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सच कहने की हिम्मत

कालेज की वार्षिक परीक्षा शुरू हो गई थी. गणित का प्रश्नपत्र प्रिंसिपल विश्वनाथजी ने खुद तैयार किया था. परीक्षा में गणित का एक प्रश्न देख कर छात्रों का सिर चकरा गया. प्रश्न कठिन था और छात्रों की समझ में नहीं आ रहा था कि उस प्रश्न को हल कैसे किया जाए दरअसल, प्रिंसिपल सर ने जानबूझ कर प्रश्नपत्र में एक कठिन प्रश्न रख दिया था.

परीक्षा समाप्त होने के बाद कौपियां जांचने का काम शुरू हुआ. गणित की कौपियां प्रिंसिपल सर खुद जांचने लगे. उन्हें हैरानी हुई कि एक भी छात्र ने उन के दिए उस कठिन प्रश्न को छुआ तक नहीं था. उन्होंने अपने कक्ष में गणित के टीचर्स को बुलाया और प्रश्नपत्र दिखाते हुए फटकारने लगे, ‘‘आप लोग कक्षा में क्या पढ़ाते हैं  इस एक प्रश्न को तो किसी छात्र ने छुआ तक नहीं है. यह प्रश्न इतना कठिन भी नहीं था कि छात्र इसे छूने की हिम्मत ही नहीं करते. जाहिर है कि इस तरह के सवाल हल करना आप लोगों ने छात्रों को सिखाया ही नहीं. कक्षा में यदि पढ़ाया ही नहीं जाएगा तो बेचारे छात्र परीक्षा में ऐसा प्रश्न पूछे जाने पर उस का उत्तर कैसे दे पाएंगे ’’ उन के स्वर में रोष मिश्रित निराशा थी. सारे टीचर्स सांस रोक कर प्रिंसिपल सर की फटकार सुनते रहे लेकिन किसी ने भी जवाब देने की हिम्मत न की. सभी टीचर्स के सिर झुके हुए थे.

अचानक एक कोने से एक स्वर उभरा, ‘‘मैं कुछ कहना चाहता हूं सर,’’ युवा टीचर रमेश खड़े हुए और विनम्रता से बोले.

‘‘क्या कहना चाहते हैं, कहिए,’’ प्रिंसिपल सर उन की तरफ देखते हुए बोले.

‘‘सर, छात्र इस कठिन सवाल को हल कैसे करते ’’ रमेश स्पष्ट शब्दों में बोले, ‘‘यह प्रश्न ही गलत है.’’

रमेश की बात सुन कर कक्षा में उपस्थित सारे प्राध्यापक सकते में आ गए. उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि प्रिंसिपल सर के सामने एक टीचर उन की गलती बताने का साहस कर सकता है. हालांकि सारे टीचर्स यह बात अच्छी तरह जान गए थे कि प्रिंसिपल सर ने एक प्रश्न गलत चुना है लेकिन सच कहने की हिम्मत किसी में नहीं थी. प्रिंसिपल विश्वनाथ तनिक रोष भरे स्वर में बोले, ‘‘कौन कहता है कि मेरे द्वारा चुना गया प्रश्न गलत था ’’

‘‘मैं कहता हूं सर कि प्रश्न गलत था,’’ रमेश ने विनम्रता से कहा.

उन की बात सुन कर प्रिंसिपल सर चुप हो गए और कुछ सोचने लगे. फिर उन्होंने उस प्रश्न को गौर से देखा. वास्तव में वह प्रश्न ही गलत था, जिसे वह भूल से कठिन समझ रहे थे. प्रिंसिपल सर को अपनी गलती का एहसास हो गया था. वे बोले, ‘‘मुझे क्षमा करें. मैं यह भूल गया था कि प्रश्न भी गलत हो सकता है,’’ फिर थोड़ी देर सोचने के बाद वे बोले, ‘‘मुझे खुशी है, साथ ही गर्व भी कि हमारे कालेज में रमेशजी जैसे गुणी व बुद्धिमान टीचर्स भी हैं. लेकिन इस बात का दुख भी है कि अन्य सभी ने जानते हुए भी मुझे मेरी गलती बताने की हिम्मत नहीं की. चुपचाप निर्दोष होते हुए भी मेरी फटकार सुनते रहे. यह अच्छी बात नहीं है.

‘‘अगर रमेश ने मुझे सचाई बताने की कोशिश न की होती तो मैं यही सोचता कि आप लोग कक्षा में पढ़ाते ही नहीं हैं. देखिए, भूल किसी से भी हो सकती है. अगर बड़े से कोई गलती हो जाए और उस का पता छोटों को चल जाए, तो बेझिझक बड़े को उस की गलती बता देनी चाहिए. यह सोच कर चुप नहीं रह जाना चाहिए कि बड़े की गलती कैसे बताएं ’’

‘‘हमें क्षमा करें महोदय,’’ सभी टीचर्स एकसाथ बोले. साथ ही रमेश की प्रशंसा करने लगे.

