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जज ने थामी नेपाल की बागडोर

नेपाल की सियासी उठापटक एक न्यायाधीश के प्रधानमंत्री बन जाने से भले  ही थमती प्रतीत हो पर इस में कोई दोराय नहीं है कि इस फैसले के दौरान सियासी दलों का स्वार्थी व जनविरोधी चेहरा सब के सामने उजागर हो गया है. आने वाले आम चुनावों में नेपाल की सियासत का ऊंट किस करवट बैठेगा, विश्लेषण कर रहे हैं बीरेंद्र बरियार ज्योति.

नेपाल के सियासी दलों की आपसी खींचतान और सिरफुटौव्वल की वजह से आखिरकार देश के मुख्य न्यायाधीश को प्रधानमंत्री की कुरसी मिल गई. हर राजनीतिक दल के नेता इसी उठापटक में लगे थे कि अगर उन्हें प्रधानमंत्री की कुरसी नहीं मिली तो वे किसी और को भी प्रधानमंत्री बनने नहीं देंगे. यही वजह है कि आपस में रायमशविरा कर किसी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए किसी दल का नेता तैयार नहीं हुआ पर मुख्य न्यायाधीश को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाने पर सब राजी हो गए. अब आगामी 21 जून को नेपाल में होने वाला आम चुनाव उन्हीं की देखरेख में होगा.

नेपाल के मुख्य न्यायाधीश खिल राज रेगमी ने 14 मार्च को देश के नए प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ली. 63 साल के रेगमी के अंतरिम प्रधानमंत्री बनने के बाद नेपाल में कई महीनों से चल रहा सियासी गतिरोध तो खत्म हो गया पर सियासी दलों की आपसी स्वार्थ की कलई एक बार फिर खुल गई कि किसी भी पार्टी को देश और जनता की चिंता नहीं है, वे बस सत्ता का सुख भोगने की जुगत में लगे रहते हैं.

राजशाही पर सत्तासुख भोगने का आरोप लगाने वाले सियासी दलों के नेता आज खुद लोकतंत्र के बहाने अपनाअपना राजतंत्र कायम करने में लगे हुए हैं. इसी चक्कर में नेपाल में होने वाला चुनाव पिछले कई महीनों से टलता रहा. रेगमी ने प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई की जगह ली है. चुनाव कराने के लिए 11 मंत्रियों की टोली का मुखिया रेगमी को बनाया गया है.

यूनाइटेड डैमोक्रैटिक मधेशी फ्रंट (यूडीएमएफ) समेत देश के 4 प्रमुख दलों की लंबी बैठक के बाद मुख्य न्यायाधीश की अगुआई में चुनावों की देखरेख के लिए सरकार गठित करने के मसले पर सहमति बनी. बैठक के बाद 11 बिंदुओं वाले राजनीतिक सहमतिपत्र  पर हस्ताक्षर किए गए. डैमोक्रैटिक मधेशी फ्रंट के विजय कुमार गच्छेदार, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के प्रमुख पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’, नेपाली कांग्रेस की अध्यक्ष सुशीला कोइराला और नेपाली कांग्रेस (युमाले) के अध्यक्ष ?ालानाथ खनाल ने हस्ताक्षर किए.

वोटर लिस्ट में सुधार करना, नागरिक प्रमाणपत्र बना कर बांटना, आम नागरिक समस्याओं को दूर करना, नेपाल सेना में शामिल माओवादियों के लिए कर्नल का 1 और लैफ्टिनैंट कर्नल के 2 पद बनाने समेत 11 बिंदुओं पर सहमति बनी.

नेपाली कांग्रेस की अध्यक्ष सुशीला कोइराला कहती हैं कि मुख्य न्यायाधीश को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाए जाने से न केवल देश में चल रहा सियासी गतिरोध खत्म हुआ है बल्कि चुनाव के बाद लोकतंत्र और मजबूत हो कर उभरेगा.

नेपाल के इतिहास में पहली बार मुख्य न्यायाधीश को सरकार का मुखिया बनाया गया है. गौरतलब है कि नेपाली संसद का कार्यकाल 2012 में ही पूरा हो गया था. सियासी दलों की आपसी खींचतान की वजह से चुनाव की तारीखें टलती जा रही थीं. आखिरकार मुख्य न्यायाधीश की अगुआई में चुनाव कराने के लिए सभी पार्टी के नेता तैयार हो गए. इस से पहले 1990 में बंगलादेश में तब के चीफ जस्टिस शहाबुद्दीन अहमद को सरकार का मुखिया बना कर चुनाव कराया गया था.

अब जब चुनाव की तैयारियां शुरू हो गई हैं तो नेपाली कांग्रेस पार्टी (माओवादी) ने नया बखेड़ा शुरू कर दिया है. वह यह मांग कर रही है कि रेगमी को हटा कर चुनाव कराने का जिम्मा सियासी दलों के हाथों में ही सौंपा जाए. ऐसा नहीं होने पर वह चुनाव में शामिल न होने की धमकी दे रही है. नेकंपा (माओवादी) अपने साथ छोटेछोटे सियासी दलों को जोड़ने की मुहिम में लगी हुई है. उस की चाल है कि किसी भी तरह से चुनाव को टाला जाए.

किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने की वजह से ही नेपाल में टिकाऊ सरकार नहीं बन सकी, जिस से देश में भीतरी उठापटक मची रही और चीन वहां अपना मतलब आसानी से साधने में लगा हुआ है. यह नेपाल के साथसाथ भारत के लिए भी काफी नुकसानदेह साबित हो सकता है.

चीन जहां भारत और नेपाल के प्रति आक्रामक रवैया रखता है वहीं भारत नेपाल को छोटे भाई के रूप में देखता है और चीन से भी मधुर रिश्ता बनाए रखना चाहता है. सब जानते हैं कि चीन नेपाल में अपना दबदबा बढ़ा कर भारत पर निशाना साधे रखने की जीतोड़ कोशिशों में लगा हुआ है. चीन के लिए सब से बड़ा सिरदर्द नेपाल में रहने वाले 20 हजार तिब्बती शरणार्थी हैं जो नेपाल के रास्ते चीन और भारत आतेजाते रहते हैं. नेपाल को माली मदद दे कर चीन उसे दिमागी रूप से अपना गुलाम बनाए रखना चाहता है.

नेपाल के आधारभूत ढांचे और जलबिजली परियोजनाओं के अलावा सैन्य ताकत को मजबूत करने के लिए चीन ने नेपाल को 10 करोड़ डौलर की माली मदद देने का ऐलान किया. वहीं काठमांडू तक अपनी पहुंच को आसान बनाने के लिए चीन 1,956 किलोमीटर लंबे रेलमार्ग पर तेजी से काम कर रहा है. 2014 तक पूरी होने वाली इस गोलमुडल्हासा रेल परियोजना पर चीन 1.9 अरब रुपए खर्च कर रहा है. चीन की देखादेखी भारत ने भी नेपाल पर खजाना लुटाना शुरू कर दिया है. पिछले साल ही भारत ने नेपाल में 4 जौइंट चैकपोस्ट बनाने, नेपाल के 33 जिलों में 1,500 किलोमीटर लंबी सड़कों का जाल बिछाने और दोनों देशों के बीच 184 किलोमीटर ब्रौडगेज रेललाइन बनाने के लिए 3 हजार करोड़ रुपए की मदद दी है.

नेपाल के वीरगंज इलाके का रहने वाला कारोबारी रमेश यादव कहता है कि नेपाल में अगर मजबूत सरकार होती तो चीन की मनमानी नहीं चल पाती. नेपाल की कमजोरी का फायदा उठा कर चीन नेपाल में अपना मजबूत नैटवर्क बना कर भारत को परेशान करने में लगा हुआ है.

रेगमी की इंटरनैशनल मुहिम

रेगमी चुनाव को ले कर काफी उत्साहित हैं और चीन, जापान समेत दूसरे देशों के राजदूतों से लगातार मिल रहे हैं. रेगमी और इंटरनैशनल समुदायों की कोशिश है कि चुनाव में कम से कम दल हिस्सा लें. उन का मानना है कि जितने कम दल चुनाव में भाग लेंगे, नेपाल की राजनीतिक स्थिरता उतनी ही मजबूत होगी. अगर ऐसे हालात बनते हैं तो नेपाल में छोटे दलों का वजूद खत्म होने के कगार पर है, इसलिए छोेटे दल रेगमी की देखरेख में होने वाले चुनाव का एक सुर में विरोध कर रहे हैं.

सवालों के घेरे में छात्र राजनीति

बंगाल में एक छात्र की हुई मौत पर भड़की हिंसा से एक बार फिर यह मुद्दा जोर पकड़ने लगा है कि भारत में छात्र राजनीति गुंडागर्दी का पर्याय और वर्चस्व की लड़ाई का मैदान बन चुकी है. बंगाल समेत देश के कई कालेजों में हिंसक घटनाएं और मौतें इस बात की कैसे तसदीक करती हैं, बता रही हैं साधना शाह.

कुछ दशकों से देश की छात्र राजनीति ने नया मोड़ लिया है. शिक्षण संस्थानों में गुंडागर्दी, पुलिस के साथ हिंसक ?ाड़प और मौत आम हो गई है. बंगाल के विभिन्न जिलों के कालेज व विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ के हालिया हुए चुनावों में से कोई भी शांतिपूर्ण नहीं रहा. कोलकाता के गार्डेनरीच इलाके में हरिमोहन कालेज के चुनाव में खुलेआम गुंडागर्दी व एक इंस्पैक्टर की मौत से साफ हो गया कि बंगाल में शिक्षण संस्थानों का माहौल विषैला होता जा रहा है. इस घटना के बाद राज्य सरकार ने छात्रसंघ के चुनाव पर रोक लगा दी. हालांकि ऐसा कानून व्यवस्था की बहाली के मद्देनजर किया गया था पर हुआ उलटा ही.

चुनाव पर रोक के विरोध में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीएम के छात्र संगठन स्टूडैंट्स फैडरेशन औफ इंडिया यानी एसएफआई के कार्यकर्ता व समर्थक सड़क पर उतरे. प्रदर्शन और नारेबाजी के दौरान पुलिस के साथ ?ाड़प और फिर छात्रों की गिरफ्तारी हुई. पुलिस कस्टडी में पिटाई के बाद एसएफआई समर्थक सुदीप्तो गुप्तो की मौत के बाद एक बार फिर से कानून व्यवस्था गड़बड़ा गई. और इस पर जम कर राजनीति हुई.

छात्र की मौत के बाद बंगाल ही नहीं, दिल्ली में भी घातप्रतिघात का सिलसिला चला. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी दिल्ली गईं तो उन के सहयोगियों के साथ बदसलूकी की गई. एसएफआई समर्थक छात्र की मौत के बाद ममता बनर्जी और राज्य प्रशासन भारी दबाव में थे. लेकिन दिल्ली में एसएफआई के द्वारा हमला व बदसलूकी की घटना ने उन के ऊपर के दबाव को काफी हद तक हलका कर दिया. सुदीप्तो की घटना के बाद मुंह छिपा रही तृणमूल को पलटवार करने का मौका मिल गया. इस से पहले सुदीप्तो की मौत को कैश कराने में सीपीएम ने पूरा जोर लगा दिया था. लेकिन इस से चूक हो गई.

पासा पलट गया

दिल्ली में तृणमूल नेताओं के साथ बदसलूकी के बाद ममता बनर्जी गरजीं और खूब गरजीं. योजना आयोग के अध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया और योजना राज्यमंत्री राजीव शुक्ला को जम कर खरीखोटी सुनाई. प्रधानमंत्री के साथ बैठक भी उन्होंने रद्द कर दी. इस का खासा असर बंगाल में देखने को मिला. जगहजगह सीपीएम के दफ्तरों में तृणमूल कार्यकर्ताओं ने जम कर तोड़फोड़ की. पूर्व मंत्री रज्जाक मोल्ला और सुदर्शन रायचौधुरी पर हमला कर तृणमूल ने हिसाब बराबर कर लिया. छात्र मौत से होने वाली तृणमूल की समालोचना की जगह ली सहानुभूति ने.

अन्य राज्य भी अछूते नहीं

बंगाल में ही नहीं, बल्कि पिछले दिनों राजधानी दिल्ली समेत मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश के कालेजों विश्वविद्यालयों में छात्र संगठन के चुनाव के दौरान में भी कमोबेश ऐसी ही स्थिति देखने में आई. छात्र संगठन के चुनाव के नाम पर गुंडागर्दी, पुलिस के साथ ?ाड़प, दो गुटों के बीच मारपीट और हत्या का दौर पूरे देश में चला. कुछ दशकों से छात्र राजनीति शिक्षण संस्थानों में गुंडागर्दी का पर्याय बन गई है.

