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मैजिक गर्ल

‘कहो न प्यार है’ और ‘गदर’ जैसी ब्लौकबस्टर फिल्मों से अपना कैरियर शुरू करने वाली अभिनेत्री अमीषा पटेल ने स्वयं द्वारा लिए गए कुछ गलत फैसलों के चलते अपना कैरियर लगभग खत्म कर लिया. खैर, अच्छी खबर यह है कि अमीषा पटेल एक अच्छी निर्माता के तौर पर अपने कैरियर में ‘देसी मैजिक’ नाम की फिल्म ले कर लोगों के सामने आ रही हैं. अमीषा, हम तो यही चाहेंगे कि आप जोरदार वापसी करें.

 

गर्दिश में हीरो

शाहिद कपूर फिल्म ‘फटा पोस्टर निकला हीरो’ में सलमान खान की नकल करते हुए दिखाई दिए. शाहिद का कहना है कि वे सलमान के बहुत बड़े फैन हैं और उन की तरह अभिनय करना उन का मजाक नहीं, बल्कि आदर व्यक्त करना है. प्रमोशन के दौरान वे ‘बीइंग ह्यूमन’ की टीशर्ट भी पहने हुए नजर आए.

शाहिद की सोच अच्छी है पर दर्शक शाहिद के अभिनय को ही देखना पसंद करेंगे न कि किसी और की नकल. लगता है शाहिद के तारे गर्दिश में हैं, तभी तो उन्हें अपनी फिल्म में सलमान जैसे बड़े सितारे का सहारा लेना पड़ा.

 

ग्रैंड मस्ती

यह फिल्म वर्ष 2004 में आई फिल्म ‘मस्ती’ का सीक्वल तो नहीं है परंतु बहुतकुछ उस जैसी है. पूरी फिल्म पोर्नोग्राफिक कौमेडी से भरी पड़ी है. सैक्स फैंटेसी और द्विअर्थी संवादों से मालामाल यह फिल्म अग्रिम पंक्ति के दर्शकों को ध्यान में रख कर बनाई गई लगती है. परिवार के किसी सदस्य के साथ बैठ कर देखने लायक यह कतई नहीं है. पता नहीं सैंसर बोर्ड वालों ने इसे पास कैसे कर दिया.

इस तरह की बोल्ड सब्जैक्ट वाली फिल्में अब काफी बनने लगी हैं. इस तरह की फिल्म टीवी धारावाहिकों की निर्माता एकता कपूर भी बनाने लगी हैं. थोड़ा इंतजार करिए, उन की अगली पोर्नोग्राफिक फिल्म ‘रागिनी एमएमएस 2’ तैयार हो चुकी है, शीघ्र ही वह परदे पर होगी. इस तरह की फिल्में समाज में विकृतियां ही पैदा करती हैं.

‘ग्रैंड मस्ती’ की कहानी एकदम साधारण है. कालेज की पढ़ाई पूरी कर चुके तीन दोस्तों मीत (विवेक ओबराय), अमर (रितेश देशमुख) और प्रेम (आफताब शिवदासानी) की अब शादी हो चुकी है. पर तीनों ही अपनी शादीशुदा जिंदगी से खुश नहीं हैं. उन की सैक्स लाइफ बोरिंग है. तीनों एक दिन अपने पुराने कालेज पहुंच जाते हैं. वहां वे पिं्रसिपल (प्रदीप रावत) के रोबदार चेहरे को देख कांप जाते हैं. उन के खौफ के चलते कोई लड़का किसी लड़की की तरफ आंख उठा कर भी नहीं देखता. कालेज में इन तीनों की मुलाकात पिं्रसिपल की बेटी मैरी (ब्रूना अब्दुल्ला), बहन रोज (मरियम जकरिया) और बीवी मारलो (कायनात अरोड़ा) से होती है. तीनों ही उन के प्रेमजाल में फंस जाते हैं, मगर तीनों की बीवियां ऐन मौके पर उन्हें इस मुसीबत से बचा लेती हैं.

इस फिल्म में शुरू से आखिर तक निर्देशक ने पूरा ध्यान अंग प्रदर्शन और द्विअर्थी संवादों पर लगाया है. दर्जनों सुंदरियां बिकनी पहने फ्लर्ट करती हुई आप को दिख जाएंगी. फिल्म का क्लाइमैक्स ठंडा और घिसापिटा है. फिल्म का संगीत औसत है. छायांकन अच्छा है. ग्रैंड मस्ती की मस्ती से बच कर रहें, कहीं ऐसी मस्ती आप पर भारी न पड़ जाए.   

