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डाक्टरी : सेवा या व्यवसाय

डाक्टर और मरीज के बीच संबंध बहुत ही निजी और जरूरत भरे होते हैं. कुछ साल से इन संबंधों में दरार आने लगी है. डाक्टर और मरीज के बीच टूटती भरोसे की कड़ी के बीच पैसे की दीवार खड़ी हो गई है. ऐसे में कई बार दोनों के बीच टकराव इस हद तक पहुंच जाता है कि अस्पतालों में तोड़फोड़ की घटनाएं भी होने लगती हैं. ऐसे में यह समझना जरूरी हो जाता है कि डाक्टरी पेशा सेवा है या व्यवसाय. मैडिकल बिजनैस के जानकार इस की वजह महंगे होते इलाज को मानते हैं. ऐसे लोगों का कहना है कि पहले स्वास्थ्य के नाम पर इलाज के लिए कुछ ही दवाएं थीं. मरीज की जांच के नाम पर डाक्टर के पास एक स्टैथोस्कोप ही होता था. उसी से वह मरीज की बीमारी का पता लगाने का काम करता था. डाक्टर अपने अनुभव के आधार पर दवा लिख देता था. उस के बदले अपनी फीस ले लेता था.  

समय के साथ चिकित्सा जगत में नए प्रयोग हुए. नई किस्म की दवाएं, जांच की मशीनें और जिंदगी को लंबा बनाने के दूसरे साधन आने लगे. जिस डाक्टर के पास जांच के लिए बेहतर मशीनें होती हैं वहां मरीज ज्यादा जाते हैं. ऐसे मेंदूसरे डाक्टर के लिए जरूरी होता है कि वह अपने अस्पताल को भी पूरी तरह से सुविधाजनक बनाए. इस के लिए डाक्टर को अस्पताल बनाने में बहुत सारा पैसा निवेश करना होता है. इस पैसे को निकालने के लिए डाक्टर मरीज के ऊपर निर्भर होता है. इस से इलाज का खर्च बढ़ जाता है. मरीज शुरुआत में तो इस महंगे इलाज को वहन कर लेता है, जैसेजैसे वह ठीक होने लगता है, इलाज का महंगा खर्च उस को अखरने लगता है. जिन मामलों में इलाज के दौरान मरीज की मृत्यु हो जाती है वहां मरीज के साथी पैसे देने में आनाकानी करने लगते हैं. इस से टकराव बढ़ जाता है. दोनों के ही अपनेअपने तर्क हैं. मरीज वाले कहते हैं कि डाक्टरी का पेशा सेवा का है, इसे व्यवसाय नहीं बनाना चाहिए. डाक्टर तर्क देता है कि मरीज की बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए हम जो साधन जुटाते हैं उस की वजह से इलाज महंगा हो जाता है.

सरकार नहीं करती मदद

लखनऊ नर्सिंग होम एसोसिएशन की अध्यक्षा डा. रमा श्रीवास्तव कहती हैं, ‘‘शिक्षा और स्वास्थ्य समाज की 2 बड़ी जरूरतें हैं. सरकार ने दोनों का निजीकरण किया. सरकारी स्कूलों के साथसाथ प्राइवेट स्कूल भी बनाए गए. सरकारी अस्पतालों के साथसाथ प्राइवेट नर्सिंग होम भी बनाने शुरू किए गए. सरकार ने स्कूल और नर्सिंग होम के बीच भेदभाव किया. सरकार प्राइवेट स्कूल खोलने वालों को तमाम तरह की सुविधाएं देती है. प्राइवेट नर्सिंग होम खोलने वालों को किसी भी तरह की सुविधा नहीं दी जाती है. 10 बैड के मामूली से अस्पताल को बनाने में 4 करोड़ रुपए से अधिक की रकम लगानी होती है. इस के लिए बैंक से लोन लेना पड़ता है.’’

डा. रमा आगे कहती हैं, ‘‘डाक्टर और मरीज के बीच टकराव की वजह बीमारी में लगने वाला पैसा ही होता है. मरीज को यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि अस्पताल में मिलने वाली सुविधाओं की कीमत उसे देनी पडे़गी. इलाज में जांच की मशीनों ने बेहतर सहयोग दिया है. मशीनों से खतरनाक से खतरनाक औपरेशन भी सुविधाजनक तरीके से होने लगे हैं. नर्सिंग होम में होने वाले बेहतर निवेश से ही मरीजों को बेहतर सुविधाएं मिलती हैं. ऐसे में मरीज को समझना चाहिए कि आज का डाक्टर सेवा के साथ सुविधाएं भी देता है.’’

सेवाभाव से कार्य करें

स्वास्थ्य सेवा में कौर्पोरेट के आने व डाक्टरों में बढ़ती कमर्शियल एप्रोच पर इंडियन मैडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के महासचिव डा. के के अग्रवाल का कहना है, ‘‘मैडिकल प्रोफैशन के व्यावसायिक पेशा हो जाने का अर्थ यह नहीं है कि यह एक नेक पेशा न रहे. व्यावसायिक संस्थान लाभ के लिए व्यवसायीकरण करते हैं. कौर्पोरेट अस्पताल और ट्रस्ट अस्पताल में यह फर्क होता है कि कौर्पोरेट अस्पताल को होने वाली आय का प्रयोग बोर्ड औफ डायरैक्टर्स द्वारा निजी तौर पर भी किया जा सकता है जबकि ट्रस्ट द्वारा अर्जित आय को सिर्फ ट्रस्ट के तय उद्देश्यों के लिए ही प्रयोग किया जा सकता है. जहां तक डाक्टरों की बात है वह चाहे ट्रस्ट के अस्पताल में कार्य करें या कौर्पोरेट अस्पताल में, उन का फर्ज है कि वे पारदर्शिता, नैतिकता और सेवाभाव से कार्य करें.’’

जरूरी है मरीज की काउंसलिंग

कानपुर के राज हौस्पिटल एंड इनफर्टिलिटी सैंटर की डा. ममता अग्निहोत्री कहती हैं, ‘‘मरीज और डाक्टर के बीच संबंध को बेहतर बनाने के लिए जरूरी है कि मरीज की बात को ध्यान से सुना जाए. किसी भी इलाज में होने वाले खर्च, उस में मिलने वाली सफलता के संबंध में डाक्टर को मरीज से पूरी बात करनी चाहिए. कई बार डाक्टर ज्यादा मरीजों को देखने के चक्कर में मरीज को पूरा समय नहीं देते हैं. ऐसे में मरीज को लगता है कि डाक्टर ने उस की पूरी बात नहीं सुनी. यहां से डाक्टर और मरीज के बीच अविश्वास की दीवार खड़ी होने लगती है. अगर ठीक से मरीज को पूरी बात समझाई जाए तो उस की धारणा बदलने लगेगी. डाक्टर को चाहिए कि वह मरीज को इलाज में लगने वाले औसतन खर्च की जानकारी जरूर दे.’’ हमारे यहां अभी भी समय की कोई कीमत नहीं समझी जाती है. ऐसे में डाक्टर जो समय मरीज को देता है उस की कीमत मरीज नहीं समझता. डाक्टरों को ज्यादा से ज्यादा मरीजों को देखने की होड़ से बचना चाहिए. उन को क्वालिटी इलाज देना चाहिए जिस से मरीज को यह लगे कि वह जो फीस चुका रहा है उस के बदले सही इलाज मिल रहा है. परेशानियां वहीं खड़ी होती हैं जहां पर इस तरह की सोच बनने लगती है. ऐसे में मरीज की काउंसलिंग कर के उस को समझाया जा सकता है. मरीज डाक्टर पर यकीन कर के ही अस्पताल में आता है. वह अच्छे से अच्छे डाक्टर की सेवाएं लेना चाहता है.

गोरखपुर के स्टार हौस्पिटल की डा. सुरहिता करीम का मानना है कि डाक्टरी पेशे को ले कर कई तरह की भ्रांतियां समाज में फैल रही हैं. यह सच बात है कि कुछ सालों में डाक्टरी पेशा सेवा भर नहीं रह गया है, उस की जवाबदेही सेवा से अधिक आगे बढ़ चुकी है. ऐसे में मरीज इसे बिजनैस मान लेता है. अस्पताल को चलाना भले ही बिजनैसका काम हो पर मरीज का इलाज करना आज भी सेवा का ही हिस्सा है. वे कहती हैं, ‘‘कुछ दुष्प्रचार भी डाक्टरी पेशे की छवि को खराब करने का काम करता है. कई बार मरीज की बीमारियां ऐसी होती हैं जो बेहतर इलाज से भी ठीक नहीं हो सकती हैं. ऐसे में यह सोचना ठीक नहीं होता कि डाक्टर ने पैसे ले लिए और इलाज नहीं किया. कोई भी डाक्टर अपने मरीज का बुरा नहीं चाहता. वह बेहतर इलाज करने का प्रयास करता है. ऐसी घटनाएं सरकारी अस्पतालों में भी घटती हैं. वहां मरीज हल्ला नहीं मचाता.’’

