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डीडीसीए एपिसोड

नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में सब से ज्यादा बोलने वाले मंत्री अरुण जेटली को आम आदमी पार्टी ने बुरी तरह घेर लिया है. दिल्ली के क्रिकेट स्टेडियम को ले कर जो रस्साकशी चल रही है उस में अरुण जेटली सभी चैनलों, अखबारों को इंटरव्यू देने में लगे जैसे अभिनेता अभिनेत्री अपनी फिल्मों के प्रमोशन के लिए देते रहते हैं. मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो द्वारा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के दफ्तर में एक अफसर के केबिन में डाले गए छापे से शुरू हुआ था. सीबीआई चाहे जो कहे, एक मुख्यमंत्री के दफ्तर पर छापा मारा जाए तो सरकार व मुख्यमंत्री की छवि तो खराब होगी ही. शासन हो या व्यापार, सैकड़ों कागज ऐसे मिल जाएंगे जो पहली बार में गलत लगेंगे चाहे बाद में उन का औचित्य सिद्ध किया जा सके.

मायावती, मुलायम सिंह, जयललिता, शरद पवार जैसे नेता तो सीबीआई जांच से घबरा जाते हैं पर अरविंद केजरीवाल दूसरी मिट्टी के बने निकले. उन्होंने दिल्ली डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष रहे अरुण जेटली के अध्यक्षीय काल में बने स्टेडियम की मिट्टी की परतें उधेड़नी शुरू कर दीं. नतीजतन, नरेंद्र मोदी के इकलौते मंत्री, जिन के पास वकालत से बहुत अच्छी, शुद्ध आय वर्षों से चली आ रही थी, खुद कठघरे में खड़े हो गए हैं.

यह मामला आंधी की तरह है जो 2-4 दिन में कुछ तोड़फोड़ कर ठंडा पड़ जाएगा जैसा मध्य प्रदेश के शिवराज सिंह के व्यापमं घोटाले के मामले में हुआ या जैसा ललित मोदी के राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे या विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के संबंधों को ले कर हुआ. अरुण जेटली चूंकि नरेंद्र मोदी के लिए आवश्यक हैं, वे आतेजाते तो कहीं नहीं पर उन्हें सफाई देने को मजबूर होना पड़ रहा है और इस का अपरोक्ष लाभ कांगे्रस को मिल रहा है जिस का नैशनल हैराल्ड का मामला फीका पड़ गया.

भाजपा इस मामले से इतनी चिंतित हो गई कि भाजपा सांसद कीर्ति आजाद, जो खुद क्रिकेटर रहे हैं और जिन्होंने डीडीसीए कांड का परदाफाश करने का बीड़ा उठा रखा है, को अमित शाह समझाने के लिए बुलाने को मजबूर हो गए.

डेढ़ साल में भारतीय जनता पार्टी को समझ आ गया है कि शासन चलाने में भ्रष्ट आचरण तो अपनाना ही होगा क्योंकि उलझे मामलों को हल करने के शौर्टकट अपनाने ही पड़ते हैं.

इस सारे मामले में कभी किसी पर दोष साबित होंगे, ऐसा लगता नहीं है. जो पहले दिखता है, वह साबित करना असंभव सा है. अरुण जेटली पर आरोप चाहे जितने लगें, न नरेंद्र मोदी उन्हें छोड़ने वाले हैं, न डीडीसीए. यह कांड यही साबित करेगा कि राजनीति का मतलब हमारे देश में एक कांड से दूसरे कांड में जाना है, एक निर्माण से दूसरे निर्माण में नहीं.

लखनऊ: चप्पे चप्पे पर आपको दिखेगी नवाबी शान

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ गोमती नदी के किनारे बसा है. नवाबों के शहर के नाम से मशहूर लखनऊ के चप्पेचप्पे पर नवाबी शानोशौकत की छाप देखी जा सकती है. वैसे भी इस शहर का इतिहास बहुत पुराना है इसलिए समय के साथ इस के नाम में भी बदलाव आए. पहले इस का नाम लक्ष्मणपुरी फिर लखनपुरी और बाद में लखनऊ हो गया.

1775 से 1856 तक लखनऊ अवध रियासत की राजधानी था. तब यहां पर अवध की तहजीब व अदब का विकास हुआ. नवाबों की बनवाई कई इमारतें आज भी लखनऊ में मौजूद हैं. यहां केवल ऐतिहासिक इमारतें ही देखने लायक नहीं हैं बल्कि यहां की चिकनकारी, नवाबी तहजीब, मुगलई खाना, आभूषण और चांदी का वर्क आदि भी मशहूर हैं. आज अपनी नजाकत और नफासत को संभालते हुए लखनऊ एक मेट्रो शहर के रूप में आगे बढ़ रहा है. पर्यटकों को नवाबी मजा देने के लिए ऐतिहासिक स्थलों को घूमने के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश पर्यटन निगम ने बग्घियों की नई व्यवस्था शुरू की है. इस के अलावा हाल ही में गोमती के किनारे पर खूबसूरत टूरिस्ट स्पाट का भी निर्माण किया गया है.

दर्शनीय स्थल

बड़ा इमामबाड़ा : चारबाग रेलवे स्टेशन से लगभग 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बड़ा इमामबाड़ा वास्तुकला का एक अद्भुत नमूना है. इस के एक छोर पर कागज फाड़ने की जैसी कम आवाज को भी दूसरी तरफ से सुना जा सकता है. इस इमारत का निर्माण नवाब आसिफुद्दौला ने 1784 में अकाल से अपनी जनता को राहत देने के लिए करवाया था. करीब 50 फुट लंबा और 16 फुट ऊंचा हाल, बगैर किसी खंभे के सहारे पर टिका है. यह भवन भूलभुलैया के नाम से भी जाना जाता है. बड़ा इमामबाड़ा सैलानियों के लिए सुबह 6 से शाम 5 बजे तक खुला रहता है.

छोटा इमामबाड़ा : इसे हुसैनाबाद के इमामबाड़े के नाम से भी जाना जाता है. यह बड़े इमामबाड़े से लगभग 1 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. इस का निर्माण 1837 में मोहम्मद अली शाह ने करवाया था. दूर से इस इमामबाड़े का बाहरी नक्शा ताजमहल जैसा दिखता है. इस में नहाने के लिए एक खास किस्म का हौज बनाया गया था जिस में गरम और ठंडा पानी एकसाथ आता था. इस इमारत में शीशे के लगे हुए झाड़फानूस बेहद खूबसूरत हैं.

रूमी दरवाजा : इस का निर्माण भी नवाब आसिफुद्दौला ने करवाया था. इस को तुर्किश गेटवे के नाम से भी जाना जाता है. इस विशाल दरवाजे की ऊंचाई 60 फुट है. इस दरवाजे के निर्माण में कहीं भी लकड़ी या लोहे का इस्तेमाल नहीं किया गया है.

घड़ी मीनार : रूमी दरवाजे से कुछ कदमों की दूरी पर घड़ी मीनार है. इस का निर्माण अंगरेजों ने 1881 में करवाया था. 67 मीटर ऊंची इस मीनार पर यूरोपियन स्टाइल में की गई नक्काशी इसे कुछ अलग आकर्षण देती है. यहां लगी घड़ी के डायल 12 पंखडि़यों वाले फूल की तरह नजर आते हैं, पेंडुलम लगभग 14 फुट लंबा है.

पिक्चर गैलरी : घड़ी मीनार से कुछ दूर आगे चल कर पिक्चर गैलरी है जिस में अवध के नवाबों के तैलचित्र लगे हैं. इस से नवाबी संस्कृति का पता चलता है.

