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Hindi Kahani: बहू बेटी

Hindi Kahani: घर क्या था, अच्छाखासा कुरुक्षेत्र का मैदान बना हुआ था. सुबह की ट्र्र्रेन से बेटी और दामाद आए थे. सारा सामान बिखरा हुआ था. दयावती ने महरी से कितना कहा था कि मेहमान आ रहे हैं, जरा जल्दी आ कर घर साफ कर जाए. 10 बज रहे थे, पर महरी का कुछ पता नहीं था. झाड़ ूबुहारु तो दूर, अभी तो रात भर के बरतन भी पड़े थे. 2-2 बार चाय बन चुकी थी, नाश्ता कब निबटेगा, कुछ पता नहीं था.

रमेश तो एक प्याला चाय पी कर ही दफ्तर चला गया था. उस की पत्नी जया अपनी 3 महीने की बच्ची को गोद में लिए बैठी थी. उस को रात भर तंग किया था उस बच्ची ने, और वह अभी भी सोने का नाम नहीं ले रही थी, जहां गोद से अलग किया नहीं कि रोने लगती थी.

इधर कमलनाथ हैं कि अवकाश प्राप्त करने के बाद से बरताव ऐसा हो गया है जैसे कहीं के लाटसाहब हो गए हों. सब काम समय पर और एकदम ठीक होना चाहिए. कहीं कोई कमी नहीं रहनी चाहिए. उन के घर के काम में मदद करने का तो कोई प्रश्न ही नहीं था.

गंदे बरतनों को देख कर दयावती खीज ही रही थी कि रश्मि बेटी ने आ कर मां को बांहों में प्यार से कस ही नहीं लिया बल्कि अपने पुराने स्कूली अंदाज से उस के गालों पर कई चुंबन भी जड़ दिए.

दयावती ने मुसकरा कर कहा, ‘‘चल हट, रही न वही बच्ची की बच्ची.’’

‘‘क्या हो रहा है, मां? पहले यह बताओ?’’

 

मां ने रश्मि को सारा दुखड़ा रो दिया.

‘‘तो इस में क्या बात है? तुम अपने दामाद का दिल बहलाओ. मैं थोड़ी देर में सब ठीक किए देती हूं.’’

‘‘पगली कहीं की,’’ मां ने प्यार से झिड़क कर कहा, ‘‘2 दिन के लिए तो आई है. क्या तुझ से घर का काम करवाऊंगी?’’

‘‘क्यों, क्या अब तुम्हारी बेटी नहीं रही मैं? डांटडांट कर क्या मुझ से घर का काम नहीं करवाया तुम ने? यह घर क्या अब पराया हो गया है मेरे लिए?’’ बेटी ने उलाहना दिया.

‘‘तब बात और थी, अब तुझे ब्याह जो दिया है. अपने घर में तो सबकुछ करती ही है. यहां तो तू बैठ और दो घड़ी हंसबोल कर मां का दिल बहला.’’

‘‘नहीं, मैं कुछ नहीं सुनूंगी. तुम अब यहां से जाओ. या तो इन के पास जा कर बैठो या छुटकी को संभाल लो और भाभी को यहां भेज दो. हम दोनों मिल कर काम निबटा देंगे.’’

‘‘अरे, बहू को क्या भेजूं, उसे तो छुटकी से ही फुरसत नहीं है. यह बच्ची भी ऐसी है कि दूसरे के पास जाते ही रोने लगती है. रोता बच्चा किसे अच्छा लगता है?’’

रश्मि को मां की बात में कुछ गहराई का एहसास हुआ. कहीं कुछ गड़बड़ लगती है, पर उस ने कुरेदना ठीक नहीं समझा. वह भी किसी की बहू है और उसे भी अपनी सास से निबटना पड़ता है. तालमेल बिठाने में कहीं न कहीं किसी को दबना ही पड़ता है. बिना समझौते के कहीं काम चलता है?

बातें करतेकरते रश्मि ने एक प्याला चाय बना ली थी. मां के हाथों में चाय का प्याला देते हुए उस ने कहा, ‘‘तुम जाओ, मां, उन्हें चाय दे आओ. उन को तो दिन भर चाय मिलती रहे, फिर कुछ नहीं चाहिए.’’

मां ने झिझकते हुए कहा, ‘‘अब तू ही दे आ न.’’

‘‘ओहो, कहा न, मां, तुम जाओ और दो घड़ी उन के पास बैठ कर बातें करो. आखिर उन को भी पता लगना चाहिए कि उन की सास यानी कि मेरी मां कितनी अच्छी हैं.’’

रश्मि ने मां को जबरदस्ती रसोई से बाहर निकाल दिया और साड़ी को कमर से कस कर काम में लग गई. फुरती से काम करने की आदत उस की शुरू से ही थी. देखतेदेखते उस ने सारी रसोई साफ कर दी.

फिर भाभी के पास जा कर बच्ची को गोद में ले लिया और हंसते हुए बोली, ‘‘यह तो है ही इतनी प्यारी कि बस, गोद में ले कर इस का मुंह निहारते रहो.’’

भाभी को लगा जैसे ननद ताना दे रही हो, पर उस ने तीखा उत्तर न देना ही ठीक समझा. हंस कर बोली, ‘‘लगता है सब के सिर चढ़ जाएगी.’’

‘‘भाभी, इसे तो मैं ले जाऊंगी.’’

‘‘हांहां, ले जाना. रोतेरोते सब के दिमाग ठिकाने लगा देगी.’’

‘‘बेचारी को बदनाम कर रखा है सब ने. कहां रो रही है मेरे पास?’’

‘‘यह तो नाटक है. लो, लगी न रोने?’’

‘‘लो, बाबा लो,’’ रश्मि ने हंस कर कहा, ‘‘संभालो अपनी बिटिया को. अच्छा, अब यह बताओ नाश्ता क्या बनेगा? मैं जल्दी से तैयार कर देती हूं.’’

भाभी ने जबरन हंसते हुए कहा, ‘‘क्यों, तुम क्यों बनाओगी? क्या दामादजी को किसी दूसरे के हाथ का खाना अच्छा नहीं लगता?’’

हंस कर रश्मि ने कहा, ‘‘यह बात नहीं, मुझे तो खुद ही खाना बनाना अच्छा लगता है. वैसे वह बोल रहे थे कि भाभी के हाथ से बने कबाब जरूर खाऊंगा.’’

‘‘बना दूंगी. अच्छा, तुम इसे जरा गोदी में ले कर बैठ जाओ, सो गई है. मैं झटपट नाश्ता बना देती हूं.’’

‘‘ओहो, लिटा दो न बिस्तर पर.’’

‘‘यही तो मुश्किल है. बस गोदी में ही सोती रहती है.’’

‘‘अच्छा ठहरो, मां को बुलाती हूं. वह ले कर बैठी रहेंगी. हम दोनों घर का काम कर लेंगे.’’

‘‘नहींनहीं, मांजी को तंग मत करो.’’

जया को मालूम था कि एक तो छुटकी मांजी की गोद में ज्यादा देर टिकती नहीं, दूसरे जहां उस ने कपड़े गंदे किए कि वह बहू को आवाज देने लगती हैं. स्वयं गंदे कपड़े नहीं छूतीं.

रश्मि को लगा, यहां भी कुछ गड़बड़ है. चुपचाप धीरे से छुटकी को गोद में ले कर बैठ गई और प्यार से उस का सुंदर मुख निहारने लगी. कुछ ही महीने की तो बात है, उस के घर भी मेहमान आने वाला है. वह भी ऐसे ही व्यस्त हो जाएगी. घर का पूरा काम न कर पाएगी तो उस की सास क्या कर लेगी, पर उस की सास तो सैलानी है, वह तो घर में ही नहीं टिकती. उस का सामाजिक दायरा बहुत बड़ा है. गरदन को झटका दे कर रश्मि मन ही मन बोली, ‘देखा जाएगा.’

मुश्किल से 15 मिनट हुए थे कि बच्ची रो पड़ी. हाथ से टटोल कर देखा तो पोतड़ा गीला था. उस ने जल्दी से कपड़ा बदल दिया, पर बच्ची चुप न हुई. शायद भूखी है. अब तो भाभी को बुलाना ही पड़ेगा. भाभी ने टोस्ट सेंक दिए थे, आमलेट बनाने जा रही थी. पिताजी अभी गरमगरम जलेबियां ले कर आए थे.

भाभी को जबरदस्ती बाहर कर दिया. बच्ची की देखभाल आवश्यक थी. फुरती से आमलेट बना कर ट्रे में रख कर मेज पर पहुंचा दिए. कांटेचम्मच, प्यालेप्लेट सब सही तरह से सजा कर पिताजी और अपने पति को बुला लाई. मां अभी नहा रही थीं. उस ने सोचा वह मां और भाभी के साथ खाएगी बाद में.

नाश्ते के बाद रश्मि ने कुछ काम बता कर पति को बाजार भेज दिया. अब मैदान खाली था. झट से झाड़ ू उठा ली. सोचा कि पति के वापस आने से पहले ही सारा घर साफसुथरा कर देगी. वह नहीं चाहती थी कि पति के ऊपर उस के मायके का बुरा प्रभाव पड़े. घर का मानअपमान उस का मानअपमान था. पति को इस से क्या मतलब कि महरी आई या नहीं.

जैसे ही उस ने झाड़ ू उठाई कि जया आ गई. दोनों में खींचातानी होने लगी.

‘‘ननद रानी, यह क्या कर रही हो? लोग क्या कहेंगे कि 2 दिन के लिए मायके आई और झाड़ बुहारु, चौकाबरतन सब करवा लिए. चलो हटो, जा कर नहाधो लो.’’

‘‘नहीं जाती, क्या कर लोगी?’’ रश्मि ने मुसकरा कर कहा, ‘‘मेरा घर है, मैं कुछ भी करूं, तुम्हें मतलब?’’

‘‘है, मतलब है. तुम तो 2 दिन बाद चली जाओगी, पर मुझे तो सारा जीवन यहां बिताना है.’’

रश्मि ने इशारा समझा, फिर भी कहा, ‘‘अच्छा चलो, काम बांट लेते हैं. तुम उधर सफाई कर लो और मैं इधर.’’

‘‘बिलकुल नहीं,’’ जया ने दृढ़ता से कहा, ‘‘ऐसा नहीं होगा.’’

भाभी और ननद झगड़ ही रही थीं कि बच्ची ने रो कर फैसला सुना दिया. भाभी मैदान से हट गई. इधर मां ने दिन के खाने का काम संभाल लिया. छुटकी को नहलानेधुलाने व कपड़े साफ करने में ही बहू को घंटों लग जाते हैं. सास बहू की मजबूरी को समझती थी, पर एक अनकही शिकायत दिल में मसोसती रहती थी. बहू के आने से उसे क्या सुख मिला? वह तो जैसे पहले घरबार में फंसी थी वैसे ही अब भी. कैसेकैसे सपनों का अंबार लगा रखा था, पर वह तो ताश के पत्तों से बने घर की तरह बिखर गया.

वह कसक और बढ़ गई थी. नहीं, शायद कसक तो वही थी, केवल उस की चुभन बढ़ गई थी. दयावती के हाथ सब्जी की ओर बढ़ गए. फिर भी उस का मन बारबार कह रहा था, लड़की को देखो, 2 दिन के लिए आई है, पर घर का काम ऐसे कर रही है जैसे अभी विवाह ही न हुआ हो. आखिर लड़की है. मां को समझती है…और बहू…

संध्या हो चुकी थी. रश्मि और उस का पति विजय अभीअभी जनपथ से लौटे थे. कितना सारा सामान खरीद कर लाए थे. कहकहे लग रहे थे. चाय ठंडी हो गई थी, पर उस का ध्यान किसे था? विजय ने पैराशूटनायलोन की एक जाकेट अपने लिए और एक अपनी पत्नी के लिए खरीदी थी. रश्मि के लिए एक जींस भी खरीदी थी. उसे रश्मि दोनों चीजें पहन कर दिखा रही थी. कितनी चुस्त और सुंदर लग रही थी. दयावती का चेहरा खिल उठा था. दिल गर्व से भर गया था.

बहू रश्मि को देख कर हंस रही थी, पर दिल पर एक बोझ सा था. शादी के बाद सास ने उस की जींस व हाउसकोट बकसे में बंद करवा दिए थे, क्योंकि उन्हें पहन कर वह बहू जैसी नहीं लगती थी.

रात को गैस के तंदूर पर रश्मि ने बढि़या स्वादिष्ठ मुर्गा और नान बनाए. इस बार बहू अपने मायके से तंदूर ले कर आई थी, पर वह वैसा का वैसा ही बंद पड़ा था. उस पर खाना बनाने का अवकाश किसे था. सास को आदत न थी और बहू को समय न था. तंदूर का खाना इतना अच्छा लगा कि विजय ने रश्मि से कहा, ‘‘कल हम भी एक तंदूर खरीद लेंगे.’’

दयावती के मुंह से निकल गया, ‘‘क्यों पैसे खराब करोगे? यही ले जाना. यहां किस काम आ रहा है.’’

कमलनाथ ने कहा, ‘‘ठीक तो है, बेटा. तुम यही ले जाओ. हमें जरूरत पड़ेगी तो और ले लेंगे.’’

बहू चुप. उस के दिल पर तो जैसे किसी ने हथौड़ा मार दिया हो. उस ने अपने पति की ओर देखा. बेटे ने मुंह फेर लिया. एक ही इलाज था. कल ही बहन के लिए एक नया तंदूर खरीद कर ले आए. लेकिन इस के लिए पैसे और समय दोनों की आवश्यकता थी.

बेटी को अपना माहौल याद आया. एक बार तंदूर ले गई तो उस के ससुर व पति दोनों जीवन भर उसे तंदूर पर ही बैठा देंगे. दोनों को खाने का बहुत शौक था. इस के अलावा उसे याद था कि जब मां का दिया हुआ शाल सास ने उस की ननद को बिना पूछे पकड़ा दिया था तो उसे कितना मानसिक कष्ट हुआ था. आंखों में आंसू आ गए थे. भाभी की हालत भी वही होगी.

बात बिगड़ने से पहले ही उस ने कहा, ‘‘नहीं मां, यह तंदूर भाभी का है, मैं नहीं ले जाऊंगी. मेरे पड़ोस में एक मेजर रहते हैं. उन्होंने मुझे सस्ते दामों पर फौजी कैंटीन से तंदूर लाने के लिए कहा है. 2-2 तंदूर ले कर मैं क्या करूंगी?’’

बेटी ने तंदूर के लिए मांग नहीं की थी, परंतु उस ने ससुराल लौटते ही मेजर साहब से तंदूर के लिए कहने का इरादा कर लिया था.

अगले दिन बेटी और दामाद चले गए. घर सूनासूना लगने लगा. चहलपहल मानो समाप्त हो गई थी. इस सूनेपन को तोड़ने वाली केवल एक आवाज थी और वह थी बच्ची के रोने की आवाज. वातावरण सामान्य होने में कुछ समय लगा. मां के मुंह से हर समय बेटी का नाम निकलता था. वह क्याक्या करती थी…क्या कर रही होगी…बच्चा ठीक से हो जाए…तुरंत बुला लूंगी. 3 महीने से पहले वापस नहीं भेजूंगी. बहू सोच रही थी, उसे तो पीछे पड़ कर 1 महीने बाद ही बुला लिया था.

दयावती की बहन की लड़की किसी रिश्तेदार के यहां विवाह में आई थी, समय निकाल कर वह मौसी से मिलने भी आ गई.

‘‘क्या हो रहा है, मौसी?’’

‘‘अरे, तू कब आई?’’ दयावती ने चकित हो कर कहा, ‘‘कुछ खबर भी नहीं?’’

‘‘लो, जब खुद ही चली आई तो खबर क्या भेजनी? आई तो कल ही हूं. शादी है एक. कल वापस भी जाना है, पर अपनी प्यारी मौसी से मिले बिना कैसे जा सकती हूं? भाभी कहां हैं? सुना है, छुटकी बड़ी प्यारी है. बस, उसे देखने भर आई हूं.’’

‘‘अरे, बैठ तो सही. सब देखसुन लेना. देख कढ़ी बना रही हूं. खा कर जाना.’’

‘‘ओहो…बस, मौसी, तुम और तुम्हारी कढ़ी. हमेशा चूल्हाचौका. अब भाभी भी तो है, कुछ तो आराम से बैठा करो.’’

दयावती ने गहरी सांस ले कर कहा, ‘‘क्या आराम करना. काम तो जिंदगी की अंतिम सांस तक करना ही करना है.’’

‘‘हाय, दीदी, तुम्हारा कितना काम करती थी. सच, तुम्हें रश्मि दीदी की बहुत याद आती होगी, मौसी?’’

‘‘अब फर्क तो होता ही है बहू और बेटी में,’’ दयावती ने फिर गहरी सांस ली.

जया सुन रही थी. उस के दिल पर चोट लगी. क्यों फर्क होता है बहू और बेटी में? एक को तीर तो दूसरे को तमगा. जब सास की बहन की लड़की चली गई तो जया सोचने लगी कि इस स्थिति में बदलाव आना जरूरी है. सास और बहू के बीच औपचारिकता क्यों? वह सास से साफसाफ कह सकती है कि बारबार बेटी की रट न लगाएं. पर ऐसा कहने से सास को अच्छा न लगेगा. अब उसे ही बेटी की भूमिका अदा करनी पड़ेगी. न सास रहेगी, न बहू. हर घर में बस, मांबेटी ही होनी चाहिए.

वह मुसकराई. उसे एक तरकीब सूझी. परिणाम बुरा भी हो सकता था, परंतु उस ने खतरा उठाने का निर्णय ले ही लिया. अगले सप्ताह होली का त्योहार था. अगर कुछ बुरा भी लगा तो होली के माहौल में ढक जाएगा. उस ने छुटकी को उठा कर चूम लिया.

प्रात: जब वह कमरे से निकली तो जींस पहने हुए थी और ऊपर से चैक का कुरता डाल रखा था. हाथ में गुलाल था.

‘‘होली मुबारक हो, मांजी,’’ कहते हुए जया ने ननद की नकल करते हुए सास के गालों पर चुंबन जड़ दिए और मुंह पर गुलाल मल दिया. दयावती की तो जैसे बोलती ही बंद हो गई. इस से पहले कि सास संभलती, जया ने खिलखिला कर ‘होली है…होली है’ कहते हुए सास को पकड़ कर नाचना शुरू कर दिया. होहल्ला सुन कर कमलनाथ भी बाहर आ गए और यह दृश्य देख कर हंसे बिना न रह सके.

‘‘यह क्या हो रहा है, बहू?’’ कमलनाथ ने हंसते हुए कहा.

‘‘होली है, पिताजी, और सुनिए, आज से मैं बहू नहीं हूं, बेटी हूं…सौ फीसदी बेटी,’’ यह कहते हुए उस ने ससुर के मुंह पर भी गुलाल पोत दिया.

इस से पहले कि कुछ और हंगामा खड़ा होता, पासपड़ोस के लोग मिलने आने लगे. स्त्रियां तो घर में ही घुस आईं. इसी बीच छुटकी रोने लगी. जया ने दौड़ कर छुटकी को उठा लिया और उस के कपड़े बदल कर सास की गोदी में बैठा दिया.

‘‘मांजी, आप मिलने वालों से निबटिए, मैं चायनाश्ता लगा रही हूं.’’

‘‘पर, बहू…’’

‘‘बहू नहीं, बेटी, मांजी. अब मैं बेटी हूं. देखिए मैं कितनी फुरती से काम निबटाती हूं.’’

लोग आ रहे थे और जा रहे थे. जया फुरती से नाश्ता लगालगा कर दे रही थी. रसोई का काम भी संभाल रही थी. गरमागरम पकौडि़यां बना रही थी, जूठे बरतन इकट्ठा नहीं होने दे रही थी. साथ ही साथ धो कर रखती जाती थी. सास को 2 बार रसोई से बाहर किया. उस का काम केवल छुटकी को रखना और मिलने वालों से बात करना था. सास को मजबूरन 2 बार छुटकी के कपड़े बदलने पड़े. सब से बड़ी बात तो यह थी कि दादी की गोद में छुटकी आज चुप थी, रोने का नाम नहीं. लगता था कि वह भी षडयंत्र में शामिल थी.

जब मेहमानों से छुट्टी मिली तो दयावती ने महसूस किया कि छुटकी कुछ बदल गई है. रोई क्यों नहीं आज? बल्कि शैतान हंस ही रही थी.

कमलनाथ ने आवाज दी, ‘‘बहू, जरा एक दहीबड़ा और दे जाना, बहुत अच्छे बने हैं.’’