नए रास्तों से निकले समाधान

इस बात को तो सभी स्वीकार करते हैं कि स्वास्थ्य सेवाएं बदल रही हैं. लोगों को केवल सरकारी अस्पतालों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है. अब तो कई ऐसे अस्पताल सरकार खुद बनाती है जहां पर मरीजों को बीमारी में होने वाले खर्च को चुकाना पड़ता है. जब ऐसे अस्पतालों में पैसा देना पड़ता है तो प्राइवेट अस्पतालों में पैसा देना जरूरी हो जाता है. अगर प्राइवेट अस्पतालों से मरीजों को राहत देने के प्रयास किए जाएं तो नर्सिंग होम चलाने वाले डाक्टरों को अस्पताल के लिए सस्ती जमीन, कम ब्याज पर लोन और टैक्स के बोझ को कम करने की जरूरत है. इस के अलावा हैल्थ बीमा को बढ़ावा देने की जरूरत है, जिस से मरीज को महंगे इलाज की मार नहीं सहनी पडे़गी. 

कृष्णा मैडिकल सैंटर की डा. मालविका मिश्रा कहती हैं, ‘‘डाक्टरी पेशा सेवा के साथ किया जाने वाला बिजनैस है. इस में डाक्टर और मरीज के बीच जो रिश्ता बनता है वह दूसरे किसी बिजनैस में नहीं बनता. डाक्टर मरीज से जो फीस लेता है वह ज्यादा नहीं होती. आज विज्ञान ने ऐसी बहुत सारी तकनीकें ईजाद की हैं जिन से मरीज की सेवा बेहतर तरीके से की जा रही है. ऐसी मशीनों और दवाओं का प्रबंध करने के लिए अस्पतालों को सुविधाएं जुटानी पड़ती हैं. अगर डाक्टरी पेशे को नोबल पेशे के रूप में देखना है तो सेवा और व्यवसाय के बीच का रास्ता बनाना होगा. दोनों को एकदूसरे की जरूरतों को समझना पडे़गा. समयअसमय इमरजैंसी में जिस तरह से डाक्टर अपनी सुविधा का ध्यान न रखते हुए मरीज की सेवा करता है यह भाव किसी दूसरे प्रोफैशन में फीस लेने के बाद भी नहीं दिखता है.                            

जर्जर जहाज के कप्तान सीताराम येचुरी

सीताराम येचुरी भले आदमी हैं लेकिन वे जर्जर जहाज के कप्तान बने हैं या वे ऐसे गांव के मुखिया बने हैं जहां कोई रहता नहीं है. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता सीताराम येचुरी के पार्टी के महासचिव बनने पर ऐसी टिप्पणियां होनी लाजिमी ही हैं. किसी समय भारतीय राजनीति में महाबली मानी जाने वाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और वाममोरचे की हालत इन दिनों बेहद खस्ता है. केरल व पश्चिम बंगाल में शासन करने वाली माकपा चुनाव ही नहीं हारी, हिम्मत भी हार चुकी है. केवल त्रिपुरा जैसा छोटा राज्य ही बचा है जहां वह अब भी सत्ता में है. लोकसभा में उस की संख्या सिकुड़ चुकी है. येचुरी के लिए तो सिर मुंड़ाते ही ओले पड़े वाली कहावत सही साबित हुई कि माकपा अपना गढ़ रहे पश्चिम बंगाल के स्थानीय निकायों के चुनाव में बुरी तरह से पराजित हो गई. कोलकाता के 144 वार्डों में से केवल 15 वार्डों में ही वह जीत पाई. शेष बंगाल में तो हालत और भी बुरी रही. 91 स्थानीय निकायों में से केवल 6 निकायों में ही वह जीत पाई. मतलब साफ है कि पार्टी रसातल में पहुंच चुकी है.

वक्त ने क्या सितम ढाया है कि कभी जो कम्युनिस्ट पार्टी लाल किले पर लाल निशान फहराने के सपने देखती थी वह आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण के जमाने में लुप्त प्रजाति बनती जा रही है. ऐसे समय में सीताराम येचुरी माकपा के महासचिव चुने गए हैं. यह तो अच्छा ही हुआ कि सीताराम येचुरी की माकपा का महासचिव बनने की हसरत पूरी हो गई जिस के लिए हमेशा उन का पूर्व महासचिव प्रकाश करात के साथ टकराव होता रहता था लेकिन माकपा की हालत देखते हुए तो यही लगता है कि यह पद कांटो भरा ताज है. येचुरी के कुछ प्रशंसक ऐसे भी हैं जो मानते हैं कि उदारवादी येचुरी माकपा के डेंग सियाओपिंग, जो चीन के नेता थे, की तरह माकपा के तारनहार साबित हो सकते हैं. यह बात अलग है कि येचुरी ने कम से कम अब तक इस बात का प्रमाण नहीं दिया कि उन में लीक से हट कर सोचने की क्षमता है और वे अगर डेंग न सही तो कम से कम मोदी की तरह अपनी पार्टी का कायाकल्प कर सकते हैं.

12 अगस्त, 1952 को तमिलनाडु के चेन्नई में जन्मे सीताराम येचुरी का बचपन हैदराबाद में गुजरा. मैट्रिक हैदराबाद के ही औल सेंट्स हाईस्कूल से किया. उस के बाद की पढ़ाई के लिए वे दिल्ली आए और प्रैसिडैंट्स इस्टेट स्कूल से विद्यालयी शिक्षा पूरी की, फिर सेंट स्टीफंस कालेज से अर्थशास्त्र में स्नातक की पढ़ाई की. इस के बाद उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एमए कंपलीट किया. जेएनयू के दिनों में ही इन का विवाह सीमा चिश्ती से हुआ. हालांकि सीमा चिश्ती से पहले उन का एक विवाह हो चुका था. पहली शादी से उन के एक बेटा और एक पुत्री भी हैं. दिल्ली के अमीरों के बच्चों को पढ़ाने वाले सेंट स्टीफंस कालेज और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पढ़े येचुरी आपातकाल के दौरान गिरफ्तारी के कारण अपनी पीएचडी पूरी नहीं कर पाए. रिहाई के बाद वे जेएनयू छात्रसंघ के 3 बार अध्यक्ष चुने गए. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में प्रकाश करात और सीताराम येचुरी की जोड़ी हमेशा ही चर्चा में रही क्योंकि दोनों ने ही पार्टी में तेजी से तरक्की की. दोनों ही महासचिव के सर्वोच्च पद तक पहुंचे. लेकिन उन की इस तरक्की को बहुत सराहा नहीं जाता. उन के बारे में लोग व्यंग्य में कहते हैं कि ये दोनों माकपा कालेज रिकू्रट हैं तो कुछ कहते हैं ये पार्टी की सिविल सर्विस से आए हुए हैं.

माकपा का अपने बारे में यह खयाल है कि वह क्रांतिकारी पार्टी है और उस का नेतृत्व जनआंदोलनों की आग में तप कर निकलता है. तभी तो बी टी रणदीवे, पुछलापल्ली सुंदरैया, ईएमएस नंबूदिरीपाद, हरकिशन सिंह सुरजीत जैसे लोग महासचिव बने. इन के विपरीत प्रकाश करात और सीताराम येचुरी ने छात्र आंदोलनों के बाहर कोई बड़ा काम नहीं किया, न उन का कोई जनाधार है. दरअसल ये दोनों, पार्टी के शीर्ष नेताओं के बहुत प्रिय थे. नेताओं ने इन्हें भविष्य के नेता के तौर पर तैयार करने का फैसला किया. फिर पार्टी संगठन में उन की तेजी से तरक्की हुई. 

बहुत कम उम्र में दोनों पार्टी की पोलितब्यूरो के सदस्य बन गए थे. ऐसा नहीं था कि माकपा में तब युवा और बौद्धिक रूप से प्रखर कार्यकर्ताओं की कमी थी लेकिन उन्हें हाशिये पर डाल कर माकपा के नेताओं, हरकिशन सिंह सुरजीत, ज्योति बसु आदि द्वारा प्रकाश करात, सीताराम येचुरी को पसंद करने के पीछे माकपा के शीर्षस्थ नेताओं की अपनी असुरक्षा की भावना काम कर ही थी. उन्हें ऐसे नेता रास नहीं आते थे जिन के पास बौद्धिक प्रखरता के साथ जनाधार भी हो. उन से वे असुरक्षित महसूस करते थे. लेकिन करात और येचुरी ने भी एक बार शीर्ष नेताओं को झटका दिया ही था. 1996 में जब महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु को तीसरे मोरचे की सरकार का प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे तब येचुरी और करात सहित पार्टी की पोलितब्यूरो के कई सदस्यों द्वारा विरोध किए जाने के कारण ज्योति बसु प्रधानमंत्री नहीं बन पाए. कई कम्युनिस्ट नेताओं ने इसे ऐतिहासिक गलती बताया था जिस के कारण देश में कम्युनिस्ट प्रधानमंत्री के बनने का मौका माकपा ने खो दिया.

