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Hindi Satire Story : अपनी धरती-अपना देश : हमारे देश का जवाब नहीं

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‘‘कसम ऊपर वाले की, जो दोबारा कभी यूरोप गया. न तो वहां किसी में सिविक सेंस है और न ही नागरिक अधिकारों के बारे में कोई जागरुकता,’’ वह आज ही यूरोप की यात्रा से लौटे थे और पानी पीपी कर यूरोप को कोसे जा रहे थे.

‘‘लेकिन इन मामलों में तो अंगरेज अग्रदूत माने जाते हैं,’’ मैं ने टोका.

‘‘क्या खाक माने जाते हैं,’’ वह गरम तवे पर पानी की बूंद की तरह छनछना उठे, ‘‘यह बताइए कि सांस लेना और खानापीना मनुष्य का मौलिक अधिकार है या नहीं?’’

‘‘है,’’ मैं ने सिर हिलाया.

‘‘तो फिर उगलना और विसर्जन करना भी मौलिक अधिकार हुआ,’’ उन्होंने विजयी मुद्रा में घोषणा की फिर बोले, ‘‘एक अपना देश है जहां चाहो विसर्जन कर लो. आबादी हो या निर्जन, कहीं कोई प्रतिबंध नहीं, लेकिन वहां पेट भले फट जाए पर मकान व दुकान के सामने तो छोड़ो सड़क किनारे भी विसर्जन नहीं कर सकते.’’

‘‘लेकिन वहां सरकार ने जगहजगह साफसुथरे टायलेट बनवा रखे हैं, उन में जाइए,’’ मैं ने समझाया.

‘‘बनवा तो रखे हैं लेकिन अगर हाजत आप को चांदनी चौक में लगी हो और फारिग होने कनाट प्लेस जाना पड़े तो क्या बीतेगी?’’ उन्होंने आंखें तरेरीं फिर तमकते हुए बोले, ‘‘आप को कुछ पता तो है नहीं. घर से बाहर निकलिए, दुनिया देखिए तब अच्छेबुरे में फर्क करने की तमीज पैदा हो पाएगी. तब तक के लिए फुजूल में टांग घुसेड़ने की आदत छोड़ दीजिए.’’

मुझे डपटने के बाद शायद उन्हें कुछ रहम आया. अत: थोड़ा मधुर कंठ से बोले, ‘‘यह बताइए कि आप को जुकाम हो और नाक गंदे नाले की तरह बह रही हो तो क्या करेंगे?’’

‘‘जुकाम की दवा खाएंगे,’’ मैं ने तड़ से बताया.

वह पल भर के लिए हड़बड़ाए. शायद मनमाफिक उत्तर नहीं मिला था. अत: अपने प्रश्न को थोड़ा और संशोधित करते हुए बोले, ‘‘डाक्टर की दुकान में घुसने से पहले क्या करेंगे आप?’’

‘‘जेब टटोल कर देखेंगे कि बटुआ है कि नहीं,’’ मैं ने फिर तड़ से उत्तर दिया.

इस बार उन के सब्र का पैमाना छलक गया. वह हत्थे से उखड़ते हुए बोले, ‘‘क्या बेहूदों की तरह नाक बहाते भीतर घुस जाएंगे और सुपड़सुपड़ कर सब के सामने नाक सुड़किएगा?’’

‘‘जी, नहीं, पहले नाक छिनक कर साफ करूंगा फिर भीतर जाऊंगा,’’ मैं ने कबूला. उन का प्रश्न वाजिब था. पर मेरी ही समझ में कुछ विलंब से आया.

‘‘तो गोया कि आप पहले घर जाएंगे और राजा बेटा की तरह नाक साफ करेंगे फिर वापस आ कर डाक्टर की दुकान में जाएंगे,’’ वह रहस्यमय ढंग से मुसकराए.

‘‘खामखां मैं घर क्यों जाऊंगा? वहीं नाक साफ करूंगा फिर डाक्टर से दवा ले कर घर लौटूंगा,’’ इस बार उखड़ने की बारी मेरी थी.

‘‘यही तो…यही तो…मैं सुनना चाहता था आप की जबान से,’’ वह यों उछले जैसे बहुत बड़ा मैदान मार लिया हो. फिर मेरे कंधों पर हाथ रख भावुक हो उठे, ‘‘वहां जुकाम हो तो सड़क पर नाक नहीं छिनक सकते. कहते हैं रूमाल में पोंछ कर जेब में रख लो. छि…छि…सोच कर भी घिन आती है. उसी रूमाल से मुंह पोंछो, उसी से नाक. दोनों हैं अगलबगल में पर कुदरत ने कुछ सोच कर ही दोनों के छेद अलगअलग बनाए हैं. वह फर्क तो बरकरार रखना चाहिए.’’

‘‘तो 2 रूमाल रख लीजिए,’’ मैं ने उन की भीषण समस्या का आसान सा हल सुझाया फिर समझाने लगा, ‘‘सड़क पर एक इनसान गंदगी करता है तो दूसरे को उस की गंदगी साफ करनी पड़ती है. कितनी गलत बात है यह.’’

‘‘बात गलत नहीं, बल्कि सोच गलत है तुम्हारी,’’ वह शोले से भड़के. फिर मेरी अज्ञानता पर तरस खा शांत स्वर में बोले, ‘‘वैसे देखा जाए तो गलती तुम्हारी नहीं है. गलती तुम्हारी उस शिक्षा की है जो अंगरेजों की देन है.’’

इतना कह कर वह पल भर के लिए ठहरे फिर सांस भरते हुए बोले, ‘‘हम भारतवासी सदा से दयालु रहे हैं. जितना खाते हैं उतना गिराते भी हैं ताकि कीड़ेमकोड़ों और पशुपक्षियों का भी पेट भर सके. लेकिन ये जालिम अंगरेज तो इनसानों का भी भला नहीं सोचते.’’

‘‘मैं कुछ समझा नहीं.’’

उन्होंने मुझ पर तरस खाती दृष्टि डाली फिर समझाने की मुद्रा में बोले, ‘‘बरखुरदार, अपने देश में हम लोग परंपरापूर्वक मूंगफली और केला खा कर प्लेटफार्म पर फेंकते हैं, पूर्ण आस्था के साथ पान खा कर आफिस में थूकते हैं. श्रद्धापूर्वक बचाखुचा सामान पार्क में छोड़ देते हैं. इस से समाज का बहुत भला होता है.’’

‘‘समाज का भला?’’

‘‘हां, बहुत बड़ा भला,’’ वह अत्यंत शांत मुद्रा में मुसकराए फिर पूर्ण दार्शनिक भाव से बोले, ‘‘गंदगी मचाने से रोजगार का सृजन होता है क्योंकि अगर गंदगी न हो तो सफाई कर्मचारियों को काम नहीं मिलेगा. बेचारों के परिवार भूखे नहीं मर जाएंगे? लेकिन अंगरेजों को इस से क्या? वे तो हमेशा से मजदूरों के दुश्मन रहे हैं. इतिहास गवाह है कि जब भी किसी इनसान ने अधिकारों की मांग की है, अंगरेजों ने उसे बूटों तले कुचल डाला है. अब दूसरे मुल्कों में उन की हुकूमत तो रही नहीं, इसलिए अपने ही नागरिकों को गुलाम बना लिया. बेचारे अपने ही घर के सामने कूड़ा नहीं फेंक सकते, अपने ही महल्ले में सड़क घेर कर भजनकीर्तन नहीं कर सकते, सुविधानुसार गाड़ी पार्क नहीं कर सकते, अपने ही आफिस में पीक उगलने का आनंद नहीं ले सकते. जरूरत पड़ने पर इच्छानुसार विसर्जन नहीं कर सकते. काहे का लोकतंत्र जहां हर पसंदीदा चीज पर प्रतिबंध हो? सच्चा लोकतंत्र तो अपने यहां है. अपना देश, अपनी धरती. जहां चाहो थूको, जहां चाहो फेंको, जहां चाहो विसर्जन करो, कोई रोकटोक नहीं. इसीलिए तो कहते हैं, मेरा देश महान…’’

वह बोले जा रहे थे और मैं टकटकी बांधे देखे जा रहा था. लग रहा था कि शायद वह सही हैं.

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Hindi Satire Story : आधा है चंद्रमा, रात आधी – कोई जादुई चिराग तो है नहीं

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‘‘मान्यवर, महंगाई के बारे में आप से कुछ बात करनी थी.’’

वह गुस्से से थर्रा उठे थे. कुरसी उन से टकराई थी या वह कुरसी से, मैं नहीं बता सकता.

‘‘इस के लिए आप ने कितनी बार लिख डाला? गिनती में आप बता सकते हैं?’’

‘‘जी, जितनी बार वामपंथियों ने समर्थन वापस लेने की धमकियां दे डालीं,’’ मैं ने विनम्रता से कहा.

‘‘इस मुद्दे पर आप हमारा कितना कीमती समय बरबाद कर चुके हैं, कुछ मालूम है. आप को तो मुल्क की कोई दूसरी समस्या ही नजर नहीं आती… पाकिस्तानी सीमा पर आएदिन गोलीबारी होती रहती है. चीनी सीमा अभी तक विवादित पड़ी है. हम देश की अस्मिता बचाने में परेशान हैं. हमारी आधी सेना उन से लोहा लेने में लगी हुई है…’’

उन के इस धाराप्रवाह उपदेश के दौरान ही मेरे मुंह से निकल गया, ‘‘और बाकी आधी…’’

उन्होंने गुर्रा कर कहा, ‘‘मुल्क के तमाम हिस्सों में बोरवेलों में गिरने वाले बच्चों को निकालने में…कभी आप ने यह जानना नहीं चाहा कि अंदरूनी हालात भी कम खराब नहीं चल रहे हैं. मुंबई, बनारस, अक्षरधाम, हैदराबाद, बंगलौर, जयपुर के बाद अभी हाल में दिल्ली में आतंकवादी हमलों से देश कांप उठा है. हमारे आधे सुरक्षाबल तो उन्हीं से जूझ रहे हैं.’’

मैं ने प्रश्नवाचक मुंह बनाया, ‘‘बाकी आधे…’’

उन्होंने खट्टी डकार लेते हुए बताया, ‘‘वी.आई.पी. सुरक्षा में मालूम नहीं क्यों लोग अधिकारियों और मंत्रियों का घेराव करते रहते हैं. हमारे पास जादुई चिराग तो है नहीं. किसान कहते हैं अनाज की कीमतें बढ़ाइए, आप कहते हैं घटाइए. आप ही बताइए हम इसे कैसे संतुलित करें? हम तो बीच में कुछ अनाज धर्मकर्म पर या व्यवस्था के नाम पर ही तो लेते हैं. शेष का आधा आप लोगों की सेवा में ही लगाया जाता है.’’

मैं ने पूछा, ‘‘और बाकी आधा…’’

वह बहुत जोर से झल्ला उठे, ‘‘बाकी आधा सरकारी गोदामों में सड़ जाता है. आप लोग यह जो नेतागीरी करते रहते हैं, हमें काम करने का समय ही नहीं मिल पाता. गोदाम से अनाज निकलवाने के लिए हमें सुप्रीम कोर्ट तक बेकार की दौड़ करनी पड़ती है. यह काम सुप्रीम कोर्ट का है कि दिल्ली की सड़कों की सफाई के लिए भी लोग वहां पहुंच जाते हैं. उस का आधा समय तो यों ही निकल जाता है.’’

‘‘और शेष आधा?’’ मैं ने पूछा.

‘‘आतंकवादियों के मुकदमे सुनने में, पुलिस वालों के मुकदमे सुनने में और सरकारी व संवैधानिक संकट के समय उन को सलाहमशविरा देने में.

‘‘हमारी तो दिली इच्छा है कि हम सरकारों या सियासी पार्टियों को इस दलदल से निकालें. पर ये दोनों ही जनता की आड़ ले कर निकलना ही नहीं चाहते. जो बच्चे बोरवेल से निकलना चाहते थे, निकल लिए. जिन कपड़ों को मौडलों के बदन से निकलना था, निकल लिए. जो आतंकवादी मुल्क से निकलना चाहते थे, निकल लिए. जो अपराधी जेल से निकलना चाहते थे, निकल लिए. जो नेता पार्टी से निकलना चाहते थे, निकल लिए जो ‘बड़े’ घोटालों से निकलना चाहते थे, निकल लिए. स्वाभाविक नींद सोने वालों को तो जगाया जा सकता है, पर जो बन के सो रहे हों, उन्हें कौन जगा सकता है? क्योंकि तेल कंपनियां मुसीबत से निकलना चाहती थीं, प्रधानमंत्री से अपना रोना रोईं, उन्होंने आश्वासन दिया कि वे उन को परेशान नहीं देखना चाहते, कुछ दाम तो बढ़ाने ही होंगे. इस के बाद ‘ब्रांडेड’ पेट्रोल और बढ़े हुए दामों पर आ गया, रसोई गैस के नए कनेक्शन मिलने बंद हो गए हैं, आप जानते हैं कि आप मिट्टी के तेल, रसोई गैस आदि के असली मूल्य का आधा ही चुकाते हैं.’’

‘‘और आधा…’’ मेरे मुंह से आदतानुसार निकल गया.

‘‘अभी तक हम चुका रहे थे, अब बंद कर देंगे. आप का समय ‘पूरा’ खत्म हो गया.’’

मैं बाहर निकलते समय सोच रहा था कि वह सचमुच कितनी कंजूसी से काम चलाते हैं. आधे सांसदों से भी कम खर्च कर के सरकार बना भी लेते हैं और चला भी लेते हैं. जो तनाव ले कर मैं उन से मिलने गया था, आधा कम हो चुका था. ‘आधा है चंद्रमा रात आधी…’ गीत गुनगुनाते हुए मैं लौट पड़ता हूं क्योंकि अच्छा संगीत तनाव को आधा कर देता है.

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Hindi Satire Story : पकौडों का सैंपल फेल : क्या हुआ जब मैंने बनाए पकौड़े ?

Hindi Satire Story : दोस्तो, मुझे पकौड़े बनाने का कोई तजुरबा नहीं है. मैं ने तो कभी घर में भी पकौड़े नहीं बनाए थे. पर जब सरकार ने कहा है कि पकौड़ों में लखपति बनाने की ताकत है तो मैं ने सरकार के पकौड़ों का हिस्सा होने के लिए आव देखा न ताव, घर के स्टोर से टूटीफूटी कड़ाही निकाली, दादा के वक्त का कैरोसिन का चूल्हा साफ किया और एक परात में बेसन के बदले मक्के का आटा, नमक, मिर्च पता नहीं किस के स्वाद के हिसाब से मिला, सड़े आलू काट अपने महल्ले के किनारे की सरकारी जमीन पर शान से पकौड़ा भंडार खोल दिया और उस का नाम रखा ‘सरकारी पकौड़ा भंडार’.

पकौड़ों के उस भंडार का नाम सरकारी था इसलिए किसी भी सरकारी मुलाजिम की मुझ से यह पूछने की हिम्मत न हुई कि सरकारी जमीन पर पकौड़ा भंडार क्यों खोला? मुझे पता था कि कोई सरकारी मुलाजिम सब से पंगा ले सकता है पर अपनी सरकार के बंदों से नहीं.