वर्ष 2006 में मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले के माधव कालेज में छात्र राजनीति का सब से अधिक ?ाक?ोर देने वाली घटना घटी. 26 अगस्त, 2006 को माधव कालेज में छात्रसंघ चुनाव के दौरान हंगामा कर रहे छात्रों को जब प्रोफैसर सभरवाल ने टोका तो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी एबीवीपी के समर्थक छात्रों व उस के दबंगों ने प्रोफैसर सभरवाल समेत एक और अध्यापक प्रोफैसर नाथ के मुंह पर कालिख पोती और उन की जम कर पिटाई की. इस दौरान सभरवाल को दिल का दौरा पड़ा और उन की मौत हो गई. वारदात के बाद एबीवीपी के नेता विमल तोमर और शशि रंजन समेत 6 लोगों की गिरफ्तारी हुई, पर उन्हें जमानत मिल गई. राज्य की भाजपा सरकार पर आरोपियों को बचाने का आरोप लगा. बहरहाल, 6 में से 1 आरोपी विमल तोमर की संदिग्ध हालत में मौत हो गई.

पिछले साल अगस्त में उत्तर प्रदेश में लखनऊ के कान्यकुब्ज कालेज, कानपुर के डीएवी कालेज समेत गोरखपुर, ?ांसी, आगरा के कालेजों व विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ के चुनाव में बाहुबलियों की बाकायदा धूम रही. हिंसक वारदातों में कालेजोें में बाहरी लोगों के बेरोकटोक प्रवेश का बड़ा हाथ रहा है. बहरहाल, इस के बाद उत्तर प्रदेश के कई शिक्षण संस्थानों में बगैर पहचानपत्र के परिसर मेें प्रवेश पर रोक लगा दी गई. लेकिन इस से गुस्साए सभी छात्र नेता तोड़फोड़ पर आमादा हो गए. 13 अगस्त, 2012 को कानपुर के डीएवी कालेज परिसर में पूर्व छात्र नेता विपिन शुक्ल ने अपने बंदूकधारियों के साथ कालेज में जबरन घुसने का प्रयास किया तो जम कर मारपीट हुई, कई छात्र घायल हुए. वहीं, छात्र राजनीति में वर्चस्व की लड़ाई में गोरखपुर में छात्र नेता सतपाल सिंह और प्रदीप सिंह की हत्या कर दी गई.

छात्र चुनाव ही नहीं, शिक्षण संस्थानों में छात्र अपनी मांग मंगवाने के लिए तरहतरह से दबाव बनाते हैं. वर्ष 2009 में भोपाल के बरकतउल्ला विश्वविद्यालय में अखिल भारतीय छात्र परिषद ने कुलपति का घेराव और हंगामा किया. बाद में कुलपति ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई और विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रों को नोटिस भी थमाया. मध्य प्रदेश के इंदौर में अहल्याबाई विश्व विद्यालय में कुलपति डा. भागीरथ प्रसाद को पदभार लेने के लिए पुलिस की मदद लेनी पड़ी थी.

सुप्रीम कोर्ट की कवायद

देशभर में छात्र संगठन के चुनाव के दौरान हिंसक ?ाड़प को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट हरकत में आई. शिक्षा संस्थानों में राजनीतिक हिंसा पर लगाम लगाने के लिए 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने लिंगदोह समिति का गठन किया था. समिति की सिफारिशों को सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया और इस पर अमल करने के लिए राज्यों को दिशानिर्देश भी जारी किया. हाल ही में राज्य में होने वाली राजनीतिक हिंसा को देखते हुए चुनाव आयोग के पूर्व अध्यक्ष और समिति के अध्यक्ष जे एम लिंगदोह ने अपने एक बयान में कहा कि पंजाब, हरियाणा और दिल्ली के विभिन्न कालेजों व विश्वविद्यालयों में भी छात्र संगठन के चुनाव में राजनीतिक हिंसा हमेशा से होती रही है लेकिन समिति की सिफारिश के आधार पर सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश से इन राज्यों में हिंसा की वारदातें बहुत कम हो गई हैं.

अभी कुछ समय पहले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भी शांतिपूर्ण माहौल में छात्र संगठन का चुनाव हुआ. लेकिन बंगाल ही अकेला राज्य है जहां समिति की सिफारिशों और सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश को तूल नहीं दिया जा रहा है.

सुदीप्तो की मौत के बाद छात्र राजनीति और छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकार को ले कर नई बहस छिड़ गई है. छात्रों को क्या किसी पार्टी विशेष के एजेंट के रूप में राजनीति करनी चाहिए? छात्रों को राजनीति से तौबा कर लेनी चाहिए या पार्टी विशेष की राजनीति से अलग हो जाना चाहिए? छात्र आंदोलन के मुद्दे क्या हों, राजनीतिक हों या गैर राजनीतिक?

विशिष्ट जनों के विचार

राज्य के जानेमाने राजनीतिक चिंतक अमल मुखर्जी का कहना है कि बंगाल ही नहीं, पूरे देश में छात्र संगठन की कोई निजी सत्ता नहीं है. छात्र संगठन राजनीतिक पार्टियों की छत्रछाया में फलतेफूलते हैं. छात्र संगठन किस राह चलेगा, किस मुद्दे पर क्या रुख अख्तियार करेगा आदि सब राजनीतिक पार्टियां तय करती हैं. मसलन, शिक्षा का व्यवसायीकरण, राजनीतिक दखलंदाजी से मुक्त पाठ्यक्रम, साक्षरता के प्रचारप्रसार, महिला यौन उत्पीड़न और नशीले पदार्थों के सेवन के विरोध में जागरूकता अभियान जैसे बहुत सारे विषय हैं. कालेज-विश्वविद्यालय को राजनीतिक नियंत्रण से मुक्त करने के लिए छात्र आंदोलन के मुद्दों में बदलाव निहायत जरूरी है.

बोस इंस्टिट्यूट के निदेशक शिवाजी राहा का कहना है कि छात्रों को राजनीति जरूर करनी चाहिए वरना राजनीति में अपराधियों का बोलबाला बढ़ने लगेगा. पर कोलकाता हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश भगवती प्रसाद बनर्जी का कहना है कि छात्रों का एकमात्र लक्ष्य पठनपाठन होना चाहिए. राजनीति करने के लिए नेता हैं. राजनीति में पड़ कर छात्रों का भविष्य और उन की प्रतिभा दोनों नष्ट हो रही है.

ममतापंथी बुद्धिजीवी सुनंद सान्याल, जो इन दिनों राज्य में चल रही हिंसक राजनीति के समालोचक हैं, का कहना है कि राज्य की स्थिति देख कर यही लगता है कि अगले कुछ सालों तक छात्रों को राजनीति से दूर ही रहना चाहिए. राजनीतिक पार्टियां कालेजविश्वविद्यालय के छात्रों को एक बड़े हद तक गुंडा बना रही हैं. शिक्षण संस्थान नेता तैयार करने के अखाड़े में तबदील हो गए हैं. लेकिन राजनीतिक पार्टियों को नेताओं की आपूर्ति करने का काम शिक्षण संस्थान का नहीं हो सकता है. सुनंद सान्याल कहते हैं कि इसी कारण मैं चाहता हूं कि पढ़ाई पूरी करने के बाद अगर किसी को लगे कि उसे राजनीति में जाना चाहिए, तो वह बेशक जाए.

जहां तक राजनीति में छात्रों की शिरकत का सवाल है तो यही कहा जा सकता है कि नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व छात्र ही करते हैं. ऐसे में देश व समाज में घट रही घटनाओं पर उन के विचार जरूर माने रखते हैं. और फिर 18 साल की उम्र में युवाओं को मतदान का अधिकार दिया गया है तो इस से जाहिर है कि देश की युवा पीढ़ी प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष चुनाव करती है, ऐसे में छात्रों को राजनीति से दूर रहने की बात करना हास्यास्पद है. हां, इतना जरूर है कि राजनीति का बिजनैस करने वाले नेता जिंदा इंसान के प्राणों की कीमत सम?ों. अगर ऐसा नहीं हुआ तो जाने कितने छात्र राजनीति की बलि चढ़ जाएंगे.

मोदी और राहुल – खोखले दावों के सौदागर

नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के भाषणों और वक्तव्यों में न तो नयापन है और न ही देश के विकास की ठोस योजना. जनता को बरगलाने के खोखले दावों की पोटली जरूर है. प्रधानमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार माने जा रहे इन दोनों दिग्गजों की शख्सीयत का विश्लेषण कर रहे हैं जगदीश पंवार.

देश में पहली बार कुछकुछ अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की तर्ज पर प्रधानमंत्री पद के 2 दावेदार जनता को लुभाने की होड़ में निकल पड़े हैं. गुजरात के मुख्यमंत्री व भाजपा के नेता नरेंद्र मोदी ने अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा छोड़ दिया है तो राहुल मोदी के घोड़े को थाम कर कांग्रेस की नैया पार लगाने में जुट गए हैं. मोदी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी दोनों अपनाअपना विकास का नजरिया पेश कर रहे हैं. मोदी के विकास के हवाई प्रवचनों में चमत्कार, जादू की कहानियां हैं तो राहुल के दावों में बदलाव को ले कर सवाल हैं. जवाब दोनों महारथियों के पास नहीं हैं. हालांकि दोनों को अभी तक उन की पार्टियों ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया है.

भाजपा की रामलीला में अभी तक तय ही नहीं हो पाया, राम कौन बनेगा. रामनाम जपने वाली इस पार्टी में राम के लिए महाभारत दिख रहा है. दावेदार कई हैं पर वनवास के लिए नहीं, राजतिलक कराने के लिए आतुर हैं. लक्ष्मण, भरत, हनुमान बनने को कोईर् तैयार नहीं. अलबत्ता तवज्जुह न मिलने पर विभीषण और बातबात पर श्राप देने वाले व संन्यास की धमकी देने वाले जरूर दिखते हैं लेकिन प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी की बेचैनी साफ देखी जा सकती है.

फिक्की की महिला शाखा और टैलीविजन कार्यक्रम ‘थिंक इंडिया’ में हुए मोदी के भाषण प्रवचन अधिक लगते हैं. भाषणों में मोदी की ‘मैं’ यानी अहं बारबार बाहर झलक रहा था. मोदी के बोल व्यक्तिवादी, स्वयं यानी मैं पर आधारित हैं. इस तरह का अहं हमारे पौराणिक देवताओं, अवतारों, महर्षियों, साधुओं की कथाओं में दिखता है. अहम् ब्रह्मास्मि अर्थात मैं ही बह्म हूं. मैं ही रचयिता हूं, मैं ही संहारक हूं, मैं ही सबकुछ हूं.

हिंदुत्व की पाठशाला में तपे और गुजरात में हिंदुत्व की प्रयोगशाला के प्रधान आचार्य नरेंद्र दामोदरदास मोदी के प्रवचन कुछ इसी तरह के हैं जैसे भगवद्गीता में कृष्ण खुद ही अपनी दिव्य विभूतियां बताते हैं :

अहम् आत्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थित:,  अहमादिश्च मध्यं च भूतानामंत एव च. यानी हे गुडाकेश, सब प्राणियों के हृदय में रहने वाली आत्मा मैं हूं्. मैं ही सब प्राणियों का आदि, मध्य और अंत हूं.

हे अर्जुन, 12 आदित्यों में विष्णु मैं हूं. प्रकाशमान ज्योतियों में सूर्य मैं हूं. उनचास मरुतगणों में मरीचि नामक वायु मैं हूं. तारागणों में चंद्रमा मैं हूं. वेदों में सामवेद, देवताओं में इंद्र, इंद्रियों में मन, ग्यारह रुद्रों में शंकर मैं हूं. यक्षराक्षसों में कुबेर मैं हूं. आठ वसुओं में अग्नि मैं हूं. पर्वतों में मेरु मैं हूं. पुरोहितों में बृहस्पति, सेनापतियों में स्कंद, झीलों में समुद्र, महर्षियों में भृगु, वाणी में अक्षर ॐ मैं हूं. यज्ञों में जप यज्ञ मैं हूं. स्थावरों में हिमालय मैं हूं. वृक्षों में पीपल मैं हूं. देवऋषियों में नारद, हाथियों में ऐरावत, गायों में कामधेनु, शस्त्रों में वज्र, नागों में अनंत, जलचरों में वरुण, शासन करने वालों में यम मैं हूं. दैत्यों में प्रहलाद, गिनती करने वालों में काल मैं हूं. हिरनों में सिंह मैं हूं. पक्षियों में गरुड़ मैं हूं. योद्धाओं में राम मैं हूं. मछलियों में मगर, नदियों में गंगा, विद्याओं में अध्यात्म विद्या मैं हूं. ऋतुओं में वसंत ऋतु मैं हूं. छलियों में जुआ, विजेताओं में जय, उद्यमियों में व्यवसाय, यदुवंशियों में वासुदेव, पांडवों में अर्जुन, मुनियों में व्यास और कवियों में शुक्राचार्य मैं हूं. दंड देने वालों में दंड मैं हूं, ज्ञान वालों में ब्रह्मज्ञान मैं हूं. गुप्त पदार्थों में मौन मैं हूं और मनुष्यों में राजा मैं ही हूं.

