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संजोग: मां-बाप के मतभेद के कारण विवेक ने क्या किया?

लेखिका- मीनू त्रिपाठी

जीवन में कुछ परिवर्तन अचानक होते हैं जो जिंदगी में खुद के दृष्टिकोण पर एक प्रश्नचिह्न लगा जाते हैं. पुराना दृष्टिकोण किसी पूर्वाग्रह से घिरा हुआ गलत साबित होता है और नया दृष्टिकोण वर्षा की पहली सोंधी फुहारों सा तनमन को सहला जाता है. सबकुछ नयानया सा लगता है.

कुछ ऐसा ही हुआ विवेक के साथ. कौसानी आने से पहले मां से कितनी जिरह हुई थी उस की. विषय वही पुराना, विवाह न करने का विवेक का अडि़यल रवैया. कितना समझाया था मां ने, ‘‘विवेक शादी कर ले, अब तो तेरे सभी दोस्त घरपरिवार वाले हो गए हैं. अगर तेरे मन में कोई और है तो बता दे, मैं बिना कोई सवाल पूछे उस के साथ तेरा विवाह रचा दूंगी.’’

विवेक का शादी न करने का फैसला मां को बेचैन कर देता. पापा कुछ नहीं कहते, लेकिन मां की बातों से मूक सहमति जताते पापा की मंशा भी विवेक पर जाहिर हो जाती, पर वह भी क्या करे, कैसे बोल दे कि शादी न करने का निर्णय उस ने अपने मम्मीपापा के कारण ही लिया है. पतिपत्नी के रूप में मम्मीपापा के वैचारिक मतभेद उसे अकसर बेचैन कर देते. एकदूसरे की बातों को काटती टिप्पणियां, अलगअलग दिशाओं में बढ़ते उन के कदम, गृहस्थ जीवन को चलाती गाड़ी के 2 पहिए तो उन्हें कम से कम नहीं कहा जा सकता था.

छोटीबड़ी बातों में उन के टकराव को झेलता संवेदनशील विवेक जब बड़ा हुआ तो शादी जैसी संस्था के प्रति पाले पूर्वाग्रहों से ग्रसित होने के कारण वह विवाह न करने का ऐलान कर बैठा. मम्मीपापा ने शुरू में तो इसे उस का लड़कपन समझा, धीरेधीरे उस की गंभीरता को देख वे सचेत हो गए.

पापा अब मम्मी की बातों का समर्थन करने लगे थे. वे अकसर विवेक को प्यार से समझाते कि सही निर्णय के लिए एक सीमा तक वैचारिक मतभेद जरूरी है. यह जरूर है कि नासमझी में आपसी सवालजवाब सीमा पार कर लेने पर टकराव का रूप ले लेते हैं, पर सिक्के का एक दूसरा पहलू भी है. समझदारी व आपसी सामंजस्य से विषम परिस्थितियों में भी तालमेल बिठाया जा सकता है.

विवाह जैसी संस्था की जड़ें बहुत गहरी व मजबूत होती हैं. छोटीमोटी बातें वृक्ष को हिला तो सकती हैं, पर उसे उखाड़ फेंकने का माद्दा नहीं रखतीं. उन की ये दलीलें विवेक को संतुष्ट न कर पातीं, लेकिन कौसानी आने पर अचानक ऐसा क्या हुआ कि दिल के जिस कोमल हिस्से को जानबूझ कर उस ने सख्त बना दिया था. उस के द्वारा बंद किए उस के दिल के दरवाजे पर कोई यों अचानक दस्तक दे प्रवेश कर जाएगा, किसी ने कहां सोचा था.

कौसानी में होटल के रिसैप्शन पर रजिस्टर साइन करते समय डा. विद्या के नाम पर उस की नजर पड़ी थी. उस शाम कैफेटेरिया में एक युवती ने बरबस ही उस का ध्यान खींचा.

सांवली सी, बड़ीबड़ी हिरनी सी बोलती आंखें, कमर तक लहराते केश, हलके नीले रंग की शिफान की साड़ी पहने वह सौम्यता की मूर्ति लग रही थी.

विवेक अपनी दृष्टि उस पर से हटा न पाया और बेखयाली में ही एक कुर्सी पर बैठ गया. तभी किसी ने आ कर कहा, ‘‘ऐक्सक्यूज मी, यह टेबल रिजर्व है…’’ उस ने झुक कर देखा तो नीचे लिखा था, डा. विद्या. वह जल्दी से खड़ा हो गया, तभी मैनेजर ने दूसरी टेबल की तरफ इशारा किया और वह उस तरफ जा कर चुपचाप बैठ गया.

‘डा. विद्या’ कितनी देर तक यह नाम उस के जेहन में डूबताउतराता रहा था. वह युवती डा. विद्या की जगह पर बैठ गई. कुछ ही देर में 2 अनजान मेहमान आए और वह उन से कुछ चर्चा करती रही. विवेक की नजरें घूमफिर कर उस पर टिक जातीं. उस के बाद तो यह सिलसिला सा बन गया था.

डा. विद्या के आने से पहले ही उस की महक फिजा में घुल कर उस के आने का संकेत दे देती. विवेक की बेचैन नजरें बढ़ी हुई धड़कन के साथ उसे खोजती रहतीं. उस पर नजर पड़ते ही उस का गला सूखने लगता और जीभ तालु से लग जाती.

वह सोचता कि यह क्या हो रहा है. ऐसा तो आज तक नहीं हुआ. सांवली सी, चंचलचितवन वाली इस लड़की ने जाने कौन सा जादू कर दिया, जिस ने उस का चैन छीन लिया है. कौसानी के ये 4-5 दिन तो जैसे पंख लगा कर उड़ गए. समय बीतने का एहसास तक नहीं हुआ.

कल विवेक के सेमिनार का अंतिम दिन था. उस दिन उस के दोस्त ध्रुव का फोन आया, वह काफी समय से विवेक को कौसानी बुला रहा था. इत्तेफाक से विवेक का सेमिनार कौसानी में आयोजित होने से उसे वहां जाने का मौका मिल गया, लेकिन अचानक ध्रुव को कुछ काम से दिल्ली जाना पड़ा.

इस होटल में ध्रुव ने ही विवेक की बुकिंग करवाई थी. ध्रुव दिल्ली में था, वरना तो वह अपने परम मित्र को कभी भी होटल में नहीं रहने देता. उस की नईनई शादी हुई थी, तो विवेक ने भी ध्रुव की अनुपस्थिति में उस के घर रहना ठीक नहीं समझा.

‘‘हैलो, धु्रव… कहां है यार, मुझे बुला कर तो तू गायब ही हो गया.’’

‘‘माफ कर दे यार, मुझे खुद इतना बुरा लग रहा है कि क्या बताऊं? मैं परसों तक कौसानी पहुंच जाऊंगा. ईशा भी तुझ से मिलना चाहती है. मैं ने उसे अपने बचपन के खूब किस्से सुनाए हैं. तब तक तुम अपना सेमिनार निबटा लो, फिर हम खूब मस्ती करेंगे,’’ ध्रुव ने फोन पर कहा.

दूसरे दिन विवेक का सेमिनार था. होटल आतेआते उसे शाम हो गई थी. वह थक गया था. फ्रैश हो कर वह कैफेटेरिया की तरफ गया. प्रवेश करते ही उस का सामना फिर डा. विद्या से हुआ. वह नाश्ता कर रही थी. हलके गीले बाल, जींस के ऊपर चिकन की कुरती पहने, वह ताजी हवा की मानिंद विवेक के दिल को छू गई.

वह असहज हो गया था. उस के दिल की धड़कनें बढ़ गई थीं. जाने क्यों, उसे ऐसा लगा कि पाले के उस पार बैठी उस युवती के हृदय में भी कुछ ऐसा बवंडर उठा है. क्या वह भी अपने परिचय का दायरा विस्तृत करना चाहती है? वे दोनों ही अनजान बने बैठे थे. उन की नजरें जबतब इधरउधर भटक कर एकदूसरे पर पड़ जातीं. तभी वेटर ने आ कर पूछा, ‘‘आप कुछ लेंगे,’’ तो विवेक को मन मार कर उठना पड़ा. वह समझ गया कि यों अंधेरे में तीर चलाने का कोई फायदा नहीं है.

कमरे में आते ही उस ने अपना लैपटौप निकाला. अपना ईमेल अकाउंट खोला, तो उस में फेसबुक की तरफ से मां का मैसेज देखा. उस लिंक पर जाने पर मां की फ्रैंड्स लिस्ट में एक चेहरे पर उस की नजर पड़ी जिसे देख कर वह चौंक उठा, ‘‘ओ माई गौड, यह यहां कैसे?’’

मां की फ्रैंड्स लिस्ट में डा. विद्या की तसवीर देख उस की आंखें विस्मय से फैल गईं. शायद धोखा हुआ है, परंतु नाम देख कर तो विश्वास करना ही पड़ा. मां कैसे जानती हैं इसे. उस ने पहले तो कभी इस चेहरे पर ध्यान ही नहीं दिया.

विवेक चकरा गया था. शायद मां की मैडिकल एडवाइजर हों. उस ने तुरंत मां को फोन कर के डा. विद्या के बारे में पूछा, तो उन्होंने सहजता से बताया, ‘‘यह तो मेरी डाक्टर है. तुम्हारे दोस्त ध्रुव ने ही तो इस के बारे में बताया था. यह धु्रव की दोस्त है और काफी नामी डाक्टर है यहां की.’’

विवेक की जिज्ञासा चरम पर पहुंचने लगी. उस ने तुरंत फ्रैंड्स लिस्ट के माध्यम से विवेक का फेसबुक अकाउंट खोला, तो उस में भी उस युवती की तसवीर थी. ध्रुव के वालपोस्ट को चैक करने पर उस के द्वारा विद्या को दिया गया मैसेज देखा, जिस में ध्रुव ने विद्या को विवेक के कौसानी आने के बारे में बताया था.

विवेक ने डा. विद्या वाली उलझी गुत्थी को सुलझाने के लिए ध्रुव को फोन लगाया तो लगातार उस का फोन स्विच औफ आता रहा. ईशा भाभी से पूछना कुछ ठीक नहीं लगा. क्यों न हिम्मत कर डा. विद्या से ही बात करूं कि यह माजरा क्या है? पर अब रात बहुत हो चुकी थी. अभी जाना ठीक नहीं है. पूरी रात उस की करवटें बदलते बीती. सुबहसुबह ही उस ने रिसैप्शन से डा. विद्या के बारे में पता किया, तो पता चला मैडम सुबहसुबह ही कहीं निकल गई हैं.

