई में चली आई. महक ने उसे कपड़े बदल आने की सलाह दी तो उस ने इतराते हुए जवाब दिया, ‘‘दीदी, आज तुम्हारे भैया ने मेरी सुंदरता की इतनी ज्यादा तारीफ की है कि अब तो मैं ये कपड़े रात को ही बदलूंगी.’’

‘‘कीमती साड़ी पर दागधब्बे लग जाने की चिंता नहीं है क्या तुम्हें?’’

‘‘ऐसी छोटीमोटी बातों की फिक्र करना अब छोड़ दिया है मैं ने, दीदी.’’

‘‘मेरी समझ से कोई बुद्धिहीन इनसान ही अपना नुकसान होने की चिंता नहीं करता है,’’ महक ने चिढ़ कर व्यंग्य किया.

‘‘मैं बुद्धिहीन तो नहीं पर तुम्हारे भैया के प्रेम में पागल जरूर हूं,’’ हंसती हुई रंजना ने अचानक महक को गले से लगा लिया तो वह भी मुसकराने को मजबूर हो गई. रंजना ने कड़ाही पनीर की सब्जी बाजार से मंगवाई और बाकी सारा खाना घर पर तैयार किया.

‘‘आजकल की लड़कियों को फुजूलखर्ची की बहुत आदत होती है. जो लोग खराब वक्त के लिए पैसा जोड़ कर नहीं रखते हैं, उन्हें एक दिन पछताना पड़ता है, बहू,’’ अपनी सास की ऐसी सलाहों का जवाब रंजना मुसकराते हुए उन की हां में हां मिला कर देती रही. उस दिन उपहार में रंजना को साड़ी और मोहित को कमीज मिली. बदले में उन्होंने महक को उस का मनपसंद सैंट, सास को साड़ी और ससुरजी को स्वैटर भेंट किया. उपहारों की अदलाबदली से घर का माहौल काफी खुशनुमा हो गया था. यह सब को पता था कि सागर रत्ना में औफिस वालों की पार्टी का समय रात 8 बजे का है. जब 6 बजे के करीब मोहित ड्राइंगरूम में पहुंचा तो उस ने अपने परिवार वालों का मूड एक बार फिर से खराब पाया.

‘‘तुम्हें पार्टी में जाना है तो हमारी इजाजत के बगैर जाओ,’’ उस की मां ने उस पर नजर पड़ते ही कठोर लहजे में अपना फैसला सुना दिया.

‘‘आज के दिन क्या हम सब का इकट्ठे घूमने जाना अच्छा नहीं रहता, भैया?’’ महक ने चुभते लहजे में पूछा.

‘‘रंजना ने पार्टी में जाने से इनकार कर दिया है,’’ मोहित के इस जवाब को सुन वे तीनों ही चौंक पड़े.

‘‘क्यों नहीं जाना चाहती है बहू पार्टी में?’’ उस के पिता ने चिंतित स्वर में पूछा.

‘‘उस की जिद है कि अगर आप तीनों साथ नहीं चलोगे तो वह भी नहीं जाएगी.’’

‘‘आजकल ड्रामा करना बड़ी अच्छी तरह से आ गया है उसे,’’ मम्मी ने बुरा सा मुंह बना कर टिप्पणी की. मोहित आंखें मूंद कर चुप बैठ गया. वे तीनों बहस में उलझ गए.

‘‘हमें बहू की बेइज्जती कराने का कोई अधिकार नहीं है. तुम दोनों साथ चलने के लिए फटाफट तैयार हो जाओ वरना मैं इस घर में खाना खाना छोड़ दूंगा,’’ ससुरजी की इस धमकी के बाद ही मांबेटी तैयार होने के लिए उठीं. सभी लोग सही वक्त पर सागर रत्ना पहुंच गए. रंजना के सहयोगियों का स्वागत सभी ने मिलजुल कर किया. पूरे परिवार को यों साथसाथ हंसतेमुसकराते देख कर मेहमान मन ही मन हैरान हो उठे थे.

‘‘कैसे राजी कर लिया तुम ने इन सभी को पार्टी में शामिल होने के लिए?’’ संगीता मैडम ने एकांत में रंजना से अपनी उत्सुकता शांत करने को आखिर पूछ ही लिया. रंजना की आंखों में शरारती मुसकान की चमक उभरी और फिर उस ने धीमे स्वर में जवाब दिया, ‘‘दीदी, मैं आज आप को पिछले 1 साल में अपने अंदर आए बदलाव के बारे में बताती हूं. शादी की पहली सालगिरह के दिन मैं अपनी ससुराल वालों के रूखे व कठोर व्यवहार के कारण बहुत रोई थी, यह बात तो आप भी अच्छी तरह जानती हैं.’’

‘‘उस रात को पलंग पर लेटने के बाद एक बड़ी खास बात मेरी पकड़ में आई थी. मुझे आंसू बहाते देख कर उस दिन कोई मुसकरा तो नहीं रहा था, पर मुझे दुखी और परेशान देख कर मेरी सास और ननद की आंखों में अजीब सी संतुष्टि के भाव कोई भी पढ़ सकता था. ‘‘तब मेरी समझ में यह बात पहली बार आई कि किसी को रुला कर व घर में खास खुशी के मौकों पर क्लेश कर के भी कुछ लोग मन ही मन अच्छा महसूस करते हैं. इस समझ ने मुझे जबरदस्त झटका लगाया और मैं ने उसी रात फैसला कर लिया कि मैं ऐसे लोगों के हाथ की कठपुतली बन अपनी खुशियों व मन की शांति को भविष्य में कभी नष्ट नहीं होने दूंगी. ‘‘खुद से जुड़े लोगों को अब मैं ने 2 श्रेणियों में बांट रखा है. कुछ मुझे प्रसन्न और सुखी देख कर खुश होते हैं, तो कुछ नहीं. दूसरी श्रेणी के लोग मेरा कितना भी अहित करने की कोशिश करें, मैं अब उन से बिलकुल नहीं उलझती हूं.

‘‘औफिस में रितु मुझे जलाने की कितनी भी कोशिश करे, मैं बुरा नहीं मानती. ऐसे ही सुरेंद्र सर की डांट खत्म होते ही मुसकराने लगती हूं.’’

‘‘घर में मेरी सास और ननद अब मुझे गुस्सा दिलाने या रुलाने में सफल नहीं हो पातीं. मोहित से रूठ कर कईकई दिनों तक न बोलना अब अतीत की बात हो गई है. ‘‘जहां मैं पहले आंसू बहाती थी, वहीं अब मुसकराते रहने की कला में पारंगत हो गई हूं. अपनी खुशियों और मन की सुखशांति को अब मैं ने किसी के हाथों गिरवी नहीं रखा हुआ है. ‘‘जो मेरा अहित चाहते हैं, वे मुझे देख कर किलसते हैं और मेरे कुछ किए बिना ही हिसाब बराबर हो जाता है. जो मेरे शुभचिंतक हैं, मेरी खुशी उन की खुशियां बढ़ाने में सहायक होती हैं और यह सब के लिए अच्छा ही है.

‘‘अपने दोनों हाथों में लड्डू लिए मैं खुशी और मस्ती के साथ जी रही हूं, दीदी. मैं ने एक बात और भी नोट की है. मैं खुश रहती हूं तो मुझे नापसंद करने वालों के खुश होने की संभावना भी ज्यादा हो जाती है. मेरी सास और ननद की यहां उपस्थिति इसी कारण है और उन दोनों की मौजूदगी मेरी खुशी को निश्चित रूप से बढ़ा रही है.’’ संगीता मैडम ने प्यार से उस का माथा चूमा और फिर भावुक स्वर में बोलीं, ‘‘तुम सचमुच बहुत समझदार हो गई हो, रंजना. मेरी तो यही कामना है कि तुम जैसी बहू मुझे भी मिले.’’ ‘‘आज के दिन इस से बढिया कौंप्लीमैंट मुझे शायद ही मिले, दीदी. थैंक्यू वैरी मच,’’ भावविभोर हो रंजना उन के गले लग गई. उस की आंखों से छलकने वाले आंसू खुशी के थे. Hindi Family Story.

Hindi Romantic Story: याददाश्त- इंसान को कमजोरी का एहसास कब होता है?

Hindi Romantic Story: कहते हैं आदमी की उम्र बढ़ने के साथसाथ याददाश्त भी कमजोर होने लगती है. शायद कुछ ऐसा ही हो रहा होगा मेरे साथ, तभी तो आजकल अकसर चीजें रख कर भूल जाता हूं. उस दिन चश्मा नहीं मिल रहा था. बस उस के ढूंढ़ने के पीछे क्याक्या हो गया, क्या बताऊं… याददाश्त इतनी कमजोर नहीं थी कि घर भूल जाऊं. पत्नीबच्चों को भूल जाऊं. जैसा कि लोग कहते थे कि यदि भूलने की आदत है तो खानापीना, सोना, घनिष्ठ संबंध क्यों नहीं भूल जाते. अब मैं क्या करूं यदि रोजमर्रा की चीजें भी दिमाग से निकल जाती थीं. तो वहीं ऐसी बहुत सारी छोटीछोटी बातें हैं जो मैं नहीं भूलता था और ऐसी भी बहुत सी चीजें, बातें थीं जो मैं भूल जाता था और बहुत कोशिश करने के बाद भी याद नहीं आती थीं और याद करने की कोशिश में दिमाग लड़खड़ा जाता. खुद पर गुस्सा भी आता. तलाश में घर का कोनाकोना छान मारता. समय नष्ट होता.

