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Editorial : सरित प्रवाह – धूमिल होती सोनेचांदी की चमक

Editorial : सोनेचांदी के भावों में उतारचढ़ाव बच्चों के सीसौ की तरह हो रहा है. पक्का है कि इस खेल में काफी लोग अपना सबकुछ गंवा बैठेंगे. सोने के दाम इसलिए बढ़ने लगे क्योंकि दुनिया की लगभग सभी सरकारों के रिजर्व बैंकों ने अमेरिकी सरकार के बौंड्स की जगह सोना खरीदना शुरू कर दिया. चांदी के दाम इसलिए बढ़े क्योंकि सोलर पौवर में इस का बड़ा इस्तेमाल होने लगा है.

इन दोनों के अलावा कई और धातुएं हैं जिन के दाम बेतहाशा बढ़े पर वे औद्योगिक इस्तेमाल की हैं और उन का आम लोगों से लेनादेना नहीं. सदियों से सोनाचांदी घरों में रखा और पहना जाता रहा है और इस के दाम बढ़ने से जहां जिस के पास कुछ सोनाचांदी है वह खुश रहता है जबकि जिस की खरीदने की इच्छा होती है वह परेशान हो उठता है.

असली चक्कर में वे पड़े हैं जिन्होंने बढ़ते दामों के लालच में महंगे दामों पर सोना और चांदी खरीद लिया था. अब इन दोनों धातुओं के दाम धड़ास से गिर गए. महंगी कीमत पर खरीदने वालों के बाद उन को ज्यादा नुकसान हुआ जो इन धातुओं की सट्टाबाजारी में लगे थे.

सोनाचांदी हो या शेयर या जमीन, अंधीदौड़ में सभी लोग पैसा कमाना चाहते हैं. यह बहुतकुछ धर्म की पढ़ाई पट्टी है कि पैसा या जीने का सामान तो ऊपर से भगवान की कृपा से मिलता है और उस के लिए सही समय पर पूजापाठ करना चाहिए. सभी धर्मों की किताबों में ऐसी घटनाओं की बनावटी कहानियां ठूंसी गई हैं जिन में लगातार भक्ति में लगे कुछ लोगों को बैठेबिठाए अपार संपत्ति मिल गई.

गनीमत यह है कि धर्मों की जकड़न के बावजूद मानव ने अपने जीने के लिए मेहनत करनी नहीं छोड़ी है. किसानों ने खेती की, जुलाहों ने कपड़ा बुना, मिस्त्रियों ने मकान-शहर बनाए, घरों में औरतों ने सुरक्षा दी. उन्होंने अचानक ऊपर से टपक कर कुछ आने का इंतजार नहीं किया. आज अगर हम एक नए युग में जी रहे हैं तो इसीलिए कि कुछ ने अचानक सोनेचांदी का ढेर मिल जाने की जगह चीजों के निर्माण में नई सोच लगाई, मेहनत की, तरहतरह के उपयोग किए.

सफलता तो मेहनत में है, नई चीज बचाने में है. सोनेचांदी की चमक में अंधे न हों, अपने हाथों पर विश्वास करें. Editorial

Editorial : सरित प्रवाह – दिल्ली में एआई समिट

Editorial : दिल्ली में बड़े धूमधड़ाके से एआई समिट का आयोजन किया गया. चर्चा में जो बातें ज्यादा रहीं वे थीं अव्यवस्था, चोरियां, विदेशी सामान पर देशी बिल्ला लगा कर दर्शाना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वजह से समिट में लगे स्टौलों को पूरे 3 घंटे बंद कर देना.

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों मुंबई के मैरीन ड्राइव पर जौगिंग करने के लिए बिना ताम?ाम के निकल सकते हैं जबकि प्रधानमंत्री मोदी अपनी जनता से भयभीत हैं, उन्होंने अपनी विजिट के दौरान स्टौल लगाने के लिए आने वालों को भी हटवा दिया. केवल कैमरे के सामने आने वाले स्टौल लगाने वाले ही आने दिए गए.

असल में वैज्ञानिकता तार्किकता से आती है और जो देश गले तक पाखंडों में डूबा हो, जहां सरकार राम मंदिर के विकास और नए संसद भवन के उद्घाटन तक पर भगवाधारी अनपढ़ स्वामियों के जमावड़े पर ज्यादा भरोसा करती हो वहां विज्ञान केवल टोकन बन कर रह जाएगा.

