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साइलैंस 2 : काठ की हांडी बारबार नहीं चढ़ती

रेटिंग: एक स्टार
निर्माता : किरण देवहंस
लेखक : अबान भरूचा देवहंस और सनी शर्मा
निर्देशक : अबान भरूचा देवहंस
कलाकार : मनोज बाजपेयी, प्राची देसाई, साहिल वैद, वकार शेख, दिनकर शर्मा, पारुल गुलाटी, चेतन शर्मा, श्रुति बापना और नीना कुलकर्णी
अवधि : 2 घंटे 25 मिनट
ओटीटी प्लेटफौर्म : जी5 पर

जी5 पर ही कोविडकाल में रहस्य-रोमांच प्रधान फिल्म ‘साइलैंस : कैन यू हियर इट?’ स्ट्रीम हुई थी, जिसे दर्शकों ने सिरे से नकार दिया था. इस में एसीपी अविनाश वर्मा के किरदार में मनोज बाजपेयी थे. उस के बाद इस के मुख्य किरदार अविनाश वर्मा के ही नाम पर जियो सिनेमा पर लंबी वैब सीरीज ‘इंस्पेक्टर अविनाश’ स्ट्रीम हुई, उसे भी दर्शकों ने सिरे से नकार दिया था, जबकि जियो सिनेमा पर यह सीरीज मुफ्त में देखी जा सकती है.

मनोज बाजपेयी
मनोज बाजपेयी

इस के बावजूद जी5 पर 16 अप्रैल से अपने प्लेटफौर्म पर पहली असफल फिल्म का सीक्वअल ‘साइलैंस 2 : द नाइट ओवल बार शूटआउट’ स्ट्रीम कर रहा है जो कि एक नीरस सीरीज के अलावा कुछ नहीं है. इस में भी एसीपी अविनाश वर्मा के किरदार में मनोज बाजपेयी ही हैं. दर्शक इस से कहीं ज्यादा अच्छे रहस्य व रोमांच से भरपूर एपिसोड ‘सीआईडी’ और ‘क्राइम पैट्रोल’ में देख चुके हैं.

इस फिल्म के प्रमोशन के दौरान फिल्म के पीआर के पसंदीदा पत्रकारों से बातचीत करते हुए मनोज बाजपेयी फिल्म की तारीफ करते हुए नहीं थक रहे थे. मनोज बाजपेयी का दावा है कि ‘साइलैंस 2’ को दर्शकों की भारी मांग पर जी5 को बनानी पड़ी. हालांकि 8 दिसंबर, 2023 को प्रदर्शित उन की फिल्म ‘जोरम’ ने बौक्सऔफिस पर बामुश्किल 40 लाख रुपए ही कमाए थे और इस के निर्माता व निर्देशक देवाशीष मखीजा ने बयान दिया था कि वे डूब गए. उन्हें किराए के मकान में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा.

इतना ही नहीं, दर्शक ‘जोरम’ को मुफ्त में ‘जी5’ पर या यूट्यूब पर देख सकते हैं. इस के बावजूद ‘जोरम’ को दर्शक नहीं मिल रहे. शायद दर्शक मनोज बाजपेयी को बारबार एक ही तरह का अभिनय करते हुए नहीं देखना चाहता. खैर, ‘साइलैंस 2 : द नाइट ओवल बार शूटआउट’ की कमजोर कड़ियों में मनोज बाजपेयी और इस के लेखक व निर्देशक अबान देवहंस हैं.

साइलेंस 2 का एक दृश्य
साइलेंस 2 का एक दृश्य

कहानीः

कहानी एसीपी (सहायक पुलिस आयुक्त) अविनाश वर्मा की है. वे स्पैशल जांच शाखा के मुखिया हैं. उन के साथ 2 पुरुष और एक महिला इंस्पैक्टर व एक हवलदार हैं. मजेदार बात यह है कि यह यूनिट 24 घंटे गश्त करती रहती है. अचानक रात में डेढ़ बजे एसीपी अविनाश वर्मा सड़क पर लड़की की इज्जत बचा रहे हैं, तभी मुंबई पुलिस कमिश्नर फोन कर उन्हें ‘द नाइट ओवल बार’ में हुई गोलीबारी की जांच करने का आदेश देते हैं.

इस गोलीबारी में मंत्री के सैक्रेटरी व एक पत्रकार सहित 8-10 लोग मारे गए हैं. अविनाश वर्मा और उन की इकाई जांच करती है. इस गोलीबारी कांड की जांच करते हुए एसीपी वर्मा 15-16 साल की उम्र की लड़कियों के एक बड़े यौन तस्करी रैकेट का भंडाफोड़ कराने की ओर ले जाता है.

समीक्षा

फिल्म की पहली कमजोर कड़ी इस की कहानी व पटकथा है. इस से अच्छे रहस्य-रोमांच से भरे उपन्यास वेद प्रकाश पाठक और ओम प्रकाश शर्मा लिख चुके हैं. यह अति लंबी व नीरस फिल्म है. इसे एडिटिंग टेबल पर कसा जाना चाहिए था. फिल्म में एसीपी अविनाश वर्मा की कार्यशैली बिलकुल वनमैन शो जैसी ही है. मतलब, वे हर वक्त खुद को ही सुर्खियों में रखना चाहते हैं. जांच करने के बजाय वे लंबेलंबे संवाद बोलते हुए अपनी टीम व दर्शकों को रहस्य को सुलझाने का तरीका सिखाते हुए ही नजर आते हैं. तफ्तीश के दौरान जो मोड़ आते हैं उन में भी कोई नवीनता नहीं है.

फिल्मकार ने रहस्यरोमांच से भरपूर इस फिल्म में उपेक्षित बच्चों की मानसिक स्थिति व बिखरे हुए परिवार के बच्चों को होस्टल भेजे जाने से बच्चे के मन पर पड़ने वाले प्रभाव को उठाया है, पर इस पर वह दोचार मिनट से ज्यादा नहीं दे पाई. जबकि, इस फिल्म के साथ पूरा परिवार यानी कि अबान भरूचा देवहंस के पति किरण देवहंस व उन के बच्चे तानिया देवहंस व देव देवहंस भी जुड़े हुए हैं.

इस की मूल वजह यह है कि किरण या अबान देवहंस को उपेक्षित बच्चों या होस्टल में न चाहते हुए भी परवरिश पाने वाले बच्चों के मनोविज्ञान की न समझ है और न ही इस तरह के बच्चों से वे कभी मिले ही हैं. किरण देवहंस फिल्म ‘कयामत से कयामत तक’ के भी कैमरामैन थे. यानी, वे लगभग 40 साल से फिल्म इंडस्ट्री में हैं, इस के बावजूद वे फिल्मों में हीरोईन बना देने के नाम पर लड़कियों के देहशोषण का मुद्दा भी ठीक से फिल्म में दिखाने में असफल रहे हैं.

फिल्मकार ने युवा पीढ़ी में बढ़ती ड्रग्स की लत पर भी रोशनी डालने का अप्रभावशाली प्रयास किया है. यह फिल्म रहस्यरोमांच प्रधान होने के बावजूद दशकों को बांधे रखने में कमजोर दिखाई देती है.

अभिनय

मनोज बाजपेयी और जी5 का साथ तो लंगोटिया यार जैसा है. जी5 की ही फिल्म ‘एक बंदा …’ में मनोज बाजपेयी ने अपने अभिनय की अलग छाप छोड़ी थी. इस के लिए उन्हें काफी सम्मान मिला, पर उस के बाद उन की फिल्में चली नहीं. फौरेंसिक लैब में काम करने वाले युवक विंस्टन के छोटे किरदार में दवे देवहंस अथवा आरती सिंह के किरदार में पारुल गुलाटी जरूर अपने अभिनय की छाप छोड़ने में कामयाब रही हैं. संजना भाटिया के किरदार में प्राची देसाई का होना या न होना कोई माने नहीं रखता.

बीजेपी की ऐक्टिव और स्ट्रौंग महिला नेता हैं कमलजीत सहरावत

 

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लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने बहुत से मौजूदा सांसदों की जगह नए चेहरों को मैदान में उतारा है. पूर्व मेयर कमलजीत सहरावत एक ऐसा ही चेहरा हैं. दिल्ली में बीजेपी ने पश्चिमी दिल्ली के मौजूदा सांसद प्रवेश वर्मा का टिकट काट कर कमलजीत सहरावत को मौका दिया है.

कमलजीत दिल्ली बीजेपी की महासचिव हैं. वे एसडीएमसी की मेयर रह चुकी हैं. वर्तमान में वे वार्ड संख्या-120 (द्वारका बी) से पार्षद हैं. वे एमसीडी की स्टैंडिंग कमेटी की सदस्य भी हैं. कमलजीत सोशल मीडिया पर ऐक्टिव रहती हैं. एक्स पर उन के 48 हजार से ज्यादा फौलोअर्स हैं. वहीं फेसबुक पर उन्हें 2 लाख से ज्यादा लोग फौलो करते हैं. पार्टी गतिविधियों में वे बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती हैं.

