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वह इंसान से बन गया कुत्ता

घटना हैरान करने वाली है. आखिर कोई आदमी कुत्ता कैसे बन सकता है और भला किसी का इंसान से कुत्ता बनने का सपना कैसे हो सकता है? लेकिन ऐसा हुआ है.

एक शख्स कुत्ता बन गया और उस की पूरी हरकतें भी बदल गईं. दरअसल जापान के एक शख्स ने 18 लाख रुपए खर्च कर खुद को कुत्ते में बदल लिया है, जिसे देख लोग हैरानी जता रहे हैं. आदमी से कुत्ता बने शख्स का कहना है कि यह उस का सपना था, इसलिए उस ने इतने रुपए बिना किसी परवा के खर्च कर दिए.

यह दुनिया अजीबोगरीब लोगों से भरी पड़ी है. कोई भी शख्स हो, आजकल हर कोई कुछ नया करने के चक्कर में किसी भी हद तक जाने को तैयार है, फिर चाहे उस के लिए उसे कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े.

जापान में कुत्ते में तबदील हुआ शख्स का नाम टोको बताया जा रहा है. इस के लिए टोको ने 22 हजार डौलर यानी करीब 18 लाख रुपए खर्च किए हैं. अब कुत्ते की तरह दिखने वाले शख्स को देख लोग हैरानी जता रहे हैं.

जेपपेट नाम की कंपनी ने की मदद

जेपपेट नाम की एक कंपनी ने इस जापानी शख्स को कुत्ते के रूप को बनाने में मदद की है. कंपनी को ऐसा करने में करीब 40 दिन लगे. इस शख्स ने कोल्ली ब्रीड के कुत्ते का रूप लिया है, जिस को ले कर कंपनी के प्रवक्ता ने कहा है कि इस शख्स को कोल्ली कुत्ते की तर्ज पर बनाया गया है.

यह 4 पैरों पर चलने वाले असली कुत्ते जैसा दिखता है. कोल्ली एक मध्यम आकार का कुत्ता है. नर का वजन लगभग 30 से 45 पाउंड होता है और कंधों तक लगभग 20 इंच लंबा होता है. मादाएं थोड़ी छोटी होती हैं. इस शख्स को देख कर कहीं से भी ऐसा नहीं लगता कि उस ने कौस्ट्यूम पहना है क्योंकि उसे हूबहू कुत्ते जैसा ही बनाया गया है.

पहली बार टोको कुत्ता बन कर सड़क पर टहलने निकला तो लोग हैरानी में पड़ गए. पहले तो किसी को कुछ सम?ा नहीं आया लेकिन जब पता चला तो लोग हैरान रह गए.

टोको का यह सपना था

आदमी से कुत्ता बने इस जापानी शख्स ने बताया है कि यह उस की जिंदगी का सपना था. इस शख्स ने अपने यूट्यूब चैनल पर ‘आई वांट टू बी एन एनिमल’ नाम से एक वीडियो अपलोड किया. इस चैनल के करीब 31,000 सब्सक्राइबर हैं और वीडियो को 1 मिलियन से अधिक बार देखा जा चुका है.

वीडियो में टोको को गले में पट्टा डाल कर सैर के लिए ले जाते हुए देखा जा सकता है. मानव कुत्ता पार्क में अन्य कुत्तों को सूंघते हुए और जानवरों की तरह फर्श पर लोटते हुए देखा गया.

पहली बार बताया सपना

इस से पहले टोको ने मीडिया को बातचीत में बताया कि यह उस के बचपन का शौक था, लेकिन वह नहीं चाहता था कि इस शौक के बारे में उस के आसपास के लोगों को पता चले. अगर लोगों को पता चलता तो उन्हें लगता कि यह अजीब है कि कुत्ता बनना चाहता है. इसी कारण से वह अब अपना असली चेहरा नहीं दिखा सकता.

सर्दी आते ही मेरे बाल फ्रिजी होने शुरू हो गए हैं, बताएं मैं क्या करूं ?

सवाल

मेरी उम्र 22 साल की है. वैसे तो मेरे बाल सिल्की हैं लेकिन जैसेजैसे सर्दी का मौसम नजदीक आ रहा है, मेरे बाल फ्रिजी होने शुरू हो गए हैं. कंडीशनर लगाती हूं, फिर भी फ्रिजीनैस दूर नहीं होती. आप ही बताएं कि क्या करूं?

जवाब

आजकल के मौसम में गीले बालों के साथ बाहर न जाएं. न ही गीले बालों के साथ सोएं. ऐसा करने से बाल डैमेज हो जाते हैं. माइक्रो फाइबर टौवेल सूती तौलिए की तुलना में अधिक पानी सोखती है. ऐसे में आप बालों को धोने के बाद उन को माइक्रोफाइबर की मदद से सुखा सकते हैं.

आप तकिए का कवर सिल्क या साटन का इस्तेमाल कर सकती हैं. इस से बाल टूटेंगे नहीं. बालों पर हेयर सीरम या मौइश्चराइजर हेयर औयल लगाएं. इस से बाल हाइड्रेटेड रहेंगे, उन्हें फ्रिजी बालों से लड़ने की शक्ति मिलेगी.

बालों को कंडीशन करने से बालों के क्यूटिकल्स स्मूद होते हैं, नई फील होती है और सोते समय बाल फ्रिजी होने से बचते हैं. ऐसे में आप हेयर मसाज, प्री या पोस्ट कंडीशनिंग आदि को हेयर केयर में शामिल करें.

मगर आप उलझे या फ्रिजी बालों में शैंपू करेंगी तो बाल टूटेंगे, झड़ेंगे. इसलिए धोने से पहले हमेशा बालों को अच्छी तरह से कौम्ब कर लेना चाहिए.

अपने खाने में अधिक से अधिक आयरन, मिनरल्स, ओमेगा 3 फैटी एसिड आदि का सेवन करें और एंटीऔक्सीडैंट से भरपूर चीजों का सेवन करें.

घर के सामान से भी होते हैं लंग्स खराब

गैसचैंबर के अप्रिय खिताब से नवाजी जाने लगी देश की राजधानी दिल्ली में प्रदूषण का खतरनाक स्तर को पार कर जाना अब आएदिन की बात हो गई है जिस पर कुछ दिनों के लिए होहल्ला मचता है. तरहतरह की एडवाइजरी जारी होती हैं, फिर बात कुछ दिनों के लिए आईगई हो जाती है. अक्तूबर के महीने में भी फिर ऐसा ही कुछ हुआ और कई और बातें निकल कर सामने आईं लेकिन उन में से अधिकतर दिल्ली तक ही में सिमट कर रह गईं.

मसलन यह कि दिल्ली में तेजी से फेफड़ों के मरीजों की तादाद में इजाफा हो रहा है. कुछ इलाकों में तो ब्रोन्कियल अस्थमा और सीओपीडी यानी क्रौनिक औब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज जैसी घातक बीमारियां बहुत तेजी से फैल रही हैं.

ब्रोन्कियल अस्थमा में मरीज को सांस लेने में दिक्कत होने लगती है क्योंकि उसे सांस लेने में ज्यादा जोर लगाना पड़ता है. इस बीमारी में सांस लेने में घरघराहट और सीने में भी तकलीफ होने लगती है. सीओपीडी में भी कमोबेश यही लक्षण दिखाई देते हैं जिस में मरीज औक्सीजन खींच तो लेता है लेकिन कार्बन डाइऔक्साइड आसानी से बाहर नहीं छोड़ पाता जिस से उस का दम घुटने लगता है. कई बार तो इस से मौत तक हो जाती है.

नैशनल इंस्टिट्यूट फौर इंप्लीमेंटेशन रिसर्च औन नौन कम्युनिकेबल डिजीज, जोधपुर और आईआईटी, दिल्ली सहित कोई 6 एजेंसियों ने इन बीमारियों पर रिसर्च की तो पता यह भी चला कि घर की हवा की गुणवत्ता भी लंग्स की बीमारियों की जिम्मेदार है. घरों में धूल की मौजूदगी, खाना बनाने में इस्तेमाल होने वाला ईंधन और धुआं, सामान पर जमा होता ठोस और जैविक वेस्ट का डिस्पोजल और कीड़ेमकोड़े भी फेफड़ों के खराब होने में अहम रोल निभाते हैं.

बाहरी प्रदूषण को नियंत्रित करने की सरकारी और गैरसरकारी कोशिशें कब और कितनी कामयाब होंगी, यह कोई नहीं कह सकता, हां, बाहरी प्रदूषण से बचने के लिए मास्क लगाने जैसी कुछ सावधानियां जरूर रखी जा सकती हैं पर घर के अंदर के सामान से फेफड़े कब और कैसे खराब होने लगते हैं, इस बारे में आम लोगों को ज्यादा जानकारी नहीं होती हैं क्योंकि हल्ला बाहरी प्रदूषण को ले कर मचता है जबकि जरूरत घर के अंदर ध्यान देने की ज्यादा है, क्योंकि हम सभी ज्यादा वक्त वहीं बिताते हैं. जाहिर है लगातार घर के सामान के संपर्क में रहते हैं.

धूल हर कहीं है

घर का कोई कोना ऐसा नहीं होता जहां धूल न हो. फेफड़ों की तमाम बीमारियां धूल से ही ज्यादा होती हैं क्योंकि इस से वे खराब होने लगते हैं. एक आम घर में पर्याप्त साफसफाई के बाद भी धूल रह ही जाती है जो हवा के साथ आती है. सोफे, कारपेट, इलैक्ट्रौनिक्स आइटम्स  और पंखों पर धूल का डेरा बहुत आम है.