खूब हलकान, परेशान होता और जब चीज मिलती तो ऐसी जगह मिलती कि लगता, अरे, यहां रखी थी. हां, यहीं तो रखी थी. पहले भी इस जगह तलाश लिया था, तब क्यों नजर नहीं आई? उफ, यह कैसी आदत है भूलने की. इसे जल्दबाजी कहें, लापरवाही कहें या क्या कहें? अभी इतनी भी उम्र नहीं हुई थी कि याद न रहे. कल बाजार में एक व्यक्ति मिला, जिस ने गर्मजोशी से मुझ से मुलाकात की और वह पिछली बहुत सी बातें करता रहा और मैं यही सोचता रहा कि कौन है यह? मैं उस की हां में हां मिला कर खिसकने का बहाना ढूंढ़ रहा था. मैं यह भी नहीं कह पा रहा था, उस का अपनापन देख कर कि भई माफ करना मैं ने आप को पहचाना नहीं. हालांकि, इतना मैं समझ रहा था कि इधर पांचसात सालों में मेरी इस व्यक्ति से मुलाकात नहीं हुई थी. उस के जाने के बाद मुझे अपनी याददाश्त पर बहुत गुस्सा आया. मैं सोचता रहा, दिमाग पर जोर देता रहा कि आखिर कौन था यह? लेकिन दिमाग कुछ भी नहीं पकड़ पा रहा था.

घर से जब बाहर निकलता तो कुछ न कुछ लाना भूल जाता था. यह भी समझ में आता था कि कुछ भूल रहा हूं लेकिन क्या? यह पकड़ में नहीं आता था. अब मैं कागज पर लिख कर ले जाने लगा था कि क्याक्या खरीदना है बाजार से. इस बार मैं तैयार हो कर घर से बाहर निकला और बाहर निकलते ही ध्यान आया कि चश्मा तो पहना ही नहीं है. घर के अंदर गया तो जहां चश्मा रखता था, वहां चश्मा नहीं था. तो कहां गया चश्मा? इस चक्कर में पूरा घर छान मारा. पत्नी को परेशान कर दिया. उसे उलाहना देते हुए कहा, ‘‘मेरी चीजें जगह पर क्यों नहीं मिलतीं? यहीं तो रखता था चश्मा. कहां गया?’’ पत्नी भी मेरे साथ चश्मा तलाश करने लगी और कहने भी लगी गुस्से में, ‘‘खुद ही कहीं रख कर भूल गए होगे. याद करो, कहां रखा था?’’ ‘‘वहीं रखा था जहां रखता हूं हमेशा.’’ ‘‘तो कहां गया?’’ ‘‘मुझे पता होता, तो तुम से क्यों पूछता?’’ फिर हमारी गरमागरम बहस के साथ हम दोनों ही पूरा घर छानने लगे चश्मे की तलाश में. काफी देर तलाशते रहे. लेकिन चश्मा कहीं नहीं मिल रहा था.

मैं याद करने की कोशिश भी कर रहा था कि मैं ने यदि चश्मे को उस के नियत स्थान से उठाया था तो फिर कहांकहां रख सकता था? जैसे कि मैं ने चश्मा उठाया. उस के कांच साफ किए. फिर गाड़ी की चाबी उठाई. इस बीच, मैं ने आईने के सामने जा कर कंघी की. फिर पानी पिया, फिर… तो मैं सभी संभावित स्थानों पर गया. जैसे ड्रैसिंग टेबल के पास, फ्रिज के पास वगैरह. लेकिन चश्मा नहीं मिला. मैं समझ नहीं पा रहा था कि आखिर चश्मा गया कहां? उसे जमीन खा गई या आसमान निगल गया. याद क्यों नहीं आ रहा है? चश्मे की आदत सी पड़ गई थी. न भी पहनूं तो जेब में रख लेता था बाजार जाते समय. जैसे घड़ी का पहनना होता था. मोबाइल रखना होता था. बहुत जरूरी न होते भी जरूरी होना. न रखने पर लगता था कि जैसे कुछ जरूरी सामान छूट गया हो. खालीखाली सा लगता. आदत की बात है. चश्मा तलाश रहा हूं. पत्नी अपने काम में लगी हुई है. उस ने यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि नहीं मिल रहा तो परेशान मत हो. घर में होगा, मिल जाएगा. बिना चश्मे के बाजार जा सकते हो.

मुझे उस की बात ठीक लगी. लेकिन दिमाग में यही चल रहा था कि आखिर चश्मा कहां रख कर भूल गया. तभी कोचिंग से बेटा घर आया. मेरा चेहरा देख कर समझ गया. उस ने पूछा, ‘‘क्या नहीं मिल रहा, अब?’’ उस की बात पर मुझे गुस्सा आ गया. ‘अब’ लगाने का क्या मतलब हुआ? यही कि मैं हमेशा कुछ न कुछ भूल जाता हूं. अकसर तो भूल जाता हूं, लेकिन हमेशा… यह तो हद हो गई. खुद तो कोचिंग के नाम पर व्यर्थ रुपया खर्च कर रहा है. कोचिंग ही जाना था तो स्कूल की क्या जरूरत थी? फैशन सा हो गया है आजकल कोचिंग जाना. कोचिंग जा कर छात्र साबित करते हैं कि वे बहुत पढ़ाकू हैं. दिनभर स्कूल, फिर कोचिंग. मैं इसे कमजोर दिमाग मानता हूं. जैसे पहले कमजोर को ट्यूशन दी जाती थी. लेकिन अब जमाना बदल गया है. कोचिंग जाने वालों को पढ़ाकू माना जाता है. मैं ने गुस्से से बेटे की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘जा कर अपना काम करो.’’ बेटे तो फिर बेटे ही होते हैं. तुरंत मुंह घुमा कर अंदर चला गया और मैं बिना चश्मे के बाहर निकल गया.

किराना दुकानदार को सामान की लिस्ट दी. वह सामान निकालता रहा. मैं इधरउधर सड़कों पर नजर घुमाता रहा. दुकानदार आधा सामान दुकान के बाहर रखे हुए हैं. तंबाकू खाते हुए मुझे भी थूकने की इच्छा हुई. मैं ने काफी देर पीक को मुंह में रखा और नाली, सड़क का किनारा तलाशता रहा. अंत में मुझे भी सड़क पर ही थूकना पड़ा. दुकानदार ने बिल देते हुए कहा, ‘‘चैक कर लीजिए.’’ मैं ने कहा, ‘‘भाई, आज मैं अपना चश्मा लाना भूल गया.’’ उस ने मेरे चेहरे पर इस तरह दृष्टि डाली जैसे मैं ने शराब पी रखी हो. फिर कहा, ‘‘लगा तो है.’’ मेरा हाथ आंखों पर गया और… अरे, यह तो पहले से ही लगा हुआ था और मैं पूरे घर में तलाश रहा था. लेकिन मुझे समझ क्यों नहीं आया. शायद आदत पड़ जाने पर उस चीज का भार महसूस नहीं होता. पत्नी तो खैर मेरे कहने पर ढूंढ़ने लगी थी. उसे विश्वास था कि नहीं मिल रहा होगा. लेकिन बेटे को तो पता होगा कि चश्मा लगाया हुआ है मैं ने. लेकिन मैं ने कहां बताया था गुस्से में कि चश्मा नहीं मिल रहा है. बताता तो शायद वह बता देता और इतनी मानसिक यंत्रणा न झेलनी पड़ती. न ही दुकानदार के सामने शर्मिंदा होना पड़ता. बच्चों से प्रेम से ही बात करनी चाहिए. वह पूछता.

मैं बताता कि चश्मा नहीं मिल रहा है तो वह बता देता. मांबाप की डांट या गुस्से में बात करने से बच्चे और चिढ़ जाते हैं. नए खून नए मस्तिष्क पर भरोसा करना सीखना चाहिए. उन के बाप ही न बने रहना चाहिए. मित्र भी बन जाना चाहिए जवान होते बच्चों के पिता को. बेटे को पता तो चल ही गया होगा कि चश्मा तलाश रहा था मैं और अब तक उस ने अपनी मां को बता भी दिया होगा कि चश्मा पिताजी पहने हुए थे. दोनों मांबेटे हंस रहे होंगे मुझ पर. अब भविष्य में कोई चीज गुम होने पर शायद उतनी संजीदगी से तलाशने में मदद भी न करें. मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा था कि मुझे समझ में क्यों नहीं आया कि मैं चश्मा लगाए हुए था. अब दिमाग इसी उधेड़बुन में लगा हुआ था कि नियत स्थान से चश्मा उठा कर मैं ने लगाया कब था? तैयार होने के बाद. गाड़ी की चाबी उठाने के बाद या पानी पीने के बाद या इस सब के पहले या उस से भी बहुत पहले. कहीं ऐसा तो नहीं कि सुबह समाचारपत्र पढ़ते समय. यह भी संभव है कि रात में पहन कर ही सो गया था. दिमाग पर काफी जोर डालने के बाद भी पक्का नहीं कर पाया कि चश्मा लगाया कब था और मैं अभी भी उसी सोच में डूबा हुआ था. और यह सोच तब तक नहीं निकलने वाली थी जब तक कोई दूसरी चीज न मिलने पर उस की खोज में दिमाग न उलझे. Hindi Romantic Story.

Hindi Family Story: जारी है सजा- श्रीमती गोयल की गलत आदतों को क्यों सहती थी?

Hindi Family Story:

पूर्व कथा

श्रीमान गोयल की रंगीनमिजाजी के चलते उन के बेटेबहुएं साथ नहीं रहते. पति से बहुत ही लगाव रखती व उन की खूब इज्जत करती श्रीमती गोयल के पास पति की गलत आदतोंबातों को सहने के अलावा चारा न था, जबकि उन के बच्चे पिता की गंदी हरकतों से बेहद क्रोधित रहते थे. उन के अपने बच्चों पर श्रीमान गोयल की छाया न पड़े, इसलिए वे मातापिता से अलग रहते हैं. लेकिन उन में मां की ममता में कोई कमी न थी. वे मां को बराबर पैसे भेजते रहते हैं ताकि उन के पिता, उन की मां को तंग न करें. उधर, श्रीमती गोयल का अपनी नई पड़ोसन शुभा से संपर्क हुआ तो उन्हें लगा कि गैरों में भी अपनत्व होता है.

