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क्या है प्रोस्थेटिक मेकअप और परफौरमिंग आर्ट्स जिसे फिल्म में हीरो हीरोइन यूज करते हैं

फिल्मों, टेलीविजन, थिएटर और अन्य प्रदर्शन कलाओं के लिए चेहरे और शरीर पर कृत्रिम मेकअप के द्वारा लुक को चेंज करने के लिए आजकल जो तकनीक बौलीवुड और हौलीवुड में इस्‍तेमाल किया जाता है, वह है प्रोस्थेटिक मेकअप. अकसर लोग जानना चाहते हैं कि प्रोस्थेटिक है क्या और यह कैसे प्रयोग में लाई जाती है.

दरअसल ऐसा मेकअप करना आसान नहीं होता, घंटों समय लगता है, इसलिए किसी भी फिल्म में प्रोस्थेटिक का प्रयोग करने के लिए कलाकार को घंटों पहले आ कर इसे लगाना पड़ता है. फिल्म ‘साड़ की आंख’ में अभिनेत्री तापसी पन्नू ने कहा कि उन्हें वयस्क की भूमिका निभाते हुए काफी समय तक प्रोस्थेटिक मेकअप लेना पड़ा, जिस से कई प्रकार की त्वचा की समस्या का उन्हें सामना करना पड़ा.

अपने अनुभव शेयर करते हुए वह कहती हैं कि “प्रकाशी तोमर के किरदार के लिए चेहरे पर लगाई गई प्रोस्थेटिक को हटाने के बाद उन की स्किन को नौर्मल होने में 1 घंटे का समय लगता था. इस के बाद भी लाइन्स, परतें दिखती थीं और ये स्किन पूरी तरह से नौर्मल होने तक दिखती थी.

“कई बार तो मैं डर जाती थी कि स्किन नौर्मल होगी या नहीं. इस के लिए मैं ने डाक्टर से भी संपर्क किया था. हालांकि, भविष्य में ऐसा एक दिन अवश्य आएगा, जब मैं वयस्क हो जाऊंगी और स्किन पर झुर्रियां आएंगी, लेकिन अभी के लिए स्किन का नौर्मल होना, मेरे लिए राहत की सांस लेने जैसा रहा.”

प्रोस्थेटिक मेकअप है उपयोगी
प्रोस्थेटिक मेकअप में चिन, कान, ब्रेस्‍ट आदि का अधिकतर मेकओवर किया जाता है. फि‍ल्‍म ठाकरे में नवाजुद्दीन सिद्दीकी को बाला साहब ठाकरे की तरह दिखाने के लिए इस प्रक्रिया का इस्‍तेमाल किया गया था. हर बार ऐसे मैकअप के लिए उन्हें कम से कम डेढ़ से दो घंटे लगते थे. इस के अलावा दबंग, गजनी, ब्‍लैक, ठाकरे, थलाइवी, मैं अटल हूं’ आदि ऐसी फि‍ल्‍में हैं जिन के लिए कलाकारों ने खूब मेहनत की है. फि‍ल्‍म थलाइवी मे कंगना रनौत के लुक को चेंज करने के लिए प्रोस्थेटिक का सहारा लिया गया था.

फिल्मों में प्रोस्थेटिक

प्रोस्थेटिक असल में खराब हुए या क्षतिग्रस्‍त अंगों की जगह कृत्रिम अंग लगाने की प्रक्रिया है. हालांकि यह एक लंबी, खर्चीली और धैर्य वाली प्रक्रिया है. पर इस का फायदा यह है कि इस के जरिए शरीर के किसी भी अंग को रिप्‍लेस किया जा सकता है. कान, नाक, चिन, गर्दन यहां तक कि स्‍तन, आदि को भी प्रोस्थेटिक के माध्‍यम से मनचाहा आकार दिया जा सकता है.

प्रोस्थेटिक मेकअप का प्रयोग इन दिनों धीरेधीरे बढ़ रहा है. इस से पहले अमिताभ बच्‍चन की फिल्‍म ‘पा’, ऋतिक की ‘धूम-2’, शाहरूख की ‘फैन’, ‘चाची 420’ और रणबीर कपूर अभिनीत ‘बर्फी’ आदि फिल्‍मों में उम्रदराज और अलगअलग लुक देने के लिए प्रोस्‍थेटिक मेकअप का सहारा लिया जा चुका है.

फिल्‍म ‘भारत’ में कटरीना कैफ काफी उम्रदराज दिखाई दी, जिस के लिए उन के फेस पर काफी मेहनत की गई थी. दरअसल, उन का लुक बदलने के लिए प्रोस्‍थेटिक मेकअप का सहारा लिया गया था. इस मेकअप की मदद अभिनेत्री दीपिका ने भी फिल्‍म ‘छपाक’ में भी लिया था, जिस में दीपिका ने एसिड अटैक सर्वाइवर लक्ष्‍मी की भूमिका निभाई है. इस लुक के लिए उन्होंने प्रोस्‍थेटिक मेकअप का प्रयोग किया था.

क्या है प्रोस्थेटिक मेकअप

प्रोस्थेटिक मेकअप एक ऐसी तकनीक है, जिस के सहारे कौस्मेटिक इफैक्ट दिया जाता है. इस में काफी मात्रा में सिलिकौन रबर का प्रयोग किया जाता है.

इस के अलावा कृत्रिम सामग्री फोम लेटैक्स, जिलेटिन, सिलिकौन आदि सामग्री का प्रयोग किया जाता है. मौडलिंग क्ले – एक तेल आधारित प्लास्टिसिन क्ले होता है, जिसे प्रोस्थेटिक के आकार में ढाला जा सकता है. इस से नैगेटिव मोल्ड बनाए जाते हैं, जिन्हें लेटैक्स, सिलिकौन या इस तरह से भर कर व्यक्ति का अंतिम प्रोस्थेटिक्स बनाया जाता है, जिस की मदद से मेकअप होता है.

इस मेकअप का इस्‍तेमाल किसी भी किरदार को छोटे और बड़े उम्र या फिर अलग दिखाने के लिए किया जाता है.

प्रोस्‍थेटिक मेकअप करने में करीब 6 से 10 घंटे का समय लगता है. हालांकि, इस मेकअप को निकालने में भी कम से कम 1 घंटे का समय लगता है. इस मेकअप को करने वाले आर्टिस्‍ट सामान्‍य मेकअप करने वालों से अलग होते हैं. इस तकनीक की वजह से रियल लुक दिया जाता है और किसी भी एक्टर को तब पहचानना भी मुश्किल हो जाता है.

प्रोस्थेटिक के लाभ

• प्रोस्थेटिक मेकअप में रियल लुक का विस्तृत रूप होता है, इसलिए साधारण मेकअप के साथ यह नहीं चल पाता.

• पारंपरिक मेकअप की तुलना में प्रोस्थेटिक्स अधिक टिकाऊ होते हैं, जो फिल्मांकन और लंबे शूटिंग दिनों मांग को पूरा कर सकते हैं.

• प्रोस्थेटिक का उपयोग मामूली चोटों से ले कर पूरे शरीर में परिवर्तन तक, विभिन्न प्रकार के प्रभाव पैदा करने के लिए भी किया जा सकता है.

• प्रोस्थेटिक का उपयोग कई बार किया जा सकता है, जिस से लंबे समय में पैसा और समय बचाया जा सकता है.

प्रोस्थेटिक के नुकसान

• प्रोस्थेटिक्स बनाना अधिकतर एक समय लेने वाली प्रक्रिया होती है, इसे बनाने और प्रयोग में लाने के लिए कौशल और विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है.

• प्रोस्थेटिक्स को बनाना और बनाए रखना महंगा होता है.

• प्रोस्थेटिक्स को लंबे समय तक पहनने में असुविधा होती है.

• प्रोस्थेटिक्स कलाकार की गति को प्रतिबंधित करता है, जिस से उन के लिए कुछ कार्य करना या भावनाओं को व्यक्त करना मुश्किल होता है.

• प्रोस्थेटिक्स को हटाना एक कठिन और समय लेने वाली प्रक्रिया होती है, जिस से त्वचा में जलन भी हो सकती है.

कर्नाटक में जातियां तय करती हैं पार्टियों का भविष्य

2024 के आम चुनाव में जिन राज्यों में दिलचस्प और कांटे का मुकाबला हो रहा है कर्नाटक उन में से एक है. 28 लोकसभा सीटों वाले इस राज्य में जातियों का रोल अहम रहता है जिन में से अधिकतर किसी एक पार्टी से बंधी नहीं रहतीं. पिछले साल मई में हुए विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनाव नतीजे हैरान कर देने बाले रहे थे. जिन्होंने अच्छेअच्छे सियासी पंडितों के गुणा भाग उलट दिए थे. इस बार भी नतीजे इसी पैटर्न पर आएं तो बात कतई हैरानी की नहीं होगी.

मई 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने एक तरह से क्लीन स्वीप ही कर दिया था. उस ने 224 में से 135 सीटें जीतते हुए 42.88 फीसदी वोट हासिल किए थे. जबकि भाजपा 36 फीसदी वोटों के साथ 66 सीटें ही ले जा पाई थी. जनता दल एस को महज 19 सीट 8.48 फीसदी वोटों के साथ मिली थीं.

पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले भाजपा को 38 और जनता दल एस को 18 सीटों का नुकसान हुआ था जो सीधेसीधे कांग्रेस के खाते में दर्ज हो गईं थीं. यह चुनाव भाजपा ने पूरी तरह नरेंद्र मोदी के नाम और चेहरे पर लड़ा था और अपने क्षेत्रीय दिग्गज येदियुरप्पा को दरकिनार कर दिया था.

यह प्रयोग या भूल कुछ भी कह लें की कीमत उसे सत्ता गंवा कर चुकानी पड़ी थी. हालांकि आखिरी दिनों में उस ने गलती सुधारने की कोशिश की भी थी लेकिन तब तक तीर कमान से निकल चुका था और यह साबित हो गया था कि नरेंद्र मोदी के नाम पर वह हिंदी भाषी राज्यों में ही मनमाने ढंग से चुनावी प्रयोग कर सकती है. जहां उन्हें चुनौती देने वाला कोई क्षत्रप नहीं और जो क्षत्रप होने लगते हैं उन्हें जनादेश की आड़ ले कर हाशिये पर ढकेल दिया जाता है जैसे कि शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे सिंधिया और डाक्टर रमन सिंह वगैरह, जिस से कोई पीएम बनने की दावेदारी न करे.

अब येदियुरप्पा को फिर भाव दिया जा रहा है जिस से परंपरागत लिंगायत वोटों को फिर से साधा जा सके जो पहले सा आसान काम नहीं रह गया है. पिछले लोकसभा चुनाव में कर्नाटक में मोदी लहर नहीं थी बल्कि कांग्रेस की गलतियों का फायदा उसे मिला था, जो वह 28 में से रिकौर्ड 25 सीटें 51.75 फीसदी वोटों के साथ ले गई थी.

इस चुनाव में पहली बार कांग्रेस एतिहासिक दुर्गति का शिकार हुई थी. उसे महज एक सीट 32.11 फीसदी वोटों के साथ मिली थी.
इस चुनाव में उस का गठबंधन जनता दल एस के साथ था उसे भी एक ही सीट 9.74 फीसदी वोटों के साथ मिली थी. 2014 का लोकसभा चुनाव भाजपा ने येदियुरप्पा को आगे कर ही लड़ा था तब उसे 17 सीटें 43 फीसदी वोटों के साथ मिली थीं. कांग्रेस ने 40.80 फीसदी वोटों के साथ 9 सीटें और जनता दल एस ने 2 सीटें 11 फीसदी वोटों के साथ जीती थीं.

2009 के चुनाव के मुकाबले भाजपा को 2 और जनता दल एस को एक सीट का नुकसान हुआ था. इन दोनों का वोट शेयर भी क्रमश 1.37 और 2.57 घटा था जबकि कांग्रेस का 3.15 फीसदी बढ़ा था. 2018 का विधानसभा चुनाव परिणाम त्रिशंकु था जिस में भाजपा ने जबरजस्त प्रदर्शन करते हुए 104 सीटें 36.2 फीसदी वोटों के साथ हासिल की थीं. कांग्रेस को उस से वोट लगभग 2 फीसदी तो ज्यादा मिले थे लेकिन वह 78 सीटों पर सिमट कर रह गई थी. जनता दल एस ने 18.3 फीसदी वोटों के साथ 37 सीटें जीती थीं. तब उस ने कांग्रेस के सहयोग से सरकार बनाई थी और उस के मुखिया एचडी कुमार स्वामी मुख्यमंत्री बने थे.

फिर शुरू हुआ खरीद फरोख्त और आयाराम गयाराम का खेल जिस में भाजपा जीत गई और येदियुरप्पा सीएम बन गए. लेकिन बहुमत वह भी साबित नहीं कर पाए. कुमारस्वामी फिर से मुख्यमंत्री बने लेकिन 14 महीनों के अंदर ही भाजपा ने तोड़फोड़ कर डाली और येदियुरप्पा मुख्यमंत्री बन गए.

2 साल बाद ही भाजपा ने सभी को चौंकाते येदियुरप्पा को हटा कर बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री बना दिया था जिन्हें जनता ने 2023 के चुनाव में नकार दिया.

जातियों से निकलती है जीत

सिद्धारमैया के मुख्यमंत्री बनने के बाद लोकसभा चुनाव को ले कर कांग्रेस थोड़े सुकून में है क्योंकि वे जमीनी और काबिल नेता हैं. येदियुरुप्पा केवल लिंगायत समुदाय में लोकप्रिय हैं लेकिन सिद्धारमैया दलित, आदिवासी, मुसलिम और इसाई सहित पिछड़ों में भी लोकप्रिय हैं. कर्नाटक की राजनीति बिना अहिंद शब्द के पूरी नहीं होती. जिस का मतलब होता है अल्पसंख्यातारु, हिंदुलिदावरु ( कर्नाटक में पिछड़ों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द ) और दलितातारु, इन तीनों शब्दों के पहले अक्षरों से अहिंद मौडल बना है जो अपने दौर के दिग्गज कांग्रेसी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री देवराज अर्स की देन है.अर्स ने कर्नाटक की राजनीति से लिंगायतों और वोकलिंगाओं का दबदबा खत्म करने में अहम रोल निभाया था. उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव का पीडीए अहिंद की ही कौपी या नौर्थ एडिशन कुछ भी कह लें है.

सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री बनाने के पीछे कांग्रेस की रणनीति अहिंद को ही साधने की है जिस से लोकसभा की ज्यादा से ज्यादा सीटें जीती जा सकें. गौरतलब है कि मुख्यमंत्री रहते सिद्धारमैया ने साल 2014 – 15 में जातिगत जनगणना करवाई थी जिस पर कोई 150 करोड़ रु खर्च हुए थे. इस की रिपोर्ट आधिकारिक तौर पर सार्वजनिक नहीं हो पाई थी लेकिन इस की प्रतियां गलीगली में बोर्ड इम्तिहान के पर्चों की तरह बिकी थीं.

इस रिपोर्ट से न केवल लिंगायत बल्कि वोक्लिंगा समुदाय के लोग भी खासे खफा हुए थे क्योंकि इस में उन की आबादी बेहद कम बताई गई थी यानी दबदबे वाली जातियों की सांख्यकीय हकीकत उजागर हो गई थी. जिस का खामियाजा कांग्रेस को 2018 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनाव में भुगतना भी पड़ा था. लेकिन 2023 के विधानसभा चुनाव में बाजी इसी रिपोर्ट के आंकड़ों के अहिंद तक पहुंच जाने से पलटी भी थी.

वोटिंग का यही ट्रेंड कायम रहा तो भाजपा का 400 प्लस का सपना कर्नाटक से टूट भी सकता है.
इस चर्चित रिपोर्ट के मुताबिक कर्नाटक में दलितों की आबादी सब से ज्यादा 19.5 फीसदी है और मुसलिमों की 16 फीसदी है. ओबीसी भी 16 फीसदी हैं. जबकि लिंगायतों की आबादी 14 और वोक्लिंगाओं की महज 11 फीसदी है.

आदिवासी 5 फीसदी तो इसाई 3 और जैन बौद्ध 2 फीसदी हैं.अन्य धर्मों की आबादी 4 फीसदी है जिन में ब्राहण केवल 2 फीसदी ही हैं. ओबीसी में भी सब से बड़ा हिस्सा कुरुबा समुदाय का 7 फीसदी है जिस से सिद्धारमैया आते हैं.

मल्लिकार्जुन खड़गे को अध्यक्ष बनाने का फायदा कांग्रेस को अगर लोकसभा चुनाव में भी मिला तो भाजपा को दहाई का आंकड़ा छूने में भी पसीने आ जाने हैं. क्योंकि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को दलितों के कोई 63 फीसदी वोट मिले थे और मुसलमानों के लगभग 75 फीसदी, जो बाजी पलट देने काफी हैं. आदिवासियों और ईसाईयों का झुकाव भी कांग्रेस की तरफ है जबकि लिंगायतों और वोक्लिंगाओ के वोट आधे आधे बंटने लगे हैं. इसी समीकरण को साधे रखने सिद्धारमैया ने लिंगायत समुदाय के 8 और वोक्लिंगा समुदाय के 6 मंत्री बनाए हैं.

उधर भाजपा की मुश्किलें अब येदियुरप्पा के चलते ही बढ़ने लगी हैं. विधानसभा चुनाव की हार के बाद मोदीशाह ने उन के सामने पूरी तरह हथियार डाल दिए हैं. अपनी चहेती शोभा कलंद्लाजे को टिकट दिलवाने वे अड़ गए तो बेंगलुरु उत्तर से दिग्गज सदानंद गौड़ा का टिकट कट गया.

शोभा पिछले 2 बार से उद्दुपी चिकमंगलूर से सांसद हैं लेकिन उन का विरोध वहां कार्यकर्ता ही कर रहे थे. शोभा की बयानबाजी भी भाजपा को महंगी पड़ सकती है जो उन्होंने रामेश्वरम केफे बम विस्फोट को ले कर तमिलनाडु और केरल के लोगों पर की थी. इन दोनों समुदायों के शहरी इलाको में खासे वोट हैं.

टिकट बंटबारे को ले कर भाजपा घिरती जा रही है. हावेरी लोकसभा सीट से पूर्व उपमुख्यमंत्री इश्वरप्पा अपने बेटे केई कंटेश के लिए टिकट मांग रहे थे लेकिन पार्टी ने वहां से बसवराज बोम्मई को टिकट दे दिया. इस से खफा ईश्वरप्पा ने शिवमोगा से निर्दलीय लड़ने का एलान कर दिया है जहां से सिद्धारमैया के बेटे वीवाई विजयेन्द्र को पार्टी ने उम्मीदवार बनाया है. इश्वरप्पा का यह बयान काफी चर्चित हो रहा है कि मोदीजी कहते हैं कि कांग्रेस पार्टी एक परिवार के हाथ में है लेकिन कर्नाटक भाजपा में भी यही स्थिति है. उस पर एक ही परिवार का कब्जा है हमें उस का विरोध करना होगा. टिकट न मिलने से जो कई और भाजपाई दुखी और नाराज हैं उन में प्रमुख जेसी मधुस्वामी कराडी और संगन्ना के नाम भी शामिल हैं. वजूद खोते जनता दल एस से हाथ मिला कर भी भाजपा की साख पर बट्टा लगा है. हालांकि वह उसे 2 – 3 से ज्यादा सीटें देने तैयार नहीं. लेकिन लगता ऐसा है कि भाजपा आलाकमान हर किसी से गठबंधन कर रहा है इस से उस का डर और असुरक्षा ही उजागर हो रहे हैं.

अब होगा यह कि जनता दल के हिस्से के वोट कांग्रेस को बैठे बिठाए मिल जाएंगे जिस से भाजपा का ही नुकसान होगा. कोढ़ में खाज वाली कहावत येदियुरप्पा पर पूरी तरह लागू हो रही है, जिन पर एक नाबालिग लड़की ने यौन शोषण का आरोप लगाया है. उन के खिलाफ बेंगलुरु के सदाशिवनगर थाने में पास्को एक्ट व धारा 354 ( ए ) के तहत मामला दर्ज हुआ है. इस 17 वर्षीय पीड़िता के मुताबिक वह बीती 2 फरवरी को अपनी मां के साथ येदियुरप्पा के पास मदद मांगने गई थी वह मामला भी इत्तफाक से यौन उत्पीड़न का ही था. येदियुरप्पा ने लड़की का हाथ पकड़ कर कमरे में खींच लिया और …

जांच अब आला पुलिस अफसर कर रहे हैं जो जब पूरी होगी तब होगी लेकिन 80 वर्षीय येदियुरप्पा के खिलाफ इस तरह का मामला दर्ज होना भाजपा के लिए चुनाव के लिहाज से शुभ तो कतई नहीं है अब. सब कुछ उस के हक में नहीं रह गया है सिवाय इस के कि 8 – 10 फीसदी ऊंची जाति वाले पूरी तरह उस के हक में हैं.

बेंगलुरु में रह रहे कोई 5 लाख उत्तर भारतीयों में से अधिकतर का समर्थन भी उसे मिलता रहा है पर इन के वोट एक लाख भी नहीं हैं. मुसलमान वोट अब उस के सहयोगी जनता दल एस को भी नहीं मिलने वाले क्योंकि कर्नाटक में भाजपा का हिंदू मुसलिम करना हर किसी को दहशत में डाले हुए है. अलावा इस के भाजपा की बड़ी दिक्कत हिंदुत्व, धर्म, अयोध्या, काशी, मथुरा और नरेंद्र मोदी का जादू न चलना है. जो इस चुनाव में मारे डर के न रामराम कर पा रहे न विधानसभा चुनाव की तरह बजरंगबली की जय बोल पा रहे.

प्यार का सूरज: भाग 3

मैं पलंग पर जा लेटी और सोचने लगी, सुधा ठीक कह रही थी कि अकेली स्त्री को यह समाज चैन से जीने नहीं देता. एक दिन मैं अपने डिपार्टमैंट में अकेली थी, तभी वहां मेरा सीनियर प्रोफैसर आया. मु?ो अकेली देख उस ने मेरा हाथ पकड़ने की कोशिश की. मेरे फटकारने पर वह बेहयाई से बोला था, ‘मैं ने सुना है, आप की अपने पति से कुछ अनबन है. मेरे साथ सहयोग करेंगी तो आप को बहुत जल्द रीडर बनवा दूंगा.’ मैं ने प्रिंसिपल से उस की शिकायत करने की धमकी दी थी तब कहीं वह माना था.

मैं ने अपनी आंखें बंद कर लीं. बंद पलकों की कोरों में अतीत के कई दृश्य उभरे. रवि की शराफत, उस की सज्जनता, मेरे मायके के प्रति उस का लगाव, विवाह के बाद के सुनहरे दिन, सभी कुछ मु?ो याद आ रहा था. मैं ने रवि से बात करने का निश्चय किया. दीपक के घर से मेरे लौटने पर रवि को बेहद तकलीफ हुई थी. निराशा के आलम में सारी रात आंखों में ही कट गई थी. उन की जरा सी भूल ने उन के वैवाहिक जीवन को एक मजाक बना डाला था. अपनी मां और बहनों के कहने में आ कर उन्होंने मु?ो स्वयं से दूर तो कर डाला किंतु शांति उन्हें फिर भी न मिली.

जयपुर जाते हुए जिस कातर दृष्टि से मैं ने उन्हें देखा था, मेरी वे निगाहें हर पल उन का पीछा करती थीं. रात्रि के सन्नाटे में जब सब लोग चैन की नींद सो रहे होते, वह बिस्तर पर करवटें बदलते. हर पल उन्हें यही प्रश्न बेचैन किए रहता, आखिर क्यों उन्होंने मु?ो स्वयं से दूर किया? क्या कुसूर था मेरा? यही न कि मैं ने उन के घर वालों के साथ सामंजस्य बिठाने की भरपूर कोशिश की थी और बदले में उन्होंने मु?ो क्या दिया? घर वालों की इच्छा पूरी कर के उन्होंने अपनी और मेरी, दोनों की जिंदगी बरबाद कर डाली, फिर भी घर वाले उन से खुश नहीं हुए.

मेरे जाने के कुछ दिनों बाद उन की बहनें मायके आ गई थीं. औफिस से लौट कर वे देखते, मां बेटियों की खातिरदारी में लगी रहतीं. उन्हें तरहतरह के व्यंजन बना कर खिलातीं. उस समय उन्हें खयाल आता, मेरे बीमार होने पर भी वे रसोई में नहीं जाती थीं. यह सब देख उन का मन ग्लानि से भर उठता. एक रविवार बड़ी बहन आगरा आई हुई थी. रवि के सिर में तेज दर्द था. फ्रिज से पानी पीने के लिए ज्यों ही वे बरामदे में गए, उन्होंने दीदी को कहते सुना, ‘मां, तुम रवि से बंटी की बात कर लो. रवि के पास पैसे की कमी तो है नहीं. यदि वह बंटी की जिम्मेदारी उठा ले तो बहुत अच्छा रहेगा. यों भी उस की अपनी तो कोई औलाद है नहीं. बंटी यहां रहेगा तो रवि का दिल भी लगा रहेगा.’

यह सुन रवि तड़प उठे. तुरंत उन दोनों के सामने जा खड़े हुए और बोले, ‘दीदी, आज अगर मेरी औलाद नहीं है तो आप लोगों के ही कारण ऐसी नौबत आई है.’ यह सुन कर मां आगबबूला हो गई थीं, ‘क्या बोल रहा है? होश में तो है न?’

‘मां, मैं पूरी तरह होश में हूं, बल्कि यों कहो, होश में आया ही अब हूं. सब लोग अपना स्वार्थ पूरा करने में लगे हैं. यह नहीं सोच रहे कि मेरी जिंदगी का क्या होगा? आप सब की बातों में आ कर बेवजह मैं ने स्वाति को यहां से भेज दिया,’ कहते हुए रवि तेजी से कमरे से बाहर चले गए थे. उन के मुंह से सच्चाई सुन कर मां और दीदी उन से कटेकटे रहने लगे थे.

कुछ दिनों बाद वे जयपुर गए थे. उन के आने की खबर पा कर मैं पहले ही सुधा के साथ उदयपुर चली गई थी. उन्होंने दीपक को भी मेरे पास भेजा किंतु मैं ने उस से भी कोई बात नहीं की. संयोगवश इन दिनों मैं अपनी छात्रओं के साथ आगरा आई हुई थी. पिछली रात मैं दीपक के घर आई भी किंतु रवि को देख वापस लौट गई. रवि ने निश्चय किया, वे स्वयं मेरे पास आ कर मु?ा से क्षमा मांगेंगे और मु?ो वापस अपनी जिंदगी में ले आएंगे.

शाम को रवि और दीपक मेरे पास आए. उस समय मैं अपनी पैकिंग में व्यस्त थी. रवि को मेरे पास छोड़ दीपक और सुधा कमरे से बाहर चले गए. ‘‘बैठिए,’’ मैं ने कुरसी की ओर संकेत किया. इतने दिनों बाद रवि को अपने करीब पा कर मेरे दिल की धड़कनें बढ़ गई थीं. हाथों में हलका सा कंपन महसूस हो रहा था. मैं नजरें ?ाका कर उन के सामने बैठ गई.

‘‘मैं तुम्हें घर ले जाने आया हूं, स्वाति.’’

‘‘मेरा कोई घर नहीं,’’ मेरी आंखें डबडबा आईं.’’

‘‘ऐसा मत कहो, स्वाति. मैं अपने व्यवहार के लिए बेहद शर्मिंदा हूं, मु?ो माफ कर दो और घर लौट चलो,’’ कहते हुए रवि फूटफूट कर रो पड़े.

