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मेरे पापा

जीवन का मेरा हर वह पल सुनहरा हो जाता है जिस में पापा मेरे साथ होते हैं. मध्यवर्गीय परिवार से होते हुए भी उन्होंने मेरी हर मांग को पूरा किया. 15 वर्ष की छोटी सी उम्र में मुझे किडनी की बीमारी हो गई जिस कारण मैं शारीरिक रूप से कमजोर हो गया और मेरी पढ़ाई रुक गई. मैं बुरी तरह से मानसिक अवसाद से घिर गया. तब पापा ने ही मुझे अवसाद से बाहर निकाला और अपनी बीमारी से लड़ने के लिए व फिर से पढ़ाई शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया. उन के इन शब्दों ‘बेटा, हर इंसान के जीवन में संघर्ष होता है. शायद तुम्हारे जीवन में कुछ ज्यादा ही संघर्ष हो पर उस से घबराना नहीं बल्कि डट कर मुकाबला करना. तुम्हें अपनेआप को साबित करना है’ ने मेरा मनोबल बढ़ाया. उन्हीं के कारण मैं ने अपनी बीमारी को सकारात्मक रूप में लेते हुए अपनी पढ़ाई शुरू की. हाईस्कूल, इंटर और फिर गे्रजुएशन कंप्लीट किया. पर गे्रजुएशन के बाद मेरी हालत और बिगड़ी व आगे जीवित रहने के लिए डाक्टर ने ‘किडनी प्रत्यारोपण’ की सलाह दी. तब पापा ने ही 57 वर्ष की उम्र व उच्च रक्तचाप होते हुए भी अपनी एक किडनी दे कर मुझे फिर एक नया जीवनदान दिया.

औपरेशन के ठीक 1 माह बाद जब मैं पापा से मिला व हमारी नजरें एकदूसरे से मिलीं तब उमड़ते भावों, छलकते आंसू, असीम सुख की अनुभूति, सच्चे आनंद का जो एहसास हुआ उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता. तब पापा ने मुझे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने की सलाह दी ताकि मैं किसी पर बोझ न बनूं. मैं कैरियर संवारने में लग गया और पापा मेरा आत्मविश्वास बढ़ाते रहते. आज मैं पापा के प्यार, उन की सलाह, नसीहतों के साथ जीवन की नई चुनौतियों को पार करने व कैरियर बनाने में जुटा हूं.

सौरभ श्रीवास्तव, लखनऊ (उ.प्र.)

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मेरे पिताजी, जिन को हम अब्बा कहा करते थे, का सब काम अनुशासित था. वे समय के पाबंद थे. सब काम समय पर करो, यही उन का कहना रहता था. हम सब भाईबहन उन के ऋणी हैं कि उन्होंने हम सब को आत्मनिर्भर बनाया. उन की सीख थी कि स्वयं किसी को भी दुखपीड़ा न पहुंचाओ. हमेशा सच बोलो, अपनी गलती स्वीकार करो, बड़ों का आदर करो, दूसरों की यथासंभव मदद करो, झूठ का सहारा मत लो. हमें अपने पापा की सीख पर गर्व है. आज हम सब उन्हीं की प्रेरणा से आत्मनिर्भर हैं. अब हमारे बीच पापा नहीं हैं, फिर भी कोई दिन, कोई पल ऐसा नहीं जाता कि उन की याद न सताए.

कुसुम देव, सागर (म.प्र.)

मिसाल हैं कुणाल

कामयाब आदमी को भीड़ में जगह बनाने के लिए कोई अतिरिक्त कोशिश नहीं करनी पड़ती क्योंकि खुद भीड़ ही उसे अपने से अलग कर ऐसी जगह खड़ा कर देती है जहां से सब उसे और वह सभी को आसानी से देख सके.  ऐसा ही कुछ 20 मई को कुणाल बहल के साथ हुआ जब उन्होंने मध्य प्रदेश सरकार द्वारा मुख्यमंत्री निवास में आयोजित युवा उद्यमी पंचायत में शिरकत की. इस कार्यक्रम में देशप्रदेश से आए हजारों युवा उद्यमियों को पता चला कि छोटे चैक की शर्ट वाला युवा स्नैपडील का सीईओ कुणाल बहल है तो तमाम आंखें उन की तरफ मुड़ उठीं और हर कोई कुणाल से मिलने को लालायित हो उठा. आकर्षण का केंद्र बन गए कुणाल को किसी सैलिब्रिटी सरीखा ट्रीटमैंट मिला तो तय है उन्हें यह भी समझ आया होगा कि उन की कंपनी अपनेआप में एक बड़ा ब्रैंड बन चुकी है और हर कोई सिर्फ यह जानने के लिए उन पर नजरें गड़ाए बैठा है कि स्नैपडील देखते ही देखते कैसे शीर्ष पर पहुंच गई. अपनी और अपनी कंपनी की कामयाबी की कहानी कुणाल ने साझा की तो कई दिलचस्प और सीखने लायक बातें सामने आईं. मसलन, स्नैपडील आज देश की दूसरी बड़ी ई-कौमर्स कंपनी है. इस का सालाना टर्नओवर 32 हजार करोड़ रुपए है. स्नैपडील में 7 हजार कर्मचारी काम कर रहे हैं और देशभर के 500 शहरों में इस के 4 करोड़ ग्राहक हैं.  स्नैपडील तकरीबन 1 करोड़ 40 लाख प्रोडक्ट बेचती है.

कामयाबी के झंडे फहराते इन आंकड़ों के पीछे राज क्या है, इस सवाल पर कुणाल ने बेहद गंभीरता से लेकिन सिलसिलेवार बताया कि इस के पहले मैं 5 बिजनैस कर चुका हूं और पांचों में असफल रहा. मैं ने बिजनैस की शुरुआत दिल्ली के कीर्तिनगर फर्नीचर मार्केट से की थी जहां अपने पार्टनर के साथ 14 हजार रुपए महीने के किराए के दफ्तर में बैठता था. छठी बार 2010 में जब स्नैपडील की नींव डाली तब मेरी उम्र केवल 23 साल थी. मेरे पार्टनर रोहित बंसल और मैं बड़ा सोचते थे और कड़ी मेहनत करते थे.  आज भी मैं 16 से ले कर 18 घंटे तक काम करता हूं. कुणाल गर्व से बताते हैं कि जब स्नैपडील डाली थी तब हमारे पास कुल 10 विक्रेता और महज 5 हजार उत्पाद थे.  पहले साल सिर्फ 10 लाख रुपए की बिक्री हुई थी. तब मेरी मम्मी बड़ी चिंतित रहती थीं और कहती थीं, ‘तनख्वाह तो तुझे मिलती नहीं, तू करता क्या है और तुझ से कौन लड़की शादी करेगी.’

आज हालत यह है कि हर कोई स्नैपडील के जरिए अपना प्रोडक्ट बेचना चाहता है. भोपाल आए कुणाल ने अच्छे कारोबारी की तरह मध्य प्रदेश लघु उद्योग निगम से भी एक करार कर डाला जिस के तहत अब मध्य प्रदेश के बुनकरों और शिल्पकारों के बनाए मृगनयनी ब्रैंड उत्पाद स्नैपडील के जरिए बिकेंगे. जाहिर है इस से घाटा झेल रहे लघु उद्योग निगम को बेहद फायदा होगा. बकौल कुणाल, भोपाल आने के 2 हफ्ते पहले मुझे फोन आया था कि मध्य प्रदेश की उद्योगमंत्री यशोधरा राजे सिंधिया मुझ से मिलना चाहती हैं. मैं उन से मिला, तकरीबन 1 घंटे मीटिंग हुई और तय हुआ कि स्नैपडील मध्य प्रदेश के प्रोडक्ट खरीदेगी. यह जान कर और हैरानी होती है कि स्नैपडील के ग्राहक ही लगातार नहीं बढ़ रहे हैं बल्कि इस में निवेश करने वालों की भी लाइन लंबी है. स्नैपडील में अजीम प्रेमजी और रतन टाटा जैसे नामी उद्योगपतियों ने निवेश किया हुआ है और जापानी सौफ्टबैंक ब्लैक हौक व अमेरिका ई-वे जैसी प्रतिष्ठित कंपनियों ने भी स्नैपडील में पैसा लगाया हुआ है.