माकपा नेतृत्व के ये दोनों चिकनेचुपड़े चहेते शीर्ष पदों तक पहुंचे. इन में करात पहले महासचिव बने, जिन्हें कट्टरवादी माना जाता था. जबकि येचुरी की गिनती उदारवादियों में होती है. करात के महासचिव बनने के बाद येचुरी और करात के बीच प्रतिद्वंद्विता बढ़ गई. तब येचुरी कहते थे कि माकपा पर एक गुट हावी है जिसे वे साहिब, बीवी और गुलाम का गुट कहते थे. इस से उन का मतलब होता था साहिब यानी प्रकाश करात, बीवी यानी उन की पत्नी वृंदा करात और गुलाम से उन का मतलब था पोलितब्यूरो के सदस्य रामचंद्र पिल्लई, जो इस बार महासचिव के चुनाव में उन के प्रतिद्वंद्वी थे दिल्ली के येचुरी और करात के बहुत तेजी से शीर्ष तक पहुंच जाने की एक और वजह थी कि माकपा का शीर्ष नेतृत्व राज्यों के क्षेत्रीय क्षत्रपों से बना हुआ है और वे दिल्ली में रहना पसंद नहीं करते. वे पार्टी की बैठकों में सुबह के विमान से आते  शाम के विमान से चले जाते. उन की चिंता का विषय उन के अपने क्षेत्र हैं न कि दिल्ली. ऐसी संकीर्ण मानसिकता वाले नेता माकपा को कभी अखिल भारतीय पार्टी न बना पाए, तो अचरज कैसा.

वैसे येचुरी अपने मिलनसार व्यक्तित्व के कारण माकपा ही नहीं, बाकी पार्टियों के नेताओं में भी खासे लोकप्रिय हैं. बताया जाता है कि पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव ने येचुरी को कैबिनेट मंत्री पद देने का प्रस्ताव रखा था लेकिन येचुरी अपनी विचारधारा पर अडिग रहे. विशाखापट्टनम में हुए चुनाव में रामचंद्र पिल्लई और येचुरी के मुकाबले में कुछ बातें पहले से ही येचुरी के पक्ष में गई थीं. येचुरी, रामचंद्र पिल्लई की तुलना में 15 साल छोटे हैं. इसलिए ज्यादा युवा हैं. वे 12 अगस्त, 2015 को 63 साल के होंगे. येचुरी 2 दशक तक राष्ट्रीय राजनीति में वामदलों का चेहरा रहे हैं और राज्यसभा में पार्टी की आवाज. राज्यसभा में उन के कामकाज और भाषणों की काफी सराहना भी होती है. वे हिंदी, अंगरेजी, बंगला के अलावा तेलुगू के भी जानकार हैं.

आज की राजनीति में ये सारी विशेषताएं महत्त्वपूर्ण हैं. लेकिन माकपा आज बहुत ही दयनीय स्थिति से गुजर रही है, उसे नरेंद्र मोदी नहीं तो कम से कम अरविंद केजरीवाल जैसा नेता चाहिए जिस के लिए लोग दीवाने हों और जो पार्टी में नई जान फूंक सके, देश में एक नई बहस छेड़ सके. येचुरी बहुत मधुरभाषी, मिलनसार, पढ़ेलिखे, सभी राजनीतिक नेताओं से अच्छे रिश्ते रखने वाले हैं, लेकिन पार्टी में नई जान फूंकने वाली नेतृत्व क्षमता उन में नजर नहीं आती. उन में कुछ नया सोचने, कुछ नया करने की क्षमता का अभाव है. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि येचुरी युवाओं के बीच लोकप्रिय हैं लेकिन यह लोकप्रियता उन्हें मौजूदा हालात में मजबूती प्रदान कर पाएगी, इस में थोड़ा संशय है.

चुनौतियों का पहाड़

येचुरी पूर्व माकपा नेता हरकिशन सिंह सुरजीत के लंबे समय तक शिष्य रहे हैं, इसलिए इस देश की सक्रिय राजनीति का उन्हें लंबा अनुभव है. कभीकभी लगता है येचुरी की यही सब से बड़ी खामी है. सुरजीत पार्टियों के बाकी बुजुर्ग नेताओं से किसी माने में बेहतर नहीं थे. दरबारी राजनीति करने में उन का कोई सानी नहीं था. मगर रहे वे लकीर के फकीर ही. माकपा को वे न कभी नई सैद्धांतिक दिशा दे पाए, न ही केरल और पश्चिम बंगाल के बाहर पार्टी का कोई विस्तार कर पाए. इसलिए येचुरी यदि सुरजीत के सच्चे शिष्य हैं तो उन से कुछ नया या क्रांतिकारी करने की उम्मीद नहीं की जा सकती. सीताराम येचुरी के सामने सब से बड़ी चुनौती पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव में लैफ्ट की खोई सियासी जमीन को वापस दिलाने की होगी. पश्चिम बंगाल माकपा का सब से बड़ा गढ़ है जिस में उस ने 34 साल निरंतर शासन किया है. दिक्कत यह है कि माकपा चुनाव ही नहीं हारी, हिम्मत भी हार चुकी है.

कभी माकपा राष्ट्रीय मान्यताप्राप्त पार्टी थी लेकिन उस की राष्ट्रीय मान्यता 2014 के चुनावों में खो गई है. 2009 में पार्टी के 24 सांसद थे जो अब घट कर 9 रह गए हैं. पिछले लोकसभा चुनाव में वामदलों के मतों का प्रतिशत 7 था जो घट कर 4.5 रह गया. जो पार्टी वर्ग, चरित्र और जातीय समीकरणों व संरचना को ले कर सैद्धांतिक तौर पर बहुत चिंतित रहती है उस के कैडर में 6.5 प्रतिशत ही युवा हैं जबकि देश की 51 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है. जिस पार्टी के पास युवा कार्यकर्ता नहीं हों उस का भविष्य क्या होगा. वैसे भी आज का युवा साम्यवाद या समाजवाद को वैचारिक कबाड़ समझता है और उस की तरफ झांकना भी नहीं चाहता.

इस सिलसिले में अरविंद केजरीवाल की यह उपलब्धि माननी पड़ेगी कि उन्होंने भ्रष्टाचार के विमर्श पर ही दिल्ली में एक ऐसी पार्टी खड़ी की जिस का आधार माकपा का सर्वहारा यानी दलित, मजदूर, किसान, झुग्गीझोपड़ी वाले हैं. जिस ने चुनाव में ऐसी चुनावी सफलता हासिल की जिसे भूतो न भविष्यति कहा जा सकता है. लेकिन कोई कम्युनिस्ट ऐसा एक भी रचनात्मक प्रयोग सफलतापूर्वक नहीं कर पाया. वह पूंजीवाद और अमेरिकी साम्राज्यवाद से लड़ना, समाजवाद को मजबूत बनाना जैसी घिसीपिटी शब्दावली से बाहर नहीं निकल पाता. महासचिव चुने जाने के बाद माकपा बैठक को संबोधित करते हुए येचुरी ने कहा कि यह भविष्य का सम्मेलन है, हमारी पार्टी के भविष्य का और देश के भविष्य का. हमारा काम वाम और लोकतांत्रिक ताकतों को मजबूत करना है. इस सम्मेलन का सुस्पष्ट निष्कर्ष है कि दुनिया में पूंजीवाद संकट गहराता जा रहा है. समाजवाद के लिए संघर्ष बढ़ाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है. मानव सभ्यता का कोई भविष्य है तो वह भविष्य समाजवाद में है.

देश के वाम आंदोलनों में जान फूंक कर दूसरे वामदलों को माकपा से जोड़ने का कोई खाका भी येचुरी के पास नहीं है. चुने जाने के बाद उन्होंने यह कहा कि माकपा और भाकपा का विलय जरूर उन के एजेंडे पर है, जल्दी ही यह काम होगा. लेकिन आज के समय में इतना काफी नहीं है. दरअसल, भाकपा की ताकत इतनी कम है कि इस से माकपा की स्थिति में कोई खास फर्क नहीं आएगा. यों भी वाम एकता की कोशिश करना मेढक तौलने की तरह है.     

