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संतूर होटल को भी डकार गए सरकारी गिद्ध

सरकारी क्षेत्र की सार्वजनिक कंपनियां लाभ वाले क्षेत्र को भी घाटे में ही चलाती हैं. सरकार की व्यवस्था ही ऐसी है कि उसे अपने कमाऊ संस्थानों से लाभ देने की उम्मीद भी कम ही रहती है. दिल्ली परिवहन निगम हमेशा घाटे में चलता है जबकि कुछ वर्ष पूर्व दिल्ली की खूनी बसें नाम से कुख्यात रही निजी बसों के मालिकों ने बोरे भर कर उन्हीं सड़कों पर रुपए समेटे हैं.

निजी क्षेत्र के होटल जम कर कमाई कर रहे हैं और लगातार अपना विस्तार करने में लगे हैं जबकि कमाऊ क्षेत्र में सेंध लगाने के मकसद से बने सार्वजनिक क्षेत्र के भारतीय होटल निगम यानी एचसीआई लगातार घाटे में चल रहा है, इस के सभी होटल नुकसान में चल रहे हैं.

मोटी तनख्वाह देने वाला यह निगम अच्छी सेवा मुहैया कराने में असफल रहने के कारण सफेद हाथी बना हुआ है. सरकारी बाबुओं और नेताओं की ऐशगाह बने एचसीआई के होटल अब बहुत कम हैं और जो हैं भी उन्हें बंद किया जा रहा है. यही निगम दिल्ली और श्रीनगर में संतूर होटल चलाता है लेकिन दोनों होटलों में घाटा बढ़ा तो सरकार ने इस के प्रबंधन को निजी हाथों में देने का फैसला कर लिया.

दोनों होटल लीज की जमीन पर चल रहे हैं और लाभ देने वाली मुरगियां हैं लेकिन सरकारी कर्मचारियों के निकम्मेपन के कारण दोनों होटलों पर ताला जड़ कर निजी हाथों में सौंपने की खबर सब के लिए कष्टदायी है.

सरकारी क्षेत्र के दिल्ली और मुंबई में ‘सेफ एअर’ नाम से 2 फ्लाइट किचन हैं लेकिन दोनों 1 दशक से अधिक समय से घाटे में हैं. सवाल है कि सरकारी क्षेत्र की कंपनियां फेल क्यों हो जाती हैं? जबकि वही प्रोजैक्ट निजी हाथों में जाते ही सोने के अंडे देने वाली मुरगी साबित होते हैं.

ऐसे उद्योगों में दरअसल, पिछले दरवाजे से बड़े सरकारी हाकिमों और नेताओं तक थैलियां पहुंचती हैं. इसीलिए सरकारी कंपनियों के उच्च अधिकारी मनमरजी से संस्थानों को चलाते हैं. इस में मरता, पिसता छोटा कर्मचारी है. दबता आम आदमी है जिसे कुचल कर हमारे नेता और अफसर अपनी आर्थिक तरक्की के रास्ते निकालते हैं.

अर्थशास्त्री ‘जमीन’ पर चलें

हमारे अर्थशास्त्री ‘जमीन’ पर चलें तो देश का कायापलट जल्द होगा. रुपया भले ही दिलों की धड़कन बढ़ा रहा है लेकिन मानसून की अच्छी बारिश ने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का काम किया है. आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि कई वर्षों के बाद मानसून खुशियां बिखेरता नजर आया है. उम्मीद की जा रही है कि अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार आएगा.

कृषि क्षेत्र के लिए इस बारिश को खुशहाली लाने वाली बारिश माना जा रहा है. कृषि पैदावार में अच्छी बढ़ोतरी की उम्मीद है. अच्छी खेती की वजह से कृषि ऋण के 30 फीसदी तक बढ़ने की आशा व्यक्त की जा रही है. अच्छी फसल से किसान की आय बढ़ेगी और देश को खाद्य सुरक्षा की जमीनी गारंटी मिल सकेगी. वहीं देश की आर्थिक विकास दर में कृषि क्षेत्र की भागीदारी बढ़ेगी.जानकार कहते हैं कि बढि़या बारिश के नतीजे में ग्रामीण क्षेत्रों में कारों की बिक्री 20 से 22 प्रतिशत तक बढ़ेगी और तिपहिया वाहनों की बिक्री का आंकड़ा 40 फीसदी तक बढ़ सकता है. टैलीविजन, फ्रिज आदि की जरूरत भी ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ रही है, इन की बिक्री में भी इजाफा हो सकता है.

