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भूमि अधिग्रहण की राजनीति

कांगे्रस का भाजपा को गरीब किसानों की जमीन छीनने के कानून बनाने पर कोसना उस बिल्ली का शाकाहारी बनना है जो 900 चूहे पहले ही चट कर चुकी हो. 1947 के बाद कांग्रेस सरकारों ने जिस तरह भूमि अधिग्रहण कानून का दुरुपयोग किया वह तानाशाहों को भी मात कर दे. उस पर हल्ला नहीं मचा क्योंकि देश का संपन्न वर्ग लगातार सस्ती जमीन का फायदा उठाता रहा और गरीबों की नंगी छातियों पर पैर रख कर मौज उड़ाई और बदले में मुंह बंद रखा. यह तो सोनिया गांधी की धुन थी कि उन्होंने तमाम विरोधों के बावजूद 2013 का कानून बनवा दिया जिस ने गरीब किसान की जमीन पर सरकारी बुलडोजरी की तानाशाही समाप्त कर दी. जो जमीनें पिछले 70 सालों में सरकारों ने देशभर में छीनी हैं उन पर कुछ ही सड़कें, रेलें, नहरें बनी हैं. ज्यादातर जमीनें फैलते शहरों ने खाई हैं जिन पर शहरी भव्य मकानों में रह रहे हैं या फिर निजी उद्योग चल रहे हैं. सेना ने जो जमीन ली थी वह 1947 से थोड़ा सा पहले ली थी और उस ने उस का केवल विकास किया.

किसी किसान की जमीन निजी इस्तेमाल के लिए छीनी जाए, यह व्यवस्था गलत है. सरकार को अपने काम के लिए जब जमीन चाहिए हो तो वह टैंडर निकाले, जैसे और सामान खरीदने के लिए करती है. किसान की इच्छा हो तो बेचे और यदि उस की मरजी के पैसे मिलें तो ही बेचे. जब सरकार अरबों रुपयों का सामान टैंडर से खरीद सकती है तो जमीन क्यों नहीं. भारतीय जनता पार्टी को 2014 से पहले जो जनसमर्थन मिल रहा था उस के पीछे जमीन के लालचियों का हाथ था, इस से इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि नरेंद्र मोदी की प्राथमिकताओं में जमीन कानून सब से आगे रहा है. भारत न तो स्वच्छ हुआ न भ्रष्टाचार मुक्त पर जमीन मुक्त होने की तलवार जरूर लटक गई. प्रशासनिक सुधार नहीं हुए, निरर्थक दखलंदाजी करने वाले कानून समाप्त नहीं हुए, कानून व्यवस्था नहीं सुधरी पर जमीन कानून की मरम्मत के लिए सरकार रातदिन एक करने में लगी है. कांगे्रस दूध की धुली नहीं है. 2014 की चुनावी हार ने उसे पापों का प्रायश्चित्त करने का मौका दे दिया है. नरेंद्र मोदी के जमीन कानून के रूप में उसे एक हथियार मिल गया है. राहुल गांधी को डूबती पार्टी को बचाने के लिए तिनका तो मिला है, देखें कितने तिनके जोड़ कर वे नाव बनाते हैं.

स्मार्टफोन के फायदे व नुकसान

स्मार्टफोन निसंदेह एक अद्भुत आविष्कार है जो दुनियाभर की जानकारी एक छोटे से डब्बे में पैक कर देता है और इसे रखने वाला हर तरह की जानकारी जब मरजी हासिल कर सकता है. समस्या इस ‘हर तरह’ से आने लगी है. नाबालिगों और विशेषतौर पर बच्चों के हाथों में वह जानकारी, जो उन के काम की नहीं है, खतरनाक साबित हो सकती है. बच्चे आमतौर पर स्मार्टफोन की तकनीक और गुणों को वयस्क लोगों से जल्दी समझ लेते हैं क्योंकि उन के दिमाग में लैंडलाइन वाला काला फोन होता ही नहीं है. उन्हें बचपन से बटनों की उपयोगिता का एहसास होने लगता है. वे उस जगह पर पहुंच जाते हैं जहां वयस्क नहीं जाते क्योंकि न तो उन के पास समय होता है न जरूरत. बस, यही विवाद का कारण बन रहा है.

स्मार्टफोन जब तक मातापिता और इक्केदुक्के दोस्तों से मिलने के संपर्क सूत्र हों तो ठीक है. इस फोन से छोटे बच्चे भी दुनियाभर में चैटिंग कर सकते हैं, अपने बारे में चाहीअनचाही जानकारी दे सकते हैं. वे पौर्न, अश्लील और आपराधिक जानकारी पा सकते हैं. वे अनजानों से दोस्ती कर सकते हैं. इसलिए स्मार्टफोन बच्चों के हाथों में ऐसा है मानो उन्हें चौराहे पर अकेला छोड़ दिया गया हो. बच्चों में अगर लड़की है तो यह फोन समझो, आफत का निमंत्रण है. बच्चों की स्मार्टफोन की मांग को रोकना मातापिता के लिए लगभग असंभव है. चूंकि हर हाथ में मोबाइल है और हर समय जरूरत होती है, इसे खरीदना तो पड़ेगा ही. कुछ निर्माताओं ने छोटे बच्चों के लिए सुरक्षित स्मार्टफोन बनाए हैं जिन का सौफ्टवेयर ऐसा है कि बहुत सी साइटों पर बच्चे जा ही नहीं सकते. ऐसे में यह पक्का है कि बच्चे इसे खरीदेंगे ही नहीं. उन्हें यह जबरन दिलाया गया तो वे उसे 2-4 दिन में तोड़ डालेंगे. कामकाजी मातापिताओं के लिए छोटे बच्चों के हाथ में स्मार्टफोन देना अनिवार्य सा है पर यह उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए छुरा पकड़ाने के समान है जिस से वे किसी निर्दोष को नुकसान पहुंचा सकते हैं और खुद को भी. असल में स्मार्टफोन में सुविधाएं होने के बावजूद यह इतना लाभदायक नहीं जितना समझा जा रहा है. इसे एक तरह से ऐसे समझें कि घर के बाहर ही दीवार से सटी पटरी पर आटे, दाल, सब्जियों की दुकानें, कच्चे ढाबे तरहतरह की सुविधाएं तो देते हैं लेकिन वे घर और माहौल में बदबू फैलाए रखते हैं, गंदगी फैलाते हैं, अनचाहों को घर के सामने ला खड़ा कर देते हैं, पटरी पर चलना नामुमकिन कर देते हैं और बच्चों से खेलने की जगह छीन लेते हैं. सो, फैसला आप को करना है–जीवन सुविधाजनक चाहिए या सुव्यवस्थित.

राहुल की सक्रियता

राहुल गांधी बड़े मजे में नरेंद्र मोदी को पाठ पढ़ा रहे हैं कि सत्ता से बाहर रह कर कुछ भी कह देना कितना आसान है और बाहर वाले को न जिम्मेदारी की चिंता करनी पड़ती है न जवाब के असर की. नरेंद्र मोदी ने मई 2014 से पहले चुनावी भाषणों व अन्य सभाओं में सोनिया गांधी व राहुल गांधी पर जम कर कटाक्ष किए थे और समाज का वह वर्ग, जो कांगे्रस सरकार की भ्रष्टाचार की कहानियों से खुन्नस खाए बैठा था, बड़ा खुश हुआ था कि चलो एक जन आया तो जो काले को काला कहने में हिचकता नहीं. तब राहुल गांधी और सोनिया गांधी ही नहीं, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी बहुत दयनीय नजर आते थे और लग रहा था कि वे शब्दों व व्यंग्यबाणों के सैलाब में बह जाएंगे. मई 2014 में ऐसा हुआ भी, पर अब वही कटाक्ष घूम कर नरेंद्र मोदी व भाजपा पर आ रहे हैं. किसी गुमनाम, रहस्यात्मक छुट्टी के बाद लौटे राहुल गांधी ने लगातार व्यंग्यात्मक रवैया अपना लिया.

