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Family Story in Hindi : हाय रे पर्यटन

Family Story in Hindi : सहेलियों पर अपना रोब झाड़ने के लिए मिसेज शर्मा ने किसी हिल स्टेशन  पर जाने की चेतावनी दे डाली. मैं, बेचारा अपनी जेब की तंगदिली का मारा हुआ, कभी पत्नी और बच्चों के उत्साह को देखता तो कभी पर्यटन के नाम पर शौपिंग करते हुए पैसों को धूंधूं उड़ते हुए.

आजकल पर्यटन पर खास जोर है. जिसे देखो वही कहीं न कहीं जा रहा है. कोई शिमला, कोई मनाली, कोई ऊटी. पत्नी भी कहां तक सब्र रखती, आखिर एक दिन कह ही दिया, ‘‘देखो, बहुत हो गया. इतने साल हो गए हमारी शादी को, आप कहीं नहीं ले जाते. ले दे कर पीहर और रिश्तेदारों के अलावा आप की डायरी में दूसरी कोई जगह ही नहीं है. अब तो किटी में भी लोग मुझ से पूछते हैं, ‘मिसेज शर्मा, आप कहां जा रही हो.’ अब मैं क्या जवाब दूं. मैं ने भी उन से कह दिया कि हम भी इस बार हिल स्टेशन जा रहे हैं.

‘‘इस बार आप पक्की तरह सुन ही लो. हमें इस बार किसी न किसी हिल स्टेशन पर जाना ही है, चाहे लोन ही क्यों न लेना पड़े. मेरी नाक का सवाल है,’’ यह कह कर वह कोपभवन में चली गईं.

हमारे जैसे शादीशुदा लोग पत्नी के कोप से अच्छी तरह परिचित हैं. वे जानते हैं कि एक बार निर्णय लेने के बाद पत्नियों को कोई नहीं समझा सकता, सो मैं ने समझौतावादी नीति अपनाई और उन्हें बातचीत के लिए आमंत्रित किया. एकतरफा बातचीत के बाद मैं ने मान लिया कि इस बार शिमला जाना ही हमारी नियति है.

रेलवे टाइमटेबिल में से कुछ गाडि़यां नोट कर मैं रिजर्वेशन कराने रेलवे के आरक्षण कार्यालय पहुंचा. कार्यालय बिलकुल खाली पड़ा था. मैं मन ही मन खुश हो उठा कि चलो अच्छा हुआ, अभी 5 मिनट में रिजर्वेशन हो जाएगा.

चंद मिनटों में मेरा नंबर भी आ गया.

‘‘लाइए,’’ यह कहते हुए आरक्षण क्लर्क ने मेरा फार्म पकड़ा और उस पर अपनी पैनी नजर फिरा कर मुझे वापस पकड़ा दिया.

‘‘क्या हुआ?’’ मैं ने चौंक कर पूछा, ‘‘आप ने फार्म वापस क्यों दे दिया?’’

वह क्लर्क हंस कर बोला, ‘‘भाईसाहब, गाड़ी में नो रूम है यानी कि अब जगह नहीं है.’’

‘‘तो कोई बात नहीं, दूसरी गाड़ी में दे दीजिए.’’

‘‘इस समय इस ओर जाने वाली किसी भी गाड़ी में कोई जगह नहीं है.’’

‘‘कैसी बात करते हैं. सारे काउंटर खाली पड़े हैं और आप हैं कि…’’

‘‘ऐसा है, आप तैश मत खाइए. सारी गाडि़यां 2 महीने पहले ही बुक हो गई हैं. अब कहें तो जुलाई का दे दें.’’

एकाएक मुझे खयाल आया कि मैं भी कैसा बेवकूफ हूं. नहीं मिला तो अच्छा ही हुआ. अब कम से कम इस बहाने जाने से तो बचा जा सकता है.

मैं खुशीखुशी घर लौट आया और जैसे ही घर में प्रवेश किया तो यह देख कर हैरान रह गया कि वहां महल्ले की किटी कार्यकारिणी की सभी महिला पदाधिकारी अपने बच्चों सहित मौजूद थीं.

‘‘भाईसाहब, बधाई हो, आप ने शिमला का निर्णय ठीक ही लिया, पर लगे हाथ कुल्लूमनाली भी हो आइएगा,’’ मिसेज वर्मा बोलीं.

‘‘अरे, जब वहां जा रहे हैं तो कुल्लूमनाली को कैसे छोड़ देंगे,’’ श्रीमतीजी चहक कर बोलीं.

‘‘और भाईसाहब, रिजर्वेशन ए.सी. में ही करवाइएगा, नहीं तो आप पूरे रास्ते परेशान हो जाएंगे.’’

‘‘अरे भाभीजी, हमारे साहब के स्वभाव में तकलीफ उठाना तो बिलकुल नहीं है. हम ने तो ए.सी. में ही रिजर्वेशन करवाया है. इन्होंने तो होटल में भी ए.सी. रूम ही बुक करवाए हैं.’’

मुझे काटो तो खून नहीं. केवल स्टेटस सिंबल के लिए श्रीमतीजी झूठ पर झूठ बोलती जा रही थीं.

चायनाश्ते के दौर के बाद जब महिला ब्रिगेड विदा हुई तो मैं धम से सोफे पर पड़ गया.

उन्हें छोड़ कर वे अंदर आईं तो मेरा हाल देख कर घबरा गईं, ‘‘क्या हो गया, तुम्हारी तबीयत तो ठीक है न.’’

मैं ने श्रीमतीजी को रिजर्वेशन की असलियत बताई तो वह बिफर उठीं, ‘‘तुम कैसे आदमी हो, तुम से एक रिजर्वेशन नहीं हुआ. मैं नहीं जानती. मुझे इस बार शिमला जरूर जाना है. अब तो मेरी नाक का सवाल है,’’ कह कर वह अंदर चली गईं.

बेटी, मां की बात सुन कर मुसकराई, ‘‘देखो पापा, मम्मी की नाक का सवाल बहुत बड़ा होता है. इस सवाल में अच्छेअच्छों के कान भी कट जाते हैं. ऐसा करते हैं, गाड़ी कर के चलते हैं.’’

अब इस फैसले को मानने के अलावा मेरे पास कोई चारा नहीं था.

सीने पर पत्थर रख कर मैं गाड़ी की बात करने गया. गाड़ी का रेट सुन कर मेरे होश उड़ गए, पर क्या करता, श्रीमतीजी की नाक का सवाल सब से बड़ा था. मुझे लगा, जितने पैसे में घूम कर आ जाते, उतना तो गाड़ी ही खा जाएगी, लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था.

देखतेदेखते वह दिन भी आ गया. सोसायटी की सभी महिलाएं विदा करने आईं. श्रीमतीजी फूली नहीं समा रही थीं. वह मेरी तरफ ऐसे देख रही थीं जैसे कह रही हों, देखो, मेरी इज्जत. हां, बात करतेकरते सभी महिलाएं अपने लिए शिमला से कुछ न कुछ लाने की फरमाइश कर रही थीं, जिसे श्रीमतीजी सहर्ष स्वीकार करती जा रही थीं. इन फरमाइशों की सूची सुन कर मेरा दिल घबराने लगा था.

अंतत: गाड़ी रवाना हुई तो श्रीमतीजी ने प्रधानमंत्री की तरह हाथ हिला कर सोसायटी वालों से विदा ली. थोड़ी देर में सूरज सिर पर आ गया. लू के थपेड़े चलने लगे. गाड़ी बुरी तरह तप रही थी. जहां हाथ लगाओ वहीं ऐसा लगता था जैसे गरम सलाख दाग दी गई हो. कुछ देर में पत्नी, फिर बेटी धराशायी हो गई.

बेटा मां से लड़ने लगा, ‘‘यह कौन सा हिल स्टेशन है? हम सहारा मरुस्थल में चल रहे हैं क्या?’’

श्रीमतीजी कराहती हुई बोलीं, ‘‘अरे बेटा, यह तेरे पापा की कंजूसी से ऐसा हुआ है. मैं ने तो ए.सी. गाड़ी लाने को कहा था.’’

जवाब में बेटा और बेटी अपने कलियुगी पिता को घूरने लगे. मैं क्या करता, मैं ने निगाहें नीचे कर लीं.

दवाइयां खाते, उलटियां करते जैसेतैसे कर के शिमला तक पहुंचे. शिमला तक का रास्ता आलोचनाओं में अच्छी तरह कटा. उन की आलोचनाओं का केंद्र मैं जो था.

शिमला पहुंच कर सब ने चैन की सांस ली. ड्राइवर ने सड़क के एक ओर गाड़ी लगा दी.

बेटा अचानक गाड़ी को रुकते देख बोला, ‘‘क्यों पापा, होटल आ गया?’’

‘‘हां, बेटा, तेरे पापा ने फाइव स्टार होटल बुक करा रखा है,’’ श्रीमतीजी व्यंग्य से बोलीं.

ड्राइवर भी हैरान रह गया, ‘‘क्या साहब, आप ने होटल भी बुक नहीं करवाया? सीजन का टाइम है. क्या पहली बार घूमने आए हो?’’

‘‘हां, भैया, पहली बार ही आए हैं. हमारी तकदीर में बारबार घूमने आना कहां लिखा है,’’ श्रीमतीजी लगातार वार पर वार कर रही थीं, ‘‘जा बेटा, उठ और होटल ढूंढ़, मेरे तो बस की नहीं है.’’

फिर बेटे और बेटी को ले कर गलीगली घूमने लगा. ज्यादातर होटल भरे हुए थे, हार कर एक बहुत महंगा होटल कर लिया. अब सब बहुत खुश थे.

उस दिन आराम किया. शाम को माल रोड घूमने निकले. मैं उन्हें बता रहा था, ‘‘देखो, रेलिंग के नीचे घाटी कितनी सुंदर लग रही है,’’ पर घाटी को निहारने के बाद अपना सिर घुमाया तो पाया मैं अकेला था. ये तीनों अलगअलग दुकानों में घुसे हुए थे.

थोड़ी देर बाद बेटी आई और हाथ पकड़ कर दुकान में ले गई, ‘‘देखो पापा, कितनी सुंदर ड्रेस है.’’

‘‘अच्छा भई, कितने की है?’’ लाचारी में मुझे पूछना पड़ा.

‘‘बस सर, सस्ती है. आप को डिस्काउंट में दे देंगे. मात्र 2 हजार रुपए.’’

मुझे मानो करंट लगा, ‘‘अरे भई, तुम तो दिन दहाड़े लूटते हो. यह डे्रस तो कोटा में 300-400 से ज्यादा की नहीं मिलती है.’’

दुकानदार ने डे्रस मेरे हाथ से छीन ली, ‘‘कोई दूसरी दुकान देखिए साहब, हमारा टाइम खराब मत कीजिए.’’

बेटी को भारी धक्का पहुंचा. बाहर निकलते ही वह रोने लगी, ‘‘आप भी बस पापा, कितना अपमान करवाते हैं.’’

तभी श्रीमतीजी भी बेटे के साथ आ गईं. बेटी को रोते देख उन्होंने मेरी जो क्लास ली कि मेरी जेब का अच्छाखासा पोस्टमार्टम हो गया.

दूसरे दिन कूफरी घूमने का प्रोग्राम बना. कूफरी में घोड़े वाले पीछे पड़ गए कि साहब, ऊपर पहाड़ी पर चलें. मुझे घुड़सवारी में कोई दिलचस्पी नहीं है और फिर रेट इतने कि मैं ने साफ मना कर दिया.

‘‘तुम ऊपर चले चलोगे तो बच्चों का मन बहल जाएगा. बच्चों का मन रखने के लिए क्या इतना भी नहीं कर सकते.’’

‘‘नहीं, बिलकुल नहीं कर सकता,’’ मुझे पत्नी पर गुस्सा आ गया, ‘‘एक बार घर वालों का मन रखने के लिए घोड़ी पर चढ़ा था जिस का मजा आज तक भोग रहा हूं… अब और रिस्क नहीं ले सकता.’’

मेरे इस व्यंग्य को सुन कर श्रीमतीजी ने रौद्र रूप धारण कर लिया. फिर क्या था, मुझे सपरिवार घोड़े की सवारी करनी ही पड़ी. लेकिन जिस बात का डर था, वही हुआ. घोड़े पर से उतरते वक्त मैं संतुलन खो बैठा और धड़ाम से नीचे जा गिरा. मेरे पांव में मोच आ गई. मेरा उस दिन का सफर गाड़ी में बैठेबैठे ही पूरा हुआ. वे बाहर घूमतेफिरते, मजे करते रहे और मैं अंदर बैठाबैठा कुढ़ता रहा.

शाम को वहीं एक डाक्टर को दिखाया. उस ने कहा, ‘‘कोई चिंता की बात नहीं है. एकदो दिन आराम करोगे तो ठीक हो जाएगा.’’

दूसरे दिन सुबह मैं पलंग पर लेटा रहा. तीनों सदस्य अर्थात श्रीमतीजी, पुत्र व पुत्री तैयार होते रहे. थोड़ी देर बाद वे तीनों एकसाथ आ कर मेरे सामने बैठ गए.

मैं बोला, ‘‘कोई बात नहीं. चोट लग गई तो लग गई. तुम लोग परेशान मत हो. जा कर घूम आओ.’’

‘‘हम क्यों परेशान होंगे. हम तो पैसे के लिए बैठे हैं.’’

पैसे ले कर तीनों सुबह के निकले तो रात तक ही लौट कर आए. उन्होंने इतना सामान लाद रखा था कि बड़ी मुश्किल से उठा पा रहे थे.

धीरेधीरे उन्होंने एकएक सामान का रेट बताना शुरू किया तो मेरा दिल बैठ गया. मैं ने खर्च का हिसाब लगाया तो सिर्फ इतने ही रुपए बचे थे कि बस होटल का बिल चुका कर हम जैसेतैसे घर पहुंच सकें.

रात को बैठ कर सारी पैकिंग की गई. कुल्लूमनाली न जाने की बाबत अफसोस जाहिर किया गया और यह चिंता जतलाई गई कि अब श्रीमतीजी घर पहुंच कर कैसे मुंह दिखाएंगी.

दूसरे दिन उदासी भरे चेहरों को ले कर वे शिमला से रवाना हुए और साथ में मुझे लेना भी नहीं भूले.

कुछ घंटों बाद जब हमारी कार पहाड़ों को छोड़ कर मैदानों में पहुंची तो गरमी अपना विकराल रूप दिखाने लगी. लू के थपेड़े खाते हुए जब हम घर पहुंचे तो श्रीमतीजी के आगमन पर पूरा महल्ला इकट्ठा हो गया. श्रीमतीजी रास्ते की थकान भूल गईं.

वह बढ़ाचढ़ा कर शिमला का बखान सुनाने लगीं. सब लोग धैर्य से सुनते रहे. फिर समापन के समय वस्तुवितरण समारोह हुआ. श्रोताओं का धैर्य टूट गया. वे सामानों की आलोचना करने लगे.

‘‘अरे, मिसेज शर्मा, यह शाल थोड़ा आप हलका ले आई हैं.’’

‘‘हां, कपड़े भी ठीक नहीं आए. फुटपाथ से लेने में क्वालिटी हलकी आ ही जाती है.’’

‘‘मिसेज शर्मा, आप ने तो बस घूमने का नाम ही किया, कुल्लूमनाली हो कर आतीं तो कुछ बात भी थी.’’

थोड़ी देर बाद सब चले गए. घर की 3 सदस्यीय ज्यूरी के सामने मैं अपराधी बैठा था. अपराध सिद्ध करने के लिए महल्ले के सभी गवाह पर्याप्त थे.

मुझे दोषी माना गया और सजा दी गई कि अब क्रिसमस की छुट्टियों में गोवा घूमने चलेंगे, जिस का सब इंतजाम बेटा पहले से ही कर लेगा और मुझे सिर्फ एक काम करना होगा, एक भारी राशि का चेक साइन करना होगा ताकि सबकुछ अच्छी तरह से निबट सके. Family Story in Hindi

Social Story in Hindi : हरिराम

Social Story in Hindi :

शशांक अपने आफिस में काम कर रहा था कि चपरासी ने आ कर कहा, ‘‘साहब, आप को बनर्जी बाबू याद कर रहे हैं.’’