ध्रुव का मोबाइल अभी भी स्विच औफ आता रहा. उस की बेचैनी व उत्कंठा बढ़ती ही जा रही थी. वह रिसैप्शन में ही डेरा डाल कर बैठ गया. अचानक ध्रुव ने प्रवेश किया, वह जैसे ही उस की ओर बढ़ता ईशा से बतियाती डा. विद्या भी साथ आती दिखी. विवेक के कदम वहीं थम गए. उसे पसोपेश में पड़ा देख ध्रुव शरारत से मुसकराया. विद्या एक औपचारिक ‘हैलो’ करती हुई बोली, ‘‘मैं अभी फ्रैश हो कर आती हूं, आज का डिनर तुम दोस्तों को मेरी तरफ से,’’ कह कर वह चली गई.

विवेक को चक्कर में पड़ा देख ध्रुव को हंसी आ गई.

‘‘तुम जानते हो इसे,’’ विवेक ने पूछा तो कंधे उचाकते हुए ध्रुव बोला, ‘‘हां, दोस्त है मेरी, मतलब हमारी पुरानी स्कूल की दोस्ती है.’’

‘‘ऐसी कौन सी दोस्त है तुम्हारी, जिसे मैं नहीं जानता,’’ विवेक बोला.

‘‘तुम नहीं जानते? क्या बात कर रहे हो.’’

‘‘ध्रुव, प्लीज साफसाफ बताओ कौन है ये? तुम ने इसे ईमेल के जरिए यह क्यों बताया कि मैं कौसानी आ रहा हूं.’’

‘‘कमाल है यार, एक दोस्त दूसरे दोस्त के बारे में पूछे तो क्यों न बताऊं,’’ ध्रुव ने कहा.

‘‘ओफ, ध्रुव, अब बस भी करो,’’ विवेक के चेहरे पर झुंझलाहट और उस की विचित्र मनोदशा का आनंद लेता हुआ ध्रुव आराम से सोफे पर बैठ गया और उस की आंखों को देखता हुआ बोला, ‘‘विवेक, तुझे अपनी क्लास टैंथ याद है. सहारनपुर से आई वह झल्ली सी लड़की, जिस के कक्षा में प्रवेश करते ही हम सब को हंसी आ गई थी. जिस से तेरा फ्रैंडशिप बैंड बंधवाना चर्चा का विषय बन गया था. सब ने कितनी खिल्ली उड़ाई थी तेरी.’’

विवेक के चेहरे का रंग बदलता गया और अचानक वह बोला, ‘‘ओ माई गौड, यह वह विद्या है, जिस के तेल से तर बाल चर्चा का विषय थे.

‘‘कितनी हंसती थी सारी लड़कियां. मीरा मैम ने जब डौली को घर से तेल लगा कर आने को कहा तो कैसे हंस कर वह बोली, ‘हम सब के हिस्से का तेल तो विद्या लगाती है न मैम…’ उस की इस बात पर सब कैसे ठहाका लगा कर हंस पड़े थे.’’

विद्या लगभग बीच सैशन में आई थी. मैम ने जब सब से कहा कि विद्या का काम पूरा करने के लिए सब उसे सहयोग करें. उस का काम पूरा करने के लिए अपने नोट्स उसे दे दें, तो विद्या कैसी मासूमियत से ध्रुव की ओर इशारा कर के बोली थी, ‘मैम, ये भैया, अपनी कौपी मुझे नहीं दे रहे हैं.’ उस के भैया शब्द पर पूरी क्लास ठहाकों से गूंज उठी थी. खुद मीरा मैम भी अपनी हंसी दबा नहीं पाई थीं. छोटे शहर की मानसिकता किसी से भी हजम नहीं होती. लड़कियों का तो वह सदा ही निशाना रहती थी.

विद्या पढ़ने में तो तेज थी, लेकिन अंगरेजी उस की सब से बड़ी प्रौब्लम थी. अंगरेजी माध्यम से पढ़ते हुए उसे खासी दिक्कत पेश आई थी. फिर उसे ‘फ्रैंडशिप डे’ का वह दिन याद आया, जब सभी एकदूसरे को फ्रैंडशिप बैंड बांध रहे थे, तो किसी ने विद्या पर कमेंट किया, ‘विद्या तुम से तो हम सब राखी बंधवाएंगे.’ उस की आंखों में आंसू आ गए. बेचारगी से उस ने अपनी मुट्ठी में रखे बैंड छिपा लिए थे.

विवेक को उस बेचारी सी लड़की पर बड़ा तरस आया. सब के जाने के बाद विवेक और धु्रव ने उस से फ्रैंडशिप बैंड बंधवाया, पर यह दोस्ती ज्यादा दिन तक नहीं चल पाई थी.

एक साल बाद ही विद्या कोटा चली गई. ध्रुव ने बताया कि जुझारू विद्या का मैडिकल में चयन हो गया था.

विवेक मानो स्वप्न से जागा हो. जब उस ने आत्मविश्वास से भरी, मुसकराती हुई डा. विद्या को आते देखा. कोई इतना कैसे बदल सकता है. विद्या ने आते ही विवेक की आंखों में झांक कर पूछा, ‘‘अभी भी नहीं पहचाना तुम ने, मैं ने तो तुम्हें फेसबुक पर कब का ढूंढ़ लिया था, लेकिन तुम्हारी अतीत की स्मृति में बसी विद्या के रूप से डरती थी.’’

ध्रुव ने खुलासा किया कि हम सब ने विद्या को विस्मृत कर दिया था, लेकिन यह तुम्हें कभी भुला न पाई.

विद्या लरजते स्वर में बोली, ‘‘विवेक, तुम्हें तो मालूम भी नहीं होगा कि उम्र के उस नाजुक दौर में मैं अपना दिल तुम्हें दे बैठी थी. मुझे नहीं पता कि कच्ची उम्र में तुम्हारे प्रति मेरा वह एकतरफा तथाकथित प्यार था या महज आकर्षण, पर यह सच है कि स्वयं को तुम्हारे काबिल बनाने की होड़ व जनून ने ही मुझे कुछ कर दिखाने की प्रेरणा व हिम्मत दी. मुझे सफलता के इस मुकाम तक पहुंचाने का एक अप्रत्यक्ष जरिया तुम बने. किस ने सोचा था कि कभी तुम से यों मुलाकात भी होगी.’’

‘‘वह भी इतने नाटकीय तरीके से,’’ कहता हुआ ध्रुव हंस पड़ा, ‘‘पिछले 6 महीने से विद्या के साथ तुम्हारे बारे में ही बातें होती रहीं. तुम्हारी शादी न करने की बेवजह जिद से परेशान हो कर आंटी ने जब मैट्रीमोनियल साइट पर तुम्हारा बायोडाटा डाल दिया था तब आंटी को मैं ने ही विश्वास में ले कर विद्या के बारे में बताया. अब मुसीबत यह थी कि तुम्हारी आशा के अनुरूप तो कोई उतर ही नहीं रहा था. तो हम सब ने यह नाटक रचा.

‘‘तुम कौसानी आए, तो मैं ने झूठ बोला कि मैं दिल्ली जा रहा हूं, ताकि तुम होटल में रुको. विद्या तुम से मिलना चाहती थी, पर बिना किसी पूर्वाग्रह के, हालांकि हमें संदेह था कि कोई यों आसानी से तुम्हारे हृदय में अधिकार जमा भी पाएगी. शायद नियति को भी यह संजोग मंजूर था.’’

‘‘पर तुम मुझे एक बार बताते तो सही,’’ विवेक हैरानी से बोला.

ध्रुव बोल पड़ा, ‘‘ताकि तुम अपनी जिद के कारण अपने दिल के दरवाजे को स्वयं बंद कर देते.’’

तभी मां का फोन आया. उन के कुछ पूछने से पहले ही विवेक बोल उठा, ‘‘मां, तुम्हारी खोज पूरी हो गई है. जल्दी ही मैं एक डाक्टर बहू घर ले कर आ रहा हूं. आप पापा के साथ मिल कर शादी की पूरी तैयारी कर लेना.’’

मां भावुक हो उठी थीं, ‘‘विवेक समस्याएं तो हर एक के जीवन में आती हैं, पर उन से डर कर रिश्ते के बीजों को कभी बोया ही न जाए, यह सही नहीं है. हम ने नासमझी की, पर मेरा बेटा समझदार है और विद्या भी बहुत सुलझी हुई लड़की है. मुझे पूरा विश्वास है कि तुम दोनों

तभी पीछे से ईशा ने विवेक को छेड़ते हुए कहा, ‘‘क्यों विवेक भैया, एक बार फिर एक विश्वामित्र की तपस्या टूट ही गई.’’

विवेक और ध्रुव उस की बात पर जोर से हंस पड़े. विवेक ने विद्या के हाथों को ज्यों ही अपने हाथों में थामा, उस की नारी सुलभ लज्जा व गरिमा ने उस के सौंदर्य को अपरिमित कर दिया.

Holi 2024: क्या अपने आप को बचा पाई सुलेखा

सुलेखा की हाल ही में शादी हुई थी. होली के मौके पर वह पहली बार अपनी ससुराल में थी. होली को ले कर उस के मन में बहुत उमंगें थीं. वैसे तो वह गांव की रहने वाली थी, मगर शादी से पहले वह बहुत दिनों तक शहर में भी रह चुकी थी. होली के दिन सुबह से ही पूरा गांव होली के रंग में डूबा हुआ था. होली के रंग में प्यार का रंग मिला कर सुलेखा भी अपने पति दिनेश के साथ होली खेलने लगी.

दिनेश ने सुलेखा को रंगों से सराबोर कर दिया. नीलेपीले रंगों में लिपीपुती सुलेखा बंदरिया लग रही थी. इस तरह हंसीठिठोली के बीच दोनों ने होली मनाई. ‘‘मैं अपने दोस्तों के साथ होली खेलने जा रहा हूं. अगर मैं उन के साथ नहीं गया, तो वे मुझे जोरू का गुलाम कहेंगे. थोड़ी देर बाद आऊंगा,’’ यह कह कर दिनेश घर से निकल गया.