रवि को इस तरह बिलखता देख मेरी आंखों से भी आंसू बह निकले. मन किया, उन की सारी व्यथा अपने सीने में समेट लूं किंतु मैं ने अपनी भावनाओं पर काबू रखा और बोली, ‘‘जानते हो रवि, 2 अजनबी भी जब विवाह बंधन में बंधते हैं तो फेरे पड़ते ही लड़की को वह पुरुष नितांत अपना लगने लगता है. उसे लगता है, ससुराल में अजनबियों के बीच वही उस की सुखसुविधा का खयाल रखेगा. फिर मैं ने तो तुम से प्रेमविवाह किया था.

‘‘मेरा तुम पर कितना अटूट विश्वास था, किंतु तुम ने उस विश्वास को छलनी कर दिया. मु?ो तुम्हारे घर वालों से कोई शिकायत नहीं है क्योंकि वे तो इस विवाह के लिए राजी ही नहीं थे. वे तो मु?ो तभी स्नेह, इज्जत देते जब तुम मु?ो स्नेह, इज्जत देते.’’

‘‘शायद तुम्हें पता नहीं, स्वाति, मम्मी अब आगरा में नहीं हैं. पंकज उन्हें हैदराबाद ले गया है, इसलिए हम दोनों के बीच अब कोई नहीं आएगा.’’

‘‘रवि, मेरी मम्मी कहा करती हैं, बुजुर्ग लोग घर के आंगन में लगे उस वृक्ष के समान होते हैं जो भले ही फल न दे, अपनी छाया अवश्य देता है. मैं नहीं चाहती, तुम्हारी मम्मी हमारे साथ न रहें. मैं ने कभी यह न चाहा कि तुम अपने घर वालों का खयाल न रखो, किंतु रवि, हर रिश्ते की अपनी अहमियत होती है, अपनी जगह होती है.

‘‘जिस तरह विवाह के बाद पत्नी के लिए उस के जीवन में सब से पहले पति का स्थान होता है उसी तरह पति के लिए भी सब से पहले उस की पत्नी होनी चाहिए, बाद में दूसरे लोग,’’ कहते हुए स्वाति ने अपनी भावनाएं प्रकट कीं.

‘‘तुम्हारे विचार कितने अच्छे हैं स्वाति,’’ कहते हुए भावावेश में रवि ने मेरे दोनों हाथ पकड़ लिए, ‘‘मैं ने समय रहते तुम्हारी कद्र नहीं की. मु?ो क्षमा कर दो. बस, एक मौका और दो ताकि अवसाद के जिस अंधेरे में मैं ने तुम्हें धकेला है उस में खुशियों का उजाला भर सकूं. प्रायश्चित्त का एक मौका दो, स्वाति,’’ रवि की आवाज भर्रा गई. वे उठ कर मेरे करीब आए और अपनी बांहों का सहारा दे कर मु?ो अपने करीब खींच लिया.

रवि के सीने में मैं ने अपना चेहरा छिपा लिया. मु?ो लगा, प्यार का सूरज हालात के काले बादलों से ढक कर नजरों से ओ?ाल भले ही हो जाए पर एकदम खो नहीं सकता. काले बादलों के छंटते ही आकाश स्वच्छ हुआ नहीं कि प्यार का सूरज अपनी पूरी आब के साथ फिर चमकने लगता है.

आरोही : भाग -3 अविरल की बेरुखी की क्या वजह थी?

उन दोनों के बीच की दूरियां बढ़ती जा रही थीं. उसे देररात तक पढ़ने का शौक था और उस के प्रोफैशन के लिए भी पढ़ना जरूरी था. अविरल के लिए उस की अंकशायिनी बनने का मन ही नहीं होता था. इसलिए भी अविरल का फ्रस्ट्रैशन बढ़ता जा रहा था. समय बीतने के साथ वह मांजी और अविरल के स्वभाव व खानपान को अच्छी तरह से समझ चुकी थी. वह मांजी की दवा वगैरह का पूरा खयाल रखती और उस ने एक फुलटाइम मेड रख दी थी. सुबहशाम मांजी के पास थोड़ी देर बैठ कर उन का हालचाल पूछती. अब मांजी उस से बहुत खुश रहतीं. वह कोशिश करती कि अविरल की पसंद का खाना बनवाए. संभव होता तो वह डाइनिंग टेबल पर उसे खाना भी सर्व कर देती. लेकिन वह महसूस करती थी कि अविरल की अपेक्षाएं बढ़ती ही जा रही हैं. उस का पुरुषोचित अहं बढ़ता ही जा रहा था. वह उस पर अधिकार जमा कर उस पर शासन करने की कोशिश करने लगा था. बातबेबात क्रोधित हो कर चीखनाचिल्लाना शुरू कर दिया था. शादी उस के कैरियर में बाधा बनती जा रही है.

शुरू के दिनों में तो वह उस की बातों पर ध्यान देती और उस की पसंद को ध्यान में रख कर काम करने की कोशिश करती पर जब उस के हर काम में टोकाटाकी और ज्यादा दखलंदाजी होने लगी तो उस ने चुप रह प्रतिकार करना शुरू कर दिया था. अपने मन के कपड़े पहनती, अपने मन का खाती. मांबेटे दोनों को उस ने नौकरों के जिम्मे कर दिया था. यदि अविरल कोई शिकायत करते तो साफ शब्दों में कह देती, ‘मेरे पास इन कामों के लिए फुरसत नहीं है.’

वह मन ही मन सोचती कि पति बनते ही सारे पुरुष एकजैसे बन जाते हैं. स्त्री के प्रति उन का नजरिया नहीं बदलता है. वह स्त्री पर अपना अधिकार समझ कर उस पर एकछत्र शासन करना चाहता है. पत्नी के लिए लकीर खींचने का हक पति को क्यों दिया जाए? आखिर पत्नी के लिए सीमाएं तय करने वाले ये पति कौन होते हैं? दोनों समान रूप से शिक्षित और परिपक्व होते हैं, इसलिए पत्नी के लिए कोई भी फैसला लेने का अधिकार पति का कैसे हो सकता है?

इन्हीं खयालों में डूबी हुई वह अपनी दुनिया में आगे बढ़ती जा रही थी. उस की व्यस्तता बढ़ती जा रही थी. परी भी बड़ी होती जा रही थी. वह स्कूल जाने लगी थी. वह कोशिश कर के अपनी शाम खाली रखती. उस समय बेटी के साथ हंसतीखिलखिलाती, उसे प्यार से पढ़ाती. वह अपनी दुनिया में मस्त रहने लगी थी. चूंकि वह सर्जन थी, उस का डायग्नोसिस और सर्जरी में हाथ बहुत सधा हुआ था. वह औनलाइन भी मरीजों को सलाह देती. अब वह मुंबई की अच्छी डाक्टरों में गिनी जाने लगी थी.

उसे अकसर कौन्फ्रैंस में लैक्चर के लिए बुलाया जाता. उसे कई बार कौन्फ्रैंस के लिए विदेश भी जाना पड़ता और अन्य शहरों में भी अकसर जानाआना लगा रहता था. डा. निर्झर कालेज में उस से जूनियर था. वह सर्जरी में कई बार उस के साथ रहता था. मस्त स्वभाव का था. अकसर उन लोगों के साथ खाना खाने भी बैठ जाया करता था. वे देररात तक काम के सिलसिले में बैठे रहते और साथ ज्यादातर दौरों पर भी जाया करते. डाक्टर निर्झर उसी की तरह हंसोड़ और मस्त स्वभाव का था. वह उस के संग रहती तो लगता कि उस के सपनों को पंख लग गए हैं. निर्झर के साथ बात कर के उस का मूड फ्रैश हो जाता और उस के मन को खुशी व मानसिक संतुष्टि मिलती.

डा. निर्झर की बातों की कशिश के आकर्षण में वह बहती जा रही थी. वह भी उस के हंसमुख व सरल स्वभाव और सादगी के कारण आकर्षण महसूस कर रहा था. दोनों के बीच में दोस्ती के साथ आत्मिक रिश्ता पनप उठा था. दोनों काम की बात करतेकरते अपने जीवन के पन्ने भी एकदूसरे के साथ खोलने लगे थे. निर्झर से नजदीकियां बढ़ती हुई अंतरंग रिश्तों में बदल गई थीं. यही कारण था कि अविरल और उस के रिश्ते के बीच दूरियां बढ़ती जा रही थीं.

निर्झर का साथ पा कर उसे ऐसा महसूस होने लगा जैसे उस के जीवन से पतझड़ बीत गया हो और वसंत के आगमन से दोबारा खुशीरूपी कलियों ने प्रस्फुटित हो कर उस के जीवन को फिर गुलजार कर दिया हो. वह दिनभर निर्झर के खयालों में खोई रहती. वह उस से मिलने के मौके तलाशती हुई उस के केबिन में पहुंच जाती.

निर्झर उस से उम्र में छोटा था. अब वह फिर से पार्लर जा कर कभी हेयर सैट करवाती तो कभी कलर करवाती. उस की वार्डरोब में नई ड्रैसेज जगह बनाने लगी थीं. यहां तक कि उस की बेटी भी उस की ओर अजीब निगाहों से देखती कि मम्मी को क्या हो गया है. अविरल शांत भाव से उस के सारे क्रियाकलापों को देखता रहता पर मुंह से कुछ न कहता. वह अपनी दुनिया में ही खोई रहती. घर नौकरों के जिम्मे हो गया था. उस के पास बस एक ही बहाना रहता कि काम बहुत है. बेटी परी के लिए भी अब उस के पास फुरसत नहीं रहती थी. समय चक्र तो गतिमान रहता ही है.  लड़तेझगड़ते 10 साल बीत गए थे. वह अपनी दुनिया में खोई हुई थी. उस ने ध्यान ही नहीं दिया था कि अविरल कब से उस की पसंद का नाश्ता खाने लगा था. अपना पसंदीदा औमलेट खाना छोड़ दिया था.

सुबहसवेरे उठते ही उस का मनपसंद म्यूजिक बजा देता और कोशिश करता कि उसे किसी तरह से टैंशन न हो. कई बार उस के लिए खुद ही कौफी बना कर बैडरूम में ले आता क्योंकि वह हमेशा से रात में कौफी पीना पसंद करती थी. अविरल की आंखों में उस के लिए प्यार और प्रशंसा का भाव दिखाई पड़ता.

एक कौन्फ्रैंस के सिलसिले में उसे 4 दिनों के लिए चैन्नई जाना था. वह बहुत उत्साहित थी. वहां के लिए उस ने खूब शौपिंग भी की थी. वह बैग तैयार करने के बाद यों ही मेल चैक करने लगी. निर्झर की मेल थी. उस ने यूएस की जौब के लिए अप्लाई किया था. उस ने बताया कि वह अपने वीजा इंटरव्यू के लिए दिल्ली जा रहा है. आरोही को बाद में पता लगा कि निर्झर यहां पहले ही रिजाइन कर चुका था.

‘उफ, कितना छिपा रुस्तम निकला, जब तक चाहा उस को यूज करता रहा और टाइमपास करता रहा और चुपचाप नौदोग्यारह हो गया. वह निराशा में डूब गई थी. उदास मन से बैड पर लेट गई थी. उस ने मन ही मन निश्चय कर लिया था कि वह बीमारी का बहाना कर के उन लोगों से अपने न आ पाने के लिए माफी मांग लेगी लेकिन पसोपेश भी था कि वह भी नहीं जाएगी और निर्झर तो पहले ही नहीं गया होगा, इस से वहां परेशानी हो जाएगी. वह बुझेमन से गुमसुम, मायूस हो कर बैड पर लेट गई थी. उसे झपकी लग गई थी. जब आंख खुली तो कमरे में घुप्प अंधेरा छाया हुआ था.

अविरल औफिस से आया तो उसे लेटा देख परेशान हो उठा, ‘‘डार्लिंग, ऐवरीथिंग इज ओके न?’’ यह आवाज सुन वह विचारों के विचरण से लौट आई और जवाब भी नहीं दे पाई थी कि उस ने देखा कि अविरल उस के सामने कौफी का प्याला ले कर खड़ा था.

वह तेजी से उठी और बोली, ‘‘अरे, तुम मेरे लिए कौफी.’’

‘‘तो क्या हुआ डार्लिंग, इट्स ओके.’’

वह अपने मन को कौन्फ्रैंस के लिए तैयार कर ही रही थी कि तभी कमरे में परी आ गई थी. बैग देख कर बोली, ‘‘मौम, कहीं जा रही हो क्या?’’

वह गुमसुम सी थी, कुछ समझ नहीं पा रही थी कि क्या कहे.

‘‘पापा बता रहे थे कि आप चेन्नई, एक कौन्फ्रैंस में जा रही हैं.’’

वह चौंक पड़ी थी, अविरल से तो उस की कोई बात नहीं हुई. उन्हें उस के प्रोग्राम के बारे में कैसे पता है?

‘‘मौम, मेरी छुट्टियां हैं. पापा भी फ्री हैं. चलिए न, फैमिली ट्रिप पर चलते हैं. आप को पूरे समय कौन्फ्रैंस में थोड़े ही रहना होता है. मौम प्लीज, हां कर दीजिए, हम लोग कब से साथ में किसी फैमिली ट्रिप पर नहीं गए हैं,’’ वह उस से लिपट गई थी. अविरल भी आशाभरी निगाहों से उस की ओर देख कर उस की हां का इंतजार कर रहा था. परी झटपट उस के बैग के सामान को उलटपुलट कर देखने लगी, वह मना करती, उस के पहले ही उस ने मां की सैक्सी सी पिंक नाइटी निकाल ली थी. वह शर्म से डूब गई थी कि अब क्या कहे.

‘‘पापा, मौम ने तो पहले से आप के साथ ही जाने का प्रोग्राम बना रखा है.’’

उस की अपनी बेटी ने आज उसे इस अजीब सी स्थिति से उबार लिया था.

कहीं दूर पर गाना बज रहा था, ‘मेरे दिल में आज क्या है, तू कहे तो मैं बता दूं…’

एक अरसे बाद उस ने आगे बढ़ कर अविरल और परी दोनों को अपनी आगोश में भर लिया था. दोनों की आंखों में खुशी के आंसू आ गए थे.

