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एक साथी की तलाश : आखिर मधुप और बिरुवा का रिश्ता था क्या ? – भाग 3

उन्होंने चौंक कर श्यामला की तरफ देखा, एक हफ्ते बाद सीधेसीधे श्यामला का चेहरा देखा था उन्होंने. एक हफ्ते में जैसे उस की उम्र 7 साल बढ़ गई थी. रोतेरोते आंखें लाल, और चारों तरफ कालेस्याह घेरे.

‘यह क्या कर रही हो तुम श्यामला, छोटी सी बात को तूल दे रही हो?’ उस की ऐसी शक्ल देख कर वे थोड़े पसीज गए थे, ‘सब ठीक हो जाएगा.’ वे धीरे से उस को कंधों से पकड़ कर बोले.

‘क्या ठीक हो जाएगा’, उस ने हाथ झटक दिए थे, ‘मैं अब यहां नहीं रह सकती. घर में रखे सामान की तरह आप की बंदिशें किसी समय मेरी जान ले लेंगी. मेरे तन के साथसाथ मेरे मनमस्तिष्क पर भी बंदिशें लगा दी हैं आप ने. मैं आप से अलग कहीं जाना तो दूर की बात है, आप से अलग सोच तक भी नहीं सकती लेकिन अब मुझ से नहीं हो पाएगा यह सब.’

तो अब क्या करना चाहती हो,’ वे व्यंग्य से बोले.‘मैं यहां से जाना चाहती हूं आज ही,  अपना घर संभालो. आप जब औफिस से आओगे तो मैं नहीं मिलूंगी,’

‘तुम्हें जो करना है करो, जब सोच लिया तो मुझ से क्यों कह रही हो,’ कह कर मधुप दनदनाते हुए औफिस चले गए. वे हमेशा की तरह जानते थे कि श्यामला ऐसा कभी नहीं कर सकती, इतनी हिम्मत नहीं थी श्यामला के अंदर कि वह इतना बड़ा कदम उठा पाती.

लेकिन अपनी पत्नी को शायद वे पूरी तरह नहीं जानते थे. उस दिन उन की सोच गलत साबित हुई. बिना स्पंदन व जीवंतता के रिश्ते आखिर कब तक टिकते. जब वे औफिस से लौटे तो श्यामला जा चुकी थी. घर में सिर्फ बिरुवा था.

‘श्यामला कहां है?’ उन्होंने बिरुवा से पूछा.‘मालकिन तो चली गईं साहब, कह रही थीं, पुणे जा रही हूं हमेशा के लिए.’वे भौचक्के रह गए.

‘ऐसा क्या हुआ साहब, मालकिन क्यों चली गईं?’‘कुछ नहीं बिरुवा.’ क्या समझाते बिरुवा को वे.

थोड़े दिन उस के लौट आने का इंतजार किया. फिर फोन करने की कोशिश की. श्यामला ने फोन नहीं उठाया. मिलने की कोशिश की, श्यामला ने मिलने से इनकार कर दिया. धीरेधीरे उन दोनों के बीच की दरार बढ़तीबढ़ती खाई बन गई. दोनों 2 किनारों पर खड़े रह गए. मनाने की उन की आदत थी नहीं जो मना लाते. नौकरी की व्यस्तता में एक के बाद एक दिन व्यतीत होता रहा. एक दिन सब ठीक हो जाएगा, श्यामला लौट आएगी, यह उम्मीद धीरेधीरे धुंधली पड़ती गई. उस समय श्यामला की उम्र 41 साल थी और वे स्वयं 45 साल के थे. तब से एकाकी जीवन, नौकरी और बिरुवा के सहारे काट दिया उन्होंने. बच्चों के भविष्य की चिंता ने श्यामला को किसी तरह बांध रखा था उन से. उन के कैरियर का रास्ता पकड़ने के बाद वह रुक नहीं पाई. इतना मजबूत नहीं था शायद उन का और श्यामला का रिश्ता.

श्यामला को रोकने में उन का अहं आड़े आया था. लेकिन बिरुवा को उन्होंने घर से कभी जाने नहीं दिया. उस का गांव में परिवार था पर वह मुश्किल से ही गांव जा पाता था. उन के साथ बिरुवा ने भी अपनी जिंदगी तनहा बिता दी थी. बच्चों ने अपनी उम्र के अनुसार मां को बहुतकुछ समझाने की कोशिश भी की पर श्यामला पर बच्चों के कहने का भी कोई असर नहीं पड़ा. वे इतने बड़े भी नहीं थे कि कुछ ठोस कदम उठा पाते. थकहार कर वे चुप हो गए. कुछ छुट्टियां मां के पास, कुछ छुट्टियां पिता के पास बिता कर वापस चले जाते.

श्यामला के मातापिता ने भी शुरू में काफी समझाया उस को. लेकिन श्यामला तो जैसे पत्थर सी हो चुकी थी. कुछ भी सुनने को तैयार न थी. हार कर उन्होंने घर का एक कमराकिचन उसे रहने के लिए दे दिया. कुछ पैसा उस के नाम बैंक में जमा कर दिया. बच्चों का खर्चा तो बच्चों के पिता उठा ही रहे थे.

बेटों की इंजीनियरिंग पूरी हुई तो वे नौकरियों पर आ गए. आजकल एक बेटा मुंबई व एक जयपुर में कार्यरत था. बेटों की नौकरी लगने पर वे जबरदस्ती मां को अपने साथ ले गए. वे कई बार सोचते, श्यामला उन के साथ अकेलापन महसूस करती थी, तो क्या अब नहीं करती होगी. ऐसा तो नहीं था कि उन्हें श्यामला या बच्चों से प्यार नहीं था. पर चुप रहना या शौकविहीन होना उन का स्वभाव था. अपना प्यार वे शब्दों से या हावभाव से ज्यादा व्यक्त नहीं कर पाते थे. लेकिन वे संवेदनहीन तो नहीं थे. प्यार तो अपने परिवार से वे भी करते थे. उन के दुख से चोट तो उन को भी लगती थी. श्यामला के अलग चले जाने पर भी उस के सुखदुख की चिंता तो उन्हें तब भी सताती थी.

दोनों बेटों ने प्रेम विवाह किए. दोनों के विवाह एक ही दिन श्यामला के मायके में ही संपन्न हुए. हालांकि बच्चों ने उन के पास आ कर उन्हें सबकुछ बता कर उन की राय मान कर उन्हें पूरी इज्जत बख्शी पर उन के पास हां बोलने के सिवा चारा भी क्या था. बिना मां के वे अपने पास से बच्चों का विवाह करते भी कैसे. उन्होंने सहर्ष हामी भर दी. जो भी उन से आर्थिक मदद बन पड़ी, उन्होंने बच्चों की शादी में की. और 2 दिन के लिए जा कर शादी में परायों की तरह शरीक हो गए.

जब से श्यामला बच्चों के साथ रहने लगी थी, वे उस की तरफ से कुछ निश्चिंत हो गए थे. बेटों ने उन्हें भी कई बार अपने पास बुलाया. पर पता नहीं उन के कदम कभी क्यों नहीं बढ़ पाए. उन्हें हमेशा लगा कि यदि उन्होंने बच्चों के पास जाना शुरू कर दिया तो कहीं श्यामला वहां से भी चली न जाए. वे उसे फिर से इस उम्र में घर से बेघर नहीं करना चाहते थे.

सरिता : मुन्ना को किस बात की चिंता हो रही थी ? – भाग 3

दीदी अब जिंदगी के समतल में आ कर शांत सरिता बन गई थीं. अब उन के प्रवाह में वेग नहीं था, व्याकुलता नहीं थी बल्कि शांति थी, सौम्यता थी.

और यही मेरी समस्या का कारण भी था कि कहीं मेरी एक गलती उस शांत सरिता के अंदर शांत तूफान को उद्वेलित न कर दे. 20 साल के अखंड तप के फलस्वरूप दीदी ने जीवन में जो थोड़ा सा सुख पाया है, कहीं मेरी एक भूल से वह फिर दुख न बन जाए. मेरी व्याकुलता बढ़ती ही जा रही थी.’

‘‘अरे, अभी तक आप जाग रहे हैं, रात भर सोए नहीं क्या?’’

शुभी ने उठते हुए पूछा तो मेरी तंद्रा भंग हुई. घड़ी की तरफ देखा तो 5 बज रहे थे. मेरी आंखें लाल हो रही थीं.

‘‘क्या बात है, आप रात भर जागते रहे, मुझे क्यों नहीं बताते आप, आखिर बात क्या है?’’

‘‘शुभी…’’ मेरे विचारों की व्यथा मेरी आवाज में झलक उठी, शायद मेरी आंखें भी भर आई थीं.

‘‘आप…’’ इतना कह कर शुभी एकदम से परेशान हो गई, ‘‘आप की आंखों में आंसू और फिर भी मुझ से अपनी परेशानी छिपा रहे हैं, शायद वह परेशानी हमारे प्यार और विश्वास से ऊपर है, है…न…’ उसे शायद मेरा मौन अपनी उपेक्षा लग रहा था.

‘‘नहीं शुभी… ऐसी बात नहीं है,’’ मैं ने उस की गोद में सिर रखते हुए कहा, ‘‘दरअसल, परेशानी ही ऐसी है कि समझ नहीं पा रहा हूं कि क्या करूं.’’

