Download App

राहुल के ‘शक्ति’ वाले बयान पर मोदी का पलटवार, धर्म से जोड़ने की असफल कोशिश

राहुल गांधी के हर बयान को तोड़मरोड़ कर पेश करना भाजपा की आदत है, इस में प्रधानमंत्री मोदी भी पीछे नहीं हैं. हाल में राहुल के ‘शक्ति’ बयान को मोदी ने धर्म से जोड़ कर यही साबित किया.

18 मार्च को एक बार फिर सिद्ध हो गया कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी घबराते हैं, डरते हैं और राहुल की एकएक बात को बड़े ध्यान से देखतेसुनते हैं, फिर उस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने ‘शक्ति’ वाले अपने बयान पर खड़े हुए राजनीतिक विवाद की पृष्ठभूमि में स्पष्ट कर दिया और कहा, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मेरी बातों का अर्थ बदलने की कोशिश की है, जबकि मैं ने जिस शक्ति का उल्लेख किया था उस का ‘मुखौटा’ प्रधानमंत्री खुद हैं.”
राहुल गांधी ने यह दावा भी किया, “जिस शक्ति के खिलाफ वे लड़ने की बात कर रहे हैं उस ने सभी संस्थाओं और संवैधानिक ढांचे को अपने चंगुल में दबोच लिया है.”

राहुल गांधी ने रविवार 17 मार्च को ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के समापन के अवसर पर मुंबई के शिवाजी पार्क में आयोजित एक रैली में कहा था, “हिंदू धर्म में शक्ति शब्द होता है. हम शक्ति से लड़ रहे हैं. एक शक्ति से लड़ रहे हैं. अब सवाल उठता है कि वह शक्ति क्या है? जैसे किसी ने यहां कहा कि राजा की आत्मा ईवीएम में है. सही है. सही है कि राजा की आत्मा ईवीएम में है. हिंदुस्तान की हर संस्था में है. ईडी में है, सीबीआई में है. आयकर विभाग में है.”

जैसा कि होना चाहिए था जब नरेंद्र मोदी ने राहुल गांधी की एकएक बात को ध्यान से सुना होगा तो प्रतिक्रिया अपने तरीके से कुछ इस तरह दी मानो राहुल गांधी ने किसी देवी शक्ति की आलोचना की है जबकि देश का बच्चाबच्चा समझ सकता है कि उन्होंने सीधा हमला नरेंद्र मोदी और उन के कामकाज की शैली पर किया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन पर मुंबई की रैली में ‘शक्ति’ के विनाश का बिगुल फूंकने का आरोप लगाते हुए सोमवार 18 मार्च को कहा, “उन के लिए हर मांबेटी ‘शक्ति’ का स्वरूप है और वे उन के लिए अपनी जान की बाजी लगा देंगे.”
तेलंगाना में प्रधानमंत्री ने कहा, “आगामी लोकसभा चुनाव में लड़ाई ‘शक्ति के विनाशकों’ और ‘शक्ति के उपासकों’ के बीच है तथा 4 जून को स्पष्ट हो जाएगा कि कौन ‘शक्ति’ का विनाश करने वाले हैं और किसे ‘शक्ति’ का आशीर्वाद प्राप्त है.”
आप नरेंद्र मोदी के इस भाषण को सुन समझ कर समझ सकते हैं कि वे हर बात को धर्म से जोड़ देते हैं और लाभ उठाना चाहते हैं. वे राहुल गांधी हों या प्रियंका गांधी अथवा सोनिया गांधी, इं सब की हरेक बात को बड़े ही ध्यान से सुनतेसमझते हैं और फिर अपने तरीके से उन्हें घेरने का प्रयास करते हैं. हम इसीलिए इस आलेख में कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कांग्रेस नेता राहुल गांधी से घबराते डरते हैं?

राहुल गांधी ने ‘एक्स’ पर लिखा, “मोदीजी को मेरी बातें अच्छी नहीं लगतीं. किसी न किसी तरह उन्हें घुमा कर वे उन का अर्थ हमेशा बदलने की कोशिश करते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि मैं ने एक गहरी सचाई बोली है. जिस शक्ति का मैं ने उल्लेख किया, जिस शक्ति से हम लड़ रहे हैं, उस शक्ति का मुखौटा मोदीजी ही हैं.”

उन्होंने कहा, “वह एक ऐसी शक्ति है जिस ने आज भारत की आवाज को, भारत की संस्थाओं को, सीबीआई, आयकर विभाग, ईडी, चुनाव आयोग, मीडिया, भारत के उद्योग जगत और भारत के समूचे संवैधानिक ढांचे को ही अपने चंगुल में दबोच रखा है.”
राहुल गांधी ने दावा किया, “उसी शक्ति के लिए प्रधानमंत्री भारत के बैंकों से हजारों करोड़ के कर्ज माफ कराते हैं जबकि भारत का किसान कुछ हजार रुपयों का कर्ज न चुका पाने पर आत्महत्या करता है. उसी शक्ति को भारत के बंदरगाह, भारत के हवाई अड्डे दिए जाते हैं जबकि भारत के युवा को अग्निवीर का तोहफा दिया जाता है, जिस से उस की हिम्मत टूट जाती है.”

राहुल गांधी ने आरोप लगाया, “उसी शक्ति को दिनरात सलामी ठोकते हुए देश की मीडिया सचाई को दबा देती है. उसी शक्ति के गुलाम नरेंद्र मोदीजी देश के गरीब पर जीएसटी थोपते हैं, महंगाई पर लगाम न लगाते हुए, उस शक्ति को बढ़ाने के लिए देश की संपत्ति को नीलाम करते हैं.” गांधी ने कहा, “उस शक्ति को मैं पहचानता हूं, उस शक्ति को नरेंद्र मोदीजी भी पहचानते हैं, वह किसी प्रकार की कोई धार्मिक शक्ति नहीं है, वह अधर्म, भ्रष्टाचार और असत्य की शक्ति है. इसलिए जबजब मैं उस के खिलाफ आवाज उठाता हूं, वे और उन की झूठों की मशीन बौखला जाती है, भड़क जाती है.”

सच तो यह है कि जब कोई सच प्रभावशाली होता है तो उस से गुनाहगार घबराते हैं, डरते हैं. आज हकीकत यही है कि नरेंद्र मोदी सचमुच राहुल गांधी से घबराते हैं और इसीलिए उन्होंने राहुल गांधी के शक्ति वाले भाषण पर धर्म को जोड़ने का असफल प्रयास किया है.

आंकड़ों के फेर में अर्थव्यवस्था

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत देश के कितने ही मंत्री रोब मारते रहते हैं कि भारत भारतीय जनता पार्टी की सरकार के अंतर्गत दुनिया का सब से तेजी से बढ़ता यानी ग्रो करता देश है. यह आंकड़ा बहुत भ्रामक है क्योंकि भारत दुनिया का हर वर्ष सब से ज्यादा जनसंख्या बढ़ाने वाला देश है इसलिए जो आंकड़े देश की अर्थव्यवस्था की ग्रोथ यानी वृद्धि के दिए जाते हैं वे प्रति व्यक्ति आय तक आ कर लुढ़क जाते हैं.

वैसे भी जो वृद्धि हो रही है, बहुत भ्रामक सी है. 2014 से 2022 तक के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, नंबर एक पर जमे देश अमेरिका की अर्थव्यवस्था 2014 से 2022 के बीच 7.9 ट्रिलियन डौलर बढ़ गई. जबकि, भारत 5 ट्रिलियन डौलर अर्थव्यवस्था बनने की घोषणा को आज खोज ही रहा है कि वह किस मंदिर की नींव में दफन हो गई. इस बात को आसानी से सम झने के लिए नीचे की तालिका देखें.

इन आंकड़ों से साफ है कि 8 सालों यानी 2014 से 2022 तक भारत की कुल जीडीपी अगर 1,346 ट्रिलियन डौलर बढ़ी है तो अमेरिका की 6 गुना 7.915 ट्रिलियन डौलर बढ़ी है जबकि इस दौरान जरमनी की सिर्फ 183 मिलियन डौलर पर चीन की 7.485 ट्रिलियन डौलर बढ़ गई. अमेरिका और चीन की फिलहाल कुल जीडीपी 8 सालों में भारत से 6 गुना ज्यादा बढ़ी है हमारी सब से तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था के दावे के बावजूद.

यही प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि देश की अर्थव्यवस्था के बारे में सरकारी दावे की पोल खोलती है. अमेरिका में प्रति व्यक्ति आय इन 10 सालों के दौरान एक औसत भारतीय की आय से 10 गुना ज्यादा बढ़ गई, चीन में 7 गुना और पिछड़ रहे जरमनी में भी 5 गुना बढ़ गई. हम कौन सी फिगर पर ढोल पीट रहे हैं, सम झ नहीं आता.

हम अपने जैसे 3 गरीब देशों की तुलना करें तो भी हम कोई गाल थपथपाने वाले नहीं हैं. प्रति व्यक्ति आय हमारी अगर 595 डौलर 8 सालों में बढ़ी है तो बंगलादेश की 611 डौलर और इंडोनेशिया की 871 डौलर.

हम भ्रम में न रहें कि देश बहुत शानदार ढंग से चल रहा है. हां, पाकिस्तान से तुलना करें तो संतोष होगा जो हर भारतीय हिंदू को बेहद सुकून देता है. पाकिस्तान की प्रति व्यक्ति आय 2014 में 1,240 डौलर थी जो 2022 में रोपीट कर 1,536 डौलर पर पहुंची. यह हमारे लिए दीवाली मनाने के लिए काफी है, राममंदिर की दीवाली से भी ज्यादा. हालांकि, 1960 के आसपास पाकिस्तान की प्रति व्यक्ति आय भारत के प्रति व्यक्ति आय से कुछ ज्यादा ही थी.

अमेरिका और चीन की अर्थव्यवस्था 2019 से 2022 के बीच उतनी बढ़ गई जितनी हमारी कुल अर्थव्यवस्था वर्ष 2022 में थी. मतलब यह है कि हम कितने ही मंदिर बना लें, हमारी अर्थव्यवस्था पूजापाठ से नहीं, परिश्रम से बढ़ेगी. हमें शोर मचाने से ज्यादा काम पर, विज्ञान पर, तर्क पर, व्यवस्था पर ध्यान देना होगा, निरर्थक विवादों पर नहीं.

सही उम्र में कराएं एग फ्रीजिंग

अब महिलाएं बड़ी उम्र में भी एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दे सकती हैं. वे चाहें तो उम्र की मजबूरी उन के आड़े नहीं आएगी. इस के लिए उन्हें सही उम्र में अपने एग फ्रीज कराने होते हैं. मगर यह प्रक्रिया कितनी सुरक्षित है, यह जानना भी जरूरी है.

मां बनना हर औरत का एक खूबसूरत सपना होता है. 20 से 30 साल की उम्र मां बनने के लिए सब से अच्छी है. मगर कई दफा स्त्री कैरियर या सेहत की वजह से कुछ साल बाद मां बनना चाहती है. तब तक उस की उम्र अधिक हो चुकी होती है और स्वस्थ बच्चे को जन्म देने के चांसेस कम हो जाते हैं. मगर यदि इस खूबसूरत सपने को अपने हिसाब से जीने और उम्र की बंदिशों से दूर इस का फैसला लेने का हक महिला को मिल जाए तो बात ही क्या है.

आज चिकित्सा विज्ञान की तरक्की ने यह भी संभव कर दिखाया है. अब महिलाएं बड़ी उम्र में भी एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दे सकती हैं. वे चाहें तो उम्र की मजबूरी उन के आड़े नहीं आएगी. इस के लिए उन्हें सही उम्र में अपने एग फ्रीज कराने होते हैं. बौलीवुड की एकता कपूर से ले कर मोना सिंह, तनीषा मुखर्जी, पूर्व मिस वर्ल्ड डायना हेडन, राखी सावंत और प्रियंका चोपड़ा तक ने अपने एग्स फ्रीज करवाए हैं. प्रियंका चोपड़ा साल 2022 में सरोगेसी के जरिए मां बनी. उस ने 30 साल की उम्र में ही अपने एग्स फ्रीज करा दिए थे.

दरअसल, बढ़ती उम्र के साथ महिलाओं की प्रजनन शक्ति घटने लगती है जबकि आजकल कई ऐसी महिलाएं हैं जो कैरियर, सेहत या फिर परिवार से जुड़ी किसी समस्या के चलते अपने परिवार को आगे बढ़ाने का फैसला थोड़ा समय ले कर सोचसम?ा कर करना चाहती हैं.

