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मेरी उम्र 30 साल है, मैं रिलेशनशिप में हूं , मुझे डर लगता है कहीं मैं प्रेग्नेंट न हो जाऊं

सवाल

मेरी उम्र 30 वर्ष है. मैं अपने बौयफ्रैंड के साथ रिलेशनशिप में रह रही हूं. वैसे तो हम फिजिकल रिलेशन बनाते वक्त पूरी एहतियात रखते हैं लेकिन फिर भी डरती हूं कि कहीं प्रैग्नैंट न हो जाऊं. मैं जानना चाहती हूं कि गर्भावस्था के लक्षण किस सप्ताह में शुरू हो जाते हैं?

जवाब

फिजिकल रिलेशनशिप बनाते वक्त पूरी सावधानी बरती जाए तो गर्भ ठहरने का डर नहीं रहता. जहां तक आप का सवाल है तो सैक्स के बाद प्रैग्नैंसी होने में लगभग 2 से 3 हफ्ते का समय लगता है. कुछ में गर्भावस्था शुरू होने के एक हफ्ते बाद ही गर्भावस्था के लक्षण दिखाई देते हैं जब एक निषेचित अंडा आप के गर्भाशय की दीवार से जुड़ जाता है. यह भी होता है कि कुछ स्त्रियों में महीनों तक लक्षण दिखाई नहीं देते हैं. वैसे, प्रारंभिक गर्भावस्था के लक्षणों में मिस पीरियड, जल्दीजल्दी पेशाब आना, सूजे हुए या कोमल स्तन, थकान और मौर्निंग सिकनैस शामिल हैं.

बेटी हो तो ऐसी : भाग 3

“तुम मुझे चुड़ैल कहो चाहे भुतनी, मुझे कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है. मैं तुम्हारी स्त्रीत्व की रक्षा करना चाहती हूं. अगर लोगों की जबान बंद करना चाहती हो तो विनायक अंकल से शादी कर लो. वह भी तो तलाकशुदा हैं. अभी तुम्हारी उम्र 34-35 के आसपास होगी यह उम्र विधवा की जिंदगी जीने के लिए नहीं होती. तुम दोनों की शादी से मुझे काफी खुशी होगी,” इतना कहने के बाद वंदना अपने कमरे से बाहर निकल गई.

वंदना का जवाब सुन कर विमला की बोलती बंद हो गई. वह कमरे से बाहर निकलती वंदना को आश्चर्य से देखती रह गई. थोड़ी देर पहले मांबेटी के बीच जो विषम स्थिति बनी हुई थी वह बदल कर कुछ हद तक साकारात्मक हो गई थी. विमला सोचने लगी,’घर में जवान बेटी के रहते वह विनायक बाबू से कैसे विवाह कर सकती है. अगर शादी हुई भी तो जगहंसाई के सिवा उस के हाथ में क्या आएगा? वह कोई अच्छा लड़का देख कर पहले वंदना की शादी कर देगी. उस के बाद अपने बारे में सोचेगी…’

वह यही सब सोच रही थी कि तभी दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी. उस ने जैसे ही दरवाजा खोला तो सामने खड़े एक युवक को देख कर दंग रह गई. युवक का सौम्य चेहरा और व्यक्तित्व काफी आकर्षक था.

“मैं वंदना की मां से मिलने आया हूं,” उस युवक ने मुसकराते हुए कहा.

“मैं ही हूं उस की मां, आप कौन हैं?”

“मैं रौशन. वंदना के साथ काम करता हूं. बैठने को नहीं बोलेंगी क्या आंटी?”

“ओह, तुम ही रौशन हो. अंदर आओ बेटा. वंदना अकसर तुम्हारी चर्चा करती है,” प्रसन्नता के साथ विमला उसे अंदर ले आई और रौशन को ड्राइंगरूप में बैठाया. फिर उस से बोली,”बैठो बेटा, चाय बना कर लाती हूं.”

“आप बैठिए न, वंदना चाय बना कर लाएगी.”

“नहीं बेटा, वह घर में नहीं है, शायद बाजार गई होगी.”

“शायद क्यों? बता कर नहीं गई है क्या? यह तो गलत बात है.”

“फोन कर के देखो न बेटा, वह कहां है?”

“ठीक है, उस से बात करता हूं.”

रौशन ने वंदना को फोन किया और बोला, “जल्दी घर पहुंचो, तुम्हें देखने के लिए मैं अपने मातापिता के साथ आया हूं.”

“इंतजार करो, बस घर पहुंचने वाली हूं,” जवाब दे कर उस ने फोन काट दिया.

विमला थोड़ी देर बाद चाय ले कर लौटी और टेबल पर रख कर उस के सामने वाली कुरसी पर बैठ गई.
“चलो, अब चाय पी लो, बेटा. और बताओ तुम्हारे परिवार में कौनकौन हैं?” विमला ने उत्सुकता से पूछा.

चाय की चुसकियां लेते हुए रौशन ने कहा,”मेरा परिवार छोटा है. 3 भाईबहनों में मैं सब से छोटा हूं. मेरी बड़ी बहन अनिता और उन से छोटी बहन सुनीता शादीशुदा हैं, जो अपनेअपने ससुराल रहती हैं. मेरी मां ममता देवी गृहिणी हैं, जबकि मेरे पिता स्कूल में शिक्षक हैं.”

तभी वंदना घर लौटी. उस के साथ विनायक, रौशन के मातापिता और दोनों बहनें भी थीं. विमला एकसाथ अपने घर में इतने मेहमानों को देख कर खुशी से झूम उठी. उस ने सभी का अभिवादन किया. तभी कुछ लोग फल, मिठाइयां, कपड़े, जेवरात आदि के पैकेट्स अंदर रख गए. यह सब देख कर विमला अजमंजस में थी. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक यह सब क्या हो रहा है। तभी विनायक बोल पड़े,”आज वंदना और रौशन की रिंग सेरेमनी है.”

सहसा रौशन की मां ममता देवी ने वंदना को अपने गले से लगा लिया और अपने साथ लाए कपङे देती हुई बोलीं,”वंदना बेटी, जल्दी तैयार हो कर आओ, रिंग सेरेमनी का वक्त हो गया है.”

“हांहां, जल्दी आओ बेटी,” रौशन के पिता ने भी आग्रह किया. वंदना कपड़े ले कर अपने कमरे में चली गई. थोड़ी देर के बाद जब आकर्षण ड्रैस में बाहर निकली तो सभी उसे एकटक निहारते रहे गए.

तभी रौशन आगे आया और रिंग बौक्स खोल कर अंगूठी निकाली और वंदना को पहनाना चाहा.

“ठहरो रौशन, अभी हमारी रिंग सेरेमनी नहीं हो सकती,” वंदना 2 कदम पीछे हटते हुए बोली.

“अरे बेटा, अचानक तुम्हें क्या हो गया? यह तो घर आए मेहमानों का अपमान है,” विमला ने नाराजगी जताते हुए वंदना से कहा.

