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बच्चों के मुख से

मेरे पड़ोस में ढाई साल के जुड़वां बच्चे मुदित और मौलिक रहते हैं. दोनों मुझ से काफी हिलमिल गए हैं. मम्मीपापा दोनों के कामकाजी होने से बच्चे दिनभर अपने दादादादी और आया के साथ रहते हैं. एक दिन सुबह आया उन्हें बाहर घुमा कर घर वापस ला रही थी, तभी मेरे पति लंच के लिए घर आ रहे थे, बच्चों ने जैसे ही उन्हें देखा, खुशी से एकसाथ चिल्लाए, ‘‘वो थाया (छाया) अंकल आ गए.’’ दरअसल, मुझे पड़ोस में सभी छाया कहते हैं. बच्चों की बात सुन पति और अन्य मौजूद लोग खिलखिला कर हंस पड़े. पति ने कहा, ‘‘बच्चों ने तो मेरा नाम ही बदल दिया.’’

निर्मला राजेंद्र मिश्रा, नासिक रोड (महा.)

 

हमारे पास मेरा छोटा बेटा अपनी पत्नी व 3 वर्षीय पुत्र आदित्य के साथ आया हुआ था. आदित्य बड़ा ही बातूनी है. एक सुबह जब मैं नींद से जागा तो उस की मां आदित्य का मुंह धुला रही थी. मैं ने आदित्य को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘आदित्य, गुडमौर्निंग.’’ कोई जवाब नहीं मिलने पर मैं ने फिर कहा, ‘‘आदित्य, गुडमौर्निंग.’’ फिर भी कोई जवाब नहीं आया. तब मैं ने कहा, ‘‘पता नहीं, आदित्य कोई जवाब क्यों नहीं दे रहा है.’’ तभी आदित्य ऊंची आवाज में बोल पड़ा, ‘‘अभी हम मुंह धो रहे हैं.’’ आदित्य का उत्तर सुन कर हम सभी हंस पड़े.   

विनोद प्रसाद, रांची (झारखंड)

 

एक बार मेरी नवासी और मेरा पोता  इंटरनैट के जरिए स्काइप पर आमनेसामने बैठे बातें कर रहे थे. पोता बोला, ‘‘अरे, तुम्हारा दांत टूट गया, टूथफेयरी ने तुम्हें क्या गिफ्ट दिया?’’ दरअसल, अमेरिका में बच्चों का दांत टूटता है तो उसे तकिए के नीचे रख दिया जाता है. बच्चे को सुबह वहां एक गिफ्ट रखा मिलता है. मेरी नवासी को इस बारे में कुछ पता नहीं था. उस के पापा ने कहा, ‘‘तुम्हारी टूथफेयरी को अभी इंडिया का वीजा नहीं मिला.’’ यह सुन कर सभी का हंसतेहंसते बुरा हाल हो गया.     

ममता, लखनऊ (उ.प्र.)

 

मेरे जेठ की बेटी की शादी की तैयारियां हो रही थीं. मुझे अपनी 5 वर्षीया बेटी के लिए बाजार से सैंडिल खरीदने थे. पति से पैसे मांगे तो हमेशा की तरह चिढ़ कर बोले, ‘‘पैसे नहीं हैं.’’ मेरी बेटी धीरे से मेरे कान में बोली, ‘‘ममा, पिताजी से बोलो कि दादी के लिए कुछ लाना है तो वे आप को पैसे दे देंगे.’’ मासूम बेटी की इस बात पर हम बहुत हंसे.

पुष्पा बिष्ट, गाजियाबाद (उ.प्र.)

जिंदगी के उतारचढ़ावों की साथी है पत्नी

महाराष्ट्र की सियासत में खासा मुकाम हासिल कर चुके नारायण राणे की निजी जिंदगी उन की अर्धांगिनी नीलमताई से शुरू होती है और उन्हीं के इर्दगिर्द खत्म. वे सालों के अपने परिपक्व प्रेम, विश्वास और पारस्परिक सामंजस्य की बदौलत जीवन में आई उपलब्धियों को साझा कर रहे हैं आसावरी जोशी से.

सामाजिकता और राजनीति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. सामाजिकता, समाज के लिए कुछ कर दिखाना, समाज के दुर्बल लोगों के बारे में सोचना, या यों कहें कि हम जिस समाज में रहते हैं उस का हम पर जो कर्ज है उसे चुकाने के लिए, कम से कम पलभर के लिए ही सही, सच्चे मन से सोचने के लिए एक संवेदनशील मन की जरूरत होती है.

समय के साथ इस सामाजिक व्यवस्था को और भी सक्षम बनाने के लिए राजनीति का सहारा लेना ही पड़ता है. फिर जैसेजैसे समय बीतता जाता है वैसेवैसे राजनीति परिस्थिति की जरूरत या किसी और कारण से समाज व्यवस्था पर धीरेधीरे हावी होने लगती है और संवेदनशीलता समय के साथ में कहीं पीछे छूट जाती है और अपनेआप ही उस पर धूल की परत जमा हो जाती है. लेकिन ऐसा कहा जा सकता है कि कुछ लोगों के बाबत ये नियम काफी अपवादों के बाद सिद्ध होते हैं.

नारायण राणे, महाराष्ट्र की राजनीति की एक बड़ी हस्ती, एक प्रतिष्ठित नाम, उन से मुलाकात करने के लिए मैं उन के घर पहुंची. उन के चेहरे पर प्रसन्नता और स्वागतशीलता के भाव से मैं ने सवालों का सिलसिला शुरू किया और एक अलग ही व्यक्तित्व मेरे आगे उभरता गया. अपने परिवार को प्यार करने वाले एक पिता, पोतों को प्यार करने वाले एक दादा और सब से खास अपनी पत्नी को जान से भी ज्यादा प्यार करने वाले एक प्यारे पति, पत्नी का नाम आते ही वे रोमांटिक और भावुक हो गए.

अपनी पत्नी के बारे में वे कहते हैं, ‘‘हमारी शादी बहुत जल्दी हुई थी. हमारी लवमैरिज है. शादी से पहले हम एकदूसरे के पड़ोस में रहते थे. मैं उस से शादी करना चाहता था. शादी से पहले यह मान, सम्मान और प्रतिष्ठा मेरे पास कुछ नहीं था. आयकर विभाग में एक सामान्य सी नौकरी करता था तभी हमारी शादी हुई. उसे मुझ पर पूरा विश्वास था. मेरे हर काम में मुझे उस का पूरा साथ मिलता था. आप ऐसा क्यों कर रहे हैं, यह सवाल आज तक उस ने मुझ से कभी नहीं पूछा. मेरे हर फैसले में मुझे उस का साथ बिना मांगे और बिना पूछे मिल जाता था. पिछले 34 सालों से मेरे साथ अखंड चलने की मानो उस ने शपथ ली हो और आज तक यह शपथ पूरे प्यार और निष्ठा से निभा रही है.’’

वे बिलकुल मग्न हो कर अपनी पत्नी के बारे में बोले जा रहे थे, ‘‘हमारा पिछले 34 सालों का साथ है. हम एकदूसरे से कभी भी अलग नहीं रहे हैं. उस के साथ मेरा जीवन बहुत ही सुख से बीता है. वह मेरे जीवन में क्या आई, सफलता कदम- कदम पर मुझे चूमने लगी. साल 1985 में मैं लोकप्रतिनिधि बना. सच पूछो तो नौकरी ही मेरे लिए कमाई का जरिया थी, पर लोगों के लिए भी कुछ न कुछ करने की लालसा मन में बसी हुई थी. मेरे अंदर बसे मेरे नेतृत्वगुण को मेरी पत्नी ने और भी बढ़ावा दिया. वह हमेशा मेरे साथ मजबूती के साथ खड़ी रही. आज वह घर के साथसाथ मेरा कारोबार भी संभालती है, मेरे बच्चों को उस ने बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं.’’

पत्नी नीलमताई का एक वाक्य हमेशा उन को धीरज बंधाता है, ‘आप जो चाहते हैं वही करें, मैं आप के साथ हूं.’ नारायण राणे कहते हैं कि जब भी वे दौरे पर निकलते हैं उन की पत्नी उन के साथ होती है. फिर चाहे वह दौरा कहीं का भी हो. वे बताते हैं, ‘‘मैं जब भी मुुंबई में रहता हूं, रात का खाना पत्नी के साथ खाता है. आज तक कभी मैं ने यह नियम तोड़ा नहीं है. हमारा बारबार एकदूसरे से संवाद होता रहता है. ठीक 7 बजे मुझे उस का फोन आता है कि घर कब तक आ रहे हैं. हां, पर इस बात में एक फर्क जरूर पड़ा है कि अब फोन मेरे पोते द्वारा  करवाती है. घर में आए मेहमानों और रिश्तेदारों की वह बहुत अच्छी खातिरदारी करती है. घर के हर प्रोग्राम में मेरी उपस्थिति होने पर उस का ज्यादा जोर होता है. घर के सभी सदस्यों का जन्मदिन हम घर में ही एकसाथ मनाते हैं.

‘‘खाना खाने के बाद हम एकसाथ गपशप करने बैठते हैं. अपने जीवन की हर बात मैं उस के साथ शेयर करता हूं. जिंदगी के हर उतारचढ़ाव में मुझे उस का पूरापूरा साथ मिलता है. हमारे इतने सालों के साथ में वह बहुत ही कम मायके गई है, या यों कहें कि मुझे छोड़ कर वह कभी रही ही नहीं है.’’

नारायण राणे को महंगे कपड़े और गाडि़यां बहुत पसंद हैं. हंसते हुए वे कहते हैं, ‘‘पर यह सब मैं अपने पैसों से ही खरीदता हूं, सरकारी पैसों से नहीं. घर के लिए खरीदारी मैं अपनी पत्नी के साथ करता हूं. एकदूसरे के बिना चैन ही नहीं पड़ता. हम भले ही जबान से न कहें पर एकदूसरे को पढ़ सकते हैं, समझ सकते हैं और एकदूसरे के मन में क्या है, यह भी जान सकते हैं,’’ वे आगे कहते हैं,?‘‘मेरे जीवन में कई कठिन मौके आए पर पत्नी ने मुझे कभी भी डगमगाने नहीं दिया. मैं ने जब शिवसेना छोड़ दी थी तब मुझे तत्काल दिल्ली जाना पड़ा था. तब भी मेरे साथ सिर्फ मेरी पत्नी आई थी. कई महत्त्वपूर्ण फैसले लेने थे. उस के साथ के बिना मैं फैसला ले ही नहीं सकता था.’’

प्यार जीवन को खूबसूरत बना देता है, इस में शक तो नहीं मगर यदि प्यार का एक रूप यानी लाइफ पार्टनर के साथ सामंजस्य नहीं बैठता तो जीवन बदसूरत हो जाता है. पति व पत्नी के रूप में नारायण राणे और नीलमताई दोनों को एकदूसरे पर अटूट विश्वास है जो उन के प्यार की सफलता का प्रतीक है.

सफर अनजाना

बात पिछले वर्ष जून माह की है. मैं दुबई घूमने गया. दुबई जाने से पहले मैं ने मुंबई से राजनादगांव का टिकट 90 दिन पूर्व ही बुक करा लिया था. मुझे एसी थर्ड में वेटिंग 1 और 2 मिला. मैं ने सोचा कि 3 माह का समय है, वेटिंग क्लियर हो जाएगी. निश्ंिचत हो कर हम दुबई यात्रा से लौटे. प्लेन रात 1.30 बजे मुंबई आया और रेलवे स्टेशन आतेआते 3 बज गए. सुबह 6 बजे गीतांजली ऐक्सप्रैस में रिजर्वेशन था. 1 घंटे पूर्व चार्ट देखा तो होश उड़ गए, वेटिंग ज्यों की त्यों थी.

समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें. आखिरकार ट्रेन में चढ़े. कल्याण स्टेशन तक सभी यात्री अपनीअपनी सीट पर काबिज हो गए और टीटीई ने आते ही हाथ खड़े कर दिए कि मैं कुछ नहीं कर सकता और आप लोगों को इस डब्बे से उतरना पड़ेगा.

हम लोगों की बातें सामने 4 लड़के- लड़कियों का ग्रुप बैठा सुन रहा था. ग्रुप में से एक लड़के ने कहा, ‘‘आप चिंता मत करो. हमारे पास साइड की 2 बर्थ हैं. उन पर आप अपना सामान रख दें. नीचे हम लोग साथ में बैठ जाते हैं और हमारी सीट में आप लोग बैठ जाइए,’’ इतने में मुझे दूसरा टीटीई दिखा. उस को मैं ने सारी बात बताई और सीट देने का आग्रह किया. उस ने मुझे 2 सीटें दे दीं. डब्बे में शिफ्ट होने से पूर्व हम दोनों ने उस लड़के व उस के साथियों का शुक्रिया अदा किया. उन के सहयोग के कारण ही हमारा सफर आसानी से पूरा हुआ.