सुलेखा मुसकराते हुए पति को जाते हुए देखती रही. दरवाजा बंद कर के वह जैसे ही मुड़ी, तभी उस की नजर एक कोने में चुपचाप खड़े अपने देवर महेश पर पड़ी. ‘‘क्यों देवरजी, तुम इतनी दूर क्यों खड़े हो? क्या मुझ से होली खेलने से डरते हो? आओ मेरे पास और खेलो मुझ से होली…’’

‘‘तुम तो पहले से ही रंगों से लिपीपुती हो भाभी. इस पर मेरा रंग कहां चढ़ेगा…’’ महेश शरारत से बोला. ‘‘क्यों नहीं चढ़ेगा. क्या तुम्हारे मन में कोई ‘चोर’ है…’’ सुलेखा मुसकराते हुए बोली. ‘‘नहीं तो…’’ इतना कह कर महेश झेंप गया.

‘‘तो फिर होली खेलो. देवर से होली खेलने के लिए मैं बेकरार हूं…’’ कह कर सुलेखा ने महेश को रंग लगा दिया और फिर खिलखिलाते हुए बोली, ‘‘तुम तो बंदर लग रहे हो देवरजी.’’ महेश ने भी ‘होली है…’ कह कर सुलेखा के गालों पर गुलाल मल दिया.

भाभी से होली खेल कर महेश खुश हो गया. होली की खुशियां लूटने के बाद सुलेखा घर के कामों में जुट गई. थोड़ी देर बाद ही दिनेश अपने दोस्तों के साथ लौट आया और उन्हें आंगन में बैठा कर सुलेखा से बोला, ‘‘मेरे दोस्त तुम से होली खेलने आए हैं. तुम उन के साथ होली खेल लो.’’

‘‘मैं उन के साथ होली नहीं खेलूंगी.’’ ‘‘कैसी बातें करती हो? वे मेरे दोस्त हैं. थोड़ा सा रंग डालेंगे और चले जाएंगे. अगर तुम नहीं जाओगी, तो वे बुरा मान जाएंगे.’’

‘‘अच्छा, ठीक है…’’ सुलेखा उठ कर आंगन में चली आई. दिनेश के दोस्त नईनवेली खूबसूरत भाभी से होली खेलने के एहसास से ही रोमांचित हो रहे थे.

सुलेखा को देखते ही उन की आंखों में चमक आ गई. वे नशे में तो थे ही, उन्होंने आव देखा न ताव, सुलेखा पर टूट पड़े. कोई उस के गालों पर रंग मलने लगा, तो कोई चोली भिगोने लगा. कोई तो रंग लगाने के बहाने उस का बदन सहलाने लगा. दिनेश कोने में खड़ा हो कर यह तमाशा देख रहा था. उसे यह सब अच्छा तो नहीं लग रहा था, मगर वह दोस्तों को क्या कह कर मना करता. वह भी तो उन सब की बीवियों के साथ ऐसी ही होली खेल कर आ रहा था.

‘‘हटो, दूर हटो… रंग डालना है, तो दूर से डालो…’’ तभी सुलेखा उन्हें परे करते हुए दहाड़ कर बोली, ‘‘अरे, देवर तो भाई जैसे होते हैं. क्या वे भाभी के साथ इस तरह से होली खेलते हैं? कैसे इनसान हो तुम लोग? क्या तुम्हारे गांव में ऐसी ही होली खेली जाती है? अगर कोई लाजशर्म नहीं है, तो मैं नंगी हो जाती हूं, फिर जितना चाहे, मेरे बदन से होली खेल लेना…’’ सुलेखा के तेवर देख कर सभी पीछे हट गए. किसी अपराधी की तरह उन सब के सिर शर्म से झुक गए. किसी में भी सुलेखा से आंख मिलाने की हिम्मत न थी. उन का सारा नशा काफूर हो चुका था. थोड़ी देर में सारे दोस्त अपना सा मुंह ले कर चुपचाप चले गए. बीवी के इस रूप को दिनेश हैरानी से देखता रह गया.

‘‘यह क्या किया तुम ने…’’ दोस्तों के जाते ही दिनेश बोला. ‘‘मैं ने उन्हें होली का पाठ पढ़ाया और बिलकुल ठीक किया. आप भी अजीब आदमी हैं. दोस्तों की इतनी परवाह है, लेकिन मेरी नहीं…’’ सुलेखा ने कहा.

‘‘ऐसा क्यों कहती हो. मैं तो तुम से बहुत प्यार करता हूं.’’ ‘‘क्या यही है आप का प्यार… कोई आप की आंखों के सामने आप की बीवी के साथ छेड़खानी करे और आप चुपचाप खड़े हो कर तमाशा देखते रहें. कैसे पति हैं आप…

‘‘अब खड़ेखड़े मेरा मुंह क्या देख रहे हैं. जल्दी से 2 बालटी पानी लाइए, मैं नहाऊंगी.’’ दिनेश ने चुपचाप पानी ला कर रख दिया और सुलेखा कपड़े ले कर बाथरूम में घुस गई.

दरवाजा बंद करने से पहले जब सुलेखा ने दिनेश की तरफ मुसकरा कर देखा तो बीवी की इस अदा पर वह ठगा सा रह गया. ‘‘अंगअंग धो लूं जरा मलमल के बाण चलाऊंगी नैनन के… हर अंग का रंग निखार लूं कि सजना है मुझे सजना के लिए…’’ बाथरूम में नहाते हुए सुलेखा मस्ती में गुनगुनाने लगी. बाहर खड़े दिनेश को अपनी बीवी पर नाज हो रहा था.

Holi 2024: क्या करें जब आंख, कान या मुंह में चला जाए रंग?

रंगों का त्योहार अब ज्यादा दूर नहीं रहा. होली के हफ्ते पहले से इसका नशा लोगों पर छाने लगता है. इसका जोश, उल्लास लोगों पर इस कदर छाता है कि दिन हो या रात कभी भी रंग की बौछार होने लगती है. ऐसे में आंख, कान और नाक का खासा ख्याल रखने की जरूरत है.

लोग अचानक से चेहरे पर रंग लगा देते हैं. अधिकतर समय हम इसके लिए तैयार नहीं होते और रंग हमारी आंखों में, नाक और कान में चले जाते हैं. इन अंगों समेत त्वचा पर भी इसका बुरा असर होता है. ऐसे में जरूरी है कि हम सावधान रहें और कुछ खास बातों को हमेशा ध्यान में रखें, जिससे आपकी मौज मस्ती फीकी ना पड़े और आप इस त्योहार को अच्छे से एंजौय कर सकें.

तो आइए शुरू करें

जब आंख में चला जाए रंग

शरीर के संवेदनशील अंगों में, खास कर के आंख, और कान में रंगों के जाने से परेशानी हो सकती है. आंख में रंग जाने से जलन होती है, इसके असर को कम करने के लिए आंख को अच्छे से पानी से धोएं. इसके बाद आंख में गुवाबजल डालें. इससे आपको ठंडक मिलेगी.

इससे बचने के लिए कोशिश करें कि गौगल लगा कर होली खेलें. इससे आपकी लुक जंचेगी

जब कान में चला जाए रंग 

जिस कान में रमग जाए उस ओर से लेट जाएं. ऐसा करने से पूरा रंग धीरे धीरे बाहर आ जाएगा. इसके बाद कान के बाहरी हिस्से को अच्छे से धो लें.

जब मुंह में चला जाए रंग

मुंह में रंग जाने से जीभ का स्वाद खराब होता है और उल्टी होती है. ऐसी स्थिति में अच्छे से कुल्ला करें और जब रंगों की कड़वाहट कम हो तो कुछ मीठा खाएं. इससे आपको अच्छा लगेगा.

हर्बल रंगों का करें प्रयोग

safety tips of holi

हर्बल रंगों का ही प्रयोग करें. बाजार में ज्यादातर जगहों पर सिंथेटिक कलर मिलते हैं, त्वचा के लिए और हमारे अंगों के लिए ये हानिकारक होते हैं. ये सस्ते और खतरनाक रसायन से बने होते हैं. ऐसे में इनके प्रयोग से बचें और लोगों को भी जागरुक करें.

खूब लगाएं तेल

safety tips of holi

रंग खेलने से पहले त्वचा पर खूब तेल लगा लें. इससे रंगों में पाए जाने वाले रसायनों से हम सुरक्षित रहते हैं और रंग आसानी से छूट भी जाते हैं. तेल की जगह आप पेट्रोलियम जेली का भी इस्तेमाल कर सकते हैं.

ना खेलें गुब्बारे वाली होली

safety tips of holi

गुब्बारे वाली होली से बचें. ये त्वचा के लिए और आंखों के लिए खतरनाक होता है. गुब्बारे में रंग डाल कर फेंकने से त्वचा पर चोट लगती है. कई बार गुब्बारे से आंख में गंभीर चोट लग जाती है. ऐसे में सतर्क रहें और संभल कर होली खेलें.

आंख, कान और नाक बेहद संवेदनशील अंग होते हैं. लापरवाही से बचें, स्वस्थ और सुरक्षित होली खेलें.

Holi 2024: जब बहू चुनने में हुई सरला से गलती

किचन में खड़ा हो कर खाना बनातेबनाते सरला की कमर दुखने लगी पर वे क्या करें, इतने मेहमान जो आ रहे हैं. बहू की पहली दीवाली है. कल तक उसे उपहार ले कर मायके जाना था पर अचानक बहू की मां का फोन आ गया कि अमेरिका से उन का छोटा भाई और भाभी आए हुए हैं. वे शादी पर नहीं आ सके थे इसलिए वे आप सब से मिलना चाहते हैं. उन्हीं के साथ बहू के तीनों भाई व भाभियां भी अपने बच्चों के साथ आ रहे हैं.

कुकर की सीटी बजते ही सरला ने गैस बंद कर दी और ड्राइंगरूम में आ गईं. बहू आराम से बैठ कर गिफ्ट पैक कर रही थी.

‘‘अरे, मम्मी देखो न, मैं अपने भाईभाभियों के लिए गिफ्ट लाई हूं. बस, पैक कर रही हूं…आप को दिखाना चाहती थी पर जल्दी है, वे लोग आने वाले हैं इसलिए पैक कर दिए,’’ बहू ने कुछ पैक किए गिफ्ट की तरफ इशारा करते हुए कहा. तभी सरलाजी का बेटा घर में दाखिल हुआ और अपनी पत्नी से बोला, ‘‘सिमी, एक कप चाय बना लाओ. आज आफिस में काफी थक गया हूं.’’

‘‘अरे, आप देख नहीं रहे हैं कि मैं गिफ्ट पैक कर रही हूं. मां, आप ही बना दीजिए न चाय. मुझे अभी तैयार भी होना है. मेरी छोटी भाभी बहुत फैशनेबल हैं. मुझे उन की टक्कर का तैयार होना है,’’ इतना कह कर सिमी अपने गिफ्ट पैक करने में लग गई.