उन का सूटबूट की सरकार जो नाम लिखे नरेंद्र मोदी के बंद गले के सूट पर मजाक था, वाला व्यंग्य भाजपाइयों को अंदर तक भेद गया. ‘आप के प्रधानमंत्री,’ ‘देश के प्रधानमंत्री’, ‘भाजपा के प्रधानमंत्री नहीं’ जैसे शब्दों से उन्होंने संसद में वही वाक्पटुता दिखाई जो नरेंद्र मोदी दिखाते रहे हैं. नरेंद्र मोदी की विदेश यात्रा पर उन के मजाक, जब वे भारत के दौरे पर हों तो पंजाब के किसानों का हाल पूछ आएं, ने सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया. एक भाजपा मंत्री के किसानों की आत्महत्या को उन की अपनी कमजोरी बताने को ले कर राहुल ने नरेंद्र मोदी की सरकार को किसान विरोधी व कौर्पोरेटरों की सरकार के मुकुट से सजा डाला. मतलब सिर्फ इतना है कि विपक्ष में रह कर बोलना बहुत आसान होता है. राहुल गांधी की बोलती 10 साल बंद थी क्योंकि तब वे जो बोलते, उन्हें करना पड़ता. वे तब गलतियों और कमजोरियों पर सफाई ही दे सकते थे. वे किसी पर निकम्मेपन का आरोप नहीं लगा सकते थे. यह अब नरेंद्र मोदी के साथ हो रहा है. नरेंद्र मोदी विदेश जा रहे हैं तो इसलिए कि यह देश की जरूरत है. वे सैरसपाटे के लिए विदेश नहीं जा रहे. वे अच्छे कपड़े पहन रहे हैं तो इसलिए कि प्रधानमंत्री का पद यह मांग करता है. वे किसानों की जमीन चाहते हैं तो इसलिए कि उन का विचार है कि उद्योग ज्यादा लाभदायक हैं. सत्ता में रह कर वे वैसे ही असहाय हैं जैसे पहले राहुल गांधी, सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की तिगड़ी थी. जनता को यह समझना होगा कि सत्ताधारी नेता की जिम्मेदारी होती है और विपक्ष का काम मीनमेख निकालना होता है. दोनों ही लोकतंत्र में जरूरी हैं.

जब लेना हो होम लोन

घर खरीदने के लिए होम लोन मददगार साबित होते हैं परंतु कुछ गलतियों की वजह से कई लोग इन्हें हासिल करने में नाकामयाब हो जाते हैं. यहां ऐसी 10 गलतियों के बारे में जानकारी दी जा रही है जिन से बचने पर आसानी से होम लोन प्राप्त किया जा सकता है : 

जरूरत से अनभिज्ञता : घर खरीदने की प्रक्रिया शुरू करने से पहले आप को अपने स्तर पर पर्याप्त खोज करनी चाहिए. किसी अन्य द्वारा दी गई जानकारी या सूचना पर आंख मूंद कर विश्वास न करें. यदि आप खुद यह मेहनत नहीं करेंगे तो हो सकता है कि आप को अपनी मनचाही संपत्ति न मिले या जो मिले उसे खरीदना आप की क्षमता से बाहर हो. सब से पहले उन परियोजनाओं या इलाकों को चिह्नित करें जो आप को अपने मतलब की लगें. फिर इस बात पर गौर करें कि आप की जरूरतों पर इन में से कौन सी संपत्ति खरी उतरती है.

क्रैडिट रिपोर्ट प्राप्त नहीं करना : बैंक या हाउसिंग फाइनेंस कौर्पोरेशन के साथ होम लोन संबंधी बातचीत करने से पहले आप को अपनी क्रैडिट रिपोर्ट को किसी तरह की गलती या गड़बड़ के लिए, जरूर जांच लेनी चाहिए. यदि आप को कोई गलत या गड़बड़ दिखाई दे तो उसे तुरंत चुनौती दें क्योंकि इस से आप का क्रैडिट स्कोर प्रभावित होता है. नकारात्मक क्रैडिट रिपोर्ट आप के लोन लेने की क्षमता पर बेहद बुरा प्रभाव डालती है. अच्छी क्रैडिट रिपोर्ट से आप अधिक लोन लेने के योग्य हो सकते हैं.

व्यावहारिक पहलुओं का ध्यान नहीं रखना : कई बार लोग केवल कुछ ऊपरी बातों पर ही ध्यान देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वे अपनी मासिक आय का 80 से 85 फीसदी मासिक किस्त के रूप में अदा कर सकते हैं. हालांकि वे उन खर्चों का ध्यान रखना भूल जाते हैं जो अचानक करने पड़ सकते हैं. इस तरह के गलत आकलन की वजह से आप अपनी क्षमता से अधिक लोन ले सकते हैं जिस से आर्थिक रूप से आप पर बोझ तथा दबाव पड़ सकता है. ऐसे में स्वीट होम के मालिक बनने का ख्वाब आर्थिक समस्या की वजह से बुरा साबित हो सकता है.

लोन देने वालों के बारे में पर्याप्त पड़ताल नहीं करना : विज्ञापनों में किए गए लुभावने वादों तथा आकर्षक ब्याज दरों के प्रस्ताव या दोस्तों एवं परिवार वालों की बातों में आ कर जल्दबाजी में कोई फैसला न करें. पूरी पड़ताल करें. इस के लिए इंटरनैट की सहायता से ब्याज दरों तथा होम लोन औफर्स की आपस में तुलना भी की जा सकती है. आजकल इंटरनैट पर सभी बैंकों के औफर्स तथा उन की ब्याज दरों की सारी जानकारी उपलब्ध होती है, जिस का अध्ययन करने से आप के लिए फैसला करना सरल हो जाएगा.

हड़बड़ी में लोन स्वीकार करना : होम लोन की बात हो तो ध्यान रखें कि आप होम लोन के पहले प्रस्ताव को ही स्वीकार न कर लें. जिस तरह से आप बाजार में खरीदारी के वक्त विभिन्न दुकानों पर घूम कर अपनी पसंद तथा जरूरत की चीज की तलाश करते हैं, ठीक उसी तरह से आप को उपयुक्त होम लोन की खरीदारी करनी चाहिए.

आवेदन में सभी तथ्यों की जानकारी नहीं देना : यह आप के ही हित में है कि आप अपने आवेदन में सारे तथ्य सहीसही जाहिर कर दें. यदि आप के क्रैडिट कार्ड पर राशि बकाया है या पहले से आप ने अन्य लोन ले रखे हैं तो ये आप की होम लोन क्षमता को प्रभावित करेंगे. बेहतर होगा कि आप अपने बारे में सभी तथ्यों को आवेदन में लिख दें. इन बातों को छिपाने का पता चलने पर बैंक आप को होम लोन देने से इनकार कर सकता है.

लोन एग्रीमैंट को अच्छे से नहीं पढ़ना : किसी भी लोन एग्रीमैंट पर साइन करने से पहले उसे अच्छी तरह से पढ़ना जरूरी होता है. इन में कोई ऐसा नियम या शर्त हो सकती है जो आप को बिलकुल मंजूर न हो. इसे पढ़ कर सुनिश्चित हो जाएगा कि आप किस परिस्थिति में पैर रखने जा रहे हैं. यदि आप को किसी शर्त पर आपत्ति है तो उस के बारे में बैंक के साथ बात की जा सकती है.

वित्तीय स्थिति को व्यवस्थित नहीं रखना : अपनी आय तथा व्यय संबंधी वित्तीय आंकड़ों की व्यवस्थित जानकारी रखने से आप को बैंक से लोन लेने में तो आसानी होगी ही, अपनी वित्तीय स्थिति का सटीक आकलन लगाने में भी सहायता होगी. इतना ही नहीं, इस की मदद से आप निकट भविष्य में अपनी आय में होने वाले इजाफे का अनुमान भी लगा सकते हैं.

होम लोन पर इंश्योरैंस नहीं लेना : यदि लोन लेने वाले व्यक्ति के साथ कोई अनहोनी घट जाए तो लोन अदा करने का बोझ परिवार पर आ सकता है. ऐसी किसी परिस्थिति से परिवार को सुरक्षा प्रदान करने के लिए होम लोन का बीमा अवश्य करवाना चाहिए. लोन लेने वाले की मृत्यु की स्थिति में लोन की बाकी सारी राशि को बीमा कंपनी अदा कर देती है. इसी प्रकार क्रिटिकल इलनैस पौलिसी के तहत लोन लेने वाले की आय में किसी गंभीर रोग की वजह से कमी आने पर भी बीमा कंपनी एक तय समय तक किस्तों की अदायगी करती है.