धूल सांस के जरिए फेफड़ों में पहुंचती है तो मामला गड़बड़ होने लगता है. भोपाल के वरिष्ठ पल्मोनोलौजिस्ट, गांधी मैडिकल कालेज के प्रोफैसर, निशांत श्रीवास्तव के मुताबिक, मामूली सी धूल स्ट्रोक, हार्ट अटैक सहित फेफड़ों के कैंसर की भी वजह बनती है. सो, इस से बचना जरूरी है.

यानी प्रदूषण घर के अंदर भी होता है. साफसफाई के बाद भी धूल सामान पर जमा रहती है खासतौर से परदों, कारपेट और कोनों पर. सामान जरूरी हैं, इन्हें फेंका नहीं जा सकता लेकिन धूल साफ की जा सकती है. दिल्ली की बदहाली पूरे देश के लिए सबक भी है कि सभी को सावधान घर के अंदर के उन सामान से भी रहना है जिन पर धूल जमा होती जाती है और जिन की रोज साफसफाई संभव नहीं होती. इन सामान की साप्ताहिक सफाई यानी डस्टिंग जरूरी है जिस की धमक दिल्ली में देखने में आ रही है.

दिल्लीवासियों को घर के खिड़कीदरवाजे भी ज्यादा से ज्यादा बंद रखने की सलाह दी जा रही है. साथ ही, यह भी कहा जा रहा है कि ऐसा चौबीसों घंटे नहीं करना है क्योंकि हवा भी जरूरी है. हवा में धूल सभी जगह है जिसे घरों में दाखिल होने से रोका नहीं जा सकता लेकिन डस्टिंग करने की नियमितता फेफड़ों की हिफाजत तो करती ही है.

मोल्ड भी कम खतरा नहीं

धूल की तरह मोल्ड यानी नमी भी फेफड़ों के लिए बेहद नुकसानदेह होती है जो धूल की ही तरह हर घर में होती है. यह एक तरह का कवक होता है जो काले, पीले और भूरे रंग का होता है और नमी में ज्यादा पनपता है. हरे और सफेद रंग का मोल्ड बहुत आम है जिसे फफूंद और काई भी कहा जाता है. खानेपीने के पुराने और बासी आइटमों पर यह हर कभी दिख जाता है. किचन, बाथरूम की दीवारें और खिड़कियां मोल्ड के बड़े अड्डे होते हैं. स्टोररूम, लौन और गमलों पर भी मोल्ड जल्द जमता है.

धूल की तरह मोल्ड भी सांस के साथ फेफड़ों तक पहुंचता है और कई बीमारियों की वजह बनता है. यह जब फेफड़ों में पहुंच जाता है तो जिंदगी खतरे में पड़ जाती है. अब से कोई 3 साल पहले ब्राजील के राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो ने यह खुलासा किया था कि उन के फेफड़ों में मोल्ड है जिस के चलते वे कमजोरी महसूस कर रहे हैं और ठीक होने को एंटीबायोटिक्स ले रहे हैं.

गौरतलब है कि टीबी की बीमारी भी मोल्ड से हो सकती है. समय रहते फेफड़ों में मोल्ड होने की पहचान या पुष्टि हो पाए तो इलाज संभव है. इस के शुरुआती लक्षण सांस लेने में दिक्कत खांसी, सिरदर्द, खुजली, खांसी और थकान सहित एलर्जी वगैरह जैसे होते हैं. इन से इम्यूनिटी जल्द और ज्यादा कमजोर होती है. मोल्ड से फेफड़ों का बचाव इस की जानकारी और साफसफाई से होना आसान है.

धुआं फेफड़ों का दुश्मन

यह ठीक है कि आजकल एलपीजी गैस के चलते चूल्हों का चलन खत्म हो गया है लेकिन धुआं अभी भी घरों में है, जो फेफड़ों के बड़े दुश्मनों में से एक है. सिगरेट का धुआं अब सार्वजनिक स्थानों में कम दिखता है लेकिन यह भी खत्म नहीं हुआ है. लोग स्मोकिंग जोन में जा कर खुद की और दूसरों की जिंदगी खतरे में डाल रहे हैं.

अगरबत्ती हर घर में जलती है. इस का धुआं भी फेफड़ों को नुकसान पहुंचाता है. यज्ञ-हवन में उपले इफरात से जलाए जाते हैं. दीवाली की आतिशबाजी का नजारा तो कुछ दिनों पहले हर किसी ने देखा ही है, जो अस्थमा और ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारियों का कारण है. इसी तरह गैरजरूरी होते हुए भी लोग मोमबत्ती जलाते हैं.

स्मोकिंग के नुकसान किसी सुबूत के मुहताज कभी नहीं रहे, जिन में फेफड़ों का कैंसर भी शामिल है. मोमबत्ती, उपले, अगरबत्ती और पटाखों के धुएं से भी फेफड़ों को नुकसान होता है लेकिन अल्पकालिक होने के चलते यह दिखता नहीं. इसलिए लोग इसे भी धुएं में उड़ा देते हैं.

इंडस्ट्रियल इलाकों के लोगों के फेफड़े ज्यादा कमजोर होते हैं. दरअसल धुएं से हाइड्रोजन क्लोराइड, अमोनिया, सल्फर डाइऔक्साइड जैसी नुकसानदेह गैसों के अलावा जहरीला कैमिकल एलडीहाइड फेफड़ों में पहुंचता है जो फेफड़ों में सूजन और दूसरी बीमारियों की वजह बनता है.

फेफड़ों की जिम्मेदारी पूरे शरीर में औक्सीजन सप्लाई की होती है. ऐसे में जैसी हवा उसे मिलेगी वह उसे ही सप्लाई करेगा. अब हवा में ही जहर हो तो फेफड़ों का क्या दोष. सबकुछ लोगों के नियंत्रण में न सही पर बहुत कुछ तो है, मसलन धुएं से खुद को बचाना. इस के लिए जरूरी है कि सिगरेट, मोमबत्ती, अगरबत्ती, उपलों और लकड़ी के इस्तेमाल से बचा जाए, नहीं तो कल को हर घर में एयर प्योरीफायर भी नजर आएगा और इस के बाद भी शुद्ध हवा शरीर को मिलेगी, इस की गारंटी नहीं रहेगी.

दिल्ली में इन दिनों कोई आइटम इफरात से बिक रही है तो वह एयर प्यूरिफायर, जो 6 से ले कर 60 हजार रुपए तक में मिलता है. इस से हवा शुद्ध होती है. कांग्रेस नेता शशि थरूर के तो गले में यह लटका रहता है जिस की सोशल मीडिया पर आएदिन चर्चा भी होती रहती है.

ऐसी नौबत ही क्यों आने दी जाए कि जिस से फेफड़ों को नुकसान हो. बचने को खास कुछ नहीं करना है, बस, घर के सामान की साफसफाई का ध्यान रखना है. धूल, धुएं, कवक और कैमिकल्स से बचना है, नहीं तो कल को जिंदगी दिल्ली वालों जैसी दुश्वार हो जाएगी.

सिसकता इश्क़ : भाग 2

रशिका इस प्रोजैक्ट को रिजैक्ट कर देना चाहती थी लेकिन दिल के आगे भला आज तक किसी का जोर चला है जो रशिका का चलता. वैसे भी किसी ने ठीक ही कहा है कि किसी के चाहने से क्या होता है, वही होता है जो होना होता है. रशिका खुद को संभालने में लगी हुई थी, इसलिए उस ने निश्चय किया कि वह यह प्रोजैक्ट नहीं करेगी, यही सोच कर वह इस प्रोजैक्ट को नहीं कहने के लिए जा ही रही थी कि कौरिडोर में हनीफ से टकरा गई और हनीफ ने उस से पूछ लिया- “रैडी फौर अ न्यू प्रोजैक्ट?”

रशिका हनीफ को यह नहीं कह पाई कि वह उस के साथ नहीं जाना चाहती. वह थोड़ी मुसकराती और थोड़ी सकुचाती हुई बोली- “इया, आय एम रैडी.”

15 दिनों तक हनीफ के साथ एक ही छत यानी एक होटल में रहना होगा, यह सोच कर रशिका का दिल हिचकोले खाने लगा. भीतर ही भीतर रशिका का दिल इस बात से भी डरने लगा, कहीं अपने जज्बात के आगे वह कमजोर न पड़ जाए. उस के मन में दबा हुआ प्यार सिर उठाने की गुस्ताखी न कर बैठे. लेकिन अब सिर ओखली में रख ही दिया है तो फिर मूसल से क्या डरना. जो होगा, देखा जाएगा, यह सोच कर रशिका सब के साथ बैंगलुरु आ गई.

यहां बैंगलुरु में पहले से ही होटल व सभी के लिए अलग कमरे बुक थे. इस ग्रुप में रशिका के साथ एक और लड़की उपासना भी थी, जो इस एक महीने में रशिका की शुभचिंतक बन गई थी और हर वक्त रशिका को हनीफ से सतर्क रहने व हनीफ से बच के रहने के लिए आगाह करती रहती थी. हनीफ को मिला कर 2 और लड़के भी थे राजीव और संदीप. कुल मिला कर इन का 5 लोगों का एक ग्रुप था जो इस नए प्रोजैक्ट पर काम करने वाला था, जिसे लीड हनीफ ही कर रहा था.