भारत में तर्क की कोई गुंजाइश नहीं है. संसद की बहसों में देख लें. आज 2026 में सांसदों में जब बहस होती है तो वर्तमान तथ्य और तर्कों की जगह सत्ता पक्ष केवल नेहरू, इंदिरा, राजीव के नाम लेते दिखते हैं और कुतर्क का इस्तेमाल कर के दूसरों को बोलने से रोकते हैं. संसद भवन कैमरों, रिमोट माइकों से लदा पड़ा है लेकिन इन सब का उपयोग केवल विपक्ष का मुंह बंद करने के लिए हो रहा है.

नई दिल्ली स्थित भारतीय मंडपम जहां एआई समिट हुई, वहां चारों ओर बुरी तरह अफरातफरी मची रही. एआई तो क्या, आसपास की सड़कों पर ट्रैफिक लाइटें तक सुव्यवस्थित नहीं थीं. मंडपम में बिछे कारपेट मुड़ रहे थे, तार बिखरे हुए थे, स्टौलों के पार्टीशन खंभे गिर रहे थे. कहीं से ऐसा नहीं लग रहा था कि यह एक विकसित देश की जमीन पर टैक्नोलौजी के आज के नए अवतार एआई यानी आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस को जज्ब कर लिया गया है.

असल में आज भी भारतीय लोग पहाड़ों, कंदराओं और गुफाओं में रहने वाली सोच में रह रहे हैं जहां गाय को औक्सीजन देने वाली और गौमूत्र को दवा मान लिया जाता है. ऐसा देश न तो एआई को कभी सही ढंग से इस्तेमाल कर पाएगा और न अपने को उन देशों की श्रेणी में ला सकता है जो एआई के बलबूते पर ज्ञान की नई सीमाएं तय कर रहे हैं.

हम अभी भी 15वीं सदी में रह रहे हैं, तुलसी के कथन में, यहां वही होता है जो रामजी चाहते हैं, एआई नहीं. Editorial

Editorial : सरित प्रवाह – भारत-अमेरिका की डील ढीली

Editorial : किन्हीं 2 देशों में व्यापार हो और जितना संभव हो खुला व्यापार हो तो उतना ही दोनों देशों के लिए अच्छा होता है. लेकिन जब एक देश दूसरे की बांह मरोड़ कर व्यापार करने पर उतारू हो तो यह वह जबरदस्ती होगी जो तोपों से लदे व्यापारिक जहाजों ने 17वीं से 19वीं सदी तक भारत, चीन, जापान के साथ की थी.

इंगलैंड, अमेरिका, फ्रांस, हौलैंड, पुर्तगाल, स्पेन के व्यापारियों के जहाजों ने चीन और जापान से 17वीं सदी के बीच के दशकों में जबरन सख्त शर्तों के साथ व्यापार करने की इजाजत ली थी और फिर इस का फायदा जम कर उठाया. यूरोप के देश एशियाई देशों से जबरन सस्ता माल खरीदते और उन्हें गैरजरूरी सामान जबरन बेचते थे.

भारत और चीन को जबरन अफीम बेची गई, चाय का आदी बनाया गया और कौड़ियों के भाव यहां से मसाले, रेशम, रुई, चमड़ा, गेहूं ले जाया गया. भारत को तो अपनी आजादी खोनी पड़ी, चीन को सम्मान.

आज अमेरिका यही भारत से कर रहा है और आज भी हम वैसे ही व्यवहार कर रहे हैं जैसे 1707 के बाद मुगल साम्राज्य के बाद कर रहे थे. आज अमेरिका हम पर अपनी शर्तें थोप रहा है और उन शर्तों पर हमारे नेता जश्न मना रहे हैं. वे अपनी असहायता व दयनीयता को उपलब्धि बता कर अखबारों में वाहवाही के बड़ेबड़े विज्ञापन प्रकाशित करा रहे हैं. जो जीहुजूरी इस देश ने हर आक्रांत के समय, उस समय के थोड़ेबहुत पढ़ेलिखे लोगों की भी, देखी थी, आज फिर देख रहा है.

अमेरिका से भारत का व्यापार समझता एकतरफा है, यह बिलकुल स्पष्ट है. लेकिन व्यापार मंत्री पीयूष गोयल, विदेश मंत्री जे जयशंकर, पैट्रोल मंत्री हरदीप सिंह पुरी व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसे व्यवहार कर रहे हैं कि जैसे कि वे अमेरिका की सोने की खानों पर कब्जा कर के लौटे हैं. अमेरिका ने धमकियों के बाद भारत से यह डील मनवाई है, यह स्पष्ट है.