सही रवैया न अपनाना : आप को लोन देने में बैंक की एक अहम भूमिका होती है परंतु इस के लिए आप को उन का अत्यधिक आभारी होने की जरूरत भी नहीं है. कई बार होम लोन देने में बैंकों का अपना हित अधिक समाया होता है और वे आप का फायदा उठा सकते हैं. वास्तव में लोन लेने वाले ग्राहक के रूप में आप के पास अधिक शक्ति होनी चाहिए. बेशक आप को अपने बैंक पर भरोसा हो परंतु लोन से संबंधित प्रोसैसिंग फीस, प्री पेमैंट फीस, लीगल फीस,वैल्युएशन फीस जैसी सभी बातों पर पैनी नजर रखनी चाहिए.

फाल्के का कपूर कनैक्शन

पृथ्वीराज कपूर, राज कपूर और शशि कपूर, ये तीनों नाम एक ही परिवार के हैं और शायद यह पहली पीढ़ी होगी जहां 3 दादा साहेब फाल्के पुरस्कारों का जमावड़ा है. पिछले दिनों शशिकपूर की तबीयत खराब होने के चलते वे दिल्ली नहीं आ सके. लिहाजा  पृथ्वी थिएटर (मुंबई) में पूरे कपूर परिवार की मौजूदगी में यह पुरस्कार अभिनेता शशि कपूर को दिया गया. इस पुरस्कार के बाद भी वही सवाल जस का तस कायम है कि अकसर कलाकारों की स्मरणशक्ति खोने या बीमार व लाचार या कभीकभी मरने के बाद ही बडे़ पुरस्कार क्यों दिए जाते हैं. अगर यह अवार्ड समय रहते मिलते तो इस की खुशी दिलीप कुमार, शशि कपूर और अटल बिहारी वाजपेयी ऐसे कई नाम अपनों से बांट पाते.

स्मार्ट टिप्स

  1. सिर के बाल झड़ रहे हैं तो नारियल तेल में करी पत्तों को उबाल लें. फिर तेल थोड़ा ठंडा कर के सिर पर लगाएं. 20 मिनट बाद सिर धो लें. ऐसा हफ्ते में 2 बार करें.
  2. सुबह उठते ही जैसे आप को लगे कि आप के चेहरे पर पिंपल निकल आया है, वैसे ही तुलसी और नीम की पत्तियां पीस कर मुंहासे पर लगा लें. 15 मिनट के बाद चेहरा धो लें, आप को फर्क जरूर दिखाई देगा.
  3. राइस ब्रान तेल में पौलीअनसैच्युरेटेड फैट पाया जाता है, साथ ही इस में विटामिन व एंटीऔक्सीडैंट भी पाए जाते हैं. यह कोलैस्ट्रौल को कम करता है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है.
  4. लिप बाम ज्यादा देर तक होंठों पर टिका रहे, इस के लिए पहले होंठों पर हलके रंग का लिप लाइनर लगाएं, उस के बाद लिप ग्लौस लगा कर उस के ऊपर लिप बाम लगाएं.
  5. समर कैंप में बच्चे बहुतकुछ सीखते हैं. फिजिकल फिटनैस के साथसाथ अन्य बच्चों से बातचीत कर उन में आत्मविश्वास का स्तर सुधरता है, वे अधिक आत्मनिर्भर बनते हैं.
  6. टोफू प्रोटीन का एक बेहतरीन स्रोत है. नियमित और पर्याप्त मात्रा में टोफू का सेवन करने वाले प्रोटीन का सेवन करने वाले मांसाहारी लोगों का मुकाबला कर सकते हैं.

फरीदा जलाल से बातचीत

फरीदा जलाल बौलीवुड की उन अभिनेत्रियों में से एक हैं जिन्होंने जिस भी फिल्म में भूमिका निभाई वह हिट हुई. 1960 में बाल कलाकार के रूप में काम शुरू कर उन्होंने 130 फिल्मों में बेटी, बहन, मंगेतर, फैमिली फ्रैंड आदि की भूमिकाएं निभाईं. 80 के दशक में उन्होंने थोड़ा बे्रक लिया. फिर बड़ी बहन, दादी, मां, बुजुर्ग पड़ोसी और विधवा की भूमिकाएं निभाईं. उन्हें फिल्म पारस, हिना, मम्मो और दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे के लिए अवार्ड भी मिले. 65 वर्षीया फरीदा को लगता है कि बड़े परदे पर अच्छा काम करने के बावजूद पहचान के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ता है. अगर फिल्म हिट हो गई और काम की सराहना भी की गई तो भी जरूरी नहीं कि अगली फिल्म में सफलता बरकरार रहे जबकि छोटे परदे पर ज्यादा संभावनाएं होती हैं, दर्शकों से सीधा संवाद होता है. टैलीविजन धारावाहिक ‘देख भाई देख’, ‘शरारत’, ‘बालिका वधू’ के बाद अब वे जी टीवी पर ‘सतरंगी ससुराल’ में विहान की दादीमां की भूमिका निभा रही हैं. उन से मिल कर बात करना रोचक था. पेश हैं अंश :

आप काफी दिनों बाद अभिनय कर रही हैं, इस की वजह?

औफर तो आते थे पर मैं मना करती रही. जो हमेशा से किया उसी को बारबार करने से कोई खुशी नहीं मिलती. इस धारावाहिक के कोप्रोड्यूसर ने जब मुझे इस की कहानी सुनाई तो यह किरदार अलग था. लोग मुझे हंसतीबोलती मां जैसी भूमिका में देखना चाहते हैं. कहानी के मुताबिक, इस सीरियल की भूमिका में अभिनय थोड़ा संजीदा है, सीरियस है. इस में दादी अधिक बोलती नहीं. पर असल में मैं बहुत अधिक बोलती हूं और जल्दीजल्दी बोलती हूं. किरदार का यह अलगपन मुझे अच्छा लगा. मैं ने पहले फिल्मों में काम किया. टीवी पर काम तो बाद में शुरू किया. टीवी और फिल्म में कोई अंतर नहीं होता. दोनों में ऐक्टर कैमरा फेस करते हैं और अपनी भूमिका निभाते हैं.

अपने अभिनय के सफर से खुश हैं? कहीं कोई मलाल तो नहीं कि और बेहतर कर सकती थीं?

मुझे कोई मलाल नहीं. मैं अपने फिल्मी सफर से खुश हूं. टीवी और फिल्म में अंतर इतना होता है कि फिल्म का कुछ पता नहीं होता, फिल्म चली या नहीं चली. उसे 100 लोगों ने देखा या कुछ हजारों ने. टीवी आप घर में देखते हैं. टीवी को घर का नौकर भी देखता है. व्यूअरशिप की भूख सब को होती है. हर कलाकार चाहता है उस के काम को दर्शक देखें, सराहना करें. मैं ने 45 साल फिल्मों में काम किया. मैं कुछ और भी कर सकती थी, यह अगर लोग सोचें तो मुझे खुशी होगी. मुझे इंडस्ट्री से कोई शिकायत नहीं.

फिल्मों में कहानी से ले कर फिल्मांकन तक में आजकल काफी बदलाव आए हैं, इसे किस रूप में देखती हैं?

फिल्मों में आया बदलाव अच्छा है. इस का स्वागत करना चाहिए. जिंदगी का दूसरा नाम बदलाव है. आप उन के बहाव में चलें पर अपने सिद्धांत और नियमों को तोड़ें, यह जरूरी नहीं. यह जरूर खटकता है कि फिल्मों से थीम खत्म हो रही है. पहले लोग कमाई या बौक्स औफिस कलैक्शन को याद नहीं करते थे बल्कि गाने, डायलौग, सीन्स, भूमिका को याद करते थे. मुगलेआजम, नया दौर, प्यासा आदि कुछ ऐसी फिल्में हैं जो दिल को छूती थीं. धक्का लगता है कि वैसी फिल्में अब हम क्यों नहीं बना पा रहे हैं.

मां की भूमिका भी पहले से बदल चुकी है, इस बात से कितनी सहमत हैं?

मां की भूमिका अब फिल्मों में होती ही नहीं. अगर होती भी है तो 2 या 3 सीन जिन में अजीबोगरीब कपड़े पहना दिए जाते हैं. वैसी मां की भूमिका मैं नहीं कर सकती. मां बोल्ड होनी चाहिए, जैसी दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे में थी.

