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Holi Special: यूथ फैस्टिवल्स को बनाएं अपनी जान

होली के अवसर पर गुझिया की मिठास का आनंद लेने के बाद रंगपिचकारी के साथ होली खेलना, ढोल की थाप पर नाचना व एकदूसरे को गले लगाना, कुछ इस तरह सैलिबे्रट करते थे युवा होली को. लेकिन बदलते समय में यूथ के लिए फैस्टिवल्स की परिभाषाएं भी बदली हैं. उन्हें त्योहारों को मनाने के तौरतरीकों में आए बदलाव से लगता है कि त्योहार जो कभी उत्साह, माधुर्य, स्फूर्ति के परिचायक होते थे अब औपचारिकता मात्र रह गए हैं.

युवाओं का ऐसा मानना कि अब त्योहारों की रौनक फीकी पड़ गई है या फिर अब त्योहारों में वह बात नहीं जो पहले थी, गलत है. चाहे हम अपने परिवार के साथ रहें या फिर नौकरी या पढ़ाई के कारण घर से दूर, लेकिन फिर भी त्योहारों के लिए उत्साह कम नहीं होना चाहिए, क्योंकि अगर इस उम्र में आप जीभर कर नहीं जीए तो फिर आगे तो जिम्मेदारियों का बोझ ढोते हुए चाह कर भी त्योहारों का मजा नहीं ले पाएंगे. इसलिए खुशी के जो पल मिलें उन्हें अपने हाथ से न निकलने दें.

क्यों बढ़ी त्योहारों के प्रति दूरी

पहले युवा होली का त्योहार आने से कई दिन पहले ही एकदूसरे पर गुब्बारे फेंकने शुरू कर देते थे. यहां तक कि दोस्तों व रिश्तेदारों को आमंत्रित किया जाता था कि इस बार होली का त्योहार हमारे घर पर मनाया जाएगा. उन के चेहरे की रौनक साफ दर्शाती थी कि वे त्योहारों के प्रति कितने उत्साहित हैं, लेकिन अब तो स्थिति यह है कि कई दिन पहले क्या युवा जिस दिन त्योहार होता है उस दिन भी उसे सैलिबे्रट करने के मूड में नहीं रहते. उन्हें लगता है कि रिश्तेदारों व दोस्तों को बुलाने, उन के घर जाने या फिर उन्हें रंगगुलाल लगाने से अच्छा है कि छुट्टी का भरपूर मजा लिया जाए. जब चाहें सो कर उठें, जो चाहें मूवी देखें, आज कोई रोकनेटोकने व डिस्टर्ब करने वाला न हो.

ऐसे में अगर कोई उन्हें फोर्स भी करता है कि त्योहार सैलिबे्रट करने के लिए उस के महत्त्व को समझें तो वे यह कह कर टाल देते हैं कि हमें तो अपनी छुट्टी इस त्योहार के चक्कर में बरबाद नहीं करनी है अगर आप करना चाहें तो करें, लेकिन हमें इस के लिए फोर्स न करें.

घरों से दूरी ने घटाया उत्साह

आज के किशोरों व युवाओं पर पढ़ाई व कैरियर बनाने का इतना अधिक प्रैशर आ गया है कि उन्हें इन के लिए छोटी उम्र में ही घर से दूर जाना पड़ता है. वहां रह कर पढ़ाई व जौब के साथ अपनी सारी जिम्मेदारियां उठाने के चक्कर में उन में त्योहारों को ले कर कोई उत्साह नहीं रहता. उन्हें लगता है कि अकेले त्योहार मनाने से अच्छा है कि इन्हें मनाओ ही नहीं और इस दिन जो काम बाकी रह गए हैं उन्हें निबटाया जाए. अगर वे छुट्टी ले कर घर आ भी जाते हैं तो सोचते हैं कि फैस्टिवल को ऐंजौय करने से अच्छा है कि फैमिली के साथ कुछ वक्त बिताएं. अपने इस बिजी रूटीन में फंसे व उलझे होने के कारण उन में अब फैस्टिवल्स को मनाने का क्रेज खत्म होता जा रहा है.

परिवार की जिम्मेदारियों का बोझ भी वजह

घर में अगर पापा या मम्मी का बहुत छोटी उम्र में देहांत हो गया हो और अभी बहुत सारी जिम्मेदारियां बाकी हों तो ऐसे में बड़े भाई या बड़ी बहन होने का फर्ज निभाना पड़ता है. उन की हर छोटीबड़ी जरूरत का ध्यान रखना पड़ता है. कभीकभी परिवार की आर्थिक स्थिति सही नहीं होने के कारण छोटी उम्र में ही जौब छोड़नी पड़ती है. इन जिम्मेदारियों के तले दबे होने के कारण वे त्योहारों को मनाने के बारे में सोचने की बात तो बहुत दूर, अपने बारे में भी नहीं सोच पाते. उन की इच्छाएं तक दब कर रह जाती हैं. यही वजह है कि वे त्योहारों से दूरी बना लेते हैं.

त्योहारों पर टैक्नोलौजी हावी

जैसेजैसे युवाओं को लुभाने के लिए नईनई टैक्नोलौजी आ रही हैं, वैसेवैसे उन का बाकी चीजों के प्रति उत्साह खत्म होता जा रहा है. अब वे सोचते हैं कि स्मार्टफोन पर उपलब्ध ऐप्स का ज्यादा से ज्यादा लाभ लिया जाए. अब उन्हें हर पल व्हाट्सऐप व फेसबुक पर डीपी अपडेट करने की चिंता रहती है. यदि एक बार डीपी अपडेट हो गई तो फिर उस के बाद लाइक्स के इंतजार में मोबाइल पर ही नजरें गड़ाए रखते हैं. ऐसे में उन के पास त्योहारों के बारे में सोचने का वक्त ही नहीं रहता या यों कहें कि टैक्नोलौजी ने उन के लाइफस्टाइल को पूरी तरह बदल दिया है.

औनलाइन विश करने में ज्यादा रुचि

स्मार्टफोन के बढ़ते चलन ने अब फैस्टिवल्स को सैलिबे्रट करने के तरीके में भी बदलाव ला दिया है. अब युवा साथ मिल कर त्योहार सैलिबे्रट करने से बेहतर एसएमएस के जरिए एकदूसरे को बधाई दे देते हैं, लेकिन वे इस बात से अनजान हैं कि टैक्नोलौजी के प्रयोग से त्योहारों की मिठास भी फीकी होती जा रही है. जो मजा साथ बैठ कर खाने व एकदूसरे को गले मिल कर बधाई देने में आता था वह मजा टैक्नोलौजी के कारण खत्म हो रहा है.

एकल परिवारों से पड़ा उत्साह फीका

पहले संयुक्त परिवार अधिक होते थे, जहां दादादादी, चाचाचाची सब बच्चों को त्योहारों का महत्त्व बताते थे. घरों में कई दिन पहले से ही त्योहारों की तैयारियां शुरू हो जाती थीं. घर के माहौल को देख कर बच्चों में भी उत्साह रहता था, लेकिन एकल परिवारों के बढ़ते वर्चस्व ने त्योहारों की रौनक फीकी कर दी है. अब पेरैंट्स वर्किंग होने के कारण बच्चों को ज्यादा समय नहीं दे पाते. त्योहार वाले दिन भी वे घर पर खाना बनाने के बजाय बाहर से ही खाना मंगवा लेते हैं. इसलिए ऐसे माहौल में बच्चे समझ ही नहीं पाते कि त्योहार होते क्या हैं, जिस से उन में त्योहारों के प्रति रुचि घटती जा रही है.

स्किन कौंशियस ज्यादा

अब युवा अपनी फिगर व स्किन को ले कर ज्यादा कौंशियस हो गए हैं. उन्हें लगता है कि अगर उन्होंने होली खेली तो रंगों में कैमिकल्स होने के कारण उन की स्किन खराब हो जाएगी, फिर सब उन्हें देख कर हंसेंगे. उस के बाद डाक्टरों के चक्कर लगाओ सो अलग. इस से अच्छा है कि आराम से अपने घर बैठो

त्योहारों को मनाने के फायदे

–               एक जैसे रूटीन से बाहर निकलने का मौका मिलता है. इस बहाने आप परिवार के लोगों के साथ कुछ पल बिता सकते हैं. ये यादें कुछ पलों के लिए नहीं बल्कि जिंदगी भर के लिए होती हैं, जिन्हें याद कर आप मुश्किल परिस्थिति में भी खुद के चेहरे पर मुसकान ला सकते हैं.

– शौपिंग करने का मौका मिलता है. त्योहारों पर अगर आप ऐक्स्ट्रा शौपिंग भी कर लेंगे तब भी आप को डांटने वाला कोई नहीं होगा.

–               सैल्फ ग्रूमिंग का मौका मिलता है.

–               एकदूसरे के रीतिरिवाजों का भी पता चलता है.

–               त्योहारों पर खुद को ज्यादा ऐनरजैटिक फील करते हैं.

–               अपनों के साथ मेलजोल से प्रेम व भाईचारा बढ़ता है.

कैसे बरकरार रखें त्योहारों के प्रति उत्साह

–               जो फ्रैंड्स फैस्टिवल्स को छुट्टी मात्र मानते हैं उन्हें त्योहारों का महत्त्व बताना बहुत जरूरी है.

–               अगर आप पढ़ाई व नौकरी के कारण घर से दूर हैं तो त्योहार ही प्रिय बहाना है जिस के जरिए आप अपने फैमिली मैंबर्स से मिल पाएंगे.

–               पार्टी अरेंज कर के फैस्टिवल मूड बनाएं.

–               फैस्टिवल पर घर पर डिशेज बना कर अपने फैमिली मैंबर्स व फ्रैंड्स का दिल जीतें.

–               आप का फैस्टिवल मनाने का तरीका जितना जिंदादिल व उत्साह भरा होगा और आप फैस्टिवल मनाने के नएनए तरीकों का इन्वैंशन करते रहेंगे तो यकीन मानिए आप के साथ हर कोई फैस्टिवल को सैलिबे्रट करने को उत्सुक रहेगा.

प्रेरणा: आखिर नमन को पढ़ने के लिए किसने प्रेरित किया?

12वीं की बोर्ड परीक्षा के बाद थोड़े दिन आराम कर ने के बाद नमन किताब खोल कर पढ़ने लगा तो उस के मातापिता को आश्चर्य हुआ. नमन इतना पढ़ाकू कभी नहीं रहा. मालूम नहीं कितने नंबर आएंगे, किसी कालेज में दाखिला मिलेगा या फिर पत्राचार से बीए करेगा. वे उस के भविष्य के लिए चिंतित भी थे. हर वर्ष लुढ़कते अगली कक्षा में पहुंच जाता था. 10वीं की बोर्ड परीक्षा में भी मातापिता के दबाव में पढ़ाई की और 55% नंबर ले आया था, जब दूसरे छात्र 95% से अधिक नंबर प्राप्त कर रहे थे.

11वीं में वह स्वयं से पढ़ने लगा. मातापिता को तनिक भी एहसास नहीं हुआ कि उस के बदलते रुझान का आखिर क्या कारण है. कारण रही प्रेरणा। 11वीं में नमन ने कौमर्स ली और टीचर ने नमन को प्रेरणा के साथ डैस्क पर बैठा दिया.