बैंगलुरु में पहुंचते ही और एयरपोर्ट से बाहर पांव धरते ही रशिका ने देखा, सभी के तेवर ही बदल ग‌ए. हमेशा संस्कारों, धर्म और सहीग़लत की बातें करने वाले अपने संस्कारों को भूल मौजमस्ती और अपने वास्तविक रूप में आ गए हैं, जिसे देख रशिका हैरान थी. लेकिन हनीफ में अब भी वही सादगी बरकरार थी जो हैदराबाद में रशिका ने हनीफ में देखा था. रशिका की हैरानी उस वक्त और अधिक बढ़ गई जब होटल पहुंच कर उपासना अपना रूम होते हुए भी संदीप संग रूम शेयर करने के लिए राज़ी हो गई. संस्कारों और अपनी सभ्यता की दुहाई देने वाली उपासना का यह रूप रशिका के लिए अप्रत्याशित था. लेकिन हनीफ पर इन सब बातों का कोई असर नहीं था. वह सभी से नौर्मल बिहेव ही कर रहा था. रशिका ने उपासना को संदीप संग रूम शेयर करने से रोकना चाहा लेकिन उपासना ने रशिका को यह कह कर चुप रहने को कहा कि-

“चिल यार, यह हमारा हैदराबाद नहीं बैंगलुरु है, यहां हम कुछ भी कर सकते हैं, किसी को कुछ पता नहीं चलेगा, ये 15 दिन न, हमारे हैं. हम सारा दिन प्रोजैक्ट पर काम करेंगे और रात को पार्टी.”

वैसा ही हुआ. पांचों पूरा दिन औफिस में अपने न‌ए प्रोजैक्ट पर काम करते और फिर सभी बैंगलुरु घूमने निकल जाते, केवल हनीफ को छोड़ कर. उस के बाद देररात तक उपासना, संदीप और राजीव तीनों एक ही रूम में मिल कर पार्टी करते. रशिका भी एकदो दिनों तक उन तीनों के साथ शाम को घूमने निकली लेकिन उसे उन के साथ घूमना रास नहीं आया और वह भी हनीफ की ही तरह अगले दिन से होटल में रुकने लगी. एक रोज़ रशिका को अपने रूम में बोरियत महसूस होने लगी, तो वह हनीफ के रूम में आई. उस ने हलका सा दरवाजे को हाथ लगाया और दरवाजा खुल गया. उस के बाद रशिका ने जो देखा, हैरान हो गई और दरवाजे पर ही खड़ी रही, हनीफ कोई मोटी किताब पढ़ रहा था.

हनीफ को प्यास महसूस हुई तो वह पानी पीने के लिए उठा. उस ने रशिका को दरवाजे पर खड़ा देख उसे अंदर आने को कहा. लेकिन रशिका फिर भी कुछ देर वहीं खड़ी रही. उस के मन में यह दुविधा थी कि वह इस कट्टरपंथी व्यक्ति के कमरे में जाए या फिर दरवाजे से ही लौट जाए. तभी हनीफ ने उसे फिर अंदर आने को कहा. रशिका सकुचाती हुई अंदर आई. हनीफ रशिका के मनोभाव को समझ गया, बोला-

“माना कि मैं और मेरा परिवार इसलाम धर्म को मानने वाले हैं लेकिन इस बात से मेरा परिवार या मैं बिलकुल भी इत्तफाक नहीं रखते कि हमें हिंदुओं से या हिंदू धर्म से कोई रंजिश है.”

रशिका हिचकिचाती हुई बोली-

“नहीं, तुम गलत सोच रहे हो, मैं ऐसा कुछ नहीं सोच रही थी.”

उस दिन रशिका और हनीफ के बीच काफी देर तक बातें चलती रहीं. रशिका हनीफ के मोहपाश में बंधती चली जा रही थी. अब यह रोज़ का सिलसिला हो गया था. औफिस से आने के बाद दोनों घंटों बातें किया करते. इस तरह समय पंख लगा कर उड़ गया और हैदराबाद जाने का वक्त आ गया. रशिका को ऐसा लग रहा था मानो पलक झपकते ही ये 14 दिन बीत गए. 15वें दिन सभी ने मिल कर तय किया कि आज रात हैदराबाद निकलने से पहले ग्रैंड पार्टी करेंगे. उस रात सब ने खूब एंजौय किया. उपासना, संदीप और राजीव ने कुछ ज्यादा ही पी ली थी. होटल पहुंच कर सभी अपनेअपने रूम में चले गए.

रशिका अपने रूम में पहुंच कर आईने के सामने खड़ी हो खुद को निहारने लगी. आईने में हनीफ और खुद को एक जोड़े के रूप में कल्पना कर खुद से ही शरमाने लगी. तभी डोरबेल बजी और रशिका का चेहरा यह सोच कर सूर्खगुलाबी हो गया कि शायद डोर पर हनीफ होगा क्योंकि पिछले कुछ दिनों से रशिका को यह लगने लगा था कि हनीफ के दिल में भी उस के लिए प्यार के अंकुर फूट रहे हैं.

पलकें झुकाए, मुसकराती हुई रशिका ने दरवाजा खोला तो वह हैरान रह ग‌ई. सामने नशे में धुत राजीव खड़ा था और वह रशिका के मना करने के बाबजूद कमरे में घुस आया और रशिका से बदतमीजी के साथ जबरदस्ती भी करने की कोशिश करने लगा. उसी वक्त वहां हनीफ आ गया और उस ने रशिका को राजीव से छुड़ाया. उस के बाद रशिका हनीफ से लिपट गई. यह देख राजीव ज़ोरज़ोर से चिल्लाता हुआ रशिका को भलाबुरा कहते हुए कहने लगा-

“तुम जैसी लड़कियों की वजह से ही हमारा समाज और धर्म बिगड़ रहा है और हनीफ जैसे लोग अपने मनसूबे में कामयाब हो रहे. ये लोग जिहाद को प्यार का नाम दे देते हैं और तुम जैसी आवारा लड़कियां अपने धर्म के लड़कों को छोड़ उन के क़ौम में चली जाती हो. तुम भी उन्हीं में से एक हो. मैं सब जानता हूं, तुम भी रशिका भटनागर से रशिका बानो, रशिका बेगम बनना चाहती हो. तभी तो जब से यहां आई हो, घंटों इस के कमरे में बैठी रहती हो. अभी ही देख लो खुद को कैसे लिपटी हुई हो एक तलाकशुदा आदमी के साथ.”

यह सुन हनीफ का पारा चढ़ ग‌या और वह राजीव पर हाथ उठाने ही वाला था कि रशिका ने उसे रोक दिया. उसी वक्त होटल के और भी कुछ लोग वहां आ गए. उस के बाद राजीव वहां से चला गया और हनीफ रशिका को संबल देने के बाद उस का मोबाइल उसे देते हुए बोला-

“हमारा फोन एक्सचेंज हो गया है. ये तुम्हारा फोन, मैं तुम्हें लौटाने आया था. मेरा फ़ोन शायद तुम ले आई हो.”

अपना फोन लेने के बाद रशिका ने हनीफ का फोन उसे लौटा दिया और फिर हनीफ जैसे ही जाने लगा, रशिका ने हनीफ से धीरे से कहा- “थैंक्स.”

यह सुन हनीफ दरवाजे पर रुक गया और मुसकराते हुए बोला-

“कोई भी प्रौब्लम हो, फोन कर लेना.” इतना कह कर वह वहां से चला गया.

रशिका बिस्तर पर लेटी हनीफ के बारे में सोचने लगी. सहसा उसे अपनी सहेली गजाला याद आ गई. गजाला उस की स्कूलफ्रैंड थी और दोनों कालेज में भी साथ थीं. लेकिन गजाला और रशिका की दोस्ती रशिका के परिवार वालों को हमेशा बेहद खटकती थी. उन्हें यह दोस्ती पसंद न थी.

रशिका की मां हमेशा यही कहती कि गजाला के क़ौम के लोग कभी अपने नहीं होते हैं. ये लोग हमेशा पीठपीछे वार करते हैं. रशिका के पापा भी रशिका को हमेशा बारबार, बस, यही समझाते हुए कहते कि तुम देख लेना, एक न एक दिन तेरी यह अभिन्न सहेली गजाला तुझे जरूर धोखा देगी और ऐसा ही कुछ हो गया.

इंटर कालेज डांस कंपीटिशन के दौरान रशिका फाइनल राउंड में पहुंच गई थी. फाइनल राउंड शुरू ही होने वाला था कि रशिका गजाला को ढूंढती हुई ड्रैसिंगरूम से बाहर आई तो उस ने जो देखा उसे देख उस की आंखों को विश्वास ही नहीं हुआ. गजाला के हाथों में रशिका के पानी की बोतल थी और वह राशि से बात कर रही है जो फाइनल राउंड में रशिका की प्रतिद्वंद्वी है. रशिका ने यह भी देखा कि राशि के हाथों में दवाई की एक शीशी थी. यह देख रशिका यह समझ बैठी कि गजाला राशि से मिली हुई है और दोनों मिल कर उस के पानी में दवाई मिलाने की बात कर रही हैं क्योंकि रशिका ने राशि को यह कहते हुए सुन लिया था कि इस शीशी में नशे की दवाई है.

हीरो : भाग 2

उस रात मनोज, सुनंदा और उन के दोनों बच्चे वापस अपने घर नहीं गए थे. आशी बुआ के जोर देने पर मनोज ने सुनंदा और बच्चों को 3 दिनों के लिए वहीं रहने की इजाजत दे दी.

अगले दिन शाम को आशी बुआ सुनंदा के दोनों बच्चों के साथ पास वाली मुख्य सङक पर टहलने निकलीं. उन्होंने नोट किया कि इस सङक पर पहुंचते ही जो 2 सब से बड़ी इमारतें नजर आती थीं, वे नर्सिंगहोम थे.

बाईं तरफ 50-60 मीटर दूर आलोक नर्सिंगहोम था. दाईं तरफ करीब इतनी ही दूरी पर ज्योति नर्सिंगहोम था. दोनों ही बहुत पुराने और आसपास के इलाके में खूब मशहूर थे. इन दोनों में शहरी भी आते थे और आसपास के कस्बों के लोग भी.