कहर

अजीत की रेलगाड़ी 8 घंटे लेट थी. क्या करे  टिकटघर से टिकट लेते वक्त रेलगाड़ी को महज एक घंटा लेट बताया गया था. अब एक के बाद एक हो रही एनाउंसमैंट से रेलगाड़ी 8 घंटे लेट थी. टिकट वापस करने पर 10 फीसदी किराया कट जाता. बस स्टैंड जाने पर 50 रुपए खर्च होते, साथ ही समय ज्यादा लगता. टी स्टौल पर चाय की चुसकी लेता अजीत अभी सोच ही रहा था कि वह क्या करे, तभी उस का मोबाइल फोन घरघराया.

फोन अजीत की पत्नी का था, ‘तुम बस से चले आओ.’

‘‘देखता हूं,’’ अजीत बोला.

चाय के पैसे चुका कर अजीत जैसे ही मुड़ा, तभी उस से एक शख्स टकराया. दोनों एकदूसरे को देख कर चौंके. वह अजीत के स्कूल का सहपाठी कुलदीप था.

‘‘अरे अजीत,’’ इतना कह कर कुलदीप ने उसे गले लगा लिया और पूछा, ‘‘कहां जा रहा है ’’

‘‘अपने शहर और कहां… रेलगाड़ी 8 घंटे लेट है,’’ अजीत ने कहा.

‘‘मेरे होते क्या दिक्कत है,’’ कुलदीप बोला.

‘‘मगर तू तो मालगाड़ी का ड्राइवर है,’’ अजीत ने कहा.

‘‘तो क्या…  मेरे साथ इंजन में बैठ जाना. तेरे शहर से ही हो कर गुजरना है.’’

‘‘मेरे पास टिकट भी है.’’

‘‘वापस कर आ. तेरा किराया भी बचेगा.’’

अजीत टिकट खिड़की पर चला गया. कुलदीप चाय पीने लगा. 10 मिनट बाद मालगाड़ी चल पड़ी. मालगाड़ी के इंजन में बैठ कर सफर करना अजीत के लिए रोमांचक था.

कुलदीप 12वीं जमात पास कर के रेलवे में भरती हो गया था. अजीत आगे पढ़ा व अब एक दवा कंपनी में मैडिकल प्रतिनिधि था. अजीत के शहर का रेलवे स्टेशन आने वाला था. आउटर पर गाड़ी एक पल को रुकी. अजीत अपना बैग पकड़ कर रेलवे पटरी के दूसरी तरफ कूद गया. अजीत रेलवे लाइन के एक तरफ बनी पगडंडी पर आगे बढ़ा. रेलवे स्टेशन का चौराहा अभी दूर था. उस ने अपना मोबाइल फोन निकाला और पत्नी को फोन मिलाया. फोन स्विच औफ था. चौराहे पर कई आटोरिकशा खड़े थे. अजीत एक आटोरिकशा में बैठ गया. कालोनी के बाहर सन्नाटा पसरा था. अजीत ग्राउंड फ्लोर पर बने अपने फ्लैट के बाहर पहुंचा. वह घंटी बजाने को हुआ कि तभी उस के कानों में किसी अनजान मर्द की आवाज गूंजी.

अजीत ने घंटी पर से हाथ हटा लिया और दबे पैर फ्लैट के पिछवाड़े में पहुंचा. चारदीवारी ज्यादा ऊंची नहीं थी. वह दीवार फांद कर अंदर कूदा और चुपचाप बैडरूम के पिछवाड़े की खिड़की से अंदर झांका, तो हैरान रह गया.

भीतर अजीत की पत्नी उस के एक दोस्त के साथ रंगरलियां मना रही थी. अजीत कुछ देर तक भीतर का सीन देखता रहा, फिर धीरेधीरे पीछे हटता चारदीवारी के साथ पीठ लगा कर खड़ा हो गया. ऐसा तो उस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था. अजीत स्वभाव का बड़ा सीधासादा था. उस की पत्नी सुंदर, सुघड़ और घरेलू थी. उन के 2 प्यारे बच्चे थे. अजीत के शहर से बाहर होने पर पत्नी मोबाइल फोन से उस का हालचाल पूछती थी. घर आने पर उस की सेवा में बिछ जाती थी. लेकिन अब जो सामने था, वह सब अजीत की सोच से बाहर था. अजीत का माथा गुस्से से भिनभिनाने लगा था. वह बौखलाया हुआ सा इधरउधर देखने लगा. लौन में एक खुरपा पड़ा था. वह झुका और खुरपा उठा लिया.

अजीत हाथ में खुरपा थामे आगे बढ़ा. कमरे के बंद दरवाजे को हलके से थपथपाया. सिटकिनी लगी थी. उस ने कंधे का एक तगड़ा वार किया. दरवाजा खुल कर एक तरफ हो गया. सैक्स की मस्ती में डूबे वे दोनों घबरा कर अलग हो गए. अजीत खुरपा थामे आगे बढ़ा. उस का दोस्त पलंग से कूदा और उस को परे धकेल कर बिना कपड़ों के ही बाहर दौड़ गया. डर से थरथर कांपती अजीत की पत्नी कमरे के एक कोने में सिमटती सी खड़ी हो गई और बोली, ‘‘मुझे मत मारना.’’‘‘भाग जा यहां से,’’ अजीत ने दांत भींचते हुए कहा. सलवारकमीज उठा कर पत्नी भी बाहर दौड़ गई. अजीत थोड़ी देर खड़ा इधरउधर देखता रहा, फिर वह भी बाहर लौन में आया और खुरपा एक तरफ रख दिया. उस ने अपना बैग उठाया और अंदर आ गया. अजीत के दोनों बच्चे प्रियंका और एकांश सो रहे थे. इतने मासूम बच्चों की मां पति के दोस्त के साथ रंगरलियां मना रही थी. पता नहीं, यह सिलसिला कब से चल रहा था.