‘‘तो हमें बताइए ना…’’ शुभी जिद्दी स्वर में बोली.

‘‘कल आफिस में जीजाजी आए थे.’’

‘‘क्या?’’ एक पल के लिए तो वह भी चौंक पड़ी थी, ‘‘पर वह तो संन्यासी…’’

‘‘हां, शुभी, 20 साल पहले वह दीदी को छोड़ कर संन्यासी हो गए थे, तुम ने तो देखा भी नहीं है उन्हें.’’

‘‘क्या कह रहे थे वह?’’

‘‘वह दीदी से एक बार मिलना चाहते हैं. पहले तो जी चाहा कि मैं उन्हें आफिस से बाहर कर दूं. 20 साल मेरी बहन ने इस आदमी के बगैर अपनी गृहस्थी कैसे चलाई यह मैं ही जानता हूं, लेकिन उन की हालत बहुत खराब है, शुभी. ऐसा लगता है जैसे अब गिरे कि तब गिरे. मैं उन से कोई कठोर बात नहीं कह पाया लेकिन उस के बाद मैं कोई निर्णय भी नहीं कर सका. वह आज फिर आने के लिए कह गए हैं, समझ में नहीं आता कि क्या करूं. एक तरफ डर लगता है कि जीजाजी की वापसी दीदी के लिए अभिशाप न बन जाए और दूसरी तरफ उन की दयनीय हालत मुझे कठोरता बरतने से रोक रही है.’’

‘‘देखिए, मैं नहीं जानती कि उस समय जब उन्होंने घर छोड़ा था तो हालात क्या रहे होंगे, पर आज जब वह दीदी से मिलना चाहते हैं तो उन्हें रोकना भी ठीक नहीं होगा. पतिपत्नी का रिश्ता सिर्फ जिस्म का रिश्ता तो नहीं होता न, इसलिए तुम दीदी को यहां बुला लो, फिर उन का मन किसी तरह टटोलेंगे, अगर कहीं से उन के दिल में कोई कोना अब भी जीजा के लिए शेष होगा तो ठीक, वरना दीदी से कोई बहाना कर देंगे और यथासंभव हम जीजाजी की मदद कर देंगे.’’

‘‘शुभी…कहीं ऐसा न हो…’’ मेरा संशय दूर होने का नाम नहीं ले रहा था.

‘‘कुछ नहीं होगा…तुम दीदी को बुलाओ, हमें भी तो उन से मिले बहुत दिन हो गए. इसी बहाने उन से मुलाकात भी हो जाएगी.’’

तभी मेरा छोटा बेटा रोने लगा और शुभी उठ कर चली गई थी.

दीदी को फोन करते वक्त मैं काफी हलका महसूस कर रहा था. शायद शुभी ठीक कह रही है. बुलाते हैं दीदी को.

दीदी को फोन किया, पहले तो उन के पास फुरसत नहीं थी. काफी मानमनौव्वल के बाद जब मैं ने कहा, ‘‘दीदी, मेरी तबीयत ठीक नहीं है. डाक्टर ने…’’

फिर पता नहीं क्याक्या कहता चला गया. मैं जानता था कि मेरी बीमारी का नाम सुन कर दीदी रुक नहीं सकेंगी. उस दिन मैं आफिस भी नहीं जा पाया और वही हुआ भी. दीदी दूसरे ही दिन प्रियांशु को साथ ले कर आ गईं. इधर मेरी सोच मेरे ऊपर इस तरह हावी हो गई कि मुझे बुखार हो गया.

‘‘क्या हुआ, मुन्ना? अब कैसी तबीयत है तेरी…’’ दीदी काफी घबरा गई थीं. उन्होंने मेरे माथे पर हाथ रखते हुए कहा था.

‘‘अब तो ठीक हूं, दीदी. इधर मां की बहुत याद आ रही थी तो सोचा, तुम चली आओगी तो…वैसे मेरी खातिर काफी नुकसान हुआ न तुम्हारा.’’

‘‘मेरा पागल भाई,’’ कह कर दीदी ने मुझे अपनी बांहों में भर लिया और बोलीं, ‘‘काम कैसा, मैं तो खुद को बहलाने के लिए काम करती हूं. चल, अब कुछ दिन यहीं रुकूंगी.’’

उस दिन हम देर तक बैठे बातें करते रहे पर हम दोनों की हिम्मत नहीं हो पाई कि जीजाजी के बारे में कुछ कहें.

दूसरे दिन सुबह हम सभी आंगन में बैठे थे. मैं चाह कर भी दीदी से कुछ नहीं कह पा रहा था. शुभी पकौड़े तल रही थी. दीदी शायद मेरी कशमकश को भांप गई थीं.

‘‘क्या बात है, मुन्ना? तू शायद कुछ कहना चाहता है मुझ से?’’ दीदी ने मेरी ओर देखते हुए कहा.

‘‘अरे, नहीं तो दीदी,’’ मैं हड़बड़ा सा गया था.

‘‘फिर मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि तू मुझ से कुछ कहना चाहता है. कोई परेशानी है तो बता.’’

‘‘अरे…नहीं…’’ अभी मैं अपना वाक्य पूरा भी नहीं कर पाया था कि डोर बेल बज उठी…मैं उठना ही चाहता था कि दीदी बोल उठीं, ‘‘तू बैठ, मैं देखती हूं.’’

उन्होंने उठ कर दरवाजा खोला. मेरी नजर भी दरवाजे की तरफ ही थी. दरवाजे पर जीजाजी खड़े थे. मुझे लगा कि मेरी सांस रुक जाएगी, जीजाजी आखिर यहां…

‘‘आप…’’ इतना बोल कर दीदी रुक गईं और निर्निमेश नजरों से उन्हें देखने लगीं. उन्होंने शायद जीजाजी को पहचान लिया था.

जीजाजी अपने कांपते हाथों को जोड़ कर रो पड़े, ‘‘सरिता मैं, हां मैं सरिता, एक अभागा अपराधी जो भटक कर किसी और दुनिया में चला गया था. वहां जहां ईश्वर के नाम पर सौदे होते हैं, जहां भगवान की नीलामी बोली जाती है, और जब होश आया तो मैं इतनी दूर निकल गया था कि लौट कर तुम्हारे पास आने के लिए मेरे पास कोई रास्ता ही न था.

‘‘शर्मिंदगी से अपने चेहरे को छिपाए भटकताभटकता किसी तरह मुन्ना का पता लगा पाया. अपने आखिरी वक्त में तुम से क्षमा मांगने की लालसा में मैं इस के पास गया, पर मुझ से मिलने के बाद यह 3 दिन से आफिस ही नहीं आ रहा था. आज पता चला कि यह बीमार है, किसी तरह इस के घर का पता लगा कर इसे देखने चला आया. मुझे माफ कर दो सरिता, शायद तुम्हारी क्षमा मुझे कुछ शांति दे सके. मुझे माफ…’’

इतना बोल कर वह हांफते हुए बैठ गए थे.

दीदी ने धीरे से उन के हाथों को पकड़ कर उठाया और धीरे से बोल उठीं, ‘‘तुम तो एक अनजानी मंजिल की तलाश में भटकते रहे, मगर मैं तो एक ऐसी सरिता बन गई थी जिस की कोई मंजिल नहीं थी. अब तुम लौट आए हो तो शायद मुझे भी मेरी मंजिल मिल जाए.’’

‘‘दीदी, मुझे भी माफ…’’ मैं उन के कंधे से लग कर सिसक उठा.

‘‘यही बात कहना चाहते थे न तुम. अरे, पगले, भटकता तो इनसान ही है और नफरत तो मैं किसी से नहीं करती थी तो इन से कैसे करूंगी… ये लौट आए जिंदगी की हकीकत समझ कर, मेरे लिए यही बहुत है. आज बाबूजी की आत्मा को शांति मिल गई होगी.’’

इतना कह कर दीदी मुझे पकड़ कर फफक पड़ीं. वर्षों से बंधी सरिता आज बांध तोड़ कर बह चली थी. प्रियांशु अपने दोनों हाथों से अपने कांप

सच्चा प्यार : क्या शेखर की कोई गलत मंशा थी ? – भाग 3

पहले कुछ महीने हमारे बीच दोस्ती थी. हमारे कालेज के पास एक अच्छा कैफे था. हम दोनों रोज वहां कौफी पीने जाते. इसी दौरान एक दिन उस ने मुझे अपने घर बुलाया. वह एक छोटे से फ्लैट में रहता था. उस की मां ने मेरी खूब खातिरदारी की और उस की बहन जो कालेज में पढ़ती थी वह भी मेरे से बड़ी इज्जत से पेश आई. इसी दौरान एक दिन ललित ने मुझ से कहा, ‘‘उर्मी, क्या आप मेरे साथ कौफी पीने के लिए आएंगी?’’उस का इस तरह पूछना मुझे थोड़ा अजीब सा लगा, मगर फिर मैं ने हंस कर पूछा, ‘‘कोई खास बात है जो मुझे कौफी पीने को बुला रहे हो?’’

उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘हां, बस ऐसा ही समझ लीजिए.’’