एग फ्रीजिंग महिलाओं की फर्टिलिटी को बनाए रखने का एक नया तरीका है. फ्रोजन भ्रूण से फ्रोजन अंडों तक के बदलाव ने हरेक महिला को एक अवसर दिया है कि वह कभी भी गर्भवती हो सकती है.

यदि किसी स्त्री को उस के अंडाशय को हटाने या उसे नुकसान पहुंचाने वाली सर्जरी से गुजरना पड़ रहा है तो वह भी इस प्रक्रिया से पहले अपने अंडे फ्रीज करा सकती है. एग फ्रीजिंग का फायदा उन महिलाओं को भी होता है जिन्हें कैंसर की वजह से कीमोथेरैपी और रेडियोथेरैपी जैसे ट्रीटमैंट से गुजरना पड़ रहा है. इस ट्रीटमैंट की वजह से अकसर अंडे खत्म हो जाने के कारण महिलाएं भविष्य में मां नहीं बन पातीं. ऐसे में उन्हें एग फ्रीजिंग का काफी लाभ मिल सकता है.

क्या है एग फ्रीजिंग

एग फ्रीजिंग में ओवरी से मैच्योर अंडों को निकालते हैं और लैब में ले जा कर सब जीरो तापमान पर फ्रीज करते हैं. इन अंडों को -196 (माइनस 196) डिग्री पर फ्रीज किया जाता है ताकि समय बीतने के साथ उन की गुणवत्ता में कोई कमी न हो.

इन अंडों को लिक्विड नाइट्रोजन में फर्टिलिटी सैंटर की लैब या जहां लंबे समय के लिए स्टोरेज सुविधा हो या फिर फ्रोजन एग बैंक में संग्रहीत किया जाता है.

बाद में जब कभी महिला मां बनना चाहती है, तब इन फ्रीज्ड अंडों को इंजैक्शन के जरिए पुरुष के स्पर्म के साथ फर्टिलाइज किया जाता है. फर्टिलाइज किए गए इन एग्स को 3 से 5 दिनों तक विकसित कर इन की गुणवत्ता का आकलन किया जाता है. इस के बाद एक कैथेटर के जरिए अच्छी क्वालिटी वाला भ्रूण यानी एम्ब्रियो महिला के गर्भाशय में ट्रांसफर कर दिया जाता है.

इस प्रक्रिया में अंडों की जैविक गति को कुछ समय के लिए रोका जाता है जिस से उस गति को बाद में इस्तेमाल किया जा सके. मैडिकल तौर पर एग फ्रीजिंग को क्रायोप्रिजर्वेशन कहते हैं.

अंडों को फ्रीज कराने की सही उम्र देखा जाए तो अंडे फ्रीज करने की सही उम्र 20 से ले कर 30 साल है. इस उम्र में अपने अच्छे गुणवत्ता वाले अंडों को फ्रीज कर के उन का इस्तेमाल बाद में किया जा सकता है. 35 साल के बाद एग की गुणवत्ता और मात्रा में कमी आने लगती है.

एग फ्रीजिंग की प्रक्रिया

एग फ्रीजिंग एक लंबी प्रक्रिया है. कई परीक्षणों के बाद डाक्टर इस प्रक्रिया को पूरा कर पाते हैं. इस प्रक्रिया के दौरान पहले महीने में महिला के ब्लड टैस्ट और अल्ट्रासाउंड की मदद से अंडों की कैपेबिलिटी की जांच की जाती है. अंडों की सेहत अच्छी होने पर ही उन्हें फ्रीज किया जाता है.

इस के लिए कुछ दवाएं और सप्लीमैंट्स दिए जाते हैं. दूसरे महीने डाक्टर अंडों के विकास पर ध्यान देते हैं. इस समय भी महिला के ब्लड टैस्ट, स्क्रीनिंग समयसमय पर होती रहती है. यदि प्रक्रिया सफल होती है तो उस के 15-20 अंडों को फ्रीज किया जाता है.

एग फ्रीजिंग के साइड इफैक्ट्स

जब महिला के शरीर में दोबारा से फ्रीज अंडे स्थानांतरित किए जाते हैं तो वह एक सप्ताह के भीतर अपनी सामान्य गतिविधियां फिर से शुरू कर सकती है. एग फ्रीजिंग के बाद दर्द का अनुभव या प्रैग्नैंट होने की संभावना बनी रहती है. शरीर में अंडे स्थानांतरित करने के बाद वजन बढ़ने की समस्या या सूजन, दर्द जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं.

एग फ्रीजिंग के दौरान अंडों की संख्या बढ़ाने के लिए इंजैक्टेबल फर्टिलिटी ड्रग्स का इस्तेमाल किया जाता है. इस से अंडाशय में सूजन आ सकती है और दर्द हो सकता है. इस के अलावा इस के उपयोग से पेटदर्द, मतली, सूजन, उलटी और दस्त जैसी समस्याएं भी होती हैं.

दोबारा अंडा प्राप्त करने के लिए एस्पिरेटेड सूई का इस्तेमाल करने की वजह से रक्तस्राव, संक्रमण, आंत्र या मूत्राशय को नुकसान या रक्तवाहिका को नुकसान हो सकता है. एग फ्रीजिंग भविष्य में गर्भधारण करने की उम्मीद जरूर देता है लेकिन इस की सफलता की कोई गारंटी नहीं है.

एग फ्रीजिंग की सफलता दर

35 साल या उस से कम आयु की महिलाओं में एग फ्रीजिंग की सफलता दर काफी ज्यादा होती है. ऐसी महिलाओं से एक बार में 10-12 अंडे मिलते हैं, जिन में से 7-9 फ्रीजिंग और संरक्षित करने के लिए उपयुक्त हो सकते हैं. भविष्य में इस में से करीब 80-90 प्रतिशत अंडे जीवित रह सकते हैं और फिर इन जीवित अंडों में से 50-80 प्रतिशत भ्रूण के रूप में फर्टिलाइज होते हैं. हालांकि 35 साल से ज्यादा उम्र की महिला में इस की सफलता दर कम होती है. एग फ्रीजिंग की सफलता दर उम्र, अंडे की गुणवत्ता और मात्रा पर निर्भर करती है.

एग फ्रीजिंग की कीमत

महिलाओं के अंडाशय से अंडे निकालने और फिर फ्रीज करने तक की पूरी प्रक्रिया के लिए 50 हजार से एक-सवा लाख रुपए के बीच की कीमत चुकानी पड़ती है. इस के अलावा जब एक बार अंडा फ्रीज हो जाता है तो उन्हें फ्रोजन स्टेट में रखने की सालाना करीब 15 हजार से 30 हजार रुपए की कीमत देनी पड़ सकती है.

कितने साल के लिए किए जा सकते हैं फ्रीज

महिला अपने अंडाणु को 10-15 साल के लिए भी फ्रीज करवा सकती है. अंडा तब तक उसी अवस्था में रहेगा जैसा अंडाशय में था. भविष्य में जब महिला मां बनना चाहेगी, आईवीएफ तकनीक से अंडे को निषेचित किया जाएगा और इस निषेचित अंडाणु को महिला के शरीर में प्रवेश कराया जाता है.

भारत में कितना सफल हो सकता है एग फ्रीजिंग

एग फ्रीजिंग भारत में उतना सुरक्षित नहीं रह सकता. जब यहां लंबे समय के लिए बैंकों में पैसे सुरक्षित नहीं और तिजोरी में जमा 2,000 या 500 के नोट सुरक्षित नहीं तो सालों के लिए फ्रीज करा कर रखे एग्स कैसे सुरक्षित रहेंगे, यह सोचने वाली बात है. जरा सोचिए, भारत  में हम बैंकों में रुपए जमा कराते हैं. मगर कौन सा बैंक या बैंक की कौन सी ब्रांच कब बंद हो जाए, क्या इस की कोई गारंटी है?

माना आप ने घर चेंज कर लिया और किसी दूसरे महल्ले या शहर में चले गए जबकि आप के रुपए एक जानेमाने बैंक में जमा हैं. आप बेफिक्र हैं कि आप के अकाउंट में काफी रुपए हैं लेकिन अगर उस बैंक की ब्रांच बंद हो गई और बैंक ने आप के पुराने पते पर ब्रांच या बैंक बंद होने व रुपए निकाल लेने की सूचना भेजी, जबकि वह लैटर आप को मिला ही नहीं, इधर बैंक के पास तो प्रूफ है कि उस ने आप को इन्फौर्म किया था आप ने ही सजगता नहीं दिखाई, तब बैंक तो पल्ला ?ाड़ लेगा मगर आप क्या करेंगे?

ऐसा ही कुछ 2,000 और 500 के नोटों के साथ हुआ. एक दिन अचानक आप को पता चला कि इन नोटों की नोटबंदी हो गई. सालों से भविष्य के लिए जमा आप के रुपए पलभर में बेकार हो गए. क्या अब आप कभी बड़े नोट भविष्य के लिए जमा कर के रखने की भूल करेंगे?

इसी तरह किसी महिला ने अपने एग फ्रीज करा लिए मगर कई साल बाद जब वह इन्हें प्रयोग में लाना चाहे तो इस की गारंटी कैसे मिलेगी कि ये उसी के एग हैं? कहने का तात्पर्य यह है कि भारत में यदि महिलाएं ऐसा करना चाहें तो बे?ि?ाक करें मगर लंबे समय के लिए नहीं. दरअसल, 2-3 साल की बात तो सम?ा आती है कि एग्स सुरक्षित रह जाएंगे मगर 15-20 सालों का जोखिम उठाना कतई सम?ादारी नहीं. द्य

 

लापता: पिता और पुत्र की कहानी

जी हां, आप ने सही पहचाना. वे मेरे पापा ही हैं, त्रिलोकीनाथ चौहान, है न भारीभरकम नाम. बहुत कड़क आदमी हैं जनाब. अपने समय के कलंदर. एक वाक्य बोल कर सब को चुप करवा देते थे. ‘डोंट ट्राई टू बी ओवरस्मार्ट.’ मैं क्या, हर आदमी जो उन से वाबस्ता था उन से प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता था. इन्साइक्लोपीडिया तो फिर एक छोटा शब्द है उन के सामने. कोई कहता कि वे अपनेआप में एक बड़ी संस्था थे.

हर चीज में उन का दखल काबिलेगौर था- संगीत, कविता, धर्म, विज्ञान, इतिहास या राजनीति. आप बात कर के देखते उस समय.

उन के सामने बहुत छोटा महसूस करते थे हम. उन का हर वाक्य एक कमांड होता था और हरेक शब्द एक संदेश. कभी अपनी पीठ नहीं लगने दी उन्होंने.

उन का सब से बड़ा प्लस पौइंट यह था कि वे बेदाग चरित्र के मालिक थे. साफसुथरी छवि के मालिक. कभी कोई अनर्गल बात नहीं करते थे. जो बात आज उन्होंने कही, दस साल बाद भी वही हूबहू हजारों लोगों के नाम मानो तोते की तरह रटे हुए थे.

अब कहां हैं?

जी जिंदा हैं अभी. जिंदा भी ऐसे मानो मांस का लोथड़ा हो. दिन में पता नहीं कितनी बार हिंसक हो उठते हैं. घर के एक कमरे में कैद कर के रखना पड़ता है उन्हें, ताला लगा कर.

डिमैंशिया नाम का रोग सुना होगा आप ने. इस में स्मरण शक्ति खत्म हो जाती है. रोजाना की आम गतिविधियां नहीं कर सकता वह आदमी. बातचीत में ठहराव नहीं रहता, कोई फोकस नहीं. बच्चों से भी गयागुजरा हो जाता है. बच्चा तो फिर भी हर रोज एक नई बात सीखता है मगर पापा जैसा आदमी लगातार भूलता जाता है आसपास को, अपनेआप को. यही नहीं, अपने शरीर के अंगों से नियंत्रण घटता जाता है उन का.

कई रूप हैं इस बीमारी के. मैं तो ठीक से बता भी नहीं पाऊंगा. अल्जाइमर्स रोग है या कुछ और.

मगर जो भी है आदमी आलूगोभी की तरह हो जाता है. सामने है, मगर उस का वजूद न के बराबर. अपनेआप में गुम हो गया लगता है, खो गया लगता है, लापता हो जैसे.

हम लोग पापा को कई अस्पतालों में ले गए. शुरूशुरू में पापा का कुछ और ही रूप था. तब शुरुआत थी शायद.