लचर कानून व शासन तंत्र

जयराम जयललिता को कानूनी आतंक से मुक्ति मिलने के बाद लोकतंत्र के स्वयंभू रक्षक जिस तरह का सियापा पीट रहे हैं उस से आश्चर्य नहीं होना चाहिए. इस देश की शिक्षित जनता की आदत हो गई है कि वह अपने मन के बनाए खलनायकों को तुरंत फांसी पर चढ़वाने की वकालत करती है पर आसपास मंडराते सैकड़ों राक्षसों के उत्पातों को सहन करती जाती है. तमिलनाडु की अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम पार्टी की नेता जयललिता ने 19 वर्ष पहले अपने पहले मुख्यमंत्रित्व काल में कुछ हेराफेरियां की थीं या नहीं, इस पर मुकदमे चल रहे थे और वे कभी जेल में होतीं, कभी बाहर. पर कानूनी तूफानों के बावजूद उन का सूरज चमकता रहा और वे न केवल कांगे्रस को धराशायी कर पाईं, अपनी प्रबल प्रतिद्वंद्वी द्रविड़ मुनेत्र कषगम को चित कर पाईं बल्कि भारतीय जनता पार्टी को राज्य में पैर नहीं जमाने की इजाजत तक नहीं दी.

तमिलनाडु की यह नेता गुनाहगार थी या नहीं, यह कभी पता नहीं चलेगा पर देश की चैटरिंग, बकबकिया क्लास ने उन्हें वर्षों से अपराधी मान रखा है. यह ठीक नहीं है. हमारे यहां जो उंगलियां उठाते हैं वे भूल जाते हैं कि देश का कानून, प्रशासनिक तंत्र ऐसा है कि हर किसी को पहले दिन गुनाहगार मान लेना आसान है पर गुनाह साबित करना असंभव सा है. हमारे यहां समय के चलते गवाह मुकरते रहते हैं, सरकारी वकील खरीदे जाते हैं, जजों की पसंदनापसंद बदलती रहती है. सब से बड़ी बात यह है कि हमारा नैतिकता का आधार पानी पर तैरता है, जब चाहे ऊपर हो जाए, जब चाहे नीचे, जब चाहे उत्तर से बहने लगे, जब चाहे दक्षिण में धकेल दे. हमारी नैतिकता का ढोल पीटने वाले उन ऋषियों, मुनियों, अवतारों की पूजा करते हैं जिन के नैतिक काम ढूंढ़ने के लिए माइक्रोस्कोप चाहिए.

हमारे यहां नैतिकता के दावेदार लाइनें तोड़ कर आगे बढ़ते हैं, रिश्वत दे कर या सिफारिश लगवा कर काम करवाते हैं, रातदिन मेहनत कर के कानूनों का ऐसा जाल बुनवाते हैं कि कोई शरीफ बचे ही नहीं और सभी पर कालिख लगी हो. हमारे यहां 100-200 राजनीतिबाजों को तो कोसा जाता है पर उन करोड़ों सरकारी अफसरों को दिल का लाड़ला बना कर रखा जाता है जो सिर्फ लूटना, मौज करना, राज करना जानते हैं. उन्हें रातदिन संरक्षण मिलता है और नेताओं को, जिन्हें जनता चुनती है, मानवीय प्रलाप सहना पड़ता है. जयललिता गुनाहगार थीं या नहीं, यह सवाल नहीं, सवाल यह है कि ऐसा तंत्र क्यों बना कि एक मुख्यमंत्री बजाय जनता के हितों की रक्षा करने के अपने हितों की सोच भी सकती है जबकि उस की डोर हर समय जनता के हाथ में रहती है और वह दसियों तरह के चुनावों व लगातार संसद या विधानसभा की जांच के दायरे में रहती है. नेता इसलिए बेईमानी करता है क्योंकि उस के पिछलग्गू लोकतंत्र के लिए नहीं, प्रभाव के लिए काम करते हैं और वे चाहते हैं कि नेता उन्हें पालने के लिए अपनी जेब से खर्च करे.

यहां नेता को मानसम्मान उस के गुणों के कारण नहीं, उस के पीछे की भीड़ पर निर्भर है. वह बाबाओं की तरह भी हो सकता है और मटका किंग की तरह भी या फिल्मी नचैया की तरह भी. जिस समाज को काली मूर्तियों को पूजने की आदत हो वह शुद्ध, सफेद नेताओं की कल्पना कैसे कर सकता है?

बिखर गया कम्युनिस्टी सपना?

‘दिशा वाम वाम वाम, समय साम्यवादी’-यह लिखा था हिंदी के कवि शमशेर बहादुर सिंह ने साम्यवाद और वामपंथ की ऐतिहासिक अनिवार्यता के बारे में. यह कविता तब लिखी गई थी जब आधी दुनिया लाल थी. साम्यवादी सोवियत संघ महाशक्ति था और अमेरिकी व पश्चिमी साम्राज्यवाद को चुनौती देता था. पूर्वी यूरोप के देश हंगरी, चैकोस्लोवाकिया, पोलैंड, पूर्वी जरमनी उस के उपनिवेश थे.

बाल्कान के देशों–यूगोस्लाविया, रूमानिया, अलबानिया आदि में भी कम्युनिज्म की तूती बोलती थी. दुनिया की सब से ज्यादा आबादी वाला चीन माओवाद के रास्ते से तरक्की कर रहा था.  इस के अलावा वियतनाम, कंबोडिया, उत्तरी कोरिया, क्यूबा, लाओस आदि में साम्यवाद का झंडा फ हराता था. दुनिया के ज्यादातर देशों में कम्युनिस्टों व वामपंथी दलों के नेतृत्व में मजदूर और किसानों के जुझारू आंदोलन चलते थे, जहां ‘दुनिया के मजदूरो, एक हो’ और ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे गूंजते थे. तब एक सपना पलता था कि धीरेधीरे सारी दुनिया लाल हो जाएगी. एक नई सुबह आएगी, जब शोषण और दमन खत्म हो कर नई खुशहाली आएगी. लेकिन वह सपना टूट गया, इसलिए टूट गया क्योंकि कम्युनिज्म का सपना दुस्वप्न साबित हुआ लोगों के लिए. सोवियत संघ, पूर्वी यूरोप एबाल्कान में साम्यवादी साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह गया. कम्युनिस्ट देश चीन पूंजीवादी हो कर बाजारू अर्थव्यवस्था की शरण में चला गया. उस ने बोर्ड तो कम्युनिज्म का लगा रखा है पर वहां माल पूंजीवाद का बिक रहा है. यह तो साम्यवादी विचारधारा की जड़ों पर कुठाराघात  था. महाशक्ति  अमेरिका को धूल चटा देने वाले हो ची मिन्ह का वियतनाम अब अमेरिका के सामने मदद के लिए कटोरा फैला रहा है. फिदेल कास्त्रो का क्यूबा साम्यवाद का म्यूजियम बन कर अब भी किसी तरह जिंदा है. वह भी अंकल सैम की तरफ  दोस्ती का हाथ बढ़ा रहा है.

जब सारी दुनिया को साम्यवाद का प्रकाश देने वाले देश एकएक कर ढह गए तो विश्व साम्यवाद भी राह से भटक गया. कई जगह तो साम्यवादी पार्टियों ने लोकतांत्रिक समाजवाद की विचारधारा को अपना लिया. नेपाल जैसे देशों में तो माओवादियों ने भी संसदीय लोकतंत्र की राह पकड़ ली. साम्यवाद के इस विखंडन का सब से बड़ा असर मनोवैज्ञानिक था. पहले आम कम्युनिस्ट में यह विश्वास होता था कि कम्युनिज्म आ कर ही रहेगा, वह ऐतिहासिक अनिवार्यता है. लेकिन वह भावना चूरचूर हो गई. दुनियाभर की कम्युनिस्ट पार्टियां उस का बुरी तरह शिकार हुई हैं.  आखिर ऐसा क्या हो गया कि जो विचारधारा देखतेदेखते सारी दुनिया पर छा जाती हुई लग रही थी वह अचानक कहां खो गई? दुनिया को लाल बनाने का सपना कहां गुम हो गया? कुछ इतिहास और अर्थशास्त्र के अध्येताओं का कहना है कि दुनिया केवल सपने से नहीं अर्थशास्त्र के कठोर नियमों से चलती है. आखिरकार वही व्यवस्थाएं, वही सभ्यताएं जीती हैं जो अर्थशास्त्र के नियमों और मानव मन की गहरी समझ के बल पर खड़ी होती हैं.

