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नृत्य और संगीत से सराबोर ‘सिरपुर महोत्सव’

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 85 किलोमीटर दूर बसे शहर सिरपुर की चर्चा अब उस के वैभवशाली अतीत के साथसाथ बीते 3 सालों से आयोजित हो रहे सिरपुर महोत्सव से भी होने लगी है, जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी अलग पहचान बना चुका है. महानदी के किनारे बौद्धविहारों और मंदिरों वाले इस शहर में अब नृत्य और संगीत की ध्वनि भी इस तरह गूंजने लगी है कि उस की तुलना अजंता और खजुराहो महोत्सवों से की जाने लगी है.

सिरपुर आने वाले पर्यटकों की संख्या में हर साल इजाफा हो रहा है. इन में बड़ी संख्या में कलाप्रेमी हैं. नृत्य और संगीत को समर्पित सिरपुर महोत्सव में अब तक जो ख्यातिनाम कलाकार अपनी प्रस्तुतियां दे चुके हैं, उन में पंडित बिरजू महाराज, छन्नूलाल मिश्र, हरिप्रसाद चौरसिया, माधवी मुद्गल, प्रहलाद सिंह तिपानिया के अलावा तीजनबाई, राहुल शर्मा, उस्ताद शुजात खान और विक्कू विनायक राम के नाम प्रमुख हैं. इस सूची में जार्ज बु्रकान, पीट लाकेट और लेनार्ड एरो के नाम भी शुमार हैं.

छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति कभी किसी सुबूत की मुहताज नहीं रही. सिरपुर महोत्सव में जनजातीय कलाकारों की मनमोहक व लुभावनी परंपरागत प्रस्तुतियां देखने का मौका भी पर्यटकों को इस अवसर पर मिलता है.सिरपुर महोत्सव का आयोजन हर साल जनवरी के महीने में होता है. इस साल यह महोत्सव 29 से 31 जनवरी, 2016 तक चलेगा. कलाप्रेमी पर्यटक पूरी शिद्दत से इस का इंतजार करते हैं. इस महोत्सव की एक खासीयत यह भी है कि जनवरी में छत्तीसगढ़ का मौसम बेहद सुहाना रहता है.छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल द्वारा आयोजित सिरपुर महोत्सव को देख कर इस की तारीफ लाओस, श्रीलंका, कोरिया और वियतनाम के राजदूत भी कर चुके हैं.

जीवन बीमा : बचत ही नहीं जरूरत भी

समय के साथ अब जीवन बीमा में भी बदलाव आ चुका है. अब यह जरूरत और बचत दोनों को पूरा करता है. यह एक ऐसी आर्थिक सुरक्षा देता है, जो व्यक्ति के आत्मविश्वास को बढ़ाने का काम करती है. जीवन बीमा पौलिसी जितनी कम आयु में ले ली जाए प्रीमियम उतना ही कम देना पड़ता है और लाभ अधिक से अधिक मिलता है. वैसे जीवन बीमा को बचत की जगह जरूरत ज्यादा मानना चाहिए, क्योंकि इस से बड़े होते बच्चों की शिक्षा, रोजगार व शादी सहित जीवन की और नई महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारियों को उठाने में मदद मिलती है.

भारतीय जीवन बीमा निगम परिवार के हर सदस्य की जरूरत को समझते हुए उस के हिसाब से पौलिसी देता है. जिस से केवल घर के कमाऊ सदस्य को ही नहीं, दूसरे सदस्यों को भी पूरी सुरक्षा मिलती है.

ऐसे में यह जरूरी है कि जीवन बीमा को बचत से अधिक जरूरत समझना चाहिए. भारत में जीवन बीमा पौलिसी की शुरुआत भारतीय जीवन बीमा निगम ने की थी.

बीमा यानी इंश्योरैंस एक प्रकार का अनुबंध होता है. 2 या अधिक व्यक्तियों, संस्थाओं में ऐसा समझौता जिसे कानूनी रूप से लागू किया जा सके, उसे अनुबंध कहते हैं.

शुरूशुरू में भारत में सरकारी कंपनियां ही बीमा पौलिसियां बेचने का काम करती थीं. मगर अब बहुत सारी प्राइवेट कंपनियों को भी लाइफ इंश्योरैंस, हैल्थ इंश्योरैंस पौलिसियां बेचने की अनुमति मिल गई है. हाल के कुछ सालों में देश में बीमा कारोबार ने काफी तरक्की कर ली है. बीमा केवल करने और कराने वाले के लिए ही लाभप्रद नहीं है, बीमा कंपनियां देश में बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार देने का काम भी कर रही हैं.

जैसी जरूरत वैसी पौलिसी

भारतीय जीवन बीमा निगम, लखनऊ मंडल के वरिष्ठ मंडल प्रबंधक, आदित्य गुप्ता कहते हैं, ‘‘आजीवन बीमा पौलिसी कितनी कीमत की ली जाए इस का सरल सा फार्मूला यह है कि व्यक्ति की सालाना आय जितनी हो, उस की 10 गुना बीमा राशि हो. कई तरह की बीमा पौलिसियां आने से किसी तरह का बोझ पौलिसीधारक पर नहीं पड़ता है. बीमा एजेंट सही बीमा पौलिसी का चुनाव करने में मदद करता है.’’

हर बीमा योजना को चलाने के लिए एक पौलिसी का सहारा लिया जाता है. इस पौलिसी में ही अनुबंध की शर्तें लिखी होती हैं. बीमा कंपनियों का प्रयास होता है कि वे इस तरह की पौलिसियां बनाएं जिन में हर आदमी की जरूरत के हिसाब से पौलिसी चुनने की सुविधा मिल सके. बीमा पौलिसियां कई तरहकी होती हैं. बीमा को लोगों के बीच लोकप्रिय बनाने के लिए बचत योजना को भी बीमा पौलिसी में जोड़ा गया. बीमा का पैसा ली गई पौलिसी की तय समय अवधि पूरी होने के बाद मिलता है.

बीमा कराने वाले को उस की जरूरत के हिसाब से समयसमय पर कुछ पैसा मिलता रहे, इस के लिए मनी बैक पौलिसी का विकल्प भी उपलब्ध है. मनी बैक पौलिसी जीवन बीमा की सब से अधिक बिकने वाली पौलिसियों में आती है. यही नहीं, बीमा कंपनियां गारंटीशुदा पैसा देने वाली पौलिसी भी ले कर आ चुकी हैं.

रोजगार भी

बीमा से केवल जीवन की सुरक्षा ही नहीं मिलती है, यह रोजगार का भी एक बड़ा साधन है. जीवन बीमा एजेंट बन कर लाखों लोग अपनी रोजीरोटी चला रहे हैं. इस से आर्थिक लाभ मिलता है. बीमा रकम बीमाधारक के मरने के बाद भी और जिंदा रहते हुए भी काम आती है. रूढि़यों में जीने वाले हमारे देशवासी अपने मरने की कल्पना भी नहीं करना चाहता. इसी वजह से जीवन बीमा कंपनियों को अपने प्रचार में कहना पड़ता है कि जिंदगी के बाद भी और जिंदगी के साथ भी. बीमा कंपनियां पौलिसियां बनाते समय इस बात का पूरा ध्यान रखती हैं कि बीमाधारक की जरूरत के अनुसार बीमा पौलिसी बनाई जाए.

अभी भी हमारे देश में प्रति व्यक्ति आय दूसरे विकसित देशों के मुकाबले काफी कम है. इसी वजह से यहां बीमा की तरफ कम ध्यान दिया जाता है. बीमा के साथसाथ बचत योजनाओं को चलाने से ही बीमा की तरफ लोगों को ज्यादा से ज्यादा जोड़ा जा सकता है. प्रबंधक कार्यालय सेवा, मोनिका विकास जगधारी कहती हैं, ‘‘आज के दौर में महिलाएं नौकरी और रोजगार के अन्य क्षेत्रों में आगे बढ़ रही हैं. ऐसे में महिला बीमा एजेंटों की जरूरत भी तेजी से बढ़ रही है. बीमा एजेंट बन कर महिलाएं रोजगार कर सकती हैं. किसी महिला को बीमे की जरूरत के बारे में महिला एजेंट ज्यादा अच्छी तरह समझा सकती है. महिला के लिए बीमा एजेंट बन कर अपना कैरियर चलाना सरल काम है.’’

बीमा देश के विकास में अपना अहम रोल अदा कर रहा है. भारत में अभी भी बीमा कारोबार की बड़ी संभावनाएं हैं. ज्यादा से ज्यादा लोगों तक इस को पहुंचाने से देश का लाभ होगा. बीमा एजेंट बन कर बेरोजगारी की समस्या को भी काफी हद तक दूर किया जा सकता है. 