“हां बेटी, रस्म अदायगी पूरी करो, हम बड़े अरमान ले कर तेरे पास आए थे, आखिर रौशन में क्या कमी है?” ममता ने गंभीरता के साथ अपनी बात रखी.

“कोई परेशानी हो तो बताओ वंदना, हम उस का समाधान निकालेंगे. निस्संकोच बोलो,” इस बार रौशन ने वंदना का हौसला बढ़ाया और कहा,”वंदना, दिल में छिपे गुब्बार को बाहर निकालो, दबाने से मर्ज बढ़ता है, मुझे लगता है कि तुम विनायक अंकल और अपनी मां के बारे में कुछ कहना चाहती हो…”

“हां, तुम ठीक समझे रौशन। पहले मां और अंकल की शादी करना चाहती हूं. पहले इन दोनों का रिंग सेरेमनी हो जाए, उस के बाद हम दोनों की होगी.”

“बहुत सुंदर फैसला. जितनी प्रशंसा की जाए कम है,” खुशी का इजहार करते हुए रौशन की मां और पिता ने पास आ कर वंदना की पीठ थपथपाई. साथ ही ममता देवी अपनी ममता लुटाती हुई सिर झुका कर खड़ी विमला को बांहों में भर लिया और सूने मांग को चूम कर बोली,
“रौशन बेटा, आंटी को अंगूठी दो और विनायक बाबू अपना दाहिना हाथ आगे कीजिए…”

“लेकिन…”

“लेकिनवेकिन कुछ नहीं, शुभकार्य में विलंब कैसा…विमला बहन, अंगूठी पहनाओ.”

विमला ने विनायक की उंगली में जैसे ही अंगूठी पहनाई, सभी लोगों ने तालियां बजाईं और फूलों की वर्षा की.

“वंदना की शादी के बाद तुम बिलकुल अकेली हो जाओगी बहन, इसलिए विनायक बाबू से शादी कर सुखमय जीवन का आनंद उठाओ. हमारी शुभकामनाएं और बधाइयां स्वीकार करो,” हर्ष व्यक्त करते हुए ममता ने कहा.

इधर रिंग सेरेमनी के बाद रौशन ने अपने सास और ससुर का आशीर्वाद लिया. वहीं जब वंदना ने झुक कर अपने माता और पिता का आशीर्वाद लिया तो विमला ने गीली आंखों से उसे देखा और अपने गले से लगा लिया. बेटी के जिंदादिली पर उस का रोमरोम प्रफुल्लित था. उस के दिल ने कहा, ‘बेटी हो तो ऐसी.’

समर्पण: भाग 3- सुधा क्यों शादी तुड़वाना चाहती थी?