उत्पल बनर्जी कंपनी के निदेशक थे. पीठ पीछे उन्हें सभी बंगाली बाबू कह कर संबोधित करते थे. कंपनी विद्युत संयंत्रों की आपूर्ति, स्थापना और रखरखाव का काम करती थी. कंपनी के अलगअलग प्रांतों में विद्युत निगमों के साथ प्रोजेक्ट थे. शशांक इस कंपनी में मैनेजर था.

‘‘यस सर,’’ शशांक ने बनर्जी साहब के कमरे में जा कर कहा.

‘‘आओ शशांक,’’ इतना कह कर उन्होंने उसे बैठने का इशारा किया.

शशांक के दिमाग में खतरे की घंटी बज उठी. उसे लगा कि उस की हालत उस बकरे जैसी है जिसे पूरी तरह सजासंवार दिया गया है और बस, गर्दन काटने के लिए ले जाना बाकी है. शशांक ने अपने चेहरे पर कोई भाव नहीं आने दिया और चुपचाप कुरसी पर बैठ गया.

‘‘तुम्हारा फरीदाबाद का प्रोजेक्ट कैसा चल रहा है?’’

‘‘सर, बहुत अच्छा चल रहा है. निर्धारित समय पर काम हो रहा है और भुगतान भी ठीक समय से हो रहा है.’’

‘‘बहुत अच्छा है. मुझे तुम से यही उम्मीद थी, पर मैं तुम्हें ऐसा काम देना चाहता हूं जो सिर्फ तुम ही कर सकते हो.’’

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शशांक चुपचाप बैठा अपने निदेशक मि. बनर्जी को देखता रहा. उसे लगा कि बस, गर्दन पर तलवार गिरने वाली है.

‘‘शशांक, तुम्हें तो पता है कि लखनऊ वाले प्रोजेक्ट में कंपनी की बदनामी हो रही है. भुगतान बंद हो चुका है. हमें पैसा वापस करने का नोटिस भी मिल चुका है. मैं चाहता हूं कि तुम वह काम देखो.’’

‘‘लेकिन वह काम तो जतिन गांगुली देख रहे हैं,’’ शशांक ने कहा.

‘‘मैं ने फैसला किया है कि अब कंपनी के हित में लखनऊ का प्रोजेक्ट तुम देखोगे और जतिन गांगुली फरीदाबाद का प्रोजेक्ट संभालेगा.’’

शशांक की इच्छा हुई कि कह दे कि उस के साथ इसलिए ज्यादती हो रही है क्योंकि वह बंगाली नहीं है. उस ने सोचा कि कंपनी अध्यक्ष से जा कर मिले पर उसे याद आया कि कंपनी अध्यक्ष सेनगुप्ता साहब भी बंगाली हैं. वह भी बंगाली का ही साथ देंगे.

शशांक अपने केबिन में जाने से पहले अपनी सहकर्मी वंदना के केबिन पर रुका.

‘‘वंदना, चलो काफी पीते हैं. मुझे तुम से कुछ पर्सनल बात करनी है.’’

काफी पीतेपीते शशांक ने उसे सारी बात बता दी.

‘‘अगले 3 माह में प्रमोशन के लिए निर्णय लिए जाएंगे. यह मामला जतिन गांगुली के प्रमोशन का है. लखनऊ प्रोजेक्ट की जो उस ने हालत की है, उस से प्रमोशन तो दूर उसे कंपनी से निकाल देना चाहिए,’’ वंदना ने कहा.

‘‘क्या मैं सेनगुप्ता साहब से मिलूं?’’

‘‘नहीं, उस से फायदा नहीं होगा. तुम्हें लखनऊ जाना पडे़गा पर फरीदाबाद प्रोजेक्ट की फाइलों की सूची बना कर, आज की स्थिति की रिपोर्र्ट बना कर तुम जतिन गांगुली के दस्तखत ले लेना और उस की कापी सेनगुप्ता साहब को भेज देना. प्रोजेक्ट में गड़बड़ होने पर वे लोग तुम्हें दोष दे सकते हैं,’’ वंदना ने सुझाव दिया.

कुछ समय तक दोनों के बीच खामोशी छाई रही.

‘‘शशांक, तुम से एक बात पूछना चाहती हूं. मुझे दोस्त समझ कर सचसच बताना,’’ वंदना बोली.

‘‘क्या बात है?’’

‘‘कहीं तुम्हारे और तुम्हारी पत्नी सरिता के बीच तनाव तो नहीं?’’

‘‘क्यों, क्या हुआ?’’

‘‘पिछले हफ्ते तुम फरीदाबाद प्रोजेक्ट की मीटिंग में थे तब शाम को 8 बजे सरिता का फोन मेरे घर पर आया था. तुम्हारे बारे में पूछ रही थी.’’

शशांक को अपनी पत्नी पर क्रोध आ गया. पर उस ने कहा, ‘‘उस दिन मैं उसे बताना भूल गया था. इसलिए वह परेशान होगी.’’

‘‘शशांक, प्रोजेक्ट और प्रमोशन के बीच में अपने परिवार को मत भूलो,’’ वंदना ने गंभीरता से कहा.

‘‘आज कोई मीटिंग नहीं थी क्या? जल्दी आ गए,’’ सरिता ने शशांक के घर पहुंचने पर व्यंग्य भरे लहजे में पूछा.

शशांक के मन में क्रोध भरा हुआ था. वह बिना जवाब दिए अपने कमरे में चला गया.

‘‘मुझे लखनऊ वाले प्रोजेक्ट पर काम दिया गया है. कल ही मैं 1 सप्ताह के लिए लखनऊ जा रहा  हूं,’’ उस     ने रात को खाना खाते हुए सरिता से कहा.

‘‘अकेले जा रहे हो? क्या तुम्हारी प्यारी दोस्त वंदना नहीं जा रही है?’’

शशांक को लगा कि उस के संयम की सीमा पार हो चुकी है और वह अभी सरिता के गाल पर तमाचा लगा देगा. पर वह आग्नेय नेत्रों से सरिता को देख कर आधा खाना खा कर ही उठ गया.

दूसरे दिन लखनऊ पहुंच कर शशांक कंपनी के अतिथिगृह में ठहरा, जहां उस की  मुलाकात अतिथिगृह के प्रभारी हरिराम से हुई.

‘‘नमस्ते साहब,’’ हरिराम ने हाथ जोड़ कर कहा.

शशांक ने अनुमान लगाया कि हरिराम की उम्र करीब 50-55 की होगी. हट्टाकट्टा शरीर पर साफ कुरता- पायजामा, ठीक  से संवारे गए सफेद बाल, दाढ़ीमूंछ साफ, करीब 5 फुट 8 इंच ऊंचाई लिए हरिराम आकर्षक व्यक्तित्व का मालिक लग रहा था.

कमरे में जा कर शशांक ने लखनऊ पहुंचने पर सरिता को फोन किया.

रात को खाना खातेखाते शशांक ने हरिराम से उस के बारे में पूछा.

‘‘साहब, मेरे पिता इस अतिथिगृह में थे. मैं बचपन से उन की सहायता करता था. बीच में 10 साल के लिए मुंबई गया था, एक कारखाने में काम करने. पिता की अचानक मृत्यु हो गई. मां अकेली थीं, इसलिए मुंबई छोड़ कर लखनऊ आना पड़ा. पिछले 10 साल से इसी अतिथिगृह में आप सब की सेवा कर रहा हूं.’’

‘‘तुम्हारे परिवार में कौनकौन हैं?’’

‘‘बस, मैं अकेला हूं,’’ कह कर वह दूसरे कमरे में चला गया. शायद वह इस बारे में बात नहीं करना चाहता था.

दूसरे दिन शशांक प्रोेजेक्ट आफिस गया तो उसे चारों ओर से अपनी कंपनी की आलोचना ही सुनने को मिली. उत्तर प्रदेश विद्युत निगम के अधिकारियों ने एक ही बात की रट लगाई कि पैसा वापस करो और दफा हो जाओ यहां से. उस की कंपनी के ज्यादातर कर्मचारी नदारद थे.

लज्जित शशांक गुस्से से भरा शाम को अतिथिगृह वापस लौटा. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि स्थिति से कैसे निबटा जाए. उसे कुछ समय के लिए सब से विरक्ति सी हुई. उस का मन किया कि कंपनी को त्यागपत्र भेज कर, दूर पहाड़ों में चला जाए.

खाना खा कर वह टहलने के लिए निकल पड़ा. 1 घंटे के बाद वापस आ कर सोने की तैयारी करने लगा. एकाएक उसे खयाल आया कि उस का पर्स जिस में करीब 5 हजार रुपए थे, गायब है. उस ने अपनी पैंट की जेब, बाथरूम आदि में ढूंढ़ा पर पर्स नहीं मिला.

उस ने सोचा कि कहीं यह करामात हरिराम ने तो नहीं कर दिखाई.

शशांक ने हरिराम को बुला कर बहुत डांटा, धमकाया और पर्स वापस करने के लिए कहा.

हरिराम चुपचाप खड़ा रहा. उस की आंखों में आंसू आ गए. वह कुछ नहीं बोला.

‘‘मैं तुम्हें सुबह तक का समय देता हूं. यदि तुम ने मेरा पर्स वापस नहीं किया तो मैं तुम्हें पुलिस के हवाले कर दूंगा.’’

शशांक रात को अपने कमरे में बैठा काफी देर तक सोचता रहा कि इस नई समस्या से कैसे निबटा जाए. सोने के लिए लेटा तो उसे तकिया टेढ़ामेढ़ा लगा. तकिया उठाया तो उस के नीचे पर्र्स था. शशांक को याद आया कि उस ने इस डर से पर्स तकिए के नीचे छिपा दिया था कि कहीं हरिराम उसे चुरा न ले.

शशांक को खुद पर शर्म महसूस हुई. वह हरिराम के कमरे में गया और उसे अपने कमरे में बुला कर लाया. शशांक ने हरिराम को बताया कि वह किस परेशानी में यहां आया था. किस तरह वह क्षेत्रवाद, भाषावाद का शिकार हो रहा है. इसी परेशानी में उस से यह अपराध हो गया, जिस के लिए वह शर्मिंदा है.

‘‘साहब, यह बडे़ दुख की बात है कि हम पहले हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, बंगाली, मराठी आदि हैं और बाद में भारतीय. इस सोच ने हमारे देश की प्रगति में बहुत बड़ी बाधा डाली हुई है.’’

शशांक को किसी हिंदू से बाबरी मसजिद के बारे में यह विचार सुन कर आश्चर्य हुआ. उसे लगा कि उस के सामने एक सच्चा भारतीय खड़ा है.

‘‘पर क्या किया जा सकता है, हरिराम?’’ उस के मुंह से निकला.

‘‘क्या आप कर्म पर विश्वास करते हैं?’’

‘‘हां, बिलकुल.’’

‘‘आप यह क्यों नहीं सोचते कि इस लखनऊ वाले प्रोजेक्ट ने आप को अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने का अवसर दिया है? उत्तर प्रदेश विद्युत निगम के अधिकारी हमारी कंपनी के शत्रु नहीं हैं. आप को उन की समस्याओं का समाधान करना चाहिए.’’

‘‘हरिराम, तुम ठीक कहते हो. अब रात बहुत हो गई है, थोड़ा सो लेते हैं.’’

अगले दिन शशांक ने अपनी कंपनी के कर्मचारियों से मिल कर भविष्य की कार्यप्रणाली तय की. इस के बाद उस ने उत्तर प्रदेश विद्युत निगम के अध्यक्ष से मिल कर 3 महीने का समय मांग लिया और उन्हें यह आश्वासन भी दिया कि वह लखनऊ से बाहर नहीं जाएगा.

शशांक सुबह नाश्ते के बाद प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए रवाना हो जाता था और रात को काफी देर के बाद वापस आता था. इस से कंपनी के कर्मचारियों में नई जान आ गई.

एक दिन शशांक रात को आया तो अतिथिगृह में ताला लगा था. वह पास के बगीचे में टहलने के लिए चला गया. वहीं उसे हरिराम अकेले एक बैंच पर सिर झुकाए बैठा मिल गया.

‘‘हरिराम, तुम यहां क्या कर रहे हो?’’

हरिराम ने उसे देखा और फिर यह कहते हुए कि आओ, शशांक बाबू, बैठो, उस ने शशांक का हाथ पकड़ कर अपने पास बिठा दिया.

शशांक ने हरिराम के मुंह से शराब की गंध महसूस की.

‘‘जानते हो यह कौन है?’’ हरिराम ने शशांक को एक तसवीर दिखाते हुए कहा.

शशांक ने देखा, तसवीर में एक महिला, 4-5 साल के बच्चे के साथ थी.

‘‘यह सीता है, मेरी पत्नी और यह रमेश है, मेरा बेटा. मैं मुंबई में काम करता था. अपनी सीता पर शक करता था. रोज उसे पीटता था. वह बेचारी कब तक जुल्म सहती. एक दिन मुझे छोड़ कर बेटे के साथ कहीं चली गई,’’ कह कर हरिराम ने सिर झुका लिया.

‘‘तुम ने उन्हें ढूंढ़ने की कोशिश नहीं की?’’

‘‘बहुत ढूंढ़ा, बहुत खोजा पर कहीं पता नहीं चला. आज आप की मेमसाहब का फोन आया था. परिवार के बिना जिंदगी गुजारना बहुत कठिन है साहब. इस का दर्द मैं जानता हूं,’’ कह कर वह फूटफूट कर रोने लगा.

दूसरे दिन सुबह नाश्ते के समय हरिराम ने संकोच के साथ कहा, ‘‘साहब, कल नशे में कुछ गुस्ताखी हो गई हो तो माफ कीजिएगा.’’

दिन भर शशांक, हरिराम और अपनी जिंदगी के बारे में सोचता रहा. उस का और सरिता का कालिज का 3 साल तक प्यार, एक परिवार का सपना, विवाह, उस का काम में व्यस्त होना, कंपनी में प्रमोशन के लिए भागदौड़, सरिता की शिकायतें, अहं का टकराव फिर लड़ाई, उस का तंग आ कर सरिता पर हाथ उठाना, सरिता की आत्महत्या की धमकी, हमेशा एक तनाव भरी जिंदगी जीना.

‘नहीं, हमारी पे्रम कहानी का यह अंत नहीं होना चाहिए,’ शशांक के अंतर्मन से यह आवाज निकली और शाम को उस ने सरिता को फोन किया.

‘‘हेलो,’’ फोन सरिता ने उठाया था.

‘‘हेलो, क्या कर रही हो?’’ शशांक ने नम्र स्वर में पूछा.

‘‘यों ही बैठी हूं.’’

‘‘सरिता, मैं तुम से एक बात कहना चाहता हूं. मैं यहां लखनऊ में तुम्हारे बिना बहुत अकेला महसूस कर रहा हूं.’’

एक क्षण को सरिता के मन में आया कि बोले वंदना को बुला लो, पर दूसरे क्षण उस का अपनेआप पर नियंत्रण न रहा और वह फूटफूट कर रो पड़ी.

शशांक की आंखों में भी आंसू आ गए.

‘‘सरु, क्या तुम यहां आ सकती हो?’’

‘‘मैं कल ही पहुंच रही हूं, शशांक,’’ सरिता ने रोतेरोते कहा.

शशांक दूसरे दिन शाम को कमरे में दाखिल हुआ तो सरिता उस का इंतजार कर रही थी.

‘‘शशांक, मुझे माफ कर दो.’’

शशांक ने सरिता को गले से लगा लिया.

‘‘गलती मेरी ज्यादा है. मैं काम के जनून में तुम्हें नजरअंदाज करने लगा था. मैं ने तुम्हें बहुत दुख दिया है न सरू ?’’

रात को खाना खाने के बाद हरिराम ने सरिता से कहा, ‘‘मेमसाहब, आप के आने से साहब बहुत खुश हैं. इन्होंने आज 2 रोटियां ज्यादा खाई हैं,’’ फिर उस ने शशांक से कहा, ‘‘साहब, कल छुट्टी है. आप मेमसाहब को बड़ा इमामबाड़ा, बारादरी, गोमती नदी का किनारा आदि जगह घुमा कर लाइए. हां, शाम को अमीनाबाद से इन के लिए चिकन की साड़ी खरीदना मत भूलिएगा.’’