उद्योगपतियों के लिए रोल मौडल

युवा उद्योगपतियों के रोल मौडल बनते जा रहे कुणाल में सीखने के लिए काफी कुछ है. उन्होंने बताया कि सफलता के लिए लगातार अथक परिश्रम के सिवा और कोई रास्ता नहीं है. युवा अपने अंदर की कुछ कर गुजरने की आवाज सुनें और फिर उसे जरूर करें. तरक्की तभी समझी जाएगी जब आज का दिन बीते कल से बेहतर हो. विनम्र और सधी बातचीत करने वाले इस युवा उद्योगपति का कहना है कि युवा बड़ा सोचें और बड़ा करें तो कोई वजह नहीं कि सफलता न मिले. इसी आत्मविश्वासी सोच का नतीजा इसे कहा जाएगा कि हर किसी के लिए विज्ञापन न करने वाले अभिनेता आमिर खान स्नैपडील को न नहीं कह पाए. देश में युवा उद्योगपतियों की संख्या लगातार बढ़ रही है और वे बजाय नौकरी करने के कंपनियां खोल कर कारोबार भी कर रहे हैं. पढ़लिख कर खासतौर से एमबीए करने के बाद युवा खुद का उद्योग लगाना चाहते हैं. यह बात भारी बदलाव का इशारा है. युवाओं की कंपनियों के बारे में पूछने पर कुणाल ने कहा, ‘‘उद्योग चलाते वक्त घबराना नहीं चाहिए. जब आप हताश हो जाएं तो तय मानिए एक जोर के धक्के की जरूरत है और फिर आप की कंपनी चल निकलेगी. लेकिन यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि कंपनी में कैसे लोग हैं, उसी हिसाब से कंपनी मोटीवेट होगी.’’

साफ है, कुणाल कड़ी मेहनत के अलावा प्रतिष्ठा और ईमानदारी पर जोर देते हैं. वे जल्द ही स्नैपडील का और भी विस्तार करने जा रहे हैं. अपनी तकनीकी टीम में वे इस साल 1 हजार और भर्तियां करने जा रहे हैं. रातोंरात तो नहीं, लेकिन 5 साल में आइकन कैसे बना जा सकता है, यह कुणाल बहल की सफलता से सीखा जा सकता है जिन की डिक्शनरी में हताशा शब्द के लिए कोई जगह नहीं और कामयाब न होने या पसंद न आने पर बिजनैस मौडल बदलने से परहेज करना जरूरी नहीं.

अखिलेश यादव : पहचान का संकट

समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं. साल 2012 के विधानसभा चुनाव में वे पार्टी को भारी बहुमत से जिता कर सत्ता में लाए थे. अखिलेश यादव के नेतृत्व में पहली बार उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को बहुमत से सरकार बनाने का मौका मिला. वे प्रदेश के सब से युवा मुख्यमंत्री हैं. मुख्यमंत्री बनने से पहले वे लोकसभा सदस्य भी रह चुके थे. उत्तर प्रदेश आबादी के लिहाज से देश का सब से बड़ा प्रदेश है. किसी प्रदेश का युवा मुख्यमंत्री पहचान के संकट से गुजर रहा हो तो सोचने वाली बात है. अखिलेश ने यह खुद माना कि दूरदराज के गांव में लोग उन को नहीं पहचानते. मुख्यमंत्री के तौर पर अखिलेश यादव ने जब से कामकाज शुरू किया है तब से उन का यह संकट बना हुआ है. समाजवादी पार्टी के विरोधी कहते थे कि प्रदेश को 5 मुख्यमंत्री मिल कर चला रहे हैं. तब सपा इसे विरोधियों की साजिश बताती थी. 3 साल बाद जब अखिलेश खुद मानते हैं कि लोग उन को नहीं पहचानते तो लगता है कि मुख्यमंत्री पहचान के संकट से गुजर रहे हैं. किस्सा कुछ इस तरह है–अखिलेश यादव राजधानी लखनऊ से दूर गांव में लोगों को राहत चैक बांटने गए थे. चैक बांटते समय उन्होंने पूछा कि यह पैसा कौन दे रहा है? उस महिला ने कहा – सरकार दे रही है. इस के बाद उन्होंने पूछा, प्रदेश का मुख्यमंत्री कौन है तो वह महिला कोई जवाब नहीं दे पाई. अपनी सरकार की पहचान पर कुछ और सवाल भी हुए जिन के जवाब सुन कर अखिलेश यादव खुश नहीं हुए. वे वापस राजधानी लखनऊ आए तो मीडिया को इस का जिम्मेदार माना और कहा कि उन के सरकार के कामकाज को सही तरह से जनता के बीच नहीं पहुंचाया जा रहा है.

संभव है कि अखिलेश यादव की शिकायत जायज हो. सोचने वाली बात यह है कि किसी नेता की छवि कैसे बनती है. उत्तर प्रदेश के किसी भी गांव में खड़े हो जाइए और मुलायम सिंह यादव का नाम ले लीजिए तो हर गांव उन को पहचान लेगा. मुलायम सिंह यादव जब राजनीति में आए थे तो प्रचार के इतने साधन नहीं थे. इस के बाद भी गांवगांव के लोग उन को पहचानते हैं. खुद अखिलेश यादव ने साल 2010 से 2012 तक क्रांतिरथ के जरिए प्रदेशभर में दौरा किया था. इस के फलस्वरूप ही समाजवादी पार्टी ने बड़ी जीत हासिल कर प्रदेश में सरकार बनाई. मुख्यमंत्री बनने के बाद अखिलेश यादव पर यह आरोप लगा कि वे पार्टी के बड़े नेताओं और अपने परिवार के सदस्यों के दबाव में काम करते हैं. विरोधी दलों ने साफतौर पर आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश में 5 मुख्यमंत्री फैसले करते हैं. इस के जवाब में पार्टी ने कहा कि यह विरोधी दलों की साजिश है. मुख्यमंत्री बनने के 3 साल के बाद अखिलेश जब प्रदेश के अलगअलग जिलों में गए तो वहां अपने बारे में पूछा तो लोगों ने उन को पहचानने से इनकार कर दिया. इस में स्कूली बच्चों से ले कर गांव की महिलाएं तक हर तरह के लोग शामिल थे.

छवि बनाने में चूके

2012 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव की छवि साफसुथरी और मिलनसार नेता की थी. जनता को पक्का यकीन था कि वे जातिधर्म की राजनीति नहीं करेंगे. उन्होंने अपने शुरुआती कामकाज से इस बात का पक्का यकीन भी जनता को दिलाया. उन्होंने जनता दरबार शुरू किया, जिस में वे एक तय दिन में लोगों से मिलते थे. उन की परेशानियों को दूर करते थे. सभी स्कूली छात्रों को लैपटौप दिए. एक साल बीतते ही सबकुछ बदलने लगा. मुख्यमंत्री का जनता दरबार बंद हो गया. स्कूली बच्चों को लैपटौप मिलने बंद हो गए. बेरोजगारी भत्ता देने में इतनी शर्तें लगाई गईं कि लोग इस योजना से दूर हो गए. हाईस्कूल पास करने वाले बच्चों को टैबलेट देने की योजना को भी दरकिनार कर दिया गया. स्कूली छात्रों को दी जाने वाली छात्रवृत्ति देने में बजट आवंटन की परेशानी आने लगी. मुख्यमंत्री बनने के पहले तक जिस तरह से अखिलेश यादव जनता के बीच में पहुंच कर मिलतेजुलते थे, वह बंद हो गया. केवल वे लोग ही अखिलेश यादव तक पहुंच पाते हैं जो खास हैसियत वाले होते हैं. उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्रिमंडल में सब से अधिक 50 विभाग खुद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पास हैं. मुख्यमंत्री के कामकाज के प्रचारप्रसार के लिए बना सूचना विभाग भी खुद मुख्यमंत्री के पास है. सूचना विभाग का अरबों रुपए का बजट होता है, जिस को मुख्यमंत्री की पहचान बनाने में खर्च किया जाता है. सूचना विभाग के अलावा मुख्यमंत्री सचिवालय में 2 प्रमुख सचिव, 5 विशेष सचिव और 3 सचिव काम करते हैं. 6 लोग विशेष कार्याधिकारी के रूप में काम करते हैं. इस के अलावा सूचना सलाहकार, मुख्यमंत्री सूचना परिसर और 4 मीडिया सैंटर खोले गए हैं. सूचना विभाग में सूचना निदेशक सहित 30 से अधिक अफसर काम करते हैं. सरकार से अलग समाजवादी पार्टी का अपना मीडिया तंत्र है. इस में भी पार्टी प्रवक्ता और दूसरे प्रभावशाली लोग हैं जो मुख्यमंत्री तक सीधी पहुंच रखते हैं. इन सभी का काम मुख्यमंत्री की छवि को चमकाने का होता है. निश्चित तौर पर अखिलेश यादव साफसुथरी छवि के नेता हैं पर जो अवसर उन को मिला था उस में वे अपनी छवि बनाने में चूक गए हैं.