आशीष जयकिशन, राजनादगांव (छ.ग.)

मैं इंदौर से मंदसौर जा रहा था. बस रात 9 बजे रतलाम पहुंची. वहां बताया गया कि बस आधा घंटा रुकेगी. रतलाम में मुझे मेरे पुत्र के लिए अपने मित्र से कुछ पुस्तकें लेनी थीं. पुस्तकें ले कर आने के लिए आधा घंटा पर्याप्त था. आटो किया, मित्र के घर पहुंचा, पुस्तकें लीं और आटो वाले से बस स्टैंड लौटने के लिए कहा. उस ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि घर पर मेहमान आने वाले हैं.

तभी एक तांगा दिखाई दिया. मैं उस से बस स्टैंड के लिए चल दिया. देखा, तांगे का घोड़ा काफी कमजोर था इसलिए तेज चल ही नहीं पा रहा था और जब बस स्टैंड पहुंचा तो बस निकल चुकी थी.

अगली बस रात 11 बजे थी. उस से मंदसौर के लिए निकला. रास्ते में रतलाम से लगभग 15 किलोमीटर दूर वह बस, जो मुझ से छूट गई थीं, एक मोटरसाइकिल वाले को बचाने में पुलिया से टकरा कर उलट गई थी. घोर अंधेरे में चीखनेचिल्लाने की आवाजें आ रही थीं. कई यात्रियों को गंभीर चोटें आई थीं. एक वृद्ध महिला बेहोश पड़ी थी. कुछ राहगीर सहायता के लिए आ गए थे. हम सब भी उतर कर उन लोगों की मदद करने में जुट गए. मैं ने आटो वाले और घोड़े का मन ही मन आभार माना जिन्होंने उस दिन अनजाने में मुझे बचा लिया था.

मधुकर नाडकर्णी, उज्जैन (म.प्र.)

सुला दिया गया लोगों को जगाने वाला

अंधविश्वास और धार्मिक पाखंडों के मकड़जाल में उलझे समाज को जगाने की सजा शायद मौत है. तभी तो डा. नरेंद्र दाभोलकर जैसी शख्सीयत, जिस का ध्येय ही समाज को जादूटोने और अंधविश्वास के दलदल से बाहर निकालना था, को दिनदहाड़े गोलियों से भून दिया जाता है. क्या समाज इस कदर स्वार्थी व भ्रष्ट हो चुका है जो उस के भले के लिए ही लड़ने वाले को ऐसा अंजाम बख्शे? पढि़ए जितेंद्र कुमार मित्तल का लेख.

लगभग 30 साल तक डा. नरेंद्र दाभोलकर नामक अदना सा इंसान देश के गांवगांव घूम कर धार्मिक अंधविश्वासों, काले जादू और टोनेटोटकों के खिलाफ अपनी मुहिम अकेला ही चलाता रहा. जब कभी कोई व्यक्ति अपनेआप को भगवान या उस का विशेष दूत कह कर लोगों को अपने चमत्कारों से सम्मोहित कर देता था तो

डा. दाभोलकर उन्हीं चमत्कारों को लोगों के सामने पेश कर के उस तथाकथित भगवान या उस के विशेष दूत को बेनकाब कर देते थे और लोगों के समक्ष बहुत सीधी व आसान भाषा में यह भी स्पष्ट कर देते थे कि वह चमत्कार कैसे किया गया था. और अगर किसी ढोंगी ने बांझ स्त्रियों को संतान प्रदान करने का दावा कर के उन से लाखों रुपए ऐंठ कर असीम संपत्ति एकत्र कर ली तो डा. दाभोलकर अपनी सूझबूझ से उस के इस दावे की तह तक जा कर जनता के समक्ष उस का ढोंगी चेहरा उजागर कर देते थे.

उन का मकसद केवल एक ही था कि वे धर्म के नाम पर चल रहे करोड़ों रुपए के इस काले व्यापार का भंडाफोड़ कर देश के असंख्य अनपढ़ व नादान लोगों को इस कुचक्र से बाहर निकाल सकें और उन के भीतर अच्छेबुरे का ज्ञान व तथाकथित धार्मिक चमत्कारों को तर्क की कसौटी पर परखने की सोच पैदा कर सकें. लेकिन 67 वर्षीय डा. दाभोलकर का यह अभियान अचानक 20 अगस्त को पुणे में बहुत दर्दनाक ढंग से समाप्त कर दिया गया. उस दिन जब वे अपने दैनिक योगाभ्यास के बाद बाहर घूमने निकले तो एक पुल पार करते समय 2 लोगों ने पीछे से गोली मार कर उन की हत्या कर दी. इस कू्रर हत्या के बाद ये हत्यारे अपनी मोटरसाइकिल पर सवार हो कर भीड़ में गायब हो गए.

डा. दाभोलकर की हत्या पोंगापंथी धर्म के तथाकथित ठेकेदारों और सामाजिक सुधारकों के बीच चल रहे शताब्दियों पुराने संघर्ष की एक नवीनतम कड़ी है. जब पुलिस ने इन हत्यारों को पकड़ने के लिए डा. दाभोलकर के दुश्मनों की सूची तैयार करनी शुरू की तो उन्हें यह जान कर आश्चर्य हुआ कि यह सूची वास्तव में काफी लंबी है. उन्हें समयसमय पर कट्टर हिंदू संगठनों से धमकियां मिलती रही थीं. साथ ही हिंदू गुरुओं के शिष्य अपने गुरुओं का परदाफाश करने के कारण उन से इतने नाराज हो गए थे कि उन्होंने कई बार उन की पिटाई तक कर डाली थी.

इतना ही नहीं, खाप पंचायत जैसे जातीय समूहों की दादागीरी की कड़ी आलोचना करने व उन के खिलाफ अभियान चलाने के कारण इन पंचायतों के सामंत भी उन की जान के दुश्मन बन गए थे. पिछले 14 साल से वे धार्मिक अंधविश्वासों के नाम पर लोगों को ठगने वालों के खिलाफ महाराष्ट्र में कानून बनाने के लिए आंदोलन चलाते आ रहे थे और उन के सुझाव पर ही समयसमय पर विधेयक का मसविदा भी सरकार द्वारा तैयार किया गया, लेकिन शिवसेना व भारतीय जनता पार्टी के निहित हितों के चलते वह कभी विधानसभा में पारित ही नहीं हो सका.

डा. दाभोलकर इन अड़चनों से कभी निराश नहीं हुए, न घबराए. वे इस बारे में कहा करते थे, ‘मैं जानता हूं कि इस तरह की लड़ाइयां युगों तक चला करती हैं …हमारा जीवनकाल 70-80 साल का होता है और इस एक जीवनकाल में हम जिस महान क्रांति का सपना देखते हैं उस का एक छोटा सा अंश ही हासिल हो पाता है.’

लेकिन उन की दर्दनाक हत्या के तुरंत बाद महाराष्ट्र की कांगे्रस व राष्ट्रवादी कांगे्रस पार्टी की मिलीजुली सरकार हरकत में आ गई और 5 दिनों के भीतर ही राज्यपाल ने इस आशय के एक अध्यादेश पर हस्ताक्षर कर दिए. पुलिस का कहना है कि दाभोलकर के हत्यारे अपने पीछे कोई ठोस सुबूत छोड़ कर नहीं गए हैं. इस हत्या के विषय में वहां लगे कैमरे में केवल इतना ही कैद हो पाया कि हत्या के 1 घंटे पहले से दोनों हत्यारे उस पुल पर चहलकदमी कर रहे थे. उन की हिम्मत तो देखिए कि वे अपनी मोटरसाइकिल पास के ही एक पुलिस स्टेशन के बाहर पार्क कर के पुल पर आए थे और जैसे ही डा. दाभोलकर उस पुल पर घूमने आए, वे हत्यारे उन के शरीर को गोलियों से छलनी कर के भाग गए.

धर्म के इन तथाकथित ठेकेदारों ने इस हत्या से कुछ समय पहले मुंबई में उन्हें सीधे शब्दों में धमकी दी थी कि तुम अपनी हरकतों से बाज आ जाओ. हम ने जब गांधी को ही नहीं छोड़ा तो तुम भला क्या चीज हो.

उन पर जानलेवा हमले भी होते रहे थे. उन्होंने हमलों की रिपोर्ट पुलिस में लिखवाने से इनकार कर दिया था. स्वयं उन्हीं के शब्दों में, ‘अगर अपने ही देश में अपने ही लोगों से बचने के लिए मुझे पुलिस की सुरक्षा लेनी पड़े तो यह समझना चाहिए कि मैं ही कहीं गलत हूं. मेरी लड़ाई संवैधानिक है और यह किसी के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह तो सभी के हित की लड़ाई है.’

डा. दाभोलकर पर यह भी आरोप लगा कि वे केवल हिंदू धर्म के पीछे पड़े हुए थे. इस आरोप के जवाब में उन का कहना था, ‘मैं खुद एक हिंदू हूं, इसलिए सब से पहले मैं अपने घर की सफाई करना चाहता हूं.’ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने डा. दाभोलकर की हत्या को उस मानसिकता से जोड़ा जो महात्मा गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार थी. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है, ‘‘जिन लोगों ने महात्मा गांधी की हत्या की उन्हीं लोगों ने डा. नरेंद्र दाभोलकर की भी हत्या की है.’’ मुख्यमंत्री का यह कथन शायद इस तथ्य पर आधारित है कि उन्हें धमकियां देने वाले संगठनों में ‘सनातन संस्था’ नामक एक कट्टरपंथी हिंदू संगठन भी शामिल है, लेकिन इस संगठन के संस्थापक ने उन की हत्या के बाद दिए अपने बयान में केवल इतना ही कहा है कि ‘हम इस हत्या की निंदा करते हैं’, लेकिन उन्होंने इस हत्या पर अपना शोक प्रकट करना जरूरी नहीं समझा.

डा. जयंत अठवले, जो पहले सम्मोहन विद्या से लोगों का इलाज करने का दावा किया करते थे (जाहिर है कि डा. दाभोलकर उन के तौरतरीकों के कट्टर विरोधी थे) और जो अब अपनेआप को किसी गौडमैन से कम नहीं मानते, ने इस संस्था के मुखपत्र ‘सनातन प्रभात’ में अपने संपादकीय में डा. दाभोलकर की हत्या पर अपने विचार कुछ इन शब्दों में अभिव्यक्त किए हैं : ‘‘कष्टदायक वृद्धावस्था या किसी शल्यचिकित्सा के बाद मरने के बजाय आज डा. दाभोलकर को जो मृत्यु प्राप्त हुई है वह भगवान का आशीर्वाद ही है.’’

डा. दाभोलकर का जन्म महाराष्ट्र के एक प्रतिष्ठित व प्रगतिशील परिवार में 1 नवंबर, 1945 को हुआ था. 6 भाइयों व 3 बहनों में वे सब से छोटे थे. उन के पिता वकील थे. मां एक प्रगतिशील महिला थीं. इस प्रकार एक प्रगतिशील समाज का सपना उन्हें विरासत में मिला था. उन के सब से बड़े भाई देवदत्त, जिन का 2010 में देहांत हो गया, गांधीवादी थे और वे पुणे विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर रह चुके थे. उन के दूसरे भाई श्रीपद, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, प्रोफैसर थे और वे महाराष्ट्र  में औरगैनिक फार्मिंग के प्रणेता माने जाते हैं. उन के तीसरे भाई दत्ता प्रसाद एक प्रमुख लेखक, वैज्ञानिक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं. स्वयं डा. दाभोलकर पेशे से चिकित्सक थे और उन की धर्मनिरपेक्ष सोच का सुबूत इसी बात से मिल जाता है कि उन्होंने स्वयं हिंदू होते हुए भी अपने बेटे का नाम महान विचारक व समाजसुधारक हमीद दलवाई के नाम पर हमीद रखा था.

हमीद अपने पिता की ही तरह स्वयं एक चिकित्सक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं. डा. दाभोलकर ने अपना पूरा जीवन धार्मिक अंधविश्वासों के खिलाफ अपनी लड़ाई को समर्पित करने के उद्देश्य से 40 साल की उम्र में अपनी मैडिकल प्रैक्टिस बंद कर दी और 1983 में सतारा में इस दिशा में काम करना शुरू कर दिया.

वर्ष 1989 में उन्होंने इस उद्देश्य से ‘अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति’ का गठन किया. उन्हें अपने इस अभियान में अपने पुत्र हमीद, बेटी मुक्ता व पत्नी शैला का पूरा समर्थन प्राप्त था. शैला बताती हैं, ‘‘तब हम केवल समाज के विषय में ही सोचा करते थे और केवल इसी बात की चिंता रहती थी कि सामाजिक बुराइयों से हम किस प्रकार मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं. हम दोनों ही आदर्शवादी देशभक्त थे. हम एक अच्छे समाज के सपने देखा करते थे.’’