दोस्तो, सरकारी जमीन पर सरकारी नाम का पकौड़ा भंडार नहीं खुलेगा, तो क्या अपने घर में खुलेगा? सरकार के नाम की दुकानें सरकार की गैरकानूनी तौर पर कब्जाई जगह पर ही खुल कर शोभा पाती हैं. नियमानुसार सरकारी जमीन पर सरकारी बंदे ही कब्जा कर सकते हैं. आम आदमी सरकारी जमीन पर कब्जा करना तो दूर, उस ओर देखने की भी हिम्मत करे तो उस की आंखें निकाल दी जाएं.

अपने पकौड़ा भंडार का ‘सरकारी पकौड़ा भंडार’ नाम रखने के चलते सब ने यही सोचा कि मैं सरकार का राइट नहीं तो लैफ्ट हैंड जरूर हूं, बल्कि थानेदार साहब ने तो मेरे कच्चे पकौड़ों की तारीफ करते हुए मेरी पीठ थपथपा कर यहां तक कह डाला कि ‘सरकारी पकौड़ा भंडार’ के लिए फर्नीचर की जरूरत हो तो बता देना. आधे रेट में दिलवा दूंगा.

अगर कोई विपक्ष वाला मेरे ‘सरकारी पकौड़ा भंडार’ की ओर आंख उठा कर भी देखे तो वह थानेदार उस की आंख तो आंख, आंत तक निकाल कर हाथ में दे देगा.

हफ्तेभर में ही सरकार के पकौड़ों के साथ अपने अधकच्चे, अधपके पकौड़ों का कदमताल करवाने का यह फायदा हुआ कि हर कोई अपने को सरकारी पकौड़ों का ग्राहक बताने के चक्कर में मेरे पकौड़ों को बिन दांतों के भी चटकारे लेले कर अपने पेट में धकियाता रहा. सब को यही लगता रहा कि जैसे वे मेरे पकौड़े नहीं, बल्कि सरकार के पकौड़े खा रहे हों. मुझ से किसी की यह भी कहने की हिम्मत नहीं हुई कि पकौड़ों में नमक नहीं है, पकौड़ों में मिर्च ज्यादा है.

मैं देखते ही देखते सरकारी पकौड़ों का अहम हिस्सा हो गया. विपक्ष वाले भी अपने को सरकार का हिस्सा साबित करने के बहाने अपने मुंह पर नकाब लगाए आते और मेरे पकौड़ों को सरकारी पकौड़ों का हिस्सा मान कर अपने को सरकार के बंदे घोषित करवा कर चुपचाप पकौड़े खा जाते.

चटनी की जगह पानी होता तो उसे भी चटकारे लेले पीते. यह सरकार की मुहर का प्रोडक्ट भी बड़ा अजीब होता है दोस्तो, सरकार के प्रेमी उसे यों चाटते हैं कि…

मैं मजे से बेखौफ हो कर जितना मन करता, पकौड़ों में बेसन के बदले मक्के का आटा मिला देता. तेल हुआ तो हुआ, वरना खाली कड़ाही में ही पकौड़े तल दिए.

महीनेभर से इसी तरह सरकारी पकौड़ों के नाम पर जनता को ठगने का अपना काम बुलंदियों पर था. सौ ग्राम के बदले 75 ग्राम तोलो तो भी कोई पूछने वाला नहीं. सरकार अपनी, तो तराजू भी अपनी. सरकार अपनी, तो मिर्च भी अपनी. सरकार अपनी, तो सड़े आलू भी अपने.

सब मजे से ठीकठाक चल रहा था कि पता नहीं कहां से एक हाथी पर, दूसरा साइकिल पर, तो तीसरा दिन में ही लालटेन जलाए अपने को सैंपल भरने वाले बता कर आ धमके.

सैंपल भरने वाले पहले भी आते थे पर ‘सरकारी पकौड़ा भंडार’ का मुकुट मेरी दुकान के माथे पर लगा पढ़ दुम दबाए माफी मांगते आगे हो लेते थे.

सैंपल भरने वालों में से एक ने मेरी सरकारी पकौड़ों की परात को घूरते हुए पूछा, ‘‘यह क्या है?’’

‘‘सरकारी पकौड़े हैं और क्या…’’ मैं ने गुर्राते हुए कहा.

‘‘कच्चे? जनता को बीमार करना

है क्या?’’

‘‘जनता तो जन्मजात ही बीमार है सर, इसलिए इस व्यवस्था में उस के सेहतमंद होने की सोचना भी फुजूल है. अब रही बात मेरे पकौड़ों की, तो सरकारी मुहर और नाम वाले पकौड़े चाहे कैसे भी हों, वे पके ही होते हैं. हर कोण से सेहत के लिए बढि़या ही होते हैं,’’ मैं ने सरकार के पक्ष में कहा, पर फिर भी वे चुप न हुए.

मन किया सरकार को फोन लगा दूं कि ये बेतुके से सैंपल भरने वाले कहां से भेज दिए आप ने जो सरकारी मुलाजिम होने के चलते सरकार के ‘मेड इन इंडिया’ पकौड़ों पर ही सवाल उठा रहे हैं.

‘‘पकौड़ों के नाम पर जनता को ठगते हो?’’ लालटेन वाले ने मुंह में पकौड़ा डाल कर मुंह बिचकाते हुए पूछा.

‘‘सर, लुट चुकी जनता का अब और क्या ठगना…’’ मैं ने दोनों हाथ जोड़े कहा तो साइकिल पर बैठा सैंपल भरने वाला नीचे उतरा और बोला, ‘‘अब ये पकौड़े नहीं चलेंगे,’’ फिर उस ने हाथी पर से पकौड़ों की क्वालिटी चैक करने वाली मोबाइल किट निकाली और उस में 2 सरकारी पकौड़े डाले.

5 मिनट तक वह उस किट में उन पकौड़ों को हिलाता रहा. उस के बाद पकौड़ों का घोल देख कर उस ने कहा, ‘‘पकौड़ों का सैंपल फेल…’’

‘‘पर सर, ये मेरे निजी नहीं, सरकारी पकौड़े हैं.’’

‘‘होते रहें. बहुत खिला लिए जनता को कच्चे, मिलावटी पकौड़े. कल से पकौड़ों की दुकान बंद.’’

‘‘तो मेरा क्या होगा साहब?’’

‘‘सरकार की जनता को उल्लू बनाने वाली अगली स्कीम का इंतजार करो,’’ उन में से एक ने कहा और वे तीनों मदमाते आगे हो लिए. Hindi Satire Story :

Hindi Satire Story : मैं तो कुछ नहीं खाती – आप कौन सा उपवास रखती हैं ?

Hindi Satire Story : अपना देश उपवासों का देश है. हर माह, हर सप्ताह, हर रोज कोई न कोई त्योहार आते ही रहते हैं. दीपावली, होली जैसे कुछ खास त्योहारों को छोड़ दिया जाए, जिन में मिठाइयां,चटपटे नमकीन पकवानों का छक कर उपयोग किया जाता है तो शेष त्योहारों में महिलाओं द्वारा उपवास रख कर पर्वों की इतिश्री कर दी जाती है.

कुछ उपवास तो निर्जला होते हैं. ये उपवास औरतों के लिए चुनौतीपूर्ण होते हैं. साथ ही सहनशीलता का जीताजागता उदाहरण भी हैं. आम औरतें तो बिना अन्न खाए रह सकती हैं मगर बिना पानी के रहना सच में साहस भरा कदम है. यह उपवास हरेक के बूते का रोग नहीं होता. घर में पानी से भरे मटके हों, फ्रिज में पानी से भरी ठंडी बोतलें हों, गरमी अपना रंग दिखा रही हो, गला प्यास से सूख रहा हो और निर्जला व्रत रखने वाली महिलाएं इन से अपना मुंह मोड़ लें. है न कमाल की बात. ठंडी लस्सी, शरबत, केसरिया दूध की कटोरी को छूना तो दूर वे इस सुगंधित स्वादिष्ठ पेय की ओर देखती तक नहीं हैं. धन्य है आर्य नारी, सच में ऐसी त्यागमयी मूर्ति की चरण वंदना करने को मन करता है.

ऐसा निर्जला उपवास करने वाली औरतों की संख्या उंगलियों पर होती है मगर खापी कर उपवास करने वाली घरेलू औरतें हर घर में मिल जाती हैं जो परिवार के स्वास्थ्य, सुखसमृद्धि के लिए गाहे- बगाहे उपवास करती रहती हैं. उपवास के नाम पर वे अन्न त्याग करने में अपनी जबरदस्त आस्था रखती हैं.
प्रात:काल स्नान कर घोषणा करती हैं कि उन का आज उपवास है. वह अन्न ग्रहण नहीं करेंगी. मगर फलाहार के नाम पर सब चलता है. मौसमी फलों की टोकरियां इस बात का प्रमाण होती हैं कि परिवार की महिलाएं कितनी सात्विक हैं. श्रद्धालु हैं, त्यागी हैं.

ऐसे तीजत्योहार में वे अनाज की ओर देखती तक नहीं हैं. बस, फल के नाम पर कुछ केले खा लिए. पपीता या चीकू की कुछ फांकें डकार लीं. कोई पूछता तो गंभीरता से कहती, ‘‘मैं तो कुछ खाती नहीं बस, थोड़े से भुने काजू ले लिए. कुछ दाने किशमिश, बादाम चबा लिए. विश्वास मानिए, मैं तो कुछ खाती नहीं. खापी कर उपवास किया तो उपवास का मतलब ही क्या रह गया.’’

‘‘आप सच कहती हैं, बहनजी. स्वास्थ्य की दृष्टि से सप्ताह में एक दिन तो अन्न छोड़ ही देना चाहिए. क्या फर्क पड़ता है यदि हम एक दिन अनाज न खाएं?’’ एक ही थैली की चट्टीबट्टी दूसरी महिला ने हां में हां मिलाते हुए कहा.

उपवास वाले दिन परिवार का बजट लड़खड़ा कर औंधेमुंह गिर जाता है. सिंघाड़े की सेव कड़ाही के तेल में तली जाने लगती है. कद्दू की खीर शुद्ध दूध में बनाई जाने लगती है. फलाहारी व्यंजन के नाम पर राजगीरा के बादशाही रोल्स बनने लगते हैं. फलाहार का दिन हो और किचन में सतरंगी चिवड़ा न बने, ऐसा कैसे हो सकता है? फलाहारी पकवान ही तो संभ्रांत महिलाओं को उपवास करने के लिए प्रेरित करते रहते हैं.

नएनए फलाहारी पकवान सुबह से दोपहर तक बनते रहते हैं. घरेलू औरतों के मुंह चलते रहते हैं. पड़ोस में फलाहारी पकवानों की डिश एक्सचेंज होती रहती हैं. एकदूसरे की रेसिपी की जी खोल कर प्रशंसा होती है, ‘‘बड़ा गजब का टेस्ट है. आप ने स्वयं घर पर बनाया है न?’’ एक उपवासव्रता नारी पूछती है.

‘‘नहीं, बहनजी, आजकल तो नएनए व्यंजनों की विधियां पत्रपत्रिकाओं में हर माह प्रकाशित होती रहती हैं. अखबारों के संडे एडीशन तो रंगीन चित्रों के साथ रेसिपीज से पटे रहते हैं. इसी बहाने हम लोग किचन में व्यस्त रहती हैं. आप को बताऊं हर टीवी चैनल वाले दोपहर को किचन टिप्स के नाम पर व्यंजन प्रतियोगिताएं आयोजित करते रहते हैं. ऊपर से पुरस्कारों की भी व्यवस्था रहती है. हम महिलाओं के लिए दोपहर का समय बड़े आराम से व्यंजन बनाने की विधियां देखने में बीत जाता है.

‘‘मैं तो कहती हूं, अच्छा भी है जो ऐसे रोचक व उपयोगी कार्यक्रम हमें व्यस्त रखते हैं, नहीं तो आपस में एकदूसरे की आलोचना कर हम टाइम पास करती रहती थीं. जब से मैं ने व्यंजन संबंधी कार्यक्रम टीवी पर देखने शुरू किए हैं विश्वास मानिए, पड़ोसियों से बिगड़े रिश्ते मधुर होने लगे हैं. मैं भी उपवास के नाम पर अब किचन में नएनए प्रयोग करती रहती हूं ताकि स्वादिष्ठ फलाहारी व्यंजन बनाए जा सकें.’’

विशेष पर्वों पर फलाहारी व्यंजन के कारण बाजार में सिंघाड़े, मूंगफली, राजगिरा, सूखे मेवे, तिल, साबूदाना और आलू जैसी फलाहारी वस्तुओं के भाव आसमान छूने लगते हैं. उपवास की आड़ में तेल की धार घर में बहने लगती है. नए परिधान में चहकती हुई महिलाएं जब उपवास के नाम पर फलाहारी वस्तुएं ग्रहण करती हैं, सच में वे काफी सौम्य लगती हैं. उन का दमकता चेहरा दर्शाता है कि उपवास रहने में सच संतोष व आनंद की अनुभूति होती है. बस, दुख इसी बात का रहता है कि हर नए व्यंजन का निराला स्वाद चटखारे के साथ लेते हुए कहती रहती हैं, ‘‘मैं तो कुछ खाती नहीं.’’ Hindi Satire Story :

Second Marriage : बेझिझक करें दूसरी शादी लेकिन इग्नोर न करें रिश्तेदारी

Second Marriage : दूसरी शादी में समाज और रिश्तेदारों की भूमिका अहम होती है. सामाजिक सुरक्षा की नजर से उस शादी को सफल बनाने में ये लोग मदद कर सकते हैं. इन के साथ होने से भावनात्मक सुरक्षा और सहयोग मिलने लगता है. सवाल यह कि समन्वय कैसे बने.

पहले पति या पत्नी के जिंदा न रहने पर या फिर पतिपत्नी का आपस में कानूनन तलाक हो जाने के बाद दूसरी शादी की जा सकती है. दूसरी शादी में सब से बड़ी परेशानी सामाजिक मान्यता और घरपरिवार के सहयोग को ले कर होती है. ऐसे में प्रयास यह होना चाहिए कि घर, परिवार, समाज और नातेरिश्तेदार भी इस को सहज भाव से लें. यह जिम्मेदारी दूसरी शादी करने वाले पतिपत्नी को लेनी चाहिए. पतिपत्नी अपने अच्छे व्यवहार और आपसी मेलजोल से घर, परिवार और नातेरिश्तेदारों का दिल जीत सकते हैं. एक बार सहज भाव बन जाता है तो दूसरी शादी में होने वाली बाद की दिक्कतें कम हो जाती हैं.

दूसरी शादी में समाज और रिश्तेदारों की भूमिका अहम होती है. सामाजिक सुरक्षा की नजर से उस शादी को सफल बनाने में ये लोग मदद कर सकते हैं. इन के साथ होने से भावनात्मक सुरक्षा और सहयोग मिलने लगता है. समाज और रिश्तेदारों के साथ होने से शादी करने वाले जोड़े को यह एहसास नहीं होता कि वे अकेले हैं. यह बात भी है कि कुछ मामलों में रिश्तेदार नकारात्मक भूमिका भी निभा सकते हैं. कई बार अलगअलग कारणों से ये लोग नई शादी को स्वीकार करने को सहज भाव से तैयार नहीं होते. इन को तैयार करने का काम पतिपत्नी को करना चाहिए.