यानी मोदी का दंभ इस प्रकार दिखता है जैसे पौराणिक कथाओं में श्राप देने की शक्ति रखने वाले साधुओं की बातों में प्रकट होता था.  मोदी दिल्ली में फिक्की की महिला शाखा की बैठक में फरमाते हैं, ‘‘एक व्यक्ति 4 तीर्थस्थलों पर जाता है और मोक्ष पा लेता है पर एक फाइल 30-35 जगहों पर जाती है फिर भी काम नहीं होता.’’

समझ नहीं आता, मोदी संन्यासी बनने जा रहे हैं या प्रधानमंत्री? वह तो हिंदू धर्म में मोक्ष, स्वर्ग का प्रचार कर रहे हैं. मोक्ष के उदाहरण में देश के विकास की सीख कहां है. मोदी धर्म में मोक्ष की तो गारंटी देते हैं पर खुद सरकारी कामकाज में सुधार कर फाइलें आगे बढ़ाने की गारंटी नहीं दे सकते. वे आगे कांग्रेस के पब्लिक, प्राइवेट पार्टनरशिप की जगह पब्लिक, पीपल, प्राइवेट और पार्टनरशिप अपनाने की सलाह देते हैं. चंद कौर्पोरेट घरानों के साथ उन की सरकार की पार्टनरशिप जगजाहिर है पर पीपल और पब्लिक की पार्टनरशिप कैसे करेंगे? लोगों को भागीदारी कैसे देंगे?

वे कहते हैं कि नेता ना और अफसर हां करना सीखें. जनाब, आप ने यह नहीं बताया कि कहां सीखें? घूसखोरी में, सांप्रदायिक दंगों में? महिला वोटरों को लुभाने के लिए मोदी ने गुजरात की जसुबेन की मिसाल देते हुए कहा कि इस महिला ने 20 रुपए से पिज्जा बेचने की शुरुआत की थी और अब नहीं रहीं पर आज उन के बेटे पिज्जा स्टोर संभाल रहे हैं.

जसुबेन के जरिए असल में वे अपने प्रतिद्वंद्वी राहुल गांधी पर भी निशाना साध रहे हैं. वे कहते हैं कि राहुल ने 2008 में महाराष्ट्र की कलावती का जिक्र संसद में किया था पर लाख कोशिशों के बावजूद कलावती आज भी गरीब, असहाय, बेबस है.

नरेंद्र मोदी टैलीविजन चैनल पर गुड गवर्नैंस पर बोले. उन्होंने वही बातें दोहराईं जो राहुल गांधी सीआईआई में कह चुके थे लेकिन समस्याओं का ठोस समाधान न तो मोदी ने और न राहुल ने सुझाया.

मोदी ने देश को हाथी की संज्ञा दी और राहुल मधुमक्खी का छत्ता बता रहे हैं तो दोनों ठीक ही कहते हैं क्योंकि देश की राजनीतिक शासन व्यवस्था सफेद हाथी बनी हुई है जो जनता की गाढ़ी कमाई को खाए जा रहा है और मधुमक्खी के छत्ते का शहद कोई और ले जाता है, मधुमक्खियों को नहीं मिलता. लेकिन इस का हल दोनों नेताओं के पास नहीं है.

उधर राहुल गांधी सीआईआई की बैठक में विकास से वंचित बड़े हिस्से के बारे मेें उसी कौर्पोरेट जगत को नसीहत देते हैं जिस के साथ मिल कर उन की सरकार ने संसाधनों की लूटखसोट की है.

मोदी प्रधानमंत्री पद के लिए आतुर हैं. वे चुनावी मंत्र दे रहे हैं. वे इस तरह खुद को पेश कर रहे हैं मानो उन के पास कोई करिश्मा है, चमत्कार, जादू है कि उन के आते ही देश की तमाम समस्याएं हल हो जाएंगी. रामराज स्थापित हो जाएगा.

 मोदी बारबार गुजरात के विकास का मौडल सामने रखते हैं. वे कहते हैं कि आज देश में आर्थिक मुद्दों पर बहस हो रही है. विकास को ले कर एक प्रतियोगिता शुरू हो चुकी है और गुजरात को गर्व है कि उस ने विकास आधारित राजनीति पर राष्ट्रीय बहस का एजेंडा तय किया है. पर वास्तव में वहां कैसा विकास हुआ है, आंकड़ों की हकीकत कुछ और ही है. गरीबी में आई कमी के आधार पर गुजरात 20 प्रदेशों की सूची में 10वें नंबर पर है. मजदूरी में वृद्धि के मामले में 20 बड़े प्रदेशों में गुजरात 15वें स्थान पर है.

गुजरात विधानसभा में मार्च में पेश सीएजी की रिपोर्ट बताती है कि आर्थिक स्तर पर पैट्रोल और खाद पर सब से ऊंची वैट दर वाले गुजरात राज्य पर सरकारी बोझ 2002 में 45.301 करोड़ रुपए का था वह 2012 तक 1.76 लाख करोड़ रुपए का हो गया. गुजरात में इस साल राजकोषीय घाटा 20,496 करोड़ रुपए का है जो राज्य के जीडीपी का 2.57 प्रतिशत है. हालांकि, बजट में राजस्व घाटा नहीं है.

ऊपर से मोदी गुजरात छोड़ कर अब भारतमाता का कर्ज चुकाने दिल्ली आना चाहते हैं. जिस तरह मोदी अपनी कार्यक्षमता के उदाहरण के रूप में गुजरात में किए गए अपने कामों का हवाला देते हैं उसी तरह राहुल गांधी युवा कांग्रेस में अपने कामों को यह दिखाने के लिए पेश करते हैं कि व्यवस्था में किस तरह बदलाव किया जा सकता है पर वे यह भी मानते हैं कि युवा कांग्रेस में आए परिवर्तन को लोग समझ नहीं पाए और इसलिए उस की कहीं चर्र्चा ही नहीं होती.

मोदी के व्यक्तिवादी आधारित भाषणों के विपरीत राहुल गांधी व्यक्तिपरक न हो कर एक अरब लोगों को सत्ता के अधिकार में शामिल करने के समर्थक हैं. यानी मोदी के व्यक्तिवादी केंद्रीकरण के बजाय राहुल सत्ता के विकेंद्रीकरण की बात करते हैं.

4 अप्रैल को राहुल गांधी सीआईआई के सम्मेलन में कहते हैं, ‘‘मेरे प्रधानमंत्री बनने का सवाल गैरवाजिब है.’’ उन के अनुसार भारत में एक ऐसा सिस्टम बन गया है जिस में यह सोचा जाता है कि कोई घोड़े पर सवार हो कर आएगा जिस के पास बेशुमार ताकत होगी और वह तमाम समस्याओं का हल कर देगा.

राहुल आगे कहते हैं कि कोई एक शख्स देश की समस्याओं का उत्तर नहीं खोज सकता. देश के करोड़ों लोगों को मिल कर उत्तर ढूंढ़ना होगा. उन्होंने भारत और चीन की तुलना करते हुए भारत को मधुमक्खी का छत्ता बताया तो 6 अप्रैल को भाजपा के स्थापना दिवस समारोह में मोदी ने जवाब देते हुए देश को मधुमक्खी का छत्ता नहीं, भारत मां कहा था.

राहुल के अनुसार, सत्ता का केंद्रीकरण होना ही व्यवस्था में अवरोधों का कारण है. इस में नीतियों के निर्माण में आम आदमी की बात नहीं सुनी जाती. इस के साथ ही नीतियों के क्रियान्वयन में देरी होती है और भ्रष्टाचार पनपता है.

लेकिन मोदी इस व्यवस्था को खारिज करते हुए कहते हैं कि व्यवस्था में बुराईर् नहीं है. इसी कानून, इसी संविधान, इन्हीं नियमकायदों, कर्मचारियों, दफ्तरों और काम करने के इन्हीं तरीकों के साथ भी हम आगे बढ़ सकते हैं और काफी कुछ हासिल कर सकते हैं. यानी मोदी को नयापन नहीं, हम तो लकीर के फकीर ही बने रहना चाहते हैं क्योंकि हमारी प्राचीन सनातन संस्कृति व परंपराएं हों या शासन व्यवस्था, नहीं छोड़नी चाहिए.

स्पष्ट है मोदी कांग्रेस के शासन को नाकाम बता रहे हैं. धर्र्मपरायण मोदी को क्या निंदा करनी चाहिए? धर्म काम, क्रोध, ईर्ष्या, निंदा न करने की सीख देता है पर मोदी के तेवर अहंकारी तो हैं ही, निंदापरस्त भी हैं.

जनता को ताकत देने की कितनी ही बातें करें पर दोनों नेताओं के अपनेअपने पिछले 10 साल के शासन में गरीब, आम आदमी और बदहाल हुए जबकि कौर्पोरेट, अमीर और अमीर बने. दोनों की सत्ता ने निरंकुश तंत्र को प्रश्रय दिया.

उधर, राहुल गांधी कहते हैं कि गरीबी से निबटने के लिए लोगों को अधिकार देने होंगे. संप्रग ने बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए जो खाका बनाया है, उस में इसी पर जोर है. हर व्यक्ति को बुनियादी शिक्षा, रोजगार, सूचना, स्वास्थ्य देने की जरूरत है और हम यही करने की कोशिश कर रहे हैं.

यह ठीक है कि लोगों को शिक्षा, भोजन, आवास देने के अधिकार दिए जा रहे हैं पर दिक्कत यह है कि ये योजनाएं भ्रष्टाचार, निकम्मेपन के चलते सिरे नहीं चढ़ पा रही हैं. इस पर राहुल गांधी की पार्टी के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार कोई ठोस उपाय सोच नहीं पाती. राहुल गांधी ने बदलाव की बातें तो की हैं पर वह होगा कैसे? उन के पास कोई फार्मूला नहीं है. वे सत्ता की ताकत आम आदमी के हाथ में देने की बात कहते हैं लेकिन उन पार्टी की सरकार द्वारा इसी मकसद से 3-4 दशक पहले शुरू की गई पंचायतीराज व्यवस्था के बावजूद क्या लोगों के हाथों में ताकत आ पाई? पंचायतों में अभी भी पटवारी पंच से ज्यादा ताकतवर है. फैसले नौकरशाह लेते हैं.

इन दोनों के भाषणों के विपरीत 2004 के बराक ओबामा के चुनावी भाषण अधिक प्रभावशाली होते थे. पब्लिक मीटिंगों में उन का विजन स्पष्ट होता था. युवाओं में बेरोजगारी की समस्या, आउटसोर्सिंग, विदेश नीति, इराक, अफगानिस्तान युद्ध नीति, कर नीति से ले कर हर छोटेबड़े मुद्दों पर अपने विचार रखते थे लेकिन हमारे प्रधानमंत्री पद के दोनों दावेदार राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी भाषणवीर तो बने घूम रहे हैं, विकास के बड़ेबड़े मंत्र फूंक रहे हैं पर विकास की राह के सब से बड़े दुश्मन भ्रष्टाचार, आतंकवाद, सांप्रदायिकता, आंतरिक व बाहरी सुरक्षा, सामाजिक गैर बराबरी, भाईभतीजावाद, नेतागीरी, नौकरशाही व कौर्पोरेट की लूट व अंधविश्वास जैसे ज्वलंत मुद्दों पर कोई बात नहीं कर रहे हैं.

प्रधानमंत्री पद के दोनों दावेदारों में दम नहीं है. केवल भाषणों से लोगों का पेट नहीं भरता. देश चलाने के लिए चुनौतियों का सामना करने के लिए जज्बा चाहिए, नया नजरिया चाहिए. मोदी के दामन पर सांप्रदायिक नरसंहार के दाग हैं तो वंश परंपरा से निकले राहुल गांधी अब तक अपनी काबिलीयत न दिखा पाने वाले नेता बने हुए हैं. राहुल की पार्टी भ्रष्टाचार को ले कर कठघरे में है.

लिहाजा, मोदी और राहुल गांधी दोनों ही आज की तारीख में देश के प्रधानमंत्री बनने लायक नहीं हैं. राहुल को तो बनना ही नहीं चाहिए. उन की काबिलीयत पर सहयोगी कभी भी उंगली उठा सकते हैं. तो फिर कौन? यह सवाल जनता के भविष्य से जुड़ा हुआ है. गंभीरता से सोचना होगा कि कौन देश को आगे ले जा सकता है.

मोदी और राहुल- खोखले दावों के सौदागर

नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के भाषणों और वक्तव्यों में न तो नयापन है और न ही देश के विकास की ठोस योजना. जनता को बरगलाने के खोखले दावों की पोटली जरूर है. प्रधानमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार माने जा रहे इन दोनों दिग्गजों की शख्सीयत का विश्लेषण कर रहे हैं जगदीश पंवार.