टीवी पर अधिकतर सासबहू की कहानियां होती हैं, जिन में टकराव दिखाया जाता है. रियल लाइफ में सासबहू का रिश्ता कैसे अच्छा बन सकता है

यह रिश्ता व्यक्तिगत होता है पर हर रिश्ते में स्पेस चाहिए. सास को बांटना नहीं आता, इसलिए समस्या आती है. बहू और बेटे को अपने हिसाब से जीने दो. इस से सास की इज्जत बनी रहती है और बेटाबहू से रिश्ता अच्छा बना रहता है.

कमीशनखोरी हमारा राष्ट्रीय दायित्व

आश्चर्य मत करिए, इतना परेशान होने की भी जरूरत नहीं है. कोई चाहे कुछ कहे, कुछ समझे, हम तो खम ठोक कर कहेंगे कि कमीशनखोरी हमारा नैतिक, पारिवारिक, सामाजिक तथा उस सब से ऊपर उठ कर राष्ट्रीय दायित्व, राष्ट्रीय कर्तव्य है. बिना कमीशन लिए कोई भी कार्य करना सिर्फ अपराध ही नहीं बल्कि घोर राष्ट्रद्रोह है, जिस के अपराधी को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए. बिना कमीशन लिए किसी का कोई भी कार्य करना, अनैतिक ही नहीं अपने ही बंधुबांधवों के साथ अन्याय भी है. इस से पूरे समाज में एक गलत संदेश भी जाता है कि बिना रुपयापैसा लिएदिए भी कार्य हो सकते हैं. साथ ही, इस से रुपए की क्रयशक्ति पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगता है क्योंकि आमतौर पर यह माना जाता है कि रुपयों के द्वारा कुछ भी खरीदा जा सकता है, किसी को भी खरीदा जा सकता है. तो फिर क्या इन रुपयों से एक अदने से ईमान को नहीं खरीदा जा सकता?

कमीशनखोरी समाज में समानता की भावना का विकास करती है. कमीशन, जहां देने वाले व्यक्ति के आत्मविश्वास में वृद्धि करता है, वहीं लेने वाले व्यक्ति के बैंकबैलेंस को बढ़ाता है. कमीशन देने और लेने वाले व्यक्तियों में स्वस्थ, सौहार्दपूर्ण संबंध बन जाते हैं. उन के संबंधों में खुलापन आ जाता है. वे अंतरंग बन जाते हैं. कमीशन उन के बीच पद की दूरी को पाटने के लिए सेतु का काम करता है. कमीशन लेने के बाद बड़े से बड़ा अधिकारी भी अत्यंत विनम्र हो जाता है तथा कमीशन देने वाला मरियल सा आदमी भी कड़क से कड़क तथा बड़े से बड़े अधिकारी के सिर पर चढ़ कर बात करता है. कमीशन वह मोहनी विद्या है जिस से किसी भी अधिकारी को वश में कर उस से मनमाफिक कार्य करवाए जा सकते हैं. कमीशनरूपी ब्रह्मास्त्र असंभव को भी संभव बना देता है. कमीशन देने के बाद व्यक्ति अपनी कार्यसिद्धि के लिए पूरी तरह निश्ंिचत, पूरी तरह आश्वस्त हो जाता है. उसे पता होता है कि अब चाहे जो भी हो जाए, उस का कार्य हो ही जाएगा.

कमीशन का देश के विकास से सीधा संबंध है क्योंकि कमीशनरूपी चक्र (पहिए) लगने पर फाइलें तीव्र गति से चलने लगती हैं. उन्हें एक टेबल से दूसरी टेबल तक जाने में समय नहीं लगता. फाइलों के निबटते ही रुके हुए विकास कार्यों को जैसे पंख लग जाते हैं, रुके हुए कार्यों के कार्य आदेश निकलने लगते हैं, अटके हुए बिल पास हो जाते हैं. नए कार्यों के लिए मौके तलाशे जाते हैं. इस प्रकार कमीशन देश के विकास की सारी बाधाओं को हटा कर उसे वापस प्रगति के मार्ग पर लाता है. देश का आर्थिक विकास सुनिश्चित करता है.

कमीशन देश की आर्थिक प्रगति में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. चमचमाते बाजार, बड़ेबड़े मौल, चहकतेदहकते मल्टीप्लैक्स इन सब की रौनक, चहलपहल कमीशन की कमाई के बिना असंभव है. कमीशन न हो तो इन के सामने खड़ी रहने वाली नईनई कारों की कतार अदृश्य हो जाएगी. इन में घूमने वाले, पौपकौर्न खाने वाले, महंगेमहंगे गेम्स खेलने वाले, महंगे ब्रैंडेड कपड़े, विलासिता का सामान खरीदने वाली महिलाओं, युवाओं, बच्चों की संख्या में कमी आ जाएगी, मल्टीप्लैक्स में लगी फिल्में दर्शकविहीन हो जाएंगी. सब ओर मायूसी छा जाएगी. कमीशन वह संजीवनी है जो सर्वथा निकृष्ट (कचरा) उत्पाद को भी सर्वोत्कृष्ट बनाने की क्षमता रखती है. इस प्रकार कमीशन गुणवत्ताहीन पदार्थों (उत्पादों) की खपत सुनिश्चित कर के यह विश्वास दिलाता है कि कोई भी पदार्थ या वस्तु अनुपयोगी या बेकार नहीं है, प्रत्येक वस्तु उपयोगी है, सिर्फ उस के उपयोग को उचित ढंग से समझाना आना चाहिए. कमीशन सरकारी अधिकारियों की सहृदयता को बढ़ा कर उन्हें कचरा माल को भी पास कराने के लिए बाध्य करता है.

कहते हैं कि साहूकार को अपने मूल से सूद कहीं अधिक प्यारा, कहीं अधिक प्रिय होता है. इसी प्रकार की कुछ महिमा कमीशन की भी होती है. अधिकारियों, कर्मचारियों को यह अपने वेतन से कहीं अधिक प्यारा होता है. कमीशन की कमाई हाथ में आते ही उन का दिल बल्लियों उछलने लगता है. भ्रष्टाचार का विरोध करने वालों को सिर्फ ये ही नहीं, बल्कि इन के पूरे घर वाले भलाबुरा कहते हैं, जी भर कर गालियां देते हैं. अन्नाजी द्वारा ‘जनलोकपाल विधेयक’ की मांग को ले कर किए गए अनशन पर ऐसे लोगों की प्रतिक्रियाएं तथा भावभंगिमाएं देखने योग्य थीं. उन दिनों इन्हें देख कर लगता था जैसे यदि इस समय अनशनकारी सामने आ जाएं तो वे उन का जाने क्या हश्र कर दें. कमीशन विकास की सतत धारा बहाता है. यह एक ऐसी आदर्श स्थिति का निर्माण करता है जिस में कोई भी उत्पाद, कोई भी निर्माण, कोई भी सामग्री ऐसी टिकाऊ तथा उच्च गुणवत्ता की नहीं होती जिसे देखदेख कर व्यक्ति तंग आ जाए, बोर हो जाए तथा उसे लगे कि यह वस्तु/निर्माण यहां से कब हटेगा? यदि वस्तुएं टिकाऊ तथा गुणवत्तायुक्त होने लगें तो फिर अगली खरीदी कैसे होगी? नए माल की खपत कहां होगी? विकास की प्रक्रिया थम नहीं जाएगी. अरे, जब जीवन क्षणभंगुर है तो फिर सड़क, पुल, इमारतें कैसे स्थायी हो सकते हैं?

कमीशनखोरी व्यक्ति को समृद्ध तो करती ही है, उस की प्रतिष्ठा में भी वृद्धि करती है. वह आदमी कमीशन तो लेता है, लेकिन उस के बाद काम की गारंटी होती है. कैसा भी उलझा हुआ, अटका हुआ काम हो, यदि एक बार हां कर दी तो फिर निश्ंिचत हो जाइए. आप के कार्य को अच्छेअच्छे भी नहीं रोक सकते. उस का कमीशन लेना ही इस बात की गारंटी है कि आप का कार्य होगा ही होगा. कमीशनखोरी, कर्मचारियों में आपसी सहृदयता तथा सौजन्यता का संचार करती है. कमीशनखोर किसी भी संभावित खतरे या भय की सूचना पहले ही एकदूसरे को दे देते हैं. कमीशनखोरों में एक सहज ही भ्रातृत्वगुण पाया जाता है, जो 2 ईमानदारों में दुर्लभ होता है. कमीशनखोर एकदूसरे के प्रति पूरी तरह ईमानदार होते हैं. कमीशनखोरी रुपए के सतत प्रवाह को भी चालू रखती है जिस से देश की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक असर पड़ता है. बाजार में व्यय करने के लिए इन लोगों की जेब रुपयों से भरी होती है. वे आवश्यक/अनावश्यक सभी तरह के सामानों की खरीद कर लेते हैं. कमीशन का रुपया जेब में हो तो व्यक्ति महीने के अंतिम दिनों में, वेतन मिलने के दिन के समान व्यय करता है. वह स्वयं भी प्रसन्न रहता है तथा बाजार व व्यवसायियों को भी प्रसन्न रखता है. अब यदि बाजार में चहलपहल होगी, सामान की खरीदफरोख्त होगी, तभी तो कलकारखानों की मशीनें चलेंगी, मजदूरों को काम मिलेगा, नए उत्पाद बनेंगे, देश की अर्थव्यवस्था के रुके पहियों को गति मिलेगी.