फटा पोस्टर निकला हीरो

यह एक ऐक्शन कौमेडी फिल्म है जिस में शाहिद कपूर रणबीर कपूर के पोस्टर को फाड़ कर बाहर निकला है. ‘घायल’ और ‘दामिनी’ जैसी गंभीर फिल्में बनाने वाले निर्देशक राजकुमार संतोषी ने इस बार कौमेडी में अपना हाथ आजमाया है. वैसे, इस से पहले वे ‘अजब प्रेम की गजब कहानी’ जैसी कौमेडी फिल्म बना चुके हैं. इस फिल्म में वे भूल गए हैं कि उन्हें ऐक्शन फिल्म बनानी है या कौमेडी. दर्शकों को शाहिद कपूर से बहुत उम्मीदें थीं. काफी अरसे के बाद वे परदे पर नजर आए परंतु इस फिल्म में उन्होंने अपने चाहने वालों को निराश ही किया है.

फिल्म की कहानी है एक नौजवान विश्वास (शाहिद कपूर) की. जब वह पैदा हुआ था तभी उस का पिता, एक भ्रष्ट इंस्पैक्टर, अपने परिवार को छोड़ कर भाग गया था. मां सावित्री (पद्मिनी कोल्हापुरे) ने उसे पालापोसा, बड़ा किया. मां चाहती है कि उस का बेटा पुलिस में भरती हो कर ईमानदार पुलिस इंस्पैक्टर बने परंतु विश्वास पर तो हीरो बनने का भूत सवार है.

पुलिस में इंटरव्यू देने का बहाना कर वह मुंबई पहुंच जाता है. वह फिल्मों में कहानियां लिखने वाले एक स्ट्रगलर जोगी (संजय मिश्रा) से मिलता है. विश्वास को फिल्मों में छोटेमोटे रोल मिलने लगते हैं. तभी उस की जिंदगी में काजल (इलियाना डिकू्रज) उस वक्त आती है जब विश्वास फोटोशूट कराने के लिए नकली पुलिस की वरदी में जा रहा होता है. काजल उसे असली पुलिस इंस्पैक्टर समझ लेती है और गुंडों से भिड़ जाने को ललकारती है.

यहीं से विश्वास की जिंदगी में तूफान आ जाता है. उधर उस की मां मुंबई पहुंच जाती है तो गैंग वाले उस की मां को कैद कर लेते हैं. विश्वास अपनी मां को गैंग वालों के हाथों से छुड़वा लेता है. तभी उसे पता चलता है कि गैंग का डौन नैपोलियन (मुकेश तिवारी) उस का पिता है जो बचपन में ही परिवार को छोड़ कर भाग गया था और अब वह पूरी मुंबई पर रासायनिक ब्लास्ट कर उसे खत्म करना चाह रहा है.

वह अकेले दम पर पूरे गैंग को पकड़वाता है और अपनी मां के आगे कसम खाता है कि मैं अब कभी पोस्टर हीरो नहीं बनूंगा, सच्चा हीरो बन कर देश की हिफाजत करूंगा. फिल्म की यह कहानी 70-80 के दशक जैसी है. मध्यांतर से पहले इस कहानी में कौमेडी है तो मध्यांतर के बाद फुल ऐक्शन. फिल्म का पूर्वार्ध भाग धीमा है और बोर करता है. उत्तरार्ध वाले हिस्से में शाहिद कपूर ने 2 डांस किए हैं. एक गाने पर डांस करते वक्त शाहिद कपूर ने कई बेहतरीन डांसरों को भी पीछे छोड़ दिया है.

अभिनय की दृष्टि से शाहिद कपूर ने कहींकहीं फनी ऐक्ंिटग की है. उस ने कई भावुक दृश्यों में अपना टेलैंट भी दिखाया है. अतिथि की भूमिका में सलमान खान फिल्म का आकर्षण है. नरगिस फाखरी का आइटम सौंग दर्शकों को अच्छा लगेगा. संजय मिश्रा की कौमेडी भी अच्छी लगेगी. इलियाना डिकू्रज मिसफिट है.

फिल्म का निर्देशन औसत दरजे का है. गीतसंगीत कुछ अच्छा है. एक गीत ‘मैं रंग शरबतों का तू मीठे घाट का पानी…’ अच्छा बन पड़ा है. फिल्म का छायांकन अच्छा है.

 

लंच बौक्स

कहते हैं न कि किसी के दिल तक पहुंचने का रास्ता उस के पेट से हो कर जाता है, ‘लंच बौक्स’ में रखे स्वादिष्ठ खाने ने भी दर्शकों के दिलों को जीत लिया है. यह सीधी, सच्ची और सरल सी फिल्म है.