खाने की कमी या बढ़ते दाम

खाने की कमी या बढ़ते दामों का एक पुराना इलाज एक मंत्री महोदय ने फिर दोहराया है कि मत खाओ. उन्होंने कहा है कि दालों की कीमत नरेंद्र मोदी सरकार की गलत नीतियों से नहीं बढ़ी, वह तो ज्यादा खाने से बढ़ी है. दालों की खपत 226 लाख मीट्रिक टन हो गई, पर उत्पादन 170 लाख मीट्रिक टन हो रहा है.

पूछा जा सकता है कि खपत क्या एक रात में बढ़ गई थी? खाद्य मंत्रालय या वित्त मंत्रालय में क्या घोड़े सो रहे हैं जो देख नहीं सकते कि प्रोटीन को देने वाली दालों की जरूरत बढ़ेगी, जैसेजैसे बच्चे बड़े हो कर युवा और जवान बनेंगे. मंत्रीजी ने यह भी कहा है कि दाल बाहर से आयात नहीं कर सकते, क्योंकि वहां दाल की जगह मीट खाते हैं और भारतीयों के लिए वे दालों का उत्पादन करेंगे, इस की गुंजाइश नहीं है.

मंत्रीजी की पार्टी ही गौहत्या के नाम पर देश में पहले से ही मौजूद मीट को खाने पर रोक लगाने की जरूरत पर जोर देती है, क्योंकि उसे गौदान का माहौल बनाए रखना है. गौदान ही तो हिंदू धर्म की जान है, क्योंकि सदियों से गृहस्थों से जो चीज बिना मेहनत किए दान के नाम पर छीनी जा सकती थी, वह गाय ही थी. उसे तो उठा कर भी ले जाना नहीं पड़ता, रामायणमहाभारत ऐसे राजाओं के गुणगानों से भरे हैं, जिन्होंने सुंदर गायों और सुंदर लड़कियों को दान में ऋषिमुनियों को दिया था. अब हिंदू राज तो तभी आएगा न जब यह दोहराया जाए, चाहे उस की वजह से आम आदमी भूखा रह जाए.

दालें हमें महंगी लगती हैं, क्योंकि हमारे आम किसानों में आज भी इतना दम नहीं कि चीनी, अमेरिकी किसानों की तरह मेहनत कर सकें. अमेरिका के आबादी के डेढ़ प्रतिशत से भी कम किसान अपनी जनसंख्या के लिए ही नहीं निर्यात के लिए भी खाना उगा लेते हैं और हम से दालें भी नहीं उगतीं. फिर बहानेबाजी कि क्यों खाते हो, अगर महंगी है.

मंत्रीजी ने हाथ झाड़ दिए हैं कि दालों के दाम कम हो सकते हैं. ठीक भी है. सरकार को गरीबों को खिलाने की नहीं, सेना को खरबों के हवाईजहाज, पनडुब्बियां दिलाने, बुलेट ट्रेन बनवाने, 8 या 12 लेन की सड़कें बनवाने, नए शहर बनवाने की चिंता है. उसे सूटबूट वालों को खुश रखना है, जो फाइव स्टार होटल में महीनेभर की गरीब की दाल का खर्च एक रात में कर सकते हैं.

जिस सरकार से बौर्डर नहीं संभल रहा हो, डौलर नहीं संभल रहा हो, शेयर बाजार नहीं संभल रहा हो, उस से दालों की चिंता करने की उम्मीद करना बेकार है. यह तो जनता को अपनेआप करना होगा, चाहे घर के गमले में दाल उगाए या महंगी ला कर खाए.

उपहार से कुछ इस तरह करें इजहार ए प्यार

‘हमें तुम से प्यार कितना ये हम नहीं जानते, मगर जी नहीं सकते तुम्हारे बिना,’ ‘मेरी रगरग में तुम हो और उसी होने के आनंद को जीती हूं मैं’, ‘तुम एक शब्द हो, जिस का अर्थ है खुशी’, ‘कह नहीं पाती तुम से पर यह सच है कि तुम मेरा आधार हो, जिस के भरोसे मेरा वजूद है…’

जैसेजैसे फरवरी माह करीब आने लगता है, जोड़े अपने साथी को वैलेंटाइन डे पर एक अच्छे से तोहफे पर कुछ ऐसी ही पंक्तियां लिख कर देने की फिराक में रहते हैं. क्योंकि उन के लिए तो यह दिन खुशियां, उम्मीदें और उमंग ले कर आता है. आएं आप भी थोड़ा रूमानी हो जाएं और जानें क्या है वैलेंटाइन डे, जिस ने भारत की जमीन पर दबे पांव कदम रखा था पर धीरेधीरे सभी युवाओं को अपना मुरीद बना लिया.

इस पर्व को मनाने के तौरतरीके और रीतिरिवाज बड़े अनोखे और रोचक रहे हैं. इतिहास के पन्ने पलटें तो वे कहते हैं कि एक ऐसे व्यक्ति के बलिदान का दिन है वैलेंटाइन डे, जिस ने प्यार किया और प्यार करने वालों को एक पवित्र बंधन में बांधने का प्रयास किया. उन के वक्त में रोम का शासक क्लोडियम था जो कि बहुत कू्रर और सख्त स्वभाव का था. उस ने अपने शासनकाल में सभी सिपाहियों पर प्रतिबंध लगा दिया था कि कोई भी न तो अपनी प्रेमिका से मिलेगा और न ही शादी करेगा. मगर वैलेंटाइन ने राजा की मरजी के खिलाफ प्रेमी जोड़ों की छिपछिप कर शादी करवाई और प्रेम करने वालों को एकदूसरे से मिला दिया. यों कहें कि वह प्रेम का फरिश्ता बन गया. क्लोडियम से यह सब बरदाश्त न हुआ और वैलेंटाइन को मृत्युदंड दिया गया. यह बात 14 फरवरी, 269 ई. की है.

वैलेंटाइन की एक दोस्त थी जो जेलर की बेटी थी. उसे मृत्युदंड से पहले वैलेंटाइन ने एक खत लिखा था. इस के बाद हर साल 14 फरवरी को वैलेंटाइन की याद के दिन के रूप में मनाया जाने लगा और इसे नाम दिया गया वैलेंटाइन डे. शुरू में लोग इस मौके पर प्रेम भरा खत लिखते थे, तो बाद में अपने प्रिय को खत के साथ उपहार देने का चलन चला और आज तो बाजार में इस से जुड़े उपहारों की भरमार है. आइए, जानते हैं कि उन में खास उपहार कौन से हैं और उन की अहमियत किसलिए है:

गुलाब: प्यार के इजहार के लिए सब से बेहतर तरीका है लाल गुलाब. लेकिन यह भी याद रहे कि प्रेमी या प्रेमिका को दिए जाने वाले गुलाबों की संख्या भी कुछ हती है. जैसे प्यार के इजहार के लिए 1 गुलाब ही काफी है. अगर आभार प्रकट कर रहे हों तो 1, बधाई के लिए 25 और बिना शर्त के प्यार के लिए 50 गुलाबों का महकता गुलदस्ता उपयुक्त माना जाता है. बस शर्त यह है कि उसे लवर्स नौट में बांध कर दें.

दिल: वैलेंटाइन डे पर बाजार में लाल गुलाबों की भरमार के बाद दिल की शेप में बने विभिन्न प्रकार के कार्ड्स व गिफ्ट आइटम देखने को मिलते हैं. पहले कामदेव के तीर से बिंधा दिल रति के लिए प्रेम की अभिव्यक्ति का बेहद खूबसूरत जरीया था. प्यार करने वालों को वैलेंटाइन डे पर दिल शेप में बने हुए कार्ड्स, शोपीस, टैडी बियर, पाउच, इंयररिंग्स, रिंग्स, ज्वैलरी बौक्स, सिरैमिक कौफी मग, कुशन कवर, पिलो कवर तथा शोपीस मिल जाएंगे.

कबूतर का जोड़ा: ‘तुम्हारे बिना मैं मर जाऊंगी’, ‘तुम से बिछुड़ने से पहले मुझे मौत आ जाए’, ये जुमले प्रेमी युगल एकदूसरे से अकसर कहते हैं. शायद हम में से बहुत कम इस बात से वाकिफ होंगे कि कबूतरकबूतरी ऐसे प्यार के पर्याय होते हैं कि यदि इन दोनों में से एक की मौत हो जाए तो फिर दूसरा नए साथी की तलाश नहीं करता. प्यार तो समर्पण है. प्यार व उस के प्रति पूर्ण आस्था को दर्शाने के लिए, शौपिंग मौल्स व गिफ्ट शौप्स में ऐसे कबूतरों की जोडि़यों की विभिन्न मुद्राओं में गिफ्ट आइटम देखने को मिलते हैं.