दरअसल, खरीफ की फसल इस बार पिछले साल की तुलना में दोगुना हो सकती है क्योंकि इस बार 5 लाख हैक्टेयर भूमि पर जुताई हुई है. देश के सशक्तीकरण में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी 58.2 फीसदी बताई जा रही है. कृषि क्षेत्र के प्रति लोगों का ध्यान घट रहा है क्योंकि बिचौलिए इस मेहनतकश वर्ग का शोषण कर के अपने कौलर सफेद बनाए रखते हैं. यदि सरकार कृषि पैदावार पर ध्यान दे तो देश का कायापलट हो सकता है. लेकिन मुश्किल यह है कि हमारे अर्थशास्त्री जमीन की ओर कम देखते हैं.

 

जीवन की मुसकान

बात मेरी शादी के कुछ महीने पहले की है. मेरे पिता की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. मेरी मां और पिता बड़ौदा में थे और मैं चेन्नई में. शादी में बहुत पैसा खर्च हो रहा था. पिताजी को चेन्नई ट्रांसफर किए जाने का आदेश मिल गया था, सो उन्हें कोई कर्ज भी नहीं दे रहा था.
मेरे होने वाले पति ने मेरे पिताजी को लोन दिलवा दिया था. पिताजी की चिंता कम हो गई थी. मुझे शादी होने के कई महीनों बाद तक यह बात पता ही नहीं थी. जब मुझे यह बात पता चली तो मेरे मन में पति के प्रति सम्मान और बढ़ गया.

भूमा विजयराघवन, चेन्नई (तमिलनाडु)

मेरा छोटा भाई आयूष असम अभियांत्रिकी महाविद्यालय में प्रथम वर्ष का छात्र है. वह पढ़ाई के प्रति गंभीर रहता है. घर से उस का महाविद्यालय
15 किलोमीटर दूर है. हाल ही में आयोजित किए गए भारत बंद के दिन मैं ने उसे महाविद्यालय जाने से मना किया लेकिन वह नहीं माना और चला गया.
लौटते वक्त उसे कोई साधन नहीं मिला और इतनी दूर पैदल चलना मुश्किल था. तभी उसे सेना के 2 ट्रक दिखे. उस ने सैनिक भाइयों को अपनी समस्या बताई तो उन्होंने उसे घर के पास वाले बस स्टौप पर छोड़ दिया. मेरे देश के सैनिक देश व देशवासियों के प्रति कितने समर्पित हैं, यह सोच कर मैं खुश व संतुष्ट हो जाता हूं.

पीयूष सोमानी, गुवाहाटी (असम)


कुछ समय पहले की बात है. मैं अपनी बेटी के साथ पानीपत से दिल्ली बस से जा रही थी. मैं ने कंडक्टर को टिकट के लिए 500 रुपए दिए. उस के पास खुले पैसे न होने के कारण उस ने टिकट के पीछे लिख दिया कि 370 रुपए बाद में ले लेना.
बस में भीड़ होने के कारण मैं पैसे लेना भूल गई और वह कंडक्टर भी देना भूल गया. दिल्ली आने पर हम उतर गए. थोड़ी देर बाद मुझे याद आया और अपनी गलती का एहसास हुआ. लेकिन मेरे पास पछतावे के सिवा कुछ नहीं था.
कुछ दिन दिल्ली रुकने के बाद हम लोग वापस पानीपत आ रहे थे. बस में कंडक्टर टिकट के लिए आया. मैं पर्स से पैसे निकालने लगी तो मेरे हाथ में वह पुराना टिकट आ गया जिस के पीछे 370 रुपए लिखे थे, मैं उसे देखने लगी. इतने में कंडक्टर आ गया, शायद उस ने वह पुराना टिकट देख लिया था.
वह बोला, ‘‘बहनजी, 4 दिन पहले आप पानीपत से दिल्ली आई थीं.’’ मेरे ‘हां’ कहने पर उस ने कहा, ‘‘आप के 370 रुपए मेरे पास गलती से रह गए थे. तब से मैं हर रोज बस में आप को पैसे वापस देने के लिए देखता था.’’
आज के समय में ऐसी ईमानदारी देख कर मैं नतमस्तक हो गई.