दूसरे दिन इमामबाड़ा की भूलभुलैया में दोनों एकदूसरे का हाथ पकड़ कर रास्ता खोजते रहे. शशांक और सरिता को लगा कि उन के कालिज के दिन लौट आए हैं.

शाम को गोमती के किनारे बने पार्क में बैठेबैठे सरिता ने शशांक के कंधे पर सिर रख दिया और आंखें बंद कर लीं.

‘‘सरू, तुम्हें पता है, मुझ में आए इस बदलाव का जिम्मेदार कौन है…इस का जिम्मेदार हरिराम है,’’ उस ने सरिता के बालों को सहलाते हुए उस शाम की घटना बता दी.

शशांक दूसरे दिन प्रोजेक्ट पर पहुंचा तो वह खुद को बहुत हलका महसूस कर रहा था. उस ने पाया कि उस में कुछ कर दिखाने की इच्छाशक्ति पहले से दोगुनी हो गई है.

इधर सरिता ने हरिराम के कमरे में जा कर कहा, ‘‘काका, आप के कारण मेरी खोई हुई गृहस्थी, मेरा परिवार मुझे वापस मिला है. मैं आप की जिंदगी भर ऋणी रहूंगी. मैं अब आप को काका कह कर बुलाऊंगी.’’

हरिराम ने भावुक हो कर सरिता के सिर पर हाथ फेरा.

‘‘काका, अब मैं यहीं रहूंगी और खाना मैं बनाऊंगी आप आराम करना.’’

‘‘नहीं बिटिया, मेरा काम मत छीनो. हां, अपनेआप को व्यस्त रखो और कुछ नया करना सीखो.’’

सरिता ने चित्रकला सीखनी शुरू कर दी. शशांक के प्रयासों से लखनऊ प्रोजेक्ट में पहले धीमी और फिर तेज प्रगति होने लगी. उत्तर प्रदेश विद्युत निगम ने कंपनी को भुगतान शुरू कर दिया. यही नहीं, उस प्रोजेक्ट के विस्तार का काम भी उस की कंपनी को मिल गया.

1 माह के बाद सरिता ने हरिराम से कहा, ‘‘काका, आप के कारण मुझे अपनी गलतियों का एहसास हो रहा है. मैं दिल्ली में बिलकुल खाली रहती थी. इस कारण मेरा दिमाग गलत विचारों का कारखाना बन गया था. बजाय शशांक की परेशानी समझने के मैं अपने पति पर शक करने लगी थी.’’

हरिराम के लाख मना करने पर भी सरिता ने उस का एक बड़ा चित्र बनाया.

इधर दिल्ली में कंपनी अध्यक्ष      मि. सेनगुप्ता के सामने निदेशक मि. उत्पल बनर्जी पसीनापसीना हो रहे थे.

‘‘मि. बनर्जी, आप को पता है कि हरियाणा विद्युत निगम ने कंपनी को फरीदाबाद प्रोजेक्ट के लिए कोर्ट का नोटिस भेजा है?’’

‘‘सर, शशांक बहुत गड़बड़ कर के गया है. उस ने कोई कागज न गांगुली को और न मुझे दिया है. बिना कागज के तो….’’

‘‘मि. बनर्जी, आप मुझे क्या बेवकूफ समझते हैं?’’

‘‘नहीं सर, आप तो…’’

‘‘मि. बनर्जी, सारी गड़बड़ आप के दिमाग में है. आप आदमी का मूल्यांकन उस के काम से नहीं बल्कि उस के बंगाली होने या न होने से करते हैं.’’

‘‘मेरे पास उन फाइलों और रिपोर्टों की पूरी सूची है जो शशांक, जतिन गांगुली को दे कर गया है.’’

‘‘यस सर.’’

‘‘आप और गांगुली 1 सप्ताह के अंदर फरीदाबाद वाले प्रोजेक्ट को रास्ते पर लाइए या अपना त्यागपत्र दीजिए.’’

‘‘सर, 1 सप्ताह में…’’

‘‘आप जा सकते हैं.’’

1 सप्ताह के बाद मि. उत्पल बनर्जी और मि. गांगुली कंपनी से निकाले जा चुके थे. मि. सेनगुप्ता ने शशांक को फोन कर के कंपनी की इज्जत की खातिर फरीदाबाद प्रोजेक्ट का अतिरिक्त भार लेने को कहा.

‘‘हरिराम, तुम ने ठीक कहा था. ईमानदारी और मेहनत से काम करने पर हर व्यक्ति की प्रतिभा का मूल्यांकन होता है,’’ शशांक दिल्ली के लिए विदा लेते समय बोला.

‘‘काका, आप की बहुत याद आएगी,’’ सरिता बोली.

1 माह बाद फरीदाबाद प्रोजेक्ट भी ठीक हो गया और शशांक को दोहरा प्रमोशन दे कर कंपनी का जनरल मैनेजर बना दिया गया. उस ने हरिराम को अपने प्रमोशन की खबर देने के लिए फोन किया तो पता चला कि हरिराम नौकरी छोड़ कर कहीं चला गया है.

शाम को शशांक ने हरिराम के बारे में सरिता को बताया तो वह गंभीर हो गई, फिर बोली, ‘‘हरिराम काका शायद अपने बिछुड़े  परिवार की तलाश में गए होंगे या शांति की तलाश में.’’

आज 3 साल बाद शशांक कंपनी में निदेशक है. सरिता ने चित्रकला का स्कूल खोला है. उन की बैठक में हरिराम का सरिता द्वारा बनाया हुआ चित्र लगा है.

Social Story in Hindi

Social Story in Hindi : गुरु की शिक्षा

Social Story in Hindi :

कहते हैं, ‘घर आया मेहमान, भगवान समान’ पर अब वह बात कहां. हां, हमारे यहां कोई आए, तो हम तो उसे तब तक न छोड़ें जब तक वह खुद न जाने को चाहे.’’

यह सुन कर सुमति ने पद्मा की ओर देखा तो पद्मा कसमसा कर रह गई.

‘‘अच्छा बहू, इस बार आश्रम आना. तू ने तो देख रखा है, कैसा अच्छा वातावरण है. सत्संग सुनेगी तो तेरे भी दिमाग में गुरु के कुछ वचन पड़ेंगे, क्यों जी?’’

‘‘हां जी,’’ मामाजी का जवाब था.

बड़ी मामी को विदा करने के बाद सब हलकेफुलके हो कर घर लौटे. घर आ कर समीर ने पूछा, ‘‘क्यों मां, कब का टिकट कटा दूं?’’

‘‘कहां का?’’ पद्मा ने पूछा.

‘‘वहीं, तुम्हारे आश्रम का. बड़ी मामी न्योता जो दे गई हैं.’’

‘‘न बाबा, मैं तो भर पाई उस गुरु से और उस की शिष्या से. कान पकड़ लेना, जो दोबारा उन का जिक्र भी करूं. शिष्या ऐसी तो गुरु के कहने ही क्या. सच, आज तक मैं ऊपरी आवरण देखती रही. सुनीसुनाई बातों को ही सचाई माना. परंतु सच्ची शिक्षा है, अपने अच्छे काम. ये पोंगापंथी बातें नहीं.’’

‘‘सच कह रही हो, मां?’’ आश्चर्यचकित समीर ने पूछा.

‘‘और नहीं तो क्या, क्यों जी?’’

और समवेत स्वर सुनाई दिया, ‘‘हां जी.’’

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Satirical Story In Hindi : हम तैयार हैं आतंकियों – ऐसे सुलझेगी आतंकवाद की समस्या

Satirical Story In Hindi : आतंकवाद से निबटने के उपायों की बिगड़ती स्थिति की बेहद जरूरी समीक्षा के लिए नियमित मीटिंग न हो सकने पर एक इमरजेंसी मीटिंग हुई, जिस में राजनीतिक, मीडिया, चिकित्सा, धार्मिक, सामाजिक व सरकारी आदि सभी तरह के नुमाइंदे शामिल हुए. भारतीय परंपरा के मुताबिक सब से पहले अध्यक्ष का चुनाव किया गया. कोई पंगा न हो इसलिए सरकारी नुमाइंदे को ही सब की सहमति से अध्यक्ष चुना गया. इस से वह प्रसन्नचित्त भी हो गए. मीटिंग शुरू हुई.

सभी अपनीअपनी की गई तैयारी बताने के लिए अच्छे ढंग से तैयार हो कर आए थे. सूचना युग में सब से पहली बारी मीडिया की आई. मीडिया की तरफ से एक चैनल वाला और एक अखबार वाला था. चैनल वाले ने सूचित किया कि मुझे मेरे चैनल वालों ने नया अति आधुनिक तकनीक वाला कैमरा खरीद कर दिया है क्योंकि मेरा पुराना कैमरा बीचबीच में पंगा करता था. अब हम आतंकवादियों के कारनामों व उस के परिणामों को निर्बाध रूप से कवर कर के दिखाएंगे. मैं ने अपने सूचना सूत्रों को भी कस दिया है जहां भी कोई आतंकी हादसा होगा, मेरे मोबाइल पर इस का फास्ट मैसेज आएगा और मैं सीधा घटनास्थल की तरफ रुख करूंगा. मैं ने अपनी बाइक की टंकी पावर पेट्रोल से फुल कर ली है, इमरजेंसी में खाने के लिए मनपसंद एनर्जी बिस्कुट, केक, डिं्रक्स आदि रख ली हैं. मैं पूरी तरह से तैयार हूं.

अखबार वाले ने कहा, ‘‘हम इन टीवी वालों से कतई पीछे नहीं रहेंगे. जो ये दिखाएंगे हम उसी घटना को नए अंदाज में, अधिक प्रभावशाली व तकनीकी दक्षता के साथ फोटो को कलर व बढि़या कागज पर छापेंगे और खबरों को अधिक विश्वसनीय व खोजी बनाएंगे.’’

चिकित्सा विभाग के बीमार से लग रहे नुमाइंदे ने अपनी खांसी को जबरन काबू करते हुए, लगभग यह दिखाते हुए कि खांसी नहीं हो रही, कहा, ‘‘यों तो हमारे पास हमेशा की तरह ज्यादा उपकरण व सुविधाएं नहीं हैं क्योंकि हम ने जो दवाइयां, इंजेक्शन व अन्य सामान मंगवाया था वह बजट की कमी के कारण अभी तक पहुंचा नहीं है पर हम ने दवाइयां व उपकरण बनाने वाली कंपनियों से सीधा संपर्क कर लिया है. वे हमारे इस मानवीय प्रयास को प्रायोजित करने के लिए एकदम तैयार हैं. वे दवाइयां, इंजेक्शन व अन्य सामान देंगी जिस के एवज में आतंकवादी प्रभावित क्षेत्रों में हमें उन के बैनर लगा कर उन्हें सहयोग करना होगा जिस के लिए हमारे विभाग ने कमर कस ली है. चाहे कुछ भी हो जाए हम पीछे नहीं हटेंगे व अपने उद्देश्य में सफल रहेंगे.

‘‘विभाग बिलकुल तैयार है. हम ने इस कार्यक्रम में शहर के सफल एनजीओ व अन्य सामाजिक संस्थाओं को भी हाथ बटाने को कहा है.’’

शहर की सामाजिक संस्थाओं के 1 नहीं 3 प्रतिनिधि वहां पर थे. उन्होंने एक सम्मिलित स्वर से, चिकित्सा विभाग के नुमाइंदे को बीच में ही रोक कर कहा, ‘‘हमारा के्रडिट क्यों हथिया रहे हो भाई, हम ने तो हमेशा की तरह खुद ही मुफ्त आफर दिया है. आप को हम ससम्मान सूचित कर देना चाहते हैं कि आतंकवादी घटना वाले इलाकों में लोगों की सेवा करने के लिए हम प्रसिद्ध हैं. कितने ही प्रमाण एवं प्रशंसापत्र हमारे पास सुरक्षित हैं.’’

दूसरा बोला, ‘‘यह देखिए, बड़ेबड़े अखबारों की कटिंग्स जिस में छपी फोटो व खबरों से पता चलता है कि हम ने कितनी समाजसेवा की है. हमारा गु्रप तैयार रहेगा. बस, हमें सूचित कर दीजिएगा और यदि वहां पहुंचने के लिए गाड़ी उपलब्ध करवा देंगे तो और अच्छा होगा. हम आप के आभारी होंगे. इस सहयोग के लिए हम आप को प्रशंसापत्र भी दिलवाएंगे, किसी वीआईपी के करकमलों द्वारा एक बढि़या कार्यक्रम में जिस में खानपान भी होगा.’’

धार्मिक नुमाइंदे को ऐसा लगा जैसे उसे चुप रखा जा रहा है. उस ने मानो पुलिस की बारकेड तोड़ कर बात की, ‘‘हम धर्म की बात कर रहे हैं, हमारी सुनिए, हमारी सुनिए.’’ धर्म का मामला था, सब चुप हो गए. वह कहने लगे, ‘‘हम सभी धर्मावलंबियों ने मिल कर हमेशा मानवता की सेवा की है, जहांजहां धार्मिक फसाद हुए, हम ने जा कर सभी वर्गों की मदद की है. उन के लिए स्वादिष्ठ भोजन के लंगर लगाए हैं. मुसीबत में फंसी मानवता के लिए धार्मिक व आध्यात्मिक रास्ता खोजने के दर्जनों ईमानदार प्रयास किए हैं. प्रार्थना सभाएं आयोजित की हैं, टीवी पर इन का लाइव कवरेज भी कराया है, आप सभी ने देखा होगा. हमारे प्रयासों से आतंक प्रभावित क्षेत्र के लोगों को कठिन स्थिति में संभलने का आत्मबल मिला है. सब को भरपूर दान देने का अवसर भी हम ने दिया है. हमारा मानना है कि सभी धर्म दान लेने में बराबर के अधिकारी हैं.’’

सरकारी नुमाइंदे को लगा कि मीटिंग लंबी हो रही है, समय हमेशा की तरह कम व कीमती है और सभी को अपनेअपने घर सुरक्षित पहुंचना है, अत: सभी को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘दोस्तो, मैं आप सब का इतनी सक्रियता से सोचने व जरूरी प्रबंध करने यानी आतंकवाद से कुशलता से निबटने के लिए तैयार रहने की प्रवृत्ति को धन्यवाद करता हूं. माफ करें, पुलिस के प्रतिनिधि टै्रफिक जाम में फंस जाने के कारण मीटिंग में नहीं आ सके, उन्होंने मोबाइल से सूचित किया है कि उन के सभी इंतजामात बिलकुल पुख्ता हैं. मैं सरकार की ओर से आप को सच्चा आश्वासन दिलाता हूं कि इस बार आतंकवाद से प्रभावितों को मुआवजा दिलाने में देर नहीं की जाएगी.’’

मीटिंग काजू, बादाम, बिस्कुट, चाय के साथ संपन्न हुई. रिकार्ड रखने के लिए फोटो भी खिंचे और प्रेस रिलीज भी जारी की गई जिस के आधार पर अगले रोज खबर भी छपी जिस की हैडलाइन थी, ‘आतंकवाद से निबटने के लिए सब तैयार.’ Satirical Story In Hindi

Satirical Story In Hindi : बेटा बकना सीख रहा है

Satirical Story In Hindi : बेटा शब्द भी बड़े कमाल का शब्द होता है दोस्तो. मांबाप किसी को ले कर चिंतित रहें या न रहें, पर इस शब्द को ले कर बड़े चिंतित रहते हैं. इस के होने से ले कर इस के बाप बन जाने के बाद तक भी. या कहें मांबाप जब तक यहां से प्रस्थान नहीं कर जाते.

इतिहास उठा कर देख लीजिए. दशरथ से ले कर धृतराष्ट्र तक, धृतराष्ट्र से ले कर अपने दोस्त तक, बेचारे सब बाप अपने बेटों को ले कर परेशान ही रहे. सारी उम्र कट गई उन की अपने बेटों को स्थापित करतेकरते. इस चक्कर में कई बेचारे बाप बेटों को स्थापित करतेकरते खुद विस्थापित हो गए. उस के बाद भी किसी बाप ने आज तक उन विस्थापित बापों से कोई सीख नहीं ली.