जबतब दोनों में मुलाकातें होती रहतीं और श्रीमती गोयल उन्हें पति का दुखड़ा सुना कर संतुष्ट हो लेतीं. शुभा के पूछने पर श्रीमती गोयल ने बताया, ‘‘गोयल साहब औरतबाज हैं, इस सीमा तक बेशर्म भी कि बाजारू औरतों के साथ मनाई अपनी रासलीला को चटकारे लेले कर मुझे ही सुनाते रहते हैं,’’ श्रीमती गोयल पति के साथ इस तरह जीती रहीं जैसे पड़ोसी. ऐसा बदचलन पड़ोसी जो जब जी चाहे, दीवार फांद कर आए और उन का इस्तेमाल कर चलता बने.

श्रीमती गोयल सोचती हैं कि शायद ऐसा पति ही उन के जीवन का हिस्सा था, जैसा मिला है उसी को निभाना है. श्रीमती गोयल न जाने कौन सा संताप सहती रहीं जबकि उन का पति क्षणिक मौजमस्ती में मस्त रहा. कुछ भी गलत न करने की कैसी सजा वे भोग रही हैं वहीं, कुकर्म करकर के भी श्रीमान गोयल बिंदास घूम रहे हैं. लेकिन…अब आगे…

ऐयाश बाप को उन के पुत्र इसलिए पैसा देते हैं कि वे घर से बाहर बाहरवालियों पर लुटाएं और मां को तंग न करें. लेकिन जब मां की आंखें हमेशा के लिए बंद हो जाती हैं तब…

गतांक से आगे…

अंतिम भाग

बातों का सिलसिला चल निकलता तो उन का रोना भी जारी रहता और हंसना भी.

‘‘आप के घर का खर्च कैसे चलता है?’’

‘‘मेरे बच्चे मुझे हर महीने खर्च भेजते हैं. बाप को अलग से देते हैं ताकि वे मुझे तंग न करें और जितना चाहें घर से बाहर लुटाएं.’’

मैं स्तब्ध थी. ऐसे दुराचारी पिता को बच्चे पाल रहे हैं और उस की ऐयाशी का खर्च भी दे रहे हैं.

अपने बच्चों के मुंह से निवाला छीन कर कौन इनसान ऐसे बाप का पेट भरता होगा जिस का पेट सुरसा के मुंह की तरह फैलता ही जा रहा है.

‘‘आप लोग इतना सब बरदाश्त कैसे करते हैं?’’

‘‘तो क्या करें हम. बच्चे औलाद होने की सजा भोग रहे हैं और मैं पत्नी होने की. कहां जाएं? किस के पास जा कर रोएं…जब तक मेरी सांस की डोर टूट न जाए, यही हमारी नियति है.’’

मैं श्रीमती गोयल से जबजब मिलती, मेरे मानस पटल पर उन की पीड़ा और गहरी छाप छोड़ती जाती. सच ही तो कह रही थीं श्रीमती गोयल. इनसान रिश्तों की इस लक्ष्मण रेखा से बाहर जाए भी तो कहां? किस के पास जा कर रोए? अपना ही अपना न हो तो इनसान किस के पास जाए और अपनत्व तलाश करे. मेकअप की परत के नीचे वे क्याक्या छिपाए रखने का प्रयास करती हैं, मैं सहज ही समझ सकती थी. जरूरी नहीं है कि जो आंखें नम न हों उन में कोई दर्द न हो, अकसर जो लोग दुनिया के सामने सुखी होने का नाटक करते हैं ज्यादातर वही लोग भीतर से खोखले होते हैं.

इसी तरह कुछ समय बीत गया. मुझ से बात कर वे अपना मन हलका कर लेती थीं.

उन्हीं दिनों एक शादी में शामिल होने को मुझे कुल्लू जाना पड़ा. जाने से पहले श्रीमती गोयल ने मुझे 5 हजार रुपए शाल लाने के लिए दिए थे. मैं और मेरे पति लंबी छुट्टी पर निकल पड़े. लगभग 10 दिन के बाद हम वापस आए.

रात देर से पहुंचे थे इसलिए खाना खाया और सो गए. अगले दिन सुबह उठे तो 10 दिन का छोड़ा घर व्यवस्थित करतेकरते ही शाम हो गई. चलतेफिरते मेरी नजर श्रीमती गोयल के घर पर पड़ जाती तो मन में खयाल आता कि आई क्यों नहीं आंटी. जब हम गए थे तो उन्होंने सफर के लिए गोभी के परांठे साथ बांध दिए थे. गरमगरम चाय और अचार के साथ उन परांठों का स्वाद अभी तक मुंह में है. शाम के बाद रात और फिर दूसरा दिन भी आ गया, मैं ने ही उन की शाल अटैची से निकाली और देने चली गई, लेकिन गेट पर लटका ताला देख मुझे लौटना पड़ा.

अभी वापस आई ही थी कि पति का फोन आ गया, ‘‘शुभा, तुम कहां गई थीं, अभी मैं ने फोन किया था?’’

‘‘हां, मैं थोड़ी देर पहले सामने आंटी को शाल देने गई थी, मगर वे मिलीं नहीं.’’

वे बात करतेकरते तनिक रुक गए थे, फिर धीरे से बोले, ‘‘गोयल आंटी का इंतकाल हुए आज 12 दिन हो गए हैं शुभा, मुझे भी अभी पता चला है.’’

मेरी तो मानो चीख ही निकल गई. फोन के उस तरफ पति बात भी कर रहे थे और डर भी रहे थे.

‘‘शुभा, तुम सुन रही हो न…’’

ढेर सारा आवेग मेरे कंठ को अवरुद्ध कर गया. मेरे हाथ में उन की शाल थी जिसे ले कर मैं क्षण भर पहले ही यह सोच रही थी कि पता नहीं उन्हें पसंद भी आएगी या नहीं.

‘‘वे रात में सोईं और सुबह उठी ही नहीं. लोग तो कहते हैं उन के पति ने ही उन्हें मार डाला है. शहर भर में इसी बात की चर्चा है.’’

धम्म से वहीं बैठ गई मैं, पड़ोस की बीना भी इस समय घर नहीं होगी…किस से बात करूं? किस से पूछूं अपनी सखी के बारे में. भाग कर मैं बाहर गई और एक बार फिर से ताले को खींच कर देखने लगी. तभी उधर से गुजरती हुई एक काम वाली मुझे देख कर रुक गई. बांह पकड़ कर फूटफूट कर रोने लगी. याद आया, यही बाई तो श्रीमती गोयल के घर काम करती थी.

‘‘क्या हुआ था आंटी को?’’ मैं ने हिम्मत कर के पूछा.

‘‘बीबीजी, जिस दिन सुबह आप गईं उसी रात बाबूजी ने सिर में कुछ मार कर बीबीजी को मार डाला. शाम को मैं आई थी बरतन धोने तो बीबीजी उदास सी बैठी थीं. आप के बारे में बात करने लगीं. कह रही थीं, ‘मन नहीं लग रहा शुभा के बिना.’ ’’

आंटी का सुंदर चेहरा मेरी आंखों के सामने कौंध गया. बेचारी तमाम उम्र अपनेआप को सजासंवार कर रखती रहीं. चेहरा संवारती रहीं जिस का अंत इस तरह हुआ. रो पड़ी मैं, सत्या भी जोर से रोने लगी. कोई रिश्ता नहीं था हम तीनों का आपस में. मरने वाली के अपने कहां थे हम. पराए रो रहे थे और अपने ने तो जान ही ले ली थी.

दोपहर को बीना आई तो सीधी मेरे पास चली आई.

‘‘दीदी, आप कब आईं? देखिए न, आप के पीछे कैसा अनर्थ हो गया.’’

रोने लगी थी बीना भी. सदमे में लगभग सारा महल्ला था. पता चला श्रीमान गोयलजी तभी से गायब हैं. डाक्टर बेटा आ कर मां का शव ले गया था. बाकी अंतिम रस्में उसी के घर पर हुईं.

‘‘तुम गई थीं क्या?’’

‘‘हां, अमेरिका वाला बेटा भी आजकल यहीं है. तीनों बेटे इतना बिलख रहे थे कि  क्या बताऊं आप को दीदी. गोयल अंकल ने यह अच्छा नहीं किया. गुल्लू तो कह रहा था कि बाप को फांसी चढ़ाए बिना नहीं मानेगा लेकिन बड़े दोनों भाई उसे समझाबुझा कर शांत करने का प्रयास कर रहे हैं.’’

गुल्लू अमेरिका में जा कर बस जाना ज्यादा बेहतर समझता था, इसीलिए साथ ले जाने को मां के कागजपत्र सब तैयार किए बैठा था. वह नहीं चाहता था कि मां इस गंदगी में रहें. घर का सारा वैभव, सारी सुंदरता इसी गुल्लू की दी हुई थी. सब से छोटा था और मां का लाड़ला भी.

हर सुबह मां से बात करना उस का नियम था. आंटी की बातों में भी गुल्लू का जिक्र ज्यादा होता था.

‘‘तुम चलोगी मेरे साथ बीना, मैं उन के घर जा कर उन से मिलना चाहती हूं.’’

‘‘इसीलिए तो आई हूं. आज तेरहवीं है. शाम 4 बजे उठाला हो जाएगा. आप तैयार रहना.’’

आंखें पोंछती हुई बीना चली गई. दिल जैसे किसी ने मुट्ठी में बांध रखा था मेरा. नाश्ता वैसे ही बना पड़ा था जिसे मैं छू भी नहीं पाई थी. संवेदनशील मन समझ ही नहीं पा रहा था कि आखिर आंटी का कुसूर क्या था, पूरी उम्र जो औरत मेहनत कर बच्चों को पढ़ातीलिखाती रही, पति की मार सहती रही, क्या उसे इसी तरह मरना चाहिए था. ऐसा दर्दनाक अंत उस औरत का, जो अकेली रह कर सब सहती रही.