काम न आई सोशल मीडिया

2014 के लोकसभा चुनाव के समय भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी रहे नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से सोशल मीडिया का इस्तेमाल अपने पक्ष में किया उस ने देश के बाकी नेताओं को भी सोशल मीडिया से जुड़ने को मजबूर किया. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री सहित दूसरे तमाम नेता सोशल मीडिया पर सक्रिय हो गए. फेसबुक और ट्विटर के अकाउंट खुल गए. सोशल मीडिया पर ज्यादातर नेता एकतरफा सक्रिय होते हैं. वे अपनी बात तो कहते हैं पर उस पर आई शिकायतों या सवालों का जवाब नहीं देते. लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत हुई. समाजवादी पार्टी अखिलेश सरकार के पहले के कामों को छोड़ कर नए काम करने लगी. अखिलेश सरकार ने हाईस्कूल पास छात्रों को टैबलेट तो दिया नहीं, इंटर पास छात्रों को लैपटौप देना भी बंद कर दिया. केवल दिखावेभर के लिए मैरिट वाले छात्रों को लैपटौप दिए जा रहे हैं. छात्रों को छात्रवृत्ति देने की योजना भी बजट के भंवर में फंस गई. युवा वर्ग का जो बड़ा साथ अखिलेश यादव के साथ था, उस का भरोसा टूट गया.

सोशल मीडिया पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की प्रशंसाभर होती है. प्रशंसा करते समय जरूरत को ध्यान नहीं दिया जाता. देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब विदेशी दौरे करने शुरू किए तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी विदेशी दौरे शुरू किए. अखिलेश ने विदेशी दौरों से क्या हासिल किया, इस को बताने के बजाय सोशल मीडिया पर यह बताया जाने लगा कि नरेंद्र मोदी विदेशों में सूटबूट पहन कर जाते हैं जबकि अखिलेश यादव कुरतापाजामा पहनते हैं. सोशल मीडिया पर मुख्यमंत्री का ऐसा प्रचार खुद उन का प्रचार करने वालों ने शुरू किया. अगर सोशल मीडिया पर मुख्यमंत्री खुद रूबरू होते और वहां आई शिकायतों व सुझावों का संज्ञान लेते तो ज्यादा बेहतर होता. अगर मुख्यमंत्री को यह लगता है कि उन के कामकाज और सरकार के प्रदर्शन को सही तरह से जनता के बीच पहुंचाने का काम नहीं हो रहा है तो इस में खुद उन की प्रचार व्यवस्था का दोष है. आज पहले से ज्यादा प्रचारतंत्र मजबूत है. जब आप कुरसी पर बैठे हों तो आप का प्रचार नहीं आप का काम बोलना चाहिए. मुलायम सिंह यादव जब मुख्यमंत्री थे तब बेरोजगारी भत्ता मिलता था. वह ठीक उन शर्तों पर दिया जाता था जिन शर्तों पर देने को कहा गया था. अखिलेश यादव सरकार ने अपने चुनावी वादों को उस तरह से पूरा नहीं किया जिस तरह से पूरा करने का वादा किया था. जनता तो सरकार और कारोबारी में अंतर मानती है. अखिलेश सरकार जिस तरह से शर्तों के साथ अपने चुनावी वादों को पूरा करने का राग अलाप रही है उस की सचाई जनता के गले के नीचे नहीं उतर रही. सरकार की छवि चमकाने के लिए जो होर्डिंग और विज्ञापन जारी किए गए उन में शहरी चमकदमक तो दिखती है पर गांव की चर्चा नहीं है. यही वजह है कि आज प्रदेश की जनता अखिलेश यादव को पहचानने से इनकार कर रही है. अखिलेश यादव के पास अभी 2 साल का मौका है.

कचरे की राजनीति

स्वर्ण मंदिर यानी गोल्डन टैंपल और वाघा बौर्डर अमृतसर आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण के 2 मुख्य केंद्र हैं. आकर्षण के इन दोनों केंद्रों में से पर्यटक, स्वर्ण मंदिर को प्राथमिकता देते हैं. यह सिखों का प्रमुख धार्मिक स्थल है. हर रोज यहां हजारों की तादाद में देशीविदेशी पर्यटक आते हैं. स्वर्ण मंदिर बेहतर साफसफाई के लिए भी जाना जाता है. पर्यटकों को ध्यान में रखते हुए अमृतसर नगर निगम इस मंदिर की तरफ जाने वाले मार्ग की साफसफाई का खासतौर पर ध्यान रखता है. उस की कोशिश रहती है कि स्टेशन से ले कर स्वर्ण मंदिर तक जाने वाले मार्ग में कहीं गंदगी व कचरा न आए. निगम की यह सारी कवायद इसलिए होती है कि स्वर्ण मंदिर के दीदार को आने वाले पर्यटक केवल स्वर्ण मंदिर ही नहीं, अमृतसर शहर के बारे में भी अच्छी तसवीर दिमाग में ले कर वापस जाएं. पिछले कुछ महीनों के दौरान जो कुछ भी हुआ उस से पर्यटकों के दिमाग में अमृतसर की एक ऐसी तसवीर बनी जोकि शर्मिंदा करने वाली थी. यह तसवीर एक ऐसे शहर की थी जहां जगहजगह कचरे के ढेर थे और हवा दमघोंटू, बदबू से भरी हुई थी. स्टेशन से स्वर्ण मंदिर जाने वाले साफसुथरे मार्ग पर इतना कचरा था कि गुजरना मुश्किल था. ऐसी नौबत कचरे की लिफ्टिंग नहीं होने की वजह से आई थी. ऐसा लगता है कि मुद्दों के लिहाज से राजनीतिक पार्टियां एकदम दिवालिया हो चुकी हैं, शायद इसीलिए तो कचरे जैसी चीज को ले कर भी पिछले कुछ महीने से अमृतसर जैसे व्यावसायिक शहर में खूब जोरशोर से राजनीति की गई. शहर में जगहजगह कचरे के ऊंचेऊंचे अंबार लग गए. पूरे शहर का वातावरण ऐसी तीखी और दमघोंटू बदबू से भर गया जैसे शहर कचरे के ढेर पर ही खड़ा हो. नगर निगम के कर्मचारी शहर से कचरे की लिफ्टिंग नहीं कर रहे क्योंकि जहां कचरा फेंका जाना है, वे डंप राजनीतिक लड़ाई के मैदान से बन गए.