इन्हीं दोनों नर्सिंगहोम को आधार बना कर आशी बुआ ने कविता की आंखें खोलने व पतिपत्नी के रिश्ते का जरूरत समझाने का काम अगले दिन दोपहर में की. उस समय घर में सिर्फ कविता मौजूद थी. बुआ ने अपनी भाभी कमलेश को अपनी बचपन की सहली रंजना के घर बहाने से भेज दिया, जिस के पिता पुलिस में कांस्टेबल थे उन की ही प्रार्थना पर चाचेरे भाई की लङकी अनिता ने सुनंदा को बच्चों समेत अपने घर खाने पर बुला लिया था. उन के भैया आनंद सुबह काम पर चले ही गए थे.

अपने बेटे राहुल को उन्होंने पड़ोसी मेवालालजी के बेटे की मोटर साइकिल पर सुबह भिजवा कर सारा इंतजाम पूरा कर लिया था.

आशी बुआ का सारा नाटक दोपहर 12 बजे के आसपास शुरू हुआ. कविता ने सबकुछ कमरे की खिडक़ी पर पड़े परदे की ओट में छिप कर देखासुना था. कविता की ससुराल ज्यादा दूर नहीं 4-5 किलोमीटर पर थी. वहां से राहुल कविता की सास उर्मिला को मोटरसाइकिल पर पीछे बैठा कर सब से पहले ले आया.

राहुल ने घबराए अंदाज में उन्हें सिर्फ इतना बताया था कि मां ने आप को फौरन लिवा लाने का आदेश दे कर भेजा था. उर्मिला के कुछ पूछने से पहले ही आशी बुआ ने डरी व घबराई आवाज में उन से कहा, ‘‘बहनजी, राजेश और उस के पिताजी को मैं ने सुबह यहां बुलाया था, कविता की वापसी के बारे में बात करने के लिए, उन के खाने के लिए जो सांभरबड़ा मंगाया, वह स्वाद में अच्छा पर जहरीला निकला. वे दोनों नर्सिंगहोम में भरती हैं इस वक्त.’’

‘‘ओह…’’ उर्मिला के चेहरे का रंग फौरन उड़ गया, ‘‘क्या तबियत बहुत बिगड़ गई है? कौन से नर्सिंगहोम में भरती हैं? मुझे ले चल उन के पास बेटा.’’

‘‘आंटी, मैं ने जीजाजी को ज्योति नर्सिंगहोम में भरती कराया था. कुछ देर बाद अंकल को पड़ोस वाले मेवालाल अंकल नर्सिंगहोम ले कर चले गए थे. हम पहले कहां चलें?’’ राहुल ने मोटरसाइकिल घुमाते हुए पूछा.

‘‘पहले अपने अंकल से मिला दे, बेटा. वे बीमारी में बड़ी जल्दी घबरा कर हौसला खो देते हैं,’’ घबराहट के कारण कांप रहीं उर्मिला उचक कर पीछे बैठीं और राहुल उन्हें ले कर मुख्य सङक की तरफ चला गया.

परदे के पीछे छिपी कविता ने सब कुछ देखासुना था.

करीब 20 मिनट बाद सुनंदा रिकशे से घर पहुंची. उसे बुआ ने फोन कर के फौरन अकेले लौट आने का आदेश दिया था. बुआ ने उसे वही जानकारी दी जो उर्मिला को दी थी, पर राजेश के पिता की जगह अपने भाई आनंद का नाम लिया और राजेश की जगह उस के पति मनोज का.

सुनंदा जिस औटो से आई थी, उसी से लौट चली. मुख्य सङक पर पहुंच कर आटो दाईं तरफ मुड़ा. उधर ज्योति नर्सिंगहोम था जिस में मनोज की तरफ भरती होने की जानकारी उसे बुआ ने दी थी.

1-1 कर के मनोज, राजेश के पिता, फिर राजेश और अंत में कविता की मां कमलेश घर पहुंचे. बुआ फूड पौइजनिंग की कहानी हरएक को गेट पर खड़ा कर के सुनातीं. डर और घबराहट का अभिनय वे हर बार पहले से बेहतर कर रही थीं. आने वाले को किसी अपने करीबी में से एक व्यक्ति को पहले किसी नर्सिंगहोम में देखने जाने का फैसला बदहवासी की हालत में फौरन करना पड़ता. बुआ किसी को सोचने का बिलकुल समय नहीं दे रही थीं. मनोज को अपनी लाडली साली और पत्नी में से चुनाव करना पड़ा और वह सुनंदा को पहले देखने गया.

राजेश ने अपनी मां उर्मिला और कविता के बीच में अपनी जीवनसंगिनी को पहले देखने जाने का निर्णय लिया. दीगरवालजी अपनी पत्नी उर्मिला का हालचाल जानने को बाईं तरफ आलोक नर्सिंगहोम गए जबकि उन के बेटे राजेश के ज्योति नर्सिंगहोम में होने की जानकारी बुआ ने उन्हें दी थी.

सिर्फ कमलेश अपवाद साबित हुईं. अपने पति और बेटी के बीच में उन्होंने सुनंदा को पहले देखने जाने का फैसला किया था. अपने भाई के गुस्सैल स्वभाव को देखते हुए बुआ ने आनंद को नाटक का हिस्सा नहीं बनाया था. परदे के पीछे छिपी कविता को बुआ के नाटक की पूर्व जानकारी कतई नहीं थी. किस ने पहले किसे देखने जाने का चुनाव किया था, यह जानकारी देने के अलावा बुआ ने कविता से सारे समय नाटक को ले कर कोर्ई चर्चा नहीं करी. कमलेश की आंखों से ओझल हो जाने के बाद बुआ ने कविता को आवाज दे कर अपने पास बुला लिया.

‘‘बुआ, जब नर्सिंगहोम में कोई मरीज भरती है ही नहीं, तो कोई भी यहां वापस क्यों नहीं लौटा है?’’ सामने आते ही कविता ने उलझन भरे स्वर में बुआ से सवाल पूछा.

‘‘वे सभी छोटी सी पार्टी का आनंद अपने दोस्त के घर में ले रहे हैं,’’ बुआ रहस्यमयी अंदाज में मुसकराईं.

‘‘किस ने दी है पार्टी?’’

‘‘मैं ने.’’

‘‘भला किसलिए, बुआ.’’

‘‘पार्टी मैं ने दी है और कारण भी देरसवेर पैदा हो जाएगा,’’ बुआ अचानक हंसी, तो कविता की उलझन और बढ़ गई.

‘‘बुआ, मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है,’’ कविता ने कहा,’’ जो कुछ भी आप ने किया है, उस के द्वारा आप मुझे कुछ सीख देना चाहती हैं, मैं इतना समझ रही हूं, पर क्या है वह सीख? अब आप हंसनामुसकराना छोड़ कर मुझ से सीधीसीधी बात कहो.’’

‘‘तू पहले फटाफट घर का ताला लगा. सब लोग हमारे आनंद के यहां बेसब्री से इंतजार कर रहे होंगे. बेचारा राहुल किसी को नाटक के बारे में कुछ भी नहीं समझा पा रहा होगा.’’

केलिकुंचिका : भाग 2

छोटे से माइनिंग वाले शहर में सभी अफसर एकदूसरे को अच्छी तरह जानतेपहचानते थे. थोड़ी ही देर में डाक्टर ने अमोलिका को फोन कर कहा, ‘‘मुबारक हो, शाम को मैं आ रही हूं, मिठाई खिलाना.’’

‘‘श्योर, दरअसल हम लोगों ने जिस दिन पार्टी दी थी आप छुट्टी ले कर बाहर गई थीं.’’

‘‘वह तो ठीक है, मैं तुम्हारी मौसी बनने की खुशी में मिठाई मांग रही हूं. ठीक है, शाम को डबल मिठाई खा लूंगी.’’ डाक्टर से बात करने के बाद अमोलिका के चेहरे की हवाइयां उड़ने लगीं. उस के मन में संदेह हुआ क्योंकि दुर्गा और जतिन के अलावा घर में तीसरा और कोई नहीं था, कहीं यह बच्चा जतिन का न हो. उसे अपनी बहन पर क्रोध आ रहा था. साथ ही, उसे नफरत भी हो रही थी.

अभी तक दुर्गा और जतिन दोनों अस्पताल से घर भी नहीं लौटे थे. दोनों की समझ में नहीं आ रहा था कि आने वाले भीषण तूफान से कैसे निबटा जाए. कुछ पलों का आनंद इतनी बड़ी मुसीबत बन जाएगा, उन्होंने इस की कल्पना भी नहीं की थी. दोनों सोच रहे थे कि आज नहीं तो कल अमोलिका को यह बात तो पता चलेगी ही, तब उस के सामने कैसे मुंह दिखाएंगे.

घर पहुंच कर दुर्गा बंटी के लिए दूध बना कर ले गई. उस ने दूध की बोतल अमोलिका को दी. वह बहुत गंभीर थी. दुर्गा वापस जाने को मुड़ी ही थी कि अमोलिका ने उसे हाथ पकड़ कर रोक लिया. पहले तो वह सोच रही थी कि सारा गुस्सा अभी के अभी उतार दे, पर उस ने बात बदलते हुए पूछा, ‘‘अब तो तुम्हारा एमए भी पूरा हो गया है. अगले महीने तुम्हारा कौन्वोकेशन भी है.’’ दुर्गा बोली, ‘‘हां.’’

‘‘आगे के लिए क्या सोचा है? और तुम ने संस्कृत ही क्यों चुनी? इनफैक्ट संस्कृत की तो यहां कोई कद्र नहीं है.’’

‘‘आजकल जरमनी में लोग संस्कृत में रुचि ले रहे हैं. बीए करने के बाद मैं एक साल स्कूल में पार्टटाइम संस्कृत टीचर थी. मैं ने जरमनी की एक यूनिवर्सिटी में संस्कृत ट्यूटर के लिए आवेदन दिया था. मैं ने जरमन भाषा का भी एक शौर्टटर्म कोर्स किया है. मुझे उम्मीद है कि जरमनी से जल्दी ही बुलावा आएगा.’’

‘‘कब तक जाने की संभावना है?’’