देश में पहली बार कुछकुछ अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की तर्ज पर प्रधानमंत्री पद के 2 दावेदार जनता को लुभाने की होड़ में निकल पड़े हैं. गुजरात के मुख्यमंत्री व भाजपा के नेता नरेंद्र मोदी ने अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा छोड़ दिया है तो राहुल मोदी के घोड़े को थाम कर कांग्रेस की नैया पार लगाने में जुट गए हैं. मोदी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी दोनों अपनाअपना विकास का नजरिया पेश कर रहे हैं. मोदी के विकास के हवाई प्रवचनों में चमत्कार, जादू की कहानियां हैं तो राहुल के दावों में बदलाव को ले कर सवाल हैं. जवाब दोनों महारथियों के पास नहीं हैं. हालांकि दोनों को अभी तक उन की पार्टियों ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया है.

भाजपा की रामलीला में अभी तक तय ही नहीं हो पाया, राम कौन बनेगा. रामनाम जपने वाली इस पार्टी में राम के लिए महाभारत दिख रहा है. दावेदार कई हैं पर वनवास के लिए नहीं, राजतिलक कराने के लिए आतुर हैं. लक्ष्मण, भरत, हनुमान बनने को कोईर् तैयार नहीं. अलबत्ता तवज्जुह न मिलने पर विभीषण और बातबात पर श्राप देने वाले व संन्यास की धमकी देने वाले जरूर दिखते हैं लेकिन प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी की बेचैनी साफ देखी जा सकती है.

फिक्की की महिला शाखा और टैलीविजन कार्यक्रम ‘थिंक इंडिया’ में हुए मोदी के भाषण प्रवचन अधिक लगते हैं. भाषणों में मोदी की ‘मैं’ यानी अहं बारबार बाहर झलक रहा था. मोदी के बोल व्यक्तिवादी, स्वयं यानी मैं पर आधारित हैं. इस तरह का अहं हमारे पौराणिक देवताओं, अवतारों, महर्षियों, साधुओं की कथाओं में दिखता है. अहम् ब्रह्मास्मि अर्थात मैं ही बह्म हूं. मैं ही रचयिता हूं, मैं ही संहारक हूं, मैं ही सबकुछ हूं.

हिंदुत्व की पाठशाला में तपे और गुजरात में हिंदुत्व की प्रयोगशाला के प्रधान आचार्य नरेंद्र दामोदरदास मोदी के प्रवचन कुछ इसी तरह के हैं जैसे भगवद्गीता में कृष्ण खुद ही अपनी दिव्य विभूतियां बताते हैं :

अहम् आत्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थित:, अहमादिश्च मध्यं च भूतानामंत एव च. यानी हे गुडाकेश, सब प्राणियों के हृदय में रहने वाली आत्मा मैं हूं्. मैं ही सब प्राणियों का आदि, मध्य और अंत हूं.

हे अर्जुन, 12 आदित्यों में विष्णु मैं हूं. प्रकाशमान ज्योतियों में सूर्य मैं हूं. उनचास मरुतगणों में मरीचि नामक वायु मैं हूं. तारागणों में चंद्रमा मैं हूं. वेदों में सामवेद, देवताओं में इंद्र, इंद्रियों में मन, ग्यारह रुद्रों में शंकर मैं हूं. यक्षराक्षसों में कुबेर मैं हूं. आठ वसुओं में अग्नि मैं हूं. पर्वतों में मेरु मैं हूं. पुरोहितों में बृहस्पति, सेनापतियों में स्कंद, झीलों में समुद्र, महर्षियों में भृगु, वाणी में अक्षर ॐ मैं हूं. यज्ञों में जप यज्ञ मैं हूं. स्थावरों में हिमालय मैं हूं. वृक्षों में पीपल मैं हूं. देवऋषियों में नारद, हाथियों में ऐरावत, गायों में कामधेनु, शस्त्रों में वज्र, नागों में अनंत, जलचरों में वरुण, शासन करने वालों में यम मैं हूं. दैत्यों में प्रहलाद, गिनती करने वालों में काल मैं हूं. हिरनों में सिंह मैं हूं. पक्षियों में गरुड़ मैं हूं. योद्धाओं में राम मैं हूं. मछलियों में मगर, नदियों में गंगा, विद्याओं में अध्यात्म विद्या मैं हूं. ऋतुओं में वसंत ऋतु मैं हूं. छलियों में जुआ, विजेताओं में जय, उद्यमियों में व्यवसाय, यदुवंशियों में वासुदेव, पांडवों में अर्जुन, मुनियों में व्यास और कवियों में शुक्राचार्य मैं हूं. दंड देने वालों में दंड मैं हूं, ज्ञान वालों में ब्रह्मज्ञान मैं हूं. गुप्त पदार्थों में मौन मैं हूं और मनुष्यों में राजा मैं ही हूं.

यानी मोदी का दंभ इस प्रकार दिखता है जैसे पौराणिक कथाओं में श्राप देने की शक्ति रखने वाले साधुओं की बातों में प्रकट होता था.   

मोदी दिल्ली में फिक्की की महिला शाखा की बैठक में फरमाते हैं, ‘‘एक व्यक्ति 4 तीर्थस्थलों पर जाता है और मोक्ष पा लेता है पर एक फाइल 30-35 जगहों पर जाती है फिर भी काम नहीं होता.’’  समझ नहीं आता, मोदी संन्यासी बनने जा रहे हैं या प्रधानमंत्री? वह तो हिंदू धर्म में मोक्ष, स्वर्ग का प्रचार कर रहे हैं. मोक्ष के उदाहरण में देश के विकास की सीख कहां है. मोदी धर्म में मोक्ष की तो गारंटी देते हैं पर खुद सरकारी कामकाज में सुधार कर फाइलें आगे बढ़ाने की गारंटी नहीं दे सकते.

वे आगे कांग्रेस के पब्लिक, प्राइवेट पार्टनरशिप की जगह पब्लिक, पीपल, प्राइवेट और पार्टनरशिप अपनाने की सलाह देते हैं. चंद कौर्पोरेट घरानों के साथ उन की सरकार की पार्टनरशिप जगजाहिर है पर पीपल और पब्लिक की पार्टनरशिप कैसे करेंगे? लोगों को भागीदारी कैसे देंगे?

वे कहते हैं कि नेता ना और अफसर हां करना सीखें. जनाब, आप ने यह नहीं बताया कि कहां सीखें? घूसखोरी में, सांप्रदायिक दंगों में? महिला वोटरों को लुभाने के लिए मोदी ने गुजरात की जसुबेन की मिसाल देते हुए कहा कि इस महिला ने 20 रुपए से पिज्जा बेचने की शुरुआत की थी और अब नहीं रहीं पर आज उन के बेटे पिज्जा स्टोर संभाल रहे हैं.

जसुबेन के जरिए असल में वे अपने प्रतिद्वंद्वी राहुल गांधी पर भी निशाना साध रहे हैं. वे कहते हैं कि राहुल ने 2008 में महाराष्ट्र की कलावती का जिक्र संसद में किया था पर लाख कोशिशों के बावजूद कलावती आज भी गरीब, असहाय, बेबस है.

नरेंद्र मोदी टैलीविजन चैनल पर गुड गवर्नैंस पर बोले. उन्होंने वही बातें दोहराईं जो राहुल गांधी सीआईआई में कह चुके थे लेकिन समस्याओं का ठोस समाधान न तो मोदी ने और न राहुल ने सुझाया. मोदी ने देश को हाथी की संज्ञा दी और राहुल मधुमक्खी का छत्ता बता रहे हैं तो दोनों ठीक ही कहते हैं क्योंकि देश की राजनीतिक शासन व्यवस्था सफेद हाथी बनी हुई है जो जनता की गाढ़ी कमाई को खाए जा रहा है और मधुमक्खी के छत्ते का शहद कोई और ले जाता है, मधुमक्खियों को नहीं मिलता. लेकिन इस का हल दोनों नेताओं के पास नहीं है.

उधर राहुल गांधी सीआईआई की बैठक में विकास से वंचित बड़े हिस्से के बारे मेें उसी कौर्पोरेट जगत को नसीहत देते हैं जिस के साथ मिल कर उन की सरकार ने संसाधनों की लूटखसोट की है. मोदी प्रधानमंत्री पद के लिए आतुर हैं. वे चुनावी मंत्र दे रहे हैं. वे इस तरह खुद को पेश कर रहे हैं मानो उन के पास कोई करिश्मा है, चमत्कार, जादू है कि उन के आते ही देश की तमाम समस्याएं हल हो जाएंगी. रामराज स्थापित हो जाएगा.

 मोदी बारबार गुजरात के विकास का मौडल सामने रखते हैं. वे कहते हैं कि आज देश में आर्थिक मुद्दों पर बहस हो रही है. विकास को ले कर एक प्रतियोगिता शुरू हो चुकी है और गुजरात को गर्व है कि उस ने विकास आधारित राजनीति पर राष्ट्रीय बहस का एजेंडा तय किया है. पर वास्तव में वहां कैसा विकास हुआ है, आंकड़ों की हकीकत कुछ और ही है. गरीबी में आई कमी के आधार पर गुजरात 20 प्रदेशों की सूची में 10वें नंबर पर है. मजदूरी में वृद्धि के मामले में 20 बड़े प्रदेशों में गुजरात 15वें स्थान पर है.

गुजरात विधानसभा में मार्च में पेश सीएजी की रिपोर्ट बताती है कि आर्थिक स्तर पर पैट्रोल और खाद पर सब से ऊंची वैट दर वाले गुजरात राज्य पर सरकारी बोझ 2002 में 45.301 करोड़ रुपए का था वह 2012 तक 1.76 लाख करोड़ रुपए का हो गया.

गुजरात में इस साल राजकोषीय घाटा 20,496 करोड़ रुपए का है जो राज्य के जीडीपी का 2.57 प्रतिशत है. हालांकि, बजट में राजस्व घाटा नहीं है.  ऊपर से मोदी गुजरात छोड़ कर अब भारतमाता का कर्ज चुकाने दिल्ली आना चाहते हैं. जिस तरह मोदी अपनी कार्यक्षमता के उदाहरण के रूप में गुजरात में किए गए अपने कामों का हवाला देते हैं उसी तरह राहुल गांधी युवा कांग्रेस में अपने कामों को यह दिखाने के लिए पेश करते हैं कि व्यवस्था में किस तरह बदलाव किया जा सकता है पर वे यह भी मानते हैं कि युवा कांग्रेस में आए परिवर्तन को लोग समझ नहीं पाए और इसलिए उस की कहीं चर्र्चा ही नहीं होती.

मोदी के व्यक्तिवादी आधारित भाषणों के विपरीत राहुल गांधी व्यक्तिपरक न हो कर एक अरब लोगों को सत्ता के अधिकार में शामिल करने के समर्थक हैं. यानी मोदी के व्यक्तिवादी केंद्रीकरण के बजाय राहुल सत्ता के विकेंद्रीकरण की बात करते हैं.

4 अप्रैल को राहुल गांधी सीआईआई के सम्मेलन में कहते हैं, ‘‘मेरे प्रधानमंत्री बनने का सवाल गैरवाजिब है.’’ उन के अनुसार भारत में एक ऐसा सिस्टम बन गया है जिस में यह सोचा जाता है कि कोई घोड़े पर सवार हो कर आएगा जिस के पास बेशुमार ताकत होगी और वह तमाम समस्याओं का हल कर देगा.

राहुल आगे कहते हैं कि कोई एक शख्स देश की समस्याओं का उत्तर नहीं खोज सकता. देश के करोड़ों लोगों को मिल कर उत्तर ढूंढ़ना होगा. उन्होंने भारत और चीन की तुलना करते हुए भारत को मधुमक्खी का छत्ता बताया तो 6 अप्रैल को भाजपा के स्थापना दिवस समारोह में मोदी ने जवाब देते हुए देश को मधुमक्खी का छत्ता नहीं, भारत मां कहा था.

राहुल के अनुसार, सत्ता का केंद्रीकरण होना ही व्यवस्था में अवरोधों का कारण है. इस में नीतियों के निर्माण में आम आदमी की बात नहीं सुनी जाती. इस के साथ ही नीतियों के क्रियान्वयन में देरी होती है और भ्रष्टाचार पनपता है. लेकिन मोदी इस व्यवस्था को खारिज करते हुए कहते हैं कि व्यवस्था में बुराईर् नहीं है. इसी कानून, इसी संविधान, इन्हीं नियमकायदों, कर्मचारियों, दफ्तरों और काम करने के इन्हीं तरीकों के साथ भी हम आगे बढ़ सकते हैं और काफी कुछ हासिल कर सकते हैं.

यानी मोदी को नयापन नहीं, हम तो लकीर के फकीर ही बने रहना चाहते हैं क्योंकि हमारी प्राचीन सनातन संस्कृति व परंपराएं हों या शासन व्यवस्था, नहीं छोड़नी चाहिए. स्पष्ट है मोदी कांग्रेस के शासन को नाकाम बता रहे हैं. धर्र्मपरायण मोदी को क्या निंदा करनी चाहिए? धर्म काम, क्रोध, ईर्ष्या, निंदा न करने की सीख देता है पर मोदी के तेवर अहंकारी तो हैं ही, निंदापरस्त भी हैं.