रसोई से आवाज आई, ‘‘यहां कोई बहूवहू नहीं है, पिताजी.’’

‘‘बड़ी भूल हो गई बेटी,’’ कमलनाथ ने हंसते हुए कहा, ‘‘अब तो मिलेगा न?’’

‘‘और हां बेटी,’’ सास ने शरमाते हुए कहा, ‘‘अपनी मां का भी ध्यान रखना.’’

सास के गले में बांहें डालते हुए जया ने कहा, ‘‘क्योें नहीं, मां, आप लोगों को पा कर मैं कितनी धन्य हूं.’’

रमेश ने जो यह नाटक देख रहा था, गंभीरता से कहा, ‘‘इन हालात में मेरी क्या स्थिति है?’’ और सब हंस पड़े. Hindi Kahani

Hindi Story: असली पहचान

Hindi Story: मैं राजेश को जब भी देखती मेरे जेहन में ‘गुलाम’ फिल्म में आमिर खान का गेटअप घूम जाता था. वह बिलकुल उसी तरह बालों की स्टाइल, हाथों में कड़ा और गले में चेन डाल कर घूमता रहता था. वह मेरी पड़ोसिन की बूआ का बेटा था. मेरे परिवार के लोग राजेश को टपोरी समझते थे पर उसी टपोरी ने वह कर दिखाया था जिस के बारे में न तो मैं ने कभी सोचा था न मेरे परिवार में किसी को उम्मीद थी.

आज जब राजेश का फोन आया कि नीलू मां बनने वाली है तो मेरे परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई. मां और बाबूजी के साथ मेरे देवर भी तरहतरह के मनसूबे बनाने लगे और मैं सोचने लगी कि इस दुनिया में कितने ऐसे लोग हैं जो जैसे दिखते हैं वैसे अंदर से होते नहीं और जो बाहर से भोलेभाले दिखते हैं स्वभाव से भी वैसे हों यह जरूरी नहीं.

नीलू मेरी सब से छोटी ननद है. मेरी आंखों के सामने उस की बचपन की तसवीर घूमने लगी और मेरा मन 15 साल पीछे की बातों को याद करने लगा.

मैं इस घर में बहू बन कर जब आई थी तब मेरे दोनों देवर व ननद छोटेछोटे थे. मेरे पति सब से बड़े थे. उन में व बाकी बहनभाइयों में उम्र का काफी फासला था. हमारी शादी के दूसरे दिन ही बूआ सास ने मजाक में कहा था, ‘बहू, तुम्हें पता है कि तुम्हारे पति व अन्य बहनभाइयों में उम्र का इतना अंतर क्यों है? तुम्हारे पति के जन्म के बाद मेरी भाभी ने सोचा थोड़ा आराम कर लिया जाए…’ और इतना कह कर वह जोर का ठहाका मार का हंस पड़ी थीं.

नईनई भाभी पा कर मेरे छोटेछोटे देवर तो मेरे आगेपीछे चक्कर काटते और मेरा आंचल पकड़ कर घूमते रहते थे. पर मैं ने गौर किया कि मेरी सब से छोटी ननद नीलू जो लगभग 6-7 साल की थी, मेरे सामने आने से कतराती थी. यदि वह कभी हिम्मत कर के पास आती भी थी तो उस के भाई उसे झिड़क देते थे. यहां तक कि मांजी भी हमेशा उसे अपने कमरे में जाने को बोलतीं. नीलू मुझे सहमी सी नजर आती.

शादी के कुछ दिन बाद घर मेहमानों से खाली हो गया था. कोई काम नहीं था तो सोचा कमरे में पेंटिंग ही लगा दूं. मैं अपने कमरे में पेंटिंग लगा रही थी कि देखा, नीलू चुपचाप मेरे पीछे आ कर खड़ी हो गई है. मुझे इस तरह उस का चुपचाप आना अच्छा लगा.

‘आओ नीलू, तुम अपनी भाभी के पास नहीं बैठोगी? तुम मुझ से बातें क्यों नहीं करतीं.’

मैं उस से प्यार से अभी पूछ ही रही थी कि मेरा बड़ा देवर संजय आ गया और नीलू की ओर देख कर बोला, ‘अरे, भाभी, यह क्या बातें करेगी…इतनी बड़ी हो गई पर इसे तो ठीक से बोलना तक नहीं आता.’

संजय ने बड़ी आसानी से यह बात कह दी. मैं ने देखा कि नीलू का खिला चेहरा बुझ सा गया. मैं ने सोचा कि इस बारे में संजय को कुछ नसीहत दूं. पर तभी मांजी मेरे कमरे में आ गईं और आते ही उन्होंने भी नीलू को डांटते हुए कहा, ‘तू यहां खड़ीखड़ी क्या कर रही है. जा, जा कर पढ़ाई कर.’

नीलू अपने मन के सारे अरमान लिए चुपचाप वापस अपने कमरे में चली गई. उस के जाने के बाद मांजी बोलीं, ‘देखो बहू, मैं ने तुम्हारे लिए यह सूट खरीदा है,’ और वह मुझे सूट दिखाने लगीं, पर मेरा मन नीलू पर ही लगा रहा. शाम को जब यह घर आए तो चायनाश्ते के समय मैं ने इन से पूछा, ‘आप एक बात बताइए कि यह नीलू इतनी डरीसहमी सी क्यों रहती है?’

यह गौर से मुझे देखते हुए बताने लगे कि वह साफसाफ बोल नहीं पाती. दरअसल, नीलू ने बोलना ही देर से शुरू किया और 6 साल की होने के बावजूद हकलाहकला कर बोलती है.

‘आजकल तो कितनी मेडिकल सुविधाएं हैं. आप नीलू को किसी स्पीच थेरेपिस्ट को क्यों नहीं दिखाते?’

उस समय उन्होंने मेरी बात हवा में उड़ा दी पर मैं ने मन ही मन सोचा कि मैं खुद नीलू को दिखाने के लिए किसी स्पीच थेरेपिस्ट के पास जाऊंगी. इस बारे में जब मैं ने बाबूजी से बात की तो उन्होंने भी कोई उत्सुकता नहीं दिखाई लेकिन उन्होंने सीधे मना भी नहीं किया. अगले हफ्ते मैं नीलू को शहर की एक लोकप्रिय महिला स्पीच थेरेपिस्ट के पास ले गई.

थोड़ी देर बाद जब थेरेपिस्ट नीलू का विश्लेषण कर के बाहर आईं तो बोलीं, ‘इस का हकला कर बोलना उतनी परेशानी की बात नहीं है जितना इस के व्यक्तित्व का दबा होना. इसे लोगों के सामने आने में घबराहट होती है क्योंकि लोग इस के हकलाने का मजाक उड़ाते हैं. इसी से यह खुल कर नहीं रहती और न ही बोल पाती है.’

मैं नीलू को ले कर घर चली आई. मैं ने निश्चय किया कि नीलू को ले कर मैं बाहर निकला करूंगी, उसे अपने साथ घुमाने ले जाया करूंगी और उस दिन से मैं नीलू पर और ज्यादा ध्यान देने लगी. मैं ने नीलू के व्यक्तित्व को निखारने की जैसे कसम खा ली थी. इस के नतीजे जल्दी ही हम सब के सामने आने लगे. उस दिन तो घर में खुशी की लहर ही दौड़ गई जब नीलू अपने स्कूल में कविता प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार ले कर घर आई थी.

समय पंख लगा कर कितनी तेजी से उड़ गया, पता ही नहीं चला. मेरे सभी देवरों की शादी हो गई. अब घर में बस, नीलू ही थी. उस ने भी एम.ए. कर लिया था. हम लोग उस की शादी के लिए लड़का देख रहे थे. जल्द ही लड़का भी मिल गया जो डाक्टर था. परिवार के लोगों ने बड़ी धूमधाम से नीलू की शादी की. शादी के बाद के कुछ महीनों तक तो सब कुछ ठीकठाक चलता रहा. धीरेधीरे मैं ने महसूस किया कि नीलू की आवाज में खुशी नहीं झलकती. मैं ने पूछा भी पर उस ने कुछ बताया नहीं और शादी के केवल 2 साल बाद ही नीलू अकेले मायके वापस आ गई.

उस के बुझे चेहरे को देख कर हम सभी परेशान रहते थे. मैं ने सोचा भी कि कुछ दिन बीत जाएं तो उस के ससुराल फोन करूं. क्या पता पतिपत्नी में खटपट हुई हो. 15 दिन बाद जब मैं ने नीलू के ससुराल फोन किया तो उस की सास व पति के जवाब सुन कर सन्न रह गई. ‘मेरा तो एक ही बेटा है, आप ने हम से झूठ बोल कर शादी की और अपनी तोतली बेटी हमें दे दी. उस पर वह बांझ भी है. मैं तो सीधे तलाक के पेपर भिजवाऊंगी,’ इतना कह कर नीलू की सास ने फोन काट दिया.

घर में सन्नाटा छा गया. मांजी ने मुझे भी कोसना शुरू कर दिया, ‘मैं कहती थी कि यह कभी ठीक नहीं होगी. तुम्हारे उस ‘स्पीच थेरेपी’ जैसे चोंचलों से कुछ होने वाला नहीं है. लो, देखो, अब रखो अपनी छाती पर इसे जिंदगी भर.’ मुझे नीलू की सास की बात सुन कर उतना दुख नहीं हुआ जितना कि अपनी सास की बातों से हुआ. दरअसल, नीलू एकदम ठीक हो गई थी पर नए माहौल में एकाध शब्द पर थोड़ा अटकती थी जोकि पता नहीं चलता था. पर उस के ससुराल वालों ने उसे कैसे बांझ करार दे दिया यह बात मेरी समझ में नहीं आई. क्या 2 साल ही पर्याप्त होते हैं किसी स्त्री की मातृत्व क्षमता को नापने के लिए?

खैर, बात काफी आगे बढ़ चुकी थी. आखिर तलाक हो ही गया. इस के बाद नीलू एकदम चुप सी रहने लगी. जैसे कि मेरी शादी के समय थी. बंद कमरे में रहना, किसी से बातें न करना. एक दिन मैं ने जिद कर के नीलू को अपने साथ बाहर चलने के लिए यह सोच कर कहा कि घर से बाहर निकलेगी तो थोड़ा बदलाव महसूस करेगी. रास्ते में ही पड़ोस की बूआ का बेटा राजेश मिल गया. उस ने मुझे रोक कर नमस्कार किया और बोला, ‘भाभी, मुझे मुंबई में अच्छी नौकरी मिल गई है और कंपनी वालों ने रहने के लिए फ्लैट दिया है. किसी दिन मम्मी से मिलने के लिए आप मेरे घर आइए न.’

‘ठीक है भैया, किसी दिन मौका मिला तो आप के घर जरूर आऊंगी,’ इतना कह कर मैं नीलू के साथ बाजार चली गई.

एक दिन मैं बूआ के घर गई. उन का घरपरिवार अच्छा था. अपना खुद का कारोबार था. मैं ने बातों ही बातों में बूआ से नीलू का जिक्र किया तो वह बोल पड़ीं, ‘अरे, उस बच्ची की अभी उम्र ही क्या है? कहीं दूसरी शादी करा दें तो ठीक हो जाएगी.’

‘लेकिन बूआ, कौन थामेगा उस का हाथ? अब तो उस पर बांझ होने का ठप्पा भी लग गया है. यद्यपि मैं ने उस के तमाम मेडिकल चेकअप कराए हैं पर उस में कहीं कोई कमी नहीं है,’ इतना कहते- कहते मेरा गला जैसे भर्रा गया.

‘मैं कैसा हूं आप के घर का दामाद बनने के लिए?’ राजेश बोला तो मैं ने उसे डांट दिया कि यह मजाक का वक्त नहीं है.

‘भाभी, मैं मजाक नहीं सच कह रहा हूं. मैं नीलू का हाथ थामने को तैयार हूं बशर्ते आप लोगों को यह रिश्ता मंजूर हो.’

मेरा मुंह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया. आश्चर्य से मैं बूआ की ओर पलटी तो मुझे लगा कि उन्हें भी राजेश से यह उम्मीद नहीं थी.

थोड़ी देर रुक कर वह बोलीं, ‘मैं घूमघूम कर समाजसेवा करती हूं और जब अपने घर की बारी आई तो पीछे क्यों हटूं? फिर जब राजेश को कोई एतराज नहीं है तो मुझे क्यों होगा?’

राजेश मेरी ओर मुड़ कर बोला, ‘भाभी, जहां तक बच्चे की बात है तो इस दुनिया में सैकड़ों बच्चे अनाथ पड़े हैं. उन्हीं में से किसी को अपने घर ले आएंगे और उसे अपना बच्चा बना कर पालेंगे.’

राजेश के मुंह से ऐसी बातें सुन कर मुझे सहसा विश्वास ही नहीं हुआ. जिस की पहचान हम उस के पहनावे से करते रहे वह तो बिलकुल अलग ही निकला और जो सूटटाई के साथ ‘जेंटलमैन’ बने घूमते थे वह कितने खोखले निकले.

मेरे मन से राजेश के लिए सैकड़ों दुआएं निकल पड़ीं. मेरा रोमरोम पुलकित हो उठा था. मुझे टपोरी ड्रेस में भी राजेश किसी राजकुमार की तरह लग रहा था. घर आ कर मैं ने यह बात परिवार के दूसरे लोगों को बताई तो सब इस के लिए तैयार हो गए और फिर जल्दी ही नीलू की शादी राजेश के साथ कर दी गई. शादी के साल भर बाद ही वे दोनों अनाथ आश्रम जा कर एक बच्चा ले आए और आज जब नीलू खुद मां बनने वाली है तो मेरा मन खुशी से झूम उठा है.

मैं ने राजेश से फोन पर बात की और उसे बधाई दी तो वह कहने लगा कि भाभी, हम मांबाप तो पहले ही बन चुके थे पर बच्चों से परिवार पूरा होता है न. बेटी तो हमारे पास पहले से ही है अब जो भी होगा उसे ले कर कोई गिलाशिकवा नहीं रहेगा, क्योंकि वह हमारा ही अंश होगा. राजेश के मुंह से यह सुन कर सचमुच मन भीग सा गया. राजेश ने मानवता की जो मिसाल कायम की है, यदि ऐसे ही सब हो जाएं तो समाज में कोई परेशानी आए ही न. यह सोच कर मेरी आंखों में राजेश व उसके परिवार के प्रति कृतज्ञता के आंसू आ गए. Hindi Story

Stories Hindi: इसी को कहते हैं जीना

Stories Hindi: ‘‘नेहा, क्या तुम ने कभी यह सोचा है कि तुम अकेली क्यों हो? हर इनसान तुम से दूर क्यों भागता है?’’नेहा चुपचाप मेरा चेहरा देखने लगी.

‘‘किसी भी रिश्ते को निभाने में तुम्हारा कितना योगदान होता है, क्या तुम ने कभी महसूस किया है? जहां कहीं भी तुम्हारी दोस्ती होती है वहां तुम्हारा समावेश उतना ही होता है जितना तुम पसंद करती हो. कोई तुम्हारे काम आता है तो उसे तुम अपना अधिकार ही मान कर चलने लगती हो. जिन से तुम दोस्ती करती हो उन्हें अपनी जरूरत के अनुसार इस्तेमाल करती हो और काम हो जाने के बाद धन्यवाद बोलना भी जरूरी नहीं समझती हो…लोग तुम्हारे काम आएं पर तुम किसी के काम आओ यह तुम्हें पसंद नहीं है, क्योंकि तुम्हें लोगों से ज्यादा मिलनाजुलना पसंद नहीं है. जो तुम्हारे काम आते हैं उन से तुम हफ्तों नहीं मिलतीं तो सिर्फ इसलिए कि स्कूल के बाद तुम्हें अपने घर को साफ करवाना जरूरी होता है.

लौटते हुए

‘‘अच्छा, यह बताओ कि तुम्हारे घर में कितने लोग हैं जो रोज इतनी साफसफाई करवाती हो. साफ घर हर रोज इस तरह साफ करती हो मानो दीवाली आने वाली हो. आता कौन है तुम्हारे घर पर? न तुम्हारे मांबाप आते हैं न सासससुर…पति न जाने किस के साथ कहां चला गया, तुम खुद भी नहीं जानतीं.’’

आंखें और भी फैल गईं नेहा की.

‘‘जरा सोचो, नेहा, तुम कब किसी के काम आती हो. कब तुम अपने कीमती समय में से समय निकाल कर किसी का सुखदुख पूछती हो…कितना बनावटी आचरण है तुम्हारा. मुंह पर जिस की तारीफ करती हो पीठ पीछे उसी की बुराई करने लगती हो. क्या तुम्हें प्रकृति से डर नहीं लगता? सोने से पहले क्या कभी यह सोचती हो कि आज रात अगर तुम मर जाओ तो क्या तुम कोई कर्ज साथ नहीं ले जाओगी?’’

‘‘किस का कर्ज है मेरे सिर पर? मुझे तो किसी का कोई रुपयापैसा नहीं देना है.’’

‘‘रुपएपैसे के आगे भी कुछ होता है, जो कर्ज की श्रेणी में आता है.

‘‘रुपएपैसे के एहसान को तो इनसान पैसे से चुका सकता है मगर उन लोगोें का बदला कैसे चुकाया जा सकता है जहां  लगाव, हमदर्दी और अपनत्व का कर्ज हो. जिस ने मुसीबत में तुम्हें सहारा दिया उस का कभी हालचाल भी नहीं पूछती हो तुम.’’

उसे किस ने मारा

‘‘किस की बात कर रहे हो तुम?’’

‘‘इस का मतलब तुम पर किस के एहसान का कर्ज है यह भी तुम्हें याद नहीं.’’

मैं नेहा का मित्र हूं और हमारी मित्रता का कोई भी भविष्य मुझे अब नजर नहीं आ रहा. मित्रता तो एक तरह का निवेश है. प्यार दो तो प्यार मिलेगा. आज तुम किसी के काम आओ तो कल कोई तुम्हारे काम आएगा. नेहा तो सूखी रेत है जिस पर चाहो तो मन भर पानी बरसा दो वह फिर भी गीली नहीं हो सकती.

अफसोस हो रहा है मुझे खुद पर और नेहा पर भी. खुद पर इसलिए कि मैं  नेहा का मित्र हूं और नेहा पर इसलिए कि क्या उसे कोई किनारा मिल पाएगा कभी? क्या वह रिश्ता निभाना सीख पाएगी कभी?

नेहा से मेरी जानपहचान शर्माजी के घर हुई थी. शर्माजी हमारे विभाग में वरिष्ठ अधिकारी हैं और बड़े सज्जन पुरुष हैं. शर्माजी की पत्नी ललिताजी भी बड़ी मिलनसार और ममतामयी महिला हैं. मैं कुछ फाइलें उन्हें दिखाने उन के घर गया था, क्योंकि वह कुछ दिन से बीमार चल रहे थे.

हम दोनों के सामने चाय रख कर ललिताजी जल्दी से निकल गई थीं. टिफिन था उन के हाथ में.

‘‘भाभीजी बच्चों को टिफिन देने गई हैं क्या?’’

पिंजरे वाली मुनिया

‘‘अरे, बच्चे कहां हैं यहां हमारे,’’ शर्माजी बोले, ‘‘दोनों बेटे अपनीअपनी नौकरी पर बाहर हैं. यहां तो हम बुड्ढाबुढि़या ही हैं. तुम्हें क्या हमारी उम्र इतनी छोटी लग रही है कि हमारे बच्चे स्कूल जाते होंगे.

‘‘मेरी पत्नी समाज सेवा में भी विश्वास करती है. यहां 2 घर छोड़ कर कोई बीमार है…उसी को खाना देने गई है. अकेली लड़की है. बीमार है, बस, उसी की देखभाल करती रहती है. क्या करे बेचारी? अपने बच्चे तो दूर हैं न. उन की ममता उसी पर लुटा कर खुश हो लेती है.’’

तब पहली बार नेहा के बारे में जाना था. स्कूल में टीचर है और पति कुछ समय पहले कहीं चला गया था. शादी को 2-3 साल हो चुके हैं. कोई बच्चा नहीं है. अकेली रहती है, इसलिए ललिताजी उस से दोस्ती कर के उस की मदद करती रहती हैं और समय का सदुपयोग भी.

अभी हम फाइलें देख ही रहे थे कि ललिताजी वापस चली आईं और अपने साथ नेहा को भी लेती आई थीं.

‘‘बहुत तेज बुखार है इसे. मैं साथ ही ले आई हूं. बारबार उधर भी तो नहीं न जाया जाता.’’