पिछले 2 दशकों के दौरान डा. दाभोलकर ने महाराष्ट्र के सभी प्रमुख सामाजिक अभियानों में सक्रिय रूप से भाग लिया था. उन की लड़ाई केवल अंधविश्वासों के खिलाफ ही नहीं थी बल्कि वे महिलाओं के अधिकारों, पर्यावरण सुरक्षा जैसे अनेक मोरचों पर एकसाथ काम कर रहे थे. लेकिन इन सब में तथाकथित धर्मगुरुओं का परदाफाश करना उन का सब से बड़ा व महत्त्वपूर्ण काम था.

एक जरमन विद्वान डा. दाभोलकर की संस्था ‘अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति’ के कार्यों से इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने इस पर पूरी एक किताब ही लिख डाली है. इस पुस्तक में उन्होंने इस संस्था के एक कार्यक्रम का बड़ा दिलचस्प चित्र पेश किया है. डा. दाभोलकर के शिष्य सड़क के बीचोंबीच एक मजमा लगाए हुए हैं. उन में से कुछ नुकीली कीलों और कांच के टुकड़ों की शैया पर लेटे हुए हैं और कुछ नारियल में यकबयक अग्नि प्रज्वलित कर देते हैं. वे वहां एकत्र भीड़ को अपने कारनामों के विषय में समझाते हुए कह रहे हैं कि भाइयो, धार्मिक चमत्कार जैसी कोई चीज नहीं होती. यह सब हाथ की सफाई है जिसे आप जादूगरी भी कह सकते हैं. कभी किसी के बहकावे या छलावे में न आएं…धर्मगुरुओं की दिलचस्पी केवल आप के पैसे ऐंठने में है. उन्हें किसी कथित भगवान का कोई विशेष आशीर्वाद प्राप्त नहीं है.

डा. दाभोलकर व उन के शिष्य जानबूझ कर ऐसे काम करते थे जिन के बारे में तथाकथित धर्मगुरु या कर्मकांड करने वाले तांत्रिक अकसर यह कहते सुने जाते थे कि वैसा करने से भगवान का कोप भुगतना पड़ेगा या फिर यंत्रतंत्र (काला जादू) उन लोगों को नेस्तनाबूद कर देगा. यह सबकुछ करने का उन का मकसद आम जनता को केवल यह समझाना होता था कि इन धार्मिक पोंगापंथियों की ये सारी बातें कोरी बकवास होती हैं और उन में से कभी किसी को भी यह सबकुछ करने के बावजूद आज तक कोई नुकसान नहीं पहुंचा था.

कुछ समय से डा. दाभोलकर काला जादू विरोधी विधेयक पर ही अपना ज्यादातर समय लगा रहे थे और उन्हें इस बात का खेद था कि राजनीतिज्ञ कोई न कोई बहाना बना कर इस विधेयक को पारित नहीं होने दे रहे थे.

पुणे विश्वविद्यालय की समाजशास्त्र की प्राध्यापक श्रुति तांबे के अनुसार, इस के मार्ग में अनेक अवरोध पैदा हो गए थे. सब से पहली बात तो यह थी कि हाल ही में मध्यमवर्ग के हिंदुओं में रूढि़वादी विचार जोर पकड़ते जा रहे थे. इस के अलावा, कुछ जातियां किन्हीं खास धार्मिक कर्मकांडों से विशेष रूप से जुड़ी हुई थीं और यह विधेयक उन की रोजीरोटी के लिए खतरा बन गया था. इन सब बातों के अलावा अंधविश्वास को किसी कानूनी परिभाषा में अभिव्यक्त करना एक कठिन काम था.

इन सब बातों का नतीजा यह हुआ कि विधेयक में प्रतिबंधित गतिविधियों की सूची दिन ब दिन छोटी होती चली गई. श्रुति तांबे के अनुसार, आज जो विधेयक का मसविदा है, वह एक बिना धार वाली तलवार की तरह रह गया है. स्वयं उन्हीं के शब्दों में, ‘‘विश्वास व अंधविश्वास को एकदूसरे से अलग करने वाली रेखा बहुत पतली है.’’

कट्टरपंथी हिंदू संगठन इस विधेयक के घोर विरोधी रहे हैं. ‘सनातन संस्था’ के प्रवक्ता शंभू गावरे के अनुसार, इस विधेयक के शुरू के मसविदे में उपवास जैसी धार्मिक क्रियाओं पर भी सवालिया निशान लगा दिया गया था. इस मसविदे के मुताबिक किसी भी ऐसे कृत्य पर जिस से शरीर को नुकसान पहुंचे, प्रतिबंध लगा दिया गया था. इस में कानून की दृष्टि से परंपरागत धार्मिक व्रत या उपवास को आसानी से शामिल किया जा सकता है. हालांकि ऐसी अनेक विवादग्रस्त धाराएं इस विधेयक से निकाल दी गई हैं, इस के बावजूद अभी भी इस में अनेक विवादास्पद प्रावधान शामिल हैं. गावरे, जो एक मैकेनिकल इंजीनियर हैं, कहते हैं कि यह पूरा विधेयक ही हिंदुओं और उन के धर्म के खिलाफ है. इन समस्त विरोधों के बावजूद महाराष्ट्र सरकार ने इस विधेयक को अध्यादेश के रूप में जारी कर के डा. दाभोलकर को अपनी सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित की है.

मराठी व अंगरेजी के सुप्रसिद्ध लेखक और उपन्यासकार किरण नगरकर ने डा. दाभोलकर के बारे में कहा, ‘‘दाभोलकर की हत्या हमारे समाज के ऊपर एक कलंक है. वे एक अदम्य साहसी व्यक्ति थे और उन्होंने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया. उन की लड़ाई सामाजिक व धार्मिक बुराइयों के खिलाफ थी और अपनी इस लड़ाई में वे हमेशा खतरों से खेलते रहे…’’

वर्तमान में हम अगर डा. दाभोलकर के सुझाए रास्ते पर चल कर समाज को अंधविश्वास और जादूटोने के कुचक्र से बाहर निकालने का प्रयत्न करें तो शायद उन की मौत सार्थक हो जाए.

संत के भेस में भूमाफिया

हरिद्वार में पंडेपुरोहित धर्म की आड़ ले कर ही सत्ता में बनाए अपने रसूख के चलते करोड़ों अरबों की जमीन कब्जाए बैठे हैं. दूसरों को त्यागी बनने और सुखों से वंचित रहने का उपदेश देने वाले इन फर्जी संतों का यह अवैध कारोबार देख कर तो यही लगता है कि यहां संत के भेस में भूमाफिया पल रहे हैं. पढि़ए नितिन सबरंगी की रिपोर्ट.

धार्मिक नगरी के रूप में मशहूर गंगा नदी के किनारे बसे हरिद्वार में धर्म के नाम पर साधुसंत महज धंधा ही नहीं करते बल्कि जमीनों पर अतिक्रमण व कब्जे का काम भी जम कर करते हैं. वे ऐसे दबंग भी नहीं कि हथियारों और लाठियों के बल पर जमीन कब्जाते हों. वे धर्म की आड़ ले कर भक्तों की ताकत व सत्ता में रसूख के बल पर ही अवैध काम करते हैं. गंगा के सीने में छेद कर के उस की सैकड़ों एकड़ जमीन को उन्होंने कब्जाया हुआ है. दूसरों को सांसारिक सुखों से दूर रहने की शिक्षा देने वाले खुद प्राकृतिक वातावरण व अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस हो कर जीवन का आनंद ले रहे हैं. नियमकायदों को सूली पर लटकाने के हुनर के ये बाजीगर भी हैं. सत्ताधारी नेता भी चूंकि संतों के दरबार में नतमस्तक होते हैं इसलिए सरकारी तंत्र बाबाओं के खिलाफ कार्यवाही की हिम्मत नहीं जुटा पाता. यदि कोई गुस्ताखी कर भी दे तो उसे सबक सिखाने का काम किया जाता है. धर्म के नाम पर ये दबंगई की ऐसी मिसाल कायम करते हैं कि हर कोई हैरान हो जाता है. उन की करतूतों को देख कर सोच का यह संतुलन भी अस्थिर हो जाता है कि ऐसे संतों को संत कहें या भूमाफिया?

कहते हैं संत वही जो परम सत्य को जान कर जनकल्याण करे, लेकिन कलियुग का सत्य यह है कि वे अब अपना मुनाफा पहले करते हैं. इस हकीकत से हम भी रूबरू हुए. धर्म के रथ पर सवार हो कर जमीनें कब्जाने, उन का व्यापार करने व गंगा की धारा को छेड़ने का कौशल देखने को मिला. गंगा किनारे बना है भव्य इमारत वाला परमार्थ आश्रम. इस आश्रम के अध्यक्ष हैं स्वामी चिन्मयानंद सरस्वतीजी महाराज. उन के सैकड़ों देशीविदेशी भक्त हैं. आश्रम स्वामी शुकदेवानंद ट्रस्ट द्वारा संचालित होता है. यों तो आश्रम के पास करोड़ों की वैध जमीन है जिस पर आश्रम भी बना है, लेकिन इतने से शायद काम नहीं चला.

गंगा की धार से जुड़ती सैकड़ों एकड़ रेतीली जमीन खाली पड़ी थी. पहले लोहे व कंकरीट से निर्मित पुलनुमा रास्ता आश्रम की तरफ से गंगा की धार तक बना कर अलग घाट बना दिया गया. इस स्थान का नामकरण कर के श्रीधर्म गंगाघाट नाम दे दिया गया. आश्रम के साथ ही आधुनिक सुविधाओं वाला एक निजी पक्का विश्राम स्थल भी बनाया गया जिस का नाम रख दिया गंगा धर्म कुटीर. यह पूरी की पूरी जमीन गंगा की है. जिस पर देखते ही देखते संत के भेस में भूमाफियाओं ने कब्जा कर लिया.

गंगा किनारे ऊंची बिल्डिंग के अलावा विदेशियों, पूंजीपतियों व वीआईपी भक्तों के ठहरने के लिए विदेशी अंदाज में कई आकर्षक कौटेज बना दिए गए. अच्छे किस्म के पेड़पौधे भी यहां लगाए गए. खेलनेकूदने व खुले में बैठने के लिए मैदान भी छोड़ा गया. यहां वीआईपी और विदेशी चेलेचपाटियां अकसर आ कर ठहरते हैं.

सामाजिक कार्यकर्ता जे पी बडोनी कहते हैं, ‘‘यही गंगा की दुहाई सब से ज्यादा देते हैं. धनाढ्य लोगों व विदेशियों को 6 हजार रुपए प्रतिदिन के हिसाब से कौटेज किराए पर दी जाती है.’’

यह स्थान आश्रम के बिलकुल पीछे की तरफ गंगा के तट पर है. प्राकृतिक माहौल के बीच यहां की भव्यता देखते ही बनती है. इस अवैध निर्माण की इजाजत सरकार से लेने की जरूरत शायद इसलिए नहीं समझी गई क्योंकि वह मिल ही नहीं सकती. फिर सभी इस मजबूत कलियुगी धारणा को जानते हैं कि कुछ भी करें, कोई देखने वाला नहीं है. देख भी लेगा तो कुछ कर नहीं पाएगा.

वहां कौन आताजाता है, इस का पता भी आश्रम के सिवा किसी सरकारी मशीनरी या बाहरी व्यक्ति को नहीं होता. गंगा के सीने पर अवैध जागीर के खुद को मालिक समझने वालों को झटका केदारनाथ में आई आपदा के बाद गंगा ने उफान पर आ कर दिया. गंगा का पानी अपनी असल जगह पर उफन कर आ गया और वहां रेत व सिल्ट आ कर जमा हो गई. खैर, अब दोबारा रेत व सिल्ट हटा कर कब्जा किए स्थान को सुंदर बना लिया जाएगा.

आश्रम के अंदर प्रवेश कर के कब्जाई जगह तक पहुंचना आसान नहीं है. चूंकि अब कुछ भक्त लोग वहां दबी अपनी कारों को निकालने की कोशिश कर रहे थे, इसलिए हम भी वहां पहुंच गए. लेकिन वहां के फोटो लेने में हम ने बहुत सावधानी बरती. हम ने स्वामीजी से उन का पक्ष जानने का प्रयास किया, लेकिन प्रशासनिक कार्यालय में बैठे उन के कारिंदों ने बताया कि वे आराम कर रहे हैं, समय लग जाएगा. हकीकत तो वे ही जानें, लेकिन आश्रम द्वारा गंगा पर पक्का निर्माण ध्वस्त हो कर जमीन कभी आश्रम के चंगुल से कब्जामुक्त हो पाएगी, इस की उम्मीद कम ही नजर आती है.