कमीशनखोरी देश के एक बहुत बड़े वर्ग की आजीविका का साधन भी है. कई सरकारी विभाग तो ऐसे हैं जिन में मध्यस्थों के बिना कोई कार्य हो ही नहीं सकता. बहुत सारे लोग कमीशन से प्राप्त आय के बल पर न सिर्फ अपने परिवार का उचित भरणपोषण करते हैं बल्कि समाज में एक सम्मानित जिंदगी का भी निर्वाह करते हैं. इन मध्यस्थों के बीच में आते ही रुके हुए कार्य फिर प्रारंभ हो जाते हैं, अटकी हुई फाइलों में मानो पंख लग जाते हैं. इन का एक इशारा पाते ही अधिकारी कैसी भी फाइलों पर बिना सोचविचार किए हस्ताक्षर कर देते हैं. ये मध्यस्थ रुके हुए कार्य की सारी बाधाएं हटा कर उसे वापस सही मार्ग पर ले आते हैं, चलने लायक बना देते हैं. अंत में, हमारे देश की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ रहे, सभी कर्मचारी प्रसन्न रहें, सरकारी दफ्तरों की रौनक बनी रहे, बाबूराज कायम रहे, विकास कार्य जारी रहे, कमीशन का निर्बाध आदानप्रदान होता रहे, देश प्रगति करे, इन सब के लिए सभी सौदों में कमीशन देना जरूरी है. इसलिए मेरी स्पष्ट सोच है कि कमीशनखोरी हमारा पारिवारिक, नैतिक, सामाजिक दायित्व ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय दायित्व है. कहिए, क्या कहते हैं आप?

अद्भुत खजाना : ड्रमहैलर

कनाडा के एल्बर्टा प्रदेश की राजधानी एडमन्टन के दक्षिणपूर्व की ओर 300 किलोमीटर की दूरी पर ड्रमहैलर नामक एक प्रसिद्ध स्थान है. कनाडा के बैडलैंड इलाके में वर्ष 1913 में एक बहुत छोटे गांव के रूप में बसने के बाद इसे वहीं के एक व्यक्ति सैमुअल ड्रमहैलर के नाम से जाना जाने लगा. उसी समय इस गांव के समीप कोयले का विशाल भंडार पाए जाने से वह स्थान कनाडा के सब से तेजी से विकसित स्थान में परिवर्तित हो गया तथा केवल 17 वर्षों के अल्पकाल में वर्ष 1930 तक यह गांव पूरे पश्चिमी संसार का सब से तेजी से विकसित हो कर एक अत्यंत सुंदर शहर में परिवर्तित होने वाला केवल कनाडा का ही नहीं, बल्कि विश्व का एक ज्वलंत उदाहरण बन गया. दरअसल, जैसे ही कोयला भंडार पाए जाने की खबर कनाडा के साथ अमेरिका तथा यूरोप में पहुंची, वहां उथलपुथल सी मच गई, विशेषकर उन देशों की कोलमाइंस की कंपनियों में. एल्बर्टा प्रदेश बेहद ठंडा होने के कारण कोयला वहां के घरों को गरम रखने तथा भोजन आदि बनाने के लिए एक प्राकृतिक देन थी. कोल भंडार की विशालता को देखते हुए तमाम देशों से आ कर 139 माइंस कंपनियां रजिस्टर्ड हो गईं और सभी ने कार्य प्रारंभ कर दिया.

हजारों की संख्या में यूरोप, अमेरिका आदि से इन कंपनियों में काम करने वाले ड्रमहैलर पहुंच गए. उन के रहने के लिए बहुत से मकान आदि बनाए जाने लगे. इधर अच्छी बात यह हुई कि उस स्थान से निकलने वाला कोयला, मकानों में जलाने के दृष्टिकोण से बहुत उत्तम क्वालिटी का था. कनाडा सरकार ने बिना समय नष्ट किए ड्रमहैलर से, समीप के पूर्ण विकसित शहर कैलगरी तक 1913 में ही रेल लाइन बिछा दी ताकि कोयला ढोने तथा वितरण में आसानी हो जाए. कहते हैं कि उस समय ड्रमहैलर में यूरोप की 20-25 भाषाओं को बोलने वाले व्यक्ति रहते थे जो वहां की माइंस के कर्मचारी थे. अगले 50 वर्षों तक बहुत बड़ी मात्रा में वहां की माइंस द्वारा कोयला निकाला जाता रहा. रिकौर्ड्स के अनुसार 60 मिलियन टन कोयला ड्रमहैलर से बाहर भेजा गया. यही समय था कि माइंस में कोयला समाप्त होने लगा था. यह वर्ष 1979 का समय था कि कोयले के भंडार कम होते ही उस स्थान पर तेल तथा गैस के विशाल भंडार मिल गए. इस समय तक वहां के आसपास खेती के साथ टूरिज्म का भी तेजी से विकास हो गया था. सो, खानों को बंद कर दिया गया जो अब टूरिस्टों के देखने का केंद्र बन गई हैं.

गैस तथा तेल के निकलते ही कनाडा के उस बेहद ठंडे प्रांत में, जो संसार के उत्तरी धु्रव के बहुत पास होने से बहुत ठंडा, विशेषकर जाड़ों के मौसम में, जबकि इस प्रदेश में अकसर बर्फीले तूफान आते एवं हिमपात होता है, गैस के मिल जाने से वहां के मकानों को कोयला जला कर गरम करने के स्थान पर अब वैज्ञानिक तरीकों से गैस द्वारा सैंट्रली हीटेड बना कर इच्छानुसार तापक्रम पर रखा जा सकता है जो सुविधाजनक हो गया. साथ ही, अब इस भाग के मकानों में एक भाग अंडरग्राउंड भी बनाने के प्रावधान होने लगे ताकि यदि कभी बड़े भयंकर तूफान आने से मकान के ऊपरी भागों के नष्ट होने की संभावना हो तो अंडरग्राउंड वाले भाग में जा कर सुरक्षित रहा जा सकता है. मौसम के क्षेत्र में यहां के विश्वविद्यालयों में कमाल के अनुसंधान हुए हैं जिन के कारण मौसम विभाग में बहुत से ऐसे वैज्ञानिक यंत्र लग गए हैं जिन की भविष्यवाणियों में आश्चर्यजनक परिवर्तन आए हैं जो सत्यता के अत्यंत समीप हैं. लगातार मौसम की भविष्यवाणियां टैलीविजनों, इंटरनैट, मोबाइल फोनों पर आती रहती हैं ताकि नागरिक उसी के अनुसार सतर्कता बरत सकें.

यह अच्छी बात है कि मेरा बड़ा पुत्र संजय अपनी फैमिली के साथ एल्बर्टा प्रदेश की राजधानी एडमन्टन में रहता है. भारत एवं कनाडा का दोहरा नागरिक है. मैं गरमी में अकसर उस के पास कनाडा आताजाता रहता हूं. हम सब इन्हीं दिनों कनाडा के दर्शनीय स्थलों को देखने जाते हैं. हम लोगों ने डायनासौर के प्राचीन गढ़ ड्रमहैलर को देखने जाने का प्रोग्राम बनाया. मौसम विभाग की इस भविष्यवाणी के आधार पर कि सुबह से शाम 6 बजे तक ड्रमहैलर का मौसम सामान्य रहेगा तथा शाम 6 बजे से मौसम खराब होने के साथ तेज बारिश होने की संभावना है, सुबह 8.30 बजे घर से चल कर ठीक 3 घंटे में ड्राइव कर रास्ते के बसंती वातावरण का आनंद लेते हुए हम लोग 11.30 बजे ड्रमहैलर के सुंदर टाउन में पहुंच गए. कहीं कोई भीड़ नहीं थी. वातावरण शांत था.