पूनम जैन, पानीपत (हरियाणा)

दूसरों की नहीं विशेषज्ञों की सुनें

‘सुनो सब की, करो मन की’ उक्ति  से कोई भी अपरिचित न होगा.  मन का करना सही होता है पर केवल तभी जब वह वैज्ञानिक सोच से बुद्धिमत्तापूर्वक किया जाए और जरूरी नहीं कि विवेक या वैज्ञानिक सोच सभी में हो क्योंकि प्रत्येक इंसान को सभी क्षेत्रों का ज्ञान नहीं होता. और अज्ञानता होने पर सिर्फ विशेषज्ञ की सलाह पर चलना ही सही कदम होगा.

सामाजिक परिवेश में जीवन में आने वाली विविध प्रकार की परेशानियों के उदाहरणों से हम रूबरू होते ही रहते हैं. लेकिन कुछ परेशानियों के लिए हम स्वयं ही जिम्मेदार होते हैं. आइए, कुछ उदाहरणों से रूबरू होते हैं जो समाज में आसपास ही देखे गए हैं.

सर्वप्रथम मैं अपना स्वयं का अनुभव ही बताना चाहूंगी. कुछ समय पूर्व चिकनगुनिया नामक बीमारी फैली थी. इस बीमारी की चपेट में मैं भी आ गई. मुझे हाथपैरों के जोड़ों में जकड़न के साथ बुखार था. डाक्टर द्वारा लिखित दवाओं का निश्चित डोज लेने के पश्चात भी कुछ लक्षण यथावत थे. एक परिचित ने सलाह दी कि पैरों का व्यायाम करें. मैं ने व्यायाम शुरू किया. नतीजा नकारात्मक रहा. जब इस संबंध में चिकित्सक से परामर्श लिया तो उन्होंने बताया कि इस बीमारी में व्यायाम नहीं करना चाहिए. इस अनुभव से मैं ने जाना कि बीमारी में विशेषज्ञ की सलाह के बगैर कुछ नहीं करना चाहिए.

स्वास्थ्य संबंधी घरेलू नुस्खे समाचार- पत्रों व पत्रिकाओं में छपते रहते हैं. वैसा ही एक नुस्खा एक महिला, जो कि एक प्राइवेट फर्म में अच्छे पद पर कार्यरत हैं, ने पढ़ा. नुस्खे के अनुसार, उन्होंने ककड़ी की स्लाइस आंखों पर रखी और नतीजा यह हुआ कि आंखों पर सूजन आ गई, शायद कुछ रस आंखों में चला गया. नतीजतन, उक्त महिला को चिकित्सक की सलाह लेनी पड़ी.

एक निकट के रिश्तेदार का अनुभव भी यहां बांटना चाहूंगी. उन की गरदन में हमेशा दर्द रहता था. पेन रिलीफ बाम लगाने पर भी कोई विशेष फर्क नहीं पड़ा. लक्षणों से स्पौंडोलाइटिस की शंका हुई और लगा कि इस से संबंधित व्यायाम क्यों न किया जाए. सो, शुरू कर दिया. दर्द घटने के बजाय बढ़ने लगा. डाक्टर से जांच करवाने पर पता चला कि स्पौंडोलाइटिस की शुरुआत थी. लेकिन यह मान्यता कि इस बीमारी की शुरुआत में ही व्यायाम करना शुरू कर देने से बीमारी नहीं होगी, सरासर गलत है. बीमारी की प्रारंभिक अवस्था में डाक्टर द्वारा लिखी दवाएं लेना आवश्यक है. दर्द से पूरी तरह मुक्ति मिलने के कुछ समय बाद व्यायाम शुरू करने से बीमारी आगे के लिए नियंत्रण में आ सकती है.

मानसिक बीमारियों में बीमारी की तरह न ले कर कुछ बुरे प्रभावों को कारक माना जाता है. 12वीं कक्षा में आते ही सुलभा का मन पढ़ाई से उचटने लगा. उस में मानसिक बीमारी ‘डिप्रैशन’ के लक्षण आने लगे थे. लेकिन रिश्तेदारों ने सलाह दी कि शादी करने पर सब ठीक हो जाएगा. घर वालों ने सलाह मान कर शादी कर दी. ससुराल में जाने पर भी बीमारी वैसी ही बनी रही और उसे मायके भेज दिया गया. अब एक मनोचिकित्सक द्वारा उस का इलाज किया जा रहा है.