डाक्टर पूछता कि क्या नाम है?

पापा चौकन्ने हो कर जवाब देते, ‘त्रिलोकीनाथ चौहान.’

डाक्टर सहम जाता, ‘अरे, आप हैं सर. बहुत नाम सुना है आप का. आप को कौन नहीं जानता. आप ने तो बहुत बड़ेबड़े काम किए हैं जो कोई दूसरा नहीं कर सकता.’

पापा मुसकराते, अजीब सी दंभभरी मुसकराहट. चेहरे पर अहंकारभरे भाव आ जाते उन के.

शुरू के सालों में पापा इस बीमारी को अपने मिलने वालों पर जाहिर नहीं होने देते थे. घर में कोई भी आता, उस से मिल कर खुश हो जाते. भले ही पहचानते न थे मगर आने वाले के पास बैठते. बेशक, कुछ न पूछते. मगर ऐसा भी नहीं कि कोई रुचि न लेते, कहते- खाना खाया, कब आए हो.

दोचार बातों तक ही महदूद हो गया था उन का सारा अस्तित्व.

फिर धीरेधीरे अपने कमरे में ही रहने लगे.

सब से बुरी बात तब हुई जब वे आईने में अपनी ही सूरत भूल जाते. खुद को कोई अन्य सम?ा कर अपने अक्स से बात करने लगते.

फिर आसपास से बेखबर होने लगे. सुबह को शाम सम?ाने लगे. दिन-तारीख तो अब क्या याद रखनी थी उन्हें. कुछ बातों की जिद पकड़ लेते. कभी अपने घर की बालकनी में हम पापा को बिठाते तो कुछ देर बार वे अपने कमरे या बाथरूम का ठिकाना भूल जाते.

खाने को ले कर बहुत लोचा होने लगा. उन्हें कभी तो बहुत भूख लगती तो किसी दिन उन्हें चाय के साथ बिसकुट खिलाना भी मुसीबत हो जाता हम लोगों के लिए.

कभी अपने मृत पिता को याद करने लगते, कहते, मु?ो उन के पास छोड़ आओ. मम्मी सम?ाती. आप 90 के हैं तो आप के पिता तो कब के दुनिया छोड़ चुके.

हैरान हो कर पूछते, ‘अच्छा कब मरे? मु?ो बताया क्यों नहीं.’

उन की आंखों में आंसू छलकने लगते.

पापा की स्मरण शक्ति बहुत तेजी से घटती जा रही थी. अब मु?ो पहचानते थे या मेरी मम्मी को. मम्मी उन से 10 साल छोटी थी. सेहत तो उन की भी अच्छी नहीं थी.

बहुत क्षुद्र जीव है यह आदमी. ज्यादा देर तक शासन नहीं चला सकता. दूसरों पर ठीक है. दूसरों को चालीसपचास बरस काबू कर लेगा मगर खुद अपने शरीर से नियंत्रण हट जाए तो बहुत मुसीबत आ जाती है. खुद के साथ समीकरण बिगड़ जाए तो साथ वालों की जिंदगी हराम हो जाती है.

आप का कहना अपनी जगह सही है. सब के साथ नहीं होता ऐसा.

इंगलैंड की रानी नब्बे के आसपास है. खूब कर रही है राज. अजी क्या पावर है उस के पास. औपचारिक रूप से सोने की मोहर ही है. हां, बस इतनी सी पावर हो तो आदमी का दिमाग खराब नहीं होता.

पापा से मनोचिकित्सक उन के आसपास बैठे लोगों के बारे में पूछता, ‘ये कौन हैं?’

पापा तिरस्कार के भाव से कहते, ‘यह मेरा नालायक बेटा है. कुछ नहीं हो सका इस से. नैशनल डिफैंस एकेडमी से भाग आया. अब अपना बिजनैस चौपट कर के बैठा है.’

मु?ा से बहुत अपेक्षाएं थीं पापा

की. खुद तो बहुत बड़े महत्त्वाकांक्षी थे ही, मु?ो ले कर कुछ ज्यादा ही पजेसिव थे. मु?ो अपने से भी ऊपर देखना

चाहते थे.

जब मैं आर्मी अफसर के प्रशिक्षण केंद्र से भाग आया और इधरउधर हाथपांव मार रहा था तब पापा मु?ो उलाहने देते. बारबार कहते, ‘मैं खाली हाथ आया था दिल्ली. बाप की 5 रुपए महीने की पैंशन थी. खाने वाले 10 जीव थे. अब तुम्हारे लिए चंडीगढ़ में 2 कनाल की कोठी बनवाईर् है मैं ने. 10 एकड़ का फार्महाउस है. घर में 4 कारें खड़ी हैं. तुम ने क्या किया? मेरा नाम को बट्टा लगा दिया.’

मेरी हर चीज से शिकायत थी पापा को. मैं उन की किसी अपेक्षा पर खरा नहीं उतरा.

मैं क्या बनना चाहता था? अरे साहब, जब से होश संभाला है, मु?ा से किसी ने पूछा ही नहीं. बस, हुक्म दे दिया जाता कि ये कर लो, वो कर लो.

पूरे इलाके में पापा का इतना ज्यादा रोब था, रसूख था कि एक से एक बढि़या स्कूल में मु?ो दाखिला मिल जाता. कालेज में आराम से एडमिशन मिल जाता. टीचर मु?ा से खौफ खाते कि कहीं मेरे पापा उन के खिलाफ किसी को टैलीफोन न कर दें.

एक वक्त था शहर ही बहुत बड़ी ताकत का पर्याय थे वे, बहुत बड़ी हस्ती थे पापा. इतने ज्यादा पढ़ते नहीं थे. बस, दिमाग बहुत बड़ा था. पता नहीं सबकुछ कैसे समा जाता था. सुबह अखबार पढ़ते थे. याददाश्त बहुत गजब की थी. सामने वाले को तर्क देने लायक नहीं छोड़ते थे.

 

बहुत सारी महत्त्वपूर्ण घटनाएं थीं उन के जीवन की. फौज से सीधे अफसर बन कर गए थे. आजादी के तुरंत बाद पुलिस के बड़े अफसर आर्मी से लिए गए. पापा की टौप के लोगों में गिनती होने लगी. काम के माहिर थे और राजनीति से दूर. नेताओं ने खूब फायदा उठाया पापा का. पापा को अच्छे प्रभार मिलते. जहांजहां दंगा या अलगाववादी उपद्रव होते, पापा ने हीरो की तरह काम किया.

मैं क्याक्या बताऊंगा. आप गूगल से पूछ लेना.

वे बतातेबताते थकेगा नहीं, आप सुनतेसुनते बोर हो जाएंगे.

हम परिवारवाले बुरी तरह पक गए थे पापा की इस मशहूरी से.

उस का हमारी नौर्मल लाइफ पर बहुत बुरा असर पड़ा.

मां की जबान चली गई.

जी नहीं, गूंगी नहीं हुई. पापा के सामने बौनी होती गई. विरोध नहीं कर पाती थी. पापा ने जो कह दिया वह पत्थर की लकीर.

मैं खुद. कहांकहां नहीं धकेला गया मु?ो. और मैं था कि हर जगह नाकाम करार दे दिया जाता क्योंकि मैं वह सब नहीं करना चाहता था.

क्या करना चाहता था?

अजी सोचने का मौका ही कब मिला मु?ो. पापा ही हावी रहे मेरी सोच पर.

रिटायरमैंट भी बहुत लंबा था पापा का. 80 साल की उम्र तक तो वे

बहुत ही सक्रिय रहे. कई तरह के असाइनमैंट मिलते रहे पापा को. विदेशों में भी जाते रहते. हर समय सूटकेस तैयार रहता.

बस, एक ही बात बताई जाती हमें, ‘दिल्ली जा रहे हैं.’

हमारी सांस में सांस आती कि कुछ दिन आराम से कटेंगे.

समय बदला, लोग बदले, सरकारें बदली. पापा का स्थान दूसरे लोगों ने ले लिया. पापा की उपयोगिता कम होती जा रही थी. अब ईमानदारी की कोई कीमत नहीं रह गईर् थी. पापा अनवांटेड हो गए. समय सापेक्ष नहीं रहे. बूढ़े भी हो गए.

जब पापा की उम्र 85 से 90 के बीच थी तब पापा रुतबे से घटते गए. चिड़चिड़े हो गए. मैं 60 का हो गया था.

क्या करता हूं?

छोटेमोटे धंधे करता हूं. पापा ने इतना कुछ जमा कर लिया, उसे संभालता हूं.

लोगों ने पापा से मिलना छोड़ दिया. पापा अपने कमरे में अकेले होते गए.

कभीकभार कुछ लिखते. वह दिखाऊंगा आप को. मेरे तो कुछ पल्ले नहीं पड़ा. देश की राजनीति पर कुछ निबंध वगैरह हैं.

जी हां, पापा का लिखा दिखाया था प्रकाशकों को. वे कहते हैं कि बिकेगा नहीं. अगर 20 साल पहले लिखा होता तो शायद कुछ करते.

इंसान की यही लिमिटेशन है. समय पर खरीदा माल समय पर ही बेच

देना चाहिए. बाद में कोई कीमत नहीं मिलती.

पापा को अब घर में बांध कर रखना भी अपनेआप में फुलटाइम काम होता जा रहा था. किसी को कुछ नहीं सम?ाते थे वे. किसी का कहना नहीं मानते थे. मम्मी को सम?ाते थे कि घर की नौकरानी है.

मैं अब उन से खुल कर ?ागड़ने लगा था. शायद तभी मेरे काबू में आ जाते थे. अब मेरा डर खत्म हो गया था. पापा अब ऐसे बूढ़े शेर थे जिस के दांत टूट चुके थे और गुर्राना भी भूल चुके थे.

अब एक नई मुसीबत का सामना करना पड़ रहा था हमें. पापा बिन बताए मौका पाते ही घर से निकल जाते.

एक बार नहीं, बारबार घर से निकल कर भागे वे. पहले तो यहीं अपने

एरिया में ही गुम हो जाते. हम ढूंढ़ लाते या कोई जानपहचान वाला  छोड़ जाता.

दाढ़ी बढ़ आई थी उन की. शक्ल बदल गई थी. शहर बदल गया था. दुकानदारों को तो पापा की बीमारी के बारे में पता था मगर जानपहचान के पुराने लोग कम होते जा रहे थे. कुछ बच्चों के साथ चले गए. कुछ मरमरा गए.

यह ससुरा चंडीगढ़ है न. यहां सारे सैक्टर एकसमान लगते हैं. सैक्टर 35 के मार्केट और सैक्टर 36 के मार्केट में फर्क करना मुश्किल हो जाता है. चौक, मकान, मोड़ सब एकजैसे दिखते हैं.

अब पापा को काबू करना सच में मुश्किल हो गया था. जरा सा मौका मिलता, वे निकल भागते. दीवार फांद लेते.

सारी उम्र दिल्ली जाते रहते थे. अब भी हर वक्त एक ही रट लगाते, ‘मु?ो दिल्ली ले चलो. वहां मेरे पिताजी हैं. उन की देखभाल कौन करता होगा.’ मम्मी रोने लगती. पापा पर कोई असर नहीं होता था.

बाकी के सारे रिश्तेदार भूल गए थे उन्हें. सिर्फ मु?ो नहीं भूले. हम उन के गले में या बाजू पर नाम, पता या मेरे मोबाइल का नंबर लिखा रिबन बांध देते मगर वे उसे उखाड़ कर फेंक देते. कमीज के कौलर या बाजू के कफ के अंदर लिखा रहता पेन से. मगर किसी दूसरे को क्या पड़ी है. आजकल आदमी अपनेआप से बेखबर रहने लगा है. किसी दूसरे की तरफ तो देखता तक नहीं. पुलिस? अरे साहब उस का अपना पेट नहीं भरता. वह आम नागरिक की मदद क्यों करने लगी भला.

एक दिन वही हुआ जिस का हमें हर वक्त डर सताता रहता था.

पापा लापता हो गए.

हर वक्त दिल्ली जाने की रट लगाते रहते थे. तो किसी ने दिल्ली की बस में बिठा दिया होगा.

अब दिल्ली तो एक समुंदर है. हम लोग यहां अपने शहर, अंबाला, पटियाला में ढूंढ़ते रहे. पुलिस स्टेशन, वृद्धाश्रम, बसस्टैंड, रेलवे स्टेशन, सराए सब जगह. 2 आदमी रखे पैसे दे कर. उन्हें हर

रोज सब तरफ भेजते. लापता होने के पोस्टर भी लगवाए. अखबारों में कई दिन विज्ञापन दिया.