‘‘आरोही, हम लोग इस बार महाबलीपुरम भी चलेंगे,’’ अविरल खुश हो कर बोला और उसे अपनी आगोश में ले लिया था. आज अविरल के प्यारभरे चुंबन ने उस के दिल को तरंगित कर दिया था. परी तेजी से उन से अलग हो कर भागती हुई अपनी फ्रैंड्स को अपनी चेन्नई ट्रिप के बारे में बताने में मशगूल हो गई थी.

 

मेरी 10 वर्षीय बेटी के ऊपरी होंठ पर बहुत बाल हैं, कृपया उन्हें हटाने के उपाय बताएं?

सवाल

मेरी 10 वर्षीय बेटी के ऊपरी होंठ पर बहुत बाल हैं. कृपया उन्हें हटाने के उपाय बताएं?

जवाब

हलदी का गाढ़ा पेस्ट बनाएं और उसे ऊपरी होंठ पर लगा कर आधे घंटे के लिए छोड़ दें. जब पेस्ट सूख जाए तो धो लें. ऐसा लगातार 4-5 हफ्तों तक करें. धीरेधीरे बालों की ग्रोथ में कभी आएगी. इस के अतिरिक्त आप नीबू व चीनी को मिला कर ऊपरी होंठ पर लगाएं और 15-20 मिनट लगा रहने दें. सूखने पर धो लें. इसी तरह आटा, दूध व हलदी का पेस्ट बना कर भी ऊपरी होंठ पर लगा सकती हैं. ये सभी उपाय ऊपरी होंठ के बालों की ग्रोथ को कम करने में सहायक होंगे.

 

 

रिश्तों का कटु सत्य : अपने जब छलकपट से दुख देते हैं तो क्या होता है

उस दिन दोनों ने अपनेअपने काम से छुट्टी ली थी. कई दिनों से दोनों ने एक फैसला लिया था कि वे अपने पुश्तैनी मकान में रहेंगे, क्योंकि आंटी का रिटायरमैंट करीब था और अंकल भी अपनी सेहत के चलते कचहरी के अपने काम को ज्यादा नहीं ले रहे थे. शुगर होने के चलते थक जाते थे. अंकल और आंटी को हालांकि आंटी के अनुज के बच्चों का पूरा प्यार और अपनत्व मिल जाता था, लेकिन वास्तविकता में दोनों ही एकदूसरे का सच्चा सहारा थे.

पारिवारिक मूल्यों को बखूबी समझने वाले अंकल ने अब तक जो कमाया, सारा का सारा अपनी मां और अपने भाईभतीजों को ही दिया था. आंटी की एक निजी विद्यालय में नौकरी थी, उसी से उन का घरखर्च चल रहा था. इसी सब के चलते दोनों ने किराए के मकान को छोड़ कर अपने पुश्तैनी मकान के फर्स्टफ्लोर के अपने कमरे में जा कर रहने का फैसला लिया था.

लगभग 30 वर्षों पहले दोनों किराए के मकान में आ गए थे. आंटी जब से ससुराल में ब्याह कर आई थीं, वहां उन्होंने कलहक्लेश, झगड़े जैसा माहौल ही देखा था. घर के किसी भी सदस्य का व्यवहार अच्छा नहीं था. ताने, उलाहने, मारपीट, भद्दी भाषा और चरित्रहीनता जैसे उन के आचरण से तंग आ कर ही अंकल और आंटी ने एक दिन अपना जरूरी सामान बांधा और एक रिकशा में सवार हो कर घर से निकल पड़े.

मानसिक अशांति से थोड़ी राहत तो पाई, लेकिन बहुत सी कठिनाइयों से उन्हें दोचार होना पड़ा, क्योंकि उन के पास पलंगबरतन कुछ भी नहीं था. हर चीज पर घरवालों ने अधिकार जमा रखा था. वह घर नहीं, मुसीबतों का एक अड्डा नजर आता था. पानी की एक बूंद को तरसते थे.

आंटी एक संपन्न परिवार से ऐसी ससुराल में आई थीं जहां तमीज और तहजीब नाम की चीज कोई नहीं जानता था. अंकल की मां को चुगलखोर औरत के रूप में सारा महल्ला जानता था. अंकल ने जब अपनी आंखों से देखा, कानों से सुना कि किस तरह घर के लोग आंटी के नाक में दम करते हैं जब वे घर पर नहीं होते हैं, तब उन्हें यकीन हुआ कि वास्तव में घरवाले बदतमीजी की सारी हदें लांघ चुके हैं.

किराए के मकान में आ जाने के बाद भी अंकलआंटी अपने पुश्तैनी मकान में बराबर आतेजाते थे, हर मौके पर मौजूद रहते. वहां अपनत्व या इज्जत नाम की कोई बात ही नहीं थी, तब भी अंकल पारिवारिक मूल्यों के पक्षधर और बेहद सरल स्वभाव के धनी होने के नाते अपनी जिम्मेदारियों की अनदेखी कभी नहीं करते थे.

अधिकार शब्द को तो अंकल ने जैसा भुला ही दिया था. अधिवक्ता थे तो रोजाना कचहरी आनाजाना रहता था, जाते और आते रोज अपनी मां के पास रुकते थे, हर तरह की मदद करने को तैयार रहते. खुद कितनी भी तंगी में हों, मां को हमेशा बिना मांगे ही रुपएपैसे देते थे बिजली के बिल, राशन सबकुछ के लिए. ये उन की सादगी कहें, मां की चतुराई या कहें अंकल की दूरदर्शिता.

आंटी की जहां तक बात है, ससुराल वालों के साथ रहते समय बहुत सारे कटु और कसक देने वाले अनुभव उन्हें वहां मिले थे. विवाह के कुछ समय बाद ही, अभी आंटी नईनवेली ही थीं कि, उन के सासससुर ने एक दिन उन के कमरे में आ कर उन से उन के सभी जेवर उतरवा लिए थे, जो अलमारी में थे, वे भी सारे ले लिए इस वादे के साथ कि जल्द ही लौटा देंगे. अब चूंकि आंटी का सारा स्त्रीधन वे लोग ले ही चुके थे, तो अब उन को उन से वास्ता भी क्या रखना था. अब वो देनदार थे, सो, जितना हो सकता था उतना परेशान करते थे.

इसी बीच, आंटी के पीहर पक्ष से बड़ी रकम लाखों में उधार मांग ली लौटा देने की शर्त पर आंटी ने अपने पीहर पक्ष को कभी भी अपनी आपबीती नहीं बताई थी. एक तो आंटी को संस्कार ही ऐसे मिले थे कि वे स्वभाव से ही गंभीर थीं और दे ही देंगे तो उन्हें क्यों कहना जैसा भाव भी मन में था.

अंकल को भी आंटी ने बहुत दिनों बाद बताया कि सारे जेवर आप के मातापिता ने ले लिए. अंकल ने जरा भी आशंका नहीं जताई. सोचा, कोई बात नहीं, दे देंगे वापस. उधर आंटी के मातापिता ने ताउम्र अपना धन वापस नहीं मांगा. मांग ही नहीं सके, अपने दामाद के लिए उन के मन में सम्मान और प्यार था इस कारण. आंटी का पीहर बहुत दूर था, आंटीअंकल खुद ही वर्ष में एकदो बार मिल आते थे.

बहुत आहत मन से अंकलआंटी उस घर से निकले थे, लेकिन अब समय का लंबा फर्क और मजबूरी उन्हें फिर वहां ले जा रही थी. किराया नहीं दे सकेंगे, सो, अपने कमरे में जाने का विचार किया.

आंटी ने अंकल से कहा, ‘‘आप कल उधर जाओगे तो अपना कमरा खोल आना, मैं साफ करने के लिए जाऊंगी, फिर जरूरी सामान रख आएंगे.’’

अंकल ने कहा, ‘‘ठीक है.’’

अगले दिन अंकल ने अपनी मां से कहा, ‘‘मां, हम ने अपने कमरे में लौटने का विचार किया है क्योंकि आप की बहू रिटायरमैंट के करीब है, मकान का किराया देना मुश्किल होगा. सेहत की वजह से मैं भी वकालत का काम कम ही लेता हूं.’’

अंकल की बात सुनते ही मां को तो जैसे सांप सूंघ गया हो. बिना जवाब दिए घर से बाहर निकल गईं.

अंकल अपने घर आ गए. आंटी ने कहा, ‘‘कमरा खोल आए क्या?’’

अंकल ने कहा, ‘‘नहीं, कल चलेंगे, तब कमरा झाड़ देना तुम.’’

अगले दिन अंकल, मां के पास रोजाना की तरह जा बैठे और कहा, ‘‘मां, आप की बहू को अभी साथ ला रहा हूं, कमरा साफ कर जाएंगे. और कल रविवार है, कल से यहीं आ जाएंगे हम आप के पास.’’

अंकल की बात सुनते ही आसपास के कमरों से सारा कुनबा ही जैसे कूद पड़ा. बरामदे में पहले से सभी जमा थे. अंकल रोजाना इसी समय आया करते थे. बेटी और दामाद को भी बुला रखा था. छोटेबड़े सभी इकट्ठा थे. कोई कुछ बोले, इस से पहले अंकल ने फिर कहा, ‘‘मां, क्या बात है, बोल नहीं रहा कोई?’’

इतने में बिजली सी कड़कती कर्कश आवाज में बोलते हुए अंकल की मां अंकल पर टूट पड़ीं. अंकल को धकियाती हुई बाहर के दरवाजे तक ले गई. बहन, जीजा ने धक्के मारे. भाइयों ने जलीकटी कहीं. भाभियां मुसकरा रही थीं.

अंकल अचानक हुए इस हमले को सह न सके, कुछ समझ न सके और लड़खड़ा कर नीचे गिर पड़े. मां व बहन ने गिरने पर भी धक्के दिए. अंकल का बाजू हिल गया, पैंट घुटने से फट गई. इस अजीब व्यवहार व अपमान ने अंकल का दिमाग घुमा दिया. पगड़ी उतर कर दूर जा गिरी. अंकल अकेले उठ पाने की हालत में नहीं थे. किसी तरह सीढ़ी पकड़ कर उठे और अपने घर पहुंचे. बदहवास, परेशान, लज्जित और चुप, वे तत्काल बोलने की स्थिति में नहीं थे. आंटी ने उन्हें देखा तो सहम गईं और प्रश्नों की झड़ी लगा दी.  किसी भी प्रश्न का कोईर् जवाब अंकल नहीं दे रहे थे.

आंटी ने खाना परोसा. अंकल ने नहीं खाया. आराम करने को कह कर करवट ले ली. आंटी को काटो तो खून नहीं. अंकल ही सेहत को ले कर वैसे भी हर वक्त चिंता में रहती थीं और आज क्या हुआ, क्यों नहीं बताते. ऐसे में स्वभाविक ही था चिंता का बढ़ना. आंटी ने देखा कुहनी तथा घुटने छिले थे, पैंट फटी थी, अब तो यही अनुमान लगाया कि स्कूटर तेज चलाया होगा. पर मन नहीं माना. अंकल कभी तेज चलाते ही न थे स्कूटर. चोट आखिर कैसे लगी होगी. कहीं खड्डों वाली सड़क पर स्कूटर फंस गया होगा.

कहते हैं कि जब स्नेह, प्रीति, लगाव का दायरा छोटा हो तो वह एक पर ही केंद्रित हो जाता है, आंटी की कुछ ऐसी ही स्थिति थी. अंकल ही उन के पास थे, जीवनसाथी से लगाव होना स्वभाविक भी है. फिर दोनों का साथ. तीसरा तो कोई जबतब ही पास आता, अधिकतर तो दोनों अकेले ही होते थे. अंकल से आंटी ने सब जानना चाहा. पर अंकल शायद सोए तो थे ही नहीं, सुबक रहे थे, रो रहे थे. तकिया आंसुओं से भीग गया था.

बहुत मनुहारें करने के बाद अंकल ने बताया, ‘‘मैं गया था उस घर में, किंतु अब हम कभी वहां नहीं जाएंगे. कभी भी नहीं.’’

‘‘आखिर क्यों?’’ आंटी ने तुरंत जानना चाहा था. अब आशंकाओं ने आंटी के मन को घेरना शुरू कर दिया था,  आशंकाओं को आधार भी मिलने लगा था भीतर ही भीतर. जिस घर में उचित सम्मान कभी नहीं मिला, बड़े होने के नाते भी नहीं, वहां तो कुछ भी गड़बड़ हो सकती है. ऐसा आंटी के मन में विचार उठ रहा था.

अब अंकल ने सारी बात बताई, लेकिन रोते हुए, सुबकते हुए. अंकल के चेहरे पर मन की पीड़ा को साफ पढ़ा जा सकता था. आंखों से मानो दिल का दर्द टपकटपक पड़ रहा था. सारी आपबीती बताई. आंटी अंकल को दुखी देख कर तड़प उठीं, किंतु खुद को रोका. यह वक्त अंकल को सहारा देने का है, सताने या सुनाने का नहीं. अब जबकि अंकल खुद भुगत कर आए हैं, तो क्या बचा है कहनेसुनने को.

अब तो उन्हें मां की भक्ति से मिले रिजल्ट का साक्षात अनुभव हुआ है. जिन भाइयों ने कभी भैया कह कर बुलाया भी नहीं, उन्हें अंकल ने कहांकहां सहारा नहीं दिया? एक को तो सरकारी नौकरी भी अपनी जानपहचान के बूते परीक्षा के प्रश्नपत्र पूर्व में ही बता कर दिलवाई जैसेतैसे. शेष की आर्थिक मदद, कानूनी मदद करते रहे. आज उन्होंने ठोकरें मार कर बाहर कर दिया था.

आंटी ने अंकल को सहारा दिया, ‘‘हमें जाना ही नहीं वहां, आप चिंता न करें. आप के साले, साली कितना पूछते हैं आप को, हमेशा मदद के लिए खड़े रहते हैं. सो, परेशान नहीं होना है. बस, इस बात को यहीं रोको.’’ आंटी अंकल की सेहत न बिगड़ जाए, इस बात से भीतर ही भीतर डर रही थीं. इस के बाद अंकल हमेशा गुमसुम रहने लगे थे. काम पर जाते, जल्दी घर आ जाते.