घरेलू कलह से नजात पाने के लिए अनेक सामाजिक संस्थाएं कार्यरत हैं. यहां परिवार के प्रत्येक सदस्य को बातचीत द्वारा स्वस्थ व निष्पक्ष रहने की सलाह दी जाती है, इन की सलाह द्वारा कितने ही घर फिर से बस जाते हैं. इस के बावजूद रिश्तेदारों के कहने पर एक श्रीमतीजी ने स्वयं अपना घर उजाड़ डाला. दरअसल, प्रतिदिन सासबहू के झगड़े होते रहते थे. लोगों के कहने पर बेटाबहू को अलग कर दिया. इस से बेटा आर्थिक परेशानी से तो जूझ ही रहा है साथ ही, परिवार के मुखिया इस सदमे के चलते बीमार हो गए.

इन नकारात्मक उदाहरणों के साथ आइए कुछ सकारात्मक उदाहरणों से भी रूबरू होते हैं जिन में लोगों ने अपने विवेक से काम ले कर समस्या का सामना किया.

एक प्राइवेट बैंक के मैनेजर पद पर कार्यरत एक सज्जन ने नया फ्लैट खरीदा. शिफ्ट करने के दूसरे दिन से एक के बाद एक विपत्ति आने लगी. कुछ दिनों के लिए वे डिप्रैशन में चले गए. उन की इस स्थिति पर दया खाते हुए रिश्तेदार कहने लगे कि बेचारे को मकान फला नहीं. उन्होंने सलाह भी दे डाली, ‘मकान को वास्तु के अनुरूप बदलवा लो.’ किसी की भी सलाह न मानते हुए उक्त श्रीमान ने समस्या के मूल में जा कर कारण समझा और समाधान किया.

श्रुति को कैरियर चुनने में कठिनाई हो रही थी. तनाव दिनोंदिन बढ़ रहा था लेकिन उस ने समझदारी दिखाई. कैरियर काउंसलर से संपर्क किया और सही मार्गदर्शन पाया.

इन घटित घटनाओं के अलावा विभिन्न शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, व्यक्तिगत प्रकार की समस्याओं से नजात पाने के लिए इंसान स्वविवेक के अभाव में गलत तरीकों से जूझता रहता है. इस के लिए वह लुभावने विज्ञापनों का सहारा ले कर भ्रमित होता भी पाया गया है.

समस्या का धैर्यपूर्वक मुकाबला करते हुए सिर्फ संबंधित विशेषज्ञ की सलाह पर चलें और समय व धन दोनों की ही बरबादी से बचें.

सूक्तियां

अंत:करण
मनुष्य का अंत:करण उस के आकार, संकेत, गति, चेहरे की बनावट, बोलचाल तथा आंख और मुख के विकारों से मालूम पड़ जाता है.
बदला
महान पुरुष जो उपकार करते हैं उस का बदला नहीं चाहते. भला संसार जल बरसाने वाले बादलों का बदला किस प्रकार चुका सकता है?
आशा और आत्मविश्वास
आशा और आत्मविश्वास ही वे वस्तुएं हैं जो हमारी शक्तियों को जाग्रत करती हैं और हमारी उत्पादन शक्ति को दोगुनातिगुना बढ़ा देती हैं.
उद्यम
उद्यम ही सफलता की कुंजी है. बिना उद्यम किए थाली की रोटी भी अपने मुंह में नहीं जाती.
महान
महान व्यक्ति न किसी का अपमान करता है और न उस को सहता है.
आलसी
आलसी मनुष्य सदा ऋणी और दूसरों के लिए भार रूप रहता है.
खर्च
छोटेछोटे खर्चों से सावधान रहो. थोड़ाथोड़ा जल रिसतेरिसते बड़ेबड़े जहाज डूब जाते हैं.

यह भी खूब रही

एक बार हम सब बैठ कर यह बात कर रहे थे कि किस में कितने ग्राम खून है. तभी दादी तपाक से बोलीं, ‘‘मैं ने कभी चैक तो नहीं करवाया है पर अब तो सिर्फ 100 ग्राम ही खून बचा होगा.’’  दादी के इतना कहते ही हम सब हंसतेहंसते लोटपोट हो गए.