दबंग महंत का बोलबाला

धर्म की आड़ में और रसूख के बल पर कैसे गंगा की जमीन को कब्जाया जाता है, इस के हुनर की उपाधि हासिल की अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के महामंत्री महंत हरिगिरी ने. हरिगिरी अखाड़ा के संचालक भी हैं. अनगिनत भक्तों के साथ ही संत समाज के अन्य लोगों की भी उन पर आस्था है, लेकिन उन्होंने ऐसी करतूतों को अंजाम दिया जिन्होंने भूमाफियाओं को भी पीछे छोड़ दिया.

दरअसल, वर्ष 2010 में हरिद्वार में कुंभ मेले का आयोजन किया गया. ऐसे में धार्मिक गतिविधियों के मद्देनजर अन्य की तरह अस्थायी शिविर के रूप में हरिगिरी को भी गंगा के बिलकुल किनारे ललतारौ पुल के नजदीक धोबीघाट को हटा कर जगह दे दी गई. कुंभ का स्नान चलता रहा. करोड़ों की जगह मौके की थी, लिहाजा, हरिगिरी ने मजबूत डेरा जमाने की ठान ली. यहां मंदिर की आड़ में उन्होंने सैकड़ों वर्गमीटर में खुलेआम निर्माण शुरू कर दिया.

कुंभ मेले के बाद यों तो जगह को खाली किया जाना था लेकिन रसूख के चलते हरिगिरी ने अवैध रूप से अतिक्रमण कर के चारमंजिला आकर्षक आश्रम का निर्माण कर लिया. निर्माण के बीच चूंकि एक पीपल का पेड़ बाधा डाल रहा था, इसलिए उन्होंने उस की मजबूत शाखाओं को कटवा दिया. इतना ही नहीं, रसूख का इस्तेमाल कर के निर्माण में आड़े आ रही 11 हजार वोल्ट की विद्युतलाइन को भी हटवा कर गंगा के ऊपर से निकालने पर विभाग को मजबूर कर दिया. जो विभाग एक तार तक बदलने में लोगों को रुला देता हो, उस ने खंबे लगा कर महंत की इच्छानुसार लाइन खींच दी. बिना सांठगांठ और दबाव के यह संभव नहीं दिखता. धोबी का काम करने वाले रामलाल सवाल उठाते हैं कि अब यदि बिजली का तार टूट गया तो पता नहीं पानी में करंट फैलने से कितने लोग मरेंगे.

एक आरटीआई कार्यकर्ता जे पी बडोनी ने इस पर सवाल उठाते हुए शिकायत की. शिकायत के संदर्भ में जिलाधिकारी सचिन कुर्वे ने कार्यवाही करने की ठानी तो उन्हें भारी दबाव का सामना करना पड़ा क्योंकि वह एक बड़े महंत के खिलाफ कार्यवाही करने की हिम्मत जुटा रहे थे. दबाव को दरकिनार कर जांच हुई तो जालसाजी से परदा उठ गया.

जांच में पता चला कि जमीन को पूरी तरह कब्जाने के लिए हरिगिरी ने मजबूत हथकंडा अपनाया. उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश के बीच परिसंपत्तियों का विवाद था. इस का हरिगिरी ने फायदा उठाया. जहां निर्माण हुआ, गंगा की वह जमीन सिंचाई विभाग के अधीन आती थी. इस जमीन को एक स्थानीय नेता व पत्रकार के साथ मिल कर अपने नाम करा लिया गया. अरबों की इस भूमि पर आश्रम के अलावा अपार्टमैंट बना कर बेचने की योजना थी. इस बीच अदालत का एक आदेश आया जिस में गंगा किनारे 200 मीटर की परिधि में बने अवैध निर्माणों को गिराने की बात की गई.

जांच में जालसाजी का पूरा खेल खुल गया. इस के बाद तहसील प्रशासन की तरफ से हरिगिरी, पत्रकार गोपाल रावत व नेता पारस कुमार जैन के खिलाफ हरिद्वार कोतवाली में धारा-420 व 120 के तहत धोखाधड़ी व आपराधिक षड्यंत्र रचने का मुकदमा दर्ज करा दिया गया. चारमंजिला अवैध भव्य आश्रम को भी भारी विरोध के बीच जेसीबी मशीनें लगा कर ध्वस्त करा दिया गया. प्रशासन के सख्त रुख के सामने हरिगिरी को मजबूरन अपना बिस्तर समेटना पड़ा.

जिलाधिकारी ने अपने दायित्व का सही निर्वहन किया. अवैध निर्माण को ध्वस्त करने के दौरान आश्रम में रखी मूर्तियों को हटा दिया गया, लेकिन संत समाज के लोगों ने इसे हिंदू धर्म पर प्रहार बता कर कड़ा विरोध किया और धार्मिक रंग दे कर मूर्तियां खंडित करने का आरोप लगाया. सरकार में शिकायत भी की. कहा जाता है कि राजनीति में हरिगिरी की पकड़ ही ऐसी थी कि कुछ समय बाद ही जिलाधिकारी को पद से हटा दिया गया. इस के बाद हौसले इतने बुलंद हुए कि पुलिस नामजद आरोपियों में से किसी को गिरफ्तार करने की हिम्मत भी नहीं जुटा सकी. तोड़े गए अवैध निर्माण का मलबा आज भी मौके पर पड़ा है, लेकिन तबादलों के डर से अधिकारी अब मलबा हटाने की हिम्मत भी नहीं कर पा रहे हैं.

इस मामले में हटाए गए जिलाधिकारी सचिन कुर्वे कहते हैं, ‘‘हम ने सरकारी काम ही किया. आश्रम को अवैध रूप से बनाया गया था. मूर्तियों पर बेवजह बवाल हुआ. उन्हें हम ने पहले ही सुरक्षित निकलवा लिया था.’’ क्या उन्हें महंत के आश्रम के खिलाफ कार्यवाही करने की सजा तबादले के रूप में मिली, इस सवाल पर वे कुछ भी बोलने से इनकार कर गए.

सरकारी जमीनों की लूट

गंगा तटों के अलावा सिंचाई व वन विभाग की जमीनों पर कब्जे के मामले में महत्त्वाकांक्षी साधु, महंतों, संतों, बाबाओं ने ऊंचा दरजा हासिल किया हुआ है. बाबागीरी की आड़ में करोड़ों का यह व्यापार खुलेआम होता है. शहर व उस के आसपास 4 हजार से ज्यादा आश्रम, मठ, अखाड़े व धर्मशालाएं हैं. हरिद्वार की अरबों की सरकारी जमीनों पर अतिक्रमण व कब्जे करने के लिए ऐसे लोग तथाकथित भगवान का सहारा सब से पहले लेते हैं. यह उन की मजबूरी और जरूरत दोनों हैं. ‘राम नाम जपना, पराया माल अपना’ की तर्ज पर वे पहले मंदिर बनाते हैं और फिर धार्मिक संस्था, आश्रम व मठ के रूप में कब्जा कर लेते हैं. एक बार मंदिर बनाते ही मामला धार्मिक हो जाता है. दर्जनों कब्जे हटवाने की हिम्मत प्रशासन नहीं कर पाता क्योंकि धार्मिक आस्था पर चोट करने की बात प्रचारित की जाती है.

हर की पौड़ी के अलावा बैरागी कैंप, गिरलाघाट, चंडीघाट, लालजी वाला व भैरोंघाट इलाके में भी दर्जनों अवैध कब्जे हैं. रोचक बात यह भी है कि कई बाबाओं ने आश्रमों के नाम पर कब्जे कर के जमीनें लोगों को बेच दीं. वे आश्रमों, धर्मशालाओं में फाइवस्टार सुविधाएं दे कर अपार्टमैंट बना कर बेचते हैं. कोई बाबा यहां आश्रम बना कर रह रहा है तो कोई मंदिर बना कर धर्म की दुकान चला रहा है. निजी भक्तों की फौज के अलावा इन बाबाओं के पास अन्य प्रदेशों से लाखों लोग गंगा स्नान, दान व मंदिरों में माथा टेक कर पुण्य कमाने के लिए आते हैं. ये बाबाओं के जीवन संचालन के प्रमुख स्रोत होते हैं.

सरकारी जमीनों की लूट का ऐसा दृश्य शायद ही कहीं देखने को मिले. ऐसे स्थानों पर फोटो खींचने पर बाबा लोग व उन के भक्त कड़ा ऐतराज करते हैं और कुपित निगाहों से देखते हैं. गंगा के किनारों पर उस जगह को भी नहीं बख्शा जा रहा जहां गंगा बहती है. गंगा में जल कम हो कर धार पीछे गई नहीं कि हो गया कब्जा. कुंभ मेले के बाद कब्जे और भी बढ़ गए. सिंचाई विभाग व प्रशासन गेंद एकदूसरे के पाले में डालते हैं. सिंचाई विभाग ने कब्जाधारियों की सूची बना कर प्रशासन को दी जो धूल फांक रही है.

सरकारी विभाग कुछ मामलों में कब्जा हटवाने के बजाय सांठगांठ कर के उसे बढ़ावा देने का काम करते हैं. फर्क करना मुश्किल है कि यह उन की मजबूरी है या काम के प्रति ईमानदारी? इतना तय है कि यदि निष्पक्षता से उच्चस्तरीय जांच कराई जाए तो कई चेहरों से नकाब उतर जाएगा.

नेता सब नतमस्तक

हरिद्वार के संतमहात्मा राजनीति में गहरी पकड़ रखते हैं. मुख्यमंत्री, राज्यपाल व अन्य सत्ता के ओहदेदार बड़े संतों के भक्तों की श्रेणी में आते हैं. संतों, राजनीति व प्रशासन का गहरा गठजोड़ है. वीआईपी जब आश्रमों में आते हैं, तो व्यवस्था बनाने में लगने वाले सरकारी कारिंदों को संतों की ताकत का एहसास हो जाता है. एक स्थानीय कहावत भी बन गई कि ‘नेता आ कर पैर छूते हैं इसलिए संतों पर कोई नियम लागू नहीं होता.’ जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद का ओहदा वैसे तो बहुत ऊंचा है लेकिन अपने आश्रम में वे अवैध निर्माण करने के आरोपी हैं. क्या उन्हें ऐसा करना चाहिए? इस का जवाब तो एक सड़कछाप साधु ज्ञानचंद भी न के रूप में ही देता है. इस के अलावा संत आसाराम बापू के हरिपुर कला स्थित आश्रम को भी अवैध निर्माण का नोटिस जारी किया गया है. उन की तरह 40 से ज्यादा ऐसे संत हैं जिन्होंने अवैध निर्माण किए हैं.

ऐसे निर्माणों को रोकने की जिम्मेदारी हरिद्वार विकास प्राधिकरण की है. वह कार्यवाही क्यों नहीं करता, इस का जवाब जानने के लिए जब प्राधिकरण के उपाध्यक्ष रंजीत कुमार से संपर्क किया, तो उन्होंने यह कह कर बात खत्म कर दी कि ‘हम ने पिछले दिनों ऐसे लोगों को नोटिस दिए हैं.’ स्थानीय लोगों की मानें तो इस से ज्यादा कोई विभाग कुछ कर भी नहीं सकता. महंत हरिगिरी के अवैध आश्रम को गिराए जाने के बाद खुद राज्यपाल अजीज कुरैशी एक आयोजन में उसी स्थान पर आए. स्थानीय प्रशासन ने खुफिया रिपोर्ट के आधार पर उन्हें न आने की सलाह दी, लेकिन वे महंत हरिगिरी के पास फिर भी आए. यह बयान दे कर भी उन्होंने महंत के रसूख को दर्शा दिया कि उन्हें प्रशासन ने आने से मना किया था, लेकिन वे फिर भी आए.

कब्जेधारी बेफिक्र भी इसलिए रहते हैं कि उन के रिश्ते सीधे बड़े नेताओं से होते हैं. उन्हें यह गुमान है कि उन का कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता. नियम आम आदमी के लिए होते हैं उन के लिए नहीं. प्रभाव को और भी ज्यादा कायम करने के लिए वे आयोजनों में नेताओं को बुलवाते हैं. लिहाजा, अधिकारियों को हाथ बांध कर नौकरी करना मजबूरी है. ऐसे में कोई सरकारी कारिंदा संतों के अवैध निर्माण और उन की मनमानी पर कार्यवाही करना तो दूर, इस बारे में सोचना भी उचित नहीं समझता. धारणा यही कि छोटा कदम उठाने पर भी वे उलटा झमेले में फंस जाएंगे.