नमन गोराचिट्टा व लंबे कद का हैंडसम लड़का था. चेहरे पर हलकीहलकी दाढ़ी भी आने लगी थी. उस ने अभी शेव करना शुरू नहीं किया था.

प्रेरणा भी खूबसूरत लड़की थी. उम्र के हिसाब से शरीर में समुचित भराव था. पहले दिन दोनों ने एकदूसरे को देखा और आकर्षित हुए. अपनी प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की. प्रेरणा पढ़ने में होशियार थी. उस से मित्रता के चक्कर में नमन ने पढ़ाई में मन लगाना शुरू कर दिया. पढ़ाई के बहाने दोनों में बातचीत आरंभ हो गई.
यह उम्र कुछ स्वयं बननेसंवरने की होती है. दूसरों को अपनी ओर आकर्षित होने की होती है. दूसरे उन्हें देखें, उन की ओर आकर्षित हों, उन की तारीफ करे, यह स्वाभाविक है. कुछ यही प्रेरणा तथा नमन में प्राकृतिक रूप से हुआ.

एक ही डैस्क पर बैठते हुए उन का एकदूसरे के प्रति आकर्षित होना स्वाभाविक था, जो हुआ. स्कूल में तो यूनिफौर्म अनिवार्य है, स्कूल के बाहर बनसंवर कर घूमनाफिरना युवाओं को कई बार एकतरफा प्रेम का एहसास करा जाता है.

नमन भी इसी दौर से गुजर रहा था. प्रेरणा पढ़ाकू होने के कारण टीचर्स की नजरों में थी. प्रेरणा नमन से अधिक बात करे, उस के साथ समय अधिक व्यतीत करे, इस समस्या का केवल एक ही समाधान था, नमन पढ़ाई की बातें प्रेरणा से करे. नमन ने यही सही रास्ता चुना और 12वीं में दोनों की मित्रता घनिष्ठ हो गई. दोनों एकसाथ पढ़ने लगे, पढ़ाई की बातें डिस्कस होतीं. कभीकभी एकदूसरे को देख कर दिल धड़कने लगता. पढ़ाई के साथ नईपुरानी फिल्मों पर भी दोनों चर्चा करते. नमन का दिल कहता था कि उस के संग फिल्म देखे, मगर दिल की बात जबान पर कभी नहीं ला सका. दोनों के घर आसपास थे, दोनों पढ़ने के लिए अकसर एकदूसरे के घर भी आ जाते थे.

बोर्ड परीक्षा के बाद नमन को पढ़ाई की चर्चा करते देख कर उस के पिताजी ने पूछ ही लिया, “आगे क्या करने का इरादा है? कुछ तो सोचा होगा?”

“सबकुछ सोच रखा है पापा. बी.काम में ऐडमिशन लेना है और साथ में सीए करनी है.“ नमन के मुख से आत्मविश्वास वाला उत्तर सुन कर पिताजी को झटका लगा. यह कायाकल्प कैसे हो गया है? फिर संभल कर पूछा, “सुना है आजकल 90% से कम वालों को दिल्ली विश्वविद्यालय में ऐडमिशन नहीं मिलता है.“

“वह तो है पापाजी. दिल्ली में बहुत कालेज हैं, कैंपस में ऐडमिशन नहीं मिला तो कोई गम नहीं. दिल्ली विश्वविद्यालय के किसी कालेज में ऐडमिशन मिल जाएगा. उस के साथ सीए करूंगा.“

“सुना है, सीए में पढ़ाई बहुत करनी पड़ती है. रिजल्ट भी बहुत कम निकालते हैं. बहुत टफ है,“ पिताजी ने फिर अपनी शंका को जाहिर किया.

“प्रेरणा और मैं ने प्रण कर लिया है. बी.काम के साथ सीए करनी है. बोर्ड में मेरे अच्छे नंबर आने की उम्मीद है.“
अब पिताजी को समझ आया कि प्रेरणा के संग पढ़ने और साथ से नमन जीवन के प्रति गंभीर हो गया है.

“सुंदर लड़की है और समझदार भी,“ माताजी बोल उठी.

पिताजी हैरानी से देखने लगे, अभी तो लड़का 18 वर्ष का है. माताजी क्या बोल गईं? वे अपनी दुकान में इतने व्यस्त रहते हैं, बच्चे क्या कर रहे हैं, मालूम ही नहीं पड़ा.

“सुंदर और समझदार से तुम्हारा क्या मतलब है?” पिताजी ने माताजी की ओर देखा.

“अब सुंदर है तो है. तुम खुद देख लो.“

“अब मैं दुकान न जाऊं, लड़कियों की खूबसूरती देखता रहूं.“

“मुझे भी कभी ध्यान से नहीं देखा तो दूसरी लड़कियों को क्या खाक देखोगे,“ माताजी की पिताजी से बहस हो गई.

“अब नाश्ता करा दो तो दुकान जाऊं,“ पिताजी दुकान के बहाने माताजी से बच गए. वे सोचने लगे, रिजल्ट आएगा तब देखेंगे.

मई अंत में रिजल्ट आ गया. नमन के 92% अंक आए. प्रेरणा के 97% अंक आए. प्रेरणा का बी.काम में ऐडमिशन नौर्थ कैंपस के खालसा कालेज में हुआ. नमन का ऐडमिशन कैंपस के बाहर राजधानी कालेज में हुआ, वह भी तीसरी लिस्ट में.
खैर नमन खुश था, ऐडमिशन हो गया. दोनों ने सीए के फाउंडेशन कोर्स में भी ऐडमिशन लिया. दोनों के कालेज अलग थे इसलिए शाम को मिलते. यथापूर्वक पढ़ने के लिए एकदूसरे के घर भी आतेजाते रहते.

कई बार एकदूसरे के कालेज भी चले जाते. फुरसत में घूमते और मूवी देखने चले जाते. इस कारण वे दोनों अपने मित्र समूह में बौयफ्रैंड गर्लफ्रैंड के रूप में मशहूर हो गए. कालेज में न तो नमन की कोई गर्लफ्रैंड बनी न ही प्रेरणा का कोई बौयफ्रैंड बना.

“यार, यह तो गलत बात है। कोई लड़की मुझ से ढंग से बात नहीं करती. पढ़ाई तक की भी नहीं करती,“ नमन ने अपना दुखड़ा सुनाया.

प्रेरणा कुछ देर सोचता रही.
“सोच क्या रही हो?”

“कुछ यही हाल मेरा भी है. सारे लड़के दूरदूर भाग जाते हैं जैसे मैं ने उन की भैंस भगा ली.“

“हम एकदूसरे से मिलते हैं, इस से दूसरों को क्या तकलीफ है? पढ़ाई की बात तो कर सकते हैं.“

“नहीं करते न करें. हम दोनों स्कूल से फ्रैंड हैं.“

“हूं यह बात तो है. यह तो मैं ने सोचा ही नहीं. चलो फिल्म देखने चलते हैं.
दोनों ने एकसाथ फिल्म देखी. फिल्म देखने के बाद घर पर रात के समय बिस्तर पर करवटें बदलते हुए दोनों सोच रहे थे कि एकसाथ रहते हुए भी उन्होंने प्रेम के विषय में कोई विचार नहीं किया. शारीरिक आकर्षण हुआ मगर प्रेम में डूबने के स्थान पर पढ़ाई के गोते लगाते रह गए.

अब जब कालेज में अन्य लड़के, लड़कियों ने उन से मित्रता को घनिष्ठ नहीं बनाया, दोनों आज पहली बार प्रेम पर विचार करने लगे मगर जब फिर अगली शाम मिले, प्रेरणा ने अपना दिमाग खोला, “नमन, अब हमें पढ़ कर कैरियर बनाना है. फिल्म सीए बनने के बाद भी देख लेंगे.“

“बिलकुल ठीक बात,“ नमन भी अपने दिल की बात दिल में दबा गया. वैसे वह प्रेम के चक्कर में प्रेरणा के निकट आया था और पढ़ाकू बन गया.
साथसाथ मिलते, पढ़ते दोनों ग्रैजुएट बन गए. साथ ही साथ दोनों की सीए इंटर भी हो गई. दोनों के परिवार उन की पढ़ाई पर संतुष्ट थे. कालेज पासआउट के बाद दोनों को एकसाथ रहने के लिए अधिक समय मिलने लगा.

“प्रेरणा, एक बात कहूं?” एक दिन नमन ने अपने दिल का हाल प्रेरणा के सामने रखने का पक्का मन बना लिया. दोनों एक फूड जौइंट में बैठ कर बर्गर खा रहे थे.

“बोल दो, क्या बोलना है. सीए फाइनल बहुत मुश्किल है. उस की जम कर तैयारी करनी है.“

“वह तो है, सीए कंप्लीट करनी है. एक बात और भी है.“

“कौन सी बात है?”

नमन के दिल में जो था वह अटक गया, जिस मकसद से आया था, उस से भटक गया. आई लव यू उस के गले में अटक गया, जो उस ने नहीं सोचा था, वह बोल गया.

“वह क्या है न कि सीए बनने के बाद क्या सोचा है?”

“सोचना क्या है, कोई अच्छी सी नौकरी करूंगी. मेरे फादर की जौब है, मैं भी करूंगी. अब तुम तो प्रैक्टिस की सोच सकते हो, तुम्हारे फादर की दुकान है, बिजनैस करते हैं.“

“हां वह तो है,“ नमन बस इतना ही कह सका. दिल की बात दिल में ही रह गई. नमन की एक कमजोरी, प्रेरणा को अपना दिल खोलकर नहीं दिखा पाना, आज तक कायम है. दोनों की मित्रता गाढ़ी होती गई मगर प्रेम का इजहार नहीं हो सका. एक संतोष नमन को जरूर था, वह पढ़ाकू हो गया. पढ़ने की प्रेरणा भी प्रेरणा की खूबसूरती से मिली.

नमन का मन प्रेरणा में अधिक उलझने लगा, वह कैसे अपने दिल का हाल बताए, इस का असर उस की पढ़ाई में पड़ने लगा. प्रेरणा की सीए कंप्लीट हो गई मगर नमन का एक ग्रुप अटक गया.

प्रेरणा के सीए कंप्लीट होने की खुशी में उस के परिवार में दावत दी गई जिस में नमन भी आमंत्रित था. उस के कान में प्रेरणा के मातापिता की वार्तालाप के कुछ अंश पड़ गए. वे प्रेरणा को विवाह के लिए कह रहे थे. प्रेरणा ने अभी रुकने को बोला, “मम्मी, पहले 2 साल नौकरी कर लूं. थोड़ा बैंक बैलेंस भी हो जाए.“

नमन सोचने लगा कि कहीं प्रेरणा की शादी हो गई तब उस के अरमान दिल में ही रह जाएंगे. एक दिन वह प्रेरणा को पिज्जा खिलाने ले गया.”सुना है, तुम शादी कर रही हो?” नमन ने सीधा प्रश्न किया.

प्रेरणा नमन को घूरती रही. कुछ सोचने के बाद बोली, “देख नमन, यदि तुम्हें सीए बनना है तब तो मैं रुकूं नहीं तो कोई सीए लड़का देखना पड़ेगा. मम्मीपापा भी पीछे पड़ गए हैं.“

नमन को प्रेरणा से हिंट मिल गया.
“यार, भरपूर प्रयास कर रहा हूं. देखना इस बार कंप्लीट हो जाएगी.“
कुछ तो प्रेम प्रेरणा के दिल में भी उमड़ा था जो अप्रत्यक्ष रूप से उस ने उजागर कर दिया.