शाम कालेज खत्म होने के बाद हम दोनों कौफी शौप में गए और एक कोने में जा कर बैठ गए. मैं ने उस के चेहरे को देख कर कहा, ‘‘हां, बोलो ललित क्या बात करनी है मुझ से?’’ ललित ने बिना किसी हिचकिचाहट के कहा, ‘‘उर्मी, मैं बातों को घुमाना नहीं चाहता हूं. मैं तुम से प्यार करता हूं. अगर तुम्हें भी मंजूर है, तो मैं तुम से शादी करना चाहता हूं.’’ यह सुन कर मुझे सच में झटका लगा. मुझे जरा सा भी अंदाजा नहीं था कि ललित इस तरह मुझ से पूछेगा.

मैं ने ललित के बारे में बहुत सोचा. मुझे तब तक मालूम हो चुका कि मेरे पास जो पैसे हैं वे मेरी शादी के लिए बहुत कम हैं और फिर मेरी मां को भी अपनाने वाला दूल्हा मिलना लगभग नामुमकिन ही था. इस बारे में मेरे दिल ने नहीं दिमाग ने निर्णय लिया और मैं ने ललित को अपनी मंजूरी दे दी. उस के बाद हर हफ्ते हम रविवार को हमारे घर के सामने वाले पार्क में मिलते. इसी बीच यकायक ललित 3 दिन की छुट्टी पर चला गया. ललित चौथे दिन कालेज आया. उस का चेहरा उतरा हुआ था. शाम को हम दोनों पार्क में जा कर बैठ गए. मुझे मालूम था कि ललित मुझ से कुछ कहना चाह रहा, मगर कह नहीं पा रहा.  फिर उस ने मेरा हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘मुझे माफ कर दो उर्मी… मैं ने खुद ही तुम से प्यार का इजहार किया था और अब मैं ही इस रिश्ते से पीछे हट रहा हूं. तुम्हें मालूम है कि मेरी एक बहन है. वह किसी लड़के से प्यार करती है और उस लड़के की एक बिन ब्याही बहन है. उन लोगों ने साफ कह दिया कि अगर मैं उन की लड़की से शादी करूं तो ही वे मेरी बहन को अपनाएंगे. मेरे पास अब कोई रास्ता नहीं रहा.’’

मैं 1 मिनट के लिए चुप रही. फिर कहा, ‘‘फैसला ले ही लिया तो अब किस बात का डर… शादी मुबारक हो ललित,’’ और फिर घर चली आई. 1 महीने में ललित और उस की बहन की शादी धूमधाम से हो गई. अब ललित कालेज की नौकरी छोड़ कर अपनी ससुराल की कंपनी में काम करने लगा. अब मनोहर से मेरी शादी हुए 1 महीना हो गया है. मेरी ससुराल वालों ने मेरे पति को मेरे साथ मेरे फ्लैट में रहने की इजाजत दे दी ताकि मेरी मां को भी हमारा सहारा मिल सके. इस नई जिंदगी से मुझे कोई शिकायत नहीं. मेरे पति एक अच्छे इनसान हैं. मुझे किसी भी बात को ले कर परेशान नहीं करते हैं. मेरी बहुत इज्जत करते हैं. औरतों को पूरा सम्मान देते हैं. उन का यह स्वभाव मुझे बहुत अच्छा लगा. ‘‘उर्मी जल्दी से तैयार हो जाओ. हमारी शादी के बाद तुम पहली बार मेरे दफ्तर की पार्टी में चल रही हो. आज की पार्टी खास है, क्योंकि हमारे मालिक के बेटे दिल्ली से मुंबई आ रहे हैं. तुम उन से भी मिलोगी.’’

जब हम पार्टी में पहुंचे तो कई लोग आ चुके थे. मेरे पति ने मुझे सब से मिलवाया. इतने में किसी ने कहा चेयरमैन साहब आ गए. उन्हें देख कर एक क्षण के लिए मेरी सांस रुक गई. चेयरमैन कोई और नहीं शेखर ही था. तभी सभी को नमस्कार कहते हुए शेखर मुझे देख कर 1 मिनट के लिए चौंक गया.

मेरे पति ने उस से कहा, ‘‘मेरी बीवी है सर.’’

शेखर ने हंसते हुए कहा, ‘‘मुबारक हो… शादी कब हुई?’’ मेरे पति उस के सवालों के जवाब देते रहे और फिर वह चला गया. कुछ देर बाद शेखर के पी.ए. ने आ कर कहा, ‘‘मैडम, चेयरमैन साहब आप को बुला रहे हैं अकेले.’’ मैं ने चुपके से अपने पति के चेहरे को देखा. पति ने भी सिर हिला कर मुझे जाने का इशारा किया. शेखर एक बड़ी मेज के सामने बैठा था. मैं उस के सामने जा कर खड़ी हो गई.

शेखर ने मुझे देख कर कहा, ‘‘आओ उर्मी, प्लीज बैठो.’’

मैं उस के सामने बैठ गई. शेखर ने कहा, ‘‘मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं. मैं सीधे मुद्दे पर आ जाऊंगा… मैं हमारी पुरानी दोस्ती को फिर से शुरू करना चाहता हूं बिलकुल पहले जैसे. मैं तुम्हारे पति का दिल्ली में तबादला कर दूंगा. अगर तुम चाहती हो तो तुम्हें दिल्ली के किसी कालेज में लैक्चरर की नौकरी दिला दूंगा.’’ वह ऐसे बोलता रहा जैसे मैं ने उस की बात मान ली. मगर मैं उस वक्त कुछ नहीं कह सकी. चुपचाप लौट कर पति के सामने आ कर बैठ गई. कुछ भी नहीं बोली. टैक्सी से लौटते समय भी कुछ नहीं पूछा उन्होंने. घर लौटने के बाद मेरे पति ने मुझ से कुछ भी नहीं पूछा. मगर मैं ने उन से सारी बातें कहने का फैसला कर लिया. पति ने मेरी सारी बातें चुपचाप सुनीं. मैं ने उन से कुछ नहीं छिपाया.

मेरी आंखों से आंसू आने लगे. मेरे पति ने मेरा हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘उर्मी, तुम ने कुछ गलत नहीं किया. हम सब के अतीत में कुछ न कुछ हुआ होगा. अतीत के पन्नों को दोबारा खोल कर देखना बेकार की बात है. कभीकभी न चाहते हुए भी हमारा अतीत हमारे सामने खड़ा हो जाता है, तो हमें उसे महत्त्व नहीं देना चाहिए. हमेशा आगे की सोच रखनी चाहिए. शेखर की बातों को छोड़ो. उस का रुपया बोल रहा है… हम कभी उस का मुकाबला नहीं कर सकते… मैं कल ही अपना इस्तीफा दे दूंगा. दूसरी नौकरी ढूंढ़ लूंगा. तुम चिंता करना छोड़ो और सो जाओ. हर कदम मैं तुम्हारे साथ हूं,’’ और फिर मुझे बांहों में भर लिया. उन की बांहों में मुझे फील हुआ कि मैं महफूज हूं. इस के अलावा और क्या चाहिए एक पत्नी को?

यह भूल मत करना : माधवी की शादी हुई या नहीं ?

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चमत्कार : मोहिनी की शादी में क्या हुआ था ?

‘‘मोहिनी दीदी पधार रही हैं,’’ रतन, जो दूसरी मंजिल की बालकनी में मोहिनी के लिए पलकपांवडे़ बिछाए बैठा था, एकाएक नाटकीय स्वर में चीखा और एकसाथ 3-3 सीढि़यां कूदता हुआ सीधा सड़क पर आ गया.

उस के ऐलान के साथ ही सुबह से इंतजार कर रहे घर और आसपड़ोस के लोग रमन के यहां जमा होने लगे.

‘‘एक बार अपनी आंखों से बिटिया को देख लें तो चैन आ जाए,’’ श्यामा दादी ने सिर का पल्ला संवारा और इधरउधर देखते हुए अपनी बहू सपना को पुकारा.

‘‘क्या है, अम्मां?’’ मोहिनी की मां सपना लपक कर आई थीं.

‘‘होना क्या है आंटी, दादी को सिर के पल्ले की चिंता है. क्या मजाल जो अपने स्थान से जरा सा भी खिसक जाए,’’ आपस में बतियाती खिलखिलाती मोहिनी की सहेलियों, ऋचा और रीमा ने व्यंग्य किया था.

‘‘आग लगे मुए नए जमाने को. शर्म नहीं आती अपनी पोशाक देख कर? न गला, न बांहें, न पल्ला, न दुपट्टा और चली हैं दादी की हंसी उड़ाने,’’ ऋचा और रीमा को आंखों से ही घुड़क दिया. वे दोनों चुपचाप दूसरे कमरे में चली गईं.

लगभग 2 साल पहले सपना ने अपने पति रामेश्वर बाबू को एक दुर्घटना में गंवा दिया था. श्यामा दादी ने अपना बेटा खोया था और परिवार ने अपना कर्णधार. दर्द की इस सांझी विरासत ने परिवार को एक सूत्र में बांध दिया था.

‘‘चायनाश्ते का पूरा प्रबंध है या नहीं? पहली बार ससुराल से लौट रही है हमारी मोहिनी. और हां, बेटी की नजर उतारने का प्रबंध जरूर कर लेना,’’ दादी ने लाड़ जताते हुए कहा था.