मैपल लीफ: कनाडा के राष्ट्रीय वृक्ष मैपल ट्री की पत्तियां आज भी जापानी और चीनी सभ्यता में प्रेम को प्रतिबिंबित करती हैं. इन पत्तियों में मिठास होती है. शायद इसीलिए ऐसी मान्यता है. अमेरीका में कई प्रेमी युगल सच्चा प्यार पाने के लिए बैड के नीचे फर्श पर मैपल की पत्तियां रखते हैं. वैलेंटाइन डे पर मैपल पत्ती वाले कार्ड खूब मिलते हैं. उन पर लिखे होते हैं कुछ रोमांटिक शेर या फिर तीर से बिंधा दिल बना होता है.

ट्यूलिप फ्लावर: कहींकहीं शादी की 11वीं सालगिरह का प्रतीक माना गया है ट्यूलिप फ्लावर. ट्यूलिप फ्लावर के बीचोंबीच काले मखमली भाग को प्रेमी का दिल माना गया है. प्रेमियों की पहली पसंद कहलाने वाला ट्यूलिप फूल दरअसल मशहूर प्रेमी युगल शीरीफरहाद के इश्क की उपज माना जाता है. कहते हैं, फरहाद जो तुर्की का रहने वाला था, शीरी से बेपनाह मुहब्बत करता था. जब फरहाद को पता चला कि शीरी अब इस दुनिया में नहीं रही, तो वह दीवानों की तरह पहाड़ की चोटी पर चढ़ गया और प्यार में पागल हो कर उस चोटी से कूद गया. फिर जहांजहां उस के खून की बूंदें गिरीं, वहींवहीं सुर्ख ट्यूलिप का फूल खिला. बस तभी से यह इश्क के मतवालों के प्यार का प्रतीक बन गया. वैलेंटाइन डे पर प्रेमी युगल प्यार में मर मिटने के लिए ट्यूलिप गिफ्ट करते हैं.

डायमंड: प्यार को दर्शाने के लिए डायमंड यानी हीरे से बढ़ कर तोहफा और क्या हो सकता है. प्यार शिलालेख सा अमिट है. इसे दर्शाने के लिए हीरा एक अनुपम उपहार है. ग्रीक सभ्यता में तो हीरों को देवताओं के टपके हुए आंसू माना गया है. रोमन सभ्यता में इस का गुणगान आसमान से टूटा तारा मान कर किया गया है. बाजार इन मान्यताओं को भुनाने में वक्त नहीं लगाता. वैलेंटाइन डे पर आभूषण की दुकानों पर उपहार में देने के लिए डायमंड लेने की होड़ सी लगी रहती है. यों भी तो कहा जाता है कि जो हीरा पहनता है उस के व्यवहार में एक ठहराव और संतुलन झलकता है. प्रेमिका को इंप्रैस करने का सही दिन है वैलेंटाइन डे और सही तोहफा डायमंड.

दिलनुमा शेप के तोहफे: प्यार का इजहार करने का एक अच्छा तरीका यह भी है कि ऐसा कोई भी तोहफा देना जिस पर दिल बना हो. दिल से कीजै दिल की बात. बाजार में रेशमी या फिर वैलवेट कपड़े से बने दिल आकार के छोटेबड़े गिफ्ट बौक्स या डिब्बियां मिल जाती हैं. बाजार से न लेना हो तो अपनी कल्पनाशीलता की उड़ान को पंख दें और मनाएं वैलेंटाइन डे.

गणित चिह्नों की वंश कथा

जब से प्रत्यक्ष उदाहरण रखने की आवश्यकता का आभास हुआ, तब से एकएक चिह्न का निर्माण हुआ. जब चिह्न नहीं थे, तब मौखिक हिसाब किया जाता था. चिह्नों और 0 से 9 तक 10 संख्याओं के आधार पर कोई भी संख्या तैयार करना सहज और सरल है, परंतु इन संख्याओं पर कुछ विशिष्ट क्रिया करने की आवश्यकता ने ही धन (+), ऋण (-), गुणा और भाग चिह्नों को जन्म दिया. जानिए, इन के वर्तमान रूप में विकसित होने के पीछे का इतिहास :

धन चिह्न (+)

धन (जोड़ने) की क्रिया के लिए कुछ प्राचीन भारतीय गणितज्ञ किसी भी चिह्न का उपयोग नहीं करते थे. कुछ गणितज्ञ 2 अंकों के बीच बिंदु का उपयोग करते थे. इतालवी गणितज्ञ अंगरेजी के ‘प्लस’ (+) शब्द के पहले अक्षर ‘पी’ का उपयोग धन के लिए करते थे. मध्ययुग के यूरोपीय गणितज्ञ ‘और’ अर्थ वाले लैटिन शब्द ‘द्गद्व’ का उपयोग करते थे. फिर इस के लिए ‘%’ चिह्न का उपयोग होने लगा.

फिर माइकल स्टिफेल नामक गणितज्ञ ने वर्ष 1544 में ‘अरिथ्मेटिक’ नामक ग्रंथ में ‘+’ चिह्न को धन चिह्न दर्शाने के लिए प्रयोग किया और तब से हम उसी चिह्न को धन चिह्न के रूप में प्रयोग करते आ रहे हैं.

ऋण चिह्न (-)

धन चिह्न के साथ मौजूदा ऋण चिह्न (-) का प्रथम बार प्रयोग करने का श्रेय भी माइकल स्टिफेल को ही है. ऋण चिह्न के लिए इतालवी गणितज्ञ अंगरेजी के ‘माइनस’ शब्द के पहले अक्षर ‘एम’ का प्रयोग करते थे. गणितज्ञ पसिओली भी पहले ऋण के लिए ‘एम’ चिह्न का ही प्रयोग करते थे. किंतु बाद में पसिओली व हैक्टोग्लिआ ने भी ऋण दर्शाने के लिए ‘-’ चिह्न का प्रयोग शुरू कर दिया. ‘हिएटा’ नामक गणितज्ञ ‘अ-ब,’ इस रीति से ऋण दर्शाते थे.

यद्यपि स्टिफेल ने सन 1544 में सर्वप्रथम इस चिह्न (-) का प्रयोग प्रारंभ कर दिया था किंतु अन्य गणितज्ञों ने इसे 1630 में अपनाया.

गुणा चिह्न

गुणा दर्शाने के लिए 2 अंकों के बीच बिंदु लगाने की विधि का प्रारंभ हरिओट नामक गणितज्ञ ने किया था. किसी भी चिह्न का उपयोग न करने वाले फ्रैंच गणितज्ञ डेकार्ट, ‘अ ङ्ग ब’ को ‘अब’ लिखते थे. जरमन गणितज्ञ लायबनीत्स अर्धवर्तुलाकार चिह्न का उपयोग गुणा के लिए करते थे. गुणा चिह्न का प्रयोग गणितज्ञ आउट्रेड ने सर्वप्रथम सन 1631 में ‘ग्रंथ क्लासिक मैथेमेटिका’ में किया.

भाग चिह्न

अरब गणितज्ञ ‘अ’ में ‘ब’ द्वारा भाग दिखाने के लिए आधुनिक प्रचलित पद्धति ‘अ़ब’ को ’अ-ब‘ या अ/ब के रूप में लिखते थे. गणितज्ञ आउट्रेड ने भाग के लिए (:) चिह्न का प्रयोग किया. गणितज्ञ लायबनीत्स तत्कालीन गुणा चिह्न अर्धवर्तुलाकार (ड) का उलटा चिह्न ‘फ’ का भाग करने के लिए प्रयोग करते थे. गणितज्ञ जोहन हेनरीज राहन ने सन 1659 में ज्यूरिख में भाग के लिए चिह्न का उपयोग किया. इस तरह गणित चिह्नों धन (+), ऋण (-), गुणा व भाग का विकास हुआ.       

 

मैं 55 में भी फिट तो आप क्यों नहीं: सुनील शेट्टी

बौलीवुड के रफटफ हीरो और ‘अन्ना’ के नाम से मशहूर सुनील शेट्टी सेहत को ले कर काफी चाकचौबंद रहते हैं और वे आम लागों को भी सेहतमंद रहने के लिए जागरूक बनाने की मुहिम चला रहे हैं. वे कहते हैं, ‘‘सेहत को ले कर अकसर लोग फुरसत न मिलने का बहाना बनाते हैं, जो बाद में उन्हें महंगा ही पड़ता है. जब मैं 55 साल की उम्र में फिट रह सकता हूं, तो और लोग क्यों नहीं रह सकते हैं?’’

पटना में एक जिम का उद्घाटन करने पहुंचे हीरो सुनील शेट्टी एक ‘फिटनैस गुरु’ के रूप में नजर आए. बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि देश और देह को सेहतमंद रख कर हम अपनी तरक्की कर सकते हैं और देश का भी भला कर सकते हैं. हर इनसान को रोजाना नियमित रूप से कसरत करने के लिए कुछ समय निकालना चाहिए. पैदल घूमना भी एक बेहतरीन कसरत है. कसरत से फिट रहने में मदद मिलती है.