रेजीडेंसी : इस भवन का निर्माण भी नवाब आसिफुद्दौला ने करवाया था. इस इमारत को बनाने की शुरुआत 1780 में हुई थी और 1800 में बन कर तैयार हुई. 1857 में आजादी की लड़ाई के बाद अंगरेजों ने इस पर कब्जा कर लिया और इस में अपना निवास बनाया तो इस का नाम रेजीडेंसी पड़ गया. इस इमारत की दीवारें आजादी की लड़ाई की गवाह हैं. यहां एक कब्रगाह है जिस में गदर के दौरान मारे गए लोगों को दफनाया गया है. सुबह 9 से शाम साढ़े 5 बजे तक यह पर्यटकों के लिए खुला रहता है. यहां बना खूबसूरत लान इस की खूबसूरती को और भी बढ़ा देता है.

शहीद स्मारक : यह स्मारक 1857 में शहीद हुए वीरों की याद में गोमती नदी के किनारे बनाया गया है. यहां नौका विहार का भी मजा लिया जा सकता है. यहां फूलों से लिखा शहीद स्मारक देखने लायक है.

जामा मसजिद : यह मसजिद 4950 वर्ग मीटर के विशाल विस्तार में फैली है. इस के 15 धनुषाकार गुंबद आने वाले सैलानियों को हैरान कर देते हैं. इस का निर्माण अहमद शाह के शासनकाल के दौरान शुरू हुआ और उस की बेगम ने पूरा कराया. इस इमारत में 260 खंभे हैं.

टिप्स: आपकी ड्रैस भी मैच करे ज्वैलरी से

ज्वैलरी केयरिंग टिप्स

कौस्ट्यूम ज्वैलरी को हमेशा साफ व सूखा रखें. फिर चाहे वह नैकलैस हो, रिंग हो, ब्रेसलेट हो या इयररिंग्स. कौस्ट्यूम ज्वैलरी को लोशन, परफ्यूम, औयल व पानी से बचाएं वरना उस का कलर चेंज हो सकता है. जब भी क्रीम, परफ्यूम लगाएं या हाथ धोएं ज्वैलरी को पहले उतार दें.

कौस्ट्यूम ज्वैलरी को हमेशा न पहनें. उसे अमोनिया, ऐसिड, विनेगर के संपर्क से बचाएं. हर ज्वैलरी को अलगअलग बौक्स या पाउच में रखें.

गहने हर स्त्री का पहला प्यार होते हैं. शायद इसीलिए बचपन से दादीनानी और मां के गहनों से खुद को सजनासंवरना उन्हें हमेशा लुभाता है. दरअसल, हर युवती व महिला की चाहत होती है खुद को खूबसूरत व स्टाइलिश दिखाने की और इसी चाहत को पूरा करने के लिए वह ब्यूटीफिकेशन, लेटैस्ट फैशन व ज्वैलरी का सहारा लेती है. लेकिन वह इस बात से अनजान होती है कि फैशन व ब्यूटीफिकेशन के अलावा वह मैचिंग स्टाइलिश ज्वैलरी के साथ खुद को टीमअप कर के अपने डेली लुक को ज्वैलिसीफाई कर सकती है और अपनी खूबसूरती को नए माने दे कर फैशनीस्ता की कैटेगरी में खुद को शामिल कर सकती है.

आइए, ज्वैलरी डिजाइनर कृति गर्ग से जानते हैं कि अलगअलग ड्रैसेज के साथ किस तरह की ज्वैलरी पहन कर आप अपने डेली लुक को ज्वैलिसीफाई कर सकती हैं:

इयररिंग्स: कृति कहती हैं कि सही ड्रैस के साथ पहनी गई मैचिंग ज्वैलरी न केवल किसी महिला की लुक को कंपलीट करती है, बल्कि उसे कौन्फिडैंस भी देती है. ज्वैलरी में अगर इयररिंग्स की बात की जाए, तो प्रेशियस मैटल जैसे गोल्ड, सिल्वर, डायमंड के अलावा मार्केट में मैटल, फाइबर, पेपर, प्लास्टिक व लैदर, एडी के इयररिंग्स की अनेक वैरायटी मौजूद हैं, जिन में से कोई भी महिला अपनी जरूरत और जेब के अनुसार अपनी ड्रैस मैच कर सकती है.कृति कहती हैं कि अगर कोई वर्किंग लेडी, जिस के औफिस में बिजनैस ड्रैस कोड हो तो उसे लार्ज ट्रूप या ड्रौप इयररिंग्स न पहन कर स्मौल स्टड्स पहनने चाहिए. बिजनैस ड्रैस कोड के साथ ब्राइट स्पार्कलिंग, डायमंड या बड़े जैम्स स्टोन नहीं जंचते. ट्राउजर्स व स्ट्राइप्ड शर्ट के साथ जियोमैट्रिक इयररिंग्स और जींस के साथ अगर कोई कलरफुल फ्लोरल टौप पहनता है, तो उस के साथ मैटल के इयररिंग्स पहन सकता है. इंडियन वियर जैसे लौंग कुरती के साथ हैंगिंग्स वाले इयररिंग्स लुक को कौंप्लिमैंट करेंगे. ज्यादा ब्लिंग या चमकीली ज्वैलरी मैरिज या पारिवारिक आयोजनों के लिए रखें. अगर कोई महिला मैरिड है तो वह स्टड्स पहन सकती है. सस्ते फंकी स्ट्रीट इयररिंग्स, वैस्टर्न वियर और हैंडलूम, खादी, कौटन सूट व कुरती के साथ जंचते हैं. अगर आप शाम को किसी पार्टी में जा रही हैं, तो बाजर में मौजूद इयरकफ्स आप ईवनिंग गाउन या साड़ी के साथ पहन सकती हैं.

बैंगल्स और वाचेज: अगर आप मैरिड हैं तो डेली यूज में वैस्टर्न ड्रैस के साथ हैंडकफ्स व मल्टीकलर्ड मैटल, फाइबर, प्लास्टिक या लैदर का बे्रसलेट पहन सकती हैं. लैदर ब्रेसलेट आप की स्किनी जींस को ऐनहांस करने का काम करता है. एक हाथ में बे्रसलेट या कफ्स के साथ आप दूसरे हाथ में वाच से खुद को ऐक्सैसराइज कर सकती हैं.आजकल बाजार में बड़े डायल वाली ट्रैंडी घडि़यों का फैशन चल रहा है. जहां युवतियों के लिए मौडर्न, स्टाइलिश, ऐलिगैंट और शाइनिंग वाचेज मौजूद हैं, तो वहीं सिल्वर व मैटल के बेस पर बे्रसलेट स्टाइल में भी मौजूद हैं. इन घडि़यों को साड़ी, सलवारकुरती व जींस सभी के साथ ऐक्सैसराइज किया जा सकता है. अगर आप टौम बौय जैसा लुक चाहती हैं तो स्पौटी लुक की कलरफुल घड़ी जींस के साथ पहन सकती हैं. वहीं ट्रैडिशनल व फौर्मल के साथ मैटल के साथ बे्रसलेट स्टाइल की घड़ी फबेगी. कलाई के साइज और घड़ी के डायल के साइज की बात की जाए, तो ध्यान रहे कि डायल कलाई के 2/3 हिस्से से ज्यादा को कवर न करे.

ऐंकलेट व रिंग: वैस्टर्न वियर के साथ आप बीडेड या मैटल का सिंगल ऐंकलेट भी पहन सकती हैं. यह आप को क्लासी लुक देगा. जहां तक रिंग्स की बात है डेली यूज में औफिस में और अगर मैरिड हैं तो वैडिंग रिंग और सिंपल बैंड आकार की रिंग ही पहनें. औफिस से बाहर डेटिंग पर या ईवनिंग पार्टी में आप कलरफुल शाइनी ड्रैसेज के साथ बोल्ड रिंग्स पहन सकती हैं. लेकिन ध्यान रहे कि आप के नेल्स अच्छी तरह से मैनिक्योर किए हुए हों. साथ ही ज्यादा नेल आर्ट या ग्लिटर लुक न दें. इस से रिंग का महत्त्व कम हो जाएगा.