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कमलजीत सहरावत काफी पढ़ीलिखी हैं. उन के पास एमकौम की डिग्री है. उन्होंने बीएड और लौ प्रोग्राम में भी डिग्री हासिल की है, साथ ही, कंप्यूटर एप्लीकेशन में डिप्लोमा भी किया है. उन का जन्म 29 सितंबर, 1972 को हुआ था. उन्होंने राज कुमार सहरावत से शादी की है. उन के 2 बच्चे हैं. वे पश्चिमी दिल्ली की मटियाला विधानसभा सीट से चुनाव लड़ चुकी हैं. वे बीजेपी दिल्ली महिला मोरचा की अध्यक्ष और दिल्ली प्रदेश बीजेपी की उपाध्यक्ष रही हैं. सहरावत का नाम भाजपा की ताकतवर महिला नेताओं की सूची में शामिल है. सहरावत महिला भाजपा कार्यकर्ताओं के दिलों में विशेष स्थान रखती हैं.

52 वर्षीया सहरावत एक प्रखर वक्ता, मतदाताओं की शिकायतों की कुशल प्रबंधक और मोदी की नीतियों की उत्साही समर्थक हैं. जनता द्वारा भेजी गई शिकायतों पर गौर करती हैं. वे न केवल शिकायतों को संबंधित विभाग प्रमुखों को भेजती हैं बल्कि यह सुनिश्चित भी करती हैं कि सरकारी अधिकारी उन पर अमल करें. जब वे महापौर थीं तब सोडियम स्ट्रीट लाइट को एलईडी लाइट में बदलने के लिए उन्हें राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा सम्मानित किया गया था. उन्होंने हमेशा अपनी टीम की महिलाओं को बढ़ावा दिया है. उन्होंने मेयर के रूप में शहर में पहले पिंक बूथ शौचालय का उद्घाटन किया.

कमलजीत सहरावत ने यहां तक पहुंचने के लिए 15 साल मेहनत की. उन्होंने पहली बार 2008 में मटियाला विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा था और केवल 6,000 वोटों से हारी थीं. 2017 में उन्होंने एमसीडी चुनाव जीता और पार्षद बनीं. वे वर्तमान में जीनियस कमर्शियल एंड एजुकेशनल इंस्टिट्यूट प्राइवेट लिमिटेड में निदेशक हैं.

पिछले कुछ दिनों से कमलजीत सहरावत सोशल मीडिया प्लेटफौर्म पर काफी ऐक्टिव हैं. नई रीलें, उन के दिन के शैड्यूल और उन के द्वारा किए जाने वाले प्रत्येक कार्यक्रम की तसवीरें पाई जा सकती हैं. 3 फोटोग्राफरों की एक टीम सहरावत के साथ यात्रा करती है और उन की सोशल मीडिया टीम को तसवीरें भेजती रहती है.

उत्तम नगर में जन्मीं और द्वारका में रह रहीं सहरावत मतदाताओं के सामने अपनी बेटी और बहू कार्ड खेलती हैं, कहती हैं, ‘मैं आप की बेटी, बहू और बहन हूं. मैं आप में से एक हूं. आप 60 दिन संभाल लें, मैं अगले 60 महीने संभाल लूंगी.’

उन के साथ काम कर चुके एमसीडी अधिकारी उन्हें एक उत्कृष्ट नेता बताते हैं जो हमेशा काम और लोगों को प्राथमिकता देते हैं. स्थानीय लोगों के बीच उन की काफी पहुंच है. उन का कम्युनिकेशन स्किल उत्कृष्ट है. वे काम को कभी भी टालती नहीं हैं. वे पूरे दिन सक्रिय रहती हैं और मीटिंग्स में भी हमेशा समय पर पहुंचती हैं.

राजनीतिक कैरियर

सहरावत ने 2007 में नजफगढ़ में भाजपा जिला उपाध्यक्ष की भूमिका निभाई. उन्होंने 2008 में मटियाला विधानसभा क्षेत्र से विधायक का चुनाव लड़ा. 2009 से 2014 तक उन्होंने दिल्ली प्रदेश भाजपा के सचिव के रूप में कार्य किया. वे 2014 से 2016 तक भाजपा दिल्ली महिला मोरचा के अध्यक्ष पद पर रहीं. 2014 में उन्हें एसडीएमसी के मेयर के लिए नामांकित पर्सन के रूप में चुना गया था. 2016 और 2017 के बीच सहरावत दिल्ली राज्य भाजपा की उपाध्यक्ष बनीं. 2022 में सहरावत ने द्वारका बी वार्ड से पार्षद का चुनाव जीता.

सहरावत ने 2016 से 2017 तक भाजपा के दिल्ली राज्य के उपाध्यक्ष के रूप में कार्य किया और उन्हें 2018 में स्थायी समिति के सदस्य के रूप में चुना गया. सहरावत को 2024 में आगामी लोकसभा चुनाव में पश्चिमी दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र के लिए भाजपा उम्मीदवार के रूप में चुना गया.

राजनीतिक योगदान और पहल

सहरावत महिला सशक्तीकरण की वकालत में सक्रिय रूप से शामिल रही हैं और उन्होंने समाज में महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने के उद्देश्य से विभिन्न अभियानों व कार्यक्रमों का नेतृत्व किया है.

भाजपा के दिल्ली राज्य के उपाध्यक्ष के रूप में सहरावत ने पार्टी की चुनावी रणनीति तैयार करने व उसे क्रियान्वित करने, समर्थन जुटाने और अपने जमीनी स्तर के नैटवर्क का विस्तार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई.

आखिरी रास्ता: निर्मला के पापा ने क्यों गिफ्ट्स फेंक दिए?

“यार, इस में इतना परेशान होने की क्या बात है? तुम दोनों पहले सोच कर फैसला  कर लो कि तुम अपने पापामम्मी की मरजी के बिना शादी कर सकते हो या नहीं?” रौनक ने अपने दोस्त विमल से कहा.

 

“तुम सभी लोग जानते हो कि मैं और निर्मला कालेज के फर्स्ट ईयर से ही एकदूसरे को चाहते हैं, फिर भी सामाजिक मर्यादाओं की सीमा में ही रहे हैं.  मुश्किल तो यह है कि हम दोनों में से किसी का परिवार गैरजातीय शादी के लिए  तैयार नहीं है,” विमल बोला.

 

“अब आगे से प्यार करने के पहले हमें एक दूसरे की जाति और  धर्म पूछ लेना चाहिए वरना आगे चल कर हमारा भी यही हश्र हो सकता है,” निर्मला की एक सहेली ने कहा.

 

इस पर वहां मौजूद सभी दोस्त हंस पड़े.

 

“तुम लोग हंस रहे हो और हम दोनों कितने परेशान हैं, शायद इस का अंदाज़ा तुम्हें नहीं है,” निर्मला बोली.

 

“अरे नहीं. हम सभी तुम्हारे साथ हैं और चाहते भी हैं कि तुम दोनों की शादी हो, पर पहले तुम दोनों में इतना साहस हो कि अपने परिवार की मरजी के खिलाफ जा कर शादी कर सको.  तुम अब मैच्योर्ड हो और अपने पैरों पर खड़े हो,” कुछ दोस्तों ने कहा.

 

“मेरे मामू वकील हैं, तुम दोनों बोलो तो मामू को  बोल कर तुम्हारी कोर्ट मैरिज की औपचारिकताएं शुरू करा दें. गवाही के लिए हम लोग तैयार हैं ही,” रौनक बोला.

 

सभी लोगों ने कुछ देर आपस में सलाहमशवरा किया. विमल और निर्मला कोर्ट मैरिज के लिए तैयार हो गए. सभी दोस्तों ने फैसला किया कि यह बात दोनों परिवारों तक नहीं पहुंचनी चाहिए. रजिस्ट्रार के औफिस में कोर्ट मैरिज के लिए 30 दिन की नोटिस दी गई. विमल और निर्मला दोनों अपने मातापिता की इकलौती संतानें थीं, उन की जाति अलग थीं. दोनों के मातापिता उन की शादी के लिए रिश्ते तलाश रहे थे. उन्हें अपनी जाति में मनलायक अच्छे रिश्ते भी मिल रहे थे पर विमल और निर्मला दोनों ही किसी न किसी बहाने शादी टाल रहे थे.