शाम को सरलाजी के ड्राइंगरूम में करीब 10-12 लोग बैठे हुए थे. उन में बहू के तीनों भाई, उन की बीवियां, बहू के मम्मीपापा, भाई के बच्चे और उन सब के बीच मेहमानों की तरह उन की बहू सिमी बैठी थी. सरला ने इशारे से बहू को बुलाया और रसोईघर में ले जा कर कहा, ‘‘सिमी, सब के लिए चाय बना दे तब तक मैं पकौड़े तल लेती हूं.’’

‘‘क्या मम्मी, मायके से परिवार के सारे लोग आए हैं और आप कह रही हैं कि मैं उन के साथ न बैठ कर यहां रसोई में काम करूं? मैं तो कब से कह रही हूं कि आप एक नौकर रख लो पर आप हैं कि बस…अब मुझ से कुछ मत करने को कहिए. मेरे घर वाले मुझ से मिलने आए हैं, अगर मैं यहां किचन में लगी रहूंगी तो उन के आने का क्या फायदा,’’ इतना कह कर सिमी किचन से बाहर निकल गई और सरला किचन में अकेली रह गईं. उन्होंने शांत रह कर काम करना ही उचित समझा.

सरलाजी ने जैसेतैसे चाय और पकौड़े बना कर बाहर रख दिए और वापस रसोई में खाना गरम करने चली गईं. बाहर से ठहाकों की आवाजें जबजब उन के कानों में पड़तीं उन का मन जल जाता. सरला के पति एकदो बार किचन में आए सिर्फ यह कहने के लिए कि कुछ रोटियों पर घी मत लगाना, सिमी की भाभी नहीं खाती और खिलाने में जल्दी करो, बच्चों को भूख लगी है.

सरलाजी का खून तब और जल गया जब जातेजाते सिमी की मम्मी ने उन से यह कहा, ‘‘क्या बहनजी, आप तो हमारे साथ जरा भी नहीं बैठीं. कोई नाराजगी है क्या?’’

सब के जाने के बाद सिमी तो तुरंत सोने चली गई और वे रसोई संभालने में लग गईं.

अगले दिन सरलाजी का मन हुआ कि वे पति और बेटे से बीती शाम की स्थिति पर चर्चा करें पर दोनों ही जल्दी आफिस चले गए. 2 दिन बाद फिर सिमी की एक भाभी घर आ गई और उस को अपने साथ शौपिंग पर ले गई. शादी के बाद से यह सिलसिला अनवरत चल रहा था. कभी किसी का जन्मदिन, कभी किसी की शादी की सालगिरह, कभी कुछ तो कभी कुछ…सिमी के घर वालों का काफी आनाजाना था, जिस से वे तंग आ चुकी थीं.

एक दिन मौका पा कर उन्होंने अपने पति से इस बारे में बात की, ‘‘सुनो जी, सिमी न तो अपने घर की जिम्मेदारी संभालती है और न ही समीर का खयाल रखती है. मैं चाहती हूं कि उस का अपने मायके आनाजाना कुछ कम हो. शादी को साल होने जा रहा है और बहू आज भी महीने में 7 दिन अपने मायके में रहती है और बाकी के दिन उस के घर का कोई न कोई यहां आ जाता है. सारासारा दिन फोन पर कभी अपनी मम्मी से, कभी भाभी तो कभी किसी सहेली से बात करती रहती है.’’

‘‘देखो सरला, तुम को ही शौक था कि तुम्हारी बहू भरेपूरे परिवार की हो, दिखने में ऐश्वर्या राय हो. तुम ने खुद ही तो सिमी को पसंद किया था. कितनी लड़कियां नापसंद करने के बाद अब तुम घर के मामले में हम मर्दों को न ही डालो तो अच्छा है.’’

सरलाजी सोचने लगीं कि इन की बात भी सही है, मैं ने कम से कम 25 लड़कियों को देखने के बाद अपने बेटे के लिए सिमी को चुना था. तभी पति की बातों से सरला की तंद्रा टूटी. वे कह रहे थे, ‘‘सरला, तुम कितने दिनों से कहीं बाहर नहीं गई. ऐसा करो, तुम अपनी बहन के घर हो आओ. तुम्हारा मन अच्छा हो जाएगा.’’

अपनी बहन से मिल कर अपना दिल हलका करने की सोच से ही सरला खुश हो गईं. अगले दिन ही वे तैयार हो कर अपनी बहन से मिलने चली गईं, जो पास में ही रहती थीं. पर बहन के घर पर ताला लगा देख कर उन का मन बुझ गया. तभी बहन की एक पड़ोसिन ने उन्हें पहचान लिया और बोलीं, ‘‘अरे, आप सरलाजी हैं न विभाजी की बहन.’’

‘‘जी हां, आप को पता है विभा कहां गई है?’’

‘‘विभाजी पास के बाजार तक गई हैं. आप आइए न.’’

‘‘नहींनहीं, मैं यहीं बैठ कर इंतजार कर लेती हूं,’’ सरला ने संकोच से कहा.

‘‘अरे, नहीं, सरलाजी आप अंदर आ कर इंतजार कर लीजिए. वे आती ही होंगी,’’ उन के बहुत आग्रह पर सरलाजी उन के घर चली गईं.

‘‘आप की तसवीर मैं ने विभाजी के घर पर देखी थी…आइए न, शिखा जरा पानी ले आना,’’ उन्होंने आवाज लगाई.

अंदर से एक बहुत ही प्यारी सी लड़की बाहर आई.

‘‘बेटा, देखो, यह सरलाजी हैं, विभाजी की बहन,’’ इतना सुनते ही उस लड़की ने उन के पैर छू लिए.

सरला ने उसे मन से आशीर्वाद दिया तो विभा की पड़ोसिन बोलीं, ‘‘यह मेरी बहू है, सरलाजी.’’

‘‘बहुत प्यारी बच्ची है.’’

‘‘मम्मीजी, मैं चाय रखती हूं,’’ इतना कह कर वह अंदर चली गई. सरला ने एक नजर घुमाई. इतने सलीके से हर चीज रखी हुई थी कि देख कर उन का मन खुश हो गया. कितनी संस्कारी बहू है इन की और एक सिमी है.

‘‘बहनजी, विभा दीदी आप की बहुत तारीफ करती हैं,’’ मेरा ध्यान विभा की पड़ोसिन पर चला गया. इतने में उन की बहू चायबिस्कुट के साथ पकौड़े भी बना कर ले आई और बोली, ‘‘लीजिए आंटीजी.’’

‘‘हां, बेटा…’’ तभी फोन की घंटी बज गई. पड़ोसिन की बहू ने फोन उठाया और बात करने के बाद अपनी सास से बोली, ‘‘मम्मी, पूनम दीदी का फोन था. शाम को हम सब को खाने पर बुलाया है पर मैं ने कह दिया कि आप सब यहां बहुत दिनों से नहीं आए हैं, आप और जीजाजी आज शाम खाने पर आ जाओ. ठीक कहा न.’’

‘‘हां, बेटा, बिलकुल ठीक कहा,’’ बहू किचन में चली गई तो विभा की पड़ोसिन मुझ से बोलीं, ‘‘पूनम मेरी बेटी है. शिखा और उस में बहुत प्यार है.’’

‘‘अच्छा है बहनजी, नहीं तो आजकल की लड़कियां बस, अपने रिश्तेदारों को ही पूछती हैं,’’ सरला ने यह कह कर अपने मन को थोड़ा सा हलका करना चाहा.

‘‘बिलकुल ठीक कहा बहनजी, पर मेरी बहू अपने मातापिता की अकेली संतान है. एकदम सरल और समझदार. इस ने यहां के ही रिश्तों को अपना बना लिया है. अभी शादी को 5 महीने ही हुए हैं पर पूरा घर संभाल लिया है,’’ वे गर्व से बोलीं.

‘‘बहुत अच्छा है बहनजी,’’ सरला ने थोड़ा सहज हो कर कहा, ‘‘अकेली लड़की है तो अपने मातापिता के घर भी बहुत जाती होगी. वे अकेले जो हैं.’’

‘‘नहीं जी, बहू तो शादी के बाद सिर्फ एक बार ही मायके गई है. वह भी कुछ घंटे के लिए.’’

हम बात कर ही रहे थे कि बाहर से विभा की आवाज आई, ‘‘शिखा…बेटा, घर की चाबी दे देना.’’

विभा की आवाज सुन कर शिखा किचन से निकली और उन को अंदर ले आई. शिखा ने खाने के लिए रुकने की बहुत जिद की पर दोनों बहनें रुकी नहीं. अगले ही पल सरलाजी बहन के घर आ गईं. विभा के दोनों बच्चे अमेरिका में रहते थे. वह और उस के पति अकेले ही रहते थे.

‘‘दीदी, आज मेरी याद कैसे आ गई?’’ विभा ने मेज पर सामान रखते हुए कहा.

‘‘बस, यों ही. तू बता कैसी है?’’

‘‘मैं तो ठीक हूं दीदी पर आप को क्या हुआ कि कमजोर होती जा रही हो,’’ विभा ने कहा. शायद सरला की परेशानियां उस के चेहरे पर भी झलकने लगी थीं.

‘‘आंटीजी, आज मैं ने राजमा बनाया है. आप को राजमा बहुत पसंद है न. आप तो खाने के लिए रुकी नहीं इसलिए मैं ले आई और इन्हें किचन में रख रही हूं,’’ अचानक शिखा दरवाजे से अंदर आई, किचन में राजमा रख कर मुसकराते हुए चली गई.

‘‘बहुत प्यारी लड़की है,’’ सरला के मुंह से अचानक निकल गया.

‘‘अरे, दीदी, यही वह लड़की है जिस की बात मैं ने समीर के लिए चलाई थी. याद है न आप को इन के आफिस के एक साथी की बेटी…दीदी आप को याद नहीं आया क्या…’’ विभा ने सरला की याददाश्त पर जोर डालने को कहा.

‘‘अरे, दीदी, जिस की फोटो भी मैं ने मंगवा ली थी, पर इस का कोई भाई नहीं था, अकेली बेटी थी इसलिए आप ने फोटो तक नहीं देखी थी.’’