फिर एक दिन बहुत कठिन घड़ी आई. अंकल कचहरी में बेहोश हो कर गिर गए. आंटी के भाई को सूचना मिली तो फौरन उन्होंने संभाला, अस्पताल पहुंचाया. सभी जांचें हुईं. अंकल को बीते दिनों अपनों से मिली प्रताड़ना के कारण गहरा आघात पहुंचा था. विश्वासघात के शिकार हुए थे वे. सूचना तो उन के घरवालों को भी दी गई किंतु किसी ने हाल जानना जरूरी नहीं समझा, वे ही तो गुनाहगार थे, वे क्यों आते पूछने. पक्षपातिनी मां, वह बेरहम बहन किसी को दुख नहीं हुआ अपने ही घर के सदस्य के बीमार होने का.

आंटी नौकरी पर थीं, लौटीं तो बहुत दुखी हुईं. उन की व्यथा का कोई पारावार न था. आते ही अंकल से लिपट गईं. सब पूछ डाला भाई से, चिकित्सक से, रिपोर्ट पढ़ी.

अंकल अपने साथ घटित उस अपमानजनक व्यवहार को याद करें भी तो कैसे? कटु सत्य से सामना हुआ था उन का. एक बहुत बड़े राज से परदा उठा था. मन में चल रही उठापटक ने अंकल को असामान्य हालत में पहुंचा दिया था. अंकल रहरह कर यही बुदबुदाते, ‘मैं ने बिगाड़ा क्या है उन का?’

लगभग 8 माह तक ससुराल वालों की सेवा से अंकल थोड़ा स्वस्थ हुए.

एक दिन अंकल के पास उन का एक नजदीकी रिश्तेदार फुफेरा भाई आया और कहने लगा, ‘‘तुम्हारा पुश्तैनी मकान वे लोग बेच रहे हैं, ऐसी भनक मुझे लगी है.’’ अंकल के साथ हुए अमानवीय व्यवहार का उसे पता था. उस ने आगे कहा, ‘‘तुम्हें कानूनी मदद लेनी चाहिए.’’

अब क्योंकि अपने पुश्तैनी घर में वे जा नहीं सकते थे, सो, याचिका लगा कर न्याय दिलाने की व घर में अपना हक लेने की अपील की. पहली पेशी पर ही सारा राज जाहिर हो गया. अंकल की मां, भाई सब मिल कर कचहरी में आए. वकील के माध्यम से अंकल के हाथ की लिखी दस्तबरदारी के सरकारी कागजात पेश कर दिए वह भी 15 वर्ष पूर्व की गई समस्त कार्यवाही के. केस वहीं खत्म हो गया, जब खुद ही अपना हक छोड़ने को लिख दिया तो अब  कोई प्रावधान ऐसा न बचा था कि आगे सुनवाई हो.

अंकल अनजान थे इस कटु सत्य से. यदि जानते होते तो केस ही क्यों लगाते भला? खुद अधिवक्ता हो कर भी मां की चाल न समझ सके, क्योंकि कोई मां पर ही विश्वास नहीं करेगा तो किस पर करेगा? अब सारा मामला समझ आ गया कि क्यों घर से खदेड़ा? क्यों उन्हें वापस घर आने देना नहीं चाहते थे. उन्होंने सिर्फ मिल्कीयत की खातिर यह षड्यंत्र रचा था. मिल कर आपस में बांटना था, घर की कीमत, जमीनजायदाद सब बहुत पहले ही लिखवा ली थी, बेच भी दी थी, ये राज भी खुल गए. अंकल के पास कुछ नहीं था.

ऐसे आस्तान के सांप निकले अंकल के अपने. और मां की ऐसी घिनौनी हरकत को क्या कहा जाए? क्या इस बेटे को पैदा नहीं किया था? यह आसमान से गिरा था? या इस बेटे को उस की सरलता या ईमानदारी का यह इनाम दिया गया था? अपनों द्वारा दी गई ऐसी सजा जिसे दिल पर ले लिया अंकल ने. शहरभर के शुभचिंतक अंकल का हालचात पूछते रहते हैं. आंटी के पितृगृह के भाईबहन ने तनमनधन से अंकल की सहायतासेवा की. यदि इन लोगों का सहारा न होता तो पता नहीं क्या हाल होता दोनों का? एक वे अपने हैं जिन्होंने मार कर फेंका, एक ये पराए हैं जिन्होंने संभाला ही नहीं, सहारा भी बने हैं.

अनेक लोग अंकल के परिजनों को लानतें दे चुके हैं, सामाजिक बहिष्कार कर चुके हैं उन का. तब भी धन की लालसा में घिरे वे लोग एकजुट हैं. उन के लिए तो एक ही बात अर्थ रखती है, ‘बाप बड़ा न भैया, सब से बड़ा रुपैया.’ हंसतेमुसकराते दंपती की हंसी छीन कर आज वे पुश्तैनी मकान की करोड़ों की कीमत पाने को प्रयासरत हैं. भविष्य के वे लखपति अपने इस अनमोल हीरे के हृदय को चूरचूर कर के कितने आनंद में हैं, और इधर अपनों द्वारा विश्वासघात की मार सह कर न केवल घर में, बल्कि एक ही कक्ष में कैद हो कर रह गए है अंकलआंटी, यह कैसा समाज है, कैसा न्याय है.

अनाम रिश्ता : नेहा और अनिरुद्ध के रिश्ते का क्या था हाल

आज मेरे लिए बहुत ही खुशी का दिन है क्योंकि विश्वविद्यालय ने 15 वर्षों तक निस्वार्थ और लगनपूर्वक की गई मेरी सेवा के परिणामस्वरूप मुझे कालेज का प्रिंसिपल बनाने का निर्णय लिया था. आज शाम को ही पदग्रहण समारोह होने वाला है. परंतु न जाने क्यों रहरह कर मेरा मन बहुत ही उद्विग्न हो रहा है.

‘अभी तो सिर्फ 9 बजे हैं और ड्राइवर 2 बजे तक आएगा. तब तक मैं क्या करूं…’ मैं मन ही मन बुदबुदाई और रसोई की ओर चल दी. सोचा कौफी पी लूं, क्या पता तब मन को कुछ राहत मिले.

कौफी का मग हाथ में ले कर जैसे ही मैं सोफे पर बैठी, हमेशा की तरह मुझे कुछ पढ़ने की तलब हुई. मेज पर कई पत्रिकाएं रखी हुई थीं. लेकिन मेरा मन तो आज कुछ और ही पढ़ना चाह रहा था. मैं ने यंत्रवत उठ कर अपनी किताबों की अलमारी खोली और वह किताब निकाली जिसे मैं अनगिनत बार पढ़ चुकी हूं. जब भी मैं इस किताब को हाथ में लेती हूं, एक अलग ही एहसास होता है मुझे, मन को अपार सुख व शांति मिलती है.

‘आप मेरी जिंदगी में गुजरे हुए वक्त की तरह हैं सर, जो कभी लौट कर नहीं आ सकता. लेकिन मेरी हर सांस के साथ आप का एहसास डूबताउतरता रहता है,’ अनायास ही मेरे मुंह से अल्फाज निकल पड़े और मैं डूबने लगी 30 वर्ष पीछे अतीत की गहराइयों में जब मैं परिस्थितियों की मारी एक मजबूर लड़की थी, जो अपने साए तक से डरती थी कि कहीं मेरा यह साया किसी को बरबाद न कर दे.

जन्म लेते ही मां को खा जाने वाला इलजाम मेरे माथे पर लेबल की तरह चिपका दिया गया था. पिताजी ने भी कभी मुझे अपनी बेटी नहीं माना. उन्होंने तो कभी मुझ से परायों जैसा भी बरताव नहीं किया. मुझे इंसान नहीं, एक बोझ समझा. मैं अपने पिताजी के साथ अकेली ही इस घर में रहती थी, क्योंकि मुझे पालने वाले चाचाचाची इस दुनिया से चले गए थे. और मैं तो अभी 8वीं में पढ़ने वाली 13 साल की बच्ची थी. फिर भला मैं कहां जाती.

मैं घर में पिताजी के साथ एक अनचाहे मेहमान की तरह रहती थी, लेकिन घर के नौकरचाकर मुझ से बहुत प्यार करते थे. जन्म से ले कर आज तक कभी भी मैं ने मां और पापा शब्द नहीं पुकारा है. मुझे तो यह भी नहीं मालूम कि इन रिश्तों को नाम ले कर बुलाने से कैसा महसूस होता है. पिताजी की सख्त हिदायत थी कि जब तक वे घर में रहें, तब तक मैं उन के सामने न जाऊं. इसलिए जितनी देर पिताजी घर में रहते, मैं पीछे बालकनी में जा कर नौकरों से बातें करती थी.

बालकनी से ही मैं ने उन्हें पहली बार देखा था. सामने वाले मकान में किराएदार के रूप में आए थे वे. पहले मैं नहीं जानती थी कि वे कौन हैं, क्या करते हैं? लेकिन जब भी मैं बालकनी में खड़ी होती तो उन की दैनिक गतिविधियों को निहारने में मुझे अद्भुत आनंद आता था. उम्र में तो वे मेरे पिताजी के ही बराबर थे लेकिन उन का आकर्षक व्यक्तित्व किसी को भी आकर्षित कर सकता था.

मैं अकसर उन्हें पढ़ते हुए देखती थी. कभीकभार खाना बनाते या कपड़े धोते हुए देखा करती थी. कई बार उन की नजर भी मुझ पर पड़ जाती थी. मैं अकसर उन के बारे में सोचती थी, परंतु पास जा कर कुछ पूछने की हिम्मत नहीं होती थी.

एक दिन जब मैं स्कूल से लौटी तो उन्हें बैठक में पिताजी के साथ चाय पीते देख कर चकित रह गई. मैं कुछ देर वहां खड़ी रहना चाहती थी, लेकिन पिताजी का इशारा समझ कर तुरंत अंदर चली गई और छिप कर बातें सुनने लगी. उस दिन पहली बार मुझे पता चला कि उन का नाम अनिरुद्ध है. नहीं…नहीं, अनिरुद्ध सर क्योंकि वे वहां के महिला महाविद्यालय में हिंदी के लैक्चरर थे.

कालेज के ट्रस्टी होने के नाते पिताजी और अनिरुद्ध सर की दोस्ती बढ़ती गई. और साथ ही मैं भी उन के करीब होती गई. स्कूल से आते वक्त कभीकभी मैं उन के घर भी चली जाया करती थी. वे बेहद हंसमुख स्वभाव के थे. जब भी मैं उन से मिलती, उन के चेहरे पर खुशी और ताजगी दिखती थी.

वे मुझ से केवल मेरे स्कूल और मेरी सहेलियों के बारे में ही पूछा करते थे. मेरी पढ़ाई का उन्हें विशेष खयाल रहता था, जबकि उतनी फिक्र तो शायद मुझे भी नहीं थी. मैं तो केवल पढ़ाई नाम की घंटी गले में बांधे घूम रही थी.

मैं ने तो सर से मिलने के बाद ही जाना कि ये किताबें किस हद तक मंजिल तक पहुंचने में मददगार सिद्ध होती हैं. सर कहा करते थे कि ये किताबें इंसान की सच्ची दोस्त होती हैं जो कभी विश्वासघात नहीं करतीं और न ही कभी गलत दिशा दिखलाती हैं. ये हमेशा खुशियां बांटती हैं और दुखों में हौसलाअफजाई का काम करती हैं.

उसी दौरान मुझे यह भी पता चला कि वे एक अच्छे लेखक भी हैं. इन दिनों वे एक नई किताब लिख रहे थे जिस का शीर्षक था ‘निहारिका.’ जब मैं ने 9वीं कक्षा पास कर ली तब उन्होंने एक दिन मुझ से कहा कि उन की ‘निहारिका’ आज पूरी हो गई है, और वे चाहते हैं कि मैं उसे पढूं.

तब मैं साहित्य शब्द का अर्थ भी नहीं जानती थी. कोर्स की किताबों के अलावा अन्य किताबों से मेरा न तो कोई परिचय था और न ही रुचि. लेकिन ‘निहारिका’ को मैं पढ़ना चाहती थी क्योंकि उसे सर ने लिखा था और उन की इच्छा थी कि मैं उसे पढ़ूं. और सर की खुशी के लिए मैं कुछ भी कर सकती थी.

जब मैं ने ‘निहारिका’ पढ़नी शुरू की तो उस के शब्दों में मैं डूबती चली गई. उस के हर पन्ने पर मुझे अपना चेहरा झांकता नजर आ रहा था. ऐसा लगता था जैसे सर ने मुझे ही लक्ष्य कर, यह कहानी मेरे लिए लिखी है, क्योंकि अंत में सर के हाथों मेरे नाम से लिखी वह चिट इस बात की प्रमाण थी.

‘प्रिय नेहा,

‘मैं जानता हूं कि तुम्हारे अंदर किसी भी कार्य को करगुजरने की अनोखी क्षमता है, लेकिन जरूरत है उसे तलाश कर उस का सही इस्तेमाल करने की. मेरी कहानी की नायिका निहारिका ने भी यही किया है. तमाम कष्टों को झेलते हुए भी उस ने अपने डरावने अतीत को पीछे छोड़ कर उज्ज्वल भविष्य को अपनाया है, तभी वह अपनी मंजिल पाने में कामयाब हो सकी है. मैं चाहता हूं कि तुम भी निहारिका की तरह बनो ताकि इस किताब को पढ़ने वालों को यह विश्वास हो जाए कि ऐसा असल जिंदगी में भी हो सकता है.

‘तुम्हारा, अनिरुद्ध सर.’