जमीनों को ले कर हत्याएं

संत समाज भक्तों को अहिंसा का पाठ तो पढ़ाता है जबकि जमीनों, आश्रमों में होने वाली बंदरबांट, कब्जों और करोड़ों के गैरकानूनी व्यापार के लिए ही संत व बाबा लोग हिंसा का शिकार हो जाते हैं. लड़ाई सड़कों पर आने के अलावा हत्याएं तक हो जाती हैं. हत्याओं के मुकदमे भी दर्ज होते हैं. लेकिन मामले चूंकि रहस्यमयी होते हैं इसलिए कातिल पकड़ में नहीं आते. अकेले हरिद्वार में ही महज 3 सालों में 20 से ज्यादा संतों, बाबाओं की हत्याएं कर दी गईं. हत्याओं के ऐसे मामलों में कोई गिरफ्तार नहीं हुआ. मामले करोड़ों की प्रौपटी से जुड़े होते हैं. महंत बाल स्वामी, योगानंद महाराज, गोवर्धन दास व प्रेमानंद को गोलियों का शिकार बनाया गया. 1 साल पहले महानिर्वाणी अखाड़े के महंत सुधीर गिरी की अज्ञात हमलावरों ने उस वक्त ताबड़तोड़ गोलियां बरसा कर हत्या कर दी जब वे कार से अपने आश्रम जा रहे थे. इस में कोई धार्मिक दुश्मनी न हो कर माया का चक्कर था. कहा जाता है कि वे कुछ संतों, भूमाफियाओं की पोल खोलने वाले थे. कह सकते हैं कि जमीनों का प्रलोभन संतों की जान पर खतरा बन कर मंडरा रहा है. जमीन से जुड़े कई मामलों में साधुमहंतों को अपनी जान गंवानी पड़ी है.

ज्यादा चेले तो बड़ा बाबा

हरिद्वार में मुख्य मार्ग से ले कर अंदर तक दर्जनों होर्डिंग्स ऐसे मिलते हैं जिन पर कार्यक्रमों का ब्योरा दर्ज होता है. सत्संग समागम होते तो धर्म के नाम पर हैं, लेकिन नेताओं की रैली से कम भी नहीं होते जिन में वे ज्यादा से ज्यादा भीड़ जुटा कर दूसरे को अपनी ताकत का एहसास कराते हैं. विधानसभा व संसद सत्र की तरह यहां भी सत्संग सत्र चलते हैं जिस में हजारों भक्त आते हैं. संतों की संख्या भी ज्यादा होती है और भक्तों की भी.

आसाराम बापू के होर्डिंग्स कई स्थानोें पर लगे हम ने देखे. बाबा मुसकान के साथ विभिन्न वेशभूषा में थे. ऐसे ही माध्यम अपनाकर भीड़ को लुभाया जाता है. पिछले कुछ समय से यौन शोषण के आरोपों के चलते जेल की हवा खा रहे आसाराम की अकूत संपत्ति देशभर में फैली है. आलम यह है कि प्रवचन के बहाने जहां भी पहुंचे वहीं जमीन हड़प ली. पिछले 20 सालों में इसी तरह आसाराम डेढ़ हजार करोड़ से ज्यादा कीमत की जमीनों के मालिक बन बैठे हैं.

एक अनुमान के मुताबिक आसाराम 223 एकड़ जमीन के खुद मालिक हैं और कुछ जमीन उन के ट्रस्ट और करीबी रिश्तेदारों के नाम पर खरीदी गई है. इतना ही नहीं, करीब 588 एकड़ जमीन पर उन का कब्जा है. उन के 400 से ज्यादा आश्रम हैं, जो ज्यादातर विवादों में हैं. कुल मिला कर आसाराम को अगर संत की शक्ल में भूमाफिया कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी.

पुलिस प्रशासन सुरक्षा व्यवस्था तो देखता है, लेकिन कोई दखल देने का अधिकार उसे नहीं होता. बाबाओं के ऐसे सत्संग से लाखोंकरोड़ों की कमाई होती है. अब यदि भक्तों के साथ कोई हादसा हो जाए, उस की जिम्मेदारी उन की नहीं होती. सोच लीजिए, ईश्वर को यही मंजूर था. सत्संग खत्म होने पर गंदगी व कचरा समेटने का काम नगर निगम का रह जाता है. कहते हैं कि किसी बाबा की ताकत का अंदाजा उस के भक्तों की संख्या को देख कर लगाया जाता है. नेता भी रैली में ज्यादा से ज्यादा भीड़ जुटा कर अपनी ताकत का एहसास कराते हैं. अधिकांश बाबा अपने विदेशी भक्तों की संख्या पर ज्यादा गर्व करते हैं. साल में वे वहां घूमने भी जाते हैं. दिल्ली के रामलीला मैदान में हुए लाठीचार्ज के बाद बाबा रामदेव हमेशा चिल्लाते हैं कि देश की 120 करोड़ जनता उन के साथ है, लेकिन कोई उन से यह पूछे कि बाकी के पास क्या है? बाबाओं की लीला को उन के भक्त धर्म के परदे से ज्यादा जानना भी नहीं चाहते.

लाशों पर लूटपाट

केदारनाथ में आई भयानक आपदा में संन्यास के नाम पर पहाड़ों पर पड़े साधुसंन्यासियों ने अपना असली चेहरा दिखाया. ऐसे पाखंडियों ने आपदा आने के बाद मरे हुए लोगों की जेबों से नकदी समेटने के साथ ही उन के द्वारा पहने गए आभूषण भी लूट लिए. दरअसल, जब मिलिट्री के जवान हैलिकौप्टर के जरिए लोगों को बचा रहे थे, कई साधु भारी बैगों के साथ उस में चढ़ने लगे. वजन की वजह से सैनिकों ने सामान रखने से मना किया लेकिन वे नहीं माने तो शक होने पर तलाशी ली गई. गेरुआ वस्त्रधारियों की हकीकत जान कर सैनिक भी शर्मसार हो गए. उन के पास से सवा करोड़ रुपए की नकदी और काफी आभूषण बरामद हुए. उन सभी को पुलिस के हवाले कर दिया गया. उन्होंने ये सब भक्तों के अलावा बैंक के लौकरों से निकाला था. भयंकर तबाही के बाद वहां लाशों के बीच साधुवेशधारी लूट की फिराक में भटक रहे थे.  

नौनिहालों के लिए निवेश में न करें देरी

अपने बढ़ते नौनिहालों को महंगी शिक्षा देने व उन्हें नंबर वन पर रखने का हर मातापिता का सपना होता है. लेकिन महंगाई का मुकाबला करते हुए इस सपने को पूरा करने के लिए पैसों का सही समय पर व सही जगह निवेश कैसे करें, बता रहे हैं अमरीश सिन्हा.

भारत में बच्चों को केंद्र में रख कर निवेश करने की परंपरा नहीं रही है. जब से देश और दुनिया में उदारीकरण व बाजारवाद ने दस्तक दी तब से शिक्षा, पैसा व कैरियर अधिक महत्त्वपूर्ण होते गए. यही वजह है कि 20वीं सदी तक तो ऐसी गिनीचुनी निवेश योजनाएं ही देश में उपलब्ध थीं जो विशेषकर बच्चों के लिए हों. इन के बारे में भी शहरी निवेशकों या किसी दूसरे प्रकार के बीमा लेने वालों को ही पता होता था.

चाइल्ड इंश्योरैंस प्लान के अधिकतर ग्राहक वे ही होते थे जो या तो स्वयं बीमा कंपनी में कार्यरत थे या उन के मित्र व रिश्तेदार होते थे. बच्चों के भविष्य की निवेश योजनाएं बहुत ही ‘लो प्रोफाइल’ यानी कम लोगों के बीच प्रसारित होती थीं. वे तो गनीमत रहे 20वीं सदी के समापन के वर्ष और 21वीं सदी के शुरुआती साल जब उदारवाद की कोख से कई सारे घटनाक्रमों ने जन्म लिया. उन में से एक यह था कि लोगों में अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए निवेश करने की जागरूकता पनपी.

अश्विनी गरोडि़या तभी तो अपने इकलौते पुत्र को आईआईएम अहमदाबाद में प्रवेश दिलाने के वास्ते जीजान से जुटे हैं. बेटा होशियार भी है. उस का दाखिला एक नामीगिरामी कोचिंग संस्था में भी कराया गया है. अश्विनी वहां की फीस और फिर मैनेजमैंट में चयन के बाद पूरे 3 साल के आवासीय शिक्षण शुल्क आदि को मिला कर करीब 20 लाख रुपए जुटा चुके हैं.

मुकुंद गाडगिल का लड़का अतुल इसी साल साइंस इंस्टीट्यूट, भोपाल में चुना गया है जहां सभी छात्रों को सरकार की तरफ से 5 हजार रुपए माहवार छात्रवृत्ति मिलती है. वे काफी खुश हैं क्योंकि बतौर फीस मोटी रकम जुटा पाना उन के लिए मुमकिन नहीं था. दरअसल, पिछली सदी तक 1 बच्चे की पढ़ाई में मामूली रकम (कुछ विशेष विषयों की पढ़ाई को छोड़ कर) खर्च होती थी और वह नौकरी भी पा जाता था. लेकिन अब प्रतिस्पर्धी माहौल में पढ़ाई आसान नहीं रह गई है. महत्त्वाकांक्षाएं दिनबदिन बलवती हो रही हैं. हालांकि औरों को पीछे छोड़ आगे बढ़ने के मार्ग में कई निजी व सामाजिक खतरे भी हैं लेकिन उन्हें एक ओर रखते हुए सिर्फ आर्थिक पहलू पर गौर करें तो यह कहा जाना जरूरी है कि बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए अभिभावकों को आर्थिक तौर पर सबल बनना होगा.

बच्चों के भविष्य उन के अध्ययन के कोर्स, डिग्री, इंस्टीट्यूट आदि पर निर्भर होते हैं. ये सभी उच्च कोटि के हों, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप का बच्चा कितना होशियार है व आप श्रेष्ठ संस्थाओं में उस के अध्ययन का खर्च उठा पाने में सक्षम हैं या नहीं. शायद यही वजह है कि कई अभिभावक अपने बच्चों की बेहतर पढ़ाई हेतु बजट बनाने व पैसों का जुगाड़ करने को अपने जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा समझते हैं. हो भी क्यों न, राजेश सिन्हा अपने पुत्र को एमबीए में दाखिला दिलाना चाहते हैं. पर जिस किसी नामी संस्थान से संपर्क करते हैं, उन्हें पढ़ाई का कुल खर्च 12-13 लाख के आसपास बताया जाता है. वे अपने पुत्र निशांत को आईआईएम अहमदाबाद या एसएलआरआई जमशेदपुर के लिए तैयार कर रहे हैं.

चाइल्ड इंश्योरैंस प्लान

चाइल्ड इंश्योरैंस योजना की खासीयत यह होती है कि यदि बच्चे के एक निश्चित आयु तक पहुंचने से पहले ही बीमाधारक की मृत्यु हो जाती है तो भी बीमा अपनी मैच्योरिटी तिथि तक जारी रहता है जबकि उस के बाद सारे प्रीमियम माफ हो जाते हैं. प्रीमियम बीमा कंपनी द्वारा खुद भरे जाते हैं. पौलिसी के मैच्योर होने पर सारे लाभ आप के बच्चे को पूर्ववत मिलेंगे.

दरअसल, यह पौलिसी काफी उपयोगी है व सभी बीमा कंपनियों के पास ऐसी पौलिसी उपलब्ध है. अमूमन यह पौलिसी 2 तरह की होती है. पहली पौलिसी मार्केट से जुड़ी होती है यानी इस में अदा किया जाने वाला प्रीमियम ‘इक्विटी’ और ‘डेट’ दोनों में निवेश किया जाता है जबकि दूसरी पौलिसी पारंपरिक होती है. इस में निवेश सिर्फ ‘डेट’ में होता है. दोनों में से कौन सा विकल्प आप को पसंद है. इस का चुनाव बीमा लेते वक्त आप को करना होता है. जहां पहले विकल्प में ‘जोखिम’ अधिक होने की वजह से मैच्योरिटी पर मिलने वाली रकम अधिक हो सकती है, वहीं दूसरा विकल्प ‘रिस्क फ्री’ होता है. पर इस में ‘मैच्योरिटी वैल्यू’ अपेक्षाकृत कम हो सकती है.