अमेरिका के हाथ में आज भारत के खिलाफ बहुत से हथियार हैं. इन में सब से बड़ा छिपा हथियार भारतीय ही हैं जो अमेरिका में बसे हैं और जिन में से बहुत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी रिपब्लिकन के चाटुकार सदस्य हैं. कुछ तो चाटुकारिता में इतने पटु हैं कि वे अपने रंग को भूल कर वहां दक्षिणी अमेरिका या अफ्रीका से आए लोगों को गोरों की तरह नीची जाति का समझने लगे हैं.

अमेरिका भारत के निर्यात का बड़ा बाजार है और जब से अमेरिका ने आयात पर टैरिफ 3 फीसदी से 50 फीसदी किया, भारत के सैकड़ों उद्योग बंद हो गए और लाखों कामगार बेकार हो गए. भारतीय निर्यातकों ने जबरन दाम घटाए और नुकसान में सामान बेचा यह सोच कर कि कुछ समय बाद भारत सरकार तो हथियार डाल ही देगी.

भारत अमेरिका को वह लाल आंख नहीं दिखा सका जो उस ने चीन को दिखाई थी लेकिन चीन ने अमेरिका की एक भी बात नहीं मानी.
आज ऐसा नहीं है कि भारत अमेरिका से व्यापार करने के बिना जिंदा नहीं रह सकता लेकिन भारत के ‘भेदिए’ ही उसे अमेरिकी शरण में धकेल रहे हैं.

भारत-अमेरिका डील मीर जाफर और जयचंदों की याद दिलाती है. कहा गया है कि जो इतिहास नहीं पढ़ते उन्हें इतिहास सबक सिखाता है. हम तो हर 5-10 साल में इतिहास ही बदल देते हैं ताकि हमारे अपने लोगों को पता न चले कि भारत-अमेरिकी डील एक ऐतिहासिक भूल है. Editorial

Editorial : सरित प्रवाह – बंगलादेश और भारत

Editorial : बंगलादेश में हुए आम चुनावों में बंगलादेश नैशनलिस्ट पार्टी की जीत से भारत में संतोष इतना ही होना चाहिए कि न तो जमाते इसलामी सत्ता में आई, न जेनजी की पार्टी जिस ने 2024 में शेख हसीना को उखाड़ फेंका था. बीएनपी के मुखिया तारिक रहमान ने कहना शुरू कर दिया है कि वे न दिल्ली के इशारों पर चलेंगे न पिंडी के. उन के लिए बंगलादेश मुख्य है.

जिस देश का जन्म भारत के कारण हुआ वह अब भारत के लिए अगर दूसरा सिरदर्द बन रहा है तो इस के लिए भारत जिम्मेदार है, बंगलादेश नहीं. भारत 1971 के बाद शेख मुजीबुर्रहमान को सुरक्षित नहीं रख पाया, बंगलादेशी सेना के कुछ जूनियर अफसरों ने ही उन की हत्या करवा कर उन की पार्टी को सत्ता से बाहर कर दिया.

इस का एक कारण यह था कि 1905 में जब अंगरेजों ने हिंदूमुसलिम आधार पर बंगाल प्रोविंस को 2 हिस्सों में बांटना चाहा था तभी भारत के हिंदू नेता उखड़ गए थे कि मुसलिम बहुल प्रोविंस कैसे बन जाए क्योंकि इस से हिंदू बंगालियों का पूर्वी बंगाल के दोहन पर बुरा असर पड़ता.
1757 तक तो पूरे बंगाल पर मुसलिम राज था. पलासी की लड़ाई के बाद जब से अंगरेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी का राज आया, तेजी से इंग्लिश पढ़ कर और अंगरेजों से व्यापार के गुण सीख कर हिंदू व्यापारियों व धर्मगुरुओं ने पूरे बंगाल की अर्थव्यवस्था व समाज पर कब्जा कर लिया था.