इस के बाद वही हुआ, जिस का डर था. अजीत का अपनी पत्नी से तलाक हो गया. बच्चों की सरपरस्ती पत्नी को मिली. अजीत ने उसे भत्ता देना मंजूर किया और हर महीने एक तय रकम का चैक भेज देता था. एक दिन अजीत फ्लैट बेच कर दूसरे शहर में जा बसा. वह तरक्की करता हुआ मैनेजर बन गया. कंपनी के मालिक राजेंद्र की गैरहाजिरी में उन की पत्नी गीता कभीकभार दफ्तर में आ कर काम संभालती थीं. धीरेधीरे उन की अजीत से अच्छी जानपहचान हो गई. ‘‘अजीत, आप का तलाक हो गया है. आप दोबारा शादी क्यों नहीं करते ’’ एक शाम दफ्तर का काम खत्म होने पर गीता ने पूछा.

‘‘बस, दिल नहीं मानता,’’ अजीत बोला.

‘‘अकेले कब तक रहोगे ’’ गीता ने फिर पूछा.

अजीत खामोश रहा. उस के उदास चेहरे को गीता ने अपने हाथों में भरा और उस का माथा चूम लिया. अजीत हैरान सा खड़ा उन की तरफ देखने लगा. पत्नी के मुकाबले गीता भारी जिस्म की सांवले रंग की थीं. उन की आंखों में काम वासना के डोरे तैर रहे थे. गीता ने अजीत की तुलना अपने पति से की. एक तरफ 30 साला नौजवान था, दूसरी ओर 50 साल की उम्र का अधेड़. अजीत को औरत की दरकार थी और गीता को अपनी संतुष्टि के लिए नौजवान मर्द की. कुछ ही दिनों में उन के बीच के सारे फासले मिट गए. राजेंद्र कई कंपनियों के मालिक थे. काम के सिलसिले में वे ज्यादातर बाहर रहते थे. उन की गैरहाजिरी में गीता काम संभालती थीं. उन के 2 बच्चे थे, जो एक बोर्डिंग स्कूल में पढ़ते थे. हैदराबाद में एक बड़ी कंपनी की मीटिंग खत्म हुई. राजेंद्र के सचिव ने ट्रैवल एजेंट को फोन किया.

‘सौरी सर, कल सुबह से पहले किसी फ्लाइट में भी सीट नहीं है,’ ट्रैवल एजेंट ने बताया. इस पर राजेंद्र अपने होटल में चले गए.

‘घर आ रहे हो ’ गीता ने उन्हें फोन कर के पूछा.

‘‘कल सुबह आऊंगा,’’ राजेंद्र ने जवाब दिया. अभी राजेंद्र होटल के कमरे में दाखिल हुए ही थे कि ट्रैवल एजेंट का फोन आ गया.

‘सर, एक पैसेंजर ने अपनी सीट कैंसिल कराई है. आप आधा घंटे में एयरपोर्ट आ जाएं.’ राजेंद्र तुरंत एयरपोर्ट पहुंचे. 2 घंटे बाद वे अपने शहर में थे.

राजेंद्र ने मोबाइल फोन निकाला, फिर इरादा बदलते हुए सोचा कि अब आधी रात को क्यों ड्राइवर को तकलीफ दें. लिहाजा, वे टैक्सी से अपनी कोठी पहुंचे. वहां उन्हें अपने मैनेजर अजीत की कार खड़ी दिखी, तो वे चौंक गए. राजेंद्र ने इधरउधर देखा, फिर वे अपने घर के पिछवाड़े में पहुंचे. एक कार उन की कोठी के पिछवाड़े की दीवार को छूती खड़ी थी. वे उस की छत पर जा चढ़े और फिर दीवार पर चढ़ गए और लौन में कूद गए. उन के अंदर कूदते ही पालतू कुत्ता भूंका, फिर मालिक को पहचानते हुए चुप हो कर उन के कदमों में लोटने लगा.राजेंद्र ब्रीफकेस थामे दबे पैर चोरी से पिछवाड़े के कमरे का दरवाजा खोल कर अंदर दाखिल हुए. उन के कानों में ऊपर की मंजिल पर बने अपने बैडरूम से हंसनेखिलखिलाने की आवाज आई. वे दबे पैर सीढि़यां चढ़ते हुए ऊपर पहुंचे. खिड़की से अंदर झांका. बैड पर मैनेजर अजीत के साथ उन की पत्नी गीता मस्ती कर रही थीं.

अब वे क्या करें  दोनों को रंगे हाथ पकड़ें  नतीजा साफ था. शादी का टूटना. मैनेजर कहीं और नौकरी पा लेगा. पत्नी गुजारा भत्ता ले कर कहीं और जा बसेगी और उम्र के इस पड़ाव पर वे खुद क्या करेंगे दोबारा शादी करेंगे  दूसरी पत्नी भी ऐसी ही निकली तो  वे धीरेधीरे पीछे हटते गए. दूसरे कमरे में चले गए और कुरसी पर बैठ गए. उधर कमरे में जब वासना का ज्वार शांत हुआ, तो अजीत व गीता अलग हो गए.