ललिताजी नेहा को दूसरे कमरे में सुला आई थीं और अब शर्माजी को समझा रही थीं,  ‘‘देखिए न, अकेली बच्ची वहां पड़ी रहती तो कौन देखता इसे. बेचारी के मांबाप भी दूर हैं न…’’

‘‘दूर कहां हैं…हम हैं न उस के मांबाप…हर शहर में हमारी कम से कम एक औलाद तो है ही ऐसी जिसे तुम ने गोद ले रखा है. इस शहर में नहीं थी सो वह कमी भी दूर हो गई.’’

‘‘नाराज क्यों हो रहे हैं…जैसे ही बुखार उतर जाएगा वह चली जाएगी. आप भी तो बीमार हैं न…आप का खानापीना भी देखना है. 2-2 जगह मैं कै से देखूं.’’

मैं ने भी उसी पल उन्हें ध्यान से देखा था. बहुत ममतामयी लगी थीं वह मुझे. बहुत प्यारी भी थीं.

लगभग 4 घंटे उस दिन मैं शर्माजी के घर पर रहा था और उन 4 घंटों में शर्मा दंपती का चरित्र पूरी तरह मेरे सामने चला आया था. बहुत प्यारी सी जोड़ी है उन की.  ललिताजी तो ऐसी ममतामयी कि मानो पल भर में किसी की भी मदद करने को तैयार. शर्माजी पत्नी की इस आदत पर ज्यादातर खुश ही रहते.

मेरे साथ भी मां जैसा नाता बांध लिया था ललिताजी ने. सचमुच कुछ लोग इतने सीधेसरल होते हैं कि बरबस प्यार आने लगता है उन पर.

‘‘देखो बेटा, मनुष्य को सदा इस  भावना के साथ जीना चाहिए कि मेरा नाम कहीं लेने वालों की श्रेणी में तो नहीं आ रहा.’’

‘‘मांजी, मैं समझा नहीं.’’

‘‘मतलब यह कि मुझे किसी का कुछ देना तो नहीं है न, कोई ऐसा तो नहीं जिस का कर्ज मेरे सिर पर है, रात को जब बिस्तर पर लेटो तब यह जरूर याद कर लिया करो. किसी से कुछ लेने की आस कभी मत करो. जब भी हाथ उठें देने के लिए उठें.’’

मंत्रमुग्ध सा देखता रहता मैं  ललिताजी को. जब भी उन से मिलता था कुछ नया ही सीखता था. और उस से भी ज्यादा मैं यह सीखने लगा था कि नेहा के करीब कैसे पहुंचा जाए. नेहा अपना कोई न कोई काम लिए ललिताजी के पास आ जाती और मैं उस के लिए कुछ सोचने लगता.

‘‘बहुत अच्छी लड़की है, पढ़ीलिखी है, मेरा जी चाहता है उस का घर पुन: बस जाए.’’

‘‘मांजी, उस का पति वापस आ गया तो. ऐसी कोई तलाक जैसी प्रक्रिया तो नहीं गुजरी न दोनों में. पुन: शादी के बारे में कैसे सोचा जा सकता है.’’

शर्माजी के घर से शुरू हुई हमारी जानपहचान उन के घर के बाहर भी जारी रही और धीरेधीरे हम अच्छे दोस्त बन गए.

ललिताजी से मिलना कम हो गया और हर शाम मैं और नेहा साथसाथ रहने लगे. मार्च का महीना था जिस वजह से आयकर रिटर्न का काम भी नेहा ने मुझे सौंप दिया. कभी नया राशन कार्ड बनाना होता और कभी पैन कार्ड का चक्कर. उस के घर की किस्तें भी हर महीने मेरे जिम्मे पड़ने लगीं. 2-3 महीने में नेहा के सारे काम हो गए. कभीकभी मुझे लगता, मैं तो उस का नौकर ही बन गया हूं.

कुछ दिन और बीते. एक दिन पता चला कि ललिताजी को भारी रक्तस्राव की वजह से आधी रात को अस्पताल में भरती कराना पड़ा. शर्माजी छुट्टी पर चले गए. उन के  बच्चे दूर थे इसलिए उन्हें परेशान न कर वह पतिपत्नी सारी तकलीफ खुद ही झेल रहे थे.

मेरा परिवार भी दूर था सो कार्यालय के बाद मैं भी अस्पताल चला आता था, उन के पास.

नेहा अस्पताल में नहीं दिखी तो सोचा, हो सकता है वह ललिताजी का घर संभाल रही हो. ललिताजी का आपरेशन हो गया. मैं छुट्टी ले कर उन के आसपास ही रहा. नेहा कहीं नजर नहीं आई. एक दिन शर्माजी से पूछा तो वह हंस पड़े और बताने लगे :

‘‘जब से तुम उस के काम कर रहे हो तब से वह मुझ से या ललिता से मिली कब है, हमें तो अपनी सूरत भी दिखाए उसे महीना बीत गया है. बड़ी रूखी सी है वह लड़की.’’

मुझ में काटो तो खून नहीं. क्या सचमुच नेहा अब इन दोनों से मिलती- जुलती नहीं. हैरानी के साथसाथ अफसोस भी होने लगा था मुझे.

ललिताजी अभी बेहोशी में थीं और शर्माजी उन का हाथ पकड़े बैठे थे.

‘‘ललिता का तो स्वभाव ही है. कोई एक कदम इस की तरफ बढ़ाए तो यह 10 कदम आगे बढ़ कर उस का साथ देती है. हम नएनए इस शहर में आए थे. यह लड़की एक शाम फोन करने आई थी. उस का फोन काम नहीं कर रहा था… गलती तो ललिता की ही थी… किसी की भी तरफ बहुत जल्दी झुक जाती है.’’

स्तब्ध था मैं. अगर मुझ से भी नहीं मिलती तो किस से मिलती है आजकल?

4 दिन और बीत गए. मैं आफिस के बाद हर शाम अस्पताल चला जाता. मुझे देखते ही ललिताजी का चेहरा खिल जाता. एक बार तो ठिठोली भी की उन्होंने.

‘‘बेचारा बच्चा फंस गया हम बूढ़ों के चक्कर में.’’

इंद्रधनुष

‘‘आप मेरी मां जैसी हैं. घर पर होता और मां बीमार होतीं तो क्या उन के पास नहीं जाता मैं?’’

‘‘नेहा से कब मिलते हो तुम? हर शाम तो यहां चले आते हो?’’

‘‘वह मिलती ही नहीं.’’

‘‘कोई काम नहीं होगा न. काम पड़ेगा तो दौड़ी चली आएगी,’’ ललिताजी ने ही उत्तर दिया.

शर्माजी कुछ समय के लिए घर गए तब ललिताजी ने इशारे से पास बुलाया और कहने लगीं, ‘‘मुझे माफ कर देना बेटा, मेरी वजह से ही तुम नेहा के करीब आए. वह अच्छी लड़की है लेकिन बेहद स्वार्थी है. मोहममता जरा भी नहीं है उस में. हम इनसान हैं बेटा, सामाजिक जीव हैं हम… अकेले नहीं जी सकते. एकदूसरे की मदद करनी पड़ती है हमें. शायद यही वजह है, नेहा अकेली है. किसी की पीड़ा से उसे कोई मतलब नहीं है.’’

‘‘वह आप से मिलने एक बार भी नहीं आई?’’

‘‘उसे पता ही नहीं होगा. पता होता तो शायद आती…और पता वह कभी लेती ही नहीं. जरूरत ही नहीं समझती वह. तुम मिलना चाहो तो जाओ उस के घर, इच्छा होगी तो बात करेगी वरना नहीं करेगी… दोस्ती तक ही रखना तुम अपना रिश्ता, उस से आगे मत जाना. इस तरह के लोग रिश्तों में बंधने लायक नहीं होते, क्योंकि रिश्ते तो बहुत कुछ मांगते हैं न. प्यार भी, स्नेह भी, अपनापन भी और ये सब उस के पास हैं ही नहीं.’’

शर्माजी आए तो ललिताजी चुप हो गईं. शायद उन के सामने वह अपने स्नेह, अपने ममत्व को ठगा जाना स्वीकार नहीं करना चाहती थीं या अपनी पीड़ा दर्शाना नहीं चाहती थीं.

3-4 दिन और बीत गए. ललिताजी घर आ चुकी थीं. नेहा एक बार भी उन से मिलने नहीं आई. लगभग 3 दिन बाद वह लंच में मुझ से मिलने मेरे आफिस चली आई. बड़े प्यार से मिली.

‘‘कहां रहीं तुम इतने दिन? मेरी याद नहीं आई तुम्हें?’’ जरा सा गिला किया था मैं ने.

‘‘जरा व्यस्त थी मैं. घर की सफाई करवा रही थी.’’

‘‘10 दिन से तुम्हारे घर की सफाई ही चल रही है. ऐसी कौन सी सफाई है भई.’’

मन में सोच रहा था कि देखते हैं आज कौन सा काम पड़ गया है इसे, जो जबान में मिठास घुल रही है.

‘‘क्या लोगी खाने में, क्या मंगवाऊं?’’

खाने का आर्डर दिया मैं ने. इस से पहले भी जब हम मिलते थे खाना मैं ही मंगवाता था. अपनी पसंद का खाना मंगवा लिया नेहा ने. खाने के दौरान कभी मेरी कमीज की तारीफ करती तो कभी मेरी.

‘‘शर्माजी और ललिताजी कैसी हैं? शर्माजी छुट्टी पर हैं न, कहीं बाहर गए हैं क्या?’’

‘‘पता नहीं, मैं ने बहुत दिन से उन्हें देखा नहीं.’’

‘‘अरे भई, तुम इस देश की प्रधानमंत्री हो क्या जो इतना काम रहता है तुम्हें. 2 घर छोड़ कर तो रहते हैं वह…और तुम्हारा इतना खयाल भी रखते हैं. 10 दिन से वह तुम से मिले नहीं.’’

‘‘मेरे पास इतना समय नहीं होता. 2 बजे तो स्कूल से आती हूं. 4 बजे बच्चे ट्यूशन पढ़ने आ जाते हैं. 7 बजे तक उस में व्यस्त रहती हूं. इस बीच काम वाली बाई भी आ जाती है…’’

‘‘किसी का हालचाल पूछने के लिए आखिर कितना समय चाहिए नेहा. एक फोन काल या 4-5 मिनट में जा कर भी इनसान वापस आ जाता है. उन के और तुम्हारे घर में आखिर दूरी ही कितनी है.’’

‘‘मुझे बेकार इधरउधर जाना अच्छा नहीं लगता और फिर ललिताजी तो हर पल खाली रहती हैं. उन के साथ बैठ कर गपशप लगाने का समय नहीं होता मेरे पास.’’

नेहा बड़ी तल्खी में जवाब दे रही थी. खाना समाप्त हुआ और वह अपने मुद्दे पर आ गई. अपने पर्स से राशन कार्ड और पैन कार्ड निकाल उस ने मेरे सामने रख दिए.

‘‘यह देखो, इन दोनों में मेरी जन्मतिथि सही नहीं लिखी है. 7 की जगह पर 1 लिखी गई है. जरा इसे ठीक करवा दो.’’

हंस पड़ा मैं. इतनी हंसी आई मुझे कि स्वयं पर काबू पाना ही मुश्किल सा हो गया. किसी तरह संभला मैं.

‘‘तुम ने क्या सोचा था कि तुम्हारा काम हो गया और अब कभी किसी की जरूरत नहीं पड़ेगी. मत भूलो नेहा कि जब तक इनसान जिंदा है उसे किसी न किसी की जरूरत पड़ती है. जिंदा ही क्यों उसे तो मरने के बाद भी 4 आदमी चाहिए, जो उठा कर श्मशान तक ले जाएं. राशन कार्ड और पैन कार्ड जब तक नहीं बना था तुम्हारा मुझ से मिलना चलता रहा. 10 दिन से तुम मिलीं नहीं, क्योंकि तुम्हें मेरी जरूरत नहीं थी. आज तुम्हें पता चला इन में तुम्हारी जन्मतिथि सही नहीं तो मेरी याद आ गई …फार्म तुम ने भरा था न, जन्मतिथि तुम ने भरी थी…उस में मैं क्या कर सकता हूं.’’

‘‘यह क्या कह रहे हो तुम?’’ अवाक्  तो रहना ही था नेहा को.

‘‘अंधे को अंधा कैसे कहूं…उसे बुरा लग सकता है न.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘मतलब साफ है…’’

उसी शाम ललिताजी से मिलने गया. उन्हें हलका बुखार था. शर्माजी भी थकेथके से लग रहे थे. वह बाजार जाने वाले थे, दवाइयां और फल लाने. जिद कर के मैं ही चला गया बाजार. वापस आया और आतेआते खाना भी लेता आया. ललिताजी के लिए तो रोज उबला खाना बनता था जिसे शर्माजी बनाते भी थे और खाते भी थे. उस दिन मेरे साथ उन्होंने तीखा खाना खाया तो लगा बरसों के भूखे हों.

‘‘मैं कहती थी न अपने लिए अलग बनाया करें. उबला खाना खाया तो जाता नहीं, उस पर भूखे रह कर कमजोर भी हो गए हैं.’’

ललिताजी ने पहली बार भेद खोला. दूसरे दिन से मैं रोज ही अपना और शर्माजी का खाना पैक करा कर ले जाने लगा. नेहा की हिम्मत अब भी नहीं हुई कि वह एक बार हम से आ कर मिल जाती. हिम्मत कर के मैं ने सारी आपबीती उन्हें सुना दी. दोनों मेरी कथा सुनने के बाद चुप थे. कुछ देर बाद शर्माजी कहने लगे, ‘‘सोचा था, प्यारी सी बच्ची का साथ रहेगा तो अच्छा लगेगा. उसे हमारा सहारा रहेगा हमें उस का.’’

‘‘सहारा दिया है न हमें प्रकृति ने. बच्ची का सहारा तो सिर्फ हम ही थे… बदले में सहारा देने वाला मिला है हमें… यह बच्चा मिला है न.’’

ललिताजी की आंखें नम थीं, मेरी बांह थपथपा रही थीं वह. मेरा मन भी परिवार के साथ रहने को होता था पर घर दूर था. मुझे भी तो परिवार मिल गया था परदेस में. कौन किस का सहारा था, मैं समझ नहीं पा रहा था. दोनों मुझे मेरे मातापिता जैसे ही लग रहे थे. वे मुझे सहारा मान रहे थे और मैं उन्हें अपना सहारा मान रहा था, क्योंकि शाम होते ही मन होता भाग कर दोनों के पास चला जाऊं.

क्या कहूं मैं? अपनाअपना तरीका है जीने का. कुदरत ने लाखों, करोड़ों जीव बनाए हैं, जो आपस में कभी मिलते हैं और कभी नहीं भी मिलते. नेहा का जीने का अपना तरीका है जिस में वह भी किसी तरह जी ही लेगी. बस, इतना मान सकते हैं हम तीनों कि हम जैसे लोग नेहा जैसों के लिए नहीं बने, सो कैसा अफसोस? सोच सकते हैं कि हमारा चुनाव ही गलत था. कल फिर समय आएगा…कल फिर से कुछ नया तलाश करेंगे, यही तो जीवन है, इसी को तो कहते हैं जीना. Stories Hindi

Short Hindi Story: आठवां फेरा

Short Hindi Story: हमारी शादी को 35 वर्ष का लंबा  अंतराल हो चुका था. दोनों बेटियों की शादी हो चुकी थी और हम 4 वर्ष पुराने नानानानी भी बन चुके थे. सिर के तीनचौथाई बाल सफेद हो गए थे या गायब हो चुके थे. पति 60 वर्ष के ऊपर और मैं भी वहां तक पहुंच रही थी, पर आज कचहरी में अपने एक वकील की 8 बाई 8 फुट की कोठरी में बैठना हमें बड़ा असुविधाजनक लग रहा था.

कोर्टकचहरी तो हम वैसे भी कभी नहीं गए. न कभी चोरी की न कभी डाका डाला. और तो और, ईमानदारी बनाम हमारे पति ने कभी रिश्वत भी नहीं ली लेकिन हमारी प्रवासी बिटिया ने हमें एक फार्म भेजा था. वह चाहती थी कि हम लोग ‘इमीग्रेशन’ के लिए उसे भर दें. जब फार्म भरने बैठे तो ‘विवाहित’ के सामने (ङ्क) मार्क करने के बाद उस फार्म ने फरमाइश की कि यदि आप विवाहित हैं तो ‘मैरिज’ सर्टिफिकेट चाहिए. मैं अपने पति का और पति मेरा मुंह देखने लगे.

यह मैरिज सर्टि- फिकेट क्या होता है? हाईस्कूल सर्टिफिकेट, 12वीं का सर्टिफिकेट, बी.ए. व एम.ए. की डिगरी, पतिदेव की कालिज की तमाम डिगरियों तथा अपने कालिज के स्पोर्ट्स में सदैव तीसरा स्थान पाने वाले 15-20 सर्टिफिकेट्स, सभी की एक फाइल तैयार थी. पर कभी किसी नौकरी के साक्षात्कार से ले कर तत्काल के रेलवे रिजर्वेशन में ऐसा सर्टिफिकेट किसी ने नहीं मांगा था.

‘‘अरे भाई, अब इस उम्र में क्या हमें अपनी शादी का सर्टिफिकेट तैयार करना पड़ेगा?’’

हमारे से आधी उम्र के वकील साहब, जो मेरे छोटे भाई के दोस्त रह चुके थे, बोले, ‘‘जीजी, आप चिंता क्यों करती हैं, मैं हूं न. मैं बनवा दूंगा. आखिर कचहरी में बैठा किसलिए हूं,’’ वह एकदम फिल्मी वकील साहब वाली हंसी हंसते हुए बोले.

हम दोनों चुपचाप बैठे रहे, जहां वह हमें कहते रहे वहां हम दस्तखत करते रहे. कचहरी के जिन गलियारों से वह हमें ले जाते रहे हम वहां से गुजरते रहे. जिन अधिकारियों के सामने पेश किया, पेश हो गए. जहां कहा वहां अंगूठे का निशान तक लगा दिया और 2-3 दिन की दौड़भाग के बाद एक अधमरा सा कागज हमें इस एतराम (रौब) से सौंपा गया जैसे लखनऊ के नवाब की शाही जागीर वह हमें सौंप रहे हों. उस कागज पर तरहतरह की मुहरें हमें दिखाते हुए वकील साहब गहरी सांस ले कर पूरी बत्तीसी दिखाते हुए बोले, ‘‘लीजिए, अब आप और जीजाजी कानूनी तौर पर शादीशुदा हो गए.’’

‘तो क्या हम अब तक गैरकानूनी तौर पर…’ जबान पर भी जो लफ्ज न आ पाए, जरा सोचिए वह खयाल मेरे जेहन पर, मस्तिष्क पर, हृदय पर कितने सारे आड़ेतिरछे प्रश्नचिह्न भाले की तरह चुभो गए होंगे? यह सोच कर कि हम क्या यों ही…तो क्या हम वैसे ही…अब तक पिछले 35 साल से रह रहे थे? कैसा मजाक है कि हमारे बच्चों के जन्म प्रमाणपत्र हैं जिन पर हम उन के कानूनी मांबाप हैं, वह तो स्वीकार है पर हमारी शादी सर्टिफिकेट के बिना…नहीं. यह कैसा विरोधाभास है?

मुझे हंसी भी आ रही थी और एक गहन विचार भी दिमाग में जन्म ले रहा था.

हमारे समाज में हिंदू मैरिज सिस्टम में जहां सैकड़ों छोटीबड़ी रस्मों की भरमार है, जहां शादीविवाह के मामले में हम इतना सोचविचार करते हैं…इतने शुभअशुभ, मंगलअमंगल, रीतिरिवाजों की भरमार है, जहां बिटिया के लिए वर और बेटे के लिए वधू ढूंढ़ने के लिए अनेक आधुनिकतम वैवाहिक विज्ञापन हैं, जहां कई हजार देवीदेवताओं की मंगल कामनाएं मांगने के इतने ढेर सारे रिवाज हैं, जहां विवाह जैसे अति महत्त्वपूर्ण मामले में हम अपनी पूरी मेहनत व पूंजी लगा देते हैं, जहां ब्याहशादी की सैकड़ों रस्मों पर तरहतरह के कपड़ेगहने, खानेपीने, सजनेसजाने की सभी व्यवस्था हम खूब बारीकी से करते हैं, जहां अग्नि को साक्षी मान स्वयं ब्रह्मा, विष्णु, महेश के साथ सैकड़ों रिश्तेदार, मामा, नाना, दादा, दादी व मित्र आशीर्वाद देते हैं, जहां भावविभोर पिता अपनी बेटी का हाथ वर के हाथ में दे कर कन्यादान करता है, जहां सिल्क के धोतीकुरते में सजेसजाए पंडितजी सात फेरे डलवाते हैं वहां ‘एक कागज के टुकड़े बनाम मैरिज सर्टिफिकेट’ का प्रावधान क्या इतना महत्त्वपूर्ण है? यदि हां, तो यह विवाह के समय ही क्यों नहीं दे देना चाहिए?