आरती, भिवानी (हरियाणा)

 

कुछ दिन पहले हमारे एक परिचित अपनी बेटी, जिसे वे प्यार से टुकटुक कहते हैं, के साथ श्रीलंका घूमने गए. घूमतेघूमते टुकटुक एक दिन उन से आगे निकल गई. उस की मम्मी ने आवाज लगाई, ‘‘टुकटुक, रुक जा.’’ इतने में एक थ्रीव्हीलर उन के पास आ कर रुक गया और चालक ने उन से पूछा कि आप को कहां जाना है? उन्होंने कहा कि हम तो अपनी बेटी को बुला रहे थे. दरअसल, वहां थ्रीव्हीलर को टुकटुक कहते हैं.

निर्मलकांता गुप्ता, कुरुक्षेत्र (हरियाणा)

 

बात बहुत पुरानी है. उस वक्त परिवार में बहुएं साड़ी ही पहना करती थीं. बड़ों के सामने सलवारसूट नहीं पहना जाता था. हमारे घर में जेठजी के बेटे की शादी हुई तो बहूरानी आई. जैसा कि आजकल चलन है, बच्चे साड़ी न पहन कर सूट या अन्य कुछ पोशाक पहनना पसंद करते हैं, वह भी सलवारसूट पहना करती थी. यह पहनावा मेरी सास को पसंद नहीं आता था.उस समय हम ग्वालियर में थे. मेरी सास कभीकभी हमारे पास आया करती थीं. वे जेठजी के साथ बुलंदशहर में रहा करती थीं. एक दिन जब मेरे दोनों बच्चे भी मेरे पास बैठे थे, वे बोलीं, ‘‘बहू ऐसे कपड़े पहनती है, अच्छा नहीं लगता, कोई क्या कहेगा.’’ मेरे मुंह से निकला, ‘‘बेटी भी पहनती है, उस ने पहन लिए तो क्या हुआ, साड़ी में बंधन लगता होगा.’’

मेरा बेटा, जो यह सुन रहा था, बोला, ‘‘अम्मा, जिस में कंफर्ट महसूस हो वह ही पहनना चाहिए.’’ मेरी सास, जो गांव की सरल स्वभाव की महिला थीं, थोड़ी देर तो चुप रहीं फिर कुछ सोच कर बोलीं, ‘‘कम फटने की क्या बात है, साड़ी भी उतनी ही फटती है, जितना सूट फटता है.’’

उन की बात सुन कर मैं व मेरे दोनों बच्चे खिलखिला कर हंस पड़े. मेरी सास ‘कंफर्ट’ का मतलब ‘कम फटना’ समझ रही थीं.

स्नेह अग्रवाल, मयूर विहार (दिल्ली)

 

मेरे बेटे की शादी थी. विदाई के समय बहू सब से गले मिल कर रो रही थी. उस के पापा भी रो रहे थे. मैं काफी भावुक हूं. किसी की भी विदाई पर मुझे रोना आ जाता है. उस के पापा मेरे ही पास खड़े थे. मुझे रोते देख मेरी भतीजी बोली, ‘‘बूआ, आप भी इन के गले मिल कर क्यों नहीं रोतीं, भाभी की तरह?’’ बात की नजाकत को समझ कर सभी हंसने लगे. बहू के पापा भी मुसकराते हुए बोले, ‘‘यह गले लगना उधार रहा.’’ माहौल हलका हो गया.

ममता, बीकानेर (राजस्थान)

बस एक उदासी

खोल दिए हैं पलकों के द्वार

उड़ा दिए सपनों के पाखी

चुने थे कहांकहां से

ढूंढ़ यहांवहां से

 

बादल की नीली शाखों

तारों की स्वप्निल आंखों में

नानीदादी की लोरी

या प्रकृति की बोरी में

 

अब सूखा आस का चारा

उम्मीदों का रिक्त भंडारा

प्रेम की धारा सूखी

मन की धरती रूखी

 

धूमिल दूषित आकाश

तमस से हारा प्रकाश

सांस की पूंजी चुकने को

जीवन की गति रुकने को

 

जर्जर पिंजरा दिया छुड़ाए

सपने पाखी दिए उड़ाए

मुक्त हुए नैनों के वासी

बाकी, बस एक उदासी.