विभा की बात से सरला को ध्यान आया कि विभा ने उन से इस लड़की के बारे में कहा था पर उन्होंने कहा था कि जिस घर में बेटा नहीं उस घर की लड़की नहीं आएगी मेरे घर में, क्योंकि मातापिता कब तक रहेंगे, भाइयों से ही तो मायका होता है. तीजत्योहार पर भाई ही तो आता है. यही कह कर उन्होंने फोटो तक नहीं देखी थी.

‘‘दीदी, इस लड़की की फोटो हमारे घर पर पड़ी थी. श्रीमती वर्मा ने देखी तो उन को लड़की पसंद आ गई और आज वह उन की बहू है. बहुत गुणी है शिखा. अपने घर के साथसाथ हम पतिपत्नी का भी खूब ध्यान रखती है. आओ, चलो दीदी, हम खाना खा लेते हैं.’’

राजमा के स्वाद में शिखा का एक और गुण झलक रहा था. घर वापस आते समय सरलाजी को अपनी गलती का एहसास हो रहा था कि लड़की के गुणों को अनदेखा कर के उन्होंने भाई न होने के दकियानूसी विचार को आधार बना कर शिखा की फोटो तक देखना पसंद नहीं किया. इस एक चूक की सजा अब उन्हें ताउम्र भुगतनी होगी.

Holi 2024: इस साल होली पर बनाएं गोल गुझिया

गुझिया के सामान्य आकार से अलग गोल आकार की गुझिया अब लोगों को पसंद आने लगी है. गोल गुझिया बनाने के लिए अच्छे किस्म के गेहूं के मैदे का प्रयोग किया जाता है. उत्तर प्रदेश के सभी छोटेबड़े जिलों में यह मिठाई खूब बिकती है. गुझिया पूरे साल बाजार में मौजूद रहती है.

त्योहारों पर बंगाली मिठाइयों के साथ इस का सीधा मुकाबला होता है. अपने रसीले स्वाद के चलते इस की बहुत मांग रहती है. यह कई दिनों ताक खराब नहीं होती है. इस कारण लोग इसे ज्यादा मात्रा में खरीद कर घर लाते हैं और इसे गरम कर के भी खाते हैं.

गोल गुझिया बनाने के लिए किसी बड़े कारीगर की जरूरत नहीं होती. यह बेहद आसानी से बनाई जा सकती है. गोल गुझिया बनाने में सब से मेहनत का काम इसे सही आकार देने का होता है. यह लंबे समय तक रखी जा सकती है.

कैसे बनाएं गोल गुझिया

सामग्री :

200 ग्राम मैदा,

250 ग्राम खोया,

1 किलोग्राम चीनी,

20 ग्राम मिश्री,

10 बादाम,

20 पिस्ते,

5 छोटी इलायची,

आधा चम्मच केसर,

2 चांदी के वर्क,

तलने के लिए जरूरत के हिसाब से तेल या घी.

विधि :

  • गोल गुझिया तैयार करने के लिए पहले बादाम और पिस्ते छील कर महीन काट लें.
  • इलायची छील कर महीन कूट लें.
  • मिश्री के दाने चने की दाल के आकार में तोड़ लें.
  • खोया कस लें और उस में मेवा, मिश्री, इलायची और केसर मिला लें.
  • इस मिश्रण के 8 हिस्से कर दें. 
  • मैदे में घी डाल कर कड़ा गूंध लें.
  • इस की समान आकार की 16 लोइयां बना लें. हर लोई को 3 इंच गोल बेल लें.
  • एक पूरी पर एक हिस्सा मसाला रख कर दूसरी पूरी से ढक दें.
  • इस के बाद इस के किनारों को हाथ की उंगलियों के सहारे गूथ दें. ऊपर और नीचे की पूरियों को एकदूसरे से मिला दें. 
  • गुझिया के किनारे देखने में गोल रस्सी जैसे लगेंगे. यही काम थोड़ा कठिन होता है.
  • इस के बाद चीनी की 1 तार की चाशनी बना लें.
  • घी गरम कर के मध्यम आंच पर गुझियों को गुलाबी होने तक तलें.
  • इस के बाद उन्हें कड़ाही से निकाल कर तुरंत गरम चाशनी में डाल दें.
  • गुझियों को 15 से 20 मिनट तक चाशनी में पलटते रहें.
  • इस के बाद उन को बाहर निकाल लें और उन पर चांदी का वर्क लगा दें.

अलग स्वाद देती है गरमगरम गुझिया

  • गोल आकार वाली गुझिया काफी पसंद की जाने वाली मिठाई है. इस के अंदर मेवे वाला मसाला भरा होता है, जिस से खाने का अलग स्वाद आता है. इसे गरम खाने में ज्यादा मजा आता है.
  • जिन लोगों के पास ओवन है, वे इस का मजा गरम खा कर ले सकते हैं. इस के अलावा जो लोग ऐसे ही खाना चाहते हैं, उन को भी इस का स्वाद पसंद आता है. मिठाई की दुकान से यह गरम ही दी जाती है.
  • जो लोग इसे अपने शहर से दूर ले जाना चाहते हैं, उन के लिए यह सुविधाजनक होती है. इस का रस अंदर भरा रहता है. ऐसे में यह खराब नहीं होती है. यह सभी उम्र के लोगों को पसंद आती है.
  • जिन लोगों को ज्यादा चीनी वाली मिठाई खाने से परहेज होता है, उन के लिए शुगरफ्री गुझिया भी कई मिठाई की दुकानों में मिलने लगी है. 

जरूरी है सही आकार

  • गोल गुझिया बनाने में खास ध्यान रखने वाली बात यह होती है कि यह कहीं से खुले नहीं.
  • अगर यह खुल जाएगी तो अंदर भरा हुआ मेवा बाहर निकल आएगा और यह देखने में अच्छी नहीं लगेगी.
  • साथ ही साथ जिस तेल में  तली जाएगी वह भी खराब हो जाएगा.
  • इस का आकार भी सही होना चाहिए. इसे पूरी तरह गोल आकार में बनाना चाहिए. ऊपर और नीचे की दोनों गोल आकार वाली पूरियों को ऐसे मिलाना चाहिए, जिस से यह देखने में अच्छी लगे.
  • मोड़े हिस्से पर चाशनी रुक जाती है, जिस से गोल गुझिया रसीली दिखती है.

Holi 2024: घर पर इन 9 तरीकों से बनाएं हर्बल रंग

बिना रंगों यानी गुलाल के होली का आंनद नहीं आता. लेकिन होली में कैमिकल रंगों के बढ़ते प्रभाव से लोगों में होली के प्रति आकर्षण खत्म होता जा रहा है. बाजार में बिकने वाले हर्बल कलर महंगे होने के कारण आम लोगों की पहुंच से दूर होते हैं. ऐसे में घर पर भी हर्बल कलर तैयार किए जा सकते हैं.

स्किन पर होता है असर

कैमिकल कलर से सैंसिटिव स्किन ज्यादा प्रभावित होती है. कई बार स्किन पर लाल रंग के चकत्ते पड़ जाते हैं, खुजली होने लगती है. खुजली करने से स्किन फट जाती है और खून निकलने लगता है. ज्यादा प्रभाव होता है तो यह परेशानी लंबे समय तक बनी रह सकती है.

बालों को भी पहुंचता है नुकसान

केवल स्किन ही नहीं, बालों को भी कैमिकल कलर से बहुत नुकसान होता है. कैमिकल कलर बालों के साथ स्कैल्प की स्किन को नुकसान पहुंचाता है. वहां पर फंगल इन्फैक्शन से ले कर खुजली तक कुछ भी हो सकता है. स्किन में इन्फैक्शन से बालों की जड़ें कमजोर हो सकती हैं जिस से बालों के झड़ने की परेशानी शुरू हो सकती है. इस से बचने के लिए जरूरी है कि रंग खेलते समय बालों को ढक कर रखें.

ऐसे बनाएं हर्बल रंग

1 हल्दी और बेसन को मिला कर पीला रंग तैयार कर सकते हैं.

2 गुलमोहर की पत्तियों को पीस कर नीला गुलाल तैयार हो सकता है. ये प्राकृतिक रंग त्वचा के लिए पूरी तरह से सुरक्षित होते हैं.

3 होली में पीले रंग का अपना महत्त्व होता है. पीला रंग बनाने के लिए एक टी स्पून हल्दी में 4 टी स्पून बेसन मिला कर पीला रंग तैयार कर सकते हैं.

4 गेंदे या टेसू के फूल की पंखुडि़यों को पानी में उबाल कर प्राकृतिक पीला रंग बनाया जा सकता है.

5 होली का दूसरा सब से खास रंग गुलाबी होता है. इस को बनाने के लिए चुकंदर के टुकड़े काट कर पानी में भिगो कर गहरा गुलाबी रंग बनाया जा सकता है.

6 प्याज के छिलकों को पानी में उबाल कर भी गुलाबी रंग बनाया जा सकता है.

7 गुलाबी रंग से मिलता हुआ लाल रंग बनाने के लिए लाल चंदन के पाउडर को लाल रंग के तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं.

8 हरा रंग बनाने के लिए मेहंदी में बराबर मात्रा में आटा मिला कर रंग बना सकते हैं.

9 त्वचा पर सूखी मेहंदी लगने पर कोई नुकसान भी नहीं होता है. मेहंदी में पानी मिला कर गीला हरा रंग भी तैयार किया जा सकता है.

 

नागरिकता संशोधन कानून को लागू करने के पीछे मोदी सरकार की मंशा संदिग्ध

सीएए को भारत की संसद ने 11 दिसंबर, 2019 को पारित किया था. शुरू से ही यह कानून व्यापक बहस और विरोध का विषय रहा है. इस के खिलाफ बाकायदा आंदोलन हुए हैं. अब तक नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 200 से अधिक याचिकाएं दायर हो चुकी हैं. नागरिकता संशोधन अधिनियम के नियमों को लागू करने पर रोक लगाने की मांग को ले कर ये याचिकाएं दायर की गई हैं.
केरल सरकार पहली राज्य सरकार थी जिस ने 2020 में सीएए के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था और कहा था कि यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत ‘समानता के अधिकार’ के प्रावधानों के खिलाफ है. राज्य ने सीएए नियमों को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय में एक और मामला भी दायर किया था.

कानून को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं का यह भी कहना है कि सीएए धर्म के आधार पर मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव करता है. एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने अपनी याचिका में कहा है कि सीएए लागू करने के पीछे सरकार का असली मकसद एनआरसी के जरिए मुसलिम समुदाय को निशाना बनाना है, जिसे 2019 में अपडेट किया गया था.