‘‘कुछ पक्का नहीं कह सकती हूं, पर 6 महीने या सालभर लग सकता है. उन्होंने कहा है कि अभी तुरंत वैकेंसी नहीं है, होने पर सूचित करेंगे.’’

‘‘तब तक तुम्हारा ये बच्चा…’’ अमोलिका के मुंह से अचानक यह सुनना दुर्गा के लिए अनपेक्षित था. इस अप्रत्याशित प्रश्न के लिए वह तैयार नहीं थी. उसे चुप देख कर अमोलिका ने उसे डांटते हुए कहा, ‘‘तुम्हें शर्म नहीं आई दीदी के यहां आ कर यह सब गुल खिलाने में. वैसे तो मैं समझ सकती हूं तेरे पेट में किस का अंश है, फिर भी मैं तेरे मुंह से सुनना चाहती हूं.’’

दुर्गा सिर नीचे किए रो रही थी, कुछ बोल नहीं पा रही थी. अमोलिका ने ही फिर कड़क कर कहा, ‘‘यह किस का काम है? बंटी के सिर पर हाथ रख कर कसम खा तू, किस का काम है यह?’’ दुर्गा फिर चुप रही. तब अमोलिका ने ही कहा, ‘‘जतिन का ही दुष्कर्म है न यह? सच बता तुझे बंटी की कसम.’’

‘‘तुम्हारी खामोशी को मैं तुम्हारी स्वीकृति समझ रही हूं. बाकी मैं जतिन से समझ लूंगी.’’ दुर्गा वहां से चली गई. अमोलिका ने अपनी मां को फोन कर कहा, ‘‘मां, मैं कुछ दिनों के लिए वहां आ कर तुम लोगों के साथ रहना चाहती हूं.’’

जतिन के माफी मांगने और मना करने के बावजूद दूसरे दिन अमोलिका दुर्गा के साथ पीहर आ गई. उस ने मेघाताबुरू की कहानी मां को बताई. उस की मां भी बहुत क्रोधित हुईं और उन्होंने दुर्गा से कहा, ‘‘अरे, तू अपनी सगी बहन के घर में आग लगा बैठी.’’ दुर्गा के पास कोई जवाब न था. वह चुप रही. मां ने कहा, ‘‘मैं तेरी जैसी कुलटा को अपने घर में नहीं रख सकती. तू निकल जा मेरे घर से. हम लोग तुम्हारा मुंह नहीं देखना चाहते.’’

उस रात दुर्गा को नींद नहीं आ रही थी. वह रात में एक बैग ले कर दरवाजा खोल कर घर से निकलना ही चाहती थी कि अमोलिका जग उठी. उस ने कहा, ‘‘कहां जा रही हो?’’ दुर्गा बोली, ‘‘कुछ सोचा नहीं है, या तो आत्महत्या करूंगी या फिर सब से दूर कहीं चली जाऊंगी.’’

‘‘एक पाप तो तूने पहले ही किया, दूसरा पाप आत्महत्या करने का होगा.’’

‘‘तो मैं क्या करूं?’’

‘‘तू एबौर्शन करा ले, उस के बाद आगे की जिंदगी का रास्ता साफ हो जाएगा.’’

‘‘एबौर्शन कराना भी तो एक पाप ही होगा.’’

‘‘तू अभी चुपचाप घर में बैठ. कुछ दिनों में हम सब लोग मिलजुल कर बात कर कोई समाधान ढूंढ़ लेंगे.’’

दुर्गा ने महसूस किया कि उस के मातापिता दोनों ने ही उस से बोलचाल बंद कर दी है. वह तो अमोलिका की गुनाहगार थी, फिर भी दीदी कभीकभी उस से बात कर लेती थीं. उस को अंदर से ग्लानि थी कि उस की एक छोटी सी भूल की सजा दीदी और बंटी को भी मिल रही है. 2 दिनों बाद ही दुर्गा अचानक घर छोड़ कर कहीं चली गई. उस ने अपना कोई अतापता किसी को नहीं बताया.

दुर्गा अपने साथ पढ़ी एक सहेली माधुरी के यहां कोलकाता आ गई. दोनों ने 12वीं तक साथ पढ़ाई की थी. उस ने उसे अपनी कहानी बताई और कहा, ‘‘प्लीज, मेरा पता किसी को मत बताना. मुझे कुछ दिनों के लिए पनाह दे, फिर मैं कहीं दूरदराज चली जाऊंगी.’’

माधुरी अविवाहित थी और नौकरी करती थी. वह बोली, ‘‘तू कहीं नहीं जाएगी. तू जब तक चाहे यहां रह सकती है. तू तो जानती ही है कि इस दुनिया में मेरा अपना निकटसंबंधी कोई नहीं है. तू यहीं रह, तू मां बनेगी और मैं मौसी.’’

वहीं दुर्गा ने एक बालक को जन्म दिया. उस ने वहीं रह कर इग्नू से 2 साल का मास्टर इन वैदिक स्टडीज का कोर्स किया. इसी बीच, उस ने झारखंड में धनबाद के निकट काको मठ और महाराष्ट्र में नासिक के निकट वेद पाठशालाओं में वहां के संतों व गुरुजनों से भी वेद पर विशेष चर्चा कर वेद के बारे में अपना ज्ञान बढ़ाया. माधुरी ने उस से कहा, ‘‘तुम वेदों को इतना महत्त्व क्यों दे रही हो? मैं ने तो सुना है कि वेद स्त्रियों के लिए नहीं हैं.’’

दुर्गा बोली, ‘‘तू उस की छोड़, क्लासिकल भाषाओं के अच्छे जानकारों की जरूरत हमेशा रहेगी. हर युग में उन्हें नए ढंग से पढ़ा और समझा जाता है.’’ जब तक दुर्गा माधुरी के साथ रही, उस ने दुर्गा की आर्थिक सहायता भी की. कुछ पैसे दुर्गा ट्यूशन पढ़ा कर भी कमा लेती थी. इस बीच, दुर्गा का बेटा शलभ 2 साल का हो चुका था. तभी जरमनी से संस्कृत टीचर के लिए उस का बुलावा आ गया.

कोलकाता के जरमन कौन्सुलेट से दुर्गा और बेटे शलभ को वीजा भी मिल गया. वह जरमनी के हीडेलबर्ग यूनिवर्सिटी गई.

टीनऐजर्स लव : भाग 2

एकदूसरे को देखते, हंसतेमुसकराते समय निकल रहा था जैसे मुट्ठी में से रेत देखते ही देखते उंगलियों के बीच की जगह से निकल जाती है. दोनों को ही छुट्टी होने की अधीर प्रतीक्षा थी. समर तो मन ही मन योजना बना रहा था…‘12 बजे छुट्टी होगी, 1 बजे यह घर पहुंचेगी, 2 बजे तक फ्री होगी और मुझे ठीक ढाई बजे कौल करना होगा.’ उस का दिमाग तेजगति से काम कर रहा था जैसे मार्च में अकाउंटैंट का दिमाग किया करता है. आखिर ढाई बज ही गए. समर ने बिना क्षण गंवाए, मोबाइल उठाया और अस्मिता का नंबर डायल किया.

पहली बार में तो अस्मिता ने कौल काट दी. फिर मिस्डकौल की. सामान्य औपचारिक बातचीत के बाद समर गंभीर मुद्दे पर आना चाहता था. शायद अस्मिता भी यही तो चाहती थी. ‘‘क्या तुम मुझ से इसी तरह रोज बात करोगी?’’ समर ने पूछा.

‘‘किसी लड़की के भोलेपन का फायदा उठा रहे हो?’’ अस्मिता ने जान कर प्रतिप्रश्न किया. ‘‘नहींनहीं, ऐसे ही, अगर तुम्हें उचित लगे तो,’’ समर ने शराफत दिखाते हुए कहा.

रुकरुक कर दिन में 5-6 बार बातें होने लगीं. समर कभी मिस्डकौल करता तो कभी जोखिम उठाते हुए सीधा कौल कर देता. दिन बीतते गए, बातें बढ़ती गईं और उन दोनों के संबंधों में प्रगाढ़ता आती गई. हंसीमजाक, स्कूल की बातें, दोस्तोंसहेलियों के किस्से उन के विषय रहते थे. वे स्कूल में बहाना खोजते ताकि एकांत में बैठ कर प्यारभरी बातें कर सकें. रास्ते सुहाने होते गए, हलके स्पर्श में मिठास का एहसास होता.

एक दिन आया जब उन के प्रेम का जिक्र क्लास के हर स्टूडैंट की जबां पर तो था ही, टीचर्स के बीच में भी बात फैल गई और प्रधानाचार्य ने दोनों को स्टाफरूम में बुला कर ऐसी हरकतों के दुष्परिणामों से अवगत करवाया. उन दोनों ने भविष्य में इस प्रकार की गलती दोहराने की प्रतिबद्घता व्यक्त कर पीछा छुड़ा लिया. अब लगभग सब लोग उन के बीच का सबकुछ जान चुके थे. यह वह वक्त था जब अर्धवार्षिक परीक्षाएं सिर पर थीं. दोनों को ही किताब खोले महीनों हो गए थे. अस्मिता अपनी बौद्धिकता के अहं में थी और समर अपने बौद्धिक होने के वहम में.

एक रोज फोन पर समर कुछ उदास आवाज में बोला, ‘‘क्या मैं पास हो सकूंगा? मैं ने पढ़ा तो कुछ नहीं. तुम तो फिर भी होशियार हो, मेरा क्या होगा?’’ ‘‘सब ठीक होगा, क्लास में तुम से कमजोर भी बहुत हैं,’’ अस्मिता ने उसे ढांढ़स बंधाते हुए कहा.