नमन फिर से जीजान से पढ़ाई में गोते लगाने लगा. वह एक बार असफल रहा मगर दूसरी बार उस ने बाजी मार ली और सफल हो गया. सीए बनते ही नमन पिज्जा और बर्गर ले कर प्रेरणा के घर पहुंच गया.

“अब क्या इरादा है?” उस ने प्रेरणा से पूछा.

“कौन सा?” प्रेरणा उस के हावभाव देखना चाहती थी.

“अब तुम्हारा बैंक बैलेंस बन गया होगा?”

“तुम भी बनाओ.“

इतना सुनते ही नमन चुप हो गया.
“चुप क्यों हो?”

“सोच रहा हूं बैंक बैलेंस आई लव यू पर भारी पड़ गया है.“

“पैसा सब से अहम है. आखिर हम सीए रुपयों की गिनती की औडिट करते रहते हैं.“

“अच्छा चलता हूं.“

“बाय, एक बात तो बताओ, नौकरी करोगे या प्रैक्टिस?” प्रेरणा के इस प्रश्न पर नमन ने कुछ सोचा फिर दिल की बात बोल ही दी.

“शादी करूंगा.“

प्रेरणा चौंक गई, “किस से?”

“कोई तो मिल ही जाएगी. सीए बन गया हूं.“ नमन वहां से चला गया.

कुछ देर वह यों ही मौल में बिना किसी उद्देश्य के घूमता रहा. जब घर पहुंचा तो रात के 9 बज रहे थे. उस का मन खिन्न था। जिस लड़की के चक्कर में उस ने पढ़ना शुरू किया, वही भाव दिखा रही है. चलो कोई बात नहीं, इस बहाने कैरियर तो बन गया.

नमन घर पहुंचा तो वह हैरान हो गया. प्रेरणा के मातापिता उस के मम्मीपापा के पास बैठे हंस कर बात कर रहे थे.
“भाईसाहब, यह तो प्रेरणा की प्रेरणा ने हमारे पढ़ाई से जी चुराने वाले लड़के को सीए बना दिया. चलो जब आप कहते हैं, लड़कालड़की राजी, फिर हम अडंगा क्यों डालें.”

नमन को उस के पापा ने आवाज दी.
“नमन इधर आना.“

“जी पापा.“

“तुम प्रेरणा से मिलने गए थे न?” पिताजी ने प्रश्न पूछा.

“जी पापा.“

“तो उस को घर ले आते. एकसाथ खुशी की मिठाई खाते.“ नमन सकपका गया.

“अरे खोएखोए क्यों हो, प्रेरणा तेरे सीए बनने की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रही थी. अब तो हां बोल दे. प्रेरणा के मम्मीपापा उस की हां के साथ आए हैं.“

नमन ने मिठाई खाई और झट से कमरे में गया. प्रेरणा को फोन मिलाया,”मिठाई खा ली, लड़की कौन है?” प्रेरणा की शरारत भरी आवाज थी.

“ड्रामेबाज, कल मिल, लड़की दिखाता हूं.“

प्रेरणा फोन पर हंसी. दूसरी ओर से दोनों के मम्मीपापा हंस रहे थे. वाकई बच्चे समझदार हैं. प्रेम को बैकग्राउंड में रख कर पढ़ कर कैरियर बना लिया.

इंडिया ब्लौक क्या ले रहा है आकार

इंडिया ब्लौक ने फीनिक्स पक्षी की तरह अपने पंख दोबारा खोले तो हैं लेकिन उड़ान वह कहां तक कर पाएगा, यह कहना मुश्किल है. जिस पौराणिक माहौल में भाजपा 400 पार का दम भर रही है, लोकतांत्रिक माहौल के तहत विपक्ष उसे कितनी चुनौती दे पाएगा, यह भी अगर मुट्ठीभर सवर्णों को ही तय करना है तो यह चुनाव कतई दूसरे मुद्दों के इर्दगिर्द नहीं होने वाला.

कांग्रेस नेता राहुल गांधी की न्याय यात्रा का उत्तर प्रदेश में आखिरी पड़ाव आगरा था जहां की टेढ़ी बगिया में सुबह से ही समाजवादी पार्टी के और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के आने का सिलसिला शुरू हो गया था. दोपहर होतेहोते इलाके में पांव रखने की भी जगह नहीं बची थी. चारों तरफ ?ांडे ही ?ांडे नजर आ रहे थे जिन से 22 जनवरी के अयोध्या इवैंट के दौरान लगाए भगवा ?ांडे एक हद तक छिपने लगे थे. सपा और कांग्रेस के ?ांडों के साथसाथ दलितों वाले नीले ?ांडे एक नई जुगलबंदी की चुगली कर रहे थे जो अब बसपा के साथ भाजपा के लिए चिंता की बात हो सकती है.

सपा प्रमुख अखिलेश यादव के सभा में पहुंचते ही नारेबाजी शुरू हो गई और सपा कार्यकर्ताओं की अखिलेश तक पहुंचने की होड़ में मंच की रेलिंग टूट गई जो ऐसे आयोजनों में सफलता की निशानी मानी जाती है. आधा घंटे बाद राहुल और प्रियंका गांधी भी पहुंचे. राहुल और अखिलेश के गले मिलते ही यह साफ हो गया कि टूटने के बाद अब एक बार फिर इंडिया गठबंधन आकार ले रहा है. राहुल और अखिलेश के जयजयकार के नारों के दौरान भीमराव अंबेडकर की जय के भी नारे लगे जिस से जाहिर है कि बड़ी तादाद में दलित भी इस सभा में आए थे.

अखिलेश यादव ने माहौल देखते कहा, बाबासाहेब के जिन सपनों को भाजपा ने बरबाद किया है उन्हें पूरा करने के लिए हमें एक कसम खानी होगी कि बीजेपी हटाओ, देश बचाओ, संकट मिटाओ. भाजपा ने दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को वह सम्मान नहीं दिया जिस के वे हकदार हैं. गौरतलब है कि अखिलेश यादव का पूरा फोकस पीडीए यानी पिछड़े, दलितों और अल्पसंख्यकों पर है जिस का एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस के पास है. इसलिए दोनों के बीच सहमति इस बात पर बनी है कि उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 17 पर कांग्रेस लड़ेगी और बाकी 63 पर सपा और इंडिया ब्लौक के दूसरे सहयोगी भाजपा को टक्कर देंगे.

वोट शेयरिंग होगी क्या

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के एक बार फिर पलटी मारने के बाद इंडिया गठबंधन बिखरता दिखाई दे रहा था. उत्तर प्रदेश के रालोद मुखिया जयंत चौधरी जो चरण सिंह के पोते और अजित सिंह के बेटे हैं, के भी भगवा गैंग जौइन कर लेने के बाद हर कोई विपक्षी एकता की तरफ से निराश हो चला था लेकिन जिस तेजी से इंडिया गठबंधन में सीट शेयरिंग पर सहमति बनी वह बताती है कि जो होना था वह हो चुका है और गठबंधन छोड़ कर जो दल और नेता भाजपा के साथ गए हैं वे न केवल अपनी जमीन खो चुके हैं बल्कि उन का आत्मविश्वास और पौराणिकवादियों से जू?ाने का जज्बा भी ध्वस्त हो चुका है. इन नेताओं को लगता नहीं कि समाज से कोई सरोकार बचा है. बहुसंख्यकवाद के आगे घुटने टेकना कोई हताशा नहीं है बल्कि एक किस्म की धूर्तता है यह.

नीतीश कुमार की लोकप्रियता और स्वीकार्यता समाजवादी राजनीति के चलते ही रही है. एक दौर में वे प्रत्यक्षअप्रत्यक्ष इतिहास की आर्थिक व्याख्या किया करते थे. यानी वे आर्थिक सुधारों व समानता के लिए सामाजिक व्यवस्था में बदलाव के हिमायती थे, इसलिए पिछड़े, दलित और मुसलमान उन में भरोसा जताया करते थे. यह भरोसा इस चुनाव में कायम रहेगा, इस सवाल का जवाब हां में तो कतई नहीं मिलने वाला.

अतिआत्मविश्वास और संभावित जीत के अहंकार में डूबी भाजपा ने उन्हें साथ ले कर घाटे का ही सौदा किया है क्योंकि जातिवादी राजनीति के सिर चढ़ कर बोलने के इस दौर में लगता नहीं कि भाजपा का सवर्ण वोट जदयू को मिलेगा या नीतीश का पिछड़ा वोट भाजपा को जाएगा ही.

इन राजनीतिक और चुनावी बातों से हट कर देखें तो नीतीश कुमार 2 मार्च को बहुत बेचारे लगे थे जब वे नरेंद्र मोदी से माफी मांगने के अंदाज में यह कह रहे थे कि अब कहीं नहीं जाऊंगा. ये वही नीतीश हैं जो 2013-14 में नरेंद्र मोदी को हड़काते व धमकाते रहते थे. यही सख्त तेवर और उसूल देख पिछड़ों को लगता रहा था कि उन का सम्मान और स्वाभिमान नीतीश के हाथों में सुरक्षित है. अब यह तबका हताश है. इस से इंडिया ब्लौक को फायदा ही होगा क्योंकि मुसलिम समुदाय के पास भी अब कोई विकल्प नहीं बचा है कि अगर सुकून से रहना है तो सीधी टक्कर वाले राज्यों में वोट कांग्रेस को दिया जाए और जहां उस का गठबंधन क्षेत्रीय दलों से है वहां उन्हें चुना जाए, मसलन उत्तर प्रदेश में सपा, दिल्ली में आप और बिहार में आरजेडी.

उत्तर प्रदेश के साथसाथ दिल्ली और महाराष्ट्र में भी सीटों का फार्मूला तय हो चुका है जिस के तहत आप 4 और कांग्रेस 3 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. तीनों ही जगह कांग्रेस को उस की राष्ट्रीय कदकाठी के लिहाज से सम्मानजनक सीटें मिली हैं. बिहार में कचरा छंटने के बाद राजद और कांग्रेस खुद को ज्यादा कंफर्ट महसूस कर रहे हैं. अब लोगों और भाजपा की निगाहें खासतौर से पश्चिम बंगाल पर हैं जहां सीटों का पेंच अभी भी फंसा है.

सक्रिय हुईं पार्टियां

बावजूद कुछ सियासी अड़चनों के, इंडिया ब्लौक की पार्टियां एक बार गिरने के बाद फिर ह्यूमन पिरामिड की तरह सक्रिय हो गई हैं जिन का वजन सब से नीचे पीठ के बल बैठी कांग्रेस ने अपने ऊपर ले रखा है. सत्ता की हांडी से मक्खन ये लूट पाएंगे या नहीं, यह नतीजे बताएंगे लेकिन पहली बार ऐसा लग रहा है कि अब ये सभी सीटों की गिनती का मोह और लालच छोड़ देश की सोचने लगे हैं, जनता की सोचने लगे हैं और एक हद तक वे मानसिक रूप से खुद को इस बाबत तैयार करने में लगे हैं कि इस बार चुनावी राजनीति के जरिए समाज और उस के विभिन्न वर्गों के हकों व हितों की लड़ाई लड़नी है.