‘‘सब प्रबंध है, अम्मां. आप तो सचमुच हाथपैर फुला देती हैं. नजर आदि कोरा अंधविश्वास है. पंडितों की साजिश है,’’ सपना अनचाहे ही झल्ला गई थी.

‘‘बुरा मानने जैसा तो कुछ कहा नहीं मैं ने. क्या करूं, जबान है, फिसल जाती है. नहीं तो मैं कौन होती हूं टांग अड़ाने वाली?’’ श्यामा दादी सदा की तरह भावुक हो उठी थीं.

‘‘अब तुम दोनों झगड़ने मत लगना. शुक्र मनाओ कि सबकुछ शांति से निबट गया नहीं तो न जाने क्या होता?’’ मोहिनी के बड़े भाई रमन ने बीचबचाव किया तो उस की मां सपना और दादी श्यामा तो चुप हो गईं पर उस के मन में बवंडर सा उठने लगा. क्या होता यदि मोहिनी के विवाह के दिन ऊंट दूसरी करवट बैठ जाता? वह तो अपनी सुधबुध ही खो बैठा था. उस की यादों में तो आज भी सबकुछ वैसा ही ताजा था.

‘भैया, ओ भैया. कहां हो तुम?’ रतन इतनी तीव्रता से दौड़ता हुआ घर में घुसा था कि सभी भौचक्के रह गए थे. वह आंगन में पड़ी कुरसी पर निढाल हो कर गिरा था और हांफने लगा था.

‘क्या हुआ?’ बाल संवारती हुई अम्मां कंघी हाथ में लिए दौड़ी आई थीं. रमन दहेज के सामान को करीने से संदूक में लगवा रहा था. उस ने रतन के स्वर को सुन कर भी अनसुना कर दिया था.

शादी का घर मेहमानों से भरा हुआ था. सभी जयमाला की रस्म के लिए सजसंवर रहे थे. सपना और रतन के बीच होने वाली बातचीत को सुनने के लिए सभी बेचैन हो उठे थे. पर रतन के मुख से कुछ निकले तब न. उस की आंखों से अनवरत आंसू बहे जा रहे थे.

‘अरे, कुछ तो बोल, हुआ क्या? किसी ने पीटा है क्या? हाय राम, इस की कनपटी से तो खून बह रहा है,’ सपना घबरा कर खून रोकने का प्रयत्न करने लगी थीं. सभी मेहमान आंगन में आ खड़े हुए थे.

श्यामा दादी दौड़ कर पानी ले आई थीं. घाव धो कर मरहमपट्टी की. रतन को पानी पिलाया तो उस की जान में जान आई.

‘मेरी छोड़ो, अम्मां, रमन भैया को बुलाओ…वहां मैरिज हाल में मारपीट हो गई है. नशे में धुत बराती अनापशनाप बक रहे थे.’’

सपना रमन को बुलातीं उस से पहले ही रतन के प्रलाप को सुन कर रमन दौड़ा आया था. रतन ने विस्तार से सब बताया तो वह दंग रह गया था. वह तेजी से मैरिज हाल की ओर लपका था उस के मित्र प्रभाकर, सुनील और अनिल भी उस के साथ थे.

रमन मैरिज हाल पहुंचा तो वहां कोहराम मचा हुआ था. करीने से सजी कुरसियांमेजें उलटी पड़ी थीं. आधी से अधिक कुरसियां टूटी पड़ी थीं.

‘यह सब क्या है? यहां हुआ क्या है, नरेंद्र?’ उस ने अपने चचेरे भाई से पूछा था.

‘बराती महिलाओं का स्वागत करने घराती महिलाओं की टोली आई थी. नशे में धुत कुछ बरातियों ने न केवल महिलाओं से छेड़छाड़ की बल्कि बदतमीजी पर भी उतर आए,’ नरेंद्र ने रमन को वस्तुस्थिति से अवगत कराया था.

रमन यह सब सुन कर भौचक खड़ा रह गया था. क्या करे क्या नहीं…कुछ समझ नहीं पा रहा था.

‘पर बराती गए कहां?’ रमन रोंआसा हो उठा था. कुछ देर में स्वयं को संभाला था उस ने.

‘जाएंगे कहां? बात अधिक न बढ़ जाए इस डर से हम ने उन्हें सामने के दोनों कमरों में बंद कर के ताला लगा दिया,’ नरेंद्र ने क्षमायाचनापूर्ण स्वर में बोल कर नजरें झुका ली थीं.

‘यह क्या कर दिया तुम ने. क्या तुम नहीं जानते कि मैं ने कितनी कठिनाई से पाईपाई जोड़ कर मोहिनी के विवाह का प्रबंध किया था. तुम लोग क्या जानो कि पिता के साए के बिना जीवन बिताना कितना कठिन होता है,’ रमन प्रलाप करते हुए फूटफूट कर रो पड़ा था.

‘स्वयं को संभालो, रमन. मैं क्या मोहिनी का शत्रु हूं? तुम ने यहां का दृश्य देखा होता तो ऐसा नहीं कहते. तुम्हें हर तरफ फैला खून नजर नहीं आता? यदि हम करते इन्हें बंद न तो न जाने कितने लोग अपनी जान से हाथ धो बैठते,’ नरेंद्र, उस के मित्र प्रभाकर, सुनील और अनिल भी उसे समझाबुझा कर शांत करने का प्रयत्न करने लगे थे.

किसी प्रकार साहस जुटा कर रमन उन कमरों की ओर गया जिन में बराती बंद थे. उसे देखते ही कुछ बराती मुक्के हवा में लहराने लगे थे.

‘तुम लोगों का साहस कैसे हुआ हमें इस तरह कमरों में बंद करने का,’ कहता हुआ एक बराती दौड़ कर खिड़की तक आया और गालियों की बौछार करने लगा. एक अन्य बराती ने दूसरी खिड़की से गोलियों की झड़ी लगा दी. रमन और उस के साथी लेट न गए होते तो शायद 1-2 की जान चली जाती.

दूल्हा ‘राजीव’ पगड़ी आदि निकाल ठगा सा बैठा था.

‘समझ क्या रखा है? एकएक को हथकडि़यां न लगवा दीं तो मेरा नाम सुरेंद्रनाथ नहीं,’ वर के पिता मुट्ठियां हवा में लहराते हुए धमकी दे रहे थे.

चंद्रा गार्डन नामक इस मैरिज हाल में घटी घटना का समाचार जंगल की आग की तरह फैल गया था. समस्त मित्र व संबंधी घटनास्थल पर पहुंच कर विचारविमर्श कर रहे थे.

चंद्रा गार्डन से कुछ ही दूरी पर जानेमाने वकील और शहर के मेयर रामबाबू रहते थे. रमन के मित्र सुनील के वे दूर के संबंधी थे. उसे कुछ न सूझा तो वह अनिल और प्रभाकर के साथ उन के घर जा पहुंचा.

रामबाबू ने साथ चलने में थोड़ी नानुकुर की तो तीनों ने उन के पैर पकड़ लिए. हार कर उन को उन के साथ आना ही पड़ा.

रामबाबू ने खिड़की से ही वार्त्तालाप करने का प्रयत्न किया पर वरपक्ष का कोई व्यक्ति बात करने को तैयार नहीं था. वे हर बात का उत्तर गालियों और धमकियों से दे रहे थे.

रामबाबू ने प्रस्ताव रखा कि यदि वरपक्ष शांति बनाए रखने को तैयार हो तो वह कमरे के ताले खुलवा देंगे पर लाख प्रयत्न करने पर भी उन्हें कोई आश्वासन नहीं मिला. साथ ही सब को गोलियों से भून कर रख देने की धमकी भी मिली.

इसी ऊहापोह में शादी के फूल मुरझाने लगे. बड़े परिश्रम और मनोयोग से बनाया गया भोजन यों ही पड़ापड़ा खराब होने लगा.

‘जयमाला’ के लिए सजधज कर बैठी मोहिनी की आंखें पथरा गईं. कुछ देर पहले तक सुनहरे भविष्य के सपनों में डूबी मोहिनी को वही सपने दंश देने लगे थे.

काफी प्रतीक्षा के बाद वह भलीभांति समझ गई कि दुर्भाग्य ने उस का और उस के परिवार का साथ अभी तक नहीं छोड़ा है. मन हुआ कि गले में फांसी का फंदा लगा कर लटक जाए, पर रमन का विचार मन में आते ही सब भूल गई. किस तरह कठिन परिश्रम कर के रमन भैया ने पिता के बाद कर्णधार बन कर परिवार की नैया पार लगाई थी. वह पहले ही इस अप्रत्याशित परिस्थिति से जूझ रहा था और एक घाव दे कर वह उसे दुख देने की बात सोच भी नहीं सकती थी.

उधर काफी देर होहल्ला करने के बाद बराती शांत हो गए थे. बरात में आए बच्चे भूखप्यास से रोबिलख रहे थे. बरातियों ने भी इस अजीबोगरीब स्थिति की कल्पना तक नहीं की थी.

अत: जब मेयर रामबाबू ने फिर से कमरों के ताले खोलने का प्रस्ताव रखा, बशर्ते कि बराती शांति बनाए रखें तो वरपक्ष ने तुरंत स्वीकार कर लिया.