“खुद से भी ज्यादा. सच कहूं तो मैं यही चाहती हूं कि तुम इस बारे में न सोचो.”
“मैं ने कभी ऐसा नहीं सोचा कि मेरी पत्नी नौकरी छोड़ कर घर बैठ जाए. मैं जानता हूं कि तुम में मुझ से ज्यादा टेलैंट है.”
“यह तुम क्या कह रहे हो?”
“मैं सही कह रहा हूं. तुम मुझ से अच्छी नौकरी पर हो.  तुम्हारी नौकरी के घंटे कम हैं और साथ ही नौकरी का तनाव भी कम है.  मेरी नौकरी का समय तुम से ज्यादा है और उस में तनाव भी बहुत है. अकसर नौकरी के सिलसिले में टूर पर जाना पड़ता है. मैं नौकरी से ऊपर अपने घर को तवज्जो देता हूं.”
“तुम ठीक कहते हो पर तुम्हारे मम्मीपापा क्या सोचेंगे?”
“तुम मेरे मम्मीपापा की नहीं अपने मम्मीपापा की फ़िक्र करो.  उन्हें अच्छा नहीं लगता कि दामाद नौकरी छोड़ कर घर पर रहे. मैं ने इसे अपना घर नहीं हमारा घर समझा है.  इस घर का गुजारा एक के काम करने से अच्छे से चल जाता है.  हम बच्चों को देखने के लिए घर पर आया का प्रबंध करते हैं. उस के बदले भी उसे अच्छाखासा मेहनताना देना पड़ता है.  उस पर भी दिनभर तनाव रहता है. शाम को बच्चों के काम की चिंता लगी रहती.  इस सब को संभालने के लिए हम दोनों में से एक का घर पर रहना जरूरी है. वैसे, मैं घर पर रह कर भी अच्छाखासा कमा लूंगा. अब तुम खुद सोचो तुम क्या चाहती हो?”
“मैं ने अपनी इच्छा तुम्हें बता दी है.”
“अनु, तुम नौकरी छोडती हो तो तुम पर काम का बोझ अधिक पड़ेगा और तुम्हें शायद नौकरी छोड़ने का पछतावा भी हो.”
“अभी नौकरी छोड़ने की क्या जरूरत है.  मैं अवैतनिक अवकाश भी ले सकती हूं.”
“वह तो ठीक है लेकिन तुम जिस जगह पर हो वहां पर तुम्हें अपने स्टूडैंट्स के भविष्य का खयाल भी रखना चाहिए. मेरे ऊपर इस प्रकार की कोई जिम्मेदारी नहीं है. औफिस में एक काम छोड़ता है उस की जगह दूसरा ले लेता है,” तुषार ने अनु को समझाया.
“तुम ठीक कहते हो, तुषार.  तुम्हारी सोच बहुत बड़ी है और मेरी छोटी.”
“ऐसी बात नहीं है, अनु,  तुम्हारी सोच मुझ से भी बड़ी है लेकिन समाज का दवाब देख कर शायद तुम झुक जाती हो. मुझे अपने घर की परवाह है समाज की नहीं.”
तुषार का निर्णय अनु को बहुत अच्छा लगा.  तुषार ने पहले अवैतनिक अवकाश का प्रार्थनापत्र दिया उस के बाद उस ने नौकरी से इस्तीफा दे दिया.
अनु ने यह बात जब मम्मी को बताई तो वह अवाक रह गई,”अनु, मैं यह क्या सुन रही हूं?”
“मम्मी आप ने ठीक सुना है. तुषार ने नौकरी छोड़ दी है.”
“ऐसी क्या मजबूरी आ गई?”
“मम्मी, घर पर बच्चों को हमारी जरूरत है. उसे पूरा करने के लिए किसी एक को तो यह सब करना ही था. हम दोनों ने सोचा और तुषार ने नौकरी छोड़ने का निर्णय ले लिया.”
“तो क्या दामादजी दिन भर औरतों की तरह घर का काम देखेंगे?”
“मम्मी, आप घर के काम को छोटा समझती हैं. जब 2 लोग घर से बाहर निकल कर दिनभर काम करते हैं तो दोनों के ऊपर घर और बाहर दोनों  का दवाब रहता है.  तुषार नहीं चाहते मैं इस प्रकार का तनाव झेलूं. उन्हें मेरी चिंता रहती है.  तभी तो उन्होंने इतना बड़ा फैसला लिया है. हर किसी पुरुष के बस का यह सब नहीं होता,” अनु बोली तो सुधा चुप हो गई.
वह आज तक तुषार को दिल से अपना दामाद स्वीकार नहीं कर सकी थी. उन्हें लगता था कि इस के कारण ही अनु उस मुकाम तक न पहुंच सकी थी जहां उसे होना चाहिए था. तुषार के चक्कर में पड़ कर उस ने अपना कैरियर बरबाद कर लिया था.  कितनी उम्मीदें थीं उन्हें अनु से? उस के मन में कहीं बहुत बड़ी कसक थी. उन की  बेटी ने हमेशा अपनी ही मनमानी की है और उन की कभी नहीं सुनी. जब कैरियर बनाने का समय था तब शादी कर ली.  अब जरा स्थिति सुधरी थी तो उस के पति ने नौकरी छोड दी है और घर बैठ कर बच्चे पाल रहा है.  वे समाज और रिश्तेदारों को क्या जवाब देंगे कि उन का दामाद नौकरी छोड़ कर घर में औरतों की तरह आया का काम कर रहा है?
तुषार ने जल्दी ही अपना घर और मार्केटिंग का काम बहुत अच्छे से संभाल लिया.  वह सुबह रिया को स्कूल भेजता और दोपहर उन्हें लेने जाता.  इस बीच वह अपना मार्केटिंग का काम भी कर लेता. इस से उस की अच्छीखासी कमाई भी होने लगी थी. शाम को दोनों बच्चों को घुमाने भी ले जाता. अनु कालेज से थकीहारी घर आती तो उस से प्यार से बात करता और उस की इच्छा का मान रखता. दोनों को समय मिलता तो वे इधरउधर घूमने भी चले जाते.
एक दिन सुधा का फोन आया. वह बहुत घबराई हुई थी,”अनु, तुम्हारे पापा की तबीयत बहुत खराब हो गई है. तुम तुरंत यहां आ जाओ.”
“मम्मी, मैं वहां आ कर क्या करूंगी? दिल्ली में बहुत अच्छे डाक्टर हैं. तुम प्लीज पापा को लेकर तुरंत यहां आ जाओ.”
मरता क्या न करता. ऐसी हालत में शर्माजी को दिखाने के लिए दिल्ली लाना पड़ा. अनु ने साफ कह दिया था कि मम्मीपापा मेरे ही साथ आ कर रुकेंगे.  मजबूर हो कर सुधा को वहीं रुकना पड़ा. पापाजी की हालत ऐसी न थी कि वह अकेले भागदौड़ कर सकते. तुषार एक बेटे से भी बढ़ कर उन की सेवा में लगे रहे। वह सुबहसवेरे उन के साथ डाक्टर के पास जाते. दिनभर वह उन की हर जरूरत का खयाल रखता और साथ के साथ अपना औनलाइन मार्केटिंग का काम भी निबटा लेता.
तुषार की देखभाल और भागदौड़ का नतीजा था कि पापाजी की हालत में जल्दी सुधार हो गया था. इस दौरान सुधा घर पर रह कर बच्चों की देखभाल कर लेती. तुषार दिनभर पापाजी के साथ रह कर जब घर लौटता तो सब से पहले रिया को होमवर्क करवाता. ऐसी विषम परिस्थिति में भी उस ने अनु पर पापाजी की तबियत का जरा सी भी जिम्मेदारी नहीं डाली.
पहली बार सुधा को एहसास हुआ कि तुषार के रूप में उन्हें दामाद नहीं एक हीरा मिला है जिस की पहचान अनु को बहुत पहले हो गई थी. घर चलाने की उन की रूढ़िवादी सोच को तुषार ने तार-मतार कर दिया था. तुषार का अपने परिवार के प्रति समर्पण किसी स्त्री से भी बढ़ कर था.  यहां पर स्त्री-पुरुष का कहीं कोई भेद न था. उन के परिवार की गाङी बहुत ही अच्छी तरह से प्यार से सरोबार हो आगे बढ रही थी.
अनु और तुषार अपनी जिम्मेदारियां  बखूबी निभा रहे थे.  अनु घर से बाहर निकल नौकरी कर रही थी और तुषार घर की जिम्मेदारियां निभाते हुए अपना मार्केटिंग का काम भी कर रहा था? जिस से उस की अच्छीखासी कमाई भी हो रही थी. तुषार के मम्मीपापा यह बात पहले से जानते थे कि उन्हें अपने बेटे से कोई शिकायत नहीं थी.
यह सब देख कर उन्हें अब अनु के फैसले पर कोई आपत्ति नहीं थी. उन की समझ में आ गया था कि दुनिया में रुतबा बहुत माने रखता है लेकिन इस से बढ़ कर घर की सुखशांति और पतिपत्नी के बीच की समझदारी होती है. घर में कितना भी पैसा आ जाए और वहां शांति न हो तो सब बेकार है.
सुधा के मम्मीपापा को पहली बार परिवार के प्रति समर्पण और आत्मविश्वास से भरे तुषार के सामने अपनी रूढ़िवादी सोच बहुत तुच्छ लगी.  तुषार की नई पहल पर अब उन्हें भी बहुत गर्व हो रहा था.  अनु की हंसतीमुसकराती गृहस्थी देख कर उस के मम्मी पापा बहुत खुश थे.

ट्रायल कोर्ट और विवेचकों को बनाया जवाबदेय

न्याय व्यवस्था में आमूलचूल सुधार की जरूरत है. संविधान ने कई मसलों पर स्पष्ट राय नहीं रखी पर जरूरत के हिसाब से संविधान संशोधन कर उन को अपनाया गया है. मुकदमों की बढ़ती संख्या और ऊपरी अदालतों के बढ़ते बोझ का कम करने के लिए ट्रायल कोर्ट और विवेचकों को जवाबदेय बनाना चाहिए. नेता जब कुरसी पर रहते हैं तो ऐसे कानून बनाते हैं जो राहत की जगह दंड देने वाले हों. ऐेसे में उम्मीद की आखिरी किरण न्याय पालिका ही है. उस के पास लोकसभा से अधिक ताकत दी है.