आज 55 साल की उम्र में भी अपनी अच्छी सेहत का राज बताते हुए उन्होंने कहा कि वे अपनी सेहत को ले कर जागरूक हैं और लोगों को भी जागरूक होने की सलाह देते हैं. सेहत को तरजीह दे कर ही लोग खुद, परिवार, कारोबार, नौकरी वगैरह को भी अच्छी तरह से संभाल सकते हैं.

लोग अकसर यह कहते हैं कि आज की भागदौड़ वाली जिंदगी में कसरत करने के लिए समय ही नहीं मिलता है. वे सारा कुसूर खानपान और भागदौड़ की जिंदगी को ठहरा देते हैं. सच तो यह है कि सेहत की अनदेखी करने से मोटापा, डायबिटीज जैसी तमाम बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं. जिम में ऐक्सपर्ट ट्रेनर की मदद से मोटापा, डायबिटीज और कई तरह की बीमारियों से नजात पाई जा सकती है या कंट्रोल में रखा जा सकता है. जो लोग जिम नहीं जा सकते हैं, वे रोज एकाध घंटा घर पर ही कसरत को जरूर समय दें. साल 1992 में हिंदी फिल्म ‘बलवान’ से हीरो के तौर पर अपना फिल्मी कैरियर शुरू करने वाले सुनील शेट्टी ने अपनी आने वाली फिल्मों के बारे में बताया कि अभी ‘हेराफेरी-3’ पर काम चल रहा है और कुछ और फिल्मों पर बात चल रही है.

बिहार के बारे में उन्होंने कहा कि फिल्म इंडस्ट्री में बिहार की काफी अहमियत है. कई फिल्मों में बिहारी किरदारों को देखा जा सकता है, वहीं दूसरी ओर फिल्मों के कारोबार के लिहाज से भी फिल्म वालों का ध्यान बिहार पर टिका रहता है. बिहार और उत्तर प्रदेश में जब कोई फिल्म चलती है, तभी सुपरहिट मानी जाती है.

‘बलवान’, ‘मोहरा’, ‘गोपीकिशन’, ‘दिलवाले’, ‘टक्कर’, ‘शस्त्र’, ‘सपूत’, ‘धड़कन’,  ‘बौर्डर’, ‘भाई’, ‘विनाशक’, ‘हेराफेरी’, ‘रिफ्यूजी’, ‘एलओसी-कारगिल’ समेत तकरीबन 110 फिल्मों में तरहतरह के किरदारों को निभा चुके सुनील शेट्टी की बेटी आथिया शेट्टी ने भी बौलीवुड में धमाकेदार कदम रखा है.

आथिया शेट्टी के बारे में सुनील का कहना है कि उन में ऐक्टिंग का हुनर है और बौलीवुड में भलेबुरे की पहचान भी है. उन की पहली फिल्म ‘हीरो’ को लोगों ने काफी पसंद किया है और वे इंडस्ट्री में खुद अपना ठोस मुकाम बनाने का दम रखती हैं. अवार्ड वापसी के बारे में पूछने पर सुनील शेट्टी ने कहा कि सब से बड़ा पुरस्कार तो जनता का प्यार और सपोर्ट होता है. इस के बगैर किसी कलाकार, फिल्मकार, साहित्यकार का वजूद नहीं हो सकता है. सम्मान के तौर पर मिली किसी चीज को लौटा देने भर से सम्मान की वापसी नहीं हो जाती है. वैसे तो हर इनसान की अपनीअपनी सोच और समझ होती है. कोई भी अपनी मरजी का काम करने के लिए आजाद है.

पठानकोट: सिक्योरिटी में लगी शर्मनाक सेंध

2 जनवरी, 2016. ठिठुरती सुबह के तकरीबन साढ़े 3 बजे थे. पठानकोट एयरबेस में डीएससी की मैस में लाइटें जल रही थीं, जबकि बाकी रिहायशी इलाके में अंधेरे का राज था. मैस में डीएससी के जवान एयरफोर्स के अफसरों व जवानों के लिए नाश्ता तैयार कर रहे थे. कुछ जवान गैस के चूल्हे पर चावल बना रहे थे, तो कुछ गाजर, टमाटर, पनीर, अदरक वगैरह काट रहे थे. अचानक वहां कुछ हलचल हुई. जवानों को कुछ समझ में आता, तब तक वहां कुछ अनजान बंदूकधारी घुस चुके थे. उन के इरादे ठीक नहीं थे, क्योंकि यह एक आतंकी हमला था, जो उन जवानों के लिए कड़ी चुनौती था.

मैस में काम कर रहे जवान जगदीश राज ने फौरन एक आतंकवादी को धर दबोचा और उस से गुत्थमगुत्था हो गए. उन्होंने उस आतंकवादी की राइफल छीनी और उसे गोलियों से भून डाला. इस बीच बौखलाए दूसरे आतंकवादी ने जगदीश राज और उन के साथ रसोईघर में काम कर रहे डीएससी के 4 जवानों पर गोलियां बरसा कर उन्हें शहीद कर डाला. 20 से 30 साल की उम्र के वे आतंकवादी रसोईघर से खानेपीने का सामान बटोर कर चल दिए. एक आतंकवादी के दोनों पैरों की उंगलियां नहीं थीं. एक आतंकवादी ने मूंछें रखी हुई थीं, जबकि बाकी क्लीन शेव थे. उन के पास वौकीटौकी थे, जिन से वे आपस में बातचीत कर रहे थे.

अचानक हुई गोलीबारी से एयरबेस में रैड अलर्ट जारी हो गया और इस के बाद शुरू हुआ आतंकवादियों के खिलाफ ऐसा आपरेशन, जो तकरीबन 100 घंटे तक चला. नैशनल सिक्योरिटी गार्ड, सेना व एयरफोर्स के गरुड़ कमांडो ने इस आपरेशन में एयरबेस कैंप में घुसे आतंकवादियों में से 4 को 24 घंटे में ही मार डाला था, जबकि 5वें और 6ठे आतंकवादियों को मारने में 60 घंटे से भी ज्यादा का समय लग गया था. इस आतंकी हमले में भारतीय सेना का भी काफी नुकसान हुआ. नैशनल सिक्योरिटी गार्ड के लैफ्टिनैंट कर्नल निरंजन पी. कुमार समेत 7 जवान शहीद हुए, जबकि 20 जवान घायल हो गए.

पाकिस्तान की सरहद से तकरीबन 20 किलोमीटर दूर बने इस एयरबेस में घुसे आतंकवादी सेना की वरदी में थे और वहां के असलहाघर, मुलाजिमों को सप्लाई की जाने वाली गैस के भंडार, सेना के अस्पताल और एक सैंट्रल स्कूल को अपना निशाना बना कर जान और माल का ज्यादा से ज्यादा नुकसान करना चाहते थे. इस आतंकी हमले से केवल पंजाब में ही दहशत नहीं मची, बल्कि भारत और पाकिस्तान के संबंधों में सुधार लाने की उम्मीदों को भी झटका लगा. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, ‘इनसानियत के जो दुश्मन भारत की तरक्की नहीं देख सकते, ऐसे लोगों ने हमला किया. हमारे जवानों ने उन्हें कामयाब नहीं होने दिया. मुझे अपने जवानों और सिक्योरिटी बलों पर फख्र?है.’

इतना कह देने से बात नहीं बनती है, क्योंकि मामला जितना दिख रहा है, उस से कहीं ज्यादा गंभीर है. चूंकि इस आतंकी हमले के पीछे जैश ए मोहम्मद का हाथ बताया जा रहा है, इसलिए इतना तो साफ है कि आतंकवादी भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में सुधार नहीं होने देना चाहते हैं. साथ ही, उन्होंने यह भी साबित कर दिया है कि वे अब इतने ताकतवर हो चुके हैं कि भारत में कहीं भी घुसपैठ कर सकते हैं.

हर कदम पर चूक

पठानकोट को ही लें. वहां एक लाख से ज्यादा सेना के लोग तैनात हैं. वहां सेना का एक बड़ा असलहाघर है. इस भंडार के एक हजार गज के दायरे में सेना किसी भी तरह की इमारत नहीं बनने देना चाहती है, पर फिर भी ऐसा हो रहा है. कई इमारतें इतनी बड़ी हैं कि उन पर से सेना के हर छोटेबड़े काम पर नजर रखी जा सकती है. इस के अलावा जिस इलाके से आतंकवादी एयरफोर्स स्टेशन में घुसे थे, वहां का बहुत बड़ा हिस्सा बड़ेबड़े सरकंडों से ढका हुआ है. इस इलाके की उतनी बार साफसफाई नहीं की गई, जितनी होनी चाहिए थी. दुख की बात तो यह है कि साल 2015 में गुरदासपुर के दीनानगर पुलिस स्टेशन पर हुए आतंकी हमले के बाद भी पठानकोट में इंटरनैशनल बौर्डर को सौ फीसदी कंटीली तारों से नहीं बांधा जा सका है. पठानकोट जिले में 30 किलोमीटर लंबी सरहद में तकरीबन आधा किलोमीटर से भी ज्यादा हिस्से की कंटीली तार कट चुकी है. भारत की तरफ रावी नदी से जलालिया व तरनाह नाम के नाले भी निकलते हैं.