अमृतसर के 2 मुख्य डंप हैं जहां सारे शहर का कचरा फेंका जाता है. एक डंप शहर के भगतांवाला इलाके में है जोकि भगतांवाला डंप कहलाता है और दूसरा जब्बाल रोड पर सड़क के किनारे पर बना है जोकि फताहपुर डंप के नाम से जाना जाता है. दोनों ही डंप विभाजन से पहले के हैं और कभी भी इन को ले कर लोगों ने कोई आपत्ति दर्ज नहीं करवाई. 67 वर्ष के बाद कुछ महीने पहले अचानक ही आश्चर्यजनक ढंग से डंपों की मौजूदगी को ले कर लोगों में विरोध के स्वर उठने लगे. डंपों के आसपास के इलाकों में रहने वाले लोग दोनों ही डंपों को उन के मौजूदा स्थान से हटाने की मांग करने लगे. विरोध करने वाले लोगों का मानना था कि कचरे के डंपों से पैदा होने वाले प्रदूषण की वजह से उन के बच्चे कई किस्म की खतरनाक बीमारियों के शिकार हो रहे हैं. विद्रोह के स्वर इसलिए उठे क्योंकि खाली बैठे छुटभैये किस्म के नेता अपनी नेतागीरी चमकाने के लिए इस मामले में कूद पड़े. डंपों के विरोध में धरने और प्रदर्शन होने लगे. डंपों की तरफ जाने वाले रास्तों में रुकावटें खड़ी कर के कचरा ढोने वाली गाडि़यों को डंपों तक पहुंचने से रोक दिया गया. नतीजतन, शहर से कचरे की लिफ्ंिटग रुक गई. कईकई दिन तक लिफ्ंिटग नहीं होने से शहर की गलियों और चौराहों में कचरे के ऊंचे ढेर लग गए. वातावरण बदबू से भर गया. बदबू से भी नेताओं को अपना वोटबैंक मजबूत करने का मौका मिला. लोगों की मुश्किलों की किसी को कोई फिक्र नहीं थी.

निगम ने जब कचरा फेंकने के लिए वैकल्पिक जगहों की तलाश की तो नेताओं की शह पर वहां भी विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए. कचरे की लिफ्ंिटग कई बार चली और रुकी. इस बीच, भगतांवाला डंप की तरफ जाने वाले रास्ते के बीच में लोगों ने दीवारें खड़ी कर दीं और गड्ढे खोद डाले. वहीं जब्बाल रोड वाले फताहपुर डंप पर लोगों ने कोर्ट से स्टे ले लिया. समस्या और भी जटिल हो गई. कचरे की समस्या से नजात दिलाने वाला सौलिड वेस्ट प्लांट पहले ही राजनीति की भेंट चढ़ चुका था वरना कचरे की समस्या इतनी विकराल नहीं होती. जनता के भारी आक्रोश व दबाव के चलते आखिर निगम थोड़ा सख्त हुआ. उस ने शहर के कचरे को भगतांवाला डंप में ही फेंकने के लिए कमर कस ली. पुलिस फोर्स की सहायता ली गई. इस के बाद कचरे की लिफ्ंिटग एक बार फिर से शुरू हुई. 10 अप्रैल को  पुलिस के एक एडीसीपी और 6 थाना प्रभारियों के नेतृत्व में पुलिस के लगभग 200 जवानों के संरक्षण में कचरे से भरी गाडि़यां डंप की तरफ बढ़ रही थीं. पुलिस की मदद से ही निगम के कर्मचारियों ने डंप की राह में खड़ी की गई दीवारों को गिराया और गड्ढों को भरा. इतना ही नहीं, पुलिस ने कचरे को डंप में फेंकने का विरोध कर रहे लोगों पर बल प्रयोग करते हुए उन्हें खदेड़ भी दिया.

10 दिन के बाद भगतांवाला डंप में कचरा फेंकने में कामयाब होना निगम के लिए किसी जंग को जीतने से कम नहीं था. इस के लिए उसे उन जमीनमालिकों से भी समझौता करना पड़ा था जिन की जमीन पर से कचरे की गाडि़यों को गुजरना था. समझौते के अंतर्गत निगम उन जमीनमालिकों को हर महीने 25 हजार रुपए देगा जिन की जमीन पर से डंप को जाने वाली कचरे से भरी गाडि़यां गुजरेंगी. यह व्यवस्था बहरहाल 3 महीने के लिए ही है. इस के बाद क्या होगा, कहना मुश्किल है. वैसे प्रबल संभावना यह है कि कचरे की यह लड़ाई अभी लंबी चलेगी.

वजहें और भी हैं, अमृतसर में जहां हर जगह जमीनों के भाव आसमान को छू रहे हैं वहीं डंप के आसपास की जमीनों की कीमत उन के मुकाबले में कुछ भी नहीं. अगर कचरा फेंकने वाले डंपों को उन के मौजूदा स्थान से हटा दिया जाए तो उन की कीमतों में भारी उछाल आना निश्चित है. बिल्डरों और राजनेताओं को शायद इसी का इंतजार है. ऐसे में कचरे का खेल खत्म कैसे होगा, कचरे पर राजनीति जारी ही रहेगी, ऐसी आशंका है. सवाल यह भी उठता है कि अगर डंपों की बदबू से वास्तव में ही इतनी परेशानी थी तो फताहपुर वाले डंप के पास ही एक नर्सिंग कालेज का निर्माण क्यों किया गया? डंपों के विरुद्ध आंदोलन के पीछे का सारा खेल ही बहुत गहरा है. केवल 5-6 साल पहले जिन डंपों के आसपास की जमीन कुछ सौ रुपए गज थी, आज उसी जमीन की कीमत आसमान छूते हुए 7-8 हजार रुपए प्रति गज तक पहुंच गई है. भारतपाक विभाजन के बाद कुछ वर्ष बाद तक अमृतसर शहर का फैलाव किसी हद तक बेतरतीब था. ऐसा होना स्वाभाविक ही था. विभाजन की वजह से विस्थापित हो आए हजारों शरणार्थियों को सिर छिपाने के लिए आशियाने की जरूरत थी. ऐसे में जहां जिस को, कहीं उजाड़ में भी जमीन दिखी उस ने किसी तरह भी सिर छिपाने के लिए कच्चेपक्के घर का निर्माण कर लिया. डंपों के आसपास की खाली जमीन पर बस्ती बनने की बुनियाद भी शायद उसी दौर में पड़ी थी. ऐसा देश के हर शहर के साथ हो रहा है. दरअसल, शहर के बाहर वाले इलाकों में जमीन सस्ती होने के कारण लोगों ने वहां जमीनें ले कर मकान बना लिए. वहां शहर का कचरा फेंका जाता था. अब शहर फैल रहे हैं. बस्तियां बसती जा रही हैं. आबादी बढ़ती जा रही है. तो अब लोग डंपों का विरोध कर रहे हैं. देश को साफ न कर पाने का कारण यही है कि कचरे का नियमन आखिरकार कैसे हो, इस की सोच में कोई अपना दिमाग नहीं लगाना चाहता, सभी वोटबैंक की राजनीति करने में ही वक्त जाया करते रहते हैं.

महागठबंधन बड़े फोके हैं इस राह में

बिहार विधानसभा चुनाव के लिए मुलायम, लालू, नीतीश और कांगे्रस ने मिल कर कमर तो कस ली है और एक नया चुनावी तानाबाना तैयार हो गया है पर सियासत के ये धुरंधर अब तक यह साफ नहीं कर सके हैं कि वे जनता से किस नाम पर वोट मांगेंगे? भाजपा विरोध के तोतारटंत नारे के अलावा उन की झोली में कुछ भी नहीं है. बिहार के पिछड़ेपन की दुहाई देने वाले इन नेताओं को याद नहीं है कि बिहार की बदहाली का पूरा का पूरा कलंक उन्हीं के सिर पर आ पड़ा है. पिछले 10 साल तक नीतीश ने राज किया. उस के पहले के 15 साल तक बिहार लालू के हाथों में रहा और उस के पहले के 42 साल तक कांग्रेस का शासन रहा था. ऐसे में तो बिहार की दुर्गति का ठीकरा लालू, नीतीश और कांगे्रस के ही सिर पर फूट रहा है. ऐसी हालत में गठबंधन के तरक्की के दावे और वादे को हजम कर पाना जनता के लिए मुश्किल ही होगा. बिहार को कई साल पीछे ढकेलने वाले ही अब ‘बढ़ता रहेगा बिहार, फिर एक बार नीतीश कुमार’ का ढोल पीट रहे हैं. इस के अलावा नेताओं ने तो ऊपरऊपर गठबंधन कर लिया है पर उन की पार्टी के कार्यकर्ता पसोपेश में हैं कि वे अपने इलाके में किस का और कैसे प्रचार करें? जदयू के नेता और कार्यकर्ता वोटरों को क्या जवाब देंगे कि ‘जंगलराज’ वाले अब उन के दोस्त कैसे बन गए?