 

एक महीने बाद विमल और निर्मला ने कोर्ट मैरिज कर ली. शादी के बाद उन्होंने अपने दोस्तों के साथ होटल में लंच लिया. इस के बाद विमल और निर्मला अपनेअपने घर चले गए. उसी दिन शाम को विमल मिठाईयां और कुछ उपहार के पैकेट ले कर निर्मला के घर पहुंचा. उस के पापामम्मी  दोनों बाहर लौन में ही बैठे थे. निर्मला घर के अंदर थी.

 

वह बोला, “नमस्ते अंकल, नमस्ते आंटी. आप लोग कैसे हैं?”

 

“ नमस्ते, हम ठीक हैं. और यह सब क्या है, कैसे आना हुआ?”  निर्मला के पिता महेश दूबे ने पूछा.

 

“अंकल, आंटी, अब मुझे आप दोनों को मम्मीपापा बोलना होगा. आज कोर्ट में मैं ने निर्मला से शादी कर ली है. उसे विदा कराने आया हूं. मेरे मातापिता इसे बहू स्वीकार करने के लिए तैयार हैं.”

 

“लगता है तुम्हारा दिमाग ठिकाने नहीं है, चलो भागो यहां से,” बोल कर दूबेजी गुस्से से आगबबूला हो कर उठ खड़े हुए और उन्होंने मिठाई व गिफ्ट पैकेट्स को जमीन पर फेंक  दिया.

 

फिर दूबेजी ने बेटी को चिल्ला कर आवाज़ दी, “निर्मला, इधर आओ.”

 

निर्मला को इस स्थिति का आभास पहले से ही था. वह चुपचाप आ कर दूबेजी के सामने खड़ी हो गई.

 

“देखो, यह क्या बके जा रहा है. यह बोल रहा है कि तुम दोनों ने शादी कर लिया है,” विमल की ओर इशारा करते हुए वे बोले.

 

निर्मला कुछ देर तक सिर झुकाए खामोश खड़ी  रही. तब फिर दूबेजी ने गरजते हुए कहा, “मैं ने  तुम से कुछ पूछा है, जवाब दो.”

 

पर निर्मला से कुछ बोलते नहीं बना, वह अभी भी खामोश थी. तभी विमल ने आगे बढ़ कर कोर्ट मैरिज का सर्टिफिकेट उन्हें देते हुए कहा, “यह क्या बोलेगी,  खुद ही देख लीजिए मैरिज रजिस्ट्रेशन का सर्टिफिकेट है यह.”

 

दूबेजी ने सर्टिफिकेट पढ़ा और फाड़ कर फेंक दिया.

 

“यह तो सिर्फ एक जेरौक्स कौपी है.”

 

दूबेजी ने पत्नी पर गुस्सा उतारते हुए कहा, “देखा तुमने, दुलार में बेटी को कितना बिगाड़ दिया है. मैं ने कहा था न कि इसे कालेज भेजने की जरूरत नहीं है. 12वीं के बाद ही इस के लिए अच्छे अच्छे रिश्ते आने लगे थे.”

 

उस समय विमल और निर्मला के कुछ मित्र वहां आए और वे एकसाथ बोले, “अंकल, शादी मुबारक.”

 

“काहे की शादी? मैं नहीं मानता इस शादी को.”

 

“पर कानून तो मानता है. आप कानून को नहीं मानते हैं तो इस में गलती आप की है. जरा ठंडे दिमाग से सोचिए, इन दोनों ने कोई गलत काम नहीं किया है. इन्होंने मर्यादा के विरुद्ध कोई काम नहीं किया है. कोर्ट मैरिज ही इन के लिए आखिरी रास्ता था. इस रिश्ते को स्वीकार करने में ही सब की ख़ुशी  है.”

 

दूबेजी अपनी पत्नी और बेटी निर्मला को ले कर अंदर चले गए. उन्होंने फोन कर स्थानीय रिश्तेदार व दोस्त को बुलाया. विमल अपने दोस्तों के साथ बरामदे में कुरसी और झूले पर बैठा था. उस के दोस्त रौनक ने भी फोन कर अपने वकील मामू को बुला लिया. आधे घंटे के अंदर 2 कारें  आईं जिन में दूबेजी के मित्र और रिश्तेदार थे. कार से उतर कर  वे सभी सीधे घर के अंदर गए. इस के दस मिनट बाद एक अन्य कार से वकील मामू सादे लिबास में आए. वे विमल और उस के मित्रों के बीच  बैठ गए. घर के अंदर से कभी दूबेजी की गुस्से वाली तेज आवाज आती तो कभी उन के मित्रों या रिश्तेदारों की धीमी आवाज में उन्हें समझाने की.

 

कुछ मिनट इंतजार के बाद वकील ने पूछा, “क्या मैं भी अंदर आ सकता हूं?”

 

“आप की तारीफ़?” दूबेजी ने पूछा.

 

“मैं ने ही इन दोनों की कोर्ट मैरेज कराई है.”

 

“तो आप जले पर नमक छिड़कने आए हैं?”

 

“जी नहीं, मुझे क्या पड़ी है. मैं तो सिर्फ आप को समझाने आया हूं. मैं वकील हूं, मेरे बेटे ने भी घर से भाग कर  कोर्ट मैरिज की थी. बाद में जब उस के ससुर बेटी को उस के साथ नहीं जाने दे रहे थे तब बेटे ने पुलिस की मदद ली और वह अपनी पत्नी को साथ  ले गया. हम मानें या न मानें,  ऐसी शादी को कानून की मान्यता है. मुझे भी अपनी बहू को स्वीकार करना ही पड़ा था. इसलिए मेरी सलाह है कि कोर्टकचहरी के चक्कर में न पड़ें, इसी में सब की भलाई है. मुझे बस इतना ही कहना था, बाकी आप की मरजी.”

 

कुछ देर तक सब लोग आपस में बातें करते रहे. ज्यादातर लोग दूबेजी को ही समझा रहे थे कि इस रिश्ते को मान लेना ही सही होगा. तभी वकील ने फिर कहा, “ठीक है भाईसाहब, मैं अब चलता हूं. एक बार फिर ठंडे दिमाग से सोचिए, आप खुद एक सरकारी नौकर हैं, कानून तो आप भी जानते ही होंगे.”

 

दूबेजी को फिर लोगों ने समझाया कि अब इस रिश्ते को कबूल करने में ही उन की भलाई है वरना अपनी इकलौती संतान से भी हाथ धो बैठेंगे. उन का गुस्सा धीरेधीरे ठंडा पड़ने लगा. वकील मामू तब तक जा चुके थे. उन के जाने के कुछ देर बाद विमल ने कहा, “तब निर्मला मेरे साथ चल रही है न?”

 

दूबेजी ने कहा, “बेशर्म, चल भाग यहां से. जा कर बाप को बोल, बरात ले कर आए और अपनी बहू को विदा करा के ले जाए.”

उन की बात सुन कर सभी ख़ुशी से झूम उठे. विमल ने भी निर्मला को आंख मारी और अपने दोस्तों के साथ लौट गया.

 

शादी से पहले जरूर करवा लें ये 8 टेस्ट

कई फिल्मों में शादी के लिए कुंडली मिलान बहुत जरूरी बताया जाता है और कुंडली न मिलने पर पक्का रिश्ता भी टूट जाता है, लेकिन अधिकतर देखा गया है कि कुंडली मिला कर की गई शादियों में भी तलाक की दर बहुत अधिक है, इसलिए अब लोगों की सोच बदलने लगी है और उन्हें लगता है कि शादी के लिए कुंडली से ज्यादा जरूरी है कि दोनों एकदूसरे के लायक हों और शारीरिक रूप से फिट हों ताकि शादी के बाद किसी तरह की कोईर् परेशानी न आए.

शादी से पहले युवकयुवती को एकदूसरे के बारे में सबकुछ पता हो तो आगे चल कर सिचुएशन हैंडिल करने में काफी आसानी रहती है और दोनों एकदूसरे को उस की कमियों के साथ स्वीकारने की हिम्मत रखते हैं तो ऐसा रिश्ता काफी मजबूत बनता है. इसलिए दूल्हादुलहन शादी से पहले कई तरह के मैडिकल टैस्ट कराने से भी नहीं हिचकिचाते. आइए जानें, ये मैडिकल टैस्ट कौन से हैं और कराने क्यों जरूरी हैं :

1 एचआईवी टैस्ट

यदि युवक या युवती में से किसी एक को भी एचआईवी संक्रमण हो तो दूसरे की जिंदगी पूरी तरह से बरबाद हो जाती है. इसलिए शादी से पहले यह टैस्ट करवाना बहुत जरूरी है.  इस में आप की सजगता और समझदारी है.

2 उम्र का परीक्षण

कई बार शादी करने में काफी देर हो जाती है और उम्र अधिक होने के कारण युवतियों में अंडाणु बनने कम हो जाते हैं तथा बच्चे होने में परेशानी आ सकती है. इसलिए यदि बढ़ती उम्र में शादी कर रहे हैं तो टैस्ट जरूर कराएं.