‘‘मैं क्या करूं बताओ? तुम से बात किए बिना एक पल भी नहीं रहा जाता. हर बार मोबाइल उठा कर देखता हूं कि कहीं तुम्हारा मैसेज या कौल तो नहीं आई, अस्मिता.’’ ‘‘मेरा भी यही हाल है. सभी सखीसहेलियों, परिजनों के इतर जीवन अब सिर्फ तुम पर केंद्रित हो गया है. मेरी हर कल्पना, हर सपने का प्रधान किरदार तुम ही हो, समर. मैं इन सभी चीजों को ले कर मजाक में थी. मगर अब यह बेचैनी बताती है, छटपटाहट बताती है कि दिल पर अब मेरा बस नहीं रहा. अब मैं तुम्हारी हो गई हूं. पर क्या वह सब संभव है? मैं भी न, क्याक्या बकती जा रही हूं.’’

दिन बीतते गए, फोन पर उन की बातें चलती गईं. ‘‘कहीं मिलते हैं, कुछ घंटे साथ बिताते हैं, अब सिर्फ बातों से मन नहीं भरता, अस्मिता.’’ अब समर कभीकभी अस्मिता पर, घर से बाहर मिलने पर भी जोर डालने लगा.

एक दिन निश्चय किया कि कहीं एकांत में मिलते हैं. लेकिन कहां? यह प्रश्न था कि कहां मिला जाए. परेशानी को दूर किया अस्मिता की सहेली दीपिका ने. उसी ने रास्ता सुझाया. दीपिका ने कहा, ‘‘मैं अपनी मम्मी को अपनी बहन के साथ मूवी देखने के लिए भेज दूंगी. उन लोगों के जाते ही तुम दोनों मेरे फ्लैट में आ जाना. मैं बाहर से ताला लगा कर चली जाऊंगी. और ठीक 2 घंटे बाद आ कर ताला खोल दूंगी. अगर कोई आएगा भी तो समझेगा कि घर में कोई नहीं है. देख अस्मिता, तुझे समर के साथ समय बिताने का इस से अच्छा कोई मौका नहीं मिल सकता. तू और समर वहां खूब मस्ती करना.’’ समर को भी इस में कोई आपत्ति न थी. 2 दिन बाद मिलने का कार्यक्रम तय कर लिया गया. मौसम साफ था, हवा में संगीत था, पंछियों की कोमल आवाज मनमस्तिष्क में नव स्फूर्ति भर रही थी. नीयत स्थान और निश्चित समय. समर का पहला और आखिरी काम जो पूर्व तैयारी के साथ संपन्न होने जा रहा था वरना अब तक तो उस ने परीक्षा तक के लिए कोई तैयारी नहीं की थी.

तय दिन तय समय पर, अस्मिता समर के साथ दीपिका के फ्लैट पर पहुंची. प्लान के मुताबिक दीपिका ने अपनी मम्मी और बहन को नई मूवी देखने के लिए भेज दिया. वे दोनों फ्लैट के अंदर और बाहर ताला. लेकिन उन की ये सब गतिविधियां फ्लैट के सामने दूसरे फ्लैट में रहने वाले एक अंकल खिड़की से देख रहे थे. उन्हें शायद कुछ गड़बड़ लगा. वे अपने फ्लैट से नीचे उतर कर आए और कालोनी के 2-3 लोगों को एकत्र कर धीरे से बोले, ‘‘यह जो फ्लैट है, अरे वही सामने, बख्शीजी का फ्लैट, उस में एक लड़का और एक लड़की बंद हैं.’’

‘‘क्या मतलब?’’ दूसरे फ्लैट वाले अंकल ने पूछा. ‘‘मतलब… बख्शीजी की लड़की तो बाहर से ताला लगा गई है पर अंदर लड़कालड़की बंद हैं.’’

‘‘अरे, छोड़ो यार, हमें क्या मतलब. इस में नया क्या है? आजकल तो यह आम बात है,’’ दूसरे फ्लैट वाले अंकल टालते हुए बोले. ‘‘अमा यार, कैसी बात कर रहे हो? अपनी आंखों के सामने, यह गलत काम कैसे होने दूं्?’’

‘‘गलत?’’ ‘‘हां जी, मैं ने खुद अपनी आंखों से देखा है दोनों को फ्लैट के अंदर जाते हुए.’’

तभी पड़ोस की एक आंटी भी आ गई, ‘‘क्या हुआ भाईसाहब?’’ ‘‘अरे, सामने बख्शीजी के फ्लैट में एक लड़कालड़की बंद हैं,’’ पहले वाले अंकल बोले.

‘‘तो ताला तोड़ दो,’’ महिला ने मशवरा दिया. ‘‘नहीं, यह सही नहीं है, जिस का मकान है, उसे बुलाओ,’’ दूसरे अंकल ने सलाह दी.

शोर बढ़ता गया. लोग इकट्ठे होते चले गए. तभी कहीं से पुलिस का एक हवलदार भी पहुंच गया. लोगबाग दरवाजा पीटने लगे. ‘‘बाहर निकलो, दरवाजा खोलो…’’ बिना यह सोचेसमझे कि ताला तो बाहर से बंद है, तो दरवाजा खुलेगा कैसे? प्लान के मुताबिक, दीपिका समय पूरा होने से 10 मिनट पहले वहां पहुंच गई, लेकिन भीड़ को देख कर एक बार वह भी घबरा गई. उस ने लोगों से वहां इकट्ठे होने का प्रयोजन पूछा और गुस्से में बोली, ‘‘मेरा फ्लैट है, मैं जानूं. आप लोगों को क्या मतलब?’’

परिंदा : भाग 2

अभिन्न ने मुझे यों देखा जैसे पहली बार देख रहा हो. प्रश्न तो बहुत सरल था मगर मैं जिस सहजता से पूछ बैठी थी वह असहज थी. मुझे यह भी आभास नहीं हुआ कि यह ‘कहां’ मेरे मन में कहां से आ गया. मेरी रहीसही नींद भी गायब हो गई.

कितने पलों तक कौन शांत रहा पता नहीं. मैं तो बिलकुल किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई थी.

‘‘10 बज गए हैं,’’ ऐसा नहीं था कि घड़ी देखनी मुझे नहीं आती हो मगर कुछ कहना था इसलिए उस ने कह दिया होगा.

‘‘ह…हां…’’ मेरी शहीद हिम्मत को जैसे संजीवनी मिल गई, ‘‘आप चाहें तो इधर रुक सकते हैं, बस, एक दिन की बात तो है.’’

मैं ने जोड़तोड़ कर के अपनी बात पूरी तो कर दी मगर अभिन्न दुविधा में फंस गया.

उस की क्या इच्छा थी यह तो मुझे पता न था लेकिन उस की दुविधा मेरी विजय थी. मेरी कल्पना में उस की स्थिति उस पतंग जैसी थी जो अनंत आकाश में कुलांचें तो भर सकती थी मगर डोर मेरे हाथ में थी. पिछले 15 घंटों में यह पहला सुखद अनुभव था. मेरा मन चहचहा उठा.

‘‘फिर से खाना बनवाने का इरादा तो नहीं है?’’

उस के इस प्रश्न से तो मेरे अरमानों की दुनिया ही चरमरा गई. पता नहीं उस की काया किस मिट्टी की बनी थी, मुझे तो जैसे प्रसन्न देख ही नहीं सकता था.

‘‘अब तो आप को यहां रुकना ही पड़ेगा,’’ मैं ने अपना फैसला सुना दिया. वास्तव में मैं किसी ऐसे अवसर की तलाश में थी कि कुछ उस की भी खबर ली जा सके.

‘‘एक शर्त पर, यदि खाना आप पकाएं.’’

उस ने मुसकरा कर कहा था, सारा घर खिलखिला उठा. मैं भी.

‘‘चलिए, आज आप को अपना शहर दिखा लाऊं.’’

मेरे दिमाग से धुआं छटने लगा था इसलिए कुछ षड्यंत्र टिमटिमाने लगे थे. असल में मैं खानेपीने का तामझाम बाहर ही निबटाना चाहती थी. रसोई में जाना मेरे लिए सरहद पर जाने जैसा था. मैं ने जिस अंदाज में अपना निर्णय सुनाया था उस के बाद अभिन्न की प्रतिक्रियाएं काफी कम हो गई थीं. उस ने सहमति में सिर हिला दिया.

‘‘मैं कुछ देर में आती हूं,’’ कह कर मैं फिर से अंदर चली गई थी.

आखिरी बार खुद को आईने में निहार कर कलाई से घड़ी लपेटी तो दिल फूल कर फुटबाल बन गया. नानी, दादी की मैं परी जैसी लाडली बेटी थी. कालिज में लड़कों की आशिक निगाहों ने एहसास दिला दिया था कि बहुत बुरी नहीं दिखती हूं. मगर वास्तव में खूबसूरत हूं इस का एहसास मुझे कभीकभार ही हुआ था. गहरे बैगनी रंग के सूट में खिलती गोरी बांहें, मैच नहीं करती मम्मी की गहरी गुलाबी लिपस्टिक और नजर नहीं आती काजल की रेखाएं. बचीखुची कमी बेमौसम उमड़ आई लज्जा ने पूरी कर दी थी. एक बार तो खुद पर ही सीटी बजाने को दिल मचल गया.

घड़ी की दोनों सुइयां सीधेसीधे आलिंगन कर रही थीं.

‘‘चलें?’’ मैं ने बड़ी नजाकत से गेस्टरूम के  दरवाजे पर दस्तक दी.

‘‘बस, एक मिनट,’’ उस ने अपनी नजर एक बार दरवाजे से घुमा कर वापस कैमरे पर टिका दी.

मैं तब तक अंदर पहुंच चुकी थी. थोड़ी ऊंची सैंडल के कारण मुझे धीरेधीरे चलना पड़ रहा था.

उस ने मेरी ओर नजरें उठाईं और जैसे उस की पलकें जम गईं. कुछ पलों तक मुझे महसूस हुआ सारी सृष्टि ही मुझे निहारने को थम गई है.