बारिश के दिनों में इन नालों में इतना तेज पानी आता है कि कंटीली तार भी बह जाती है. ऐसा माना जा रहा है कि एयरफोर्स स्टेशन पर हमला करने वाले आतंकवादी ऐसे ही सिक्योरिटी में हुए छेदों का फायदा उठा कर पठानकोट में घुसे थे. कोढ़ पर खाज यह कि दिसंबर, 2015 में ही ऐसी खुफिया रिपोर्टें आई थीं कि कुछ आतंकवादी पाकिस्तान से भारत में घुस आए हैं, जिन पर संजीदगी से काम नहीं किया गया. सुपरिंटैंडैंट सलविंदर सिंह, उन के एक ज्वैलर दोस्त राजेश वर्मा और रसोइया मदन गोपाल ने 1 जनवरी, 2016 को पुलिस को यह सूचना दी थी कि सेना की वरदी पहने 4-5 लोगों ने उन्हें बंधक बनाया और उन की गाड़ी लूट कर फरार हो गए. इस के बाद भी पुलिस ने कोई ठोस कार्यवाही नहीं की. हालांकि बाद में एसपी के बयान पर शक भी किया गया और उन्हें कड़ी पूछताछ के लिए नैशनल सिक्योरिटी एजेंसी के हवाले कर दिया गया.

पर अगर तब एसपी सलविंदर सिंह की बात को संजीदगी से ले कर पंजाब पुलिस ने कथनौर पुल पर लगे नाके पर चैकिंग की होती, तो शायद आतंकवादी पकड़े जाते. लेकिन ऐसा हो न सका और आतंकवादी हथियारों के बड़े जखीरे के साथ तकरीबन 30 किलोमीटर के दायरे में 2 दिनों तक घूमते रहे और जिस जगह पर उन्होंने एसपी सलविंदर सिंह की गाड़ी छीनी थी, उसी के 5 सौ मीटर की दूरी पर वे गाड़ी की मदद से बेरोकटोक एयरबेस के अंदर घुसे थे. सवाल यह भी उठता है कि अगर इस तरह के आतंकी हमले की पहले से ही जानकारी थी, तो एयरफोर्स स्टेशन की चारदीवारी पर सिक्योरिटी क्यों नहीं बढ़ाई गई? एयरफोर्स ने हमले से एक दिन पहले पुलिस और मिलिटरी के आला अफसरों की मीटिंग की थी. इसी के मद्देनजर 1 जनवरी, 2016 को दिल्ली से एनएसजी के कमांडो पठानकोट भेज दिए थे. ऐसा होने के बाद भी एयरफोर्स स्टेशन का पूरा जिम्मा एनएसजी, आर्मी कमांडो और गरुड़ को नहीं सौंपा गया, बल्कि पहली जनवरी की रात सिक्योरिटी की जिम्मेदारी डीएससी के रिटायर्ड जवानों पर डाल दी गई, जिस से आतंकवादियों का एयरबेस में घुसने का रास्ता और भी आसान हो गया.

रची गई साजिश

ऐसा माना जा रहा है कि पठानकोट एयरबेस पर आतंकी हमले की साजिश पिछले एक साल से रची जा रही थी. पुलिस ने इस बेस कैंप की जानकारी पाकिस्तान तक पहुंचाने के आरोप में 30 अगस्त, 2014 को सेना के एक जवान सुनील कुमार को गिरफ्तार किया था. वह एक सोशल नैटवर्किंग साइट के जरीए आईएसआई की एक तथाकथित एजेंट मीना रैणा के संपर्क में आया था और उसे एयरफोर्स के राज बताए थे. माना जा रहा है कि आतंकवादियों ने इसी जानकारी के तहत इस हमले की साजिश रची. यह भी कहा जा रहा है कि अगर पुलिस ने सुनील कुमार की गिरफ्तारी को संजीदगी से लिया होता, तो इतना बड़ा हमला नहीं होता. लेकिन हमला तो हो गया और वह भी इस तरह प्लान बना कर कि हमारी सुरक्षा एजेंसियां मुंह ताकती रह गईं. कहने को तो वे 5-6 आतंकवादी थे, लेकिन किसी कमांडो की तरह ट्रेनिंग पाए हुए, तभी तो उन्होंने हमारे 7 जांबाजों को ‘शहीद’ बना दिया.

आतंकवादियों का पठानकोट एयरबेस पर हमले का संबंध सीधेसीधे भारत और यहां की सेना को चुनौती देना था. वे देश के सब से बड़े एयरबेस की सिक्योरिटी में सेंध लगा कर अपनी ताकत का एहसास कराना चाहते थे. वे एयरबेस के भीतर घुसे, हमारे जवानों को निशाना बनाया और देश में बेचैनी बढ़ा दी. यह चिंता की बात है और दुश्मन के छक्के छुड़ाने, आतंकवाद को जड़ से मिटाने, शहीदों की याद में मोमबत्ती जलाने जैसे जुमलों से बात नहीं बनेगी, बल्कि अब यह मान लेना होगा कि पानी सिर से ऊपर जा रहा है. साथ ही, इस बात पर संजीदगी से विचार करना होगा कि हमारे सिक्योरिटी सिस्टम में आई खामियों को कैसे दुरुस्त करना है. अगर पहले से ही इस हमले की जानकारी हो चुकी थी, तो फिर हमारे 7 सेना के लोग कैसे मारे गए? उन की मौत की जिम्मेदारी कौन लेगा?

रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने कहा था कि आतंकवादियों के पास एके-47, अंडर ग्रेनेड बैटल लौंचर, पिस्तौलें, स्विस और कमांडो चाकू, 40-50 किलो गोलियां, 3-4 दर्जन मैगजीन और मोर्टार बरामद किए गए. मौत का इतना साजोसामान ले कर किसी एयरबेस में घुसना हंसीखेल नहीं है. इस बात की जांच होनी चाहिए और कुसूरवारों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए. यह ठीक है कि इस आतंकी हमले में मारे गए जवानों को शहीद का दर्जा दिया जाएगा और उन्हें लड़ाई जैसे हालात में अपनी जान देने वालों को मिलने वाले सभी फायदे दिए जाएंगे, मगर क्या यह सब उन के परिवार वालों के दिलों को ठंडक पहुंचा देगा? भारत द्वारा पाकिस्तान को भेजे गए सुबूतों पर तो बाद में फैसला होगा, फिलहाल तो हमें अपनी कमियों को ठीक करना होगा, क्योंकि ऐसा जल्दी नहीं किया गया, तो अगला आतंकी हमला झेलने के लिए तैयार रहिए. 

औरत के देहजाल से बचें

आजकल लोगों के दिलों में पैसे और ऐशोआराम की चाहत इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि मां बेटी से जिस्मानी रिश्ते की बात करते समय अपने रिश्ते की मर्यादा को भी भूल चुकी है. एक मामला ऐसी ही मां का है. मां ने कालेज में पढ़ने वाली अपनी बेटी से कहा कि वह अधेड़ उम्र के लैक्चरर को घर पर कोचिंग देने के लिए आने को तैयार कर के उसे अपना दीवाना बना कर उस से पैसे ऐंठे. इस से सैक्स का मजा भी मिलेगा और शादी का दहेज जुटाने में मदद भी मिलेगी.

मां की इन बातों को सुन कर 18 साला बेटी खुशी से मुसकरा उठी. अपनी मां की बात सुन कर उस ने सोचा कि सैक्स का पूरा मजा तो अब अपने घर पर ही लिया जा सकता है. वजह, उस ने अपने एक बौयफ्रैंड से पार्क की झाडि़यों में सैक्स का मजा चोरीचुपके से लिया हुआ था. दूसरे दिन ही उस बेटी ने अपने कालेज के 50 साला लैक्चरर को अपने घर पर कोचिंग देने के लिए राजी कर लिया. उस ने छुट्टी के दिन लैक्चरर को अपने घर पर बुला लिया था. वह लैक्चरर को अपने घर की दूसरी मंजिल के कमरे में ले गई थी और उस के शरबत में शराब मिला कर उसे मदहोश कर दिया था.