‘‘क्या तुम्हारी बीवी ने दूसरी शादी कर ली ’’ गीता ने पूछा.

‘‘नहीं.’’

‘‘क्यों ’’

‘‘औरत बदनाम हो जाए, तो दोबारा घर बसाना मुश्किल होता है.’’

‘‘और मर्द ’’

‘‘मर्द पर बदनामी का असर नहीं पड़ता.’’

‘‘तो तुम ने दोबारा शादी क्यों नहीं की ’’

‘‘मुझे किसी भी औरत पर अब भरोसा नहीं रहा.’’ इस पर गीता एकटक उस की तरफ देखने लगीं. साथ वाले कमरे में राजेंद्र उन की बातचीत सुन रहे थे. अजीत के जवाब ने गीता का सैक्स का मजा किरकिरा कर दिया था. वह उन के साथ जिस्मानी रिश्ता तो बना सकता था, पर उन्हें वफादार साथी नहीं मान रहा था. इस बीच राजेंद्र को शरारत सूझी. उन्होंने अपना मोबाइल फोन निकाला, पत्नी का नंबर मिलाया और धीमी आवाज में कहा, ‘मैं एयरपोर्ट पर हूं. दूसरी फ्लाइट में सीट मिल गई थी. 10 मिनट में घर पहुंच जाऊंगा.’ गीता ने अजीत को बताया. वे दोनों हड़बड़ाहट में कपड़े पहनने लगे. पालतू कुत्ता अभी तक मालिक के पास बैठा था. राजेंद्र ने उस को इशारा किया और धीमे से दरवाजा खोल कर उस को बाहर निकाल दिया. अजीत सीढि़यां उतरता नीचे लौन में आया, तभी पालतू कुत्ता उस पर झपट पड़ा. बचाव के लिए गीता लपकीं, मगर तब तक कुत्ते ने अजीत को 3-4 जगह पर काट खाया था.

अजीत किसी तरह अपनी कार में सवार हुआ. गेट बंद कर गीता कुत्ते की तरफ लपकीं और चेन पकड़ कर उस को एक जगह बांध दिया. इस के बाद गीता अपने पति का इंतजार करने लगीं. ड्राइंगरूम में बैठेबैठे उन की आंख लग गई. मौका देखते ही राजेंद्र चुपचाप बैडरूम में जा कर सो गए. सबह जब गीता जागीं, तो उन्होंने राजेंद्र को बैडरूम में पा कर घबराते हुए पूछा, ‘‘आप कब आए ’’

‘‘3 बजे. तब तुम ड्राइंगरूम में सो रही थीं.’’

‘‘अपना डौगी अब खतरनाक हो गया है. उस को निकाल दो,’’ गीता ने बताया.

‘‘क्यों, क्या हुआ ’’

‘‘कल एक पड़ोसी पर झपट पड़ा.’’

‘‘चेन से बांध कर रखना था…’’ इतना कह कर राजेंद्र बाथरूम में चले गए. तैयार हो कर वे अपने दफ्तर पहुंचे. अब तक अजीत नहीं आया था.

‘‘कल किसी कुत्ते ने अजीत को काट खाया है,’’ असिस्टैंट मैनेजर ने राजेंद्र को बताया.

राजेंद्र के दफ्तर जाने के बाद गीता घर की सफाई करने लगीं. बैडरूम के साथ वाले कमरे में सिगरेट के जले टुकड़ों का ढेर लगा था. वे चौंकीं कि कल शाम तक तो कमरा साफसुथरा था, फिर इतनी सारी सिगरेटें किस ने पी वे सारा माजरा समझ गईं. उन्होंने एयरपोर्ट इनक्वायरी फोन किया. वहां से पता चला कि राजेंद्र तो रात को ही घर आ गए थे. वे बेचैन हो गईं. अजीत अस्पताल में था. उस के हाथपैरों पर पट्टियां बंधी थीं, तभी उस का मोबाइल फोन बजा.

‘मेरा अंदाजा है कि राजेंद्र को हमारे संबंध का पता चल चुका है. कल रात को वे 12 बजे ही घर आ गए थे,’ गीता ने बताया.

‘‘अब हम क्या करें ’’

‘खामोश रहो.’

7 दिन बाद अजीत दफ्तर आया. ‘‘आवारा कुत्ते आजकल कम होते हैं… आप पर कोई कुत्ता कैसे झपटा ’’ राजेंद्र के सवाल पर अजीत चुप रहा.

‘‘आप सिगरेट कौन सी पीते हैं ’’ अजीत ने अपना सिगरेट का पैकेट निकाल कर दिखाया. तब राजेंद्र ने अपनी मेज की दराज खोली और एक पैकेट निकाल कर सामने रखते हुए कहा, ‘‘यह पैकेट मेरी कोठी में कोई छोड़ गया था. आप का ही ब्रांड है. मेरा ब्रांड दूसरा है. आप ले लो.’’ अजीत को काटो तो खून नहीं. उस को राजेंद्र से ऐसे हमले की उम्मीद नहीं थी. वह चुपचाप अपने चैंबर में चला गया. अगले दिन उस ने इस्तीफा दे दिया. पत्नी को तलाक देने के बाद अजीत ने कभी उस के बारे में नहीं सोचा था. आज पहली बार सोच रहा था. अजीत का मालिक समझदार था. बदनामी और जगहंसाई से बचने के लिए उस ने कोई ऐसा कदम नहीं उठाया, जिस से बात और बिगड़ जाए.