Second Marriage (2)

अगर कोई रिश्तेदार या घर के लोग दूसरी शादी कर चुके हैं, वे नवविवाहितों को सलाह और मार्गदर्शन दे सकते हैं. उन के अनुभव नई शादी को सफल बनाने में मदद कर सकते हैं. यदि नवविवाहितों के बीच कोई मतभेद या झगडा होता है, तो रिश्तेदार मध्यस्थता कर सकते हैं और झगड़े को सुलझाने में मदद कर सकते हैं. रिश्तेदार नवविवाहितों को पारिवारिक बंधन में शामिल करने में मदद कर सकते हैं, जिस से वे एकदूसरे के साथ अधिक सहज महसूस करें.

समाज, रिश्तेदारों की चिंता न करें

कुछ रिश्तेदार दूसरी शादी को स्वीकार करने में सहज नहीं होते. ऐसे लोग कुछ परेशानियां खड़ी कर सकते हैं. कई बार ऐसे लोग दूसरी शादी में बहुत हस्तक्षेप करने लगते हैं. ऐसे रिश्तेदार नवविवाहितों की तुलना उन के पहले साथी से करने लगते हैं. इस से उन के बीच असुरक्षा की भावना पैदा हो सकती है. कुछ रिश्तेदार अफवाहें फैला सकते हैं, जिस से नवविवाहितों के लिए नकारात्मक माहौल बन जाता है. ऐसे लोगों से बचने के लिए ही लोग चुपचाप या फिर छिप कर दूसरी शादी कर लेते हैं.

इस से बचने के लिए समाज और रिश्तेदारों की चिंता न करें. खास बात यह होती है कि इन को इग्नोर भी नहीं करना चाहिए. इन को हर बात की जानकारी दे देनी चाहिए. इस की वजह यह है कि जब तक इन को बात पता नहीं चलेगी, ये एकदूसरे से पूछते रहेंगे और बात का बंतगढ़ बनाते रहेंगे. जब एक बार इन को सच की जानकारी हो जाएगी तो ये गौशिप करना बंद कर देंगे. नवविवाहितों को अपने परिवारों को दूसरी शादी के बारे में समझाना चाहिए और उन्हें विश्वास दिलाना चाहिए कि यह जरूरी था और बहुत सोचसमझ कर की गई है.

पर उन को इग्नोर भी न करें

समाज और नातेरिश्तेदार यह मानते हैं कि इस तरह की शादी केवल सैक्स संबंधों के लिए की जाती है. उन को यह समझने की जरूरत है कि शादी केवल सैक्स संबंधों के लिए नहीं होती. शादी की अपनी कई सामाजिक और मानसिक जरूरतें होती हैं. समय के साथसाथ सैक्स की चाहत तो कम हो सकती है पर मानसिक सहयोग और साथ चाहिए होता है, एकदूसरे की मदद करने की जरूरत होती है. ऐसे में दूसरी शादी में एकदूसरे का सम्मान करना चाहिए. एकदूसरे की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए. अपने विचारों और भावनाओं को एकदूसरे के साथ खुल कर साझा करना चाहिए. अपने परिवारों के साथ सीमाएं निर्धारित करनी चाहिए और उन्हें यह स्पष्ट करना चाहिए कि वे अपनी शादी में कितना हस्तक्षेप चाहते हैं.

Second Marriage (3)
दूसरी शादी की चुनौतियां अलग होती हैं. यहां प्यार, जनून और जज्बात से ज्यादा मैच्योरिटी काम आती है. अपने फैसले और रिश्तेदारों के बीच सामंजस्य बैठाने में समझदारी जरूरी होती है.

यदि किसी भी समस्या का सामना करना पड़ता है तो उन्हें डाक्टर, वकील और मनोचिकित्सक जैसे पेशेवर लोगों से मदद लेने में संकोच नहीं करना चाहिए. दूसरी शादी एक चुनौतीपूर्ण अनुभव सी होती है. यदि रिश्तेदार सही भूमिका निभाते हैं तो यह एक सफल और खुशहाल शादी हो सकती है. अगर उन की भूमिका सही नहीं होती तो उन को इग्नोर न करें बल्कि आपसी समझदारी से काम करें. इस के लिए अपने ही व्यवहार और आचरण से भी बहुतकुछ सीखा जा सकता है. इस के लिए जरूरी है कि आपसी संबंध मजबूत रखें. आपस में मिलनाजुलना बढ़ाएं. इस का सब से आसान रास्ता ‘डिनर डिप्लोमैसी’ होती है. कहा भी जाता है दिल का रास्ता पेट से हो कर जाता है. समयसमय पर इस तरह के आयोजन आपस में मधुरता घोलने का काम करते हैं.

कैसे सफल हो दूसरी शादी : 11 टिप्स

• पहली शादी से मिले सबक पर विचार करें, समझें कि क्या कामयाब रहा और क्या नहीं. ताकि आप अपनी दूसरी शादी में सोचसमझ कर निर्णय ले सकें. पुरानी गलतियों को दोहराने से बच सकेंगे.

• दूसरी शादी की अलग चुनौतियां होती हैं. इस में दिल से अधिक दिमाग से काम लेना पड़ता है. खासकर आर्थिक, कानूनी और सामाजिक मसलों पर फैसला काफी सोचविचार कर करना चाहिए.

• पतिपत्नी दोनों के अगर बच्चे भी हैं तो शादी के पहले और बाद धैर्य से काम लें. परिवारों को आपस में मिलाने से पहले उन को मानसिक रूप से तैयार कर दें, जिस से सभी के लिए मुलाकातें सहज रहें. कोई कठिन मोड़ आए तो शांत मन से ही फैसला करें.

• पुरानी किसी भी समस्या को पहले सही से पहचानें. इस के बाद उस से कैसे निबटे, यह सोचें. यह ध्यान रखें कि पुरानी समस्या नए रिश्ते को प्रभावित न करे. पुरानी कोई भी समस्या किसी अकेले की नहीं होती है. उस का मुकाबला दोनों पतिपत्नी को मिल कर करना चाहिए.

• एक स्वस्थ रिश्ते के लिए विश्वास स्थापित करना सब से जरूरी काम होता है. कोई भी रिश्ता, चाहे पतिपत्नी के बीच हो या परिवार के भीतर, इस के बिना पनप नहीं सकता. विश्वास जमने में समय लगता है. ऐसे में जल्दबाजी में कोई फैसला न लें.

• दूसरे विवाह में गलतफहमी दूर करने के लिए पतिपत्नी को ही अपनी भूमिकाएं तय कर लेनी चाहिए. एकदूसरे के बच्चों को भी अपनी जिम्मेदारियां समझनी चाहिए. जब हर कोई अपनी भूमिका सही तरह से निभाता है, तो दूसरी शादी को सफल होने से कोई रोक नहीं सकता है.

• किसी भी रिश्ते में लचीलापन जरूरी होता है. न केवल अपने नए जीवनसाथी के साथ, बल्कि उन के बच्चों और परिवार के साथ भी संबंध बनाएं. यह न केवल दूसरे विवाह को मजबूत बनाता है बल्कि रिश्ते की सफलता में भी महत्त्वपूर्ण योगदान देता है. एकदूसरे के बच्चों को उन के जन्मदिन पर उपहार दे सकते हैं. आजकल अलगअलग अवसरों को भी सैलिब्रेट किया जाने लगा है. पेरैंट्स को इस दिन उपहार और पार्टी दे सकते हैं. उन को उपहार भी दिए जा सकते हैं.

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दूसरी शादी में सब से बड़ी समस्या पहली शादी से जुड़ी खटास की यादों की आती है, ऐसे में नई यादें बनाने के लिए कपल को एकदूसरे के साथ क्वालिटी टाइम बिताना जरूरी होता है.

• नए रिश्ते को मजबूत करने के लिए माफ करना और भूलना जरूरी होता है. पिछली शिकायतों को भूल कर आगे बढ़ने में ही भलाई होती है. दूसरी शादी में अगर सौतेले बच्चे अच्छा व्यवहार नहीं करते हैं, अपने नए मातापिता के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं तो इस को सहज भाव से लें. उन की भावनाओं को समझने की कोशिश करें क्योंकि उन्हें इस बदलाव के दौरान सहारे की जरूरत है.

• अपने रिश्ते को मजबूत बनाने के लिए एकसाथ समय बिताना बेहद जरूरी होता है. न केवल अपने नए साथी के साथ बल्कि उन के परिवार के साथ भी समय बिताएं. नए परिवार के साथ सैरसपाटा, डिनर या पिकनिक के लिए समय निकालते रहें. उन की परंपराओं और रीतिरिवाजों को अपनाने का प्रयास करें.

• अगर कभी ऐसा होता है कि बच्चे सिर्फ अपने असली मातापिता के साथ बाहर जाना पसंद करते हैं और नए मातापिता के साथ नहीं, तो बहस से बचें. उन की जगह का सम्मान करें और उन्हें वह आजादी दें. हर रिश्ते को विकसित होने में समय लगता है. दूसरी शादी के मामले में यह न केवल समय की मांग करता है बल्कि लगातार प्रयास करने की जरूरत भी होती है.

• कई बार पैसों को ले कर विवाद हो जाते हैं. ऐसे में जरूरी है कि आपसी विचार से योजनाएं बनाएं. यदि पूर्व पति तलाक के बाद अपनी मां के साथ रहने वाले बच्चों के मासिक खर्चों को वहन करने के लिए बाध्य हैं, तो हस्तक्षेप से बचें. यह उन का अधिकार है. उन को खर्च करने दें. तलाक में कई बार कोर्ट शर्तें रख देती है कि पिता अपने बच्चों से मिल सकते हैं. इस को सहज भाव से लें. कई बार सौतेला पिता इस को अन्यथा ले लेता है कि वह घर में बारबार क्यों आता है. Second Marriage :

गंजे लड़के – रिजैक्शन का शिकार क्यों ?

Hair Loss Problem Male : क्यों कोई लड़की गंजे लड़के से शादी नहीं करना चाहती? इस सवाल का जवाब ढूंढ पाना उतना ही मुश्किल है जितना उन्हें यह समझा पाना कि जब बाकी सब ठीकठाक हो और मैच कर रहा हो तो महज गंजेपन के आधार पर अच्छा घरबार ठुकरा देना कोई फायदे का सौदा तो नहीं कहा जा सकता.

फेसबुक पर कभीकभार जो सलीके की पोस्ट देखने को मिलती हैं उन में से एक किन्ही सुरेंद्र सिंह पंवार की है जिस में पिछली 20 मार्च को वे लिखते हैं, ‘शादी के लिए आए गंजे लड़कों की फोटो रिजैक्ट करने वाली 90 फीसदी लड़कियों को शादी के 10 साल बाद गंजे पति के साथ ही रहना पड़ता है. यानी, सुरेंद्र सिंह के मुताबिक, शादी के 10 साल बाद पति में गंजापन आने लगता है. मुमकिन है यह आंकड़ा थोड़ा ज्यादती पेश करता हुआ लगे लेकिन रोजाना दिखने वाली इस हकीकत के लिए किसी सर्वे रिपोर्ट की दरकार नहीं कि 90 नहीं तो 60 फीसदी पति तो गंजेपन का शिकार होने लगते ही हैं. उन्हें देख लगता है कि अर्धगंजेपन से ज्यादा तो पूर्णगंजापन अच्छा और ठीकठाक लगता है.

आजकल ज्यादातर लड़कियां 30 और 35 वर्ष की उम्र के बीच शादी कर रही हैं. इस वक्त में पति की उम्र इस से थोड़ी ज्यादा ही होती है. 45 तक पहुंचतेपहुंचते अधिकतर पुरुषों के सिर की फसल उजड़ना शुरू हो जाती है. अर्थात, बाल वाला पति कोई 10-12 साल ही बाल वाला रहता है.

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सांकेतिक तस्वीर

अमेरिकी हेयर लौस एसोसिएशन के मुताबिक तो 85 फीसदी पुरुषों के बाल 50 वर्ष की उम्र के बाद पतले होना और झड़ना शुरू हो जाते हैं. इसे मेल पैटर्न बाल्डनैस या एलोपेसिया भी कहा जाता है. ऊपर बताए आंकड़े की पुष्टि कुछ बदलाव के साथ दूसरी कई एजेंसियां भी करती हैं. मसलन, अमेरिका के ही एक प्रतिष्ठित अस्पताल समूह क्लिवलैंड क्लिनिक की एक मैडिकल रिसर्च के मुताबिक भी हर दो में से एक पुरुष के सिर के बाल 50 साल की उम्र के बाद पतले होने लगते हैं या फिर झड़ने लगते हैं.

भारत की स्थिति इस से अलग नहीं है. एक रिपोर्ट के मुताबिक 30 से 50 साल की उम्र के बीच के 58 फीसदी युवक एजीए यानी एन्ड्रोजेनेटिक एलोपेसिया की गिरफ्त में हैं. इसे ही मेल पैटर्न बाल्डनैस कहा जाता है. तो फिर क्यों लड़कियां गंजे लड़कों से शादी नहीं करना चाहतीं, इस सवाल का दो टूक जवाब तो यह है कि यह व्यक्तिगत इच्छा और पसंद की बात है. जब लड़के बातबात पर लड़कियों को रिजैक्ट कर सकते हैं तो इसी या किसी और आधार पर लड़कियों से यह हक नहीं छीना जा सकता.

कमी या कमजोरी नहीं गंजापन

लेकिन जिस तरह लड़कों को यह सलाह नहीं दी जाती कि वे महज हाइट या कम गोरे होने जैसी बेदम वजहों के चलते खासी शिक्षित लड़की को रिजैक्ट कर दें, ठीक उसी तरह लड़कियों को भी यह सलाह नहीं दी जा सकती कि वे महज गंजे होने के कारण अच्छेखासे कमाऊ लड़के को रिजैक्ट कर दें.

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भारत में हेयर ग्रोथ व हेयर ट्रीटमेंट से जुड़े क्लीनिक धड़ल्ले से खुल गए हैं. वजह, युवाओं में बढ़ रहा फौल नहीं बल्कि हेयरफौल के चलते सामाजिक रिजैक्शन है, जिसे वे झेल नहीं पा रहे हैं.

गंजापन कोई शारीरिक कमजोरी या कमी नहीं है जिसे रिजैक्शन का पैमाना बनाया या माना जाए. पुणे में एक सौफ्टवेयर कंपनी में नौकरी कर रहे भोपाल के 34 वर्षीय आदित्य सक्सेना (बदला नाम) की शादी महज इसलिए नहीं हो पा रही कि वे गंजे हैं. कालेज तक उस के बाल ठीकठाक थे. लेकिन पुणे में जौब जौइन करने के बाद बाल झड़ने लगे. जिन्हें रोकने के लिए उस ने कई जतन किए. एलोपेथी से ले कर होम्योपैथी और नीमहकीमों तक का इलाज लिया लेकिन कोई फायदा न हुआ. सो, उस ने अपने गंजेपन को नियति स्वीकारते उस से समझौता कर लिया.

अब तक कई लड़कियां आदित्य को रिजैक्ट कर चुकी हैं, जबकि उस की सैलरी लगभग डेढ़ लाख रुपए महीना है. मम्मीपापा दोनों सरकारी नौकरी से रिटायर हुए हैं जिन्होंने खासी जायदाद भोपाल में बना ली है. साथ ही, इज्जत भी खूब कमाई है. खुद आदित्य भी नेकदिल और होनहार है, पढ़ाई में हमेशा अव्वल नंबरों से पास हुआ है और नौकरी भी नामी कंपनी में करता है. उस का रंग भी साफ है और हाइट भी 6 फुट है. कमी है तो बस सिर में बालों की जिस से लड़कियां समझौता नहीं कर रहीं.