पापा सैक्टर 35 के स्टेट बैंक से अपनी पैंशन लेते थे. वहां पता किया. मम्मी के नाम पैंशन लगवाने की बात हुई तो वे बोले किसी जगह से मृत्यु का प्रमाणपत्र लाओ या कुछ साल इंतजार करो. उस के बाद कचहरी से लापता हो कर मरा हुआ जान कर ऐसा प्रमाणपत्र मिल जाएगा.

साल बीता, कोई खबर नहीं मिली पापा की.

घर का बंदा गुम हो जाए तो कितना तकलीफदेह हो जाता है रहनासहना.

हर रोज एक आस जगती है. फिर इस उम्र का आदमी घर से चला जाए तो सोच कर देखिए, जनाब.

हम चुप हो कर बैठे थे. क्या कर सकते थे हम.

फिर एक दिन बैंक से ही मु?ो फोन आया कि आप के पापा जिंदा हैं. दिल्ली में सरकारी अस्पताल एम्स में भरती हैं.

आखिर दिल्ली जा कर ही दम लिया पापा ने.

वहां पता नहीं कहांकहां भटकते रहे होंगे. बीमार हुए तो किसी ने लावारिस सम?ा कर एम्स में भरती करवा दिया होगा. इंग्लिश बोलते थे तो किसी ने सोचा कि अच्छे घर के होंगे. अपना नाम तक याद नहीं था पापा को.

कैसे पता चला?

डाक्टर लोग हर रोज उन से बातचीत करते होंगे तो एक दिन अचानक पापा ने बोला, ‘त्रिलोकी नाथ चौहान, स्टेट बैंक, सैक्टर 35, चंडीगढ़.’

वहां के लोगों ने यहां नंबर मिलाया और बैंक वालों ने मु?ो सूचित किया.

मैं पापा को लेने के लिए निकला. मन में गुस्सा भी था और अपराधबोध भी कि हम उन की देखभाल ठीक से नहीं कर रहे हैं.

लावारिस की तरह जनरल वार्ड में पड़े मिले वे, गंदे से कपड़ों में. बहुत शर्म आई. बहुत देर लगी यह बताने में कि मैं उन का बेटा हूं. बिलकुल पराए से लग रहे थे. आंखों में कोई भाव नहीं. कोईर् भी ले जाता उन्हें वहां से.

मु?ो उन के खर्च की फीस भरने को कहा गया. मैं 2 लाख रुपए नकद ले कर गया था. काउंडर पर बैठे आदमी ने बताया, ‘एक हजार दो सौ साठ रुपए.’ मेरा यकीन करना, साहब.

बहुत पत्थर दिल इंसान हूं मैं. मगर पहली बार फूटफूट कर मेरे आंसू निकले. गला रुंध गया. वाह रे कुदरत, यह मैं क्या देख रहा हूं. कितने दिनों से यह आदमी यहां फटेहाल पड़ा है. अब कहीं भागने की हिम्मत भी नहीं रही इस की.

मैं घर ले आया उन्हें. लाश जैसे थे वे. कार की सीटबैल्ट से बांध कर. बारबार लुढ़क जाते.

अब तो सब शांत है.

जिंदा हैं, बस. मु?ो भी बहुत बार नहीं पहचानते.

पता नहीं किस बात का इंतजार है उन्हें. तरस आता है. जीवन की नियति यही होती है क्या? तमाम उम्र कितनी भागदौड़ करते हैं हम. चोरी, डाका, फरेब, ?ागड़े और अंत में क्या शेष रहता है. एक शून्य, एक गुमशुदगी, खोई हुई अस्मिता. अपनेआप में कोई इतना लापता कैसे हो सकता है, भला.

समर्पण: भाग 2- सुधा क्यों शादी तुड़वाना चाहती थी?

अनु की शादी के बाद भी कई दिनों तक सुधा अपनेआप को सामान्य नहीं कर पाई.  तुषार से मिल कर उसे भी अच्छा लगा था। वह एक सुलझा हुआ युवक था लेकिन एक बेरोजगार दामाद को अपनाने में उसे हिचक हो रही थी.  बेटी की खुशी के आगे उन्होंने कुछ नहीं कहा.
उन्हें यकीन था एक दिन अनु जरूर कुछ न कुछ अच्छा ही करेगी.  कुछ ही महीने में अनु की मेहनत रंग लाई. उस ने पीसीएस की मुख्य परीक्षा पास कर ली थी. अनु ने साक्षात्कार की बहुत अच्छी तैयारी की थी पर वह  उस में रह गई। तुषार अभी भी संघर्षरत था. उन दोनों को इस बात का काफी मलाल हुआ. ऐसी परिस्थिति में भी तुषार ने अनु को हिम्मत बंधाई,”अनु, तुम्हें दिल छोटा नहीं करना चाहिए. तुम बहुत मेहनती और होशियार हो. एक दिन तुम्हें अपनी मेहनत का पूरा श्रेय जरूर मिलेगा.”
“तुषार, तुम ही तो मेरी प्रेरणा हो. तुम्हारी बातों से मुझे बड़ी हिम्मत मिलती है. मैं और मेहनत करूंगी और एक दिन कुछ बन कर दिखाऊंगी,” अनु बोली.
इसे कोई संयोग ही कहें कि जितना उस ने सोचा था, वह वहां तक न पहुंच पाई.  नेट परीक्षा उत्तीर्ण करने के कारण उस का यूनिवर्सिटी में असिस्टैंट प्रोफैसर के लिए चयन हो गया था. परिस्थितियों को देखते हुए अनु ने यह जौब खुशीखुशी स्वीकार कर लिया. अब उसके सामने आर्थिक परेशानी नहीं थी.
2 महीने बाद तुषार का सिलैक्शन  यूपीएससी परीक्षा के माध्यम से ही समीक्षा अधिकारी के लिए हो गया था। दोनों बेहद खुश थे. आखिरकार उन्हें एक ही शहर में नौकरी तो मिल गए थी. ये नौकरियां उन के योग्यता और सपनों के अनुरुप नहीं थीं लेकिन घरगृहस्थी चलाने के लिए पर्याप्त थीं. अनु ने यह खबर मम्मीपापा को सुनाई तो उन्हे ज्यादा खुशी नहीं हुई.
सुधा बोली,”अनु, तुम आगे भी  तैयारी करते रहना. यह नौकरी तो तुम्हें इसी शहर में रह कर पढ़ने से भी मिल सकती थी.”
“आप बिलकुल ठीक कहती हैं, मम्मी. मैं आगे भी प्रयास करती रहूंगी.”
अनु अपने काम के प्रति बहुत समर्पित थी. वह पीएचडी करना चाहती थी ताकि अपने कैरियर में किसी से पीछे न रहे. नेट की बदौलत वह इस नौकरी तक पहुंच गई थी. तुषार के सहयोग के कारण उसे आगे पढ़ने में कोई परेशानी नहीं थी.  वे दोनों अभी भी प्रतियोगिताओं की तैयारी कर रहे थे पर उन का समय  साथ नहीं दे रहा था. तुषार की नौकरी लगने के सालभर बाद अनु ने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया. सुधा ऐसे समय में बेटी को अकेले पा कर मात्र 2 हफ्ते के लिए अनु के पास आई थी.  उस के नर्सिगहोम से घर आ जाने पर वह वापस लौट आई थी. तुषार जिस तरह से अनु का खयाल रखता था, सुधा उस से संतुष्ट थी.
अनु के 6 महीने मातृत्व अवकाश के साथ आराम से कट गए. उस ने कुछ महीने और शिशु देखभाल अवकाश ले लिया था. अब नौकरी के साथसाथ बच्चे को देखने के लिए एक आदमी की घर पर जरूरत थी. अनु ने कहा,”तुषार, क्यों न हम अपने पेरैंट्स को यहां बुला लें.”
“क्या उन का दिल हमारे साथ लगेगा? हम एक छोटे से फ्लैट में रहते हैं. मम्मीपापा को इस प्रकार से रहने की आदत नहीं है.”
“तुम ठीक कहते हो. उन के लिए यह घर जेल के समान हो जाएगा, भले ही हम अपनी ओर से उन:के लिए कोई कसर नहीं रखेंगे. एक सामान्य जिंदगी जीने वाले को बड़े शहरों की  आदत नहीं होती. उन की अपनी एक दिनचर्या है, जिसे वे यहां अच्छे से नहीं निभा पाएंगे। इस के साथ एक दूसरी बात भी है.”
“वह क्या?”
“तुम तो जानती हो कि उन के सपनों को तोड़ कर हम दोनों ने शादी की. उन की अपेक्षाएं हम से कुछ और थीं और हम उन के अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे. हमें देख कर उन्हें यह बात भी याद आती रहेगी. अच्छा होगा कि हम बच्चे की देखभाल के लिए एक आया रख लें.”
जल्दी ही अनु ने अपने सहकर्मियों की मदद से एक आया का इंतजाम कर दिया पर उस के भरोसे रिया को छोड़ने में दोनों को बड़ी परेशानी हो रही थी. किसी तरह 2 महीने बीते.  एक बार रिया की तबियत बिगड़ गई. ‌ऐसी हालत में उन की हिम्मत रिया को आया के भरोसे छोड़ने की न हो सकी. तब समस्या का समाधान तुषार ने निकाला,”अनु, मैं कुछ समय के लिए रिया की देखभाल के लिए छुट्टी ले लेता हूं.”
“यह क्या कर रहे हो तुम?”
“मैं ठीक कह रहा हूं. हम दोनों में से छुट्टी कोई भी ले क्या फर्क पड़ता है? बच्चा हमारा है. इतने महीने तुम उस की देखभाल कर चुकी हो.  तुम्हें अभी अपना पीएचडी का काम भी पूरा करना है. मैं औफिस से छुट्टी ले लेता हूं.”
“तुम्हें छुट्टी कहां मिलेगी?”
“तो क्या हुआ? अवैतनिक अवकाश ले लूंगा.  हमारे बच्चे की परवरिश में कोई कसर नहीं रहनी चाहिए,” तुषार ने बोला तो अनु उस के परिवार के प्रति समर्पण को देख कर नतमस्तक हो गई.
वैसे तो उन के घर में भी काम करने  वाले आते थे लेकिन उन के ऊपर भी देखभाल के लिए घर पर कोई तो चाहिए था.  तुषार ने यह जिम्मेदारी बडे अच्छे से संभाल ली.  रिया बड़ी हो रही थी.  अनु उस की ओर से बिलकुल बैफिक्र थी.  तुषार एक जिम्मेदार पिता की तरह उस की बहुत अच्छी देखभाल करता.  शाम को अनु थक कर घर आती तो उस के साथ भी बहुत अच्छा व्यवहार करता. अनु अपनेआप को धन्य मानती कि उसे पति के रूप में तुषार मिला. अनु ने यह बात मम्मी को बताई कि अब तुषार नौकरी छोड़ कर बच्चे की देखभाल करेंगे.”
“मम्मी, रिया हम दोनों की बेटी है. क्या फर्क पड़ता है कि देखभाल मैं करूं या तुषार करें?”
“बेटी, यह काम औरतों को ही शोभा देता है.”
“मम्मी, आप तुषार से मिल चुकी हैं. वे बहुत ही अच्छे इंसान है. उन्होंने मुझे कभी एहसास तक नहीं होने दिया कि मैं एक औरत हूं और वे मेरे पति। वे घर को मुझ से अच्छे तरीके से संभालते हैं और बेटी का भी बहुत ध्यान रखते हैं.”
“तो क्या घर तेरी तनख्वाह से चलेगा बेटी?”
“परिवार के बीच में तेरामेरा कहां से आ गया मम्मी? मेरा और तुषार का जो कुछ है वह हम सब का है.  इस से क्या फर्क पड़ जाता है कि घर कौन चला रहा है? फर्क इस बात से पड़ता है कि घर अच्छे से चलना चाहिए. उस में सब के लिए स्थान होना चाहिए. सब की कद्र होनी चाहिए.  रिया को घर पर आया कि नहीं मम्मीपापा की जरूरत है.  तुषार उस की बहुत अच्छे से देखभाल करते हैं. अगर तुम्हें कुछ गलत लगता है तो तुम यहां आ जाओ.”
“तुम तो जानती हो कि मैं तुम्हारे पापा को अकेले नहीं छोड़ सकती और  इतने दिन वे बेटी के घर पर रहेंगे नहीं.”
“तो तुम ही बताओ कि रिया की देखभाल कौन करेगा?”
“तुम तुषार के मम्मीपापा को बुला लो.”
“वह भी तो आप की ही तरह हैं. आप यह क्यों नहीं समझतीं?” अनु बोली तो सुधा चुप हो गई. उन्हें जरा भी अच्छा नहीं लगा था कि दामाद नौकरी से छुट्टी ले कर घर बैठ कर औरतों की तरह अपनी बेटी की देखभाल कर रहा है.  इस दौरान वे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी करते रहे पर सफलता हाथ नहीं लगी.
समय कट रहा था. 3 साल बाद अनु ने एक और बेटी प्रिया को जन्म दिया. मातृत्व अवकाश में अनु ने  घर संभाला. उस ने बच्चों की देखभाल के लिए 1 साल की और छुट्टी ली. उस के बाद बच्चों को देखने की समस्या फिर खड़ी हो गई थी.  तुषार बच्चों की परवरिश में कोई भी कसर नहीं छोड़ना चाहता था.
वह इस पक्ष में नहीं था कि बच्चों को दिनभर आया के हवाले छोड़ कर खुद नौकरी पर जाया जाए. वह जानता था कि शाम को जब थक कर मम्मीपापा दोनों घर आते हैं तो उन के तनाव का बच्चों पर क्या असर पड़ता है. वे किस तरह से बच्चों की परवरिश के लिए एकदूसरे को जिम्मेदार ठहराते हैं.  समस्या गंभीर थी और इस का हल निकालना भी जरूरी था.
एक दिन तुषार बोला,”मैं सोचता हूं कि नौकरी छोड़ कर अपना समय परिवार को दे दूं.”
“नहीं, तुषार नौकरी छोड़ने की नौबत आई तो नौकरी मैं छोङूंगी तुम नहीं.”
“भला क्यों?”
“एक पुरुष का इस तरह नौकरी छोड़ कर अपने को घर पर कैद कर लेना किसी को भी अच्छा नहीं लगता.”
“मैं किसी की नहीं तुम्हारी बात पूछ रहा हूं. तुम तो जानती हो घर पर रह कर भी मैं अपने लिए कुछ न कुछ काम ढूंढ़ ही लूंगा. मुझे जितना वक्त मिलेगा उस दौरान मैं मार्केटिंग का औनलाइन काम कर लूंगा.”
“यह काम इतना सरल नहीं है.”
“मन में लगन हो तो कठिन काम भी सरल हो जाते हैं. तुम्हें मुझ पर भरोसा तो है?”