फिल्म में गिनेचुने 4 पात्र हैं. निर्देशक रितेश बत्रा ने इन चारों किरदारों को कहीं भटकने नहीं दिया है. ये किरदार दर्शकों को बांधे रखते हैं. 2 प्रमुख एडल्ट किरदारों के बीच रोमांस लंच बौक्स के जरिए ही फलताफूलता है.

फिल्म की कहानी है मुंबई के एक दफ्तर में नौकरी करने वाले विधुर साजन (इरफान खान) और एक बच्चे की मां इला (निमरत कौर) की.  इला के पति ने उस में रुचि लेना कम कर दिया है. इला को लगता है कि उस के पति के संबंध किसी और औरत से बन गए हैं. वह रोजाना अपने पति के लिए लंच बौक्स में खाना रख कर डब्बा वाले के जरिए उस के दफ्तर भेजती है. पर वह डब्बा उस के पति के पास न पहुंच कर साजन (इरफान खान) के पास पहुंचने लगता है और साजन का एक रेस्तरां से आने वाला डब्बा उस के पति के पास पहुंचता है. पहले डब्बा भरा ही वापस आ जाता था पर अब वापस आने पर खाली लंच बौक्स आता है. साजन खाली डब्बे में खाने की तारीफ कर एक पत्र रख देता है. इला को पता चल जाता है कि डब्बा किसी और के पास जा रहा है.

यहीं से इला की जिंदगी में बदलाव आता है. पत्रों के जरिए दोनों में रोमांस पैदा होता है. कुछ दिन तक पत्रों का सिलसिला चलता रहता है. दोनों एक रेस्तरां में मिलने का फैसला करते हैं. पर वहां पहुंच कर साजन को अपनी बढ़ती उम्र और इला की कम उम्र का एहसास होता है तो वह उस से बिना मिले ही वापस लौट जाता है. अंत में दोनों मिलते हैं या नहीं यह स्पष्ट नहीं किया गया.

इस फिल्म को जितनी वाहवाही मिली है यह उस के लायक नहीं है. लंच बौक्स के बदले जाने के कारण उपजे रोमांस को ज्यादा तूल देने की जरूरत नहीं है क्योंकि इस तरह का रोमांस अकसर रौंग नंबर मिल जाने के कारण हो जाता है और इंटरनैट पर तो यह आम प्रक्रिया है कि अनजाने से प्रेम व्यक्त करें.

अगर खासीयत है तो यह कि घर के उबाऊ कामों या एकरस दफ्तरी जिंदगी में एक नए जने का आना, वह भी सिर्फ लंच बौक्स में रखे पत्रों के माध्यम से, काफी सुहाना है. निर्देशक ने जिस खूबी से नायक व नायिका की रोजाना की एक जैसी जिंदगी का चित्रण किया है उस से करोड़ों लोग वाकिफ हैं, उसे झेलते भी हैं पर व्यक्त नहीं कर पाते.

क्या लंच बौक्स का प्रेम वास्तविक बन सकता है? क्या एक युवा औरत, एक बच्ची की मां, एक ऐसे पति की पत्नी जिसे पत्नी में रुचि न रह गई हो, सब बंधन तोड़ कर लंच बौक्स में रखे पत्रों के फलसफे के आधार पर नई खुशनुमा जिंदगी शुरू कर सकती है? क्या एक रिटायर्ड पुरुष ऐसी औरत को जीवन जीने का संबल दे सकता है? अफसोस, निर्देशक के पास इन अहम सवालों का कोई जवाब नहीं और यहीं यह फिल्म उद्देश्यहीन हो गई.

फिल्म की कहानी धीरेधीरे डैवलप होती है. इस कहानी में 2 किरदार और भी हैं. एक, शेख (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) अकाउंटैंट की टे्रनिंग लेने के लिए साजन के पास आता है और दूसरा, जो दिखाई नहीं पड़ता, उस की सिर्फ खनकदार आवाज सुनाई पड़ती है. वह किरदार है आंटी (भारती अचरेकर). इला के ऊपर वाले फ्लैट में वह रहती है. फिल्म का निर्देशन कमाल का है. निर्देशक ने सभी कलाकारों से बेहतरीन काम लिया है. निमरत कौर को देख कर लगा ही नहीं कि वह पहली बार किसी फिल्म में काम कर रही है. खुद में सिमटी इला के किरदार को जब पति का तिरस्कार मिलता है और किसी ऐसे पुरुष का साथ मिलता है जिसे वह जानती तक नहीं तो वह उस रास्ते पर आगे बढ़ चलती है. उस के अभिनय में सादगी है, गहराई है.