3 प्रजनन क्षमता की जांच जरूरी

जिन कपल्स को शादी के बाद बच्चे पैदा करने में समस्या आती है, उन्हें प्रजनन क्षमता का टैस्ट जरूर कराना चाहिए ताकि पता चल सके कि कमी युवक में है या युवती में. वैसे तो यह टैस्ट शादी से पहले ही होना चाहिए, जिस से पता चल सके कि वे दोनों संतान पैदा करने योग्य हैं भी या नहीं.

4 ओवरी टैस्ट

इस टैस्ट को युवतियां कराती हैं ताकि पता चल सके कि उन्हें मां बनने में कोई मुश्किल तो नहीं है. कई युवतियां इस टैस्ट को कराने में हिचकिचाती हैं कि यदि कोईर् कमी पाई गई तो उन का रिश्ता होना मुश्किल हो जाएगा, जबकि ऐसा नहीं है. आज तो मैडिकल साइंस में हर चीज का इलाज है. अच्छा तो यह है कि समय रहते आप को प्रौब्लम के बारे में पता चल जाएगा. यदि टैस्ट सही आया तो आप को वैवाहिक जीवन में कोई तकलीफ नहीं होगी.

5 सीमन टैस्ट

इस टैस्ट में युवकों के वीर्य की जांच होती है कि वह बच्चा पैदा करने के लिए पूरी तरह से सक्षम है या नहीं और अगर कोई प्रौब्लम है तो उस का इलाज करवा कर पूरी तरह स्वस्थ हुआ जा सकता है. यह टैस्ट इसलिए करवाया जाता है ताकि पहले ही परेशानी के बारे में पता चल जाए और उसी के हिसाब से इलाज करवा कर बंदा शादी के लिए पूरी तरह से परफैक्ट हो जाए.

6 यौन परीक्षण

कुछ बीमारियां संक्रमित होती हैं, जो शारीरिक संपर्क के दौरान बढ़ती हैं. इन बीमारियों को सैक्सुअली ट्रांसमिटेड बीमारियां कहा जाता है और ये संभोग के बाद पार्टनर को भी बड़ी आसानी से लग जाती हैं. इसलिए ऐसी किसी भी बीमारी से बचने के लिए शादी से पहले ही यह जांच करवा लें ताकि भविष्य में किसी गंभीर बीमारी से पार्टनर और आप दोनों ही बच सकें.

7 ब्लड टैस्ट

ब्लड टैस्ट कराने से पता चल जाता है कि कहीं ब्लड में कोई ऐसी प्रौब्लम तो नहीं है, जिस का सीधा असर होने वाले बच्चे पर पड़ेगा. हीमोफीलिया या थैलेसीमिया ऐसे खतरनाक रोगों में से एक हैं जिन में बच्चा पैदा होते ही मर जाता है. इस में दोनों के ब्लड की जांच कराना आवश्यक है जिस से आर एच फैक्टर की सकारात्मकता व नकारात्मकता का पता चल सके. यह टैस्ट शादी से पहले कराना अतिआवश्यक है.

8 जैनेटिक टैस्ट

इस तरह के टैस्ट को परिवार की मैडिकल हिस्ट्री भी कहा जाता है. इस से जीन के विषय में पता चल जाता है कि आप को जैनेटिक डिजीज है भी या नहीं. इस टैस्ट से आनुवंशिक बीमारियों के बारे में भी पता चल जाता है जो पार्टनर को कभी भी हो सकती हैं.

मैंने एक लड़की से आई लव यू कहा तो उस ने मना कर दिया, मैं क्या करूं?

सवाल

मैं एक लड़की से बहुत प्यार करता हूं. वह लड़की मुझ से 2 साल छोटी है. मैं अभी 17 साल का हूं. मैं ने उसे आई लव यू कहा तो उस ने मना कर दिया. पर अब मेरा मन कहीं नहीं लगता. बताइए मैं क्या करूं?

जवाब

पहले तो आप ही बताइए कि क्या 15-17 साल की उम्र आई लव यू कहने की होती है? नहीं न? तो फिर आप ने उसे ऐसा कैसे कह दिया. वह आप से 2 साल छोटी है अर्थात 15 साल की लड़की, जो परिपक्व भी नहीं होती. इसे आप महज आकर्षण समझें, प्यार नहीं. अपनी पढ़ाई व कैरियर पर ध्यान दीजिए और कुछ बन कर दिखाइए. फिर कहिएगा आई लव यू.

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ईरान-इजराइल की बढ़ती दुश्मनी से भारत चिंतित

इजराइल पर ईरान के अटैक करने के बाद दुनिया के सामने युद्ध का नया चैप्टर खुल गया लगता है. 13 अप्रैल की रात ईरानी सेना ने इजराइल के नवातिम एयरबेस को निशाना बना कर 200 से ज्यादा ड्रोन और दर्जनों मिसाइलों से ताबड़तोड़ अटैक किया. ईरान के ताबड़तोड़ हमले के बाद इजराइल के साथसाथ पूरी दुनिया में डर का माहौल है. इस हमले में इजराइल को हुए नुकसान की खबरें भी सामने आ रही हैं, हालांकि इजराइल नुकसान से इनकार कर रहा है. इजराइल अब एक्शन मोड में है और प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान के हमले का बदला लेने की कसम खा ली है. उन्होंने कहा है कि इजराइल जवाबी कार्रवाई करने और ईरान से कीमत वसूलने के लिए उचित समय और तरीका चुनेगा.

ईरान और इजराइल के बीच शुरुआत, दरअसल, 1 अप्रैल से हुई थी जब इजराइल ने सीरिया में स्थित ईरानी दूतावास पर हमला किया था, जिस में 2 कमांडर और 7 नागरिकों की मौत हो गई थी. इस हमले के बाद ईरान ने बदला लेने की चेतावनी दी थी. और 13 अप्रैल की रात ईरान ने इजराइल पर ताबड़तोड़ हमला कर दिया. ईरान के हमले के बाद इजराइल उसे आतंकवादी देश कह रहा है जबकि वह खुद लंबे समय से निर्दोष फिलिस्तीनियों का लहू बहा रहा है.

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गौरतलब है कि एक समय ऐसा भी था जब ईरान और इजराइल अच्छे दोस्त थे. 1979 में राजशाही के अपदस्थ होने तक ईरान और इजराइल के बीच तेल और हथियारों के सौदों सहित राजनयिक और आर्थिक संबंध थे. इराक के साथ ईरान के युद्ध के दौरान ईरान और इजराइल के बीच तनाव बढ़ता गया. बाद में यह तनाव इतना बढ़ गया कि 2005 में ईरान के राष्ट्रपति ने यहां तक कह दिया कि इजराइल को मानचित्र से हटा देना चाहिए.

कैसे शुरू हुई दुश्मनी

साल 1948 में अपने निर्माण के बाद से इजराइल काफी उठापटक झेलता रहा. ज्यादातर देशों ने उसे मान्यता देने से इनकार कर दिया, खासकर मिडिल ईस्ट के मुसलिम देशों ने. मगर ईरान ने उसे मान्यता दी. उस दौर में पूरे वेस्ट एशिया में ईरान यहूदियों के लिए सब से बड़ा ठिकाना था. नयानया यहूदी देश इजराइल ईरान को हथियार और तकनीक देता और बदले में तेल लिया करता था. दोनों के बीच रिश्ते इतने अच्छे थे कि इजराइली खुफिया एजेंसी मोसाद ने ईरान के इंटैलीजैंस सावाक को खुफिया कामों की ट्रेनिंग तक दी. लेकिन दोनों के बीच दुश्मनी की नींव पड़ी ईरान की इसलामिक क्रांति की वजह से.

60 के दशक से ही ईरान के धार्मिक नेता अयातुल्ला रूहुल्लाह खुमैनी ईरान को मुसलिम देश बनाने की वकालत करने लगे. तब इस देश पर राजा शाह रजा पहलवी का शासन था, जिस के अमेरिका और इजराइल से बढ़िया रिश्ते थे. मगर खुमैनी इन दोनों ही देशों को शैतानी देश कहते थे और मुसलिम राष्ट्र की बात करते थे.

धीरेधीरे हवा खुमैनी के पक्ष में होती गई. क्रांति हुई. लाखों लोग शाह के खिलाफ प्रोटैस्ट करने लगे. हालात इतने बिगड़े कि राजा को देश छोड़ कर भागना पड़ा और साल 1979 में ईरान इसलामिक देश घोषित हो गया. इस के बाद ही उस ने अमेरिका समेत सहयोगी देश यानी इजराइल से खुल कर नफरत दिखानी शुरू कर दी.