काल बदले, युग बदले, पर बेटों को ले कर मांबापों की चिंता कम होने के बजाय और भी बढ़ी ही है, बल्कि आज तो यह हाल है कि मांबाप अपने बेटों को ले कर कुछ अधिक ही चिंतित दिखते हैं. जब देखो अपना वर्तमान छोड़, बस, उन के भविष्य के बारे में डूबे दिखते हैं.

इसी चिंता में डूबे हुए एक अदद बेटे के बाप मेरे पास आए. आते ही अपना दुख कम करने के लिए अपना दुखड़ा सुनाने लगे, ‘यार, बहुत कोशिश कर ली. बेटा है कि लिखनापढ़ना तो सीखा ही नहीं, बोलना भी नहीं सीख रहा. इतना बड़ा हो गया. अब तुम ही कुछ बताओ कि बेटे को कैसे बोलना सिखाऊं? कम से कम बोलना सीख जाता तो…’

मामला पेचीदा था. बेटे का भी और बाप का भी. मैं ने चुटकी लेते कहा, तो तुम्हें और क्या चाहिए मेरे दोस्त. ऐसे बेटे आज की तारीख में कम लोगों को ही मिलते हैं वरना आज के बेटे तो पैदा होते ही बाप को कहने लग जाते हैं कि कैसे बाप हो तुम भी? क्या है तुम्हारे घर में? अगर मेरा ऐसे ही वैलकम करना था तो क्यों बुलाया मुझे अपने घर में? भले ही बाप ने 10 बेटियों के बाद 11वीं बार में इसे बुलाया होे.

‘ऐसा करो, उसे चिडि़यों के साथ रखो. चिडि़यों के साथ रहने पर वह खुद बोलना सीख जाएगा,’ मैं ने उन्हें और्गेनिक फार्मूला सुझाया तो वे बोले, ‘चिडि़यां अब दिखती ही कहां हैं मेरे दोस्त. सारे जतनकर हार गया. उसे

2 किलो सुहागा चटा चुका हूं. चिडि़यों को ढूंढ़ढूंढ़, उन की मिन्नतें कर अपने घर के आंगन में बुला उन के साथ भी रखा. पर उस की जबान न खुली. तुम्हारे सामने ही यह सच कह  रहा हूं. वह, बस, बोलना सीख जाए, इस के लिए उसे कुत्तों के साथ भी रखा, भेडि़यों के साथ भी रखा. और तो और, उसे सियारों के साथ भी रखा. समय जाने किसकिस के साथ नहीं रखा, पर सोच कर बोलना तो दूर, बिन सोचे हुए भी बोलना नहीं सीखा तो नहीं सीखा. अब तुम ही कहो इस का क्या करूं? बस, दिनरात एक यही चिंता घुन की तरह खाए जा रही है.’

इतना कह कर उन्होंने मेरे सिर में अपना हाथ दिया तो मुझे पता चल गया कि वे हद से अधिक परेशान हैं, सो, उन का हाथ उन के सिर में दे कुछ देर तक मैं गंभीर समस्या पर अपने सिर को अपने हाथ का सहारा दे सोचता रहा. सोचने से क्या नहीं हो जाता. और आज का दौर तो केवल और केवल सोचने का है. काम करने का नहीं. इसीलिए सोचने वाले चांदी कूट रहे हैं और मेहनत करने वाले छाती पीट रहे हैं.

‘यार, एक आइडिया है?’ मैं ने कहा तो हर बाप की तरह वे भी उछले. उन्हें लगा कि उन के बेटे की नैया पार लगे या न लगे, पर उन की नैया जरूर पार लगने वाली है. कई बार भ्रम में जीने का भी अलग ही मजा होता है.

‘कहो,’ कह वे मेरा मुंह ताकने लगे कि आगे मेरा मुंह क्या उगलता है. भले ही आज तक उस ने निगला ही निगला हो.

‘मेरे एक दोस्त नेता हैं. ऐसा कमाल बकते हैं, ऐसा बकते हैं कि बड़ेबड़ों की बोलती बंद करवा देते हैं. हाय, कुल मिला कर क्या गजब का बकते हैं. क्या वाहियात बकते हैं. जब वे बकने लगते हैं तो सब बस उन का मुंह देखते रह जाते हैं. वे जब बकने लगते हैं तो इतना बकते हैं कि उन्हें चुप करवाने के लिए उन के आगे नाक रगड़नी पड़ती है कि बंधु, बहुत बक लिए. सेहत के लिए अब चुप भी हो जाओ, प्लीज. तुम्हें कल फिर बकना है. वे रोटीपानी के बिना रह सकते हैं पर बके बिना नहीं.’

‘मतलब?’ वे चौंके.

‘उन की शागिर्दी में तुम्हारे बेटे को छोड़ देते हैं. मुझे पूरा विश्वास है कि उन के पास रह वह जरूर बकना…मेरा मतलब है कि बोलना सीख जाएगा.’

‘पर उन से बात कौन करेगा?’ यह कह कर वे मायूस से हुए तो मैं ने कहा, ‘वह तो मैं कर लूंगा.’

अगले दिन हम दोस्त के बेटे व दोस्त को ले कर उन के घर पहुंच गए. उस वक्त भी वे बक तो नहीं, पर बड़बड़ा जरूर रहे थे. उन्होंने हमें देखते ही बड़बड़ाना छोड़, बकना शुरू किया तो मैं ने उन के आगे हाथ जोड़ कर कहा, ‘नेताजी, आप के पास एक शिष्य को लाया हूं. इसे स्वीकार कीजिए.’

‘क्या करना है इस का?’ वे सिर से टोपी उठाते हुए बोले.

‘सर, यह बोलता बहुत कम है. या कि बोलता ही नहीं. अगर बोलता भी है तो तुतला कर बोलता है, 30 का होने के बाद भी,’ दोस्त ने हाथ जोड़े स्थिति स्पष्ट की.

‘तो?’ वे उन के बेटे को निरखतेपरखते गंभीर हुए.

‘इसे बोलना कम, बकना सिखा दो. ये आप के तहेदिल से आभारी रहेंगे,’ कह मैं ने उन के बेटे के हाथों से तुरंत उन के चरणों में बतौर ऐडमिशन 4 श्रीफल

और 4 धोतीकुरते रखवाए, तो वे उस की ओर देखते बोले, ‘ठीक है, पट्ठे को ऐसा बकना सिखाएंगे कि…ठीक समय पर आए हो. चुनाव के दिन हैं. बकते तो हम अकसर हरदम ही रहते हैं पर चुनाव के दिनों में तो बकना बहुत ही जरूरी होता है.

‘जो जितना बके वह उतना ही बड़ा नेता. चुनाव के दिन वैधानिक रूप से हमारे बकने के दिन होते हैं और जनता के पकने के. छोड़ जाओ पट्ठे को. इस को ऐसा बोलना कम बकना सिखाएंगे कि महीने के बाद ही बड़ेबड़ों कि बोलती बंद न कर दे तो हमारा शार्गिद नहीं. देशदुनिया को भी पता चल जाएगा कि पट्ठा किस का शार्गिद है,’ कह उन्होंने उन के बेटे की पीठ पर हाथ रखा.

महीने बाद दोस्त घर आए तो बेहद खुश. पहली बार किसी बाप को खुश देखा तो अपने को भरापूरा महसूस किया. आते ही गले लगे. गले भी ऐसे लगे कि मेरी पीठ में दर्द हो गया. पहली बार किसी खुश बाप से पाला पड़ा था. बड़ी मुश्किल से उन की भुजाओं के बंधन से अपने को जैसेतैसे मुक्त कराया तो वे पगलाए से बोले, ‘बधाई हो यार, बेटा बोलना सीख गया,’ कह उन्होंने एकसाथ कई लड्डू मेरे मुंह में ठूंसे. तो मैं ने उन से निवेदन किया, ‘यार, मरा तो नहीं जा रहा हूं. एकएक कर जितने खिलाने हैं खिला. पर मेरी सांस तो न रोक. तुम मुझे अपनी खुशी में शामिल करते हुए मुझे लड्डू खिला रहे हो या ऊपर पहुंचाना चाहते हो?’

‘सौरी यार,’ वे पागलपन से पूरे नहीं, पर जरा पीछे हटे और अबनौर्मल से कुछ नौर्मल होते बोले, ‘यार, कमाल का गुरु दिया तुम ने मेरे बेटे को. कल शाम को घर आया था घंटेभर को बेटा, पर 2 घंटे तक वह बिना ब्रेक के ऐसा बोलता रहा, ऐसा बोलता रहा कि…मैं तो बस उस का मुंह ही देखता रह गया. लगा ही नहीं कि वह मेरा वही बेटा है. वही मेरा बेटा है जो कल तक तुतलाता था,’ कह उन्होंने फिर मेरे मुंह में 4 लड्डू एकसाथ जबरदस्ती ठूंसने की कोशिश की तो मैं ने उन्हें सचेत करते कहा, ‘बंधु, एकएक प्लीज. मुझे खुशी है कि कम से कम तुम्हारा बेटा बोलना सीख रहा है. अब वह दिन दूर नहीं जब वह इतना बोलेगा, इतना बोलेगा कि…’

‘पर वह बकवास ही अधिक कर रहा था,’ एक बाप की तरह वे फिर चिंतित हुए. ये बाप भी न, अपने बेटों से कभी प्रसन्न होते ही नहीं. अपने बच्चों को ले कर इन की किस्मत में सातों दिन चौबीसों घंटे चिंता में ही रहना बदा होता है, शायद. सो, मैं ने उन्हें चिंता से उबारने की कोशिश करते कहा, ‘बंधु, सच पूछो तो सार्थक कहने को हमारे पास कुछ होता ही नहीं. हमें सार्थक कहना हो तो दो शब्दों से आगे कुछ कह ही न पाएं. तभी तो सब, बस, बकने को बोले जा रहे हैं.’

‘सच?’

‘हां, मेरे दोस्त,’ मैं ने कहा तो मुझे लगा कि वे मेरे कहने से संतुष्ट हो गए. उन्होंने बचे हुए लड्डुओं का डब्बा वहीं टेबल पर रखा और तालियां बजाते, पता नहीं क्या गाते अपने घर की ओर निकल लिए. Satirical Story In Hindi

Romantic Story in Hindi : मौन – जब दो जवां और अजनबी दिल मिले

Romantic Story in Hindi : सर्द मौसम था, हड्डियों को कंपकंपा देने वाली ठंड. शुक्र था औफिस का काम कल ही निबट गया था. दिल्ली से उस का मसूरी आना सार्थक हो गया था. बौस निश्चित ही उस से खुश हो जाएंगे. श्रीनिवास खुद को काफी हलका महसूस कर रहा था. मातापिता की वह इकलौती संतान थी. उस के अलावा 2 छोटी बहनें थीं. पिता नौकरी से रिटायर्ड थे. बेटा होने के नाते घर की जिम्मेदारी उसे ही निभानी थी. वह बचपन से ही महत्त्वाकांक्षी रहा है. मल्टीनैशनल कंपनी में उसे जौब पढ़ाई खत्म करते ही मिल गई थी. आकर्षक व्यक्तित्व का मालिक तो वह था ही, बोलने में भी उस का जवाब नहीं था. लोग जल्दी ही उस से प्रभावित हो जाते थे. कई लड़कियों ने उस से दोस्ती करने की कोशिश की लेकिन अभी वह इन सब पचड़ों में नहीं पड़ना चाहता था.

श्रीनिवास ने सोचा था मसूरी में उसे 2 दिन लग जाएंगे, लेकिन यहां तो एक दिन में ही काम निबट गया. क्यों न कल मसूरी घूमा जाए. श्रीनिवास मजे से गरम कंबल में सो गया. अगले दिन वह मसूरी के माल रोड पर खड़ा था. लेकिन पता चला आज वहां टैक्सी व बसों की हड़ताल है.

‘ओफ, इस हड़ताल को भी आज ही होना था,’ श्रीनिवास अभी सोच में पड़ा ही था कि एक टैक्सी वाला उस के पास आ कानों में फुसफुसाया, ‘साहब, कहां जाना है.’ ‘अरे भाई, मसूरी घूमना था लेकिन इस हड़ताल को भी आज होना था.’

‘कोई दिक्कत नहीं साहब, अपनी टैक्सी है न. इस हड़ताल के चक्कर में अपनी वाट लग जाती है. सरजी, हम आप को घुमाने ले चलते हैं लेकिन आप को एक मैडम के साथ टैक्सी शेयर करनी होगी. वे भी मसूरी घूमना चाहती हैं. आप को कोई दिक्कत तो नहीं,’ ड्राइवर बोला. ‘कोई चारा भी तो नहीं. चलो, कहां है टैक्सी.’

ड्राइवर ने दूर खड़ी टैक्सी के पास खड़ी लड़की की ओर इशारा किया. श्रीनिवास ड्राइवर के साथ चल पड़ा.

‘हैलो, मैं श्रीनिवास, दिल्ली से.’ ‘हैलो, मैं मनामी, लखनऊ से.’

‘मैडम, आज मसूरी में हम 2 अनजानों को टैक्सी शेयर करना है. आप कंफर्टेबल तो रहेंगी न.’ ‘अ…ह थोड़ा अनकंफर्टेबल लग तो रहा है पर इट्स ओके.’

इतने छोटे से परिचय के साथ गाड़ी में बैठते ही ड्राइवर ने बताया, ‘सर, मसूरी से लगभग 30 किलोमीटर दूर टिहरी जाने वाली रोड पर शांत और खूबसूरत जगह धनौल्टी है. आज सुबह से ही वहां बर्फबारी हो रही है. क्या आप लोग वहां जा कर बर्फ का मजा लेना चाहेंगे?’ मैं ने एक प्रश्नवाचक निगाह मनामी पर डाली तो उस की भी निगाह मेरी तरफ ही थी. दोनों की मौन स्वीकृति से ही मैं ने ड्राइवर को धनौल्टी चलने को हां कह दिया.

गूगल से ही थोड़ाबहुत मसूरी और धनौल्टी  के बारे में जाना था. आज प्रत्यक्षरूप से देखने का पहली बार मौका मिला है. मन बहुत ही कुतूहल से भरा था. खूबसूरत कटावदार पहाड़ी रास्ते पर हमारी टैक्सी दौड़ रही थी. एकएक पहाड़ की चढ़ाई वाला रास्ता बहुत ही रोमांचकारी लग रहा था. बगल में बैठी मनामी को ले कर मेरे मन में कई सवाल उठ रहे थे. मन हो रहा था कि पूछूं कि यहां किस सिलसिले में आई हो, अकेली क्यों हो. लेकिन किसी अनजान लड़की से एकदम से यह सब पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था.

मनामी की गहरी, बड़ीबड़ी आंखें उसे और भी खूबसूरत बना रही थीं. न चाहते हुए भी मेरी नजरें बारबार उस की तरफ उठ जातीं. मैं और मनामी बीचबीच में थोड़ा बातें करते हुए मसूरी के अनुपम सौंदर्य को निहार रहे थे. हमारी गाड़ी कब एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ पर पहुंच गई, पता ही नहीं चल रहा था. कभीकभी जब गाड़ी को हलका सा ब्रेक लगता और हम लोगों की नजरें खिड़की से नीचे जातीं तो गहरी खाई देख कर दोनों की सांसें थम जातीं. लगता कि जरा सी चूक हुई तो बस काम तमाम हो जाएगा.

जिंदगी में आदमी भले कितनी भी ऊंचाई पर क्यों न हो पर नीचे देख कर गिरने का जो डर होता है, उस का पहली बार एहसास हो रहा था. ‘अरे भई, ड्राइवर साहब, धीरे… जरा संभल कर,’ मनामी मौन तोड़ते हुए बोली.

‘मैडम, आप परेशान मत होइए. गाड़ी पर पूरा कंट्रोल है मेरा. अच्छा सरजी, यहां थोड़ी देर के लिए गाड़ी रोकता हूं. यहां से चारों तरफ का काफी सुंदर दृश्य दिखता है.’ बचपन में पढ़ते थे कि मसूरी पहाड़ों की रानी कहलाती है. आज वास्तविकता देखने का मौका मिला.