नैकलैस: आप सोचेंगी डेली लुक में भला नैकलैस कैसे पहना जा सकता है? नैकलैस तो सिर्फ फौर्मल और स्पैशल ओकेजन के लिए होता है. लेकिन आप की यह सोच गलत है.

आप डेली लुक के साथ भी नैकलैस कैरी कर सकती हैं. जैसे बटन फ्रंट और कौलर्ड शर्ट के साथ कंट्रास्ट कलर के बिब टाइप नैकलैस स्टाइलिश लुक देते हैं और आप की लुक को ज्वैलिसीफाई करते हैं. ट्रैडिशनल ड्रैसेज जैसे कौटन साड़ी व कलरफुल कुरती के साथ चांदी के औक्सीफाइज्ड नैकलैस आप को शिल्पा व दीपिका की तरह फैशन दीवा का रूप देंगे. बाजार में स्ट्रीट ज्वैलरी में बिब, लेयर्ड व कलर्ड नैकलैस की फंकी ज्वैलरी उपलब्ध है, जिसे आप डेली लुक में पहन सकती हैं. अगर आप को आर्टिफिशियल ज्वैलरी से ऐलर्जी है तो आप सिल्वर ज्वैलरी, जो अभी ट्रैंड में भी है और जिस का फ्यूचर में कौस्ट बैनिफिट भी होता है, का नैकलैस डेली पहन सकती हैं. गरमियों में सिल्वर ज्वैलरी डेली लुक के लिए बैस्ट औप्शन होता है. फिर चाहे वह कौरपोरेट लंच हो, डेट हो, औफिस हो या किट्टी पार्टी. कृति बताती हैं कि अगर आप अपनी ड्रैस के साथ बोल्ड बैल्ट पहन रही हैं, तो लौंग चेन नैकलैस न पहनें वरना ध्यान चेन के बजाय वैस्टलाइन पर जाएगा.

नहीं आप खूबसूरत हैं

जिस ऐक्ट्रैस की एक झलक पाने को उस के फैंस बेताब रहते थे वही फैंस अब उस ऐक्ट्रैस के मां बनने के बाद उस के फूले गालों, थुलथुल शरीर को देख भौंहें सिकोड़ने लगे यानी ऐक्ट्रैस की बदली शारीरिक बनावट उन्हें सुहा नहीं रही. अपनी फेवरेट ऐक्ट्रैस की बिगड़ी फिगर को ले कर वे उस की इतनी आलोचना कर रहे हैं मानो मां बन कर उस ने कोई अपराध कर दिया हो. फैंस के इस आलोचनात्मक व्यवहार ने उस ऐक्ट्रैस को इतना डिप्रैस कर दिया है कि वह तमिल अदाकारा अब इंडस्ट्री में दोबारा कैमरे को फेस करने तक का आत्मविश्वास खो चुकी है.

हर महिला की यही कहानी

यह कहानी इस महिला कलाकार की ही नहीं वरन हर आम महिला की भी है. दरअसल, महिलाओं को प्रकृति की सब से खूबसूरत रचना का खिताब प्राप्त है. उन की खूबसूरती का आकलन उन की शारीरिक बनावट और रूपसौंदर्य से किया जाता है. लेकिन मां बनने के बाद उन की बदली शारीरिक बनावट  उन से खूबसूरत होने का यह खिताब छीन लेती है.

इस बात का और भी अधिक एहसास उन के घर वालों और रिश्तेदारों की तीखी नजरें और उन की फिगर को ले कर दी गई हिदायतें कराती हैं. ऐसे में वे खुद को साधारण महिला महसूस करने लगती हैं. इस से सब से ज्यादा नुकसान उन के आत्मविश्वास और आत्मसम्मान को होता है. उन्हें खुद में कमियां नजर आने लगती हैं. वे खुद को शर्मसार सा महसूस करने लगती हैं खासतौर पर तब जब सार्वजनिक स्थल पर अपने शिशु को स्तनपान कराना पड़ता है. हालांकि इस स्थिति का सामना हर महिला को मां बनने के बाद करना पड़ता है, लेकिन उन्हें ऐसा करने में झिझक महसूस होती है. झिझक होना जाहिर भी है, क्योंकि हर महिला को इस बात का डर सताने लगता है कि कहीं कोई उसे स्तनपान कराते हुए देख तो नहीं रहा.

नहीं बदली सोच

दरअसल, सामाजिक रीतिरिवाजों की बेडि़यों में जकड़ी महिला को आज भी सार्वजनिक स्थल पर स्तनपान कराते कोई पराया मर्द देख ले तो वह आत्मग्लानि से भर जाती है. उस का मन उसे कचोटने लगता है कि उफ, उसे पराए मर्द ने स्तनपान कराते देख लिया.

वैसे आधुनिक युग में पुरुषों में भी कोई खास बदलाव नहीं आया. आधुनिक युग में भी पुरुषों की सोच पुरातन ही है. आज भी महिला की ब्रैस्ट उन्हें  सैक्स्युलाइज मैटीरियल लगती है और यदि कोई स्तनपान कराती महिला दिख जाए तो उसे ऐसे टकटकी लगाए देखते हैं मानो पोर्न फिल्म देख रहे हों.

पुरुष ही नहीं, यदि दिल्ली मैट्रो के महिला कोच की बात की जाए तो आप को यह जान कर हैरानी होगी कि इस कोच में भी यदि कोई महिला अपने शिशु को स्तनपान करा रही होती है, तो कोच में मौजूद लड़कियों और महिलाओं की नजरें उसे घूर रही होती हैं. ये घूरती नजरें ही स्तनपान कराने वाली महिला को अपमानित महसूस कराती हैं. उस के मन में यह डर बैठ जाता है कि पब्लिक प्लेस में ब्रैस्टफीडिंग कराने पर सब उसे ही देखेंगे. ब्रैस्टफीडिंग मां के लिए अपने प्राइवेट बौडी पार्ट्स को पब्लिकली ऐक्सपोज करने की मजबूरी होती है. मगर लोगों की तीखी नजरें उस के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाती हैं.

अब यहां यह तय कर पाना मुश्किल नहीं कि बदसूरती लोगों की सोच में है या एक मां की शारीरिक बनावट में. मां बनना किसी भी महिला के लिए संपूर्ण होने का अनुभव है और अपने शिशु को स्तनपान कराना उस का हक. गर्भधारण करने के बाद से ही महिला के शरीर में बदलाव शुरू हो जाते हैं और शिशु के जन्म के बाद तक  सिलसिला जारी रहता है.

मां बनने पर अपने शिशु की देखभाल में वह इतनी खो जाती है कि अपने स्वास्थ्य पर ध्यान न दे पाना, नींद पूरी न होना और अपनी सोशल लाइफ से मुंह फेर लेना उसे मानसिक और शारीरिक तौर पर पूरी तरह बदल देता है. लेकिन समाज इस बात के लिए मां की सराहना करने की जगह उस की शारीरिक बनावट का मखौल उड़ाता है. उसे बदसूरत होने का एहसास कराता है. इन्हीं कारणों से आज ब्रैस्टफीडिंग महिलाओं के लिए हौआ बन चुकी है.