`बहुत दुख होता है जब लड़कियां गंजेपन के कारण मुझे रिजैक्ट कर देती हैं,’ आदित्य बताता है, उन में से कुछ से मैं ने पूछा भी कि इस गंजेपन के अलावा कोई और कमी या ऐब मुझ में दिखता है तो उन सभी का जवाब मेरे हक में यानी न में था. एक लड़की ने तो फोन पर साफतौर पर कहा कि आप बहुत अच्छे हैं आदित्यजी. जो भी लड़की आप से शादी करेगी वो बहुत भाग्यशाली होगी लेकिन स्कूल के ज़माने से मेरी इच्छा रही है कि मेरे होने वाले पति के बाल काले, घने और घुंघराले हों. इसलिए बेमन से लेकिन पूरी विनम्रता से मैं यह रिश्ता मंजूर नहीं कर पा रही. जबकि मम्मीपापा समझासमझा कर हार चुके हैं कि आप से बेहतर घर-वर मुझे कहीं और नहीं मिलेगा.

तार्किक भड़ास एक गंजे युवा की

दरअसल इस लड़की से आदित्य के रिश्ते की बात थोड़ी लंबी चली थी. दोनों 2 बार डेट पर भी गए थे जहां ढेर सी बातें हुई, जिन में आदित्य का गंजापन भी शामिल था. आदित्य को भी वह लड़की भा गई थी. इसलिए उस ने अपने गंजेपन को ले कर कन्विंस कराने की कोशिश की थी. लेकिन बात बनतेबनते बिगड़ गई. लड़की के पेरैंट्स तो एकपैर पर शगुन लिए खड़े थे लेकिन, बकौल आदित्य, उस लड़की को लड़का नहीं शायद चिम्पाजी या रीछ चाहिए था. अगर उसे सिर्फ बालों से ही शादी करना थी तो मेरे घर का नौकर सुदामा से कर लेती जिस के बाल न केवल घने हैं बल्कि घुंघराले भी हैं. हां, सिर्फ कुछ कमियां हैं उस में जैसे महज 10वीं पास है, उस की सैलरी सिर्फ 6 हजार रुपए महीना है और आमतौर पर वह मैलाकुचैला रहता है.

तय है यह उस का गुस्सा बोल रहा था लेकिन अच्छी बात यह है कि अब वह अपने गंजेपन की हताशा और हीनता को आत्मविश्वास में तबदील कर चुका है. अब कोई भी रिश्ता आता है तो सब से पहले वह लड़की को अपना गंजा सिर दिखा देता है कि देख लो, बाकी बातें बाद में करेंगे.
लेकिन बात अभी तक कहीं बनी नहीं है जिस से उस के पेरैंट्स उस से भी ज्यादा दुखी और तनाव में रहते हैं. आदित्य की मां की मानें तो आदित्य से गएगुजरे लड़कों की शादी ठाट से हो रही है जो इनकम, स्टेटस और एजुकेशन के अलावा दिखने में भी उस से आधे ही हैं. हां, उन के सिर पर बाल जरूर बराबर हैं. बाल होने की शर्त पर लड़कियां लड़कों की दूसरी कमियां और कमजोरियां नजरअंदाज कर रही हैं, क्या यह बात उन पर तरस खाने वाली नहीं.

यह एक मां की पीड़ा या भड़ास भर नहीं है बल्कि 62 वसंत देख चुकी एक शिक्षित नौकरीपेशा और अनुभवी महिला की लड़कियों को नसीहत या मशवरा भी है कि उन्हें लड़के में क्याक्या देखना चाहिए. सब से पहले शिक्षा, फिर नौकरी और कमाई, फिर व्यवहार व परिवार और इस के बाद देखना हो तो कैरेक्टर और शौक वगैरहवगैरह देखे जाने चाहिए.

सुखी जीवन का बालों से संबंध नहीं

यह अच्छी और स्वागतयोग्य बात है कि लड़कियों को अपना वर चुनने की आजादी मिली है खासतौर से नौकरीपेशा लड़कियों को तो इंटरकास्ट मैरिज करने की भी अग्रिम इजाजत मिली हुई है. यानी, पेरैंट्स का रोल अब फायनैंसर होने का भर का रह गया है. वे अपनी बेटी को यह तक समझाने में नाकाम हो रहे हैं कि लड़के में सारे गुण हों, नौकरी और सैलरी अच्छी हो, घरपरिवार अच्छा और इज्जतदार हो तो गंजापन कोई बहुत बड़ा फैक्टर नहीं रह जाता. उस स्थिति में तो कतई नहीं जिस में, सुरेंद्र सिंह पंवार की पोस्ट के मुताबिक, 10 साल बाद गंजे हो ही जाना है.
इस में कोई शक नहीं कि गंजे लड़के पति के तौर पर लड़कियों की आखिरी प्राथमिकता हैं ठीक वैसे ही जैसे ज्यादा सांवली और साधारण शक्लओसूरत वाली लड़कियां लड़कों की आखिरी प्राथमिकता होती हैं. अब यहां यह देखा जाना जरूरी है कि कितनी सांवली लड़कियां एक बेहतर पत्नी और कितने गंजे लड़के बेहतर पति साबित हुए. अपने अनुभवों से तो कई लोग कहते मिल जाएंगे कि अधिकतर रिश्ते सफल रहे और उन का वैवाहिक जीवन भी सुखद रहा.

क्या हर वो लड़की जिस ने बाल वाले लड़के से शादी की सुखी है? इस का जवाब न में ही मिलता है. इस का मतलब यह नहीं कि बाल वाले सभी लड़के या पति ख़राब होते हैं या सभी गंजे आदर्श पति साबित होते हैं. मुमकिन है उन में भी कोई न कोई ऐब मिल जाए लेकिन जब रिस्क दोनों तरफ बराबर का है तो एक गंजेपन की बिना पर अच्छाखासा रिश्ता ठुकरा देना बुद्धिमानी की बात या फैसला तो नहीं माना जा सकता. इस बारे में एक युवती रश्मि का कहना है, आप शादी की बात कर रहे हैं, हकीकत तो यह है कि गंजे लड़कों को लड़कियां बौयफ्रैंड बनाना भी पसंद नहीं करतीं क्योंकि उन्हें गंजे के साथ चलने, रहने और बात करने में शर्म आती है.

गंजों के प्रति पूर्वाग्रह क्यों ?

गंजापन कोई विकलांगता नहीं है लेकिन इसे देखा इसी नजरिए से जाता है. गंजों को कई विशेषणों से नवाजा जाता है जिन में टकला, उजड़ा चमन और बंजर जमीन प्रमुख हैं. कई फिल्मों में गंजों का मजाक बनाया गया है और गंजों पर कई जोक्स भी बने हैं. यानी, गंजों के प्रति पूर्वाग्रह पैदा करने और नैगेटिव नैरेटिव गढ़ने में इन का भी योगदान कमतर नहीं.

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साल 2019 में अमर कौशिक द्वारा निर्देशित फिल्म ‘बाला’ रिलीज हुई थी, जो युवाओं में गंजेपन के चलते सामाजिक बहिष्कार के मुद्दे पर बनी है.

ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ व्यक्तिगत रूप से ही गंजों को दुश्वारियां झेलनी पड़ती हों, बल्कि है ऐसा भी कि गंजे लोग हर कहीं अनदेखी और भेदभाव का शिकार होते हैं. अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के एक सर्वे के मुताबिक गंजे आदमी को संक्रमित, बदबूदार, गंदा और नासमझ समझा जाता है. गंजे लोगों को जौब देने में भेदभाव होता है. हद तो यह कि प्रत्येक 6 में से एक आदमी गंजों से बात करने में हिचकता है.
इस और ऐसी कई परेशानियों को साल 2019 में अमर कौशिक निर्देशित फिल्म ‘बाला’ में बहुत गहराई से उकेरा गया था. इस फिल्म में आयुष्मान खुराना ने एक ऐसे युवा गंजे की भूमिका निभाई है जिस का मजाक गंजेपन के चलते उड़ना आम है. इस से उस का आत्मविश्वास डगमगा जाता है और गंजेपन से नजात पाने के लिए वह वही उपाय आजमाता है जो आदित्य जैसे लाखों युवा आजमाते हैं. कई उपायों के बाद भी नायक बाला के बाल वापस नहीं आते लेकिन उस की जिंदगी में एक खूबसूरत वकील लतिका यानी यामिनी गौतम आती है जिसे लुभाने के लिए बाला बिग पहनने लगता है. लतिका भी बाला को पसंद करने लगती है.

जब फिल्म में खुला राज

लेकिन एक दिन उम्मीद के मुताबिक बाला के गंजेपन का राज खुल ही जाता है. उम्मीद के मुताबिक ही लतिका गंजापन झेल नहीं पाती और दोनों का ब्रेक अप हो जाता है. यानी, महज गंजेपन के चलते एक पढ़ीलिखी युवती की धारणा बदलती है तो उसे तथाकथित समझदार ही कहा जाएगा. कल तक जिस लड़के के साथ वह रोमांटिक रिश्ते में थी, नाच-गा रही थी, घर बसाने के सपने देखने लगी थी उस की शक्ल और समझ पर निछावर थी, एक बाल न होने से यह सब उसे बेकार लगने लगता है.

ऐसा फिल्मों में ही नहीं बल्कि हकीकत में भी अकसर होता देखा गया है. कुछ अरसा पहले ही उत्तर प्रदेश के उन्नाव के सफीपुर में दिल्ली के एक दूल्हे पंकज, जो पेशे से शिक्षक था, की बिग वरमाला के दौरान गिर गई तो दुलहन ने गंजे से शादी करने से मना कर दिया. नतीजतन, पंकज को बरात बड़े बेआबरू हो कर तेरे कूचे से निकले की तर्ज पर वापस दिल्ली ले जाना पड़ी. दोनों पक्षों के समझदार लोगों ने लड़की को समझाने की कोशिश की लेकिन उस के बालों में जूं तक न रेंगी.

बाला फिल्म इन्ही वजहों के चलते अच्छी बन पड़ी थी जिस में भूमि पेडनेकर भी परिणीती नाम से एक महत्त्वपूर्ण भूमिका में दिखाई दी थी जो बाला के बचपन की दोस्त है. लेकिन दोनों में कोई प्यार या रोमांस नहीं है, बस, दोस्ती है. परिणीती मामूली शक्ल वाली टिकटौक स्टार है जिस की लड़ाई सौंदर्य मानकों को ले कर है. सीधेसीधे कहा जाए तो अमर कौशिक यह बताने में कामयाब रहे थे कि जिस वजह से साधारण चेहरेमोहरे वाली लड़कियों की शादी नहीं होती वही स्थिति एक गंजे युवक की समाज में होती है.

लेकिन फिल्म का अंत काफी इंस्पायर करने वाला था. बाला अपनी कमी को स्वीकार लेता है और खोया हुआ आत्मविश्वास हासिल कर लेता है. यही परिणीती भी करती है और दोनों सबकुछ नजरअंदाज करते अपनीअपनी मंजिल की तरफ बढ़ने लगते हैं. यही आम जिंदगी में होना जरूरी है कि गंजे युवा खुद को दीनहीन न समझें और खुद को साबित करते रहें तो दुनिया उन्हें सलाम करेगी.

आदित्य इन दिनों यही कर रहा है और कुछ वर्षों बाद अपनी खुद की कंपनी डालने की योजना बना रहा है. इस बाबत उस ने प्रोजैक्ट तैयार कर लिया है. शादी की बाबत उस का कहना बेहद साफ है कि जो लड़की उसे उस के गंजेपन के साथ दिल से स्वीकारेगी वही जिंदगीभर साथ दे पाएगी. हां, आकर्षक दिखने के लिए उस ने दूसरे कई गंजे युवकों की तरह चेहरे के मुताबिक दाढ़ी रखना शुरू कर दी है जिस से वह आकर्षक दिखता है और उस का गंजापन, आंशिक ही सही, ढक भी जाता है.

लेकिन उस की बातों से यह बात या मैसेज भी लड़कियों के लिए झलकता है कि वे किसी गंजे युवक को महज बालों की कमी के चलते रिजैक्ट न करें बल्कि वे देखें यह कि लड़का कितना कमाऊ, शिक्षित, स्वाभिमानी और समझदार है. जिंदगी किसी लड़के के बालों के साथ नहीं, बल्कि उस के स्वभाव के साथ काटनी है, यह बात हर लड़की को समझनी चाहिए. Hair Loss Problem Male

Hindi Family Story : क्षोभ – शादी के नाम पर क्यों हुआ नितिन का दिल तार-तार ?

Hindi Family Story : यह कहना सही नहीं होगा कि नितिन की जिंदगी में खुशी कभी आई ही नहीं. खुशी आई तो जरूर, लेकिन बिलकुल बरसात की उस धूप की तरह, जो तुरंत बादलों से घिर जाती है. जहां धूप खिली वहीं बादलों ने आ कर चमक धुंधली कर दी, यानी जैसे ही मुसकराहट कहकहों में बदली वैसे ही आंखों ने बरसना शुरू कर दिया.

यों तो नितिन के पापा नामीगिरामी डाक्टर थे, पैसे की कोई कमी नहीं थी, फिर भी परिवार इतना बड़ा था कि सब के शौक पूरे करना या सब को हमेशा उन की मनचाही चीज दिलाना मुश्किल होता था. इस मामले में नितिन कुछ ज्यादा ही शौकीन था और अपने शौक पूरे करने का आसान तरीका उसे यह लगा कि फिलहाल पढ़ाई में दिल लगाए ताकि जल्दी से अच्छी नौकरी पा कर अपने सारे अरमान पूरे कर सके.

कुछ सालों में ही नितिन की यह तमन्ना पूरी हो गई. बढि़या नौकरी तो मिल गई, लेकिन नौकरी मिलने की खुशी में दी गई पार्टी में पापा का अचानक हृदयगति रुक जाने के कारण देहांत हो गया. खुशियां गम में बदल गईं.

7 भाईबहनों में नितिन तीसरे नंबर पर था. बस एक बड़ी बहन और भाई की शादी हुई थी बाकी सब अभी पढ़ रहे थे.

नितिन ने शोकाकुल मां को आश्वस्त किया कि अब छोटे भाईबहनों की पढ़ाई और शादी की जिम्मेदारी उस की है. सब को सेट करने के बाद ही वह अपने बारे में सोचेगा यानी अपनी गृहस्थी बसाएगा और उस ने यह जिम्मेदारी बखूबी निबाही भी. अपने शौक ही नहीं कैरिअर को भी दांव पर लगा दिया.

हालांकि दूसरे शहरों में ज्यादा वेतन की अच्छी नौकरियां मिल रही थीं, लेकिन नितिन ने हमेशा अपने शहर में रहना ही बेहतर समझा. कारण, एक तो रहने को अपनी कोठी थी, दूसरे मां और छोटे भाईबहन उस के साथ रहने से मानसिक रूप से सुरक्षित और सहज महसूस करते थे.

अत: वह मेहनत कर के वहीं तरक्की करता रहा. वैसे बड़े भाई ने भी हमेशा यथासंभव सहायता की, फिर दूसरे भाईबहनों ने भी नौकरी लगते ही घर का छोटामोटा खर्च उठाना शुरू कर दिया था.