‘एक आदमी जरा सा नंगा हो रहा हो तो हम उसे किसी तरह ढकने का प्रयास कर सकते हैं शुभा, लेकिन उसे कैसे ढकें जो अपने सारे कपड़े उतार चौराहे पर जा कर बैठ जाए, उसे कहांकहां से ढकें…इस आदमी को मैं कहांकहां से ढांपने की कोशिश करूं, बेटी. मुझे नजर आ रहा है इस का अंत बहुत बुरा होने वाला है. मेरे बेटे सिर्फ इसलिए इसे पैसे देते हैं कि यह मुझे तंग न करे. जिस दिन मुझे कुछ हो गया, इस का अंत हो जाएगा. बच्चे इसे भूखों मार देंगे…बहुत नफरत करते हैं वे अपने पिता से.’

गोयल आंटी के कहे शब्द मेरे कानों में बजने लगे. पुन: मेरी नजर घर पर पड़ी. यह घर भी गोयल साहब कब का बेच देते अगर उन के नाम पर होता. वह तो भला हो आंटी के ससुर का जो मरतेमरते घर की रजिस्ट्री बहू के नाम कर गए थे.

शाम 4 बजे बीना के साथ मैं

डा. विजय गोयल के घर पहुंची. वहां पर भीड़ देख कर लगा मानो सारा शहर ही उमड़ पड़ा हो. अच्छी साख है उन की शहर में. इज्जत के साथसाथ दुआएं भी खूब बटोरी हैं आंटी के उस बेटे ने.

तेरहवीं हो गई. धीरेधीरे सारी भीड़ घट गई. आंटी की शाल मेरे हाथ में कसमसा रही थी. जरा सा एकांत मिला तो बीना ने गुल्लू से मेरा परिचय कराया. गुल्लू धीरे से उठा और मेरे पास आ कर बैठ गया. सहसा मेरा हाथ पकड़ा और अपने हाथ में ले कर चीखचीख कर रोने लगा.

‘‘मैं अपनी मां की रक्षा नहीं कर पाया, शुभाजी. पिछले कुछ हफ्तों से मां की बातों में सिर्फ आप का ही जिक्र रहता था. मां कहती थीं, आप उन्हें बहुत सहारा देती रही हैं. आप वह सब करती रहीं जो हमें करना चाहिए था.’’

‘‘जिस सुबह आप कुल्लू जाने वाली थीं उसी सुबह जब मैं ने मां से बात की तो उन्होंने बताया कि बड़ी घबराहट हो रही है. आप के जाने के बाद वे अकेली पड़ जाएंगी. ऐसा हो जाएगा शायद मां को आभास हो गया था. हमारा बाप ऐसा कर देगा किसी दिन हमें डर तो था लेकिन कर चुका है विश्वास नहीं होता.’’

दोनों बेटे भी मेरे पास सिमट आए थे. तीनों की पत्नियां और पोतेपोतियां भी. रो रही थी मैं भी. डा. विजय हाथ जोड़ रहे थे मेरे सामने.

‘‘आप ने एक बेटी की तरह हमारी मां को सहारा दिया, जो हम नहीं कर पाए वह आप करती रहीं. हम आप का एहसान कभी नहीं भूल सकते.’’

क्या उत्तर था मेरे पास. स्नेह से मैं ने गुल्लू का माथा सहला दिया.

सभी तनिक संभले तो मैं ने वह शाल गुल्लू को थमा दी.

‘‘श्रीमती गोयल ने मुझे 5 हजार रुपए दिए थे. कह रही थीं कि कुल्लू से उन के लिए शाल लेती आऊं. कृपया आप इसे रख लीजिए.’’

पुन: रोने लगा था गुल्लू. क्या कहे वह और क्या कहे परिवार का कोई अन्य सदस्य.

‘‘आप की मां की सजा पूरी हो गई. मां की कमी तो सदा रहेगी आप सब को, लेकिन इस बात का संतोष भी तो है कि वे इस नरक से छूट गईं. उन की तपस्या सफल हुई. वे आप सब को एक चरित्रवान इनसान बना पाईं, यही उन की जीत है. आप अपने पिता को भी माफ कर दें. भूल जाइए उन्हें, उन के किए कर्म ही उन की सजा है. आज के बाद आप उन्हें उन के हाल पर छोड़ दीजिए. समयचक्र कभी क्षमा नहीं करता.’’

‘‘समयचक्र ने हमारी मां को किस कर्म की सजा दी? हमारी मां उस आदमी की इतनी सेवा करती रहीं. उसे खिला कर ही खाती रहीं सदा, उस इनसान का इंतजार करती रहीं, जो उस का कभी हुआ ही नहीं. वे बीमार होती रहीं तो पड़ोसी उन का हालचाल पूछते रहे. भूखी रहतीं तो आप उसे खिलाती रहीं. हमारा बाप सिर पर चोट मारता रहा और दवा आप लगाती रहीं…आप क्या थीं और हम क्या थे. हमारे ही सुख के लिए वे हम से अलग रहीं सारी उम्र और हम क्या करते रहे उन के लिए. एक जरा सा सहारा भी नहीं दे पाए. इंतजार ही करते रहे कि कब वह राक्षस उन्हें मार डाले और हम उठा कर जला दें.’’

गुल्लू का रुदन सब को रुलाए जा रहा था.

‘‘कुछ नहीं दिया कालचक्र ने हमारी मां को. पति भी राक्षस दिया और बेटे भी दानव. बेनाम ही मर गईं बेचारी. कोई उस के काम नहीं आया. किसी ने मेरी मां को नहीं बचाया.’’

‘‘ऐसा मत सोचो बेटा, तुम्हारी मां तो हर पल यही कहती रहीं कि उन के  बेटे ही उन के जीने का सहारा हैं. आप सब भी अपने पिता जैसे निकल जाते तो वे क्या कर लेतीं. आप चरित्रवान हैं, अच्छे हैं, यही उन के जीवन की जीत रही. बेनाम नहीं मरीं आप की मां. आप सब हैं न उन का नाम लेने वाले. शांत हो जाओ. अपना मन मैला मत करो.

‘‘आप की मां आप सब की तरफ से जरा सी भी दुखी नहीं थीं. अपनी बहुओं की भी आभारी थीं वे, अपने पोतेपोतियों के नाम भी सदा उन के होंठों पर होते थे. आप सब ने ही उन्हें इतने सालों तक जिंदा रखा, वे ऐसा ही सोचती थीं और यह सच भी है. ऐसा पति मिलना उन का दुर्भाग्य था लेकिन आप जैसी संतान मिल जाना सौभाग्य भी है न. लेखाजोखा करने बैठो तो सौदा बराबर रहा. प्रकृति ने जो उन के हिस्से में लिखा था वही उन्हें मिल गया. उन्हें जो मिला उस का वे सदा संतोष मनाती थीं. सदा दुआएं देती थीं आप सब को. तुम अपना मन छोटा मत करो… विश्वास करो मेरा…’’

मेरे हाथों को पकड़ पुन: चीखचीख कर रो पड़ा था गुल्लू और पूरा परिवार उस की हालत पर.

समय सब से बड़ा मरहम है. एक बुरे सपने की तरह देर तक श्रीमती गोयल की कहानी रुलाती भी रही और डराती भी रही. कुछ दिनों बाद उन के बेटों ने उस घर को बेच दिया जिस में वे रहती थीं.

श्रीमान गोयल के बारे में भी बीना से पता चलता है. बच्चों ने वास्तव में पिता को माफ कर दिया, क्या करते.

उड़तीउड़ती खबरें मिलती रहीं कि श्रीमान गोयल का दिमाग अब ठीक नहीं रहा. बाहर वालियों ने उन का घर भी बिकवा दिया है. बेघर हो गया है वह पुरुष जिस ने कभी अपने घर को घर नहीं समझा. पता नहीं कहां रहता है वह इनसान जिस का अब न कोई घर है न ठिकाना. अपने बच्चों के मुंह का निवाला जो इनसान वेश्याओं को खिलाता रहा उस का अंत भला और कैसा होता.

एक रात पुन: गली में चीखपुकार हुई. श्रीमान गोयल अपने घर के बाहर खड़े पत्नी को गालियां दे रहे थे. भद्दीगंदी गालियां. दरवाजा जो नहीं खोल रही थीं वे, शायद पागलपन में वे भूल चुके थे कि न यह घर अब उन का है और न ही उन्हें सहन करने वाली पत्नी ही जिंदा है.

चौकीदार ने उन्हें खदेड़ दिया. हर रोज चौकीदार उन्हें दूर तक छोड़ कर आता, लेकिन रोज का यही क्रम महल्ले भर को परेशान करने लगा. बच्चों को खबर की गई तो उन्होंने साफ कह दिया कि वे किसी श्रीमान गोयल को नहीं जानते हैं. कोई जो भी सुलूक चाहे उन के साथ कर सकता है. किसी ने पागलखाने में खबर की. हर रात  का तमाशा सब के लिए असहनीय होता जा रहा था. एक रात गाड़ी आई और उन्हें ले गई. मेरे पति सब देख कर आए थे. मन भर आया था उन का.

‘‘वह आंटीजी कैसे सजासंवार कर रखती थीं इस आदमी को. आज गंदगी का बोरा लग रहा था…बदबू आ रही थी.’’

आंखें भर आईं मेरी. सच ही कहा है कहने वालों ने कि काफी हद तक अपने जीवन के सुख या दुख का निर्धारण मनुष्य अपने ही अच्छेबुरे कर्मों से करता है. श्रीमती गोयल तो अपनी सजा भोग चुकीं, श्रीमान गोयल की सजा अब भी जारी है. Hindi Family Story.

Social Story In Hindi: माफी या सजा- कौन था विशाखा पर हुए एसिड अटैक के पीछे?