इसलामिक रिवोल्यूशन के तुरंत बाद दोनों देशों के बीच यात्राएं बंद हो गईं. एयर रूट पूरी तरह से रोक दिया गया. दोनों के बीच डिप्लोमेटिक रिश्ते भी खत्म हो गए और तेहरान स्थित इजराइली एंबेसी को फिलिस्तीन के दूतावास में बदल दिया गया. एक जो सब से बड़ी बात हुई वह यह कि दोनों ने ही एकदूसरे को मान्यता देने से इनकार कर दिया. ईरान ने इजराइल को पहले तो मान्यता दी थी लेकिन खुमैनी के आने के बाद यह बात फैलने लगी कि यहूदियों ने फिलिस्तीनियों का हक मारा है. दूसरी तरफ अपना वर्चस्व बढ़ाते इजराइल ने भी अमेरिका की देखादेखी इसलामिक रिपब्लिक को मानने से मना कर दिया.

20वीं सदी के मध्य के बाद से मध्यपूर्व दुनिया का सब से अस्थिर हिस्सा रहा है. इजराइल-फिलिस्तीन सहित अन्य समूहों के बीच संघर्ष दशकों पुराना है. इस का प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ा है. इजराइल ने 1948 और 1973 के बीच मिस्र, सीरिया और जौर्डन सहित अरब पड़ोसियों के साथ 4 बड़े युद्ध लड़े हैं. 1960 के दशक के मध्य में फिलिस्तीन मुक्ति संगठन के निर्माण के बाद से इसे अन्य चुनौतियों का सामना करना पड़ा है. इस में लेबनान में हिजबुल्लाह, फिलिस्तीन क्षेत्रों में हमास और यमन में हूती भी शामिल हो गए हैं.

युद्ध का भारत पर असर

रूस-यूक्रेन और इजराइल-हमास के युद्ध के चलते वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले ही काफी डांवाडोल है. अब ईरान और इजराइल के बीच यदि युद्ध हुआ तो यह सिर्फ मिडिल ईस्ट तक ही सीमित नहीं रहेगा बल्कि यह नया संघर्ष पूरे मध्यपूर्व को अस्थिर कर देगा, जिस का सीधा असर भारत पर पड़ेगा.

7 अक्टूबर को हुए हमले के बाद भी कुछ ऐसा ही हुआ था. इजराइल-हमास युद्ध शुरू होने के बाद लाल सागर में हूती विद्रोहियों ने जहाजों पर हमला किया था. लाल सागर से भारत अरबों का व्यापार करता है और यहां उत्पन्न अस्थिरता उस के ट्रेड के लिए खतरा है. इस के अलावा अगर मिडिल ईस्ट में संघर्ष चलता रहा तो इंडिया, मिडिल ईस्ट, यूरोप इकोनौमिक कौरिडोर के काम में रुकावट पैदा हो जाएगी.

भारत के मध्यपूर्व के देशों, विशेषकर यूएई और सऊदी, के साथ घनिष्ठ आर्थिक संबंध हैं. तेल जैसि जरूरी चीजों को भारत यहां से आयात करता है और इन देशों से अरबों डौलर के निवेश की उम्मीद कर रहा है. अगर इजराइल और ईरान युद्ध में उतरते हैं तो भारत की उम्मीदों पर संकट के बादल मंडराने लगेंगे. भारत पर इस का असर दिख भी रहा है. बीते दिनों ईरान ने इजराइल से जुड़े एक जहाज पर कब्जा कर लिया. इस जहाज में कुल 25 लोग सवार थे, जिन में 17 भारतीय क्रू मैंबर थे.

इजराइल पर ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमले तथा इस के बाद मध्यपूर्व में पैदा हुए हालात पर भारत काफी चिंतित है. मिडिल ईस्ट में संघर्ष के कारण भारतीयों की जिंदगी दांव पर होगी. इस वक्त लाखों भारतीय यूएई और सऊदी अरब में रहते हैं. मिडिल ईस्ट में जंग का मतलब है इन सभी की जान पर खतरा. इजराइल और ईरान में लगभग 30,000 भारतीय रहते हैं. इन की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिकता है. भारतीय दूतावास ने कहा है कि वह लोगों के संपर्क में है. इन देशों में रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा के साथसाथ भारत के आर्थिक हित भी दांव पर हैं.

ईरान और इजराइल के बीच युद्ध हुआ तो ईरान के साथ भारत की बढ़ती आर्थिक भागीदारी, विशेषकर चाबहार बंदरगाह विकास जैसी परियोजनाएं खटाई में पड़ जाएंगी. चाबहार बंदरगाह पाकिस्तान में चीन द्वारा वित्तपोषित ग्वादर बंदरगाह के पास स्थित है. चाबहार बंदरगाह का विकास भारत और ईरान मिल कर कर रहे हैं. यह ईरान के दक्षिणी तट पर सीस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में है.

भारत और ईरान दोनों के लिए यह बंदरगाह रणनीतिक महत्त्व रखता है. यह पाकिस्तान को बाईपास कर के भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया के साथ व्यापार के लिए एक वैकल्पिक रास्ता देता है. यह बंदरगाह इस क्षेत्र में व्यापार मार्गों और कनैक्टिविटी को मजबूत करने के भारत के प्रयासों का हिस्सा है. ईरान-इजराइल के बीच सैन्य कार्रवाई इन प्रयासों को खतरे में डाल सकती है.

इस के अलावा इंटरनैशनल नौर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कौरिडोर (आईएनएसटीसी) में भी बाधा पैदा हो जाएगी. गौरतलब है कि आईएनएसटीसी भारत, ईरान, अफगानिस्तान, आर्मेनिया, अजरबैजान, रूस, मध्य एशिया और यूरोप के बीच माल ढुलाई के लिए 7,200 किलोमीटर लंबी मल्टी-मोड परिवहन परियोजना है. भारत क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा देने, खासकर अफगानिस्तान से इस की कनैक्टिविटी, के लिए इस परियोजना पर जोर दे रहा है. इस क्षेत्र में संघर्ष बढ़ा तो इस के पूरे पश्चिम एशियाई क्षेत्र में फैलने की आशंका है. इस से यह क्षेत्र फिर से अस्थिर हो सकता है, जिस से भारत की ऊर्जा, सुरक्षा और व्यापार मार्ग प्रभावित हो सकता है. आसपास के देशों के भी लड़ाई में शामिल होने से खतरा बढ़ जाएगा. इस से भारत के लिए स्थिति और जटिल हो सकती है.

भारत ईरान और इजराइल दोनों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना चाहता है. भारत के ईरान के साथ संबंध मजबूत रहे हैं. दोनों देशों के बीच उच्च स्तरीय आदानप्रदान और सहयोग समझौते हुए हैं. ईरान के साथ भारत के आर्थिक संबंध व्यापार, निवेश और बुनियादी ढांचे के विकास सहित कई क्षेत्रों तक फैला हुआ है. ईरान के साथ भारत के व्यापार संबंधों में चावल और फार्मास्युटिकल से ले कर मशीनरी व आभूषण तक का आयातनिर्यात शामिल है.

भारतीय कंपनियां ईरान और इजराइल दोनों देशों में कारोबार कर रही हैं. कंपनियां विकास परियोजनाओं से ले कर व्यापार साझेदारी तक में शामिल हैं. रक्षा और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में इजराइल के साथ भारत की साझेदारी बढ़ी है. ईरान-इजराइल के बीच तनाव बने रहने से इन कंपनियों को खतरों और अनिश्चितताओं का सामना करना पड़ सकता है.

खाड़ी के देशों में 90 लाख से अधिक भारतीयों की जान खतरे में

मध्यपूर्व के खाड़ी के देशों में 90 लाख से अधिक भारतीय रहते हैं. इन में ईरान में करीब 10 हजार, इजराइल में 18 हजार से अधिक लोग रहते हैं. खाड़ी सहयोग परिषद् के देशों- बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात में लगभग 90 लाख भारतीय रहते हैं. पूरी दुनिया में भारतीयों की आबादी 3 करोड़ से अधिक है. युद्ध के हालात बनने पर इतनी बड़ी संख्या में लोगों का भारत लौटना संभव नहीं है.

श्रेया वर्मा: समाजवादी पार्टी में तीसरी पीढ़ी का दखल

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श्रेया वर्मा समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक बेनी प्रसाद वर्मा की पोती हैं. इस से एक बात और साफ होती है कि चुनाव लड़ना अब सामान्य परिवार और खासकर महिलाओं के लिए सरल नहीं है.

समाजवादी पार्टी यानी सपा ने 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की गोंडा सीट से श्रेया वर्मा को अपना उम्मीदवार बनाया है. 31 साल की श्रेया वर्मा बेनी प्रसाद वर्मा की पोती और राकेश वर्मा की बेटी हैं. बेनी प्रसाद वर्मा सपा के संस्थापक सदस्यों में से एक रहे हैं. मुलायम सिंह यादव के बेहद करीबी रहे बेनी प्रसाद को मुलायम सिंह यादव के बाद सपा में नंबर 2 का नेता माना जाता था.