पूंजीवाद एक ऐसी ही व्यवस्था है और इसीलिए वह कई सदियों से अपना अस्तित्व बनाए हुए है. पिछली 3-4 सदियों में उस ने बहुत सारे देशों और करोड़ों लोगों को खुशहाल बनाया है, फिर भी जिंदा है और अपना निरंतर पुनर्नवीनीकरण भी कर रहा है. इस के विपरीत साम्यवाद समृद्धि और समानता की बात करता है लेकिन वह दरिद्रता का दर्शन है और गरीबी का अर्थशास्त्र है. यही वजह है कि वह पश्चिमी पूंजीवादी व्यवस्था के सामने टिक नहीं पाया और अपने अंतर्विरोधों के बोझ से दब कर खत्म हो गया. मजदूर तो कम्युनिज्म के नाम से ही दूर भाग रहे हैं. क्यों न भागें? कम्युनिज्म उन्हें जो देने का वादा करता था उस से कहीं ज्यादा तो शोषक पूंजीवाद ने दे दिया. अब तो यह भी अपील नहीं की जा सकती कि दुनिया के मजदूरो एक हो जाओ, तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है. क्योंकि पश्चिमी देशों में पूंजीवादी व्यवस्थाओं ने उन का भरपूर शोषण करने के बावजूद उन्हें मालामाल कर दिया. वहां मजदूर पहले की तरह कड़का, सर्वहारा  नहीं रहा. उस के पास खोने के लिए बहुत कुछ है–फ्लैट है, गाड़ी है, टीवी है, फ्रि ज है, एसी है, मोटी बीमा पौलिसियां हैं. जब मनी हो और हनी हो तो फि र भला वह क्रांति, भ्रांति के चक्कर में क्यों पड़ेगा.

पिछले कुछ वर्षों में साम्यवाद और समाजवाद बीते जमाने की बात हो गए और ज्यादातर देशों को विकास का पूंजीवादी रास्ता ही रास आ रहा है. वक्त ने कुछ ऐसी पलटी मारी कि आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण के जमाने में यह कहने की नौबत आ गई. दिशा दक्षिण दक्षिण दक्षिण, समय पूंजीवादी यानी कवि ने कभी जो कहा था कि ‘दिशा वाम वाम वाम, समय साम्यवादी’ आज फिट नहीं है. फिर ऐसे में साम्यवादी विचारधारा और आंदोलनों का भविष्य क्या होगा? क्या यह माना जाए कि कम्युनिज्म के साथ मनुष्यता का  समता पर आधारित समाज का सपना भी खत्म हो गया?

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कम्युनिज्म के पतन का असर बाकी दुनिया की तरह भारत पर भी पड़ा है. कभी कम्युनिस्ट पार्टियां भारत में कम्युनिस्ट क्रांति का सपना देखते हुए नारा लगाती थीं : ‘लालकिले पर लाल निशान, मांग रहा है हिंदुस्तान.’ लेकिन वक्त के सितम तो देखिए कि कुछ ही दशकों में देश का कम्युनिस्ट आंदोलन टुकड़ेटुकड़े हो कर बिखर गया. कभी देश की राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली कम्युनिस्ट पार्टियां इतनी कमजोर हो चुकी हैं. भारत की मूल साम्यवादी पार्टी थी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी यानी भाकपा. तब कम्युनिस्ट पार्टी सही माने में अखिल भारतीय पार्टी थी. देशभर में उस का प्रभाव था. 1964 में चीन के भारत पर हमले को ले कर पार्टी में फूट पड़ गई. इन में से भाकपा रूस परस्त पार्टी थी जो अपने अस्तित्व के लिए पूरी तरह से सोवियत संघ पर निर्भर होती थी. वह इस कदर सोवियत संघपरस्त थी कि मास्को में बारिश होती थी तो भाकपाई कामरेड हिंदुस्तान में छाता तान लेते थे. इसलिए सोवियत संघ का विघटन भाकपा के लिए तो जानलेवा साबित हुआ. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट माकपा ने सोवियत संघ और चीन दोनों से समान दूरी बनाए रखी पर वह सोवियत संघ की नाकामी व चीन  के भटकाव का विश्लेषण करतेकरते खुद भी भटक गई. उस के वैचारिक भटकाव ने सारे काडर को भी प्रभावित किया.

माकपा का उजड़ना

जिस पश्चिम बंगाल पर 34 बरसों तक माकपा निरंतर शासन करती रही वहां वह इतनी बुरी तरह हारी कि उस के लिए फिर से उठ खड़े होना मुश्किल हो रहा है. केरल में जहां वह बारीबारी से कांग्रेस के मुकाबले सरकार में रहती थी वहां भी हार चुकी है. छोटे से राज्य त्रिपुरा में ही उस की सरकार बची है. उस की सरकार के अलावा सबकुछ उजड़ गया महान क्रांतिकारी नेता प्रकाश करात के महासचिव रहते. इसलिए राजनीतिक पर्यवेक्षक यह मानते हैं कि प्रकाश करात पार्टी में नीतियों का नया प्रकाश लाने के बजाय सैद्धांतिक  कट्टरतावाद का अंधेरा ले कर आए जो पार्टी की चुनावी पराजय का कारण बना. अब उन की जगह सीताराम येचुरी महासचिव बने हैं. येचुरी उदारवादी हैं, इस का मतलब केवल इतना है कि वे करात की तरह सैद्धांतिक मामलों में कट्टर ही हैं मगर वे कांग्रेस के साथ सहयोग करने को भी तैयार हैं. आज हालत यह है कि केवल कम्युनिस्ट एकता से बात नहीं बनेगी. देश के वाम आंदोलनों में जान फूंक कर उन्हें माकपा से जोड़ने का कोई खाका भी येचुरी के पास नहीं है. इस समय देश में 30 वाम संगठन हैं.

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियों की सब से त्रासदी यह है कि वैचारिक पाखंड उन का स्वभाव बन गया है. माकपाभाकपा संसदीय लोकतंत्र में भागीदारी कर तो रही हैं लेकिन उन्होंने सर्वहारा की तानाशाही जैसी अपनी लोकतंत्र विरोधी अवधारणाओं को छोड़ा भी नहीं है. ऐसे में कैसे माना जाए कि वे लोकतांत्रिक हैं. वे मानव अधिकारों की बात करती हैं मगर उन्होंने स्तालिन और माओ जैसे अपने नेताओं को नकारा नहीं है जिन के हाथ लाखों निर्दोष लोगों के खून से रंगे हुए हैं. ऐसी स्थिति में सिर्फ  यही कहा जा सकता है कि कम्युनिस्ट पार्टियां लोकतांत्रिक होने का ढोंग कर रही हैं ताकि संसदीय राजनीति में हिस्सा ले सकें जबकि मार्क्सवाद की लोकतंत्र विरोधी अवधारणाओं से उन्होंने मुक्ति नहीं पाई है.

इसी तरह उन का आर्थिक एजेंडा भी स्पष्ट नहीं है. पिछले कुछ वर्षों के दौरान एक बात तो स्पष्ट हो गई है कि साम्यवाद की उत्पादन और वितरण  के साधनों पर सरकारी स्वामित्व और नियोजित अर्थव्यवस्था की जिद देश को विकास के पथ पर नहीं ले जा सकती. क्योंकि चाहे जो कर लो सरकारी अफसरों को न उत्पाद से दिली मतलब है न सेवा से. सरकारी अफसर जनता पर राज करना चाहता है और वह भी निरंकुश और यही फार्मूला वह सरकारी उद्योगों में अपनाता है, जहां कर्मचारी और उपभोक्ता, जनता दोनों वे पक्ष हो जाते हैं, जिन्हें लूटना है, जिन की सेवा नहीं करनी. माकपाभाकपा इसे छोड़ने को कतई तैयार नहीं हैं. जबकि चीन के अनुभव ने बता दिया कि खुले बाजार की व्यवस्था यानी उत्पादन को सरकारी चंगुल से निकाल देना को अपनाकर किस तरह तेजी से प्रगति की जा सकती है. डेंग सियाओपिंग ने चीन के कम्युनिस्टों को सब से पहली बात तो यह समझाई कि साम्यवाद का मतलब गरीबी नहीं होता. साम्यवाद और समृद्धि का कोई बैर नहीं है. इसी संदर्भ में वे कहते थे कि जब तक बिल्ली चूहे पकड़ती है तब तक इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि वह काली है या सफेद है.