निवेश की शुरुआत

बच्चा जन्म ले, तभी से उस के लिए निवेश के रास्ते तय करने शुरू कर देने चाहिए. अधिकतर मांबाप अपने बच्चों के नाम लंबी अवधि के लिए फिक्स्ड डिपौजिट या आरडी (रेकरिंग डिपौजिट) अकाउंट खुलवाते हैं लेकिन ये नाकाफी होते हैं. कारण, एक तो ये मुद्रास्फीति को मात नहीं दे पाते, दूसरा, लंबी अवधि के एफडी में आप की रकम लंबे समय के लिए ब्लौक हो जाती है. ये रकम मैच्योरिटी पर अमूमन उतनी भी नहीं होती कि मौजूदा मार्केट दर पर आप बच्चों की महंगी पढ़ाई का खर्च वहन कर सकें.

समझदारी इस में है कि अपने नौनिहालों के लिए निवेश के विभिन्न ‘सेगमैंट’ तय कर लिए जाएं. यह सेगमैंट निर्धारण आप के लक्ष्य के मुताबिक हो. मसलन, लड़के या लड़की के विवाह का खर्च, विवाह की अनुमानित आयु, पढ़ाई पर होने वाला अनुमानित व्यय आदि. अब इन लक्ष्यों के मुताबिक अपनी वर्तमान आय व भविष्य की आय को ध्यान में रख कर निवेश करें. निवेश के कई सेगमैंट हो सकते हैं, जैसे चाइल्ड इंश्योरैंस प्लान, रियल एस्टेट या चुनिंदा कंपनियों के शेयरों में निवेश, पीपीएफ खाते में निवेश. पीपीएफ में माहवार जमा की जाने वाली रकम 15 वर्षों बाद बड़ी रकम में तबदील हो जाती है. रिटर्न का गोल्ड ईटीएफ भी अच्छा विकल्प है.

मुंबई के चेंबूर इलाके में रहने वाले हरीश रावजियानी शेयरों में निवेश के जरिए न सिर्फ अपनी दोनों संतानों (एक पुत्र व एक पुत्री) को अच्छी शिक्षा दिला सके, बल्कि आज दोनों संतानें बहुराष्ट्रीय कंपनियों में ऊंचे ओहदों पर कार्यरत हैं. चाइल्ड इंश्योरैंस प्लान ‘टर्म प्लान’ भी हो सकता है. ये प्लान एक से अधिक भी लिए जा सकते हैं. रियल एस्टेट में निवेश में रिटर्न 20-25 फीसदी सालाना हो सकता है. यह निवेश मुद्रास्फीति को तेजी से मात देता है पर पूंजी अधिक निवेश करनी पड़ती है.

चुनिंदा स्टौक में निवेश से लंबी अवधि में अच्छा रिटर्न मिलता है. कुछ स्टौक लंबी अवधि के लिए काफी फायदेमंद माने जाते हैं, जैसे एसबीआई, एलएंडटी, नेसले, ब्रिटानिया, कोलगेट, कैस्ट्रोल, केडिला हैल्थकेयर, डाबर, कोल इंडिया आदि. ‘सिप’ के जरिए श्रेष्ठ म्युचुअल फंड में निवेश 15 वर्षों में औसतन आप की रकम में 400 फीसदी इजाफा कर सकते हैं. वास्तविक सोने या गोल्ड ईटीएफ में निवेश भी अच्छा है. औसतन 18-20 फीसदी का रिटर्न देने वाला यह निवेश महंगाई की मार से आप को बचाता है और आप की पूंजी को सुरक्षित भी रखता है.

बहरहाल, जहां चाइल्ड प्लान में 10 हजार रुपए प्रति माह की बचत पर आप को 15 साल में करीब 61 लाख रुपए मिलेंगे, वहीं ऊपर दर्शाए गए निवेश के अलगअलग सेगमैंट के अनुसार इसी अवधि में लगभग 1 करोड़ 15 लाख का रिटर्न प्राप्त हो सकता है. चूंकि मुद्रास्फीति की दर भी औसतन 8 फीसदी रहती है, इसलिए महंगाई का मुकाबला करते हुए अपने बढ़ते नौनिहालों को महंगी शिक्षा देने और उन्हें ‘नंबर वन’ पर रखने के लिए निवेश करने में समझदारी ही नहीं बल्कि तत्परता भी दिखानी होगी यानी चाइल्ड इंश्योरैंस प्लान भी लें और मार्केट में सूझबूझ से पैसे भी लगाएं.

हर कोई चाहे गांधी टोपी

भेदभाव के खिलाफ महात्मा गांधी द्वारा धारण की गई टोपी को वोट के खेल में खूब भुनाया जाता है. कभी देशभक्ति का प्रतीक समझी जाने वाली यह टोपी फिल्मों में विलेन के सिर तक जा पहुंची और कभी रैंप पर. आजकल लोग टोपी के जरिए अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा भी पूरी करने में लगे हैं.

भारतीय राजनीति और आंदोलन का एक महत्त्वपूर्ण अंग है गांधी टोपी. स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह टोपी लोकप्रिय हुई और देशभक्ति का एक प्रतीक चिह्न बन गई. बाद में यह कांगे्रसी विचारधारा के साथ जुड़ गई. फिर इस की लोकप्रियता का ज्वार ऐसा उतरा कि एक समय ऐसा आया, जब हिंदी सिनेमा में राजनीतिक विलेन को गांधी टोपीधारी दिखाया जाने लगा. यह कह सकते हैं कि फिल्मों ने गांधी टोपी को एक बड़े हद तक बदनाम ही किया है.

आजादी के 66 साल के बाद अब समाजसेवी अन्ना हजारे की अगुआई में अगस्त 2011 को आम जनता ने इस टोपी पर अपनी आस्था जताई. बड़े पैमाने पर भारत के विभिन्न शहरों में गांधी टोपी पहन कर देश का आम आदमी सड़क पर उतरा और ‘मैं अन्ना हूं’ का उद्घोष करते हुए भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में शामिल हुआ. तब यह अन्ना टोपी गांधी टोपी के समानांतर खड़ी हो गई.

गौरतलब है कि गांधी के नाम से जुड़ी यह विशिष्ट टोपी भारत के कुछ राज्यों की वेशभूषा का एक अहम हिस्सा रही है. खासतौर पर गुजरात और महाराष्ट्र के दूरदराज के गांवों में तो यह आज भी पहनी जाती है. लेकिन भारत के राजनीतिक इतिहास की बात की जाए तो वकालत की पढ़ाई के लिए दक्षिण अफ्रीका गए महात्मा गांधी ने पहली बार इसे वहीं धारण किया था. वहीं उन्होंने भारतीयों के प्रति बरते जाने वाले भेदभाव के विरोध में सत्याग्रह कर अपनी गिरफ्तारी दी थी. लेकिन वहां जेल में भी उन्होंने पाया कि भारतीय कैदियों के साथ भेदभाव के तहत इस तरह की टोपी को पहनना अनिवार्य था. इस अपमानजनक नियम की याद को ताजा रखने के मकसद से गांधीजी ने इस टोपी को धारण किया. तब से इस विशिष्ट टोपी को गांधी टोपी कहा  जाने लगा.

गांधीजी के भारत लौटने के बाद देशभक्ति के जज्बे के साथ गांधी टोपी आजादी के लिए संघर्ष का एक प्रतीक बन गई. सत्याग्रहियों, खासतौर पर कांगे्रसी स्वयंसेवकों ने इसे गांधी के नाम से जोड़ा. इस के बाद तो गांधी टोपी ठेठ कांगे्रसी पहनावे का हिस्सा बन गई. आजादी मिलने के बाद इस टोपी का चलन धीरेधीरे कम होता चला गया. हालांकि नारायण दत्त तिवारी जैसे कुछ कांगे्रसी इसे धारण करते रहे.

फिल्मों में गांधी टोपी

हिंदी फिल्मों में भी गांधी टोपी का बखूबी इस्तेमाल हुआ है. लेकिन छठे दशक की शुरुआत में के एन सिंह, जीवन, प्रेम चोपड़ा और प्राण सरीखे खलनायक ऐयाश किस्म के स्मगलर आदि होते थे. इन की खलनायकी हीरो से बदला लेने के लिए उस के परिवार समेत हीरोइन को उठवा लेने या हीरोइन व हीरो की बहन का रेप करने तक सीमित थी. इस दौरान की फिल्मों में हीरो के साथ खलनायक का आमनासामना, एकाध वाक्युद्ध (डायलौगबाजी) और फिर मल्लयुद्ध (डिशुंम-डिशुंम) के जरिए बदी पर नेकी की जीत से फिल्म का अंत हुआ करता था.

कुल मिला कर फिल्में सामाजिक और घरेलू ड्रामा से भरपूर, लेकिन राजनीति से कोसों दूर थीं. लेकिन बाद में देशभक्ति के दम पर बौक्स औफिस पर धूम मचाने का चलन आया. इस की सब से अच्छी मिसाल पेश की मनोज कुमार ने. देश भक्ति और सैक्स परोस कर उपकार, रोटी कपड़ा और मकान, पूरबपश्चिम, क्रांति जैसी कई हिट फिल्में दीं.

‘अपना देश’, ‘रोटी’ जैसी फिल्मों के बल पर राजेश खन्ना ने कुछ ज्वलंत मुद्दों को उठा कर अपनी छवि को खूब चमकाया. पर एंग्री यंगमैन की छवि वाले अमिताभ बच्चन के साथ फिल्मों में राजनीति का प्रवेश हुआ और जल्द ही लोकप्रिय व व्यावसायिक फिल्म की सफलता के लिए राजनीति हुकुम का इक्का बन गई.

भारतीय फिल्मों में अदालत के दृश्यों में जिस तरह महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी की तसवीरें हम देखा करते हैं उसी तरह फिल्मों का एक ऐसा भी दौर आया जब खलनायकों को कांगे्रसी पहनावे में पेश किया गया. उन के पीछे महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी की तसवीर दिखा कर उन्हें कांगे्रसी नेता के रूप में प्रोजैक्ट किया गया. वहीं, इन फिल्मों में लाल ?ांडे को बौद्धिक विचारधारा के रूप में बड़े सम्मान के साथ दिखाया जाता रहा है.

ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि हिंदी व भारतीय फिल्मों में खलनायक को हमेशा कांगे्रसी क्यों दिखाया जाता है? गौतम घोष की फिल्म ‘पतंग’ में खलनायक को कांगे्रसी नेता के रूप में प्रोजैक्ट किया गया था.

2 वर्ष पूर्व 72 वर्षीय अन्ना हजारे की अगुआई में पूरा भारत भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में सड़क पर उतर आया. देशभर से लोग इस टोपी को सिर पर धारण कर भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम से जुड़ गए. स्वतंत्रता संग्राम के बाद तब पहली बार बड़े पैमाने पर गांधी टोपी का उपयोग दिखा. समाजसेवी अन्ना हजारे की तुलना महात्मा गांधी से की जाने लगी और उन्हें दूसरे गांधी के रूप में देखा जाने लगा. साथ ही इस टोपी का नाम अन्ना टोपी हो गया.

अब टीम अन्ना बंट चुकी है. अन्ना हजारे के प्रमुख सहायक अरविंद केजरीवाल राजनीतिक पार्टी बना कर चुनावी मैदान में उतर चुके हैं. अन्ना हजारे से अलग हो जाने के बाद भी अरविंद केजरीवाल से इस टोपी का मोह नहीं छूट पाया. टीम अरविंद ने पहले ‘मैं अरविंद हूं’ कह कर इस टोपी को अरविंद टोपी नाम देने की कोशिश की लेकिन विभिन्न तबकों की समालोचना के बाद ‘मैं आम आदमी हूं’ कह कर इसे आम आदमी का प्रतिनिधित्व प्रदान करने का प्रयास किया गया.

गांधी टोपी और खद्दर भारतीय राजनीति के अहम अंग रहे हैं. इसीलिए इन का बहुत इस्तेमाल भी हुआ है. यही वजह है कि भारत का आम आदमी आज भी इस के मोह से दूर नहीं हो पाया है.

हर दौर में सियासतदां, फिल्म और फैशन जगत ने गांधी टोपी का अपनेअपने तरीके से इस्तेमाल किया है. किसी ने विलेन के बहाने अभिनेताओं को गांधी टोपी पहनाई तो किसी ने अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा पूरी करने के लिए खुद टोपी पहन ली. इन सब के अपने हितों के बीच हमेशा जनता को टोपी पहनाने का सिलसिला आज भी जारी है.

डैटसन गो

विभिन्न कंपनियों के भिन्नभिन्न मौडल्स की कारों की मौजूदगी के बीच विदेशी कंपनी निसान अपने एक पुराने मौडल को भारतीय रंगढंग दे कर बाजार में पेश करने जा रही है. ‘डैटसन गो’ नाम से आने वाली इस कार के बारे में जानते हैं कुछ विशेष :

जानीमानी कार निर्माता कंपनी निसान एक ऐसे मौडल को पेश करने जा रही है जिसे उस ने लगभग 27 वर्ष पहले बनाना बंद कर दिया था. उस मौडल की उस वक्त अमेरिका में धूम मची थी. जी हां, हम बात कर रहे हैं डैटसन गो की, जिसे भारत, इंडोनेशिया, रूस, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील के बाजारों के लिए नया रूप दिया जा रहा है. डैटसन गो नाम से कार का यह मौडल अगले साल मार्चअप्रैल में सड़कों पर दौड़ता देखा जा सकता है.