‘सप्तपदी’ के एकएक श्लोक की विवेचना पर पोथियां लीपी गईं तो कानूनी तौर पर मैरिज सर्टिफिकेट के महत्त्व को ताक पर उठा कर क्यों रखा गया? ‘मैट्रीमोनियल’, ‘रिश्ते ही रिश्ते’ और ‘दुल्हन वही जो पिया मन भाए’ जैसी हजारों संस्थाओं को चाहिए कि वे जिस तरह वाहन सीखने वाले ड्राइविंग स्कूल अपना विज्ञापन करते हैं और अपनी फीस में सिखाने के साथ ड्राइविंग लाइसेंस की फीस निश्चित कर के बताते हैं, उसी प्रकार वरवधू के साथ मैरिज सर्टिफिकेट्स की फीस भी लगा दें या जिस प्रकार बड़े टीवी के साथ छोटा टीवी मुफ्त मिलता है, उसी प्रकार मालदार आसामी के साथ मैरिज सर्टिफिकेट मुफ्त दिला कर अपने व्यापार को ऊपर बढ़ा सकते हैं. कृपया सुझाव नोट करें.

सदियों से चली आ रही हिंदू विवाह पद्धति में कुछ फेरबदल करना आवश्यक है. समय के साथ हिंदू विवाह की रीतियां भी अपने में विकसित करें. अत: हनीमून पर जाने से पहले या बिटिया को ‘मायके’ का फेरा डलवाने से पहले प्रत्येक नवविवाहित जोड़े को एक और रीति का पालन करना होगा.

आज का तकाजा है प्रत्येक विवाह में वरवधू के जोड़े से सातवें फेरे के बाद, जहां सामान्य तौर पर उस के साथ ही यह पंडितजी बड़ों का आशीर्वाद लेने को कहते हैं, उसी समय कहें कि अब विवाह तभी संपूर्ण माना जाएगा जब आप ‘मैरिज रजिस्ट्रार’ के दफ्तर में जा कर आठवां फेरा लगा कर ‘मैरिज सर्टिफिक Short Hindi Story

Stories in Hindi: रिश्ता

पूर्व कथा, Stories in Hindi: आकाश के बीमार होने की खबर अन्नू श्रावणी को देती है. वह नहीं चाहती कि उस के मायके में किसी को इस बात का पता चले. इसलिए वह कालिज के काम से लखनऊ जाने की बात अपने पापा से कहती है. ट्रेन में बैठते ही वह अतीत की यादों में खो जाती है. कालिज के वार्षिक समारोह में अन्नू श्रावणी का परिचय अपने भैया आकाश से करवाती है. पहली ही मुलाकात में आकाश और श्रावणी एकदूसरे की ओर आकर्षित होने लगते हैं. दोनों शादी करने का फैसला करते हैं तो श्रावणी के पिता शादी में जल्दबाजी न करने की सलाह देते हैं पर वह नहीं मानती.

शादी की पहली रात को वह आकाश का बदला रूप देख कर चौंक जाती है. एक दिन पिक्चर हाल में आकाश छोटी सी बात पर हंगामा खड़ा कर देता है और घर आ कर सब के सामने उसे अपमानित करता है और अंतरंग क्षणों में उस से माफी मांगने लगता है. श्रावणी आकाश के इस दोहरे व्यवहार को समझ नहीं पाती. शादी के बाद वह आकाश के साथ पहली बार मायके जाती है तो घर के बाहर एक कार चालक से वह लड़ने लगता है.

समय बीतने लगता है. अन्नू की शादी तय हो जाती है और श्रावणी भी गर्भवती हो जाती है. आकाश उस पर गर्भपात कराने का दबाव बनाने लगता है. उस के इस व्यवहार से घर के सभी लोग दुखी हो जाते हैं. श्रावणी एक बेटे को जन्म देती है. उधर अन्नू की शादी की तारीख करीब आने लगती है लेकिन आकाश का तटस्थ व्यवहार देख सब परेशान होते हैं और शादी की सारी जिम्मेदारी श्रावणी को निभानी पड़ती है, और अब आगे…

आकाश की आदर्शवादी बातों से प्रभावित हो कर श्रावणी ने पिता की इच्छा के विरुद्ध उस से शादी की, लेकिन शादी के बाद आकाश के दोगले और तटस्थ व्यवहार से श्रावणी बिखर कर रह गई. पढि़ए, पुष्पा भाटिया की कहानी.

गतांक से आगे…

अंतिम भाग

अम्मां के आग्रह पर अब सुबहशाम पापा आ जाते थे. पापा के साथ उन की कार में बैठ कर मैं बाहर के काम निबटा लिया करती थी. मां घर और चौके की देखभाल कर लिया करती थीं. बहू के अति विनम्र स्वभाव को देख कर अम्मां आशीर्वादों की झड़ी लगा कर मुक्तकंठ से मेरी मां से सराहना करतीं, ‘बहनजी, जितना सुंदर श्रावणी का तन है, उतना ही सुंदर मन भी है. श्रावणी जैसी बहू तो सब को नसीब हो.’

अन्नू का ब्याह हो गया. मां और पापा घर लौट रहे थे. अम्मां ने एक बार फिर मेरी प्रशंसा मां से की तो मां के जाते ही आकाश के अंत:स्थल में दबा विद्रोह का लावा फूट पड़ा था :

‘वाहवाही बटोरने का बहुत शौक है न तुम्हें? अपने जेवरात क्यों दे दिए तुम ने अन्नू को?’

मैं ने आकाश के साथ उस के परिवार को भी अपनाया था. फिर इस परिवार में मां और बहन के अलावा था भी कौन? दोनों से दुराव की वजह भी क्या थी? मैं ने सफाई देते हुए कहा, ‘जेवर किसी पराए को नहीं अपनी ननद को दिए हैं. अन्नू तुम्हारी बहन है, आकाश. जेवरों का क्या, दोबारा बन जाएंगे.’

‘पैसे पेड़ पर नहीं उगते, श्रावणी, मेहनत करनी पड़ती है.’

मैं अब भी उन के मन में उठते उद्गारों से अनजान थी. चेहरे पर मायूसी के भाव तिर आए थे. रुंधे गले से बोले, ‘इन लोगों ने मुझे कब अपना समझा. हमेशा गैर ही तो समझा…जैसे मैं कोई पैसा कमाने की मशीन हूं. उन दिनों 7 बजे दुकानें खुलती थीं. सुबह जा कर मामा की आढ़त की दुकान पर बैठता. वहां से सीधे दोपहर को स्कूल जाता. तब तक घर का कामकाज निबटा कर मां दुकान संभालती थीं. शाम को स्कूल से लौट कर पुन: दुकान पर बैठता, क्योंकि मामा शाम को किसी दूसरी दुकान पर लेखागीरी का काम संभालते थे. इन लोगों ने मेरा बचपन छीना है. खेल के मैदान में बच्चों को क्रिकेट खेलते देखता तो मां की गोद में सिर रख कर कई बार रोया था मैं, लेकिन मां हर समय चुप्पी ही साधे रहती थीं.’

मनुष्य कभी आत्मविश्लेषण नहीं करता और अगर करता भी है तो हमेशा दूसरे को ही दोषी समझता है. आकाश इन सब बातों का रोना मुझ से कई बार रो चुके थे. अपनी सकारात्मक सोच और आत्मबल की वजह से मैं, अलग होने में नहीं, हालात से सामंजस्य बनाने की नीति में विश्वास करती थी. हमेशा की तरह मैं ने उन्हें एक बार फिर समझाया :

‘अम्मां की विवशता परिस्थितिजन्य थी, आकाश. असमय वैधव्य के बोझ तले दबी अम्मां को समझौतावादी दृष्टिकोण, मजबूरी से अपनाना पड़ा होगा. जिस के सिर पर छत नहीं, पांव तले जमीन नहीं थी, देवर, जेठ, ननदों…सभी ने संबंध विच्छेद कर लिया था तो भाई से क्या उम्मीद करतीं? अम्मां को सहारा दे कर, उन के बच्चों की बुनियादी जरूरतें पूरी कीं, उन्हें आर्थिक और मानसिक संबल प्रदान किया. ऐसे में यदि अम्मां ने बेटे से थोड़े योगदान की उम्मीद की तो गलत क्या किया?

‘आखिर मामा का अपना भी तो परिवार था और फिर अम्मां भी तो हाथ पर हाथ धर कर नहीं बैठी थीं. यही क्या कम बात है कि अपने सीमित साधनों और विषम परिस्थितियों के बावजूद, अम्मां ने तुम्हें और अन्नू को पढ़ालिखा कर इस योग्य बनाया कि आज तुम दोनों समाज में मानसम्मान के साथ जीवन जी रहे हो.’

सुनते ही आकाश आपे से बाहर हो गए, ‘गलती की, जो तुम से अपने मन की बात कह दी…और एक बात ध्यान से सुन लो. मुझे मां ने नहीं पढ़ाया. जो कुछ बना हूं, अपने बलबूते और मेहनत से बना हूं.’

उस दिन आकाश की बातों से उबकाई सी आने लगी थी मुझे. पानी के बहाव को देख कर  बात करने वाले आकाश में आत्मबल तो था ही नहीं, सोच भी नकारात्मक थी. इसीलिए आत्महीनता का केंचुल ओढ़, दूसरों में मीनमेख निकालना, चिड़चिड़ाना उन्हें अच्छा लगता था. खुद मित्रता करते नहीं थे, दूसरों को हंसतेबोलते देखते तो उन्हें कुढ़न होती थी.

अन्नू अकसर घर आती थी. कभी अकेले, कभी प्रमोदजी के साथ. नहीं आती तो मैं बुलवा भेजती थी. उस के आते ही चारों ओर प्रसन्नता पसर जाती थी. अम्मां का झुर्रीदार बेरौनक चेहरा खिल उठता. लेकिन बहन के आते ही भाई के चेहरे पर सलवटें और माथे पर बल उभर आते थे. जब तक वह घर रहती, आकाश यों ही तनावग्रस्त रहते थे.

अन्नू के ब्याह के कुछ समय बाद ही अम्मां ने बिस्तर पकड़ लिया था. मेरा प्रसवकाल भी निकट आता जा रहा था. अम्मां को बिस्तर से उठाना, बिठाना काफी मुश्किल लगता था. मैं ने आकाश से अम्मां के लिए एक नर्स नियुक्त करने के लिए कहा तो उबल पडे़, ‘जानती हो कितना खर्चा होगा? अगले महीने तुम्हारी डिलीवरी होगी. मेरे पास तो पैसे नहीं हैं. तुम जो चाहो, कर लो.’

घरखर्च मेरी पगार से चलता था. मैं ने कभी भी खुद को इस घर से अलग नहीं समझा, न ही कभी आकाश से हिसाब मांगा. अन्नू के ब्याह पर भी अपने प्राविडेंट फंड में से पैसा निकाला था. फिर इस संकीर्ण मानसिकता की वजह क्या थी? किसी से कुछ भी पूछने की जरूरत नहीं पड़ी. मां के इलाज के लिए पैसेपैसे को रोने वाले बेटे को चमचमाती हुई कार दरवाजे के बाहर पार्क करते देख कर कोई पूछ भी क्या सकता था? डा. प्रमोद ही अम्मां की देखभाल करते रहे थे.

कुछ ही दिनों बाद अम्मां ने दम तोड़ दिया. मैं फूटफूट कर रो रही थी. एकमात्र संबल, जिस के कंधे पर सिर रख कर मैं अपना सुखदुख बांट सकती थी, वह भी छिन गया था. मां ढाढ़स बंधा रही थीं. पापा, अन्नू और प्रमोदजी मित्रोंपरिजनों की सहानुभूतियां बटोर रहे थे. दुनिया ने चाहे कितनी भी तरक्की कर ली हो पर जातियों में बंटा हमारा समाज आज भी 18वीं सदी में जी रहा है. ब्याहशादियों में कोई आए न आए, मृत्यु के अवसर पर जरूर पहुंचते हैं.

धीरेधीरे यहां भी लोगों की भीड़ जमा होनी शुरू हो गई. मांपापा, अन्नू, प्रमोद, यहीं हमारे घर पर ठहरे हुए थे. आकाश घर में रह कर भी घर पर नहीं थे. एक बार वही तटस्थता उन पर फिर हावी हो चुकी थी. जब मौका मिलता, घर से बाहर निकल जाते और जब वापस लौटते तो उन की सांसों से आती शराब की दुर्गंध, पूरे वातावरण को दूषित कर देती. प्रबंध से ले कर पूरी सामाजिकता प्रमोदजी ही निभा रहे थे और यह सब मुझे अच्छा नहीं लग रहा था. यह सोच कर कि अम्मां बेटे की मां थीं. आकाश को उन्होंने जन्म दिया था, पालपोस कर बड़ा किया था तो अम्मां के प्रति उन की जिम्मेदारी बनती है.

एक दिन पंडितों के लिए वस्त्र, खाद्यान्न, हवन के लिए नैवेद्य आदि लाते हुए प्रमोदजी को देखा तो बरसों का उबाल, हांडी में बंद दूध की तरह उबाल खाने लगा, ‘ये सब काम आप को करने चाहिए आकाश. प्रमोदजी इस घर के दामाद हैं. फिर भी कितनी शांति से दौड़भाग में लगे हुए हैं.’

‘मैं शुरू से ही जानता था. तुम्हें ऐसे ही लोग पसंद हैं जो औरतों के इर्दगिर्द चक्कर लगाते हैं और खासकर के तुम्हारी जीहुजूरी करते हैं,’ फिर मां और पापा को संबोधित कर के बोले, ‘प्रमोद जैसा लड़का ढूंढ़ दीजिए अपनी बेटी को,’ और धड़धड़ाते हुए वह कमरे से बाहर निकल गए.

आकाश का ऐसा व्यवहार मैं कई बार देख चुकी थी. बरदाश्त भी कर चुकी थी. कई बार दिल में अलग होने का खयाल भी आया था लेकिन कर्तव्य व प्रेम के दो पाटों में पिस कर वह चूरचूर हो गया. आकाश के झूठ, दंभ और पशुता को मैं इसीलिए अपनी पीठ पर लादे रही कि समाज में मेरी इमेज, एक सुखी पत्नी की बनी रहे. लेकिन आकाश ने इन बातों को कभी नहीं समझा. वहां आए रिश्तेदारों के सामने, मां की मृत्यु के मौके पर वह मुझे इस तरह जलील करेंगे, ऐसी उम्मीद नहीं थी मुझे.

तेरहवीं के दिन, शाम के समय मां और पापा ने मुझे साथ चलने के लिए कहा तो, सभ्य रहने की दीवार जो मैं ने आज तक खींच रखी थी, धीरे से ढह गई. पूरी तरह प्रतिक्रियाविहीन हो कर, जड़ संबंधों को कोई कब तक ढो सकता था? चुपचाप चली आई थी मां के साथ.

इसे औरत की मजबूरी कहें या मोह- जाल में फंसने की आदत. बरसों तक त्रासदी और अवहेलना के दौर से गुजरने के बाद भी, उसी चिरपरिचित चेहरे को देखने का खयाल बारबार आता था. क्रोध से पागल हुआ आकाश, नफरत भरी दृष्टि से मुझे देखता आकाश, अम्मां को खरीखोटी सुनाता आकाश, अन्नू को दुत्कारता, प्रमोदजी का अनादर करता आकाश.

मां और पापा, सुबहशाम की सैर को निकल जाते तो मुझे तिनकेतिनके जोड़ कर बनाया अपना घरौंदा याद आता, एकांत और अकेलापन जब असहनीय हो उठता तो दौड़ कर अन्नू को फोन मिला देती. अन्नू एक ही उत्तर देती कि सागर में से मोती ढूंढ़ने की कोशिश मत करो श्रावणी. आकाश भैया अपनी एक सहकर्मी मालती के साथ रह कर, मुक्ति- पर्व मना रहे हैं. हर रात शराब  के गिलास खनकते हैं और वह दिल खोल कर तुम्हें बदनाम करते हैं.

बिट्टू के जन्म के समय भी आकाश की प्रतीक्षा करती रही थी. पदचाप और दरवाजे के हर खटके पर मेरी आंखों में चमक लौट आती. लेकिन आकाश नहीं आए. अन्नू प्रमोदजी के साथ आई थी. मेरी पसीने से भीगी हथेली को अपनी मजबूत हथेली के शिकंजे से, धीरेधीरे खिसकते देख बोली, ‘मृगतृष्णा में जी रही हो तुम श्रावणी. आकाश भैया नहीं आएंगे. न ही किसी प्रकार का संपर्क ही स्थापित करेंगे तुम से. जब तक तुम थीं तब तक कालिज तो जाते थे. परिवार के दायित्व चाहे न निभाए, अपनी देखभाल तो करते ही थे. आजकल तो नशे की लत लग गई है उन्हें.’

अन्नू चली गई. मां मेरी देखभाल करती रहीं. लोग मुबारक देते, साथ ही आकाश के बारे में प्रश्न करते तो मैं बुझ जाती. मां के कंधे पर सिर रख कर रोती, ‘बिट्टू के सिर से उस के पिता का साया छीन कर मैं ने बहुत बड़ा अपराध किया है, मां.’

‘जिस के पास संतुलित आचरण का अपार संग्रह न हो, जो झूठ और सच, न्यायअन्याय में अंतर न कर सके, वह समाज में रह कर भी समाज का अंग नहीं बन सकता, न ही किसी दृष्टि में सम्मानित बन सकता है,’ पापा की चिढ़, उन के शब्दों में मुखर हो उठती थी.

मां, पुराने विचारों की थीं, मुझे समझातीं, ‘बेटी, यह बात तो नहीं कि तू ने प्रयास नहीं किए, लेकिन जब इतने प्रयासों के बाद भी तुझे तेरे पति से मंजूरी नहीं मिली तो क्या करती? साए की ओट में दम घुटने लगे तो ऐसे साए को छोड़ खुली हवा में सांस लेने में ही समझदारी है.’

‘लेकिन जगहजगह उसे पिता के नाम की जरूरत पड़ेगी तब?’

‘अब वह जमाना नहीं रहा, जब जन्म देने वाली मां का नाम सिर्फ अस्पताल के रजिस्टर तक सीमित रहता था और स्कूल, नौकरी, विवाह के समय बच्चे की पहचान पिता के नाम से होती थी. आज कानूनन इन सभी जगहों पर मां का नाम ही पर्याप्त है.’

मां की मृत्यु पर भी आकाश नहीं दिखाई दिए थे. अन्नू और प्रमोदजी ही आए थे. मैं समझ गई, जिस व्यक्ति ने मुझ से संबंध विच्छेद कर लिया वह मेरी मां की मृत्यु पर क्यों आने लगा. जाते समय अन्नू ने धीरे से बतला दिया था, ‘आजकल आकाश भैया सुबह से ही बोतल खोल कर बैठ जाते हैं. मैं ने सौ बार समझाया और उन्होंने न पीने का वादा भी किया, लेकिन फिर शुरू हो जाते हैं,’ फिर एक सर्द आह  भर कर बोली, ‘लिवर खराब हो गया है पूरी तरह. प्रमोदजी काफी ध्यान रखते हैं उन का लेकिन कुछ परहेज तो भैया को भी रखना चाहिए.’

सोच के अपने बयावान में भटकती कब मैं झांसी पहुंची पता ही नहीं चला. तंद्रा तो मेरी तब टूटी जब किसी ने मुझे स्टेशन आने की सूचना दी. लोगों के साथ टे्रन से उतर कर मैं स्टेशन से सीधे अस्पताल पहुंच गई. अन्नू पहले से ही मौजूद थी. प्रमोद डाक्टरों के साथ बातचीत में उलझे थे. मैं ने आकाश के पलंग के पास पड़े स्टूल पर ही रात काट दी. सच कहूं तो नींद आंखों से कोसों दूर थी. मेरा मन सारी रात न जाने कहांकहां भटकता रहा.

सुबह अन्नू ने चाय पी कर मुझे जबर्दस्ती घर के लिए ठेल दिया. आकाश तब भी दवाओं के नशे में सोए हुए थे.

घर आ कर मुझे जरा भी अच्छा नहीं लग रहा था. पराएपन की गंध हर ओर से आ रही थी. नहाधो कर आराम करने का मन बना ही रही थी, पर अकेलापन मुझे काटने को दौड़ रहा था. घर से निकल कर अस्पताल पहुंची तो आकाश, नींद से जाग चुके थे. अन्नू के साथ बैठे चाय पी रहे थे. मुझे देख कर भी कुछ नहीं बोले. मैं ने धीरे से पूछा, ‘‘तबीयत कैसी है?’’