नाकाम साम्यवाद

भारतीय  कम्युनिस्ट पार्टियां कभी  डेंग को समझ ही नहीं पाईं, इसलिए बंदरिया की तरह मरे हुए सिद्धांतों के बच्चों को छाती से लगा कर बैठी हैं. माकपा ने चीन के आर्थिक मौडल को सराहने के बजाय हमेशा उस की तीखी आलोचना की है और कहा कि इस के कारण चीन में असमानता और भ्रष्टाचार बढ़ा है. माकपा की दुविधा यह है कि सोवियत संघ बिखर गया. चीन साम्यवाद के रास्ते से भटक गया. वियतनाम और क्यूबा ने ऐसा कुछ कमाल किया नहीं जिसे मौडल माना जा सके. ऐसी स्थिति में किसी न किसी का अनुकरण करने वाली माकपा किसे अपना मौडल माने? हर बार की तरह उस ने इस बार भी कहा है कि वह भारत के लिए अपना अलग मौडल बनाएगी. लेकिन उस मौडल की कोई रूपरेखा नजर नहीं आती. उस के पास वितरण के न्याय का तो लंबाचौड़ा एजेंडा है लेकिन वितरण करने  के लिए पहले उत्पादन बढ़ाने और ऊंची विकास दर को हासिल करना जरूरी है, लेकिन उस का कोई एजेंडा पार्टी के पास नहीं है. एक बात तो स्पष्ट है कि साम्यवाद के तरीके कम से कम उत्पादन बढ़ाने के मामले में नाकाम साबित हो चुके हैं, इसलिए चीन को बाजारवाद की राह अपनानी पड़ी.

बुद्धदेव भट्टाचार्य जैसे खांटी कम्युनिस्ट भी आर्थिक सुधार आर्थिक उदारवाद और वैश्वीकरण की बातें करने लगे. लेकिन माकपा ने कसम खा रखी है कि वह नहीं सुधरेगी. दरअसल, विकास जैसे मुद्दे पर माकपा की सोच बाबा आदम के जमाने की है. माकपा की विकास की सोच इतनी उलटी है कि उस ने औद्योगिक तौर पर उन्नत पश्चिम बंगाल को अपने शासनकाल में औद्योगिक रेगिस्तान बना दिया. सारे उद्योगधंधे खत्म हो गए. उस का सारा जोर कृषि के विकास पर ही केंद्रित रहा. नतीजतन, पश्चिम बंगाल का सारा विकास अवरुद्ध हो गया क्योंकि कृषि पर आधारित विकास की अपनी सीमाएं हैं. बुद्धदेव भट्टाचार्य के समय में फिर औद्योगिक विकास किए जाने की कोशिश शुरू हुई, जो कामयाब नहीं हो पाई. लेकिन यह सब माकपा की विकास के मामले में तुगलकी सोच का ही नमूना था. जिस तरह माकपा ने पश्चिम बंगाल और केरल का विकास नहीं होने दिया, वैसे ही अब वह उदारीकरण के कानूनों का विरोध कर के देश के विकास में अड़ंगे लगा रही है. ऐसी किसी पार्टी के प्रति लोग क्यों आकर्षित होंगे जो औद्योगिक विकास को ले कर इतनी लापरवाह है. ऐसी पार्टियों की जगह तो इतिहास के कूड़ेदान में होती है. हाल ही में पश्चिम बंगाल के स्थानीय निकायों के चुनाव ने स्पष्ट कर दिया कि जनता माकपा को भूल चुकी है.

भूचाल से बेहाल नेपाल

भूकंप के बाद नेपाल की राजधानी  काठमांडू की सड़कों और गलियों के भयावह मंजर मानो चीखचीख कर कह रहे थे कि ‘अब भी चेत जाओ वरना जान और माल गंवाने के लिए तैयार रहो’. शहर के कोटेश्वर महल्ले के ज्यादातर घर कब्रमें तबदील हो चुके हैं. नेपाल के कई लोगों से बातचीत के बाद इस नतीजे पर पहुंचा जा सकता है कि नेपालियों ने नेपाल की प्राकृतिक खूबसूरती का जम कर दोहन किया लेकिन उस के बदले में देश को कुछ दिया नहीं. जिस देश की 52 फीसदी कमाई प्राकृतिक नजारों, ऐतिहासिक इमारतों और विदेशी पर्यटकों से होती है,वहां उसे संजो कर रखने की न कोई मंशा है और न ही सरकार की कोई ठोस योजना. पहाड़ों और जंगलों के लिए दुनियाभर में मशहूर नेपाल आज कंक्रीट के बेतरतीब जंगल में बदल चुका है जिस का खमियाजा तो उसे भुगतना ही होगा.

काठमांडू, भक्तपुर, ललितपुर, पोखरा, लुम्बिनी, तिलोत्तमा, भैरवा, बुटवन आदि इलाकों में पर्यटकों की भरमार रहती है. हर साल 8 से 9 लाख विदेशी पर्यटक नेपाल घूमने आते हैं. इन पर्यटकों से नेपालियों को भारी कमाई होती है. लेकिन अब तसवीर बदल चुकी है. पोखरा घूमने आए नागपुर के पर्यटक संजीव कुमार कहते हैं कि वे पोखरा में बडे़ पैमाने पर छोटेछोटे गैस्टहाउस और पेइंग गैस्टहाउस खुले हुए हैं. वहां तकरीबन हर घर छोटा गेस्टहाउस बना हुआ है. गेस्टहाउस वाले पर्यटकों को ठगने और लूटने के धंधे में लगे हुए हैं.

ठगी और लूट

संजीव बताते हैं, ‘‘जब मैं पोखरा बस अड्डे पर उतरा तो सैकड़ों की तादाद में टैक्सी वालों ने घेर लिया. कोई 300 रुपए में गेस्टहाउस, कोई 200 रुपए में गैस्टहाउस…चिल्ला रहा था. बस से उतरे कई पर्यटकों का जबरन सामान ले कर वे अपनी टैक्सी में रख लेते हैं. मेरा भी सूटकेस ले कर एक टैक्सी वाले ने अपनी टैक्सी में रख लिया और मुझे गैस्टहाउस पहुंचा दिया. गैस्टहाउस में 3 दिन ठहरा और रात को जब वहां से निकलने लगा तो बिल लाने के लिए कहा. बिल देख कर तो मेरा सिर चकरा गया. 300 रुपए रोजाना किराए की बात हुई थी और बिल 800 रुपए रोज के हिसाब से बनाया गया था. इस बारे में पूछने पर गेस्टहाउस मालिक कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था. टैक्सी वाला ही मकानमालिक यानी गेस्टहाउस का मालिक था और वह शराब के नशे में था. जब मैं ने उस से कहा कि 300 रुपए किराया बताया गया था पर 800 रुपए का बिल क्यों बनाया, तो उस ने छूटते ही कहा, ‘‘अगर 800 रुपए किराया बताया जाता तो आप आते ही नहीं. यह तो बिजनेस ट्रिक है.’’

नेपालियों की इसी सोच ने नेपाल को चौपट कर रखा है. यह तो एक बानगी है. नेपाल में टैक्सी वाले और अपने घरों को गेस्टहाउस बना कर लोग पर्यटकों से मनमाना किराया वसूलते हैं. इस बारे में पोखरा में गेस्टहाउस चलाने वाला डुंगडुग उरांव कहता है कि पर्यटकों के लिए कोई पक्का रेट तय नहीं होता है. जैसा ग्राहक होता है उस से वैसा ही वसूला जाता है. काठमांडू से ले कर नेपाल के हर इलाके में मलबे के ढेर में तबदील सैकड़ों बड़े और छोटे मकानों की हर ईंट बताती है कि उस के मालिकमकान ने उस के बूते जेब तो खूब भरी पर मकान के रखरखाव पर फूटी कौड़ी भी कभी नहीं खर्च की. भूकंप का  झटका लगने के बाद ढह चुके मकानों ने अपने मालिकों को भूकंप से भी बड़ा  झटका दिया है. पोखरा में थापा गैस्टहाउस चलाने वाले अनिल थापा की मानो दुनिया ही उजड़ गई है. 7 लोगों के परिवार को चलाना उस के लिए सब से बड़ी मुसीबत बन गई है क्योंकि उस का गेस्टहाउस जमींदोज हो चुका है.