‘‘चलें?’’ मैं ने हौले से उस की तंद्रा भंग की तो लगा जैसे वह नींद से जागा.

‘‘बिलकुल नहीं,’’ उस ने इतने सीधे शब्दों में कहा कि मैं उलझ कर रह गई.

‘‘क्यों? क्या हुआ?’’ मेरी सारी अदा आलोपित हो गई.

‘‘क्या हुआ? अरे मैडम, लंगूर के साथ हूर देख कर तो शहर वाले हमारा काम ही तमाम कर देंगे न,’’ उस ने भोलेपन से जवाब दिया.

ऐसा न था कि मेरी प्रशंसा करने वाला वह पहला युवक था लेकिन ऐसी विचित्र बात किसी ने नहीं कही थी. उस की बात सुन कर और लड़कियों पर क्या गुजरती पता नहीं लेकिन शरम के मारे मेरी धड़कनें हिचकोले खाने लगीं.

टैक्सी में उस ने कितनी बार मुझे देखा पता नहीं लेकिन 3-4 बार नजरें मिलीं तो वह खिड़की के बाहर परेशान शहर को देखने लगता. यों तो शांत लोग मुझे पसंद थे मगर मौन रहना खलने लगा तो बिना शीर्षक और उपसंहार के बातें शुरू कर दीं.

अगर दिल में ज्यादा कपट न हो तो हृदय के मिलन में देर नहीं लगती है. फिर हम तो हमउम्र थे और दिल में कुछ भी नहीं था. जो मन में आता झट से बोल देती.

‘‘क्या फिगर है?’’

उस की ऊटपटांग बातें मुझे अच्छी लगने लगी थीं. मैं ने शरमाते हुए कनखियों से उस की भावभंगिमाएं देखने की कोशिश की तो मेरे मन में क्रोध की सुनामी उठने लगी. वह मेरी नहीं संगमरमर की प्रतिमा की बात कर रहा था. जब तक उस की समझ में आता कि उस ने क्या गुस्ताखी की तब तक मैं उसे खींचती हुई विक्टोरिया मेमोरियल से बाहर ले आई.

‘‘मैं आप की एक तसवीर उतार लूं?’’ अभिन्न ने अपना कैमरा निकालते हुए पूछा.

‘‘नहीं,’’ जब तक मैं उस का प्रश्न समझ कर एक अच्छा सा उत्तर तैयार करती एक शब्द फुदक कर बाहर आ गया. मेरे मन में थोड़ा नखरा करने का आइडिया आया था.

‘‘कोई बात नहीं,’’ उस ने यों कंधे उचकाए जैसे इसी उत्तर के लिए तैयार बैठा हो.

मैं गुमशुम सी तांबे की मूर्ति के साथ खड़ी हो गई जहां ज्यादातर लोग फोटो खिंचवाते थे. वह खुशीखुशी कैमरे में झांकने लगा.

‘‘जरा उधर…हां, ठीक है. अब जरा मुसकराइए.’’

उस की हरकतें देख मेरे चेहरे पर वे तमाम भावनाएं आ सकती थीं सिवा हंसने के. मैं ने उसे चिढ़ाने के लिए विचित्र मुद्रा में बत्तीसी खिसोड़ दी. उस ने झट बटन दबा दिया. मेरा नखरे का सारा नशा उतर गया.

रास्ते में पड़े पत्थरों को देख कर खयाल आया कि चुपके से एक पत्थर उठा कर उस का सिर तोड़ दूं. कमाल का लड़का था, जब साथ में इतनी सुंदर लड़की हो तो थोड़ाबहुत भाव देने में उस का क्या चला जाता. मेरा मन खूंखार होने लगा.

‘‘चलिए, थोड़ा रक्तदान कर दिया जाए?’’ रक्तदान का चलताफिरता शिविर देख कर मुझे जैसे मुंहमांगी मुराद मिल गई. मैं बस, थोड़ा सा कष्ट उसे भी देना चाहती थी.

‘‘नहीं, अभी नहीं. अभी मुझे बाहर जाना है.’’

‘‘चलिए, आप न सही मगर मैं रक्तदान करना चाहती हूं,’’ मुझे उसे नीचा दिखाने का अवसर मिल गया.

‘‘आप हो आइए, मैं इधर ही इंतजार करता हूं,’’ उस ने नजरें चुराते हुए कहा.

मैं इतनी आसानी से मानने वाली नहीं थी. उसे लगभग जबरदस्ती ले कर गाड़ी तक पहुंची. नामपता लिख कर जब नर्स ने सूई निकाली तो मेरी सारी बहादुरी ऐसे गायब हो गई जैसे मैं कभी बहादुर थी ही नहीं. पलभर के लिए इच्छा हुई कि चुपचाप खिसक लूं मगर मैं उसे दर्द का एहसास कराना चाहती थी.

अम्मा : भाग 2

अजय ने नीरा के होंठों को कस कर भींच दिया था पर चौखट पर खड़ी अपर्णा ने सबकुछ सुन लिया था. उस के तो तनबदन में आग सी लग गई पर सीधे नीरा से कुछ न कह कर अम्मां से जरूर मन की भड़ास निकाली थी.

‘3-3 ननदें हैं मेरी. हफ्ते में बारीबारी से तीनों आती हैं. मेरी सास के साथ मुंह से मुंह जोड़ कर बैठी रहती हैं, चौके में मैं अकेली पिसती हूं. सब्जी काट कर भी कोई नहीं देता. एक यह घर है, सबकुछ किया कराया मिलता है, तब भी बहू को चैन नहीं.’

‘तेरी ससुराल में होता होगा. बहू तो घर की लक्ष्मी होती है. उस की निंदा कोई बेटी से क्यों करे? वह पहले ही अपना घर छोड़ कर पराए घर की हो गई,’ अपर्णा की बात को बीच में काट कर अम्मां ने साफगोई से बीचबचाव करते हुए कहा था.

पर बेटी के जाने के बाद उन्होंने बारीकी से विश्लेषण किया. सुहाग उन का उजड़ा, वैधव्य उन्हें मिला. न किसी से कुछ मांगा, न ही गिलाशिकवा किया. चुपचाप कोने में बैठी, किताबों से मन बहलाती रहीं. फिर भी घर का वातावरण दूषित क्यों हो गया.

मन में यह विचार आया कि कहीं ऐसा तो नहीं, अजय उन्हें ज्यादा समय देने लगा है. इसलिए नीरा चिड़चिड़ी हो गई है. हर पत्नी को अपने पति का सान्निध्य भाता ही है.

अम्मां ने एक अहम फैसला लिया. अगले दिन शाम होते ही वह सत्संग पर निकल गई थीं. अपनी हमउम्र औरतों के साथ मिल कर कुछ देर प्रवचन सुनती रहीं फिर गपशप में थोड़ा समय व्यतीत कर वापस आ गईं. यही दिनचर्या आगे भी चलती रही.

हमेशा की तरह अजय अम्मां के कमरे में जाता और जब वह नहीं मिलतीं तो नीरा से प्रश्न करता. नीरा 10 दलीलें देती, पर अजय को चैन नहीं था. व्यावहारिक दृष्टिकोण रखने वाली अम्मां ‘कर्म’ पर विश्वास करती थीं. घर छोड़ कर सत्संग, कथा, कीर्तन करने वाली महिलाओं को अम्मां हेयदृष्टि से ही देखती थीं. फिर अब क्या हो गया?

नीरा प्रखर वक्ता की तरह बोली, ‘बाबूजी के गुजरने के बाद अम्मांजी कुछ ज्यादा ही नेमनियम मानने लगी हैं. शायद समाज के भय से अपने वैधव्य के प्रति अधिक सतर्कता बरतनी शुरू कर दी है.’

एक शाम अम्मां घर लौटीं तो घर कुरुक्षेत्र का मैदान बना हुआ था. नीरा बुरी तरह चीख रही थी. अजय का स्वर धीमा था. फिर भी अम्मां ने इतना तो सुन ही लिया था, ‘दालरोटी का खर्च तो निकलता नहीं, फलदूध कहां से लाऊं?’

रात को नीरा अम्मां के कमरे में फलदूध रखने गई तो उन्होंने बहू को अपने पास बिठा लिया और बोलीं, ‘एक बात कहूं, नीरा.’

‘जी, अम्मां,’ उसे लगा, अम्मां ने शायद हम दोनों की बात सुन ली है.

‘तुम ने एम.ए., बी.एड. किया है और शादी से पहले भी तुम एक पब्लिक स्कूल में पढ़ाती थीं.’

‘वह तो ठीक है अम्मां. पर तब घरपरिवार की कोई जिम्मेदारी नहीं थी. अब लवकुश भी हैं. इन्हें कौन संभालेगा?’ नीरा के चेहरे पर चिढ़ के भाव तिर आए.

‘मैं संभालूंगी,’ अम्मां ने दृढ़ता से कहा, ‘चार पैसे घर में आएंगे तो घर भी सुचारु रूप से चलेगा.’

सासबहू की बात चल ही रही थी, जब अजय और अपर्णा कमरे में प्रविष्ट हुए. नीरा चौके में चायनाश्ते का प्रबंध करने गई तो अजय ने ब्रीफकेस खोल कर एकएक कर कागज अम्मां के सामने फैलाने शुरू किए और फिर बोला, ‘अम्मां, सी.पी. फंड, इंश्योरेंस, गे्रच्युटी से कुल मिला कर 5 लाख रुपए मिले हैं. मिल तो और भी सकते थे, पर बाबूजी ने यहां से थोड़ाथोड़ा ऋण ले कर हमारी शादियों और शिक्षा आदि पर खर्च किया था. 7 हजार रुपए महीना तुम्हें पेंशन मिलेगी.’