‘‘ठीक है,’’ उन का जवाब ठंडे लोहे की तरह लगा. किसी के बारे में कुछ पूछताछ नहीं की. यहां तक कि बिट्टू के बारे में भी कुछ नहीं पूछा. अन्नू ही कमरे में मौन तोड़ती रही. हम दोनों के बीच पुल बनाने का प्रयास करती रही. डाक्टरों की आवाजाही जारी थी. सारे दिन लोग, आकाश से मिलने आते रहे. मुझे देख कर हर आने वाला कहता, ‘अच्छा हुआ आप आ गईं,’ पर 3 दिन में, एक बार भी मेरे पति ने यह नहीं कहा, ‘अच्छा हुआ जो तुम आ गईं. तुम्हें बहुत मिस कर रहा था मैं.’

आकाश की हालत काबू में नहीं आ रही थी. प्रमोदजी ने मुझ से धीरे से कहा, ‘‘भाभीजी, आकाश भैया की हालत अच्छी नहीं लग रही है. आप जिसे चाहें खबर कर दें.’’

मैं जब तक कुछ कहती या करती, आकाश ने दम तोड़ दिया. अन्नू फूटफूट कर रो रही थी. प्रमोदजी उसे ढाढ़स बंधा रहे थे. मेरे तो जैसे आंसू ही सूख गए थे. इस पर क्या आंसू बहाऊं? जिस आदमी ने मुझे कभी अपना नहीं समझा…मेरे बेटे को अपना समझना तो दूर उस का चेहरा तक नहीं देखा, मैं कैसे उस आदमी के लिए रोऊं? यह बात मेरी समझ से बाहर थी.

जाने कितने लोग, शोक प्रकट करने आ रहे थे. हर आदमी, इतनी कम उम्र में इन के चले जाने से दुखी था, पर मैं जैसे जड़ हो गई थी. इतने लोगों को रोते देख कर भी मैं पत्थर की हो गई थी. मेरे आंसू न जाने क्यों मौन हो गए थे? सब कह रहे थे, मुझे गहरा शौक लगा है. इन दिनों आकाश की सारी बुराइयां खत्म हो गई थीं. हर व्यक्ति को उन की अच्छाइयां याद आ रही थीं. मैं खामोश थी.

पापा का फोन मेरे मोबाइल पर कई बार आ चुका था. मैं उन्हें 1-2 दिन का काम और है बता कर फोन काट देती थी. तेरहवीं के बाद सब ने अपनाअपना सामान बांध लिया. मेरी उत्सुक निगाहें मालती को ढूंढ़ रही थीं. अन्नू से ही पूछताछ की तो बोली, ‘‘आकाश भैया का सारा पैसा अपने नाम करवा कर वह तो कभी की चली गई झांसी छोड़ कर. कहां है, कैसी है हम नहीं जानते. भला ऐसी औरतें रिश्ता निभाती हैं?’’

झांसी से टे्रन के चलते ही मैं ने राहत की सांस ली. ऐसा लगा, जैसे मैं किसी कैद से बाहर आ गई हूं. झांसी की सीमा पार करते ही मुझे पहली बार एहसास हुआ कि झांसी से मेरा रिश्ता सचमुच टूट गया है. अब मैं यहां क्यों आऊंगी? रिश्तों के दरकने का मुझे पहली बार एहसास हुआ. मैं फूटफूट कर रो पड़ी. Stories in Hindi

Consensual Sex: सहमति से यौन संबंध- न उम्र की सीमा हो, न कानून का हो बंधन

Consensual Sex: सुप्रीम कोर्ट का फैसला जो भी आए जब भी आए लेकिन मुद्दा गंभीर और संवेदनशील है किशोरों की यौन इच्छाओं और सक्रियता पर अंकुश लगाने की बात ही अव्यवहारिक है. हां, इसे मैनेज करने के उपायों पर जरूर हर किसी को विचार करने की जरूरत है. खासतौर से खुद टीनएजर्स और पेरेंट्स को तो विवेक से काम लेना पड़ेगा.

चक्रपाणि महाराज, डा. विक्रम सिंह, नाजिया इलाही खान और डा. एपी सिंह के नाम हालांकि कम ही लोगों ने सुने होंगे लेकिन जिन्होंने भी सुने होंगे वे यह भी जानते हैं कि इन लोगों का पसंदीदा कामधंधा धर्म रक्षा का है. इसके लिएए लोग हर उस काम का विरोध करते रहते हैं जिसके होने से मानव मात्र और उसमें भी महिलाओं का भला होता हो लेकिन धर्म, संस्कृतिऔर भगवा गैंगवगैरह उसे सहमति और अनुमति न देते हों. जो कोई भी उदारवादी संकुचित धार्मिक धारणाओं और पूर्वाग्रहों के खिलाफ जाता है ए और ऐसे लोग उस पर शाब्दिक लावलश्कर लेकर रट्टू तोते की तरह चढ़ाई यह कहते कर देते हैं कि इससे धर्म को खतरा है. हमारी संस्कृति नष्टभृष्ट करने की साजिश रची जा रही है. लिहाजा संस्कृति के ठेकेदार होने के नाते हम इस का विरोध करते हैं.
क्यों ए लोग मशहूर अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह को एक संवेदनशील मुद्दे पर घेर रहे हैं इसे जानने से पहले इनके विचारों को थोड़े से में समझ लें तो स्पष्ट हो जाएगा कि अपने अपने पेशे में गहरा दखल पकड़ और नालेज रखने वाले ए लोग दरअसल में भगवा गैंग के बौद्धिक मोहरे हैं.जो धर्म या संस्कृति संबंधी कोई भी मसला या विवाद खड़ा होने पर वही भाषा बोलने लगते हैं जो संघी और भाजपाई बोलते हैं. यही भाषा हिंदूराष्ट्र को मुहिम की शक्ल देने वाले धर्मगुरु बोलते हैं, धीरेधीरे यही भाषा और उसके विचार जिनका स्रोत धर्म ग्रंथ ही होते हैं सड़क चौराहों और चौपालों तक को जकड़ लेती है.

चौकड़ी के 4 चेहरे
इस चौकड़ी में से चक्रपाणि महाराज के बारे में तो इतना भर कह देना काफी है कि वे तथाकथित हिंदू महासभा के तथाकथित राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और बेहद हास्यास्पद बात यह है कि वे खुद के कृष्ण का कलयुगी अवतार होने का दावा अपने चेलेचपाटों और अनुयायियों से करवाते रहते हैं.आज से कोई पांच साल पहले उन्होंने एक गौ मूत्र पार्टी का आयोजन कर हर किसी को हंसने और हर किसी को ही सोचने का मौका जरूर दे दिया था कि हिंदू राष्ट्र अगर कभी बन पाया तो उस का राष्ट्रीय पेय क्या होगा. दिल्ली का नाम बदलकर इन्द्रप्रस्थ करने का आईडिया या सुझाव भी इन्हीं महाराज का है.
नाजिया इलाही खान कहने को ही यानी एक्सिडेंटल मुसलमान हैं. दरअसल में वे एक कट्टर हिंदू महिलाओं सरीखी मानसिकता वाली अधिवक्ता हैं जिसने कभी यह कहते सनसनी मचा दी थी कि मैं अभिनेता पुनीत वशिष्ट के साथ काशी में शादी करूंगी और अयोध्या के राममंदिर में फेरे लूंगी.
इससे भी ज्यादा अहम उनका यह कहना रहा था कि मुस्लिम पुरुषों द्वारा मुस्लिम महिलाओं के शोषण को रोकने की ताकत मुझे हिंदू धर्म देता है. लव जिहाद जैसे मुद्दे पर नाजिया वही भाषा बोलती हैं जो सड़कों पर हिंदूवादी संगठनों के कार्यकर्त्ता अपना गमछा फहराते नारों की शक्ल में बोलते हैं.
कई अहम और जिम्मेदार पदों पर रह चुके डाक्टर विक्रम सिंह एक रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी हैं जो उत्तरप्रदेश के डीजी भी रहे है. बिलाशक उनके पास गहरा प्रशासनिक अनुभव है और वे गंभीर भी हैं लेकिन बात जहां वास्तविक विवेक को इस्तेमाल करने की आती है वे झट से चक्रपानी महाराज और नाजिया इलाहीखान हो जाते हैं. कमोबेश यही स्थिति इंदिरा जयसिंह के हमपेशा एपी सिंह की है जो निर्भया मामले में आरोपियों का आखिर तक बचाव करते रहे थे पुरुष मंत्रालय की मांग उठाकर भी सुर्खियां बटोरने बाले एपी सिंहअपने दौर के बदनाम तांत्रिक चन्द्रा स्वामी के सहयोगी रहे हैं जिनकी बातें और व्यक्तित्व दोनों ही विकट के विरोधाभासी हैं.
इन दिनों लाखोंकरोड़ों हिंदूवादियों की तरहए चारों भी इंदिरा जयसिंह से खासे चिढ़े हुए हैं जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में एक रिट दायर कर रखी है. 25 जुलाई 2025 को दायर इस याचिका में इंदिरा जयसिंह ने मांग की है किप्रोटेक्शन औफ चिल्ड्रन फ्रौम सैक्सुल औफेंस 2012 यानी पोस्को एक्ट 2012 और आईपीसी की धारा 375 के तहत यौन सहमति की न्यूनतम उम्र को 18 से घटाकर 16 साल किया जाए.
अपनी मांग के बाबत उनके पास जो तर्क, उद्धरण और तथ्य हैं जिनसे असहमत वही हो सकता है जो इस क्या किसी भी उम्र में सैक्स को पाप समझता हो खासतौर सेअविवाहित रहते और विवाहेत्तर मामलों में क्योंकि इन्होंने एक धारणा सैक्स के बारे में बना रखी है कि वह धर्म और उसके निर्देशों के मुताबिक ही करना चाहिए नहीं तो वह पाप है.

दमदार दलीलें इंदिरा जयसिंह की
सुप्रीम कोर्ट में बतौर एमिकस क्यूरी (न्यायालय या कोर्ट का मित्र जिसे सुप्रीम कोर्ट नियुक्त करता है) तैनात इंदिरा जयसिंह ने पहली दलील यह दी है कि यौन संबंधों के लिए सहमति की उम्र 1860 से ही 16 साल रही लेकिन 2013 में इसे बढ़ाकर 18 कर दिया गया. यह बिना किसी आधार के किया गया मनमाना बदलाव है जो संविधान के अनुच्छेद 14 समानता) का उल्लंघन करता हुआ है.
गौरतलब है कि निर्भया हादसे के बाद पूर्व जस्टिस जेएस वर्मा की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की गई थी जिसके दूसरे दो सदस्य पूर्व जज लीला सेठ और वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम थे. महिलाओं के खिलाफ होने वाली यौन हिंसा से सुरक्षा पर गठित इस कमेटी ने 23 जनवरी 2013 को पेश रिपोर्ट में कहा था कि पोस्को एक्ट में सहमति की उम्र को 16 साल ही रखा जाए.
इस कमेटी ने यह भी कहा था कि 16-18 साल के किशोरों को परिपक्वता का अधिकार दिया जाए और सहमति वाले संबंधों को अपराध न बनाया जाए. 18 साल की सख्ती से किशोरों में यौन स्वायतता का उल्लंघन होगा जो संविधान के अनुच्छेद 21 के खिलाफ है.कमेटी का सुझाव था कि आईपीसी की धारा 375 में संशोधन किया जाएमसलन बलात्कार की परिभाषा का विस्तार, वैवाहिक बलात्कार को अपराध मानना और तेज ट्रायल.
इस कमेटी की अहमियत इसी बात से समझी जा सकती है कि इसकी सिफारिशों की बिना पर ही 2013 का आपराधिक कानून ( संशोधन ) अधिनियम बना और 3 अप्रैल 2013 को लागू भी हो गया. लेकिन सहमति की उम्र वाला सुझाव संसद ने किनारे कर दिया गया. अब इसे इंदिरा जयसिंह उठा रही हैं तो कईयों को यह गुनाह लग रहा है तय है ए लोग यथास्थितिवादी हैं.
सुप्रीम कोर्ट में इंदिरा जयसिंह ने दूसरी दलील यह दी है कि एनऍफएचएस-5 ( नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे ) जैसे सर्वे यह दिखाते हैं कि 15 से 19 साल की उम्र वाली लड़कियों में 8 फीसदी से अधिक को यौन संबंधों का अनुभव होता है. पोस्को के तहत 16 से 18 साल के मामलों में महज 4 साल में अभियोजन 180 फीसदी तक बढ़ा लेकिन ज्यादातर इंटर कास्ट और इंटर फेथ ( अंतर्धार्मिक ) संबंधों के खिलाफ पेरेंट्स की शिकायतें हैं.यह कानून सहमति को शोषण के बराबर ठहराता है जबकि किशोरों को शिक्षा और संवाद की जरूरत है न कि जेल की.
बात शीशे की तरह साफ़ है जो बदलते समाज और परिवारों की तरफ ध्यान मोड़ती है कि तेजी से बहुत तेजी से टीनऐजर्स में सैक्स इच्छाएं पनपने लगी हैं जिन्हें घर के बड़े पेरेंट्स तो क्या कोई भी दबा नहीं सकता.
वह दौर गया जब बाहर जाते समय मांबाप लड़की को ताले में बंद कर जाते थे. अब दौर यह है कि एकल परिवारों के चलते लड़की के पास भी घर की एक चाबी है और वह दिन भर अकेली रहती है. दोपहर के 4 घंटे जिन्हें टीनऐजर्स गोल्डन आवर्स कहते हैं में इत्मीनान से लड़कालड़की मिलते हैं पढ़ाईलिखाई करते हैं सिनेमा और ओटीटी की चर्चा करते हैं और फिर एक दिन प्यार रोमांस और सैक्स पर आ जाते हैं.
इसमें गलत कुछ नहीं है क्योंकि उनकी अपनी जिज्ञासाएं हैं, इच्छाए, उत्कंठा, उत्तेजना और भूख है जिसे मिटाने वे एक हो जाते हैं यानी सहवास कर बैठते हैं जो खाना खाने जैसी स्वभाविक बात है. लेकिन एक बड़ा फर्क या डर कुछ भी कह लें इस खाने के बाद लड़की के प्रैगनेंट हो जाने का है जो तमाम फसादों की जड़ है. यह जरूर चिंता की बात है जिससे तमाम पेरेंट्स डरते हैं.
समझदार पेरेंट्स जो बमुश्किल 25 फीसदी ही होंगे संतान से यह कम कहते हैं कि ऐसा मत करना बल्कि इशारों में समझाइश यह देते हैं कि ऐसा वैसा कुछ न हो जाए इसलिए एहतियात बरतना. पूरे सौ फीसदी पेरेंट्स से इतनी समझ की उम्मीद रखना बेकार की बात है जिसकी वजह उन की रूढ़ियां, परम्परागत मानसिकता के साथ साथ पौराणिक और सामाजिक मान्यताएं हैं.
जब नाबालिग लड़की प्रैगनेंट हो जाती है तो पेरेंट्स कुदरती तौर पर परेशानियों और तनाव से घिर जाते हैं.उनकी पहली कोशिश अबार्शन की होती है जो गलत कहीं से नहीं लेकिन वह मुमकिन न रह जाए तो वे सारा ठीकरा और दोष लड़के के सर फोड़ते अपनी इज्जत बचाने में ही भलाई समझते हैं.
ऐसे अधिकतर मामलों में लड़का दूसरी जाति या धर्म का ही होता है इसलिए उसके खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज करा दी जाती है.लड़की अगर उसके साथ भाग गई हो तो फिर मामला अपहरण का भी बन जाता है.
यही होतेहोते ऐसे अपराधों की तादाद 1917 से लेकर 1923 तक 180 फीसदी बढ़ी है. लेकिन ए अपराध वास्तविक नहीं हैं बल्कि इनमें से अधिकतर गढ़े गए होते हैं. दरअसल में यह प्यार रोमांस या सैक्स कुछ भी कह लें होता है. दोषी किशोर को जेल भेज देने से बड़ा गुनाह कोई और ऐसे मामलों में हो भी नहीं सकता जो रोज सैकड़ों हजारों जगह किया जाता है.
जबकि ऐसा करने बाले भी बेहतर जानते समझते हैं कि यह समस्या का हल नहीं है क्योंकि किशोर प्रेम दरअसल में एक ख़ूबसूरत एहसास है जो सदियों से किशोरों के दिलोदिमाग में बसता आ रहा है. लेकिन कम उम्र लड़कालडकी को इस से कोई फर्क नहीं पड़ता.
दो टूक कहा जाए तो बेहतर यही होगा कि समाज इनके साथ जीना सीख ले इन्हें स्वीकार करना सीख ले. किशोर प्रेम पर बनी दो कामयाब व्यासायिक फिल्में राजकपूर की बाबी और राजेंद्र कुमार की लव स्टोरी इसी अंत के साथ खत्म होती हैं कि पेरेंट्स ने उनके प्यार को समझ और स्वीकार लिया था.
रियल लाइफ और मामलों में कानून का रोल लड़के को बलात्कारी ठहराते उसे सीखंचों के पीछे भेज देने भर का रह जाता है जिससे उनका भविष्य शिक्षा और करियर सब बर्बाद हो जाते हैं और लड़की भी अपराधबोध से ग्रस्त रहते घुटन में जीती रहती है क्योंकि उसने भी प्यार किया था गुनाह नहीं.

इंदिरा जयसिंह इसी कमी या ज्यादती के खिलाफ अदालत से गुहार लगा रही हैं कि 18 साल से कम बालों को दूध पीता बच्चा समझने की भूल न की जाए . इस उम्र में उनकी यौन सक्रियता सामान्य है दिक्कत तो यह है कि हम उसे सहज ढंग से नहीं ले पाते.
इंदिरा जयसिंह की तीसरी दमदार दलील यह है कि पिछड़ना नैतिकता नहीं है कानून को किशोरों की वास्तविकता के अनुरूप बनाना चाहिए जसे क्लोज इन एज अपवाद उम्र का अंतर 2-3 साल तक अपराध न माना जाए और अनिवार्य रिपोर्टिंग ( धारा 19 ) में छूट हो. बकौल इंदिरा जयसिंह कई हाईकोर्ट खासतौर से बौम्बे और मद्रास के फैसले इस बात की पुष्टि करते हैं कि सहमति और शोषण में अंतर हो.
इसे और आसान तरीके से समझें तो मतलब यह निकलता है कि अगर 14 साल की कोई लड़की 14 से 16 साल तक के लड़के से प्यार कर बैठती है तो दोनों में से कोई भी अपराधी नहीं माना जाना चाहिए. हांलड़के की उम्र इससे ज्यादा हो तो क़ानूनी काररवाई में हर्ज नहीं उलटे वह जरूरी है क्योंकि लड़के की मंशा प्यार की न होकर शारीरिक सुख भोगने की होगी. जाहिर है कि वह नादानी के दायरे से बाहर निकल चुका एक दुनियादार युवक होता है जो प्रेम नही शोषण कर रहा है. यानी अपराध तय करने का एक पैमाना समझ भी होना चाहिए.