जसबीर कौर

मोहब्बत हो गई

हम उसूलों पर चले
दुनिया में शोहरत हो गई
अपने घर के लोगों में
बगावत हो गई


आंधियों में तेरी लौ से
जल गई उंगली मगर
ये तसल्ली है मुझे
तेरी हिफाजत हो गई


पहले उस का आनाजाना
इक मुसीबत सा लगा
रफ्तारफ्ता उस मुसीबत से
मोहब्बत हो गई


आज फिर दिल को जलाया
मैं ने उन की याद में
आज फिर उन की अमानत में
खयानत हो गई


जो गवाही से थे वाबस्ता
हुई उन की पकड़
और जो मुलजिम थे
सब की जमानत हो गई.


डा. बीना बुदकी

पाठकों की समस्याएं

मैं 30 वर्षीय विवाहित महिला हूं और एक शादीशुदा मुसलिम अधिकारी से प्यार करती हूं. वे भी मुझे चाहते हैं. पर पिछले कुछ महीनों से उन का व्यवहार बदलाबदला सा लग रहा है जैसे वे मुझे इग्नोर कर रहे हों. मैं उन से सिर्फ दोस्ती और प्यार चाहती हूं. परिवार, मर्यादा के बारे में सोच कर मन ही मन घुटती रहती हूं, निराशा जन्म ले रही है. क्या मैं उन्हें फोन करूं? आप ही सलाह दीजिए.

आप अब तक जिसे प्यार समझती रहीं वह आप दोनों के बीच मात्र आकर्षण और टाइमपास था. वास्तविकता के धरातल पर आप के दोस्त ने आप से दूरी बना कर सही निर्णय लिया है. चूंकि आप दोनों विवाहित हैं, इसलिए आप के दोस्त का निर्णय आप और आप के परिवार दोनों के लिए सही रहेगा.

यदि आप परिवार और मर्यादा को समझती हैं, उसे महत्त्व देती हैं तो ऐसे रिश्ते को आगे बढ़ाने की तरफ से अपना ध्यान हटा लीजिए. आप का उस अधिकारी के प्रति लगाव आप के घरपरिवार के लिए नुकसानदेह साबित होगा. ऐसे रिश्तों का कोई नाम नहीं होता. इन से सिर्फ बदनामी मिलती है. इसलिए इस रिश्ते की तरफ से अपना ध्यान हटा कर अपने घर, परिवार में मन लगाइए. वैसे, यदि दिल न माने तो यह सावधानी रखें कि यह बात किसी को पता न चले. इस तरह के संबंध पूरी तरह छिपे रहें, यही मुश्किल है.

 

मैं 23 वर्षीय अविवाहित हूं. 2 वर्षों से एक तलाकशुदा महिला से प्यार करता हूं. अब उस से विवाह करना चाहता हूं पर घर वाले उस के साथ शादी के लिए राजी नहीं हैं. आप ही बताइए, मैं क्या करूं?

आप उस महिला को अपने परिवार वालों से मिलवाइए और अगर आप सचमुच उस महिला के साथ विवाह करना चाहते हैं तो परिवार वालों को समझाइए कि तलाकशुदा होना कोई गुनाह नहीं है, वह भी एक बेहतर पत्नी और बहू साबित हो सकती है. वैसे, इस तरह का विवाह तब सफल होता है जब आप अपने परिवार से दूर रहते हों और कभीकभार मिलना होता हो. एक घर में रह कर घरवालों की पसंद के बिना पत्नी लाना आफत को निमंत्रण देना होता है.

मैं एक लड़की से बहुत प्यार करता हूं. वह भी मुझे बहुत चाहती है. लेकिन शादी की बात पर उस ने मेरे सामने एक शर्त रख दी है. उस का कहना है कि अगर तुम्हारी सरकारी नौकरी नहीं लगी तो तुम से शादी नहीं करूंगी. उस की इस शर्त से मैं बहुत परेशान हो गया हूं. मैं उस से अलग नहीं होना चाहता. समझ नहीं आ रहा, क्या करूं?