कस्तूरी का साहसी कदम

इतना ही नहीं कुछ महिलाएं तो कभी गर्भधारण न करने तक का मन बना लेती हैं ताकि उन की फिगर न बिगड़े. लेकिन महिलाओं की इस मानसिकता को गलत साबित किया पिछले दिनों इंटरनैट पर वायरल हुए साउथ इंडियन ऐक्ट्रैस कस्तूरी के सेमीन्यूड फोटोशूट ने. इस फोटोशूट में कस्तूरी अपने बच्चे को ब्रैस्टफीडिंग कराते दिख रही हैं. यह फोटोशूट कुछ समय पहले विश्वप्रसिद्ध फोटोग्राफर जेड बैल द्वारा अपनी बुक सीरीज ‘ए ब्यूटीफुल बौडी प्रोजैक्ट: द बौडीज औफ मदर्स’ के लिए किया गया था. इस बुक सीरीज में विश्व भर से चुनी गईं 80 मांओं की गर्भधारण के समय और उस के बाद की शारीरिक खूबसूरती पर चर्चा की गई है.

फोटोशूट को सोशल मीडिया में अपलोड करने और उस के वायरल होने के बाद लोगों की मिल रही प्रतिक्रियाओं से हैरान कस्तूरी कहती हैं, ‘‘मुझे आश्चर्य है कि लोगों ने मेरे इस फोटोशूट को इतना पसंद किया और अच्छी प्रतिक्रियाएं दीं. वाकई मां बनना एक खूबसूरत एहसास है. इस से भी ज्यादा गर्व की बात एक मां के लिए अपने शिशु को ब्रैस्टफीड कराना है. लेकिन आज भी गर्भधारण और मां बनने के बाद महिलाओं को ब्रैस्टफीडिंग को ले कर हिचक महसूस होती है खासतौर पर किसी के सामने ब्रैस्टफीडिंग कराना उन्हें अपमानजनक लगता है. लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है. एक मां अपने शिशु को कहीं भी, कभी भी ब्रैस्टफीडिंग करा सकती है और मेरा फोटोशूट भी मांओं को इस के लिए प्रोत्साहित करता है.’’

मानसिकता बदलना जरूरी

कस्तूरी के इस कदम को लोगों ने भले ही प्रोत्साहित किया हो, लेकिन प्रोत्साहन के साथ ही लोगों को अब पब्लिक प्लेस पर ब्रैस्टफीडिंग को ले कर अपनी मानसिकता बदलने की भी जरूरत है ताकि सार्वजनिक स्थलों पर जरूरत पड़ने पर यदि किसी मां को अपने शिशु की भूख शांत करने के लिए स्तनपान कराना पड़े, तो उसे झिझक महसूस न हो. इस के अतिरिक्त इस फोटोशूट को देखने के बाद लोगों के लिए यह समझ पाना और आसान होगा कि एक स्त्री को जिंदगी के कई मोड़ों पर चुनौतियों का सामना कर नए रिश्तों को निभाना पड़ता है. इन चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करने में शारीरिक और मानसिक तौर पर स्त्री में कई बदलाव भी आते हैं.

कस्तूरी अकेली नहीं हैं, जिन्होंने अपनी झिझक को दूर कर इस फोटोशूट में भाग लिया, उन की ही तरह विश्व भर के अलगअलग देशों से 80 मांएं और हैं, जो ओपनली ब्रैस्टफीडिंग और प्रैगनैंसी के बाद अपनी शारीरिक बनावट में आए बदलाव को कोसती नहीं, बल्कि उन्होंने इस खूबसूरत बदलाव को स्वीकार किया है.

इस फोटोशूट को अंजाम देने वाली फोटोग्राफर जेड बैल, जो खुद भी एक मां हैं, कहती हैं, ‘‘मां बनने के बाद अपनी बिगड़ी शारीरिक बनावट को देख मैं डर गई थी. मुझे अवसाद ने घेर लिया था. लेकिन मैं खुद को किसी तरह से स्टूडियो तक लाई और अपनी कुछ तसवीरें खिंचवाईं. कुछ समय बाद मुझे ऐसी महिलाओं के फोन आने लगे, जो प्रैगनैंसी के बाद अपनी खराब हो चुकी फिगर की तसवीरें खिंचवाने के लिए उत्सुक थीं. इस घटना के बाद ही मुझे इस प्रोजैक्ट का खयाल आया.’’

फोटोग्राफर अरुण पुनालुर का कहना है, ‘‘जेड बैल के लिए शूट करने वाली कस्तूरी पहली भारतीय महिला हैं. उन के इस कार्य की बहुत लोगों ने आलोचना की, लेकिन यह एक शूट है और वे एक मौडल. कस्तूरी ने जो किया वह उन का हक है. वैसे भी कौन सी महिला ऐसा करने के लिए तैयार होगी, जो कस्तूरी ने किया. बौडी ऐक्सपोज तो छोडि़ए कुछ लोग तो सार्वजनिक तौर पर किसी सामाजिक मुद्दे पर अपनी राय तक देने से कतराते हैं. ऐसे में एक महिला हो कर कस्तूरी ने जो फोटोशूट कराया वह सराहनीय है.’’

प्रैगनैंसी के बाद शारीरिक बदलाव

महिलाओं की प्रैगनैंसी के बाद शारीरिक बनावट बिगड़ना आम है. लेकिन बहुत सी महिलाएं इस बदलाव को स्वीकार नहीं कर पातीं. मसलन, वजन का बढ़ना, नींद पूरी न हो पाना, अपने लिए समय न निकाल पाना उन्हें अवसाद से ग्रस्त करता है. इन बातों को अकसर नजरअंदाज कर दिया जाता है, जबकि इन पर जागरूकता महिलाओं को सही वक्त पर मदद के लिए आवाज उठाने के लिए प्रेरित करती है.

इस बाबत ट्रैवल ब्लौगर इंद्रा थुरावुर कहती हैं, ‘‘यह फोटो एलबम मातृत्व एवं मां द्वारा अपने शिशु की भूख को शांत करने के लिए स्तनपान कराए जाने की महानता का प्रदर्शन करता है. लेकिन सोशल मीडिया में यह आज भी एक संवेदनशील मुद्दा है. लोगों को पता ही नहीं कि इस मुद्दे पर कैसे बात की जानी चाहिए. स्तनपान मां और शिशु के रिश्ते का सब से अहम पहलू है. फिर भी कुछ महिलाएं अपने शिशु को सिर्फ स्तन का आकार खराब हो जाने के डर से स्तनपान नहीं करातीं. लेकिन कभी उन मांओं के बारे में सोचा है, जो खराब जीवनशैली की वजह से अपने शिशु को स्तनपान नहीं करा पातीं और तड़पती रह जाती हैं. मां के दूध से अच्छा एक शिशु के लिए और कुछ भी नहीं है.

करें नई शुरुआत

शिशु के जन्म के बाद मां के लिए उस का बच्चा पहली प्राथमिकता बन जाता है. ऐसे में खुद पर ध्यान देना एक मां के लिए मुमकिन नहीं हो पाता. निम्न टिप्स को अपनाकर आप अपनी खोई हुई खूबसूरती को फिर से हासिल कर सकती हैं:

– शिशु के पालनपोषण की बड़ी जिम्मेदारी मां को ही निभानी पड़ती है. लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि पिता का शिशु की देखभाल में हाथ बंटाना मना है. शिशु के छोटेमोटे काम कराने के लिए पति की मदद लें. इस से आप को अपने लिए अतिरिक्त समय मिलेगा.

– मां बनने से पहले जिस तरह आप सजीसंवरी रहती थीं उसी तरह अब भी अपने रूपसौंदर्य को संवारने के लिए समय निकालें. अपने बालों और चेहरे को साफसुथरे तरीके से संवारें. खुद को सजासंवरा देख कर आप का खोया आत्मविश्वास फिर से लौट आएगा.

– शरीर को फिट रखने के लिए व्यायाम करना बहुत जरूरी है. लेकिन व्यायाम करने से पहले एक बार डाक्टर की सलाह जरूर लें.