1905 में वायसराय लौर्ड जौर्ज नथानिएल कर्जन ने जब मुसलिम मांग के अनुसार बंगाल प्रोविंस को अलग करना चाहा था तो हिंदू धर्मगुरुओं और व्यापारियों को भारी नुकसान दिखा जो मुसलिम नवाबों के शासन के बाद अंगरेजों के शासन में जम कर कमाई कर रहे थे. 1947 में भारत के विभाजन के समय 1905 से 1911 तक के प्रोविंस विभाजन की यादें जड़ में थीं और बंगलादेश बन जाने के बाद भी यह इतिहास भुलाया नहीं गया है.

1971 के बाद भारत सरकार की चाहे जो गलती रही हो पर संघ परिवार ने अपना 1905 से 1911 वाला गुस्सा बरकरार रखा और उस ने भारत में बसे बंगलादेशियों के खिलाफ मुहिम वर्ष 2014, 2019 और 2024 के आम चुनावों में इस्तेमाल कर अपनी पार्टी भाजपा को जीत दिलवाई. यही नहीं, असम के राज्य विधानसभा चुनाव में भी उस ने इसे हथियार बनाया.

तारिक रहमान की बीएनपी इस पुराने गड़े मुद्दे को भूल जाए, यह संभव नहीं है क्योंकि भारत में मुसलिम राज को कहां भुलाया जा रहा है. फिल्म ‘छावा’ और ‘धुरंधर’ की सफलताएं बताती हैं कि यहां की जनता को यह भेदभाव उजागर करने में आज भी पाश्विक आनंद आता है. बंगलादेश भारत का मित्र तब बन सकता जब कम से कम सरकार इस मकड़जाल से निकले. पर जब वोट पाने का अकेला तरीका ही प्रशासनिक नीतियां नहीं बल्कि धार्मिक नारे, वह भी विघटनकारी, हों तो फिर तारिक रहमान की नीति को समझना मुश्किल नहीं. Editorial

Readers’ Problems : “बिना औफिस पौलिटिक्स…”, “टीनऐज बेटे को ढील…”