अब तक अधिकतर बरातियों का नशा उतर चुका था. पर रस्सी जलने पर भी ऐंठन नहीं गई थी. वर के पिता सुरेंद्रनाथ तथा अन्य संबंधियों ने बरात के वापस जाने का ऐलान कर दिया. रामबाबू भी कच्ची गोलियां नहीं खेले थे. उन के इशारा करते ही कालोनी के युवकों ने बरातियों को चारों ओर से घेर लिया था.

‘देखिए श्रीमान, मोहिनी केवल एक परिवार की नहीं सारी कालोनी की बेटी है. जो हुआ गलत हुआ पर उस में बरातियों का दोष भी कम नहीं था,’ रामबाबू ने बात सुलझानी चाही थी.

‘चलिए, मान लिया कि दोचार बरातियों ने नशे में हुड़दंग मचाया था तो क्या आप हम सब को सूली पर चढ़ा देंगे?’ वरपक्ष का एक वयोवद्ध व्यक्ति आपा खो बैठा था.

‘आप इसे केवल हुड़दंग कह रहे हैं? गोलियां चली हैं यहां. न जाने कितने घरातियों को चोटें आई हैं. आप के सम्मान की बात सोच कर ही कोई थानापुलिस के चक्कर में नहीं पड़ा,’ रमन के चाचाजी ने रामबाबू की हां में हां मिलाई थी.

‘तो आप हमें धमकी दे रहे हैं?’ वर के पिता पूछ बैठे थे.

‘धमकी क्यों देने लगे भला हम? हम तो केवल यह समझाना चाह रहे हैं कि आप बरात लौटा ले गए तो आप की कीर्ति तो बढ़ने से रही. जो लोग आप को उकसा रहे हैं, पीठ पीछे खिल्ली उड़ाएंगे.’

‘अजी छोडि़ए, इन सब बातों में क्या रखा है. अब तो विवाह का आनंद भी समाप्त हो गया और इच्छा भी,’ लड़के के पिता सुरेंद्रनाथ बोले थे.

‘आप हां तो कहिए, विवाह तो कभी भी हो सकता है,’ रामबाबू ने पुन: समझाया था.

काफी नानुकुर के बाद वरपक्ष ने विवाह के लिए सहमति दी थी.

‘इन के तैयार होने से क्या होता है. मैं तो तैयार नहीं हूं. यहां जो कुछ हुआ उस का बदला तो ये लोग मेरी बहन से ही लेंगे. आप ही कहिए कि उस की सुरक्षा की गारंटी कौन देगा. माना हमारे सिर पर पिता का साया नहीं है पर हम इतने गएगुजरे भी नहीं हैं कि सबकुछ देखसमझ कर भी बहन को कुएं में झोंक दें,’ तभी रमन ने अपनी दोटूक बात कह कर सभी को चौंका दिया था और फूटफूट कर रोने लगा था.

कुछ क्षणों के लिए सभी स्तब्ध रह गए थे. रामबाबू से भी कुछ कहते नहीं बना था. पर तभी अप्रत्याशित सा कुछ घटित हो गया था. भावी वर राजीव स्वयं उठ कर रमन को सांत्वना देने लगा था, ‘मैं आप को आश्वासन देता हूं कि आप की बहन मोहिनी विवाह के बाद पूर्णतया सुरक्षित रहेगी. विवाह के बाद वह आप की बहन ही नहीं मेरी पत्नी भी होगी और उसे हमारे परिवार में वही सम्मान मिलेगा जो उसे मिलना चाहिए.’

‘ले, सुन ले रमन, अब तो आंसू पोंछ डाल. इस से बड़ी गारंटी और कोई क्या देगा,’ रामबाबू बोले थे.

धीरेधीरे असमंजस के काले मेघ छंटने लगे थे. नगाड़े बज उठे थे. बैंड वाले अपनी ही धुन पर थिरक रहे थे. रमन पुन: बरातियों के स्वागतसत्कार मेें जुट गया था.

रमन न जाने और कितनी देर अपने दिवास्वप्न में डूबा रहता कि तभी मोहिनी ने अपने दोनों हाथों से उस के नेत्र मूंद दिए थे.

‘‘बूझो तो जानें,’’ वह अपने चिरपरिचित अंदाज में बोली थी.

रमन ने उसे गले से लगा लिया. सारा घर मेहमानों से भर गया था. सभी मोहिनी की एक झलक पाना चाहते थे.

मोहिनी भी सभी से मिल कर अपनी प्रसन्नता व्यक्त कर रही थी. तभी रामबाबू ने वहां पहुंच कर सब के आनंद को दोगुना कर दिया था. रमन कृतज्ञतावश उन के चरणों में झुक गया था.

‘‘काकाजी उस दिन आप ने बीचबचाव न किया होता तो न जाने क्या होता,’’ वह रुंधे गले से बोला था.

‘‘लो और सुनो, बीचबचाव कैसे न करते. मोहिनी क्या हमारी कुछ नहीं लगती. वैसे भी यह हमारे साथ ही दो परिवार के सम्मान का भी प्रश्न था,’’ रामबाबू मुसकराए फिर

राजीव से बोले, ‘‘एक बात की बड़ी उत्सुकता है हम सभी को कि वे लोग थे कौन जिन्होंने इतना उत्पात मचाया था? मुझे तो ऐसा लगा कि बरात में 3-4 युवक जानबूझ कर आग को हवा दे रहे थे.’’

‘‘आप ने ठीक समझा, चाचाजी,’’ राजीव बोला, ‘‘वे चारों हमारे दूर के संबंधी हैं. संपत्ति को ले कर हमारे दादाजी से उन का विवाद हो गया था. वह मुकदमा हम जीत गए, तब से उन्होंने मानो हमें नीचा दिखाने की ठान ली है. सामने तो बड़ा मीठा व्यवहार करते हैं पर पीठ पीछे छुरा भोंकते हैं,’’ राजीव ने स्पष्ट किया.

‘‘देखा, रमन, मैं न कहता था. वे तो विवाह रुकवाने के इरादे से ही बरात में आए थे, पर उस दिन राजीव, तुम ने जिस साहस और सयानेपन का परिचय दिया, मैं तो तुम्हारा कायल हो गया. मोहिनी बेटी के रूप में हीरा मिला है तुम्हें. संभाल कर रखना इसे,’’ रामबाबू ने राजीव की प्रशंसा के पुल बांध दिए थे.

राजीव और मोहिनी की निगाहें एक क्षण को मिली थीं. नजरों में बहते अथाह प्रेम के सागर को देख कर ही रमन तृप्त हो गया था, ‘‘आप ठीक कहते हैं, काका. ऐसे संबंधी बड़े भाग्य से मिलते हैं.’’

वह आश्वस्त था कि मोहिनी का भविष्य उस ने सक्षम हाथों में सौंपा था.

‘आरडब्लूए’ जैसे काम क्यों नहीं करती सरकार?

बजट, टैक्स, सरकार और जनता ये आपस में उलझे हुए शब्द हैं. टैक्स के बारे में कहा जाता है कि अच्छा राजा वह होता है जो जनता से टैक्स ले लेकिन जनता को पता न चले. पहले बजट में ही महंगाई बढ़तीघटती थी. अब साल में कई बार चीजों के दाम बढ़ जाते हैं.

रेल बजट को आम बजट में जोड़ दिया गया है. रेल का टिकट बजट के बाद भी बढ़ता है. सरकार का काम होता है जनता से पैसे ले कर उस के लिए सुविधा और कल्याणकारी योजनाएं चलाए. अब कोई भी सेवा कल्याणकारी नहीं है, सब का बिजनैस मौडल बन गया है. नाममात्र की जो कल्याणकारी योजनाएं हैं उन का बुरा हाल है.

सेना छोड़ कर सभी का निजीकरण हो गया है. सेना में भी अग्निवीर जैसी योजनाएं आ गई हैं जो एक तरह से कौन्ट्रैक्ट सर्विस जैसी हो गई हैं. सेना के बजट में पिछले साल के मुकाबले 3.4 फीसदी की बढ़ोतरी की गई है. डिफैंस खर्च के लिए 6.2 लाख करोड़ रुपए दिए गए हैं. अंतरिम बजट में सब से बड़ा हिस्सा डिफैंस का ही है. इसे कुल बजट का 8 फीसदी मिला है, जबकि अब देशों से लड़ाई कर के किसी देश पर कब्जा कोई नहीं कर सकता. ऐसे में सेना का बजट बढ़ाने का कोई लाभ नहीं दिखता.

बजट से साफ पता चलता है कि सरकार की कमाई टैक्स से हो रही है. वह इस को कहां खर्च कर रही, यह पता नहीं चल रहा है. 2024-25 में सरकार की कमाई 30.80 लाख करोड़ (उधारी छोड़ कर) और खर्च 47.66 लाख करोड़ रुपए रहने का अनुमान है.

अगले वित्त वर्ष में सरकार को टैक्स कलैक्शन से कुल 26.02 लाख करोड़ रुपए मिलने का अनुमान है. सरकार सड़क, अस्पताल और स्कूल में खर्च कर रही है. यहां से भी उस की कमाई अलग से हो रही है.