Social Story In Hindi: विशाखा और सौरभ एकसाथ कालेज में पढ़ते थे. कालेज के अंतिम वर्ष तक आतेआते उन दोनों की मित्रता बहुत गहरी हो गई थी. विशाखा एक संपन्न परिवार की इकलौती बेटी थी. वह नाजों से पलीबढ़ी. उस के उच्चशिक्षण के लिए उस का दाखिला दूसरे शहर के एक अच्छे कालेज में करा दिया गया. विशाखा का विवाह पहले से ही उस के बाबूजी के मित्र के बेटे के साथ तय हो चुका था. सौरभ विशाखा की विवाह तय होने की बात से भलीभांति परिचित था. एक दिन सौरभ ने विशाखा से कहा कि वह उसे पसंद करता है और विवाह करना चाहता है. विशाखा सौरभ की बातों से बिलकुल सहमत नहीं थीं.

वह असहमति जता कर वहां से चली गई. परीक्षा का अंतिम दिन था. सौरभ ने अंतिम परचे के बाद विशाखा से साथ चलने को कहा. विशाखा अपने मित्र के साथ चलने को सहर्ष ही तैयार हो गई. सौरभ ने विशाखा के सामने एक बार फिर विवाह का प्रस्ताव रखा और कहा कि तुम किसी और से विवाह करो, ठीक नहीं होगा. विशाखा असहमति जताते हुए सौरभ से कुछ कह पाती, इतने में 2 बाइक सवार विशाखा के मुंह पर एसिड फेंक कर भाग गए. उस के बाद सौरभ भी चला गया. विशाखा वहां दर्द और जलन से तड़प रही थी. वहां कोई नहीं था उस की मदद के लिए.

थोड़ी ही देर में सौरभ आया और उसे अस्पताल ले गया. लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. विशाखा हमेशा के लिए अपनी आंखें खो चुकी थी, चेहरा बुरी तरह से ?ालस गया था. विशाखा के पिता के दोस्त, जिन के बेटे से विशाखा की शादी तय हुई थी, सपरिवार आए विशाखा से मिलने. विशाखा को देख कर शादी से इनकार करते हुए बोले, ‘‘हमें कुरूप और अंधी बहू नहीं लेनी, क्षमा करें. उम्रभर हम एक अंधी लड़की की सेवा का भार नहीं उठा सकते.’’ रिश्ता तोड़ कर वे लोग चले गए.

विशाखा के दिल पर गहरी ठेस लगी. लेकिन इधर सौरभ जीजान से विशाखा का हर पल खयाल रखता, उस की मदद करता. विशाखा ठीक हो कर घर वापस आ गई. एक सवाल उसे अभी भी कचोट रहा था कि उस पर एसिड किन लड़कों ने और क्यों फेंका और पुलिस कंपलेन के बावजूद वे अभी तक पकड़े क्यों नहीं गए? विशाखा के पिता ने उस के इलाज में कोई कसर नहीं छोड़ी. लेकिन न तो उस का चेहरा पूरी तरह ठीक करवा सके, न ही उस की आंखें ला सके. डाक्टर के अनुसार, अब विशाखा जीवनभर नेत्रहीन रहेगी. ऐसे में सौरभ शादी का प्रस्ताव रखता है तो विशाखा के पिता हां कर देते हैं. लेकिन विशाखा सौरभ से कहती है, ‘‘सौरभ, अब तुम मुझे से क्यों शादी करना चाहते हो, न तो वह सूरत रही अब मेरी और उस पर आंखें भी नहीं रहीं. तुम पर बोझ बन जाऊंगी, इसलिए तुम कोई और लड़की ढूंढ़ लो अपने लिए.

’’ लेकिन सौरभ कहता है कि वह उसी से प्यार करता है और सदा करता रहेगा. दोनों की शादी तय हो गई. विशाखा ने बिना आंखों के जीवन जीना तो सीख लिया लेकिन इस के साथ ही उस ने एक संगठन तैयार किया जो इस तरह की एसिड पीडि़त लड़कियों को इंसाफ दिलवाए. विशाखा ने एक बहुत बड़ा एसिड अटैक विक्टिम नामक कैफे खोला, जहां केवल एसिड पीडि़त लड़कियां ही काम करतीं. वे एकदूसरे का संबल बनतीं और साथ में हंसतींखेलतीं, खुश रहतीं. सब अपनेअपने गमों को भूल जातीं. विशाखा की शादी को अभी थोड़ा ही समय बीता था कि एक दिन सौरभ, ‘‘विशाखा, मुझे तुम से माफी मांगनी है.’’ ‘‘माफी किस बात की, सौरभ, माफी के काबिल तो मैं हूं, जो तुम्हारे प्यार को पहचान नहीं पाई.

तुम मुझे से इतना प्यार करते हो कि मुझे कुरूप और अंधी को भी अपना जीवनसाथी बनाया.’’ ‘‘हां विशाखा, मैं तुम से प्यार बहुत करता था और जीवनसाथी प्रायश्चित्त करने के लिए बनाया.’’ ‘‘प्रायश्चित्त? कैसा प्रायश्चित्त, सौरभ?’’ विशाखा हैरानी से पूछती है. ‘‘विशाखा, जब तुम ने मुझे से शादी करने से इनकार किया तो मुझे अपना अपमान महसूस हुआ और बदला लेने के लिए मैं ने ही तुम पर एसिड फिंकवाया था. जब मैं ने तुम्हें तड़पता हुआ देखा तो मुझे सुकून महसूस हुआ लेकिन न जाने थोड़ी ही देर में मेरे दिल ने फिर तुम्हारे प्रति वह प्यार जगा दिया और मैं तुम्हें अस्पताल ले गया.

उस प्यार ने मुझे प्रायश्चित्त करने पर विवश कर दिया. इसलिए मैं ने शादी का प्रस्ताव रखा और तुम मान गईं. लेकिन उस अपराध की ग्लानि अभी तक मेरे मन में है, इसलिए मैं अपना अपराध कुबूल करता हूं.’’ सौरभ की बातें सुन कर विशाखा पर घड़ों पानी पड़ गया. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह सौरभ को माफ करे या उसे सजा दे. Social Story In Hindi.

Family Story In Hindi: सौतेली मां- क्या दूसरी मां को अपना पाए बच्चे?

Family Story In Hindi: मां की मौत के बाद ऋजुता ही अनुष्का का सब से बड़ा सहारा थी. अनुष्का को क्या करना है, यह ऋजुता ही तय करती थी. वही तय करती थी कि अनुष्का को क्या पहनना है, किस के साथ खेलना है, कब सोना है. दोनों की उम्र में 10 साल का अंतर था. मां की मौत के बाद ऋजुता ने मां की तरह अनुष्का को ही नहीं संभाला, बल्कि घर की पूरी जिम्मेदारी वही संभालती थी.

ऋजुआ तो मनु का भी उसी तरह खयाल रखना चाहती थी, पर मनु उम्र में मात्र उस से ढाई साल छोटा था. इसलिए वह ऋजुता को अभिभावक के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं था. तमाम बातों में उन दोनों में मतभेद रहता था. कई बार तो उन का झगड़ा मौखिक न रह कर हिंसक हो उठता था. तब अंगूठा चूसने की आदत छोड़ चुकी अनुष्का तुरंत अंगूठा मुंह में डाल लेती. कोने में खड़ी हो कर वह देखती कि भाई और बहन में कौन जीतता है.

कुछ भी हो, तीनों भाईबहनों में पटती खूब थी. बड़ों की दुनिया से अलग रह सकें, उन्होंने अपने आसपास इस तरह की एक दीवार खड़ी कर ली थी, जहां निश्चित रूप से ऋजुता का राज चलता था. मनु कभीकभार विरोध करता तो मात्र अपना अस्तित्व भर जाहिर करने के लिए.

अनुष्का की कोई ऐसी इच्छा नहीं होती थी. वह बड़ी बहन के संरक्षण में एक तरह का सुख और सुरक्षा की भावना का अनुभव करती थी. वह सुंदर थी, इसलिए ऋजुता को बहुत प्यारी लगती थी. यह बात वह कह भी देती थी. अनुष्का की अपनी कोई इच्छाअनिच्छा होगी, ऋजुता को कभी इस बात का खयाल नहीं आया.

अगर अविनाश को दूसरी शादी न करनी होती तो घर में सबकुछ इसी तरह चलता रहता. घर में दादी मां यानी अविनाश की मां थीं ही, इसलिए बच्चों को मां की कमी उतनी नहीं खल रही थी. घर के संचालन के लिए या बच्चों की देखभाल के लिए अविनाश का दूसरी शादी करना जरूरी नहीं रह गया था.

इस के बावजूद उस ने घर में बिना किसी को बताए दूसरी शादी कर ली. अचानक एक दिन शाम को एक महिला के साथ घर आ कर उस ने कहा, ‘‘तुम लोगों की नई मम्मी.’’

उस महिला को देख कर बच्चे स्तब्ध रह गए. वे कुछ कहते या इस नई परिस्थिति को समझ पाते, उस के पहले ही अविनाश ने मां की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘संविधा, यह मेरी मां है.’’

बूढ़ी मां ने सिर झुका कर पैर छू रही संविधा के सिर पर हाथ तो रखा, पर वह कहे बिना नहीं रह सकीं. उन्होंने कहा, ‘‘बेटा, इस तरह अचानक… कभी सांस तक नहीं ली, चर्चा की होती तो 2-4 सगेसंबंधी बुला लेती.’’

‘‘बेकार का झंझट करने की क्या जरूरत है मां.’’ अविनाश ने लापरवाही से कहा.

‘‘फिर भी कम से कम मुझ से तो बताना चाहिए था.’’

‘‘क्या फर्क पड़ता है,’’ अविनाश ने उसी तरह लापरवाही से कहा, ‘‘नोटिस तो पहले ही दे दी थी. आज दोपहर को दस्तखत कर दिए. संविधा का यहां कोई सगासंबंधी नहीं है. एक भाई है, वह दुबई में रहता है. रात को फोन कर के बता देंगे. बेटा ऋजुता, मम्मी को अपना घर तो दिखाओ.’’