जंगलों का सफाया

पटना के बिल्डर ज्ञानमणि सहाय बताते हैं कि उन्होंने कुछ साल पहले नेपाल में अपार्टमैंट बनाने की कोशिश की थी, पर वहां के जमीन मालिकों की अजबगजब डिमांड की वजह से उन्होंने वह आइडिया छोड़ दिया. साल 2008-09 के बीच केवल काठमांडू में करीब 2 लाख प्लौटों की खरीद और बिक्री हुई थी. पिछले 10-12 सालों के बीच जमीनों और मकानों के भाव में 300 गुना का इजाफा हो चुका है. कमाई के चक्कर में पहाड़ तोड़े जा रहे हैं और जंगलों का सफाया किया जा रहा है. ऐसे में नेपाल में तबाही मचना हैरानी की बात नहीं है. नेपाल में हर साल करीब 8 लाख पर्यटक आते हैं. गाइड राम सिंह बताता है कि हर साल अप्रैल से ले कर अगस्त तक सैलानियों की भरमार रहती है. सैलानियों की वजह से ही नेपालियों की रोजीरोटी चलती है. भूकंप ने हजारों नेपालियों की रोजीरोटी छीन ली है. दरबार स्क्वायर, धरहरा टावर, जानकी मंदिर समेत नेपाल की 7 ऐतिहासिक इमारतें और धरोहर जमीन में मिल चुकी हैं. दरबार स्क्वायर को तो यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित कर रखा था. इस का असर नेपाल की माली हालत पर पड़ेगा और इस से उबरने में देश को पचासों साल लग जाएंगे. नेपाल के सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि देश की अर्थव्यवस्था 1,178 अरब रुपए की है. इस में से 52.2 फीसदी पर्यटन, 33.7 फीसदी खेती और 14 फीसदी कैसीनों, बिजली व अन्य उत्पादनों से आता है. इस के अलावा 1 फीसदी नेपाल से बाहर रहने वाले नेपाली अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा नेपाल भेजते हैं.

काठमांडू के भृकुटिमंडपम महल्ले में स्थित नेपाल पर्यटन बोर्ड के दफ्तर का एक मुलाजिम नाम न छापने का भरोसा मिलने के बाद मायूस हो कर कहता है कि भूकंप की चोट से उबरने में नेपाल को 50 साल से ज्यादा का वक्त लग जाएगा. अप्रैल महीने में तो पर्यटन सीजन की शुरुआत ही हुई थी, और तुरंत भूचाल आ गया. इस से कई पर्यटनस्थल ध्वस्त हो गए हैं, वहीं पर्यटकों को अब यहां आने से डर भी लगेगा. पर्यटकों का भरोसा दोबारा बहाल होने में काफी समय लग जाएगा. ऐसी हालत में नेपाल की माली हालत का बद से बदतर होना तय है. अभी कुछ साल पहले ही तो नेपाल ने नए सिरे से अपना कदम जमाना शुरू किया था क्योंकि पिछले 10 सालों तक चले गृहयुद्ध और माओवादियों के आतंक से नेपाल बुरी तरह टूट चुका था. पर्यटक यहां आने से कतराने लगे थे. विदेशी पर्यटकों में भरोसा जगाने के लिए नेपाल सरकार ने वर्ष 2011 को पर्यटन वर्ष के रूप में मनाया था और 10 लाख पर्यटकों के नेपाल आने का लक्ष्य तय किया था. इस में नेपाल काफी हद तक कामयाब होने लगा था तो भूकंप ने उसे फिर से जीरो पर पहुंचा दिया है.

पर्यटन उद्योग पर चोट

नेपालियों से ज्यादा विदेशी पर्यटकों पर भूकंप की मार पड़ी है. अपने घर और देश से दूर ऐसी आपदा में फंस कर उन की मानसिक हालत डगमगा गई है. पटना के रमेश सिंह अपनी आपबीती सुनाते हुए बताते हैं कि वे अपने परिवार के साथ छुट्टियां मनाने नेपाल पहुंचे थे. जिस समय भूकंप आया हम लोग काठमांडू के धरहरा टावर के पास थे. मेरी आंखों के सामने टावर ताश के पत्तों की तरह पलक  झपकते ही ढह गया. चारों ओर अफरातफरी मच गई. उन लोगों को कुछ सम झ में ही नहीं आया कि वे क्या करें. एक टैक्सी वाले से अपने होटल चलने की गुजारिश की तो उस ने 5 हजार रुपए किराया मांगा. नेपाल के पोखरा जिले में छोटा सा होटल चला कर अपने परिवार का गुजारा करने वाले विवेक पासवान कहते हैं कि 25 अप्रैल को आए भूकंप में उन का सबकुछ तबाह हो गया. होटल का भवन भूकंप की वजह से गिर गया और उस की बीबी प्रभा पासवान घायल हो गई. पोखरा के अस्पतालों में भारी भीड़ को देखते हुए वे इलाज के लिए काठमांडू के त्रिभुवन विश्वविद्यालय शिक्षण अस्पताल पहुंचे. विवेक आगे बताते हैं कि वे अपने सभी ग्राहकों के लिए दोपहर के खाने के इंतजाम में लगे हुए थे कि अचानक रसोई की एक दीवार तेज धमाके के साथ गिर गई. गरम खाने की वजह से वहां मौजूद 6 लोग जख्मी हो गए. ईंट की दीवार गिरने से 2 लोगों का सिर फट गया. काठमांडू का हर छोटाबड़ा अस्पताल घायलों और लाशों से पटा हुआ है. वे पिछले 25 सालों से नेपाल में रह रहे हैं पर ऐसी तबाही कभी नहीं देखी.

नेपाल में आए भूकंप की वजह से भारत समेत पाकिस्तान, बंगलादेश, म्यांमार और चीन में  झटका दर  झटका लगा और वहां भी जान और माल का काफी नुकसान हो गया. नेपाल के 26 जिलों में भूकंप ने काफी नुकसान पहुंचाया जबकि पश्चिमी हिस्से में इस का खास असर नहीं हुआ. हजारों लोगों की जान गंवाने के बाद नेपाल के सामने सब से बड़ी चुनौती भूकंप के प्रकोप से बच गए लोगों और देश के पूरे सिस्टम को दोबारा पटरी पर लाने की है. नेपाल से लौट कर आए बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के कांटी प्रखंड का रहने वाला मजदूर विमल साहनी बताता है कि वहां खाने के सामान और पानी की बहुत कमी है. सारी दुकानें बंद हैं. बिजली नहीं रहने की वजह से रात में परेशानी कई गुना ज्यादा बढ़ जाती है. भूकंप के कुछ देर बाद ही काठमांडू के बीर अस्पताल के सामने लाशों का ढेर लग गया और रोतेचीखते घायलों ने पूरे माहौल को दर्द से भर दिया था.

हिमालय के एवरेस्ट शिखर के आसपास बर्फ की चट्टानों के टूट कर गिरने से 22 पर्वतारोही बर्फ में दफन हो गए. इस के साथ ही सैकड़ों विदेशी पर्यटक और गाइड लापता हैं. भूकंप के समय 1 हजार पर्वतारोही बेस कैंप में थे. समुद्रतल से 17 हजार 500 फुट ऊपर बने बेस कैंप में सब से ज्यादा तबाही मची. 19 हजार 500 फुट ऊपर कैंप नंबर-1 में किसी को कोई नुकसान नहीं हुआ. 29 मई, 1953 को सब से पहले एवरेस्ट फतह करने वाले न्यूजीलैंड के एडमंड हिलेरी के बेटे पीटर हिलेरी भी अपने 12 लोगों की टीम के साथ एवरेस्ट पर चढ़ाई कर रहे थे. वे हिमालय के गोरक शेप क्षेत्र में सुरक्षित रहे.

सब से बड़ी तबाही

पिछले 81 सालों के दौरान नेपाल में भूकंप से इस बार सब से बड़ी तबाही हुई है.25 अप्रैल की दोपहर 11 बज क 56 मिनट पर आए पहले भूकंप के  झटके की तीव्रता 7.9 आंकी गई और उस के बाद आए 25  झटकों की तीव्रता 4.5 के आसपास रही. भूकंप की वजह से नेपाल में जान और माल के साथ वहां के पर्यटन स्थलों को भी भारी नुकसान हुआ है. नेपाल का कुतुबमीनार कहा जाने वाला सालों पुराना 9 मंजिला धरहरा टावर पल भर में जमींदोज हो गया. 1832 में बने इस टावर को 1934 के भूकंप में हलका नुकसान हुआ था. 203 फुट ऊंचा धरहरा टावर काठमांडू का मुख्य टूरिस्ट स्पौट था. उस में 213 घुमावदार सीढि़यां थीं और उस की 8वीं मंजिल की बालकनी से समूचे काठमांडू का नजारा मिलता था. नेपाल की करीब 100 ऐतिहासिक इमारतों समेत 15 हजार से ज्यादा मकान ध्वस्त हो गए और करीब 66 लाख लोग इस से प्रभावित हुए हैं. भूविज्ञानी बी एन सिंह कहते हैं कि नेपाल को दुनिया का सब से ज्यादा भूकंप वाली आशंका का देश माना जाता है. हिमालय की तराई में बसा नेपाल प्राकृतिक तौर पर तो धनी है लेकिन हिमालय ही उस के लिए सब से बड़ा खतरा भी है. उस क्षेत्र में पृथ्वी की इंडियन प्लेट (भारतीय भूगर्भ परत) यूरेशियन प्लेट के नीचे दबती जा रही है, जिस से हिमालय पर्वत ऊपर की ओर उठता जा रहा है. इस से चट्टानों में विचलन पैदा होती है जो भूकंप के रूप में दुनिया को दिखाई देती है. पटना के मौसम विभाग के निदेशक ए के सेन बताते हैं कि नेपाल के उत्तरपश्चिम में 75 किलोमीटर की दूरी पर भूकंप का केंद्र था. इस का लौंगिट्यूड 28.1 डिगरी उत्तर और लेटीट्यूड 84.6 डिगरी पूरब था. रिक्टर स्केल पर इस की तीव्रता 7.5 थी और इस का केंद्र जमीन के 10 किलोमीटर नीचे था.