संविधान ने न्याय पालिका, कार्यपालिका और विधायिका को लोकतंत्र की रक्षा की जिम्मेदारी सौंपी थी. संविधान के यह तीनों ही स्तंभ अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाए जनता से ही उम्मीद करते हैं वह इन की कमियों को दूर करने के लिए आवाज उठाएं. जनता की आवाज के रूप में लोकतंत्र के जिस चौथे स्तंभ मीडिया की बात कही गई उस को संविधान ने न कोई ताकत दी न ही उस का आधारभूत ढांचा तैयार किया. जो आधीअधूरी ताकते हैं वह न्याय पालिका, कार्यपालिका और विधायिका के रहमोकरम पर है. संविधान केवल 3 स्तंभों पर ही टिकी है. चौथा स्तंभ 3 स्तंभों की कृपा पर निर्भर है. ऐसे में कृपा करने वाले के हिसाब से काम करना होता है.
संविधान से सब से अधिक महत्व न्याय पालिका को दिया है. कलीजिमय सिस्टम लागू होने के बाद न्याय पालिका लोकसभा और राष्ट्रपति से भी उपर हो गई है. करीब 40 साल इस व्यवस्था को लागू हुए हो गया है न्याय पालिका खुद में सुधार नहीं कर पाई है. सुप्रीम कोर्ट के जज पद से रिटायरमेंट लेने के बाद ही वह अपने हित के लिए राजनीतिक दलों से लाभ लेने लगता है. 2 साल का कूलिंग पीरियड रखने की बात कही गई थी पर वह भी नहीं हो पाया. 5 करोड़ से अधिक मुकदमे विचाराधीन हैं.

ट्रायल कोर्ट में हो जरूरी सुधार

न्यायिक व्यवस्था में पीड़ित सब से पहले ट्रायल कोर्ट जिन का निचली अदालते कहते हैं वहां न्याय की उम्मीद ले कर जाता है. वहां न्याय न मिलने पर पीडित हाईकोर्ट जाता है. इस के बाद सुप्रीम कोर्ट तक जाता है. देश में 5 करोड़ से अधिक मामले लंबित है. ऐसे में न्याय व्यवस्था में सुधार की आमूलचूल बदलाव करने होगे. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने अजय सिंह उर्फ गोलू की ओर से दाखिल एक याचिका को निस्तारित करते कहा कि ‘सभी विचारण न्यायलय और अपीलीय न्यायालय अपने आदेश को और्डर शीट पर स्पष्ट तरीके से लिखे. संक्षिप्त शब्दों का प्रयोग करने से बचें.’

न्याय व्यवस्था में छोटेबड़े हर तरह के सुधार की जरूरत है. हमारा कानून डायनेमिक है, जो समय के हिसाब से बदलते रहता है. उस की अलगअलग तरीके परिस्थिति के हिसाब से उस की व्याख्या की जाती है. कानून में बदलाव सामाजिक सच्चाई के हिसाब से होता है. अगर सामाजिक सचाई बदल गई है तो फिर कानून की सचाई को भी बदलना होगा. 21वीं सदी में परिस्थितियां बदल गई हैं तो बदली हुई परिस्थितियों के हिसाब से कानून में भी बदलाव होना चाहिए. इस से न्यायपालिका की स्वीकार्यता और भी मजबूत होगी और लोगों का भरोसा और बढ़ेगा.

‘कूलिंग पीरियड’ से परहेज क्यों ?

न्याय व्यवस्था दबाव मुक्त रहे इस के लिए एक बात बारबार उठ रही है कि रिटायर होने के 2 साल के अंदर जज कोई सरकारी पद न ले. बौम्बे लौयर्स एसोसिएशन ने एक जनहित याचिका याचिका दायर कर के मांग की थी कि सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के किसी भी रिटायर्ड जज की राजनीतिक नियुक्ति को स्वीकार करने से पहले 2 साल की ‘कूलिंग औफ’ अवधि तय की जाए. अगर इस में हर तरह के जज शामिल हो तो और भी ठीक रहेगा.

इस मसले पर संविधान ने कोई राय नहीं दी है. शायद संविधान ने इस बारे में सोचा ही नहीं होगा. संविधान ने कलीजिएम को चर्चा के बाद खारिज किया था लेकिन बाद में इस को न्याय व्यवस्था का हिस्सा बना लिया गया. इसी तरह से कूलिंग पीरियड की बात को यह कह कर टाला जाना ठीक नहीं है कि इस बारे में संविधान ने कुछ नहीं कहा है. न्याय व्यवस्था सब से ऊपर है तो उस की जिम्मेदारी बनती है कि खुद में सुधार के लिए पीआईएल का इंतजार न करें. कानून में बदलाव सामाजिक सचाई के हिसाब से होता है. अगर सामाजिक सचाई बदल गई है तो फिर कानून की सचाई को भी बदलना होगा.

‘कूलिंग पीरियड’ की मांग जज की स्वतंत्रता को मजबूत करने के लिए जरूरी है. होना तो यह चाहिए कि यह कदम खुद जजों की तरफ से उठनी चाहिए. इस से उन के प्रति और अधिक सम्मान होगा. रिटायरमेंट के बाद, दो, तीन या चार साल जो भी उचित हो, उस का कूलिंग पीरियड होना चाहिए. जब कोई सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट का जज अपने पद पर होते हैं तो वे सरकार के खिलाफ और पक्ष में भी निर्णय देते हैं.

कायदे से कूलिंग पीरियड 5 साल होना चाहिए. क्योंकि 5 साल में सरकार बदल जाती है. अगर लोगों के बीच यह धारणा है कि कोई जजमेंट किसी खास सरकार के वक्त में उन के पक्ष में आया है तो सरकार फैसले देने वाले जज को रिटायरमेंट के बाद उस के एवज में कुछ देती है. इसलिए जरूरी है कि रिटायरमेंट के बाद कूलिंग औफ पीरियड जरूर होना चाहिए ताकि बीच में एक गैप आ जाए और जिस की वजह से न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनी रहे. ऐसा होने पर अगर किसी जज ने सरकार के पक्ष में कोई जजमेंट दिया तब ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि रिटायरमेंट के बाद जो पद मिला है, उस फैसले के एवज में मिला है.

लोगों का लगता है कि कोई फैसला अगर सरकार के पक्ष में आता है तो पोस्ट रिटायरमेंट कोई जौब या राजनीतिक नियुक्ति इस वजह से तो नहीं दी गई है. इस में बहुत सारे ट्रिब्यूनल हैं, कमीशन हैं. इन का पोस्ट रिटायरमेंट के बाद जजों को मिल जाता है तो लोगों को लगता है कि उसी वजह से मिला है. सचाई क्या है कोई नहीं जानता पर जो राय बनती है उस का समाधान होना चाहिए.

न्यायपालिका चुने हुए लोगों पर आधारित नहीं होती है. न्यायपालिका की जवाबदेही सीधे पब्लिक को ले कर नहीं होती है. यही कारण है कि न्यायपालिका स्वतंत्र है. जबकि कार्यपालिका यानी सरकार इसलिए स्वतंत्र नहीं होती है क्योंकि उन की जवाबदेही सीधे पब्लिक की होती है. न्यायपालिका का निर्णय कानून के आधार पर होता है. पब्लिक के मूड से न्यायपालिका के किसी फैसले का कोई संबंध या प्रभाव नहीं होता है. यह माग लंबे समय से चल रही है.