उस समय क्या करना चाहिए, यह ऋजुता तुरंत तय नहीं कर सकी. इसलिए उस समय अविनाश की जीत हुई. घर में जैसे कुछ खास न हुआ हो, अखबार ले कर सोफे पर बैठते हुए उस ने मां से पूछा, ‘‘मां, किसी का फोन या डाकवाक तो नहीं आई, कोई मिलनेजुलने वाला तो नहीं आया?’’

संविधा जरा भी नरवस नहीं थी. अविनाश ने जब उस से कहा कि हमारी शादी हम दोनों का व्यक्तिगत मामला है. इस से किसी का कोई कुछ लेनादेना नहीं है. तब संविधा उस की निडरता पर आश्चर्यचकित हुई थी. उस ने अविनाश से शादी के लिए तुरंत हामी भर दी थी. वैसे भी अविनाश ने उस से कुछ नहीं छिपाया था. उस ने पहले ही अपने बच्चों और मां के बारे में बता दिया था. पर इस तरह बिना किसी तैयारी के नए घर में, नए लोगों के बीच…

‘‘चलो,’’ ऋजुता ने बेरुखी से कहा.

संविधा उस के साथ चल पड़ी. उसे पता था कि विधुर के साथ शादी करने पर रिसैप्शन या हनीमून पर नहीं जाया जाता, पर घर में तो स्वागत होगा ही. जबकि वहां ऐसा कुछ भी नहीं था. अविनाश निश्चिंत हो कर अखबार पढ़ने लगा था. वहीं यह 17-18 साल की लड़की घर की मालकिन की तरह एक अनचाहे मेहमान को घर दिखा रही थी. घर के सब से ठीकठाक कमरे में पहुंच कर ऋजुता ने कहा, ‘‘यह पापा का कमरा है.’’

‘‘यहां थोड़ा बैठ जाऊं?’’ संविधा ने कहा.

‘‘आप जानो, आप का सामान कहां है?’’ ऋजुता ने पूछा.

‘‘बाद में ले आऊंगी. अभी तो ऐसे ही…’’

‘‘खैर, आप जानो.’’ कह कर ऋजुता चली गई.

पूरा घर अंधकार से घिर गया तो ऋजुता ने फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘मनु, तू जाग रहा है?’’

‘‘हां,’’ मनु ने कहा, ‘‘दीदी, अब हमें क्या करना चाहिए?’’

‘‘हमें भाग जाना चाहिए.’’ ऋजुता ने कहा.

‘‘कहां, पर अनुष्का तो अभी बहुत छोटी है. यह बेचारी तो कुछ समझी भी नहीं.’’

‘‘सब समझ रही हूं,’’ अनुष्का ने धीरे से कहा.

‘‘अरे तू जाग गई?’’ हैरानी से ऋजुता ने पूछा.

‘‘मैं अभी सोई ही कहां थी,’’ अनुष्का ने कहा और उठ कर ऋजुता के पास आ गई. ऋजुता उस की पीठ पर हाथ फेरने लगी. हाथ फेरते हुए अनजाने में ही उस की आंखों में आंसू आ गए. भर्राई आवाज में उस ने कहा, ‘‘अनुष्का, तू मेरी प्यारी बहन है न?’’

‘‘हां, क्यों?’’

‘‘देख, वह जो आई है न, उसे मम्मी नहीं कहना. उस से बात भी नहीं करनी. यही नहीं, उस की ओर देखना भी नहीं है.’’ ऋजुता ने कहा.

‘‘क्यों?’’ अनुष्का ने पूछा.

‘‘वह अपनी मम्मी थोड़े ही है. वह कोई अच्छी औरत नहीं है. वह हम सभी को धोखा दे कर अपने घर में घुस आई है.’’

‘‘चलो, उसे मार कर घर से भगा देते हैं,’’ मनु ने कहा.

‘‘मनु, तुझे अक्ल है या नहीं? अगर हम उसे मारेंगे तो पापा हम से बात नहीं करेंगे.’’

‘‘भले न करें बात, पर हम उसे मारेंगे.’’

‘‘ऐसा नहीं कहते मनु, पापा उसे ब्याह कर लाए हैं.’’

‘‘तो फिर क्या करें?’’ मनु ने कहा, ‘‘मुझे वह जरा भी अच्छी नहीं लगती.’’

‘‘मुझे भी. अनुष्का तुझे?’’

‘‘मुझे भी अच्छी नहीं लगती.’’ अनुष्का ने कहा.

‘‘बस, तो फिर हम सब उस से बात नहीं करेंगे.’’

‘‘पापा कहेंगे, तब भी?’’ मनु और अनुष्का ने एक साथ पूछा.

‘‘हां, तब भी बात नहीं करेंगे. उसे देख कर हंसना भी नहीं है, न ही उसे कुछ देना है. उस से कुछ मांगना भी नहीं है. यही नहीं, उस की ओर देखना भी नहीं है. समझ गए न?’’

‘‘हां, समझ गए.’’ मनु और अनुष्का ने एक साथ कहा, ‘‘पर दादी मां कहेंगी कि उसे बुलाओ तो…’’

‘‘तब देखा जाएगा. दोनों ध्यान रखना, हमें उस से बिलकुल बात नहीं करनी है.’’

‘‘पापा, इसे क्यों ले आए?’’ मासूम अनुष्का ने पूछा.

‘‘पता नहीं.’’ ऋजुता ने लापरवाही से कहा.

‘‘दीदी, एक बात कहूं, मुझे तो अब पापा भी अच्छे नहीं लगते.’’

‘‘मुझे भी,’’ मनु ने कहा. मनु ने यह बात कही जरूर, पर उसे पापा अच्छे लगते थे. वह उस से बहुत प्यार करते थे. उस की हर इच्छा पूरी करते थे. पर दोनों बहनें कह रही थीं, इसलिए उस ने भी कह दिया. इतना ही नहीं, उस ने आगे भी कहा, ‘‘दीदी, अब यहां रहने का मन नहीं होता.’’

‘‘फिर भी रहना तो पड़ेगा ही. अच्छा, चलो अब सो जाओ.’’

‘‘मैं तुम्हारे पास सो जाऊं दीदी?’’ अनुष्का ने पूछा.

‘‘लात तो नहीं मारेगी?’’

‘‘नहीं मारूंगी.’’ कह कर वह ऋजुता का हाथ पकड़ कर क्षण भर में सो गई.

ऋजुता को अनुष्का का इस तरह सो जाना अच्छा नहीं लगा. घर में इतनी बड़ी घटना घटी है, फिर भी यह इस तरह निश्चिंत हो कर सो गई. कुछ भी हो, 17-18 साल की एक लड़की पूरी रात तो नहीं जाग सकती थी. वह भी थोड़ी देर में सो गई.

सुबह वह सो कर उठी तो पिछले दिन का सब कुछ याद आ गया. उस ने अनुष्का को जगाया, ‘‘कल रात जैसा कहा था, वैसा ही करना.’’

‘‘उस से बात नहीं करना न?’’ अनुष्का ने कहा.

‘‘किस से?’’

‘‘अरे वही, जिसे पापा ले आए हैं, नई मम्मी. भूल गई क्या? दीदी, उस का नाम क्या है?’’

‘‘संविधा. पर हमें उस के नाम का क्या करना है. हमें उस से बात नहीं करनी है बस. याद रहेगा न?’’ ऋजुता ने कहा.

‘‘अरे हां, हंसना भी नहीं है.’’

‘‘ठीक है.’’

इस के बाद ऋजुता ने मनु को भी समझा दिया कि नई मम्मी से बात नहीं करेगा. जबकि वह समझदार था और खुद भी उस से चिढ़ा हुआ था. इसलिए तय था कि वह भी संविधा से बात नहीं करेगा. विघ्न आया दादी की ओर से. चायनाश्ते के समय वह बच्चों का व्यवहार देख कर सब समझ गईं. अकेली पड़ने पर वह ऋजुता से कहने लगीं, ‘‘बेटा, अब तो वह घर आ ही गई है. उस के प्रति अगर इस तरह की बात सोचोगी, तो कैसे चलेगा. अविनाश को पता चलेगा तो वह चिढ़ जाएगा.’’

‘‘कोई बात नहीं दादी,’’ पीछे खड़े मनु ने कहा.

‘‘बेटा, तू तो समझदार है. आखिर बात करने में क्या जाता है.’’

दादी की इस बात का जवाब देने के बजाए ऋजुता ने पूछा, ‘‘दादी, आप को पता था कि पापा शादी कर के नई पत्नी ला रहे हैं?’’

‘‘नहीं, जब बताया ही नहीं तो कैसे पता चलता.’’

‘‘इस तरह शादी कर के नई पत्नी लाना आप को अच्छा लगा?’’

‘‘अच्छा तो नहीं लगा, पर कर ही क्या सकते हैं. वह उसे शादी कर के लाए हैं, इसलिए अब साथ रहना ही होगा. तुम सब बचपना कर सकते हो, पर मुझे तो बातचीत करनी ही होगी.’’ दादी ने समझाया.

‘‘क्यों?’’ ऋजुता ने पूछा.

‘‘बेटा, इस तरह घरपरिवार नहीं चलता.’’

‘‘पर दादी, हम लोग तो उस से बात नहीं करेंगे.’’

‘‘ऋजुता, तू बड़ी है. जरा सोच, इस बात का पता अविनाश को चलेगा तो उसे दुख नहीं होगा.’’ दादी ने समझाया.

‘‘इस में हम क्या करें. पापा ने हम सब के बारे में सोचा क्या? दादी, वह मुझे बिलकुल अच्छी नहीं लगती. हम उस से बिलकुल बात नहीं करेंगे. पापा कहेंगे, तब भी नहीं.’’ ऋजुता ने कहा. उस की इस बात में मनु ने भी हां में हां मिलाई.

‘‘बेटा, तू बड़ी हो गई है, समझदार भी.’’

‘‘तो क्या हुआ?’’

‘‘बिलकुल नहीं करेगी बात?’’ दादी ने फिर पूछा. इसी के साथ वहां खड़ी अनुष्का से भी पूछा, ‘‘तू भी बात नहीं करेगी अनुष्का?’’