गाड़ी से बाहर निकलते ही हाड़ कंपा देने वाली ठंड का एहसास हुआ. चारों तरफ से धुएं जैसे उड़ते हुए कोहरे को देखने से लग रहा था मानो हम बादलों के बीच खड़े हो कर आंखमिचौली खेल रहे होें. दूरबीन से चारों तरफ नजर दौड़ाई तो सोचने लगे कहां थे हम और कहां पहुंच गए.

अभी तक शांत सी रहने वाली मनामी धीरे से बोल उठी, ‘इस ठंड में यदि एक कप चाय मिल जाती तो अच्छा रहता.’ ‘चलिए, पास में ही एक चाय का स्टौल दिख रहा है, वहीं चाय पी जाए,’ मैं मनामी से बोला.

हाथ में गरम दस्ताने पहनने के बावजूद चाय के प्याले की थोड़ी सी गरमाहट भी काफी सुकून दे रही थी. मसूरी के अप्रतिम सौंदर्य को अपनेअपने कैमरों में कैद करते हुए जैसे ही हमारी गाड़ी धनौल्टी के नजदीक पहुंचने लगी वैसे ही हमारी बर्फबारी देखने की आकुलता बढ़ने लगी. चारों तरफ देवदार के ऊंचेऊंचे पेड़ दिखने लगे थे जो बर्फ से आच्छादित थे. पहाड़ों पर ऐसा लगता था जैसे किसी ने सफेद चादर ओढ़ा दी हो. पहाड़ एकदम सफेद लग रहे थे.

पहाड़ों की ढलान पर काफी फिसलन होने लगी थी. बर्फ गिरने की वजह से कुछ भी साफसाफ नहीं दिखाई दे रहा था. कुछ ही देर में ऐसा लगने लगा मानो सारे पहाड़ों को प्रकृति ने सफेद रंग से रंग दिया हो. देवदार के वृक्षों के ऊपर बर्फ जमी पड़ी थी, जो मोतियों की तरह अप्रतिम आभा बिखेर रही थी. गाड़ी से नीचे उतर कर मैं और मनामी भी गिरती हुई बर्फ का भरपूर आनंद ले रहे थे. आसपास अन्य पर्यटकों को भी बर्फ में खेलतेकूदते देख बड़ा मजा आ रहा था.

‘सर, आज यहां से वापस लौटना मुमकिन नहीं होगा. आप लोगों को यहीं किसी गैस्टहाउस में रुकना पड़ेगा,’ टैक्सी ड्राइवर ने हमें सलाह दी. ‘चलो, यह भी अच्छा है. यहां के प्राकृतिक सौंदर्य को और अच्छी तरह से एंजौय करेंगे,’ ऐसा सोच कर मैं और मनामी गैस्टहाउस बुक करने चल दिए.

‘सर, गैस्टहाउस में इस वक्त एक ही कमरा खाली है. अचानक बर्फबारी हो जाने से यात्रियों की संख्या बढ़ गई है. आप दोनों को एक ही रूम शेयर करना पड़ेगा,’ ड्राइवर ने कहा. ‘क्या? रूम शेयर?’ दोनों की निगाहें प्रश्नभरी हो कर एकदूसरे पर टिक गईं. कोई और रास्ता न होने से फिर मौन स्वीकृति के साथ अपना सामान गैस्टहाउस के उस रूम में रखने के लिए कह दिया.

गैस्टहाउस का वह कमरा खासा बड़ा था. डबलबैड लगा हुआ था. इसे मेरे संस्कार कह लो या अंदर का डर. मैं ने मनामी से कहा, ‘ऐसा करते हैं, बैड अलगअलग कर बीच में टेबल लगा लेते हैं.’ मनामी ने भी अपनी मौन सहमति दे दी.

हम दोनों अपनेअपने बैड पर बैठे थे. नींद न मेरी आंखों में थी न मनामी की. मनामी के अभी तक के साथ से मेरी उस से बात करने की हिम्मत बढ़ गई थी. अब रहा नहीं जा रहा था, बोल पड़ा, ‘तुम यहां मसूरी क्या करने आई हो.’

मनामी भी शायद अब तक मुझ से सहज हो गई थी. बोली, ‘मैं दिल्ली में रहती हूं.’ ‘अच्छा, दिल्ली में कहां?’

‘सरोजनी नगर.’ ‘अरे, वाट ए कोइनस्टिडैंट. मैं आईएनए में रहता हूं.’

‘मैं ने हाल ही में पढ़ाई कंप्लीट की है. 2 और छोटी बहनें हैं. पापा रहे नहीं. मम्मी के कंधों पर ही हम बहनों का भार है. सोचती थी जैसे ही पढ़ाई पूरी हो जाएगी, मम्मी का भार कम करने की कोशिश करूंगी, लेकिन लगता है अभी वह वक्त नहीं आया. ‘दिल्ली में जौब के लिए इंटरव्यू दिया था. उन्होंने सैकंड इंटरव्यू के लिए मुझे मसूरी भेजा है. वैसे तो मेरा सिलैक्शन हो गया है, लेकिन कंपनी के टर्म्स ऐंड कंडीशंस मुझे ठीक नहीं लग रहीं. समझ नहीं आ रहा क्या करूं?’

‘इस में इतना घबराने या सोचने की क्या बात है. जौब पसंद नहीं आ रही तो मत करो. तुम्हारे अंदर काबिलीयत है तो जौब दूसरी जगह मिल ही जाएगी. वैसे, मेरी कंपनी में अभी न्यू वैकैंसी निकली हैं. तुम कहो तो तुम्हारे लिए कोशिश करूं.’ ‘सच, मैं अपना सीवी तुम्हें मेल कर दूंगी.’

‘शायद, वक्त ने हमें मिलाया इसलिए हो कि मैं तुम्हारे काम आ सकूं,’ श्रीनिवास के मुंह से अचानक निकल गया. मनामी ने एक नजर श्रीकांत की तरफ फेरी, फिर मुसकरा कर निगाहें झुका लीं. श्रीनिवास का मन हुआ कि ठंड से कंपकंपाते हुए मनामी के हाथों को अपने हाथों में ले ले लेकिन मनामी कुछ गलत न समझ ले, यह सोच रुक गया. फिर कुछ सोचता हुआ कमरे से बाहर चला गया.

सर्दभरी रात. बाहर गैस्टहाउस की छत पर गिरते बर्फ से टपकते पानी की आवाज अभी भी आ रही है. मनामी ठंड से सिहर रही थी कि तभी कौफी का मग बढ़ाते हुए श्रीनिवास ने कहा, ‘यह लीजिए, थोड़ी गरम व कड़क कौफी.’

तभी दोनों के हाथों का पहला हलका सा स्पर्श हुआ तो पूरा शरीर सिहर उठा. एक बार फिर दोनों की नजरें टकरा गईं. पूरे सफर के बाद अभी पहली बार पूरी तरह से मनामी की तरफ देखा तो देखता ही रह गया. कब मैं ने मनामी के होंठों पर चुंबन रख दिया, पता ही नहीं चला. फिर मौन स्वीकृति से थोड़ी देर में ही दोनों एकदूसरे की आगोश में समा गए. सांसों की गरमाहट से बाहर की ठंड से राहत महसूस होने लगी. इस बीच मैं और मनामी एकदूसरे को पूरी तरह कब समर्पित हो गए, पता ही नहीं चला. शरीर की कंपकपाहट अब कम हो चुकी थी. दोनों के शरीर थक चुके थे पर गरमाहट बरकरार थी.

रात कब गुजर गई, पता ही नहीं चला. सुबहसुबह जब बाहर पेड़ों, पत्तों पर जमी बर्फ छनछन कर गिरने लगी तो ऐसा लगा मानो पूरे जंगल में किसी ने तराना छेड़ दिया हो. इसी तराने की हलकी आवाज से दोनों जागे तो मन में एक अतिरिक्त आनंद और शरीर में नई ऊर्जा आ चुकी थी. मन में न कोई अपराधबोध, न कुछ जानने की चाह. बस, एक मौन के साथ फिर मैं और मनामी साथसाथ चल दिए. Romantic Story in Hindi

AR Rahman Controversy : संकीर्णता का शिकार – ए. आर. रहमान

AR Rahman Controversy :

संगीत या कला को धर्म, भाषा व देश की सरहदों में बांटा नहीं जा सकता. संगीत को धर्म के चश्मे से भी नहीं देखा जाना चाहिए. कटु सत्य यह है कि संगीत का कोई धर्म नहीं होता. इस के बावजूद एक कलाकार की पहचान उस के सुरों की बनिस्बत उस के मजहब से होने का सीधा अर्थ यही होता है कि समाज की वैचारिक सेहत ठीक नहीं है.

भारत को वैश्विक पटल तक पहुंचाने वाले ए आर रहमान ने औस्कर की दहलीज पर खड़े हो कर दुनिया को ‘इलाही’ की इबादत और भारत की विरासत का संगम दिखाया, जो आज एक अजीबोगरीब घेरेबंदी का शिकार है.

हाल ही में बीबीसी एशियन नैटवर्क के लिए पाकिस्तानी ब्रिटिश पत्रकार हारून रशीद को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के बदलते मिजाज और बढ़ते ‘कम्युनल’ गैप पर एक कलाकार की पीड़ा व्यक्त की, जिस की वजह से उन्हें कठघरे में खड़ा किया जा रहा है, यह बहुत ही ज्यादा चिंताजनक बात है. दिलीप कुमार से अल्लाह रक्खा रहमान बनने का उन का सफर केवल एक नाम बदलने की कहानी नहीं है, बल्कि एक रूहानी तलाश और भारतीय संगीत को वैश्विक बनाने का वह जनून है जिसे आज सांप्रदायिकता के चश्मे से देखा जा रहा है. खुद ए आर रहमान संगीत को धर्म से जोड़ कर नहीं देखते. वे कई बार कह चुके हैं- ‘‘संगीत का कोई धर्म नहीं होता. संगीत केवल आत्मा को छूने वाली एक भाषा है. जब मैं संगीत बनाता हूं तो मैं किसी विशेष समुदाय के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए बनाता हूं.’’

पेश हैं यहां बीबीसी को दिए उन के इंटरव्यू के कुछ अंशः

जब बीबीसी के पत्रकार ने ए आर रहमान से सवाल किया कि उन्हें पिछले 8-10 साल से बौलीवुड में काम क्यों नहीं मिल रहा है तो रहमान ने बिना किसी लागलपेट के साफसाफ कह दिया कि पिछले लगभग 8 सालों से उन्हें बौलीवुड (हिंदी फिल्म इंडस्ट्री) में काम मिलना कम हो गया है. इसके लिए ए आर रहमान ने फिल्म इंडस्ट्री में हुए ‘पावर शिफ्ट’ को दोष दिया, जहां अब गैररचनात्मक लोगों के हाथों में निर्णय लेने की शक्ति है. उन्होंने संकेत दिया कि यह एक ‘सांप्रदायिक चीज भी हो सकती है’ लेकिन ऐसा रहमान ने सीधेतौर पर नहीं कहा लेकिन फुसफसाहट के रूप में उन के सामने यह चीज आई या यों कहें कि उन से कहलवा दिया गया.

फिल्म ‘छावा’ पर टिप्पणी

ए आर रहमान ने विक्की कौशल अभिनीत सफलतम ऐतिहासिक फिल्म ‘छावा’ में संगीत दिया है. लेकिन इंटरव्यू के दौरान इस फिल्म को उन्होंने एक ‘विभाजनकारी फिल्म’ की संज्ञा दे दी, जिस ने बौक्स औफिस पर कथित तौर पर विभाजनकारी भावनाओं को भुनाया. हालांकि, फिल्म का मुख्य संदेश ‘बहादुरी’ था. उन्होंने फिल्म में कुछ धार्मिक वाक्यांशों (जैसे ‘सुभानअल्लाह’ और अल्हम्दुलिल्लाह) के उपयोग पर भी आपत्ति जताई. इसे ‘क्लीशे’ और ‘क्रिंज’ कहा. फिल्म ‘छावा’ पर ए आर रहमान को बेवजह तूल दिया गया.

एक कलाकार की राय ‘आलोचना’ हो सकती है, ‘नफरत’ नहीं. जिस तरह से एक फिल्म समीक्षक को फिल्म पसंद या नापसंद करने का हक है, वही हक एक संगीतकार को भी है. इसे सांप्रदायिक रंग देना असल में चर्चा को भटकाना है. दूसरी बात हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि एक कलाकार जब सच बोलता है तो वह समाज का आईना होता है. इसे ‘सांप्रदायिक कार्ड’ कहना गलत है. जब वे कहते हैं कि ‘काम न मिलना एक सांप्रदायिक चीज भी हो सकती है’, तो वे अपनी व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि उस सिस्टम की ओर इशारा कर रहे होते हैं जहां रचनात्मकता से ज्यादा विचारधारा को महत्त्व दिया जा रहा है.

प्रतिक्रिया और विवाद

इस इंटरव्यू के वायरल होते ही सोशल मीडिया और फिल्म जगत में मिलीजुली प्रतिक्रियाएं नजर आईं. कुछ लोगों ने उन के दावों को खारिज कर दिया. गीतकार जावेद अख्तर ने सांप्रदायिक मुद्दे से इनकार किया. अभिनेत्री कंगना रनौत ने रहमान पर ही पक्षपाती होने का आरोप लगाया. गायक शान ने कहा कि संगीत में सांप्रदायिक या अल्पसंख्यक पहलू नहीं होता, यह योग्यता पर निर्भर करता है. हमें याद रखना होगा कि सोनू निगम ने कुछ साल पहले मसजिद से सुबहसुबह होने वाली अजान को ले कर काफीकुछ कहा था और वे विवाद के केंद्र में आ गए थे. तब से सोनू निगम ज्यादातर समय दुबई में ही बिताते हैं.

       सोशल मीडिया पर यह सवाल भी उठाया गया कि जब ए आर रहमान के संगीत से सजी ‘रोजा’, ‘बौम्बे’, ‘ताल’ हिट हो रही थीं तब उन्होंने कभी ऐसे मुद्दे क्यों नहीं उठाए. भजन सम्राट अनूप जलोटा ने तो ए आर रहमान को सलाह दी कि उन्हें फिर से मुसलिम धर्म छोड़ कर हिंदू धर्म अपना लेना चहिए.

इस विवाद के बीच कुछ फिल्म समीक्षकों के साथ ही गीतकार वरुण ग्रोवर ने उन के समर्थन में अपनी बात रखी. वरुण ग्रोवर ने रहमान के समर्थन में ट्वीट किया, ‘एक विनम्र राय के लिए उन्हें निशाना बनाया गया और स्पष्टीकरण देने पर मजबूर किया गया, जो खुद में विभाजनकारी मानसिकता का प्रमाण है.’ कई लोगों ने तर्क दिया कि पिछले एक दशक में बौलीवुड दक्षिणपंथी या बहुसंख्यकवादी विमर्शों की ओर झुक गया है, जिस से अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है.

विवाद को शांत करने के लिए रहमान ने जारी किया बयान :

आखिरकार विवाद को शांत करने के लिए ए आर रहमान ने एक वीडियो बयान जारी कर स्पष्ट किया कि उन के शब्दों को गलत समझा गया. उन्होंने कहा, ‘भारत मेरी प्रेरणा, मेरा शिक्षक और मेरा घर है.’ उन का उद्देश्य कभी किसी को ठेस पहुंचाना नहीं था.

कितनी अजीब बात है कि ए आर रहमान जैसे वैश्विक आइकन, जिन्होंने भारत का मान पूरी दुनिया में बढ़ाया, उन्हें आज अपनी वफादारी या ‘सांप्रदायिक सोच’ पर स्पष्टीकरण देने के लिए वीडियो जारी करना पड़ रहा है. बीबीसी एशियन को दिए गए उन के इंटरव्यू पर विवाद पैदा करने से पहले हर इंसान को सोचना चाहिए था कि जब एक कलाकार अपनी असुरक्षा व्यक्त करता है, तो उसे ‘विक्टिम कार्ड’ के बजाय एक गंभीर चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए.