इस गठबंधन से दलितों, पिछड़ों और सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वालों का वोट तो इंटैक्ट हो सकता है. वोट का विभाजन कम होने से छोटे दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों को काफी नुकसान हो सकता है. बिहार में 11 फीसदी यादव, 12.5 फीसदी मुसलिम, 3.6 फीसदी कुर्मी, 14.1 फीसदी अनुसूचित जाति और 9.1 फीसदी अनुसूचित जनजाति की आबादी है. गठबंधन के नेताओं को पूरा भरोसा है कि इन का वोट उन्हें ही मिलेगा. गठबंधन के बनने के बाद अब बिहार में उस की सीधी लड़ाई भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी राजग से होनी है. इस से कांटे की लड़ाई के साथ खेल दिलचस्प भी हो गया है. वोटबैंक को मजबूत करने के साथ ही गठबंधन को नए नारे और नीति की दरकार है. गठबंधन के पास बिहार को बचाने से ज्यादा भाजपा से बचने की छटपटाहट है. लालू और नीतीश के हाथ मिलाने से भाजपा के लिए चुनौतियां कई गुना ज्यादा बढ़ गई हैं. पिछले लोकसभा चुनाव में समाजवादियों और सामाजिक न्याय के वोट का बिखराव होने का फायदा भाजपा को आसानी से मिल गया था. लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद 10 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में राजद-जदयू के मिलने से काफी फायदा हो गया था. 10 में 6 सीटें गठबंधन ने जीती थीं और 2 सीटों पर भाजपा को कड़ी टक्कर भी दी थी. भाजपा को यह नहीं भूलना चाहिए कि लालू और नीतीश पिछले 24 सालों से लगातार बिहार की सियासत की धुरी बने हुए हैं और पिछले 20 सालों से वे एकदूसरे की विरोध की राजनीति करते रहे हैं. आज दोनों जिस किसी भी सियासी मजबूरियों की वजह से फिर से साथ मिले हैं, उन का मिलन उत्तर भारत की सियासत में नया विकल्प पैदा करने की उम्मीद जगाता है. इन के गठबंधन को एक झटके में बेअसर करार देना किसी भी माने में समझदारी नहीं कही जाएगी क्योंकि इस गठजोड़ के पास वोट हैं. आज की हालत में भले ही उन का वोट बिखरा और छिटका हुआ हो पर उन में इतनी कूवत है कि विधानसभा चुनाव तक अपने वोटबैंक को काफी हद तक एकजुट कर कामयाब हो कते हैं. दोनों धुरंधरों को कामयाबी महज गठबंधन बना लेने से नहीं, बल्कि अपनी गलतियों को सुधार कर और अहंकार को दरकिनार कर नया एजेंडा बनाने से ही मिलेगी. दोनों बिहार के जमीन से जुड़े नेता रहे हैं, सामाजिक न्याय के मसीहा माने जाते हैं और पिछड़ों, दलितों व अल्पसंख्यकों के वोट पर खासी पकड़ रखते हैं.

महागठबंधन के दलों के लिए सब से बड़ी दिक्कत अपनेअपने वोट को सहयोगी दलों के खाते में ट्रांसफर कराना है. राजद और जदयू के नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए यह बड़ा ही कठिन टास्क है. नीतीश और लालू सफाई दे रहे हैं कि नेताओं और पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच कहीं कोई कन्फ्यूजन नहीं है. प्रमंडल स्तर पर कार्यकर्ताओं से रायविचार करने के बाद ही गठबंधन हुआ है. कहीं कोई भी विवाद या खींचतान के हालात नहीं हैं. गठबंधन की सभी पार्टियों के नेता अपनेअपने कार्यकर्ताओं से मशविरा करने के बाद ही सीटों को ले कर तालमेल पर फैसला लेंगे. गठबंधन की सब से बड़ी खासीयत यह है कि लालू यादव ने पहली बार परिवार के दायरे से बाहर कदम रखा है और अपनी बीवी, बेटी, बेटा या परिवार के किसी और सदस्य को तरजीह नहीं दी है. हो सकता है कि लालू ने ऐसा कदम सियासी मजबूरी या दबाव की वजह से उठाया हो, लेकिन इस के बाद भी उन की यह पहल तारीफ के काबिल है. ऐसा कर वह परिवारवाद के आरोप से नजात पा चुके हैं और सामाजिक न्याय के झंडे को फिर से थाम चुके हैं. सामाजिक न्याय को आगे बढ़ाने और भाजपा को हराने के लिए उन्होंने नीतीश कुमार को गठबंधन का नेता होना भी कुबूल कर लिया है. लालू की यह खामोशी किसी बड़े तूफान की ओर इशारा भी कर देती है. सवाल यह है कि अगर चुनाव के बाद लालू की पार्टी राजद को नीतीश की पार्टी जदयू से ज्यादा सीटें मिल जाती हैं तो क्या लालू तब भी चुप रहेंगे और नीतीश को मुख्यमंत्री के तौर पर स्वीकार कर लेंगे? 1974 की संपूर्ण क्रांति के समय से ही नीतीश और लालू का याराना रहा है लेकिन पिछले 17 सालों के दौरान उन की सियासी दुश्मनी के कई रूप जनता ने देखे हैं. राजद के 15 साल के जंगलराज को खत्म करने के बाद नीतीश के नए दोस्त की तलाश की मुहिम आखिर लालू यादव पर ही जा कर खत्म हुई. पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव में मोदी लहर ने जब कांग्रेस समेत सारे इलाकाई दलों के तंबू उखाड़ दिए तो सारे उजड़े दल अपना वजूद बचाने के लिए एक छत के नीचे आ गए हैं.

भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी कहते हैं कि राजद और जदयू का गठबंधन तेल और पानी को मिलाने की तरह है. लाख कोशिशों के बाद भी तेल और पानी एक नहीं हो सकते हैं. गठबंधन ने लालू को फिर से उठने का मौका दे दिया है जबकि नीतीश के लिए यह सियासी ताबूत की आखिरी कील साबित होगी. भाजपा के लिए यही अच्छी बात है कि गठबंधन के बहाने जनता ने लालू और नीतीश का असली चेहरा देख लिया है. मोदी कुछ भी कहें लेकिन मुख्यमंत्री के उम्मीदवार का नाम ऐलान करना भाजपा के लिए काफी फजीहत का काम हो सकता है. सुशील मोदी, शत्रुघ्न सिन्हा, शाहनवाज हुसैन, रविशंकर प्रसाद, नंदकिशोर यादव, प्रेम कुमार समेत कई नेता मुख्यमंत्री की कुरसी पर गिद्ध जैसी नजर टिकाए हुए हैं. दिलचस्प बात यह है कि इन में से ज्यादातर नेता मौकेबेमौके यह सफाई देते रहते हैं कि वे मुख्यमंत्री पद के दावेदार नहीं हैं.

महागठबंधन को कितनी कामयाबी मिलेगी, यह तो चुनाव के बाद ही साफ हो सकेगा लेकिन इस ने भाजपा के खेमे में बेचैनी को तो बढ़ा ही दिया है. साल 2010 के विधानसभा चुनाव में कुल 243 सीटों में से 87 सीटों पर जदयू और राजद आमनेसामने थे. इस में से 71 सीटों पर जदयू को जीत मिली और राजद के खाते में 16 सीटें गई थीं. इन 87 सीटों पर दोनों दलों के उम्मीदवारों को मिले वोट को जोड़ देने से उन के सामने कोई दल टिक नहीं पाता है. भाजपा ने इन सीटों पर अपने उम्मीदवार नहीं उतारे थे. इस साल के चुनाव में भाजपा इन सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी तो उसे महागठबंधन से कड़ा मुकाबला करना होगा. 100 ऐसी सीटें हैं जिन पर पिछले 2 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अपने उम्मीदवार नहीं उतारे और इन सीटों पर राजद व जदयू के उम्मीदवार जीतते रहे हैं या दूसरे नंबर पर रहे हैं. भाजपा के बिहार अध्यक्ष मंगल पांडे कहते हैं कि नरेंद्र मोदी और सूबे की तरक्की के नाम पर बिहार की जनता भाजपा को वोट देगी और बहुमत से जिताएगी. पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 91 सीटों पर जीत हासिल की थी, जबकि उस ने केवल 101 सीटों पर ही अपने उम्मीदवार उतारे थे. सीट के लिहाज से भाजपा को बाकी दलों से ज्यादा बड़ी कामयाबी मिली थी. वे कहते हैं कि भाजपा और उस के सहयोगी दल सभी 243 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेंगे और महागठबंधन की हवा निकल जाएगी.