इस के अलावा भी मजिस्ट्रेट स्तर से ले कर बड़ी अदालतों तक में बहुत सुधार की जरूरत है. इस के कारण न्याय देर से मिल रहे और उस के लिए सभी अदालतों के चक्कर काटने पड़ते है. देश में रहने वाले बड़े वर्ग के पास न तो इतना पैसा होता है और न जानकारी ऐसे में कई बार गलत लोग इस का लाभ उठा लेते हैं.

राजनीतिक दलों पर जब शिकंजा कसता है तब उन को न्याय और कानून में खामी नजर आती है वैसे वह न्याय में सुधार पर आंख बंद कर काम करते हैं. अदालतों का सम्मान करते हैं. राहुल गांधी हो या अरविंद केजरीवाल खुद ही ऐसे कानून बनाते हैं जिन में जनता पिसती है. आयकर की नोटिस से जब जनता परेशान होती है तो इन की कानों पर जूं नहीं रेंगती. जब आयकर ने कांग्रेस के बैंक खाते फ्रीज किए तब उनका ‘विधवा विलाप’ शुरू हो गया. राजनीतिक दलों को कानून सविधा के अनुसार बनाना चाहिए दंड देने के हिसाब से नहीं.

कूलिंग पीरियड के पीछे की वजहें

कलकत्ता हाईकोर्ट के जस्टिस अभिजीत गंगोपाध्याय ने इस्तीफा दे कर पद छोड़ा और भाजपा में शामिल हो गए. यह कोई पहला मामला नहीं है, जब किसी न्यायाधीश ने सियासी राह चुनी हो. उन से पहले पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई, जस्टिस हिदायतुल्ला, जस्टिस रंगनाथ मिश्रा भी सियासी दलों से जुड़ चुके हैं. कलकत्ता हाईकोर्ट के जस्टिस अभिजीत गंगोपाध्याय ने पहले पद से इस्तीफा दिया. फिर 7 मार्च 2024 को भाजपा में शामिल हो गए.

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस ने उन के भाजपा में शामिल होने को ले कर निशाना साधना शुरू कर दिया है. दोनों ही दलों का कहना है कि उन के इस कदम से उन के अब तक फैसलों पर सवाल उठना लाजिमी है. पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई 17 नवंबर 2019 को अपना कार्यकाल पूरा होने के बाद 19 मार्च 2020 को ही राज्यसभा सांसद बन गए थे. उन के राज्यसभा सांसद बनने पर भी काफी हल्ला मचा था.

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस बहरुल इस्लाम आजादी के बाद से कांग्रेस नेता रहे. असम के बहरुल इस्लाम दो बार 1962 और 1968 में कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा सदस्य बने. उन्होंने बतौर राज्यसभा सदस्य दूसरा कार्यकाल पूरा होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया और गुवाहाटी हाईकोर्ट में जस्टिस बन गए. फिर 1 मार्च 1980 को सेवानिवृत्त होने के बाद 4 दिसंबर 1980 को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने उन्हें सुप्रीम कोर्ट में जज बना दिया.

सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने 1982 में बिहार के अर्बन को-औपरेटिव घोटाले में कांग्रेस नेता जगन्नाथ मिश्रा को आरोपों से बरी कर दिया. इस पीठ में बहरुल इस्लाम भी थे. सुप्रीम कोर्ट से इस्तीफा देने के बाद 1983 में तीसरी बार राज्यसभा सांसद बनाए गए.

सिख दंगों में कांग्रेस को क्लीन चिट देने वाले पूर्व सीजेआई रंगनाथ मिश्र सेवानिवृत्ति के बाद कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा सदस्य बने. दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस मिश्र की नियुक्ति 1983 में हुई और वह 1990 में मुख्य न्यायाधीश बने. पूर्व पीएम इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में सिख दंगे भड़के. दंगों की जांच के लिए पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने रंगनाथ मिश्र आयोग बनाया. आयोग ने 1986 में अपनी रिपोर्ट पेश की. इस में कांग्रेस को क्लीन चिट दी गई थी. बाद में कांगेस नेता सज्जन कुमार समेत कई नेताओं को दंगे भड़काने का दोषी मानते हुए सजा सुनाई गई थी. सेवानिवृत्ति के बाद रंगनाथ मिश्र कांग्रेस में शामिल हो गए और 1998 से 2004 तक राज्यसभा सदस्य रहे.

पूर्व सीजीआई रंजन गोगोई सुप्रीम कोर्ट से रिटायरमेंट के 6 महीने गुजरने से पहले ही राज्यसभा के सदस्य बन गए थे. इस पर विपक्षी दलों ने काफी हंगामा किया था. वहीं, उच्च सदन में दिए गए उन के भाषण पर भी काफी हल्ला हुआ था. दिल्ली सर्विस बिल पर दिए भाषण में उन्होंने कहा कि अगर पसंद का कानून न हो तो ये मनमाना नहीं माना जा सकता है. ऐसा कह कर उन्होंने बिल का विरोध कर रहे विपक्षी दलों के तर्क को खारिज कर दिया था. इस पर कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने कहा था कि क्या देश के संविधान को पूरी तरह से खत्म करने के लिए यह भाजपा की साजिश थी. संविधान पर हमला करने के लिए वो एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश का सहारा ले रहे हैं.
पूर्व जस्टिस केएस हेगड़े का सार्वजनिक जीवन काफी दिलचस्प रहा है. वह 1947 से 1957 तक लोक अभियोजक रहे. इस के बाद वह कांग्रेस में शामिल हो गए. कांग्रेस ने 1952 में उन्हें राज्यसभा सदस्य बना दिया. राज्यसभा सदस्य रहते हुए ही उन्हें मैसूर हाईकोर्ट में जस्टिस नियुक्त किया गया. फिर उन्हें दिल्ली और हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश भी बनाया गया. उन्होंने 30 अप्रैल 1973 को पद से इस्तीफा दे दिया. वह फिर राजनीति में आए और जनता पार्टी के टिकट पर दक्षिण बेंगलुरु सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा और जीता. वह 20 जुलाई 1977 तक सांसद रहे ओर 21 जुलाई 1997 को उन्हें लोकसभा अध्यक्ष चुना गया.

मोदी सरकार ने पूर्व सीजेआई पी. सदाशिवम को 2014 में केरल का राज्यपाल नियुक्त किया. इन के अलावा सुप्रीम कोर्ट में पहली महिला जज रहीं जस्टिस एम. फातिमा बीबी को रिटायरमेंट के बाद कांग्रेस सरकार ने तमिलनाडु का राज्यपाल नियुक्त किया था. वह तमिलनाडु की पूर्व सीएम जयललिता को भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे होने के बाद भी मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने के कारण विवादों में घिर गई थीं.