– शिशु के कामकाज को सफलतापूर्वक अंजाम देतेदेते मां के पास इतना समय नहीं होता की वह चैन की नींद ले सके, इसलिए जब भी मौका मिले सो जाना चाहिए.

– अपने खानेपीने का विशेष ध्यान रखें. पतला होने के चक्कर में खानेपीने में कमी न करें, क्योंकि इस का असर आप के स्वास्थ्य के साथसाथ ब्रैस्टफीडिंग पर भी पड़ेगा.

– अपने ड्रैसिंग सैंस पर भी ध्यान दें. आउटफिट बहुत हद तक शारीरिक बनावट को संवार देते हैं, इसलिए न तो बहुत अधिक चुस्त और न ही बहुत अधिक ढीले कपड़े पहनें.

– खुद को पैंपर करें. जाहिर है मां बनने के बाद आप की जिंदगी बदल जाती है. ऐसे में अपने लुक्स में भी आप बदलाव कर सकती हैं. इस के लिए नया हेयरकट एक अच्छा विकल्प है. साथ ही मेकअप का अंदाज बदल कर भी खुद को नया लुक दे सकती हैं.

अब मोबाइल से होगी इमारतों की 3डी मैपिंग

स्विट्जरलैंड के वैज्ञानिकों ने एक नया सॉफ्टवेयर बनाया है जिससे किसी इमारत की 3डी मैपिंग मोबाइल फोन या टैबलेट से की जा सकती है. ईटीएच ज्यूरिक के विजुअल कंप्यूटिंग संस्थान के शोधछात्र थॉमस स्कोप्स और उनके दल ने इस सॉफ्टवेयर का विकास किया है.

यह सॉफ्टवेयर वर्तमान में उपलब्ध सॉफ्टवेयरों से कई मायनों में अच्छा है. उदाहरण के लिए इसे दिन की रोशनी में प्रयोग किया जा सकता है. जबकि बाकी सॉफ्टवेयरों से रात में ही 3डी मैपिंग संभव है.

स्कोप्स ने इस सॉफ्टवेयर का विकास इंफरेमेटिक्स के प्रोफेसर मार्क पोलेफेस के नेतृत्व में शोधकर्ताओं के दल के साथ मिलकर किया. यह शोध गूगल के टैंगो परियोजना के तहत किया गया जिसे कंपनी दुनिया भर के 40 विश्वविद्यालयों में चला रही है और ईटीएच जुरिच भी उनमें से एक है.

यह नया सॉफ्टवेयर दो तस्वीरों के विश्लेषण के आधार पर 3डी मैपिंग करता है जबकि बाकी तकनीक में इंफ्रारेड किरणों की मदद से यह काम किया जाता है. स्कोप्स ने बताया कि यह तकनीक फिलहाल विकास के चरण में है और इसका इस्तेमाल शुरू करने में अभी वक्त लगेगा.

इस तकनीक की खास बात यह है कि भविष्य में इसे कारों में भी लगाया जा सकेगा. इससे सड़क के किनारों या पार्किंग में कितनी जगह खाली है इसका सटीक अंदाजा लगाया जा सकेगा.

हाथों के दर्द से छुटकारा दिलाएगा ये सॉफ्ट कीबोर्ड

प्लास्टिक के सख्त की-बोर्ड पर काम करने से अक्सर हाथों में दर्द होने लगता है. हर दिन कंप्यूटर पर घंटों काम करने वालों के लिए यह एक बढ़ी समस्या होती है, लेकिन इस समस्या से अब जल्द छुटकारा मिल सकता है. ऑकलैंड युनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक विशेष प्रकार की रबर से बेहद लचीले और मुलायम की-बोर्ड का निर्माण किया है. इस सॉफ्ट व फ्लेक्सिबल कीबोर्ड पर काम करने में आसानी होगी और न ही कोई दर्द होगा.

इस शोध के सह-लेखक डेनियल जू के अनुसार, "यह की-बोर्ड एक विशेष रबर (डाईइलेक्ट्रिक इलास्टोमर) की पतली शीट (चादर) है." यह की-बोर्ड, एक सिंगल परतदार संरचना के साथ 90 डिग्री के कोण पर उन्मुख दो संवेदन परतों से बना है. यह विद्युत सेपरेशन से यांत्रिक युग्मन प्रणाली का शीघ्र ही फायदा उठाने में सक्षम है.

इस सेंसर की-बोर्ड की सतह 9 अलग-अलग संवेदन क्षेत्रों में विभाजित है. शोधकर्ताओें ने इस रबर की कार्यक्षमता के परीक्षण के लिए वीडियो गेम्स में इसका इस्तेमाल किया है और एक अलग परियोजना के रूप में संवेदन दास्ताने को भी बनाया गया है जिसका भविष्य में शूटिंग गेम्स में प्रयोग किया जाएगा.  'सट्रेचसेंस' नामक कंपनी में सेंस स्ट्रेचिंग तकनीक से कई पहनने वाली वस्तुओं का निर्माण किया जा रहा है. यह अध्ययन 'स्मार्ट मैटेरियल्स एंड स्ट्रक्चर्स' नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है.

7 उपाय, जो घरेलू प्रदूषण से छुटकारा दिलाएं

घर हो या बाहर प्रदूषण आज हर जगह है. बाहर के प्रदूषण पर तो हमारा उतना बस नहीं है, लेकिन घर के प्रदूषण को हम अपनी थोड़ी सी कोशिश और सजगता से जरूर कम कर सकते हैं. ठंड में तो हमें और भी सचेत हो जाना चाहिए. इस की वजह यह है कि ठंड के मौसम में धूलधुआं ऊपर नहीं उठ पाता और सारा प्रदूषण हमारे इर्दगिर्द जमा होता रहता है. ठंड के मौसम में कुहरा होने के कारण कार्बन डाईऔक्साइड, मिथेन और नाइट्रस औक्साइड जैसी खतरनाक गैसों का प्रकोप और अधिक बढ़ जाता है.

वैसे कुहरा नुकसानदेह नहीं होता है, लेकिन जब इस में धूल, धुआं मिलता है तो यह खतरनाक हो जाता है. इसलिए ठंड के मौसम में प्रदूषण और बढ़ जाता है. तभी तो इस मौसम में आंखों में जलन, नाक में खुजली, गले में खराश, खांसी जैसी परेशानियां होती हैं. इन के अलावा फेफड़ों में संक्रमण की भी शिकायत हो जाती है. कारण, इस मौसम में वातावरण में तरहतरह के वायरस सक्रिय हो जाते हैं.

आंकड़े बताते हैं कि हर साल 43 लाख लोग घर के प्रदूषण के शिकार हो रहे हैं. अत: घर के प्रदूषण से बचना भी चुनौती ही है. फिर भी थोड़ी सी जागरूकता बरत कर घर को प्रदूषण से बचाया जा सकता है. आइए, जानते हैं कैसे:

– धूम्रपान सेहत के लिए खतरनाक है, फिर भी लोग धूम्रपान करते हैं. जो इस के आदी हैं, उन के लिए तो यह जानलेवा है ही, उन के लिए भी खतरनाक है, जो धूम्रपान नहीं करते. ऐक्टिव स्मोकिंग से ज्यादा खतरनाक पैसिव स्मोकिंग होती है. इसीलिए सब से पहले तो परिवार के जो सदस्य धूम्रपान के आदी हैं वे घर में इस का धुआं न फैलाएं. धूम्रपान का सब से बुरा असर बच्चों और बुजुर्गों पर पड़ता है. इस के अलावा अगर घर का कोई सदस्य दिल की बीमारी या फेफड़ों के संक्रमण से ग्रस्त है, तो उस के लिए पैसिव स्मोकिंग जानलेवा हो सकती है.