सरकार और इस चौकड़ी में फर्क क्या?
केंद्र सरकार बहुत साफ विरोध इस बात का उपर बताई गई चौकड़ी की तरह यह कहते कर रही है सहमति की उम्र 18 से घटाकर 16 नहीं की जा सकती. अगस्त की सुनवाई में एडिशनल सालिस्टर जनरल एश्वर्या भाटी ने कहा कि यह बदलाव नाबालिगों की सुरक्षा को खतरे में डाल देगा. बकौल सरकार 18 साल से कम उम्र के बच्चे खासतौर से लड़कियां शोषण जबरदस्ती और धोखे के प्रति असुरक्षित होते हैं. उम्र घटाने से अपराधी सहमति का हवाला देकर बच जाएंगे मौजूदा प्रावधान नाबालिगों को ढाल की तरह बचाता है.
दूसरे 16 साल पर सहमति बनने से बाल विवाह जो पहले से ही समस्या है और बढ़ जाएंगे क्योंकि उसे वैधता मिल जाएगी. इससे अनचाहा गर्भ धारण गर्भपात और मां बच्चे की मौतें बढ़ेंगी डब्ल्यूएचओ और यूनिसेफ जैसे संगठन 18 साल की सिफारिश करते हैं एनसीआरबी का डेटा बताता है कि पोस्को मामलों में बढ़ोत्तरी हुई है लेकिन वह सुरक्षा की वजह से है न कि दुरूपयोग की वजह से है. अनुच्छेद 21 ( जीवन और गरिमा ) के तहत राज्य का कर्तव्य है बच्चों की रक्षा करना, न कि उनकी स्वायतता को जोखिम में डालना. हां क्लोज इन एज यानी उम्र अंतर पर छूट जोड़ सकते हैं लेकिन उम्र घटाना गलत है.
जवाब देखनेपढ़ने में ही सटीक लगता है नहीं तो इसमें कुछ विरोधाभास हैं मसलन यह कि बदलाव नाबालिगों की सुरक्षा को खतरे में डाल देगा एक धारणा भर है हो यह भी तो सकता है कि बदलाव सुरक्षा को मजबूत करे.अपराधी सहमति का हवाला देकर बच जाएंगे यह भी एक फिजूल शंका और पूर्वाग्रह लगता है क्योंकि प्यार करने वालों को पहले ही अपराध मान लिया गया है सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसले इस धारणा को उलटते हुए भी हैं जिनमें से एक चर्चित है मुकदमे का नाम है इन रे राईट टू प्राइवेसी आफ एडोलसेंट्स. इस मामले में फैसला 25 अगस्त 2025 को आया था.
किशोर जोड़े में से लड़की की उम्र 17 और लड़के की 20 साल थी लड़के पर पोस्को एक्ट की धारा 6 और आईपी सी की धारा 376 के आरोप थे. ट्रायल कोर्ट ने लड़के को 20 साल की सजा दी लेकिन कलकत्ता हाई कोर्ट ने उसे बरी कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने पहले तो सजा बहाल की लेकिन बाद में माफी देते हुए कहा फालिंग इन लव इज नोट ए क्राइम. यह भी उसने जोड़ा कि किशोरों के प्रेम संबंधों को पोस्को के तहत स्वत अपराध न बनाया जाए क्योंकि कानून के उद्देश्य शोषण रोकना है न कि प्यार को दंडित करना.
सबसे बड़ी अदालत के इसी मामले में कहे गए इस कथन को खास तवज्जो मिली थी कि मातापिता अक्सर इंटर कास्ट या इंटर फेथ प्रेम के खिलाफ शिकायत करते हैं जिससे किशोरों को जेल और कलंक का सामना करना पड़ता है सामाजिक वास्तविकता को ध्यान में रखा जाना चाहिए किशोरों में यौन जिज्ञासा सामान्य है.
इस मामले में कोर्ट ने जाहिर है सहमति की उम्र 18 ही रखी थी यानी न्यायिक विवेक का इस्तेमाल किया था क्योंकि लड़की ने एक बच्चे को जन्म दिया था अब अगर कोर्ट उसके पति की सजा बरक़रार रखता तो तय है पत्नी दर दर की ठोकरें खाती और हैरानी नहीं होती अगर वह किसी रेड लाइट इलाके का हिस्सा बन गई होती सभ्य समाज ऐसी पापिनो और कलंकनियों पर कोई रहम नहीं करता बल्कि उनका बहिष्कार तिरस्कार कर उसकी जिंदगी नर्क बना देता.
लेकिन इन और ऐसी सैकड़ों हकीकतों से सरकार और हिंदूवादी भोंपुओ को कोई सरोकार नहीं सरकार को हक है कि वह कोर्ट में अपना पक्ष रखे और फैसले का इंतजार करे लेकिन चौकड़ी के पेट में उठती मरोड़ें बता रही हैं कि वह आशंकित है इसलिए इंदिरा जयसिंह पर पिल पड़ी है

आइए देखें कि किसने क्या कहा?
डाक्टर विक्रम सिंह – इंदिरा जयसिंह बेशक बड़ी और सुप्रीम कोर्ट की सीनियर काउन्सिल हों लेकिन उनके महिला होने के नाते मैं उनसे कतई यह उम्मीद नहीं रखता कि वह ही आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बनाने की उम्र 18 साल से घटाकर 16 करने जैसी बेहूदा मांग करेंगी. क्या वे नहीं जानती कि एक 16 साल की बच्ची या किशोर की इस अवस्था में क्या और कितनी अपरिपक्व होती है वह जब बच्चे को जन्म देगी तब क्या इसे मौत के मुंह मे धकेनले जैसी बात नहीं.
क्या इंदिरा जयसिंह नहीं जानतीं कि इससे किशोरों के अंदर यौन हिंसा की भावनाएं ज्यादा बढ़कर दावानल की तरह भड्केंगी. 37 साल पुलिस अफसरी करने के अनुभव से मैं दावे से कह सकता हूं कि इससे हमारी आने वाली और मौजूदा पीढ़ी सेक्स के मामले में तबाही और बर्बादी के दरिया में उतार दी जाएगी.
डाक्टर एपी सिंह – इंदिरा जयसिंह जी क्या कह रही हैं क्या कर रही हैं.. वह सीता, सावित्री, अहिल्या के देश में क्या करने पर उतारू हैं मेरी तो समझ के ही बाहर है कि एक महिला ही महिला के बारे में इतना बेहूदा सोच ले. तब तो फिर ऐसे बकवास मुद्दे पर जन आन्दोलन की जरूरत है. इंदिरा जयसिंह को पता चल जाएगा कि उन्होंने कैसे मुद्दे को लेकर गलत समय सही देश में गलत मुद्दे पर हाथ डालने की नाकाम कोशिश की है.
इंदिरा जयसिंह से भारत नहीं चल रहा है न ही एपी सिंह से भारत चला रहे हैं. यह देश दुर्गा, लक्ष्मी बाई, सरस्वती, मां काली कामख्या का देश है. यह वह देश है जहां स्त्री बेटी – देवी स्वरूप में पूजी जाती है. बात चूंकि देश की महिलाओं बेटियों की अस्मिता और उनके मौलिक अधिकारों से जुडी है तो ऐसे में मैं खुद भी सुप्रीम कोर्ट का वकील और एक भारतीय होने के नाते खामोश हो जाऊंगा. वैसे बेफिक्र रहिए देश में इस वक्त जो सरकार राज कर रही है वह सुप्रीम कोर्ट से आगे ही नहीं बढ़ने देगी इस वाहियात विषय को.
नाजिया इलाही हसन – मुझे उन महिला वकील की सोच पर ही शर्म आ रही है जो खुद को एक उच्च शिक्षित अनुभवी और उपर से कानून की जानकर वकील ही सहमति से शारीरिक संबंध बनाने की उम्र 18 से 16 साल किए जाने पर क्यों आमादा हैं. क्या वे खुद एक औरत नहीं हैं. उन्हें क्या यह नहीं पता है एक औरत होने के नाते कि जब 16 साल की उम्र में बच्चे शारीरिक संबंध बनाने के लिए फ्री छोड़ दिए जाएंगे तो भारत जैसे संस्कारशील देश में कम उम्र में ही यौन संबंध को लेकर यह अवधारणा समाज में फ़ैल जाएगी जो पश्चिमी संस्कृति से भी ज्यादा कुलच्छिनी होगी.
मुझे तो इस विषय पर बात करते ही घिन आ रही है. क्योंकि मैं एक महिला हूं. कम उम्र में शादी और फिर बच्चा पैदा करने का दर्द मैंने जबरदस्ती भोगा झेला है. हो सकता है कि स्वेच्छा से शारीरिक संबंध बनाने के लिए उम्र 18 से 16 किए जाने की वकालत कर रहीं इंदिरा जयसिंह ने यह दुःख न झेला हो कि कम उम्र में बच्चा पैदा करना किसी भी लडकी के लिए जिंदगी मौत का सवाल हो सकता है. यह हमारे पूरे समाज को शर्मसार कर देने वाला है इस काम के लिए अब तक मुस्लिम समुदाय ही जाना पहचाना जाता था.
चक्रपाणि महाराज – ऐसी वकील का तो नाम मैं अपनी जुबान पर भी लेना गुनाह समझूंगा जो भारत की युवा पीढ़ी को ही दुश्मन बनाने पर आमादा हो. क्या इंदिरा जयसिंह को नहीं पता है कि स्वेच्छा से शारीरिक संबंध बनाने की उम्र 18 से घटाकर 16 कर दिए जाने पर भारत जैसे गौरवशाली और खूबसूरत संस्कृति वाले देश में यौन संबंधों को लेकर हिंसा का वातावरण पनप उठेगा.
इंदिरा जयसिंह को एक संवेदनशील और काबिल वकील मैं तब मानता जब वह भारत की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए यही उम्र 18 से बढ़ाकर 21 कराने की वकालत करतीं. यह राम सीता , सावित्री , दुर्गा , लक्ष्मी , सरस्वती और लक्ष्मीबाई का भारत है अमेरिका यूरोप ब्रिटेन का नहीं इंदिरा जयसिंह इसका ख्याल रखें.
साफ दिख रहा है कि बयानों में कुंठा और इर्ष्या ज्यादा है तुक की बातें कम है इनके बयान थोड़े अहम इसलिए हो जाते हैं कि 142 करोड़ की आबादी वाले देश में कोई 12 – 15 करोड़ की पीड़ा हैं कि क्यों कोई महिला अधिवक्ता प्यार की वकालात कर रही है. लड़कियों को उस मुद्दे पर आजादी देने की बात कर रही है जिसके जरिए औरतों को गुलाम बनाकर रखा जाता था और आज भी इसकी संभावनाए मरी नहीं हैं दूसरे तरीके से ही सही उन्हें सेक्स को लेकर भी दबाया जाता है.
लेकिन फैसला अब तर्कों और तथ्यों की बिना पर सुप्रीम कोर्ट को करना है इसलिए इनके प्रलाप की ज्यादा अहमियत भी नहीं क्योंकि ये लोग कानून की नहीं बल्कि पौराणिक दुहाई दे रहे हैं.हैरानी नहीं होनी चाहिए अगर खुदा न खास्ता सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा जयसिंह से इत्तफाक रखा तो ये लोग सचमुच आसमान सर पर उठाने लोगों को धर्म और संस्कृति की दुहाई देते बर्गालाएंगे और उकसाएंगे भी. Consensual Sex.

Kissing History: इंसानों ने चुंबन करना कब सीखा? मिले सबूत

Kissing History: किसी के प्रति प्यार, खुशी, स्नेह और परवाह को व्यक्त करने के लिए चुंबन या किस करना इंसानों के व्यवहार में स्वाभाविक तौर पर शामिल है. अक्सर लोग खुशी और प्यार का इजहार किस से करते हैं. यह मनुष्य की भावनाओं की अभिव्यक्ति का एक खूबसूरत तरीका है. मांबाप अपने बच्चोँ का चुंबन करते हैं तो दो घनिष्ठ दोस्तों के बीच भी चुंबन का आदानप्रदान होता है लेकिन अपनेपन और स्नेह के इस चुंबन से अलग दो प्रेम करने वालों का आपसी चुंबन बेहद अलग होता है. दो प्रेमियों के इस चुंबन में होंठ, जीभ और मुंह के अंदर का तरल पदार्थ शेयर होता है. ऐसे में एक अहम सवाल उठता है कि आखिर अपनी भावनाओं को किस या चुंबन के जरिए व्यक्त करना इंसानों ने कैसे और कब सीखा?

आइए सब से पहले जानते हैं की मनुष्यों ने कैसे किसी को किस करना सीखा. आज से 50 हजार पहले मनुष्य चुंबन लेना नहीं जानते थे. अपने प्यार और स्नेह को व्यक्त करने के लिए उन्हें यह तरीका मालूम नहीं था.

डेली मेल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि 50,000 साल पहले प्राचीन मानवों ने अपने निकटम संबंधी निएंडरथल मानवों से किस करना सीखा था. अध्ययन से पता चलता है कि निएंडरथल मानवों ने जब मनुष्यों को चूमा, तो होमोसेपियेंस भी उन्हें कौपी करते हुए ऐसा करने लगे और यहीं से चूमने की आदत इंसानों में विकसित हुई.

औक्सफोर्ड विश्वविद्यालय और फ्लोरिडा इंस्टीट्यूट औफ टेक्नोलौजी के शोधकर्ताओं ने इस बात के प्रमाण इकट्ठा किए हैं कि प्राचीन मानव लगभग 50,000 वर्ष पहले चुंबन करना सीख गए थे. निएंडरथल मानव हमारे सब से निकटम पूर्वज थे, जो लगभग 4 लाख साल से 40 हजार साल पहले तक यूरोप और पश्चिमी एशिया में रहते थे. हमारी प्रजाति, होमो सेपिंस, ने निएंडरथल के साथ संबंध बनाए थे. क्योंकि निएंडरथल डीएनए आज भी लोगों में मौजूद हैं.

फ्लोरिडा इंस्टीट्यूट औफ टेक्नोलौजी की प्रोफेसर और इस स्टडी की लेखिका कैथरीन टैलबोट ने कहा कि चुंबन करना एक साधारण बात लगती है लेकिन आश्चर्य की बात है की यह दुनिया के केवल 46 प्रतिशत इंसानी कल्चर में ही पाया जाता है. दुनिया भर में बहुत से ट्राइब्स ऐसे हैँ जिन में चुंबन का आदानप्रदान बिलकुल नहीं होता.

गाल पर किस करना चुंबन का सब से सरल और सहज तरीका है लेकिन किसी के साथ रोमांटिक रिलेशन बनाते वक्त वाला चुंबन सब से अलग होता है. इस रोमांटिक चुंबन को शोधकर्ता ‘एक विकासवादी पहेली’ कहते हैं. क्योंकि इस चुंबन में बड़ी मात्रा में एक दूसरे के बैक्टिरिया शेयर होते हैँ जिस से रोग संक्रमण का जोखिम होता है. वहीं इस चुंबन से रिप्रोडक्शन प्रोसेस में कोई लाभ भी नहीं मिलता. वैसे तो चुंबन के इतिहास को देखना मुश्किल है क्योंकि आरकियोलौजी से इस के सबूत ढूंढना असम्भव है. शोधकर्ताओं ने मनुष्य के सब से करीबी प्रजाति चिम्पांजी, बोनोबोस और ओरांगुटान के व्यवहार में शामिल चुंबन पर स्टडी की और यही से डेटा इकट्ठा किया.

विशेषज्ञों ने चुंबन को मुंह से मुंह का ऐसा संपर्क बताया जिस में भोजन का आदानप्रदान नहीं होता. प्राइमेट फैमिली ट्री की शाखाओं में चुंबन के विकास को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने बेयसियन मौडलिंग का इस्तेमाल किया. इस मौडल को 10 मिलियन बार चलाया गया, ताकि हमारे पूर्वजों के बारे में ठोस अनुमान लगाया जा सके जिन में लाखों वर्षो के दौरान चुंबन का विकास हुआ.

इस शोध के परिणामों से पता चलता है कि चुंबन की कला वानरों के पूर्वजों में 21.5 मिलियन से 16.9 मिलियन वर्ष पूर्व के बीच विकसित हो चुकी थी लेकिन इंसानों में लिप्स टू लिप्स वाले किस की शुरुआत 50 हजार साल पहले ही हुई है.

परिणामों से यह भी पता चला कि निएंडरथल अपने अस्तित्व के दौरान चुंबन करते थे यानी आधुनिक मानवों के सब से नजदीकी रिश्तेदार निएंडरथल प्रजाति कई लाख साल पहले से चुंबन करना जानते थे. निएंडरथल  के जिनोम में होमोसेपियंस के बैक्टिरिया मिले हैं जिस से यह साबित होता है की तकरीबन 50 हजार साल पहले मनुष्य और निएंडरथल ने रोमांटिक चुंबन के दौरान लार के माध्यम से बैक्टिरिया को साझा किया था.

यह सबूत इस बात की ओर इशारा करते हैं कि मानव और निएंडरथल संबंध बनाने के दौरान एक दूसरे को चूमते थे. तभी से चुंबन इंसान सहित बड़े वानर प्रजातियों के व्यवहार में बरकरार है. साथ ही इससे यह भी स्पष्ट होता है कि इंसानों में निएंडरथल से किस करने की प्रवृति ट्रांसफर हुई.

पिछले साल ही वारविक विश्वविद्यालय के विकासवादी मनोवैज्ञानिक प्रोफेसर एड्रियानो लामीरा ने मानव चुंबन की विकासवादी शुरुआत को रेखांकित करते हुए एक रिसर्च पब्लिश किया था. उन्होंने कहा कि होठों को सिकोड़कर हल्के से चूसने की क्रिया एक समय में एकदूसरे के बालों से जूं को हटाने की तकनीक थी, लेकिन बाद में यह प्रक्रिया एक दूसरे से संबंध बनाने के दौरान स्वाभाविक रूप से इस्तेमाल होने लगी.

होमो सेपियंस और निएंडरथल के बीच चुंबन का आदानप्रदान भी ठीक ऐसे ही हुआ होगा. फिर होमोसेपिएंस ने अपनी प्रजाति के साथियों के साथ संबंध बनाने के दौरान चुंबन की शुरुआत की और ऐसे में यह प्रवृति निएंडरथल से हम इंसानों तक पहुंच गई. Kissing History.

Abortion Law India: गर्भपात कानून- कई सहूलियतों के बाद भी कायम हैं कुछ दुश्वारियां

Abortion Law India: यह उन मुकदमों में से एक था जो अदालतों का ध्यान कानूनी खामियों की तरफ खींचते हैं और उन में सुधार के लिए अदालतों को मजबूर कर देते हैं. सुप्रीम कोर्ट के इस एक फैसले ने खासतौर से कैसे गर्भपात को अविवाहिताओं के लिए आसान बनाया और कैसे कई सहूलियतों के बाद भी कुछ दुश्वारियां कायम हैं इस के लिए इस मामले को थोड़े से में समझना जरूरी है.

इस मामले में याचिकाकर्ता एक 25 वर्षीय युवती काल्पनिक नाम मान लें सीमा था जिसे 22-23 सप्ताह की प्रेगनैंसी थी. हर कभी साथ जीनेमरने की कसमे खाने वाला, सुखदुःख में साथ निभाने का वादा करते रहने वाला सीमा का प्रेमी उसे छोड़ कर गायब हो गया था जिस से वह परेशान थी. पार्टनर के साथ छोड़ देने के बाद पेट में पल रहा बच्चा उसे भार लगने लगा था. यह कोई नई बात नहीं थी क्योंकि ऐसा अक्सर होता है कि प्रेमिका या गर्लफ्रेंड के प्रेग्नैंट होते ही प्रेमी के हाथपांव फूलने लगते हैं. हाथपांव युवती के भी फूलते हैं क्योंकि एक अनचाही स्थिति उसके सामने भी होती है. ऐसे में प्रेमी साथ दे तो वह हिम्मत कर भी लेती है अबार्शन की भी और बच्चे को जन्म देने की भी बशर्ते वक्त रहते शादी हो जाएयह और बात है कि सहमती अक्सर अबार्शन पर ही बनती है.

सीमा के साथ जो हुआ उससे उसका टूट जाना स्वभाविक बात थी ऐसी हालत में युवतियों की सामने ज्यादा विकल्प नहीं होते सिवाय इस के कि वे दुनिया से छिप छिपाकर बच्चे को जन्म दे कर उसे किसी की मदद से यहांवहां कहीं देदे और फिर इसे बुरा सपना मानते छुटकारा पाकर सामान्य जिंदगी जीने की कोशिश करें.

इसके लिए भी कोई साथ देने तैयार न हो तो आत्महत्या कर लें.सीमा ने तीसरा रास्ता चुना वह था गर्भपात का चुना वह था लेकिन यह कोई आसान काम नहीं था क्योंकि इस में कानून आड़े आ रहा था.

इसके लिए वह सरकारी अस्पताल गई और मान्यता प्राप्त नर्सिंग होम्स भी गई. लेकिन दोनों ही जगह डाक्टरों ने यह कहते हाथ खड़े कर दिए कि चूंकि प्रेगनेंसी को 20 सप्ताह से ज्यादा का वक्त हो चुका है इसलिए कानून के मुताबिक वे अबार्शन नहीं कर सकते.लेकिन सीमा ने हार नहीं मानी उसने दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया और अबार्शन की गुहार लगाई लेकिन हाई कोर्ट ने भी गर्भपात के कानून एमटीपी एक्ट का हवाला देते उसकी मांग ठुकरा दी.यह मामला एक्स बनाम प्रिंसिपल सेक्रेटरी हेल्थ एंड वेलफेयर डिपार्टमेंट गवर्नमेंट आफ एनसीटी औफ दिल्ली के नाम से चला था. गोपनीयता के मद्देनजर पीड़िता की जगह एक्स लिखा गया था.