चमकदार चीजों से अलग से खर्च

आज जिस तरह की सड़कें बन रही हैं, उन पर चलने के लिए अलग से टोल टैक्स देना पड़ता है. यह टोल टैक्स हर सड़क पर अलगअलग होता है. यह करीब 2 रुपए प्रति किलोमीटर पड़ता है. आज चमकदार सड़कें वहीं है जहां टोल टैक्स अधिक है. ऐसे में टैक्स का पैसा खर्च कर के सड़कें बन भी रहीं हो तो भी जनता को राहत नहीं मिलती है. साइकिल और बाइक से चलने वाले तो इन सड़कों पर चल भी नहीं सकते. इस तरह की चमकदार सड़कें जनता के किस काम की?

बात सड़कों की ही नहीं है. स्कूल और अस्पतालों का भी यही हाल है. सरकारी स्कूल जहां पर फीस कम होती है वहां के हालात किसी से छिपे नहीं हैं. ऐेसे में जनता के टैक्स के खर्च से सरकारी स्कूल चलाने का क्या लाभ जब जनता को अच्छी शिक्षा के लिए निजी स्कूलों पर ही निर्भर रहना पड़ता है. अब पुलिस, बिजली और सफाई के लिए भी केवल सरकार पर निर्भर नहीं रहा जा सकता. शहरों अपार्टमैंट और गेटेड कालोनी बनने लगी हैं. जहां सुरक्षा के लिए निजी गार्ड रखे जाने लगे हैं. इन को पैसा देना पड़ता है.

इसी तरह से सरकारी सफाई कर्मचारी से ही काम नहीं चलता. ऐेसे में निजी कर्मचारी भी रखे जाने लगे हैं. अधिकांश घरों में बिजली के लिए इन्वर्टर और सोलर पैनल लोग लगाने लगे हैं. सरकार को टैक्स देने के बाद भी लोगों को अपने लिए अलग से खर्च करना पड़ता है. सरकार टैक्स में कोई राहत नहीं दे रही है. 3 लाख रुपए तक की इनकम ही टैक्स फ्री रहेगी.

10 साल में इनकम टैक्स कलैक्शन 3 गुना बढ़ गया है. 7 लाख की आय वालों को कोई कर देय नहीं है. सरकार ने कहा, 2025-2026 तक घाटा को और कम करेंगे. राजकोषीय घाटा 5.1 फीसदी रहने का अनुमान है. 44.90 लाख करोड़ रुपए का खर्च है और 30 लाख करोड़ रुपए का रैवेन्यू आने का अनुमान है.

आवास क्यों बना रही सरकार

2014-23 के दौरान 596 अरब डौलर विदेशी प्रत्यक्ष निवेश आया. यह 2005-2014 के दौरान आए से दोगुना था. सरकार मिडिल क्लास के लिए आवास योजना लाएगी. अगले 5 वर्षों में 2 करोड़ घर बनाए जाएंगे. पीएम आवास के तहत 3 करोड़ घर बनाए गए हैं. इस से बेहतर होता कि सरकार मकान बनाने में लगने वाली सामाग्री सस्ती करे जिस से आदमी खुद से अपना घर बना सके. असल में सरकार यह दिखाने की कोशिश कर रही कि वह गरीबों के लिए काम करती है. इस तरह की कल्याणकारी योजनाएं चलाने की जगह ऐसे काम हों जिन का लाभ जनता को मिल सके.

देश में सब से ज्यादा मुकदमे राजस्व यानी खेती की जमीन से जुड़े हैं. ये विवाद बढ़ते हैं तो झगड़े और मुकदमेबाजी बढ़ती है. सरकार अगर इस तरह के काम करे कि ये झगड़े कम हो सकें तो जनता राहत महसूस करेगी.

हर घर जल योजना से पानी पहुंचाया जा रहा है. 78 लाख स्ट्रीट वैंडर को मदद दी गई है. 4 करोड़ किसानों को पीएम फसल बीमा योजना का लाभ दिया जाता है. पीएम किसान योजना से 11.8 करोड़ लोगों को आर्थिक मदद मिली है. आम लोगों के जीवन में बदलाव लाने का प्रयास किया जा रहा है. युवाओं को सशक्त बनाने पर भी काम किया है.

सरकार जिस तरह से जनहित की योजनाएं चलाती थी, अब वे कम हो गई हैं. जनहित की योजनाओं की बुरी हालत हो गई है. उन के बराबर निजी योजनाओं में पैसा खर्च करने के लिए लोग बेबस हैं.

सरकार से सवाल नहीं हो सकते

असल में सरकार का काम ‘आरडब्ल्यूए’ यानी रैजिडेंस वैलफेयर एसोसिएशन की तरह से होना चाहिए. जिस तरह से वह प्रति स्क्वायर फुट के हिसाब से मेंटिनैंस चार्ज ले कर सारी सुविधाएं देती है उसी तरह से सरकार को करना चाहिए.

जनता से जो टैक्स ले, उसे सही तरह से आंका जा सके. सरकार इनकम टैक्स लेती है. इस के बाद हर जगह पर अलग टैक्स भी लेती है. जनता को यह पता ही नहीं है कि सरकार किसकिस तरह से उस से पैसा ले रही, उस में से जनता के हित में क्या खर्च कर रही?

‘आरडब्ल्यूए’ से सवाल किए जा सकते हैं, सरकार से सवाल नहीं पूछे जा सकते. ऐसे में सरकार एक साहूकार की तरह से जनता से पैसे ले तो लेती है पर पैसे खर्च कैसे कर रही है, यह नहीं पूछ सकते. न ही सरकार इस को ले कर कुछ कहती है. जनता से जो पैसे वसूल होते हैं उस का बड़ा हिस्सा रिश्वतखोरी और सरकार के शाही खर्चों में खर्च हो रहा है. जनता के टैक्स के पैसे खा कर सरकार का पेट निकलता जा रहा है. जनता टैक्स देदे कर सूखती जा रही है.

खतरनाक तेजी से गिर रहा है भूजल का स्तर

मानसी की उम्र बीस-बाइस साल की होगी. इंटरमीडिएट के बाद उस ने पढ़ाई छोड़ दी. घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, इसलिए उस ने सोचा कि नौकरी कर ले. एक कोरियर कंपनी में उस ने पैकेट रिसीव करने की छोटी सी जौब कर ली, मगर उस की 5,000 रुपए महीने की यह नौकरी 15 दिन भी नहीं चल पाई. वजह थी पानी, जिस के लिए उस को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा. 9 लोगों के अपने परिवार की पानी की जरूरत पूरी करने के लिए मानसी को अपनी मां और अपनी बड़ी बहन के साथ महल्ले के उस नल पर लंबी लाइन में घंटों खड़े रहना पड़ता है, जिस में निगम का पानी कुछ देर के लिए छोड़ा जाता है. वहां पानी नहीं मिलता तो उस को सड़क पर पानी के टैंकर के इंतज़ार में घंटों बैठना पड़ता है. जिस दिन दोदो बालटी पानी तीनों को मिल जाता है, समझो उस दिन त्योहार हो जाता है. 9 लोगों के उस के परिवार में सभी प्राणी रोज नहीं नहाते. आज अगर मानसी ने एक बालटी पानी में नहाना और सिर धोना कर लिया तो उस का नंबर दोबारा 5 दिनों बाद आता है. नहाने के अलावा खाना बनाने, पीने, कपड़े धोने और शौच के लिए भी पानी की आवश्यकता होती है. ऐसे में दिल्ली जैसी जगह में रहते हुए भी इस परिवार को राजस्थान के दूरदराज रेगिस्तानी इलाके में रहने जैसा अनुभव होता है. घर की कोई लड़की न तो ठीक से पढ़लिख सकती है, न ही नौकरी कर सकती है, उन के दिनरात पानी ढूंढने और भरने में जाते हैं.

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने भारत सहित दुनिया के 40 देशों में भूमि जल पर शोध कर यह खुलासा किया है कि भूजल का स्तर दुनियाभर में बड़ी तेजी से गिर रहा है. हमारे क़दमों तले संकट गहराता जा रहा है, और हम बेफिक्र हैं. रिसर्च के दौरान 1,700 जलस्रोतों की जांच में पता चला है कि वर्ष 2000 के बाद से इन में से लगभग आधे जलस्रोत सूखने की कगार पर पहुंच गए हैं. हालांकि 7 फीसदी जलस्रोतों में आश्चर्जनक रूप में पानी का स्तर बढ़ा भी है, जो कुछ राहत देता है.

इस रिसर्च में 3 वर्ष का समय लगा है और यह भूजल स्तर की वास्तविक स्थिति बताने वाला दुनिया का पहला अध्ययन है. रिसर्च के दौरान पिछले सौ वर्षों में 15 लाख कुओं से 300 मिलियन जल स्तर माप को समझने के लिए डाटा को एकत्रित किया गया है.

अध्ययन से यह बात प्रकाश में आई है कि सब से ज्यादा भूमि जल का स्तर कृषि क्षेत्रों में कम हुआ है. जहां जलवायु शुष्क है और बहुत सारी जमीन पर खेती होती है, वहां समस्या ज़यादा पैदा हुई है. भारत सहित कैलिफोर्निया की सैंट्रल वैली और संयुक्त राज्य अमेरिका के उच्च मैदानी क्षेत्र भूजल के मामले में गंभीर स्थितियों का सामना कर रहे हैं. जमीन के अंदर का पानी हर दिन .05 सैमी की दर से नीचे जा रहा है. जमीन की नमी खत्म होने से आने वाले एक दशक के भीतर कई क्षेत्रों में पीने का पानी भी पहुंच से दूर हो जाएगा. भूजल में गिरावट के चलते हम चाहे जितने बीज बिखेर दें, उन की देखभाल कर लें, नन्हा अंकुर कभी जमीन से बाहर नहीं आएगा, इस से कृषि क्षेत्रों को भारी मुसीबत का सामना करना पड़ेगा.