– कीटनाशक के प्रयोग में सावधानी बरतें. घर की मक्खियों, मच्छरों, तिलचट्टों आदि से छुटकारा पाने के लिए बाजार में तरहतरह के रिपेलैंट अगरबत्ती या लिक्विड दोनों ही रूपों में उपलब्ध हैं. ये तमाम तरह के रिपेलैंट कीड़ेमकोड़ों को भगाने के साथसाथ घर में प्रदूषण फैलाने का भी काम करते हैं. दोनों ही तरह के रिपेलैंट से हानिकारक रसायन और जहरीले धुएं से सेहत को नुकसान पहुंचता है. बच्चों और बुजुर्गों को सांस की परेशानी, खांसी और ऐलर्जी की शिकायत हो जाती है.

– घर में कीड़ेमकोड़े होने से भी घर का प्रदूषण बढ़ता है. घर में चींटियां, मकडि़यां गंदगी फैलाती हैं. इन के अलावा चूहों, तिलचट्टों और छिपकलियों की बीट से भी प्रदूषण फैलता है. अत: घर की नियमित साफसफाई बेहद जरूरी है. परदों और गलीचों में खूब धूल जम जाती है, इसलिए इन की भी समयसमय पर सफाई करते रहें. रसोई और बाथरूम की नालियों की सफाई का भी खासतौर पर ध्यान रखें. कई बार नाली या पानी का पाइप फट जाता है. पर चूंकि नालियां और पानी के पाइप लाइन दीवार में काउंसलिंग सिस्टम से लगाए जाते हैं, इसलिए इन में आई खराबी का तब तक पता नहीं चलता जब तक दीवार में सीलन नजर नहीं आती. इस से रसोई और बाथरूम में तिलचट्टों और सीलन की समस्या बढ़ती है. अत: नाली या पानी के पाइप में कहीं कोई गड़बड़ी आती है, तो उस की तुरंत मरम्मत करवाएं.

– घर की दीवारों में इस्तेमाल होने वाले रंग में कम से कम मात्रा में सीसा और वीओसी (वाष्पशील कार्बनिक यौगिक) हो, इस का ध्यान रखें. ऐसी कंपनी के रंग का चुनाव करें, जिस में सीसा और वीओसी हो ही न. इस का कारण यह है कि वीओसी में फौर्मैलडिहाइड और ऐसिटैलडिहाइड जैसे खतरनाक रसायन होते हैं, जो स्नायुतंत्र को प्रभावित करते हैं. बच्चों पर इन का असर और भी खतरनाक होता है. सीसा बच्चों के दिमागी विकास में रुकावट डालता है, इसलिए ऐसे रंगों का चुनाव करें, जिन में कम से कम मात्रा में सीसा और वीओसी हो.

– घर के प्रदूषण से छुटकारा पाने के लिए ऐरोगार्ड या एअरप्यूरिफायर का इस्तेमाल करें.

– घर के प्रदूषण में सब से बड़ी भूमिका रसोई की होती है. खाना बनाते वक्त निकलने वाला धुआं प्रदूषण फैलाता है. यह धुआं दमे के मरीज के लिए बहुत ही तकलीफदायक होता है. स्वस्थ व्यक्ति को भी छींक और खांसी की तकलीफ होती है. इसलिए रसोई के प्रदूषण से निबटने के लिए चिमनी या ऐग्जौस्ट फैन का इस्तेमाल करें. ये धुएं को घर में फैलने से रोकते हैं. कुछ होम ऐप्लायंस भी प्रदूषण फैलाते हैं खासतौर पर एअरकंडीशनर. इसलिए समयसमय पर भी इन की भी साफसफाई करती रहें. अगर एअरकंडीशनर के फिल्टर को नियमित रूप से साफ न किया जाए, तो यह सेहत के लिए नुकसानदेह होता है. इस के फिल्टर पर जमने वाली धूल की परत सांस की तकलीफ बढ़ाती है. इतना ही नहीं यह ऐलर्जी का भी कारण बनती है. इस से फेफड़ों में संक्रमण से खांसी की शिकायत भी हो सकती है.

– घर की दीवार में दरार भी प्रदूषण के लिहाज से नुकसानदेह हो सकती है. छत या दीवार में दरार से कमरों में सीलन आती है. सीलन से सर्दी, खांसी ओर सांस से संबंधित तमाम बीमारियां परिवार के सदस्यों को हो सकती हैं. इसलिए घर की दीवार या छत में कहीं कोई दरार दिखाई दे तो उस की तुरंत मरम्मत करा लें.

– घर में वैंटिलेशन का पूरा इंतजाम हो. सुबह के समय घर की सभी खिड़कियां और दरवाजे खोल दें. परदों को भी हटा दें ताकि घर में ताजा हवा आ सके. ताजा हवा घर के भीतर की प्रदूषित हवा का असर कम कर देती है

किसानों को चाहिए उम्दा, कारगर और सस्ती मशीनें

‘मशीनें काम को आसान बना देती हैं, मशीनें आगाज को अंजाम बना देती हैं. यदि सलीके से इन का इस्तेमाल करें तो मशीनें किसानों को धनवान बना देती हैं.’

आज के माहौल में ये लाइनें बेहद मौजूं लगती हैं, क्योंकि मशीनों से काम जल्दी, बेहतर व कई गुना ज्यादा होता है. यह बात अलग है कि ज्यादातर मशीनें महंगी होने की वजह से आम किसानों की पहुंच से बाहर हैं. वैसे सरकार खेती की मशीनों की खरीद पर कर्ज व छूट भी देती है, मगर इस के बावजूद ज्यादातर छोटे किसान मशीन खरीदने की कूवत नहीं रखते. ऐसे में खेती के लिए किफायती मशीनों की बहुत जरूरत है.

अब गांवों के ज्यादातर मजदूर बेहतर रोजगार व ज्यादा कमाई के लिए शहरों की ओर निकल जाते हैं, लिहाजा खेती के लिए अब आसानी से मजदूर मयस्सर नहीं होते. नतीजा यह है कि खेती के ज्यादातर काम अब मशीनों से करना एक मजबूरी हो गई है. कारगर मशीनों से काम करना अच्छा व आसान लगता है, क्योंकि उन से वक्त कम लगता है और मेहनत बचती है.

किफायती काम

हमारे देश में ऐसे बहुत से लोग हैं, जो खुद बड़े वैज्ञानिक या इंजीनियर नहीं हैं, लेकिन फिर भी उन्होंने अपने तजुरबे व जुगत से कामयाब व किफायती मशीनें बनाई हैं. मसलन कर्नाटक में मुदिगिरी तालूका के डाराडहली गांव के एक पशु चिकित्सक डॉ. श्रीकृष्ण राजू ने बेहद सस्ता व छोटा गोबरगैस प्लांट बनाया है.

बड़े गोबरगैस प्लांट में करीब 20-25 हजार रुपए खर्च होतेहैं. उस से गैस हासिल करने के लिए रोज बहुत सारा गोबर भी जरूरी होता है, जो सब के बस की बात नहीं है, क्योंकि आम किसानों के पास जानवर कम होते हैं. लेकिन यदि सिर्फ 1 बाल्टी गोबर भी रोज जमा हो जाए तो सिर्फ 3 हजार रुपए में भी एक मिनी गोबरगैस प्लांट लगाया जा सकता है.

इस मिनी प्लांट की मदद से रोज 4-5 घंटे तक रसोई गैस व काफी गाद यानी खेती के लिए उम्दा खाद मुफ्त में मिल जाती है. इस से घर की ईंधनगैस व खेत में महंगी खाद का खर्च घटाया जा सकता है. यह प्लांट 11 फुट लंबी, 7 फुट चौड़ी व 250 मिलीमीटर मोटी प्लास्टिक शीट व 2 पीवीसी पाइपों की मदद से बनाया जा सकता है.