याचिकाकर्ताओं में केरल की इंडियन यूनियन मुसलिम लीग, तृणमूल कांग्रेस की नेता महुआ मोइत्रा, कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश, औल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुसलिमीन प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी, कांग्रेस नेता देबब्रत सैकिया, एनजीओ रिहाई मंच और सिटीजन्स अगेंस्ट हेट, असम एडवोकेट्स एसोसिएशन और कानून के कुछ छात्र शामिल हैं. भारत के मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ इन तमाम याचिकाओं पर इकट्ठा सुनवाई करेगी. संसद से पारित होने के 4 वर्षों बाद इस के नियमों को ऐसे समय अधिसूचित करना सरकार की मंशा को संदिग्ध बनाता है, जब देश में लोकसभा चुनाव होने वाले हैं.

गौरतलब है कि सीएए के तहत 1955 के नागरिकता अधिनियम में संशोधन किया गया है और इस के जरिए अफगानिस्तान, बंगलादेश और पाकिस्तान के हिंदू, सिख, जैन, पारसी, बौद्ध और ईसाई समुदायों से भारत आने वाले उन प्रवासियों के लिए भारतीय नागरिकता प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त किया गया है जो अपने संबंधित देशों में धार्मिक उत्पीड़न का शिकार हैं और 31 दिसंबर, 2014 या उस से पहले भारत में प्रवेश कर चुके हैं.

केंद्र सरकार दावा करती है कि सीएए से नागरिकों के कानूनी, लोकतांत्रिक या धर्मनिरपेक्ष अधिकारों पर कोई असर नहीं पड़ेगा. सरकार ने शीर्ष अदालत से नागरिकता संशोधन कानून और उस के नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज करने का अनुरोध किया, जबकि वकील कपिल सिब्बल ने किसी को भी नागरिकता न देने की गुहार कोर्ट से लगाई है. इस पर कोर्ट ने केंद्र सरकार को अपना पक्ष रखने के लिए नोटिस जारी कर 3 हफ्ते का समय दिया है. केंद्र को यह बताना होगा कि सीएए को क्यों न खारिज किया जाए. इस पर अगली सुनवाई 9 अप्रैल को होगी.

गौरतलब है कि नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 2019, दिसंबर 2019 में संसद में पारित किया गया था. गृहमंत्री अमित शाह ने 9 दिसंबर को इसे लोकसभा में पेश किया था. नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 2019 (सीएए) संसद में 11 दिसंबर, 2019 को पारित किया गया था. सीएए के पक्ष में 125 वोट पड़े थे और 105 वोट इस के खिलाफ गए थे. 12 दिसंबर, 2019 को इसे राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई थी. मगर राष्ट्रपति से मंजूरी मिलने के बाद देश के विभिन्न राज्यों में सीएए को ले कर जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हुआ, खासतौर पर पश्चिम बंगाल में, जिस के चलते इसे लागू नहीं किया जा सका.
सीएए के साथ ही केंद्र सरकार ने देशभर में एनआरसी लागू करने की बात भी कही थी. एनआरसी के तहत भारत के नागरिकों का वैध दस्तावेज के आधार पर रजिस्ट्रेशन होना था. सीएए के साथ एनआरसी को मुसलमानों की नागरिकता खत्म करने के रूप में देखा गया था. लेकिन फिलहाल केवल सीएए को ही लागू किया गया है. लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र राम मंदिर का मुद्दा ठंडा पड़ने के बाद चूंकि बीजेपी के हाथ अब खाली हो गए थे, लिहाजा काफी सोचसमझ कर सीएए पर दांव खेला गया है.

इस कानून के लागू होने से बंगलादेश से आए मतुआ, राजवंशी और नामशूद्र समुदाय के हिंदू शरणार्थियों को भारत की नागरिकता मिल जाएगी और बीजेपी इस को अपने वोटबैंक में बदल सकेगी. बंगलादेश से लगी अंतर्राष्ट्रीय सीमा के पास के जिलों में इन समूहों का जबरदस्त बसाव है और वे लंबे समय से भारतीय नागरिकता की मांग करते रहे हैं.

देश का बंटवारा होने और बाद के वर्षों में बंगलादेश से आ कर बंगाल के सीमाई इलाकों में बसे मतुआ समुदाय की आबादी राज्य की आबादी की 10 से 20 फ़ीसदी है. राज्य के दक्षिणी हिस्से की 5 लोकसभा सीटों में उन की खासी आबादी है, जहां से 2 सीटों- गोगांव और रानाघाट पर 2019 में भाजपा को जीत हासिल हुई थी. 2019 के चुनाव से ऐन पहले प्रधानमंत्री मोदी ने मतुआ समुदाय के लोगों के बीच पहुंच कर उन्हें संबोधित किया था.

इसी तरह उत्तरी बंगाल के जिस इलाके में राजवंशी और नामशूद्र की आबादी का बसाव है, वहां भी भाजपा ने 2019 में 3 सीटों पर जीत दर्ज की थी. जलपाईगुड़ी, कूचविहार और बालुरघाट संसदीय सीट पर इन हिंदू शरणार्थियों की आबादी करीब 40 लाख से ऊपर है. इस बड़े वोटबैंक का फायदा उठाने की नीयत से ही मोदी सरकार ने सीएए का दांव खेला है.

राज्य के दक्षिणी क्षेत्र में करीब 30-35 विधानसभा क्षेत्रों में मतुआ समुदाय की आबादी 40 फीसदी के करीब है. ये विधानसभा इलाके 5 से 6 लोकसभा क्षेत्रों के तहत आते हैं. यानी इतनी सीटों पर मतुआ समुदाय हार-जीत का आंकड़ा तय कर सकता हैं. इन को भारतीय नागरिकता मिलने पर नि:संदेह इन का वोट बीजेपी की झोली में जाएगा.

आम चुनाव 2024 : केरल जहां खाता खोलने तरस रही है भाजपा

केरल के वोटर को न हिंदू राष्ट्र से कोई सरोकार है और न ही राम, कृष्ण या काशी और मथुरा वगैरह से लोगों को कोई लेनादेना है. इस खूबसूरत राज्य की 20 लोकसभा सीटों पर इस बार भी लड़ाई दो फ्रंटों की आड़ में कांग्रेस और माकपा के बीच है, ठीक वैसे ही जैसे कभी पश्चिम बंगाल में हुआ करती थी. भाजपा मुद्दत से केरल में सेंधमारी की कोशिश कर रही है लेकिन उस का हिंदुत्व और मंदिर कार्ड यहां परवान नहीं चढ़ पा रहा.

लाख कोशिशों के बाद भी भाजपा केरल में क्यों पांव नहीं जमा पा रही, इस सवाल के 2 संभावित जवाब हैं, पहला तो यह कि वहां शिक्षितों और जागरूकों की संख्या ज्यादा है जो धर्म की राजनीति के सामाजिक खतरे समझते उस से परहेज करते हैं. दूसरा यह है कि केरल देश का इकलौता राज्य बचा है जिस में मार्क्सवाद और कम्युनिज्म जिंदा है. 20 लोकसभा सीटों वाले केरल में 2019 के चुनाव के दौरान उस वक्त खासी हलचल मच गई थी जब राहुल गांधी के वायनाड सीट से लड़ने की घोषणा हुई थी. अमेठी की संभावित हार के मद्देनजर कांग्रेस के रणनीतिकारों का यह फैसला सटीक और कारगर भी रहा था.

राहुल गांधी ने सीपीआई के पी पी सुनीर को 4 लाख 31 हजार से भी ज्यादा वोटों से हरा कर 2,461 किलोमीटर दूर दिल्ली जा पहुंचे थे. उन के वायनाड से लड़ने का दोहरा फायदा कांग्रेस और उस के सहयोगी यूडीएफ यानी यूनाइटेड डैमोक्रेटिक फ्रंट को मिला था. ये दोनों 20 में से 19 सीट ले गए थे. माकपा और एलडीएफ यानी लैफ्ट डैमोक्रेटिक फ्रंट के खाते में महज एक सीट आई थी. भाजपा और एनडीए को कोई सीट नहीं मिली थी. 47.48 फीसदी वोट ले जाने वाले यूडीएफ में कांग्रेस को 37.46 फीसदी वोट शेयर के साथ 15 सीटें मिली थीं. मुसलिम लीग को 5.48 फीसदी वोटों के साथ 2 और केरल कांग्रेस व रिवोल्यूशनरी पार्टी के हिस्से में एकएक सीट आई थी. इन दोनों का वोट शेयर 4 फीसदी के लगभग था.

एलडीएफ का वोट शेयर 36.29 फीसदी था जिस में बड़ा हिस्सा इकलौती सीट अलपुझा जीतने वाली सीपीआईएम का 25.97 फीसदी था. एनडीए के सब से बड़े दल भाजपा को कुल 13 फीसदी वोट मिले थे. जाहिर है, सीधा मुकाबला यूडीएफ और एलडीएफ के बीच था. चुनाव में होने भर की रस्म अदा कर रहा एनडीए उम्मीदवार सिर्फ तिरुवनंतपुरम सीट पर दूसरे नंबर पर था जहां से कांग्रेसी दिग्गज शशि थरूर एक लाख से कुछ ही कम वोटों से जीते थे. 140 विधानसभा क्षेत्रों में से यूडीएफ 123 पर आगे रही थी जबकि एलडीएफ को महज 16 सीटों पर ही बढ़त हासिल हुई थी. एनडीए एक ही विधानसभा सीट पर लीड ले पाया था.

लोकसभा और विधानसभा चुनावों के मुद्दे और वोटर का मूड कितना अलग होता है, यह 2 साल बाद ही हुए विधानसभा चुनाव से समझ आया था जब लोकसभा चुनाव में क्लीन स्वीप करने वाला यूडीएफ महज 41 सीटों पर जीत दर्ज कर पाया था. उलट इस के, एलडीएफ ने 99 सीटें जीत ली थीं और पी विजयन मुख्यमंत्री बने थे. विधानसभा चुनाव में भी एनडीए खाता खोलने को तरस गया था खासतौर से भाजपा, जो एक विधानसभा सीट पर भी अपनी बढ़त कायम नहीं रख पाई थी.

साफ दिख रहा है कि पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को राहुल गांधी की वायनाड से उम्मीदवारी का फायदा मिला था. वरना तो 2014 के लोकसभा चुनाव में उसे केरल में केवल 8 सीटें 31.10 फीसदी वोटों के साथ मिली थीं. यूडीएफ को 12 सीटें 41.98 फीसदी वोटों के साथ मिली थीं. एलडीएफ को सीटें 40.12 फीसदी वोटों के साथ मिली थीं. एनडीए को तब 10.82 फीसदी वोट मिले थे और वह खाता तब भी नहीं खोल पाया था.