इस स्थान का नक्शा हम ने यहां आने से पहले ही इंटरनैट द्वारा निकाल लिया था तथा उसी के अनुसार हम टाउन के मध्य में बने एक अत्यंत सुंदर पार्क में पहुंच गए जहां डायनासौर की एक बहुत विशाल स्टेच्यू ने हमारा स्वागत किया. पता चला कि मानव निर्मित यह स्टेच्यू डायनासौर की सब से विशाल प्रतिमा थी. हम सब उसे देख कर दंग रह गए. उस की ऊंचाई 86 फुट तथा वजन 1,45,000 पाउंड्स था जिसे ज्यादातर स्टील द्वारा बनाया गया था तथा इस पर लगे पेंट्स इस का प्राकृतिक रूप देते हैं. इस विशाल मूर्ति के पास ही विजिटर्स इन्फौरमेशन के लिए अत्यंत सुंदर इमारत थी. इसी इमारत के एक ओर से एक जीना बना था जिस के द्वारा इस विशाल मगर अंदर से खोखले डायनासौर के खुले जबड़ों तक जाया जा सकता था, जहां से खड़े हो कर संपूर्ण ड्रमहैलर टाउन के साथ दूरदूर तक की पहाडि़यों को देखा जा सकता था. यह उसी विशाल डायनासौर की प्रतिमा थी जिस के पूर्वज लगभग 100 मिलियन वर्ष पहले पृथ्वी के इसी भाग में स्वच्छंदता से घूमा करते थे तथा इन्हीं प्राणियों का संपूर्ण अमेरिकी कौंटिनैंट में एकछत्र साम्राज्य था. एल्बरटोसौरस प्रजाति का यह भयंकर प्राणी लगभग 69 मिलियन वर्षों से 100 मिलियन वर्षों के बीच एल्बर्टा के इसी भाग में बहुलता से घूमा करते थे. ड्रमहैलर के बहुत से मकानों, दुकानों तथा मौलों के सामने विभिन्न आकारों की इसी प्राणी की प्रतिमाएं लगी हुई थीं. बड़ी प्रतिमा वाले पार्क में बैंचों पर बैठ कर हम ने लंच किया. फिर हम 30 किलोमीटर की दूरी पर प्रकृति का हुडूज नामक वह आश्चर्यजनक चमत्कार, जिसे हम लोगों ने जीवन में पहली बार ही सुना था, देखने के लिए चल दिए.

हम लोग कुछ ही किलोमीटर आगे गए थे कि सड़क के दोनों ओर की पहाडि़यों के निचले भाग में जमीन से 2-3 फुट की ऊंचाई पर लगभग 11/2 फुट की ऊंचाई के साथ पहाडि़यों के बड़े भाग में स्थित कुछ अजीब सी प्रतिमाएं दिखीं. हम हैरान थे. इस प्रकार की रचनाएं केवल एक पहाड़ी पर ही नहीं, बल्कि बीसियों पहाडि़यों पर मौजूद थीं. ठीक उसी तरह जैसे बहुत से प्राचीन मंदिरों में देवीदेवताओं की प्रतिमाएं हों. कुछ भी समझ में नहीं आया कि यह क्या है. आखिरकार हम उस स्थान पर पहुंच गए जहां नक्शे के अनुसार हमें जाना था. उस स्थान पर लगभग 50-60 व्यक्ति मौजूद थे. हम लोग गाड़ी पार्क कर वहीं पहुंच गए. वहां उसी तरह की प्रतिमाएं थीं जो हम ने मार्ग की पहाडि़यों के निचले भागों में बनी देखी थीं. साथ ही बहुत से प्राचीन भवनों के खंडहरों के थमलों की आकृतियां, जो लगभग 5-6 फुट ऊंचाई की थीं तथा विभिन्न आकारों की थीं, भी देखीं. वहां खड़े एक व्यक्ति से मैं ने पूछा कि यह क्या है तो उस ने बताया कि ये हुडूज हैं. ये ज्वालामुखी से निकले लावे की गरम मिट्टी एवं बैडलैंड में उपस्थित ग्लेशियर्स के ज्वालामुखी के अत्यंत गरम लावे के संपर्क में आने से बर्फ के पिघले पानी से मिल कर यहां की तेज हवाओं, पहाड़ों के इरोजन आदि के प्रभाव से कई मिलियन वर्षों में बनी प्रतिमाएं हैं, जो हुडूज कहलाती हैं.

बाद में हम लोगों ने वहां बनी स्टील की सीढि़यों पर चढ़ कर बहुत से अन्य तरह तरह के आकारों की प्रतिमाओं को बहुत पास से देखा. प्रकृति का यह मनोहारी दृश्य देख कर हम आश्चर्यचकित रह गए. कुछ इन्फौरमेशन सैंटर से मिले लिटरेचर में मैं ने यह भी पढ़ा कि हुडूज ड्रमहैलर की मिट्टी, कुछ सीमेंट के समकक्ष मिट्टी, ज्वालामुखी लावा, समुद्री शैल, सैंडस्टोन आदि के मिक्स्चर के पानी में मिलने के बाद तेज हवाओं, फ्रोस्ट आदि के प्रभाव से लाखों साल में ये अजीबअजीब प्रतिमाओं की शक्ल में परिवर्तित हुई हैं. प्रकृति की ये भूगर्भीय रचनाएं ड्रमहैलर की लगभग 11 हैक्टेअर बैडलैंड भूमि में ईस्ट काउली नामक स्थान तक बहुतायत में पाई जाती हैं.

हुडूज देखने के बाद हम लोग 12 किलोमीटर दूर स्थित घोस्टटाउन देखने गए. उस स्थान पर जाने के लिए करीब 1 किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए स्टील के बने 11 पुलों से गुजरना पड़ा. एक प्राचीन नदी, जिस का नाम वाइंडिंग रोज बड रिवर है, पर लगभग 1 किलोमीटर के रास्ते को पार करने के लिए 11 पुल हैं जो सब एकलेन पुल हैं. ये पुल प्राचीनकाल में कोयले की खानों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए कोयला ढोने के काम आते थे. इन पुलों को पार किया. वहां एक उजाड़ टाउन था जिस में 10-15 घर बने थे. सब खाली पड़े थे. पास में एक अत्यंत प्राचीन बार भी थी. इस स्थान पर हम ने 2-3 आदमियों को घूमते भी देखा था किंतु वे घोस्ट नहीं लग रहे थे. हम लोग फिर उन 11 ब्रिजेज को पार करते हुए सीधे ड्रमहैलर पहुंचे तथा वहां से लगभग 10 किलोमीटर पर स्थित अत्यंत सुंदर पहाडि़यों से घिरे ‘मिडलैंड प्रोविंशियल पार्क’ पहुंचे जिस में डायनासौर का म्यूजियम बना हुआ है. इसे रौयल टाइरैल म्यूजियम नाम से 1985 में कनाडा सरकार ने बनवाया था. इसे देखने संसार के विभिन्न भागों से प्रतिवर्ष 4 लाख से अधिक सैलानी पहुंचते हैं.

अब तक की हमारी यात्रा में हम ने कहीं भी भीड़ नहीं देखी थी, यहां तक कि ड्रमहैलर एक बड़ा शहर होने पर भी इस की जनसंख्या केवल 8,200 ही होने से कहीं भी भीड़भाड़ न थी किंतु हम उस स्थान पर कम से कम 2 हजार पर्यटकों को देख कर चकित हो गए. हम टिकट ले कर जैसे ही प्रथम हौल में पहुंचे, एक अत्यंत विशाल डायनासौर का संपूर्ण अस्थिपंजर दिखा जिस की विशालता देख कर हम दंग रह गए. यह अस्थिपंजर लगभग 100 मिलियन वर्षों पुराने डायनासौर का था. संजय, मधु, सिद्धार्थ एवं अनीष चारों के पास कैमरे थे जिन्होंने उस प्राचीन अस्थिपंजर के चित्र लिए. हम लोग काफी समय तक उस विशाल अस्थिपंजर को देखते रहे. अन्य विशाल हौल में 3 और बड़े एवं लगभग 37 अन्य छोटे डायनासौर के बच्चों एवं मध्यम आकार के डायनासौर के अस्थिपंजर थे. सभी अस्थिपंजरों को बहुत सुंदरता के साथ यथास्थान पर प्रदर्शित किया गया था.