फिल्म के संवाद बहुत अच्छे हैं. इला अपनी सारी बातें पत्र में हिंदी में लिखती है जबकि साजन अपने पत्र में यदाकदा अंगरेजी भाषा का प्रयोग करता है. फिल्म का यह पक्ष आम हिंदीभाषी दर्शकों को फिल्म से दूर ही रखेगा.

 

हर घर का संगीत है लोकगीत – मालिनी अवस्थी

मशहूर लोकगायिका मालिनी अवस्थी आज के कानफोड़ू संगीत के दौर में अपने लोकगीतों की मिठास से संगीत प्रेमियों का दिल जीत रही हैं. तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद सफलता के मुकाम पर पहुंची मालिनी से कुमार अभय ने बातचीत की.

लोककला के क्षेत्र में मालिनी अवस्थी एक जानापहचाना नाम है. इस क्षेत्र में उन के विशिष्ट योगदान के आधार पर भोजपुरी अकादमी ने उन्हें अपना अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक राजदूत यानी ब्रैंड एंबैसेडर बनाया था. लेकिन मनोज तिवारी सहित भोजपुरी फिल्मों के कई कलाकारों के विरोध के चलते मालिनी अवस्थी ने यह कहते हुए इस पद को छोड़ दिया कि कोई भी पद कला से ऊपर नहीं है. गौरतलब है कि मालिनी को ले कर यह विवाद इसलिए हुआ था क्योंकि वे भोजपुरी के बजाय अवधी भाषा की हैं.

वर्ष 2012 में रिलीज हुई बौलीवुड की फिल्म ‘एजेंट विनोद’ का एक गाना ‘दिल मेरा मुफ्त का…’ काफी मशहूर हुआ था. यह गाना चर्चा में इसलिए भी आया कि इसे लोकगीतों की गायिका मालिनी अवस्थी ने गाया था. आमतौर पर मालिनी को लोग ठुमरी, दादरा, कजरी और होरी गाने गाते व नृत्य करते देखा करते थे. पर हिंदी फिल्म ‘एजेंट विनोद’ के इस आइटम सौंग को मालिनी की आवाज में सुनना लोगों के लिए अनोखा था. मालिनी कहती हैं, ‘‘गाना कोई भी हो, सुनने वालों के दिल में उतर जाए तो एक कलाकार के लिए यह सम्मान की बात है.’’

लखनऊ के एक मध्यवर्गीय परिवार में जन्मी मालिनी के मातापिता की भी वही इच्छा थी, जो उस समय का चलन था. यानी बेटी बड़ी हो तो फौरन ब्याह कर दो. बस. मालिनी कहती हैं, ‘‘मांपिताजी ने मेरी शादी भी छोटी ही उम्र में कर दी. बच्चे भी जल्दी हो गए. मगर दिल के अंदर एक कलाकार की जो छटपटाहट थी, वह बारबार आगे बढ़ने और कुछ कर दिखाने को प्रेरित करती थी. सो, मैं ने शास्त्रीय संगीतज्ञ गिरजा देवी के सान्निध्य में संगीत का प्रशिक्षण लेना शुरू किया तो लगा, सपना हकीकत में जरूर बदलेगा.’’

आप ने लोकगीतों को ही गायिकी के लिए क्यों चुना? इस सवाल पर मालिनी मुसकराते हुए कहती हैं, ‘‘देखिए, लोकगीतों में एक गंभीरता होती है. एक ठहराव होता है. कश्मीर से कन्याकुमारी तक विभिन्न लोकगीत लोगों के लिए संजीवनी का काम करते हैं. भारत जैसे देश में जहां हजारों भाषाएं बोली जाती हैं, लोकगीतों में भी विविधता है. यह घरघर का संगीत है.’’

एक सफल गायिका होने के साथसाथ मालिनी अच्छी गृहिणी, मां और पत्नी भी हैं. वे बताती हैं, ‘‘ब्याह कर ससुराल आई तो यहां संस्कार और तहजीब तो थे पर बंदिशें नहीं थीं. ससुराल वालों ने मेरी खूब हौसलाअफजाई की. बढ़ते बच्चों को पालना और कैरियर संवारना, दोनों एकसाथ आसान नहीं था पर घर वालों ने पूरा सहयोग दिया.

‘‘पति प्रशासनिक अधिकारी हैं और काम के सिलसिले में काफी व्यस्त रहते हैं. पर उन के सुलझे खयालों ने मुझे कदमकदम पर प्रोत्साहित किया. नतीजतन, मैं आगे बढ़ती चली गई. हमारा दांपत्य आज अगर बेहद मजबूत है तो इस की मुख्य वजह हमारा आपसी प्यार और एकदूसरे पर गहरा विश्वास है.’’