अपने 15 जुलाई 2022 के फैसले में दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि चूंकि एमटीपी एक्ट नियम 3 बी ( सी ) में वैवाहिक स्थिति में बदलाव को केवल विधवा या तलाकशुदा के मामले में माना गया है. इसलिए अविवाहित महिला को 20 – 24 सप्ताह की बीच अबार्शन की इजाजत नहीं दी जा सकती.

पीड़ा एक अविवाहिता की

प्रेगनेंसी का यह मामला तकनीकी तौर पर कितना पेचीदा था इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अपनी अपील में सीमा ने कहा था कि वह 15 जुलाई 2022 तक अबार्शन की इजाजत चाहती है. क्योंकि तब तक प्रेगनेंसी लगभग 24 सप्ताह की हो चुकी होगी. दिल्ली हाई कोर्ट ने सीमा की मानसिक तकलीफ और दूसरी आने वाली परेशानियों से कोई वास्ता न रखते सीधे एमटीपी एक्ट के नियम के मुताबिक लकीर का फकीर स्टाइल में फैसला दिया. साथ ही एक हास्यास्पद सुझाव सीमा को यह दे डाला कि अगर वह बच्चे को जन्म देना चाहती है तो उसे बच्चे को किसी को गोद दे देना चाहिए क्योंकि बच्चा गोद लेने वालों की लाइन लगी है. हाई कोर्ट इस बात पर अड़ा रहा कि कानूनी अनुमति नियमों के भीतर ही होनी चाहिए.

सीमा तुरंत सुप्रीम कोर्ट जा पहुंची. इस बार उसके साथ काबिल, तजुर्बेकार,जोशीले और होनहार वकीलों की टीम थी जिसकी अगुवाई संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ अपर गुप्ता ने की इस टीम में नामी मानवाधिकार महिला अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर के साथ आकांक्षा मेहरोत्रा, कृतिका अग्रवाल और अपूर्वा अग्रवाल शामिल थीं. इन सभी ने सीमा को उस गुनाह के लिएइंसाफ दिलाने में मदद की जो उसने किया ही नहीं था.

सीमा की पहली दलील यह थी कि यह फैसला करना उसका हक है कि बच्चे को जन्म दे या नहीं. इसके लिए उसने संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते यह भी जोड़ा कि उसकी प्राइवेसी और शारीरिक अखंडता यानी मेरा शरीर मेरा हक को ध्यान में रखा जाए. बकौल सीमा अविवाहित होने का यह मतलब नहीं कि उसे अबार्शन का हक न मिले. वैवाहिक बदलाव की स्थिति इतनी संकीर्ण नहीं होनी चाहिए कि वह सिर्फ तलाकशुदा और विधवा महिलाओं तक सीमित रहे.

सीमा की इस दलील में भी दम था कि यह भेदभाव संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है जो समानता का अधिकार देता है. यहां तो वैवाहिक स्थिति की बिना पर उससे अलग बर्ताव किया जा रहा है. तकनीकी खामियों की तरफ सुप्रीम कोर्ट का ध्यान खींचते उसने दलील दी कि साल 2021 में एमटीपी एक्ट में जो बदलाव हुआ वह यह दिखाता है कि संसद ने लिव इन या अविवाहित महिलाओं को भी इस कानून में शामिल करने का इरादा रखा था. नियमों की व्याख्या की जानी चाहिए बजाय इसके कि उसका शाब्दिक यानी ज्यों का त्यों का पालन किया जाए.

इसके बाद सीमा ने इस बात पर जोर दिया कि एक कुंवारी लड़की का प्रेग्नैंट होना कितना बड़ा सामाजिक कलंक माना जाता है. पार्टनर ने छोड़ दिया जिसके चलते वह अकेली मातृत्व की जिम्मेदारी नहीं उठा सकती. मानसिक भावनात्मक और सामाजिक रूप से अकेली हो गई युवती के लिए यह सब झेलना मुश्किल है. अगर यह प्रेगनेंसी जारी रही तो उसकी दिमागी सेहत के लिए यह खतरनाक साबित हो सकता है. अगर इसमें देरी हुई तो और अदालती कार्रवाई लंबी चली तो प्रेगनेंसी बढ़ती जाएगी और फिर नियमों के मुताबिक अबार्शन नहीं हो पाएगा. बकौल सीमा वह सुरक्षित गर्भपात चाहती है अबार्शन के लिए कोई नाजायज या गैरकानूनी तरीका नहीं अपनाना चाहती.

सुप्रीम कोर्ट ने समझा दर्द

यह एक नहीं बल्कि लाखों सीमाओं की दास्तां है जो वजह कुछ भी हों के चलते वक्त पर अबार्शन नहीं करा पातीं और बाद में कई दिक्कतों से घिर जाती हैं.इनकी तकलीफ जस्टिस डीवाय चन्द्रचूड़, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस जेबी पड़ीवाला की बेंच ने समझी और इन दिक्कतों का आंशिक हल सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का आदेश रद्द करते सीमा को दी गई राहत और सहूलियतों की शक्ल में दिया.

उसने सीमा की हरेक दलील से इत्तफाक रखते पहले तो एम्स दिल्ली को आदेश दिया कि वह तुरंत एक मेडिकल बोर्ड का गठन करे और अबार्शन अगर सुरक्षित हो तो उसे तुरंत करे जिस से गर्भ और न बढ़े.

आननफानन में 22 जुलाई 2022 को एम्स के 9 विशेषज्ञ डाक्टरों का बोर्ड गठित हुआ जिसने तय पाया कि सीमा के अबार्शन में मां और बच्चे को कोई खतरा नहीं तो जल्द ही सीमा को अनचाहे हो चले गर्भ से मुक्ति मिल गई. सुप्रीम कोर्ट का विस्तृत फैसला 29 सितंबर 2022 को आया जिसे नजीर माना जाता है. इस फैसले ने एमटीपी की नए सिरे से व्याख्या भी कर डाली. बकौल सुप्रीम कोर्ट –

अविवाहित महिला के साथ अलग व्यवहार असंवैधानिक है. कानून सभी महिलाओं पर समान रूप से लागू होगा. एमटीपी एक्ट के नियम 3 बी की व्याख्या मकसद के मुताबिक होना चाहिए नियम किसी को रोकने नहीं बल्कि सुरक्षा देने के लिए बनाए गए हैं. इस फैसले में अहम और दिलचस्प बात बात एमटीपी एक्ट 2021 में हसबेंड की जगह पार्टनर शब्द का जिक्र होना थी इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि लिव इन, बौयफ्रेंड या किसी भी तरह का संबंध मान्य है संसद का इरादा साफ़ है कि अविवाहित महिलाओं को भी संरक्षण मिले.

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि महिला का मानसिक स्वास्थ और सामाजिक दबावदोनों मेडिकल ग्राउंड हैं. अविवाहित प्रेगनेंसी सामाजिक कलंक होती है जिसे कानून अनदेखा नहीं कर सकता. इसीलिए प्रेगनेंसी में देरी से भी कोर्ट ने सहमति जताते तुरंत मेडिकल बोर्ड बनाने का आदेश दिया था. किसी भी महिला को गर्भ रखने मजबूर नहीं किया जा सकता यह संवैधानिक तौर पर मंजूर नहीं.सुरक्षित और कानूनी अबार्शन देने को राज्य की जिम्मेदारी भी सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में ठहराया.

इस सब के बावजूद कोर्ट अबार्शन के मामलों में अपनी यानी अदालतों की भूमिका से पर कुछ नहीं बोला. अगर पहला और आखिरी फैसला मेडिकल बोर्ड ने ही लेना है तो अदालती और कानूनी दखल की जरूरत और माने क्या. क्यों सीमा जैसी युवतियों को अदालत जाने मजबूर होना पड़ता है इस पर दोबारा विचार किए जाने की जरूरत है. कोई युवती या महिला सीधे सरकारी अस्पताल या रजिस्टर्ड क्लीनिक वगैरह में जाए तो फैसला लेने का हक भी सिर्फ डाक्टरों को होना चाहिएक्योंकि वही बेहतर समझते और तय करते हैं कि अबार्शन कितना सुरक्षित और कितना असुरक्षित है और इस से जच्चाबच्चा की जान को खतरा तो नहीं.

सीमा को अगर यह सहूलियत या फायदा पहले ही मिल गया होता तो उसे भटकना नहीं पड़ता इसे एमटीपी एक्ट के मद्देनजर देखें तो तस्वीर कुछ यों बनती है कि आजादी के बाद तक भारत में गर्भपात दंडनीय अपराध हुआ करता था. भारतीय दंड संहिता की धारा 312 -316 के मुताबिक अबार्शन करना, कराना और इसकी कोशिश करना कराना भी जुर्म था.

केवल वही गर्भपात क़ानूनी था जिस में डाक्टर यह साबित कर दे कि मां की जान बचाने के लिए यह करना जरूरी था. नतीजतन, अनचाहा गर्भ जो आमतौर पर बलात्कार से ठहरता था से बचने महिलाएं नीमहकीमी, अप्रिशिक्षित दाइयों और दूसरे देसी तरीकों जो अवैज्ञानिक ही होते थे का सहारा लेने मजबूर होती थीं जो जानलेवा ज्यादा साबित होते थे.

देर से मिली थी अबार्शन की सहूलियत

60 के दशक में सरकार का ध्यान बढ़ती मातृ मृत्युओं और अवैध तरीको से होने वाले गर्भपात पर गया तो उसने 1964 में डाक्टर शांतिलाल शाह की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया 2 साल बाद 1966 में इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट पेश की जिसमें सिफारिश की गई थी कि गर्भपात को नियंत्रित और सुरक्षित ढंग से जायज किया जाए. महिलाओं के स्वास्थ और जीवन को केंद्र में रखते प्रशिक्षित डाक्टरों को गर्भपात की इजाजत दी जाए. इस रिपोर्ट की बिना पर साल 1971 में कानून बना जिसे नाम दिया गया मेडिकल टर्मिनेशन आफ प्रेगनेंसी एक्ट 1971 जो देश भर में 1 अप्रेल 1972 से लागू हुआ.

इस अधिनियम के मसौदे पर संसद में गर्मागर्म बहस हुई थी जिसका दकियानूसी कट्टरपंथी हिंदूवादी सांसदों ने जमकर विरोध किया था ( देखें बोक्स ). उस वक्त प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी थीं लिहाजा महिलाओं को एक और अधिकार देने का श्रेय उन्हें मिला . इसके पहले उनके पिता पंडित जवाहरलाल नेहरु 1956 में ही महिला हित और अधिकारों के कानून लागू कर चुके थे जिनसे पहली दफा महिलाओं को वोट देने का हक मिला था, मर्जी से दूसरी जाति और धर्म में शादी करने के साथ तलाक का भी अधिकार मिला था, पहली बार महिलाओं को जायदाद पर हक मिला था और बच्चा गोद लेने का हक भी हासिल हुआ था.

ऐसे कई कानूनी अधिकार पहली दफा महिलाओं को मिले थे जो धर्म के राज और मनमानी पर प्रहार थे और जिन्होंने पितृ सत्तात्मक व्यवस्था को कमजोर करते औरतों को बराबरी के हक दिए थे.

महिलाओं का जो अहम अधिकार गर्भपात का रह गया था वह मेडिकल टर्मिनेशन औफ प्रेगनेंसी एक्ट 1971 के जरिए मिला तो रूढ़िवादियों को एक और झटका लगा था जिनकी मंशा गर्भ की आड़ में भी महिलाओं को पारिवारिक और सामाजिक तौर पर दबाए रखने की थी. यह वह दौर था जब महिलाएं शिक्षित होकर नौकरियों में आ रही थीं अपने अधिकार और फैमिली प्लानिंग की अहमियत भी जानने समझने लगीं थीं. लेकिन प्रेगनैंसी और अबार्शन के मामले में पुरुषों की मोहताज थीं काफी कुछ हासिल हो जाने के बाद भी उन्हें यह अधिकार नहीं मिला था कि वे अपनी मर्जी से बच्चे पैदा करें या इच्छा सेहत और हिम्मत न होने पर बच्चे को जन्म देने से मना कर सकें. कुलजमा इस दौर में भी वे पैसे कमाने और घर गृहस्थी की जिम्म्मेदारियां सँभालने के साथसाथ बच्चा पैदा करने की मशीन थीं.

इस एक्ट में औपचारिक तौर पर महिलाओं को अबार्शन का हक दिया था लेकिन इसे जायज करार देना भी किसी चैलेंज से कम काम समाज के लिहाज से नहीं था. इसकी धारा 3 सबसे अहम थी जिसमें समय समय पर संशोधन भी हुए. शुरू में कहा गया था कि अबार्शन कोई भी एमबीबीएस डाक्टर करा सकता है बशर्ते वह यह महसूस करे कि मां की जिंदगी बचाने और उसके मानसिक व शारीरिक स्वास्थ के लिए यह जरूरी हो. एक्ट की धारा 3 ( 2 ) में यह प्रावधान था कि 12 सप्ताह का गर्भ गिराने एक डाक्टर की ही राय काफी है. धारा 3 ( 2 ) ( बी ) में यह अनिवार्यता कर दी गई कि गर्भ अगर 12 सप्ताह से ज्यादा का हो तो अबार्शन का फैसला 2 डाक्टर लेंगे.

एक अच्छी और जरूरी बात धारा 3 ( 3 ) में जोड़ी गई थी कि नाबालिगों को भी अबार्शन का हक रहेगा. लेकिन इसके लिए उसके क़ानूनी गार्जियंस की लिखित सहमति जरूरी रहेगी. धारा 3 (4) में प्रावधान था कि कोई भी वयस्क महिला अपनी लिखित सहमति दे कर अबार्शन करा सकती है. इस धारा में यह प्रावधान भी बतौर स्पष्टीकरण किया गया था कि बलात्कार के मामलों से हुई प्रेगनैंसी को महिला के मानसिक स्वास्थ के लिए गंभीर कष्ट माना जाएगा और शादीशुदा महिलाओं के मामले में यदि गर्भ निरोधक फेल हो जाता है तो उसे भी मानसिक कष्ट की श्रेणी में गिना जाएगा.

यह सहूलियत विरोधाभासी थी क्योंकि यह स्पष्ट नहीं हो रहा था कि अगर अविवाहित महिला गर्भ निरोधक की विफलता के चलते प्रेग्नैंट हो गई तो उसे यह अधिकार मिलेगा या नहीं. इससे सवाल खड़े होना शुरू हो गए थे कि अविवाहित महिला को इस स्थिति में अबार्शन का अधिकार क्यों नहीं.क्या शादी न करना कोई गुनाह है और क्यों इस कानून के जरिए नैतिकताथोपी जा रही है.

अविवाहित महिलाओं के साथ बड़ी दिक्कत यह थी कि डाक्टर्स कानून का हवाला देते उन्हें टरका देते थे. हकीकत में वे इसी एक्ट की धारा 5 ( 2 ) से डरते थे जो यह कहती थी कि अगर कोई भी इस एक्ट के नियमों की अनदेखी करते अबार्शन करता है तो यह भारतीय दंडसंहिता के मुताबिक 2 से लेकर 7 साल तक की कड़ी सजा का हकदार होगा.

यह भेदभाव हैरतअंगेज तरीके से लंबे समय तक बना रहा जिसे 2021 में संशोधित कर ठीक किया गया. विवाहित महिला को महिला और पति की जगह पार्टनर शब्द इस्तेमाल किया गया जिसका जिक्र सीमा ने अपनी याचिका में किया था. क्योंकि अब तक लिवइन के चलते प्रेगनैंसी के मामले अदालत जाने लगे थे. इस बदलाव से अबार्शन कराने वाली महिलाओं और इसे करने वाले डाक्टरों का डर दूर हुआ.

इसी संशोधन में यह प्रावधान भी किया गया कि अगर प्रेगनैंसी 24 सप्ताह से ज्यादा हो तो भी मेडिकल बोर्ड की इजाजत से अबार्शन किया जा सकता है. सीमा का मामला इसका भी उदाहरण ही है. एक अच्छा इंतजाम इस बदलाव में यह भी किया गया कि महिला की पहचान मेडिकल रिकार्ड और अबार्शन का विवरण किसी तीसरे व्यक्ति को नहीं बताया जाएगा. इसके लिए धारा 5 ( ए ) बनाई गई जिसमें एक साल की सजा का प्रावधान भी किया गया.

लेकिन यह सब यूं ही नहीं हो गया था बल्कि इसके लिए सरकार पर चौतरफा दबाव थे सामाजिक संगठन तो मांग कर ही रहे थे लेकिन कई हाई कोर्ट्स ने विवेक का इस्तेमाल करते हुए 20 सप्ताह से ज्यादा की प्रेगनैंसी को अबार्शन की इजाजत दी थी. सुप्रीम कोर्ट की 2016 से लेकर 2019 तक की गई टिप्पणियों ने भी सरकार को इस बारे में सोचने मजबूर कियाथा कि एमटीपी एक्ट अब बासी और आउटडेटेड हो चला है और 20 सप्ताह की समय सीमा वैज्ञानिक नहीं है.

जब अदालतों ने बलात्कार पीड़िताओं नाबालिगो और फीटल अब्नार्मिलटी वाले मामलों में मेडिकल बोर्ड की राय पर अबार्शन की इजाजत देना शुरू कर दी तो केंद्र सरकार को इसमें बदलाव करने मजबूर होना ही पड़ा.

इसके पहलेसाल 2003 में जो संशोधन इस एक्ट में किए गए थे उनमें अहम था सरकारी अस्पतालों के अलावा प्राइवेट क्लीनिकों को भी अबार्शन के लिए लाइसेंस देना इसी वक्त में ट्रेंड डाक्टरों के मापदंड निर्धारित किए गए.

एमपीटी एक्ट के बनने का ही नतीजा है कि देश में हर साल औसतन 1.56 करोड़ रजिस्टर्ड अबार्शन होते हैं जबकि एक साल में पैदा होने वाले बच्चों की तादाद 2.52 करोड़ है. यह तब है जब तरहतरह के कंट्रासेप्टिव उपलब्ध हैं और महिलाएं इनका इस्तेमाल बिना किसी हिचक के कर रही हैं.और जो पार्टनर के शादी के और दूसरे वादों पर एतवार करते वक्त गुजार देती हैं उनकी हालत सीमा सरीखी हो जाती है जिन्हें सुप्रीम कोर्ट तक जाने का रास्ता तो पता होता है लेकिन गर्भ निरोधकों के इस्तेमाल से जाने क्यों हिचकती हैं जबकि वे बहुत आसानी से हर कहीं गांवदेहातों तक में मिल रहे हैं.

इसके बाद भी यह सोचा जाना बेमानी नहीं कि हालात कुछ भी हों कोई भी महिला अबार्शन के लिए अदालत की मोहताज क्यों. जहां जा कर उस का तनाव  भागादौड़ी और दुश्वारियां और बढ़ जाते हैं. अदालत भी बिना मेडिकल बोर्ड की सलाह के कोई फैसला नहीं ले सकती इसलिए यह अधिकार मेडिकल बोर्डों और डाक्टरों को दिया जाना कोई हर्ज की बात तो नहीं.

इन्होंने किया था विरोध

शांतिलाल शाह कमेटी की रिपोर्ट के बाद जब संसद की बारी आई तो इस बिल पर बहस अगस्त 1971 में हुई थी लेकिन अच्छी बात यह थी कि इसका विरोध करने वाले सांसदों की संख्या दहाई का भी आंकड़ा नहीं छू पाई थी क्योंकि हर कोई देख और समझ रहा था कि देश भर की महिलाएं अबार्शन का अधिकार चाहती हैं.

ऐसे में बिल का विरोध करने का मतलब होगा महिलाओं के वोट गंवाना. इसके बाद भी कुछ सांसद खुद को विरोध करने से रोक नहीं पाए इनमें हैरत की बात है सत्तारूढ़ कांग्रेस के भी सांसद शामिल थे. जाहिर ये सभी सिरे से दकियानूसी और संकीर्ण धार्मिक मानसिकता वाले थे जिनकी नजर में औरत गुलाम और पांव की जूती होती है.

आरएसएस की विचारधारा से प्रभावित भारतीय जनसंघ के सांसद वसंत राव ओक ने इस बिल के विरोध में कहा था कि गर्भ में शिशु की हत्या अधर्म है. भारतीय संस्कृति में गर्भस्थ की रक्षा को धार्मिक – नैतिक कर्तव्य माना गया है इसलिए कानून द्वारा गर्भपात को जायज बनाना सांस्कृतिक धार्मिक मूल्यों के विरुद्ध होगा. अनचाहे गर्भ के नाम पर कानून का दायरा बढ़ता जायेगा और समाज में नैतिक पतन बढ़ेगा.