इस चिट को पढ़ने के साथ ही इस के हरेक शब्द को मैं ने जेहन में उतार लिया और फिर शुरू हो गया नेहा से निहारिका बनने तक का कभी न रुकने वाला सफर. जिस में सर ने एक सच्चे गुरु की तरह कदमकदम पर मेरा मार्गदर्शन किया. 10वीं का पंजीकरण कराते समय ही मैं ने अपना नाम बदल कर नेहा भाटिया की जगह नेहा निहारिका कर लिया. स्कूल तथा कालेज की पढ़ाई समाप्त करने के बाद मैं ने पीएचडी भी कर ली. मेरी 10 वर्षों की मेहनत रंग लाई और मुझे अपने ही शहर के राजकीय उच्च विद्यालय में शिक्षिका के रूप में नियुक्ति मिल गई.

उस दिन जब मैं अपना नियुक्तिपत्र ले कर सर के पास गई तो उन की खुशी का ठिकाना न रहा. तब उन्होंने कहा था, ‘नेहा, अपनी इस सफलता को तुम मंजिल मत समझना, क्योंकि यह तो मंजिल तक पहुंचने की तुम्हारी पहली सीढ़ी है. मंजिल तो बहुत दूर है जो अथक परिश्रम से ही प्राप्त होगी.’

उधर, पिताजी को मेरा नौकरी करना बिलकुल रास नहीं आ रहा था. परंतु न जाने क्यों वे खुले शब्दों में मेरा विरोध नहीं कर रहे थे. इसलिए उन्होंने मेरी शादी करने का फैसला किया ताकि वे नेहा नाम की इस मुसीबत से छुटकारा पा सकें. बचपन से ही आदत थी पिताजी के फैसले पर सिर झुका कर हामी भरने की, सो, मैं ने शादी के लिए हां कर दी.

अगले ही दिन पिताजी के मित्र के सुपुत्र निमेष मुझे देखने आए. साथ में उन के मातापिता और 2 छोटी बहनें भी थीं. जैसे ही मैं बैठक में पहुंची, पिताजी ने मेरी बेटी नेहा कह कर मेरा परिचय दिया. पहली बार पिताजी के मुंह से अपने लिए बेटी शब्द सुना और तब मुझे शादी करने के अपने फैसले पर खुशी महसूस हुई. मगर यह खुशी ज्यादा देर तक न रह सकी. निमेष और उन के परिवार वालों ने मुझे पसंद तो कर लिया, लेकिन कुछ ऐसी शर्तें भी रख दीं जिन्हें मानना मेरे लिए मुमकिन नहीं था.

निमेष की मां ने स्पष्ट रूप से कह दिया कि मुझे शादी के बाद नौकरी छोड़नी होगी और उन के परिवार के सदस्यों की तरह शाकाहारी बनना होगा.

एक पारंपरिक गृहिणी के नाम पर शोपीस बन कर रहना मुझे गवारा नहीं था. मैं तो अपने सर के बताए रास्ते पर चलना चाहती थी और उन के सपनों को पूरा करना चाहती थी, जो अब मेरे भी सपने बन चुके थे.

सब के सामने तो मैं चुप रही परंतु शाम को हिम्मत कर के पिताजी से अपने मन की बात कह दी. यह सुन कर पिताजी आगबबूला हो गए. उस दिन मैं ने पहली बार बहुत कड़े शब्दों में उन का विरोध किया, जिस के एवज में उन्होंने मुझे सैकड़ों गालियां दीं व कई थप्पड़ मारे.

फिर तो मैं लोकलाज की परवा किए बिना ही सर के पास चली गई. सर ने जैसे ही दरवाजा खोला, मैं उन से लिपट कर फफक पड़ी. इतनी रात को मेरी ऐसी हालत देख कर सर भी परेशान हो गए थे, लेकिन उन्होंने पूछा कुछ नहीं. फिर मैं ने उन के पूछने से पहले ही अपनी सारी रामकहानी उन्हें सुना डाली. इतना कुछ होने के बाद भी सर ने मुझे पिताजी के पास ही जाने को कहा, लेकिन मैं टस से मस नहीं हुई. तब सर ने समझाना शुरू किया.

वे समझाते रहे और मैं सिर झुकाए रोती रही. उन की दुनिया व समाज को दुहाई देने वाली बातें मेरी समझ के परे थीं. फिर भी, अंत में मैं ने कहा कि यदि पिताजी मुझे लेने आएंगे तो मैं जरूर चली जाऊंगी, लेकिन वे नहीं आए. दूसरे दिन उन का फोन आया था. मुझे ले जाने के लिए नहीं, बल्कि सर के लिए धमकीभरा फोन…यदि सर ने कल तक मुझे पिताजी के घर पर नहीं छोड़ा तो वे पुलिस थाने में रिपोर्ट कर देंगे कि अनिरुद्ध सर ने मेरा अपहरण कर लिया है. इतना सबकुछ जानने के बाद मैं सर की और अधिक परेशानी का कारण नहीं बनना चाहती थी, इसलिए सर के ही कहने पर मैं अपनी सहेली निशा के घर चली गई.

पूरा एक सप्ताह बीत चुका था. मेरे पिताजी को पता चल चुका था कि मैं निशा के घर पर हूं. फिर भी वे मुझे लेने नहीं आए. लेकिन मुझे कोई चिंता नहीं थी. मैं तो बस इसलिए परेशान थी कि इतने सालों बाद मैं पहली बार सर से इतने दिनों के  लिए दूर हुई थी. इसलिए मुझे घबराहट होने लगी थी, जिस के निवारण के लिए मैं सर के कालेज चली गई. वहां मैं ने जो कुछ भी सुना वह मेरे लिए अकल्पनीय व असहनीय था. सर ने अपना स्थानांतरण दूसरे शहर में करवा लिया था और दूसरे दिन जा रहे थे.

फिर तो मैं शिष्या होने की हर सीमा को लांघ गई और सर को वह सबकुछ कह दिया जिसे मैं ने आज तक केवल महसूस किया था. अपने प्रति सर के लगाव को प्यार का नाम दे दिया मैं ने. और सर…एक निष्ठुर की भांति मेरी हर बात को चुपचाप सुनते रहे. अंत में बस इतना कहा, ‘नेहा, आज तक तुम ने मुझे गलत समझा है. मेरे गुरुत्व का, मेरी शिक्षा का अपमान किया है तुम ने.’

‘नहीं सर, मैं ने आप का अपमान नहीं किया है. मैं ने तो केवल वही कहा है जो अब तक महसूस किया है. मैं ने सिर्फ प्यार ही नहीं, बल्कि हर रिश्ते का अर्थ आप से ही सीखा है. आप ने एक पिता की तरह मेरे सिर पर हाथ रख कर मुझे स्नेहसिक्त कर दिया, एक प्रेमी की तरह सदैव मुझे खुश रखा, एक भाई की तरह मेरी रक्षा की, एक दोस्त और शिक्षक की तरह मेरा मार्गदर्शन किया. यहां तक कि आप ने एक पति की तरह मेरे आत्मसम्मान की रक्षा भी की है. सच तो यह है सर, मन से तो मैं हर रिश्ता आप के साथ जोड़ चुकी हूं. इस के लिए तो मुझे किसी से भी पूछने की कोई आवश्यकता नहीं है.’

‘नेहा, मेरा अपना एक अलग परिवार है और मैं अपने परिवार के साथ विश्वासघात नहीं कर सकता. साथ ही, गुरु और शिष्य के इस पवित्र रिश्ते को भी कलंकित नहीं कर सकता.’ सर की आंखों में समाज का डर सहज ही झलक रहा था.

‘मैं जानती हूं सर, और मैं कभी ऐसा चाह भी नहीं सकती. मैं ने आप से प्यार किया है. आप के अस्तित्व को चाहा है, सर. इसलिए मैं आप को अपनी नजरों में कभी गिरने नहीं दूंगी. मैं ने तो बस अपनी भावनाएं आप के साथ बांटी हैं. आप जहां चाहे जाइए, मुझे आप से कोई शिकायत नहीं. बस, कामना कीजिए कि मैं आप की दी हुई शिक्षा का अनुसरण कर सकूं.’

‘मेरी शुभकामनाएं तो हमेशा तुम्हारे साथ हैं नेहा, पर क्या जातेजाते मेरी गुरुदक्षिणा नहीं दोगी?’ सर ने रहस्यात्मक लहजे में कहा तो मैं दुविधा में पड़ गई.

मुझे असमंजस में पड़ा देख कर सर बोले, ‘मैं तो, बस इतना चाहता हूं

नेहा कि मेरे जाने के बाद तुम न तो मुझे ढूंढ़ने की कोशिश करना और न ही मुझ से संपर्क स्थापित करने का कोई प्रयास करना. हो सके तो मुझे भूल जाना. यही तुम्हारे भविष्य के लिए उचित रहेगा.’ इतना कह कर उन्होंने अपनी पीठ मेरी तरफ कर ली.

कुछ पलों के लिए मैं सन्न रह गई. समझ में नहीं आ रहा था कि इतनी कीमती चीज मैं उन को कैसे दे दूं? फिर भी मैं ने साहस किया और बस इतना ही कह पाई, ‘सर, क्या आप अपनी ‘निहारिका’ को भूल पाएंगे? यदि आप ने इस का जवाब पा लिया तो आप को अपनी गुरुदक्षिणा अपनेआप ही मिल जाएगी.’

उस दिन मैं ने आखिरी बार अनिरुद्ध सर को आह भर के देखा. उन की शुभकामना ली तो? सर के मुंह से बस इतना ही निकला, ‘हमेशा खुश रहो.’ शायद इसीलिए मैं किसी भी परिस्थिति में दुखी नहीं हो पाती हूं. जिंदगी के हर सुखदुख को हंसते हुए झेलना मेरी आदत बन गई है. मैं ने सर की आधी बात तो मान ली और उन से कभी भी संपर्क करने की कोशिश नहीं की मगर उन्हें भूल जाने वाली बात मैं नहीं मान सकी, क्योंकि मैं गुरुऋण से उऋण नहीं होना चाहती थी.

सर के चले जाने के बाद मैं ने आजीवन अविवाहित रह कर शिक्षा के क्षेत्र में अपना जीवन समर्पित करने का फैसला कर लिया. न चाहते हुए भी पिताजी को मेरी जिद के आगे झुकना पड़ा.

इसी बीच, लगातार बजते मोबाइल की रिंगटोन को सुन कर मेरी तंद्रा भंग हुई, और मैं अतीत से वर्तमान के धरातल पर आ गई. पिताजी का फोन था, ‘‘आखिर तुम ने अपनी जिद पूरी कर ही ली. खैर, बधाई स्वीकार करो. मुझे अफसोस है कि मैं शहर से बाहर हूं और समारोह में नहीं आ सकता. आगे यही कामना है कि तुम और तरक्की करो.’’

पिताजी ने ये सबकुछ बहुत ही रूखी जबान से कहा था. फिर भी, मुझे अच्छा लगा कि पिताजी ने मुझे फोन किया. काश, एक बार सर का भी फोन आ जाता.

शराब घोटाला में अगर ईडी के पास सुबूत थे, तो चुनाव तक इंतजार क्यों किया ?

शराब घोटाला मामला 2021 से चल रहा है, 500 से ज़्यादा लोगों से पूछताछ हो चुकी है मगर चवन्नी की भी रिकवरी ईडी नहीं कर पायी. दो साल में केस का ट्रायल भी शुरू नहीं हुआ. जबकि आम आदमी पार्टी के तीन बड़े नेता मनीष सिसोदिया, सत्येंद्र जैन और संजय सिंह लम्बे समय से जेल में हैं. अब ऐन चुनाव के समय आम आदमी पार्टी के मुखिया को भी गिरफ्तार करना भाजपा की हताशा और डर को साबित कर रहा है.

महाभारत के युद्ध में पांडवों और कौरवों ने जिस तरह छल और झूठ का सहारा लिया या लंका के खिलाफ दशरथ पुत्रों ने जिस छलबल का इस्तेमाल कर रावण पर विजय पायी, इन प्रसंगों को पढ़ें तो एक चीज जो बिलकुल स्पष्ट है वह यह कि युद्ध में विजय पाने के लिए नियम और नैतिकता की राह पर कोई नहीं चला, धर्मग्रंथों में दर्ज युद्ध हमेशा साम, दाम, दंड, भेद, छल, प्रपंच और झूठ के सहारे ही जीते गए. द्रोणाचार्य, भीष्म, अभिमन्यु, जयद्रथ, बाली, रावण सब छल और झूठ से मारे गए. मनुवादी विजयी होने के लिए हमेशा धर्मग्रंथों के इन्हीं उदाहरणों से प्रेरित होकर दुशमन के खिलाफ अपनी रणनीति बनाते हैं. फिर युद्ध चाहे राजनीति के मैदान में हो, विपक्षी को मटियामेट करने के लिए हर नाजायज दांव चलने की प्रेरणा वे धर्मग्रंथों से लेते हैं.

मनुवादियों की पार्टी यानी भारतीय जनता पार्टी चुनावों के वक्त हर वो हथकंडा अपनाती है जिससे विपक्ष का मनोबल टूट जाए. जैसे जैसे चुनाव नज़दीक आता है वह जांच एजेंसियों पर दबाव बना कर विपक्षी नेताओं के खिलाफ मुक़दमे दर्ज करवाने, उनके बैंक अकाउंट फ्रीज करवाने और उन्हें जेल भिजवाने में मशगूल हो जाती है. यह ट्रेंड काफी समय से देखा जा रहा है. दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल की गिरफ्तारी भी ऐसे समय में हुई है, जब देश में लोकसभा चुनाव का कार्यक्रम घोषित हो चुका है और पार्टी पहले से ही अपने कुछ वरिष्ठ नेताओं की गिरफ्तारी के चलते परेशान है.

आम आदमी पार्टी के लिए यह समय काफी नाजुक है क्योंकि अरविंद केजरीवाल को आम आदमी पार्टी का मुख्य कर्ताधर्ता और यहां तक की चाणक्य भी कहा जाता है. दिल्ली में शराब घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ईडी ने जिस तरह 21 मार्च की रात दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को उनके आवास से गिरफ्तार किया उससे न केवल आम आदमी पार्टी, बल्कि विपक्ष सहित दिल्ली की जनता भी केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ आक्रामक नजर आ रही है. जब यह मामला 2021 से चल रहा है, 500 से ज़्यादा लोगों से पूछताछ हो चुकी है मगर चवन्नी की भी रिकवरी ईडी अब तक नहीं कर पायी और दो साल में इस केस का कोर्ट में ट्रायल भी शुरू नहीं हो पाया जबकि आम आदमी पार्टी के नंबर दो, नंबर तीन, नंबर चार नेता यानी मनीष सिसोदिया, सत्येंद्र जैन और संजय सिंह जैसे नेताओं को ईडी ने लम्बे समय से जेल में बंद कर रखा है तो एक ऐसे मामले में अब ऐन लोकसभा चुनाव के समय आम आदमी पार्टी के मुखिया को गिरफ्तार करना और जेल भेजना सिर्फ भाजपा की हताशा और डर को ही साबित करता है.

केजरीवाल की गिरफ्तारी को विपक्षी नेताओं ने स्पष्ट रूप से लोकसभा चुनाव से जोड़ते हुए अपनी प्रतिक्रियाएं दी हैं. विपक्ष का मानना है कि भाजपा आगामी चुनाव में अपनी जीत को लेकर बुरी तरह आशंकित है. पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बांड के मामले में जैसी सख्ती बरती और राजनीति पार्टियों को मिलने वाले गुप्त चंदे को असंवैधानिक बता कर इसके खुलासे का दबाव स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया पर बनाया उससे भाजपा बौखला गयी है क्योंकि सबसे ज़्यादा यानी आधे से भी ज़्यादा गुप्त चन्दा यानी विभिन्न कंपनियों से अरबों रुपयों की अवैध धनवसूली भाजपा ने की है. इलेक्टोरल बांड पर भाजपा की फजीहत हो रही है. चुनाव प्रचार में इस अवैध धनवसूली को विपक्ष बड़ा मुद्दा बनाता, खासतौर से आम आदमी पार्टी देश भर में जनता के सामने भाजपा की कलई खोलतीकई , इसलिए इस हमले से बचने के लिए केंद्रीय जांच एजेंसी के कान उमेठे गए और वह तुरंत अरविन्द केजरीवाल के घर जा धमकी. इससे पहले भी कई विपक्षी नेताओं को चुन चुन कर जेल भेजा गया है. यह सब इसीलिए ताकि युद्ध का मैदान खाली हो जाए और खाली मैदान में भाजपा अकेले तलवार भांज कर विजयी हो जाए.

आम आदमी पार्टी शुरू से भाजपा की आँखों में कंकड़ की तरह चुभ रही है. विधानसभा चुनाव में भारी बहुमत से जीतने के बाद भी आम आदमी पार्टी को केंद्र की मोदी सरकार ने कभी भी शान्ति से शासन नहीं चलाने दिया. शुरू से ही दिल्ली के उपराज्यपाल चुनी हुई सरकार के काम में बड़े बड़े अड़ंगे लगाते रहे. बावजूद इसके आम आदमी पार्टी की सरकार ने दिल्ली की जनता के लिए बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बढ़िया काम कर दिखाए और जनता के दिल में अपनी बढ़िया छवि गढ़ ली. इससे भाजपा को असुरक्षा महसूस होने लगी. क्योंकि मनुवादी सोच के लोग लोकतंत्र को ख़त्म करके तानाशाही लाने की ओर बढ़ना चाहते हैं और कांग्रेस और आम आदमी पार्टी जैसे राजनीतिक दल लोकतंत्र के खम्भे को संभाले हुए हैं. आम आदमी पार्टी की रणनीति देशभर में अपना विस्तार करने की है और उसने लोकसभा चुनाव 2024 में दिल्ली, हरियाणा और गुजरात में कांग्रेस के साथ गठबंधन किया है. वहीं, पंजाब में भी उसने सभी लोकसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं. इससे भाजपा और डर गयी है.

देखा जाए तो 543 लोकसभा सीटों में से आम आदमी पार्टी, दिल्ली की 4, हरियाणा की 1, गुजरात की 2 और पंजाब की 13 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ रही है. कुल 20 सीटों पर आम आदमी पार्टी की जीत-हार लोकतंत्र में बहुत मायने रखती है. लोकसभा चुनाव से ठीक पहले अरविंद केजरीवाल को गिरफ्तार करवा के आम आदमी पार्टी को बड़ा झटका देने की कोशिश केंद्र की तरफ से की गयी है. लेकिन लोकसभा चुनाव में इसका असर उलटा भी हो सकता है. यह विपक्ष को एक बार फिर और ज्यादा मजबूती के साथ एकजुट होने की वजह दे सकती है. केजरीवाल की गिरफ्तारी पर जिस तरह से कांग्रेस समेत कई विपक्षी नेताओं ने भाजपा और केंद्र सरकार के खिलाफ आक्रामक प्रतिक्रियाएं दीं, उससे इसकी एक तस्वीर नजर आ रही है.

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ”डरा हुआ तानाशाह, एक मरा हुआ लोकतंत्र बनाना चाहता है.” उन्होंने दावा किया, ”मीडिया समेत सभी संस्थाओं पर कब्जा, पार्टियों को तोड़ना, कंपनियों से हफ्ता वसूली, मुख्य विपक्षी दल का अकाउंट ‘फ्रीज’ करना भी ‘आसुरी शक्ति’ के लिए कम था तो अब चुने हुए मुख्यमंत्रियों की गिरफ्तारी भी आम बात हो गई है.”

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के अध्यक्ष शरद पवार ने भी कहा कि केजरीवाल पर इस कार्रवाई के खिलाफ विपक्षी गठबंधन एकजुट है. उन्होंने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ‘‘दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी से पता चलता है कि भाजपा सत्ता के लिए किस हद तक गिर सकती है. अरविंद केजरीवाल के खिलाफ इस असंवैधानिक कार्रवाई के खिलाफ ‘इंडिया’ गठबंधन एकजुट है.’’

वही, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और डीएमके के अध्यक्ष एमके स्टालिन ने भी केजरीवाल की गिरफ्तारी की निंदा की और इसे विपक्ष के ‘निरंतर उत्पीड़न’ का हिस्सा बताया. आम आदमी पार्टी की गोवा इकाई के अध्यक्ष अमित पालेकर ने कहा कि यह कार्रवाई केजरीवाल को आगामी लोकसभा चुनाव का प्रचार करने से रोकने के लिए है. पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने भी केजरीवाल की गिरफ्तारी की निंदा की और आश्चर्य जताया कि अगर चुनाव से पहले विपक्षी नेताओं और निर्वाचित मुख्यमंत्रियों को गिरफ्तार किया गया तो लोकतंत्र का क्या होगा. राज्यसभा में पार्टी के नेता डेरेक ओ ब्रायन ने एक्स पर पोस्ट के जरिए आश्चर्य जताया कि अगर सुप्रीम कोर्ट और भारत का निर्वाचन आयोग अब कार्रवाई करने में विफल रहता है तो भविष्य में भाजपा की दमनकारी राजनीति के खिलाफ लोगों के साथ कौन खड़ा होगा?

अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के बाद ईडी ने कोर्ट से उनकी 10 दिन की रिमांड मांगी है. कोर्ट में ईडी की ओर से कहा गया कि इस मामले में सरकारी गवाह बन चुके किसी आरोपी के बयान में कितनी सत्यता है, इस पर बहस सिर्फ ट्रायल के वक्त ही हो सकती है. रिमांड के दौरान इस पर बहस का कोई मतलब नहीं है.

दिल्‍ली शराब नीति मामले में अरविंद केजरीवाल की ओर से पेश हुए वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने सुनवाई के दौरान कहा कि जांच में शामिल अब तक 50 फीसदी लोगों ने केजरीवाल का नाम नहीं लिया है. वहीं 82 फीसदी लोगों ने केजरीवाल के साथ किसी डीलिंग का जिक्र नहीं किया है. सिंघवी ने कहा आप बिना किसी कारण के गिरफ्तार नहीं कर सकते हैं. ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है कि अरविंद केजरीवाल को गिरफ्तार किए बिना कोई जानकारी उनसे ना ली जा सके. ईडी कहती है कि उनके पास केजरीवाल के खिलाफ सारी सामग्री थी, तो फिर उसने आचार संहिता लागू होने तक इंतजार क्यों किया? क्या आप चुनाव का इंतजार कर रहे थे?

सिंघवी ने कहा, “भारत के इतिहास में पहली बार किसी मौजूदा मुख्यमंत्री को गिरफ्तार किया गया है. पहली बार ऐसा हुआ है कि उनकी पार्टी के पहले चार नेताओं को गिरफ्तार किया गया है. ऐसा लगता है जैसे पहला वोट डालने से पहले ही भाजपा को नतीजे पता चल गए हों.” सिंघवी ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले हैं. चुनाव के लिए नॉन लेवल फील्ड बनाया जा रहा है. सभी बड़े नेता जेल में हैं. चुनाव नजदीक हैं. इससे संविधान की मूल संरचना प्रभावित होती है. इसका असर लोकतंत्र पर पड़ता है.

शराब पॉलिसी मामले में अरविंद केजरीवाल की भूमिका और ईडी के आरोप

हाल ही में ईडी ने एक प्रेस नोट जारी कर शराब नीति मामले में बीआरएस की नेता के कविता को मुख्य साजिशकर्ता बताया. ईडी ने कहा कि के कविता ने अरविंद केजरीवाल, संजय सिंह और मनीष सिसोदिया के साथ मिलकर साजिश की. शराब नीति में बदलाव करवाए और फिर उसे अपनी तरह से लागू कराया. इसके बदले में साउथ की शराब लॉबी ने आम आदमी पार्टी को एकमुश्त 100 करोड़ रुपये दिए. इसके बाद शराब के थोक कारोबार में जो कमीशन 12 परसेंट किया गया, उसमें से 6 परसेंट वापस आम आदमी पार्टी को भेजा गया. केजरीवाल का नाम कुछ आरोपियों और गवाहों के बयानों में आया. इसका जिक्र एजेंसियों ने अपने रिमांड नोट और चार्जशीट में किया है.

ईडी के मुताबिक विजय नायर ने खोले राज

शराब पॉलिसी में आरोपी विजय नायर का मुख्यमंत्री कार्यालय में पूरी तरह आना जाना था और वो ज्यादातर समय वहीं बिताता था. वह मुख्यमंत्री केजरीवाल से काफी बात करता था. विजय नायर ने कई शराब कारोबारियों को बताया कि वो शराब पॉलिसी को लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से चर्चा करता है. विजय नायर ने ही इंडोस्प्रिट के मालिक समीर महेंद्रू की मुलाकात अरविंद केजरीवाल से करवाई. जब मुलाकात सफल नहीं हुई तो उसने अपने फोन से फेस टाइम एप पर वीडियो कॉल के जरिए समीर महेंद्रू और अरविंद केजरीवाल की बात करवाई. बातचीत में अरविंद केजरीवाल ने कहा की विजय नायर अपना बच्चा है, उस पर विश्वास करें और सहयोग करें.

राघव मगुंटा की गवाही

बकौल ईडी साउथ की शराब लॉबी से पहले आरोपी और अब गवाह बने राघव मगुंटा ने बताया कि उसके पिता मगुंटा श्रीनिवासुलू रेड्डी (एमएसआर) जो वाईएसआर कांग्रेस के सांसद हैं, ने दिल्ली शराब पॉलिसी के बारे में और ज्यादा जानने के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से मुलाकात की थी. केजरीवाल ने दिल्ली में शराब के कारोबार के लिए उनका स्वागत किया था.

पूर्व सचिव के आरोप

मनीष सिसोदिया के पूर्व सचिव सी अरविंद ने 7 दिसंबर 2022 को अपने बयान में कहा कि मार्च 2021 में उन्हें मनीष सिसोदिया से एक ड्राफ्ट रिपोर्ट मिली. जब मनीष सिसोदिया के बुलाने पर वो अरविंद केजरीवाल के घर गए तो वहां सत्येंद्र जैन भी मौजूद थे. ये डॉक्यूमेंट उन्होंने पहली बार देखा था क्योंकि किसी मीटिंग में ऐसे किसी प्रपोजल पर चर्चा नहीं हुई थी और इसी डॉक्यूमेंट के आधार पर उन्हें ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स की एक रिपोर्ट तैयार करने के लिए कहा गया. इस रिपोर्ट में शराब का थोक कारोबार निजी लोगों को देने की बात थी.

मेहनत करते हैं युवा, मलाई चाट जाते हैं वरिष्ठ

2024 के लोकसभा चुनाव प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. अब 80 दिन चुनावी हंगामा होता रहेगा. मजबूत चुनाव प्रबंधन में युवाओं की बहुत जरूरत होने लगी है. लेकिन युवा को राजनीति में आगे बढ़ने के मौके कम मिलते हैं. ऐसे में ये युवा केवल तमाशाई बन कर रह जाते हैं. राजनीति में पैसे और पहुंच की जरूरत होती है, ऐसे में या तो परिवार राजनीति में हो या फिर उस के पास पैसे अधिक हों तभी राजनीति में कदम रखे. अगर ये दोनों नहीं हैं तो केवल नेताओं की गणेशपरिक्रमा करते ही जीवन बीत जाएगा. बूथ मैनेजमैंट में युवाओं का महत्त्व सब से अधिक होता है.

क्या होता है ‘बस्ता’

जब भी कोई चुनाव शुरू होता है तो बूथ प्रबंधन की बड़ी चर्चा होती है. बूथ प्रबंधन शब्द का चलन पिछले 14 सालों से हुआ है जब गुजरात मौडल चलन में आया. पहले इस का ‘बस्ता’ लगना कहा जाता था. आज भी बूथ प्रबंधन में मुख्य काम ‘बस्ता’ ही होता है. सवाल उठता है, यह बस्ता क्या होता है? बचपन में बस्ता बच्चों के कौपीकिताब रखने के झोले को कहते थे. चुनावी बस्ते में क्या होता है?
असल में यह भी बच्चों के झोले जैसा ही होता है. इस को बस्ता इसलिए कहते हैं क्योकि पहले यह बस्ते सा होता था. फाइलों को कपड़े से बांध कर ले जाया जाता था. अब यह लोहे के बौक्स सा होता है. इस में ताला भी लगाया जाता है. इस के अंदर मतदाता सूची, पैंसिल, पैन, मोहर, स्टैंप पैड, मोबाइल चार्जर और पावर बैंक व कुछ सादे पेपर होते हैं. पहले इस में बूथ प्रबंधन में लगे लोग अपने खाने के लिए बिस्कुट, दालमोठ भी रखते थे.