सब से पहले आप अपनी प्रेमिका से पूछिए कि आखिर वह आप से शादी के लिए सरकारी नौकरी की शर्त क्यों रख रही है. क्या कोई आर्थिक असुरक्षा की भावना इस शर्त के पीछे छिपी वजह है? यदि ऐसा है तो आप उसे विश्वास दिलाएं कि चाहे नौकरी सरकारी हो या प्राइवेट, आप उस का पूरा ध्यान रखने में सक्षम हैं. कोई भी निर्णय लेने से पूर्व आप लड़की को अच्छी तरह परख लें, कहीं सरकारी नौकरी की शर्त आप से शादी न करने का बहाना तो नहीं है. इस विषय पर खुल कर बात करें और उस के बाद ही बात को आगे बढ़ाएं.

 

मैं 25 वर्षीय सेना में कार्यरत सिपाही हूं. मेरे विवाह को अभी 1 वर्ष हुआ है. मेरी 2 बहनें व 1 भाई अभी अविवाहित हैं, इसलिए मैं पत्नी को साथ नहीं रख सकता. मेरी समस्या मेरे सासससुर को ले कर है. वे मेरे साथ गालीगलौज करते हैं और दहेज का मुकदमा करने की बात करते हैं.मेरी पत्नी उन्हें कुछ नहीं कहती, वह सिर्फ मेरे साथ रहना चाहती है. मैं बड़ी मुश्किल में हूं. आप ही कोई रास्ता बताइए?

आप की सब से बड़ी गलती यह है कि आप पत्नी को अपने साथ नहीं रख रहे. जब आप ने विवाह किया है तो पत्नी को आप को अपने साथ रखना चाहिए. माना कि आप पर भाईबहनों की जिम्मेदारी है लेकिन पत्नी भी तो आप ही की जिम्मेदारी है. जहां तक सासससुर की बात है, आप पत्नी से इस बारे में बात करें कि वह अपने मातापिता को समझाए कि वे मुकदमे की बात कर के समस्या को और न बढ़ाएं, साथ ही आप के साथ सही व्यवहार भी करें. जब पत्नी आप के साथ रहने लगेगी तो सभी समस्याएं अपनेआप सुलझ जाएंगी.

 

मैं 19 वर्षीय कालेज की छात्रा हूं. मेरी समस्या यह है कि मेरे एक पड़ोसी, जिन की उम्र 53 वर्ष है, जब भी हमारे घर आते हैं और मैं उन के सामने पड़ जाती हूं तो वे मेरे परिवार से नजरें बचा कर मुझे अश्लील इशारे करते हैं. मुझे जानबूझ कर छूने की कोशिश करते हैं. मुझे समझ नहीं आ रहा है कि मैं अपने घर वालों को इस बारे में कैसे बताऊं. मुझे डर है कि कहीं इस से मेरी बदनामी तो नहीं होगी?

 

आप बेझिझक हो कर अपनी चुप्पी तोड़ें और अपने पड़ोसी की हरकतों के बारे में अपने परिवार वालों को खुल कर बताएं. उस की गलत हरकतों का प्रतिरोध करें, उस का असली चेहरा सब के सामने लाएं. आप जितना डरेंगी वह आप का उतना ही फायदा उठाएगा. आप ही सोचिए, क्या बदनामी का डर उस पड़ोसी को नहीं होगा. वैसे भी बदनामी के डर से चुप बैठना कोई समझदारी नहीं है.

महिलाओं के साथ होने वाले अधिकांश दुर्व्यवहार उन के जानने वालों के द्वारा ही होते हैं जो आगे चल कर अकसर किसी बड़ी दुर्घटना में तबदील हो जाते हैं. इसलिए पड़ोसी की गलत हरकतों को बिना डरे सब के सामने लाएं, उसे सबक सिखाएं.

भारत भूमि युगे युगे

अंत नहीं, आरंभ

72 घंटे अवसाद के समंदर में डुबकियां लगा कर लालकृष्ण आडवाणी जब यथार्थ के संसार में वापस आए तो उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ. निचोड़ यह था कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार घोषित किए जाने के उन के विरोध पर कोई हाहाकार नहीं मचा, जमाना जनसंघ का नहीं संघ का है और उगते सूरज को सभी हमेशा की तरह आज भी सलाम करते हैं.