देशद्रोह का थोपा जाना

देशद्रोह के आरोप लगाना भाजपा सरकार ने अब फैशन बना लिया है पर कन्हैया कुमार पर लगाए गए आरोप में ही यह फैशन इतना कमजोर निकला कि उच्च न्यायालय को तथ्यों व तर्कों की जगह गानों, भावनाओं, मैडिकल उदाहरणों का सहारा लेना पड़ा ताकि कन्हैया को जमानत पर छोड़ने पर कुछ तो कहा जाए. किसी को देशद्रोही कहना बहुत आसान है पर इसे साबित करना बहुत कठिन होता है. ऐसा अब्दुल करीम टुंडा के मामले में स्पष्ट हुआ भी है. 1997 में दिल्ली में बम धमाकों के मामले में गिरफ्तार हुए अब्दुल करीम टुंडा पर 4 मामले चल रहे थे. भारत सरकार ने उस का नाम पाकिस्तान सरकार को भी दिया था. मुकदमों में साक्ष्य के अभाव में उसे रिहा कर दिया गया.

देशद्रोह जैसे आरोप लगाने आसान हैं पर उन्हें साबित करना बहुत कठिन होता है. दुनियाभर में जिन पर शक होता है उन्हें सरकारें जेलों में बंद कर के दूसरों को डराती हैं, बस, और अपनी खीझ को शांत करती हैं. अमेरिका में इसी तरह के सैकड़ों अपराधी बंद हैं. चीन में तो इन की गिनती भी नहीं की जाती क्योंकि वहां तो किसी को भी इस तरह के आरोप में बंद किया जा सकता है. यूरोप के देश थोड़े उदार हैं पर तानाशाह देशों में जेलों में बंद करना और जेलों के अंदर इन्हें तंग करना आम बात है.

देशद्रोह है क्या  राज कर रहे लोगों के खिलाफ आवाज उठाना तो देशद्रोह नहीं है. उन्हें हटाना तो देश के नागरिकों के मौलिक अधिकारों में शामिल है, चाहे कोई संवैधानिक प्रावधान हो या न हो. हां, उस के लिए वे न सेना खड़ी कर सकते हैं, न किसी के जानमाल की हानि कर सकते हैं. देशभक्ति तो धर्मभक्ति है नहीं, चाहे सरकारें इन दोनों को बराबर मानती हों क्योंकि धर्म और सरकारें चाहती यही हैं कि कोई भी उन की पोलपट्टी न खोले, उन की परंपरा को न तोड़े. मध्ययुगों में राज्य के खिलाफ द्रोह से ज्यादा धर्म के खिलाफ द्रोह को भयंकर माना जाता था और बिना दलील, बिना वकील केवल पोप, मौलवी या पुजारी के आदेश पर किसी को भी जलाया तक जा सकता था. आज भी भारत, चीन जैसे देशों में देशद्रोह को किसी पर लागू किया जा रहा है, ऐसा अब्दुल करीम टुंडा को कानूनन रिहा किए जाने से साफ है.

आखिर सरकार क्यों असफल हुई कि टुंडा पर आरोप साबित न कर सकी. इस का अर्थ तो यही है कि आरोप सिद्ध करने लायक तथ्य थे ही नहीं, जबकि उस के खिलाफ बम बनाने, हथियार जमा करने जैसे आरोप लगाए गए थे, नारे लगाने के नहीं. अपने विरोधियों को परेशान करते समय ध्यान में रखना चाहिए कि नागरिकों के अधिकारों का हनन किया तो जा सकता है पर नागरिक अपने अधिकार ऐसे ही नहीं छोड़ते. कहीं न कहीं, कोई न कोई इतनी हिम्मत वाला होगा कि सरकार को चुनौती देने के लिए अपनी स्वतंत्रताओं को खतरे में डाल देगा. ऐसा सभी तानाशाह देख चुके हैं.

बेटियां बोझ नहीं हैं: लारा दत्ता

साल 2000 में ‘मिस यूनिवर्स’ बनने वाली खूबसूरत और सैक्सी लारा दत्ता ने फिल्म ‘अंदाज’ से अपने कैरियर की शुरुआत की थी. उन्होंने ‘मस्ती’, ‘काल’, ‘नो ऐंट्री’, ‘पार्टनर’, ‘हाउसफुल’, ‘बिल्लू’, ‘सिंह इज ब्लिंग’ जैसी कई फिल्मों में काम किया और अपनी एक अलग इमेज बनाई.

साल 2011 में लारा दत्ता की शादी लौन टैनिस खिलाड़ी महेश भूपति के साथ हुई. शादी के बाद लारा ने कुछ समय के लिए फिल्मों से ब्रेक ले लिया और एक बेटी की मां बन गईं.