वह लड़की फिल्म हीरोइन जैसी खूबसूरत तो थी ही, उस ने कपड़े भी बहुत छोटे पहन रखे थे. लैक्चरर उस के सुडौल उभारों की ओर देख रहे थे. तभी लड़की ने अपने कपड़ों को उतार कर उन को उन्हें पूरी तरह से दिखा दिया. इस के बाद लैक्चरर भी अपना आपा खो बैठे. कुछ ही देर में उन्होंने उस से जिस्मानी रिश्ता बनाया, तो वह लड़की भी सैक्स का मजा लेते हुए खुशी से मुसकरा उठी. उस के बाद तो यह रोज का सिलसिला बन गया. लेकिन उन्हें नहीं पता था कि लड़की की मां मोबाइल फोन से रोजाना उन के सैक्स संबंधों की वीडियो बना रही थी.

एक दिन मांबेटी की योजना के मुताबिक, लैक्चरर लड़की से सैक्स संबंध बनाने के लिए उसे अपने पास बुलाने लगे, तो उस ने उन से कहा कि वे उस के कपड़ों को फाड़ते हुए उस से जबरदस्ती करने का नाटक करें. ऐसा करने से सैक्स में ज्यादा मजा आता है. लैक्चरर साहब ऐसा ही करने लगे थे और मां उन की इन हरकतों की वीडियो बना रही थी. जैसे ही वे उस से जिस्मानी रिश्ता बनाने लगे कि तभी उस लड़की की मां ने अपने साथ आए पति से बोली, ‘‘देखा आज के कलयुगी टीचर को, जो अपनी बेटी समान शिष्या से कैसी घिनौनी हरकत कर रहा है. अभी इस की पिटाई कर के इसे पुलिस में देते हैं.’’

यह देख कर लैक्चरर साहब तो दंग रह गए थे. वे रोते हुए उन से इस भूल की माफी मांग रहे थे. यह देख कर लड़की की मां उन से बोली कि अगर अपनी बदनामी और पुलिस से बचना चाहते हो, तो 50 लाख रुपए अभी अपनी घरवाली से मंगवा लो. यह सुन कर लैक्चरर साहब ने अपने मकान के कागजात अपनी घरवाली से मंगवा कर उन को दे दिए और स्टांप पेपरों पर लिख दिया कि वे अपना मकान उन्हें बेच रहे हैं.लैक्चरर साहब ने उसी दिन प्रोपर्टी डीलर से कार्यवाही करा कर अपना मकान उन के नाम करा दिया और उन के जाल से जैसेतैसे छुटकारा पा कर राहत की सांस ली.

इसी तरह की जयपुर के एक 40 साला कुंआरे की भी कहानी है. वह भजनों का बेजोड़ गायक था. उस के मातापिता की मौत बचपन में ही हो गई थी. उसे उस की नानी ने पाला. उस के घर में एक 25 साला औरत अपने पति और 2 छोटे बच्चों के साथ किराए पर रहती है.

एक दिन उस औरत के पति ने मकान हड़पने की योजना बनाई. उस ने अपनी पत्नी से कह दिया कि वह इस आदमी को अपने प्रेमजाल में फांस ले. बूढ़ी नानी को आंखों से कम दिखाई देता है और वे सुनने में भी लाचार हैं. अपने पति की इस योजना के मुताबिक, जब उस का पति गार्ड की नौकरी पर चला गया और उस गायक की नानी भी कहीं बाहर चली गई, तो वह उस के कमरे जा कर उस से लिपटते हुए बोली, ‘‘मुझे आप से प्यार हो गया है. मैं अपने पति से परेशान हूं. वह रोजाना मुझे परेशान करता है.’’ उस की इन बातों को सुन कर वह गायक खुश हो गया. उस ने उसी समय मौके का फायदा उठा कर उस से जिस्मानी रिश्ता बना कर भरपूर मजा लिया. उस के बाद तो वह दिनरात उस से जिस्मानी सुख भोगने लगा था. रात में जब वह औरत उस के पास आती, तो वह उस से पूछता कि उस का पति जाग गया, तो परेशानी खड़ी कर देगा.यह सुन कर वह औरत उस से कहती, ‘‘मैं उसे नींद की गोलियां दे कर बेहोश कर देती हूं. अब तो वह सुबह ही उठेगा.’’

इस तरह से उन का यह खेल कई सालों तक चलता रहा.

एक बार वह औरत उस से बोली, ‘‘अब मेरा मन यहां नहीं लगता है. तुम मुझे कहीं दूर ले चलो.’’यह सुन कर वह गायक उसे कोलकाता ले गया. वह औरत अपने दोनों बच्चों को पति के पास छोड़ गई थी. कुछ दिन कोलकाता में रहने के बाद वे मथुरा में रहने लगे.योजना के मुताबिक, एक दिन उस औरत ने अपने पति और घर वालों को मथुरा फोन कर के बुलवा लिया और उसे गिरफ्तार करवा दिया. अब वह गायक जयपुर की जेल में अपने किए की सजा भुगत रहा है.जब उस औरत से समझौते की बात की जाती है, तो वह उस का मकान अपने नाम करने की बात करती है. उस की इस शर्त को सुन कर जेल में बंद वह गायक सोचता है कि अगर वह अपनी नानी के मकान को उस के नाम करने के लिए कहेगा, तो उस की 90 साला नानी जीतेजी मर जाएंगी. लिहाजा, वह जेल में ही अपनी जिंदगी बिताने को मजबूर है.

मामला राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय के एक 55 साला विधुर प्राचार्य का है. 30 साल की उम्र में ही दूसरे बच्चे को जन्म देने के 4 साल बाद ही उन की पत्नी की एक सड़क हादसे में मौत हो गई थी. प्राचार्य ने जैसेतैसे बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ालिखा कर सरकारी नौकरी में लगवाया. उन के दोनों बेटों में से बड़े बेटे की शादी के कुछ दिन बाद ही उन के बड़े बेटे और बहू ने सोचा कि पिता की पैंशन के बाद उन्हें काफी पैसा मिलेगा. उस पैसे पर उन के छोटे बेटे का हक नहीं रहे और उन का खरीदा हुआ मकान भी उन के नाम हो जाए, इस के लिए उन्हें अपने काबू में किया जाए. वे दूसरी औरतों पर भी रोजाना पैसे लुटाते हैं, इसलिए वे पैसे अपने घर में ही आएं. इस के लिए एक ही उपाय है कि उन्हें औरत का सुख घर में दिया जाए. ‘‘लेकिन इस के लिए औरत लाएंगे कहां से?’’ बड़े बेटे की बीवी ने कहा, तो बेटा आंख मारते हुए बोला, ‘‘यह सुख तुम उन्हें दोगी.’’

‘‘मैं… यह तुम क्या कह रहे हो?’’ उस की बीवी ने हैरान हो कर उस से पूछा, तो वह बोला, ‘‘तुम तो सतीसावित्री जैसी बातें कर रही हो. कालेज में तुम ने अपने फ्रैंड्स को भी तो खूब मजे दिए थे. अपने बूढ़े ससुर को मजे देने में तो तुम्हें उन का आशीर्वाद और ढेर सारा पैसा भी मिलेगा.

‘‘तो यह बात है,’’ यह सुन कर वह बोली, ‘‘आने दो उन्हें, मैं आज से ही अपना काम शुरू करती हूं. तुम 2-3 दिन घर के बाहर ही रहना. मैं उन से कह दूंगी कि तुम किसी काम से बाहर गए हो, इसलिए उन्हें तुम से डर नहीं लगेगा.’’ बड़ा बेटा 3 दिन के लिए घर से बाहर चला गया था. प्राचार्य ससुर अपने विद्यालय से घर लौटे, तो वे अपनी बहू की सैक्सी ड्रैस में उस के जिस्म के दिखते हुए मादक अंगों को देख कर हैरान रह गए थे. जब वे अपने कमरे में खाना खाने का इंतजार कर रहे थे कि तभी बहू उन के कमरे में आ कर उन से लिपट गई.

वे उस की ओर हैरानी से देखने लगे, तो बहू उन से बोली, ‘‘आप का बेटा तो कई महीने से मुझ से दूर है. शायद उन का किसी और से इश्क का चक्कर चल रहा है. मैं भी औरत हूं. मेरा जिस्म भी मर्द के प्यार को तरसता है. अगर मैं कहीं बाहर अपनी जरूरत पूरी करूंगी, तो इस में हमारी बदनामी होगी. इसलिए मैं ने सोचा कि…’’ इतना कह कर वह अपने कपड़े उतारने लगी.

बहू के इस रूप को देख कर प्राचार्य खुश हो कर उस से जिस्मानी रिश्ता बना बैठे. सालों तक उन का यह सिलसिला चलता रहा. वे अपनी तनख्वाह भी बहू को देने लगे थे, पर बहू से खुश हो कर जब वे अपना मकान उस के नाम करने लगे, तो उन के छोटे बेटे को बहुत बुरा लगा. एक दिन जब उसे अपने पिता और भाभी की इस प्रेम कहानी के बारे में मालूम हुआ, तो उस ने उन्हें खूब फटकारा और अपने पड़ोसियों को भी बताने की धमकी दी. इस से प्राचार्य को इतना ज्यादा पछतावा हुआ कि उन्होंने खुदकुशी कर ली. औरत के देहजाल के नतीजे इतने भयानक होते हैं कि लोग अपनी धनदौलत लुटा देते हैं. कितने ही लोग इस सामाजिक बुराई के चलते आज देश की जेलों में नरक से भी बदतर जिंदगी बिताने को मजबूर हैं. 