यह तो कही हुई कहानियां हैं. बहुत सारी ऐसी कहानियां है जिन को कहना सरल नहीं है. राजनीतिक में जाने के अलावा तमाम तरह की सुविधाएं लेने के लिए अलगअलग नियुक्त्यिां होती हैं. ऐसे में न्याय व्यवस्था में सुधार की जरूरत है. केवल किसी मामले की सुनवाई करते समय सुधार की बात कहने से जनता का भला नहीं होगा.
न्यायपालिका को इतने अधिकार संविधान ने दिए हैं कि अगर उस के अंदर इच्छा शक्ति हो तो वह खुद में सुधार कर सकती है. यह पूरी दुनिया के सामने एक नजीर होगी. बात ट्रायल कोर्ट की ही नहीं विवेचना करने वाली पुलिस पर की भी जवाबदेही तय की जाए. अगर कोई फैसला उपरी अदालतों में जा कर पलट जाता है इन की जिम्मेदारी तय हो कि ऐसा क्यों हुआ ? जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी सुधार संभव नहीं है.

बेरोजगारी की हालत में अंडरपैड काम करने को तैयार डिलीवरी पर्सन

मिंत्रा एक ईकौमर्स प्लेटफौर्म है. जहां से मनपंसद की खरीददारी की जाती है. खरीददारी करने के लिए अपने मोबाइल पर मिंत्रा का एक डाउनलोड करना होता है. इस और्डर को डिलीवरी ब्यौय 1 से 7 दिन में ग्राहक तक पहुंचाता है. डिलीवरी में कितना समय लगेगा इस की ट्रैकिंग की जा सकती है. एक पार्ट से दूसरी जगह पहुंचने पर ग्राहक को मैसेज आ जाता है कि आप का और्डर कहां पर है ? यह काम और्डर ट्रैकिंग टूल करता है. पैकेट पर जो बार कोड लगा होता है उस के जरीए ही यह होता है. हर और्डर को ट्रैक नहीं किया जा सकता है. और्डर ट्रैक करना चाहते हैं तो और्डर देते समय ही ‘ट्रैक और्डर’ औप्शन पर क्लिक करना होता है.

डिलीवरी करने वाली ज्यादातर कंपनियां अब अपने लौजिस्टिक्स पार्टनर रखते हैं. लौजिस्टिक्स पार्टनर चेन सिस्टम रखता है. यह अपनी सेवा शर्तों के हिसाब से काम लेते हैं. इससे कंपनी की जिम्मेदारी नहीं रहती है. मिंत्रा के लिए डिलीवरी करने वाले 30 साल के शूफियान खान से बात करने पर पता चलता है कि प्रति डिलीवरी शूफियान को 12 रूपए 50 पैसे मिलता है. डिलीवरी के लिए शूफियान ने स्कूटी रखी हुई है. उस में सामान रखना सरल होता है.

शूफियान लखनऊ के चैक इलाके में काम करता है. इन को 3 किलोमीटर के दायरे में डिलीवरी करनी होती है. प्रति दिन 20-25 डिलीवरी यह कर लेते हैं. महीने में 12 से 15 हजार के बीच मिल जाता है.

शूफियान कहते हैं ‘शुरूशुरू में अच्छा लगता है. काम आसानी से मिल जाता है. पैसा आने लगता है. धीरेधीरे इस काम में भी लोग बढ़ रहे हैं जिस से हमारी आय नहीं बढ़ रही है. 3 से 4 साल में इस काम से मन उबने लगता है. शरीर में दिक्कतें बढ़ जाती हैं. रीढ़ की हड्डी कमर और गरदन में दर्द बढ़ता है. जितनी मेहनत होती है उस हिसाब से पैसा नहीं है. मजबूरी में करते हैं. जिस दिन काम नहीं करते पैसा नहीं मिलता है.

मिंत्रा के लिए डिलीवरी करने से पहले शूफियान स्नैपडील के लिए काम करते थे. 2 साल वहां काम करने के बाद अब वह मिंत्रा के लिए काम कर रहे हैं. इन के मोबाइल में मिंत्रा का एप डाउनलोड है. इस में इन की अपनी एक आईडी बनी है. आईडी में शूफियान का पूरा विवरण दर्ज है. इन का नाम, पता, फोन नंबर, गाड़ी का नंबर और प्रकार, आधार कार्ड की कापी इस के अलावा इन का बैंक खाता. गाड़ी और फोन दोनों ही शूफियान के हैं. इन का किसी तरह का कोई चार्ज मिंत्रा नहीं देती है.

शूफियान का कहना है कि उसे आपसी संपर्क से यह जानकारी मिली कि मिंत्रा के लिए काम कर सकते हैं. संपर्क करने पर शोभित शर्मा मैनेजर मिले. शूफियान के फोन पर एप डाउनलोड किया. उस में औनलाइन एक फार्म भरा जिस में नाम, पता, फोन आधार का विवरण दिया. एक ओटीपी आती है उस को लिखते ही औनलाइन फार्म पूरा भर कर जमा हो गया. उस की कोई कौपी शूफियान के पास नहीं है. इस पेशे में गरीब और कमजोर वर्ग के युवा ज्यादा आते हैं जो कंपनी से झगड़ा नहीं करते.

जब डिलीवरी मैन का काम शुरू हुया था तब हालात थोड़े बेहतर थे अब यहां भी लौजिस्टिक्स पार्टनर के रूप में बिचैलिए आ गए हैं जिन की वजह से काम ज्यादा खराब हो गया है. बेरोजगारी है तो सब सहन करना पड़ता है. यह सोच कर काम करते हैं कि बेरोजगार खाली बैठने से अच्छा है कि डिलीवरी मैन बन कर ही काम करें. इन का बड़ा समूह हो गया है. एकदूसरे को यह जानकारी देते रहते हैं कि कहां कितने लोगों की जगह खाली है. परेशान होने के बाद भी थकहार कर उसी काम को करने लगते हैं.

मार्च माह का तीसरा सप्ताह, कैसा रहा बौलीवुड का कारोबार

मार्च माह के दूसरे सप्ताह में फिल्म ‘शैतान’ की वजह से बौलीवुड से जुड़े लोगों को थोड़ा सा मुसकराने का अवसर मिला था, मगर अफसोस तीसरे सप्ताह में घोर मायूसी छा गई. तीसरा सप्ताह हर फिल्मकार के लिए एक सबक है कि काठ की हांडी बारबार नहीं चलती. तीसरे सप्ताह यानी कि 15 मार्च को ‘द केरला फाइल्स’ के निर्माता विपुल अमृतलाल शाह, निर्देशक सुदीप्तो सेन और हीरोईन अदा शर्मा की तिकड़ी एक बार फिर अजेंडे वाली फिल्म ‘बस्तर : द नक्सल स्टोरी’ ले कर आए. तो वहीं करण जोहर निर्मित और सागर आंबे्र व पुस्कर ओझा निर्देशित तथा सिद्धार्थ मल्होत्रा के अभिनय से सजी फिल्म ‘योद्धा’ भी प्रदर्शित हुई. यह दोनों फिल्में शूटिंग के दौरान दिनभर के चाय का खर्च भी बौक्स औफिस पर इकट्ठा नहीं कर सकीं.