राहुल गांधी अपनी न्याय यात्रा के दौरान देश की जनता को यह हकीकत बताते रहे हैं जो सवर्ण वोटों के लिहाज से बहुत बड़ा रिस्क है. भाजपा नफरत, डर और हिंसा फैला रही है, राहुल की यह बात अब इंडिया ब्लौक के सभी घटक दल दोहरा रहे हैं और जो इसे दोहराने की हिम्मत नहीं जुटा पाए वे भगवा गैंग की शरण में चले गए. वे दरअसल पौराणिक मानसिकता के हैं. इन में कांग्रेसियों की तादाद भी खासी है. कितने हेमंत बिस्वा शर्मा, ज्योतिरादित्य सिंधिया और मिलिंद देवड़ा वगैरह कांग्रेस का साथ छोड़ गए, इस की गिनती करना बेकार की बात है.

इन के जाने से यह सोचना गलत है कि कांग्रेस कमजोर हुई है. उलटे, उसे मजबूती मिलती है. ये लोग कांग्रेस के ही कट्टर हिंदूवादी बाल गंगाधर तिलक और गोपाल कृष्ण गोखले से तो कहीं बेहतर हैं जिन्होंने कभी कांग्रेस में रहते हुए हिंदूवादी हितों के लिए वोटों की जमीन तैयार की थी और जातियों की खाई पर ?ांकियों व कर्मकांडों का कुदाल चलाया था. जो बबूल सवर्ण और पौराणिक मानसिकता वाले कांग्रेसी वक्तवक्त पर बोते रहे थे वे पूरे नहीं तो आधे से ज्यादा देश में अब इफरात से खिल रहे हैं और लोगों को बरगलाया जा रहा है कि ये बबूल नहीं, बल्कि गुलाब हैं.

ईमान बेच कर बचाया धर्म

हिमाचल प्रदेश में यह यानी बबूल खिलने का काम दूसरे लेकिन जानेपहचाने तरीके से हुआ. राज्यसभा चुनाव में उस के 6 विधायकों ने क्रौस वोटिंग कर अभिषेक मनु सिंघवी को हरवा दिया. इन 6 में से

5 विधायक ऊंची जाति वाले थे जिन्होंने भाजपा को मजबूत किया. इसी तरह उत्तर प्रदेश में सपा के जिन 8 विधायकों ने भाजपा के पक्ष में मतदान किया उन में से 6 ब्राह्मण, ठाकुर या दूसरी किसी ऊंची जाति वाला कोई था.

यह सोचना बेमानी है कि इन विधायकों ने 2, 5 या 10 करोड़ में अपना ईमान बेच दिया बल्कि सच तो यह है कि इन्होंने अपना धर्म बचा लिया और यह भी जता दिया कि अगर वोटर सपा या कांग्रेस या किसी भी दूसरे दल के सवर्ण को चुनता है तो वह 50 फीसदी मामलों में दरअसल भाजपा को ही चुन रहा होता है. यह बात मुनासिब वक्त पर साबित भी हो जाती है.

अहम है पश्चिम बंगाल

टीएमसी मुखिया ममता बनर्जी बेहतर सम?ा रही हैं कि अब वक्त कम बचा है. भाजपा लगातार आक्रामक हो रही है और तरहतरह से दबाव भी बना रही है. अगर उस से बचना है तो सीटों की जिद तो उन्हें छोड़नी पड़ेगी जिस से फायदे की तो कोई गारंटी नहीं लेकिन जो तयशुदा नुकसान दिख रहे हैं उन की भरपाई फिर किसी टोटके से नहीं होने वाली.

सीट शेयरिंग के मामले में अब कांग्रेस भी उदारता से काम ले रही है. यही मजबूरी क्षेत्रीय दलों की हो चली है. अरविंद केजरीवाल और अखिलेश यादव ने नफेनुकसान का हिसाबकिताब वक्त पर लगा लिया, इसलिए अब बेफिक्री से चुनाव प्रचार कर रहे हैं ताकि सीट की तरह वोट शेयरिंग पर भी काम किया जा सके. इसी तरह ममता बनर्जी जल्द कोई फार्मूला निकाल लें तो बात किसी हैरानी की नहीं होगी.

ममता बनर्जी की सब से बड़ी दिक्कत वह भाजपा है जो 2019 के आम चुनाव में चौंकाते पश्चिम बंगाल की 42 में से 18 लोकसभा सीटें 40.25 फीसदी वोटों के साथ ले गई थी जबकि 2014 के चुनाव में उसे महज 2 सीटें 17 फीसदी वोटों के साथ मिली थीं. ममता भाजपा के बढ़ते प्रभाव से सकते में थीं क्योंकि भगवा गैंग के बढ़ते प्रभाव ने राज्य में हिंदूमुसलिम बड़े पैमाने पर शुरू कर दिया था. विधानसभा चुनाव आतेआते वे संभल भी गईं थीं लेकिन खतरा अब फिर मुंहबाए खड़ा है.

भाजपा को अगर 18 से 8 पर लाना है तो उन्हें कांग्रेस और वामदलों का साथ लेना ही पड़ेगा नहीं तो वोट फिर बंटेगा और घाटे में टीएमसी ही रहेगी क्योंकि 2014 के चुनाव में कांग्रेस और वामदलों को सीटें भले ही 6 मिली हों लेकिन उन का वोट शेयर 12 फीसदी था. साफ है कि वामदलों का वोट बड़े पैमाने पर भाजपा की तरफ गया था.

सीटों के लिहाज से पश्चिम बंगाल भाजपा के लिए ज्यादा अहम हो चला है जहां वह पिछले प्रदर्शन को दोहराना चाहेगी उलट इस के, ममता कभी नहीं चाहेंगी कि भाजपा और बढ़े लेकिन उसे रोकने के लिए वे क्या करती हैं, यह देखना दिलचस्प होगा. पंचायत चुनावों में कांग्रेस और कम्यूनिस्टों का प्रदर्शन सुधरा है, उन्होंने भाजपा और टीएमसी दोनों के ही वोट काटे हैं. यही ट्रैंड इस चुनाव में भी कायम रहा तो फायदे में भाजपा ही रहेगी.

लाख टके का सवाल गठबंधन नेताओं के सामने यह मुंह बाए खड़ा है कि वोट शेयरिंग का फार्मूला कहां मिलेगा. जाहिर है अब लोकतंत्र की लड़ाई धर्म से है और सीधेतौर पर कहें तो सवर्ण बनाम गैरसवर्ण है जिस के बारे में आगरा में ही अखिलेश यादव की बातों को विस्तार देते राहुल गांधी ने कहा था कि देश में पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों की आबादी 88 फीसदी है लेकिन देश की बड़ीबड़ी कंपनियों के मैनेजमैंट में इन वर्गों के लोग आप को नहीं मिलेंगे. ये लोग आप को मनरेगा कौन्ट्रैक्ट लेबर की लिस्ट में मिलेंगे. हमें यही बदलना है और यही सामाजिक न्याय का मतलब है. पौराणिक सोच वाले सवर्णों की औरतों की स्थिति उन्हीं के घरों में रहते हुए भी कोई अच्छी नहीं है क्योंकि उन के पास कानूनों के बावजूद न अधिकार हैं, न तन कर खड़े होने के अवसर.

धर्मांधता का इलाज क्या

पौराणिक और अब लोकतांत्रिक वर्णव्यवस्था की इस से आसान व्याख्या कोई और हो भी नहीं सकती लेकिन इस बात को लोगों के गले उतारना या उन्हें वोट देने की हद तक सहमत करना भी आसान काम नहीं है. भाजपा कोई 15 फीसदी सवर्ण वोटों के भरोसे ही नहीं इतरा रही बल्कि धर्म के नाम पर और मुसलमानों के खौफ के नाम पर उसे पिछले 2 लोकसभा चुनावों में इफरात से दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों के भी वोट मिले हैं. इसलिए वह इन दोनों मुद्दों को नहीं छोड़ रही. वह लगातार मंदिरों की ताबड़तोड़ राजनीति कर रही है.

जब अखिलेश और राहुल लोकतंत्र व सामाजिक न्याय की दुहाई आगरा में दे रहे थे ठीक उसी वक्त नरेंद्र मोदी द्वारका के समुद्र में डुबकी लगाते एक दिव्य अनुभव ले रहे थे. उन के हाथ में मोरपंख और साथ में कैमरामैन और सिक्योरटी गार्ड भी थे. ईश्वर में अनास्था और अविश्वास का इस से बड़ा उदाहरण कोई और हो भी नहीं सकता कि आप सुरक्षा के लिए बजाय ऊपर वाले के, नीचे वालों की मदद लें.

आज धर्मांधता देशभर में फैली है. संपन्न, शक्तिशाली सवर्ण तो इस से कोई सम?ाता करने को तैयार नहीं जिन्हें न महंगाई सताती, न बेरोजगारी और न

ही भ्रष्टाचार से ही कोई सरोकार है. मुख्यधारा पर काबिज यह वर्ग एक जनून के तहत जी रहा है जो आगे चल कर उसी के लिए घातक साबित होगा लेकिन वह धर्म और उस की राजनीति ही क्या जो लोगों को उन के भविष्य के बारे में सोचने दे. वह तो एक पूरे वर्ग का वर्तमान नष्ट करती है जिस से भविष्य तो एडवांस में चौपट हो ही जाता है.

भाजपा की मंदिर नीति के चलते सब से बड़ा नुकसान सवर्णों और उन में भी युवाओं का ज्यादा हो रहा है. ये युवा बेरोजगारी के सब से बड़े शिकार हैं जो न तो डिलीवरी बौय बन सकते हैं न अग्निवीर और न ही ये चायपकौड़े का ठेला लगा सकते हैं. लेकिन अफसोस और हैरत की बात यह कि ये बेचारे बेरोजगारी का विरोध भी नहीं कर पाते, बात आखिर भाजपा के प्रति निष्ठा की जो है.

भोपाल के एक ऐसे ही युवा अक्षत दुबे (बदला नाम) की मानें तो दिक्कत यह है कि अधिकतर ऊंची जाति वाले नरेंद्र मोदी की आलोचना न सुनना चाहते हैं न करने देना चाहते हैं. ये लोग एक ?ाठी आस लिए महाकाल, काशी और अब अयोध्या के भी चक्कर काटने लगे हैं जबकि पिछड़ों और दलितों में ऐसा न के बराबर है.

अक्षत की मां भोपाल के ही एक सरकारी कालेज में प्राध्यापक हैं. वे कहती हैं कि जैसेजैसे समाज में ऊंची जाति वाले हिंदुओं का दबाव बढ़ रहा है वैसेवैसे मुसलिम, पिछड़ा और दलित युवा तेजी से पढ़ रहा है. पीएससी सहित दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं में ड्यूटी के दौरान यह देख हैरानी होती है कि इन में शामिल उम्मीदवार अधिकतर मुसलिम और दलित व पिछड़े हैं और उन में भी युवतियों की संख्या युवकों के लगभग बराबर ही है. इन प्रोफैसर के मुताबिक, मोदीराज में सवर्ण दोहरीतिहरी मार ?ोल रहा है. उस के धार्मिक खर्च बेहद बढ़े हैं और आमदनी में इजाफा नहीं हो रहा है. अब अधिकतर सवर्ण जमापूंजी खर्च कर रहे हैं जो अभी, न दिख रही है न किसी की सम?ा आ रही है. इस के बाद भी वे भाजपा का विरोध नहीं करना चाहते.