मालिनी देशविदेश में भी लोकसंगीत की छाप छोड़ चुकी हैं. वे कहती हैं, ‘‘संगीत और खासकर लोकसंगीत के कद्रदान विदेशों में भी कम नहीं हैं. वहां के मंचों पर प्रस्तुति देना हर कलाकार का सपना होता है.’’

क्या कभी प्रस्तुति के दौरान दर्शकों की ऐसी कोई प्रतिक्रिया मिली है, जिसे आप बरदाश्त न कर पाई हों? इस सवाल पर मालिनी कहती हैं, ‘‘कभी नहीं. मैं ने जहांजहां प्रस्तुति दी, दर्शकों से असीम स्नेह और प्यार मिला. मैं तो भारतीय महिलाओं से अपील करती हूं कि वे जिस क्षेत्र में भी जाएं, हमेशा सकारात्मक सोच रखें. गलत मानसिकता महिलाओं को आगे बढ़ने से रोकती है. हां, परिवार वालों का सहयोग जरूरी है. शिक्षा को शुरू से अहमियत दें तो हर मुश्किल रास्ते आसान हो जाते हैं. लोग क्या कहेंगे, इस पर ध्यान न दें.’’

मालिनी अवस्थी को उन के लोकसंगीत गायकी के लिए वर्ष 2003 में ‘सहारा अवध सम्मान’ से सम्मानित किया गया और वर्ष 2012 के उत्तर प्रदेश चुनाव में भारतीय चुनाव आयोग द्वारा उन्हें ब्रैंड एंबैसेडर भी बनाया गया था. वे टीवी के कई रिऐलिटी शोज में बतौर जज भी नजर आई हैं.

मालिनी कहती हैं, ‘‘आज भले ही मुझे बौलीवुड फिल्मों के गीत गाने के औफर मिलने लगे हैं पर मेरी असली लोकप्रियता लोकसंगीत की गायकी से ही हुई. मैं भोजपुरी, गजल, सूफियाना, ठुमरी में भावप्रधान गीत गाना पसंद करती हूं और इन्हें लोग दिल से सुनते हैं. जो गंभीरता लोकगीतों में है वह किन्हीं और गानों में नहीं है. और फिर इंसान वही गाता है जो उस की सोच होती है.’’

जैनेरिक दवाएं : स्वास्थ्य सेवाओं में मायूस

जैनेरिक दवाओं के उत्पादन और निर्यात में भारत दुनिया में सब से आगे है, जबकि ज्यादातर भारतीय बीमारी में दवाओं का खर्चा नहीं सह सकते. कई देशों से मरीज भारत में सस्ते इलाज के लिए आते हैं. नतीजतन, देश में ‘मैडिकल टूरिज्म’ फलफूल रहा है. वहीं 70 प्रतिशत भारतीय मरीजों के लिए डाक्टरी सेवा उपलब्ध नहीं है.

अस्पतालों में हर हजार भारतीयों के लिए मात्र 1.5 बैड उपलब्ध हैं जबकि चीन, ब्राजील, थाईलैंड और दक्षिणी कोरिया में हर हजार मरीजों के लिए औसतन 4 बैड हैं. देश के दोतिहाई नागरिक स्वास्थ्य सेवा पर खर्च निजी पैसे से ही करते हैं.

हमारे देश के ज्यादातर आंकड़े देश के स्वास्थ्य का दुखद खाका खींचते हैं. उदाहरणार्थ, रेलगाड़ी के लंबे सफर में सुबह खिड़की के बाहर गांवों के दृश्य चिंताजनक बन जाते हैं जब हम यूनिसेफ के इन आंकड़ों को ध्यान में लाते हैं. भारत की 50 फीसदी जनसंख्या बाहर खुले में शौच करती है. ब्राजील और चीन में यही संख्या 7 प्रतिशत और 4 प्रतिशत ही है. वहीं, देश की अधिकांश आबादी मल को फेंकने का सही इंतजाम करना तो दूर, मल को बाहर ही छोड़ देती है या फिर लापरवाही से कूडे़ के साथ फेंक देती है. नतीजतन, जो बीमारियां पनपती हैं उन के चंगुल में सिर्फ ये गरीब गांववासी ही नहीं, पूरी जनता फंसती है. फिर भी साल दर साल हमें गांवों में वही के वही दृश्य देखने को मिलते हैं. साफ है कि इस समस्या का समाधान काफी मुश्किल है.