Readers’ Problems :
बिना औफिस पौलिटिक्स के आगे बढ़ना मुश्किल है.
औफिस पौलिटिक्स में फंस कर काम से मन हटने लगा है. मेरी उम्र 35 वर्ष है, एक मिडसाइज कंपनी में काम करता हूं. औफिस में गुटबाजी और चुगली आम बात है. कुछ लोग मैनेजमैंट के करीब बनने के लिए दूसरों की छवि खराब करते हैं. मैं अपना काम ईमानदारी से करता हूं, लेकिन औफिस पौलिटिक्स से दूर रहने के कारण कई बार मौके हाथ से निकल जाते हैं. मन में यह सवाल उठता है कि क्या बिना पौलिटिक्स के आगे बढ़ना संभव है?
आप का सवाल आज के कौर्पोरेट माहौल की एक बहुत सच्ची तसवीर पेश करता है. औफिस में गुटबाजी और चुगली अकसर इसलिए पनपती है क्योंकि कुछ लोग शौर्टकट से आगे बढ़ना चाहते हैं. यह स्वाभाविक है कि ऐसी स्थिति में ईमानदारी से काम करने वाला व्यक्ति खुद को पीछे छूटता हुआ महसूस करे लेकिन यह समझना जरूरी है कि पौलिटिक्स से दूर रहना और पौलिटिक्स को समझ कर प्रोफैशनल तरीके से काम करना – ये 2 अलग बातें हैं. बिना पौलिटिक्स में उलझेआगे बढ़ना संभव है बशर्ते आप अपनी मेहनत को सही ढंग से दिखाई देने योग्य बनाएं.
सब से पहले, अपने काम को विजिबल बनाइए. अकसर ईमानदारी से काम करने वाले लोग यह मान लेते हैं कि अच्छा काम अपनेआप बोल देगा लेकिन प्रोफैशनल दुनिया में सही मंच पर अपने योगदान को सामने रखना भी एक स्किल है. मीटिंग में प्रोजैक्ट की प्रौग्रेस स्पष्ट शब्दों में बताना, समयसमय पर मैनेजर को अपडेट देना और अपने अचीवमैंट्स को तथ्यात्मक ढंग से समझाना सैल्फप्रमोशन नहीं, बल्कि प्रोफैशनल कम्युनिकेशन है. इस से आप की पहचान बनेगी और गुटबाजी के बीच भी आप का काम नजरअंदाज नहीं होगा.
दूसरा, रिश्तों से भागिए मत, लेकिन चुगली का हिस्सा भी मत बनिए. हर औफिस में कुछ अनौपचारिक नैटवर्क होते हैं. आप विनम्र, सहयोगी और प्रोफैशनल रह कर अच्छे वर्किंग रिलेशन बना सकते हैं, बिना किसी की बुराई किए. भरोसेमंद लोगों के साथ तालमेल बनाना कैरियर के लिए जरूरी है, क्योंकि मौके अकसर टीमवर्क और रैफरैंस के जरिए भी आते हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि आप रिश्ते काम के लिए बनाइए, कामयाबी के लिए किसी को गिरा कर नहीं.
तीसरा, अगर कोई आप को चुगली या नैगेटिव पौलिटिक्स में घसीटने की कोशिश करे तो शांति से विषय बदल दें या खुद को उस से दूर रखें. इस से आप की प्रोफैशनल छवि साफसुथरी बनी रहती है. लंबे समय में मैनेजमैंट उन लोगों पर ज्यादा भरोसा करता है जो स्थिर, भरोसेमंद और परिणाम देने वाले होते हैं, न कि हर समय विवादों में उलझे रहते हैं. आप अपना काम दिखाएं, प्रोफैशनल रिश्ते निभाएं और अपने मूल्यों पर टिके रहें. धीमा रास्ता अकसर टिकाऊ होता है और टिकाऊ सफलता ही असली जीत है.
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टीनऐज बेटे को डील करने का सही तरीका क्या है.
बड़ा बेटा किशोरावस्था में है और पढ़ाई में ध्यान नहीं देता. मैं (उम्र 41 वर्ष), 2 बच्चों का पिता हूं. बड़ा बेटा पढ़ाई में ध्यान नहीं देता तो गुस्से में आ कर मैं उसे डांट देता हूं, कभीकभी सख्ती भी कर बैठता हूं. बाद में गिल्टी फील होती है कि कहीं मैं उसे खुद से दूर तो नहीं कर रहा लेकिन डर भी है कि ढील देने से वह बिगड़ न जाए. सही संतुलन कैसे बनाऊं?
बच्चों की परवरिश में सख्ती और प्यार दोनों की जरूरत होती है लेकिन डर पर आधारित अनुशासन लंबे समय में रिश्तों को नुकसान पहुंचाता है. किशोरावस्था में बच्चे अपनी पहचान ढूंढ़ रहे होते हैं, ऐसे में उन्हें समझ और मार्गदर्शन ज्यादा चाहिए.
डांटने के बजाय उस से बात करें. बेटे से पूछें कि पढ़ाई में मन क्यों नहीं लग रहा. उस की रुचियों और कठिनाइयों को समझने की कोशिश करें. सख्ती और ढील के बीच संतुलन का मतलब है स्पष्ट नियम और भावनात्मक सहारा. घर में पढ़ाई का एक तय समय, स्क्रीनटाइम की सीमा और जिम्मेदारियों की सूची होनी जरूरी है लेकिन इन नियमों के पीछे का कारण भी बच्चे को समझाएं. ‘क्यों पढ़ना जरूरी है’ यह बात डर से नहीं, उस के भविष्य के संदर्भ में समझाएं. साथ ही, उस की छोटीछोटी कोशिशों की सराहना करें. सिर्फ गलतियों पर ध्यान देने से बच्चे का मनोबल गिरता है, जबकि सराहना उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है.
अपने गुस्से पर भी काम करना बहुत ही जरूरी है. जब आप को लगे कि आप नियंत्रण खो रहे हैं तो उसी पल बातचीत रोक दें, पानी पी लें, थोड़ी देर कमरे से बाहर चले जाएं. बाद में शांत मन से बात करना ज्यादा असरदार होता है. याद रखें, बच्चा आप के व्यवहार से ही भावनाएं संभालना सीखता है. अगर वह आप के गुस्से को संभालते देखेगा तो वह भी धीरेधीरे वही सीखेगा.
अंत में, हर बच्चा एकजैसा नहीं होता. तुलना करने या दूसरों की सफलता का उदाहरण दे कर दबाव बनाने से बचें. अपने बेटे की रुचियों और क्षमताओं को पहचान कर उसे दिशा दें. अनुशासन डर से नहीं, भरोसे से टिकता है. जब बच्चा यह महसूस करता है कि उस के मातापिता उस के साथ हैं, तब वह खुद को सुधारने की कोशिश जरूर करता है. – कंचन
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पता : कंचन, सरिता 
ई-8, झंडेवाला एस्टेट, नई दिल्ली-55. 
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