अनुष्का घबरा गई. उसे प्यारी बच्ची होना अच्छा लगता था. अब तक उसे यही सिखाया गया था कि जो बड़े कहें, वही करना चाहिए. ऋजुता ने तो मना किया था, अब क्या किया जाए? वह अंगूठा मुंह में डालना चाहती थी, तभी उसे याद आ गया कि वह क्या जवाब दे. उस ने झट से कहा, ‘‘दीदी कहेंगी तो बात करूंगी.’’

अनुष्का सोच रही थी कि यह सुन कर ऋजुता खुश हो जाएगी. पर खुश होने के बजाए ऋजुता ने आंखें दिखाईं तो अनुष्का हड़बड़ा गई. उस हड़बड़ाहट में उसे रात की बात याद आ गई. उस ने कहा, ‘‘बात की छोड़ो, हंसना भी मना है. अगर कुछ देती है तो लेना भी नहीं है. वह मुझे ही नहीं मनु भैया को भी अच्छी नहीं लगती. और ऋजुता दीदी को भी, है न मनु भैया?’’

‘‘हां, दादी मां, हम लोग उस से बात नहीं करेंगे.’’ मनु ने कहा.

‘‘जैसी तुम लोगों की इच्छा. तुम लोग जानो और अविनाश जाने.’’

पर जैसा सोचा था, वैसा हुआ नहीं. बच्चों के मन में क्या है, इस बात से अनजान अविनाश औफिस चले गए. जातेजाते संविधा से कहा था कि वह चिंता न करे, जल्दी ही सब ठीक हो जाएगा.

संविधा ने औफिस से 2 दिनों की छुट्टी ले रखी थी. नया घर, जिस में 3 बच्चों के मौन का बोझ उसे असह्य लगने लगा. उसे लगा, उस ने छुट्टी न ली होती, तो अच्छा रहता.   अविनाश के साथ वह भी अपने औफिस चली गई होती.

अविनाश उसे अच्छा तो लग रहा था, पर 40 की उम्र में ब्याह करना उसे खलने लगा था. बालबच्चों वाला एक परिवार…साथ में बड़ों की छत्रछाया और एक समझदार आदमी का जिंदगी भर का साथ…उस ने हामी भर दी और इस अनजान घर में आ गई. पहले से परिचय की क्या जरूरत है, अविनाश ने मना कर दिया था.

उस ने कहा था, ‘‘जानती हो संविधा, अचानक आक्रमण से विजय मिलती है. अगर पहले से बात करेंगे तो रुकावटें आ सकती हैं. बच्चे भी पूर्वाग्रह में बंध जाएंगे. तुम एक बार किसी से मिलो और उसे अच्छी न लगो, ऐसा नहीं हो सकता. यह अलग बात है कि तुम्हें मेरे बच्चे न अच्छे लगें.’’

तब संविधा ने खुश हो कर कहा था, ‘‘तुम्हारे बच्चे तो अच्छे लगेंगे ही.’’

‘‘बस, बात खत्म हो गई. अब शादी कर लेते हैं.’’ अविनाश ने कहा.

फिर दोनों ने शादी कर ली.

संविधा ने पहला दिन तो अपना सामान लाने और उसे रखने में बिता दिया था पर चैन नहीं पड़ रहा था. बच्चे सचमुच बहुत सुंदर थे, पर उस से बिलकुल बात नहीं कर रहे थे. चौकलेट भी नहीं ली थी. बड़ी बेटी ने स्थिर नजरों से देखते हुए कहा था, ‘‘मेरे दांत खराब हैं.’’

संविधा ढीली पड़ गई थी. अविनाश से शिकायत करने का कोई मतलब नहीं था. वह बच्चों से बात करने के लिए कह सकता है. बच्चे बात तो करेंगे, पर उन के मन में सम्मान के बजाए उपेक्षा ज्यादा होगी. ऐसे में कुछ दिनों इंतजार कर लेना ज्यादा ठीक रहेगा. पर बाद में भी ऐसा ही रहा तो? छोड़ कर चली जाएगी.

रोजाना कितने तलाक होते हैं, एक और सही. अविनाश अपनी बूढ़ी मां और बच्चों को छोड़ कर उस के साथ तो रहने नहीं जा सकता. आखिर उस का भी तो कुछ फर्ज बनता है. ऐसा करना उस के लिए उचित भी नहीं होगा. पर उस का क्या, वह क्या करे, उस की समझ में नहीं आ रहा था. वह बच्चों के लिए ही तो आई थी. अब बच्चे ही उस के नहीं हो रहे तो यहां वह कैसे रह पाएगी.

दूसरा दिन किस्सेकहानियों की किताबें पढ़ कर काटा. मांजी से थोड़ी बातचीत हुई. पर बच्चों ने तो उस की ओर ताका तक नहीं. फिर भी उसे लगा, सब ठीक हो जाएगा. पर ठीक हुआ नहीं. पूरे दिन संविधा को यही लगता रहा कि उस ने बहुत बड़ी गलती कर डाली है. ऐसी गलती, जो अब सुधर नहीं सकती. इस एक गलती को सुधारने में दूसरी कई गलतियां हो सकती हैं.

दूसरी ओर बच्चे अपनी जिद पर अड़े थे. जैसेजैसे दिन बीतते गए, संविधा का मन बैठने लगा. अब तो उस ने बच्चों को मनाने की निरर्थक चेष्टा भी छोड़ दी थी. उसे लगने लगा कि कुछ दिनों के लिए वह भाई के पास आस्ट्रेलिया चली जाए. पर वहां जाने से क्या होगा? अब रहना तो यहीं है. कहने को सब ठीक है, पर देखा तो बच्चों की वजह से कुछ भी ठीक नहीं है. फिर भी इस आस में दिन बीत ही रहे थे. कभी न कभी तो सब ठीक हो ही जाएगा.

उस दिन शाम को अविनाश को देर से आना था. उदास मन से संविधा गैलरी में आ कर बैठ गई. अभी अचानक उस का मन रेलिंग पर सिर रख कर खूब रोने का हुआ. कितनी देर हो गई उसे याद ही नहीं रहा. अचानक उस के बगल से आवाज आई, ‘‘आप रोइए मत.’’

संविधा ने चौंक कर देखा तो अनुष्का खड़ी थी. उस ने हाथ में थामा चाय का प्याला रखते हुए कहा, ‘‘रोइए मत, इसे पी लीजिए.’’

ममता से अभिभूत हो कर संविधा ने अनुष्का को खींच कर गोद में बैठा कर सीने से लगा लिया. इस के बाद उस के गोरे चिकने गालों को चूम कर वह सोचने लगी, ‘अब मैं मर भी जाऊं तो चिंता नहीं है.’

तभी अनुष्का ने संविधा के सिर पर हाथ रख कर सहलाते हुए कहा, ‘‘मैं तुम्हारी मम्मी ही तो हूं, इसलिए तुम मम्मी कह सकती हो.’’

‘‘पर दीदी ने मना किया था,’’ सकुचाते हुए अनुष्का ने कहा.

‘‘क्यों?’’ मन का बोझ झटकते हुए संविधा ने पूछा.

‘‘दीदी, आप से और पापा से नाराज हैं.’’

‘‘क्यों?’’ संविधा ने फिर वही दोहराया.

‘‘पता नहीं.’’

‘‘तुम मान गई न, अब दीदी को भी मैं मना लूंगी.’’ खुद को संभालते हुए बड़े ही आत्मविश्वास के साथ संविधा ने कहा.

संविधा की आंखों में झांकते हुए अनुष्का ने कहा, ‘‘अब मैं जाऊं?’’

‘‘ठीक है, जाओ.’’ संविधा ने प्यार से कहा.

‘‘अब आप रोओगी तो नहीं?’’ अनुष्का ने पूछा.

‘‘नहीं, तुम जैसी प्यारी बेटी को पा कर भला कोई कैसे रोएगा.’’

छोटेछोटे पग भरती अनुष्का चली गई. नन्हीं अनुष्का को बेवफाई का मतलब भले ही पता नहीं था, पर उस के मन में एक बोझ सा जरूर था. उस ने बहन से वादा जो किया था कि वह दूसरी मां से बात नहीं करेगी. पर संविधा को रोती देख कर वह खुद को रोक नहीं पाई और बड़ी बहन से किए वादे को भूल कर दूसरी मां के आंसू पोंछने पहुंच गई.

जाते हुए अनुष्का बारबार पलट कर संविधा को देख रही थी. शायद बड़ी बहन से की गई बेवफाई का बोझ वह सहन नहीं कर पा रही थी. इसलिए उस के कदम आगे नहीं बढ़ रहे थे. Family Story In Hindi.

Family Story In Hindi: पान खाए सैयां हमारो- शादी के लिए न करती युवती की कहानी

Family Story In Hindi: शाम के 6 बजे जब सब 1-1 कर घर जाने के लिए अपनाअपना बैग समेटने लगे तो सिया ने चोरी से एक नजर अनिल पर डाली. औफिस में नया आया सब से हैंडसम, स्मार्ट, खुशमिजाज अनिल उसे देखते ही पसंद आ गया था. वह मन ही मन उस के प्रति आकर्षित थी.

अनिल ने भी एक नजर उस पर डाली तो वह मुसकरा दी. दोनों अपनीअपनी चेयर से लगभग साथ ही उठे. लिफ्ट तक भी साथ ही गए. 2-3 लोग और भी उन के साथ बातें करते लिफ्ट में आए. आम सी बातों के दौरान सिया ने भी नोट किया कि अनिल भी उस पर चोरीचोरी नजर डाल रहा है.

बाहर निकल कर सिया रिकशे की तरफ जाने लगी तो अनिल ने कहा, ‘‘सिया, कहां जाना है आप को मैं छोड़ दूं?’’‘‘नो थैंक्स, मैं रिकशा ले लूंगी.’’‘‘अरे, आओ न, साथ चलते हैं.’’‘‘अच्छा, ठीक है.’’