जातियों का एक बड़ा गड़बड़?ाला देश में है जिस की तरफ इंडिया ब्लौक का भी ध्यान नहीं जा रहा. वह यह हकीकत वोटर को नहीं सम?ा पा रहा कि महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से बड़ी समस्या धर्म की राजनीति कैसे है जिस ने सवर्णों के साथ पिछड़ों और दलितों को भी अपनी ग्रिप में ले लिया है. भाजपा किनकिन नए तरीकों व हथकंडों से धर्म और जाति की राजनीति करते खुद के व देश के भविष्य की परवा नहीं कर रही, इसे सम?ाने के लिए राज्यसभा चुनाव की क्रौस वोटिंग के अलावा किसान आंदोलन और दक्षिण के साथ भेदभाव भी साक्षात उदाहरण हैं.

सरकार लाचार नहीं, चालाक है

किसान आंदोलन के दौरान मीडिया और सोशल मीडिया पर प्रचार यह किया गया कि प्रदर्शन कर रहे किसान खालिस्तानी और ऐयाश हैं. उन के पास महंगीमहंगी कारें हैं. वे विदेशी एजेंट हैं, देश के दुश्मन हैं वगैरहवगैरह. बात में दम लाने के लिए कई वीडियो वायरल किए गए जिस से किसानों की इमेज बिगड़े. ऐसे ही कुछ वायरल वीडियोज में बताया गया कि आंदोलनकारी किसान शराब पी रहे हैं, शराब बांट रहे हैं और तवायफों के साथ रंगरलियां मना रहे हैं. यह और बात है कि मीडिया के ही फैक्ट चैकरों ने पाया कि तमाम वीडियो ?ाठे और फर्जी हैं.

यह प्रचार एक अभियान के तहत कौन करता है, यह बात किसी सबूत की मुहताज नहीं रह गई है कि दक्षिणपंथी और दक्षिणापंथियों की नजर में किसानों की हैसियत शूद्रों सरीखी ही रही है. सरकार चूंकि किसानों से घबराई हुई है, इसलिए उन के आंदोलन को दुष्प्रचार कर कुचलना चाहती है. राहुल गांधी और इंडिया ब्लौक किसानों की मांगें पूरी करने का आश्वासन दे रहे हैं लेकिन उन के सम्मान और स्वाभिमान पर सरकार को नहीं घेर पा रहे जिस से किसान आंदोलन पूरी तरह चुनावी मुद्दा नहीं बन पा रहा.

यही हाल दक्षिणी राज्यों का है जहां कहीं भाजपा सत्ता में नहीं है और न ही उसे इन राज्यों से ज्यादा उम्मीदें हैं. इन राज्यों की सरकारें आएदिन केंद्र पर भेदभाव के आरोप लगाती रहती हैं. हालात तो तब और विस्फोटक व चिंतनीय हो जाते हैं जब डी के सुरेश जैसा दक्षिणी नेता अलग देश की बात कहने लगता है. इस कांग्रेसी सांसद ने बेहद व्यथित होते कहा था कि ‘केंद्र सरकार कर्नाटक को पर्याप्त पैसा नहीं दे रही है. दक्षिणी राज्यों को जीएसटी और प्रत्यक्ष करों के हिस्से का सही अधिकार नहीं दिया जा रहा है. केंद्र को हम से 4 लाख करोड़ रुपए से भी ज्यादा मिल रहा है और बदले में हमें जो मिल रहा है वह न के बराबर है.’

इस सिलसिले में कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने 7 फरवरी को दिल्ली के जंतरमंतर पर अपने पूरे मंत्रिमंडल के साथ धरना देते उन तमाम तथ्यों को उजागर किया था जिन के चलते उन्हें लावलश्कर के साथ दिल्ली जा कर धरना देना पड़ा था. यह इत्तफाक की बात नहीं थी कि इस के दूसरे ही दिन केरल के मुख्यमंत्री पी विजयन को भी उन का अनुसरण करना पड़ा. उन की व्यथा भी वही थी जो सिद्धारमैया की थी. कमोबेश तेलंगाना सरकार के आरोप भी बहुत अलग नहीं हैं.

इस विरोध ने उस वक्त और जोर पकड़ा था जब तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने पी विजयन को पत्र लिखते कहा था कि इस लड़ाई में तमिलनाडु न केवल केरल के साथ है बल्कि इस बारे में वाम लोकतांत्रिक मोरचा सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका के साथ खुद को भी संबोधित करेगा.

इन दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी तथ्य और आंकड़े पेश किए थे कि कैसे केंद्र सरकार उन के राज्यों के साथ वित्तीय भेदभाव कर रही है. ऐसे में यह सोचना और चिंता करना वाजिब है कि कहीं देश उस विभाजन या विभाजन के उन धार्मिक क्षेत्रीय और जातीय कारणों की तरफ तो नहीं बढ़ रहा जो कभी यूगोस्लाविया में हुआ था.

यह हुआ था यूगोस्लाविया में यूगोस्लाविया में लगातार धार्मिक, क्षेत्रीय और जातीय विवाद एक समूचे महासंघ के पतन और विभाजन की वजह बने. बहुत संक्षेप में देखें तो द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद कई देशों को मिला कर यूगोस्लाविया बना था.

यूगोस्लाविया के डैमोक्रेटिक फैडरल यूगोस्लाविया बनने और कुछ समय बाद सोशलिस्ट फैडरल रिपब्लिक औफ यूगोस्लाविया में तबदील हो जाने से ले कर 1990 में विघटन तक की दिलचस्प लेकिन घातक दास्तां बयां करती है कि दरअसल यूगोस्लाविया के अंदर गणराज्यों और खासतौर से जातीय समूहों के विस्तार से पहले सवर्ण और दूसरी जातियों के बीच महत्त्वपूर्ण असमानता थी जो इस के जन्म से ही एक बुनियादी कमजोरी थी. इसे भारत में किसान आंदोलन, राज्यसभा में हुई क्रौस वोटिंग और दक्षिणी राज्यों के आरोपों के मद्देनजर देखते हुए देश को अभी से सचेत हो जाना जरूरी ही नहीं बल्कि वक्त की मांग हो चली है.

जो लोग यह जानते हैं कि यूगोस्लाविया के स्थायी राष्ट्रपति मार्शल टीटो का असली नाम जोसिप ब्रोज टीटो था, वे यह भी जानते हैं कि मार्शल टीटो एकता और भाईचारे के हिमायती थे और उन्होंने इस महासंघ के भीतर पनपते खतरनाक राष्ट्रवाद पर अंकुश लगाए रखा. इस बाबत उन्होंने स्वायत्त प्रांतों के 8 नेताओं में से एक की रोटेशन के आधार पर सालभर के राष्ट्रपति पद की प्रणाली बनाई थी. मार्शल टीटो के अंतर्गत सोवियत संघ का हिस्सा न होते हुए भी यूगोस्लाविया कम्युनिस्ट रहा था पर एक इंडस्ट्रियल ताकत बन गया था जहां बहुत सी चीजें हर नागरिक को मुफ्त मिल रही थीं.

टीटो सोवियत संघ के प्रधानमंत्री जोसेफ स्टालिन के अनुयायी थे और उन की इमेज एक अर्ध-तानाशाह की थी पर फिर भी उन के शासन के दौरान यूगोस्लाविया एक ताकतवर औद्योगिक देश बन गया था और उस की अर्थव्यवस्था भी प्रभावी थी. इस की प्रमुख वजह टीटो का खुद को स्टालिन से अलग कर समाजवाद को एक नया आकार देना था. स्टालिन चाहते थे कि यूगोस्लाविया सोवियत संघ के नियंत्रण में रहे लेकिन टीटो को यह गवारा नहीं हुआ.

टीटो का मंत्र

एकता और भाईचारे का टीटो का मंत्र कारगर रहा. द्वितीय विश्व युद्ध में इस क्षेत्र के 10 से 15 लाख लोग मारे गए और यह दोहराया न जाए इसलिए जीत के बाद यूगोस्लाविया को 6 गणराज्यों बोस्निया और हर्जेगोविना, क्रोएशिया, मैसेडोनिया, मोटेनेग्रो, सर्बिया और स्लोवानिया के एक संघ के रूप में स्थापित किया गया था. क्षेत्रीय, धार्मिक और  जातीय या नस्लीय कुछ भी कह लें विवादों को हल करने के लिए यूगोस्लाविया पार्टी की कम्युनिस्ट लीग की शाखा और अभिजात्य वर्ग का एक शासक गणराज्य में था जो संघीय स्तर पर विवादों को हल करता था. इसे युगोस्लाव मौडल के नाम से जाना जाता था जो अघोषित तौर पर बुद्ध के मध्यमार्ग के सिद्धांत पर काम करता था.

टीटो का यह नया प्रयोग कमोबेश कामयाब रहा. पूरी दुनिया चमत्कृत थी क्योंकि टीटो ने वह कर दिखाया था जिस की उम्मीद किसी को नहीं थी. उस दौर में यूगोस्लाविया को कम्युनिस्टों का स्वर्ग कहा जाने लगा था. कुछ सालों बाद ही टीटो ने ही गुटनिरपेक्ष आंदोलन की भी नींव रखी जिस में भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का भी बराबर का योगदान था. इस का मकसद उन देशों को अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में एक सम्मानजनक स्थान दिलाना था जो दुनिया की दोनों महाशक्तियों अमेरिका और सोवियत संघ के पिछलग्गू नहीं बने रहना चाहते थे. भारत उन में से एक था. जवाहरलाल नेहरू और मार्शल टीटो की दोस्ती एक मिसाल या उदाहरण कुछ भी कह लें, बन गई थी.

लेकिन 1980 में टीटो की मौत के बाद जो हुआ वह भी हर किसी की उम्मीद के बाहर था. साम्यवाद कहने भर की बात रह गई और यूगोस्लाविया हाहाकार कर उठा. जातीय संघर्ष ने जो सिर उठाया तो यूगोस्लाविया के 6 टुकड़े हुए. नागरिक शास्त्र की भाषा में कहें तो गणराज्यों की सरकारों ने उन शक्तियों का प्रयोग करना शुरू कर दिया जो संविधान ने उन्हें दी थीं. लेकिन असल लड़ाई दरअसल धर्मों और जातियों के वर्चस्व की थी जिस के तहत सर्बो, क्रोएट्स, स्लोवेनियों और अल्बानियों सहित मुसलमानों और रूढि़वादी ईसाईयों ने अलग देश और आजादी की मांग शुरू कर दी. देखते ही देखते रोजरोज की हिंसा यूगोस्लाविया की नियति बन गई और जातीय हिंसा में लाखों लोग, जिन में सभी जातियों के लोग शामिल थे, मारे गए.