देशी मशीनें

खासतौर पर ग्रामीण इलाकों व खेती के तौर-तरीके सुधारने के मकसद से केंद्र सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी महकमे ने एक बेहतर पहल की है. हनीबी नेटवर्क के साथ मिल कर सरकार ने खोजबीन में लगे उन देसी वैज्ञानिकों को बढ़ावा देने की स्कीम चला रखी है, जो मशीनों के जरीए खेती के मसले हल करने के कामयाब तरीके निकाल सकते हैं.

किसान खुद अपने तजरबे व सूझबूझ से खेती में काम आने वाले नए औजार व मशीनें बना सकते हैं या पुराने औजारों व मशीनों में सुधार कर सकते हैं. देश के बहुत से इलाकों में हंसिया, खुरपी, फावड़े, हल व पाटे तक के डिजाइन सदियों पुराने हैं. यदि वे बेहतर, हलके व मजबूत हों तो उन से काम करने में आसानी होगी और उन में टूटफूट कम होगी.

सहूलियत मौजूद

खेती के उन्नत औजार व सुधरी मशीनें बनाने में लगा एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग का सब से बड़ा केंद्रीय संस्थान भोपाल में है और कटाई के बाद की तकनीक पर खोजबीन करने वाला संस्थान लुधियाना मेंहै. इन के वैज्ञानिकों ने किसानों के काम लायक बहुत सी छोटीबड़ी मशीनें बनाई हैं. यह बात अलग है कि उन की जानकारी ज्यादा किसानों को नहीं है.

इसी तरह ग्रामीण इलाकों में काम आने वाली बहुत सी मशीनों को खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग भी बढ़ावा दे रहा है. अहमदाबाद के हनीबी नेटवर्क नामक संगठन ने खेती के कामों को बेहतर व आसान बनाने वाली मशीनों को जमा करने का काबिलेतारीफ काम किया है, लिहाजा किसानों को इस संस्था से जुड़ना चाहिए.

सहायक रोजगार

मोटरचालित चारा काटने की मशीन, मोटरचालित चाक आदि से काम आसान हो जाते हैं. इस के अलावा खेती से ज्यादा कमाई करने के लिए उपज की प्रोसेसिंग करना भी जरूरी है, लिहाजा मसाले व अनाज पीसने, दाल दलने, तेल निकालने, दूध की क्रीम निकालने, चिप्स बनाने, बिस्कुट बनाने, बड़ी व पापड़ बनाने, नमकीन तलने आदि की मशीनें काफी फायदेमंद साबित हो सकती हैं. किसान इन्हें खरीद कर गांव में ही लगा कर डीजल इंजन से चला सकते हैं.

नई मशीनों से देश के बहुत से इलाकों में छोटे-बड़े उद्योग-धंधों की हालत लगातार सुधर रही है. यह बात अलग है कि ज्यादातर कारखाने नगरों के आसपास के औद्योगिक इलाकों में चल रहे हैं. उत्तराखंड व हिमाचल प्रदेश आदि कई राज्य खास जिलों में यूनिट लगाने पर करों में छूट व सस्ती जमीन देने जैसी सहूलियतें देते हैं, लिहाजा, कारोबारी दूर-दूर से वहां खिंचे चले जाते हैं. ऐसी सहूलियतें सभी राज्यों के किसानों को मिलनी चाहिए.

एग्रोप्रोसेसिंग किसानों की मालीबदहाली दूर करने का आसान व कारगर उपाय है, लेकिन इस के बावजूद खेती से जुड़े कामधंधों की पूरी पहुंच बहुत से गांवों तक नहीं हो सकी है. यदि केंद्र व राज्यों की सरकारें किसानों को आसान कर्ज, छूट, ट्रेनिंग व सहूलियतें दें तो किसान गांव में अपनी जमीन पर उपज का प्रसंस्करण करने की इकाई लगा सकते हैं.

जागरूकता जरूरी

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग बहुत तेजी से उभर रहा है. इस के लिए किसानों में जागरूकता जरूरी है. चौतरफा तरक्की होने से खानेपीने की नईनई चीजें बनाने की बहुत सी मशीनें व तकनीक देश में ही मिलने लगी है, लेकिन ज्यादातर किसानों को उन की जानकारी नहीं है. बहुत से किसान गांव में रह कर खेती से जुड़ा सहायक कामधंधा करना चाहते हैं, लेकिन वे अपने सपने पूरे नहीं कर पाते. तमाम विदेशी कंपनियां मुनाफा कमा कर बाहर ले जा रही हैं.

किसानों व छोटे कारोबारियों को मशीनों व तकनीकों की जानकारी एक छत के नीचे आसानी से मिलनी चाहिए, ताकि वे खुद अपनी इकाई लगा सकें. इस काम में मदद करने व नई मशीनों आदि की जानकारी मुहैया कराने के लिए सरकार को बेहतर इंतजाम करना चाहिए. यह बात अलग है कि इस मुद्दे पर हमारे ओहदेदारों का खास ध्यान नहीं है.

आजकल उद्योगों के लिए कर्ज देने वाली एजेंसियां तो कई हैं, लेकिन नई मशीनों के इस्तेमाल से खेती की उपज की कीमत बढ़ाने के बारे में किसानों को सही जानकारी देने का इंतजाम होना भी जरूरी है, जिस से किसान अछूते व नए कामधंधों के मैदान में भी उतर सकें.

बारिश का पानी जमा कर के बचेगी खेती

बारिश के भरोसे खेती करने के दिन अब लद गए हैं. बारिश के पानी के इंतजार में हाथ पर हाथ धरे बैठे किसानों को अपनी फसलों की सिंचाई के लिए खुद ही इंतजाम करने की जरूरत है. इस के लिए कुछ खास मेहनत और खर्च करने की जरूरत नहीं है, बल्कि बारिश के पानी को बचा कर रखने से ही सिंचाई की सारी मुश्किलों से छुटकारा मिल सकता है. बरसात के पानी के भरोसे खेती करने के बजाय सिंचाई के पुराने तरीके अपना कर उम्दा खेती की जा सकती है.

बिहार के नालंदा जिले के नूरसराय प्रखंड के कथौली गांव के किसान बृजनंदन प्रसाद ने अपने गांव में 10 एकड़ जमीन में तालाब बनाए हैं, जिस से करीब 200 एकड़ खेत में लगी फसलों को पानी मिलता है. उन्होंने सिंचाई की आस में हाथ पर हाथ धर कर सरकार और किस्मत को कोसने वाले किसानों को नया रास्ता दिखाया है. बृजनंदन कहते हैं कि खुद को और खेती को बरबाद होते देखने से बेहतर है कि अपने आसपास के पुराने और बेकार पड़े तालाबों और पोखरों को दुरुस्त कर के खेती और सिंचाई की जाए.

कुछ इसी तरह के जज्बे और हौसले की कहानी बांका जिले के बाबूमहल गांव के किसान नुनेश्वर मरांडी की भी है. 32 एकड़ में फैले लहलहाते  बाग मरांडी की मेहनत और लगन की मिसाल हैं. उन्होंने अपने गांव में छोटेछोटे तालाब बना कर बरसात का पानी जमा किया और अपने गांव की बंजर जमीन में जान फूंक दी. उन्होंने पुराने और छोटे तालाबों को धीरेधीरे बड़ा किया और नए तालाब भी खुदवाए. तालाबों के पानी से सिंचाई कर के उन्होंने अपनी 32 एकड़ जमीन में पपीता और अमरूद के बाग का लहलहा दिए. तालाब  के पानी से खेतों की सिंचाई करने के साथसाथ वे उस में मछलीपालन भी कर रहे हैं और अपनी आमदनी बढ़ा रहे हैं.