देश की भारी जनसंख्या और लोगों की बीमारियों की तरफ लापरवाही या बीमारियों को उचित महत्त्व न देना, ये 2 वजह हैं कि दुनिया की कई बीमारियों, जैसे डेंगू ज्वर, हैपेटाइटिस, तपेदिक, मलेरिया और निमोनिया ने हमारे देश में ज्यादा भयंकर रूप धारण कर लिया है और आज इन के जानेमाने इलाज हमारे यहां काम ही नहीं करते.

वर्ल्ड बैंक की एक हालिया रिपोर्ट में भारतीय बच्चों का स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ा चौंकाने वाला है. भारत के 3 साल से कम उम्र के बच्चों में 47 प्रतिशत यानी 6 करोड़ बच्चे कुपोषित हैं. यह संख्या दुनिया के कुल (3 साल से कम उम्र के) कुपोषित बच्चों की संख्या का एकतिहाई है यानी भावी चमकते भारत के लगभग आधे नागरिक जन्म से ही रोगी होंगे. स्वस्थ भारत का स्वप्न और भी दूर जाते हुए दिखता है, क्योंकि खुशहाल भारतीयों की देश से निकल कर ज्यादा विकसित देशों में जा बसने के इरादे रखने वालों की संख्या बढ़ती हुई दिखती है.

देश में स्वास्थ्य कर्मचारियों की भारी कमी है. भारत को कई लाख डाक्टरों और नर्सों की जरूरत है. मैडिकल काउंसिल औफ इंडिया के अनुसार, वर्ष 2006 में देश की विभिन्न स्टेट मैडिकल काउंसिल्स में 6,96,747 डाक्टर पंजीकृत थे पर इन में से 75 प्रतिशत बड़े शहरों में, 23 प्रतिशत छोटे शहरों में और मात्र 2 प्रतिशत गांवों में प्रैक्टिस कर रहे हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 250 लोगों की आबादी पर कम से कम 1 डाक्टर होना चाहिए जबकि देश के 6 अच्छे राज्यों में 1,600 लोगों की आबादी पर 1 डाक्टर है. वर्ष 1965 में देश में 83 मैडिकल कालेज थे. आज लगभग 50 साल बाद यह संख्या 335 है.

देश में डाक्टरों की कमी है, जबकि विदेश में बेहतर अवसरों की तलाश में डाक्टर देश छोड़ कर जा रहे हैं. भारतीय सरकार नौजवानों को अच्छा प्रशिक्षण देने में तो कामयाब हुई मगर उन्हें उपयुक्त जौब देने में चूक गई. इस तरह से देश के कई भागों, विशेषकर गांवों में, जहां दोतिहाई भारतीय रहते हैं, स्वास्थ्य सेवाएं दयनीय हैं. ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि चिकित्सकीय देखभाल के चलते कर्ज में दब कर हर साल 2 करोड़ भारतीय गरीबी रेखा के और नीचे आ जाते हैं.

12वीं पंचवर्षीय योजना (2012-2017) में सरकार के एक प्रस्ताव के अनुसार, सरकारी अस्पतालों में सैकड़ों जरूरी दवाएं मरीजों को मुफ्त उपलब्ध होंगी. पर ये दवाएं जैनेरिक यानी उन के कैमिकल नाम से जानी जाएंगी और दी जाएंगी. ये सामान्य दवाएं होंगी. योजना के तहत सरकारी डाक्टर 350 जरूरी दवाओं की सरकार द्वारा तैयार की गई सूची से ही नुसखा लिख सकते हैं, ताकि बड़ी कंपनियां ही उस का फायदा न उठाएं. 5 सालों तक लागू इस व्यवस्था में केंद्रीय सरकार 200 अरब रुपए और राज्य सरकारें 66 अरब रुपए खर्च करेंगी.

वैसे पिछले दशकों में सरकारी अस्पतालों में मुफ्त दवाओं का वितरण बड़ी रफ्तार से घटा है. जहां 1987 में अस्पताल में भरती मरीजों को निर्धारित दवाओं में 31 प्रतिशत मुफ्त थीं वहीं 2004 तक केवल 9 प्रतिशत को इस सुविधा में रखा गया. दवाओं की कीमत कम रखने के लिए लगभग 35 वर्षों तक भारत सरकार दवाओं के लिए पेटेंट नहीं लागू कर रही थी, इस वजह से आज देश में जैनेरिक दवाओं के उत्पादन का एक फलताफूलता उद्योग उभरा है. पंचवर्षीय योजना के तहत बांटी जाने वाली दवाएं सिपला, ल्यूपिन व रैनबैक्सी जैसी भारतीय कंपनियां तैयार करेंगी.