पर्यावरण मामलों के जानकार प्रोफैसर आर के सिन्हा बताते हैं कि भूकंप, बाढ़ और भूस्खलन हिमालय का पुराना स्वभाव रहा है. हिमालय से इंसान को कई सुविधाएं और संपदाओं के साथसाथ कई खतरे भी मिले हैं. इंसान खतरों के प्रति लापरवा रह कर हिमालय का दोहनशोषण ही करता रहा है. हिमालय क्षेत्र में भेड़चाल की तरह बनती पनबिजली योजनाओं ने खतरे को कई गुना ज्यादा बढ़ा दिया है. पर्यावरण को बचाने की गुहार लगाने वाली संस्थाएं पिछले कई सालों से चिल्ला रही हैं कि भारत, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान आदि देश हिमालय क्षेत्रों में कई बांध बना रहे हैं जिन से अगले कुछ सालों में हिमालय क्षेत्र में करीब 400 विशाल जलाशय बन जाएंगे. इस में सब से ज्यादा 292 बांध भारत बना रहा है. इस के अलावा चीन 100, नेपाल 13, पाकिस्तान 9 और भूटान 2 बांध बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं. इस से पर्यावरण को तो नुकसान हो ही रहा है, साथ में इंसानी जानमाल का खतरा भी बढ़ रहा है. इस से भी खतरनाक मसला यह है कि बांधों और पनबिजली योजनाओं को बनाने के लिए हिमालय के क्षेत्रों में जम कर विस्फोट कराए जा रहे हैं, जिस से पहाड़ों में हड़कंप मचना तय है. काठमांडू में प्रैक्टिस करने वाले चार्टर्ड अकाउंटैंट दुर्गा प्रसाद ने बताया कि भूकंप व भूकंप के बाद के 3 दिन नेपाल के लोगों ने भारी दहशत के बीच गुजारे हैं. सड़कों, मैदानों, पार्कों और तंबू के शिविरों में लोग दिनरात गुजार रहे हैं. जिन के घर तबाह हो गए हैं वे तो मजबूरी में खुले आसमान के नीचे रह रहे हैं, लेकिन जिन के घर बचे हुए हैं वे तबाही के खौफनाक मंजर को देखने के बाद अपने घरों के भीतर जाने से डर रहे हैं. इस तबाही से उबरने में नेपाल को कई साल लग जाएंगे. पिछले कई सालों से गृहयुद्ध और माओवादियों के आतंक को  झेलने के बाद अपने पैरों पर खड़ा होने की कवायद में लगे नेपाल को ताजा भूकंप ने फिर से औंधे मुंह गिरा दिया है.

नियमों से खिलवाड़

नेपाल से सटे बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा समेत समूचे भारत में भूकंप ने हलचल मचा दी है. बिहार में भूकंप से 63 लोगों की मौत हो गई.1 मिनट 57 सैकंड के भूकंप ने बिहार के बिल्डिंग एक्ट के हकीकत की पोलपट्टी खोल दी. इस के साथ ही, मकान बनाने को ले कर लोगों की लापरवाही व कानून को ठेंगा दिखाने की सोच एवं चलन की भी पोल खुल गई. राजधानी पटना समेत सूबे के हर शहर में बेतरतीब तरीके से बने मकान और नियमों की धज्जियां उड़ा कर बने अपार्टमैंट एक बड़ी तबाही को न्योता दे रहे हैं. इस भूकंप में बिहार में मकानों और अपार्टमैंटों को खास नुकसान नहीं हुआ लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के भीतर का इंजीनियर जबजब जागता है तो वे कई मौकों पर कहते रहे हैं कि अगर पटना में तेज भूकंप आया तो जान और माल का बड़ा नुकसान हो सकता है. गौरतलब है कि भूकंप की संवेदनशीलता के मामले में पटना जिला सिस्मिक जोन-4 में आता है, जो काफी जोखिम वाला क्षेत्र माना जाता है. ऐसे क्षेत्र में रिक्टर स्केल पर 8 या उस से ज्यादा आने वाला भूकंप बड़ी तबाही मचा सकता है. पटना के साथ सूबे के 38 में से 23 जिले सिस्मिक जोन-4 में आते हैं. रिटायर्ड इंजीनियर जे के भटनागर बताते हैं कि पटना समेत पूरे राज्य में शहरों को बसाने व बहुमंजिली इमारतों को बनने के नाम पर सरकारें केवल खानापूर्ति करती रही हैं. गलियों में खड़े अपार्टमैंट तबाही को दावत दे रहे हैं. पटना के 80 फीसदी इलाके भूकंप के लिहाज से हाई डैमेज रिस्क जोन में हैं. इस से तेज भूकंप आने पर बहुत बड़ा नुकसान हो सकता है. पटना नगर निगम की रोक के बाद भी अफसरों और बिल्डरों ने सांठगांठ कर गंगा नदी के किनारे कई अपार्टमैंट बना लिए हैं. भूकंप आने पर नरम और महीन बलुई मिट्टी के भरभराने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है. इस के साथ ही भवन के भार से नींव के नीचे की मिट्टी दबने लगती है, जिस से भवन के गिरने का खरा रहता है. बिहार का दरभंगा, सहरसा, सुपौल, सीतामढ़ी, मधुबनी, अररिया, मधेपुरा और किशनगंज जिले नेपाल से सटे हुए हैं, जिस वजह से इन इलाकों में भूकंप का सब से ज्यादा असर और तबाही देखने को मिली. ये जिले सब से खतरनाक सिस्मिक जोन-5 के तहत आते हैं.  

निर्माता मनोज वाजपेयी

कमाई में हिस्सेदारी किसे नहीं पसंद. लिहाजा, एक्टर भी निर्माता बनने लगे हैं. इसी कड़ी में आमिर खान, सलमान खान, शाहरुख खान, अक्षय कुमार और रणबीर कपूर शामिल हैं. अब मनोज वाजपेयी भी बतौर निर्माता तब्बू के साथ एक फिल्म बना रहे हैं. निर्देशक मुकुल अभयंकर के साथ बन रही इस फिल्म की कहानी थ्रिलर जोनर की है. फिल्म निर्माण बड़ा जोखिम भरा कदम है. फिल्म हिट तो वारेन्यारे वरना कई निर्माताओं के घर, बंगले तक बिक गए. कला को पूंजी के साथ जोड़ कर सफलतापूर्वक निबाह लेना हर एक के वश की बात नहीं. फिर भी मनोज को बधाई.

 

धार्मिक संतों की नौटंकी

जब बाबा रामरहीम की प्रचार की तरह बनाई गई फिल्म एमएसजी रिलीज हुई तो लोगों को लगा कि तथाकथित साधुसंतों और चमत्कारी बाबाओं पर बनी फिल्म में शायद कोई सार्थक संदेश मिलेगा लेकिन फिल्म देखी तो किस्सा वही ढाक के तीन पात वाला. जो धर्म का प्रवचन और चमत्कारों का चूरन समागम सभा व प्रवचन शिविर में दिया जाता है वही फिल्म में करोड़ों रुपए फूंक कर दिया गया. सिलसिला यहीं नहीं थमा, इस के कुछ महीनों बाद ‘गुरु नानक शाह फकीर’ भी रिलीज हुई. अब खबर है कि 1984 दंगे पर आधारित ‘ब्लड स्ट्रीट’, जो अब तक सैंसर में अटकी थी, रिलीज के लिए तैयार है. फिल्म में संत बलजीत सिंह डादूवाल भी नजर आएंगे. धार्मिक प्रसंगों से भरी ऐसी फिल्में समाज को फिर से जाति, धर्म, कुप्रथाओं की दुनिया में वापस ले जाती दिखती हैं जिस से बाहर आने के लिए कई पीढि़यों ने संघर्ष किया है. अब धर्म के दुकानदार प्रचार का हर हथकंडा अपनाने में लगे हैं. वे फिल्मों, इंटरनैट, ट्विटर, फेसबुक का जम कर इस्तेमाल कर रहे हैं.

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