दिल्ली हर साल औसतन 0.2 मीटर भूजल खो रही है. इस लिहाज से हर दिन दिल्ली की जमीन के नीचे का पानी 0.05 सैंटीमीटर नीचे जा रहा है. यहां के करीब 80 फीसदी स्त्रोत क्रिटिकल या सैमी क्रिटिकल स्थिति में आ चुके हैं. वजह यह है कि इन इलाकों में भूजल का दोहन खतरे के गंभीर स्तर तक किया जा रहा है. इंडिया डाटा पोर्टल की एक रिपोर्ट भी कहती है कि भारत में बीते 16 वर्षों में सैमी क्रिटिकल जोन में करीब 50 फीसदी का इजाफा हुआ है. साल 2004 से 2020 के बीच इन की संख्या 550 से बढ़ कर 1,057 पहुंच गई है.

भूजल के गिरते स्तर के कई कारण हैं. मुख्य है, घरघर में होने वाली अवैध बोरिंग, जो अनावश्यक रूप से धरती का जल खींच कर बरबाद कर रही है. आजकल छोटेबड़े सभी शहरों में और यहां तक कि छोटेछोटे कसबों और गावों में अधिकतर पानी बोरिंग कर के ही निकाला जा रहा है और दूसरी ओर बरसात के पानी को इकट्ठा करने के सारे तरीके लगभग बंद हो चुके हैं. उत्तर प्रदेश की ही बात करें तो यहां जितने तालाब 50 साल पहले होते थे उन में से 80 फ़ीसदी मिट्टी से पाटे जा चुके हैं और उन पर बड़ीबड़ी बिल्डिंग व मकान खड़े हो गए हैं. नगर निगम के दस्तावेजों में जहांजहां तालाब दर्ज हैं उन जगहों का निरीक्षण करने पर दूरदूर तक तालाब का नामोनिशान नहीं मिलता. यही हाल दिल्ली एनसीआर का है. यमुना के आसपास के इलाके में भी अब भूजल का स्तर खतरे की सीमा तक पहुंच गया है. एनसीआर में 50 साल पहले जितने तालाब थे, आज उन में से एक भी नहीं बचा है. लिहाजा, बरसात का पानी कहीं इकट्ठा ही नहीं होता. पहले लोग घर के आंगन में टैंक बनवा कर बरसाती पानी इकट्ठा करते थे, अब घर इतने छोटे हो गए हैं कि उन में आंगन ही नहीं हैं. फ्लैट कल्चर ने भी धरती और धरती के पानी को बहुत नुकसान पहुंचाया है. कुकुरमुत्तों की तरह उग आईं ऊंचीऊंची बिल्डिंस में गहरीगहरी बोरिंग के जरिए पानी की आवश्यकता को पूरा किया जाता है. निगम का पानी तो बमुश्किल एक या दो घंटे ही आता है.

63 वर्षीय आशा देवी पानी के लिए अकसर परेशान रहती हैं. सप्ताह में 2 से 3 बार ही इन्हें समय पर पानी मिल पाता है क्योंकि अधिकांश समय रात 8 से 9 के बीच पानी नहीं आता और सुबह कभी 5 तो कभी 6 बजे ही पानी आने लगता है. अगर सुबह जल्दी न उठें तो इन्हें पानी के लिए पूरे दिन परेशान रहना पड़ता है. आशा देवी बताती हैं कि यह हालत सिर्फ गरमी में ही नहीं, बल्कि इन दिनों सर्दी में भी है. वे कहती हैं, ‘दिल्ली में बारिश साल में गिनती के चंद रोज ही होती है. बारिश हो या न, हमारे लिए यह संकट बना ही रहता है. जूनजुलाई में पानी की किल्लत बहुत बढ़ जाती है.’

यह स्थिति अकेले आशा देवी की नहीं है बल्कि पूर्वीदिल्ली के लक्ष्मीनगर इलाके के जे एक्सटेंशन में ज्यादातर घर इस का सामना कर रहे हैं. यहां से चंद किलोमीटर दूर मयूर विहार निवासी अंकिता बंसोड कहती हैं कि दिनभर उन की ड्यूटी बस यही देखने की है कि नल आया या नहीं. इस की वजह से वे बारबार मोटर चलाती हैं. कई बार चलाने से वह एयर ले जाती है और फिर मैकेनिक बुलाना पड़ता है. यह हर महीने की हालत है और करीब 500 से एक हजार रुपए का खर्चा मोटर की एयर निकालने में ही लग जाता है.

निगम से आने वाले पानी की ऐसी दशा के कारण ही अधिकांश घरों में अवैध बोरिंग है जो भूजल के लिए बड़ा संकट का कारण बन चुकी है. जलवायु परिवर्तन और बढ़ते ग्लोबल वार्मिंग के कारण भी जमीन की ऊपरी सतह की नमी सूख गई है. गौरतलब है कि जब भूमिगत जल का स्तर कम होता है, तो नदियों और नदियों का प्रदूषित सतही जल अधिकाधिक भूजल में मिल जाता है, जो हमारे पीने के पानी और भूजल पारिस्थितिकी तंत्र को खतरे में डाल देता है. नदी के पानी में शहर की गंदगी और सीवेज के अतिरिक्त दवाओं के अवशेषों, घरेलू रसायनों, कृत्रिम मिठास और अन्य दूषित पदार्थ मिले होते हैं. जो भूजल में मिल कर पीने योग्य पानी को जहरीला कर रहे हैं. जमीनी पानी के कम होने से जगहजगह धरती के धंसने की समस्याएं सामने आ रही हैं.

Poonam Pandey Death : फेमस एक्ट्रेस पूनम पांडे ने इस बीमारी के कारण तोड़ा दम

Poonam Pandey Death : अभिनेत्री और सोशल मीडिया पर हमेशा अपने अजीबोगरीब बयानों व हरकतों के चलते छाई रहने वाली पूनम पांडे का आज सुबह सर्वाइकल कैंसर के कारण दुखद निधन हो गया, जिस से मनोरंजन उद्योग सदमे और शोक में डूब गया.

मौडलिंग और सोशल मीडिया पर मजबूत उपस्थिति के लिए मशहूर 32 वर्षीया पूनम ने निधन से पहले बीमारी के खिलाफ बहादुरी से लड़ाई लड़ी. अंतिम समय तक उन्होंने किसी को एहसास ही नहीं होने दिया कि वे बीमार हैं. इसलिए उन की मौत की खबर पर यकीन नहीं किया जा रहा है.

लेकिन पूनम पांडे की मैनेजर निकिता शर्मा ने खुद हमें ईमेल भेज कर इस दिल दहला देने वाली खबर को साझा करते हुए लिखा, ‘‘पूनम पांडे न केवल फिल्म उद्योग में एक चमकदार हस्ती थीं, बल्कि वे ताकत और लचीलेपन की प्रतीक भी थीं. स्वास्थ्य संघर्षों के बीच उन की अटूट भावना वास्तव में उल्लेखनीय थी.”

निकिता शर्मा ने आगे लिखा है, ‘‘जैसे ही हम दुखद क्षति को स्वीकार कर रहे हैं, उन का निधन हम सभी को सर्वाइकल कैंसर जैसी रोकथामयोग्य बीमारियों के खिलाफ बढ़ती जागरूकता और सक्रिय उपायों की महत्त्वपूर्ण आवश्यकता को पहचानने के लिए मजबूर करता है.’’

इस ईमेल में निकिता शर्मा ने आगे लिखा है, ‘‘पूनम पांडे एक बहुमुखी व्यक्तित्व वाली महिला थीं जो न केवल मनोरंजन उद्योग में अपने काम के लिए बल्कि सोशल मीडिया प्लेटफौर्म पर अपनी जीवंत उपस्थिति के लिए भी जानी जाती हैं. एक मौडल और अभिनेत्री के रूप में उन की यात्रा ने स्क्रीन पर अपनी प्रतिभा और करिश्मा दिखा कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया. उन के परोपकारी प्रयासों ने कई लोगों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ी है.’’

पूनम पांडे की मैनेजर ने अपने ईमेल में जगह व अस्पताल का जिक्र नहीं किया है, जहां पर पूनम का देहांत हुआ.

असली चेहरा- भाग 2: क्यों अवंतिका अपने पति की बुराई करती थी?