भाजपा की छवि पर लमो हावी

इधर भले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के मौके पर योग के जरिए दुनिया को स्वस्थ व तनावमुक्त करने का बीड़ा उठाए घूमते रहे हों लेकिन ललित मोदी वीजा विवाद में घिरी केंद्रीय मंत्री सुषमा स्वराज का मामला उन की सरकार के अस्वस्थ व तनावयुक्त होने का कारण बन गया है. भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों से घिरे आईपीएल के पूर्व चेयरमैन ललित मोदी को कुछ अहम ट्रैवल डौक्यूमैंट्स दिलाने में मदद के आरोप में फंसी सुषमा अब खुद भी नहीं बल्कि पार्टी की बिगड़ती छवि को भी बचाने में लाचार हैं. ललित मोदी प्रकरण भाजपा की छवि पर इस कदर हावी हो गया है कि विपक्षी अब सुषमा के साथ नरेंद्र मोदी को भी आड़े हाथोें ले रहे हैं. राहुल गांधी ने तो यहां तक कह दिया कि एक मोदी दूसरे मोदी को बचा रहा है. उधर भाजपा सुषमा के बचाव में कमर कसे हुए है. देखते हैं कि भ्रष्टाचार का यह मुद्दा भाजपा की छवि को अभी कितना और तारतार करेगा.

भाजपा की नाव में मांझी

लालू, नीतीश, मुलायम और कांगे्रस के गठबंधन को भाजपा ने उन के ही हथियार से मात देने की जुगत लगाई है. सूबे के महादलित नेता जीतनराम मांझी को भाजपा ने अपनी नाव पर बिठा लिया है. मांझी कहते हैं कि नीतीश कुमार ने उन को मुख्यमंत्री की कुरसी से जलील कर जबरन उतार कर समूचे महादलितों का अपमान किया है. विधानसभा चुनाव में महादलित और गरीब नीतीश को सबक सिखा देंगे. बिहार की कुल आबादी 10 करोड़ 50 लाख है और 6 करोड़ 21 लाख वोटर हैं. इन में 27 फीसदी अति पिछड़ी जातियां, 22.5 फीसदी पिछड़ी जातियां, 17 फीसदी महादलित, 16.5 फीसदी मुसलमान, 13 फीसदी अगड़ी जातियां और 4 फीसदी अन्य जातियां हैं. बिहार राज्य अति पिछड़ा महासंघ के संयोजक किशोरी दास कहते हैं कि साल 2014 के मई महीने में हुए लोकसभा चुनाव में अति पिछड़ों ने गेमचेंजर की भूमिका अदा की थी. पिछड़ों और दलितों को महज वोटबैंक के रूप में ही इस्तेमाल किया जाता रहा है. आजादी के बाद से ले कर आज तक दलितों ने देख लिया है कि हर राजनीतिक दल केवल उन की तरक्की की बात करता है, पर आज तक उन की तरक्की के लिए एक भी ठोस योजना नहीं बनी, हर सरकारी योजना दलितों को भिखारी बनाने की है. मुफ्त में खैरात बांटबांट कर दलितों को पंगु, दूसरों का मुहताज बना दिया गया है. 

योग और अयोग

नरेंद्र मोदी की सरकार ने बड़े तामझाम से करोड़ों रुपए खर्च करवा कर 21 जून को देश में ही नहीं, दुनियाभर में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनवा लिया, मानो दुनिया की सेहत के अच्छे होने की शुरुआत हो गई. इस पर जो भारीभरकम प्रचार किया गया वह थोड़ा आश्चर्य वाला है क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय पोलियो दिवस, एड्स दिवस जैसों पर सिवा छोटे विज्ञापनों के कोई शोर नहीं सुनने में आता. योग व्यायाम है या धर्म, इस पर जो बहस छिड़ी है, वह लाजिमी ही है क्योंकि जिस तरह से उसे परोसा गया उस से लगता था कि कोई मूवमैंट चलाने की कोशिश की जा रही है और जिस का सेहत से कम, लोगों को एक बैनर तले ला कर खड़ा करना ज्यादा है. जिन लोगों ने इस दिन सरकारी कार्यक्रम में भाग नहीं लिया उन पर उसी तरह तोहमतें लगाई जा रही हैं जैसे धर्म वाले अपने अनुयायियों या गैर अनुयायियों पर लगाते हैं. यह दर्शाने की कोशिश की जा रही है कि इस का विरोध करने वाले देशद्रोही हैं.

योग में कितने भी गुण हों, यह जरूरी नहीं कि इसे सब के सामने चटाई बिछा कर किया जाए. यह नितांत व्यक्तिगत मामला है. इस की चिकित्सकीय उपयोगिता चाहे जितनी हो, इसे सरकारी त्योहार की तरह मनाना गलत है. योग का हिंदू धर्म से ही जुड़ाव रहा है, इस से इनकार नहीं किया जा सकता. और यह उपयोगी है या नहीं, इसे गुप्त ज्ञान कह कर सदियों तक इस को एक वर्ग ने अपनेआप तक रखा था. इस में जो लोग माहिर हो गए वे अपने नाम के आगे योगाचार्य लगाने से नहीं चूकते रहे. अगर योग जीवन के लिए उपयोगी ही था तो उसे सदियों तक क्यों छिपा कर रखा गया? हर भारतवासी इसे जन्म से क्यों नहीं सीखता था? अगर इस की उपयोगिता सुविचारों को लाने में रही है तो उस का लाभ हजारों वर्षों से क्यों नहीं उठाया गया और देश दरिंदों, अनपढ़ों, असभ्यों के हाथों क्यों गुलाम रहा?

यही नहीं, योग  का ज्ञान होने के बावजूद हमारे देवीदेवता आपस में क्यों लड़तेझगड़ते रहे? हमारे महापुराण, पुराण, स्मृतियां, काव्य, नाटक, आदि सभी विवादों, हत्याओं, अन्यायों की ही गाथाएं हैं. योग के जन्मदाता देश ने अपने समाज को हजारों सालों से यह दृढ़ता क्यों न दी कि वह हमेशा सिर उठा कर चलता और गुलामी ही नहीं, गरीबी और गंदगी का शिकार न रहता? योग की महत्ता चाहे कुछ भी हो, यह नितांत व्यक्तिगत मामला ही है. इस का प्रचार योग शिक्षक करना चाहें तो करें पर सरकार उन का एजेंट बने, यह तार्किक नहीं है.

कठघरे में सुषमा व वसुंधरा

ललित मोदी, जिस ने क्रिकेट का व्यावसायीकरण कर देश में आईपीएल यानी इंडियन प्रीमियर लीग की सफल शुरुआत की और जिस पर भारी हेराफेरी के आरोप हैं, के इंगलैंड में रहते हुए उस की सहायता करने के मामले में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे कठघरे में हैं. किसी अदालत ने तो उन्हें अभी किसी बात का दोषी नहीं माना या उन के खिलाफ मुकदमा नहीं चलाया पर नरेंद्र मोदी की सरकार का भ्रष्टाचारमुक्त भारत का वादा चकनाचूर हो गया है और वह मीडिया ट्रायल में बुरी तरह फंस चुकी है. वह चाहे जो कोशिश कर ले, दाग साफ करना कठिन है. भारतीय जनता पार्टी ने फिलहाल इन दोनों को अभयदान दिया है क्योंकि अपराध की स्वीकारोक्ति भाजपा के लिए उन के पद पर बने रहने से ज्यादा महंगी साबित होती. कठिनाई यह है कि ललित मोदी, जिस का पासपोर्ट रद्द था, को आनेजाने की सुविधा देने वाला सिफारिशी पत्र सुषमा स्वराज ने विदेश मंत्री रह कर लिखा था और वसुंधरा राजे ने सिफारिशी पत्र ब्रिटिश अधिकारियों को तब लिखे थे जब वे राजस्थान विधानसभा में विपक्ष की नेता मात्र थीं.