एक लोकसभा क्षेत्र में औसतन 15 सौ से 2 हजार के बीच बूथ होते हैं. हर बूथ के प्रबंध में करीब करीब 11 लोगों की टीम होती है. ऐसे में आप सोच सकते हैं कि 544 लोकसभा सीटों पर बूथ मैनेजमैंट के लिए कितने युवाओं की जरूरत पड़ेगी. अगर एक लोकसभा क्षेत्र में औसतन 1,500 बूथ मान लें तो 16 हजार 500 युवा एक लोकसभा क्षेत्र में चाहिए. 544 लोकसभा सीटों पर 90 लाख यूथ चाहिए. एक दल को पूरे देश में 90 लाख युवा चाहिए.
हर लोकसभा सीट पर 3 से 4 दल ऐसे होते हैं जिन के ‘बस्ते’ लगते हैं. 4 दलों की गणना कर लें तो 3 करोड़ 60 लाख तक यह संख्या पहुंच जाती है. भाजपा के गुजरात मौडल ने ही पन्ना प्रमुख बनाया है. एक मतदाता सूची के एक पन्ने पर 30 नाम होते हैं. एक पन्ना प्रमुख का काम केवल इन 30 लोगों से संपर्क बनाना होता है. भाजपा ने कागजों पर इस को इतना महत्त्व दिया है कि हर युवा पन्ना प्रमुख बनने ही होड़ में रहता है. एक बूथ पर करीब 1,500 मतदाता होते हैं. 50 पन्ना प्रमुख होते हैं. एक बड़ीभीड़ युवाओं की इस में लगी है.

इस्तेमाल कर फेंक दिए जाते हैं ये युवा

इन का काम केवल चुनाव के दिन नहीं होता है. ये पर्ची पहुंचाने, वोटर लिस्ट में नाम का मिलान करने, मतदान स्थल पर गड़बड़ी हो तो होहल्ला मचाने जैसे प्रमुख काम करते हैं. पार्टियों की सब से बड़ी ताकत ये युवा होते हैं. इस के बाद भी इन को मिलता क्या है? बूथ प्रबंधन के नाम पर जो बजट आता है उस में एक छोटा हिस्सा मिलता है. जिस से वे अपने कपड़े का रखरखाव भी नहीं कर सकते. राजनीति में अब स्थान उस को मिल रहा है जिस के घरपरिवार के लोग पहले से राजनीति में हैं. उन के बेटाबेटी को जगह मिलती है.

भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा में पंकज सिंह जैसे न जाने कितने पदाधिकारी रहे हैं. उन में विधायक बनने का रास्ता केवल पंकज सिंह को मिला, क्योंकि उन के पिता का नाम राजनाथ सिंह है और वे भाजपा के बड़े नेता हैं. उन के दूसरे बेटे नीरज सिंह टिकट के लिए दरवाजे खटखटा रहे हैं. किस चुनाव में टिकट मिल जाए, पता नहीं चलेगा. अपर्णा यादव को भाजपा में इसलिए महत्त्व दिया जा रहा है क्योंकि उन के ससुर मुलायम सिंह यादव थे, जिहोंने समाजवादी पार्टी बनाई, 3 बार यूपी के मुख्यमंत्री रहे. ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता नेता थे तो वे कांग्रेस में भी नेता रहेंगे और भाजपा में भी.
ऐसे नामों की लिस्ट लंबी ही नहीं, बेहद लंबी है. हर दल में है. भाजपा को लगता था कि परिवारवाद से लड़ा जा सकता है. जैसे ही उन की दूसरी पीढ़ी के नेताओं का दखल शुरू हुआ, नेताओं के परिवारों का दखल यहां भी शुरू हो गया. अब भाजपा ने परिवारवाद की नई परिभाषा गढ़ ली है. अब परिवारवाद की जगह उस का हमला वंशवाद पर हो गया है. जैसे ही इन नेताओं की तीसरी पीढ़ी बढ़ेगी, भाजपा का परिवारवाद भी वंशवाद में बदल जाएगा.

राजनीति में सफल हो रहे 60 फीसदी से अधिक नेता वे हैं जो परिवारवाद की सीढ़ी चढ़ कर आए हैं. भाजपा परिवारवाद का विरोध करती थी लेकिन अब उस ने उसे स्वीकार कर लिया है. इसलिए उस की आलोचना अधिक होनी चाहिए. भाजपा ने ‘पार्टी विद डिफरैंट’ का वादा किया था. अब दूसरी पार्टियों से केवल हिंदुत्व के मामले में अलग है, बाकी में वह दूसरों जैसी ही है. ऐेसे में बूथ मैनेजमैंट कर रहे युवाओं को सोचना चाहिए कि उन का क्या हश्र होने वाला है?

क्यों जाते हैं युवा राजनीति में

पहले राजनीति में कालेज और विश्वविद्यालय के छात्रसंघों से युवा जाते थे. अब छात्रसंघों की राजनीति खत्म हो गई है. ऐसे में नेताओं के आसपास रह कर, झंडा बैनर और बूथ मैनेजमैंट कर के ही राजनीति सीखने को मिल रही है. रोजगार और नौकरियों के कम होने से बेरोजगार युवाओं की संख्या बढ़ रही है. वे इस रास्ते कमाई के अवसर देखते हैं. इन का समाजसेवा या देशसेवा से कोई मतलब नहीं रह गया है. ये हर छोटेबड़े नेता के आसपास इसलिए भटकते रहते हैं ताकि इन की पहचान बन सके.

सोशल मीडिया के जमाने में ये अपनी फोटो किसी नेता, विधायक के साथ पोस्ट कर देते हैं जिस से सामने वाले पर इन का रोब पड़ जाता है. इन में से बहुत सारे ऐसे हैं जो अपने नाम के आगे युवा नेता लिख लेते हैं. कुछ खुद को वरिष्ठ युवा नेता भी लिख लेते हैं. कुछ जो समझदार होते हैं वह कोई न कोई संस्था बना कर खुद ही उस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन जाते हैं. धीरेधीरे जो नेता के बहुत करीबी हो जाते हैं वे ठेका पट्टी, ट्रांसफर-पोस्टिग में हाथ मार लेते हैं.

भगवान जैसा हो गया नेता

आज के दौर में नेता एक भगवान जैसा हो गया है. राजनीति एक मंदिर की तरह से है. जैसे मंदिर में दर्शन करने लोग जाते हैं तो मुख्य मूर्ति पर ज्यादा प्रसाद चढ़ाते हैं, उस की पूजापरिक्रमा अधिक करते हैं. उसी मंदिर में छोटीछोटी मूर्तियां भी लगी होती हैं. दर्शन करने वाला कम प्रसाद व कम चढ़ावा वहां भी चढ़ा देता है. उसी तरह से राजनीति में भी है, बड़े नेता के साथ ही साथ छोटे नेता को भी महत्त्व मिलता है. साधारण युवा की जगह पर नेता प्रसाद उस को देता है जो अलग किस्म की खासीयत रखता है.

इस प्रसाद की अभिलाषा में युवा नेता के साथ लगा रहता है. कई दंबग नेताओं के साथ लगे युवा तो वसूली और दबंगई भी करते हैं. इन के लिए नेता अच्छे किस्म के जूते, कपड़े और मोबाइल का प्रबंध कर देते हैं. इस के बाद ये नेता के साथ उस के सुरक्षा दस्ते ही तरह चलते हैं. सुबह होते ही नेता के घर पहुंच जाते हैं. देररात तक उसके साथ रहते हैं. इन को माह में 5 से 10 हजार रुपए की नकदी भी मिल जाती है. खानापीना, गाड़ियों से चलने का सुख नेता के साथ मिलता ही रहता है. नेता के करीबी बन कर रह जाते हैं.

नेता जब नए लड़कों को साथ ले लेता है तो पुरानों की छुट्टी कर देता है. ऐसे में युवा का प्रयोग राजनीतिक दल और नेता दोनों ही कर के फेंक देते हैं. कई बार ये दूसरे नेता के पास अपनी जगह बना लेते हैं, कई बार खाली ही रह जाते हैं. नेता ज्यादातर अपनी जाति के लड़कों को ही साथ रखते हैं. जब यही नेता बड़े हो जाते हैं या वे टिकट दिलाने की हैसियत में आ जाते हैं तो वे अपने परिवार के लोगों को ही आगे बढ़ाते हैं. कई भक्त ऐसे भी हैं जो पहले पिता की सेवा में लगे होते हैं, फिर पुत्र की सेवा में भी लग जाते हैं. युवा चाहे नेता के साथ हों या राजनीतिक दल के, वे अपना भविष्य खराब कर रहे होते हैं.

 

 

भाजपा के लिए ’भस्मासुर’ हो गई सोशल मीडिया

33 करोड़ भारतीय इंस्टाग्राम पर हैं, यह संख्या हर दिन बढ़ रही है. फेसबुक पर 32 करोड़ लोग और ट्विटर पर 26 करोड़ लोग हैं. 54 करोड़ के करीब लोग व्हाट्सऐप पर हैं. अब पौडकास्टर के साथ भी नेता इंटरव्यू करने लगे हैं. ऐसे में लोकसभा चुनाव में राजनीतिक दलों के लिए सोशल मीडिया का प्रभाव बढ़ जाता है. 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने सोशल मीडिया को दोहरा प्रयोग किया. सोशल मीडिया के जरिए भाजपा ने न केवल अपना प्रचार अभियान चलाया बल्कि दूसरे दलों को बदनाम करने का काम भी किया.

सोशल मीडिया पर पलट गई है बाजी

भाजपा का सब से बड़ा हमला सब से प्रमुख विपक्षी कांग्रेस पर था. उस में भी गांधीनेहरू परिवार पर उस ने निशाना साधा. भाजपा ने इस के लिए सोशल मीडिया के साथ ही साथ अपने कार्यकर्ताओं का भी प्रयोग किया. किसी भी बात को तेजी के साथ देश के एक कोने से दूसरे कोने में फैलाने का काम किया गया. राहुल गांधी के लिए ‘पप्पू’ शब्द का प्रयोग हो या फिर ‘आलू से सोना बनाने’ वाली खबर का वायरल होना.

सोशल मीडिया के साथ ही इलैक्ट्रौनिक मीडिया का भी प्रयोग किया गया. खबरों को गढ़ने का काम हुआ. सत्ता पक्ष की जगह पर विपक्ष से सवाल किए जाने लगे. अगर भाजपा से सवाल पूछने का साहस किसी ने किया तो उस को रास्ते से हटाने के लिए चैनलों का स्वामित्व ही बदल दिया गया.

सवाल पूछने वाले पत्रकारों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा. रवीश कुमार, पुण्य प्रसून वाजपेयी, अजीत अंजुम जैसे नामों की लंबी लिस्ट है. अमेठी में स्मृति ईरानी से सवाल करने वाले पत्रकार को हटा दिया गया. पूरे देश में ऐसे पत्रकारों की लंबी लिस्ट है. अब ये सभी पत्रकार सोशल मीडिया, खासकर यूट्यूब, पर बेहद सक्रिय हैं. इन के लाखोंकरोड़ों देखने वाले हैं.

खत्म हो रहा भाजपा का एकाधिकार

ऐसे में अब सोशल मीडिया पर भाजपा का एकाधिकार खत्म हो गया है. उस के विरोधी काफी हावी हो गए हैं. 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने 325 करोड़ सोशल मीडिया के विज्ञापन पर खर्च किए थे. ऐसे में अगर भाजपा कुछ मिथ्या प्रचार करना भी चाहती है तो उस का खंडन दूसरी तरफ से आ जाता है, जिस से जनता को सच का पता चल जाता है. यह भाजपा के लिए खतरे वाली बात इस चुनाव में देखने को मिल रही है.

भारतीय जनता पार्टी तकनीकी रूप से सब से आगे हैं. उस ने जिला स्तर पर 300 कौल सैंटर स्थापित किए हैं जहां पर आप फोन कर के भारतीय जनता पार्टी के सदस्य बन सकते हैं. भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में वोटिंग प्रतिशत में बढ़ोतरी करने के लिए सोशल मीडिया, तकनीक और साधनों का प्रयोग करने के लिए काम कर रहे हैं. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और भारतीय जनता युवा मोरचा से जुड़े कार्यकर्ता हर कीमत पर अपना योगदान देना चाहते हैं.

लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया का होगा प्रयोग

नेता खुद भी सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं. 9.63 करोड़ लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक्स पर फौलो करते हैं. राहुल गांधी के 2.51 करोड़ फौलोअर हैं. जिस दल के पास जितने अधिक व्हाट्सऐप ग्रुप हैं वह उतनी ज्यादा तेजी से अपनी बात लोगों तक पहुंचा सकता है. इस में भी कार्यकर्ता का प्रयोग होता है. कार्यकर्ताओं के अपने सोशल मीडिया खाते हैं. वे भी अपने दल का प्रचारप्रसार करते रहते हैं. पहले भाजपा के लोग छोटीछोटी बातों में विपक्ष को घेरते थे, अब दूसरे दल भी यह काम करने लगे हैं.
शिव यानी शंकर ने भस्मासुर को यह ताकत दी थी कि वह जिस के सिर पर हाथ रखेगा वह भस्म हो जाएगा. सोशल मीडिया के प्रयोग से भाजपा को भी ताकत मिल गई थी. वह हर तरह से इस का प्रयोग करने लगी. अब सोशल मीडिया की वही ताकत विपक्षी दलों को मिल गई है. सोशल मीडिया अब भाजपा के लिए भस्मासुर हो गई है. अब सोशल मीडिया पर न केवल भाजपा की, बल्कि उस के साथ खड़े लोगों की भी आलोचना होने लगी है, जो अब भाजपा पर भारी पड़ेगा.

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