इस म्यूजियम की बड़ी बात यह है कि इस के एक बड़े भाग में एक विशाल लैबोरेटरी भी स्थित है जिस में नए खोजे गए फौसिल्स को पूरी तरह वैज्ञानिक ढंगों से साफ कर के सारे अस्थिपंजरों को एसैंबल किया जाता है जिस के लिए आधुनिकतम वैज्ञानिक यंत्र लगे हैं. विशेषकर उन वयस्क विशाल शरीर वाले डायनासौर के अस्थिपंजरों को जोड़ने के लिए उस विशाल लैब की छत पर भी यंत्र लगे हैं जो अस्थिपंजरों को जोड़ते समय सही पोजीशन पर आवश्यकतानुसार उन की पोजीशन आदि बदल कर उन्हें सुरक्षित रख सकें. इस लैब तथा म्यूजियम के बीच की दीवार पूर्णतया पारदर्शक शीशे द्वारा बनी हुई है ताकि म्यूजियम के दर्शक आसानी से लैब में होता हुआ काम स्वयं देख सकें. म्यूजियम के एक भाग में प्रीहिस्टोरिक पानी के पौधों का अपूर्व संग्रह है जिन्हें मुख्यतया वान्कूवर द्वीपों की नर्सरियों से खरीदा गया है. ऐसे पौधे अभी तक पैसीफिक महासागर की तलहटी में पाए जाते हैं जो लगभग पूर्णतया अंधकार में ही उगते हैं तथा प्रीहिस्टोरिक एल्बर्टा के पौधों से बहुत मिलतेजुलते हैं. क्योंकि गहरे पानी में अंधकार में उगने वाले ये पौधे, अंधकार में ही उग सकते हैं अत: म्यूजियम के एक बड़े भाग में इस प्रकार के बहुत से पौधों के लिए एक अलग भाग है जहां पूर्ण अंधकार रहता है. साइड में लगी बहुत कम लाइट के साथ शीशे के पीछे स्थित पानी में इन्हें देखा जा सकता है.

इस म्यूजियम में एक बहुत बड़ी चट्टान भी रखी है जिस के मध्य में लाखों वर्ष पूर्व दब जाने से एक मीडियम आकार के डायनासौर का सारा भाग आसपास की मिट्टी आदि के साथ चट्टान में परिवर्तित हो गया था तथा डायनासौर का पूरा शरीर एक फौसिल में परिवर्तित हो गया था, दिखता है. उस चट्टान को इस प्रकार तोड़ा गया है कि पूरे डायनासौर के फौसिल के एक साइड का पूरा शरीर स्पष्टतया दृष्टिगोचर होता है. इस के अतिरिक्त लगभग 4-5 फुट चौड़ी तथा इतनी ही ऊंची एक चट्टान का शिलाखंड भी वहां रखा है जिस में संसार के बहुत से बेहद कीमती हीरे तथा अन्य तरहतरह के कई रंग वाले बेहद कीमती पत्थर दिखते हैं. चट्टान पर लिखा है कि इस चट्टान की कीमत कई बिलियन डौलर है. यहां मैं पाठकों को यह भी बताना चाहूंगा कि एक जीववैज्ञानिक होते हुए भी मेरी डायनासौर्स के आकारों के बारे में एक बहुत बड़ी भ्रांति इस म्यूजियम के देखने के बाद दूर हो गई है. म्यूजियम में लगभग 145 से 200 मिलियन वर्ष पूर्व के एक डायनासौर की, पैर से घुटने तक की काफी मोटी तथा 11 फुट ऊंची हड्डी का फौसिल रखा है. अब अनुमान कीजिए कि जिस प्रीहिस्टोरिक प्राणी की नीचे के पंजे से ले कर घुटने तक की लंबाई 11 फुट थी तो उस का पूरा शरीर कितना बड़ा होगा? किंतु जैसेजैसे समय बीतता गया, इन प्राणियों के आकार छोटे होते गए जो प्रदर्शित फौसिल्स से सिद्ध हो जाता है. डायनासौर के 1-2 मिलियन वर्ष पूर्व के उन के आकार उन के 200 मिलियन पूर्व के बुजुर्गों की अपेक्षा लगभग 1/3 ऊंचाई के ही रह गए थे. यही कारण है कि उन के आकारों से संबंधित मेरी भ्रांति दूर हो गई थी.

‘रौयल टाइरैल म्यूजियम औफ पैलान्टोलौजी’ से बाहर आने तक शाम को 5:15 बज चुके थे. यद्यपि ड्रमहैलर का एक और मुख्य आकर्षण केंद्र वहां की सदैव के लिए बंद माइन्स थीं किंतु उन्हें देखने के लिए हमारे पास समय का अभाव था. दूसरे, हमें यह भी ज्ञात था कि शाम 6 बजे से बहुत तेज वर्षा का प्रकोप होने वाला है, हम ने तत्काल अपनी गाड़ी एडमन्टन की ओर दौड़ा दी. हम लोगों ने लगभग 100 किलोमीटर का सफर तय किया था कि ड्रमहैलर में बेहद तेज बारिश के साथ मौसम बहुत खराब हो चुका था. यह सूचना हमें अपने मोबाइल द्वारा प्राप्त हो गई थी. हमें तसल्ली थी कि हम ने अपने मिशन का विशेष भाग अत्यंत सफलतापूर्वक पूरा कर लिया था तथा ठीक 8:15 बजे शाम को हम लोग एडमन्टन में अपने घर पहुंच गए थे.

डाक्टरी : सेवा या व्यवसाय

डाक्टर और मरीज के बीच संबंध बहुत ही निजी और जरूरत भरे होते हैं. कुछ साल से इन संबंधों में दरार आने लगी है. डाक्टर और मरीज के बीच टूटती भरोसे की कड़ी के बीच पैसे की दीवार खड़ी हो गई है. ऐसे में कई बार दोनों के बीच टकराव इस हद तक पहुंच जाता है कि अस्पतालों में तोड़फोड़ की घटनाएं भी होने लगती हैं. ऐसे में यह समझना जरूरी हो जाता है कि डाक्टरी पेशा सेवा है या व्यवसाय. मैडिकल बिजनैस के जानकार इस की वजह महंगे होते इलाज को मानते हैं. ऐसे लोगों का कहना है कि पहले स्वास्थ्य के नाम पर इलाज के लिए कुछ ही दवाएं थीं. मरीज की जांच के नाम पर डाक्टर के पास एक स्टैथोस्कोप ही होता था. उसी से वह मरीज की बीमारी का पता लगाने का काम करता था. डाक्टर अपने अनुभव के आधार पर दवा लिख देता था. उस के बदले अपनी फीस ले लेता था.  

समय के साथ चिकित्सा जगत में नए प्रयोग हुए. नई किस्म की दवाएं, जांच की मशीनें और जिंदगी को लंबा बनाने के दूसरे साधन आने लगे. जिस डाक्टर के पास जांच के लिए बेहतर मशीनें होती हैं वहां मरीज ज्यादा जाते हैं. ऐसे मेंदूसरे डाक्टर के लिए जरूरी होता है कि वह अपने अस्पताल को भी पूरी तरह से सुविधाजनक बनाए. इस के लिए डाक्टर को अस्पताल बनाने में बहुत सारा पैसा निवेश करना होता है. इस पैसे को निकालने के लिए डाक्टर मरीज के ऊपर निर्भर होता है. इस से इलाज का खर्च बढ़ जाता है. मरीज शुरुआत में तो इस महंगे इलाज को वहन कर लेता है, जैसेजैसे वह ठीक होने लगता है, इलाज का महंगा खर्च उस को अखरने लगता है. जिन मामलों में इलाज के दौरान मरीज की मृत्यु हो जाती है वहां मरीज के साथी पैसे देने में आनाकानी करने लगते हैं. इस से टकराव बढ़ जाता है. दोनों के ही अपनेअपने तर्क हैं. मरीज वाले कहते हैं कि डाक्टरी का पेशा सेवा का है, इसे व्यवसाय नहीं बनाना चाहिए. डाक्टर तर्क देता है कि मरीज की बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए हम जो साधन जुटाते हैं उस की वजह से इलाज महंगा हो जाता है.