दोनों मामले एक जैसे होते हुए भी अलग हैं पर तार जुड़े हुए हैं. सुषमा स्वराज के खिलाफ कदम उठाना केंद्रीय नेतृत्व को झटका देना होगा और वसुंधरा राजे के खिलाफ कुछ करने पर संभव है वे अलग पार्टी बना कर मुख्यमंत्री बनी रहें. भाजपा, जो भ्रष्टाचार को निशाना बना कर जीती थी, बुरी तरह फंस गई है पर उस के पास कोई और उपाय नहीं है. ललित मोदी ने साबित कर दिया है कि समरथ को नहिं दोस गुसाईं. जैसे सोनिया गांधी ने अपने कई सहयोगियों को काफी दिनों तक बचाया था वैसे ही नरेंद्र मोदी को उन नेताओं को बचाना ही होगा जिन के बल पर पार्टी का विकास हुआ था. सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे भारतीय जनता पार्टी को बनाने वालों में से हैं और उन्होंने तिनकातिनका जोड़ कर भाजपा का घोंसला बनाया है. आज नरेंद्र मोदी जिस सत्ता का आनंद ले रहे हैं और उसे बनाने में लालकृष्ण आडवाणी व शिवराज सिंह चौहान के अलावा ये 2 महिलाएं हैं जिन्होंने संकट के दिनों से पार्टी को उबारा था. नरेंद्र मोदी सहित बाकी ज्यादातर नेताओं ने उन की मेहनत, निष्ठा, कमिटमैंट का फायदा उठाया है. भाजपा के नेताओं के मुंह बंद हैं तो इसलिए कि वे जीत का लाभ ही नहीं उठा रहे हैं, उन की मेहनत का लाभ उठा रहे हैं. आज नरेंद्र मोदी का कद इन कुछ नेताओं से बढ़ गया है. पार्टी के जनक माने जाने वाले लोगों में से सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे आदि ही हैं. उन्हें अपमानित कर के निकालना राजा राम का छोटे भाई भरत को निकालने की तरह होगा, वह भी मात्र एक दंभी, अहमी साधु दुर्वासा के कहने पर. भाजपा की उन्हें संरक्षण देने की जिद को समझना कठिन नहीं है.

डीएनए की सेल

बौलीवुड की तरह अमेरिकी ग्लैमर वर्ल्ड में भी रिऐलिटी शो ने कई ऐसे लोगों को स्टारडम दिया है जो हमेशा विवादित खबरों में आते रहते हैं. किम कर्दाशियां और फराह अब्राहम ऐसी ही हस्तियां हैं. फराह टीन मौम सीरियल से चर्चित हुई थीं. उस के बाद मैडम ने बाकायदा पौर्न वीडियो बना डाला और एक वैबसाइट से उस वीडियो की करोड़ों में डील भी कर ली. अब खबर है कि फराह अब्राहम अपना डीएनए बेचने जा रही हैं. एक विदेशी पत्रिका की मानें तो फराह ने सैलिब्रिटीजेन डौट कौम के साथ साझेदारी करते हुए अपना डीएनए 99 हजार डौलर में बेचने का करार किया है. इतना ही नहीं, उन्हें डीएनए नमूने के लिए 30 हजार डौलर अग्रिम राशि दी गई है. कहने को यह काम किसी चैरिटी के लिए हो रहा है लेकिन अभिनय के अलावा और कैसेकैसे कमाई की जा सकती है, कोई फराह जैसे कलाकारों से सीखे.

शेयर बाजार का रुख पलटा, सूचकांक सुधरा

जून का दूसरा पखवाड़ा शेयर बाजार के लिए उत्साहवर्द्धक रहा. 4 सप्ताह बाद पहली बार 20 जून को समाप्त हुए सप्ताह के सभी सत्रों में बाजार तेजी पर बंद हुआ. इस से पहले लगातार 3 सप्ताह तक बाजार में गिरावट का माहौल रहा जिस से बाजार में जम कर बिकवाली हुई और निवेशकों में जबरदस्त निराशा का माहौल रहा. इस अवधि में बौंबे स्टौक एक्सचेंज यानी बीएसई का सूचकांक 26 हजार अंक के मनोवैज्ञानिक अंक से नीचे उतर आया था. इसी बीच अमेरिका में केंद्रीय बैंक की दरों में बढ़ोत्तरी नहीं करने के फैसले, मानसून के पहले के अनुमान के उलट बेहतर रहने की उम्मीद, न्यूनतम समर्थन मूल्य के बढ़ने और औद्योगिक आंकड़े के बेहतर रहने तथा रुपए की सेहत में सुधार की बदौलत बाजार में रौनक लौट आई और लगातार 3 सप्ताह तक गिरावट से रूबरू हो कारोबारियों के चेहरों पर मुसकान लौटी. इस दौरान बाजार पहले 2 सप्ताह और फिर 4 सप्ताह के उच्चतम स्तर पर बंद हुआ. इस अवधि में वैश्विक बाजारों में नकारात्मकता देखने को मिली. रुपया भी अचानक मजबूत स्थिति में लौट आया, मानसून के पहले के अनुमान में बदलाव आ गया और इस से बाजार की स्थिति सुलट गई व सूचकांक एकाएक कुलांचें भरने लगा. जानकारों का मानना है कि बाजार की स्थिति फिलहाल अच्छी है, इसलिए सूचकांक के तेजी पर रहने का अनुमान है.

सुंदरकांड

रामायण में कई कांड हैं. अगर देखा जाए तो रामायण में कांड के अलावा कुछ भी नहीं है. उन कांडों में एक कांड सुंदरकांड है. इस का आयोजन मेरे महल्ले के अवधेश ने किया. अवधेश ने बाकायदा निमंत्रणपत्र छपवा कर कई लोगों के साथ मुझे भी भेजा. निमंत्रणपत्र पढ़ने के बाद मुझे कुछ अजीब लगा, सुंदरकांड? मैं सोचने लगा, भला कांड भी कभी सुंदर हुआ है? आज तक मैं ने जितने भी कांड देखे सब के सब कुरूप ही थे. फिर चाहे कांडा का कांड हो या अन्य कोई कांड या घोटाला. बहरहाल, नियत समय पर मैं अवधेश के घर पहुंच गया. घर के बाहर एक खूबसूरत शामियाना बंधा था. लोगों को बैठने के लिए कुरसीटेबल की अच्छी व्यवस्था थी. ठीक सामने एक ऊंचा सा मंच बना था. शायद यहीं पर सुंदरकांड का आयोजन होगा. एक कोने में भोजन की व्यवस्था थी, जिस की महक चारों ओर फैल रही थी. मैं ने मन ही मन सोचा, सुंदरकांड चाहे जैसा भी हो परंतु अभी तो खुशबू से पता चलता है कि भोजन स्वादिष्ठ ही होगा. तकरीबन सभी मेहमान आ गए थे. मैं ने अवधेश से उत्सुकता से पूछा, ‘‘भाई, पहले यह बताओ, यह सुंदरकांड होता कैसे है? क्या किसी नेतामंत्री को बुलाया है? क्योंकि जहां तक मेरा खयाल है, इन के बिना कोई कांड होता ही नहीं है. ये महानुभाव जहां खड़े हो जाते हैं कांड अपनेआप हो जाता है और अगर नहीं होता है तो ये कर आते हैं.’’

अवधेश मेरी अल्पबुद्धि पर हंसने लगे, ‘‘यार, तुम जिस कांड की बात कर रहे हो वह यह कांड नहीं है. यह रामायण का सुंदरकांड है.’’ मेरी अज्ञानता पर तरस खा वे मुझे विस्तार से समझाने लगे, ‘‘तुम जो समझ रहे हो वह यह कांड नहीं है. यह तो रामचरितमानस का एक कांड है.’’ मैं ने तपाक से कहा, ‘‘हां, याद आया, रामचरितमानस में तो कांड ही कांड हैं, जैसे बाली हत्याकांड, सीता अपहरण कांड, रामरावण युद्ध कांड, लंका कांड, अग्नि कांड…’’

‘‘बीच में मत बोलो,’’ वे झल्लाए.