पेश हैं, लारा दत्ता के साथ हुई लंबी बातचीत के खास अंश:

आप का अब तक का फिल्मी सफर कैसा रहा

मैं एक ऐसे परिवार में पैदा हुई, जहां हम 3 बहनें हैं. हम तीनों बहनों को आगे बढ़ने का मौका मिला. मम्मीपापा के सपोर्ट के बिना हम कुछ नहीं कर पातीं. हमारे जो भी सपने थे, उन्हें पूरा करने के लिए उन्होंने हमेशा आगे बढ़ कर साथ दिया. फिल्मी दुनिया का अब तक का सफर मेरे लिए काफी जोश वाला रहा है.

बेटी की देखभाल में आप के पति महेश भूपति कितना साथ देते हैं

वे एक लौन टैनिस खिलाड़ी हैं, इसलिए बहुत मसरूफ रहते हैं. लेकिन जब कभी वे साथ होते हैं, तो अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह से निभाते हैं. जब हमारी बेटी सायरा पैदा हुई थी, तब वे ‘आस्ट्रेलियाई ओपन’ में सानिया मिर्जा के साथ खेल रहे थे. 10 दिन बाद उन्होंने पहली बार अपनी बेटी को देखा था. उन्होंने उसे गोद में उठा लिया था. उस का डायपर भी बदला था. यह देखकर मैं हैरान रह गई थी. मुझे तब भी बहुत अच्छा लगा था, जब हमारी बेटी ने उन्हें सब से अच्छा पिता कहा था.

एक औरत के लिए मां बनना कितना सुखद है

मां बनना मेरे लिए एक अच्छा तजरबा है. मेरी बेटी अब बड़ी हो रही है और समझदार भी. आजकल की मांएं अपने बच्चों की जिंदगी में काफी हद तक शामिल रहती हैं. उन के खानेपीने और सेहत पर वे खास ध्यान देती हैं.

महिला सशक्तीकरण पर आप की राय

हमारे देश में आम लोगों की यह सोच है कि वे बेटों को कैसे भी स्कूल भेजेंगे, पर बेटियों के लिए ऐसा नहीं सोचते हैं. उन्हें लगता है कि लड़कियां शादी कर के किसी और के घर चली जाएंगी, तो उन्हें क्यों पढ़ाया जाए. मेरे हिसाब से पढ़ीलिखी औरत ही पूरे परिवार को पढ़ालिखा सकती है. वह खुद भी आत्मनिर्भर बन सकती है. मैं ने देखा कि लड़कियां स्पोर्ट्स में चैंपियन हैं. वे खेल तो खेलती ही हैं, साथ ही एक अच्छी नौकरी पाने की भी इच्छा रखती हैं, ताकि परिवार को उन का सहयोग मिल सके. अगर औरत समाज को आवाज मिलेगी, तो उसे हिम्मत मिलेगी. हिम्मत होगी, तो वह आगे बढ़ेगी और अगर आगे बढ़ेगी, तो अपना हक पहचान सकेगी. हमारे देश में ऐसी औरतें भी हैं, जो पढ़ीलिखी होने पर भी अच्छी नौकरी नहीं कर पाती हैं, इसलिए पढ़ाई के साथसाथ वोकेशनल ट्रेनिंग का होना बहुत जरूरी है, ताकि वे कामधंधे के बारे में सोच सकें और अपने पैरों पर खड़ी हो सकें. मेरा यह मानना है कि बेटियां किसी पर बोझ नहीं हैं.

आप की आगे की योजनाएं

हमारी प्रोडक्शन कंपनी नई फिल्में बनाने वाली है. हाल ही में मैं ने एक कहानी खोज निकाली है, जिस पर काम चल रहा है.

छोटे कारोबारी सौ फीसदी एफडीआई के खिलाफ

वित्त साल 2016-17 के लिए फरवरी में पेश किए गए बजट में खाद्य पदार्थों की मार्केटिंग व उन के निर्माण के क्षेत्र में सौ फीसदी एफडीआई (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) की मंजूरी के खिलाफ छोटे कारोबारी खड़े हो गए हैं.

खिलाफत करने वाले छोटे कारोबारियों का मानना है कि यह मंजूरी एक तरह से मल्टी ब्रांड रिटेल में एफडीआई की मंजूरी की तरह ही है.

साल 2014 में भाजपा ने कहा था कि उन की सरकार बनने पर मल्टी ब्रांड रिटेल में एफडीआई की इजाजत नहीं दी जाएगी. खाने की चीजों की मार्केटिंग व निर्मण में सौ फीसदी एफडीआई की खिलाफ करने वालों में एफडीआई वाच कैंपेन, कनफेडरेशन आफ आल इंडिया ट्रेडर्स (कैट), भारतीय उद्योग व्यापार मंडल, द हाकर्स फैडरेशन, जनपहल व फेडरेशन आफ एसोसिएशन आफ महाराष्ट्र के साथसाथ कई दूसरे कारोबारी एसोसिएशन भी शामिल हैं.

सरकार का मानना है कि लिए गए फैसले से किसानों की आमदनी दोगुनी करने में मदद मिलेगी. इस के अलावा बरबाद होने वाले फलों व सब्जियों को प्रोसेस्ड कर के बेचा जा सकेगा.

कैट के राष्ट्रीय अध्यक्ष बीसी भरतिया ने खाद्य क्षेत्र में सौ फीसदी एफडीआई की इजाजत को गलत बताते हुए कहा कि इस से दुनियाभर की रिटेल कंपनियों को देश के फूड मार्केट पर शिकंजा कसने का मौका मिलेगा, नतीजतन किसानों को कोई लाभ नहीं होगा. शायद सरकार ने खाद्य पदार्थों की खराबी पर भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की साल 2010 की रिपोर्ट पर गौर नहीं किया है, जिस में खाने की चीजों की खराबी बेहद मामूली बताई गई है.                        