न चाहते हुए भी रोबोट बनता जा रहा है इंसान

बोलने वाले व सुनने वाले कहीं भी मिल जाएंगे. किसी भी पेड़ के नीचे टूटी चारपाइयों पर, बसस्टैंडों पर, चाय की दुकानों में, स्कूलोंकालेजों में, चर्चों, मसजिदों, मंदिरों, गुरुद्वारों में, एयरकंडीशंड हौलों में और यहां तक कि घर की बैठक और रसोई तक में भी. फर्क यह है कि इन बोलने व सुनने वालों की नीयत में हर जगह मतलब अलग होता है.

जहां स्कूलकालेजों में बोलने व सुनने वाले कुछ देना, बताना व जानना चाह रहे होते हैं वहीं सिनेमाहौल या म्यूजिक कंसर्ट में सिर्फ कुछ ऐसा सुनना चाह रहे होते हैं जो घंटों कानों में बजता रहे, कुछ मीठी यादें दिलाता रहे. टीवी, रेडियो भी यही कर रहे हैं. नेताओं को सुनने का मतलब है उन पर भरोसा कर के अपना वोट देना व अपने ऊपर उन के नियंत्रण को इजाजत देना.

मंदिर, मसजिद, चर्च, गुरुद्वारे में सुनने का अर्थ है अपने को छोटा, बेकार मानना और किसी गुजरे व्यक्ति की पुरानी बात को ले कर आज की जिंदगी चलाना. यही नहीं, जो न सुने उसे जान से मार देना भी चाहे इस दौरान अपनी ही जान चली जाए.

अब बोलने व सुनने की नई विधा आ गई है, मोबाइल. इस में आप जीभर कर हर समय, रातदिन सुनते रह सकते हैं. यह सुनना एकतरफा है. आप सवाल नहीं पूछ सकते. अगर गाने सुन रहे हैं तो सवाल भी मन में पैदा नहीं होते. म्यूजिक सूदिंग होता है, बाहरी शोर को ढक देता है पर वह आप की कुछ सुन कर उस से कुछ सम झने की ताकत को कम कर देता है.

मोबाइल पर गाने सुनना या रील्स देखना सब से पौपुलर टाइमपास हो गया है पर यह टाइमपास से टाइमवेस्ट हो गया है. यह वह नशा है जिस की लत पड़ जाए तो सामने यदि कोई हाड़मांस का व्यक्ति भी बोलता है तो उस का उत्तर देना वैसे ही जरूरी नहीं सम झा जाता जैसा किसी गाने को सुन कर या रील को देख व सुन कर कुछ कहने का मौका नहीं होता.

रेडियो और टैलीविजन ने यह क्रांति शुरू की थी पर आज यह कुछ मिनट नहीं बल्कि बहुत ही ज्यादा समय लेने लगी है और मानव स्वभाव को बदलने भी लगी है. जो लोग रील्स देखने के आदी हो रहे हैं वे एक तरफ की बात सुनने के आदी होते जा रहे है, उन में अपनी बात कहने की आदत खत्म होती जा रही है.

विकास के लिए, दिमाग को खोलने के लिए, किसी कौंप्लैक्स बात को सम झने के लिए सुनने के साथ कहते रहना जरूरी है पर मोबाइल रिवोल्यूशन आज इस मोड़ पर है जिस पर सिर्फ सुना जा रहा है, पर न सोचा जा रहा है, न सम झा जा रहा है और न जवाब दिया जा रहा है.

सिर्फ सुनते समय दिमाग एक तरह से सुन्न हो जाता है. वह उस समय विश्लेषण करना बंद कर देता है. सुनते हुए अगर प्रश्न करने की कला भूल जाएं तो बहुत खतरनाक होता है, खासतौर से हर उस शख्स की स्थिति में जो कान में इयरबड लगाए घूम रहा है.

धर्म के प्रचारक अपने भक्तों को धार्मिक प्रवचन सुनते समय हमेशा दिमाग बंद करने की सलाह देते हैं. वे सवाल न पूछने की हिदायत पहले ही दे देते हैं. जो सुनो उसे मान लो, सवाल न करो. धर्म तर्क का नहीं, आस्था का सवाल है. धर्म में जो कहा गया उसे मान लो. हर प्रवचन ईश्वर की वाणी है, उस ईश्वर की जिस ने सब को जन्म दिया, जिस ने खाना- मकान दिया, जो दुनिया चलाता है, जो जीतेजी क्या मरने के बाद फैसले करता है, जिस से किसी की कोई बात छिपी नहीं है, जो उस प्रवचन देने वाले के मुंह के माध्यम से अपनी बात कह रहा है. इस तरह की तमाम बातें सुनने वालों पर थोप दी जाती हैं.

मोबाइल यही कर रहा है. वह ईश्वर के प्रवाचकों का स्थान लेने लगा है. फिल्म में आप देख और सुन दोनों सकते हो पर जो देखा और जो सुना उसे अंतिम शब्द मान लो. मोबाइल के इन्फ्लुएंसर्स आज प्रवाचकों से ज्यादा पौपुलर हो गए हैं क्योंकि वे सिर्फ मरने, कर्मों, पाप, पुण्य की बात नहीं करते. वे वैरायटी रखते हैं पर उन का फंडा भी वही प्रवाचकों जैसा हैं. यानी, जो कहा है उसे सच मान लो. आखिर, दूसरे लाखों भी तो सच मान रहे हैं न.

पौलिटिकल नेताओं की तरह कोई इन्फ्लुएंसर्स से भी सवाल नहीं कर सकता. इंस्टाग्राम, यूट्यूब, फेसबुक सवाल पूछने के प्लैटफौर्म हैं ही नहीं. थ्रेड्स और एक्स हैं पर उन में बोला और सुना नहीं जाता बल्कि लिखा व पढ़ा जाता है, चाहे कम शब्दों में.

सिर्फ सुनने की आदत इंसान की पर्सनैलिटी को बदल रही है. सुना भी वही जिस में डांट नहीं, जिस में रास्ता दिखाने का वादा नहीं. सुना भी उन्हें जो जरूरी नहीं कि जीवन जीने की कला सिखा रहे हों. सुनने और देखने में दिन के घंटों पर घंटे और फिर हर रोज लगातार मोबाइल से चिपक कर एकतरफा संवाद के आदी इंसानों का अपना दिमाग विश्लेषण या एनालिसिस करना भूलता जा रहा है. सामाजिक उन्नति तब शुरू हुई थी जब लोगों ने सम झ कर सवाल करने शुरू किए.

आज मोबाइल पर इन्फ्लुएंसर्स रेन ड्रौप्स की तरह हैं जो किसी सरफेस पर पड़ती हैं और मिनटों में उन का सफाया हो जाता है. उन की बात, उन की तसवीर न अशोक के स्तंभों पर लिखे शब्दों की तरह हैं जो 2,500 साल बाद भी पढ़े जा सकते हैं न अजंता की गुफाओं के चित्रों की तरह जो 1,000 साल से तब का हाल बता रहे हैं.

मोबाइल कल्चर कुछ सैकंडों के लिए है, 15, 20 या 30 सैकंड में दिमाग किसी बात को ग्रहण कर उसे मन में नहीं बैठा सकता कि बाद में उस का इस्तेमाल कर सके. रील्स पौपुलर हुईं क्योंकि एक पीढ़ी ने अपनी नई पीढ़ी को इग्नोर करना शुरू कर दिया. काम में व्यस्त पीढ़ी ने युवाओं को स्कूलों के हवाले कर के और बचपन से टीवी के आगे बैठा कर एकतरफा ज्ञान को हासिल करने तक लिमिटेड कर डाला.

सदियों तक जब मानव सभ्यता बहुत धीरेधीरे विकसित हो रही थी, घरों में नए बच्चों के साथ बात करने की फुरसत किसी को नहीं होती थी. जिन्हें फुरसत होती थी उन के पास शब्द नहीं होते थे क्योंकि शब्द वही प्रचलित थे जिन्हें कोई धर्म का दुकानदार दे गया हो. छपाई की सुविधा नहीं थी. जिन्हें कहानियां याद रहती थीं उन प्रवाचकों की पूछ थी. दादियोंनानियों की पूछ थी क्योंकि वे भी कहानियां याद रखती थीं. पीढ़ी दर पीढ़ी वही कहानियां सुनाई गईं और उन्हीं पर विश्वास करना भी सिखाया गया.

नतीजा यह था कि मानव को प्रकृति के थपेड़े खाने पड़े और अपने से बलशाली मानव के भी. सिर्फ राजा या धर्मगुरु के कहने पर हजारों की फौज मरनेमारने को तैयार हो जाती थी. ह्यूमन हिस्ट्री केवल मारकाट, हिंसा, रेप, लूट, आगजनी की बन कर रह गई थी. 500 साल पहले जब प्रिंटिंग प्रैस आया और नए शब्दों को कागज पर छाप कर बांटने की तकनीक डैवलप हुई तो मानव मस्तिक का विकास शुरू हुआ. सवाल पूछे जाने लगे राजा से, धर्मगुरु से, घर में दादापिता से भी. पढ़ने पर विविधता का ज्ञान हुआ. लिखने की कला भी बढ़ने लगी. अपनी बात, जो दूसरों की बात से अलग हो, कहने का मौका मिलने लगा. जो लिखा गया, उसे छपवा कर बंटवाने की सुविधा मिलने लगी.

हर नए मोड़ पर नई चीजें बनने लगीं. लोग 10-20 मील नहीं, सैकड़ों मील जाने लगे.  झोंपडि़यों की जगह मकानों की कतारें बनने लगीं. मशीनों की खोज होने लगी. प्रकृति की देन को सम झा जाने लगा. हर चीज भगवान की बनाई नहीं होती, मानव खुद बहुतकुछ बना सकता है. जो नया निर्माण पहले 2,000 सालों में हुआ करता था, 20 सालों में होने लगा, उस के बाद तो और भी तेजी आई. हर समय कुछ न कुछ नया बना लिया जाता है.