कुछ सालों के बाद सब चाहते थे कि नितिन शादी कर ले, लेकिन उस का कहना था कि सब से पहले छोटे भाई निखिल को डाक्टर बनाने का पापा का सपना पूरा करने के बाद ही वह अपने बारे में सोचगा.

निखिल से बड़ी बहन विभा की शादी से पहले ही मां की मृत्यु हो गई. तब तक दूसरे भाइयों के बच्चे भी बड़े हो चले थे और उन सब के अपने खर्चे ही काफी बढ़ गए थे. नितिन से उन की परेशानी देखी नहीं गई. उस ने विभा की शादी और निखिल की पढ़ाई का पूरा खर्च अकेले उठाने का फैसला किया. भविष्य निधि से कर्ज ले कर उस ने विभा की शादी उस की पसंद के लड़के से धूमधाम से करा दी और निखिल को भी मैडिकल कालेज में दाखिल करा दिया.

निखिल की नौकरी लग जाने के बाद नितिन पुश्तैनी कोठी में बिलकुल अकेला रह गया था. 2 बहनें उसी शहर में रहती थीं, जो उसे अकेलापन महसूस नहीं होने देती थीं.

दूसरे भाईबहन भी बराबर उस से संपर्क बनाए रखते थे, सिवा निखिल के. वह कन्याकुमारी में अकेला रहता था और सब को तो फोन करता था, लेकिन नितिन से उस का कोई संपर्क नहीं था. चूंकि उस का हाल दूसरों से पता चल जाता था, इसलिए नितिन ने स्वयं कभी निखिल से बात करने की पहल नहीं की.

मझली बहन शोभा की बेटी की शादी की तारीख तय हो गई थी, लेकिन उस के पति को किसी जरूरी काम से विदेश जाना पड़ रहा था और वह शादी से 2 दिन पहले ही लौट सकता था. उधर लड़के वाले तारीख आगे बढ़ाने को तैयार नहीं थे. शोभा बहुत परेशान थी कि अकेले सारी तैयारी कैसे करेगी?

‘‘तू बेकार में परेशान हो रही है, मैं हूं न तेरी मदद करने को. हरि से बेहतर तैयारी करा दूंगा,’’ नितिन ने आश्वासन दिया, ‘‘तुम सब की शादियां कराने का तजरबा है मुझे.’’

एक दिन बाहर से आने वाले मेहमानों की सूची बनाते हुए नितिन ने शोभा से कहा, ‘‘निखिल से भी आग्रह कर न शादी में आने के लिए. इसी बहाने उस से भी मिलना हो जाएगा. बहुत दिन हो गए हैं उसे देखे हुए.’’

‘‘हम सब भी चाहते हैं भैया कि निखिल आए और वह आने को तैयार भी है, लेकिन उस की जो शर्त है वह हमें मंजूर नहीं है,’’ शोभा ने सकुचाते हुए कहा.

‘‘ऐसी क्या शर्त है?’’

‘‘शर्त यह है कि आप शादी में शरीक न हों. वह आप से मिलना नहीं चाहता.’’

‘‘मगर क्यों?’’ नितिन ने चौंक कर पूछा. उसे यकीन नहीं आ रहा था कि जिस निखिल की पढ़ाई का कर्ज वह अभी तक उतार रहा है, जिस निखिल ने रैचेल से उस का परिचय यह कह कर करा दिया था कि अगर मेरे यह भैया नहीं होते तो मैं कभी डाक्टर नहीं बन सकता था, वह उस की शक्ल देखना नहीं चाहता.

फिर शोभा को चुप देख कर नितिन ने अपना सवाल दोहराया, ‘‘मगर निखिल मुझ से मिलना क्यों नहीं चाहता?’’

‘‘क्योंकि रैचेल की मौत के लिए वह आप को जिम्मेदार मानता है.’’

‘‘यह क्या कह रही है तू?’’ नितिन चीखा, ‘‘तुझे मालूम भी है कि रैचेल की

मौत कैसे हुई थी? मगर तुझे मालूम भी कैसे होगा, तू तो तब जरमनी में थी. सुनाऊं तुझे पूरी कहानी?’’

‘‘जी, भैया.’’

नितिन बेचैनी से कमरे में टहलने लगा, जैसे तय कर रहा हो कि कहां से शुरू करे, क्या और कितना बताए? फिर बताना शुरू किया, ‘‘उन दिनों अपनी कोठी में मैं अकेला ही रह गया था. पढ़ाई खत्म होते ही निखिल को शहर से दूर एक अस्पताल में रैजीडैंट डाक्टर की नौकरी मिल गई अत: उसे वहीं रहना पड़ा. एक दिन अचानक निखिल ने मुझे फोन किया कि मैं शाम को जल्दी घर आ जाऊं, वह मुझे किसी से मिलवाना चाहता है. उस दिन बहुत उमस थी, इसलिए मैं ने छत पर कुरसियां लगवा दीं. कुछ देर बाद निखिल रैचेल के साथ आया. उस ने बताया कि वह और रैचेल हाई स्कूल से एकदूसरे से प्यार करते हैं, अब डाक्टर बनने के बाद दोनों चाहते हैं कि अगर मेरी इजाजत हो तो वे शादी कर लें.

‘‘न जाने क्यों मुझे रैचेल बहुत ही प्यारी और अपनी सी लगी. ऐसा लगा जैसे मैं उसे बहुत दिनों से जानता हूं. उस के आते ही उस उमस भरी शाम में अचानक किसी बरसात की सुहानी शाम की सी खुशगवार नमी तैरने लगी थी. मैं ने कहा कि मैं तो खुशी से उन की शादी के लिए तैयार हूं, लेकिन क्या रैचेल का परिवार इस विजातीय शादी के लिए इजाजत देगा? तब रैचेल बोली कि उस की मां कहती हैं कि अगर निखिल का परिवार एक विधर्मी बहू को सहर्ष स्वीकार लेता है तो उन्हें भी कोई एतराज नहीं होगा.

‘‘मैं ने उसे आश्वासन दिया कि सब से छोटा होने के कारण निखिल सब का लाड़ला है और उस की खुशी पूरे परिवार की खुशी होगी. रही विधर्मी होने की बात तो अभी तक तो अपने परिवार में कोई विजातीय शादी नहीं हुई है, मगर मैं भी शीघ्र ही एक विधर्मी और अकेली महिला से शादी करने वाला हूं, बस निखिल के सैटल होने का इंतजार कर रहा था. निखिल यह सुन कर बहुत खुश हुआ. उस के पूछने पर मैं ने बताया कि वह महिला एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के चेयरमैन की सेके्रटरी है, औफिस के काम के सिलसिले में उस से मुलाकात हुई थी. विधवा है या परित्यक्ता, यह मैं ने कभी नहीं पूछा, क्योंकि उस ने शुरू में ही बता दिया था कि उसे खुद के बारे में बात करना कतई पसंद नहीं है और न ही निजी जिंदगी को दोस्ती से जोड़ना. दोस्ती को भी वह सीमित समय ही दे सकती है, क्योंकि नौकरी के अलावा उस की अपनी निजी जिम्मेदारियां भी हैं. मैं ने उसे बताया कि जिम्मेदारियां तो मेरी भी कम नहीं हैं, समय और पैसे दोनों का ही अभाव है और किसी स्थाई रिश्ते यानी शादीब्याह के बारे में तो फिलहाल सोच भी नहीं सकता.

‘‘निखिल और रैचेल के कुरेदने पर मैं ने बताया कि यह सुन कर वह और ज्यादा आश्वस्त हो गई और उस ने मेरी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया. फुरसत के गिनेचुने क्षण हम दोनों इकट्ठे गुजारने लगे, जिस से हमारी एक ही ढर्रे पर चलती वीरान जिंदगी में बहार आ गई.

‘‘खुद के बारे में कभी न सोचने वालों को भी अपने लिए जीने की वजह मिल गई थी. दूसरों के साथसाथ अब हम अपने लिए भी सोचने लगे थे. अकसर सोचते थे कि जब हमारी सारी जिम्मेदारियां खत्म हो जाएंगी, तब हम दोनों इकट्ठे सिर्फ एकदूसरे के लिए जीएंगे. सपने देखा करते थे कि क्याक्या करेंगे, कहांकहां जाएंगे.’’

‘‘निखिल यह सुन कर भावविह्वल हो गया और बोला कि भैया, कितने जुल्म किए आप ने खुद पर हमारे लिए, जब तक किसी से प्यार न हो, शायद अकेले रहना आसान हो, लेकिन किसी को चाहने के बाद उस से दूर रहना बहुत मुश्किल होता है.

‘‘मैं ने मजाक में पूछा कि उस की क्या मजबूरी थी, वह क्यों रैचेल से दूर रह रहा था? तब निखिल बोला कि एक तो शादी से पहले आत्मनिर्भर होना चाहता था, दूसरे रैचेल की भी कुछ मजबूरियां थीं. लेकिन अब जब मैं डाक्टर बन गया हूं और अलग भी रहने लगा हूं, तो आप अपनी शादी क्यों टाल रहे हैं?

‘‘तुम्हारी होने वाली भाभी का कहना है कि वह अभी कुछ दिन और शादी नहीं कर सकती. इस पर वह बोला कि यानी फिलहाल आप के ब्रह्मचर्य के खत्म होने के आसार नहीं हैं.

‘‘मैं ठहाका लगा कर हंस पड़ा कि ब्रह्मचर्य तो तुम्हारे यहां से जाते ही खत्म हो गया था निखिल. अकेला रहता हूं, इसलिए न तो कोई रोकटोक है और न ही समय की पाबंदी. जब भी उसे मौका मिलता है या उस का दिल करता है वह आ जाती है, फिर पूरे घर में हम दोनों स्वच्छंद विहार करते हैं.

‘‘रैचेल और निखिल को हैरान होते देख कर मैं चुप हो गया. फिर कुछ सोच कर बोला कि तुम दोनों तो डाक्टर हो, जीवविज्ञान के ज्ञाता, तुम क्यों जीवन के शाश्वत सत्य और परमसुख के बारे में सुन कर शरमा रहे हो? जल्दी से शादी करो और जीवन का अलौकिक आनंद लो. तुम दोनों को तो खैर सब कुछ मालूम ही होगा, मैं बालब्रह्मचारी तो उस से सट कर बैठने में ही खुश था, लेकिन उस की तो पहले शादी हो चुकी है न इसलिए उस ने मुझे बताया कि इस से आगे भी बहुत कुछ है. अभी भी कहती रहती है कि यह तो कुछ भी नहीं है, अपने रिश्ते पर समाज और कानून की मुहर लग जाने दो, फिर पता चलेगा कि चरमसुख क्या होता है.

‘‘तभी मेरे मोबाइल की घंटी बजी, उसी का फोन था यह बताने को कि वह आ रही है कुछ देर के लिए. मैं ने निखिल को उत्साह से बताया कि संयोग से वह आ रही है अत: वे लोग उस से मिल कर ही जाएं और फिर शरारत से कहा कि लेकिन मिलते ही चले जाना. हमारे सीमित समय के रंग में भंग करने रुके मत रहना.

‘‘निखिल ने कहा कि वे भी जल्दी में हैं, क्योंकि उन्हें रैचेल की मां के पास भी जाना है यह बताने कि आप ने इजाजत दे दी है और अब उन की इजाजत ले कर जल्दी से जल्दी शादी करना चाहते हैं.

‘‘मैं ने कहा कि तुम्हारी भाभी से पूछते हैं. अगर वह मान जाती हैं तो दोनों भाई एकसाथ ही शादी कर लेंगे. निखिल को बात बहुत पसंद आई और उस ने कहा कि मैं भी आज ही यह बात पूछ लेता हूं ताकि वह भी रैचेल की मां से उसी तारीख के आसपास शादी तय करने को कह सकें.

‘‘तभी नीचे से गाड़ी के हार्न की आवाज आई तो मैं ने उत्साह से कहा कि लो तुम्हारी भाभी आ गईं. रैचेल लपक कर मुंडेर के पास जा कर नीचे देखने लगी और फिर पलक झपकते ही वह मुंडेर पर चढ़ कर नीचे कूद गई.

‘‘जब मैं और निखिल नीचे पहुंचे तो सिल्विया रैचेल के क्षतविक्षत शव को संभाल रही थी. उस ने मुझ से एक चादर लाने को कहा. जब मैं चादर ले कर आया तो वह निखिल से बात कर रही थी. उस ने मुझे बताया कि वह निखिल के साथ रैचेल को उस के घर ले जा रही है. मैं ने कहा कि मैं भी साथ चलूंगा, मगर वे दोनों बोले कि मैं वहीं रुक कर पानी से खून साफ कर दूं ताकि किसी को कुछ पता न चले और पुलिस केस न बने. फिर वे दोनों तुरंत चले गए. मैं ने खून को अच्छी तरह साफ कर दिया.

‘‘उस रात सिल्वी ने अपना मोबाइल बंद रखा. अपने घर का फोन नंबर और पता तो उस ने मुझे कभी दिया ही नहीं था. निखिल का मोबाइल भी बंद था.

‘‘अगले दिन वह औफिस नहीं आई और निखिल भी अस्पताल नहीं गया. उस हादसे के बाद दोनों की मनोस्थिति काम पर जाने लायक नहीं होगी और क्या मालूम रात को कब घर आए हों और अभी सो रहे हों, यह सोच कर मैं ने उस दिन दोनों से ही संपर्क नहीं किया.

अगले दिन भी दोनों के मोबाइल बंद थे. शाम को मैं निखिल के अस्पताल में गया तो पता चला कि वह उसी सुबह अचानक नौकरी छोड़ने के एवज में 1 महीने का वेतन दे कर जाने कहां चला गया है.

‘‘मुझे निखिल के इस अनापेक्षित व्यवहार से धक्का तो लगा, लेकिन इस से पहले कि मैं उस की शिकायत दूसरे भाईबहनों से करता, कुदरत ने मुझे एक और जबरदस्त झटका दिया. घर लौटने पर मुझे कुरिअर द्वारा सिल्विया का पत्र मिला, जिस में उस ने लिखा था कि जब तक मुझे यह पत्र मिलेगा तब तक वह इस दुनिया से जा चुकी होगी और मेरे लिए उसे भूलना ही बेहतर होगा.

‘‘मैं ने उसे भूलने के बजाय और सब को भूल कर उस के साथ गुजारे लमहों की यादों के सहारे जीना बेहतर समझा. मैं भी लंबी छुट्टी ले कर हिमालय की घाटियों में चला गया. लेकिन उम्र भर कोल्हू के बैल की तरह काम करने वाला आदमी ज्यादा दिनों तक खाली नहीं रह सकता था. फिर चाहे कितनी ही सादगी से क्यों न रहो पैसा तो चाहिए ही और मेरे पास कोई जमापूंजी भी नहीं थी.

फिर अभी भविष्य निधि से लिया कर्ज भी चुकाना था.

‘‘अत: मैं फिर काम पर लौट आया. काम के अलावा और किसी भी चीज में अब मेरी दिलचस्पी नहीं रही थी. लेकिन खून के रिश्ते टूटते नहीं. तुझे निक्की की शादी के काम के लिए परेशान देख कर मैं उस की शादी की तैयारी करवाने के चक्कर में फिर से दुनियादारी में लौट आया. यह सोच कर कि जब और सब आ रहे हैं तो निखिल क्यों न आए, तुझे उसे बुलाने को कहा. अब तू ही बता, रैचेल की मृत्यु के लिए मैं जिम्मेदार क्यों और कैसे?’’