अब करें एटीएम और पासवर्ड के बिना ट्रांजैक्शन

अगर आप अपना एटीएम कार्ड घर पर भूल गए हैं या आप का कार्ड चोरी हो गया है तो पैसे कैसे निकालें, इस बात की टैंशन लेने की जरूरत नहीं है. अब आप बिना एटीएम कार्ड और पासवर्ड के भी एटीएम मशीन से पैसे निकाल पाएंगे. इस में न तो कार्ड मशीन में फसने की टैंशन होगी और ना ही कोई दूसरा आप का कार्ड इस्तेमाल कर पाएगा.जी हां, डीसीबी बैंक ने यह सुविधा शुरू की है, जिस में ग्राहक बिना कार्ड और पासवर्ड के अपनी बायोमीट्रिक जानकारियों के ट्ठारा ट्रांजैक्शन कर सकते हैं. देश में इस तरह का पहला एटीएम शुरू किया गया है जो आधार के डेटा से औपरेट होता है. यूजर एटीएम पर या तो 12 अंकों का नंबर डाल सकते हैं या फिर कार्ड स्वाइप कर सकते हैं. इस के बाद पहचान के लिए बायोमीट्रिक जानकारियों की जरूरत होगी. इस में स्कैनर की सहायता से आप के फिंगर प्रिंट्स की जांच की जाएगी और आप आसानी से ट्रांजैक्शन कर पाएंगे.

छोटे बच्चों के लिए ये ‘खास जूता’

छोटे बच्चे जब चलना सीखते हैं तब उन का खास ध्यान रखना पड़ता है ताकि उन्हें चोट ना लगे. क्योंकि इस दौरान कई बार बच्चे चलतेचलते गिर जाते हैं, उन का संतुलन बिगड़ जाता है. लेकिन अब आप का बच्चा बिना लड़खड़ाए टाइल्स, कारपेट और कहीं पर भी चल सकेगा. जी हां प्रतिष्ठित कार निर्माता कंपनी बीएमडब्लू ने बच्चों के लिए एक खास तरह का जूता तैयार किया है, जिसे पहनने के बाद बच्चे गिरेंगे नहीं और आसानी से चल सकेंगे. यह जूता 3 साल तक के बच्चों के लिए बनाया गया है और काफी हलका है ताकि पहनने के बाद किसी तरह की प्रौब्लम न हो. कंपनी ने इस जूते का नाम ‘एक्सड्राइव बेबी शूज’ रखा है. इस में नई तकनीक का इस्तेमाल कर रबर के ऐसे सोल बनाए गए हैं जो एक सैकेंड के दसवें हिस्से से भी कम समय में सतह की स्थिति को भांप कर अपनी दिशा बदल देगा और बच्चों का संतुलन बना रहेगा. इंटरनैट पर इस खास जूते को देख कर लोग हैरान हैं.

नई तकनीक: टायलेट में नहीं आएगी बदबू

बदबूदार टायलेट में घुसते ही नाक सिकोड़ कर उस पर हाथ रख कर बैठना पड़ता है. साथ ही हर दिन टायलेट में सैकड़ों लीटर पानी बरबाद हो जाता है, ताकि टायलेट में बदबू न आए. आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर औैर उन के छात्र ने बिना बदबू वाली टायलेट बनाने के खयाल को जन्म दिया. बस, फिर क्या था, कुछ समय की मेहनत के बाद वे ऐसा टायलेट बनाने में कामयाब रहे. मेक इन इंडिया कार्यक्रम के दौरान पैन आईआईटी पेवेलियन में स्वच्छ भारत और मेक इन इंडिया जैसी मुहिम पर जोर देने वाले इस टायलेट को पेश किया गया.

ऐसे टायलेट के इस्तेमाल से हर दिन देशभर के हजारों टायलेटों में लाखों लीटर पानी की बचत हो सकती है. फिलहाल सौ से ज्यादा संस्थाओं के सहयोग से देशभर में कईर् जगहों पर इस टेक्नोलोजी पर बने टायलेट इस्तेमाल में लाए जा रहे हैं. मुंबई में भी कई जगहों पर ये टायलेट कामयाबी के साथ काम कर रहे हैं. प्रोफेसर विजय राघवन चेरियार और उन के छात्र उत्तम बनर्जी ने एक कंपनी बना कर इस की मैन्यूफैक्चरिंग शुरू की. प्रोफेसर विजय राघवन का कहना है कि वे टायलेट में जाने वाले पानी को बरबाद होने से बचाना चाहते हैं. साथ ही वे मलमूत्र से खाद और दूसरी उपयोगी चीजें तैयार करना चाहते हैं.