जनता को ताकत देने की कितनी ही बातें करें पर दोनों नेताओं के अपनेअपने पिछले 10 साल के शासन में गरीब, आम आदमी और बदहाल हुए जबकि कौर्पोरेट, अमीर और अमीर बने. दोनों की सत्ता ने निरंकुश तंत्र को प्रश्रय दिया.

उधर, राहुल गांधी कहते हैं कि गरीबी से निबटने के लिए लोगों को अधिकार देने होंगे. संप्रग ने बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए जो खाका बनाया है, उस में इसी पर जोर है. हर व्यक्ति को बुनियादी शिक्षा, रोजगार, सूचना, स्वास्थ्य देने की जरूरत है और हम यही करने की कोशिश कर रहे हैं.

यह ठीक है कि लोगों को शिक्षा, भोजन, आवास देने के अधिकार दिए जा रहे हैं पर दिक्कत यह है कि ये योजनाएं भ्रष्टाचार, निकम्मेपन के चलते सिरे नहीं चढ़ पा रही हैं. इस पर राहुल गांधी की पार्टी के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार कोई ठोस उपाय सोच नहीं पाती.

राहुल गांधी ने बदलाव की बातें तो की हैं पर वह होगा कैसे? उन के पास कोई फार्मूला नहीं है. वे सत्ता की ताकत आम आदमी के हाथ में देने की बात कहते हैं लेकिन उन पार्टी की सरकार द्वारा इसी मकसद से 3-4 दशक पहले शुरू की गई पंचायतीराज व्यवस्था के बावजूद क्या लोगों के हाथों में ताकत आ पाई? पंचायतों में अभी भी पटवारी पंच से ज्यादा ताकतवर है. फैसले नौकरशाह लेते हैं.

इन दोनों के भाषणों के विपरीत 2004 के बराक ओबामा के चुनावी भाषण अधिक प्रभावशाली होते थे. पब्लिक मीटिंगों में उन का विजन स्पष्ट होता था. युवाओं में बेरोजगारी की समस्या, आउटसोर्सिंग, विदेश नीति, इराक, अफगानिस्तान युद्ध नीति, कर नीति से ले कर हर छोटेबड़े मुद्दों पर अपने विचार रखते थे लेकिन हमारे प्रधानमंत्री पद के दोनों दावेदार राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी भाषणवीर तो बने घूम रहे हैं, विकास के बड़ेबड़े मंत्र फूंक रहे हैं पर विकास की राह के सब से बड़े दुश्मन भ्रष्टाचार, आतंकवाद, सांप्रदायिकता, आंतरिक व बाहरी सुरक्षा, सामाजिक गैर बराबरी, भाईभतीजावाद, नेतागीरी, नौकरशाही व कौर्पोरेट की लूट व अंधविश्वास जैसे ज्वलंत मुद्दों पर कोई बात नहीं कर रहे हैं.

प्रधानमंत्री पद के दोनों दावेदारों में दम नहीं है. केवल भाषणों से लोगों का पेट नहीं भरता. देश चलाने के लिए चुनौतियों का सामना करने के लिए जज्बा चाहिए, नया नजरिया चाहिए. मोदी के दामन पर सांप्रदायिक नरसंहार के दाग हैं तो वंश परंपरा से निकले राहुल गांधी अब तक अपनी काबिलीयत न दिखा पाने वाले नेता बने हुए हैं. राहुल की पार्टी भ्रष्टाचार को ले कर कठघरे में है.

लिहाजा, मोदी और राहुल गांधी दोनों ही आज की तारीख में देश के प्रधानमंत्री बनने लायक नहीं हैं. राहुल को तो बनना ही नहीं चाहिए. उन की काबिलीयत पर सहयोगी कभी भी उंगली उठा सकते हैं. तो फिर कौन? यह सवाल जनता के भविष्य से जुड़ा हुआ है. गंभीरता से सोचना होगा कि कौन देश को आगे ले जा सकता है.

रोजगार कार्यालय पैसे की बरबादी

रोजगार मुहैया कराने के नाम पर चल रही वर्षों पुरानी सरकारी व्यवस्था न सिर्फ अपने उद्देश्य से भटक चुकी है बल्कि सिफर नतीजे के बावजूद सरकारी धन का खूब अपव्यय भी कर रही है. नतीजतन, देश में प्राइवेट एंप्लौयमैंट एजेंसियां इसी काम को मनमाने ढंग से कर मोटी कमाई कर रही हैं. क्या है पूरा मामला, बता रहे हैं कपिल अग्रवाल.

समय से बड़ा कुछ नहीं है. समय बदलने के साथ परिवर्तन आते हैं. छोटेबड़े सभी को समय के साथ चलना पड़ता है. जो नहीं चला वह या तो खत्म हो गया या बरबाद. हमारी सरकार का भी यही हाल है. 50-50, 100-100 साल पुराने नियमकानून और व्यवस्थाएं आज भी ज्यों की त्यों बरकरार हैं और हर साल करोड़ों रुपए की धनराशि उन पर बरबाद की जाती है और ऐसा तब है जब खुद सरकार द्वारा बनाई गई समितियों की राय उन्हें तुरंत खत्म कर देने की होती है. ऐसी ही एक व्यवस्था है रोजगार कार्यालय.

50 साल से भी ज्यादा पुरानी इस व्यवस्था को रोजगार कार्यालय अधिनियम 1959 के तहत स्थापित किया गया था. जगहजगह स्थापित इन कार्यालयों की उपयोगिता आज पूरी तरह समाप्त हो चुकी है, फिर भी देशभर में इन का परिचालन बदस्तूर जारी है. वर्ष 2002 में प्रशासनिक सुधार आयोग ने इन्हें बंद करने या इन की संख्या कम करने की सिफारिश की थी पर वह सिफारिश मोटी फाइलों में दफन हो गई व इन के बजट बढ़ा दिए गए.

इस समय देश में कुल 968 रोजगार कार्यालय हैं. सब पर हर माह कई करोड़ रुपए खर्च किए जाते हैं, पर नतीजा बिलकुल जीरो मिलता है. एक स्वतंत्र एजेंसी की रिपोर्ट बताती है कि कई कार्यालयों में कंप्यूटर, कंप्यूटर स्टेशनरी, डीजल, वेतनभत्ते आदि के नाम पर हर माह सरकार लाखों रुपए खर्च कर रही है, पर पिछले 10 साल में वे एक भी व्यक्ति को रोजगार नहीं दिला पाए. कागजों पर तो निजी व सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों पर मैंडेटरी एंप्लौयमैंट ऐक्सचैंज ऐक्ट 1959 (कृषि के अलावा उन सभी विभागों पर लागू जहां 25 से अधिक लोग काम करते हैं) अनिवार्य है पर हकीकत में ऐसा है नहीं और न ही कोई इस का पालन करता है. निजी क्षेत्र के लिए इस की अनिवार्यता बेहद कम वेतन वाले स्तर के लिए ही है. कानून कुछ भी कहता रहे, हकीकत में देशभर में रोजगार कार्यालयों के बारे में कुछ भी अनिवार्य नहीं है.

सरकारी क्षेत्र की बात करें तो वर्ष 1996 में आए सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय में कहा गया था कि अगर रिक्तियों को भलीभांति विज्ञापित किया जाता है तो नियुक्तियों के लिए ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है कि ये रोजगार कार्यालयों में पंजीकृत लोगों के बीच से ही की जाएंगी. इस के बाद से ही ये और ज्यादा महत्त्वहीन होने शुरू हो गए.

दरअसल, इन दफ्तरों की महत्ता शुरुआत में थी और वर्ष 1990 तक इन का भरपूर उपयोग हुआ, पर सर्वोच्च अदालत का निर्णय व रेलवे भरती बोर्ड, बैंकिंग सर्विस कमीशन, कर्मचारी चयन आयोग आदि के गठन के बाद से इन का महत्त्व बहुत तेजी से घटने लगा. अदालत के निर्णय के बाद तो ये दफ्तर अप्रासंगिक होते चले गए और समयसमय पर सरकारी व गैरसरकारी समितियां इन को बंद करने की सिफारिश करती रहीं पर सरकार के कान पर जूं न रेंगी. इस के विपरीत सरकार ने कई और कार्यालय खोले व बजट में भारी वृद्धि की.

जून 2012 तक के आंकड़ों पर गौर करें तो देश के सब से बड़े रोजगार कार्यालयों में से एक, दिल्ली की सफलता की दर मात्र 0.2 फीसदी है. दिल्ली से 9 जिला स्तरीय व 5 जोनल कार्यालय संबद्ध हैं. दूसरी ओर एक मध्यम दरजे की निजी प्लेसमैंट एजेंसी की सफलता की औसत दर 30 से 40 फीसदी के आसपास रहती है. एक व्यक्ति को रोजगार दिलाने पर दिल्ली सरकार के करीब पौने 3 लाख रुपए खर्च होते हैं. कर्नाटक, ओडिशा, मध्य प्रदेश जैसे तमाम राज्यों में स्थित रोजगार कार्यालयों से तो पिछले 8 सालों के दौरान एक भी व्यक्ति रोजगार प्राप्त नहीं कर सका.

एक तरफ जहां सरकारी कार्यालय खानेपीने का जरिया बने हुए हैं वहीं निजी रोजगार प्रदाता रोजगार देने के बदले बेहद मोटी कमाई कर रहे हैं. सब से पहले तो दोनों पक्षों से रजिस्ट्रेशन शुल्क के नाम पर खासी रकम ऐंठी जाती है. इस के बाद नौकरी लगते ही 1 से ले कर 3 माह का वेतन कर्मचारी से व नियोक्ता से कमीशन के तौर पर अलग लिया जाता है.

सब से हास्यास्पद व शोचनीय बात यह है कि अपने इन कार्यालयों पर होने वाले खर्चों आदि का संपूर्ण विवरण सरकार के पास या तो है नहीं या वह देना नहीं चाहती.
मार्च 2011 में एक निर्दलीय सांसद द्वारा लोकसभा में पूछे गए प्रश्न के जवाब में केवल इतना बताया गया कि गुजरात, तमिलनाडु व केरल के रोजगार कार्यालयों ने जरूरतमंदों को रोजगार दिलाने में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है. नवंबर 2012 में आरटीआई के तहत दिल्ली के एक वरिष्ठ नागरिक ने भी बिलकुल ऐसा ही सवाल

केंद्र सरकार के रोजगार एवं प्रशिक्षण महानिदेशालय से पूछा था, जिस के जवाब में केवल इतनी ही आधीअधूरी जानकारी दी गई कि जुलाई 2012 तक देश के समस्त 968 रोजगार कार्यालयों में कुल पंजीकरण 5.83 करोड़ का था. इस दौरान मात्र 3,78,451 लोगों को इन कार्यालयों की मदद से रोजगार हासिल हो पाया. बजट आदि के बारे में दोनों ही मौकों पर चुप्पी साध ली गई.

पिछले साल के मध्य में जारी एक स्वतंत्र एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार बुनियादी ढांचे, बिजली, कंप्यूटर, डीजल, रखरखाव व कर्मचारियों के वेतन आदि का मोटामोटा अनुमान लगाया जाए तो भी कम से कम सवा 3 लाख रुपए प्रतिमाह एक कार्यालय का खर्च बैठता है. यानी देशभर के कुल 968 कार्यालयों पर 1 माह में 31 करोड़ 46 लाख रुपए खर्च किए जाते हैं. यानी मोटे तौर पर सालाना बजट 400 करोड़ रुपए का बैठता है. एजेंसी की रिपोर्ट बताती है कि बजट की अधिकांश राशि का जम कर दुरुपयोग किया जाता है.

रिपोर्ट के मुताबिक इन कार्यालयों में इतना सारा पंजीकरण भी रोजगार प्राप्ति के लिए नहीं बल्कि विभिन्न राज्यों द्वारा समयसमय पर चलाई जा रही बेरोजगारी भत्ता, जैसी स्कीमों के चलते हुआ है. कई राज्यों में तो कार्यालय केवल वेतन आदि के लिए महीने में 4-5 दिन के लिए खोले जाते हैं, वरना नए पंजीकरण तो दूर, पुरानों का रिकौर्ड भी चूहों की भेंट चढ़ गया है.