‘‘आप ने शायद सिल्विया के साथ अपने अंतरंग संबंधों का खुलासा कुछ ज्यादा खुल कर कर दिया था भैया,’’ शोभा धीरे से बोली.

नितिन चिढ़ गया, फिर बोला, ‘‘हो सकता है, लेकिन उस का रैचेल के छत से कूदने से क्या ताल्लुक?’’

‘‘क्षोभ, शर्म भैया, क्योंकि सिल्विया उस की मां थी.’’क्षोभ: शादी के नाम पर क्यों हुआ नितिन का दिल तार-तार. Hindi Family Story :

Hindi Family Story : ग्रहण – आखिर प्रिया का क्या था राज ?

Hindi Family Story : कल से मेरे पैर धरती पर नहीं पढ़ रहे थे. रात को मारे उत्तेजना के नींद नहीं आई थी. इस पल की कितनी प्रतीक्षा थी मुझे. रात जब खाने के बाद रितिक मेरे कमरे में आया तो मुझे लगा शायद उसे कुछ चाहिए. मेरे पूछने पर उस ने अपनी दोनों बांहें मेरे गले में डाल दीं, “नहीं मां, मुझे कुछ बताना था आप को.”

शर्म से गुलाबी हो आए उस के गोरे मुखड़े को देख कर मेरे चेहरे पर प्यार भरी मुसकान तैर गई.

“तो तुझे मेरी बहू मिल गई?”
“अगर आप उसे स्वीकार करेंगी तो…”

“तुम जानते हो, तुम्हारी खुशी से बढ़ कर मेरे लिए और कुछ भी नहीं. कौन है वह, जिस ने मेरे बेटे के दिल की घंटी बजाई है?” बेटे के गाल पर प्यार की चपत लगाते हुए मैं ने पूछा.

“मां, प्रिया नाम है उस का. मेरे साथ एमबीए किया है उस ने. हम ढाई साल से एकदूसरे को जानते हैं और पसंद करते हैं. उस को भी अपने शहर में अच्छी नौकरी मिल गई है.”

“कब मिलवाओगे?” मेरा सीधा प्रश्न था.

“मां, कल सुबह नाश्ते पर बुला लेता हूं.”

“बुला नहीं लेता हूं. जा कर ले आना उसे. अब जा सो जाओ.”

पूरी रात मैं करवटें बदलती रही. सुबह 4 बजे ही मैं ने बिस्तर छोड़ दिया और रसोई में घुस गई. मन करता यह भी बना लूं, वह भी बना लूं. सुबह 7 बजे तक मेरी रसोई तरहतरह के पकवानों से महकने लगी.

“मां, क्याक्या बना लिया आप ने? पूरा घर महक रहा है. आप क्या रात भर बनाती रही हैं?” आश्चर्य और प्यार दोनों रितिक के स्वर में था.

“मेरी बहू पहली बार आ रही है. यह दिन एक बार ही आता है. तुम चाय पीयो मैं नहा कर आती हूं.”

रितिक के जाने के बाद मैं ने गुलाबी रंग की साड़ी पहनी. मोती की माला और कानों में टौप्स पहन कर शीशे के सामने खड़ी हो गई और अपने कटे हुए बालों में ब्रश करने लगी.

आज कितने सालों बाद श्रृंगार करने का मन हुआ था मेरा.

“मां…मां…” ऋतिक की आवाज सुन कर मैं चौंक गई.

“मां, प्रिया आ गई.” ऋतिक मेरे सामने खड़ा था.

“अरे, दरवाजा किस ने खोला?”
“खुला था मां, शायद आप बंद करना भूल गई थीं.”

“हां यही हुआ होगा…”

बैठक में घुसते ही प्रिया से मेरी नजरें मिलीं तो हम दोनों ही जड़ हो गए. मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. लगा जैसे पूरा कमरा घूमने लगा है. खुद को संभालना मुश्किल हो गया. रितिक ने सहारा दे कर मुझे बैठाया.

“मां… क्या हुआ आप को?”

मैं चेतना शून्य होती जा रही थी. बंद होती आंखों से देखा, रितिक और प्रिया दोनों मेरे ऊपर झुके हुए थे और मुझे पुकार रहे थे. मुझे उन की आवाजें दूर से आती प्रतीत हो रही थीं.

जब होश आया तो देखा मैं अपने पलंग पर लेटी हुई थी. रितिक और प्रिया के साथ साथ डा. रजत भी मेरे कमरे में बैठे हुए थे.

“मां, क्या हुआ आप को?” परेशान रितिक की आंखें डबडबाई हुई थीं. मेरा हाथ उस के हाथों में था.

“बेटा, मैं ठीक हूं.”

“डाक्टर रागिनी, आप दोस्त को तो डाक्टर मानती ही नहीं हैं. मैं ने कितनी दफा आप से कहा कि थोड़ा अपनी सेहत का भी ध्यान रखिए, मगर…” डाक्टर रजत फिर से उठ कर डाक्टर रागनी का ब्लड प्रैशर नापने लगे.

“मम्मी की तबीयत खराब चल रही थी? पर अंकल, मम्मी ने तो कुछ भी नहीं बताया कभी. क्या हुआ है उन्हें?” रितिक परेशान हो उठा.

“कुछ नहीं बेटा, तुम्हारे रजत अंकल ऐसे ही बोलते रहते हैं,” मैं ने बेटे का हाथ स्नेह से दबाते हुए कहा.

“कोई यों ही बेहोश नहीं हो जाता मम्मी. अंकल आप बताइए न ?”

रितिक बहुत परेशान था और इस परेशानी में प्रिया को भी भूल गया था, जो पास ही चुपचाप बैठी हुई थी और मुश्किल से अपने आंसुओं को संभाले थी.

“परेशान होने वाली भी बात नहीं है रितिक. तुम्हारी मम्मी को थोड़ा आराम करने की जरूरत है. बहुत थका देती हैं खुद को. वैसे पूरा चैकअप करा लेना हमेशा अच्छा होता है. मैं ने कुछ टेस्ट लिख दिए हैं. करा लेना. इतना ब्लड प्रैशर बढ़ना ठीक बात नहीं है,” रितिक की पीठ थपथपा कर रजत बोले.

“जी अंकल.”

“अच्छा अब सब कंट्रोल में है. मां को आराम करने दो. परेशान मत हो. मैं चलता हूं. वैसे अब जरूरत नहीं पड़ेगी पर मैं एक फोन काल की ही दूरी पर हूं,” उठते हुए डाक्टर रजत बोले.

“अरे, अंकल चाय….”

“मम्मी को ठीक होने दो, फिर साथ में पीते हैं.”

“प्रिया, मम्मी का ध्यान रखना. मैं अंकल को छोड़ कर आता हूं,” कहते हुए रितिक कमरे के बाहर चला गया.

“सौरी आंटी, मुझे बिलकुल नहीं पता था कि रितिक आप का बेटा है.”

उस की आंखें अब बरसने लगी थीं.

“प्रिया, मेरे पास आओ.”

मैं ने उस का हाथ अपने हाथ में ले लिया, “आंटी नहीं प्रिया, मां बोलो.”

वह फफकफफक कर रोने लगी और अपना सिर मेरे सीने पर रख दिया. स्नेह से मैं उस के सिर पर हाथ फेरने लगी. अतीत मुझ पर हावी होता जा रहा था…

लगभग 12 वर्ष पूर्व का वह दिन मेरी आंखों के सामने जीवंत हो उठा. मैं क्लीनिक में मरीज देख रही थी. एक दंपत्ति अपनी 13-14 साल की बेटी के साथ क्लीनिक पर आए. बच्ची दर्द में थी और एक ही बात बोले जा रही थी, “मुझे इंजैक्शन लगा दीजिए. मुझे मार दीजिए. मुझे नहीं जीना है.”

रोते हुए उस के पिता ने बताया कि वे लोग एक रिश्तेदार के घर गृहप्रवेश में गए थे. बेटी का 10वीं का बोर्ड था तो वह अपने शिक्षक की प्रतीक्षा में घर पर ही रुक गई थी. हम जब शाम को लौटे तो बेटी इस हाल में मिली. वह शिक्षक दरिंदा निकला.

वे हाथ जोड़ कर बोले, “हम पुलिस के पास नहीं जाना चाहते डाक्टर. उस का तो कुछ नहीं होगा पर हमारी लड़की बदनाम हो जाएगी. हम इस की परीक्षा के बाद यह शहर ही छोड़ देंगे. हमारी मदद कर कीजिए.”

मैं उन की पीड़ा को समझ सकती थी. मेरे जेठ की बेटी इस हादसे से गुजरी थी. जेठजी स्वयं पुलिस में थे. पर क्या लाभ हुआ पुलिस, कोर्टकचहरी, इन सब का तनाव और समाज की हिकारत भरी नजर, वह बेचारी नहीं झेल पाई और साल पूरा होतेहोते पंखे से लटक कर मर गई.

मैं बच्ची के इलाज के साथसाथ उस की काउंसलिंग भी करने लगी. वह जब घबराती अपनी मम्मी के साथ मेरे पास आ जाती. फिर धीरेधीरे अकेले आने लगी. दूसरे शहर जा कर भी वह फोन से संपर्क में रही.

एक दिन मैं ने उस से कहा,”देखो बेटा तुम 12वीं में आ गई हो और अब पूरी तरह से ठीक हो गई हो. तुम्हारे लिए जरूरी है कि तुम इस घटना को भूल जाओ. इस के लिए तुम्हें मुझे भी भूलना होगा.”

“आप को? आप को कैसे भूल सकती हूं मैं? मेरी मां ने मुझे जन्म दिया है, पर यह नई जिंदगी आप की दी हुई है,” वह कांपती हुई आवाज में बोली.

“मां कह रही हो तो मां की बात मानो. सबकुछ भूल कर एक नई जिंदगी जियो. जब शादी करोगी तो मुझे जरूर बताना, मैं आऊंगी.”

“शादी? मैं… मैं… मुझ से कौन शादी करेगा?”

“क्यों तुम ने कौन सा पाप किया है?यह पाप पुण्य का पाठ हम औरतों को जबरन सिखाया गया है ताकि हम कभी भी आजादी सेे न जी सकें. तुुुम शादी करोगी और एक आम जिंदगी  जीओगी. बस इस दुर्घटना का जिक्र किसी से कभी नहीं करना. मैं ने अपनी मैडिकल फाइल में भी तुम्हारा असली नाम नहीं लिखा है. उस में तुम छाया हो. तुम अपने असली नाम के साथ आराम से जियो.”

मगर 8 साल के लंबे अंतराल के बाद आज अचानक वही छाया, प्रिया के रूप में मेरे सामने थी.

बेटे की आवाज से मैं वापस वर्तमान में लौट आई.

“मां, इसे क्या हुआ?”

“डर गई है,” प्रिया के सिर पर हाथ फेरते हुए मैं ने जवाब दिया.

“इसी की वजह से तो आप इतना थकीं,” प्रिया की ओर देखते हुए रितिक बोला.

“प्रिया सिर उठा कर अपलक रितिक को देख रही थी.

“अब तुम्हारी सजा य. है प्रिया कि अब तुम मां के लिए चाय बना कर लाओ और जो बचे उस में से थोड़ी सी मुझे भी दे देना.”

कमरे का वातावरण थोड़ा हलका हो गया. तकिए की टेक के सहारे दोनों ने मुझे बैठा दिया.

चाय पीते हुए मैं ने प्रिया की ओर देखा और बोली,”प्रिया, चाय तो तुम ने अच्छी बनाई है. चलो रसोई में तुम पास हो गई. पर अभी तुम्हारी परीक्षा बाकी है. मेरी बहू बनने के लिए तुम्हें एक परीक्षा और पास करनी होगी.”

प्रिया और रितिक दोनों एकदूसरे की ओर देखने लगे.

हिचकता हुआ रितिक बोला,”मां, तुम्हें कोई ऐतराज है क्या?”

“नहीं… बिलकुल नहीं. मगर तुम अपने कमरे में जाओ, मुझे अकेले में  प्रिया से कुछ बात करनी है. उसके बाद तुम्हें बुला लेंगे.”

“जी…” रितिक प्रिया की ओर देखता हुआ बाहर चला गया.

प्रिया अब सीधे मेरी ओर देख रही थी.

“प्रिया, मुझे तुम से एक वादा चाहिए.”

“मां, मुझ जैसी ग्रहण लगी लड़की को जानतेसमझते हुए आप क्यों स्वीकार कर रही हैं? आप मना भी तो कर सकती हैं…”

“क्यों मना करूंगी, तुम्हारी जैसी कोमल हृदय वाली बेटी, मेरी बहू बने यही तो हमेशा चाहा है मैंने. तुम्हारे साथ से ही मेरे बेटे की खुशियां हैं. यह खुशी मैं उसे देना चाहती हूं. बस एक वादा चाहिए तुम से…”

“कौन सा वादा माँ?”

“कभी, किसी भी कमजोर पल में उस हादसे का जिक्र रितिक से नहीं करोगी.”

“इतनी बड़ी बात छिपाना क्या उचित होगा?”

“प्रिया, जिंदगी में बहुत से हादसे होते हैं. क्या हम हमेशा उन का बोझा पीठ पर ढोते रहते हैं? वे घट कर अतीत हो जाते हैं. यही होना भी चाहिए.”

वह मौन मुझे देख रही थी.

“प्रिया, मेरा बेटा बहुत सुलझा हुआ है फिर भी मैं नहीं चाहती कि किसी अनचाहे अतीत का काला साया मेरे बेटेबहू के जीवन को परेशान करे.”

“आप की भावना समझ सकती हूं. मां, मैं आप से वादा करती हूं कि इस बात का जिक्र मेरी जबान पर कभी नहीं आएगा.”

“प्रिया, अपनी मम्मीपापा से कहना कि जब वे आएंगे तो हम पहली बार मिल रहे होंगे. यह याद रखें.”

“मां, आप बहुत महान हैं,” भावुकता में प्रिया मेरे गले लग गई.

प्यार से उस की पीठ थपथपा कर मैं ने कहा,”अब रितिक को बुला लो.”

प्रिया के साथ रितिक कमरे में आया तो उस के चेहरे पर कई प्रश्न साफ दिखाई दे रहे थे.

“तेरी प्रिया, मेरी परीक्षा में पास हो गई. यह चांद सी सुंदर लड़की मुझे बहू के रूप में स्वीकार है.”

“चांद में तो दाग होता है मां. ग्रहण लगता है,” रितिक ने प्रिया को छेड़ते हुए कहा.

“चांद उस ग्रहण के साथ ही तो पूर्ण होता है बेटा. वैसे ही हम सब भी अनेक अच्छाई और बुराई के पुतले हैं और हमें एकदूसरे को संपूर्णता में स्वीकारना होता है. प्रिया हम दोनों को हमारी कमियों के साथ स्वीकारेगी और हम दोनों को भी प्रिया को उस की सारी अच्छाइयों और बुराईयों के साथ उसे स्वीकारना होगा.”

” मैं तो मां….”

“मैं जानती हूं. तुम उसे छेड़ रहे हो. अच्छा अब तुम दोनों रसोई से कुछ ला कर खिलाओ तो मुझे, भूख लग रही है.”

उठते हुए प्रिया बोली,”मैं लाती हूं मां.”