क्यों? क्योंकि सिर्फ सुनना बंद हो गया, सिर्फ देखना बंद हो गया जबकि सोचना या सोचा जाना शुरू हो गया. जो है वह भगवान की कृपा नहीं है, हम खुद काफीकुछ कर सकते हैं केवल राजा या धर्मगुरु के लिए ही नहीं बल्कि खुद अपने लिए भी. यह तकनीक की तेजी का परिणाम है कि आज हर 2 महीनों में नई तकनीक के मोबाइल आने लगे हैं. कंप्यूटरों ने खोज व निर्माण को नया रास्ता दिखाया. लेकिन अब क्या यह अपनी पीक पर पहुंच गया है? क्या नई पीढ़ी सिर्फ सुन सकती है, सिर्फ देख सकती है? लगता तो ऐसा ही है. आज युवाओं के हाथ में पैन, कागज नहीं हैं. वे लिख नहीं सकते.

सुनने और देखने भर की क्षमता ने उन से बोलना व लिखना छीन लिया है. पढ़ने, सम झने और जो पढ़ा व सम झा उस में खामियां निकालने की कला साफ हवा की तरह गायब हो गई है. मोबाइल आधुनिक तकनीक का है पर उस ने मानव पीढ़ी को 500 साल पुराने समय की ओर धकेल दिया है जब सिर्फ सुना जाता था, राजा को या धर्मगुरु को. आज राजा और धर्मगुरुओं का स्थान इन्फ्लुएंसर्स ने ले लिया है लेकिन वे मोबाइल पर बिखरे प्लेटफौर्मों के मालिकों के लिए काम रहे हैं.

आज एक पीढ़ी केवल मानसिक गुलाम बन कर रह गई है. वह मानवरूपी रोबोट सी हो गई है. मोबाइल की आदी इस पीढ़ी को हुक्म सुनने की आदत हो गई है. वह खुद कुछ बना कर निर्माण करना भूल गई है. इस पीढ़ी में कुछ अपवाद हैं. जो कुछ पढ़ रहे हैं, सोच रहे हैं, लिख रहे हैं, सवाल भी कर रहे हैं वे ही पैसा कमा रहे हैं. अमीरगरीब के बढ़ते भेद का एक कारण यह है कि जो सिर्फ सुनने और देखने में समय नहीं लगाता, वह आगे बढ़ जाता है, भीड़ से कहीं आगे.

आप किस में है? सिर्फ सुनने और देखने वालों में या कुछ सम झ कर लिखने वालों में? सुन कर, देख कर पर साथ ही पढ़ कर सोच कर लिखना ज्यादा कठिन नहीं है. अगर मानव सभ्यता को, देशों को, अपने शहरों को, अपनी लाइफस्टाइल को, अपने परिवार को, अपने खुद को बचाना है तो फैसला करना होगा कि टाइमपास या टाइमवेस्ट करना है या टाइमयूज करना है. और लक्ष्य व दिशा जाने बिना चलना है या अपना लक्ष्य खुद सोचसम झ कर तय करना है.

 

 

 एक दाढ़ी कई अफसाने

दाढ़ी हर कोई रख और बढ़ा सकता है, इस का मैंटेनैंस भी कोई खास ज्यादा नहीं. विद्वान और परिपक्व दिखाने में दाढ़ी मददगार साबित होती है लेकिन कभीकभार यह दिक्कतें भी देती है. मु?ो बगावत की भनक पहले ही लग चुकी थी, मैं चाहता तो उस ‘दाढ़ी’ की दाढ़ी पकड़ उसे खींच सकता था,’ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उन की मनमोहक दाढ़ी पर इतने अधिकारपूर्वक कौन बोल सकता है. जाहिर है, सिर्फ उद्धव ठाकरे जिन की वजह से एकनाथ शिंदे आज वहां विराजे हैं जहां तक पहुंचने के लिए अच्छेअच्छों को पापड़ बेलने पड़ते हैं. फिर शिंदे तो दाढ़ी उगने के दिनों में ठाणे में औटोरिकशा चलाते थे.

एक दिन यों ही शिवसेना की रैली में हायहाय उन्होंने की तो उन का समय ऐसा चमका कि आज वे महाराष्ट्र चला रहे हैं, जिस में 2 पहिए भाजपा के और 2 शिवसेना के हैं. कुछ कलपुर्जे एनसीपी और कांग्रेस के भी इस से जुड़े हैं. अब कब तक यह जुगाड़ वाली गाड़ी, बकौल उद्धव ठाकरे, इस दाढ़ी से चल पाएगी, यह राम जाने. कम ही लोग जानते हैं कि एकनाथ शिंदे के बचपन का नाम राहुल पांचाल था और वे सतारा के एक बेहद गरीब कुनबी समुदाय के परिवार से हैं. अपने औटोरिकशा में सवारियां ठूंस कर उन्हें एडजस्ट करने का तजरबा अब सरकार चलाने के काम आ रहा है.

उद्धव क्यों शिंदे से इतना चिढ़ते हैं कि उन का असली नाम जबां पर लाने में भी अपनी तौहीन सम?ाते हैं. यह खी?ा, तकलीफ या जलन कुछ भी कह लें किसी से छिपी नहीं रह गई है. महाराष्ट्र में अब हर कोई शिंदे को दाढ़ी नाम से ही बुलाता है. उन की घनी काली दाढ़ी है ही इतनी आईकैचर कि नजर उस पर ठहर कर रह जाती है. आजकल इतनी ‘हाई क्वालिटी’ की दाढि़यां कम ही देखने में आती हैं.

उद्धव के हमले पर शिंदे चुप नहीं रहे. जवाब में उन्होंने कहा कि इस दाढ़ी के हाथ में आप की नब्ज दबी है. कव्वाली स्टाइल के ये सवालजवाब आम लोगों को सम?ा नहीं आए कि कौन सी नब्ज यानी राज की बात हो रही है जिस के उजागर होने से महफिल में न जाने क्या हो जाएगा. सम?ादार लोगों ने दाढ़ी से ज्यादा कुछ नहीं सोचा और उस में भी यही सोचा कि जो भी हो, शिंदे की काली चमकती दाढ़ी का कोई जवाब नहीं. दाढ़ी हो तो शिंदे जैसी, नहीं तो हो ही न.

राजनीति में दाढ़ी की अपनी अलग अहमियत है. यह उस वक्त और बढ़ गई थी जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोनाकाल में दाढ़ी रखी थी. इस दाढ़ी में बड़े सस्पैंस थे. वजह, यह कोई ऐरीगैरी दाढ़ी नहीं थी. कांग्रेसियों और वामपंथियों को इस में भी कोई चालाकी और साजिश नजर आ रही थी लेकिन दक्षिणापंथी भक्तगण मोदी की दाढ़ी को वात्सल्य भाव से निहारे जा रहे थे. उन की नजर में मोदीजी गुरु वशिष्ठ और गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर जैसे दिख रहे थे जबकि विरोधियों को उन की दाढ़ी का यह स्टाइल हिंदी फिल्मों के एक विलेन अनवर जैसा लग रहा था. इस दाढ़ी पर कई दिनों तक टीकाटिप्पणियां होती रहीं लेकिन वह सब भी बढ़ी दाढ़ी की तरह निरर्थक साबित हुआ, कोई निष्कर्ष नहीं निकला.

दाढ़ी और जीडीपी

कांग्रेसी नेता शशि थरूर भी मोदी की दाढ़ी को ले कर आंदोलित थे, जिस के लिए उन्होंने इंग्लिश के एक शब्द श्चशद्दशठ्ठशह्लह्म्शश्चद्ध4 का इस्तेमाल किया जिस का मतलब दाढ़ी बढ़ाना होता है. नएनए शब्द लौंच करने के लिए पहचाने जाने वाले थरूर ने एक ट्वीट के जरिए यह तक साबित कर दिया था कि जैसेजैसे जीडीपी गिर रही है वैसेवैसे मोदी की दाढ़ी बढ़ रही है. इस बाबत उन्होंने मोदी के दाढ़ीयुक्त चेहरे के 5 फोटोज भी शेयर किए थे जिन में दाढ़ी क्रमश: बढ़ती हुई नजर आ रही है.

इसी के साथ उन्होंने गिरती हुई जीडीपी के आंकड़े भी शेयर किए थे. इसे ग्राफिक्स इलस्ट्रेशन बताते हुए थरूर ने बढ़ती का नाम दाढ़ी और गिरती का नाम जीडीपी जैसी बात कर दी थी तो मोदीभक्त उन पर भड़क गए थे. उन्हें मोदी तो मोदी, उन की दाढ़ी तक की बुराई सुनना गवारा नहीं था और न आज है. क्योंकि, मोदी उन के आदर्श, आराध्य और प्रभु हैं.

पर ये लोग दाढ़ी के जरिए देश की तरक्की का ग्राफ दे कर थरूर के नहले पर दहला नहीं जड़ पाए थे. अंधभक्ति का एक बड़ा दुर्गुण यही है कि उस के पास सम्यक दृष्टि नहीं होती, फिर तर्कवर्क करना तो दूर की बात है.

मोदी की बढ़ी दाढ़ी के बवाल का जवाब कांग्रेस नेता व सांसद राहुल गांधी ने अपनी भारत जोड़ो यात्रा के दौरान दिया था. उन की बढ़ी दाढ़ी पर भी खूब कमैंटबाजी हुई थी. भगवा गैंग में से किसी ने ताना मारा था कि दाढ़ी बढ़ा लेने से आप प्रधानमंत्री नहीं बन जाएंगे. मोदी समर्थक और भक्तों को राहुल की दाढ़ी इतनी चुभी थी कि उन्होंने इस की तुलना सद्दाम हुसैन की दाढ़ी से कर दी थी. असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा शर्मा ने गुजरात में चुनावप्रचार के दौरान जैसे ही यह कहा कि दाढ़ी के चलते राहुल का चेहरा सद्दाम हुसैन जैसा होता जा रहा है, राहुलभक्त भी हावहाव करते उन पर टूट पड़े थे.

कांग्रेसी दिग्गज दिग्विजय सिंह ने कहा था यह वह व्यक्ति है जो कांग्रेस के नेताओं के पैर पकड़ता था. उन को शर्म आनी चाहिए आज वे जो भी हैं कांग्रेस की वजह से हैं. लेकिन हेमंत शर्मा नहीं शरमाए. शर्म तो उन्होंने तभी बेच खाई थी जिस दिन कांग्रेस छोड़ भाजपा जौइन की थी.

इस से ज्यादा चुभने वाली बात अलका लाम्बा ने यह कही कि अच्छा हुआ जब हेमंत बिस्वा राहुल से मिलने गए थे तब राहुल ने उन के बजाय अपने वफादार कुत्ते को तरजीह दी. तब हेमंत बिस्वा को यह अंदाजा नहीं रहा होगा कि राहुल की दाढ़ी भी उन्हें बेइज्जत करा देगी.

दाढ़ी से परे दिलचस्प किस्सा राहुल के कुत्ते का है जिसे हेमंत जबतब सुनाया करते हैं कि एक बार जब वे राहुल से मिलने उन के घर पहुंचे तो उन्होंने मेरी बात नहीं सुनी और अपने कुत्ते को बिस्कुट खिलाते पुचकारते रहे. अब राहुल ने उन्हें क्यों नहीं पुचकारा, यह भी कोई सस्पैंस की बात नहीं रह गई थी जो वे अपने मुंह से भाजपा की भाषा बोलने लगे थे.

खैर, वफादारी का इनाम हेमंत को भी मिला और भाजपा ने उन्हें सुग्रीव व विभीषण की तरह गले लगाते उन का राजतिलक कर दिया यानी असम का मुख्यमंत्री बना दिया, जिस के एवज में वे आज तक मोदी के सामने नतमस्तक रहते हैं और राम नामी इतने हो गए हैं कि असम से सभी दाढ़ी वालों को खदेड़ने की योजनाएं बनाते रहते हैं.

नरेंद्र मोदी की दाढ़ी ज्यादा चर्चित रही थी या राहुल गांधी की, यह तो कोई नहीं बता पाया लेकिन एक फर्क लोगों ने साफ देखा कि राहुल की दाढ़ी खिचड़ी दाढ़ी है, उस में आधे बाल काले हैं जबकि मोदी की दाढ़ी पौराणिक ऋषिमुनियों सरीखी ?ाकास सफेद है. इस का ताल्लुक उम्र से है कि अभी राहुल गांधी जवान हैं जबकि मोदीजी वानप्रस्थ आश्रम की उम्र को भी पार कर चुके हैं. लेकिन वे कुछ भी हो जाए अब कुरसी नहीं छोड़ने वाले. उम्र उन की राह में बाधा नहीं हो सकती.