पर ऐसा नहीं है कि हर जगह अंधेरा ही अंधेरा है. 2-4 राज्य ऐसे भी हैं जो इन कार्यालयों का अधिकतम व उचित उपयोग करने हेतु प्रयत्नशील हैं. अन्य क्षेत्रों की तरह इस में भी गुजरात सरकार ने बाजी मार ली है. इस के बाद कर्नाटक व तमिलनाडु की सरकारें हैं. ये राज्य निजी सा झेदारों के साथ मिल कर काम कर रहे हैं. गुजरात सरकार ने रोजगार कार्यालयों का आधुनिकीकरण करने के अलावा पंजीकरण की दर में वृद्धि व रोजगार दिलाने हेतु एक अलग ही मौडल विकसित किया है. यह मौडल निजी सार्वजनिक भागीदारी पर आधारित है, जिस में कर्मचारियों के वेतनभत्ते, बुनियादी ढांचे आदि हर सुविधा व खर्चों में निजी कंपनियों की बराबर की भागीदारी व जिम्मेदारी है.

मात्र पंजीकरण केंद्रों की भूमिका निभा रहे रोजगार कार्यालयों को अब वहां आकलन, विश्लेषण, परामर्श, प्रशिक्षण व उचित अभ्यर्थी के लिए उचित रोजगार खोजने का काम भी करना पड़ता है.
राज्य सरकार के प्रोत्साहन व आग्रह से समयसमय पर विभिन्न कंपनियां रोजगार कार्यालयों में रोजगार मेलों (जौब फेयर) का भी आयोजन करती रहती हैं. गुजरात सरकार के इस मौडल को अन्य राज्य भी अपनाने की तैयारी कर रहे हैं. इन में गोआ, कर्नाटक, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, ओडिशा व राजस्थान प्रमुख हैं.

दरअसल, किसी भी सरकारी व्यवस्था में बदलाव या आमूलचूल परिवर्तन कम से कम हमारे देश में बेहद मुश्किल हैं. विश्व के तमाम देशों में रोजगार कार्यालय पूरी तरह व्यावसायिक रूप से चलाए जा रहे हैं. कदमकदम पर दाम बढ़ा कर जनता का शोषण करने वाली हमारी सरकार को भी इन का व्यवसायीकरण कर वाजिब कमाई के एक स्रोत के रूप में परिवर्तित करना चाहिए.

क्रिकेट पर कलंक

अफीम की तरह देशभर की रगों में समाया क्रिकेट स्पौट फिक्सिंग के चलते एक बार फिर देश को शर्मसार कर रहा है. आलम यह है कि मीडिया, अंडरवर्ल्ड, उद्योगपतियों, सियासी दलों और?सट्टेबाजों के घालमेल ने क्रिकेट को ऐयाशी और काले कारोबार में तबदील कर दिया है. पढि़ए जगदीश पंवार का लेख.

भद्रजनों का खेल क्रिकेट एक बार फिर कलंकित दिखाई दे रहा है. 15 मई को 3 खिलाडि़यों की गिरफ्तारी के साथ भांडा फूटा तो बड़ीबड़ी दिग्गज हस्तियां बेपर्दा नजर आने लगीं. खेल, फिल्म, कौर्पाेरेट और सियासी जगत में नीचे से ले कर ऊपर तक  खलबली मच गई. सारा का सारा मीडिया गुनाहगारों पर चीखने लगा. इस खुलासे से चोरों, बेईमानों, सट्टेबाजों, बिचौलियों और दलालों का परदाफाश हुआ जो सूटेडबूटेड व आंखों पर काला चश्मा लगाए, शराफत का लबादा ओढे़ क्रिकेट स्टेडियमों के वीआईपी बौक्सों में विराजे नजर आते हैं.

क्या गजब का खेल है क्रिकेट जिस में खिलाड़ी, टीम मालिक, अंपायर, खेल संचालित करने वाली संस्था सब के सब गैरकानूनी रूप से भी पैसे बना रहे हों, देशभर के सटोरिए और अंडरवर्ल्ड के लोग शामिल हों, यानी क्रिकेट या भ्रष्टों की बरात. मजे की बात यह है कि हंगामे के बाद सत्ता में बैठे लोग चौंकने का ढोंग ऐसे कर रहे हैं मानो उन्हें यह खेल बिलकुल साफसुथरा लगता रहा हो. चोरी का परदाफाश होने के बाद अब ये परेशान दिख रहे हैं और कानून बनाने की बात करने लगे हैं.   

15 मई को आईपीएल में स्पौट फिक्ंिसग के आरोप में राजस्थान रौयल के श्रीसंत, अजित चंदीला और अंकित चव्हाण की गिरफ्तारी से खेल जगत में हल्ला मच गया. आईपीएल के कर्ताधर्ताओं को सांप सूंघ गया. आईपीएल संचालित करने वाली संस्था बोर्ड औफ क्रिकेट कंट्रोल औफ इंडिया यानी बीसीसीआई पर घड़ों पानी पड़ गया.

4 दिन पहले माथे पर तिलक लगा कर प्रैस कौन्फ्रैंस में क्रिकेट को भ्रष्टाचार मुक्त करने की बात करने वाले बीसीसीआई प्रमुख एन श्रीनिवासन का दामाद और चेन्नई सुपर किंग्स टीम से जुड़े गुरुनाथ मयप्पन भी सट्टेबाजों के साथ पकड़ा गया तो श्रीनिवासन ने दामाद के साथ किसी रिश्ते से ही पल्ला  झाड़ लिया. ठीक उसी तरह जैसे रेल घूस कांड में रेल मंत्री का भांजा सीबीआई द्वारा पकड़ा गया तो मंत्री पवन बंसल ने आरोपी भांजे से रिश्ता ही तोड़ दिया था.

तीनों खिलाडि़यों की गिरफ्तारी के बाद मशहूर अभिनेता दारा सिंह का बेटा विंदू दारा सिंह पकड़ा गया तो उस ने सब से पहले गुरुनाथ मयप्पन का नाम लिया औैर कई खुलासे किए. विंदू ने पाकिस्तानी अंपायर असद रऊफ की ओर भी इशारा किया. असद पहले भी विवादों में रहे हैं. विंदू के खुलासे के बाद बौलीवुड, कौर्पोरेट वर्ल्ड, क्रिकेटर और अंडरवर्ल्ड की ऐसी सांठगांठ सामने आई जिस से समूचा देश भौचक्का रह गया.

पिछले दिनों दिल्ली में हुए गैंगरेप मामले में नाकामी का आरोप  झेल रही दिल्ली पुलिस को अपनी पीठ खुद थपथपाने का मौका मिला लेकिन उस ने कोईर् बड़ा तीर नहीं मारा. हर कोईर् जानता है कि क्रिकेट में सट्टेबाजी खूब चलती है और इस में बौलीवुड से ले कर अंडरवर्ल्ड तक की संलिप्तता है. लिहाजा, दिल्ली पुलिस अप्रैल महीने से ही संदिग्ध लोगों के टैलीफोन टैप कर रही थी. यानी दिल्ली पुलिस को पता था कि चोरों की बस्ती में छापा मारा जाएगा तो वहां चोर मिलेंगे ही औैर पकड़े भी जाएंगे. और जब वह ऐसा कारनामा करेगी तो उस की साख अच्छी हो जाएगी.

खिलाड़ी, बौलीवुड और टीम मालिक की लिप्तता सामने आई तो अन्य सटोरिए दिल्ली व मुंबई पुलिस की पकड़ में आने लगे. काले क्रिकेट और भ्रष्ट राजनीतिक जगत के चोरों और बेईमानों की बस्ती में भगदड़ मच गई.
बात जब बिगड़ी तो कल तक इन के सत्ता में बैठे पैरोकार पहले तो बगलें  झांकने लगे और फिर स्पौट फिक्ंिसग व आरोपियों का निंदागान करने लगे. अब वे कड़ा कानून लाने की बात कर रहे हैं लेकिन किस के लिए, केवल खिलाडि़यों और फिक्सरों के लिए?

सत्ता में बैठे लोग परेशान हो रहे हैं. आरोप अंडरवर्ल्ड पर मढे़ जा रहे हैं. अब तक आप क्या कर रहे थे? केंद्रीय मंत्री राजीव शुक्ला आईपीएल के चेयरमैन हैं, बीसीसीआई की अनुशासन समिति के अध्यक्ष भाजपा के अरुण जेटली हैं, केंद्रीय मंत्री सी पी जोशी बीसीसीआई की मीडिया समिति के प्रमुख व राजस्थान क्रिकेट संघ के अध्यक्ष हैं, केंद्रीय ऊर्जा मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया बीसीसीआई की वित्त कमेटी के चेयरमैन हैं, फारूक अब्दुल्ला बीसीसीआई में मार्केटिंग कमेटी के मुखिया हैं, भाजपा के सांसद अनुराग ठाकुर बीसीसीआई के संयुक्त सचिव व अंपायर्स उप समिति के संयोजक हैं.

यानी चोरों को प्रश्रय देने के लिए मानो राजनीतिक दलों का एक मजबूत यूनाइटेड फ्रंट काम कर रहा है. आश्चर्य इस बात का भी है कि एन श्रीनिवासन से इस्तीफा मांगने वाले भ्रष्टाचारियों के सरदार बीसीसीआई के पूर्व प्रमुख व एनसीपी के अध्यक्ष शरद पवार का क्रिकेट काल भी काले रंग से रंगा हुआ है. और तो और, बेईमानी व ठगी में फंसे सहारा समूह के मुखिया सुब्रत राय भी श्रीनिवासन से इस्तीफा मांग रहे हैं. वे अपनी टीम पुणे वारियर्स को लीग से हटाने का ऐलान पहले ही कर चुके हैं और अब स्पौंसरशिप से हटने की धमकी दी है.

इन नेताओं का ड्रामा तो देखिए, क्रिकेट को चला रहे हर पार्टी के ये नेता फिक्ंिसग से अपना पल्ला झाड़ रहे हैं और कानून लाने की बात कर रहे हैं. अरे, आप के रहते ये सब काली करतूतें चल रही थीं. कल तक बीसीसीआई को आरटीआई से दूर रखने की बात करने वाले अब कानून लाने की वकालत करने लगे हैं.

क्या क्रिकेट को संचालित करने वाली बीसीसीआई की कोई जिम्मेदारी नहीं है? आईपीएल के मुखिया केंद्र में मंत्रिपद पर बैठे कांग्रेसी राजीव शुक्ला, बीसीसीआई की अनुशासन समिति के अध्यक्ष अरुण जेटली की कोई जवाबदेही नहीं है?

इन सियासीबाजों की अगुआई में चल रहे क्रिकेट में वर्षों से मैच, स्पौट फिक्सिंग का खेल चलता आ रहा है तोे क्या इन्हें पता नहीं?

जानकारों के लिए यह कोई ताज्जुब की बात नहीं है. क्रिकेट शुरू से ही अंगरेजों, भारतीय रईसों, राजामहाराजाओं का खेल रहा है. आईपीएल की चकाचौंध से बौलीवुड, कौर्पाेरेट ने पैसा बनाने के उद्देश्य से दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी. यह पहले से ही जाहिर था कि क्रिकेट की सारी दाल ही काली है. क्रिकेट काली कोठरी है. सारा चोरों का खेल है.

आईपीएल में सट्टेबाजी खूब चल रही है, यह कोई नई बात नहीं है. दिल्ली से ले कर दुबई में बैठे लोग पैसा लगा रहे हैं. आईपीएल तमाशा कराया ही इसीलिए जाता है ताकि इस की आड़ में तमाम अवैध धंधों को चलाया जा सके. इस

में स्मगलर, चोरउचक्के, नशेबाज, लड़कीबाज ऊपर से शरीफ दिखने वाले सब आ जुड़े. मजे की बात है कि भारतीय उद्योग परिसंघ यानी फिक्की क्रिकेट में सट्टेबाजी को कानूनन मान्यता देने की वकालत कर रहा है. फिर तो दूसरी बुराइयों को भी कानूनन जायज बना दिया जाना चाहिए.

पुलिस की मानें तो आईपीएल में सट्टेबाजी का 50 हजार करोड़ रुपए का कारोबार है. श्रीसंत की गिरफ्तारी होते ही इस धंधे में स्यापा पड़ गया.
दिक्कत यह हुई कि कुछ लोग सीधेसीधे खिलाडि़यों से चोरीछिपे संपर्क कर के मैच में फेंके जाने वाले विशेष ओवरों में रन फिक्स करवा लेते हैं. बदले में खिलाड़ी को मोटा पैसा, गिफ्ट और लड़कियों का लालच मिलता है. खिलाड़ी वैसा ही करता है जैसा पहले से तय कर लिया जाता है.

इस से देशविदेश में फैले सट्टेबाजों का नैटवर्क मनमरजी के भाव तय कर लेता है और सट्टा जीत लिया जाता है.
यह राष्ट्रीय भावना वाला खेल नहीं है. यह तो सर्कस के तमाशे जैसा है. पिछले 2 दशक से क्रिकेट खेल सट्टेबाजों के लिए धन कमाने का एक जरिया बन गया.
भारत की चमत्कार, तमाशापसंद निकम्मी जनता को इस खेल का चस्का लगा तो वह कामधाम छोड़ कर खिलाडि़यों के चौकोंछक्कों पर तालियां पीट कर निहाल होने लगी.