अनिल ने अपनी बाइक स्टार्ट की, तो सिया उस के पीछे बैठ गई. अनिल से आती परफ्यूम की खुशबू सिया को भा रही थी. दोनों को एकदूसरे का स्पर्श रोमांचित कर गया. बनारस में इस औफिस में दोनों ही नए थे. सिया की नियुक्ति पहले हुई थी.

अचानक सड़क के किनारे होते हुए अनिल ने ब्रेक लगाए तो सिया चौंकी, ‘‘क्या हुआ?’’‘‘कुछ नहीं,’’ कहते हुए अनिल ने अपनी पैंट की जेब से गुटका निकाला और बड़े स्टाइल से मुंह में डालते हुए मुसकराया.‘‘यह क्या?’’ सिया को एक झटका सा लगा.‘‘मेरा फैवरिट पानमसाला.’’‘‘तुम्हें इस की आदत है?’’

‘‘हां, और यह मेरी स्टाइलिश आदत है, है न?’’ फिर सिया के माथे पर शिकन देख कर पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’‘‘तुम्हें इन सब चीजों का शौक है?’’‘‘हां, पर क्या हुआ?’’‘‘नहीं, कुछ नहीं,’’ कह कर वह चुप रही तो अनिल ने फिर बाइक स्टार्ट कर ली.धीरेधीरे यह रोज का क्रम बन गया. घर से आते हुए सिया रिकशे में आती, औफिस से वापस जाते समय अनिल उसे उस के घर से थोड़ी दूर उतार देता. धीरेधीरे दोनों एकदूसरे से खुलते गए.

अनिल का सिया के प्रति आकर्षण बढ़ता गया. मौडर्न, सुंदर, स्मार्ट सिया को वह अपने भावी जीवनसाथी के रूप में देखने लगा था. कुछ ऐसा ही सिया भी सोचने लगी थी. दोनों को विश्वास था कि उन के घर वाले उन की पसंद को पसंद करेंगे.

अनिल तो सिया के साथ अपना जीवन आगे बढ़ाने के लिए शतप्रतिशत तय कर चुका था पर सिया एक पौइंट पर आ कर रुक जाती थी. अनिल की लगातार मुंह में गुटका दबाए रखने की आदत पर वह जलभुन जाती थी. कई बार उस ने इस से होने वाली बीमारियों के बारे में चेतावनी भी दी तो अनिल ने बात हंसी में उड़ा दी, ‘‘यह क्या तुम बुजुर्गों की तरह उपदेश देने लगती हो. अरे, मेरे घर में सब खाते हैं, मेरे मम्मीपापा को भी आदत है, तुम खाती नहीं न, इसलिए डरती हो. 2-3 बार खाओगी तो स्वाद अपनेआप अच्छा लगने लगेगा. पहले मेरी मम्मी भी पापा को मना करती थीं. फिर धीरेधीरे वे गुस्से में खुद खाने लगीं और अब तो उन्हें भी मजा आने लगा है, इसलिए अब कोई किसी को नहीं टोकता.’’

सिया के दिल में क्रोध की एक लहर सी उठी पर अपने भावों को नियंत्रण में रखते हुए बोली, ‘‘पर अनिल, तुम इतने पढ़ेलिखे हो, तुम्हें खुद भी यह बुरी आदत छोड़नी चाहिए और अपने मम्मीपापा को भी समझाना चाहिए.’’

‘‘उफ सिया. छोड़ो यार, आजकल तुम घूमफिर कर इसी बात पर आ जाती हो. हमारे मिलने का आधा समय तो तुम इसी बात पर बिता देती हो. अरे, तुम ने वह गाना नहीं सुना, ‘पान खाए सैयां हमारो…’ फिर हंसा, ‘‘तुम्हें तो यह गाना गाना चाहिए, देखा नहीं कभी क्या कि वहीदा रहमान यह गाना गाते हुए कितनी खुश होती हैं.’’‘‘वे फिल्मों की बातें हैं. उन्हें रहने दो.’’

अनिल उसे फिर हंसाता रहा पर वह उस की इस आदत पर काफी चिंतित थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह अनिल की इस आदत को कैसे छुड़ाए.एक दिन सिया अपने मम्मीपापा और बड़े भाई राहुल से मिलवाने अनिल को घर ले गई. अनिल का व्यक्तित्व कुछ ऐसा था कि देखने वाला तुरंत प्रभावित होता था. सब अनिल के साथ घुलमिल गए. बातें करतेकरते जब ऐक्सक्यूज मी कह कर अनिल ने अपनी जेब से पानमसाला निकाल कर अपने मुंह में डाला, तो सब उस की इस आदत पर हैरान से चुप बैठे रह गए.

अनिल के जाने के बाद वही हुआ जिस की उसे आशा थी. सिया की मम्मी सुधा ने कहा, ‘‘अनिल अच्छा लगा पर उस की यह आदत …’’ सिया ने बीच में ही कहा, ‘‘हां मम्मी, मुझे भी उस की यह आदत बिलकुल पसंद नहीं है. क्या करूं समझ नहीं आ रहा है.’’

थोड़े दिन बाद ही अनिल सिया को अपने परिवार से मिलवाने ले गया. अनिल के पापा श्याम और मम्मी मंजू अनिल की छोटी बहन मिनी सब सिया से बहुत प्यार से पेश आए. सिया को भी सब से मिल कर बहुत अच्छा लगा. मंजू ने तो उसे डिनर के लिए ही रोक लिया. सिया भी सब से घुलमिल गई. फिर वह किचन में ही मंजू का हाथ बंटाने आ गई. सिया ने देखा, फ्रिज में एक शैल्फ पान के बीड़ों से भरी हुई थी.

‘‘आंटी, इतने पान?’’ वह हैरान हुई.‘‘अरे हां,’’ मंजू मुसकराईं, ‘‘हम सब को आदत है न. तुम तो जानती ही हो, बनारस के पान तो मशहूर हैं.’’‘‘पर आंटी, हैल्थ के लिए…’’‘‘अरे छोड़ो, देखा जाएगा,’’ सिया के अपनी बात पूरी करने से पहले ही मंजू बोलीं.किचन में ही एक तरफ शराब की बोतलों का ढेर था. वह वौशरूम में गई तो वहां उसे जैसे उलटी आने को हो गई. बाहर से घर इतना सुंदर और वौशरूम में खाली गुटके यहांवहां पड़े थे. टाइल्स पर पड़े पान के छींटों के निशान देखते ही उसे उलटी आ गई. सभ्य, सुसंस्कृत दिखने वाले परिवार की असलियत घर के कोनेकोने में दिखाई दे रही थी. ‘अगर वह इस घर में बहू बन कर आ गई तो उस का बाकी जीवन तो इन गुटकों, इन बदरंग निशानों को साफ करते ही बीत जाएगा,’ उस ने इन विचारों में डूबेडूबे ही सब के साथ डिनर किया.

डिनर के बाद अनिल सिया को घर छोड़ आया. घर आने के बाद सिया के मन में कई विचार आ जा रहे थे. अनिल एक अच्छा जीवनसाथी सिद्ध हो सकता है, उस के घर वाले भी उस से प्यार से पेश आए पर सब की ये बुरी आदतें पानमसाला, शराब, सिगरेट के ढेर वह अपनी आंखों से देख आई थी. घर आ कर उस ने अपने मन की बात किसी को नहीं बताई पर बहुत कुछ सोचती रही. 2-3 दिन उस ने अनिल से एक दूरी बनाए रखी. सिया के इस रवैए से परेशान अनिल बहुत कुछ सोचने लगा कि क्या हुआ होगा पर उसे जरा भी अंदाजा नहीं हुआ तो शाम को घर जाने के समय वह सिया का हाथ पकड़ कर जबरदस्ती कैंटीन में ले गया, वहां बैठ कर उदास स्वर में पूछा, ‘‘क्या हुआ है, बताओ तो मुझे?’’

सिया को जैसे इसी पल का इंतजार था. अत: उस ने गंभीर, संयत स्वर में कहना शुरू किया, ‘‘अनिल, मैं तुम्हें बहुत पसंद करती हूं, पर हम इस रिश्ते को आगे नहीं बढ़ा पाएंगे.’’अनिल हैरानी से चीख ही पड़ा, ‘‘क्यों?’’

‘‘तुम्हें और तुम्हारे परिवार को जो ये कुछ बुरी आदतें हैं, मुझ से सहन नहीं होंगी, तुम एजुकेटेड हो, तुम्हें इन आदतों का भविष्य तो पता ही होगा. भले ही तुम इन आदतों के परिणामों को नजरअंदाज करते रहो पर जानते तो हो ही न? मैं ऐसे परिवार की बहू कैसे बनूं जो इन बुरी आदतों से घिरा है? आई एम सौरी, अनिल, मैं सब जानतेसमझते ऐसे परिवार का हिस्सा नहीं बनना चाहूंगी.’’

अनिल का चेहरा मुरझा चुका था. बड़ी मुश्किल से उस की आवाज निकली, ‘‘सिया, मैं तो तुम्हारे बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकता.’’‘‘हां अनिल, मैं भी तुम से दूर नहीं होना चाहती पर क्या करूं, इन व्यसनों का हश्र जानती हूं मैं. सौरी अनिल,’’ कह उठ खड़ी हुई.अनिल ने उस का हाथ पकड़ लिया, ‘‘अगर मैं यह सब छोड़ने की कोशिश करूं तो? अपने मम्मीपापा को भी समझांऊ तो?’’

‘‘तो फिर मैं इस कोशिश में तुम्हारे साथ हूं,’’ मुसकराते हुए सिया ने कहा, ‘‘पर इस में काफी समय लगेगा,’’ कह सिया चल दी.आत्मविश्वास से सधे सिया के कदमों को देखता अनिल बैठा रह गया.आदतन हाथ जेब तक पहुंचा, फिर सिर पकड़ कर बैठा रह गया. Family Story In Hindi.

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