‘अरे, बेटा, मैं क्या करूंगी इतने पैसों का? तुम्हीं रखो यह कागज अपने पास.’

‘अम्मां, पैसा तुम्हारा है. सुख में, दुख में तुम्हारे काम आएगा,’ अजय ने लिफाफा अम्मां को पकड़ा दिया.

नीरा ने सुना तो अपना माथा पीट लिया. बाद में अजय को आड़े हाथों ले कर बोली, ‘राजीखुशी अम्मां तुम्हें अपनी जमा पूंजी सौंप रही थीं तो ले क्यों न ली? पूरे मिट्टी के माधो हो. अब बुढि़या सांप की तरह पैसे पर कुंडली मार कर बैठी रहेगी.’

‘तड़ाक,’ एक झन्नाटेदार थप्पड़ पड़ा नीरा के गाल पर, ‘यह क्या हो गया?’ अम्मां क्षुब्ध मन से सोचने लगीं, ‘मेरे दिए हुए संस्कार, शिक्षा, सभी पर पानी फेर दिया अजय ने?’

अश्रुपूरित दृष्टि से अपर्णा की ओर अम्मां ने देखा था. जैसे पूछ रही हों कि यह सब क्यों हो रहा है इस घर में. कुछ देर तक नेत्रों की भाषा पढ़ने की कोशिश की पर एकदूसरे के ऊपर दृष्टि निक्षेप और गहरी श्वासों के अलावा कोई वार्तालाप नहीं हो सका था.

अचानक अपर्णा का स्वर उभरा, ‘सारी लड़ाईर् पैसे को ले कर है. बाबूजी थे तो इन पर कोई जिम्मेदारी नहीं थी. अब खर्च करना पड़ रहा है तो परेशानी हो रही है.’

अम्मां ने दीर्घनिश्वास भरा, ‘मैं ने तो नीरा से कहा है कि कोई नौकरी तलाश ले. कुछ पेंशन के पैसे अजय को मैं दे दूंगी.’

जीवन में ऐसे ढेरों क्षण आते हैं जो चुपचाप गुजर जाते हैं पर उन में से कुछ यादों की दहलीज पर अंगद की तरह पैर जमा कर खड़े हो जाते हैं. मां के साथ बिताए कितने क्षण, जिस में वह सिर्फ याचक है, उस की स्मृति पटल पर कतार बांधे खडे़ हैं.

बच्चे दादी को प्यार करते, अड़ोसीपड़ोसी अम्मां से सलाहमशविरा करते, अपर्णा और अजय मां को सम्मान देते तो नीरा चिढ़ती. पता नहीं क्यों? चाहे अम्मां यही प्यार, सम्मान अपनी तरफ से एक तश्तरी में सजा कर, दोगुना कर के बहू की थाली में परोस भी देतीं फिर भी न जाने क्यों नीरा का व्यवहार बद से बदतर होता चला गया.

अम्मां के हर काम में मीनमेख, छोटीछोटी बातों पर रूठना, हर किसी की बात काटना, घरपरिवार की जिम्मेदारियों के प्रति उदासीनता, उस के व्यवहार के हिस्से बनते चले गए.

एक बरस बाद बाबूजी का श्राद्ध था. अपर्णा को तो आना ही था. बेटी के बिना ब्राह्मण भोज कैसा? उस दिन पहली बार, स्थिर दृष्टि से अपर्णा ने अम्मां को देखा. कदाचित जिम्मेदारियों के बोझ से अम्मां बुढ़ा गई थीं. हर समय तनाव की स्थिति में रहने की वजह से घुटनों में दर्द होना शुरू हो गया था.

एकाधिकार : भाग 2

‘‘मांजी कहां हैं, भाभी?’’ पहली बार मोहिनी ने नरेंद्र के मुंह से कोई बात सुनी.

‘‘वे अंदर कमरे में हैं, अभी आएंगी. तुम दोनों थोड़ा सुस्ता लो. मैं चाय भेजती हूं,’’ और जेठानी चली गईं. थोड़ी ही देर में चाय की ट्रे उठाए 3-4 लड़कियों ने अंदर आ कर मोहिनी को घेर लिया. शीघ्र ही 2-3 लड़कियां और भी आ गईं. किसी के हाथ में नमकीन की प्लेट थी तो किसी के हाथ में मिठाई की. नई बहू को सब से पहले देखने का चाव सभी को था. नरेंद्र इस शैतानमंडली को देख कर घबरा गया. वह चाय का प्याला हाथ में थामे बाहर खिसक लिया.

‘‘भाभी, हमारे भैया कैसे लगे?’’ एक लड़की ने पूछा.

‘‘भाभी, तुम्हें गाना आता है?’’ दूसरी बोली.

‘‘अरे भाभी, हम सब तो नरेंद्र भैया से छोटी हैं, हम से क्यों शरमाती हो?’’ और भी इसी तरह के न जाने कितने सवाल वे करती जा रही थीं.

मोहिनी इन सवालों की बौछार से घबरा उठी. फिर सोचने लगी, ‘नरेंद्र की मांजी कहां हैं? क्या वे उस से मिलेंगी नहीं?’

चाय का प्याला थाम कर उस ने धीरे से सिर उठा कर उन सभी लड़कियों की ओर देखा, जिन के भोले चेहरों पर अपनत्व झलक रहा था किंतु आंखें शरारत से बाज नहीं आ रही थीं. मोहिनी कुछ सहज हुई और आखिर पूछ ही बैठी, ‘‘मांजी कहां हैं?’’

‘‘कौन, चाची? अरे, वे तो अभी तुम्हारे पास नहीं आएंगी. शगुन के सारे काम तो बड़ी भाभी ही करेंगी.’’ मोहिनी कुछ ठीक से समझ न पाई, इसलिए चुप ही रही. चुपचाप चाय पीती वह सोच रही थी, क्या वह अंदर जा कर मांजी से नहीं मिल सकती.

तभी जेठानी अंदर आ गईं, ‘‘चलो मोहिनी, मांजी के पांव छू लो.’’ मोहिनी उठ खड़ी हुई. सास के पास पहुंच कर उस ने बड़ी श्रद्धा से झुक कर उन के पांव छुए और इस इंतजार में झुकी रही कि अभी वे उसे खींच कर अपने हृदय से लगा लेंगी, किंतु ऐसा कुछ भी न हुआ.

‘‘सदा सुखी रहो,’’ कहते हुए उन्होंने उस के सिर पर हाथ रख दिया और वहां से चली गईं.

ममता की प्यासी मोहिनी को ऐसा लगा जैसे उस के सामने से प्यार का ठंडा अमृत कलश ही हटा लिया गया हो.

फूलों से सजे कमरे में रात्रि के समय नरेंद्र व मोहिनी अकेले थे. यों तो नरेंद्र स्वभाव से ही शर्मीला था, किंतु उस रात वह भी सूरमा बन बैठा. हिचकिचाती, अपनेआप में सिमटी मोहिनी को उस ने जबरन अपनी बांहों में समेट लिया.

जीवनभर के विश्वासों की नींव शायद इसी परस्पर निकटता की आधारशिला पर टिकी होती है. इसीलिए सुबह होतेहोते दोनों आपस में इस तरह घुलमिल कर बातें कर रहे थे मानो वर्षों से एकदूसरे को जानते हों. मोहिनी नरेंद्र के मन को भा गई थी. दसरे दिन सुबह सभी मेहमान जाने को हो रहे थे. रसोई में नाश्ते की व्यवस्था हो रही थी. शायद उसे भी काम में हाथ बंटाना चाहिए, यही सोच कर मोहिनी भी रसोई के दरवाजे पर जा खड़ी हुई. जेठानी प्यालों में चाय छान रही थीं और मां पूरियां उतार रही थीं.

मोहिनी ने धीरे से चकला अपनी ओर खिसका कर सास के हाथ से बेलन ले लिया और ‘मैं बेलती हूं, मांजी’ कह कर पूरियां बेलने लगी. उस की बेली 4-6 पूरियां उतारने के बाद ही सास धीरे से बोल उठीं, ‘‘नरेंद्र की बहू, पूरियां मोटी हो रही हैं…रहने दो, मैं ही कर लूंगी.’’ मोहिनी सहम कर बाहर आ गई. रात को मोहिनी ने नरेंद्र के कंधे पर सिर टिका कर 2 दिन से अपने हृदय में मथ रहे प्रश्न को पूछ ही लिया, ‘‘मांजी मुझे पसंद नहीं करतीं क्या?’’

नरेंद्र इस बेतुके, किंतु बिना किसी बनावट के किए गए सीधे प्रश्न से चौंक उठा, ‘‘क्यों, क्या हुआ?’’

‘‘मांजी मुझ से प्यार से बोलती नहीं, न ही मुझे अपने से चिपटा कर प्यार किया. भाभी ने तो प्यार किया लेकिन मांजी ने नहीं.’’

मोहिनी के दोनों हाथ थाम कर वह बोला, ‘‘मां को समझने में तुम्हें अभी कुछ समय लगेगा. वैधव्य के सूनेपन ने ही उन्हें रूखा बना दिया है, उस पर भाभी के साथ कुछ न कुछ खटपट चलती ही रहती है. इसी कारण मांजी अंतर्मुखी हो गई हैं. किसी से अधिक बोलती नहीं. कुछ दिन तुम्हारे साथ रह कर शायद वे बदल जाएं.’’

‘‘मैं पूरा यत्न करूंगी,’’ और अपनेआप में हलका महसूस करते हुए मोहिनी नरेंद्र से सट कर सो गई. दूसरे दिन सुबह नरेंद्र के बड़े भाई एवं भाभी भी बच्चों सहित लौट गए. नरेंद्र से छोटे दोनों भाई अपनीअपनी नौकरियों पर वापस चले गए थे और 2 सब से छोटे भाई, जो नरेंद्र के पास रह कर पढ़ाई करते थे, अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गए.

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