“और हां प्रिया, अपने मम्मीपापा से बोलना मुझ से जल्दी आ कर मिलें और उन्हें यह भी बता देना कि मुझे शादी की जल्दी है.”

रितिक और प्रिया के चेहरे खिल उठे और दोनों मुसकराते हुए कमरे से बाहर चले गए. Hindi Family Story :

Hindi Family Story : सच होते सपने – गोपुली को किस बात पर गुस्सा आया ?

Hindi Family Story :

‘‘ऐ बहू…’’ सास फिर से बड़बड़ाने लगी, ‘‘कमाने का कुछ हुनर सीख. इस खानदान में ऐसा ही चला आ रहा है.’’

‘‘वाह रे खानदान…’’ गोपुली फट पड़ी, ‘‘औरत कमाए और मर्द उस की कमाई पर गुलछर्रे उड़ाए. लानत है, ऐसे खानदान पर.’’

उस गांव में दक्षिण दिशा में कुछ कारीगर परिवार सालों से रह रहे थे. न जाने कितनी ही पीढि़यों से वे लोग ठाकुरों की चाकरी करते आ रहे थे. तरक्की के नाम पर उन्हें कुछ भी तो नहीं मिला था. आज भी वे दूसरों पर निर्भर थे.

पनराम का परिवार नाचमुजरे से अपना गुजरा करता आ रहा था. उस की दादी, मां, बीवी सभी तो नाचमुजरे से ही परिवार पालते रहे थे. शादीब्याह के मौकों पर उन्हें दूरदूर से बुलावा आया करता था. औरतें महफिलों में नाचमुजरे करतीं और मर्द नशे में डूबे रहते.

कभी गोपुली की सहेली ने कहा था, ‘गोपा, वहां तो जाते ही तुझे ठुमके लगाने होंगे. पैरों में घुंघरू बांधने होंगे.’

गोपुली ने मुंह बना कर जवाब दिया था, ‘‘नाचे मेरी जूती, मैं ऐसे खोटे काम कभी नहीं करूंगी.’’

लेकिन उस दिन गोपुली की उम्मीदों पर पानी फिर गया, जब उस के पति हयात ने कहा, ‘‘2 दिन बाद हमें अमधार की बरात में जाना है. वहां के ठाकुर खुद ही न्योता देने आए थे.’’

‘‘नहीं…’’ गोपुली ने साफसाफ लहजे में मना कर दिया, ‘‘मैं नाचमुजरा नहीं करूंगी.’’

‘‘क्या…’’ हयात के हाथों से मानो तोते उड़ गए.

‘‘कान खोल कर सुन लो…’’ जैसे गोपुली शेरनी ही बन बैठी थी, ‘‘अपने मांबाप से कह दो कि गोपुली महफिल में नहीं नाचेगी.’’

‘‘फिर हमारे पेट कैसे भरेंगे बहू?’’ सामने ही हुक्का गुड़गुड़ा रहे ससुर पनराम ने उस की ओर देखते हुए सवाल दाग दिया.

‘‘यह तुम सोचो…’’ उस का वही मुंहफट जवाब था, ‘‘यह सोचना मर्दों का काम हुआ करता है.’’

गोपुली के रवैए से परिवार को गहरा धक्का लगा. आंगन के कोने में बैठा हुआ पनराम हुक्का गुड़गुड़ा रहा था. गोपुली की सास बीमार थी. आंगन की दीवार पर बैठा हुआ हयात भांग की पत्तियों को हथेली पर रगड़ रहा था.

‘‘फिर क्या कहती हो?’’ हयात ने वहीं से पूछा.

‘‘देखो…’’ गोपुली अपनी बात दोहराने लगी, ‘‘मैं मेहनतमजदूरी कर के तुम लोगों का पेट पाल लूंगी, पर पैरों में घुंघरू नहीं बांधूंगी.’’

कानों में घुंघरू शब्द पड़ते ही सास हरकत में आ गई. उसे लगा कि बहू का दिमाग ठिकाने लग गया है. वह खाट से उठ कर पुराना संदूक खोलने लगी. उस में नाचमुजरे का सामान रखा हुआ था.

सास ने संदूक से वे घुंघरू निकाल लिए, जिन के साथ उस के खानदान का इतिहास जुड़ा हुआ था. उन पर हाथ फेरते हुए वह आंगन में चली आई. उस ने पूछा, ‘‘हां बहू, तू पैरों में पायल बांधेगी या घुंघरू?’’

‘‘कुछ भी नहीं,’’ गोपुली चिल्ला कर बोली.

हयात सुल्फे की तैयारी कर चुका था. उस ने जोर का सुट्टा लगाया. चिलम का सारा तंबाकू एकसाथ ही भभक उठा. 2-3 कश खींच कर उस ने चिलम पनराम को थमा दी, ‘‘लो बापू, तुम भी अपनी परेशानी दूर करो.’’

पनराम ने भी जोर से सुट्टा लगाया.

बापबेटे दोनों ही नशे में धुत्त हो गए. सास बोली, ‘‘ये दोनों तो ऐसे ही रहेंगे.’’

‘‘हां…’’ गोपुली ने भी कहा, ‘‘ये काम करने वाले आदमी नहीं हैं.’’

सामने से अमधार के ठाकुर कर्ण सिंह आते हुए दिखाई दिए.

सास ने परेशान हो कर कहा, ‘‘ठाकुर साहब आ रहे हैं. उन से क्या कहें?’’

‘‘जैसे आ रहे हैं, वैसे ही वापस चले जाएंगे,’’ गोपुली ने जवाब दिया.

‘‘लेकिन… उन के बयाने का क्या होगा?’’

‘‘जिस को दिया है, वह लौटादेगा,’’ गोपुली बोली.

ठाकुर कर्ण सिंह आए, तो उन्होंने छूटते ही कहा, ‘‘देखो पनराम, तुम लोग समय पर पहुंच जाना बरात में.’’

‘‘नहीं…’’ गोपुली ने बीच में ही कहा, ‘‘हम लोग नहीं आएंगे.’’

गोपुली की बात सुन कर ठाकुर साहब को अपने कानों पर यकीन ही नहीं हो रहा था. उन्होंने पनराम से पूछा. ‘‘क्यों रे पनिया, मैं क्या सुन रहा हूं?’’

‘‘मालिक, न जाने कहां से यह मनहूस औरत हमारे परिवार में आ गई है,’’ पनराम ठाकुर के लिए दरी बिछाते हुए बोला.

ठाकुर दरी पर बैठ गए. वे गोपुली की नापजोख करने लगे. गोपुली को उन का इस तरह देखना अच्छा नहीं लगा.

वह क्यारियों में जा कर गुड़ाईनिराई करने लगी और सोचने लगी कि अगर उस के पास भी कुछ खेत होते, तो कितना अच्छा होता.

अमधार के ठाकुर बैरंग ही लौट गए. गोपुली सारे गांव में मशहूर होने लगी. जितने मुंह उतनी ही बातें.

सास ने पूछा, ‘‘क्यों री, नाचेगी नहीं, तो खाएगी क्या?’’

‘‘मेरे पास 2 हाथ हैं…’’ गोपुली अपने हाथों को देख कर बोली, ‘‘इन्हीं से कमाऊंगीखाऊंगी और तुम सब का पेट भी भरूंगी.’’

तीसरे दिन उस गांव में पटवारी आया. वह गोपुली के मायके का था, इसलिए वह गोपुली से भी मिलने चला आया.

गोपुली ने उस से पूछा, ‘‘क्यों बिशन दा, हमें सरकार की ओर से जमीन नहीं मिल सकती क्या?’’

‘‘उस पर तो हाड़तोड़ मेहनत करनी होती है,’’ पटवारी के कुछ कहने से पहले ही हयात ने कहा.

‘‘तो हराम की कब तक खाते रहोगे?’’ गोपुली पति हयात की ओर आंखें तरेर कर बोली, ‘‘निखट्टू रहने की आदत जो पड़ चुकी है.’’

‘‘जमीन क्यों नहीं मिल सकती…’’ पटवारी ने कहा, ‘‘तुम लोग मुझे अर्जी लिख कर तो दो.’’

‘‘फिलहाल तो मुझे यहींकहीं मजदूरी दिलवा दो,’’ गोपुली ने कहा.

‘‘सड़क पर काम कर लेगी?’’ पटवारी ने पूछा.

‘‘हांहां, कर लूंगी,’’ गोपुली को एक नई राह दिखाई देने लगी.

‘‘ठीक है…’’ पटवारी बिशन उठ खड़ा हुआ, ‘‘कल सुबह तुम सड़क पर चली जाना. वहां गोपाल से बात कर लेना. वह तुम्हें रख लेगा. मैं उस से बात कर लूंगा.’’

सुबह बिस्तर से उठते ही गोपुली ने 2 बासी टिक्कड़ खाए और काम के लिए सड़क की ओर चल दी. वह उसी दिन से मजदूरी करने लगी. छुट्टी के बाद गोपाल ने उसे 40 रुपए थमा दिए.

गोपुली ने दुकान से आटा, नमक, चीनी, चायपत्ती खरीदी और अपने घर पहुंच गई. चूल्हा जला कर वह रात के लिए रोटियां बनाने लगी.

सास ने कहा, ‘‘ऐ बहू, तू तो बहुत ही समझदार निकली री.’’

‘‘क्या करें…’’ गोपुली बोली, ‘‘परिवार में किसी न किसी को तो समझदार होना ही पड़ता है.’’

गोपुली सासससुर के लिए रोटियां परोसने लगी. उन्हें खिलाने के बाद वह खुद भी पति के साथ रोटियां खाने लगी.

हयात ने पानी का घूंट पी कर पूछा, ‘‘तुझे यह सब कैसे सूझा?’’

गोपुली ने उसे उलाहना दे दिया, ‘‘तुम लोग तो घर में चूडि़यां पहने हुए होते हो न. तुम ने तो कभी तिनका तक नहीं तोड़ा.’’

इस पर हयात ने गरदन झुका ली.

गोपुली को लगने लगा कि उस निठल्ले परिवार की बागडोर उसे ही संभालनी पड़ेगी. वह मन लगा कर सड़क पर मजदूरी करने लगी.

एक दिन उस ने गोपाल से पूछा, ‘‘मैं उन्हें भी काम दिलवाना चाहती हूं.’’

‘‘हांहां…’’ गोपाल ने कहा, ‘‘काम मिल जाएगा.’’

गोपुली जब घर पहुंची, तो हयात कोने में बैठा हुआ चिलम की तैयारी कर रहा था. गोपुली ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘ये गंदी आदतें छोड़ दो. कल से मेरे साथ तुम भी सड़क पर काम किया करो. मैं ने गोपाल से बात कर ली है.’’

‘‘मैं मजदूरी करूंगा?’’ हयात ने घबरा कर पूछा.

‘‘तो औरत की कमाई ही खाते रहोगे,’’ गोपुली ने ताना मारा.

‘‘नहीं, ऐसी बात तो नहीं है,’’ हयात सिर खुजलाते हुए बोला, ‘‘तुम कहती हो, तो तुम्हारे साथ मैं भी कर लूंगा.’’

दूसरे दिन से हयात भी सड़क पर मजदूरी करने लगा. अब उन्हें दोगुनी मजदूरी मिलने लगी. गोपुली को सासससुर का खाली रहना भी अखरने लगा.

एक दिन गोपुली ने ससुर से पूछा, ‘‘क्या आप रस्सियां बंट लेंगे?’’

‘‘आज तक तो नहीं बंटीं,’’ पनराम ने कहा, ‘‘पर, तुम कहती हो तो…’’

‘‘खाली बैठने से तो यही ठीक रहेगा…’’ गोपुली बोली, ‘‘दुकानों में उन की अच्छी कीमत मिल जाया करती है.’’

‘‘बहू, मुझे भी कुछ करने को कह न,’’ सास ने कहा.

‘‘आप लंबी घास से झाड़ू बना लिया करें,’’ गोपुली बोली.

अब उस परिवार में सभी कमाऊ हो गए थे. एक दिन गोपुली सभापति के घर जा पहुंची और उन से कहने लगी, ‘‘ताऊजी, हमें भी जमीन दिलवाइए न.’’

तभी उधर ग्राम सेवक चले आए. सभापति ने कहा, ‘‘अरे हां, मैं तो तेरे ससुर से कब से कहता आ रहा हूं कि खेती के लिए जमीन ले ले, पर वह तो बिलकुल निखट्टू है.’’

‘‘आप हमारी मदद कीजिए न,’’ गोपुली ने ग्राम सेवक से कहा.

ग्राम सेवक ने एक फार्म निकाल कर गोपुली को दे दिया और बोले, ‘‘इस पर अपने दस्तखत कर दो.’’

‘‘नहीं,’’ गोपुली बोली, ‘‘इस पर मेरे ससुर के दस्तखत होंगे. अभी तो हमारे सिर पर उन्हीं की छाया है.’’

‘‘ठीक है…’’ सभापति ने कहा, ‘‘उन्हीं से करा लो.’’

गोपुली खुशीखुशी उस फार्म को ले कर घर पहुंची और अपने ससुर से बोली, ‘‘आप इस पर दस्तखत कर दें.’’

‘‘यह क्या है?’’ ससुर ने पूछा.

गोपुली ने उन्हें सबकुछ बतला दिया.

पनराम ने गहरी सांस खींच कर कहा, ‘‘अब तू ही हम लोगों की जिंदगी सुधारेगी.’’

उस दिन आंगन में सास लकड़ी के उसी संदूक को खोले बैठी थी, जिस में नाचमुजरे का सामान रखा हुआ था. गोपुली को देख उस ने पूछा, ‘‘हां तो बहू, इन घुंघरुओं को फेंक दूं?’’

‘‘नहीं…’’ गोपुली ने मना करते हुए कहा, ‘‘ये पड़े रहेंगे, तो गुलामी के दिनों की याद दिलाते रहेंगे.’’

गोपुली ने उस परिवार की काया ही बदल दी. उस के साहस पर गांव वाले दांतों तले उंगली दबाने लगे. घर के आगे जो भांग की क्यारियां थीं, वहां उस ने प्याजलहसुन लगा दिया था.

सासससुर भी अपने काम में लगे रहते. पति के साथ गोपुली सड़क पर मजदूरी करती रहती.

गोपुली की शादी को 3 साल हो चुके थे, लेकिन अभी तक उस के पैर भारी नहीं हुए थे. सास जबतब उस की जांचपरख करती रहती. एक दिन उस ने पूछा, ‘‘बहू, है कुछ?’’

‘‘नहीं…’’ गोपुली मुसकरा दी, ‘‘अभी तो हमारे खानेखेलने के दिन हैं. अभी क्या जल्दी है?’’

सास चुप हो गई.

हयात और पनराम ने भांग छोड़ दी. अब वे दोनों बीडि़यां ही पी लेते थे.

एक दिन गोपुली ने पति से कहा, ‘‘अब बीड़ी पीना छोड़ दो. यह आदमी को सुखा कर रख देती है.’’

‘‘ठीक?है,’’ हयात ने कहा, ‘‘मैं कोशिश करूंगा.’’

आदमी अगर कोशिश करे, तो क्या नहीं कर सकता. गोपुली की कोशिशें रंग लाने लगीं. अब उसे उस दिन का इंतजार था, जब उसे खेती के लिए जमीन मिलेगी.