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बेनी प्रसाद 5 बार सांसद रहे. केंद्र सरकार में वे मंत्री भी रहे. 2009 में बेनी प्रसाद वर्मा ने कांग्रेस के टिकट पर अपने गृह जनपद बाराबंकी से लगे गोंडा से लोकसभा का चुनाव जीता था. इस के अलावा बेनी प्रसाद वर्मा ने अपने सभी लोकसभा चुनाव कैसरगंज सीट से जीते थे. बाराबंकी सुरक्षित सीट है. इस कारण बेनी प्रसाद वर्मा ने यहां से कोई चुनाव नहीं लड़ा. 2016 में वे वापस समाजवादी पार्टी में जुड़ गए थे.

श्रेया के पिता राकेश वर्मा भी सपा नेता हैं. 2012 से 2017 के बीच अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी सरकार में राकेश वर्मा मंत्री रहे. राकेश वर्मा 2022 के विधानसभा चुनाव में बाराबंकी की कुर्सी सीट से भाजपा के साकेंद्र प्रताप से महज 520 वोटों से हार गए थे.

श्रेया समाजवादी महिला सभा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं. श्रेया ने पहले कोई चुनाव नहीं लड़ा है. श्रेया ने अपनी स्कूली शिक्षा उत्तराखंड के वेल्हम गर्ल्स स्कूल से की. इस के बाद दिल्ली के रामजस कालेज से अर्थशास्त्र औनर से स्नातक की पढ़ाई पूरी की. उन की मां सुधा रानी वर्मा बाराबंकी में डिग्री कौलेज चलाती हैं. श्रेया कालेज के मैनेजमैंट में अपनी मां की मदद करती हैं.

श्रेया वर्मा 2 साल पहले सपा में शामिल हुईं. तब से पार्टी गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग ले रही हैं. उन्होने 2022 के विधानसभा चुनाव में पिता के चुनावी अभियान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. 2023 में श्रेया वर्मा की शादी हो चुकी है. श्रेया वर्मा का शिक्षा से बेहद लगाव रहा है. बाराबंकी में बेनी प्रसाद वर्मा एकेडमी की शुरुआत की थी उन्होंने. उस में गरीब बच्चों को सिविल सेवा समेत तमाम मामलों में मुफ्त शिक्षा दी जाती है. दिल्ली में एनजीओ के साथ जुड़ कर बच्चों को सेवा देती रही हैं.

मुद्दा परिवारवाद नहीं, विरासत की राजनीति

राजनीति में एक दौर वह था जब परिवारवाद के नाम पर बात करने में नेता असहज हो जाते थे. वह सोच बदल चुकी है. परिवारवाद तो अब किसी तरह का मुद्दा ही नहीं रह गया है. यही वजह है कि अपने चुनावप्रचार में श्रेया वर्मा अपने बाबा बेनी प्रसाद के कार्यकाल में गोंडा में हुए विकास कार्यों को उजागर कर रही हैं. वे कह रही हैं कि ‘बाबा ने जिन कार्यों को अधूरा छोड़ा है उन को पूरा करने मैं आई हूं.’ इस बात पर जनता का समर्थन मिल रहा है.

गोंडा अयोध्या से 50 किलोमीटर दूर है. लगभग 13 लाख मतदाताओं वाली गोंडा संसदीय सीट में 5 विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं. गोंडा सदर, मेहनौन, उतरौला, मनकापुर और गौरा. जहां गोंडा सदर, उतरौला और मेहनौन में मुसलिम और कुर्मी मतदाताओं की अच्छीखासी संख्या है, वहीं मनकापुर और गौरा में कुर्मी मतदाताओं की अच्छीखासी संख्या है.

श्रेया वर्मा को समाजवादी पार्टी ने कुर्मी वोटरों को साधने के लिए इस सीट पर उतारा है. गोंडा लोकसभा क्षेत्र में लगभग 21 प्रतिशत मुसलिम वोटर हैं. इस के साथ ही जातीय आधार पर कुर्मी वोटर बड़े प्रतिशत में श्रेया वर्मा को वोट करेंगे.

श्रेया वर्मा के लिए चुनौतियां कम नहीं

2022 के विधानसभा चुनाव में इन सभी सीटों पर बीजेपी उम्मीदवारों ने जीत हासिल की थी. गोंडा लोकसभा सीट पर भाजपा के कीर्ति वर्धन सिंह जीते थे. श्रेया वर्मा अपने चुनावी प्रचार अभियान में बेरोजगारी, महंगाई और महिलाओं से जुड़े मुद्दे उठा रही हैं. वे शिक्षा के महत्त्व को भी बता रही हैं, जातीय जनगणना की बात भी कर रही हैं. श्रेया की दिक्कत यह है कि अयोध्या से करीब होने के कारण गोंडा लोकसभा सीट पर राममंदिर का अच्छाखासा प्रभाव है.

इस से हिंदू वोटरों में सेंध लगाना मुश्किल है. भाजपा से 2 विधायक प्रभात वर्मा गौरा विधानसभा से और उतरौला विधानसभा से राम प्रताप वर्मा हैं जो वर्मा वोटरों को बिखरने नहीं देंगे. दूसरी चुनौती श्रेया वर्मा के लिए बाहरी होने की भी है. श्रेया बाराबंकी जिले से हैं. श्रेया वर्मा के विरोधी उन के बाहरी होने का मुद्दा उठा रहे हैं. बेनी प्रसाद वर्मा की विरासत के लाभ हैं तो उस के नुकसान भी हैं.

2009 लोकसभा चुनाव में श्रेया के बाबा बेनी प्रसाद वर्मा गोंडा से ही सांसद थे. सांसद बनने के बाद बेनी प्रसाद ने कई प्रोजैक्ट का शिलान्यास गोंडा में किया था. उन्हीं में से एक प्रोजैक्ट का शिलान्यास 2014 में हुआ, जो काफी विवादों में रहा. यह प्रोजैक्ट पावर प्लांट का था. चुनावी साल में बेनी प्रसाद ने आचार संहिता लगने से महज एक दिन पहले शहर से 30 किलोमीटर की दूरी पर एक पावर प्लांट का शिलान्यास किया था, जो गोंडा की जनता के लिए धोखा साबित हुआ. जिस जमीन पर शिलान्यास किया गया था उस जमीन का कोई अनुबंध नहीं था और न ही ऐसा कोई प्रोजैक्ट पावर प्लांट गोंडा को मिला था.

2009 से 2014 तक केंद्र में यूपीए की सरकार थी जिस को समाजवादी पार्टी का समर्थन प्राप्त था. इस के बाद भी बेनी प्रसाद वर्मा गोंडा में कोई उल्लेखनीय विकास कार्य नहीं करा पाए. इन आरोपों को भी श्रेया वर्मा को झेलना पड़ रहा है. ऐसे में जीत की गारंटी पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक पर ही टिकी है.

संबंध: पति की बेवफाई के बावजूद ससुराल से नीरू ने क्यों रखा रिश्ता?

शादी का जब वह निमंत्रण आया था, पूरे घर में हंगामा मच गया था. मां बोली थीं, ‘‘अब यह नया खेल खेला है कम्बख्त ने. पता नहीं क्या गुल खिलाने जा रही है. जरूर इस के पीछे कोई राज है वरना 2 बेटों के रहते कोई इतना बड़ा बेटा गोद लेता है? अब उस की शादी रचाने जा रही है.’’

बड़े भैया राकेश बोले थे, ‘‘आप की और वीरेश की सहमति होगी तभी तो उस ने बाप की जगह वीरेश का नाम छपवाया है.’’

मां ने प्रतिवाद किया, ‘‘अरे कैसी सहमति? तुम्हारे पापा की तेरहवीं पर बताया था कि राहुल को बेटे जैसा मानने लगी है. हम तो उसे ड्राइवर समझते थे. बरामदे में ही चाय भिजवा दिया करते थे.’’

‘‘क्या बात करती हैं?’’ राकेश बोले, ‘‘राहुल हर वक्त साथसाथ रहता है नीरू के. सारा बिजनैस देखता है. बैंक अकाउंट तक उस के नाम है. आप ने ही तो बताया था.’’

‘‘अरे कहती थी कि भागदौड़ के लिए ही रखा है उसे. अकेली औरत क्याक्या करे. अब क्या पता था कि बाकायदा बेटा बना लेगी उसे.’’

‘‘तो नुकसान क्या है? आप समझ लीजिए 3 पोते हैं आप के,’’ बड़े भैया ने बात को हलका करना चाहा, ‘‘वीरेश आए तो उस से पूछिएगा.’’