कार को मारुती के अल्टो, ऐ-स्टार व एस्टिलो, शेवरले की स्पार्क और हुंडई की सैंट्रो, आई 10 से मुकाबले के लिए बाजार में उतारा जा रहा है. डैटगो में निसान के एक अन्य मौडल माइक्रा की अनेक खूबियां होंगी. मजे की बात यह है कि डैटसन का डैटगो मौडल करीब एक सदी पहले 1914 में भी अमेरिका में खासा मशहूर था. नया मौडल ह्वीलबेस अल्टो के मुकाबले ज्यादा चौड़ा होगा. चौड़ाई और ऊंचाई माइक्रा से कुछ कम होगी पर लंबाई इस से 5 मिमी ज्यादा रखी गई है. कार के बाहरी डिजाइन को सुंदर व आकर्षक बनाया गया है. कुल मिला कर यह कार छोटे परिवार की जरूरतों के अनुरूप होगी. कार में सुरक्षा मानकों का भी पूरापूरा खयाल रखा गया है.

कार की अंदरूनी साजसज्जा की बात करें तो इस में ड्राइवर समेत 5 लोग आसानी से बैठ सकते हैं. गियर और हैंडब्रेक को डैशबोर्ड के साथ फिट किया गया है ताकि गियर बदलते समय ड्राइवर का ध्यान न भटके. आगे की सीट के साथ पर्याप्त जगह रखी गई है ताकि छोटामोटा सामान रखा जा सके. साथ ही, सवारियों को पैर फैलाने के लिए भी पर्याप्त जगह है. सिर और छत के बीच भी पर्याप्त दूरी रखी गई है. कार को चलाने के लिए 1.2 लिटर का 3 सिलेंडर वाला आधुनिक इंजन है जो 7-10 बीएचपी शक्ति उत्पन्न करता है. कार का शतप्रतिशत उत्पादन भारत में किया जाएगा और इस की कीमत रखी गई है 4 लाख रुपए से कम. यानी मध्यवर्गीय उपभोक्ताओं की जेब व जरूरतों के अनुरूप. कार के आगे लगी जाली का डिजाइन भी भारतीय परंपराओं के अनुरूप रखा गया है. कुल मिला कर यह कहा जा सकता है कि विदेशी नाम वाली डैटसन पूरी तरह से भारतीय कार होगी. लेकिन इस के लिए आप को 6-7 महीने इंतजार करना पड़ेगा.

सौजन्य : बिजनैस स्टैंडर्ड मोटरिंग

पश्चिम बंगाल में उच्चवर्णों का वर्चस्व

राजनीति में धर्म और संप्रदायवाद की सत्ता भले ही कोई नई बात न हो लेकिन दशकों तक कम्युनिस्टों की सियासत के गढ़ रहे पश्चिम बंगाल में इन दिनों सियासी बाजार में यह मुद्दा गरम है कि ज्यादातर पार्टियों में उच्चवर्णों के नेताओं का कब्जा है. वर्ग संघर्ष के आदर्शों वाली पार्टी के नेता के इन विद्रोही तेवरों से सियासत का ऊंट किस करवट बैठेगा, जानने के लिए पढि़ए यह विश्लेषणात्मक लेख.

पश्चिम बंगाल में 34 वर्ष कम्युनिस्ट पार्टियों का शासन रहा हो या उस से पहले कांगे्रस का, पहली नजर में बिहार, उत्तर प्रदेश की तरह वहां जातिवाद का कभी बोलबाला नहीं रहा. लेकिन कुछ दिनों पहले मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यानी माकपा के एक वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री अब्दुल रज्जाक मोल्ला ने पार्टी में उच्चवर्ण और ब्राह्मणवाद के खिलाफ मुंह खोला.

वर्गसंघर्ष के आदर्श पर चलने का दावा करने वाली माकपा के एक वरिष्ठ सदस्य द्वारा की गई इस टिप्पणी ने राज्य के राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है. पिछले दशक में कोलकाता में बहुजन समाज पार्टी यानी बसपा की मुखिया की मायावती ने माकपा पर निशाना साधते हुए पार्टी को मनुवादी करार दिया था और राज्य के दलित व पिछड़ों को एकजुट होने का आह्वान किया था. पर तब मायावती के आह्वान को अधिक तूल नहीं दिया गया था. राज्य में बसपा का कोई पुख्ता अस्तित्व भी नहीं है.

वहीं भारतीय जनता पार्टी यानी भाजपा अपनी हिंदूवादी विचारधारा के कारण इस प्रगतिशील राज्य में अपने पांव नहीं जमा पाई है. अब तक यही धु्रवसत्य माना जा रहा था कि बंगाल की राजनीति में जातिवादी समीकरण का कोई अस्तित्व है ही नहीं लेकिन रज्जाक मोल्ला के आरोप के बाद राज्य की राजनीति में खलबली मच गई है.

इस बारे में माकपा में सब से पहले वाममोरचा के शासनकाल में शिक्षा मंत्री रहे कांति विश्वास ने यह मुद्दा उठाया था. उन्होंने अपनी एक पुस्तक में लिखा है कि वर्ष 1977 में वाममोरचा के सत्ता पर काबिज होने के बाद मंत्रिमंडल में अनुसूचित जाति व जनजाति को प्रतिनिधित्व नहीं मिला. इस संबंध में कांति विश्वास ने ज्योति बसु और माकपा के तत्कालीन सचिव प्रमोद दासगुप्ता से बात भी की थी. नतीजतन, उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था.

उच्चवर्ग के कब्जे में पार्टियां

रज्जाक मोल्ला का कहना है कि राज्य में माकपा पूरी तरह से ब्राह्मण और कायस्थ जैसे उच्चवर्ग के कब्जे में है जबकि पार्टी के लिए खूनपसीना बहाने वाले अन्य वर्गों के नेताओंकार्यकर्ताओं की पार्टी में कोई खास पूछ नहीं है. पार्टी को नए सिरे से पूरी मजबूती के साथ खड़ा होना है और अपनी खोई जमीन को वापस पाना है तो पार्टी की कमान दलित और अल्पसंख्यक के हाथों में देनी होगी.

रज्जाक मोल्ला ने माकपा में लंबे अरसे से उच्चवर्णों की चली आ रही राजनीति को कठघरे में खड़ा किया है. सरसरी तौर पर राज्य की 3 प्रमुख पार्टियों माकपा, तृणमूल कांग्रेस और भाजपा में देखा जाए तो कमोबेश हर पार्टी में ब्राह्मण और उच्चवर्ण का बोलबाला है. इस संबंध में रज्जाक मोल्ला से बात करने पर उन्होंने पंचायत वोट के दौरान बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ताओं की हत्या का हवाला देते हुए कहा कि वोट के दौरान माकपा के 52 कार्यकर्ताओं की हत्या हुई और उन में से 50 प्रतिशत से भी अधिक अल्पसंख्यक समुदाय के कार्यकर्ता हैं, बाकी अनुसूचित जाति और जनजाति के हैं. पंचायत वोट की बलि चढ़े कार्यकर्ताओं में एक भी उच्चवर्ण का नहीं है.

कहते हैं कि वर्ष 1977 में पार्टी के सत्ता में आने से पहले से ही पार्टी के इन कार्यकर्ताओं ने बड़ा संघर्ष किया और अब भी पार्टी को जिंदा रखने की लड़ाई में अल्पसंख्यक और दलित कार्यकर्ता अपने प्राणों का बलिदान कर रहे हैं. लेकिन पार्टी के महंत बन बैठे हैं ब्राह्मण और कायस्थ जैसे उच्चवर्ण के नेता.

माकपा के पूर्व मंत्री कांति विश्वास ने भी इस सचाई को मानते हुए इसे चिंताजनक बताया है. अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी से निकल कर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का उदय हुआ. लेकिन काफी लंबे अंतराल में पार्टी की राज्य कार्यकारिणी में भले अल्पसंख्यक समुदाय को जगह मिली हो पर आदिवासी और जनजाति समुदाय को आज भी स्थान नहीं मिला है.

अल्पसंख्यक और शीर्ष दल

राज्य में माकपा की 19 सदस्यीय कार्यकारिणी में एकमात्र अल्पसंख्यक प्रतिनिधि मोहम्मद सलीम हैं. पूर्व राज्य सचिव अनिल विश्वास कायस्थ थे. बंगाल में लगभग पूरे वामशासन के दौरान विधानसभा के अध्यक्ष हसीम अब्दुल हलीम रहे. विमान बसु और ज्योति बसु कायस्थ और उन के बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य ब्राह्मण थे.

दरअसल, राज्य की राजनीति में लंबे समय तक वाममोरचे का ही शासन रहा है, जहां वर्ग संघर्ष और वर्ग शत्रु की ज्यादा चर्चा होती रही है. शायद इसीलिए राज्य राजनीति में जातिगत पैटर्न की ओर कभी किसी का ध्यान नहीं गया. इस मामले को पहली बार उठाया माकपा के नेता ने, जो अल्पसंख्यक समुदाय के हैं.

इस संबंध में राजनीतिक विश्लेषक अमल सरकार का कहना है कि वाममोरचा शासन को सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए ममता बनर्जी लंबे समय से संघर्ष करती रही हैं. उन्हें सफलता तब मिली जब वे राज्य की अनुसूचित जाति व जनजातियों के वोट को लक्ष्य बना कर आगे बढ़ीं. 2011 में तृणमूल कांगे्रस को मिले वोट में एक बड़ा हिस्सा अनुसूचित जाति जनजाति का है लेकिन उन की पार्टी के शीर्ष पर भी उच्चवर्ण के नेता ही काबिज हैं. प्रदेश कांगे्रस और भाजपा में भी स्थिति बहुतकुछ एक जैसी ही है. इन पार्टियों के भी शीर्ष पदों पर उच्चवर्ण का ही कब्जा है. अगर तृणमूल कांगे्रस की बात करें तो ममता बनर्जी से ले कर सुब्रत मुखर्जी, दिनेश त्रिवेदी, पार्थ चटर्जी, सौगत राय और मुकुल राय सभी ब्राह्मण और कायस्थ हैं. अल्पसंख्यक समुदाय से फिरहाद हकीम और डेरेक ओ ब्रायन हैं. तृणमूल कांगे्रस पार्टी में उच्चवर्ण का बोलबाला होने के बारे में पूछे जाने पर सौगत राय ने इसे सिरे से नकारते हुए कहा कि कोई भी पार्टी हो, नेता तैयार होने की एक प्रक्रिया होती है. लंबे संघर्ष के बाद ही नेता तैयार होते हैं.

जहां तक विभिन्न समुदाय के प्रतिनिधित्व का सवाल है तो ममता बनर्जी की अगुआई में तृणमूल कांगे्रस में अन्य किसी पार्टी की तुलना में अल्पसंख्यक समुदायों की भागीदारी कहीं अधिक है. ममता के मंत्रिमंडल में भी अल्पसंख्यक समुदाय के अलावा आदिवासी जाति, जनजाति और महिलाओं का भी प्रतिनिधित्व अन्य किसी पार्टी की तुलना में कहीं अधिक है. अब अगर प्रदेश भाजपा की बात की जाए तो पार्टी कार्यकारिणी में राहुल सिन्हा, तथागत राय, असीम सोम और शमीक भट्टाचार्य उच्चवर्ण से ही हैं.

वहीं, प्रदेश कांगे्रस में प्रदीप भट्टाचार्य, मानस भुंइया, दीपा दासमुंशी, अधीर चौधुरी ये सभी उच्चवर्ण से हैं. अब्दुल मन्नान अल्पसंख्यक समुदाय से हैं. इस संबंध में अब्दुल मन्नान का कहना है कि यह भारतीय राजनीति की नियति ही है कि देश की अधिकांश पार्टियां दलित, पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यक समुदायों के सदस्यों को अपने निजी स्वार्थ के तहत पार्टी में स्थान देती हैं. यह आज ‘ओपेन सीक्रेट’ है. पश्चिम बंगाल में भी यही चलन है. इस में हैरानी जैसी कोई बात नहीं है.

बहरहाल, देश व उस के कई राज्यों में जारी सांप्रदायिक व जातिवादी राजनीति से अछूता रहा बंगाल अब शायद और अछूता न रह पाएगा. हालांकि मौजूदा मुख्यमंत्री ने विशेष आरक्षण की बात कर के मुसलिम कार्ड तो खेल ही दिया है.