नौसिखिया डाक्टरों से रहें सावधान

अजमत खान उत्तर प्रदेश पुलिस में सर्विलांस ऐक्सपर्ट सिपाही था. वह बुखार से पीडि़त हुआ. 11 अक्तूबर, 2015 को वह उत्तर प्रदेश के जनपद बुलंदशहर के जिला अस्पताल में इलाज के लिए पहुंचा.

उस वक्त वहां तैनात इमर्जैंसी प्रभारी डाक्टर सचिन ने अजमत खान को 2 इंजैक्शन लगा दिए. अजमत खान खुश था कि अब उसे आराम मिल जाएगा, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. घर पहुंचने के 24 घंटे के अंदर ही अजमत खान के बदन में सूजन आ गई. हालत ज्यादा बिगड़ने पर उसे तुरंत एक प्राइवेट अस्पताल में भरती कराया गया. वहां पता चला कि बिना जांचपड़ताल किए और मर्ज को ठीक से समझे बिना ही दिए गए इंजैक्शनों ने उस की यह हालत की थी.

डाक्टर की यह करतूत जब सुर्खियों में आई, तो बजाय कोई कार्यवाही करने के अस्पताल प्रशासन ने उसे छुट्टी पर ही भेज दिया. उधर अजमत खान का शरीर गलना शुरू हो गया. गंभीर हालत के चलते उसे दिल्ली के अपोलो अस्पताल में भरती कराया गया. उस के शरीर से खून रिसने लगा. वह कोमा में चला गया और उस के गुरदों ने भी काम करना बंद कर दिया. कई दिनों के बाद उस ने दम तोड़ दिया.

मामले ने तूल पकड़ा और आरोपी डाक्टर को मरीज की अनदेखी का जिम्मेदार माना गया. डाक्टर के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया गया. नौसिखिया डाक्टर भी हर बड़ेछोटे अस्पतालों में पाए जाते हैं. कहने को उन के पास डिगरियां होती हैं, लेकिन वे असल होती हैं या थोड़ीबहुत पढ़ाई कर के हासिल की गई होती हैं, इसे कोई नहीं जानता. कई बार डिगरी लेने के तुरंत बाद ही डाक्टर अपना निजी अस्पताल खोल कर बैठ जाते हैं. वे अनुभव को तवज्जुह नहीं देते, जिस के नतीजे कभीकभी घातक साबित होते हैं.

गाजियाबाद के रहने वाले फूड इंस्पैक्टर शिवराज सिंह दिल की बीमारी से पीडि़त थे. 29 नवंबर, 2015 को उन्होंने एक लैब में ब्लड सैंपल दिया. सैंपल लेने वाला नौजवान नौसिखिया था. उस की लापरवाही से हाथ में इंजैक्शन से हवा चली गई. नतीजतन, शिवराज का हाथ सूज कर नीला पड़ गया. उस लैब को चलाने वालों ने अपनी लापरवाही से पल्ला झाड़ने की कोशिश की, लेकिन पुलिस को खबर की गई, तो उन्होंने गलती मानी.

पता चला कि लोगों का ब्लड सैंपल एक नौसिखिया ले रहा था. उस के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी गई. बरेली जिले की एक डाक्टर ने तो अनाड़ीपन की हदों को ही लांघ दिया. जचगी के दर्द के बाद नाजिम नामक नौजवान ने अपनी पत्नी मेराज को सुभाष नगर इलाके में डाक्टर राधा शर्मा के घर में बने अस्पताल में भरती कराया. डिलीवरी के दौरान उस से 10 हजार रुपए जमा कराने को कहा गया, जो उस ने जमा करा दिए. मेराज ने नौर्मल डिलीवरी से एक बेटी को जन्म दिया. डाक्टर ने सिंकाई की बात कह कर नवजात के सीने पर इलैक्ट्रौनिक सिंकाई मशीन रख दी. इस से उस का सीना जल गया. कुछ देर बाद ही उस की मौत हो गई.

मामला बिगड़ने पर डाक्टर राधा शर्मा ने समझौते की कोशिश की, लेकिन इस बात की शिकायत पुलिस से की गई, तो पुलिस ने डाक्टर राधा शर्मा को गिरफ्तार कर लिया. जांच में पता चला कि राधा शर्मा के पास एक ट्रेनिंग सैंटर से प्रसव सहायक का सर्टिफिकेट था. इस के बल पर उस ने खुद को डाक्टर घोषित कर के घर में ही अस्पताल खोल लिया था. 4 कमरों के अस्पताल में उस ने एक कमरे में ओपीडी बनाई हुई थी. फरवरी महीने में वह 2 नवजात बच्चों की मौत के मामले में जेल गई थी, लेकिन हाईकोर्ट से जमानत ले कर बाहर आ गई थी. जेल से बाहर आ कर भी डाक्टर राधा शर्मा का अनाड़ीपन खत्म नहीं हुआ और न ही कोई सबक लिया गया. उस ने फिर से नया कारनामा कर दिया. इस के बाद पुलिस ने न केवल उस के अस्पताल को सील कर दिया, बल्कि उसे पेशेवर अपराधी घोषित कर दिया.

सहारनपुर के रहने वाले अनिल कुमार को बुखार था. वह एक डाक्टर के पास पहुंचा. उसे वहां इंजैक्शन लगाया गया. इस के बाद उस की तबीयत अचानक बिगड़ गई और देखते ही देखते उस की मौत हो गई. इस मामले में मुकदमा दर्ज करा दिया गया. पता चला कि जिस ने अनिल को इंजैक्शन लगाया था, वह नौसिखिया कंपाउंडर टीटू था. बुलंदशहर जिले के किसान छोटू गिरी के 6 साला बेटे अजय की खेलते समय कुहनी की हड्डी टूट गई. वे उसे इलाज के लिए जिला अस्पताल ले गए. डाक्टर ने उस का एक्सरे कराया और प्लास्टर लगा दिया गया. अगले 5 दिनों में आराम मिलना तो दूर अजय की हालत और भी ज्यादा बिगड़ गई. बाद में उन्होंने दिल्ली ले जा कर बेटे का इलाज कराया, तो पता चला कि डाक्टर ने हड्डी ही गलत तरीके से जोड़ दी थी, जिस की वजह से अजय बहुत परेशान था.

हड्डी जोड़ने वाले उस डाक्टर के खिलाफ पुलिस में शिकायत की गई. गाजियाबाद जनपद में मोतियाबिंद के आपरेशन के चक्कर में 8 मरीजों की जिंदगी में अंधेरा छा गया. आंखों के एक अस्पताल के बाहर औफर वाला बोर्ड लगा था कि उन के यहां मोतियाबिंद का सफल आपरेशन केवल 2 हजार रुपए में किया जाता है. डाक्टरों ने एक ही दिन में कई आपरेशन कर डाले. इसे लापरवाही कहें या नौसिखियापन, 8 मरीजों की एक आंख की रोशनी जाती रही. इन मरीजों में फूलवती, राजेंद्री देवी, जगवती, फरजाना, जुम्मन, अमाना खातून, शिक्षा देवी व नेपाल शामिल थे. मामले के खुलने पर अस्पताल के खिलाफ जांच बैठा दी गई. इस तरह के मामले यह बताने के लिए काफी हैं कि मरीजों की जिंदगी से नौसिखिया डाक्टर किस हद तक खिलवाड़ कर रहे हैं. लाला लाजपतराय मैडिकल कालेज के सुपरिंटैंडैंट डाक्टर सुभाष सिंह कहते हैं कि किसी डाक्टर को डिगरी मिल जाना ही काफी नहीं होता, उसे प्रैक्टिस भी करनी होती है. डाक्टरी का पेशा गंभीर है. मामूली सी लापरवाही भी किसी मरीज की जिंदगी ले सकती है. इस मसले पर डाक्टर वीपी सिंह कहते हैं कि किसी डाक्टर पर शक हो, तो उस की जांच कराई जा सकती है. लापरवाही और अनाड़ीपन से बचने के लिए डाक्टर के बारे में उचित जांचपड़ताल भी मरीजों को कर लेनी चाहिए. 