अवंतिका की बातें सुन कर मेरा मन खराब हो गया. देखने में तो उस के पति सौम्य, सुशिक्षित लगते हैं, पर अंदर से कोई कैसा होगा, यह चेहरे से कहां पता चल सकता है? एक पढ़ालिखा उच्चपदासीन पुरुष भी अपने घर में कितना दुर्व्यवहार करता है, यह सोचसोच कर अवंतिका के पति से मुझे नफरत होने लगी. अब अकसर अवंतिका अपने घर की बातें बेहिचक मुझे बताने लगी. उस की बातें सुन कर मुझे उस से सहानुभूति होने लगी कि इतनी अच्छी औरत की जिंदगी एक बदमिजाज पुरुष की वजह से कितनी दुखद हो गई… पहले जब कभी योगिता को बसस्टौप पर छोड़ने अवंतिका की जगह योगिता के पापा आते थे, तो मैं उन से हर विषय पर बात करती थी, किंतु उन की सचाई से अवगत होने के बाद मैं कोशिश करती कि उन से मेरा सामना ही न हो और जब कभी सामना हो ही जाता तो मैं उन्हें अनदेखा करने की कोशिश करती. मेरी धारणा थी कि जो इनसान अपनी पत्नी को सम्मान नहीं दे सकता उस की नजरों में दूसरी औरतों की भला क्या अहमियत होगी.

एक दिन अवंतिका काफी उखड़े मूड में मेरे पास आई और रोते हुए मुझ से कहा कि मैं 2 हजार योगिता के स्कूल टूअर के लिए अपने पास से जमा कर दूं. पति के वापस आने के बाद वापस दे देगी. चूंकि मैं योगिता की कक्षाध्यापिका थी, इसलिए मुझे पता था कि स्कूल टूअर के लिए बच्चों को 2 हजार देने हैं. अत: मैं ने अवंतिका से पैसे देने का वादा कर लिया. पर उस का रोना देख कर मैं पूछे बगैर न रह सकी कि उसे पैसे मुझ से लेने की जरूरत क्यों पड़ गई?

मेरे पूछते ही जैसे अवंतिका के सब्र का बांध टूट पड़ा. बोली, ‘‘आप को क्या बताऊं मैं अपने घर की कहानी… कैसे जिंदगी गुजार रही हूं मैं अपने पति के साथ… बिलकुल भिखारी बना कर रखा है मुझे. कितनी बार कहा अपने पति से कि मेरा एटीएम बनवा दो ताकि जब कभी तुम बाहर रहो तो मैं अपनी जरूरत पर पैसे निकाल सकूं. पर जनाब को लगता है कि मेरा एटीएम कार्ड बन गया तो मैं गुलछर्रे उड़ाने लगूंगी, फुजूलखर्च करने लगूंगी. एटीएम बनवा कर देना तो दूर हाथ में इतने पैसे भी नहीं देते हैं कि मैं अपने मन से कोई काम कर सकूं. जाते समय 5 हजार पकड़ा गए. कल 3 हजार का एक सूट पसंद आ गया तो ले लिया.1 हजार ब्यूटीपार्लर में खत्म हो गए. रात में 5 सौ का पिज्जा मंगा लिया. अब केवल 5 सौ बचे हैं. अब देख लीजिए स्कूल से अचानक 3 हजार मांग लिए गए टूअर के लिए तो मुझे आप से मांगने आना पड़ गया… क्या करूं 2 ही रास्ते बचे थे मेरे पास या तो बेटी की ख्वाहिश का गला घोट कर उसे टूअर पर न भेजूं या फिर किसी के सामने हाथ फैलाऊं. क्या करती बेटी को रोता नहीं देख सकती, तो आप के ही पास आ गई.’’

अवंतिका की बात सुन कर मैं सोच में पड़ गई. अगर 2 दिन के लिए पति क्व5 हजार दे कर जाता है, तो वे कोई कम तो नहीं हैं पर उन्हीं 2 दिनों में पति के घर पर न होते हुए उन पैसों को आकस्मिक खर्च के लिए संभाल कर रखने के बजाय साजशृंगार पर खर्च कर देना तो किसी समझदार पत्नी के गुण नहीं हैं? शायद उस की इसी आदत की वजह से ही उस के पति एटीएम या ज्यादा पैसे एकसाथ उस के हाथ में नहीं देते होंगे, क्योंकि उन्हें पता होगा कि पैसे हाथ में रहने पर अवंतिका इन्हीं चीजों पर खर्च करती रहेगी. पर फिर भी मैं ने यह कहते हुए उसे पैसे दे दिए कि मैं कोई गैर थोड़े ही हूं, जब कभी पैसों की ऐसी कोई आवश्यकता पड़े तो कहने में संकोच न करना.

कुछ ही दिनों बाद विद्यालय में 3 दिनों की छुट्टी एकसाथ पड़ने पर मेरे पास कुछ खाली समय था, तो मैं ने सोचा कि मैं अवंतिका की इस शिकायत को दूर कर दूं कि मैं एक बार भी उस के घर नहीं आई. मैं ने उसे फोन कर के शाम को अपने आने की सूचना दे दी और निश्चित समय पर उस के घर पहुंच गई. पर डोरबैल बजाने से पहले ही मेरे कदम ठिठक गए. अंदर से अवंतिका और उस के पति के झगड़े की आवाजें आ रही थीं. उस के पति काफी गुस्से में थे, ‘‘कितनी बार समझाया है तुम्हें कि मेरा सूटकेस ध्यान से पैक किया करो, पर तुम्हारा ध्यान पता नहीं कहां रहता है. हर बार कोई न कोई सामान छोड़ ही देती हो तुम… इस बार बनियान और शेविंग क्रीम दोनों ही नहीं रखे थे तुम ने. तुम्हें पता है कि गैस्टहाउस शहर से कितनी दूर है? दूरदूर तक दुकानों का नामोनिशान तक नहीं है. तुम अंदाजा भी नहीं लगा सकती हो कि मुझे कितनी परेशानी और शर्म का सामना करना पड़ा वहां पर… इस बार तो मेरे सहयोगी ने हंसीहंसी में कह भी दिया कि भाभीजी का ध्यान कहां रहता है सामान पैक करते समय?’’

‘‘देखो, तुम 4 दिन बाद घर आए हो… आते ही चीखचिल्ला कर दिमाग न खराब करो. तुम्हें लगता है कि मैं लापरवाह और बेसलीकेदार हूं तो तुम खुद क्यों नहीं पैक कर लेते हो अपना सूटकेस या फिर अपने उस सहयोगी से ही कह दिया करो आ कर पैक कर जाया करे? मुझे क्यों आदेश देते हो?’’ यह अवंतिका की आवाज थी.

टूटे हुए रिश्तों को कैसे जोड़े, इसके लिए अपनाएं ये टिप्स

किसी भी रिश्ते में एक बार विश्वास टूट जाता है तो उस विश्वास को वापस लाना बहुत मुश्किल होता है. इसी तरह एक रिश्ते को आगे बढ़ाने के लिए उसमें सबसे ज्यादा जरूरत विश्वास की होती है. अगर किसी रिश्ते में विश्वास ही नहीं है तो रिश्ते का टूट जाना ही बेहतर होता है. लेकिन अगर आपने अपने पार्टनर का विश्वास तोड़ा है तो उसे वापस पाने के लिए बहुत सी बातों का ध्यान रखने की जरूरत होती है. अपने रिश्ते को वापस जोड़ना चाहते हैं तो आप दोनों को बराबर कोशिश करने की जरूरत होती है.

  1. अपनी भावनाओं को बताएं:

सबसे पहले आपको अपने साथी के सामने इस बात को मान लेनी चाहिए कि आपने उसके विश्वास तोड़कर गलती की है ताकि उसे इस बात का एहसास हो कि आपको अपनी गलती का पछतावा है. इसके बाद अपनी भावनाओं को बताने की जरूरत है और अपने प्यार को दिखाने की. ये सारी बातें आपके पार्टनर को प्रभावित कर सकती है और आप वापस उनका विश्वास हासिल कर सकते हैं.

  1. माफी मांगें:

आपको अपने रिश्ते में विश्वास वापस लाने के लिए अपने पार्टनर से मांफी मांगने की जरूरत होती है. अपने साथी को इस बात का विश्वास दिलाने पड़ेगा कि जो भी गलती आपसे हुई वैसे आगे भविष्य में नहीं होगी. अगर आपका साथी आपकी बातों को नहीं समझे और आपके मांफी को ना स्वीकार करें तो आपको इस बात से दुखी होने की जरूरत नहीं है बल्कि आपको उन्हें मनाने की और कोशिश करनी चाहिए.

  1. खुद को माफ करें:

अपने साथी से माफी मांगने से पहले आपको खुद को माफ करने की जरूरत है क्योंकि जब तक आप अपनी गलती को माफ नहीं करेंगे तब तक कोई भी उसे माफ नहीं कर पाएगा. किसी रिश्ते में विश्वास लाने से पहले आपको खुद पर विश्वास करने की ज्यादा जरूरत होती है. अपनी गलती को माने और कोशिश करें कि आगे भविष्य में इस गलती को ना दोहराएं और अपने साथी को भी दुख ना दें.

4. अपनी जिंदगी से जुड़ें बातों को शेयर करें:

अगर आप अपने पार्टनर का विश्वास दोबारा जितना चाहते हैं तो उसके लिए आपको अपने जिंदगी से जुड़े हर बात के बारे में अपने साथी को बताना चाहिए ताकि उसे आपके ऊपर किसी प्रकार का संदेह ना रहें. अपने बीच कोई प्राइवेसी ना रखें. इससे आपका साथी शायद इस बात को समझ पाएगा की आप आगे भविष्य में उसके साथ कुछ गलत नहीं करेंगे और ना ही धोखा देंगे.

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