जनता के इस तमाशाप्रेम की भावना को भुनाने के लिए खेल और मनोरंजन के धंधेबाज आगे आए. अमेरिका से सजायाफ्ता भगोड़े ललित मोदी ने इंडियन प्रीमियर लीग यानी आईपीएल नाम की काली कमाई का माध्यम खड़ा किया. इसे पैसे और ग्लैमर का कारोबार बना दिया गया. अर्धनग्न चीयरलीडर्स को मैचों के दौरान नचाया जाने लगा. 

हालांकि अमेरिका से आने के बाद वे अपने पिता के के मोदी के कारोबार को संभालने लगे लेकिन खेल और मनोरंजन को पसंद करने वाले ललित मोदी का पुश्तैनी टैक्सटाइल, टायरट्यूब्स, केमिकल, और उपभोक्ता सामग्री जैसे व्यापार में मन नहीं लगा.

दरअसल, आईसीसी और बीसीसीआई के बीच तकरार के बाद 2008 में आईपीएल शुरू हुआ था. आईपीएल शुरू से ही सट्टेबाजी, मनीलौंडिं्रग और स्पौट फिक्ंिसग के आरोपों के चलते विवादों में रहा. आईपीएल पर शुरू से ही सवाल उठने लगे. फ्रैंचाइजी के पास पैसा कहां से आ रहा है? चौथे आईपीएल में कोच्चि टीम को शामिल किया गया तो नियमों के उल्लंघन की बातें उठी थीं. उस समय कोच्चि टीम की फ्रैंचाइजी में केंद्र में मंत्री रहे शशि थरूर की महिला मित्र सुनंदा की हिस्सेदारी सामने आई थी और इस के चलते शशि थरूर को मंत्री पद से जाना पड़ा था. इन फ्रैंचाइजी टीमों पर टैक्स चोरी के आरोप लग रहे हैं.

दूसरा आईपीएल 2009 में भारत में आम चुनावों के चलते दक्षिण अफ्रीका में कराया गया. तब भी स्पौट फिक्सिंग को ले कर बदनामी हुई थी लेकिन तब से न तो बीसीसीआई जागी, न सरकार. अब जब आग स्वयं बीसीसीआई और सरकार के दरवाजे तक आ पहुंची तो सब मिल कर अनजान बनने का दिखावा कर रहे हैं.      

ऐसे आकर्षण के लोभ से कौर्पोरेट, फिल्म, राजनीति और उद्योग जगत के लोग बच नहीं सके. आईपीएल में टीम बनाने के लिए बाकायदा फ्रैंचाइजी आवंटित की गई. इन फ्रैंचाइजियों द्वारा खिलाड़ी नीलामी के जरिए खरीदे जाने लगे.

आईपीएल में जब धांधलियां सामने आने लगीं तो संसद में इसे बंद करने की मांग उठने लगी. पिछले दिनों संसद में करीब 80 सांसदों ने इसे बंद करने की आवाज बुलंद की थी.

क्रिकेट में इस जुर्म को साबित करने की जरूरत ही नहीं है. पिछले पन्ने पलट कर देखे जा सकते हैं. क्रिकेट में फिक्ंिसग का खेल कोईर् नया नहीं है. करीब 2 दशक पहले ही इस में बेईमानी सामने आने लगी थी. 1994 में पाकिस्तानी कप्तान सलीम मलिक पर मैच फिक्स करने के आरोप लगे थे.

वर्ष 2000 में दक्षिण अफ्रीकी खिलाड़ी हैंसी क्रोनिए को पकड़ा गया था और उस पर प्रतिबंध लगाया गया.
क्रिकेट के देवताओं के पांव दलदल में फंसे दिखाई दे चुके हैं. कुछ समय पहले अजहरुद्दीन, अजय जडेजा, मनोज प्रभाकर जैसे दिग्गज खिलाडि़यों के नाम सामने आए थे. अभी तक इन के माथे पर फिक्ंिसग का कलंक लगा हुआ है.
सवाल है कि सियासतदां परेशान क्यों हो रहे हैं? केंद्रीय कानून मंत्री कपिल सिब्बल कहते हैं कि आईपीएल स्पौट फिक्ंिसग प्रकरण के मद्देनजर कानून मंत्रालय फिक्ंिसग विरोधी कानून लाने पर विचार कर रहा है.

खेल मंत्री जितेंद्र सिंह फरमाते हैं कि यह काफी शर्र्मनाक है और खेल मंत्री के नाते उन का सिर शर्म से  झुक गया है पर कड़ा कानून बना कर क्रिकेट को विश्वसनीयता के संकट से बचाया जा सकता है.
दरअसल, क्रिकेट काले धन को सफेद करने, हवाला कारोबारियों, सट्टेबाजों, चोरी, बेईमानी करने वाली कौर्पोरेट और औद्योगिक कंपनियों को मुनाफा पहुंचाने का माध्यम साबित हो रहा है. लिहाजा, इन्हीं लोगों द्वारा आईपीएल में टीमों की खरोदफरोख्त और खिलाडि़यों के सौदे किए जाते हैं.

यह खेल देश को किस दिशा में ले जा रहा है, यह सोचने की फुरसत किसी को नहीं है. जिन की जिम्मेदारी है वे भी चोरों के साथ हैं. आम जनता भी अपनी मूल समस्याओं को भूल कर इन लोगों की पिछलग्गू बनी हुई है.
आईपीएल शहरशहर, गलीगली में युवाओं को बिना मेहनत किए लाखों कमाने के लिए उकसा रहा है. यह उन्हें निकम्मा बना रहा है. पूरा समाज सट्टेबाजों, काले चोरों, दलालों, लड़कीबाजों का साम्राज्य बनता जा रहा है. ऐसे में उम्मीद की जाती है समाज के सभ्य होने की? आईपीएल की यही भीड़ बलात्कार की घटना पर सड़कों पर उतरी नजर आती है. यह हम कैसा समाज, कैसा देश बना रहे हैं?

ममता शर्मा

गायिकी की दुनिया में ममता शर्मा को ‘मुन्नी बदनाम’ गीत ने रातोंरात भले ही स्टार बना दिया लेकिन उन्हें यह सफलता 12 साल के लंबे संघर्ष के बाद मिली है. हाल ही में ममता ने अपने कैरियर व निजी जिंदगी से जुड़े कई दिलचस्प पहलुओं पर शैलेंद्र सिंह से बातचीत की. पेश हैं मुख्य अंश.

मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर से मुंबई तक पहुंचने तक किन परेशानियों से आप को गुजरना पड़ा?
सच बात तो यह है कि हम ने कभी मुंबई जाने का सपना नहीं देखा था. मेरे घर में कोई फिल्मी दुनिया का जानकार नहीं था. न ही कभी किसी की इच्छा थी. मेरे नाना को गाने का थोड़ाबहुत शौक जरूर था. मेरे पिताजी एक कपड़ा मिल में काम करते थे. 1992 में वह मिल बंद हो चुकी थी. ऐसे में परेशानियां आने लगीं.

कुछ समय बाद मेरे पिताजी नहीं रहे. काफी जिम्मेदारी मां के कंधों पर आ गई. मैं 11 साल की थी. गाने का शौक था. जो भी लोग सुनते थे कहते कि मुझे गाने का मौका मिलना चाहिए. ऐसे में मैं ने स्टेज पर गाने का सफर शुरू किया. मैं दूसरी गायिकाओं के गाने गा कर स्टेज पर लोगों का मनोरंजन करने लगी. उस समय मध्य प्रदेश जैसी जगह में लड़की का स्टेज पर गाने का फैसला सरल नहीं था.

मां का सहयोग मेरे साथ था. मैं ने आगे बढ़ने का फैसला कर लिया. स्टेज पर गाने से लोगों का मनोरंजन तो हो रहा था पर मुझे संतुष्टि नहीं मिल रही थी. इस दौरान मैं ने एस टी पौल स्कूल से अपनी पढ़ाई पूरी कर ली. इस के बाद मुंबई आ गई.

क्या मुंबई में काम मिलना आसान था?

नहीं, मुंबई की अपनी एक अलग दुनिया है. मैं मुंबई साल 2000 में आई थी. एक बार मैं बस से सफर कर रही थी. मेरे पास 2 रुपए नहीं थे कि मैं बस का टिकट ले सकूं. बस के कंडक्टर ने टिकट बनवाने के लिए कहा तो मैं ने कह दिया कि पर्स घर पर रह गया है. मुझे देख कर एक आंटी को मेरे ऊपर तरस आ गया. उन्होंने मुझे 10 रुपए का नोट दिया. मैं ने 2 रुपए टिकट के ले कर 8 रुपए वापस किए तो वे बोलीं, ‘बेटा, रख लो, आगे काम आएंगे.’ ऐेसी बहुत सी परेशानियां आईं जिन को आज बताना सरल है पर जब समय बीत रहा था तब लगता नहीं था कि इस का कोई अंत होगा. स्टेज शो कर के मैं कमाने लगी.

इस के बाद भोजपुरी फिल्मों में भी गाने गाए. स्टेज शो के दौरान बहुत सारे गीतकारों और संगीतकारों से मुलाकात होती थी. सब कहते थे, फोन करना. जब उन को फोन करते तो केवल घंटी बजती रहती.  

जिंदगी का वह कौन सा मुकाम था जिस ने ममता शर्मा को रातोंरात स्टार बना दिया?

संगीतकार ललित पंडित से मेरी पहले मुलाकात हुई थी. कई माह के बाद एक दिन मैं ने उन को फोन किया तो वे बोले कि मेरा एक गाना है जो तुम्हें गाना है. मैं उन से मिली और फिल्म ‘दबंग’ का गाना ‘मुन्नी बदनाम…’ मुझे गाने का मौका मिल गया. इस गाने का देसी अंदाज मेरी आवाज को सूट कर गया. इस के  बाद तो मेरी जिंदगी बदल गई. 

‘मुन्नी बदनाम…’ और बाकी तमाम गाने भी ऐसे ही आइटम सौंग से रहे. क्या आप की सफलता आइटम सौंग के आसपास ही है?

सब से पहले तो आप जिसे आइटम सौंग कहते हैं, हम उसे फनी सौंग कहते हैं. ऐसे गाने फिल्मों की पहचान बन जाते हैं. इन को लोग मन लगा कर सुनते हैं. खुश होते हैं. अपनी दिनभर की थकान दूर करते हैं. ‘दबंग’ के बाद ‘दबंग 2’ के गाने ‘फेवीकौल…’ और ‘पांडेय जी सीटी…’ को भी लोगों ने उतना ही प्यार दिया. फिल्म ‘राउडी राठौर’ के गाने ‘आ रे प्रीतम प्यारे…’, फिल्म ‘मिले न मिले हम’ का गाना ‘कट्टो गिलहरी…’, फिल्म ‘हाउसफुल 2’ का गाना ‘अनारकली डिस्को चली…’ जैसे तमाम गाने हैं जिन को लोगों ने दिल से प्यार दिया.

आप जिस दौर में गायिकी के क्षेत्र में आईं हैं उस समय तमाम रिऐलिटी शो म्यूजिक को ले कर बनते हैं.  कलाकार पानी के बुलबुले की तरह होने लगे हैं. कैसा महसूस करती हैं?

देखिए, यह बात तो सच है कि रिऐलिटी शो से एक ब्रेक मिल जाता है. खराब बात यह है कि ऐसे कलाकार अपने को पूरा गायक समझ लेते हैं. इस के बाद वे मेहनत करना बंद कर देते हैं. अपने से बड़ीबड़ी अपेक्षाएं पाल लेते हैं. यही वजह है कि ऐसे कलाकार प्रतिभाशाली होते हुए भी गुम हो जाते हैं.

आप के गानों के बोल कई बार ऐसे होते हैं जिन को ले कर आरोप लगते रहे हैं. मुन्नी नाम की तमाम महिलाओं की शिकायत हुई कि उन को इस गाने के बहाने छेड़खानी का शिकार होना पड़ा?

ऐसी बातें सही नहीं हैं. कई नामों को ले कर पहले भी गाने बने हैं. ‘मेरा नाम है चमेली’ और ‘लड़की अकेली शन्नो…’ जैसे बहुत सारे गाने पहले बने हैं. तब ऐसा नहीं हुआ. दरअसल, यह मीडिया का युग है. इस में हर बात को अलग अंदाज में देखा जाता है.

पर ‘लौंडिया पटाएंगे मिसकौल से…’ जैसे गानों के बोल का कुछ तो असर समाज पर पड़ता ही होगा?

मुझे नहीं लगता कि ऐसे गानों से लोग इतना प्रभावित होते हैं. आज भारत के कुछ देहाती इलाकों में लड़की के लिए लौंडिया शब्द का प्रयोग किया जाता है. हम जब गाते हैं तो चाहे फिल्मों में गा रहे हों या स्टेज पर, हमारा प्रयास यह होता है कि देखने और सुनने वाले हर किसी को खुश कर सकें.  

गीत गाना आप ने कहीं से सीखा है?