डूबने से बचने और युद्धरत रहने के लिए जरूरी यह है कि पार्टी में रह कर ही समर्थन या विरोध किया जाए, लिहाजा वे रायपुर में नरेंद्र मोदी के साथ उन की झूठी तारीफ करते दिखे तो समझने वाले समझ गए कि असल लड़ाई तो अब शुरू हुई है. आडवाणी पलायन नहीं करेंगे और मध्य प्रदेश व राजस्थान से मिल रहे अच्छे समाचारों का श्रेय भी लेंगे. उन का मायूस हो चला खेमा भी प्रसन्न है कि उम्मीद अभी बाकी है.

अम्मा छाप पानी

तमिलनाडु में अम्मा ब्रैंड पानी 10 रुपए बोतल मिल रहा है जो दूसरे ब्रैंड्स के मुकाबले सस्ता है, लिहाजा ज्यादा बिकेगा. इस पानी में कोई अतिरिक्त खूबी नहीं है सिवा इस के कि यह लगभग मुख्यमंत्री जे जयललिता छाप है. दक्षिण भारत में अम्मा संबोधन आम है पर वहां से बाहर उत्तर की तरफ लोग अम्मा का एक ही मतलब जानतेसमझते हैं वह है जयललिता.

कई दफा साबित हो चुका है कि पानी हो या हवाई जहाज, सरकारें कारोबार नहीं कर पातीं क्योंकि बगैर सरकारी अधिकारियों के यह मुमकिन नहीं होता जो आमतौर पर भ्रष्ट होते हैं. अब जल्द ही ये अफसर पानी से पैसा बनाएंगे. व्यावहारिक तो यह होता कि सरकार मौजूदा प्रचलित ब्रैंड पर कर कम कर देती और निर्माताओं से कहती कि अपने ब्रैंड का नाम अम्मा कर दो. लेकिन सत्ताधारियों की मुहिम तो सस्ता खिलाने और पिलाने की है ताकि लोकप्रियता और वोट मिलें, इसलिए कैंटीन भी खोली जाती हैं और इडलीसांभर भी बेचा जाता है.

दुष्कर्मी मंत्री

शायद खामी राजस्थान की आबोहवा में ही है, वहां बाबा हो या नेता, बलात्कार कर डालता है. संत आसाराम सलीके से जेल में जम भी नहीं पाए थे कि एक मंत्री बाबूलाल नागर दुष्कर्म के आरोप में फंस गए. गहलोत सरकार के ये तीसरे मंत्री हैं जो इस तरह के मामले में फंसे हैं.

पीडि़ताएं अब समझदार होती जा रही हैं. वे पुलिस को दुष्कर्मस्थल का पूरा ब्यौरा दे रही हैं. मसलन, परदे के रंग, सोफे की डिजाइन और दीवार का पेंट कैसा था आदि. इस से उन की बात में दम आ जाता है. बाबूलाल नागर चुनाव के वक्त पकड़े गए हैं. लिहाजा, दिक्कत मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को पेश आ रही है, जो पहले से ही भारतीय जनता पार्टी और वसुंधरा राजे सिंधिया के बढ़ते प्रभाव से चिंतित हैं. बजाय दुख में हाथ बंटाने के, मंत्री अगर दुख बढ़ाएं तो उन्हें चलता कर देने के अलावा कोई रास्ता बचता भी नहीं.

दंगा नायक

कभी पहलवानी करते रहे मुलायम सिंह ने कई सियासी दांवपेंच आजम खान को सिखाए, पर कुछ जानबूझ कर नहीं सिखाए जो अखाड़े का एक प्रचलित नियम भी है कि गुरु सबकुछ सिखाता है पर एक दांव बचा कर रखता है.

आजम खान ने अपनी ही पार्टी समाजवादी पार्टी की तरफ आंखें तरेरनी शुरू कीं तो पता चला कि दंगों में उन की भूमिका को ले कर शोध होने लगे हैं. मुसलमानों का हीरो बनने का सपना देख रहे आजम की नींद टूटी और वे हड़बड़ा कर उठ बैठे. जल्द आए और दुरुस्त आए आजम को असल सियासत अब समझ आ रही है कि इस में कोई किसी का सगा नहीं होता और जो कैरियर बनाए उस से दगाबाजी ठीक नहीं होती. रही बात दंगों की, तो उन से किसी का खास नुकसान नहीं हुआ है, हमेशा की तरह कुछ बेगुनाह, आम लोग मारे गए हैं जिस पर बेवजह खून जलाने से कोई फायदा नहीं.

 

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