इस बार कुछ चमत्कार होगा, ऐसा लग नहीं रहा क्योंकि सीधा मुकाबला दोनों फ्रंटों के बीच ही है. राहुल गांधी दोबारा वायनाड से मैदान में हैं जिस का कितना फायदा कांग्रेस और यूडीएफ को मिलता है, यह 4 जून को ही पता चलेगा. लेकिन यह साफ दिख रहा है कि भाजपा अभी भी हवा में हाथपांव मार रही है. बीती 16 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पथनमपिट्टा की सार्वजनिक सभा एक फ्लौप शो ही साबित हुई थी जिस में उन्होंने एलडीएफ और यूडीएफ दोनों को बराबरी से कोसा. यहां उन्होंने राममंदिर और धर्म का जिक्र नहीं किया क्योंकि उन्हें बेहतर मालूम है कि केरल में यह टोटका नहीं चलने वाला. केरल ही नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण भारत में वे इन मुद्दों से बचते दिखाई देते हैं जिस की वजह साफ है कि वहां का हिंदुत्व हिंदीभाषी राज्यों के उन के हिंदुत्व से अलग है.

केरल में शैव भी हैं और वैष्णव भी हैं लेकिन वे खुद को मलयाली हिंदू कहलाना ज्यादा पसंद करते हैं बजाय सनातनी हिंदू के, उन के धार्मिक संस्कार और रीतियां भी उत्तर भारत के हिंदुओं से अलग हैं. जिन आदि शंकराचार्य की देशभर में मूर्तियां भाजपा गढ़ रही है वे केरल के ही थे लेकिन वे चूंकि नंबूधिरी या नम्बूदरी थे, इसलिए भी भाजपा उन की जाति या समुदाय का जिक्र करने से बचती है.

नंबूधिरी पौराणिक कथाओं में कावेरी और कृष्णा नदी का तो जिक्र आता है लेकिन गंगा और नर्मदा वगैरह का नहीं, जिस से लगता है कि न केवल केरल बल्कि पूरे दक्षिण भारत का हिंदुत्व एक भिन्न चीज है जिस में न रामचरित मानस है, न गीता है और न ही विष्णु के अवतार आराध्य आदर्श या नायक हैं. जबकि जातपांत और छुआछूत या शूद्र प्रताड़ना के मामले में केरल किसी से उन्नीस नहीं.

 

यूसीसी बना बड़ा चुनावी मुद्दा

चर्च के पादरी भी हिंसा के शिकार हो रहे हैं, यह कहते नरेंद्र मोदी ने 19 फीसदी ईसाईयों को लुभाने की असफल कोशिश की, असफल इसलिए कि अकसर हिंदूवादी संगठनों के कार्यकर्ताओं की झड़प ईसाईयों से ही होती है (इस लिहाज से उनका यह कहना गलत नहीं था) झड़प का हिंसक या अहिंसक होना, न होना वक्त की बात है. लंबे वक्त से भगवा गैंग केरल में ईसाईयों को घेरने के जतन में लगा है लेकिन उन के प्रति अपनी नफरत न छोड़ पाने से कामयाब नहीं हो पा रहा.

केरल में नरेंद्र मोदी सीएए पर भी नजरें चुराते नजर आए, जिस का विरोध बड़ा चुनावी मुद्दा बन चुका है. दोनों फ्रंट सीएए को ले कर भाजपा पर हमलावर हैं जिस का फायदा भी उन्हें मिलना तय है. लेकिन किस को कितना फायदा मिला, यह नतीजे बताएंगे. केरल में हिंदुओं की अबादी 54.73 फीसदी है जिसे यूसीसी से कोई खास लेनादेना नहीं. लेकिन 26.56 फीसदी मुसलिमों में इसे ले कर ख़ासा गुस्सा और दहशत है. एलडीएफ और यूडीएफ दोनों ही सीएए के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं. मुख्यमंत्री पिनराई विजयन इसे विभाजनकारी बताते इसे राज्य में लागू न करने का भरोसा दिला रहे हैं. उन के मुताबिक नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक मानता है.

एलडीएफ के संयोजक ई पी जयराजन इसे आरएसएस का हिंदू राष्ट्र बनाने का एजेंडा भी करार दे चुके हैं लेकिन यूडीएफ भाजपा के साथसाथ पिनराई सरकार को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रहा है कि वह इस मुद्दे पर ईमानदारी नहीं बरत रही है. विधानसभा में विपक्ष के नेता वी डी सतीशन कहते हैं कि साल 2019 में राज्य में सीएए के खिलाफ विरोध प्रदर्शन से ताल्लुक रखते 835 मामले दर्ज हुए थे जिन्हें सरकार वापस नहीं ले रही जबकि मुख्यमंत्री विजयन ने घोषणा की थी कि इन में से गैरआक्रामक मामले वापस लिए जाएंगे. सरकार की मंशा इसे ले कर ठीक नहीं.

केरल के चौपालों और कौफीहाउसों तक में सीएए पर गर्मागर्म बहस और चर्चा है पर इसे ले कर मुसलिम समुदाय किस के साथ जाएगा, यह साफ नहीं हो पा रहा है लेकिन कांग्रेस का पलड़ा भारी दिख रहा है जिसे इंडियन यूनियन मुसलिम लीग का साथ मिला हुआ है. पिछले 2 लोकसभा चुनावों में मुसलिम लीग 2 लोकसभा सीट जीतती रही है लेकिन 2021 के विधानसभा चुनाव में उसे 15 सीटें मिलना बताता है कि मुसलिम समुदाय में उस की पकड़ बेहद पुख्ता है जिस का फायदा यूडीएफ को मिलेगा. दूसरे, वोटर यह भी सोच सकता है कि विजयन सरकार अगर वाकई इस मुद्दे पर गंभीर है तो उसे परखने के लिए अभी 2 साल का वक्त और है.

स्थानीय कांग्रेसी नेताओं में शशि थरूर एक लोकप्रिय नेता हैं और राहुल गांधी को भी केरल के लोग पसंद करते हैं जबकि नरेंद्र मोदी अधिकतर लोगों के लिए एक प्रधानमंत्री भर हैं. उन की रैलियों में मोदीमोदी के नारे भी घुटीघुटी सी आवाज में लगते दिखाई और सुनाई देते हैं. केरल में इस बार भी मुकाबला एलडीएफ और यूडीएफ के बीच ही है जिस में भाजपा की मौजूदगी खाने की थाली में अचार सरीखी भी नहीं है. बहुत मुमकिन है कि केरल का वोटर कांग्रेस को भी ताकत दे और मार्क्सवाद को भी जिंदा रखे यानी 2014 जैसा नतीजा दे और न दे तो कम्युनिस्टों को यहां से भी सामान समेटना शुरू कर देना चाहिए.

जेंडर इनइक्वलिटी का एक ही इलाज, महिलाओं को खुद बनना होगा अपना संबल

विश्व बैंक की नई रिपोर्ट के अनुसार दुनिया का कोई भी देश महिलाओं को कार्यबल में पुरुषों के समान अवसर नहीं देता है. वैश्विक लिंग अंतर पहले की तुलना में आज कहीं अधिक व्यापक है. इस अंतर को कम करने से वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद 20 प्रतिशत से अधिक बढ़ सकता है. वीमेन, बिज़नैस एंड द लौ रिपोर्ट के 10वें संस्करण में पहली बार कानूनों और उन्हें लागू करने के लिए बनाई गई नीतियों के बीच अंतर का आकलन किया गया.

इस में पाया गया कि कुल 95 देशों ने समान वेतन पर कानून बनाए हैं लेकिन केवल 35 देशों में वेतन अंतर को लागू करने के लिए उपाय मौजूद थे. वैश्विक स्तर पर महिलाएं एक पुरुष द्वारा अर्जित प्रत्येक डौलर का केवल 77 सेंट कमाती हैं.

दरअसल कानून तो बन जाते हैं मगर इन्हें कई दफा क्रियान्वित ही नहीं किया जाता. एक तरफ इन्हें लागू करने की उचित व्यवस्था का अभाव है तो दूसरी तरफ खुद महिलाओं की जागरूक मानसिकता और इच्छाशक्ति में कमी है. बच्चों की देखभाल और सुरक्षा के मुद्दे विशेष रूप से महिलाओं की काम करने की क्षमता को प्रभावित करते हैं. हिंसा शारीरिक रूप से उन्हें काम पर जाने से रोक सकती है और बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी उन्हें अपने कैरियर के विरुद्ध फैसले लेने को मजबूर करते हैं.

विश्व बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री इंदरमीत गिल के अनुसार पूरी दुनिया में भेदभावपूर्ण कानून और प्रथाएं महिलाओं को पुरुषों के बराबर काम करने या व्यवसाय शुरू करने से रोकती हैं. इस अंतर को पाटने से वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद 20 फीसद से अधिक बढ़ सकता है.

महिलाओं को काम पर जाने से रोकता है असुरक्षित वातावरण

प्रशासन की सब से बड़ी कमजोरी महिलाओं की सुरक्षा है. महिलाओं को घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न, बाल विवाह और स्त्री हत्या के खिलाफ आवश्यक कानूनी सुरक्षा का बमुश्किल एकतिहाई लाभ मिलता है. हालांकि 151 अर्थव्यवस्थाओं में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को प्रतिबंधित करने वाले कानून हैं. केवल 39 अर्थव्यवस्थाओं में सार्वजनिक स्थानों पर इसे प्रतिबंधित करने वाले कानून हैं. इस का अर्थ यह हुआ कि महिलाओं को काम पर जाने के दौरान रास्ते में सार्वजनिक जगहों पर पूर्ण सुरक्षा नहीं मिलती है.

महिलाओं के विकास को रोकता है भेदभाव

पूरी दुनिया में भेदभावपूर्ण कानून और प्रथाएं महिलाओं को पुरुषों के बराबर काम करने या व्यवसाय शुरू करने से रोकती हैं. महिलाएं विश्व की आबादी का लगभग आधा हिस्सा हैं. इस तथ्य के बावजूद अभी तक विश्वभर में महिलाओं के साथ हिंसा और भेदभाव जारी है.