अब मुमकिन है कि वे 400 पार की मंशा के लिए फिर से दाढ़ी न बढ़ाने लगें, हालांकि इस की उम्मीद कम है, फिर भी याद यह रखा जाना चाहिए कि वे मोदी हैं और मोदीजी कुछ भी कर सकते हैं, उन की मरजी.

दाढ़ी का रिवाज

दाढ़ी रखने का रिवाज मानव सभ्यता से मेल खाता हुआ है जिस का उद्भव धर्म से हुआ. हालांकि दाढ़ी खुद धर्मनिरपेक्ष है लेकिन इस दौर में दाढ़ी का भी धर्म होने लगा है. नरेंद्र मोदी ने कभी लोगों को वेशभूषा से पहचानने का मशवरा सार्वजनिक मंच से दिया था तो कई दिग्गज मुसलिम नेता तिलमिला उठे थे कि देखो, उन का इशारा मुसलमानों के कपड़ों और दाढ़ी की तरफ है. इस सच से हर कोई रोज रूबरू होता है कि हिंदुओं की दाढ़ी मुसलमानों की दाढ़ी से भिन्न होती है. इस विवाद से परे देखें तो दाढ़ी धर्मगुरुओं के चेहरे पर हमेशा से चिपकी रही है. उन की देखादेखी साधु और मौलाना वगैरह भी दाढ़ी रखते हैं.

लेकिन ?ां?ाट उस वक्त खड़ा होने लगा जब साधुओं के अलावा शैतानों ने भी दाढ़ी रखनी शुरू कर दी. वे अपनी पहचान छिपाने के लिए दाढ़ी बढ़ाते हैं जबकि धार्मिक लोग पहचान उजागर करने के लिए दाढ़ी को फलनेफूलने देते हैं. चंबल के डाकू भी दाढ़ी रखते हैं और अंडरवर्ल्ड के डौन भी व गलियों के गुंडे भी. इसीलिए रोते छोटे बच्चों को चुप कराने के लिए यह कहते डराया जाता है कि चुप हो जा, नहीं तो ?ाले और दाढ़ी वाला बाबा आ जाएगा. दाढ़ी न होती तो ये बच्चे भी बाबा से न डरते. अब थोड़ा बदलाव आया है कि अधिकतर गुंडे, डौन वगैरह क्लीन शेव रहने लगे हैं.

साहित्यिक दाढि़यां

राजनीतिक और धार्मिक दाढि़यों के बाद साहित्यिक दाढि़यां खूब प्रसिद्ध हुईं. इतनी हुईं कि रवींद्रनाथ टैगोर की दाढ़ी अपनेआप में ब्रैंड बन गई. 70-80 के दशक में दाढ़ी रखने के शौकीन युवा सैलून जा कर टैगोर कट दाढ़ी की मांग करते थे और जो समाज का लिहाज नहीं करते थे वे हिटलर कट दाढ़ी रखते थे. कवियों और शायरों की तो पहचान ही उन की दाढि़यों से होती है. तुकबंदी और पैरोडी के लिए मशहूर हास्य कवि काका हाथरसी की दाढ़ी भी अल्पकाल के लिए ब्रैंड बनी थी.

पंत और निराला की दाढि़यों की नकल कम ही हुई लेकिन अगर किसी युवा की दाढ़ी बढ़ी हुई दिखती है तो उसे मजनू, शायर, कवि और फिलौसफर जैसे संबोधनों से नवाज दिया जाता है. इधर, कुछ सालों से लोगों की राय दाढ़ी के बारे में बदली है क्योंकि उन का स्टाइल फैशन के तहत आने लगा है जो फिल्मों से प्रेरित होती हैं.

फिल्मी दाढि़यां

अमिताभ बच्चन ने जब फ्रैंच कट दाढ़ी रखी थी, समूचे युवा आंदोलित हो उठे थे. फ्रैंच कट दाढ़ी रखने की होड़ ऐसी मची थी कि नाइयों की शामत आ गई थी. अमिताभ बच्चन की दाढ़ी के आगे मोदी या राहुल की दाढ़ी कहीं नहीं ठहरती. एक नामी अखबार ने तो अमिताभ की दाढ़ी पर संपादकीय ही लिख डाला था जबकि संपादकीय आमतौर पर गंभीर सामयिक विषयों पर लिखा जाता है. फिल्मों में खलनायकों की दाढ़ी नायकों की दाढ़ी से ज्यादा लोकप्रिय होती है. ‘अमर अकबर एंथोनी’ फिल्म में प्राण ने 3 तरह की दाढि़यां रखी थीं.

बढ़ी दाढ़ी अगर विलेन के लिए अनिवार्यता थी तो क्लीन शेव रहना हीरो की अनिवार्यता थी. इस से ही दर्शक दोनों में भेद कर पाता था. यह और बात है कई फिल्मों में नायक को दाढ़ी रखनी पड़ी और विलेन क्लीन शेव रहा.

शक्ति कपूर, रंजीत और गुलशन ग्रोवर अधिकतर फिल्मों में दाढ़ीविहीन दिखे. हीरो ने कहानी की मांग के मुताबिक दाढ़ी रखी. ‘गाइड’ फिल्म में देवानंद की दाढ़ी और ‘क्रोधी’ फिल्म में धर्मेंद्र की दाढ़ी कहानी की मांग थी.

नए दौर के नायकों में नवीन कुमार गौड़ा भी हैं जिन्हें यश नाम से जाना जाता है और जो कन्नड़ सिनेमा के अभिनेता हैं. फिल्म ‘केजीएफ’ में दाढ़ी वाले लुक से वे छा गए. कार्तिक आर्यन, आयुष्मान खुराना और रणबीर कपूर भी किरदार के हिसाब से दाढ़ी रख लेते हैं लेकिन वे लहलहाती हुई नहीं होतीं, 3-4 दिन की बढ़ी हुई होती हैं.

यही चलन आज के दौर के युवाओं में ज्यादा देखने में आता है. वे डेली शेव करते हैं. बात युवाओं की हो तो दाढ़ी के माने उन के लिए अलग होते हैं. आमतौर पर युवा फोड़े, फुंसी और मुंहासे छिपाने के लिए दाढ़ी बढ़ाते हैं. कालेज के शुरुआती दिनों में अधिकतर युवा दाढ़ी बढ़ाते हैं पर उस के 2 इंच क्रौस होते ही घबरा भी उठते हैं और फिर सफाचट हो जाते हैं. आजकल की प्रेमिकाओं और पत्नियों को दाढ़ी कम ही भाती है.

दाढ़ी की महिमा अनंत है. इतिहास में अगर दक्षिण और दक्षिणापंथियों की दाढि़यां दर्ज हैं तो मार्क्स और एंगल्स की दाढि़यां भी किसी से उन्नीस नहीं थीं. उन की दाढ़ी में तिनके न के बराबर थे, इसलिए बेचारे अपनी प्रासंगिकता खो रहे हैं. ज्यादा तिनके वाली दाढ़ी दुनियाभर में चल रही है.

गुरुनानक, वशिष्ठ, भीष्म पितामह, दशरथ, रावण, वेदव्यास और कबीर तक की दाढि़यां कम मशहूर नहीं हुईं. कई विदेशी दाढि़यों ने भी लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा था लेकिन उन में अधिकतर वैज्ञानिक ज्यादा थे, मसलन गैलेलियो, ग्राहम बैल, अल्फ्रेड नोबेल, चार्ल्स डार्विन वगैरह. लेकिन ये सब भी गुजरे कल की बात हो चले हैं. वैज्ञानिक अब दाढ़ी से बहुत ज्यादा मोह नहीं रखते.

इधर, कौर्पोरेट कल्चर के चलते भी दाढि़यां कम रखी जा रही हैं क्योंकि दाढ़ी न रखना या न बढ़ाना साहबी की निशानी मानी जाती है जो अलिखित वसीयत में अंगरेज दे गए हैं. कलैक्टर, डाक्टर और इंजीनियर से ले कर पटवारी व ड्राइवर, कंडक्टर तक दाढ़ी नहीं बढ़ाते. मुमकिन है यह उन के प्रोफैशन की मांग हो लेकिन यह नपातुला सच है कि कोई 85 फीसदी मर्द जिंदगी में एक न एक बार दाढ़ी जरूर बढ़ाता है.

कोरोना के कहर के दौरान तो थोक में दाढि़यां बढ़ीं थीं क्योंकि किसी को बाहर नहीं निकलना था. उस अप्रिय और बुरे दौर के हंसीमजाक में पत्नियां पतियों को भिक्षुक तक कहने लगी थीं. दाढ़ी पुराण के संक्षिप्त वर्णन के बाद समापन इन शब्दों के साथ कि उद्धव ठाकरे जैसे एकनाथ शिंदे को दाढ़ी कह कर संबोधित करते हैं वैसे ही उन की तरह हर दाढ़ी वाले का नामकरण रिश्ते के साथ होता है. जैसे दाढ़ी वाले फूफा, दाढ़ी वाले मौसा और दाढ़ी वाले मामा वगैरह जो हर किसी की रिश्तेदारी में निकल ही आते हैं. लेकिन, अपने पिता को कभी कोई दाढ़ी वाले पापा नहीं कहता.

 

आरोही : भाग 1- अविरल की बेरुखी की क्या वजह थी?

शाम के 5 बजे थे. आज अविरल औफिस से जल्दी आ गया था. पतिपत्नी दोनों बैठ कर कौफी पी रहे थे. तभी अविरल ने कहा, ‘‘आरोही, अगले महीने 5 दिनों की छुट्टी है, कश्मीर चलते हैं. एक दिन डल लेक में सैर करेंगे. बचपन से ही मुझे स्नोफौल देखने की बहुत बड़ी तमन्ना है. मैं ने वेदर फोरकास्ट में देखा था, श्रीनगर में स्नोफौल बता रहा है.’’ वह उम्मीदभरी नजरों से पत्नी के चेहरे को देख रहा था.

आरोही आदतन अपने मोबाइल पर नजरें लगाए कुछ देख रही थी. अविरल आईटी की एक मल्टीनैशनल कंपनी में सीनियर मैनेजर था. उस की औफिस की व्यस्तता लगातार बनी रहती थी. पत्नी डा. आरोही सर्जन थी. वह एक बड़े हौस्पिटल में डाक्टर थी. उस ने अपने घर पर भी क्लीनिक खोल रखा था. इसलिए यहां भी मरीज आते रहते थे. दोनों पतिपत्नी अपनीअपनी दिनचर्या में बहुत बिजी रहते थे.

वह धीरे से बुदबुदाई, ‘‘क्या तुम कुछ कह रहे थे?’’

‘‘आरोही, तुम्हें भी सर्जरी से ब्रेक की जरूरत है और मैं भी 2-4 दिनों का ब्रेक चाहता हूं. इसलिए मैं ने पहले ही टिकट और होटल में रूम की बुकिंग करवा ली है.’’

वह पति की बात को समझने की कोशिश कर रही थी क्योंकि उस समय उस का ध्यान अपने फोन पर था.

‘‘आजकल लगता है कि लोग छुट्टियों से पहले से ही प्लानिंग कर के रखते हैं. बड़ी मुश्किल से रैडिसन में रूम मिल पाया. एअरलाइंस तो छुट्टी के समय टिकट का चारगुना दाम बढ़ा देती हैं,’’ अविरल बोल रहा था.

‘‘कहां की बुकिंग की बात कर रहे हो?’’

‘‘तुम से तो बात करने के लिए लगता है कि कुछ दिनों के बाद मुझे भी पहले अपौइंटमैंट लेना पड़ेगा,’’ वह रोषभरे स्वर में बोला, ‘‘श्रीनगर.’’

‘‘श्रीनगर, वह भी दिसंबर में, न बाबा न. मेरी तो कुल्फी दिल्ली में ही जमी रहती थी और तुम कश्मीर की बात कर रहे हो.’’

‘‘तुम्हारे साथ तो कभी कोई छुट्टी का प्लान करना ही मुश्किल रहता है. कहीं लंबा जाने का सोच ही नहीं सकते,’’ अविरल मुंह बना कर बोला.