दूसरे कुछ हिंदूवादी सांसदों ने संसद के बाहर वसंत राव का समर्थन किया था लेकिन इस बहस से साबित हो गया था कि धर्म कोई भी हो महिलाओं को यह राहत नहीं देना चाहता. इसाई पृष्ठभूमि वाले निर्दलीय सांसद पीडी स्टीफन ने वसंत राव की बात इन शब्दों में की थी, कि इसाई धर्म शास्त्र के अनुसार गर्भाधान से ही जीवन आरम्भ हो जाता है इसलिए गर्भपात को मेडिकल टर्मीनेशन कहना गलत है यह तो टेकिंग अलाइफ है. अपनी बात में दम लाने स्टीफन ने बाइबिल का भी हवाला दिया था. जब इससे बात नहीं बनी तो वे कूदकर भारतीय सभ्यता की दुहाई यह कहते नजर आए थे कि भारतीय सभ्यता गर्भस्थ जीवन की पवित्रता को मानती है फिर चाहे वह हिंदू हो इसाई.

पेशे से वकील कांग्रस सांसद केपी उन्नीकृष्णन ने भी धार्मिक भाषा और विचारों को महिला हितों से उपर रखा उन्होंने कहा था कि भारत की सभ्यता चाहे हिंदूबौद्ध जैन परंपरा देखें गर्भस्थ जीवन को पवित्र मानती है इसलिए गर्भपात को चिकित्सीय प्रक्रिया कहना उचित नहीं. यह समाज की नैतिक दशा पर असर डालेगा इसे केवल स्वास्थ का प्रश्न मानना गलत है.धर्म शास्त्र गर्भस्थ जीवन को जीव मानते हैं.

आजादी के बाद माहौल बदला था इसलिए यह बिल लगभग सर्वसम्मति से पारित हो गया था फिर भी धर्म की बिना पर जिंदगी जीने वाले सांसदों ने अपनी भड़ास तो निकाल ही ली थी जो नक्कारखाने में तूती की आवाज सरीखी साबित हुई थी. Abortion Law India.

Smart Eating Habits: समझदारी से खाएं, बुद्धिमान कहलाएं

Smart Eating Habits: आप क्या खाते हैं, आप की लाइफस्टाइल कैसी है, आप की उम्र क्या है, आप के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य व सोचने से ले कर आप के महसूस करने तक आप को जो प्रभावित करता है वह है आप का खाना यानी आप के पोषण संबंधी विकल्प, जो पेट और मस्तिष्क के स्वास्थ्य को बेहतर करते हैं.

यदि आप शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से बेहतर महसूस करना चाहते हैं तो हर दिन समझदारी से खाएं और बेहतर महसूस करें. इस के लिए अच्छा खाएं. इस में शामिल करें पर्याप्त अनाज, फल और सब्जियां, पर्याप्त प्रोटीन व कैल्शियम लेकिन ध्यान दें, स्वास्थ्यवर्धक तेल चुनें, जिस्म को हाइड्रेटेड रखें, सेल्फ केयर करें.

हमारा खाना कार्य करने, चलने, सोचने, बढ़ने और हमारे शरीर की मरम्मत करने के लिए ईंधन का काम करता है लेकिन स्वस्थ रहने और महसूस करने के लिए बुद्धिमानी से खाना एक कला है. इस के लिए खाने की सही मात्रा, गुणवत्ता और प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, खनिज और विटामिन, अच्छे कार्बोहाइड्रेट-बुरे कार्बोहाइड्रेट, अच्छे वसा व बुरे वसा के संयोजन के बीच सही संतुलन बनाना आवश्यक है. इस के लिए बैलेंस डाइट (संतुलित आहार) लेना एक बेहतर विकल्प हो सकता है.

तो आखिर क्या है संतुलित आहार? संतुलित आहार दरअसल एक ऐसा आहार है जो समग्र स्वास्थ्य के लिए आवश्यक पोषक तत्व, जैसे विटामिन, खनिज, एंटीऑक्सिडेंट और मैक्रोन्यूट्रिएंट प्रदान करता है जिस में कार्ब्स, प्रोटीन, वसा, विटामिन, खनिज और फाइबर शामिल होते हैं. अपनी डाइट में ताजे फलों और सब्जियों को शामिल करें जबकि प्रोसेस्ड व जंक फूड्स से दूरी बनाएं. बैलेंस डाइट का उद्देश्य शरीर को ऊर्जावान बनाए रखना, उस की ग्रोथ में सहायता करना, इम्यूनिटी पावर को बढ़ाना और बीमारियों से शरीर को रोकना होता है.

कैसा हो संतुलित आहार?

संतुलित आहार के लिए अपने भोजन में प्रचुर मात्रा में फाइबर, मिनरल्स, विटामिन्स शामिल करना चाहिए. खाने में शकर और वसायुक्त पदार्थ कम से कम लें. फाइबर युक्त आहार के लिए अंकुरित अनाज, मोटे अनाज, कच्ची सब्जियां शामिल करें. खूब पानी पिएं ताकि आप के शरीर से विषैले पदार्थ बाहर निकल सकें. संतुलित आहार के लिए खाने में दूध, दही, एंटीऑक्सीडेंट फूड को शामिल करना चाहिए. शरीर को स्वस्थ रखने में विटामिन सी और डी, बी12 की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है. विटामिन डी कैल्शियम को शरीर में अवशोषित करता है. इस से हमारे नाखून, त्वचा की चमक आदि पर अच्छा असर पड़ता है.

कितनी कैलोरी?

आप को कितनी कैलोरी की आवश्यकता है, यह इस बात पर निर्भर है कि आप की दिनचर्या और उम्र क्या है? आप पुरुष हैं या महिला? पुरुषों को महिलाओं के मुकाबले ज्यादा कैलोरी की आवश्यकता होती है. यदि आप की फिजिकल एक्टिविटी कम है तो कम कैलोरी युक्त खाना खाएं. यदि हमें खुद के शरीर को स्वस्थ और सुडौल रखना है तो याद रहे कि हम जितना खाएं उतनी एक्टिविटी भी करें यानी कि जितनी कैलोरी लें उतनी बर्न भी करें. उम्र के हर पड़ाव में न्यूट्रियस और बैलेंस डाइट का शरीर पर अलग-अलग असर पड़ता है.

संतुलित आहार के फायदे

वजन प्रबंधन में मदद: संतुलित भोजन अतिरिक्त कैलोरी के बिना हमारे शरीर को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है, जिस से वजन नियंत्रण में रहता है.

बीमारियों से दूर रहते हैं: पोषक तत्वों से भरपूर भोजन का सेवन कार्डियोवैस्कुलर डिजीज, टाइप 2 डायबिटीज, हाइपरटेंशन जैसे रोगों व कुछ अन्य प्रकार के जोखिम को कम करता है.

ऊर्जा स्तर को बढ़ाता है: संतुलित आहार शरीर को उचित पोषण देता है और ऊर्जा स्तर को बढ़ाता है, जिस से कार्य करने की क्षमता बढ़ती है

तनाव को कम करता है: न्यूट्रियस आहार लेने से मानसिक स्वास्थ्य बेहतर रहता है, जिस से मूड स्विंग, अवसाद, चिंता और संज्ञानात्मक गिरावट का जोखिम कम होता है.

पाचन तंत्र बेहतर रहता है: न्यूट्रियस आहार जिस में प्रोटीन, आयरन, विटामिन खासकर सी, ए, और ई, ओमेगा-3 फैटी एसिड, जिंक और सेलेनियम हो, पूरे शरीर को स्वस्थ रखता है.

बच्चों के लिए संतुलित आहार के फायदे

बचपन से ही बच्चों में संतुलित आहार कई फायदे प्रदान करता है जो शरीर के समग्र स्वास्थ्य और विकास में सहायक होता है. इस के लिए बैलेंस डाइट लेना एक बेहतर विकल्प हो सकता है क्योंकि शरीर के सर्वांगीण विकास या ग्रोथ के लिए जिन पोषक तत्त्वों की आवश्यकता होती है वे हमें संतुलित भोजन से ही मिलते हैं. पोषक तत्वों से भरपूर यह खाना इम्यून सिस्टम को मजबूती देता है जिस से बच्चों को संक्रमण और बीमारियों से लड़ने में मदद मिलती है.

उचित पोषण संज्ञानात्मक (कॉग्निटिव) कार्य का समर्थन करता है, जिस से बेहतर एकाग्रता, स्मृति और अकादमिक प्रदर्शन में सुधार होता है. संतुलित आहार बनाए रखने के लिए कुछ खाद्य पदार्थों से बचना आवश्यक है, जैसे प्रोसेस्ड फूड्स, जंक फूड, मीठे जूस, कोल्ड ड्रिंक, अतिरिक्त शर्करा, अत्यधिक सोडियम या नमक और कैलोरी से भरे मॉकटेल्स. वहीं, तले हुए और प्रोसेस्ड फूड्स में ट्रांस फैट पाए जाते हैं जो हृदय रोग के जोखिम को बढ़ाते हैं, इन से भी बचना चाहिए.

महिलाओं के लिए संतुलित भोजन

महिलाओं को घर से लेकर ऑफिस तक की जिम्मेदारी निभानी पड़ती है. इस के लिए आवश्यक है कि वे खुद पूरी तरह से फिट और स्ट्रांग रहें. इस के लिए उन के खानपान का सही व न्यूट्रियस होना अति आवश्यक है.

अपनी उम्र के अनुसार आहार चुनें: 20 से 35 वर्ष की उम्र ग्रोथ की होती है, इस उम्र में प्रोटीनयुक्त, कार्बोहाइड्रेट्स जैसे गेहूं, चावल, रागी, ज्वार, बाजरा, ड्राई फ्रूट्स, नट्स, घी आदि को अपनी डाइट में शामिल करें.

40 से 50 वर्ष की उम्र में महिलाओं के शरीर में हार्मोनल बदलाव आते हैं. उन के इंसुलिन लेवल में बदलाव आता है और हड्डियों से संबंधित मेनोपॉज व और भी कई तरह की समस्याएं शुरू होने लगती हैं. इस के लिए ज्यादा फाइबर युक्त

हरी सब्जियां, कैल्शियम युक्त डेयरी प्रोडक्ट और नट्स अपने भोजन में शामिल करना चाहिए.

उम्र चाहे कोई भी हो, शरीर के जरूरी कार्य के लिए सभी आवश्यक पोषक तत्त्वों को सुनिश्चित करना, ऊर्जा स्तर को बनाए रखना, वजन को नियंत्रण में रख कर रोगों से शरीर को दूर रखना और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में बैलेंस डाइट का महत्त्वपूर्ण रोल होता है.

खाएं सीजनल और लोकल फूड

कोशिश करें कि हमेशा सीजनल फल व सब्जियां ही अपने आहार में शामिल करें. ध्यान रहे कि वे लोकल हों क्योंकि हर जगह का तापमान, जल और वायु सब कुछ अलग-अलग होते हैं और उसी वातावरण के हिसाब से ही हमारा शरीर ढल जाता है. लोकल और सीजनल फल व सब्जियां सस्ती व हमारे स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होती हैं. बेमौसम की चीजें खाने से बचें क्योंकि उन को उगाने के लिए काफी रासायनिक और कीटनाशक पदार्थों का उपयोग करना पड़ता है जोकि कहीं न कहीं हमारे शरीर को नुकसान पहुंचाती हैं. कोशिश करें कि आप की थाली कलरफुल और सीजनल हो ताकि हर प्रकार के न्यूट्रिएंट्स शरीर को मिल सकें.

इस तरह आप अपने भोजन में पोषक तत्वों को शामिल कर के एक अच्छा स्वास्थ्य पा सकते हैं. बस, इस के लिए आवश्यकता है हर दिन आप समझदारी से खाएं और बेहतर महसूस करें. Smart Eating Habits.

Dual Insurance Planning: आधुनिक जीवनशैली में डुअल इंश्योरेंस प्लानिंग क्यों ज़रूरी है?

Dual Insurance Planning:  आधुनिक जीवनशैली कई तरह के जोखिम और चुनौतियां साथ लाती है. ये बढ़ते स्वास्थ्य खर्च से लेकर कई अनिश्चित परिस्थितियों से जुड़े हो सकते हैं. ज्यादातर लोग बीमा की अहमियत तो समझते हैं. लेकिन वे अक्सर यह तय करने में उलझ जाते हैं कि लाइफ इंश्योरेंस ज्यादा जरूरी है या हेल्थ इंश्योरेंस.

दरअसल दोनों ही बहुत अहम हैं. ये अलग अलग होते हुए भी एक दूसरे के पूरक बने रहते हैं. जानिए क्यों डुअल इंश्योरेंस प्लानिंग बेहद जरूरी है यानी लाइफ और हेल्थ दोनों का बीमा रखना एक सुरक्षित और संतुलित जीवन के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होता है.

आधुनिक जीवनशैली में लाइफ और हेल्थ इंश्योरेंस दोनों रखने के 6 बड़े कारण 

कई ऐसे कारण हैं जो किसी व्यक्ति के लिए दोनों हेल्थ और लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसियां रखना अनिवार्य बना देते हैं. नीचे दिए गए 6 मुख्य कारण इसकी स्पष्ट व्याख्या करते हैं –

  1. आधुनिक जोखिमों से व्यापक सुरक्षा प्रदान करता है.

आज के समय में जोखिम कई प्रकार के हो चुके हैं. जैसे क्रॉनिक बीमारियाँ, लाइफस्टाइल डिज़ीज़, एक्सीडेंट और परिवार के मुख्य कमाने वाले के खोने से आर्थिक असर. हेल्थ इंश्योरेंस किसी भी मेडिकल इमरजेंसी में आर्थिक सुरक्षा देता है. यह अस्पताल में भर्ती, इलाज और दवाओं का खर्च कवर करता है.
वहीं लाइफ इंश्योरेंस आपके न रहने की स्थिति में परिवार को आर्थिक स्थिरता प्रदान करता है. अगर पॉलिसीधारक का निधन हो जाए तो तयशुदा रकम परिवार या नामांकित व्यक्ति को मिल जाती है.
ये दोनों बीमा एक दूसरे के विकल्प नहीं हैं बल्कि पूरक हैं. हेल्थ इंश्योरेंस आपके वर्तमान जीवन के स्वास्थ्य से जुड़े खर्च संभालता है. जबकि लाइफ इंश्योरेंस परिवार के भविष्य को सुरक्षित रखता है.
कुछ बीमा कंपनियां आजकल लाइफ और हेल्थ दोनों कवरेज को मिलाकर कस्टमाइज्ड विकल्प देती हैं. ये बदलती जीवनशैली के अनुरूप होते हैं. इससे आप एक मजबूत दोहरी सुरक्षा कवच तैयार कर पाते हैं.

  1. आपके परिवार को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करता है.

लाइफ इंश्योरेंस मुख्य रूप से पॉलिसीधारक के परिवार के लिए सुरक्षा जाल का काम करता है. किसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में अगर आपकी मृत्यु हो जाए तो परिवार को एकमुश्त रकम मिलती है. इससे वे अपने जीवनस्तर को बनाए रख सकते हैं. कर्ज चुका सकते हैं और बच्चों की शिक्षा या शादी जैसी जरूरतें पूरी कर सकते हैं.
यह खासकर उन परिवारों के लिए अहम है जहां सिर्फ एक व्यक्ति कमाता है. या जहां दोनों पति पत्नी की आमदनी से गृह ऋण, बच्चों की पढ़ाई जैसी जिम्मेदारियां पूरी होती हैं.
हेल्थ इंश्योरेंस केवल इलाज का खर्च वहन करता है. लेकिन खोई हुई आमदनी की भरपाई या परिवार के लंबे समय के आर्थिक भविष्य की गारंटी नहीं देता. यहीं पर लाइफ इंश्योरेंस की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है.

  1. स्वास्थ्य खर्चों को संभालता है, बचत को सुरक्षित रखता है.

तेजी से बढ़ते स्वास्थ्य खर्चों के कारण आज एक बार अस्पताल में भर्ती होना भी सालों की बचत मिटा सकता है. हेल्थ इंश्योरेंस आपको इन अनपेक्षित खर्चों से बचाता है. यह सर्जरी, गंभीर बीमारियों और अन्य मेडिकल आपात स्थितियों में आर्थिक सहायता देता है.
जिन परिवारों के पास पर्याप्त स्वास्थ्य बीमा नहीं होता उन्हें अक्सर एफडी तोड़नी पड़ती है. या संपत्ति बेचनी पड़ती है. इससे उनकी दीर्घकालिक वित्तीय योजनाएं प्रभावित हो जाती हैं.
अगर आपके पास हेल्थ इंश्योरेंस है तो आप निश्चिंत रह सकते हैं. आपकी बचत और निवेश अन्य जीवन लक्ष्यों के लिए सुरक्षित रहेंगे. जबकि बीमा आपके चिकित्सा खर्च का ध्यान रखेगा.

  1. सम्पूर्ण कल्याण के लिए दोहरी सुरक्षा देता है.

डुअल इंश्योरेंस प्लानिंग आपको किसी भी गंभीर बीमारी या अनपेक्षित जीवन घटनाओं से मजबूती से लड़ने में मदद करती है. लाइफ इंश्योरेंस आपके परिवार के भविष्य के लिए ढाल का काम करता है. वहीं हेल्थ इंश्योरेंस आपके इलाज के खर्चों में मददगार साबित होता है.
कुछ बीमा कंपनियाँ ऐसे डुअल बेनिफिट प्रोडक्ट्स भी देती हैं. जिनमें लाइफ और हेल्थ दोनों बीमे एक ही प्लान में शामिल होते हैं. इससे प्रक्रिया आसान हो जाती है. और आपको पूर्ण सुरक्षा मिलती है.
ऐसे एकीकृत समाधान आपके शारीरिक और आर्थिक दोनों स्वास्थ्य की रक्षा करते हैं. इससे आपको मानसिक शांति और सुविधा मिलती है.

  1. बीमा कवरेज में मौजूद कमियों को पूरा करता है.

कोई भी एकल बीमा पॉलिसी हर तरह के जोखिम को पूरी तरह कवर नहीं कर सकती. कई बार आपके हेल्थ इंश्योरेंस में कुछ सीमाएं होती हैं. जैसे किसी विशेष इलाज पर कैप लगना या कुछ बीमारियों का एक्सक्लूज़न.
ऐसे में आप अतिरिक्त पॉलिसियां लेकर इन कमियों को पूरा कर सकते हैं. उदाहरण के तौर पर अपने बेस हेल्थ प्लान के साथ एक्सीडेंट कवर या क्रिटिकल इलनेस पॉलिसी जोड़ सकते हैं.
इसी तरह लाइफ इंश्योरेंस को भी अपने विशेष लक्ष्यों के अनुसार ढाला जा सकता है. जैसे टर्म प्रोटेक्शन, इनकम रिप्लेसमेंट या लोन कवरेज. इससे दावे के समय किसी अस्वीकृति का जोखिम घटता है. और आपको उचित समय पर पर्याप्त आर्थिक सहायता मिलती है.

  1. मानसिक शांति प्रदान करता है.

जीवन की अनिश्चितताएं चाहे स्वास्थ्य संबंधी आपात स्थिति हो दुर्घटना या समय से पहले मृत्यु. ये मानसिक तनाव और चिंता का कारण बन सकती हैं. डुअल इंश्योरेंस प्लानिंग आपको यह भरोसा देती है कि आप और आपका परिवार हर परिस्थिति में सुरक्षित हैं.
सही तरह से चुने गए लाइफ और हेल्थ इंश्योरेंस के संयोजन से आप निश्चिंत होकर अपने सपनों को पूरा करने पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं. परिवार का ख्याल रखने पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं. और जीवन का आनंद लेने पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं. बिना इस डर के कि अगर कुछ हो गया तो.
लाइफ और हेल्थ इंश्योरेंस दोनों के उद्देश्य अलग हैं. लेकिन दोनों समान रूप से आवश्यक हैं. हेल्थ इंश्योरेंस आपके मेडिकल खर्चों से बचत की रक्षा करता है. जबकि लाइफ इंश्योरेंस आपके न रहने पर परिवार को आर्थिक सुरक्षा देता है.
दोनों मिलकर एक मजबूत वित्तीय आधार तैयार करते हैं. जिससे आप आधुनिक जीवन की जटिलताओं और जोखिमों से आत्मविश्वास के साथ निपट सकते हैं.
डुअल इंश्योरेंस प्लानिंग अपनाना यानी कई बीमा योजनाएँ लेना. यह आपके परिवार के भविष्य, आपकी मानसिक शांति और हर चुनौती का सामना करने की क्षमता में निवेश है. आज की अनिश्चित दुनिया में यह एक ऐसा निवेश है जिसे आप नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते.

. Dual Insurance Planning.

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