पर विवाद खत्म हो गया हो, ऐसा नहीं लगता. इन दिनों ए आर रहमान नितेश तिवारी के निर्देशन में बन रही फिल्म ‘रामायण’ को संगीत से संवार रहे हैं जोकि अब दक्षिणपंथियों को रास नहीं आ रहा है. ये लोग मांग कर रहे है कि हिंदू भावनाओं को कथित तौर पर आहत करने वाले व्यक्ति को फिल्म ‘रामायण’ से बाहर का रास्ता दिखया जाए वरना फिल्म ‘रामायण’ को ही बैन किया जाए.

आलोचना व विवादों को ले कर ए आर रहमान अतीत में साफ शब्दों में कह चुके हैं- ‘मेरा मकसद विवाद पैदा करना नहीं, बल्कि लोगों के दिलों को जोड़ना है. कभीकभी मेरी खामोशी को कमजोरी समझा जाता है, लेकिन मेरा संगीत ही मेरा सब से बड़ा जवाब है.’

AR Rahman Controversy (1)
जावेद अख्तर ने कई बार कहा है कि आज के कई फिल्मी गीतों में शब्दों की गहराई कम और संगीत पर अधिक जोर दिया जाने लगा है, इस बात को लोगों ने अप्रत्यक्ष रूप से रहमान की शैली से जोड़ कर देखा.

संघर्षपूर्ण बचपन और पारिवारिक पृष्ठभूमि

भजन सम्राट अनूप जलोटा ने कहा है कि ए आर रहमान को फिर से अपना धर्म बदल कर हिंदू कर लेना चाहिए. क्या भजन सम्राट अनूप जलोटा को इस तरह की बात करनी चाहिए थी. यह बहस का मुद्दा हो सकता है लेकिन पहले हम जानते हैं कि यह धर्म परिवर्तन का मसला है क्या.

हकीकत यह है कि ए आर रहमान का जन्म उस वक्त के तमिल व मलयालम फिल्मों के मशहूर संगीतकार व हिंदू धर्मावलंबी आर के शेखर के घर में हुआ था. उन के पिता ने उन का नाम दिलीप कुमार रखा था. जब वे 9 साल के थे तभी उन के पिता का निधन हो गया था. घर चलाने के लिए उन की मां, कस्तूरी (बाद में करीमा बेगम), ने उन के पिता के संगीत वाद्ययंत्रों को किराए पर देना शुरू कर दिया. परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि उन के पास स्कूल की पढ़ाई छोड़ने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था. वे घंटों रिकौर्डिंग स्टूडियो में ‘कीबोर्ड’ बजाते थे ताकि घर में चूल्हा जल सके. यह संघर्ष उन के संगीत में दिखने वाली गहराई और संवेदनशीलता का आधार बना.

धर्म परिवर्तन और रूहानियत

संघर्ष करते हुए जीवन में कई तरह के उतारचढ़ाव का सामना करते हुए वे 25 साल की उम्र में पहुंच गए. 25 साल की उम्र में उन्होंने अपनी मां के प्रभाव में इसलाम अपनाया. रहमान का मानना है कि इस बदलाव ने उन्हें शांति और अनुशासन दिया.

रहमान का इसलाम की ओर झुकाव किसी दबाव में नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक खोज का परिणाम था. वास्तव में 1980 के दशक के उत्तरार्ध की बात है. उन की बहन गंभीर रूप से बीमार हो गई थी. तब उन की मां की मुलाकात एक सूफीसंत कादरी शेख इत्तियातुल शाह से हुई थी. उस वक्त उन के परिवार से जुड़े लोगों का मानना था कि उन की प्रार्थनाओं से ही उन की बहन ठीक हुईं. आखिरकार, 1989 में जब दिलीप कुमार की उम्र 25 साल थी तब उन्होंने अपने पूरे परिवार के साथ इसलाम धर्म को अपनाया और एक ज्योतिषी की सलाह पर ‘अब्दुल रहमान’ और ‘अब्दुल रहीम’ में से ‘रहमान’ नाम चुना. उन के संगीत में जो ठहराव और रूहानियत है, वे उसे अपनी इसी नई पहचान और प्रार्थना (नमाज) का अनुशासन मानते हैं. इसलाम अपनाने के तुरंत बाद ए आर रहमान ने मद्रास, अब चेन्नई, में अपना खुद का स्टूडियो ‘पंचतत्व रिकौर्ड इन’  शुरू किया, जो आज एशिया के सब से उन्नत स्टूडियो में से एक है. ‘पंचतत्व’ हिंदू धर्म का ही शब्द है.

इस तरह देखा जाए तो ए आर रहमान की निजी जिंदगी का सफर अनेकता में एकता का प्रतीक है. एक व्यक्ति जिस ने अभावों को देखा, धर्मों के मिलन को जिया और अपनी कला से दुनिया को जोड़ा, उस पर सांप्रदायिकता का ठप्पा लगाना क्या उन की पूरी जीवनयात्रा का अपमान नहीं है?

संगीत कार के रूप में विज्ञापन की दुनिया से शुरुआत

यों तो उन का फिल्मी कैकरियर फिल्म ‘रोजा’ से शुरू हुआ था लेकिन फिल्मी कैरियर से पहले उन्होंने 300 से अधिक विज्ञापन फिल्मों को संगीत से संवारा था जिस में प्रसिद्ध ‘टाइटन वाच’ की धुन का भी समावेश है.

ए आर रहमान का संगीत सफर केवल फिल्मों या किसी भाषा मात्र तक सीमित नहीं रहा, उन्होंने भारतीय संगीत को वैश्विक स्तर पर एक नई पहचान दी. ए आर रहमान ने सब से पहले 1992 में मणिरत्नम की फिल्म ‘रोजा’ के लिए संगीत निर्देशन किया था. इस फिल्म के संगीत ने रातोंरात भारतीय फिल्म संगीत की परिभाषा बदल दी. उन्होंने पारंपरिक भारतीय धुनों को ‘रेगे’, ‘जंगल रिदम’ और वेस्टर्न आर्केस्ट्रा के साथ जोड़ा, जिसे उस वक्त ‘टाइम’ मैगजीन ने दुनिया के टौप 10 साउंडट्रैक्स में शामिल किया था.

भारतीय संगीत में रिकौर्डिंग की तकनीक को बदलने का श्रेय भी रहमान को ही जाता है. फिल्म ‘रोजा’ में जो ‘क्रिस्टल क्लियर’ आवाज थी, उस ने भारत में साउंड इंजीनियरिंग के मायने बदल दिए. उन्होंने लाइव वाद्ययंत्रों के साथसाथ सिंथेसाइजर और कंप्यूटर प्रोग्रामिंग का ऐसा तालमेल बैठाया जो उस समय भारत के लिए बिलकुल नया था. तभी तो उन्होंने अपनी पहली ही फिल्म के लिए ‘सर्वश्रेष्ठ संगीतकार’ का राष्ट्रीय पुरस्कार जीत कर अपना नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज करा लिया.

ए आर रहमान से पहले, संगीत बड़े स्टूडियो और भारीभरकम साजोसामान तक सीमित था. रहमान ने होम स्टूडियो और डिजिटल प्रोग्रामिंग की क्रांति ला कर छोटे शहरों के प्रतिभाशाली संगीतकारों के लिए रास्ता खोला. वे केवल एक संगीतकार नहीं, बल्कि एक ‘विशाल तकनीकी बदलाव’ के जनक हैं.

भारतीय सिनेमा के इतिहास में रहमान पहले ऐसे संगीतकार हैं जिन्होंने भाषाई सीमाओं को कभी स्वीकार नहीं किया. ए आर रहमान से पहले दक्षिण भारतीय संगीतकारों को ‘क्षेत्रीय’ कहा जाता था. रहमान ने साबित किया कि अगर धुन में दम हो, तो चेन्नई में बना संगीत कश्मीर की गलियों में भी उसी शिद्दत से सुना जाएगा. यह भारत की सांस्कृतिक अखंडता का एक बड़ा उदाहरण है.

शास्त्रीय और आधुनिक का द्वंद्व

अकसर शास्त्रीय संगीत के जानकार उन्हें ‘मशीनी संगीत’ बनाने वाला कहते थे. लेकिन रहमान ने ‘लगान’ और ‘स्वदेश’ जैसी फिल्मों में शास्त्रीय रागों का ऐसा आधुनिक उपयोग किया कि नई पीढ़ी भी अपनी जड़ों से जुड़ गई. उन का योगदान संगीत को ‘म्यूजियम’ से निकाल कर ‘मल्टीप्लैक्स’ तक पहुंचाने का है.

ए आर रहमान ने हर तरह की फिल्मों को अपने संगीत से संवारा फिर चाहे वह देशभक्ति वाली फिल्म हो, रोमांटिक हो या सूफीवादी हो. इतना ही नहीं, ‘बौम्बे’, ‘रोजा’ और ‘दिल से’ जैसी फिल्मों के माध्यम से उन्होंने मानवीय रिश्तों को राजनीतिक पृष्ठभूमि के साथ संगीतबद्ध किया. उन के अलबम ‘वंदे मातरम’ ने देश में देशभक्ति व राष्ट्वाद की एक नई लहर पैदा की. 1997 का देशभक्तिपूर्ण गीत ‘मां तुझे सलाम…’ (वंदे मातरम) ने आधुनिक भारत को अपनी नई ‘सांस्कृतिक पहचान’ दी और हर घर में गूंजा.

ए आर रहमान के अब तक के पूरे कैरियर पर गौर किया जाए तो एक बात साफ तौर पर उभर कर आती है कि रहमान का संगीत कभी भी एक धर्म तक सीमित नहीं रहा. ‘ताल’, ‘रंगीला’, ‘लगान’ और ‘स्वदेश’ जैसी फिल्मों में उन्होंने लोक संगीत और आधुनिक ध्वनि का ऐसा मिश्रण किया जो हर वर्ग को पसंद आया. अगर उन्होंने ‘ख्वाजा मेरे ख्वाजा’ जैसा सूफी कलाम दिया, तो उन्होंने आमिर खान की फिल्म ‘लगान’ में ‘ओ पालनहारे…’ गवाया. इतना ही नहीं, ए आर रहमान ने फिल्म ‘लगान’ के गानों की रिकौर्डिग में मशहूर वीणावादक विश्वमोहन भट्ट की सेवाएं लीं. 2001 में फिल्म ‘लगान’ का ए आर रहमान द्वारा तैयार किया गया गीत ‘ओ पालनहारे…’ भगवान कृष्ण को समर्पित यह प्रार्थना आज भी मंदिरों और घरों में भक्ति के प्रतीक के रूप में सुनी जाती है तो उन्होंने सूफी (इसलाम) गीत ‘कुन फया कुन’ दिया.

कहने का अर्थ यह कि ए आर रहमान ने ‘कुन फया कुन’ बनाने के लिए जिस दिल का इस्तेमाल किया, उसी दिल से ‘ओ पालनहारे’ की रचना की. एक सच्चा कलाकार कभी अपनी कला को सांप्रदायिक चश्मे से नहीं देखता.

ए आर रहमान से जब भी उन की सफलता पर सवाल किया गया, उन्होंने हमेशा कहा- ‘‘आसफलता केवल एक मंजिल नहीं है, यह एक सफर है जो शुद्धता और अनुशासन से तय होती है. मेरा धर्म मुझे वही अनुशासन और विनम्रता सिखाता है.’’

जावेद अख्तर ने कहा है कि पश्चिम यानी कि हौलीवुड में काम करने के कारण शायद वे बौलीवुड में समय कम दे रहे होंगे. तो, यह भी सच हो सकता है. उन्होंने ‘127 आवर्स’, ‘एलिजाबेथ’, ‘द गोल्डन एज’ और ‘पीपल लाइक अस’ जैसी अंतर्राष्ट्रीय फिल्मों के लिए भी संगीत दिया है.

रहमान केवल संगीतकार नहीं, बल्कि एक प्रभावशाली गायक भी हैं. उन की आवाज में एक खास किस्म की मासूमियत और गहराई होती है. रहमान द्वारा स्वरबद्ध गीत मसलन, ‘वंदे मातरम…’, ‘लुका छिपी…’, ‘तेरे बिना…’ लोगों के दिलों के बेहद करीब हैं. रहमान के गानों की लगभग 15 करोड़ प्रतियां दुनियाभर में बिकी हैं. वे दक्षिण और उत्तर भारत के बीच के भाषाई अंतर को संगीत के जरिए पाटने वाले पहले बड़े कलाकार माने जाते हैं.

सूफी संगीत का उदय

ए आर रहमान उन संगीतकारों में से हैं जिन्होंने बौलीवुड में सूफी संगीत को मुख्यधारा में शामिल किया. ‘जोधा अकबर’ का सूफी गीत ‘ख्वाजा मेरे ख्वाजा…’ और ‘रौकस्टार’ का ‘कुन फया कुन…’ सिर्फ गाने नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुभव हैं जो उन की धार्मिक पहचान और कला के संगम को दर्शाते हैं.

कई पुरस्कारों से सम्मानित ए आर रहमान केवल एक संगीतकार या गायक ही नहीं, बल्कि एक मानवीय चेतना वाले वैश्विक नागरिक हैं.

पुरस्कारों का वैश्विक इतिहास

ए आर रहमान ने भारतीय संगीत को उस मंच पर पहुंचाया जहां पहले कोई नहीं पहुंचा पाया था. उन के पुरस्कार केवल उन की प्रतिभा का नहीं, बल्कि उन की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है. 2009 में फिल्म ‘स्लमडौग मिलेनियर’ के लिए उन्होंने सर्वश्रेष्ठ मूल स्कोर और सर्वश्रेष्ठ मूल गीत (‘जय हो) के लिए दो औस्कर जीत कर इतिहास रचा था. औस्कर अर्वाड लेते हुए ए आर रहमान ने कहा था- ‘मेरे पास जीवन में हमेशा 2 विकल्प थे-प्यार और नफरत. मैं ने प्यार को चुना और आज मैं यहां हूं.’

AR Rahman Controversy (2)
ए आर रहमान दक्षिण और उत्तर भारत के बीच के भाषाई अंतर को संगीत के जरिए पाटने
वाले पहले बड़े कलाकार माने जाते हैं.

2010 में दुनिया के सब से प्रतिष्ठित संगीत पुरस्कार ग्रैमी में भी 2 ट्राफियां जीतीं. वे पहले भारतीय संगीतकार हैं जिन्होंने एक ही वर्ष में गोल्डन ग्लोब और बाफ्टा जैसे सम्मान अपने नाम किए. इतना ही नहीं, भारत सरकार ने उन्हें 6 बार सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया है. कला के क्षेत्र में उन के योगदान के लिए उन्हें 2010 में भारत के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मभूषण से नवाजा गया.

सामाजिक कार्य और परोपकार

दक्षिण के तमाम कलाकारों की ही तरह ए आर रहमान की पहचान उन की खामोशी और परोपकार से भी जुड़ी है. वे अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा समाज सेवा में लगाते हैं.

       उन्होंने ‘ए आर रहमान फाउंडेशन’ की स्थापना कर रखी है, जिस से वंचित बच्चों को संगीत और शिक्षा के जरिए सशक्त बनाया जा सके. चेन्नई में ‘के एम म्यूजिक कंजर्वेटरी’ नामक संस्थान है, जो संगीत की शिक्षा के लिए समर्पित है. यहां आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को भी संगीत की विश्वस्तरीय ट्रेनिंग दी जाती है.

उन्होंने यूनेस्को के साथ ‘ग्लोबल एंबेसडर’ के रूप में काम किया है और गरीबी उन्मूलन के लिए ‘ग्लोबल पावर्टी प्रोजैक्ट’ जैसे अभियानों से जुड़े रहे हैं. 2018 में जब केरल में बाढ़ आई थी तब उन्होंने अपने अमेरिका दौरे के शो से हुई कमाई का एक करोड़ रुपया राहत कोष में दिया था.

ए आर रहमान के इन परोपकार के कार्यों का जिक्र करने का एक मात्र मकसद यह है कि जिस इंसान ने जीवनभर केवल संगीत के जरिए शांति का संदेश दिया और अपनी विरासत को समाज की भलाई के लिए समर्पित कर दिया, उसे आज संकीर्ण विचारधारा के चश्मे से देखना भारतीय कला जगत के लिए एक दुखद स्थिति है. शांति और नफरत के मुद्दे पर ए आर रहमान कई बार कह चुके हैं- ‘पूरी दुनिया नफरत और हिंसा से जूझ रही है. मेरे लिए संगीत ही वह एकमात्र औजार है जिस से मैं दुनिया में थोड़ी शांति और प्यार वापस ला सकता हूं.’’