कुछ संभावित रोड़े

इस योजना के रास्ते में कई रोड़े आ सकते हैं :

  1. जैनेरिक दवाएं किसी पेटेंट से नहीं बंधी होतीं, इसलिए कोई भी कंपनी इन का निर्माण कर सकती है. यह बात तो है कि जितनी कंपनियां एक दवा के निर्माण में लगी होंगी, उतनी ही उस दवा के मूल्य में कटौती होगी. मगर इस बात पर भी ध्यान देना जरूरी होगा कि दवा की गुणवत्ता आश्वासन की जांच करने के लिए कोई सरकारी संस्था भी तैनात हो.
  2. दवा अस्पतालों में उपलब्ध हों और ज्यादा से ज्यादा जरूरतमंद इस का फायदा उठा पाएं, इस के लिए भी सरकारी दखल का होना जरूरी है.
  3. इस प्रणाली की सफलता में महत्त्वपूर्ण योगदान सरकारी डाक्टरों का होगा जो स्थानीय तौर पर मौजूद होते हैं.

सैद्धांतिक रूप से इस योजना के सफल होने के आसार अच्छे दिखे हैं लेकिन यह भी मानना पक्का है कि यह नेताओं और अफसरों के लिए पैसा कमाने का जरिया बन जाएगी. देश में स्वास्थ्य सेवा अपनेआप में एक प्रमुख उद्योग है. 2008 में सब से विकासशील देशों के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का 9 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवा पर खर्च किया गया. अमेरिका 16 प्रतिशत, फ्रांस 11.2 प्रतिशत और स्विट्जरलैंड 10.7 प्रतिशत खर्चने के साथ विश्व में स्वास्थ्य पर सर्वोच्च खर्च करने वाले देश हैं. इन के मुकाबले में भारत स्वास्थ्य में अपने जीडीपी का केवल 1.4 प्रतिशत खर्च करता है और चीन 2.3 प्रतिशत. सालों के बीतने के साथ यह खर्च हर देश में बढ़ा ही है, जाहिर है कि आने वाले सालों में स्वास्थ्य पर खर्च और बढ़ेगा. भारत की उत्पादकता कम है, क्योंकि इस की बड़ी जनसंख्या असल में बीमार है.

आमतौर पर स्वास्थ्य सुविधा व्यवस्था का निधिकरण 4 तरीकों से होता है. आम जनता से कर वसूली, निजी कंपनी द्वारा स्वास्थ्य बीमा, खुद मरीज द्वारा भुगताया खर्च या उदार या निजी संगठनों द्वारा दान.

भारत में स्वास्थ्य खर्च अधिकांश नागरिकों के आउट औफ पौकेट यानी खुद का भुगताया हुआ ही है. हमारे देश का कर आधार भी सरकार की इस कोशिश को संभालने के लिए पर्याप्त नहीं है. इसलिए सरकार की मुफ्त जैनेरिक दवाएं बांटने की यह कोशिश एक कामचलाऊ प्रबंध ही हो सकता है. दीर्घावधि निर्वाह के लिए यदि हमारे देश के नीतिनिर्धारक सामाजिक, निजी, व्यावसायिक और सरकारी स्रोतों को ले कर विशिष्ट रूप से भारतीय जरूरतों के लिए कोई नई प्रणाली बना पाएं, तो शायद कुछ बात बन सकती है.      

गर्मजोशी से राजन का स्वागत

इसे संयोग ही कह सकते हैं कि रिजर्व बैंक के गवर्नर पद पर रघुराम राजन की तैनाती के बाद से शेयर बाजार में खुशहाली लौटी है और रुपया गिरावट की ओर बढ़ने के बजाय सुधार का रुख करने लगा. नए गवर्नर के पदभार संभालने के बाद कई दिनों तक रुपए में सुधार रहा और उस में मजबूती का स्तर बेहद उत्साहजनक बना रहा.

उधर, शेयर बाजार का सूचकांक लंबे अरसे बाद 20 हजार अंक के मनोवैज्ञानिक स्तर तक पहुंचा. 10 सितंबर को तो सूचकांक 4 साल में पहली बार 1 दिन में 729 अंक की रिकौर्ड ऊंचाई पर पहुंचा. 4 दिन तक बाजार में उछाल रहा लेकिन 5वें दिन सूचकांक स्थिर रहा, हालांकि निफ्टी में 5वें दिन भी बढ़त जारी रही.