सरकार नहीं करती मदद

लखनऊ नर्सिंग होम एसोसिएशन की अध्यक्षा डा. रमा श्रीवास्तव कहती हैं, ‘‘शिक्षा और स्वास्थ्य समाज की 2 बड़ी जरूरतें हैं. सरकार ने दोनों का निजीकरण किया. सरकारी स्कूलों के साथसाथ प्राइवेट स्कूल भी बनाए गए. सरकारी अस्पतालों के साथसाथ प्राइवेट नर्सिंग होम भी बनाने शुरू किए गए. सरकार ने स्कूल और नर्सिंग होम के बीच भेदभाव किया. सरकार प्राइवेट स्कूल खोलने वालों को तमाम तरह की सुविधाएं देती है. प्राइवेट नर्सिंग होम खोलने वालों को किसी भी तरह की सुविधा नहीं दी जाती है. 10 बैड के मामूली से अस्पताल को बनाने में 4 करोड़ रुपए से अधिक की रकम लगानी होती है. इस के लिए बैंक से लोन लेना पड़ता है.’’

डा. रमा आगे कहती हैं, ‘‘डाक्टर और मरीज के बीच टकराव की वजह बीमारी में लगने वाला पैसा ही होता है. मरीज को यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि अस्पताल में मिलने वाली सुविधाओं की कीमत उसे देनी पडे़गी. इलाज में जांच की मशीनों ने बेहतर सहयोग दिया है. मशीनों से खतरनाक से खतरनाक औपरेशन भी सुविधाजनक तरीके से होने लगे हैं. नर्सिंग होम में होने वाले बेहतर निवेश से ही मरीजों को बेहतर सुविधाएं मिलती हैं. ऐसे में मरीज को समझना चाहिए कि आज का डाक्टर सेवा के साथ सुविधाएं भी देता है.’’

सेवाभाव से कार्य करें

स्वास्थ्य सेवा में कौर्पोरेट के आने व डाक्टरों में बढ़ती कमर्शियल एप्रोच पर इंडियन मैडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के महासचिव डा. के के अग्रवाल का कहना है, ‘‘मैडिकल प्रोफैशन के व्यावसायिक पेशा हो जाने का अर्थ यह नहीं है कि यह एक नेक पेशा न रहे. व्यावसायिक संस्थान लाभ के लिए व्यवसायीकरण करते हैं. कौर्पोरेट अस्पताल और ट्रस्ट अस्पताल में यह फर्क होता है कि कौर्पोरेट अस्पताल को होने वाली आय का प्रयोग बोर्ड औफ डायरैक्टर्स द्वारा निजी तौर पर भी किया जा सकता है जबकि ट्रस्ट द्वारा अर्जित आय को सिर्फ ट्रस्ट के तय उद्देश्यों के लिए ही प्रयोग किया जा सकता है. जहां तक डाक्टरों की बात है वह चाहे ट्रस्ट के अस्पताल में कार्य करें या कौर्पोरेट अस्पताल में, उन का फर्ज है कि वे पारदर्शिता, नैतिकता और सेवाभाव से कार्य करें.’’

जरूरी है मरीज की काउंसलिंग

कानपुर के राज हौस्पिटल एंड इनफर्टिलिटी सैंटर की डा. ममता अग्निहोत्री कहती हैं, ‘‘मरीज और डाक्टर के बीच संबंध को बेहतर बनाने के लिए जरूरी है कि मरीज की बात को ध्यान से सुना जाए. किसी भी इलाज में होने वाले खर्च, उस में मिलने वाली सफलता के संबंध में डाक्टर को मरीज से पूरी बात करनी चाहिए. कई बार डाक्टर ज्यादा मरीजों को देखने के चक्कर में मरीज को पूरा समय नहीं देते हैं. ऐसे में मरीज को लगता है कि डाक्टर ने उस की पूरी बात नहीं सुनी. यहां से डाक्टर और मरीज के बीच अविश्वास की दीवार खड़ी होने लगती है. अगर ठीक से मरीज को पूरी बात समझाई जाए तो उस की धारणा बदलने लगेगी. डाक्टर को चाहिए कि वह मरीज को इलाज में लगने वाले औसतन खर्च की जानकारी जरूर दे.’’ हमारे यहां अभी भी समय की कोई कीमत नहीं समझी जाती है. ऐसे में डाक्टर जो समय मरीज को देता है उस की कीमत मरीज नहीं समझता. डाक्टरों को ज्यादा से ज्यादा मरीजों को देखने की होड़ से बचना चाहिए. उन को क्वालिटी इलाज देना चाहिए जिस से मरीज को यह लगे कि वह जो फीस चुका रहा है उस के बदले सही इलाज मिल रहा है. परेशानियां वहीं खड़ी होती हैं जहां पर इस तरह की सोच बनने लगती है. ऐसे में मरीज की काउंसलिंग कर के उस को समझाया जा सकता है. मरीज डाक्टर पर यकीन कर के ही अस्पताल में आता है. वह अच्छे से अच्छे डाक्टर की सेवाएं लेना चाहता है.

गोरखपुर के स्टार हौस्पिटल की डा. सुरहिता करीम का मानना है कि डाक्टरी पेशे को ले कर कई तरह की भ्रांतियां समाज में फैल रही हैं. यह सच बात है कि कुछ सालों में डाक्टरी पेशा सेवा भर नहीं रह गया है, उस की जवाबदेही सेवा से अधिक आगे बढ़ चुकी है. ऐसे में मरीज इसे बिजनैस मान लेता है. अस्पताल को चलाना भले ही बिजनैसका काम हो पर मरीज का इलाज करना आज भी सेवा का ही हिस्सा है. वे कहती हैं, ‘‘कुछ दुष्प्रचार भी डाक्टरी पेशे की छवि को खराब करने का काम करता है. कई बार मरीज की बीमारियां ऐसी होती हैं जो बेहतर इलाज से भी ठीक नहीं हो सकती हैं. ऐसे में यह सोचना ठीक नहीं होता कि डाक्टर ने पैसे ले लिए और इलाज नहीं किया. कोई भी डाक्टर अपने मरीज का बुरा नहीं चाहता. वह बेहतर इलाज करने का प्रयास करता है. ऐसी घटनाएं सरकारी अस्पतालों में भी घटती हैं. वहां मरीज हल्ला नहीं मचाता.’’

नए रास्तों से निकले समाधान

इस बात को तो सभी स्वीकार करते हैं कि स्वास्थ्य सेवाएं बदल रही हैं. लोगों को केवल सरकारी अस्पतालों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है. अब तो कई ऐसे अस्पताल सरकार खुद बनाती है जहां पर मरीजों को बीमारी में होने वाले खर्च को चुकाना पड़ता है. जब ऐसे अस्पतालों में पैसा देना पड़ता है तो प्राइवेट अस्पतालों में पैसा देना जरूरी हो जाता है. अगर प्राइवेट अस्पतालों से मरीजों को राहत देने के प्रयास किए जाएं तो नर्सिंग होम चलाने वाले डाक्टरों को अस्पताल के लिए सस्ती जमीन, कम ब्याज पर लोन और टैक्स के बोझ को कम करने की जरूरत है. इस के अलावा हैल्थ बीमा को बढ़ावा देने की जरूरत है, जिस से मरीज को महंगे इलाज की मार नहीं सहनी पडे़गी. 

कृष्णा मैडिकल सैंटर की डा. मालविका मिश्रा कहती हैं, ‘‘डाक्टरी पेशा सेवा के साथ किया जाने वाला बिजनैस है. इस में डाक्टर और मरीज के बीच जो रिश्ता बनता है वह दूसरे किसी बिजनैस में नहीं बनता. डाक्टर मरीज से जो फीस लेता है वह ज्यादा नहीं होती. आज विज्ञान ने ऐसी बहुत सारी तकनीकें ईजाद की हैं जिन से मरीज की सेवा बेहतर तरीके से की जा रही है. ऐसी मशीनों और दवाओं का प्रबंध करने के लिए अस्पतालों को सुविधाएं जुटानी पड़ती हैं. अगर डाक्टरी पेशे को नोबल पेशे के रूप में देखना है तो सेवा और व्यवसाय के बीच का रास्ता बनाना होगा. दोनों को एकदूसरे की जरूरतों को समझना पडे़गा. समयअसमय इमरजैंसी में जिस तरह से डाक्टर अपनी सुविधा का ध्यान न रखते हुए मरीज की सेवा करता है यह भाव किसी दूसरे प्रोफैशन में फीस लेने के बाद भी नहीं दिखता है.                            

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