महत्त्वाकांक्षी नीरू को घर से गए 8 साल हो गए थे. 14 और 10 साल के सुधांशु और हिमांशु को छोड़ कर जब उसे जाना पड़ा था तब घर का वातावरण काफी विषाक्त हो चुका था. लगने लगा था कि कभी भी कुछ अवांछनीय घट सकता है.

वीरेश शुरू से ही मस्तमौला किस्म का इंसान रहा है. घूमनाफिरना, सजनासंवरना, नाचनागाना यही शौक थे बचपन से. घर का लाड़ला, मां का दुलारा. मस्तीमस्ती में एमए कर के गाजियाबाद में ही नौकरी भी ढूंढ़ ली. जबकि बड़ा बेटा राकेश सरकारी नौकरी में गाजियाबाद से बाहर ही रहा.

इस से भी मां का लाड़ वीरेश पर कुछ ज्यादा बरसा. पैसे की कमी नहीं थी. पिताजी की पैंशन और पैतृक मकान के 2 हिस्सों का किराया नियमित आमदनी थी. वीरेश धीरेधीरे लापरवाह होने लगा. एक नौकरी छूटी, दूसरी ढूंढ़ी. कभी इस सिलसिले में घर भी बैठना पड़ता. पिताजी भुनभुनाते, ‘कहीं बाहर  क्यों नहीं एप्लाई करते हो?’

मां फौरन बोलतीं, ‘एक बेटा तो  बाहर ही रहता है. यह यहीं रहेगा. नौकरियों की कमी है क्या?’

पिताजी चिल्लाते, ‘घरघुस्सा होता जा रहा है. जाहिल भी हो गया है. 9 बजे से पहले सो कर नहीं उठता. 3-4 कप चाय पीता है, तब इस की सुबह होती है. 11 बजे नौकरी पर जाएगा तो कौन रखेगा इसे? कितनी अच्छीअच्छी नौकरियां छोड़ दीं. मैं कब तक खिलाऊंगा इसे?’

पर वीरेश पर असर नहीं होता. मां बचाव करतीं, ‘शादी हो जाएगी तो सब ठीक हो जाएगा.’

‘कौन देगा इस निखट्टू को अपनी लड़की?’ पिताजी हथियार डाल देते.

लेकिन सुंदर चेहरेमोहरे वाला निखट्टू वीरेश प्रेम विवाह कर पत्नी ले आया. नीरू सुंदर थी. शादी के बाद वीरेश और लाटसाहब हो गया. अब शाम को कभीकभार डिं्रक्स भी लेने लगा. शुरूशुरू में तो नीरू को अच्छा लगा पर जब वीरेश घूमनेफिरने, पिक्चर वगैरह के लिए भी मां से रुपए मांगता तो उसे बुरा लगता. वीरेश नौकरी करता पर 6 महीने या साल भर से ज्यादा नहीं. कभी निकाल दिया जाता, कभी खुद छोड़ आता. कभी नौकरी जाने के गम में, कभी नौकरी मिलने की खुशी में, कभी किसी की सालगिरह पर, मतलब यह कि बेमतलब के बहानों से शराब पीना बढ़ता गया. 5 साल में 2 बेटे भी हो गए.

बड़े भैया होलीदीवाली आते भी तो मेहमान की तरह. कभी वीरेश को समझाने की कोशिश करते तो बीच में फौरन मां आ जातीं, ‘तुम सभी उस बेचारे के पीछे क्यों पड़े रहते हो? अब उस का समय ही खराब है तो कोई क्या करे? कोई ढंग की नौकरी मिलती ही नहीं उसे. तेरी तरह सरकारी नौकरी में होता तो यह सब क्यों सुनना पड़ता उसे?’

‘क्यों, सरकारी नौकरी में काम नहीं करना पड़ता है क्या? मेरा हर 3 साल में ट्रांसफर होता है. कितनी परेशानी होती है. मकान ढूंढ़ो, बच्चों का नए स्कूल में ऐडमिशन करवाओ. बदलता परिवेश, बदलते लोग. आसान नहीं है सरकारी नौकरी. इन का क्या है? ठाट से घर में रहते हैं. खिलाने को आप लोग हैं. जब बैठेबैठे खाने को मिले तो कोई क्यों करे नौकरी?’

‘बसबस, रहने दे. जब देखो तब जलीकटी सुनाता रहता है. कोई अच्छी सी नौकरी ढूंढ़ इस के लिए.’

‘अच्छी सी माने? जहां काम न हो? हुकम बजाने के लिए नौकर हो? घूमने के लिए गाड़ी हो? शाम के लिए दारू हो?’

‘देखा मां,’ अब वीरेश बोला, ‘इसीलिए मैं इन के साथ नहीं बैठता हूं.

4 दिन के लिए आते हैं और चिल्लाते रहते हैं.’

वीरेश गुस्से से बाहर चला जाता. मां बड़बड़ातीं. पिताजी कभी राकेश का साथ देते तो कभी मां का.

बच्चे बड़े हो रहे थे. खर्चे बढ़ रहे थे पर वीरेश में कोई परिवर्तन नहीं हुआ. पिताजी अकसर बड़बड़ाते. खासकर जब राकेश आते छुट्टियों में, ‘मैं पैंशन से 2-2 परिवार कैसे पालूं? तुम्हीं कुछ भेजा करो. बच्चे स्कूल जाने लगे हैं. कम से कम उन की फीस तो दे ही सकते हो.’

राकेश झुंझलाते, ‘मेरे खर्चे नहीं हैं क्या? तनख्वाह से मेरा भी बस गुजारा ही हो रहा है. आप जानते हैं कि

कोई ऊपरी आमदनी भी नहीं है मेरी. चलाने दीजिए इस को अपनी गृहस्थी किराए से या कैसे भी. अपनेआप

ठीक हो जाएगा. आप लोग चलिए मेरे साथ इलाहाबाद.’

‘बेटे, भूखा मरते तू देख सकता है भाई को. मांबाप नहीं देख सकते. हम तो करेंगे जितना हो सकेगा. तुझे मदद नहीं करनी, मत कर. किराए से बेचारे वीरेश का खर्च कैसे चलेगा?’ मां आ जातीं बीच में.

‘बेचारा, बेचारा, क्यों है बेचारा वह? लूलालंगड़ा है? दिमाग से कमजोर है? क्या कमी है उस में? अच्छीखासी नौकरियां छोड़ीं उस ने. किस वजह से? अपनी काहिली की वजह से न? गाजियाबाद छोड़ कर कहीं बाहर नहीं जाएंगे, क्यों? घर बैठे हलुआपरांठा मिले तो कोई काम क्यों करे? आप लोगों ने ही बिगाड़ा है उसे. कभी सख्ती से नहीं कहा कि पालो अपना परिवार,’ राकेश के सब्र का बांध टूट गया.

‘कहा है बेटा, कई बार कहा,’ अब पिताजी ने सफाई दी, ‘पहले कहता था कि मैं कोशिश करता हूं पर अच्छी नौकरी नहीं मिलती. अब कहता है कि घर छोड़ दूंगा, साधु बन जाऊंगा, आत्महत्या कर लूंगा. एक बार चला भी गया था. 2 दिन तक नहीं आया. तुम्हारी मां का रोरो कर बुरा हाल हो गया था.’

‘इसे क्या? यह तो आराम से बाहर नौकरी करता है. वह तो मेरी ममता थी जो उसे खींच लाई वरना वह साधु बन गया था,’ मां ने कहा.

‘मां की ममता नहीं थी, भूख के थपेड़े थे. पैसे खत्म हो गए होंगे लाटसाहब के,’ राकेश चिल्लाए.

‘ठीक है, यह बहस, अब बंद करो,’ हमेशा की तरह मां बड़बड़ाती हुई चली गईं.

वीरेश और नीरू के झगड़े बढ़ने लगे. अकसर मारपीट तक नौबत आ जाती. बच्चों के कोमल मन पर असर पड़ने लगा था.

बड़ा बेटा सुधांशु गुमसुम हो गया था. छोटा बेटा हिमांशु जिद्दी और मनमौजी. नीरू ने खुद काम करना शुरू किया. कभी छोटी नौकरी की, कभी घर में अचारमुरब्बे बना कर बेचे. इस के लिए उसे घर से बाहर निकलना पड़ता तब भी वीरेश चिल्लाता, ‘देखो, कैसे नखरे दिखा रही है  कामकाजी बन कर, जैसे घर में भूखी मरती है. अरे, इस का मन ही नहीं लगता घर में. बाहर 10 लोगों से मिलती है, रंगरेलियां मनाती है. मां, जरा पूछो इस से, कितनी कमाई कर के लाती है?’

नीरू जवाब देती तो झगड़ा और बढ़ता. मां अकसर वीरेश का पक्ष लेतीं और बहस मारपीट तक पहुंच जाती. बच्चे सहमे हुए होमवर्क करने का नाटक करने लगते. यह झगड़ा तब जरूर होता जब वीरेश नशे में होता.