महिलाओं को कार्यक्षेत्र में कई तरह की हिंसा और भेदभाव का सामना करना पड़ता है. पिछले कई वर्षों में विश्वभर की सरकारों ने लैंगिक अंतर को कम करने के भरसक प्रयत्न किए हैं. सरकारें नए नियम और नई नीतियां ले कर आई हैं. फिर भी महिलाओं की स्थिति में ज्यादा बदलाव नहीं है. महिलाओं को अकसर ऐसी सेवाओं में देखा जाता है जिन में नौकरियों तक पहुंच आसान है लेकिन मजदूरी अकसर कम होती है और कार्यस्थल पर सुरक्षा भी नहीं होती.

बच्चों की देखभाल का भार संभालती हैं महिलाएं

विश्वभर में महिलाएं पुरुषों की तुलना में प्रतिदिन औसतन 2.4 घंटे अवैतनिक देखभाल कार्य पर खर्च करती हैं. बच्चों की देखभाल पर अंशकालिक या पूर्णकालिक महिलाओं की नौकरियां अकसर सब से कम सुरक्षित होती हैं. महिलाएं अभी भी सब से आखिर में काम पर रखी जाती हैं और सब से पहले निकाल दी जाती हैं.

बच्चों की देखभाल और घर में काम के कारण समाज और परिवार द्वारा महिलाओं को अंशकालिक नौकरियों को चुनने के लिए मजबूर कर दिया जाता है. घरेलू काम करने वाली महिलाओं को घर से बाहर निकल कर काम करने में बड़ी मुश्किलें आती हैं. वे बच्चों की देखभाल और घर संभालने में व्यस्त रहती हैं. कई बार महिलाओं को बच्चों की देखभाल और अपने घर को चलाने के लिए अपना कैरियर तक छोड़ना पड़ जाता है.

कामकाजी महिलाओं के साथ विभिन्न स्तरों पर होता है भेदभाव

बुढ़ापे में महिलाओं को अधिक वित्तीय असुरक्षा का सामना करना पड़ता है. यह अंतर सेवानिवृत्ति तक फैला हुआ है. 62 अर्थव्यवस्थाओं में पुरुषों और महिलाओं के सेवानिवृत्त होने की उम्र एकसमान नहीं है. महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक समय तक जीवित रहती हैं. लेकिन चूंकि उन्हें काम करते समय कम वेतन मिलता है, जब उन के बच्चे होते हैं तो वे छुट्टी लेती हैं और समय से पहले सेवानिवृत्त हो जाती हैं, इसलिए उन्हें कम पैंशन लाभ और बुढ़ापे में अधिक वित्तीय असुरक्षा का सामना करना पड़ता है.

आज कानूनों में सुधार के प्रयासों में तेजी लाना और महिलाओं को काम करने, व्यवसाय शुरू करने और बढ़ाने के लिए सशक्त बनाने वाली सार्वजनिक नीतियां बनाना पहले से कहीं अधिक जरूरी है. वैश्विक कार्यबल में बमुश्किल आधी महिलाएं भाग लेती हैं जबकि हर 4 में से लगभग 3 पुरुष इस में भाग लेते हैं.

प्यू अनुसंधान केंद्र ने भारतीय किस प्रकार परिवार और समाज में लैंगिक भूमिकाओं को देखते हैं, इस पर एक शोध किया. शोध के अनुसार लगभग एकचौथाई भारतीयों का कहना है कि देश में महिलाओं के खिलाफ बहुत भेदभाव होता है. वहीं तीनचौथाई वयस्क भारतीय समाज में महिलाओं के खिलाफ हिंसा को एक बहुत बड़ी समस्या के रूप में देखते हैं.

महिलाओं की सुरक्षा में सुधार के लिए लगभग आधे भारतीय वयस्कों का कहना है कि लड़कियों को ‘उचित व्यवहार करना’ सिखाने की तुलना में लड़कों को ‘सभी महिलाओं का सम्मान करना’ सिखाना अधिक महत्त्वपूर्ण है. लेकिन एकचौथाई भारतीय यानी 26 फीसद इस का उलट मानते हैं और प्रभावी रूप से महिलाओं के खिलाफ हिंसा की जिम्मेदारी खुद महिलाओं की है.

वहीं प्यू के एक और सर्वेक्षण में 87 फीसद उत्तरदाताओं को यह लगता है, ज्यादातर या पूरी तरह से एक पत्नी को अपने पति की आज्ञा का पालन करना चाहिए. लगभग 67 फीसद पुरुष पूरी तरह से मानते हैं कि पत्नी के लिए आज्ञाकारिता अनिवार्य है. वहीं अन्य लोग इस विचार का समर्थन करते हैं. एक ऐसे देश में जहां आज भी ऐसी मानसिकता है वहां महिलाओं के खिलाफ हर कदम पर भेदभाव बहुत स्वाभाविक है.

महिलाओं की सोशल कंडीशनिंग इस तरह होती है कि कई बार वे खुद भी पति के किए गए यौन हिंसा को सही समझती हैं. पबमेड सैंट्रल के भारत में लगभग 10,000 महिलाओं पर किए गए अध्ययन में 26 प्रतिशत ने बताया कि उन्हें अपने जीवनकाल के दौरान अपने जीवनसाथी से शारीरिक हिंसा का सामना करना पड़ा है.

यह आम धारणा है कि कानून सभी के लिए समान है. लेकिन तथ्यों और सामाजिक व कानूनी कारणों को जांचने पर यह समझ आता है कि इस में लैंगिक समानता की भारी कमी है.

लंदन स्कूल औफ इकौनोमिक्स और राजनीति विज्ञान ने एक व्यापक शोध किया जिस में हरियाणा पुलिस की जनवरी 2015 से नवंबर 2018 तक की फाइलें शामिल की गईं. इन में 4,18,190 मामलों पर अध्ययन किया गया.

महिलाएं सामाजिक कारणों से अकसर अपराधों के खिलाफ शिकायत दर्ज करने में ही हिचकिचाती हैं, जो न्याय की प्रक्रिया में पहली सीढ़ी है. इस अध्ययन में पाया गया कि महिलाओं ने 38,828 शिकायतें या कुल एफआईआर का 9 फीसद दर्ज कराया.

हमारे देश में एक महिला कहां रहती है, कितनी शिक्षित है, परिवार में कितने लोग हैं, घर से पुलिस चौकी कितना दूर है या उस की सामाजिक व राजनीतिक स्थिति क्या है, इन कारकों पर भी महिलाओं के शिकायत दर्ज कराने की प्रवृत्ति निर्भर करती है.

वहीं महिलाओं के लिए धारा 498-ए या पति/पत्नी (या ससुराल वालों) द्वारा किया गया घरेलू हिंसा/दहेज संबंधी दुर्व्यवहार उन के 15 फीसद पंजीकरणों में मौजूद था. महिलाओं के खिलाफ अन्य हिंसा में दंड संहिता के अंतर्गत अपहरण, अश्लील कृत्य, बलात्कार, पीछा करना, निर्वस्त्र करने का इरादा, यौन उत्पीड़न और अप्राकृतिक सैक्स शामिल था.

महिलाओं को उन के कानूनी अधिकारों की जानकारी होने और उन्हें अपराधों की रिपोर्ट करने से न्याय तक पहुंच को सुनिश्चित किया जा सकता है. लेकिन असल में केवल महिलाओं को कानूनी ज्ञान देने से और उन्हें अपराधों की रिपोर्ट करने के लिए प्रोत्साहित करने से अपनेआप न्याय की गारंटी नहीं होती.

महिलाओं को न्याय की प्रक्रिया में अनेक स्तर पर लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है. इस में पुलिस चौकी में शिकायत से ले कर उन की जागरूकता, परिवार वालों का साथ, महिलाओं की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थिति, पुलिस का व्यवहार और अदालती कार्यवाही तक शामिल हैं. महिलाओं के लिए न्याय का मुद्दा सिर्फ न्याय का ही नहीं, महिला सशक्तीकरण से भी जुड़ा हुआ है.

महिलाओं को खुद करना होगा प्रयास

महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़े, इस के लिए जरूरी है कि वे खुद की आवाज़ को बुलंद करना सीखें. महिलाओं को हर जगह समान अधिकार और अवसर मिलना चाहिए और घरपरिवार के काम पतिपत्नी को मिल कर करने चाहिए.

महिलाओं को यह समझना होगा कि वे महज एक घरेलू नौकर या बच्चे संभालने वाली आया नहीं हैं बल्कि उन का अपना वजूद है. उन्हें भी सफलता के सोपान पर चढ़ने का मौका मिलना चाहिए. उन्हें हिंसा और भेदभाव से मुक्त रह कर सक्षम होना चाहिए. इसलिए महिलाओं और किशोरियों को बचपन से आत्मरक्षा और आत्मबल बढ़ाने की शिक्षा देनी होगी. उन्हें डर कर, चुप रह कर अन्याय नहीं सहना है बल्कि हर अन्याय के खिलाफ आवाज उठानी है.

अगर कोई उन के साथ गलत करे तो उन्हें खुद पुलिस स्टेशन जा कर न्याय की गुहार लगानी होगी. औफिस हो या घर, अपना हक मांगना होगा. अकसर देखा जाता है कि घर-बाहर हर जगह वे खुद पीछे हो जाती हैं. धर्म ने सिखाया है कि उन्हें पुरुषों के पीछे चलना है और यही घुट्टी उन के दिमाग में डाल दी जाती है. मगर महिलाओं को आधुनिक सोच अपनाना होगा. अपनी कीमत समझनी होगी. वे पुरुषों से किसी बात में कम नहीं, इस का एहसास होना बहुत जरूरी है.

डरना नहीं है, अपराध सामने लाना है

मान लीजिए किसी महिला के साथ यौन हिंसा हुई. इस के बाद क्या होता है? आमतौर पर यौन हिंसा का सामना कर चुकी महिलाओं के लिए जो छवि सब से पहले लोगों के मन में आती है वह डरीसहमी, कमजोर महिला की होती है. ऐसी महिला जो यौन हिंसा की घटना को छिपाए या रिपोर्ट दर्ज न करना चाहे, खुद को दोषी माने या समाज के सामने जाने से डरे या झिझके, यह सारी सोच गलत है.

वैसे तो हमारी सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक व्यवस्था में किसी भी महिला के लिए खुद के लिए खड़ा होना मुश्किल है पर खासकर यौन हिंसा का सामना कर चुकी महिला के लिए बेबाक और अपने लिए खड़ा होना और आम जीवन जीना पितृसत्ता को मंजूर नहीं. इसी सोच से लड़ना होगा और अपना संबल खुद बनना होगा.

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