यह गृहयुद्ध लंबा चला और तभी थमा जब एकएक कर 6 देश बोस्निया और हर्जेगोविना, क्रोएशिया, मैसेडेनिया, मोटेनेग्रो, सर्बिया और स्लोवेनिया नहीं बन गए. जातियों का जो वीभत्स और हिंसक रूप 90 के दशक की शुरुआत में यूगोस्लाविया में दिखा वह सत्ता के जरिए अपनीअपनी बादशाहत स्थापित करने का ऐसा टोटका था जिस से किसी को कुछ हासिल नहीं हुआ और जो हुआ वह सिर्फ महाभारत सरीखा खूनखराबा था जिस में सब अपनों के ही खून के प्यासे हो गए थे. यह खेल अब भारत में भी खेला जा रहा है जो बहुत साफतौर पर दिख नहीं रहा लेकिन इसे मौजूदा आम चुनाव के मद्देनजर साफसाफ महसूस किया जा सकता है.

अनुमान है कि 20 लाख से ज्यादा लोग घरों को छोड़ कर भागे, 6-7 लाख लोग बुरी तरह उन के हाथों मारे गए जो 30 साल साथसाथ रहे, औरतोंलड़कियों को उठाया गया  और उन का बलात्कार किया गया. संयुक्त राष्ट्र संघ ने लड़ाई रोकने के लिए सेना गठित की और हवाई जहाजों ने बमबारी की. भारत व पाकिस्तान विभाजन जैसे हालात के बाद 6 देश बने. यह विश्व में कहीं और नहीं दोहराया जाएगा, इस की कोई गारंटी नहीं है.

अत्याचार की शासनकला

जहां भी शासकों ने एक खास वर्ग के लोगों को साथ ले कर दूसरे वर्गों के साथ अत्याचारों को शासनकला के रूप में अपनाया है, वहां उसी खास वर्ग में अपने भेद भी पैदा हुए. यह कहानी अफ्रीका के कितने ही देशों में दोहराई गई, कंबोडिया भी नरसंहारों की कहानी आज भी हर पर्यटक को दिखाता है. हर समझदार शासक को उन विभाजक ताकतों के जहरीले फनों के लिए तैयार रहना चाहिए, ये 2 वर्षों बाद भी सिर उठा सकते हैं, 2 दशकों बाद भी.

विभिन्न धर्मों, जातियों और भाषाई व अन्य संस्कृतियों की धरोहर सिर पर ढोने वाले कैसे एकदूसरे के खून के प्यासे हो सकते हैं, यह यूगोस्लाविया के उदाहरण से साफ है. 1945 के बाद विश्व युद्ध खत्म होने पर 6 इलाके एकसाथ जनरल मार्शल टीटो के शासन के दौरान खासी तरक्की कर पाए थे. जोसिप ब्रोज टीटो ने अलगअलग लोगों को कम्युनिस्ट ?ांडे के नीचे एक रखा लेकिन 1980 में उस की मृत्यु के बाद गृहयुद्ध शुरू हो गया.

एक इलाके बोस्निया में 20 लाख लोगों को घर छोड़ने को मजबूर होना पड़ा और एक लाख लोग मारे गए. बोस्निया और हरजेगोविना में मुसलिम ठिकानों को नष्ट करने के चक्कर में बेरहमी से कत्लेआम हुए. सदियों से साथ रहने वाले एकदूसरे के खून के प्यासे हो गए. यूगोस्लाविया आज देशों में विभाजित है तो इसलिए कि मार्शल टीटो की सब को एक सूत्र में बांधने की कोशिश धर्म, जाति, भाषा व संस्कृति के ठेकेदारों को पसंद नहीं आई.

यह अफ्रीका के कई देशों में हुआ है. दक्षिणी अमेरिका में हुआ. अफगानिस्तान अछूता नहीं है. जो देश जितना कट्टर है, उतनी ज्यादा वहां इलाकाई ताकतें बढ़ जाती हैं. श्रीलंका के सिंहली और तमिलों के संघर्ष में हजारों मारे गए थे.

होश में आएगी जनता

इस खेल में भाजपा इतनी अंधी हो चुकी है कि नीतीश कुमार और जयंत चौधरियों जैसों को भी वह हाथोंहाथ ले रही है जिन का अपना कोई ईमानधर्म नहीं. भगवा गैंग इस हकीकत को भी सम?ाता है कि नीतीश या जयंत का जो थोड़ाबहुत वोटबैंक है उस का पूरा हिस्सा उसे नहीं मिलने वाला लेकिन जो भी मिले वह उस से भी नहीं चूक रही.

हैरानी या अफसोस की बात यह है कि भाजपा का कोर वोटर भी इन भगोड़ों से परहेज नहीं करता क्योंकि उसे मालूम है कि किस छलकपट से महाभारत का युद्ध पांडवों ने जीता था. कर्ण, भीष्म, अश्वथामा और अभिमन्यु जैसे महारथी उन्होंने साजिश रच कर ही मारे थे. अगर यही धर्म और मौजूदा चुनावी नीति है तो इस की हकीकत आम लोगों तक पहुंचाना और सम?ाना न राहुल गांधी के बस की बात है, न अखिलेश यादव के और न ही ममता बनर्जी या अरविंद केजरीवाल के. गुनाहगार ये भी कम नहीं जो जानेअनजाने में भाजपा की तर्ज पर ही राजनीति कर रहे हैं. अच्छा तो यह है कि अब वे एकदूसरे का सहारा बन भी रहे हैं और सहारा दे भी रहे हैं.

लेकिन यह लोकतंत्र है जिस में आज नहीं तो कल जनता होश में आती ही है पर तब तक उस का और देश का जो नुकसान हो चुका होता है उस की भरपाई में सालों लग जाते हैं क्योंकि इस दौरान सामाजिक तानाबाना भी तहसनहस हो चुका होता है, ठीक वैसे ही जैसे मुगलों के आने के बाद और उन से पहले भी हुआ करता था.

मौजूदा समाज के एक बड़े वर्ग की पौराणिक मानसिकता लाइलाज नहीं है लेकिन यह मर्ज अकसर एडवांस स्टेज पर आ कर ही ठीक होता है. यह अनुभव या सबक भी इतिहास से ही मिलता है. ऐसे में यह देश के लिए हितकारी होगा कि लोग वक्त रहते संभल और सम?ा जाएं.

रही बात इंडिया गठबंधन की, तो उसे इस हकीकत से लोगों को रूबरू कराना होगा. लेकिन यह जिम्मेदारी जिस मीडिया और बुद्धिजीवियों की भी है उन में से अधिकतर नीलाम हो चुके हैं या अपने को गिरवी रख चुके हैं, सो, तो कोई क्या कर लेगा. यह लोकसभा चुनाव सीटों से ज्यादा वोट फीसदी के लिहाज से ज्यादा अहम साबित होगा जो यह भी साबित करेगा कि देश के कुल कितने फीसदी लोग वर्णव्यवस्था की वापसी चाहते हैं और कितने फीसदी खुली हवा में सांस लेना चाहते हैं लेकिन चुनाव और राजनीति से परे यह जरूर सब की सामूहिक जिम्मेदारी है कि हम ही यूगोस्लाविया से सबक लें.

अमेरिका में यूरोप के हर देश के लोग गए, काले गुलाम आए, चीनी मजदूर आए, मूल  रेड इंडियन हैं पर वहां आज सब को मौके मिल रहे हैं, कुछ कम, कुछ ज्यादा. कोई नाराज नहीं है. इसीलिए वहां मतभेदों के बावजूद लोकतंत्र की मूल भावना सिरफिरे डोनाल्ड ट्रंप के बावजूद जिंदा है. वहां आर्थिक स्तर 8,000 डौलर प्रतिव्यक्ति प्रतिवर्ष है जबकि मंदिरों से भरे देश भारत में घिसटघिसट कर हम 2,500 डौलर के आसपास हैं.

हमारे पास विभाजक मुद्दों का समय नहीं होना चाहिए. जिस देश में 80-85 करोड़ लोगों को मुफ्त का राशन गरीबी के कारण देना पड़ रहा हो, उस देश के पास भव्य मंदिरों के निर्माण करने या जनता से वसूले टैक्स या मुनाफे से नाचगानों के आयोजन करने की फुरसत नहीं होनी चाहिए.

 

ख्वाब पूरे हुए: भाग 1

मन्नो और नकुल ने बाली उम्र में मातापिता की मरजी के खिलाफ प्रेमविवाह कर तो लिया लेकिन जल्दी ही उन्हें आटेदाल का भाव पता चल गया. जिंदगी की गाड़ी सिर्फ प्यार से नहीं चलती. तो क्या, दो प्यार करने वालों के इरादे, ख्वाब, उम्मीदें सब फना हो गए?

‘‘म  न्नो, मन्नो.’’

‘‘हां, बोलो. फुरसत मिल गई अपने काम से या अभी भी पिज्जा डिलीवरी के लिए और जाना है?’’

‘‘मन्नो, सुनो तो. यों मु?ा पर गुस्सा तो मत करो, प्लीज.’’

‘‘गुस्सा न करूं तो क्या करूं, रोजाना आधी रात के बाद घर लौटते हो. कभी सोचा है, आधी रात तक का मेरा वक्त कैसे बीतता है अकेले बिस्तर पर करवटें बदलतेबदलते?’’

‘‘सब सम?ाता हूं, मन्नो. लेकिन मैं करूं तो क्या करूं, घर बैठ जाऊं? पिछले महीने घर बैठा तो था, याद है या भूल गईं? दो वक्त की रोटियों तक के लाले पड़ गए थे. इतनी मुश्किल से तो यह नौकरी मिली है. अब इसे भी छोड़ दूं?’’

‘‘दूसरी नौकरी तलाशोगे तब तो मिलेगी. तुम्हारी यह आधीआधी रात तक की नौकरी मु?ो तो फूटी आंख नहीं सुहाती. दिनदिन की नौकरी करो न भलेमानुषों की तरह. मैं भी तो नौकरी करती हूं. शाम को 7 बजतेबजते लौट आती हूं कि नहीं. अरे ढूंढ़ोगे तब तो मिलेगी न नौकरी. यों हाथ पर हाथ धर कर तो मिलने से रही नई नौकरी.’’

‘‘तो तुम्हारा मतलब है कि मैं हाथ पर हाथ रख कर बैठा रहता हूं? बस, बस, अपनी नौकरी को ले कर ज्यादा उड़ो मत. तुम चाहती हो कि तुम्हारी इस 10,000 रुपए की नौकरी के दम पर मैं अपनी लगीलगाई नौकरी छोड़ दूं और फिर से सड़कों की खाक छानूं?’’

‘‘मेरी 10,000 रुपए की नौकरी तुम्हारी इस फूड डिलीवरी की नौकरी से लाख गुना बेहतर है. कम से कम समय पर घर तो आ जाती हूं मैं.’’

‘‘अब कितनी बार आधी रात घर लौटने को ले कर ताने सुनाओगी. बस भी करो, यार. अपना स्यापा बंद भी करो. न चैन से खुद रहती हो और न ही मु?ो रहने देती हो. जिंदगी नरक बन कर रह गई है.’’

‘‘नरक बनी है तुम्हारी करनी से. मेरा उस से क्या लेनादेना? शादी की थी यह सोच कर कि अकेले से दुकेले होंगे तो जिंदगी में सुकून आएगा. लेकिन यहां तो तुम उलटी ही गंगा बहा रहे हो. बताना जरा, शादी के बाद क्या सुख दिया तुम ने, सिवा कंगाली और अकेलेपन के?’’