अविरल के मुंह से श्रीनगर का नाम सुनते ही आरोही का मूड औफ हो गया था, ‘‘जब तुम जानते हो कि पहाड़ों पर जाने से मेरी तबीयत खराब हो जाती है, फिर भी तुम हिल्स पर ही जाने का प्रोग्राम बनाते हो. तुम्हें मेरी इच्छा से कोई मतलब ही नहीं रहता. मैं ने कितनी बार तुम से कहा है कि मुझे महाबलीपुरम जाना है. समुद्र के किनारे लहरों का शोर, उन का अनवरत संघर्ष देख कर मुझे जीवन जीने की ऊर्जा सी मिलती है. लहरों की गर्जन मुझे बहुत आकर्षित करती है.’’

‘‘हद करती हो, रहती मुंबई में हो और सी बीच के लिए महाबलीपुरम जाना है?’’

‘‘तुम्हें कुछ पता भी है, यह शहर तमिलनाडु के सब से सुंदर और लोकप्रिय शहरों में गिना जाता है. यहां 7वीं और 8वीं शताब्दी में पल्लववंश के राजाओं ने द्रविड़ शैली के नक्काशीदार अद्भुत भवन बनवाए थे, वे तुम्हें दिखाना चाहती हूं. मुझ से बिना पूछे तुम ने क्यों बुकिंग करवाई जबकि तुम्हें मालूम है कि मुझे पहाड़ों पर जाना पसंद ही नहीं,’’ आरोही उत्साह के साथ बोली.

‘‘क्या तुम ने कसम खा रखी है कि तुम वहीं का प्रोग्राम बनाओगी जहां मुझे जाने में परेशानी होने वाली है?’’ अविरल नाराजगी के साथ बोला. उन दोनों की शादी हुए 3 साल हो चुके थे. दोनों की पसंद बिलकुल अलगअलग थी. इसी वजह से आपस में अकसर नोकझोंक हो जाया करती थी और फिर दोनों के बीच आपस में कुछ दिनों तक के लिए बोलचाल बंद हो जाती थी.

आरोही ने गाड़ी की चाबी उठाई और बोली, ‘‘अब बंद करो इस टौपिक को. कहीं नहीं जाएंगे. आओ, बाहर मौसम कितना सुहावना हो रहा है, चलते हैं, कहीं आइसक्रीम खा कर आते हैं. थोड़ा ठंडी हवा में बैठेंगे. आज के औपरेशन ने मुझे बिलकुल थका कर रख दिया है.’’ अविरल ने साफ मना कर दिया, ‘‘मुझे तुम्हारी तरह भटकना पसंद नहीं.’’

इस के बाद लगभग 15 दिनों तक दोनों के बीच बोलचाल बंद रही. एक दिन यों ही समझौता करने के लिए आरोही पति से कहने लगी, ‘‘अविरल, हमारे यहां लोग सर्जरी से बचने के लिए बाबाओं और हकीमों के पास चक्कर काटते रहते हैं और जब बीमारी बढ़ कर लाइलाज हो जाती है तो डाक्टर से बारबार पूछते हैं कि डाक्टर, ठीक तो हो जाएंगे न? मरीज के पत्नी, बेटे के चेहरे की मायूसी देख कर मेरा दिल दुख जाता है. अवि प्लीज, थिएटर में अमोल पालेकर का ड्रामा है. मैं ने औनलाइन टिकट बुक कर लिए हैं. रात में 8 से 10 तक का समय है.’’

‘‘मेरी तो जरूरी मीटिंग है.’’

‘‘उफ, अविरल तुम कितने बदल गए हो, पहले मेरे साथ आइसक्रीम पार्लर भी उछलतेकूदते चल देते थे. अब तो जहां कहीं भी चलने को कहती हूं, तुरंत मना कर देते हो.’’

‘‘बस भी करो, आरोही. मैं तो तुम्हें खुश करने के लिए तुम्हारे साथ चल देता था. मुझे कभी भी यहांवहां भटकना पसंद नहीं था.’’

‘‘शायद, तुम्हें याद भी नहीं है कि आज मेरा बर्थडे है. सुबह से मैं तुम्हारे मुंह से ‘हैप्पी बर्थडे’ सुनने का इंतजार कर रही थी लेकिन छोड़ो, जब तुम्हें कोई इंटरैस्ट नहीं तो अकेला चना कहां तक भाड़ झोंकता रहेगा,’’ कहते हुए उस ने तेजी से कमरे के दरवाजे को बंद किया और लिफ्ट के अंदर चली गई. आंखों से आंसू बह निकले थे. उस ने अपने आंसू पोंछे और लिफ्ट से बाहर आ कर सोचने लगी कि अब वह कहां जाए? तभी उस का मोबाइल बज उठा था. उधर उस की बहन अवनी थी, ‘‘हैप्पी बर्थडे, दी. जीजू को आप का बर्थडे याद था कि नहीं?’’

‘‘उन के यहां ये सब चोंचले नहीं होते,’’ कह कर वह हंस दी.

‘‘दी, क्या सारे आदमी एक ही तरह के होते हैं? यहां रिषभ का भी यही हाल है. उसे भी कुछ याद नहीं रहता. इस बार तो ऐनिवर्सरी भी मैं ने ही याद दिलाई तो महाशय को याद आई थी.’’

वह जानती थी कि रिषभ इन सब बातों का कितना खयाल रखता है. आज सुबह सब से पहला फोन उसी का आया था. अवनी केवल उस का मूड अच्छा करने और उसे बहलाने के लिए कह रही थी. वह थोड़ी देर तक सोसाइटी के लौन में वौक करतेकरते बहन से बात करती रही, फिर घर लौट आई. डिनर का टाइम हो रहा था. श्यामा उसे देखते ही बोली, ‘‘मैडम, खाना लगाऊं?’’

‘‘चलो, मैं हाथ धो कर किचन में आती हूं.’’

‘‘सर ने कहा है कि आज सब लोग साथ में खाएंगे.’’

अविरल अभी भी अपने फोन पर गेम खेल रहा था. उसे उस का गेम खेलते देख मूड खराब हो जाता था. वह रातदिन काम करकर के परेशान रहती है और इन साहब को इतनी फुरसत रहती है कि बैठ कर गेम खेल रहे हैं. अविरल का कहना था कि गेम खेल कर वह अपना स्ट्रैस कम करता है. उसे भी अपनेआप को कंट्रोल करना चाहिए. लेकिन आरोही को तो खुद को रिलैक्स करने के लिए बाहर जा कर शौपिंग करना या आइसक्रीम खाना पसंद है. उस के चेहरे पर मुसकराहट आ गई थी. तब तक मांजी डाइनिंग टेबल पर बैठ चुकी थीं. श्यामा ने भी खाना लगा दिया था. उस ने डोंगा खोला तो छोले देख उस के मुंह में पानी आ गया था, ‘‘ओह, आज कुछ खास बात है क्या?’’

‘‘मैडम, सर ने आज कुछ स्पैशल बनाने के लिए बोला था. आज मूंगदाल का हलवा भी बना है.’’

मूंग दाल का हलवा हमेशा से उस का फेवरेट रहा है.

‘‘मेरे तो मुंह में पानी आ रहा है, अवि. जल्दी आओ, प्लीज.’’ अविरल फोन पर किसी से बात कर रहा था.

मांजी ने उस के सिर पर हाथ रखा और उस के हाथ में अंगूठी का डब्बा पकड़ा दिया, ‘‘हैप्पी बर्थडे आरोही, यह अविरल अपनी पसंद से लाया है.’’ वह जानती थी कि यह काम अकेली मांजी का है, अविरल का दिमाग इन सब में चलता ही नहीं है, लेकिन अविरल के चेहरे की मंदमंद मुसकान देख उसे उस पर बहुत प्यार आ रहा था. अविरल मुसकरा कर बोला, ‘‘सुबह जब मैं फ्रैश हो कर इधर आया, तुम अस्पताल जा चुकी थीं. इसलिए मैं ने यह सरप्राइज प्लान कर लिया. कैसा लगा डा. आरोही, मेरा सरप्राइज?’’

‘‘ओह अविरल, यू आर वैरी क्यूट.’’

वह खाना सर्व ही कर रही थी कि तभी कौलबेल बजी. घर के अंदर मामाजी रोनी सी सूरत बना कर आए. कमरे का माहौल बदल चुका था, वे अपने हाथ में एक फाइल लिए हुए थे, ‘‘मेरी आरोही बहू इतनी बड़ी डाक्टरनी है. पहले उसे दिखाएंगे.’’ सब की निगाहें उस पर अटकी हुई थीं और आरोही के हाथ में उन्होंने फाइल पकड़ा दी.

‘‘मामाजी, आप भी खाना खा लीजिए.’’

‘‘अरे डाक्टर बहू, तुम खाने की बात कर रही हो, यहां मेरी सांसें रुकी जा रही हैं.’’

मजबूरन उस ने फाइल हाथ में ले ली, सरसरी निगाहों से देखा फिर बोली, ‘‘डाक्टर मयंक ने बायोप्सी के लिए लिखा है तो आप को सब से पहले बायोप्सी करवानी पड़ेगी.’’

‘‘बहू, तुम समझती क्यों नहीं, मुझे दर्दवर्द बिलकुल नहीं है. तुम तो बेमतलब की बात कर रही हो. काटापीटी होगी तो बीमारी बढ़ नहीं जाएगी?’’

वह पहले भी कई बार स्पष्ट रूप से सब से कह चुकी थी कि वह हार्ट की डाक्टर है, कैंसर के बारे में ज्यादा नहीं जानती लेकिन मामाजी तो, बस, बारबार बहूबहू कर के पीछे पड़ कर रह गए हैं. उस ने फाइल पकड़ाते हुए कहा, ‘‘बायोप्सी जरूरी है. यह आवश्यक नहीं कि कैंसर ही हो, फाइब्रौड भी हो सकता है. वह औपरेट कर के आसानी से निकाल दिया जाएगा.’’

‘‘अरे बहू, तुम तो इतनी बड़ी डाक्टर हो, कुछ और इलाज बता दो, औपरेशन न करवाना पड़े.’’

यह पहली बार नहीं था. कभी मामाजी तो कभी मौसाजी, तो कभी कोई अंकल हर 8-10 दिनों बाद कोई न कोई समस्या ले कर उस के सामने आ खड़े होते. मामाजी ने तो उस के लिए मुसीबत ही खड़ी कर रखी है. एक ही बात, कभी कहते कि फलां वैद्य का इलाज चल रहा है, मैं कहता था न कि अब गांठ एकदम छोटी हो गई है तो कभी कहते कि वैद्यजी सही कह रहे थे कि डाक्टर तो बस अपना धंधा चलाते हैं. देखिएगा, मैं शर्तिया 15 दिनों में ठीक कर दूंगा.

 

मुझे अपनी शादी की कोई खुशी नहीं हो रही है, आप ही बताएं मैं क्या करूं ?

सवाल

मेरी उम्र 23 वर्ष है. मेरी और मेरी बहन की एक ही घर में शादी होने जा रही है. वह बड़ी है और मैं छोटी हूं. हर वह रस्म जिस में उस के साथ 35 मिनट खर्च किए जाते हैं तो मुझे सिर्फ 10 मिनटों में ही निबटा दिया जाता है. शादी से पहले जब अपने घर में ही यही हाल है तो पता नहीं शादी के बाद ससुराल में क्या होगा. मैं बहुत दुखी हूं, मुझे अपनी ही शादी की कोई खुशी नहीं हो रही, लग रहा है जैसे समझौता करने जा रही हूं. आखिर मैं क्या करूं ?

जवाब

आप की परेशानी जायज है लेकिन आप को खुद सोचना होगा कि आप के दुखी होने से कुछ बेहतर नहीं होगा बल्कि मन हमेशा भारी ही रहेगा. हर रस्म में सब बड़ी बहन पर ज्यादा वक्त दे रहे हैं, आप पर नहीं तो इस की एक वजह यह भी हो सकती है कि रस्में पहले पहल करने पर समय ज्यादा लगता है और दूसरी बारी में तो पता होता ही है कि आगे क्या करना है. साथ ही, आप को बड़ी बहन के दृष्टिकोण से भी सोचना चाहिए. उस के लिए भी सबकुछ नया है. वह भी हर रस्म में अपनी छोटी बहन की अठखेलियों के लिए तरस रही होगी.

सिर्फ अपने दुख के बारे में सोच कर आप बाकी सभी को भी दुखी कर रही हैं. आप को अपना मन बना लेने की जरूरत है कि कुछ बदलाव नहीं हो सकेंगे. शादी पर आप अभी खुश नहीं रहेंगी तो इस बात का पछतावा उम्रभर रहेगा.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें