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औफिस सेक्रेटी के साथ मेरा फिजिकल रिलेशन है, क्या मैं सही कर रहा हूं ?

सवाल
मैं सरकारी अफसर हूं और मेरे 2 बच्चे हैं. पिछले साल से मेरा अपनी सहकर्मी जो 1 बच्चे की मां है, से अफेयर चल रहा है. मैं उस की हर जिम्मेदारी निभाता हूं और हम पतिपत्नी की तरह ही व्यवहार करते हैं. लेकिन वह काफी मूडी व मतलबी है. आप ही बताएं कि क्या मैं सही कर रहा हूं?

जवाब
2 बच्चे और पत्नी होते हुए किसी शादीशुदा महिला से संबंध रखना गलत है. आप को अपनी पत्नी से कोई शिकायत नहीं है तो फिर इस तरह की हरकतें क्यों कर रहे हैं? वैसे भी आप कह रहे हैं कि वह महिला भी काफी मूडी व मतलबी है. हो सकता है वह आप को इस्तेमाल कर रही हो. भलाई इसी में है कि आप को समय रहते उस से दूर हो जाना चाहिए. भले ही वह आप की ऐसी बात सुन कर आप को धोखेबाज कहे. अपनी पत्नी और बच्चे में ध्यान रमाएं. मन इधरउधर न भटकाएं.

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हिसाब: कैसे बिगड़ गया उसका हिसाब

‘आज फिर 10 बज गए,’ मेज साफ करतेकरते मेरी नजर घड़ी पर पड़ी. इतने में दरवाजे की घंटी बजी.

‘कौन आया होगा, इस समय. अब तो फ्रिज में सब्जी भी नहीं है. बची हुई सब्जी मैं ने जबरदस्ती खा कर खत्म की थी,’ कई बातें एकसाथ दिमाग में घूम गईं.

थकान से शरीर पहले ही टूट रहा था. जल्दी सोने की कोशिश करतेकरते भी 10 बज गए थे. धड़कते दिल से दरवाजा खोला, सामने दोनों हाथों में बड़ेबड़े बैग लिए चेतना खड़ी थी. आगे बढ़ कर उसे गले लगा लिया, सारी थकान जैसे गायब हो गई और पता नहीं कहां से इतना जोश आ गया कि पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे.

‘‘अकेली आई है क्या?’’ सामान अंदर रखते हुए उस से पूछा.

‘‘नहीं, मां भी हैं, औटो वाले को पैसे दे रही हैं.’’

मैं ने झांक कर देखा, वीना नीचे औटो वाले के पास खड़ी थी. वह मेरी बचपन की सहेली थी. चेतना उस की प्यारी सी बेटी है, जो उन दिनों अपनी मेहनत व लगन से मैडिकल की तृतीय वर्ष की छात्रा थी. मुझे वह बहुत प्यारी लगती है, एक तो वह थी ही बहुत अच्छी – रूप, गुण, स्वभाव सभी में अव्वल, दूसरे, मुझे लड़कियां कुछ ज्यादा ही अच्छी लगती हैं क्योंकि मेरी अपनी कोई बेटी नहीं. अपने और मां के संबंध जब याद करती हूं तो मन में कुछ कसक सी होती है. काश, मेरी भी कोई बेटी होती तो हम दोनों अपनी बातें एकदूसरे से कह सकतीं. इतना नजदीकी और प्यारभरा रिश्ता कोई हो ही नहीं सकता.

‘‘मां ने देर लगा दी, मैं देखती हूं,’’ कहती हुई चेतना दरवाजे की ओर बढ़ी.

‘‘रुक जा, मैं भी आई,’’ कहती हुई मैं चेतना के साथ सीढि़यां उतरने लगी. नीचे उतरते ही औटो वाले की तेज आवाज सुनाई देने लगी. मैं ने कदम जल्दीजल्दी बढ़ाए और औटो के पास जा कर कहा, ‘‘क्या बात है वीना, मैं खुले रुपए दूं?’’

‘‘अरे यार, देख, चलते समय इस ने कहा, दोगुने रुपए लूंगा, रात का समय है. मैं मान गई. अब 60 रुपए मीटर में आए हैं. मैं इसे 120 रुपए दे रही हूं. 10 रुपए अलग से ज्यादा दे दिए हैं, फिर भी मानता ही नहीं.’’

‘‘क्यों भई, क्या बात है?’’ मैं ने जरा गुस्से में कहा.

‘‘मेमसाहब, दोगुने पैसे दो, तभी लूंगा. 60 रुपए में 50 प्रतिशत मिलाइए, 90 रुपए हुए, अब इस का दोगुना, यानी कुल 180 रुपए हुए, लेकिन ये 120 रुपए दे रही हैं.’’

‘‘भैया, दोगुने की बात हुई थी, इतने क्यों दूं?’’

‘‘दोगुना ही तो मांग रहा हूं.’’

‘‘यह कैसा दोगुना है?’’

‘‘इतना ही बनता है,’’ औटो वाले की आवाज तेज होती जा रही थी. सो, कुछ लोग एकत्र हो गए. कुछ औटो वाले की बात ठीक बताते तो कुछ वीना की.

‘‘इतना लेना है तो लो, नहीं तो रहने दो,’’ मैं ने गुस्से से कहा.

‘‘इतना कैसे ले लूं, यह भी कोई हिसाब हुआ?’’

मैं ने मन ही मन हिसाब लगाया कि कहीं मैं गलत तो नहीं क्योंकि मेरा गणित जरा ऐसा ही है. फिर हिम्मत कर के कहा, ‘‘और क्या हिसाब हुआ?’’

‘‘कितनी बार समझा दिया, मैं 180 रुपए से एक पैसा भी कम नहीं लूंगा.’’

‘‘लेना है तो 130 रुपए लो, वरना पुलिस के हवाले कर दूंगी,’’ मैं ने तनिक ऊंचे स्वर में कहा.

‘‘हांहां, बुला लो पुलिस को, कौन डरता है? कुछ ज्यादा नहीं मांग रहा, जो हिसाब बनता है वही मांग रहा हूं,’’ औटो वाला जोरजोर से बोला.

इतने में पुलिस की मोटरसाइकिल वहां आ कर रुकी.

‘‘क्या हो रहा है?’’ सिपाही कड़क आवाज में बोला.

‘‘कुछ नहीं साहब, ये पैसे नहीं दे रहीं,’’ औटो वाला पहली बार धीमे स्वर में बोला.

‘‘कितने पैसे चाहिए?’’

‘‘दोगुने.’’

‘‘आप ने कितने रुपए दिए हैं?’’ इस बार हवलदार ने पूछा.

‘‘130 रुपए,’’ वीना ने कहा.

‘‘कहां हैं रुपए?’’ हवलदार कड़का तो औटो वाले ने मुट्ठी खोल दी.

सिपाही ने एक 50 रुपए का नोट उठाया और उसे एक भद्दी सी गाली दी, ‘‘साला, शरीफों को तंग करता है, भाग यहां से, नहीं तो अभी चालान करता हूं,’’ फिर हमारी तरफ देख कर बोला, ‘‘आप लोग जाइए, इसे मैं हिसाब समझाता हूं.’’

हम चंद कदम भी नहीं चल पाई थीं कि औटो के स्टार्ट होने की आवाज आई. मैं हतप्रभ सोच रही थी कि किस का हिसाब सही था, वीना का, औटो वाले का या पुलिस वाले का?.

पुरुषों को भी तकलीफ देता है मेनोपोज

मेनोपोज, यानी एक उम्र के बाद शरीर में होने वाले हार्मोनल चेंज और कुछ शारीरिक क्रियाओं में आने वाली कमी. अधेड़ावस्था की शुरुआत है मेनोपोज. मेनोपोजसे उत्पन्न कुछ शारीरिक समस्याओं की चर्चा अब तक स्त्रियों के सम्बन्ध में ही की जाती रही हैं, लेकिन यह चर्चा बहुत कम होती है कि मेनोपोज की स्थिति और इससे उत्पन्न समस्याओं से पुरुष भी जूझते हैं।

45 से 50 साल की उम्र में पहुंचने पर महिलाओं में मेनोपोज का समय शुरू होता है, जब धीरे धीरे करके पीरियड्स आने बंद हो जाते हैं. ऐसा शरीर में स्त्री हॉर्मोन बनना बंद होने के कारण होता है. यह दौर महिलाओं के लिए मुश्किल भरा होता है. मूड स्विंग, चिड़चिड़ापन, कमजोरी, हड्डियों का भुरभुराना, बालों का झड़ना जैसी अनेक परेशानियों से महिलायें इस दौर में गुज़रती हैं, लेकिन ऐसा सिर्फ महिलाओं के साथ ही नहीं होता, बल्कि पुरुष भी इस उम्र में होने वाले हार्मोनल बदलाव के कारण काफी समस्याओं का सामना करते हैं, जिनका ज़्यादा जिक्र नहीं होता है.

50-55 की उम्र में होने वाले मेनोपोज की अवस्था में सीधेतौर पर पुरुषों की सेहत और मनोदशा प्रभावित होती है. पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन नाम का हार्मोन होता है, जिससे उनकी सेक्स लाइफ संचालित होती है. 50 की उम्र के बाद इसमें बदलाव आने लगता है, और इसका बनना कम होने लगता है, जिससे पुरुषों की मानसिक और शारीरिक सेहत प्रभावित होती है. पुरुषों में इस दौर को एंट्रोजेन डिफिसिएंसी ऑफ दी एजिंग मेल कहते हैं. टेस्टोस्टेरोन का स्तर घटने से पुरुषों को मानसिक समस्याओं के साथ ऊर्जा में कमी, डिप्रेशन या उदासी, जीवन में अचानक मोटिवेशन की कमी लगना, सेल्फ कॉन्फ‍िडेंस में कमी, किसी चीज़ में ध्यान केंद्रित करने में मुश्क‍िल आना, नींद न आना, मोटापा बढ़ना, शारीरिक तौर पर कमजोरी महसूस करना जैसी समस्याएं पैदा होने लगती हैं.

हेल्थ एक्सपर्ट- श्री नियाज़ अहमद

पुरुषों में मेनोपोज की स्थिति 50 से 60 साल की उम्र में आती है. महिलाओं की तरह पुरुषों को भी इस दौरान अपनी मेंटल और फिजिकल हेल्थ का ध्यान रखने की जरूरत होती है क्योंकि इस दौरान उनका शरीर अनेक बदलावों से गुजर रहा होता है. इनमें भावनात्मक और शारीरिक दोनों तरह के बदलाव शामिल हैं.

पुरुषों में 50 की उम्र के बाद कार्डियोवस्कुलर प्रॉब्लम्स होने का खतरा भी काफी हद तक बढ़ जाता है क्योंकि इस उम्र तक पहुंने पर बॉडी वेन्स में लचक कम होने लगती है और ब्लड वेसल्स पहले की तुलना में काफी कमजोर हो जाते हैं. इस कारण हार्ट से जुड़ी कई तरह की समस्याएं अचानक से हावी हो जाती हैं. इनमें हार्ट अटैक भी शामिल है.

मेनोपोज के कारण पुरुषों के शरीर में ऐस्ट्रोजन हॉर्मोन का बनना भी कम होने लगता है और इसका सीधा असर मानसिक सेहत पर पड़ता है.इस कारण पुरुषों में बहुत तेजी से मूड स्विंग्स देखने को मिलता ही. वे चिड़चिड़े से रहने लगते हैं. आमतौर पर इस उम्र में पुरुष खुद को बहुत अकेला और भावनात्मक रूप से कमजोर भी महसूस करने लगता है.

हेल्थ एक्सपर्ट- श्री नियाज़ अहमद

मेल हॉर्मोन्स की कमी से सेहत पर कई अन्य बीमारियों का खतरा भी मंडराने लगता है. जिसमे हृदय से जुडी कई बीमारियां सिर उठाने लगती हैं. कार्डियोवस्कुलर डिजीज के दौरान पुरुषों को कमर में तेज दर्द, मितली आना, सीने पर जलन होना, भूख ना लगना या बहुत कम लगना, खांसी आना और कफ निकलना, हर समय थकान रहना और धड़कन बढ़ने जैसी समस्याएं होने लगती हैं.  इस दौर से गुजरते हुए कई लोगों में प्रॉस्टेट ग्रंथि का साइज़ भी बड़ा होने लगता है जो कि टेस्टोस्टेरोन लेवल के कम होने का प्रमुख लक्षण है. प्रॉस्टेट ग्रंथि बड़ी और कठोर हो जाती है. हालांकि यह बात अलग अलग व्यक्तियों पर अलग तरह से निर्भर करता है. टेस्टोस्टेरोन लेवल कम होना और प्रोस्टेट ग्रंथि का बढ़ जाना दोनों ही समस्याओं का इलाज दवाइयों से संभव है. इसलिए ऐसे कोई भी लक्षण दिखने पर नजदीकी डॉक्टर की सलाह ज़रूर लें.

मेनोपोज  के कारण पुरुषों को इस उम्र में न्यूरॉलजिकल दिक्कतें भी शुरू हो जाती हैं. इनमें ऐंग्जाइटी, टेंशन और अपने काम पर फोकस ना कर पाने जैसी समस्याएं शामिल हैं. कुछ पुरुषों को तो इस दौरान मेमोरी लॉस जैसी परेशानियां भी हो जाती हैं. इन सबकी वजह एस्ट्रोजन हॉर्मोन यानी मेल हॉर्मोन्स की कमी ही होती है.

55 से 65 की उम्र के बीच हड्डियां तेजी से कमजोर होती हैं क्योंकि इस दौरान पुरुषों में बोन टिश्यूज तेजी से डिजनरेट होते हैं. इससे हड्डियां कमजोर और सॉफ्ट हो जाती हैं. इसलिए जरूरी है कि इस उम्र में पुरुष अपनी डायट में कैल्शियम, आयरन और विटमिन्स की मात्रा बढ़ा दें. साथ ही फास्ट फूड से जितना हो सके दूर रहें. कैल्शियम जहाँ हड्डियों को मजबूत बनाए रखने का काम करता है तो वहीं आयरन शरीर में ब्लड का फ्लो बनाए रखता है. इसके साथ ही यह हमारी ब्लड वेसल्स का वॉल्यूम बनाए रखने में मदद करता है. यानी रक्त धमनियों को संकरी होने से रोकता है. इससे कॉर्डियोवस्कुलर डिजीज यानी दिल की बीमारी होने का खतरा कम होता है.

मेनोपॉज की स्थिति से गुजर रहे पुरुषों को तनाव से दूर रहने का प्रयास करना चाहिए. नहीं तो डिप्रेशन में जा सकते हैं. आमतौर पर पुरुष अपना दुःख-तकलीफ जल्दी किसी से शेयर नहीं करते, लिहाज़ा मेनोपोज से पुरुषों में उत्पन्न समस्याओं के बारे में ना ज़्यादा बात होती है और ना वे इन समस्याओं को लेकर डॉक्टर के पास जाते हैं. ‘बुढ़ापे में तो सब चलता है’ ऐसा कह कर तकलीफ को नज़रअंदाज़ करने का चलन भारतीय समाज में है. लेकिन 55 से 65 की उम्र ऐसी होती है, जब पुरुष खुद को सबसे अधिक असहाय और कमजोर महसूस करने लगते हैं. यदि परिवार उनकी मानसिक स्थिति को समझकर उनका सपोर्ट ना करे तो हालात ज़्यादा खराब हो सकते हैं.

लखनऊ के हेल्थ एक्सपर्ट्स नियाज़ अहमद का कहना है कि सेहत से जुड़ी इन समस्याओं से बचने के लिए पुरुषों को अपनी मानसिक, शारीरिक और सामाजिक सेहत पर ध्यान देना चाहिए। खासतौर पर सामाजिक सेहत पर… जी हाँ, सामाजिक सेहत, जिसका मतलब है 50 की उम्र के बाद आप अकेले उदास ना रहें, बल्कि अपने दोस्तों का दायरा बढ़ाएं. सामाजिक सेहत ठीक होने से आपकी मानसिक और शारीरिक सेहत भी अच्छी रहेगी. इनडोर और आउटडोर गेम्स में हिस्सा लें. चौकड़ी जमाएं, बातचीत, हंसी-ठिठोली, हल्ला-गुल्ला करें. बागबानी या अन्य कार्यों को अपनी दिनचर्या में शामिल करके थोड़ा शारीरिक श्रम करें और अधिक से अधिक खुश रहने का प्रयास करें.

नियाज़ अहमद कहते हैं आमतौर पर पुरुष अपनी युवावस्था के दौरान खुद को करियर और नौकरी के बीच इनता उलझा लेते हैं कि उनकी सोशल लाइफ बहुत सीमित हो जाती है. ऐसे में 55 की उम्र के बाद जब उन्हें कुछ समय मिलना शुरू होता है तो वे यह सोचकर परेशान होने लगते हैं कि उनके पास तो कोई है ही नहीं, जिसके साथ वे अपनी बातें शेयर कर सकें, जिसकी कंपनी को इंजॉय कर सकें. इसलिए अगर आप बुढ़ापे में सठियाना नहीं चाहते हैं तो पुराने दोस्तों का संग-साथ हमेशा बनाये रखिये. पुराने दोस्त दूर हों तो नए दोस्त बनाइए और उनसे अपनी बातें, शौक, विचार, पसंद शेयर करिए. जो लोग अपनी युवावस्था में खेल के शौक़ीन होते हैं और खेलों में भाग लेते रहते हैं, वो 50-55 की उम्र में भी खेलों में भाग लेने से कतराते नहीं हैं. उनके दोस्तों का दायरा भी लंबा-चौड़ा होता है. ऐसे में खेलना-खिलाना चलता रहता है, फिर चाहे मोहल्ले के बच्चों के साथ खेलना हो, या नए-पुराने दोस्तों के साथ पार्क में मैच खेलना हो, खेल प्रेमी तो कहीं भी रंग जमाने पहुंच जाते हैं. खेल बहुत हद तक पुरुषों की शारीरिक, मानसिक और सामाजिक हेल्थ को संतुलित रखते हैं. जो लोग खुद को व्यस्त रखते हैं, वे तनाव और एकाकीपन से दूर रहते हैं, और मीनोपोज़ की स्टेज को आसानी से पार कर लेते हैं.

Mother’s Day 2024- बिनब्याही मां: नीलम की रातों की नींद क्यों हराम हो गई

सर्दी की खिलीखिली सी दोपहर में जैसे ही स्कूल की छुट्टी की घंटी बजी, मैं और मेरी सहेली सुजाता रोज की तरह स्कूल से बाहर आ गए. स्कूल के गेट के बाहर छोटेछोटे दुकानदारों ने अपनी अस्थायी दुकानें सड़क के किनारे, ठेले पर और साइकिल के पीछे लगे कैरियर पर बंधे लकड़ी के डब्बों में सजा रखी थीं, जिन में बच्चों को आकर्षित करने के लिए तरहतरह की टौफियां, चाट, सस्ती गेंदें व खिलौने के अलावा पेनकौपी भी थीं.

मैं ने एक साइकिल वाले से अपना पसंदीदा खट्टामीठा चूरन लिया और सुजाता के साथ रेलवे लाइन की ओर बढ़ गई. सुजाता बारबार मेरी ओर बेचैनी से देख रही थी, लेकिन कुछ बोल नहीं रही थी. रेलवे लाइन पार करने के बाद आखिरकार उस से रहा नहीं गया और उस ने मुझ से पूछा, “नीलम, सुना है, आज तेरी विकास से लड़ाई हो गई थी?”

“हां, तो उस में कौन सी नई बात है. अकसर होती है, पर बाद में दोस्ती भी तो हो जाती है,” मैं ने लापरवाही से चूरन की पुड़िया से उंगली में चूरन ले कर चाटते हुए कहा.

“बात तो कुछ नहीं, लेकिन मुझे पता चला कि उस ने तेरे हाथ पर काट भी लिया था,” उस ने बहुत रहस्यात्मक ढंग से कहा, तो मैं ने उस की ओर सवालिया निगाह से देखा और फिर अपने हाथ को देखा, जहां उस ने काटा था, अब तो वहां कोई निशान भी नहीं दिख रहा था.

“तो क्या हुआ? अब तो ठीक है सब. मैं ने भी उस के 2 बार काटा बदले में,” मैं ने शेखी बघारते हुए उसे बताया, जबकि मैं खुद डेढ़ पसली की थी. 10 साल की उम्र के हिसाब से मैं काफी दुबली थी, जबकि मेरी हमउम्र सहेलियां मुझ से बड़ी दिखती थीं.

मेरी सहेली ने बेचारगी से मेरी ओर देखा, “नीलम, लड़ाई तो होती है, पर विकास ने तुझे काटा, यह सही नहीं हुआ.”

“क्यों…?” अचानक मुझे लगा, शायद उसे मेरी चोट की चिंता हो रही है. आखिर मेरी पक्की सहेली जो थी वह.

“अरे बुद्धू, मुझे कुछ नहीं हुआ. देख, अब तो दिख तक नहीं रहा कि उस ने मुझे कहां पर काटा था,” हंसते हुए मैं ने अपना हाथ उस के सामने कर दिया.

सुजाता ने मेरा हाथ झटक दिया, “तुझे सच में नहीं पता क्या कुछ?”

मैं ने इनकार में सिर हिला दिया.

“तो सुन, मेरी बूआ ने बताया था कि अगर लड़का किसी लड़की को काट लेता है, तो उस के बच्चा हो जाता है. अब समझ आया कुछ,” सुजाता ने अपनी आंखें गोल करते हुए मुझ से कहा.

‘ हें… तू सच कह रही है क्या सुजाता?’ मेरी स्थिति तो सांप सूंघने जैसी हो गई. मैं अविश्वास से उसे देख रही थी, लेकिन उस ने दोबारा से वही बात कही. उस की बूआ ने उसे बताया है, तब तो यह बात सच ही होगी. बड़े लोग सब जानते हैं. मेरी आंखों में डर भर गया.

घर आ कर मैं बहुत बेचैन हो गई. मैं ने बस्ता एक तरफ रखा और कच्चे आंगन में पड़ी चारपाई पर बैठ गई.  ‘क्या करूं… मम्मी को बताऊं या नहीं. मेरी तो कोई गलती भी नहीं थी.’

मम्मीपापा मुझे और मेरे भाई को ज्यादा टीवी नहीं देखने देते थे, पर मैं ने कुछ फिल्में देखी थीं, जिन में से 1-2 में मैं ने देखा था कि बिनब्याही मां को कितना कुछ सहना पड़ता है. अड़ोसपड़ोस के लोग खूब ताने देते हैं.

मुझे बहुत डर लग रहा था कि पता चलने पर मम्मीपापा बहुत पिटाई करेंगे, कहीं घर से निकाल दिया तो मैं कहां जाऊंगी. किसी रिश्तेदार के घर गई तो वे भी कितने दिन रखेंगे और सच पता चलने पर धक्के मार कर मुझे निकाल देंगे.

“अरे, कब से स्कूल से आ कर बैठी है, कपड़े बदल कर रोटी खा ले, मुझे पड़ोस में कीर्तन में जाना है,” मम्मी की आवाज सुन कर मैं बेमन से उठी और हैंडपंप के पास भरी रखी बालटी से पानी ले कर हाथपैर धो कर अंदर जा कर स्कूल ड्रैस बदल कर नीली फ्राक पहन ली.

खाना खा कर मैं वापस चारपाई पर लेट गई. शाम को सुजाता खेलने के लिए बुलाने आई, लेकिन मुझे उदास देख कर वह मेरे पास बैठ गई.

“अब क्या होगा नीलम? मम्मी को बताया तू ने?”

“नहीं, हिम्मत ही नहीं हुई,” इतनी देर से रुके मेरे आंसू गालों पर लुढ़कने लगे.

“पर, बताना तो पड़ेगा, वरना जब तेरा पेट बड़ा होने लगेगा तब तो उन्हें पता चल ही जाएगा, फिर…?” सुजाता के कहने पर मैं और भी परेशान हो गई.

रात में मैं ने शीशे में खुद को ध्यान से देखा कि कहीं मेरा पेट निकलने तो नहीं लगा, लेकिन अभी तक तो सब ठीक था.

अगले दिन स्कूल में बेचैनी से मैं विकास के आने का इंतजार करने लगी. आखिर उसी के कारण तो मैं इस परेशानी में थी.

सुजाता ने मुझे बहुत सहानुभूति से देखते हुए मेरा हाथ पकड़ रखा था. इस समय मुझे वह अपनी सब से बड़ी शुभचिंतक लग रही थी.

क्लास में विकास के आते ही उस ने मेरा हाथ दबाया और आंखों ही आंखों में मुझे उस से बात करने का इशारा करती हुई अपनी क्लास में चली गई.

मैं विकास से बात करने के लिए आगे बढ़ी, तभी उस का कोई दोस्त आ गया और उसके बाद टीचर आ गईं.

इंटरवल में विकास को मैं ने इशारे से स्कूल के गार्डन में उस जगह बुलाया, जहां थोड़ा सुनसान था.

विकास के आते ही मैं ने गुस्से में उसे एक झापड़ मारा और कहा, “तुम ने मेरी जिंदगी बरबाद कर दी, मैं कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं बची,” इतना कह कर मैं रोने लगी. वह भी पलट कर मुझे थप्पड़ मारने वाला था, पर मुझे रोते देख कर वह रुक गया और चिल्ला कर बोला, “क्या बकवास कर रही हो?”

मैं ने उसे सारी बात बता दी. यह सुन कर वह भी सोच में पड़ गया. बोला, “अरे यार, अभी तो मैं खुद बच्चा हूं. कुछ कमाता भी नहीं हूं. मेरे घर वाले भी मुझे बहुत मारेंगे, अगर यह सब उन को पता चला. पर सच में अगर मुझे यह पता होता तो मैं तुझे नहीं काटता.” उसे बहुत अफसोस हो रहा था.

“एक बात बता, तू ने उस किट से टैस्ट किया क्या प्रेगनेंसी का? ”

“कैसी किट…? और मैं इसे कहां से लाऊंगी?”

“अरे यार, टीवी में कितना तो विज्ञापन आता है. तुम ने देखा नहीं क्या…?” विकास झल्ला गया. बोला, “किसी भी मैडिकल शाप पर मिल जाएगी.”

“हां. और जैसे मैं ले ही आऊंगी… सुनो विकास, तुम्हारे कारण मैं इस मुसीबत में पड़ी हूं, अब तुम्हें ही यह सब करना होगा.”

“ठीक है, मेरे दोस्त का भाई एक मैडिकल की दुकान पर काम करता है. मैं उन से कह दूंगा लाने को.”

“इस का मतलब यह कि तुम अपने दोस्त को भी यह बताओगे. सब को पता चल जाएगा, कितनी बदनामी होगी,” कहते हुए मैं फिर से रोने लगी.

“अरे यार, तू न ये रोनाधोना मत कर. कुछ भी कह दूंगा. वैसे भी ऐसे समय में खुश रहना चाहिए.”

मेरे कुछ पूछने से पहले ही वह मुंह बना कर बोला, “ऐसा टीवी में और फिल्मों में कहते सुना है मैं ने.”

“सुनो न , तुम अपने घर वालों से बात करो,” देखी गई फिल्मों के आधार पर मुझे शादी ही एकमात्र उपाय लग रही थी. हालांकि विकास का चपटी नाक वाला चेहरा मुझे बिलकुल पसंद नहीं था और ऊपर से उसे जब देखो तब जुकाम हो जाता था, लेकिन अभी और कोई चारा नहीं था.

खैर, हम दोनों इंटरवल खत्म होने की घंटी बजने तक यही बात करते रहे कि घर में कैसे क्या कहेंगे. फिर यह तय हुआ कि पहले एक बार किट ले कर टैस्ट कर लेते हैं. यदि रिपोर्ट पौजिटिव आती है, तो विकास अपने घर वालों से बात कर के उन को मेरे घर बात करने भेजेगा.

क्लास में आ कर मैं ने कविता को भी यह सब बता दिया था. उसे भी यही उपाय सही लगा.

स्कूल की छुट्टी के बाद जब मैं और कविता घर जा रहे थे, तभी विकास ने पीछे से आवाज दे कर रोका. मैं ने मुड़ कर देखा, तो वह भागता हुआ आ रहा था.

“सुनो, यह इमली लाया था मैं तुम्हारे लिए, टीवी में देखा है…” कहते हुए वह जितना शरमा रहा था, उस से कहीं ज्यादा मैं जमीन में गढ़ी जा रही थी. कविता ने कुहनी मार कर कहा, “देख, कितना ध्यान रख रहा है तेरा. अब ये तुझ से कभी नहीं लड़ेगा.”

घर आ कर मैं ने कागज में लिपटी इमली को खाने की कोशिश की, पर मेरी बिलकुल भी इच्छा नहीं हुई. वैसे भी मुझे इमली की जगह चूरन ज्यादा पसंद था, ‘लेकिन, टीवी में तो देखा है…’

दोपहर तक मेरी कल्पना डर में बदल गई कि कहीं किट की रिपोर्ट पौजिटिव आई तो क्या होगा. घर वालों को विकास के मम्मीपापा के आने पर सब पता तो चल ही जाएगा. अगर वे शादी के लिए नहीं माने तब क्या होगा? मेरी आंखों के आगे एक फिल्म का दृश्य आ गया, जहां एक लड़की  परिवार की इज्जत बचाने के लिए खुद को खत्म कर लेती है.

“नहीं… नहीं, मैं मरना नहीं चाहती,” घबरा कर मैं ने अपने दोनों हाथ अपनी आंखों पर रख लिए.

“कुछ भी हो, कैसी भी बात हो, अपने मम्मीपापा से नहीं छिपाना. वे बड़े हैं… नाराज हो सकते हैं, पर तुम्हें उस मुश्किल से भी वही निकालेंगे,” अचानक मेरे दिमाग में टीचर की बताई बात आ गई, जब वे क्लास में हम सभी से बातें कर रही थीं. मैं ने हिम्मत जुटाई और आखिरकार मम्मी को सब बताने का फैसला कर लिया.

“दादी, आप मेरे साथ जरा अंदर चलो न मम्मी के पास,” दादी की चिरौरी करते हुए मैं ने कहा.

“का हुई गवा…? कोउन्हों बदमासी की हो क्या?” दादी के झुर्रीदार गाल उन की मुसकान से भर गए.

“आप चलो तो सही,” मैं दादी की लाठी पकड़ कर उन को जबरदस्ती अंदर कमरे में ले आई, ताकि मम्मी की मार से दादी बचा सकें.

“मम्मी, मुझे कुछ कहना है. आप बैठ जाओ पहले,” मेरे कहने पर मम्मी हाथ का काम छोड़ कर कुरसी पर बैठ गईं. दादी पहले ही तख्त पर बैठ चुकी थीं.

थूक गटक कर अटकतेअटकते आंखें झुका कर मैं ने उन से कहा, “मुझे माफ कर दीजिए, मैं…” और फिर मैं ने सिर झुकाएझुकाए उन से अपनी बात कहनी शुरू की. उन की आंखों की चुभन मैं महसूस कर रही थी.

मेरी बात खत्म होने के पहले ही मम्मी और दादी आशा के विपरीत जोरजोर से हंसने लगीं, “तुझे किस ने बताया कि काटने से बच्चा हो जाता है.”

“होता है मम्मी, सुजाता की बुआ ने उसे बताया था,” मैं ने दादीमम्मी की बुद्धि पर तरस खाते हुए कहा.

“ऐसा कुछ नहीं होता. मेरे भी 2 बच्चे यानी तेरे पापा और बूआ हैं और तेरी मम्मी की भी 3 बेटियां हैं.”

“काटने से नहीं होते तो कैसे होते हैं?” मैं समझ ही नहीं पा रही थी.

“बड़ी हो कर जान जाओगी. जाओ खेलो,” मम्मी ने हंसते हुए कहा, तो मेरी जान में जान आई. ‘यानी, सब ठीक है. कल बताऊंगी इस सुजाता की बच्ची को.’

मैं खुश थी कि अब विकास से मुझे शादी नहीं करनी पड़ेगी और मुझे यकीन था कि वह भी मुझ से शादी नहीं करना चाहता होगा.

‘पर काटने से बच्चे नहीं होते तो फिर…?’ सवाल अब भी अनुत्तरित था.

Summer Special: गरमी में टैनिंग को कहें बाय-बाय

गरमी आते ही स्किन का ख्याल रखना सबसे मुश्किल हो जाता है. चाहे वह धूप में स्किन की रेडनेस, इचिंग हो या सबसे ज्यादा पर्सनेलिटी पर असर डालने वाली टैनिंग हो. टैनिंग का जितना असर हमारी स्किन पर पड़ता है, उतना ही असर डेली लाइफस्टाइल पर भी पड़ता है. वहीं कईं बार गलत लोशन भी टैनिंग का कारण बन जाते हैं. इसीलिए आज हम आपको समर में कैसे होममेड तरीकों से जल्दी टैनिंग को कैसे दूर करें, इसकी कुछ टिप्स बताएंगे.

1. टैनिंग के लिए करें नींबू के रस का इस्तेमाल

एक नींबू को काटकर अपनी टैन स्किन पर रगड़ें, और कुछ मिनट बाद इसे धो दें.

2. खीरे और नींबू के रस और रोज वौटर का करें इस्तेमाल

एक कटोरी में तीनों को बराबर मात्रा में मिलाएं और इसे अपनी टैन स्किन पर सौफ्ट तरीके से कुछ देर लगाकर धो दें.

3. बेसन और हल्दी का कौम्बिनेशन करें इस्तेमाल

थोड़ी सी हल्दी में दो बड़े चम्मच बेसन, दूध और एक बड़ा चम्मच गुलाब जल मिलाएं और टैन स्किन पर 15-20 मिनट लगाने के बाद धो लें.

4. मसूर, टमाटर और एलो का करें इस्तेमाल

एक चम्मच मसूर दाल को पानी में भिगोकर पेस्ट बना लें. इसमें एलो और टमाटर का पेस्ट बराबर मात्रा में मिलाएं. अपने चेहरे और बौडी के टैनिंग वाले हिस्सों पर लगाएं और इसे 30 मिनट तक लगाएं और फिर ठंडे पानी से धो दें.

5. हनी और पपीता का करें इस्तेमाल

एक चम्मच शहद के साथ आधा कप पपीते को मैश करें और टैनिंग वाले हिस्सों पर लगाएं. 30 मिनट बाद इसे छोड़कर ठंडे पानी से धो लें.

6. ओट मील और छाछ का कौम्बिनेशन करें ट्राई

3 बड़े चम्मच छाछ में 2 बड़े चम्मच ओटमील यानी दलिया मिलाएं. टैनिंग वाले हिस्सों पर मालिश करें और धो दें.

7. दही और टमाटर के पेस्ट का करें इस्तेमाल

दही और टमाटर के पेस्ट को मिलाएं और टैनिंग वाले हिस्सों पर लगाएं. 30 मिनट बाद इसे छोड़कर ठंडे पानी से धो लें.

8. औरेंज जूस और दही का करें इस्तेमाल

दही में एक बड़ा चम्मच संतरे का रस मिलाएं और टैन्ड हिस्सों पर लगाएं. और आधे घंटे के लिए छोड़कर पानी से धो दें.

9. दूध क्रीम और स्ट्रौबेरी का करें इस्तेमाल

दूध क्रीम के दो बड़े चम्मच में 5 स्ट्रौबेरी को मैश करें. इसे सौफ्ट तरीके से टैन हिस्सों पर लगाएं और आधे घंटे के लिए छोड़कर धो दें.

10. आलू और नींबू का रस टैनिंग के लिए करें इस्तेमाल

एक मध्यम आलू से रस लें और इसे एक चम्मच नींबू के रस के साथ मिलाएं. और 30 मिनट बाद धो लें.

चुटकी भर सिंदूर-भाग 2 : सुचेता को मायके में क्या दिक्कत हुई ?

सुचेता का अतीत बहुत कठोर था. वह उसे कभी नहीं याद करती थी, पर आज न चाहते हुए भी वह अतीत की लहरों में गोते लगाने लगी थी.

उस लड़के से सुचेता की मुलाकात कालेज कैंपस में हुई थी. एकलव्य शुक्ला नाम था उस का. सामान्य सा दिखने वाला एकलव्य फाइन आर्ट की पढ़ाई कर रहा था. कला में उस की गहरी रुचि थी. उस की यही रुचि अपने को और भी तब दिखाई देती, जब विश्वविद्यालय में कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम होना होता. स्टेज की सजावट से ले कर मुख्य द्वार तक सारी सजावट का जिम्मा एकलव्य के कंधों पर ही तो होता था और एकलव्य को तो जैसे जिम्मेदारियां ओढ़ने और उन्हें निभाने में आनंद आता था. वह बखूबी अपनी जिम्मेदारियां निभाता, इसीलिए सभी प्रोफैसर और लड़कियां उसे बहुत पसंद करते थे.

सुचेता को लेखन का शौक तो था और वह किताबों और समाचारपत्रों में आर्टिकल्स आदि लिखा भी करती थी, पर उसे मूर्ति या चित्रकला में अधिक रुचि नहीं थी.

“पता नहीं, अब इस पत्थर की मूर्ति में क्या अच्छा लगता है लोगों को? न तो इस का कहीं सिर है और न ही पैर. बस, लोग अपने को अलग और मौडर्न दिखाने को कुछ भी पसंद करते हैं. कागज पर किसी भी तरह के फैले हुए रंग को पेंटिंग कहने लगते हैं,” सुचेता ने कैंपस के बीचोंबीच एक मूर्ति को देखते हुए कहा, तो पीछे खड़ा हुआ एकलव्य हंस पड़ा था और हंस कर खुद ही मूर्तिकला की विशेषताएं सुचेता को बताने लगा था.

सुचेता एकलव्य के हावभाव को बड़े ही गौर से देख रही थी, कितनी लगन और सचाई दिख रही थी एकलव्य की बातों में, जैसे मूर्तिकला के बारे में सबकुछ उसे आज ही बता देना चाहता हो.

ये पहली मुलाकात थी उन दोनों की. सुचेता भी बिना इंप्रैस हुए नहीं रह सकी थी.

एक दिन सुचेता अपनी सहेलियों के साथ टैगोर लाइब्रेरी के बाहर वाले लौन में घास पर बैठी हुई नाश्ता कर रही थी कि अचानक से वहां पर एकलव्य पहुंच गया और बड़ी ही बेपरवाही से सुचेता के टिफिन से एक निवाला निकाल कर खाने लगा. ये देख कर सुचेता बुरी तरह चौंक गई, क्योंकि वह जाति से लोहार थी, जबकि एकलव्य ब्राह्मण था, पर एकलव्य को उस की जाति से कुछ लेनादेना नहीं था, क्योंकि वह तो सुचेता से सच्चा प्रेम कर बैठा था और सच्चा प्रेम कभी जातिधर्म नहीं देखता. यह सब देखने और जातियों के बाबत निर्णय देने के लिए समाज तो है ही.

एकलव्य के इसी अंदाज ने सुचेता को और भी आकर्षित कर लिया था. उन की इस पसंद को प्रेम में बदलते देर नहीं लगी और अन्य प्रेमियों की तरह एकलव्य और सुचेता को भी अपने प्रेम को विवाह में बदलने की शीघ्रता होने लगी. पर उन्हें पता था कि उन के बीच आर्थिक और जातीय मान्यताओं को मानने वाला रूढ़िवादी समाज का अभेद किला है, जिसे गिराना इतना आसान नहीं होगा.

और इसी समाज की दुहाई एकलव्य के पिताजी ने उसे दी और दोनों परिवारों के बीच का आर्थिक अंतर भी समझाया. जाति की लोहार सुचेता से शादी करने को मना कर दिया.

एकलव्य के पिता का कपड़े का कारोबार था और एकलव्य अभी आर्थिक रूप से स्वतंत्र न था, इसलिए पिताजी का विरोध नहीं कर सका. अपने ही प्रेम का डैम तोड़ते हुए देखा था एकलव्य ने.

सुचेता के पिताजी रिटायर हो चुके थे और जल्द से जल्द बेटी की जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहते थे, इसलिए उन्होंने सुचेता पर शादी करने का दबाव डाला.

आज शायद सुचेता की मां जिंदा होती तो अपने मन का दुख वह उन से कह लेती, पर पिताजी से वह अपने प्रेम के बारे में क्या कहे?

सुचेता जान चुकी थी कि वह एक लोहार परिवार से होने के नाते ब्राह्मण परिवार की बहू तो नहीं बन सकती, इसलिए अनमने मन से ही सही, पर उस ने भी शादी के लिए हां कर दी.

आज एकलव्य और सुचेता ने आखिरी मुलाकात की.

“जिसे सब से अधिक चाहा जाए, जब वह ही हासिल न हो तो जीने से क्या लाभ?” निराश थी सुचेता.

एकलव्य भी टूटा हुआ था, पर वह जानता था कि उसे कमजोर नहीं पड़ना है, नहीं तो सुचेता और भी टूट जाएगी, इसलिए उस ने सुचेता को समझाने का प्रयास किया और उस पर भले ही इमोशंस हावी थे, पर वह भी जीवन की सचाई जानती तो थी ही. अतः उन दोनों ने मुसकरा कर भारी मन से विदा ली.

जाते समय एकलव्य ने कहा कि चूंकि उस के पिता का बिजनैस इसी शहर में है. अतः जब भी वह मायके से आए, तब उस से मुलाकात जरूर करे. पर सुचेता ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया.

“अब तुम मेरे हृदय की धड़कन बन चुके हो, जो हर पल तुम्हारे शरीर में रहती है, पर धड़कन से प्रत्यक्ष मिलना नहीं हो पाता और वैसे भी मुझे भारतीय नारी के पतिव्रत धर्म का पालन भी तो करना है. अतः शादी के बाद तुम से मिलना ठीक नहीं होगा,” ये बात कठोर जरूर थी, पर सुचेता ने जानबूझ कर ऐसे नाटकीय अंदाज में कही कि माहौल हलकाफुलका हो गया.

सुचेता ने एकलव्य के सामने ही उस का मोबाइल नंबर भी डिलीट कर दिया.

 

बेमतलब होते हैं राजनीतिक दलों के घोषणा पत्र

आजादी के बाद देश में 1952 से चुनाव हो रहे हैं. सभी राजनीतिक दल अपनेअपने घोषणापत्रों के माध्यम से अपनी विचारधाराओं, नीतियों व कार्यक्रमों को मतदाताओं के सामने पेश करते चले आ रहे हैं. इस के लिए कोई खास आयोजन नहीं होता था. पार्टी की एक मीटिंग में चुनावी प्रस्ताव पेश किया जाता था, जिसे ले कर दल में चर्चा होती थी.

उदाहरण के लिए जब भाजपा ने राम मंदिर को अपने एजेंडे में शामिल किया तो पहली बार कोई घोषणापत्र नहीं बनाया था. हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में पालमपुर नामक जगह है. साल 1989 में 9, 10 और 11 जून को भाजपा का अधिवेशन वहां हुआ था. भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी की अगुआई में हुई. उस में अटल बिहारी वाजपेयी से ले कर विजयाराजे सिंधिया और शांता कुमार समेत पार्टी के तमाम बड़े नेता मौजूद थे.

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उस बैठक में पहली बार अयोध्या में राम मंदिर बनाने का प्रस्ताव पास हुआ, जिसे पालमपुर प्रस्ताव के नाम से भी जानते हैं. बैठक के बाद 11 जून, 1989 को पालमपुर में एक जनसभा हुई जिस का मंच संचालन बीजेपी के पूर्व विधायक राधारमण शास्त्री कर रहे थे. वे हिमांचल प्रदेश के पूर्व शिक्षा मंत्री और पूर्व विधानसभा स्पीकर रहे हैं. भाजपा ही नहीं, कांग्रेस और दूसरे दल भी अपने घोषणापत्र बेहद सरल तरह से कम शब्दों में तैयार करते थे. ये किसी इवैंट की तरह से जनता के सामने पेश नहीं किए जाते थे.
1995 के बाद जब देश में गठबंधन की सरकारों का दौर शुरू हुआ, तब से घोषणापत्र बनने लगे थे. उस में भी गठबंधन में शामिल सभी दल अपनीअपनी नीतियों वाले घोषणापत्र बनाने लगे, साथ ही, घटक दलों का एक कौमन एजेंडा वाला प्रोग्राम भी बनने लगा जिस में विवादित मुददों को छोड़ना पड़ता था. जैसे 1999 में जब भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी राजग यानी एनडीए गठबंधन से प्रधानमंत्री बने तो राम मंदिर जैसे विवादित मुददे को दूर रखा था.

घोषणापत्र नहीं लुभावने वादे

2004 के लोकसभा चुनावों में पहली बार भाजपा की अगुआई वाले राजग और कांग्रेस की अगुआई वाले यूपीए ने अपनेअपने घोषणापत्र जारी किए. यूपीए ने ‘मनरेगा’ जैसा वादा किया और उस को पूरा किया, जिस से यूपीए सत्ता में आई और 10 साल सत्ता में रही. इस के बाद केवल लोकसभा चुनाव ही नहीं, विधानसभा चुनावों में भी घोषणापत्र जारी होने लगे.

2012 में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी विपक्ष में थी. विधानसभा चुनाव के समय उस ने अपने युवाओं को लुभाने के लिए खास किस्म की बात अपने घोषणापत्र में कही कि 2012 के बाद जिन युवाओं ने हाईस्कूल पास किए उन को टेबलेट और जिन्होंने ने 12वीं पास की उन को लैपटौप दिया जाएगा. बेरोजगारों को 1 हजार रुपए प्रतिमाह का बेरोजगारी भत्ता दिया जाएगा.

यह वह दौर था जब टेबलेट, लैपटौप और बेरोजगारी भत्ता पाने के लिए होड़ लग गई. समाजवादी पार्टी का जब से गठन हुआ, उस की 2 बार मिलीजुली सरकार बन चुकी थी. उस की बहुमत की सरकार कभी नहीं बनी थी. 2012 के चुनावी घोषणापत्र का असर यह हुआ कि पहली बार सपा की उत्तर प्रदेश में बहुमत की सरकार बन गई.
सरकार बनने के बाद समाजवादी पार्टी अपने वादे पूरे नहीं कर पाई. वह कुछ छात्रों को केवल लैपटौप ही दे पाई. जनता ने घोषणापत्र में लुभावने वादों के सच को समझ लिया. सपा मतदाताओं की नजर से उतर गई. इस के बाद 2022 तक किसी चुनाव में उस को सरकार बनाने लायक जीत हासिल नहीं हो पाई.

इस के बाद से घोषणापत्रों का असली जलवा व जलाल 2014 के लोकसभा चुनाव में देखने को मिला. यह वोट के लिए मतदाताओं को लुभावने का जरिया बन गया. जनता को यह देखसमझ कर वोट करना चाहिए कि जो वादे घोषणापत्र में किए जा रहे हैं वे पूरे होने लायक हैं भी या नहीं.

लोकलुभावने वादों में फंसती जनता

दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने फ्री बिजली और फ्री पानी को ले कर जो वादे किए उन को सरकार बनने के बाद पूरे किए. इस का असर यह हुआ कि आम आदमी पार्टी लगातार वहां विधानसभा चुनाव जीत रही है. उस का दिल्ली मौडल देख कर जनता ने पंजाब में भी उस की सरकार बनवा दी. दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी ने देश की पुरानी व बड़ी पार्टियों को सत्ता से बाहर कर दिया.

2014 में जब केंद्र में मोदी सरकार बनी तो उसे भी यही समझ आया कि लोकलुभावने वादे करो. जनता को मुफ्त रेवड़ी कल्चर में फंसा दिया. इस में सुप्रीम कोर्ट तक को कहना पड़ा कि यह ठीक नहीं है. इस के बाद भी यह काम जारी है. कोरोनाकाल में 80 करोड लोगों को ‘मुफ्त राशन’ की चली योजना सालदरसाल आगे बढ़ती जा रही है.
2024 के जून तक यह पूरे देश में लागू है. कोरोनाकाल के बाद जो भी चुनाव हुए, केंद्र सरकार ने ‘मुफ्त राशन’ को मुददा बनाया. इस को जारी रखा. भाजपा की जीत में यह बड़ा सहायक है.

सरकारी योजनाओं के सहारे भाजपा ने जनता में एक अलग ‘लाभार्थी वर्ग’ तैयार कर लिया है. इस को अलग सैक्टर में रख कर काम होता है. यह भाजपा का एक बड़ा वोटबैंक हो गया है. इस की पैठ गहरी है. यह वोट देता है. इस को लगता है कि भाजपा सत्ता में नहीं आएगी तो उस को इन योजनाओं का लाभ नहीं मिलेगा. किसान सम्मान निधि भी इसी तरह की एक योजना है. जनता को यह समझ ही नहीं आ रहा कि यह पैसा उस से ही टैक्स के माध्यम से लिया जा रहा है. इस वजह से ही महंगाई बढ़ रही है.

जांचपरख कर कीजिए घोषणापत्रों पर भरोसा

जमाना प्रचार का है. कहते हैं कि अगर आप को अपना प्रोडक्ट बेचना आता है तो खराब से खराब सामान भी बिक जा रहा है. किसी क्रीम के लगाने से आप गोरे नहीं हो सकते लेकिन गोरा करने की क्रीम सब से ज्यादा बिकती है. बेचना आता है तो गंजे को भी कंघा बेचा जा सकता है.

भाजपा ने अपने घोषणापत्र में 24 गारंटियां दी हैं जिन में सभी को स्वास्थ्य बीमा, सीमापार घुसपैठ पर नकेल, बुलेट ट्रेनों का संचालन, सभी के लिए बीमा योजना और सभी को पक्का घर देने का वादा आदि प्रमुख हैं.

गरीब परिवारों की सेवा की गारंटी, मध्यवर्ग को गारंटी, नारीशक्ति के सशक्तीकरण की गारंटी, युवाओं को अवसर की गारंटी, वरिष्ठ नागरिकों को वरीयता की गारंटी, किसानों को सम्मान की गारंटी, मतस्यपालकों को गारंटी, श्रमिकों को सम्मान की गारंटी, एमएसएमई, छोटे व्यपारियों के सशक्तीकरण की गारंटी, सब का साथ सब का विकास की गारंटी, विश्वबंधु भारत की गारंटी, सुरक्षित भारत की गारंटी, समृद्ध भारत की गारंटी, देश को ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग का हब बनाने की गारंटी, विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर की गारंटी, ईज औफ लिविंग की गारंटी, विरासत भी विकास भी की गारंटी, सुशासन की गारंटी, स्वस्थ भारत की गारंटी, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की गारंटी, खेल के विकास की गारंटी, तकनीक और नवाचार की गारंटी, पर्यावरण अनुकूल भारत की गारंटी दी गई हैं.

भाजपा ने 80 करोड़ परिवारों को 5 और साल मुफ्त राशन स्कीम का फायदा देने की बात कही है. 70 साल से ज्यादा के सभी बुजुर्गों को आयुष्मान योजना में लाने का वादा किया गया है. साथ ही, ट्रांसजैंडर्स को भी इस योजना के दायरे में लाया जाएगा. हर गरीब को पक्का घर देने की योजना जारी रहेगी. अब तक 4 करोड़ घर बनाए गए हैं और आने वाले दिनों में 3 करोड़ घर और बनाए जाएंगे. अभी सस्ते सिलैंडर घरघर पहुंचाए हैं, अब पाइप से सस्ती रसोईगैस घरघर भेजी जाएगी. अब यहां देखने वाली बात यह है कि कितने लोगों को सस्ती रसोईगैस मिल रही है. 2014 में जो रसोईगैस 500 रुपए में थी वह 1,000 रुपए की हो गई है.

इस के साथ ही साथ भाजपा ने एक देश, एक चुनाव और समान नागरिक संहिता लागू करने की संभावनाएं तलाशने की भी बात कही है. भाजपा ने पूरे देश में वंदेभारत ट्रेनों का विस्तार करने का वादा किया है. वंदेभारत ट्रेनों के 3 मौडल देश में संचालित होंगे जिन में वंदेभारत स्लीपर, वंदेभारत चेयरकार और वंदेभारत मेट्रो शामिल होंगी.
इस तरह की ट्रेनों के चलने से गरीबों की पैसेंजर ट्रेनें खत्म की जा रही हैं. सामान्य ट्रेन के किराए और इन ट्रेन के किराए में 4 गुना का अंतर है. लोकलुभावनी योजनाओं के पीछे छिपे बाजार को भी देखने का काम करें. अच्छी सड़कें बनी हैं लेकिन टोल टैक्स ने उन पर चलना महंगा कर दिया है. 80 करोड़ मुफ्त राशन लेने वाले क्या इन सड़कों पर चल सकते हैं.

कांग्रेस ने भी लोकसभा चुनाव के लिए अपना घोषणापत्र जारी किया है जिस में उस ने 10 न्याय और 25 गारंटियां देने का ऐलान किया है. इन में युवा न्याय, हिस्सेदारी न्याय, नारी न्याय, किसान न्याय, श्रमिक न्याय, संविधानिक न्याय, आर्थिक न्याय, राज्य न्याय, रक्षा न्याय, पर्यावरण न्याय शामिल हैं. 10 बड़ी बातों के जरिए कांग्रेस के घोषणापत्र को समझते हैं.

कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में राष्ट्रव्यापी आर्थिक-सामाजिक न्याय, जनगणना का ऐलान किया. साथ ही, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग व गरीब सामान्य वर्ग को मिलने वाले आरक्षण की सीमा को 50 फीसदी से बढ़ाने का वादा किया.

कांग्रेस ने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के अनुसार सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी गारंटी देने का भी ऐलान किया है. कांग्रेस ने पहली नौकरी गारंटी देने के लिए अप्रेंटिस एक्ट 1961 को हटा कर अप्रेंटिसशिप अधिकार अधिनियम लाने का ऐलान किया जिस के तहत 25 साल से कम उम्र के प्रत्येक डिप्लोमाधारक या कालेज स्नातक को निजी या सरकारी कंपनी में एक साल की ट्रेनिंग दी जाएगी. कानून के तहत प्रशिक्षु को एक लाख रुपए प्रतिवर्ष का मानदेय भी दिया जाएगा.
नौकरी की परीक्षाओं के पेपरलीक मामलों के निबटारे के लिए फास्ट ट्रैक अदालतों के गठन और पीड़ितों को आर्थिक मुआवजा देने का भी वादा किया गया है. साथ ही, केंद्र सरकार में विभिन्न स्तरों पर स्वीकृत करीब 30 लाख रिक्त पद भरे जाएंगे.

प्रत्येक गरीब भारतीय परिवार को बिना शर्त नकद हस्तांतरण के रूप में एक लाख रुपए प्रतिवर्ष देने के लिए महालक्ष्मी योजना शुरू करने का संकल्प लिया गया है.
2025 से केंद्र सरकार की 50 प्रतिशत नौकरियां महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएंगी. साथ ही, महिलाओं के लिए समान काम, समान वेतन के सिद्धांत को लागू किया जाएगा. 2025 से महिलाओं को विधानसभाओं में एकतिहाई आरक्षण दिया जाएगा. सरकारी स्कूलों में कक्षा 1 से ले कर कक्षा 12 तक शिक्षा निशुल्क और अनिवार्य बनाने के लिए शिक्षा का अधिकार कानून को संशोधित किया जाएगा.

कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में संविधान की दसवीं अनुसूची में संशोधन कर दलबदल करने वाले विधायकों व सांसदों की सदस्यता स्वतः समाप्त होने का प्रावधान शामिल करेगी. पुलिस, जांच और खुफिया एजेंसियां सख्त कानून के अनुसार काम करेंगी. कांग्रेस के घोषणापत्र में कहा गया कि जिन बेलगाम शक्तियों का अभी वे प्रयोग कर रही हैं, उन्हें कम किया जाएगा. उन्हें संसद या राज्य विधानमंडलों की निगरानी में लाया जाएगा. घोषणापत्र में कानून को शस्त्र बना कर उपयोग करना, मनमानी तलाशी, जब्ती और कुर्की, मनमानी गिरफ्तारियां, लंबी हिरासत, हिरासत में मौतों और बुलडोजर न्याय को समाप्त करने का वादा भी किया गया है.

दोनो ही दलों ने अपनेअपने घोषणापत्रों में लुभावनी बातें की हैं. ये मार्केटिंग से प्रेरित हैं. दिक्कत की बात यह है कि मतदाता न तो इन को पढ़ता है न देखता है. वह इन खबरों को पढ़ कर अपना मोटामोटा नजरिया बना लेता है. जिस के लिए यह घोषणापत्र बनता है उस के किसी मतलब का न होने के कारण ही यह बेमतलब हो जाता है.
राजनीतिक दल भी जरूरी नहीं कि इस का पूरा पालन करते हैं. वे सरकार बनने के बाद चुनावी घोषणापत्र के हिसाब से काम नहीं करते हैं. कभी किसी घोषणापत्र में पिछले की तुलना नहीं होती कि कितना काम इस के अनुसार किया था. मतदाता को वोट देते समय जागरूक होना चाहिए. किसी बात के दबाव या लालच में आ कर वोट नहीं देना चाहिए.

खाद और बीज पर जीएसटी खत्म करने का कांग्रेसी वादा, क्या किसानों का भरोसा जीत पाएगा

सैकड़ों बरस पहले चाणक्य ने अर्थशास्त्र में बताया था कि राजा को इस तरह ‘टैक्स’ लेना चाहिए कि सामने वाले को पता ही न चले. मगर भारत में नरेंद्र दामोदरदास मोदी की सरकार जब सत्तारूढ़ हुई और जीएसटी लाया गया तो देश के किसानों की कमर पर पांव रख कर खाद और बीज पर जीएसटी लगा दिया गया. यह जजिया कर की याद दिलाता है जिसे गब्बर सिंह टैक्स भी कहा गया है.

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दरअसल, एक तरफ तो आप बड़ीबड़ी बातें करते हैं, 56 इंच के सीने की बात करते हैं और दिल की जगह मानो आप के पास एक तिल है. देश में जीएसटी टैक्स को ले कर जो त्राहित्राहि मची वह अब अपने रंग लोकसभा 2024 के चुनाव में दिखाने जा रहा है. किसानों के इस दर्द को संभवतया कांग्रेस पार्टी ने महसूस किया और अपने घोषणापत्र में राहत देने की बात कही है.

‘हाथ बदलेगा हालात’ के चुनावी नारे के साथ मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस लोकसभा चुनाव मैदान में है. किसान आंदोलन की बानगी देश देख रहा है. किसानों के विरोध के स्वर की गूंज देश के हर कोने में, संसद के गलियारों तक में गूंज रही थी मगर नरेंद्र मोदी सरकार ने मानो आंख, कान‌ और मुंह बंद कर लिया.
विपक्ष के रूप में कांग्रेस ने किसानों के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया है. कांग्रेस पहले ही एमएसपी की गारंटी का ऐलान कर चुकी है. अब कांग्रेस पार्टी अपने पिटारे से नया कार्ड ले कर आई है जिस में कांग्रेस ने सत्ता में आने पर खादबीज को जीएसटी के दायरे से बाहर करने ऐलान कर दिया है जो भारतीय जनता पार्टी को भारी पड़ सकता है.
देश की नब्ज को समझने वाले राजनीति के विश्लेषकों का मानना है कि इस का सीधा असर लोकसभा चुनाव पर होगा. पार्टी की चुनावी रणनीति और किसानों के प्रति संवेदनशीलता का परिचय देते हुए कांग्रेस नेता जयराम रमेश का दावा है कि पार्टी की गारंटी को घरघर वितरित किया जा रहा है. अब तक 8 करोड़ प्रतियों के अलावा पार्टी ने एक करोड़ लोगों को डिजिटल रूप से भी अपनी 5 न्याय, 25 गारंटी को भेज दिया है.

इस संदर्भ में महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि कांग्रेस की सोशल मीडिया टीम ने एक रोचक वीडियो तैयार किया है. इस वीडियो में ट्रैक्टर पर सवार एक युवा गांव के बुजुर्गों से बातचीत में कांग्रेस के कार्यकाल में किसानों के लिए माफ किए गए कर्ज को बताते हुए आगामी चुनाव में कांग्रेस को समर्थन देने की बात कर रहा है.
वीडियो में कांग्रेस पार्टी ने यह भी दावा किया है कि कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में करीब 75 हजार करोड़ का किसान कर्ज माफ किया गया था. इस के अतिरिक्त अगरचे इस दफा कांग्रेस की सरकार केंद्र में सत्तारूढ़ होती है तो खाद व बीज को जीएसटी के दायरे से बाहर किया जाएगा.

इस से पहले सोशल मीडिया के माध्यम से राहुल गांधी भी सीधे आम जनता से जुड़े थे और उन के ईमेल पर आ रहे सुझावों पर जनता से बातचीत करते और उस के सुझावों को बारीकी से समझते नजर आए थे.

राहुल गांधी ने ‘एक्स’ पर लिखा, “एमएसपी कानून, जीएसटीमुक्त खेती और अपना कर्ज माफ कराने के लिए किसान देगा कांग्रेस का साथ, अब हाथ बदलेगा हालात.”
इस से पहले भी कांग्रेस नेता राहुल गांधी की यह सीधी बात सोशल मीडिया पर काफी चर्चित रही है और युवा इस पहल को पंसद कर रहे हैं. अब कांग्रेस अपने प्रचार की यह अगली किश्त ले कर आई है जिस का असर देशभर में देखने को मिल रहा है क्योंकि इस से किसान खुश हुआ है कि कोई तो है जो उस के दर्द और पीड़ा को समझ रहा है.

विचारणीय तथ्य यह है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने आखिर क्या सोच कर किसानों पर खाद और बीज जैसे महत्त्वपूर्ण मसले को जीएसटी के दायरे में रखा है. अगर यह देश किसानों का माना जाता है तो किसानों के साथ ऐसा असंवेदनशीलता का व्यवहार क्यों? क्या किसानों को नाराज कर के नरेंद्र मोदी सरकार और देश चला सकते हैं? यह एक ऐसा प्रश्न है जो हर मतदाता को सोचने पर मजबूर कर सकता है.

अनंतनाग लोकसभा सीट पर महबूबा मुफ्ती को मिल सकता है त्रिकोणीय मुकाबले का फायदा

सिर्फ एक कदम गलत उठा था राह ए शौक में, मंजिल तमाम उम्र मुझे ढूंढती रही. अपने दौर के मशहूर शायर अब्दुल हमीद कदम की गजल का यह एक शेर महबूबा मुफ्ती की न केवल व्यक्तिगत बल्कि सियासी जिंदगी पर भी फिट बैठता है. पीपुल्स डैमोक्रेटिक पार्टी की मुखिया महबूबा मुफ्ती जम्मूकश्मीर की अनंतनाग सीट से चुनाव मैदान में हैं. सामने हैं गुजरे दौर के दिग्गज कांग्रेसी और ताजीताजी बनी डैमोक्रेटिक प्रगतिशील आजाद पार्टी के संस्थापक व अध्यक्ष गुलाम नबी आजाद और मुकाबले को दिलचस्प व कठिन बना रहे हैं नैशनल कौंफ्रैंस के मियां अल्ताफ जिन का नाम भी जम्मूकश्मीर में किसी पहचान का मुहताज नहीं. तमाम हालात के मद्देनजर और मौजूदा समीकरण देखते वोटर के लिए ही यह फैसला कर पाना कठिन है कि जीतेगा कौन.

आने वाली 22 मई को 65 साल की होने जा रहीं महबूबा जम्मूकश्मीर की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं. किसी भी भारतीय राज्य की दूसरी मुसलिम महिला मुख्यमंत्री होने का श्रेय उन्हें 2016 में मिला था. पहली महिला मुसलिम मुख्यमंत्री 1980 में कांग्रेस की तरफ से असम की सैयदा अनवरा तैमूर बनी थीं लेकिन उन के मुकाबले महबूबा का जम्मूकश्मीर का मुख्यमंत्री बन जाना आसान था क्योंकि उन के पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद भी इसी राज्य के मुख्यमंत्री रहे थे. वे देश के पहले मुसलिम गृहमंत्री भी बने थे. यह मौका उन्हें वी पी सिंह सरकार में मिला था.

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मुफ्ती मोहम्मद ने नैशनल कौंफ्रैंस छोड़ कर कांग्रेस जौइन कर ली थी. 1986 में राजीव गांधी ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया था लेकिन 1989 में वे कांग्रेस छोड़ कर वी पी सिंह के साथ उन के जनमोरचा में हो लिए थे. इस के बाद नरसिम्हा राव के वक्त में वे फिर कांग्रेस में आ गए थे. पर 1999 में उन्होंने खुद की पार्टी बना ली थी जिस की जिम्मेदारी अब महबूबा के कंधों पर है.
तो महबूबा को राजनीति में जमने के लिए खास जद्दोजेहद नहीं करना पड़ी थी लेकिन पिता की मौत के बाद उन्हें समझ आया था कि राजनीति और वह भी जम्मूकश्मीर जैसे विवादित व संवेदनशील राज्य की कर पाना कोई हंसीखेल नहीं है. खासतौर से तब जब आप का मुकाबला और सामना 94 साल पुरानी नैशनल कौंफ्रैंस के मुखिया फारूख अब्दुल्ला व उन के बेटे उमर अब्दुल्ला से हो.

साल 2016 में महबूबा अपने मरहूम पिता की जगह भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री तो बन गई थीं लेकिन यह बेमेल गठबंधन ज्यादा चल नहीं पाया. क्योंकि भाजपा का मकसद तब महबूबा को सहारा दे कर जम्मूकश्मीर में अनुच्छेद 370 को खत्म कर देने के बाद हालात क्या होंगे, यह आंकना था. यही वह गलत सियासी कदम था जिस की भरपाई महबूबा अब अनंतनाग लोकसभा सीट से जीत कर करना चाहती हैं.
लेकिन यह 2014 जैसा आसान नहीं रह गया है जब इसी सीट से उन्होंने नैशनल कौंफ्रैंस के दमदार नेता महबूब बेग को 65,417 वोटों से शिकस्त दी थी. इस चुनाव में भाजपा के मुश्ताक अहमद मलिक को मिले 4,720 वोटों ने जता दिया था कि 98 फीसदी से भी ज्यादा मुसलमानों वाले अनंतनाग में भाजपा के लिए कोई स्पेस नहीं है.

अनंतनाग सीट पर 2019 का चुनाव भी बड़ा दिलचस्प था जिस में महबूबा तीसरे स्थान पर खिसक गई थीं. तब नैशनल कौंफ्रैंस के हसनैन मसूदी ने कांग्रेस के गुलाम अहमद मीर को कोई 7 हजार वोटों के अंतर से हराया था. इस चुनाव में मतदान बेहद कम हुआ था. इस के बाद भी महबूबा 24 फीसदी वोट ले जाने में कामयाब हो गई थीं. भाजपा के सोफी यूसुफ 10 हजार से कुछ ज्यादा वोट ले जाने में कामयाब रहे थे.
बहुत पहले अनंतनाग का नाम इसलामाबाद हुआ करता था. इसे मौजूदा हिंदू नाम देने का श्रेय सर मार्क ओरल स्टील नाम के ब्रिटिश पुरातत्वविद को जाता है जो अविभाजित भारत के लाहौर के ओरिएंटल कालेज में प्रिंसिपल भी रहे थे.
इसलामाबाद के अनंतनाग हो जाने से वहां की मुसलमानियत या कश्मीरियत पर कोई फर्क नहीं पड़ा. आजादी के बाद से सत्ता कांग्रेस, पीडीपी और नेकां के इर्दगिर्द घूमती रही. पीडीपी बनने के बाद मुसलिम वोटों का एक दावेदार और भागीदार और बढ़ गया. अधिकतर वक्त कुरसी इन्हीं तीनो दलों के पास रही. जब किसी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिलना बंद हो गया तो तात्कालिक गठबंधन होने लगे लेकिन वे कांग्रेस के साथ ही हुए. कभी नैशनल कौंफ्रैंस और कांग्रेस ने सरकार बनाई तो कभी पीडीपी और कांग्रेस ने मिल कर राज किया.

नैशनल कौंफ्रैंस की तरफ से शेख अब्दुल्ला के बाद फारूख अब्दुल्ला और उन के बेटे उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने तो पीडीपी की तरफ से मुफ्ती मोहम्मद सईद के बाद महबूबा ने यह जिम्मेदारी संभाली लेकिन तब तक भाजपा भी जम्मू में पांव जमा चुकी थी जिस के साथ महबूबा ने सरकार बनाई थी जो साल 2018 में भंग कर दी गई थी.
अनंतनाग लोकसभा सीट से 1998 में मुफ्ती मोहम्मद ने कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर जीत दर्ज की थी. इस के बाद 2004 के चुनाव में महबूबा पीडीपी की तरफ से जीती थीं. 2009 में यह सीट नेकां ने झटक ली थी जिसे 2014 में महबूबा ने फिर छीन लिया था लेकिन 2019 में वोटर ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया था.

अब मुकाबला महबूबा और गुलामनबी आजाद के बीच आंका जा रहा है लेकिन इंडिया गठबंधन का प्रभाव इन दोनों से कम नहीं है जिस की तरफ से मियां अल्ताफ मैदान में हैं. ज्योमेट्री के हिसाब से तो मियां अल्ताफ भारी पड़ते दिखाई दे रहे हैं जिन्हें अपनी पार्टी नेकां के अलावा कांग्रेस के भी वोट मिलेंगे. लेकिन महबूबा की दावेदारी भी कम कर नहीं आंकी जा सकती क्योंकि अनंतनाग की रगरग से वे वाकिफ हैं.
लड़ाई सीधी होती तो समीकरण कुछ और होते लेकिन कांग्रेस छोड़ कर अपनी नई पार्टी बना चुके गुलाम नबी का अपना अलग रसूख है जो कांग्रेस की तरफ से 2005 में मुख्यमंत्री रह चुके हैं. भाजपा से उन की नजदीकियां किसी सबूत की मुहताज नहीं रहीं जिस के दम पर वे ताल ठोक रहे हैं. हालांकि यह भी उन्हें बेहतर मालूम है कि भाजपा के सगेपन की कोई गारंटी नहीं.

अभी तक भाजपा ने इस सीट से अपना प्रत्याशी घोषित नहीं किया है. इस से अंदाजा तो यही लगाया जा सकता है कि वह अपने हिस्से के वोट आजाद की तरफ शिफ्ट कर सकती है जिस से नेकां, कांग्रेस और पीडीपी को एकसाथ मात दी जा सके. अनंतनाग में 7 मई को मतदान है, इसलिए यह भी नहीं कहा जा सकता कि भाजपा अपना उम्मीदवार नहीं उतारेगी. लेकिन अगर उतारा तो गुलाम नबी आजाद को कोई उम्मीद सिवा चमत्कार के नहीं रखना चाहिए जो कि आजकल होते नहीं. महबूबा मुफ्ती को अपने व्यक्तित्व और पिता के नाम का सौ फीसदी फायदा मिलता लेकिन भाजपा के साथ सरकार बनाने के बाद वे शक के दायरे में आ गई हैं. हालांकि इस की सजा पिछले चुनाव में वोटर उन्हें दे चुका है. अगर इतने से उस की भड़ास निकल गई होगी तो जरूर पीडीपी अपने इस गढ़ को कायम रख सकती है.

महबूबा मुफ्ती को भी राजनीति का खासा तजरबा है और वे कानून की स्नातक भी हैं. जम्मूकश्मीर में उन की जिंदगी की तुलना इंदिरा गांधी की जिंदगी से की जाती है क्योंकि पति जावेद इकबाल से उन की पटरी ज्यादा बैठी नहीं. 1984 में इन दोनों की शादी हुई थी जो 3 साल बाद ही तलाक में तबदील हो गई थी.
जावेद को महबूबा का सक्रिय राजनीति में रहना पसंद नहीं था और महबूबा राजनीति छोड़ने को तैयार न थीं. इस दौरान दोनों को 2 बेटियां हुईं इल्तिजा और इरतिका जो अपनी मां की तरह ही खूबसूरत और मासूम दिखती हैं और एक हद तक हैं भी.

इल्तिजा की दिलचस्पी हिंदी फिल्मों में है जिस में कैरियर बनाने वे मुंबई में अपने मामा तसद्दुक मुफ्ती के साथ रहती हैं. इरतिका लंदन में भारतीय हाई कमीशन में सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव अफसर रह चुकी हैं और आजकल वे भी मुंबई में हैं. अपने छोटे भाई तसद्दुक मुफ्ती को महबूबा ने अपने कैबिनेट में लेते पर्यटन मंत्री बनाया था लेकिन उन की भी दिलचस्पी राजनीति में ज्यादा है नहीं. सईद परिवार के होने के साथसाथ उन की पहचान ‘ओमकारा’ और ‘कमीने’ फिल्मों के फोटोग्राफर के रूप में भी है. हालांकि, वे भी मोदी सरकार के ईडी का शिकार हो चुके हैं.

अब चुनाव सिर पर देख महबूबा भाजपा पर खूब गरजबरस रही हैं. वे वोटबैंक के लिए कश्मीरी पंडितों के दर्द को औजार की तरह इस्तेमाल कर रही है. वे यह आरोप लगाने से भी नहीं चूकतीं कि जब से भाजपा के नेतृत्व वाले केंद्र ने सीधे जम्मूकश्मीर का प्रशासन शुरू किया है तब से वे कश्मीरी पंडित भी यहां से चले गए हैं जो यहां रहते थे क्योंकि हालात ऐसे हो गए थे.
कश्मीर के हालात के बारे में भगवा गैंग की राय महबूबा मुफ्ती और उमर अब्दुल्ला वाले ग्रीन गैंग से मेल नहीं खाती. बकौल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कश्मीर अब विकास के रास्ते पर है, वहां से डर खत्म हो गया है, वहां जल्द ही विधानसभा चुनाव होंगे. जम्मूकश्मीर को वापस राज्य का दर्जा मिलेगा. अब यहां स्कूल जलाए नहीं, बल्कि सजाए जाते हैं वगैरहवगैरह.