आखिरकार ए आर रहमान केवल एक संगीतकार नहीं, बल्कि एक पुल जैसे हैं जिन्होंने दक्षिण को उत्तर से और भारत को विश्व से जोड़ा. अगर आज वे असुरक्षित महसूस करते हैं या इंडस्ट्री में बढ़ती दूरियों की ओर इशारा करते हैं, तो यह उन का ‘मजहब’ नहीं, बल्कि उन की ‘कला’ आवाज दे रही है. एक ऐसे कलाकार को, जिस ने देश को 2 औस्कर और अनगिनत गर्व के क्षण दिए, उसे उस की धार्मिक पहचान के कारण निशाना बनाना हमारी सामूहिक हार है. ‘रामायण’ जैसे महाकाव्य में उन का जुड़ना इस बात का प्रमाण है कि वे भारतीय संस्कृति के उतने ही बड़े पैरोकार हैं जितने कई और. समय आ गया है कि हम ए आर रहमान को ‘अल्लाह’ और ‘ईश्वर’ के बीच बांटने की बनिस्बत उन के उस ‘सुर’ को सुनें, प्रधानता दें जो मानवता और शांति की बात करता है. क्योंकि रहमान जैसे फनकार रोज पैदा नहीं होते. वहीं, आज के नफरत के शोर में उन की खामोशी और सुरों का साथ देना ही सच्ची कलासाधना होगी.

ए आर रहमान के खिलाफ हालिया शोर यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम एक समाज के रूप में अपनी महानतम उपलब्धियों को केवल इसलिए खंडित करने पर उतारू हैं क्योंकि वे हमारी संकीर्ण वैचारिक सांचों में फिट नहीं बैठतीं? रहमान का ‘कम्युनल’ होना तो दूर, उन का पूरा जीवन ही ‘सांस्कृतिक समावेश’  का एक जीवंत उदाहरण रहा है.

रहमान का बीबीसी इंटरव्यू किसी के खिलाफ ‘युद्धघोष’ नहीं था, बल्कि एक संवेदनशील कलाकार की वह ‘आह’ थी जो इंडस्ट्री में बढ़ते ध्रुवीकरण को महसूस कर रही है. हमें यह समझना होगा कि औस्कर की चमक रहमान के लिए नहीं, बल्कि पूरे भारत के लिए थी. यदि हम अपने नायकों को उन की पहचान की वजह से असुरक्षित महसूस करवाएंगे तो हम आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देंगे कि योग्यता से ज्यादा विचारधारा मायने रखती है जोकि गलत है.

रहमान जैसे फनकार मजहब की सीमाओं से बहुत ऊपर उस शून्य में रहते हैं जहां केवल सुरों का वास होता है. उन के संगीत पर सांप्रदायिकता का रंग चढ़ाना वैसा ही है जैसे सूरज की रोशनी को धर्मों में बांटने की कोशिश करना. समय है कि हम शोर को पीछे छोड़ें और रहमान के उस ‘मौन’ को सुनें, जो हमेशा से शांति और प्रेम की इबादत करता आया है.

AR Rahman Controversy

Digital Impact on Children : डिजिटल युग में खत्म होता बचपन

Digital Impact on Children :

डिजिटल युग में बचपन : आजादी, दबाव और दिशाहीनता

फरवरी में देश के अलगअलग शहरों में बच्चों से जुड़ी तीन ऐसी सनसनीखेज घटनाएं हुईं जिन्होंने न सिर्फ पेरैंटिंग पर सवालिया निशान जड़ दिया, बल्कि बढ़ती तकनीक, पैसा और बच्चों को मिलने वाली आजादी को कठघरे में खड़ा भी कर दिया है.

तीन बहनों की सामूहिक आत्महत्या

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के साहिबाबाद में टीला मोड़ क्षेत्र की भारत सिटी सोसायटी में तीन नाबालिग बच्चियों- निशिका 16 साल, प्राची 14 साल, पाखी 12 साल ने रात के ढाई बजे बिल्डिंग की 9वीं मंजिल की बालकनी से एकसाथ छलांग लगा कर आत्महत्या कर ली. तीनों बहनें एक कोरियन गेमिंग ऐप की आदी थीं. वे औनलाइन टास्कबेस्ड कोरियन लवर गेम खेलती थीं. पुलिस जांच में पता चला कि तीनों बहनों को कोरियाई गेम खेलने की लत थी और उन के परिजन तीनों को गेम खेलने से मना करते थे. इस से तीनों बहनें परिजनों से नाराज थीं. वे भावनात्मक तनाव में थीं और इसी के चलते उन्होंने ऐसा खौफनाक कदम उठाया.

ये तीनों बहनें कोरियन स्टार्स के प्रति भावनात्मक रूप से इतना समर्पित थीं कि उन के खिलाफ कुछ भलाबुरा सुनना उन्हें रास नहीं आता था. अपने पसंदीदा स्टार्स के रहनसहन से ले कर लाइफस्टाइल, पहनावा और हेयरस्टाइल भी तीनों ने कौपी किया था. यही नहीं, उन्होंने अपने नाम मारिया, एलिजा व सिंडी रख लिए थे. तीनों अपनी 3 साल की छोटी बहन देव्यांशी उर्फ देवु को भी कोरियन लवर बनाना चाहती थीं. इस बात को ले कर उन्हें मार भी पड़ी और 15 दिन पहले पिता ने उन का मोबाइल फोन छीन कर बेच दिया. इस से तीनों गुस्से और तनाव से भर गईं. आत्महत्या से पहले लिखा गया उन का 8 पेज का सुसाइड नोट कोरियन स्टार्स के प्रति इन नाबालिग लड़कियों की दीवानगी की इंतहा और पारिवारिक परिस्थितियों को बयां करता है. बेटियों ने लिखा, “सौरी पापा, हम गेम नहीं छोड़ सके. कोरियन गेम हमारी जिंदगी, हमारी जान है.”

बच्चियों के पिता चेतन का कहना है- वे 3 साल से गेम खेल रही थीं. आर्थिक तंगी के कारण 2 साल से इन का स्कूल छूटा हुआ था. वे ज्यादातर घर में अपने कमरे में रहती थीं और टीवी या मोबाइल देखती थीं. हमें अंदाजा नहीं था कि वे इस गेम में इतनी ज्यादा डूब चुकी हैं. वे मुझ से कहती थीं कि वे कोरिया जाना चाहती हैं.

चेतन कहते हैं, “मेरी बच्चियों के साथ बहुत बुरा हुआ. कोई भी मांबाप अपने बच्चों को मोबाइल गेम न खेलने दे. गेम में कौन सा टास्क दिया जा रहा है, इस का पता मांबाप को नहीं चलता. अगर मुझे पता होता कि किस तरह के टास्क दिए जा रहे हैं तो हम उन्हें गेम खेलने ही न देते.

चेतन कर्ज में डूबे हुए थे, इसलिए उन्होंने लड़कियों की पढ़ाई पर ज्यादा जोर नहीं दिया और बारबार फेल होने पर उन का स्कूल छुड़वा दिया. वे प्लान कर रहे थे कि जब आर्थिक स्थिति सुधरेगी, तब दोबारा एडमिशन करवा देंगे.

कोविड के दौरान तीनों लड़कियां कईकई घंटे कोरियन म्यूजिक सुनती थीं. साथ ही, फिल्में, वैब सीरीज और वीडियो देखती रहती थीं. उन के नाजुक दिमाग पर कोरियन कल्चर का इतना असर हुआ कि वो खुद को भारतीय की जगह कोरियन मानने लगी थीं.

Digital Impact on Children (2)
गाजियाबाद की 3 बहनों की एकसाथ आत्महत्या यह सोचने पर मजबूर करती है कि बच्चों को तकनीक की दुनिया में पूरी तरह स्वतंत्र छोड़ देना सही नहीं है.

यह घटना कई स्तरों पर गहरी चेतावनी देती है. इसे सिर्फ ‘मोबाइल गेम’ या ‘कोरियन कल्चर’ के असर तक सीमित कर के समझना अधूरा होगा. यह एक जटिल पारिवारिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक त्रासदी का उदाहरण है. यह डिजिटल लत का खतरनाक रूप है जिस में बच्चे लगातार कईकई घंटे गेम/कंटैंट में डूबे रहते हैं, जिस के चलते नींद की कमी, चिड़चिड़ापन, भावनात्मक अस्थिरता पैदा होती है. यही नहीं, वे आभासी दुनिया को वास्तविक जीवन से अधिक महत्त्वपूर्ण मानने लगते हैं. यह बताता है कि डिजिटल प्लेटफौर्म्स बच्चों के मन पर गहरा प्रभाव डाल रहे हैं, खासकर, जब उन का उपयोग अनियंत्रित और निगरानीरहित हो.

परिवार का अलगाव वाला माहौल

परिवार के सदस्यों के बीच संवाद की कमी, खासकर बच्चों से उन की इच्छा, जिज्ञासा, विचार आदि पर कोईबात न होना, भावनात्मक अलगाव की स्थिति पैदा करती है और उन के मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करती है. इस से बच्चों में परिवार से नाराजगी, हताशा, ‘हमें कोई नहीं समझता’ जैसी भावना पैदा होती है. उन के लिए अपनी पहचान का संकट सामने आता है.

मनोवैज्ञानिकों की मानें तो आज के डिजिटल युग में नाबालिगों में अवसाद, एंग्जायटी और आवेग बहुत तेजी से विकसित हो रहा है और इस की वजह है- हर वक्त सोशल मीडिया से जुड़े रहना, किताबों, अखबारों, पत्रिकाओं को न पढ़ना व समाज और देश में क्या हो रहा है, इस से अनभिज्ञ रहना, न सिर्फ बच्चे बल्कि मातापिता भी.

जिन घरों में अलमारियां किताबों से भरी हैं, परिवार के सदस्यों को पढ़नेलिखने का शौक है, वहां बच्चों में भी पढ़ने, सीखने, समझने और विचारों को व्यक्त करने क्षमता विकसित होती है. ऐसे घरों में तनाव, अवसाद, लड़ाईझगड़े, पलायनवादी विचार, जिद्द, क्षोभ जैसी नकारत्मक चीजें नहीं होतीं.

किशोरावस्था में रोलमौडल्स का प्रभाव सामान्य है, पर ये रोल मौडल्स वास्तविक होने चाहिए, न कि, इंटरनैट की दुनिया के आभासी. जब वास्तविक जीवन निराशाजनक लगे तो आभासी पहचान ज्यादा आकर्षक लगने लगती है. आज के समय में डिजिटल साक्षरता की जरूरत अवश्य है मगर मांबाप द्वारा इस पर नियंत्रण भी जरूरी है.

बच्चों से सिर्फ ‘मत खेलो’ कहना पर्याप्त नहीं है. उन्हें समझना, उन के साथ बैठना, सीमाएं तय करना भी जरूरी है. बच्चों के व्यवहार में बदलाव को गंभीर संकेत मानना चाहिए. डांट/मार के बजाय खुली बातचीत अधिक प्रभावी होती है. स्कूल और सामाजिक जुड़ाव बच्चों के लिए आवश्यक हैं. शिक्षा सिर्फ पढ़ाई नहीं, बल्कि यह पहचान, आत्मविश्वास और सामाजिक संतुलन भी देती है.

क्लास में गोलीकांड

9 फरवरी को पंजाब के तरनतारन जिले के उस्मा गांव में एक ला कालेज में दिल दहला देने वाली घटना हुई. एक ला स्टूडैंट ने अपने कालेज की छात्रा संदीप कौर के सिर में गोली मार कर उस की हत्या कर दी और उस के बाद उस ने वहीं अपने भी सिर से पिस्तौल सटाई व अपनी भी इहलीला समाप्त कर ली. पूरे कालेज सहित शहरभर में दहशत फैल गई. ऐसी घटनाएं अभी तक अमेरिका, कनाडा जैसे देशों से आती थीं कि स्टूडैंट्स स्कूलकालेज में असलहा ले कर आ गए और अंधाधुंध फायरिंग कर दी. मगर पंजाब में उसी तरह की घटना ने भारतीय बच्चों में बढ़ रहे गुस्से, तनाव, अपने ऊपर खो रहे नियंत्रण, भावुकता और अवसाद का मिलाजुला रूप सामने ला दिया है.

पढ़नेलिखने में अपना समय देने के बजाय बच्चे अपराध के रास्ते पर बढ़ रहे हैं. इस के पीछे वजहें हैं- परिवार द्वारा बच्चों की अनदेखी, उन के साथ संवाद की कमी, उन को भरपूर पौकेट मनी और उस पौकेट मनी का गलत चीजों को खरीदने में इस्तेमाल होना आदि.

इस घटना के पीछे एकतरफा प्यार की दास्तान थी जहां गोली मारने वाले छात्र को छात्रा से प्यार था. मगर छात्रा ने उस से कहा कि उस की शादी तय हो गई है इसलिए अब वह उस से नहीं मिलेगी. इस बात ने छात्र को इतना उद्वेलित कर दिया कि वह असलहा ले कर क्लास में पहुंच गया और सभी स्टूडैंट्स के सामने उस ने संदीप कौर के सिर में गोली मार दी और अगले ही क्षण खुद को भी गोली से उड़ा लिया.

अब पुलिस जांच कर रही है कि छात्र वह पिस्टल कहां से लाया था? पुलिस यह भी चैक कर रही है कि कहीं उस के पिता के पास लाइसैंसी पिस्टल तो नहीं है? अगर ऐसा न हुआ तो फिर यह पिस्टल अवैध है जो और भी बड़े क्राइम की ओर इशारा करती है.

रईसजादे का सड़क पर आतंक

8 फरवरी को कानपुर में नशे में धुत एक रईसजादे शिवम मिश्रा ने अपनी 12 करोड़ रुपए की लेम्बोर्गिनी कार से 6 लोगों को रौंद डाला और थाने में बाकी घायलों से उस के बौडीगार्ड्स ने मारपीट की. पहले उस ने अपनी लग्जरी कार से एक बुलेट को जोरदार टक्कर मारी, जिस पर तीन लोग सवार थे. टक्कर मारने के बाद गाड़ी रोकने के बजाय शिवम मिश्रा ने मौके से भागने की कोशिश की, जिस से अन्य लोग भी उस की चपेट में आ गए. इस के बाद कार अनियंत्रित हो कर सीधे डिवाइडर में जा घुसी.

शिवम मिश्रा कानपुर के एक बड़े तंबाकू कारोबारी के के मिश्रा का बेटा है. पैसे का गरूर उस के सिर चढ़ कर बोलता है. इसी गरूर के चलते यह घटना हुई. इस घटना के बाद बजाय इस के कि वह अपना अपराध कुबूल करता, उस के रईस पिता ने अपने ड्राइवर को इस घटना का जिम्मेदार बता कर बेटे का बचाव करना चाहा. शिवम के पिता और वकील ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि गाड़ी ड्राइवर चला रहा था. मोहन नाम के व्यक्ति ने कोर्ट में एफिडेविट भी दिया कि वह गाड़ी चला रहा था. हालांकि पुलिस जांच, सीसीटीवी फुटेज और अन्य साक्ष्यों को देखते हुए कोर्ट ने उस की बात नहीं मानी और 12 फरवरी को शिवम को पुलिस ने गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया.

फरवरी की ये तीनों घटनाएं- गाजियाबाद में तीन बहनों की सामूहिक आत्महत्या, पंजाब में कालेज परिसर में गोलीकांड, और उत्तर प्रदेश के कानपुर में रईसजादे की लापरवाह ड्राइविंग सिर्फ सनसनीखेज खबरें नहीं हैं; ये हमारे समय की बेचैन सामाजिक सच्चाइयों का आईना हैं. इन का दर्द अलगअलग है लेकिन इन के धागे कहीं न कहीं एकदूसरे से जुड़ते हैं. बदलती जीवनशैली, तकनीक का अनियंत्रित प्रभाव, पारिवारिक संवाद का क्षरण और जिम्मेदारी के स्थान पर सुविधा व दिखावे की संस्कृति ने बच्चों को जकड़ लिया है.