नहीं, मैं ने गाना सीखा नहीं है. मैं आशा और लताजी के गाने सुनती थी. वहीं से गाने की कोशिश शुरू की. आशाजी के गाने बहुत पसंद थे. उन के कुछ गाने जो हेलन पर फिल्माए गए थे, मुझे बहुत पसंद थे. ऐसे गानों को गातेगाते कब मैं गाने लगी पता ही नहीं चला. स्टेज पर भी मैं ऐसे ही गाने गाती थी. इस के अलावा जब मैं मुंबई आई तो लगा कि गाने की तकनीकी जानकारी होनी जरूरी है. तब मैं ने इंटरनैट की मदद से गाने को सीखा और समझा.

गाने के अलावा आप के दूसरे शौक क्या हैं?

गाना और खाना.यही मेरे 2 सब से बडे़ शौक हैं. मुझे हर तरह का शाकाहारी खाना बनाना आता है. अखनी पुलाव मैं बहुत अच्छा बनाती हूं. मुझे दाल बनाने का बहुत शौक है. जब मैं ग्वालियर में रहती थी तो केवल यही समझती थी कि दाल को केवल प्याज डाल कर ही छौंका जा सकता है. अब मैं 5 तरह से दाल में छौंका लगा सकती हूं. यह मुझे काफी टेस्टी लगती है. नौनवेज में केवल अंडा ही खाती हूं.

इश्क इन पेरिस

जिस तरह प्रीति जिंटा की आईपीएल टीम किंग्स इलैवन पंजाब की स्थिति हुई वैसे ही उन की खुद की लिखी और अभिनीत पहली फिल्म ‘इश्क इन पेरिस’ की हालत हुई है. बड़ेबड़े पीवीआर जैसे सिनेमाघरों में रिलीज के पहले दिन ही इस फिल्म को दर्शकों का ठंडा रिस्पौंस मिला.
यह फिल्म इसलिए दर्शकों पर अपना असर छोड़ पाने में असफल रही क्योंकि प्रीति जिंटा का यह इश्क काफी ठंडा है, कहानी भी साधारण है. और फिर फिल्म की नायिका खुद प्रीति जिंटा के चेहरे पर मासूमियत नजर नहीं आती. वैसे प्रीति जिंटा की अभी शादी नहीं हुई है, फिल्म की कहानी में नायिका की भी शादी करने में दिलचस्पी नहीं है.
यह फिल्म 2-3 साल से रिलीज होने का इंतजार कर रही थी. प्रीति जिंटा ने इस फिल्म से काफी उम्मीदें बांध रखी थीं लेकिन फिल्म उन की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकी है.

फिल्म की कहानी ऐसे 2 लोगों की है जो शादी में विश्वास नहीं करते. कहानी पेरिस से शुरू होती है. इश्क (प्रीति जिंटा) और आकाश (रेहान मलिक) रोम से पेरिस जा रही एक ट्रेन में मिलते हैं. दोनों भारतीय हैं. दोनों में दोस्ती हो जाती है. आकाश इश्क को पेरिस में अपने साथ एक रात बिताने को राजी कर लेता है. दोनों एकदूसरे से वादा करते हैं कि दोबारा नहीं मिलेंगे. लेकिन नियति उन्हें फिर से मिला देती है. आकाश को इश्क से प्यार हो जाता है परंतु इश्क शादी को नापसंद करती है. आखिर में इश्क की मां उसे अपने और पति के तलाक के बारे में सचाई बताती है. इश्क को लगता है कि उस के अंदर भी प्यार का अंकुर फूटने लगा है. वह लंदन वापस जा रहे आकाश के पास पहुंच जाती है और अपने प्यार का इजहार करती है.

फिल्म की यह कहानी एकदम ठंडी है. कहानी की गति भी बहुत धीमी है. फिल्म का निर्देशन भी दमदार नहीं है. कहानी में ट्विस्ट भी नहीं है, सीधीसपाट सी है. पूरी कहानी एक किरदार के मुंह से कहलवाई गई है.

हां, निर्देशक ने पेरिस और वहां पर बने एफिल टावर की खूबसूरती को दिखाने में कोई कंजूसी नहीं बरती है. रात के समय हजारों बल्बों की रोशनी में चमकता एफिल टावर बहुत खूबसूरत लगा है.

प्रीति जिंटा के अभिनय में कोई नवीनता नजर नहीं आती, उलटे उस के चेहरे पर प्रौढ़ता झलकने लगी है. रेहान मलिक का काम कुछ अच्छा है. फिल्म में सलमान खान का एक आइटम सौंग भी डाला गया है. प्रीति जिंटा भी सलमान के साथ नाची हैं.

फिल्म का संगीत कुछ अच्छा है. ‘कुडि़ए दी कुरती’ और ‘जाने भी दे’ गीत सुनने में अच्छे लगते हैं.

आई डोंट लव यू

आई डोंट लव यू यानी मैं तुम से प्यार नहीं करता. फिल्म का टाइटल आप को चौंकाने वाला लगेगा. लेकिन फिल्म देखने पर आप को पता चलेगा कि इस में प्यारव्यार का कोई चक्कर नहीं है, यह तो किसी सनसनीखेज एमएमएस कांड पर आधारित है तो आप एक बार फिर से चौंक जाएंगे.
फिल्म का नायक रुसलान मुमताज एक चर्चित एमएमएस कांड से जुड़ा है. वह फिल्म इंडस्ट्री की एक नई अदाकारा के साथ अपने एमएमएस की वजह से ही चर्चा में आया था.
किसी भी एमएमएस कांड को कुछ खबरिया चैनल किस तरह बढ़ाचढ़ा कर पेश करते हैं और सनसनी फैलाते हैं ताकि उन की टीआरपी बढ़े, इस पर फिल्म में खासी रोशनी डाली गई है.

फिल्म की कहानी दिल्ली के एक कालेज में पढ़ने वाले छात्र युवान (रुसलान मुमताज) की है. उसी कालेज में एक लड़की आयरा (चेतना पांडे) पढ़ने आती है. युवान को आयरा से प्यार हो जाता है. एक दिन आयरा युवान को अपने घर बुलाती है. युवान आयरा के डांस को अपने मोबाइल कैमरे में रिकौर्ड करने लगता है. फिर अचानक वह आयरा को किस करता है और उस के टौप की चैन खोल देता है. आयरा युवान को  झटक देती है. युवान वहां से चला जाता है. कुछ दिनों बाद वह एमएमएस एक न्यूज चैनल के रिपोर्टर के हाथ लग जाता है. वह सनसनी फैलाने के लिए एक  झूठी रिपोर्ट बना कर पेश करता है. परेशान हो कर युवान अपने घर की इमारत से छलांग लगा देता है. वह बच जाता है. ठीक होने पर वह आयरा से माफी मांगता है. एक अन्य चैनल युवान को बेकुसूर साबित करता है. आयरा युवान को माफ कर देती है. उस के घर वाले उस का हाथ अयान के हाथ में दे देते हैं.

इस फिल्म के माध्यम से यह दिखाने की कोशिश की है कि खबरिया चैनल वाले किस तरह किसी इंसान के निजी पलों को सैक्स स्कैंडल के रूप में दिखा कर उस की जिंदगी तबाह कर डालते हैं.

फिल्म की यह कहानी बहुत धीमी है. नायक और नायिका दोनों ही नए हैं. दोनों ने ही निराश किया है. निर्देशन साधारण है. निर्देशक ने मुद्दा तो अच्छा उठाया है परंतु उस का ट्रीटमैंट सही ढंग से नहीं कर पाया है. फिल्म का गीतसंगीत साधारण है. आखिर में अधनंगी लड़कियों द्वारा किया गया नाच भी दर्शकों का ध्यान नहीं खींच पाता. टाइटल सौंग में अंगरेजी के शब्द हैं. मिका द्वारा गाया गया एक गीत ‘इश्क की मां की…’ अपनी बोल्डनैस की वजह से आजकल चर्चा में है. छायांकन अच्छा है.

औरंगजेब

न तो यह पीरियड फिल्म है न ही इस का मुगल सल्तनत के शासक औरंगजेब से कुछ लेनादेना है. फिल्म पूरी तरह से ऐक्शनथ्रिलर है. फिल्म में औरंगजेब जैसी बादशाहत भी नहीं है. दांवपेंच जरूर ऐसे हैं जिन के जरिए भाइयों, रिश्तेदारों और दोस्तों को भी मारना पड़ता है. साजिशों, धोखाधड़ी और कत्लों के बीच पनपते रिश्तों को फिल्म में दिखाया गया है.

फिल्म का विषय नोएडा के आसपास के क्षेत्र, जहां ऐक्सप्रैसवे बना है, की जमीनों को रसूखदार आदमियों द्वारा औनेपौने दामों पर किसानों से ले कर करोड़ोंअरबों रुपए कमाना है. दिल्ली एनसीआर में रियल एस्टेट सैक्टर में कितनी धांधलियां हो रही हैं, यह किसी से छिपा नहीं है. बिल्डर माफिया ने रातोंरात अपने एंपायर खड़े कर लिए हैं.

फिल्म का विषय नया तो नहीं है लेकिन निर्देशक अतुल सभरवाल ने फिल्म का ट्रीटमैंट ऐसा किया है कि दर्शक कुछ हद तक बंधे से रहते हैं. फिल्म की सिर्फ एक ही कमजोरी है. वह है कहानी का धीमा होना.

फिल्म का नायक बोनी कपूर का बेटा अर्जुन कपूर है. फिल्म ‘इशकजादे’ के बाद यह उस की दूसरी फिल्म है. अपनी पहली फिल्म में भी उस ने काफी अच्छा अभिनय किया था. इस फिल्म में उस की दोहरी भूमिका है जिसे उस ने बबूखी निभाया है. इस फिल्म से यह साफ हो गया है कि उस में दम है.

कहानी रियल एस्टेट का बिजनैस कर रहे यशवर्धन सिंह (जैकी श्रौफ) के साम्राज्य की है. उस का बेटा अजय (अर्जुन कपूर) शराबी और बिगड़ैल है. यशवर्धन का बिजनैस उस की पार्टनर नीना (अमृता सिंह) और उस का बेटा इंदर संभालते हैं.

यशवर्धन की तरह डीसीपी रविकांत (ऋषि कपूर) भी अपना साम्राज्य खड़ा करना चाहता है. वह अपने भतीजे आर्य (पृथ्वीराज) और बेटे देव (सिकंदर खेर) के साथ मिल कर बिल्डर माफिया से पैसों की वसूली करता है. एक दिन रविकांत के भाई (अनुपम खेर) की मौत के बाद आर्यन को पता चलता है कि उस की सौतेली मां वीरा (तन्वी आजमी) और जुड़वां भाई विशाल (अर्जुन कपूर) भी है जिस की वजह से बचपन में उसे पिता की बेरुखी सहनी पड़ी थी. वह यह खबर अपने चाचा रविकांत को सुनाता है.

रविकांत आर्यन के साथ मिल कर एक प्लान बनाता है. वह अजय का अपहरण कराता है और विशाल को अजय बना कर यशवर्धन के पास भेजता है ताकि वह विशाल के जरिए यशवर्धन के काले कारनामों का पता लगा सके. प्लान कामयाब हो जाता है. जब आर्यन और रविकांत यशवर्धन को दबोचने जाते हैं तभी बाजी पलट जाती है. आर्यन को अपने चाचा की महत्त्वाकांक्षा का पता चल जाता है. रविकांत आर्यन को गोली मारता है लेकिन वह मरता नहीं. उधर, विशाल रविकांत को मार डालता है. अजय और विशाल अपने पिता यशवर्धन को बचा लेते हैं.

इस फिल्म में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि जिस प्रकार मुगल शासनकाल में औरंगजेब की वजह से मुगल सल्तनत को काफी नुकसान पहुंचा था, उसी तरह फिल्म के नायक और यशवर्धन के दूसरे बेटे विशाल की वजह से उस का पूरा साम्राज्य चौपट हो गया.

इस फिल्म में किरदार बहुत हैं. ज्यादा किरदारों का होना कहानी को उल झाता है. सभी किरदारों को घुमाने का काम ऋषि कपूर ने किया है. उस का अभिनय बहुत बढि़या है. उस ने शतरंज की ऐसी बिसात बिछाई है कि एकएक कर सभी गिरतेमरते नजर आने लगते हैं.

दक्षिण के अभिनेता पृथ्वीराज का अभिनय भी अच्छा है. उस का कम बोलना उस के आक्रोश को दिखाता है. अजय की प्रेमिका की भूमिका में सलमा आगा की बेटी साशा आगा ग्लैमरस और हौट लगी है.
फिल्म के संवाद अच्छे हैं. एक गीत ‘बरबादियां… मीठी लगें आजादियां…’ जिसे साशा आगा ने गाया है, अच्छा है. बाकी गाने पंजाबी में हैं जो अपना प्रभाव नहीं छोड़ पाते. फिल्म का छायांकन अच्छा है.

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