इस तरह की बातें उन्होंने जम्मू और उधमपुर में कहीं क्योंकि उस के नीचे कश्मीर में भाजपा को कुछ नहीं मिलना, यह हर कोई जानता है. उलट इस के, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती यह राग अलापते रहते हैं कि मुसलमानों की हालत ठीक नहीं है. हमारे समुदाय के लोगों को पीटपीट कर मार डाला गया. मसजिदों और मदरसों को ध्वस्त कर दिया गया वगैरहवगैरह.
अनंतनाग का नतीजा यह साफ करेगा कि कौन कितना सच और झूठ बोल रहा है क्योंकि यहां आ कर नेकां और पीडीपी के रास्ते अलग हो जाते हैं जिन के बीच मंजिल तलाशते गुलाम नबी आजाद हालफिलहाल तो उमर अब्दुल्ला को निशाने पर लेते यह कह रहे हैं कि आतंकवाद के वक्त में जो लंदन खिसक लिए थे, वे आज हमें राजनीति सिखा रहे हैं.

जाहिर है, उन का अगला निशाना महबूबा मुफ्ती होंगी. इस बीच भाजपा की नीति में कुछ बदलाव होते हैं तो मुकाबला और दिलचस्प भी हो सकता है. क्योंकि नए परिसीमन में पुंछ और राजौरी को भी अनंतनाग लोकसभा सीट में मिला दिया गया है जिस से हिंदू वोटरों की तादाद, मामूली ही सही, बढ़ी है लेकिन कुल मिला कर भी वह इतनी नहीं है कि भाजपा जीत ही जाए. उस का हिसाबकिताब मुसलिम वोटों के बंटवारे पर टिका है कि इन में से कितने गुलाम नबी को, कितने मियां अल्ताफ को और कितने महबूबा मुफ्ती को जा सकते हैं. गुज्जर समुदाय को अनुसूचित जाति का दर्जा देने का फायदा भाजपा को मिलना तय है. इस के बाद भी उस की जीत की संभावना न के बराबर ही है. इसलिए संभावना इस बात की ज्यादा है कि वह आजाद को समर्थन देने को ही अपने फायदे की बात समझे. अगर पीडीपी भी इंडिया गठबंधन का हिस्सा बन जाती है तो भाजपा को कश्मीर की तीनों सीटों पर कुछ करने नहीं को बचता लेकिन महबूबा और उमर दोनों ही खुद को कश्मीर का खुदा मान कर चल रहे हैं तो 4 जून को किसी एक की गलतफहमी टूटना तो तय है.

लवलाइफ में चाहते हैं प्राइवेसी तो फौलो करें ये 7 टिप्स

टीएमसी की सांसद महुआ मोइत्रा राजनीति का सब से मुखर चेहरा थीं. लोकसभा में उन की बुलंद आवाज केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाने पर लेने से घबराती नहीं थी. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के बाद वे सब से मशहूर महिला नेता थीं.

अचानक महुआ मोइत्रा के कैरियर का ग्राफ विवादों में घिर गया. विवाद भी उस ने किया जो उन का सबसे अधिक करीबी था. जय अंनत देहाद्राई की गिनती महुआ मोइत्रा के करीबियों में होती थी. पेशे से वकील जय अंनत देहाद्राई ने ही शुरुआती शिकायत की. इस के बाद दर्शन हीरानंदानी ने बात को आगे बढ़ाया. इन विवादों में महुआ मोइत्रा का कैरियर बरबाद हो गया.

भाजपा की सांसद हैं संघमित्रा मौर्य. उत्तर प्रदेश की बंदायू लोकसभा सीट से वे चुनाव जीत कर सांसद बनीं. संघमित्रा मौर्य और नवल किशोर शाक्य मैडिकल की साथसाथ पढ़ाई करते थे. 2010 में दोनों ही शादी हुई. 2021 में दोनों का तलाक हुआ. इस बीच संघमित्रा की जिंदगी में दीपक कुमार स्वर्णकार नामक युवक आया. 2019 में दोनों ने शादी कर ली. संघमित्रा ने जब 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ा तो हलफनामे में खुद को अविवाहित बताया जबकि पहले पति से तलाक 2021 में हुआ.

दीपक के साथ भी झगडा हो गया. दीपक ने मामला कोर्ट के सामने उठाया. अब मुकदमा चल रहा है. 2024 के लोकसभा चुनाव के समय मसला तेजी से उभरा. ऐसे में भाजपा को इस तरह के विवाद से दूर रहने में भलाई लगी. पार्टी ने संघमित्रा को टिकट देने से मना कर दिया. निजी जिदंगी के विवाद ने संघमित्रा के राजनीतिक कैरियर में रोड़ा अटका दिया.

बात केवल संघमित्रा और मुहआ की नहीं है. सामान्य जीवन में ऐसे बहुत सारे मामले हैं जिन में निजी जीवन की मुश्किलों से कैरियर और बिजनैस प्रभावित हो जाते हैं.
बाराबंकी से भाजपा के सांसद थे उपेंद्र रावत. उन को 2024 के लोकसभा चुनाव का टिकट मिल गया. इस बीच उन के आपत्तिजनक वीडियो वायरल हो गए. पार्टी ने दबाव बना कर कहा कि वे चुनाव लड़ने से खुद ही इनकार कर दें. रावत ने टिकट वापस करते कहा कि जब तक इस का सच सामने नहीं आता वे चुनाव नहीं लड़ेंगे. भाजपा ने उन का टिकट काट दिया.

इस की वजह यह है कि आज भी हमारे जीवन में सैक्स संबंधों को रूढ़ियों के दायरे में रख कर देखा जाता है. समाज में जो अग्रणी भूमिका में हैं उन से अलग तरह की उम्मीदें की जाती हैं. नेता अगर पब में डांस कर ले, सैक्स संबंधों में उलझा दिखे, दूसरी पत्नी या पति के साथ दिखे, और तो और अगर वह अपनी छवि के विपरीत शौक करता दिखे तो उस की इमेज खराब होती है. घर, परिवार और कैरियर सब खत्म हो जाता है. इस के बाद भी ऐसे संबंध बनते हैं. अब सवाल उठता है कि इस से कैसे बचें? इया बाबत 7 टिप्स जो आप की मदद कर सकते हैं.

1 – संबंधों को बेहद निजी रखें

जब भी आप किसी के साथ निजी रिश्तों में जाते हैं तो पहली शर्त यह है कि इन रिश्तों को बेहद निजी रखें. आप दोनों किसी करीबी से करीबी से भी इस की चर्चा न करें. राजनीति, समाजसेवा, बिजनैसमैन और अफसरों को खुद काम करने की आदत नहीं होती है. वे अपने किसी करीबी सहयोगी पर भरोसा कर लेते हैं. उस को मीडिएटर बना लेते हैं. अब यह मीडिएटर ही कई बार भंडा फोड़ देता है.

2 – निजी और गोपनीय जगहों पर ही मिलें

आज का दौर मोबाइल कैमरे और इंटरनैट का है. ऐसे में अगर किसी बाहरी ने आप को साथसाथ देख लिया तो इस की सूचना पल भर में दुनिया में एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंच जाएगी. आप के मिलने की जगह निजी और गोपनीय होनी चाहिए. बड़े नामचीन होटलों की जगह रिसोर्ट का औप्शन बेहतर होता है. आप का पहनावा और बातचीत का लहजा सामान्य होना चाहिए. फोन औफ न करें. फोन के औफ करने से शक गहरा जाता है.

3 – अपने शहर से दूर चुनें जगह

जब मिलने की जगह का चुनाव करें तो अपने शहर से दूर की जगह को चुनें. जब होटल या रिजौर्ट में कमरा बुक कराएं तो महिला खुद अपने नाम से बुक कराए. इस से कानूनी दांवपेंच में बचाव हो सकेगा. किसी को शक नहीं होगा.

4 – सफर करते समय प्राइवेट गाड़ी का प्रयोग न करें

सफर करते समय बस, ट्रेन या हवाई जहाज का प्रयोग अधिक करें. टिकट अलगअलग ही बुक कराएं. हर शहर में ओला, ऊबर और टैक्सी मिल जाती हैं, जिन से आगे की यात्रा करें.

5 – सोशल मीडिया पर अपडेट न करें

सोशल मीडिया का जमाना है. लोग साथसाथ जाते हैं. अपनेअपने सोशल मीडिया पर अलगअलग पोस्ट कर के यह समझते हैं कि जब साथ दिख नहीं रहे तो कोई कैसे पहचान लेगा. असल में कितनी भी होशियारी कर लें, कुछ न कुछ शक कई बार लोगों के मन में हो ही जाता है. ऐसे में लोग कड़ी से कड़ी जोड़ लेते हैं. राज खुलने का खतरा रहता है.

6 – उपहारों का आदानप्रदान संभल कर करें

ऐसे संबंधों की बुनियाद उपहारों से होती है. उपहार महंगे और सस्ते दोनों ही तरह के होते हैं. इन की औनलाइन खरीदारी न करें. औनलाइन का रिकौर्ड होता है. कैश में खरीदारी करें. स्टोर पर जा कर करें. भले ही खाना, चाट, केक और आइसक्रीम जैसी चीजें ही उपहार देनी हों, खरीदारी करने पर मोबाइल फोन पर रेटिंग का मैसेज आता है. जो खतरनाक हो सकता है.

7 – निजी पलों की फोटो-वीडियो न बनाएं

कई बार लोग अपने निजी पलों की फोटो और वीडियो बना लेते हैं. ये कब कैमरे या मोबाइल से बाहर निकल जाती हैं, पता नहीं चलता. इस के साथ ही साथ असुरक्षित सैक्स न करें. इस से गर्भ ठहरने का खतरा रहता है. गर्भ ठहरने के बाद उस को मैनेज करना बेहद कठिन ही नहीं, नामुमकिन सा हो जाता है.
वैसे, इस तरह के संबंध हमेशा खतरनाक होते हैं. कुछ लोग खतरों में संभल कर खेलते हैं, तो दिक्कत कम होती है. जहां सावधानी हटी वहां दुर्घटना होना तय होता है. बचाव ही सुरक्षा है, अपनी सुरक्षा का ध्यान रखें.
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