मैं ने अपने होंठों पर उंगली रख चुप रहने का अभिनय किया तो वे फिर बोले, ‘‘रामचरितमानस के कई नामों से अलगअलग हिस्से हैं. उन में सुंदरकांड नाम का भी एक हिस्सा है, जिस के पाठ का मैं ने आयोजन किया है. सुंदरकांड करने वाली एक मंडली होती है, जिस में 2 समूह बन जाते हैं. वे अपने साजोसामान यानी ढोलकपेटी, झांझमंजीरा, चिमटा आदि बजाते हुए सुंदरकांड का एक दोहा पढ़ते हैं. दूसरा ग्रुप बिना ब्रेक के तुरंत अगला दोहा सवालजवाब की तरह पढ़ता है. इस तरह बिना रुके निरंतर पढ़ते जाते हैं. यह समझो यह अखंड रामायण का एक छोटा सा अभ्यास है.’’ मैं ने उन की पूरी बात समझ कर कहा, ‘‘अच्छी बात है. तुम्हारी यह सुंदरकांड करने वाली मंडली कहां है? और कब शुरू होगा कांड?’’

‘‘बस, आती ही होगी,’’ वे गर्व से बोले, ‘‘हमारे शहर की मशहूर शुक्ला मंडली है. जगहजगह कांड करती रहती है. मंडली के मुखिया शुक्लाजी कांड करने में इतने माहिर हैं कि लोग दूरदूर से उन्हें बुलाते हैं. एक बार वे जिस के यहां कांड कर लेते हैं वह जीवनभर नहीं भूलता है. तीजत्योहारों पर तो उन्हें जरा भी फुरसत नहीं मिलती. कांड पर कांड किए जाते हैं.’’ मैं ने बेसब्री से पूछा, ‘‘भाई, यह तुम्हारी कांडी मंडली कब आएगी? तुम ने मेरी उत्सुकता बढ़ा दी है. मैं कांड देखने के लिए बेचैन हूं.’’ अवधेश ने कलाई घड़ी को देखते हुए कहा, ‘‘अभी तक तो आ जाना था, 8 बजे का समय दिया था, अब तो 9 बज गए हैं.’’ समय बढ़ता जा रहा था पर मंडली का कहीं अतापता नहीं था. अवधेश बेचैन हो शुक्लाजी को फोन पर फोन लगालगा कर परेशान हो रहे थे. दूसरी तरफ घंटी तो बराबर जा रही थी परंतु कोई फोन उठा नहीं रहा था. मैं ने शंका जाहिर की, ‘‘तुम्हारी यह मंडली कांड करतेकरते कहीं फंस तो नहीं गई? अकसर सुना है कांडी आदमी एक दिन बुरी तरह फंस जाता है.’’

‘‘शुभशुभ बोलो यार,’’ अवधेश ने मुझे घुड़का.

मैं सहम गया. यह समय मजाक का नहीं था. लेटलतीफ सभी मेहमान आ गए थे. अब वे सब भी मेरी तरह मंडली का इंतजार करतेकरते ऊबने लगे थे. कुछ ने तो अवधेश से क्षमा मांगते हुए जाने की इजाजत चाही. अवधेश लज्जित हो निवेदन कर रहे थे, ‘‘भाई, थोड़ा और रुक जाओ.’’ तभी उन की भारीभरकम श्रीमतीजी सूर्पणखा की तरह गुस्से में पांव पटकती आईं और नथुने फुला कर बोलीं, ‘‘सुनो जी, मंडली कब आएगी? हम लोगों की नाक कटी जा रही है. कितने शर्म की बात है. मेहमान बिना कांड किए जा रहे हैं. पड़ोस के महल्ले के तिवारीजी का पता करना. सुना है, उन की भी मंडली इधरउधर कांड करती रहती है. उन्हीं को बुला लाओ.’’ अवधेश हिचकिचाते बोले, ‘‘परंतु हम ने शुक्ला मंडली को पूरे 1 हजार रुपए ऐडवांस दिए हैं.’’

‘‘उस की चिंता मत करो. मेरे शूरवीर भाई कब काम आएंगे. शुक्ला से ब्याज सहित वसूल लेंगे. जरा सोचो, जब सभी मेहमान चले जाएंगे तो क्या हम दोनों ही कांड करते रहेंगे?’’

‘‘तुम ठीक कह रही हो.’’ दुबलेपतले अवधेश मिमियाते हुए जवाब दे कर तिवारी मंडली को बुलाने चल दिए. कुछ देर बाद 8-10 लोगों को उन के साजोसामान के साथ ले आए. तिवारी मंडली ने आते ही फौरन मंच पर कब्जा जमाया, फिर अपना साजोसामान खोल कर सजाया. माइक वगैरह ठीक कर सुंदरकांड की तैयारी करने लगे. तभी हांफतीदौड़ती शुक्ला मंडली आ गई. तिवारी मंडली ने उन्हें देखा और मुंह बिचका कर अपने काम में जुट गई. अवधेश ने आगे बढ़ कर शुक्लाजी को उलाहना दे कर घड़ी दिखाते हुए फटकारा, ‘‘यह कोई समय है आप के आने का. मेरे एकएक कर के कई मेहमान बिना कांड किए चले गए.’’ शुक्लाजी ने नम्रता से जवाब दिया, ‘‘देखो भाई, हम एक सज्जन धर्मप्रेमी व्यक्ति के यहां कांड कर रहे थे. वहां कांड देरी से शुरू हुआ तो समापन में देरी हो गई. इस में हमारा कोई दोष नहीं है. सब प्रभु की मरजी है.’’

‘‘आप ने मेरा फोन भी नहीं उठाया.’’

‘‘कैसे उठाते? झांझमंजीरा, ढोलकपेटी की आवाज में रिंगटोन सुनाई नहीं दी.’’ तभी तिवारीजी वहां आ गए, ‘‘देखो शुक्लाजी, अब आप देर से आए हैं तो अपना साजोसामान मत खोलिए क्योंकि हम मंच पर अपना सामान जमा चुके हैं,’’ तिवारी ने वजनदारी से आगे कहा, ‘‘अब कांड तो हम ही करेंगे.’’ ‘‘हमें देर क्या हुई, तिवारीजी आप ने चुपके से विभीषण वाली हरकत कर दी और हमारी लंका में सेंध लगा दी. अवधेश भाई के यहां कांड करने का हमारा पहला हक है, हम बरसों से यहां कांड करते आ रहे हैं, फिर हम ने कांड करने का ऐडवांस रुपया भी लिया हुआ है.’’ ‘‘हम ने भी बिनाबुलाए हनुमान की तरह घुसपैठ नहीं की है. देखते हैं, कांड करने से कौन रोकता है. हम ने एक से एक दमदार लोगों के यहां कांड किए हैं, लेकिन आज तक किसी ने चूं तक नहीं की है. आप की क्या औकात?’’ ‘‘औकात की बात मत करिए. हम आप की औकात जानते हैं,’’ शुक्लाजी को जोश आ गया. वे तैश में आगे बोले, ‘‘हमारा मुंह मत खुलवाइए. पूरी जिंदगी आप के बापदादा भांडगीरी करते रहे और आप को रामायण की एक चौपाई भी ढंग से पढ़नी नहीं आती, और चले हैं सुंदरकांड करने.’’

तूतू, मैंमैं में दोनों एकदूसरे की बखिया उधेड़ने लगे, फिर देखतेदेखते हाथापाई पर उतर आए. दोनों मंडली के लोग आमनेसामने खड़े हो कर कुरसीटेबल, झांझमंजीरा…जो हाथ में आया एकदूसरे पर फेंकने लगे. ऐसा लग रहा था रामायण का अंतिम कांड यानी रामरावण युद्ध शुरू हो गया. चारों तरफ अफरातफरी मच गई. लोग तितरबितर हो गए, जिसे जहां जगह मिली, छिपने लगे. मैं भी अपनेआप को बचाता हुआ एक कोने में जा दुबका. मेरे पास ही अवधेश भी दुबके हुए थे. युद्ध का सजीव नजारा देख वे मन ही मन दुखी हो रहे थे. मैं ने दोनों मंडलियों की मारपीट की ओर उंगली से इशारा कर अवधेश से पूछा, ‘‘इस सुंदरकांड का समापन कैसे होगा?’’ अवधेश ने हताश हो कर दयनीय दशा में बड़ी सादगी से जवाब दिया, ‘‘जैसा हर कांड का होता है.’’ इतना कह कर उन्होंने अपने मोबाइल फोन से 100 नंबर डायल कर पुलिस को भी बुलावा भेज दिया.

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