जानकार इस की बड़ी वजह सीरिया के बदले रुख को मानते हैं. उन का कहना है कि सीरिया पर अमेरिकी कार्यवाही की बढ़ती आशंका से बाजार में घबराहट थी लेकिन युद्ध नहीं होने की संभावना बनते ही बाजार का माहौल बदल गया. वैश्विक बाजार भी सुधरे.

इसी बीच, अगस्त में भारत का निर्यात 13 फीसदी बढ़ने, कारों की बिक्री 15 प्रतिशत चढ़ने और नौकरियों की संभावना बढ़ने जैसे कई सकारात्मक आंकड़ों के परिणामों की बदौलत शेयर बाजार में जम कर बिकवाली हुई. इसी दौरान सरकार ने कहा कि रुपए के लगातार मजबूत होने से डीजल के दाम नहीं बढ़ाए जाएंगे. इन सब परिस्थितियों का बाजार पर सकारात्मक असर पड़ा जिस से सूचकांक में सुधार रहा. सितंबर के दूसरे पखवाड़े में तो सेंसैक्स 20 हजार के अंक को पार कर गया. यानी दीवाली से पहले शेयर बाजार में दीवाली मन रही है.

एटीएम से निकल रहे नकली नोट

हम लोग तकनीकी का बखूबी इस्तेमाल करते हैं. हम बाबूगीरी से परेशान हैं इसलिए मशीन से होने वाले काम को तवज्जुह देते हैं. भला हो तकनीकी विशेषज्ञों का जिन्होंने संचार क्रांति ला कर काम को आसान कर दिया है. हमें दलालों से बचाया और लंबी लाइन में खड़े होने से मुक्ति दी है. रेल टिकट के लिए अब धक्के खाने से बच गए हैं.

गांवदेहात में जाइए तो वहां भी एटीएम से पैसा निकालने का प्रचलन बढ़ा है. एक आंकड़े के अनुसार, पिछले वर्ष अप्रैल से इस वर्ष मई तक एटीएम मशीन से पैसे निकालने की दर 37 प्रतिशत बढ़ी है. नैशनल पेमैंट कौर्पोरेशन औफ इंडिया ने कहा है कि इस अवधि में एटीएम से भुगतान 41 हजार 360 करोड़ रुपए से बढ़ कर 56 हजार 525 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है. लोगों में एटीएम के इस्तेमाल के प्रति और बढ़ते रुझान को देखते हुए बैंकों ने भी इस मशीन के विस्तार पर खास फोकस किया है और वे जगहजगह एटीएम मशीनों को स्थापित कर रहे हैं.

बैंकों में मानो एटीएम मशीन लगाने की होड़ मची है. पिछले वर्ष जनवरी में 69 हजार एटीएम मशीनें थीं जिन की संख्या बढ़ कर अब 1 लाख 22 हजार के करीब पहुंच चुकी है. रिजर्व बैंक औफ इंडिया ने तो अब ‘ह्वाइट लैवल’ मशीन लगाने की अनुमति भी दे दी है. ह्वाइट लैवल मशीन बैंक की नहीं बल्कि निजी कंपनी की होती है. टाटा कम्युनिकेशंस सौल्यूशन और मुथूट फाइनैंस जैसी बड़ी कंपनियां इस क्षेत्र में कूद रही हैं. इस का मतलब यह हुआ कि अब और तेजी से एटीएम मशीनें लगेंगी लेकिन इस में भी धोखा है.

एटीएम मशीनों से नकली नोट भी निकल रहे हैं. ग्राहकों के साथ यहां सब से बड़ी दिक्कत यह है कि उस वक्त उस का सुनने वाला कोई नहीं होता जब वह नकली नोट ले कर उस बैंक में पहुंचता है जिस की एटीएम मशीन से वह नकली नोट निकला है. बैंक अधिकारी ग्राहक की शिकायत को सिरे से नकार देते हैं और सुबूत पेश करने की हिदायत देते हैं. ऐसे में ग्राहक के पास सिवा उस स्लिप के कुछ नहीं होता. ज्यादातर ग्राहक तो उसी वक्त स्लिप को फाड़ कर वहां रखे डस्टबिन में फेंक देते हैं.

बात घुमाफिरा कर आखिरकार ग्राहक पर आती है. खमियाजा उसे ही भुगतना पड़ता है. कुछ एक ग्राहक ऐसे होते हैं जो इस की पड़ताल कर पाते हैं. सवाल है कि आखिर यह मिलीभगत कहां और किस से हो रही है, इस बात की भी गारंटी होनी चाहिए. यह गारंटी मशीन दे सकती है लेकिन जब वह हमारे निकाले नोट के नंबर भी रिकौर्ड करे. उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य में एटीएम से नकली नोट न मिलने की गारंटी मिल सकेगी.

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