उस दिन सभापति ने हयात को अपने पास बुलवा लिया. उन्होंने उसे एक कागज थमा कर कहा, ‘‘ले रे, सरकार ने तुम को खेती के लिए जमीन दी है.’’

‘‘किधर दी है ताऊजी?’’ हयात ने पूछा.

‘‘मोहन के आगे सुंगरखाल में,’’ सभापति ने बताया.

हयात ने घर जा कर जमीन का कागज गोपुली को दे दिया, ‘‘गोपुली, सरकार ने हमें खेती के लिए जमीन दे दी है.’’

गोपुली ने वह कागज ससुर को थमा दिया, ‘‘मालिक तो आप ही हैं न.’’

पनराम ने उस सरकारी कागज को सिरमाथे लगाया और कहा, ‘‘तुम जैसी बहू सभी को मिले.’’

Hindi Family Story :

Hindi Family Story : तेरा जाना – आखिर क्यों संजना ने लिया ऐसा फैसला ?

Hindi Family Story : दोमंजिले मकान के ऊपरी माले में अपनी पैरालाइज्ड मां के साथ अकेला बैठा अनिल खुद को बहुत ही असहाय महसूस कर रहा था. मां सो रही थी. कमरा बिखरा पड़ा था. उसे अपनी तबीयत भी ठीक नहीं लग रही थी. सुबह के 11 बज चुके थे. पेट में अन्न का एक भी दाना नहीं गया था. ऐसे में उठ कर नाश्ता बनाना आसान नहीं था. वैसे पिछले कई दिनों से नाश्ते के नाम पर वह ब्रेड बटर और दूध ले रहा था.

किसी तरह फ्रेश हो कर वह किचन में घुसा. दूध और ब्रेड खत्म हो चुके थे. घर में कोई ऐसा था नहीं जिसे भेज कर दूध मंगाया जा सके. खुद ही घिसटता हुआ किराने की शॉप तक पहुंचा. दूध, मैगी और ब्रेड के पैकेट खरीद कर घर आ गया.

अपनी पत्नी संजना के जाने के बाद वह यही सब खा कर जिंदगी बसर कर रहा था. घर आ कर जल्दी से उस ने दूध उबालने को रखा और ब्रेड सेकने लगा.

तभी मां ने आवाज लगाई,” बेटा जल्दी आ. मुझे टॉयलेट लगी है.”

अनिल ने ब्रैड वाली गैस बंद की और दूध वाली गैस थोड़ी हल्की कर के मां के कमरे की तरफ भागा. तब तक मां सब कुछ बिस्तर पर ही कर चुकी थीं. उन से कुछ भी रोका नहीं जाता. वह मां पर चीख पड़ा,” क्या मां, मैं 2 सेकंड में दौड़ता हुआ आ गया पर तुम ने बिस्तर खराब कर दिया. अब यह सब बैठ कर मुझे ही धोना पड़ेगा. कामवाली भी तो नहीं आ रही न.”

मां सकपका गईं. दुखी नजरों से उसे देखती हुई बोलीं,” माफ कर देना बेटा. पता नहीं कैसी हालत हो गई है मेरी. कितनी तकलीफ देती हूं तुझे. मैं मर क्यों नहीं जाती” कहते हुए वह रोने लगी थीं.

“ऐसा मत कह मां.”अनिल ने मां का हाथ पकड़ लिया.” पिताजी पहले ही हमें छोड़ कर जा चुके. भाई दूसरे शहर चला गया. संजना किसी और के साथ भाग गई. अब मेरा है ही कौन तेरे सिवा. तू भी चली जाएगी तो पूरी तरह अकेला हो जाऊंगा.”

अनिल की भी आंखें भर आई थीं. उसे संजना की याद तड़पाने लगी थी. संजना थी तो सब कुछ कितनी सहजता से संभाले रखती थी. मां की तबियत तब भी खराब थी मगर संजना इस तरह मां की सेवा करती थी कि तकलीफों के बावजूद वे हंसती रहती थीं. उस समय छोटा भाई और पिताजी भी थे. मगर घर के काम पलक झपकते निबट जाते थे.

अनिल की आंखों के आगे संजना का मुस्कुराता हुआ चेहरा आ गया जब वह ब्याह कर घर आई थी. नईनवेली बहू इधर से उधर फुदकती फिरती थी. मगर अनिल उस की मासूमियत को बेवकूफी का नाम देता था. वक्तबेवक्त उसे झिड़कता रहता था. वह घर से एक भी कदम बाहर रख देती थी तो घर सिर पर उठा लेता था. उस की सहेलियों तक से उसे मिलने नहीं देता था. समय के साथ चपल हिरनी सी संजना   पिंजरे में कैद बुलबुल जैसी गमगीन हो गई. हंसी के बजाय उस की आंखों में पीड़ा झांकने लगी थी. फिर भी कोई शिकायत किए बिना वह पूरे दिन घर के कामों में लगी रहती.

आज अनिल को याद आ रहा था वह दिन जब संजना की मौजूदगी में एक बार उसे बुखार आ गया था. उस वक्त उन की शादी को ज्यादा दिन नहीं हुए थे. तब संजना पूरे दिन  उस के हाथपैरों की मालिश करती रही थी. अनिल कभी संजना से सिर दबाने को कहता, कभी कुछ खाने को मंगाता तो कभी पत्रिकाओं में से कहानियां पढ़ कर सुनाने को कहता  हर समय संजना को अपनी सेवा में लगाए रखता.

एक दिन उस के मन की थाह लेने के लिए अनिल ने पूछा था,” मेरी बीमारी में तुम मुझ से परेशान तो नहीं हो गई? ज्यादा काम तो नहीं करा रहा हूं मैं ?”

संजना ने कुछ कहा नहीं केवल मुस्कुरा भर दिया तो अनिल ने उसे तुलसीदास का दोहा सुनाते हुए कहा था,” धीरज, धर्म, मित्र अरु नारी…. आपद काल परखिए चारी…. जानती हो इस का मतलब क्या है?”

नहीं तो. आप बताइए क्या मतलब है?” संजना ने गोलगोल आंखें नचाते हुए पूछा तो अनिल ने समझाया,” इस का मतलब है खराब समय में ही धीरज, धर्म, मित्र और औरत की परीक्षा होती है. बुरे समय में पत्नी आप का साथ देती है या नहीं यह देखना जरूरी है. इसी से पत्नी की परीक्षा होती है.”

संजना के बारे में सोचतेसोचते काफी समय तक अनिल यों ही बैठा रहा. तभी उसे याद आया कि उस ने गैस पर दूध चढ़ा रखा है. वह दौड़ता हुआ किचन में घुसा तो देखा आधा से ज्यादा दूर जमीन पर बह गया है और बाकी जल चुका है. भगोना भी काला हो गया है. अनिल सिर पकड़ कर बैठ गया. किचन की सफाई का काम बढ़ गया था. दूध भी फिर से लाना होगा. उधर मां के बिस्तर की सफाई भी करनी थी.

सब काम निबटातेनिबटाते दोपहर के 2 बज गए. दूध के साथ ब्रेड खाते हुए अनिल को फिर से पुराने दिन याद आने लगे. संजना को उस के लिए पिताजी ने पसंद किया था. वह खूबसूरत, पढ़ीलिखी और सुशील लड़की थी. जबकि अनिल कपड़ों का थोक विक्रेता था.

घर में रुपएपैसों की कमी नहीं थी. फिर भी संजना जॉब करना चाहती थी. वह इस बहाने खुली हवा में सांस लेना चाहती थी. मगर अनिल ने उस की यह गुजारिश सिरे से नकार दी थी. अनिल को डर लगने लगा था कि कमला यदि बाहर जाएगी या अपनी सहेलियों से मिलेगी तो वे उसे भड़काएंगी. यही सोच कर उस ने संजना को जॉब करने या सहेलियों से मिलने पर पाबंदी लगा दी.

एक दिन वह दुकान से जल्दी घर लौट आया. उस ने देखा कि कपड़े प्रेस करतेकरते संजना अपनी किसी सहेली से बातें कर रही है. अनिल दबे पांव कमरे में दाखिल हुआ और बिस्तर पर बैठ कर चुपके से संजना की बातें सुनने लगा. वह अपनी सहेली से कह रही थी,” मीना सच कहूं तो कभीकभी दिल करता है इन को छोड़ कर कहीं दूर चली जाऊं. कभीकभी बहुत परेशान करते हैं. मगर उस वक्त सुनयना दीदी का ख्याल आ जाता है. वह इतनी सुंदर हैं पर विधवा होने की वजह से उन की कहीं शादी नहीं हो पाई. कितनी बेबस और अकेली रह गई हैं. एक औरत के लिए दूसरी शादी कर पाना आसान नहीं होता. कभी मन गवाह नहीं देता तो कभी समाज. एक बात बताऊं मीना…” संजना की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि अनिल चीख पड़ा,” संजना फोन रखो. मैं कहता हूं फोन रखो.” डर कर संजना ने फोन रख दिया.

अनिल ने खींच कर एक झापड़ उसे रसीद किया. संजना बिस्तर पर बैठ कर सुबकने लगी. अनिल ने उस के कानों में तुलसीदास का दोहा बुदबुदाया,” ढोल, गंवार, शुद्र, पशु, नारी …. ये सब ताड़न के अधिकारी….”

संजना ने सवालिया नजरों से अनिल की ओर देखा तो अनिल फिर चीखा,”जानती है इस दोहे का मतलब क्या है? नहीं जानती न. इस का मतलब है कि औरतों को अक्ल सिखाने के लिए उन्हें पीटना जरूरी होता है. वे ताड़न की अधिकारी होती हैं और मैं तेरी जैसी औरतों को पीटना अच्छी तरह जानता हूं. पति की बुराई मोहल्ले भर में करती चलती हो. सहेलियों के आगे बुराइयों का पोथा खोल रखा है. छोड़ कर जाएगी मुझे? क्या कमी रखी है मैं ने? जाहिल औरत बता क्या कमी रखी है?” कहते हुए अनिल ने गर्म प्रेस उस की हथेली पर रख दी.

संजना जोर से चीख उठी. बगल के कमरे से पिताजी दौड़े आए.” बस कर अनिल क्या कर रहा है तू ? चल तेरी मां दवा मांग रही है.”

पिताजी अनिल को खींचते हुए ले गए. फिर संजना देर तक नल के नीचे बहते पानी में हाथ रखी रोती रही. उस दिन संजना के अंदर कुछ टूट गया था. यह चोट फिर कभी ठीक नहीं हुई. उस दिन के बाद संजना ने अपनी सहेलियों से भी बातें करना छोड़ दिया. हंसनाखिलखिलाना सब कुछ छूट गया. वह अनिल के सारे काम करती मगर बिना एक शब्द मुंह से निकाले. रात में जब अनिल उसे अपनी तरफ खींचता तो उसे महसूस होता जैसे बहुत सारे बिच्छूओं ने एक साथ डंक मार दिया हो. पर वह बेबस थी. उसे कोई रास्ता नहीं आ रहा था कि वह क्या करे.

इस तरह जिंदगी के करीब 3 साल बीत गए. उन्हें कोई बच्चा नहीं हुआ था. संजना वैसे भी बच्चे के पक्ष में नहीं थी. उसे लगता था कि इतने घुटन भरे माहौल में वह अपने बच्चे को कौन सी खुशी दे पाएगी?

एक दिन वह शाम के समय सब्जी लाने बाजार गई थी. वहीं उस की मुलाकात अपने सहपाठी नीरज से हुई. वह अपने भाई निलय के साथ के सब्जी और फल खरीदने आया था. संजना को देखते ही नीरज ने उसे पुकारा,” कैसी हो संजना पहचाना मुझे?”

नीरज को देख कर संजना का चेहरा खिल उठा,”अरे कैसे नहीं पहचानूंगी. तुम तो कॉलेज के जान थे.”

“पर तुम्हें पहचानना कठिन हो रहा है. कितनी मुरझा गई हो.सब ठीक तो है?” चिंता भरे स्वर में नीरज ने पूछा तो संजना ने सब सच बता दिया.

ढांढस बंधाते हुए नीरज ने संजना का परिचय अपने भाई से कराया,” यह मेरा भाई है. यहीं पास में ही रहता है. बीवी से तलाक हो चुका है. बीवी बहुत रुखे स्वभाव की थी जबकि यह बहुत कोमल हृदय का है. मैं तो जयपुर में रहता हूं मगर तुम्हें जब भी कोई समस्या आए तो मेरे भाई से बात कर सकती हो. यह तुम्हारा पूरा ख्याल रखेगा.”

इस छोटी सी मुलाकात में निलय ने अपना नंबर देते हुए हर मुश्किल घड़ी में साथ  निभाने का वादा किया था.

संजना को जैसे एक आसरा मिल गया था. वैसे भी निलय उसे जिन निगाहों से देख रहा था वे निगाहें घर आने के बाद भी उस का पीछा करती रही थीं. अजीब सी कशिश थी उस की निगाहों में. संजना चाह कर भी निलय को भूल नहीं पा रही थी.

करीब चारपांच दिन बीत गए. हमेशा की तरह संजना अपने घर के कामों में व्यस्त थी कि तभी निलय का फोन आया. उस का नंबर संजना ने सुधा नाम से सेव किया था. संजना ने दौड़ कर फोन उठाया.  निलय की आवाज में एक सुरुर था. वैसे उस ने संजना का हालचाल पूछने के लिए फोन किया था मगर उस के बात करने का अंदाज ऐसा था कि संजना दोतीन दिनों तक फिर से निलय के ख्यालों में गुम रही.

इस बार उसी ने निलय को फोन किया. दोनों देर तक बातें करते रहे. हालचाल से बढ़ कर अब जिंदगी के दूसरे पहलुओं पर भी बातें होने लगीं थीं. अब हर रोज दोपहर करीब 2- 3 बजे दोनों बातें करने लगे. दोनों ने अपनीअपनी फीलिंग्स शेयर की और फिर एक दिन एकदूसरे के साथ कहीं दूर भाग जाने की योजना भी बना डाली. संजना के लिए यह फैसला लेना कठिन नहीं हुआ था. वह ऐसे भी अनिल से आजिज आ चुकी थी. अनिल ने जिस तरह से उसे मारापीटा और गुलाम बना कर रखा था वह उस के जैसी स्वाभिमानी स्त्री के लिए असहनीय था.

एक दिन अनिल के नाम एक चिट्ठी छोड़ कर संजना निलय के साथ भाग गई. वह कहां गई इस की खबर उस ने अनिल को नहीं दी मगर क्यों गई और किस के साथ गई इन सब बातों की जानकारी खत के माध्यम से अनिल को दे दी. साथ ही उस ने खत में स्पष्ट रूप से लिख दिया था कि वह अनिल को तलाक नहीं देगी और उस के साथ रहेगी भी नहीं.

अनिल के पास हाथ मलने और पछताने के सिवा कोई रास्ता नहीं था. इस बात को डेढ़ साल बीत चुके थे. अनिल की जिंदगी की गाड़ी पटरी से उतर चुकी थी. मन में बेचैनी का असर दुकान पर भी पड़ा. उस का व्यवसाय ठप पड़ने लगा. अनिल के पिता की मौत हो गई और घर के हालात देखते हुए अनिल के भाई ने लव मैरिज की और दूसरे शहर में शिफ्ट हो गया.

अब अनिल अकेला अपनी बीमार मां के साथ जिंदगी की रेतीली धरती पर अपने कर्मों का हिसाब देने को विवश था. Hindi Family Story :

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