कृषि विभाग के आंकड़े बताते हैं कि बिहार में सिंचित क्षेत्र ज्यादा होने के बाद भी किसान समय पर फसलों की सिंचाई नहीं कर पाते हैं. पिछले 6 सालों में सिंचित क्षेत्रों में करीब 2 लाख हेक्टेयर की कमी आई है. अभी कुल सिंचित क्षेत्र 35 लाख 20 हजार हेक्टेयर है. इस में 10 लाख 11 हजार हेक्टेयर क्षेत्र की नहरों से, 1 लाख 17 हजार हेक्टेयर क्षेत्र की तालाबों से और 23 हजार हेक्टेयर क्षेत्र की कुओं से सिंचाई हो पाती है. कुओं और तालाबों जैसे सिंचाई के परंपरागत तरीकों की अनदेखी करने की वजह से यह गिरावट आई है.

कृषि वैज्ञानिक बीएन सिंह कहते हैं कि कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए उन्नत बीज, खाद, मिट्टी, कीटनाशकों के साथ पानी की सब से बड़ी भूमिका होती है और हम पानी को बचाने को ले कर ही सब से ज्यादा लापरवाह बने हुए हैं. बारिश के पानी के भरोसे बैठे रहने वाली किसानों की मानसिकता ने ही खेती और किसानों का बेड़ा गर्क किया है. बारिश के मौसम में कब, कहां और कितनी बारिश होगी? इस का सटीक अंदाजा लगाना आज भी मुश्किल है. फसलों को पानी के अभाव में बरबाद होने से बचाने के लिए बारिश के पानी को बचाने और उस के सही इस्तेमाल के तरीके किसानों को सीखने होंगे. बिहार में 93.29 हजार हेक्टेयर में तालाब और पोखर हैं. इस के अलावा 25 हजार हेक्टेयर में जलाशय और 3.2 हजार हेक्टेयर में सदाबहार नदियां हैं.

देश भर में आमतौर पर 15 जून के बाद से बारिश शुरू होती है और धान की नर्सरी डालने का सही समय 25 मई से 6 जून तक का होता है. मिसाल के तौर पर पटना जिले के पिछले 40 सालों के बारिश के आंकड़ों पर गौर करने से पता चलता है कि वहां जून में 134 मिलीमीटर, जुलाई में 340 मिलीमीटर, अगस्त में 260 मिलीमीटर और सितंबर में 205 मिलीमीटर की औसत बारिश होती है. जून में 6 दिन, जुलाई में 13 दिन, अगस्त में 12 दिन और सितंबर में 10 दिन ही बरसात होती है. बारिश के पानी को बेकार बहने से बचाने को ले कर किसानों को जागरूक होना पड़ेगा और तालाबों व पोखरों वगैरह को बचाना होगा. इस से किसान किसी महीने में कम बारिश होने पर भी अपनी फसलों को सूखने से बचा सकेंगे. इस के साथ ही सिंचाई पर होने वाली लागत में भी कमी आएगी.

किसान सलाहकार रजत यादव बताते हैं कि खेतों की मेंड़ों की ऊंचाई को बढ़ा कर मानसून के दौरान बारिश के पानी को खेतों में रोक कर रखा जा सकता है. मेंड़ की ऊंचाई जितनी ज्यादा होगी, उतने ही बारिश के पानी को बचा कर रखा जा सकेगा. अमूमन मेंड़ों की ऊंचाई 7 सेंटीमीटर से 15 सेंटीमीटर तक होती है. बारिश के पानी को खेतों में महफूज रखने के लिए मेंड़ों की ऊंचाई 20 से 25 सेंटीमीटर और मोटाई 10 से 15 सेंटीमीटर कर लेना जरूरी है. यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि खेतों में इतना पानी न जमा हो जाए कि फसलों को नुकसान होने लगे. जरूरत से ज्यादा पानी खेतों में न जमा हो, इस के लिए पानी की निकासी का भी इंतजाम करना चाहिए. ज्यादा समय तक खेतों में पानी भरे रहने से धान के पौधों के गलने का खतरा भी बढ़ सकता है.

बारिश के पानी को खेतों में बचा कर रखने से केवल सिंचाई का ही फायदा नहीं होता है, बल्कि सिंचाई पर होने वाले खर्च में कमी आती है. गौरतलब है कि डीजलपंप से सिंचाई करने पर किसानों को हर घंटे 80-90 रुपए खर्च करने पड़ते हैं. इस से खेती की लागत, पैदावार और किसानों की आमदनी पर बुरा असर पड़ता है. खेत में ज्यादा समय तक बारिश का पानी जमा रहने से जमीन के नीचे के पानी के स्तर को बढ़ावा मिलता है.

पेंच में फंसा वर्षा जल संरक्षण

बारिश का पानी जमा करने के लिए आम लोगों को जागरूक बनाने के लिए सरकार विज्ञापनों पर करोड़ों रुपए खर्च कर रही है, लेकिन बिहार में 2 विभागों के अफसरों के पेंच में यह योजना फंसी हुई है. सूबे के 8 सूखा प्रभावित जिलों में बहुत तामझाम के साथ इस योजना को शुरू करने का ढिंढोरा पीटा गया. मगर यह योजना कृषि विभाग और ग्रामीण विकास मंत्रालय के बीच उलझ कर रह गई है. बिहार कृषि विभाग केंद्रीय कृषि मंत्रालय को योजना का प्रस्ताव भेज चुका है. पर उस के लिए फंड मुहैया कराने का जिम्मा ग्रामीण विकास विभाग के पास है. पैसे की कमी की वजह से सूबे में बारिश के पानी को जमा करने की योजना ठप पड़ी हुई है.

राज्य में जलछाजन के तहत 40 योजनाओं के जरीए 1.92 लाख हेक्टेयर में सिंचाई की सुविधा बहाल करने पर काम शुरू किया गया था. पिछले साल 64 नई योजनाओं को इस में शामिल किया गया है. इस से 3 लाख हेक्टेयर में बारिश के पानी से सिंचाई का इंतजाम किया जाना है. इस योजना के पूरा होने से गया, नवादा, बांका, मुंगेर, जमुई, रोहतास, कैमूर और औरंगाबाद जिलों में सिंचाई का ठोस इंतजाम हो जाएगा.

गौरतलब है कि राज्य सरकार ने अगले 15 सालों में सिंचाई का इंतजाम न होने वाले 28 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई का पानी पहुंचाने की योजना बनाई है, लेकिन 2 विभागों के चक्कर में उलझ कर यह योजना दम तोड़ रही है.                                                  

एवलीन के पास साउथ फिल्म इंडस्ट्री से ऑफर्स की बाढ़

अभिनेत्री एवलीन शर्मा ने अधिकतर फिल्मो में गर्ल नेक्स्ट डोर तथा बबली लड़की के किरदार निभाए है. अब वे बतौर सक्षम अभनेत्री दूसरे प्रदेशों  के लिए तैयार है. 

एवलीन को फिल्मो के अलावा उनके सामाजिक कार्यो के लिए भी पहचाना जाता है. वे बॉलीवुड का एक बहुत ही चर्चित और फेमस चेहरों में से एक है , इसी के चलते ​इस सुन्दर अभिनेत्री को साउथ के और से कई फिल्मो के ऑफर आ रहे है. 

एवलीन कहती हैं, जी हाँ साउथ के कई फिल्म मेकर्स से मेरी चर्चा हुई है, फ़िलहाल हम शुरुआती दौर में है और मीटिंग्स चल रही है पर फ़िलहाल कुछ फाइनल नहीं हुआ है. मैने कई स्क्रिप्ट्स पढ़ी है उनमें से कोई स्क्रिप्ट सेलेक्ट करुँगी, जल्द ही में फिल्म के बारे में आधिकारिक तौर पर घोषणा करुँगी. 

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