तभी वीरेश को एक अच्छी एडवरटाइजिंग कंपनी में स्थानीय प्रतिनिधि की नौकरी मिल गई. लगा अब सब ठीक हो जाएगा. वीरेश को अपनी कंपनी के लिए विज्ञापन लाने का काम करना था. पर उस के आलसी स्वभाव के कारण उसे विज्ञापन नहीं मिल पाते थे.

नीरू ने वीरेश की मदद की और विज्ञापन मिलने लगे. अब होता यह कि जाना वीरेश को होता पर वह नीरू को भेज देता. कभी नीरू को विज्ञापनों के सिलसिले में कंपनी के जीएम से सीधे बात करनी पड़ जाती. नतीजा यह हुआ कि कंपनी ने कुछ ही दिनों में वीरेश की जगह नीरू को प्रतिनिधि नियुक्त कर दिया.

इस पर घर में महाभारत हो गया और नीरू ने नियुक्ति अस्वीकार कर दी, पर कंपनी ने वीरेश को फिर नियुक्त नहीं किया. मां ने वीरेश की नौकरी जाने का सारा दोष नीरू के सिर मढ़ दिया और वीरेश फिर शराब में डूब गया.

बच्चों के बढ़ते खर्चे और वीरेश के तानों से तंग आ कर नीरू ने एक बार फिर प्रयास किया और खुद ही भागदौड़ कर सरकार की महिला स्वरोजगार योजना के तहत बैंक से लोन लिया और फल संरक्षण केंद्र खोल लिया. पर उस के लिए भी उसे घर से बाहर जाना पड़ता.

कुछ दिनों बाद यह काम भी बंद हो गया. बैंक से ऋण वसूली का नोटिस आया. वीरेश ने जवाब भिजवाया कि यहां कोई नीरू नहीं रहती. पर बैंक के रिकौर्ड्स में नीरू के पति वीरेश और पारिवारिक मकान के सत्यापन प्रमाण थे. इसलिए रिकवरी नोटिस ले कर बैंक अधिकारी पुलिस के साथ पहुंच गए.

वीरेश के हाथपांव फूल गए और वह नीरू को उस के मायके छोड़ आया. पिताजी ने सरकारी नौकरी का वास्ता दिखा कर समय मांगा और बैंक की ऋण अदायगी की. इस में नीरू के और कुछ मां के भी जेवर बिक गए. राकेश ने भी काफी रुपए भिजवाए. मां ने ऐलान कर दिया कि वह कम्बख्त अब इस घर में दोबारा नहीं आएगी और भला वीरेश को इस में क्या ऐतराज हो सकता था?

बाद में नीरू ने एक पत्र राकेश को भी लिखा. उस का सारा आक्रोश मां के ऊपर था पर वीरेश को भी कभी माफ न करने की कसम खाई थी. इतना ही नहीं, उस ने आरोप लगाया था कि वीरेश ने एडवरटाइजिंग कंपनी में अपनी स्टैनो से अवैध संबंध भी बना लिए थे. सुबूत के तौर पर एक पत्र भी संलग्न था जो किसी किरन ने वीरेश को लिखा था.

राकेश सन्न रह गए थे. ऐसी स्थिति में मां को या वीरेश को समझाना व्यर्थ था. उन्होंने नीरू को ही समझाया कि इस स्थिति में समझौते से अच्छा है अपने पैरों पर खड़ा होना. बाद में पता चला कि नीरू ने दिल्ली जा कर पहले ऐडवरटाइजिंग एजेंसी में काम किया. फिर प्रौपर्टी डीलर बन गई. फ्लैट लिया, गाड़ी ली. घर तो कभी नहीं आई पर बच्चों से उन के स्कूलों में मिलती रही. जन्मदिन पर, त्योहारों पर बच्चों को तोहफे भी भिजवाती रही.

साल दर साल बीतते गए. मांपिताजी ने कोशिश की कि तलाक दिलवा कर वीरेश की दूसरी शादी करवाएं पर नीरू का संदेश आया कि भूल कर भी ऐसा नहीं करिएगा वरना शारीरिक प्रताड़ना के बाद घर से निकालने का केस बन जाएगा. वीरेश संन्यासी सा हो गया.

बढ़ती उम्र और शराब ने एक अजीब दयनीयता पोत दी थी उस के चेहरे पर. न किसी से मिलना न कहीं जाना. बस, शाम को किसी बहाने से मां से पैसे ले कर निकल जाता और देर रात झूमताझामता आता और सो जाता. तरस आने लगा उसे देख कर.

करीब 8 साल बाद नीरू घर आई जब पिताजी की मृत्यु हुई. शोक के अवसर पर किसी ने उस से कुछ नहीं कहा. तभी पहली बार सब ने राहुल को देखा था. 25-26 वर्ष का हट्टाकट्टा लड़का, चुपचाप बरामदे में बैठा था. सब ने उसे ड्राइवर ही समझा था. संवेदना व्यक्त कर के नीरू चली गई पर उस के बाद वह अकसर आने लगी. मां और वीरेश के व्यवहार से लगा कि उन्होंने उसे अपनाने का मन बना लिया.

एक बार जिद कर के अपनी कार से वह उन्हें नोएडा भी ले गई जहां उस ने शानदार फ्लैट लिया था. सुधांशु को नौकरी दिलवाने में मदद की और हिमांशु को इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला दिलवाया. वीरेश अकसर नोएडा जाने लगा. गाड़ी पटरी पर आ ही रही थी कि यह धमाका हो गया.

राहुल की शादी का कार्ड आया. मां की जगह नीरू, पिता की जगह वीरेश और दादी की जगह मां का नाम छपा था.

सुगबुगाहट थमी भी नहीं थी कि एक शाम नीरू आई, मिठाई के डब्बे और उपहारों के साथ. राहुल की सगाई में उस की ससुराल से मिले थे उपहार. कार्ड के बारे में पूछने पर नीरू ने कहा कि उस ने वीरेश को बता दिया था कि उस ने बाकायदा राहुल को गोद लिया है और वीरेश ने कोई आपत्ति नहीं की थी.

अब नीरू उस की मां हो गई तो वीरेश स्वत: ही पिता हो गया और मां दादी. वीरेश ने ही उस का बचाव किया, ‘अपने बेटों से इतने साल अलग रही तो राहुल को देख कर मातृत्व जागा और जब बेटा बना ही लिया तो शादी भी करनी थी.’ सब ने इस पर मौन सहमति दे दी.

राहुल की शादी में सब सम्मिलित हुए. सुधांशु और हिमांशु भी भैया की शादी में खूब नाचे. मां तो गद्गद थीं. नीरू ने उन्हें कई कीमती साडि़यों के साथ हीरे के टौप्स दिए थे. राहुल की ससुराल से भी दादीमां के लिए साड़ी मिली थी. शादी के बाद नीरू बहू को ले कर जब गाजियाबाद गई तब मां ने मुंहदिखाई में साड़ी दी बहू को. इसी हंसीखुशी के माहौल में मां ने नीरू से कहा कि अब वह भी लौट आए और अपनी गृहस्थी संभाले.

नीरू 1 मिनट तो चुप रही फिर जैसे फट पड़ी, ‘‘आप अपने लड़के की फिक्र कीजिए मांजी. मेरी गृहस्थी तो उजड़ी भी और बस भी गई. उजड़ी तब थी जब मुझे धोखे से मायके पहुंचा दिया गया था कि मामला ठंडा होने पर ले आएंगे. और ये शायद खुद सौत लाने की फिराक में थे. सब ने इन्हीं का साथ दिया था तब. जैसे सारी गलती मेरी ही हो. मेरा कसूर यही था न कि मैं आप के बेटे को उस के पैरों पर खड़ा देखना चाहती थी. तब उजड़ी थी मेरी गृहस्थी और बसी तब जब मैं अपने पैरों पर खड़ी हो गई. हां, तब मुझे भी गैर मर्दों का सहारा लेना पड़ा था. पर अब मुझे किसी सहारे की जरूरत नहीं.

‘‘पता नहीं मेरे बेटे मेरे रह पाते या नहीं इसलिए एक बेटा अपनाया. अब मैं भी सासू मां हूं. मेरा भरापूरा परिवार है. अब जिसे मेरा साथ चाहिए वह आए मेरे पास. इस घर से मैं ने अपना संबंध टूटने नहीं दिया. पर वह संबंध अब आप की शर्तों पर नहीं, मेरी शर्तों पर रहेगा. पूछिए अपने बेटे से, क्या वे रह सकते हैं मेरे साथ, मेरी शर्तों पर या यों ही मां की पैंशन पर जिंदगी गुजारने का इरादा रखते हैं?’’

सब हैरान थे पर वीरेश के मौन आंसू उस की सहमति बयान कर रहे थे.

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