‘‘मैं ने सुख नहीं दिया तो ढूंढ़ लेतीं कोई रईस आसामी, जो घर बैठाबैठा तुम्हारे सौसौ नखरे उठाता,’’ भीषण गुस्से से उबलते हुए अपने हाथ में थामा गजरा जमीन पर फेंकते हुए नकुल पत्नी मन्नो पर गरजा और करवट बदल कर सोने की कोशिश करने लगा. उधर, मन्नो भी पति नकुल के आज शादी की पहली वर्षगांठ पर भी आधी रात के बाद घर लौटने को ले कर बेहद गुस्सा थी. अंतस का क्रोध आंखों की राह बह रहा था. मन में खयालों की उठापटक जारी थी.

आंखें मूंद कर सोने का असफल प्रयास करतेकरते मनपंछी कब अतीत के सायों में अटकनेभटकने लगा, उसे तनिक भी एहसास न हुआ. उस ने एक छोटे से शहर में सफाई कर्मचारी मातापिता के घर में जन्म लिया था. बचपन से ही मातापिता दोनों शहर के एक अपार्टमैंट के प्रांगण को बुहारने का काम करते. वह बचपन से ही एक परिष्कृत रुचि संपन्न लड़की थी. जैसेजैसे उम्र के पायदान पर चढ़ रही थी, मातापिता के सफाई के काम को ओछी नजर से देखती. बेहद संवेदनशील स्वभाव की थी वह. बचपन में जब भी सहेलियां आपस में अपने मातापिता, उन के कामकाज की बातें करतीं, मातापिता का सफाई कर्मचारी के तौर पर परिचय देने पर उन की नजरों में आए बदलाव को भांप जाती और इसे ले कर मन ही मन घुलती.

5वीं-6ठी कक्षा में आतेआते उस की कोई हमउम्र सहेली नहीं बची थी, जिस के साथ वह मन की बातें सा?ा कर पाती. यहां तक कि उसे अपने घर से लाया टिफिन भी अकेले ही खाना पड़ता. कोई भी सखी ऐसी न थी जो उस के साथ खाना पसंद करती.

वक्त का कारवां कब रुका है? देखतेदेखते वह 11वीं कक्षा में आ पहुंची. तभी उस की नजरें अपनी ही कक्षा के एक सहपाठी नकुल से भिड़ीं. नकुल को पतलीदुबली, दोनों गालों पर डिंपल वाली, बड़ीबड़ी सीपीनुमा आंखों वाली, उदास सी अपनेआप में खोईखोई क्लास में पीछे अकेली बैठी मन्नो बहुत अच्छी लगती. ख्वाबोंखयालों की उम्र में वक्त के साथ दोनों ही एकदूसरे को दिल दे बैठे और अकसर दोनों स्कूल में एकसाथ देखे जाते.

बरसों से कक्षा की सहेलियों की उपेक्षा से व्यथित मन्नो को जैसे जीवनदान मिला. समय के साथ नकुल से उस की नजदीकियां बढ़ीं और दोनों एकसाथ जीनेमरने की कसमें खाने लगे. दोनों ही बेहद भावुक स्वभाव के थे. सो, अब एकदूसरे से अलगअलग रहना दोनों को ही रास नहीं आ रहा था.

दोनों ने अपनेअपने घरों में एकदूसरे से विवाह की बात छेड़ी, लेकिन दोनों को ही इस शादी को ले कर जातिभेद की वजह से अपनेअपने मातापिता का सख्त प्रतिरोध सहना पड़ा.

दोनों के मातापिता ने उन के विवाह संबंध से साफसाफ इनकार कर दिया.

करेला और नीम चढ़ा, कच्ची उम्र और प्यार का जनून, दोनों ने घर से भाग कर शादी करने का फैसला किया, लेकिन भूल गए कि जिंदा रहने के लिए रोटी, कपड़ा और मकान की जरूरत होती है.

दोनों मन्नो और नकुल ने 12वीं की बोर्ड परीक्षा के बाद अपने घनिष्ठ दोस्तों के उकसाने पर आर्य समाज मंदिर में उन की मौजूदगी में एकदूसरे से ब्याह रचा लिया. नकुल ने अपनी मां को पहले से ही बता रखा था कि वह एक लड़की से प्यार करता है. उसे अपनी मां पर, उन के प्यार पर अटूट भरोसा था कि वे हर हाल में मन्नो को अपनी बहू के तौर पर अपना लेंगी. नकुल सोच ही न पाया कि उस के मातापिता उस से कमतर जाति की सफाई कर्मचारी मातापिता की संतान को अपनी बहू के रूप में हरगिज नहीं स्वीकारेंगे.

विवाह के बाद जब नकुल अपनी नवोढ़ा दुलहन को रोजमर्रा के कपड़ों में सिंदूर से भरी मांग के साथ पिता के घर की दहलीज पर पहुंचा, उस की मां और पिता ने उन दोनों के मुंह पर यह कहते हुए धड़ाम से दरवाजा बंद कर दिया कि, ‘हमारे घर में लोगों का मैला साफ करने वालों की लड़की के लिए कोई जगह नहीं.’

नकुल ने उन्हें बहुत सम?ाने की कोशिश की कि वे मात्र एक आवासीय कालोनी के प्रांगण को बुहारने का काम करते हैं, मैला साफ करने का नहीं. लेकिन बेटे की इस नाफरमानी से बुरी तरह से रुष्ट पिता ने उन से अपने सारे रिश्ते तोड़ने की कसमें खाते हुए उन दोनों को अपने घर में घुसने तक की इजाजत न दी.

दोनों पतिपत्नी उन के घर की ड्योढ़ी पर घंटों बैठेबैठे उन से दरवाजा खोलने की गुहार करते रहे, लेकिन पिता का मन न पसीजा. थकहार कर नकुल मन्नो को अपने निसंतान मामामामी के यहां ले गया, जिन का उस पर विशेष स्नेह था. मन्नो के मातापिता ने भी बेटी के इस निरंकुश आचरण से क्षुब्ध हो उस से सारे रिश्ते तोड़ लिए थे.

मामामामी के यहां वे दोनों करीब महीनेभर रहे. महीना बीततेबीतते मामामामी के व्यवहार में भी तुर्शी आने लगी और दोनों को ही एहसास हुआ कि अब अपनी लड़ाई लड़ने का वक्त आ गया है. सो, दोनों अपने लिए काम की तलाश करने लगे.

 

जय दलबदल

राज्यसभा के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के चुनाव मैनेजरों ने कमाल दिखाते हुए हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश में एकएक सीट ज्यादा जीत ली. उन्होंने ‘रामभक्त’ विधायकों को ढूंढ़ा जो कांग्रेस या समाजवादी पार्टी के टिकट पर जीत कर विधायक बन कर आए थे और उन्हें भाजपा उम्मीदवार को वोट देने को राजी कर लिया.

सांसदों, विधायकों, पार्षदों का आयाराम गयाराम खेल एंटी डिफैक्शन एक्ट 1985 व 2003 के बावजूद आज भी चल रहा है और पिछले सालों में कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार आदि में सरकारें तक बदली हैं. भारतीय जनता पार्टी यानी भाजपा के मैनेजरों का कमाल है कि वे जनता के वोट पर उन के विरुद्ध जीत कर आए, चुने गए जनप्रतिनिधियों से बातचीत बंद नहीं करते और उन्हें भक्ति वाले खेमे में लाने के लिए लगातार कोशिशें करते रहते हैं.

दूसरी पार्टियों के पास आज धर्म की काट करने वाला कोई तर्क नहीं है. वोटर ने चाहे धर्म की राजनीति की जगह दूसरे मुद्दों पर वोट दिया हो, भाजपा मैनेजर चुप नहीं रहते और लगातार मेहनत करते रहते हैं कि धर्म की ‘तथाकथित रक्षा’ के लिए दलबदल का पाप करना गलत नहीं है. यह तो जाहिर ही है कि धर्म वाली पार्टी के साथ जाने पर परलोक सुधरने की ‘तथाकथित गारंटी’ होती है, हां, इहलोक फिलहाल जरूर सुधरता है.

धर्म के नाम पर जो लोग पार्टियां बदल लेते हैं उन्हें इहलोक में बहुत से दैत्यों के आक्रमणों से छुटकारा भी मिल जाता है. जब जातिगत श्रेष्ठता मिल रही हो, सुरक्षा मिल रही हो, तथाकथित स्वर्ग मरने से पहले मिल रहा हो व मरने के बाद भी मिलने की तथाकथित गारंटी हो तो ऐसे में आम जनता की कौन और क्यों चिंता करे, जय दलबदल.

बोझ नहीं रिश्ते दिल के: भाग 3

आखिरकार, सविता दीदी उस के सामने खुली किताब की तरह खुलती चली गयीन. जमाने के तीरों से लहूलुहान पर यत्न कर सहेज कर रखा दिल का दर्द उन की जबां पर आ ही गया. उस समय उन्होंने जो कहा उस का सारांश यह था कि उन का पति प्रतिष्ठित बिजनैसमैन परिवार का होने के बावजूद शराबी, जुआरी तथा दुराचारी था. उस के मातापिता को उस के ये अवगुण, अवगुण नहीं गुण नजर आते थे. उस ने अपने पति को समझाने की बहुत कोशिश की. पर वह नहीं माना. एक दिन शराब के नशे में उस ने उस के साथ संबंध बनाना चाहा तो मुंह से आती दुर्गंध ने उसे विरोध करने पर विवश कर दिया. फिर क्या था, उस ने उस पर हाथ उठा दिया. 

बहुत रोई थी वह उस दिन. अपने मातापिता से जब इस संबंध में बात की तो उन्होंने कहा, ‘सब्र कर बेटी, धीरेधीरे उस के सारे ऐब तेरे प्यार से समाप्त होते जाएंगें.’

पर ऐसा नहीं हो पाया. उस ने हर तरह से उस के साथ निभाने की कोशिश की. न चाहते हुए भी वह प्रैग्नैंट हो गई, पर उस के स्वभाव में कोई अंतर नहीं आ रहा था. गर्भावस्था के अंतिम दिनों में जब पत्नी को पति के सहारे की अत्यंत आवश्यकता होती है तब भी वह रातरातभर बाहर रहता था. यहां तक कि विपुल के जन्म के समय भी वह उस के पास नहीं था. किसी काम के कारण अगर वह न आ पाता तो कोई बात नहीं थी पर वह तो सुरासुंदरी में खोया रहता था. न जाने कैसी नफरत उस के दिल में समा गई थी कि उस ने उसी वक्त उसे छोड़ने का निर्णय ले लिया. आखिर कब तक वह जलालतभरी जिंदगी जीती. वह उसे छोड़ कर मायके चली आई.

उस के मातापिता ने उस के इस निर्णय का विरोध किया. ससुराल जा कर पैचअप कराने की कोशिश भी की पर उस के ससुराल वाले भी बेटे की तरह ही अक्खड़ निकले तथा बोले, ‘थोड़ा शराब पी कर मस्ती कर लेता है तो क्या बुराई है? यह तो अमीरजादों का लक्षण है. हमें क्या पता था कि आप लोग सोलहवीं सदी की मानसिकता वाले होंगे वरना हम अपने बेटे का विवाह आप के घर कभी न करते. वैसे भी दोष तो आप की लड़की का ही है जो उसे घर में बांध कर नहीं रख पाई.’