पितापुत्र की जोड़ी साथ चले तो आगे बढ़े

राजनीति में परिवारवाद अब कोई मुद्दा नहीं रह गया है. ऐसे में पितापुत्र की जोड़ी नई बात नहीं है. कहीं यह जोड़ी हिट है कहीं फ्लौप. इस जोड़ी के हिट होने का फार्मूला क्या हो सकता है, पेश कर रहे हैं शैलेंद्र सिंह.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित हिंदी संस्थान में साहित्यकारों के पुरस्कार वितरण का एक कार्यक्रम चल रहा था. मंच पर कई खास लोगों के साथ उत्तर प्रदेश के  मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उन के पिता समाजवादी पार्टी यानी सपा के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव भी मंच पर बैठे हुए थे. 40 हजार रुपए का पुरस्कार पाने वाले एक लेखक ने मुख्यमंत्री की तारीफ की. इस बात को सुन कर सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने चुटकी लेते हुए कहा, ‘‘40 हजार में काहे के मुख्यमंत्री, यह राशि तो और ज्यादा होनी चाहिए थी. इस में किसी तरह के बजट की परेशानी नहीं है.’’

बोलने की अपनी बारी आने पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा, ‘‘यह धनराशि पहले 20 हजार रुपए थी. इस को बढ़ा कर 40 हजार रुपए किया गया है.’’सामान्यतौर पर देखें तो इस बातचीत में विवाद जैसा कुछ नहीं है. पार्टी प्रमुख के नाते मुलायम सिंह को पूरा हक है कि वे अपने मुख्यमंत्री के कामकाज को ठीक करने का प्रयास करते रहे. यहां बात केवल राजनीतिक नहीं है. मुलायम और अखिलेश के बीच पिता और पुत्र का भी रिश्ता है.  इस नाते भी मुलायम अखिलेश को सम?ा सकते हैं.

दरअसल, सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव कई बार अलगअलग तरह से अखिलेश यादव के कामों की आलोचना सार्वजनिक रूप से करते रहे हैं. प्रदेश की खराब होती कानून व्यवस्था पर मुलायम सिंह यादव ने कुछ समय पहले कहा था, ‘‘मैं होता तो 15 दिन में प्रदेश की कानून व्यवस्था ठीक हो जाती.’’ आगरा में पार्टी के अधिवेशन में जब अखिलेश सरकार के कैबिनेट मंत्री आजम खां नहीं गए तो मीडिया ने मुलायम से यह सवाल किया कि आजम खां यहां भी नहीं आए और कैबिनेट की मीटिंग में भी नहीं जाते? मुलायम सिंह ने कहा, ‘‘आजम खां कैबिनेट मीटिंग में क्यों नहीं जाते, इस का जवाब मुख्यमंत्री अखिलेश से पूछा जाना चाहिए.’’

मुलायम और अखिलेश के बीच सम?ानेबु?ाने का दौर जब से अखिलेश मुख्यमंत्री बने हैं तभी से बराबर चल रहा है. शुरू में यह लग रहा था कि कुछ दिनों के बाद यह थम जाएगा. यही वजह है कि आज उत्तर प्रदेश में विरोधी पार्टी के लोग आरोप लगा रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में एक नहीं कई मुख्यमंत्री हैं.

साल 2012 में सपा पार्टी को उत्तर प्रदेश में पहली बार बहुमत से सरकार बनाने का मौका मिला था. उस समय खुद मुलायम सिंह यादव ने इस जीत का पूरा श्रेय अखिलेश यादव को दिया और उन को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री पद संभालने का मौका दिया. जिन अखिलेश यादव ने भाजपा, बसपा और कांग्रेस का विधानसभा चुनाव में पछाड़ कर सब से ज्यादा सीटें जीतीं, वे अपनी ही पार्टी में हाशिए पर कैसे आ गए?

राजनीति के जानकार मानते हैं कि मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश को मुख्यमंत्री की कुरसी पर तो बैठा दिया पर जो छूट और समर्थन उन को देना चाहिए था वह नहीं दिया. ऐसे में सपा के कुछ बडे़ नेता भी मुख्यमंत्री के सरल स्वभाव का बेजा लाभ उठाने लगे. उन के एकएक काम में दोष निकालने लगे. इस से विरोधी दलों का यह आरोप लगातार गहरा होता गया कि उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के अलावा मुलायम सिंह यादव, शिवपाल यादव, आजम खां जैसे लोग सरकार चला रहे हैं. अखिलेश यादव को जिस तरह से कई बार अपने फैसले बदलने पड़े उस से यह बात और भी साफ हो जाती है.

मुलायम सिंह यादव की सब से बड़ी परेशानी यह है कि वे अपनी पार्टी के सरकार में होने के बाद भी आने वाले लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी का मजबूत जनाधार नहीं देख रहे हैं. वहीं, मुलायम को लगता है कि जिस तरह से कांग्रेस और भाजपा लोकसभा चुनाव के पहले अपना जनाधार खोती जा रही हैं उस से तीसरे मोरचे की संभावनाएं दिख रही हैं. ऐसे में मुलायम को लगता है कि वे इस अवसर का लाभ उठा सकते हैं.

वहीं, अखिलेश सरकार की खराब होती छवि के चलते मुलायम को अपने सपने पूरे होते नहीं दिख रहे हैं. वे बारबार अखिलेश की आलोचना करने से भी परहेज नहीं कर रहे हैं. यही कारण है कि अखिलेश यादव का आत्मविश्वास कम होता जा रहा है.

प्रकाश और सुखवीर सिंह बादल

मुलायम और अखिलेश की ही तरह पंजाब में प्रकाश सिंह बादल उन के बेटे सुखवीर सिंह बादल की जोड़ी भी है. प्रकाश सिंह बादल जब पिछली विधानसभा के समय मुख्यमंत्री थे तो सुखबीर सिंह बादल पूरी तरह से पार्टी की कमान संभाल रहे थे. सरकार में भी उन का पूरा दखल था. मुलायम सिंह यादव से ज्यादा उम्र के होने के बाद भी प्रकाश सिंह बादल ने मुख्यमंत्री की कुरसी संभाली और बेटा सुखबीर बादल बाकी कामकाज देखता था.

एक तरफ प्रकाश सिंह बादल हैं जो खुद मुख्यमंत्री की कुरसी पर हैं और कामकाज उन का बेटा सुखबीर देखता है. दूसरी तरफ मुलायम सिंह यादव हैं जो खुद मुख्यमंत्री की कुरसी पर नहीं हैं पर मुख्यमंत्री के काम में उन का दखल बना हुआ है.

सामान्यरूप से जब आप पार्टी नेता की आलोचना करते हैं तो एक अलग बात होती है पर बेटे के काम की आलोचना करते समय हालात दूसरे होते हैं. ऐसे में पितापुत्र की जोड़ी के रूप में काम करने वाले लोगों, खासकर नेताओं को ज्यादा सचेत होना चाहिए.

बेहतर यही होगा कि सार्वजनिक रूप से आलोचना कम से कम हो. कमियों की चर्चा अकेले में होगी तो बेटे का आत्मविश्वास बना रहेगा और बाहरी लोग उस की आलोचना करने से पहले सोचने को मजबूर होंगे. कई बार बेटे जब जिद करते हैं या उन पर जरूरत से ज्यादा भरोसा किया जाता है तो पार्टी को नुकसान होता है. महाराष्ट्र में शिवसेना का उदाहरण इस की जीतीजागती मिसाल है.

किया भरोसा, टूटी पार्टी

बालासाहब ठाकरे ने शिवसेना को बनाया और महाराष्ट्र में उस की ताकत बढ़ाई. बालासाहब के पुत्र उद्धव ठाकरे और उन के भतीजे राज ठाकरे दोनों ही राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा रखते थे. उद्धव के मुकाबले राज ठाकरे में राजनीतिक क्षमता ज्यादा थी. पुत्रमोह में बालासाहब ठाकरे ने भतीजे राज ठाकरे को पीछे कर बेटे उद्धव ठाकरे को आगे बढ़ाना शुरू किया तो राज ठाकरे ने अलग हो कर ‘महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना’ यानी मनसे नाम से अलग पार्टी खड़ी कर दी. इस टूटन का प्रभाव शिवसेना पर पड़ा. उस का जनाधार कम होता गया. बीचबीच में कई बार राज व उद्धव के एक होने की खबरें आती रहीं पर ऐसा हो नहीं सका.

कहने का अभिप्राय यह है कि बालासाहब ने अगर राजनीतिक क्षमता का आकलन कर पार्टी की कमान सौंपी होती तो शिवसेना कमजोर नहीं पड़ती, उस का जनाधार बढ़ जाता. राजनीतिक दलों में कई बार परिवारवाद पार्टी की तरक्की में बाधा बनता है.

फारूक और उमर अब्दुल्ला

जम्मूकश्मीर में पितापुत्र की जोड़ी फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला के रूप में काम कर रही है.  फारूक अब्दुल्ला ने बेटे को सत्ता की कुरसी सौंपने के बाद अपने को केंद्र की राजनीति तक सीमित कर लिया. ऐसे में उन के बीच मुलायम और अखिलेश वाले हालात नहीं बन सके. साथसाथ चलने से न केवल दोनों अपनीअपनी जिम्मेदारी उठा रहे हैं बल्कि विरोधी दलों को आलोचना करने का मौका भी नहीं दे रहे हैं.

राष्ट्रीय लोकदल के नेता चौधरी अजित सिंह और उन का बेटा जयंत चौधरी भी पितापुत्र की एक ऐसी ही जोड़ी है. चौधरी अजित सिंह केंद्र की राजनीति में हैं, उन का बेटा उत्तर प्रदेश में पार्टी की कमान संभाल रहा है. लोकदल भले ही उत्तर प्रदेश में सत्ता की दौड़ में पीछे हो पर पितापुत्र के रूप में अजित और जयंत की जोड़ी में मतभेद खुल कर सामने नहीं आ रहे हैं.

इस के उलट, जहां पितापुत्र की जोड़ी ने ठीक से काम नहीं किया वहां जनता ने उन को सत्ता से बेदखल करने में कोई देरी नहीं की. तमिलनाडु में एम करुणानिधि और उन के बेटे स्टालिन का उदाहरण इस का प्रमाण है. करुणानिधि तमिलनाडु में मुख्यमंत्री थे. इस के बाद भी सत्ता के कामकाज में उन के बेटे स्टालिन का दखल था. ऐसे में जनता नाराज हुई और पितापुत्र की जोड़ी को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया. राजनीति में ऐसी जोडि़यां कम नहीं हैं.

उत्तर प्रदेश में शिवपाल यादव और उन का बेटा अक्षय यादव एकसाथ राजनीति में हैं. बिहार में लोक जनशक्ति पार्टी के नेता रामविलास पासवान ने अपने बेटे चिराग पासवान को पार्टी संगठन में जगह दी है. विधानसभा के आने वाले चुनाव में इस जोड़ी की क्षमता को परखा जाएगा.

अलग राह से नहीं बनेगी बात

भाजपा नेता राजनाथ सिंह और उन के पुत्र पंकज सिंह, लालजी टंडन के बेटे गोपाल टंडन जैसे बहुत सारे पितापुत्रों की जोड़ी राजनीति में है. भाजपा कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगाती है पर उस की पार्टी में नेताओं की दूसरी पीढ़ी में पितापुत्र की जोड़ी बड़े पैमाने पर काम कर रही है.

हिमाचल प्रदेश में प्रेमकुमार धूमल और अनुराग ठाकुर की जोड़ी राजनीति में एकसाथ काम कर रही है. प्रेमकुमार धूमल भाजपा के मुख्यमंत्री के रूप में हिमाचल प्रदेश की सत्ता पर काबिज थे. उन के बेटे अनुराग ठाकुर सांसद हैं. विधानसभा चुनाव के समय पितापुत्र की इस जोड़ी ने मिल कर काम किया लेकिन आपसी तालमेल के अभाव के चलते पार्टी को जीत नहीं मिल सकी और भाजपा बाजी हार गई.

आज सभी दल अपने परिवार को राजनीति में ले आए हैं. ऐसे में इन को अलग सोच बनानी होगी. बेटे को जब बारबार सलाह दी जाएगी या उसे खुल कर काम करने नहीं दिया जाएगा तो परिणाम बेहतर नहीं होंगे. पितापुत्र की जोड़ी को ऊर्जा और अनुभव की तरह साथसाथ चलना होगा. तभी सफलता मिल सकती है. अगर दोनों अलगअलग चलेंगे तो पार्टी की नाव डूबने से कोई  बचा नहीं सकता.पितापुत्र की जोड़ी किसी भी कारण से असफल हो, पर जिम्मेदारी दोनों पर आएगी. ऐसे में साथ चलें, तभी सुधार हो सकता है.

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