ये तीनों घटनाएं बदलते सामाजिकडिजिटल परिवेश का गंभीर संकेत हैं. किताबों और ज्ञानवर्धक पत्रिकाओं से दूर होते बच्चे, बढ़ती डिजिटल लत, असफलता का डर, रिश्तों का तनाव, ये सब मिल कर बच्चों में अवसाद, आवेग और निराशा को तेज कर रहे हैं. गाजियाबाद की सामूहिक आत्महत्या और तरनतारन की हत्याआत्महत्या दोनों में क्षणिक भावनात्मक उथलपुथल बच्चों की जिंदगी के लिए घातक साबित हुई. तीन बहनों की सामूहिक आत्महत्या बताती है कि किस तरह आज के बच्चे पहचान के संकट से गुजरते हुए आभासी दुनिया- मोबाइल गेम, सोशल मीडिया में डूब रहे हैं जो उन्हें वास्तविक जीवन से अधिक आकर्षक लगने लगती है.

Digital Impact on Children (1)
आज कई ऐसे गेम्स और ऐप्स मौजूद हैं जो बच्चों के मनोविज्ञान को प्रभावित करते हैं. कुछ गेम्स में हिंसा, प्रतिस्पर्धा और दबाव इतना अधिक होता है कि बच्चे मानसिक रूप से प्रभावित होने लगते हैं.

बच्चे औनलाइन अनेक लोगों से ‘कनैक्टेड’ हैं, पर परिवार से भावनात्मक रूप से दूर हो चुके हैं. मातापिता अकसर नहीं जानते कि बच्चे मोबाइल फोन पर क्या देख रहे हैं और क्या खेल रहे हैं.

डिजिटल दुनिया की गिरफ्त

गाजियाबाद की त्रासदी हमें डिजिटल लत के उस अंधेरे कोने में झांकने को मजबूर करती है जहां आभासी पहचान वास्तविक जीवन पर भारी पड़ने लगती है. किशोर मन स्वाभाविक रूप से जिज्ञासु और प्रभावग्राही होता है. जब परिवार, स्कूल और समाज मिल कर संतुलित मार्गदर्शन नहीं दे पाते, तब इंटरनैट, गेम्स और एल्गोरिदम ‘रोल मौडल’ बन बैठते हैं. समस्या तकनीक नहीं, उस का अनियंत्रित और निगरानीरहित उपयोग है. ‘मत खेलो’ का आदेश, बिना समझ और संवाद के, अकसर प्रतिरोध को जन्म देता है. डिजिटल साक्षरता, समयसीमा और भावनात्मक सहारा ये तीनों साथसाथ चलें, तभी समाधान संभव है.

गुस्सा, असुरक्षा और हथियार

पंजाब के कालेज की घटना बढ़ते आवेग, अस्वीकृति को सहने की घटती क्षमता और हथियारों तक बच्चों की पहुंच पर गंभीर प्रश्न उठाती है. एकतरफा भावनाएं, सामाजिक दबाव और मानसिक असंतुलन जब साथ आते हैं, तो परिणाम भयावह होते हैं. शिक्षा संस्थान केवल डिग्री देने के केंद्र नहीं, बल्कि भावनात्मक बुद्धिमत्ता, संघर्षप्रबंधन और परामर्श के सुरक्षित स्थल भी होने चाहिए. साथ ही, हथियारों की वैधअवैध उपलब्धता पर सख्त निगरानी राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी है.

पैसा, शक्ति और जवाबदेही

कानपुर की घटना उस मानसिकता को उजागर करती है जहां संपन्नता, प्रभाव और ‘बच निकलने’ की उम्मीद कानून व नैतिकता पर भारी पड़ती दिखती है. यह केवल एक व्यक्ति की चूक नहीं, बल्कि सामाजिक व पारिवारिक संदेश का संकट है. हम बच्चों को सुविधा तो दे रहे हैं पर जिम्मेदारी और संवेदनशीलता सिखाने में चूक रहे हैं. जिम्मेदारी और संवेदनशीलता आपसी संवाद से और अच्छी किताबें व पत्रिकाएं पढ़ने से विकसित होती है. इस के साथ, कानून का निष्पक्ष और दृढ़ता से सब पर बराबर लागू होना, ऐसी प्रवृत्तियों पर अंकुश लगा सकता है.

तीनों घटनाओं का साझा सबक है- परिवार में संवाद की अपरिहार्यता. डर, डांट और दंड से अधिक असरदार है खुली बातचीत, भरोसा और सहभागिता. बच्चों के व्यवहार में बदलाव, जैसे अत्यधिक एकांत में रहने लगना, चिड़चिड़ापन, नींद की कमी, पढ़ाई से दूरी आदि सब संकेत हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए. ‘समय नहीं है’ का तर्क आज सब से महंगा साबित हो रहा है.

स्कूल और कालेज केवल अकादमिक मंच नहीं, सामाजिक संतुलन और आत्मपहचान के आधार भी हैं. लाइब्रेरी में समय बिताना बच्चों के दिमागी संतुलन और सही विकास के लिए बहुत जरूरी है. जब आर्थिक या अन्य कारणों से बच्चे शिक्षा और साथियों से कटते हैं, तो वे वैकल्पिक और कभीकभी जोखिमभरी दुनियाओं में आश्रय खोजने लगते हैं. यह परिवार और समाज दोनों के लिए चेतावनी है.

इन घटनाओं को अलगअलग ‘केस’ मान कर भूल जाना हमारे लिए आसान है लेकिन यह खतरा दिनप्रतिदिन बढ़ रहा है. फरवरी की ये खबरें हमें झकझोरती हैं कि आधुनिकता की दौड़ में कहीं हम मूल्यों, संवाद और संतुलन को पीछे तो नहीं छोड़ रहे हैं. सवाल तकनीक, प्रेम या पैसे का नहीं है, सवाल यह है कि उन के साथ हमारी समझ, मर्यादा और जवाबदेही कितनी है. अगर यह आत्ममंथन अब भी न हुआ तो अगली सनसनी शायद और अधिक भयावह होगी.

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Romantic Story In Hindi : मजाक – खुशबू तो ऐसा ख्वाब थी जिस के लिए क्या कहें

Romantic Story In Hindi : दिल्ली से बैंगलुरु का सफर लंबा तो था ही, लेकिन जयंत की बेसब्री भी हद पार कर रही थी. 3 साल बाद खुशबू से मिलने का वक्त जो नजदीक आ रहा था. मुहब्बत में अगर कामयाबी मिल जाए तो इनसान को दुनिया जीत लेने का अहसास होने लगता है.

ट्रेन सरपट भाग रही थी लेकिन जयंत को उस की रफ्तार बैलगाड़ी सी धीमी लग रही थी. रात के 9 बज रहे थे. उस ने एक पत्रिका निकाल कर अपना ध्यान उस में बांटना चाहा लेकिन बेजान काले हर्फ और कागज खुशबू की कल्पना की क्या बराबरी करते?

खुशबू तो ऐसा ख्वाब थी, जिसे पूरा करने में जयंत ने खुद को झोंक दिया था. उस की हर शर्त, हर हिदायत को आज उस ने पूरा कर दिया था. अब फैसला खुशबू का था.

जयंत ने मोबाइल फोन निकाला. खुशबू का नंबर डायल किया लेकिन फिर अचानक फोन काट दिया. उसे याद आया कि खुशबू ने यही तो कहा था, ‘जब सच में कुछ बन जाओ तब मुहब्बत को पाने की बात करना. उस से पहले नहीं. मैं तब तक तुम्हारा इंतजार करूंगी.’

मोबाइल फोन वापस जेब के हवाले कर जयंत अपनी बर्थ पर लेट गया. सुख के इन लमहों को वह खुशबू की यादों में जीना चाहता था.

5 साल पहले जब जयंत दिल्ली आया था तो वह कुछ बनने के सपने साथ लाया था लेकिन दिल्ली की फिजाओं में उसे खुशबू क्या मिली, जिंदगी की दशा और दिशा ही बदल गई.

जयंत ने मुखर्जी नगर, दिल्ली के एक नामी इंस्टीट्यूट में प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए दाखिला लिया तो वहां पढ़ाने वाली मैडम खुशबू का जादू पहली नजर में ही प्यार में बदल गया.

भरापूरा बदन और बेहद खूबसूरत. झील सी आंखें. घुंघराले लंबे बाल. बदन का हर अंग ऐसा कि सामने वाला देखता ही रह जाए.

जयंत ने खुशबू से बातचीत शुरू करने की कोशिश की. क्लास में वह अकसर मुश्किल सवाल रखता पर खुशबू की सब्जैक्ट पर गजब की पकड़ थी. जयंत उसे कभी अटका नहीं पाया. लेकिन उस में भी बहुत खूबियां थीं इसलिए खुशबू उसे स्पैशल समझने लगी.

उस दिन क्लास जल्दी खत्म हो गई. खुशबू ने जयंत को रुकने का इशारा किया. थोड़ी देर बाद वे दोनों एक कौफी हाउस में थे और वहां कहीअनकही बहुत सी बातें हो गईं. नजदीकियां बढ़ने लगीं तो समय पंख लगा कर उड़ने लगा.

एक दिन मौका देख कर जयंत ने खुशबू को प्रपोज भी कर दिया, लेकिन खुशबू ने वैसा जवाब नहीं दिया जैसी जयंत को उम्मीद थी.

खुशबू की बहन की शादी थी. उस ने जयंत को न्योता दिया तो जयंत भला ऐसा मौका क्यों छोड़ता? काफी अच्छा आयोजन था लेकिन जयंत को इस सब में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी.

दकियानूसी रस्में रातभर चलने वाली थीं, इसलिए जयंत मेहमानों के रुकने वाले हाल में जा कर सो गया. लोगों की आवाजें वहां भी आ रही थीं. सब बाहर मंडप में थे.

रात में अचानक किसी की छुअन की गरमाहट से जयंत की नींद खुली. हाल की लाइट बंद थी, लेकिन अपनी चादर में लड़की की छुअन वह अंधेरे में भी पहचान गया था.

खुशबू इस तरह उस के साथ… ऐसा सोचना भी मुश्किल था. लेकिन अपने प्यार को इतना करीब पा कर कौन मर्द अपनेआप पर कंट्रोल रख सकता है?

चंद लमहों में वे दोनों एकदूसरे में समा जाने को बेताब होने लगे. खुशबू के चुंबनों ने जयंत को मदहोश कर दिया. अपने करीब खुशबू को पा कर उसे जैसे जन्नत मिल गई.

तूफान थमा तो खुशबू वापस शादी की रस्मों में शामिल हो गई और जयंत उस की खुशबू में डूबा रहा.

कुछ दिन बाद ऐसा ही एक और वाकिआ हुआ. तेज बारिश थी. मंडी हाउस से गुजरते समय जयंत ने खुशबू को रोड पर खड़ा पाया.

जयंत ने फौरन उस के नजदीक पहुंच कर अपनी मोटरसाइकिल रोकी. दोनों उस पर सवार हो इंडिया गेट की ओर निकल गए.

खुशबू को रोमांचक जिंदगी पसंद थी इसलिए वह इस मौके का लुत्फ उठाना चाहती थी. बारिश का मजा रोमांच में बदल रहा था. प्यार में सराबोर वे घंटों सड़कों पर घूमते रहे.

जयंत और खुशबू की कहानी ऐसे ही आगे बढ़ती रही कि तभी अचानक इस कहानी में एक मोड़ आया. खुशबू ने जयंत को ग्रैंड होटल में बुलाया. डिनर की यह पार्टी अब तक की सब पार्टियों से अलग थी. खुशबू की खूबसूरती आज जानलेवा महसूस हो रही थी.

‘आज तुम्हारे लिए स्पैशल ट्रीट जयंत,’ मुसकरा कर खुशबू ने कहा.

‘किस खुशी में?’ जयंत ने पूछा.

‘मुझे नई नौकरी मिल गई… बैंगलुरु में असिस्टैंट प्रोफैसर की.’

जयंत का दिल टूट गया था. खुशबू को सरकारी नौकरी मिल गई थी, इस का मतलब उस की जुदाई भी था.

जयंत ने दुखी लहजे में खुशबू को उस की जुदाई का दर्द कह सुनाया.

खुशबू ने मुसकराते हुए कहा, ‘वादा करो तुम पहले कंपीटिशन पास करोगे, नौकरी मिलने के बाद ही मुझ से मिलने आओगे… उस से पहले नहीं… न मुझे फोन करोगे और न ही चैट…

‘मैं तुम्हारी टीचर रही हूं इसलिए मुझे यह गिफ्ट दोगे. फिर हम शादी करेंगे… एक नई जिंदगी… एक नई प्रेम कहानी… मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी.

‘3 साल का समय… बस, तुम्हारी यादों के सहारे निकालूंगी.’

अचानक से सबकुछ खत्म हो गया. धीरेधीरे समय बीतने लगा. जयंत ने अपना वादा तोड़ खुशबू को फोन भी किए लेकिन उस ने मीठी झिड़की से उसे पढ़ाई पर ध्यान देने को कहा.

जयंत को भी यह बात चुभ गई. अब पूरा समय वह अपनी पढ़ाई पर देने लगा. प्यार में बड़ी ताकत होती है इसलिए मुहब्बत की कशिश इनसान से कोई भी काम करा लेती है.

जयंत को भारतीय सर्वेक्षण विभाग में अच्छी नौकरी मिल गई. अब खुशबू को पाने में कोई रुकावट नहीं बची थी. जयंत ने अपना वादा पूरा कर लिया था.

अचानक ट्रेन रुकी तो जयंत की नींद खुली. सुबह होने को थी. बैंगलुरु अभी दूर था. जयंत दोबारा आंखें मूंदे हसीन सपनों में खो गया.

टे्रन जब बैंगलुरु पहुंची, तब तक शाम हो चुकी थी. जयंत ने खुशबू को फोन मिलाया लेकिन फोन किसी अनजान ने उठाया. वह नंबर खुशबू का नहीं था. उस का नंबर अब बदल चुका था. दूसरे दिन वह मालूम करता हुआ खुशबू के कालेज पहुंचा.

लाल गुलाब और खुशबू के लिए गिफ्ट से भरे बैग जयंत के हाथों में लदे थे. वैसे भी जयंत को खुशबू को उपहार देने में बड़ा सुकून मिलता था. अपनी पौकेटमनी बचाबचा कर वह उस के लिए छोटेछोटे गिफ्ट लाता था जिन्हें पा कर खुशबू बहुत खुश होती थी.

खुशी से लबरेज जयंत कालेज गया. खुशबू के रूम में पहुंचा तो जयंत को देख वह उछल पड़ी. मिठाई का डब्बा आगे कर जयंत ने उसे खुशखबरी सुनाई.

खुशबू ने एक टुकड़ा मुंह में रखा और जयंत को शुभकामनाएं दीं.

जयंत में सब्र कहां था. उस ने आगे बढ़ उस का हाथ थामा और चुंबन रसीद कर दिया.

‘‘प्लीज जयंत… यह सब नहीं… प्लीज रुक जाओ,’’ अचानक खुशबू ने सख्त लहजे में जयंत को टोकते हुए रोका.

‘‘लेकिन यार, अब तो मैं ने अपना वादा पूरा कर दिया… तुम से मेरी शादी…’’ निराश जयंत ने पूछा.

‘‘सौरी जयंत… प्लीज… मैं ने शादी कर ली है. अब वे सब बातें तुम भूल जाओ..’’

‘‘क्या? भूल जाऊं… मतलब?’’ जयंत उसे घूरते हुए बोला.

‘‘हां, मुझे भूलना होगा,’’ मुसकराते हुए खुशबू बोली, ‘‘वे सब मजाक की बातें थीं… 3 साल पहले कही गई

बातें… क्या अब इतने दिन बाद… तुम्हें तो मुझ से भी अच्छी लड़कियां मिलेंगी…’’ मुसकराते हुए खुशबू बोली.

जयंत उलटे पैर लौट पड़ा. लाल गुलाब उस के भारी कदमों के नीचे कुचल रहे थे. मजाक की बातें शायद

3 साल में खत्म हो जाती हैं… माने खो देती हैं… जयंत समझने की नाकाम कोशिश करने लगा. Romantic Story In Hindi

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