 मम्मीपापा अपना सा मुंह ले कर लौट आए तथा फिर से उस से अपने घर लौट कर स्थितियों को अपने अनुकूल बनाने का प्रयत्न करने के लिए कहने लगे पर इतना सब होने पर लौटना उसे अपने आत्मसम्मान के विरुद्ध लगा. उस ने सीधेसीधे कह दिया कि अगर आप भी नहीं रखना चाहते तो कोई बात नहीं, मैं कोई और ठिकाना ढूंढ़े लूंगी. उस समय उस के छोटे भाई सरल ने मम्मीपापा के विरुद्ध जा कर उस का साथ दिया था. उस ने उसे ढाढस बंधाते हुए कहा था, ‘दीदी, तुम कहीं नहीं जाओगी. वैसे भी जिसे मेरी बहन की परवा नहीं है, उस के साथ मेरी बहन नहीं रहेगी.’ यह कह कर सरल ने अपना फैसला सुना दिया.

अभी यह सब कह ले पर जब बीवी आ जाएगी तब मुंह पर ताले लग जाएंगे. बेकार उसे शह दे कर उस की जिंदगी बरबाद कर रहा है. थोड़ाबहुत तो सब जगह चलता है पर हमारे खानदान में आज तक ऐसा कहीं नहीं हुआ कि बेटी ससुराल छोड़ घर बैठ जाए,’ मां ने उसे फटकारते हुए कहा था.

अगर ऐसा कभी नहीं हुआ तो यह कोई आवश्यक तो नहीं कि कभी हो ही न. हर काल में परिस्थतियां भिन्नभिन्न होती हैं, उसी के अनुसार इंसान को निर्णय लेना पड़ता है. मेरी बहन अनाथ नहीं है जो ऐसी जलालतभरी जिंदगी जिए. तुम परेशान मत हो, मां. दीदी की जिम्मेदारी उठाने का अगर मैं ने वादा किया है तो पूरी जिंदगी उठाऊंगा. पर मैं उसे उस शराबी, जुआरी के साथ रहने को मजबूर नहीं करूंगा,’ सरल ने दृढ़ स्वर में कहा.

इस की गलत बात को समर्थन दे कर तू ठीक नहीं कर रहा है. भुगतेगा एक दिन. और फिर हमारा समाज क्या वह इसे चैन से जीने देगा,’ मां ने उसे धमकी दी थी.

कैसी मां हैं आप, जो अपनी ही बेटी के दर्द को महसूस नहीं कर पा रही हैं. समाजसमाज, कहां था समाज जब जीजा ने आप की बेटी को थप्पड़ मारा. आदमी का हर ऐब समाज के लिए ठीक है लेकिन जब एक स्त्री अपना सम्मान से जीने का अधिकार मांगती है तो वह गलत है,’ सरल ने आक्रोशित स्वर में कहा.      

मां सरल की बात सुन कर उस समय चुप हो गईं. सरल के सहयोग से उन्होंने तलाक की अर्जी दे दी. ससुराल वालों को भला क्या आपत्ति थी. आखिर दोष तो लड़कियों में होता है, लड़कों में नहीं. उन्हें फिर से अपने बेटे का दूसरा विवाह कर अपनी तिजोरी भरने का एक और मौका मिल गया था.  

मां के तथा सगेसंबंधियों के व्यवहार ने सविता मेम को मायके में भी चैन से रहने नहीं दिया. सो, विपुल के थोड़ा बड़ा होते ही उन्होंने नौकरी के लिए एप्लाई करना प्रारंभ कर दिया. नौकरी मिलते ही वे विपुल को ले कर यहां आ गईं. अगर वहां रहतीं तो शायद शांति से जी न पातीं. वही लोग, वही बातें. उन की चिंता से अधिक उन की लाचारी, बेबसी लोगों को परेशान करती. वे उस माहौल में उन लोगों के साथ रह कर बेबस और लाचार नहीं कहलाना चाहती थीं. औरों की तो छोड़िए, उन की अपनी मां उन की स्थिति के लिए जबतब आंसू बहा कर कभी उन्हें दोषी ठहरातीं तो कभी जमाने को कोसतीं. कभी तो यहां तक भी कह देतीं कि लड़कियों को ज्यादा पढ़ाना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना है.

पति से तलाक लेने के बाद सविता मेम के भाई ने फिर से विवाह करने के लिए उन्हें समझाने की बेहद कोशिश की. यह भी कहा कि कोई आवश्यक नहीं कि एक जगह नहीं बन पाई तो दूसरी जगह भी न बने यहां तक कि उन के भविष्य के लिए उस ने विपुल को अपने पास रखने की भी पेशकश कर डाली पर वे इतनी स्वार्थी कैसे हो सकती थीं कि अपने सुख के लिए अपने ही कोखजाए से मुंह मोड़ लेतीं या भाई पर सदा के लिए अपने बेटे का बोझ डाल देतीं. माना भाई को वह बोझ नहीं लगता लेकिन दूसरे घर से आई लड़की को वे कैसे मुंह दिखातीं. क्या वह उस के विपुल को स्वीकार कर पाती ? वैसे भी, एक विवाह कर के तो वे देख ही चुकी थीं. पतिरूपी पुरुष जाति से न जाने क्यों उसे नफरत हो गई थी. सो, मना कर दिया.

पिछले कुछ दिनों की घटनाओं ने उन की इस धारणा को पुख्ता कर दिया था कि आज की नारी में इतना दमखम है कि अगर वह चाहे तो अपना संसार स्वयं सजासंवार सकती है. आखिर वह क्यों एक ऐसे आदमी की दूसरी पत्नी बने जिस की आंखों में उस के लिए दया के अतिरिक्त कुछ न हो. जो उसे अपनी अर्धांगिनी नहीं, अपने बच्चों की मां बना कर लाए. उस से सदा कर्तव्यों की बात करता रहे पर अधिकार न दे यहां तक कि अगर दूसरी पत्नी के बच्चा हो तो उसे भी पितृत्व के साए से दूर रखने का प्रयत्न करे. हां, कुछ अपवाद अवश्य हो सकते हैं पर वे शायद उंगलियों में गिनने लायक ही होंगे.

सविता मेम की बातों ने अनुजा को बहुत प्रभावित किया था. सचमुच अपने आत्मसम्मान और आत्मगौरव की रक्षा करना आदमी का ही नहीं, औरत का भी हक है. उस ने उन से ही सीखा. बीचबीच में उन के मांपिताजी उन से मिलने आते, उन्हें तरहतरह की नसीहतें देते पर वे टस से मस न होतीं. वे मायूस हो कर चले जाते. केवल उन का भाई ही उन की हौसलाअफजाई करता रहता तथा जबतब आ कर उन की हर संभव मदद करने की कोशिश करता. उन के जाने के बाद वे कुछ दिन उदास रहतीं, फिर सहज हो जातीं. पता नहीं कब वे सविता मेम से उस के लिए दीदी बन गईं. 

 अड़ोसपड़ोस के लोगों में उन के प्रति धारणा बदलने के साथ, समय के साथ धीरेधीरे सविता दीदी के स्वभाव में भी परिवर्तन आने लगा. सदा धीरगंभीर रहने वाली दीदी अब हंसने भी लगी थीं. कोई घर बुलाता, तो चली भी जातीं.

 अनुजा के भाई अभिनव के आईआईटी में सिलैक्शन के उपलक्ष्य में मां ने छोटी सी पार्टी दी. उस पार्टी को जानदार और खुशनुमा बनाने के लिए उस ने ‘पासिंग द पार्सल गेमरखा था. गेम सब को खेलना था. अपनी चिट के अनुसार सब को गाना सुनाना था. सविता दीदी की गाने की चिट निकली. उन का गाना लोगों को इतना पसंद आया कि गेम के बाद उन से गाने की फरमाइश की जाने लगी. उन्होंने भी फरमाइश करने वालों का दिल रखा. इस के बाद कोई भी पार्टी उन के गाने के बिना पूरी ही नहीं होती थी. अंधकार के बाद सुबह होती है, वे इस का ज्वलंत उदाहरण थीं.

धीरेधीरे ममा के विचार भी उन के प्रति बदलने लगे. अब तीजत्योहारों पर उन्हें अपने घर यह कह कर बुलाने लगीं कि अकेले रह कर क्या त्योहार मनाओगी, यहीं आ जाया करो, हम सब को अच्छा लगेगा. परिवर्तन की इस बयार ने उन में एक अनोखी ऊर्जा का संचार कर दिया था. अब वे सब के साथ सहज हो चली थीं.   पहले उन से कतराने वाले सभी लोग अब उन की बुराई नहीं, प्रसंशा करते थे. यहां तक कि अब वे अपने बच्चों से संबंधित समस्याओं पर भी उन की राय लेने लगे और वे उन की उम्मीदों पर खरी उतर रही थीं. अड़ोसपड़ोस के बच्चे भी उन का मार्गदर्शन प्राप्त कर अपनीअपनी मंजिलों की ओर बढ़ रहे थे. अब वे केवल उस की ही नहीं, सब की दीदी बन गई थीं- जगत दीदी.

 

पति कौलगर्ल के साथ संबंध बनाते हैं, मैं क्या करूं?

सवाल

मैं 42 वर्षीय विवाहिता हूं. विवाह को 16 वर्ष हो चुके है, 2 बेटे हैं. सुखी व संपन्न दांपत्य है. 3 महीने पहले तक मैं अपने को एक सफल गृहिणी और पति की प्रेयसी समझती रही, पर अचानक एक दिन ज्ञात हुआ कि पति जब कईकई दिनों के लिए टूर पर जाते हैं तो वहां (मुंबई में) किसी कौलगर्ल से मन बहलाते हैं.

यह सचाई जानने के बाद से मेरी रातों की नींद उड़ गई है. मुझे अपनेआप से ग्लानि होने लगी है. जिस पति पर मैं आंख मूंद कर विश्वास करती रही उस ने मेरे साथ विश्वासघात किया. मैं ने उन से तो कोई बात जाहिर नहीं की पर अंदर ही अंदर घुलती जा रही हूं. समझ में नहीं आ रहा है कि  इस स्थिति को कैसे संभालूं. पति मेरा उखड़ा मूड़ और चिंतित चेहरा देख कर कई बार पूछ चुके हैं. मैं ने तबीयत ठीक न होने की बात कह कर टाल दिया है. कृपया बताएं कि मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब

आप का परेशान होना स्वाभाविक है, पर आप के चिंतित और तनावग्रस्त रहने से समस्या हल नहीं होगी. इस के लिए आप को खुद प्रयास करना होगा. पति को सामने बैठा कर उन से बात करें. उन्हें समझाएं कि इस तरह का आचरण अनुचित तो है ही उन के स्वयं के भी हित में नहीं है. कौलगर्ल्स के कईकई मर्दों के साथ संबंध रहते हैं और उन से संबंध बनाने से एड्स जैसी बीमारी होने का भी खतरा रहता है. इसलिए उन्हें इस व्यभिचार से तोबा करनी चाहिए. उन्हें प्यार से, गुस्से से जैसे भी हो समझाएं और यह भी कहें कि यदि वे इस अनाचार को नहीं छोड़ते हैं तो आप उन के साथ शारीरिक संबंध नहीं रखेंगी.

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