गत वर्ष विपुल अमृतलाल शाह, सुदीप्तो सेन और अदा शर्मा की तिकड़ी अजेंडे वाली फिल्म ‘द केरला स्टोरी’ ले कर आई थी, जिसे सरकार का भी अपरोक्ष समर्थन था मगर सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म निर्माता और निर्देशक को फिल्म में गलत ढंग से आंकड़े पेश करने के लिए फटकार लगाई थी.
फिल्म ठीकठाक चल गई थी. उस के बाद आननफानन में इस तिकड़ी ने छत्तीसगढ़ राज्य की पृष्ठभूमि पर फिल्म ‘बस्तर : द नक्सल स्टोरी’ बना कर चुनाव से पहले रिलीज कर दी. यह फिल्म भी अजेंडे वाली फिल्म है, जिस में बहुत कुछ गलत ढंग से पेश किया गया है.

आईपीएस नीरजा (अदा शर्मा) खुलेआम माओवादियों को गोलियों से उड़ाने की बात करती है. इस फिल्म में फिल्मकार ने आदिवासियों की समस्या, लोग नक्सली क्यों बन रहे हैं आदि पर कोई बात न करते हुए सभी नक्सलियों को देशद्रोही बताया है. फिल्म अति घटिया बनी है. आईपीएस के किरदार में अदा शर्मा फिट नहीं बैठती है. निर्माता के अनुसार फिल्म की लागत 15 करोड़ रूपए है. मगर यह फिल्म बौक्स औफिस पर पूरे सप्ताह में 35 लाख रूपए ही कमा पाई. निर्माता की जेब में तो 10 लाख भी नहीं आएंगे. यानी कि शूटिंग के दौरान जो चाय पर खर्च किया गया था, वह भी वसूल नहीं हो पाया.

मजेदार बात यह है कि इस फिल्म के सह लेखक अमरनाथ झा कभी घोर कम्युनिस्ट / माओवादी हुआ करते थे और जेल भी जा चुके हैं. मगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वजह से उन का अचानक कम्युनिस्ट विचारधारा से मोहभंग हुआ और उन्होने ‘बस्तर : द नक्सल स्टोरी’ की कहानी लिखते हुए माओवादियों को गोली से उड़ाने की बात की है.

पिछले 3 वर्ष से प्रदर्शन का इंतजार कर रही करण जोहर निर्मित तथा सागर आंबे्र व पुष्कर ओझा निर्देशित फिल्म ‘योद्धा’ अंततः 15 मार्च को प्रदर्शित हो गई. देशभक्ति की बात करने वाली यह भी एजेंडे व सरकारपरस्त प्रोपगेंडा वाली फिल्म से इतर कुछ नहीं है. फिल्म में आर्मी औफिसर अरूण कात्याल के किरदार में सिद्धार्थ मल्होत्रा हैं जो कि ‘योद्धा टौस्क फोर्स’ के मुखिया हैं. इस फिल्म की सब से बड़ी कमजोर कड़ी अभिनेता सिद्धार्थ मल्होत्रा हैं. सिद्धार्थ मल्होत्रा को अभिनय की एबीसीडी नहीं आती, मगर वह करण जोहर के प्रिय अभिनेता हैं.

फिल्म के पीआर की सलाह पर इस फिल्म का ट्रेलर हवा में यानी कि उड़ते हुए प्लेन के अंदर चंद चुनिंदा पत्रकारों के बीच रिलीज किया गया था और प्लेन के अंदर पत्रकारों को ‘टैब’ बांटे गए थे कि वह फिल्म को चार से पांच स्टार देंगे. पर फिल्म ने बौक्स औफिस पर पानी तक नहीं मांगा. 55 करोड़ की लागत में बनी यह फिल्म बौक्स औफिस पर महज 18 करोड़ ही कमा सकी. इस में से निर्माता की जेब सिर्फ 6 करोड़ ही आने हैं. ‘बस्तर द नक्सल स्टोरी’ और ‘योद्धा’ जैसी घटिया फिल्मों का फायदा दूसरे सप्ताह में ‘शैतान’ ने उठाया. कहा जा रहा है कि यह फिल्म सफल फिल्म है.

शोभा करंदलाजे के बम बाले बयान पर बवाल, कहीं भाजपा के गले की हड्डी न बन जाए

अपने नजदीकियों में प्यार से शोभाक्का नाम से पुकारी जाने वाली वे घोषित तौर पर साध्वी नहीं हैं और न ही गेरुए कपड़े पहनती हैं लेकिन विचारों और हरकतों से वे किसी उमा भारती या प्रज्ञा सिंह ठाकुर से उन्नीस नहीं हैं. केंद्रीय राज्य मंत्री शोभा करंदलाजे कर्नाटक की फायर ब्रांड भाजपा नेत्री हैं जिन्हें हलाल मीट पर भी एतराज रहता है, हिजाब पर भी और लव जिहाद जैसे मुद्दों पर भी वे ताबड़तोड़ बोलती हैं. ऐसे मुद्दों पर हालांकि अकसर वे आलाकमान और शीर्ष नेताओं के बयानों को ही कौपी पेस्ट करती हैं लेकिन तब कट्टरवादी शैली उन की लैंग्वेज और बौडी लैंग्वेज दोनों में होती है.

अविवाहित, 57 वर्षीय, सुंदर, आकर्षक हिंदुत्व की राजनीति में दक्ष शोभा पर्याप्त शिक्षित भी हैं. उन के पास 2 मास्टर्स डिग्री हैं. कौलेज की पढ़ाई के दौरान ही वे आरएसएस से जुड़ गईं थीं और तभी उन्होंने प्रण ले लिया था कि आजीवन शादी नहीं करेंगी और हिंदुत्व के लिए ही समर्पित रहेंगी. इन दोनों कसमों पर वे आज तक कायम हैं और दिनरात हिंदुत्व के विचारों में ही वे विचरण करती हैं. इसी हिंदुत्व ने उन्हें केन्द्रीय मंत्रीमंडल तक पहुंचाया और अभी और भी आसमान अभी बाकी हैं.

शोभा ने बम वाला जो बयान दिया वह अब उन के ही गले पड़ता नजर आ रहा है. हालांकि मौसम चुनाव का है और कर्नाटक भाजपा के लिए अब पिछले चुनाव सरीखा आसान नहीं है, यह बात शोभा भी जानती हैं इसलिए उन्होंने कहा, “तमिलनाडु का व्यक्ति आता है और वह बेंगलुरु में ट्रेनिंग ले कर रामेश्वरम में बम रखता है.”

गौरतलब है कि एक मार्च को बेंगलुरु के रामेश्वरम केफे में बम विस्फोट हुआ था जिस की पुलिस जांच अभी चल रही है. लेकिन जादू के जोर से शोभा को पता चल गया कि आरोपी कहां से आए थे. अच्छा तो यह होता अगर वे उन के नाम पते भी बता देतीं तो कोई झंझट ही नहीं रह जाता.