सामान्य टायलेट में पेशाब करने के बाद फ्लश के जरीए बड़ी मात्रा में पानी यों ही बरबाद हो जाता है. ऐसा मुख्य तौर पर सफाई और बदबू से बचने के लिए किया जाता है. इस टायलेट में पेशाब करने के बाद उस के नीचे जाने पर एक विशेष प्रकार का मेकैनिज्म ऊपर तैरने लगता है औैर फिर पेशाब निकल जाने के बाद उस एरिया को वही मेकैनिज्म ब्लौक कर देता है, जिस से उस में से किसी तरह की बदबू बाहर नहीं आ पाती है. ऐसे में इस तरह के टायलेट न केवल सूखे से प्रभावित इलाकों में, बल्कि भविष्य में देशभर में पानी की परेशानी को देखते हुए काफी उपयोगी साबित हो सकते हैं. प्रोफेसर विजय राघवन चेरियार का कहना है कि रेन वाटर हार्वेस्टिंग की तर्ज पर वे मलमूत्र को भी दोबारा इस्तेमाल में लाना चाहते हैं. वैसे भी पानी के साथ मिलने के बाद मूत्र बेकार हो जाता है. अगर इसे पहले ही प्रोसेस किया जाए, तो यह इस्तेमाल में लाया जा सकता है. साथ ही मल की प्रोसेसिंग के जरीए खाद भी बनाई जा सकती है.

प्रोफेसर विजय राघवन चेरियार का कहना है कि भविष्य में उन की योजना औरतों के लिए खास तरह के टायलेट बनाने की है.

ओबामा ने प्रियंका को दिया व्हाइट हाउस में डिनर का न्योता

बॉलीवुड एक्ट्रेस प्रियंका चोपड़ा को अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने डिनर का न्योता भेजा है. ओबामा हर साल व्हाइट हाउस में डिनर का एक खास प्रोग्राम रखते हैं. इसी डिनर के लिए प्रियंका को न्योता दिया गया है. बराक ओबामा और वाशिंगटन में प्रथम महिला मिशेल ओबामा इस डिनर मेजबान होंगे.

हालांकि प्रियंका बिजी शेड्यूल के चलते डिनर पर नहीं जा पाएंगी. रिपोर्ट में कहा गया है कि वह अमेरिकी टीवी शो 'क्वांटिको' की शूटिंग में बिजी हैं और अभी तक उनके डिनर पर जाने की बात की पुष्टि नहीं की गई है.

गेजी अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक, अगले हफ्ते होने वाले व्हाइट हाउस डिनर में प्रियंका शिरकत कर पाएंगी या नहीं इसकी पुष्टि नहीं हुई है क्योंकि वह आजकल  'क्वांटिको' और 'बेवॉच' की शूटिंग में बिजी हैं.

क्वांटिको से इंटरनेश्नल फेम पा चुकी प्रियंका के फेम में दिन पर दिन बढ़ोतरी हो रही है. हाल ही में प्रियंका ने दुनिया के सबसे बडे अवॉर्ड ऑस्कर के रेड कारपेट पर जलवे बिखेरे थे.

विश्व को भारत की देन है ‘कुंग-फू शैली’: टाइगर श्रॉफ

बहुत कम लोगों को इस बात का इल्म है कि मार्शल ऑर्ट की विधा कुंग-फू का जनक भारत है. हाल ही में इस संदर्भ में कई तथ्य सामने आए हैं. 'बागी' फिल्म के ट्रेलर में अपने एक्शन से लोगों को हैरान करने वाले अभिनेता टाइगर श्रॉफ का कहना है कि कुंग-फू कला विश्व को भारत की ही देन है. मार्शल आर्ट की इस विधा को भारतीय बौद्ध संत बोधिधर्मा ने आविष्कृत किया.

लोगों के बीच में यह भ्रांति है कि कुंग-फू का जनक चीन है, क्योंकि वहां के नागरिक इसे अधिक सीखते हैं और उन्होंने इसे आत्मरक्षा के लिए अपनाया है. हालांकि, इससे यह साबित नहीं होता कि यह विधा चीन की देन है.

संत बोधिधर्मा को कुंग-फू का पिता कहा जाता है. चीन के शाओलिन में उनके नाम पर कई मंदिर बने हैं. इसलिए कयास लगाए जाते रहे हैं कि छठी सदी के दौरान संत बोधिधर्मा चीन गए थे.

इस सदी के दौरान चीन का कोई अस्तित्व नहीं था, संत तो हिंदकुश क्षेत्र के हिमालय पर्वत के उस पार के लोगों को बौद्ध धर्म का ज्ञान देने गए थे, लेकिन वह वहीं बस गए और साथ में अपने नायाब आविष्कार का ज्ञान वहां के लोगों में बांटा. यहीं कारण है कि उस क्षेत्र में इस विधा का पूरा विकास हुआ.

इस पर टाइगर श्रॉफ ने कहा, 'यह विधा भारत की देन है.' कुंग-फू, मार्शल आर्ट की सबसे पुरानी विधा है, जिसमें बिना किसी हथियार के युद्ध किया जाता है. यह बात निश्चित है कि बोधिधर्मा जहां भी गए अपने साथ मार्शल ऑर्ट का यह नायाब रूप साथ लेकर गए.

शाओलिन में बने नए मंदिर में बोधिधर्मा रह गए और अन्य बौद्ध संतों के हाथों इस कला को सौंप दिया, जिसे हम आज कुंग-फू के नाम से जानते हैं. बोधिधर्मा इस कला के आविष्कारक और महान लड़ाका थे. समय के साथ उनकी इस विधा का विकास पूरे विश्व में हुआ.

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