भूरिया मुच्छड़

राजस्थान के उदयपुर जिले में देवली नाम का एक छोटा सा गांव था. तकरीबन 700-800 घरों की बस्ती. वहां सभी जाति के लोग रहते थे, जो बहुत मेहनतकश थे. उसी गांव में सूरज नाम का एक मेहनती किसान रहता था. वह अपनी पुश्तैनी 10-12 बीघा जमीन पर खेतीबारी किया करता था. उस का खेत महावली की पहाड़ी के बीच मैदान में था, जिस में वह एक कुएं से सिंचाई करता था. सूरज 6 फुट हट्टाकट्टा नौजवान था. घर में उस की बूढ़ी मां व पत्नी संध्या रहती थी. संध्या का गोरा रंग और भरापूरा बदन लोगों के दिलों की धड़कनें तेज कर देता था. भोर में ही सूरज खेत पर चला जाता था. खेतों में उस के पास ट्रैक्टर, ट्रौली व खेती संबंधी सभी जरूरी सामान थे, जिस से वह गन्ने की उपज की सिंचाई, निराईगुड़ाई वगैरह अकेला ही करता था.

संध्या दिन में सूरज के लिए जब खाना ले कर घर से निकलती थी, तो घाघरे से उस की गोरीगोरी पिंडलियां साफ नजर आती थीं. छाती ढकने के लिए कस कर चोली बंधी रहती थी. सिर पर सतरंगी ओढ़नी का एक पल्लू चोली में खोंसा होता था.

सिर पर एक पोटली में 8-10 मक्के की मोटीमोटी रोटियां, सरसों का साग व हाथ में दही या छाछ का बरतन लिए जब वह कमर मटका कर चलती थी, तो कई मनचले मक्खियों की तरह उस के चारों ओर मंडराने लगते थे, पर वह किसी को भी नजदीक फटकने नहीं देती थी. पर देवली गांव में एक मुच्छड़ लट्ठबाज खुद को बड़ा तीसमारखां मानता था. वह अपनी मूंछों पर ताव दे कर खोमचे वालों, सब्जी वालों, दुकानदारों व राहगीरों को तंग कर उन का माल हड़पता था और औरतों को गंदे इशारे करता. मौका मिलने पर वह छेड़खानी भी कर देता था. उस का नाम वैसे तो भूरा राम था, पर सभी उसे भूरिया मुच्छड़ कहते थे.

गांव वाले भूरिया मुच्छड़ से डरते थे. पुलिस चौकी के 2 सिपाहियों और उस की खिचड़ी साथ पकती थी. एक दिन भूरिया मुच्छड़ बाजार में बवाल मचा रहा था कि तभी किसी ने उस से कह दिया कि यहां क्या अपनी धाक जमा रहा है? हिम्मत है तो सूरज की घरवाली संध्या को वश में कर के दिखा, फिर तुझे मर्द मानें?

तभी भूरिया मुच्छड़ पलट कर गरजते हुए बोला, ‘‘उस छोकरी को मैं चिडि़या की तरह अपनी कैद में न ले आऊं, तो मेरा नाम भी भूरा नहीं.

‘‘मैं कल ही संध्या पर डोरे डालना शुरू कर दूंगा.’’

दूसरे दिन जब संध्या सूरज के लिए खाना ले कर सजधज कर कमर मटकाती हुई अपने खेत की ओर चली, तो भूरिया मुच्छड़ उस के आगेपीछे मंडराने लगा.

संध्या ने उस से कहा, ‘‘भूरिया, मधुमक्खी के छत्ते में हाथ मत डालना, वरना बुरा हाल हो जाएगा.’’

उस की धमकी सुन कर भूरिया मुच्छड़ चुपचाप वहां से बिना कुछ किए चला गया. उसी दिन जब शाम को संध्या ने भूरिया मुच्छड़ की गंदी हरकतों के बारे में सूरज को बताया, तो वह बोला, ‘‘ऐसी बात है, तो मैं कल ही उस मच्छर को मसल देता हूं.’’

इस पर संध्या ने कहा, ‘‘ऐसा मत करना. जब किसी को मीठी गोली देने से मारा जा सकता है, तो जहर नहीं देना चाहिए. मैं भी चित्तौड़गढ़ की बेटी हूं. मुझे केवल गुलाब के फूल जैसी नाजुक मत समझना. उस लठैत से तो मैं अकेले ही निबट लूंगी.’’

इस के बाद संध्या ने सूरज के कान में अपनी योजना कही, जिसे सुन कर वह मुसकरा दिया. सूरज बोला, ‘‘वाह मेरी दिलदार, क्या योजना बनाई है. चलो, ट्रैक्टर पर गन्ने का खेत देख कर आते हैं.’’

अगले दिन जब संध्या भोजन ले कर खेत की ओर चली, तो भूरिया मुच्छड़ फिर आ धमका. इस बार संध्या ने आंख के इशारे से उसे अपने पास बुलाया और कहा, ‘‘देख भूरिया, तेरा पहलवान जैसा बदन देख कर मेरा भी मन ललचा गया है. अगर मेरी खूबसूरती और तेरी जवानी मिल जाए, तो जो औलाद पैदा होगी, उस में हम दोनों के गुण आ जाएंगे. ‘‘वैसे, सूरज नामर्द है. 4 साल हो गए, पर मेरी गोद अभी भी सूनी है. शाम को ही मेरे खेत में गन्नों के बीच बने चबूतरे पर मेरा इंतजार करना. मैं सूरज को घर भेज दूंगी और तेरे पास आ जाऊंगी. पर एक बात है…’’

भूरिया मुच्छड़ खुशी के मारे बोला, ‘‘क्या बात है? मैं तो तेरे लिए जान भी देने को तैयार हूं.’’

भूरिया मुच्छड़ को अपने जाल में फंसता देख संध्या बोली, ‘‘जान तेरे दुश्मन की जाए. मैं तो यह कहती हूं कि तेरी ये लंबीलंबी मूंछें मेरे गुलाब की कलियों जैसे गोरेगोरे गालों व होंठों का रसपान करने में अड़चन आएंगी. इसलिए इन मूंछों को कटा कर सफाचट हो जाओ.’’

‘‘ओह, यह बात है. मैं अभी जा कर मूंछें साफ करा देता हूं,’’ भूरिया मुच्छड़ खुशी से चहकते हुए बोला.

संध्या ने कहा, ‘‘याद रखना, अपना लट्ठ जरूर साथ लाना और रात को 8 बजे से पहले मत आना. चबूतरे पर मेरा इंतजार करना,’’ इतना कह कर संध्या घर चली गई और भूरिया मुच्छड़ अपनी मूंछें मुंड़वाने. योजना के मुताबिक, सूरज चबूतरे के पास ही गन्नों के झुरमुट में छिप गया. रात को भूरिया मुच्छड़ चबूतरे पर संध्या की बाट देखते हुए मन ही मन मुसकरा रहा था कि आज तो उन दोनों का मिलन हो ही जाएगा. उस की बांछें खिल रही थीं.

थोड़ी देर बाद संध्या भी सजधज कर उस के पास आ गई. उसे देख कर भूरिया मुच्छड़ की लार टपकने लगी. उस ने उसे अपनी बांहों में लेना चाहा, पर संध्या ने कहा, ‘‘इतनी भी जल्दी मत कर. पहले मैं अपनी चोली की डोरी कमर से खोल लेती हूं, फिर तू पूरा मजा ले लेना.’’ इस के बाद संध्या ने अपनी कमर के पीछे खोंसी हुई दरांती निकाली और फुरती से भूरिया मुच्छड़ की नाक पर वार कर उस की नाक काट कर अलग कर दी.

भूरिया दर्द के मारे चिल्लाया और बोला, ‘‘धोखा. मैं तुझे नहीं छोड़ूंगा.’’

इतना कह कर भूरिया मुच्छड़ ने अपने पास रखे लट्ठ पर हाथ मारा, पर वह गायब था. सूरज ने वह लट्ठ उठा लिया था और उस ने उसी का लट्ठ उसी पर धड़ाधड़ मारना शुरू कर दिया.

संध्या ने 2 बार के हमले में ही उस के दोनों कान भी काट दिए. भूरिया मुच्छड़ लहूलुहान हो कर इस तरह भागा, जैसे बंदूक से गोली चली.

सूरज ने अपनी पत्नी संध्या को बांहों में भर कर उस की पीठ थपथपाई और इस के बाद वे दोनों खुशीखुशी अपने घर चले आए. जब गांव वालों को मालूम हुआ कि भूरिया मुच्छड़ अपनी नाक और कान दोनों ही एक औरत से कटवा कर गांव छोड़ कर भाग गया है, तो सब ने राहत की सांस ली. इस तरह बहादुरी दिखाते हुए संध्या ने अपने गांव को बदमाश भूरिया मुच्छड़ से नजात दिलाई. अब उस का रुतबा पूरे गांव में और भी ज्यादा बढ़ गया था. जहां तक भूरिया मुच्छड़ की बात है, तो वह उस के बाद गांव के आसपास कहीं नहीं दिखाई दिया.

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