लेकिन शोभा की मंशा असल में झंझट खड़ी कर मीडिया का ध्यान अपनी तरफ खींचने की थी जिस से पब्लिसिटी मिले इस में वे कामयाब भी रहीं. क्या यह या ऐसा बयान देना फौरीतौर पर उन की मजबूरी हो गया था? तो इस का जबाब हां में ही निकलता है क्योंकि उन का उबके ही संसदीय क्षेत्र उडड्पी चिकमंगलूर में काफी विरोध हो रहा था जो उन की ही पार्टी के लोग कर रहे थे.

बहुत ज्यादा नहीं बल्कि बीती 10 मार्च को ही उडड्पी चिकमंगलूर में भाजपा कार्यालय में भाजपा कार्यकर्ताओं ने ही उन की उम्मीदवारी का विरोध करते गो बैक के नारे लगाए थे. मीडिया के सामने कुछ आक्रोशित कार्यकर्ताओं ने कहा था कि शोभा करंदलाजे जो पिछले 10 सालों से चिकमंगलूर का प्रतिनिधित्व कर रही हैं उन का पार्टी के ब्लौक समिति नेताओं से कोई परिचय नहीं है.

ये छोटे नेता शोभा की संभावित उम्मीदवारी को ले कर इतने भड़के हुए थे कि किसी की बात सुनने तैयार नहीं थे. यह पहला मौका नहीं था जब चिकमंगलूर के भाजपा कार्यकर्ताओं ने शोभा का विरोध किया हो. उन्होंने 10 फरवरी को भी नरेंद्र मोदी, अमित शाह और अध्यक्ष जेपी नड्डा को पत्र लिखते कहा था कि शोभा को टिकट न दिया जाए बल्कि किसी नए चेहरे को उतारा जाए. इन कार्यकर्ताओं ने शोभा पर उदासीनता का आरोप लगाया था. इन्हीं दिनों में मछुआरों की उन से नाराजगी की बात भी उजागर हुई थी.

लेकिन शोभा के गौड फादर पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा उन के नाम पर अड़ गए थे इसलिए आलाकमान ने बीच का रास्ता निकालते शोभा को बेंगलुरु उत्तर से टिकट दे दिया जहां से पूर्व मुख्यमंत्री सदानंद गोडा फिर से लड़ना चाह रहे थे. अब उन के भाजपा छोड़ने और कांग्रेस से लड़ने की अटकलें लग रही हैं. तो बेंगलुरु में बवंडर मचाने की गरज से शोभा ने जो बयान दिया वह अब उन्ही के गले की हड्डी बनता जा रहा है.

बयान को कोई सरपैर नहीं था और था भी तो बस इतना कि बेंगलुरु उत्तर के लोग जान लें कि अब यहां से दक्षिण की साध्वी चुनाव मैदान में है जिस का इकलौता एजेंडा सांप्रदायिक बैर फैलाने का रहता है. इस विवादित बयान के 2 दिन पहले ही बेंगलुरु में एक हिंदू दुकानदार की ठुकाई कुछ मुसलिम युवकों ने इसलिए कर डाली थी कि वह नमाज के दौरान स्पीकर पर तेज आवाज में हनुमान चालीसा बजा रहा था. इस पर हजारों भाजपा कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया था जिस की अगुवाई शोभा करंदलाजे कर रहीं थीं. क्योंकि वे अब वहां से उम्मीदवार हैं और जीतने के लिए हिंदूमुसलिम वाला अपना प्रिय टोटका आजमा रहीं हैं. इसी झक में वे कन्नड़ और तमिलों में भी नफरत फैलाने की चूक कर बैठी. आदत से मजबूर जो हैं.

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने तुरंत शोभा को घेर लिया. उन्होंने कहा भाजपा की केंद्रीय मंत्री शोभा के बेतुके बयान की मैं कड़ी निंदा करता हूं. इस तरह के दावे करने के लिए या तो एनआईए का अधिकारी होना चाहिए या फिर रामेश्वरम केफे ब्लास्ट से करीबी तौर पर जुड़ा होना चाहिए.

स्पष्ट तौर पर उन के पास इस तरह के दावे करने का कोई अधिकार नहीं है तमिल और कन्नड़ के लोग समान रूप से भाजपा की इस विभाजनकारी बयानबाजी को खारिज कर देंगे. बात यहीं खत्म हो जाती तो और बात थी लेकिन बात तब और बिगड़ी जब मैदुरे सिटी में उन की टिप्पणी पर साइबर क्राइम पुलिस ने एक डीएमके कार्यकर्ता की शिकायत पर एफआईआर दर्ज की. शिकायत चुनाव आयोग तक भी पहुंची जिस ने आदर्श आचार संहिता के उल्लघन करने पर नोटिस देते शोभा को जवाब देने के लिए 48 घंटों का वक्त दिया है.

अब जो भी हो जल्द सामने आ जाना है मगर बवंडर मचते देख शोभा ने तमिल भाईबहनों से माफी मांग ली है. लेकिन यह टिप्पणी उन्हें और भाजपा दोनों को महंगी पड़ सकती है क्योंकि तमिलनाडु में तो भाजपा की हालत खस्ता है ही लेकिन कर्नाटक में भी अंदरूनी कलह के चलते सब कुछ ठीकठाक नहीं है.

अगर चुनाव आयोग ने सख्ती बरती तो शोभा को लेने के देने भी पड़ सकते हैं. न जाने क्यों केरल के मुख्यमंत्री पी विजयन और कांग्रेस इस टिप्पणी पर खामोश हैं. आम आदमी पार्टी की खामोशी तो समझ आती है क्योंकि उन के मुखिया अरविंद केजरीवाल पर गिरफ़्तारी की तलवार लटक रही थी जो आखिरकार गिर भी गई.

दरअसल में कर्नाटक की कथित रूप से बिगड़ती कानून व्यवस्था पर शोभा ने इतना भर नहीं कहा था कि तमिलनाडु से आए लोग बम लगाते हैं बल्कि उन्होंने आगे यह भी जोड़ा था कि दिल्ली से आए लोग पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हैं और केरल से आने वाले तेजाबी हमले करते हैं.

यह भी पहला मौका नहीं है जब कोई भाजपाई नेता अपने ही बयान पर घिर रहा हो बल्कि कई बार ऐसा हो चुका है. आलू से सोना बनाने की बात असल में कही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने थी जिस का हवाला एक मीटिंग में राहुल गांधी ने दिया था लेकिन भगवाईयों ने वीडियो एडिट कर उसे राहुल गांधी का ही बना कर वायरल कर दिया.
नरेंद्र मोदी का वह वीडियो भी अकसर वायरल होता रहता है जिस में वे एक चाय वाले का जिक्र करते हुए कह रहे हैं कि वह नाले की गैस का इस्तेमाल गैस सिलेंडर में कर लेता है.

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