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जमींकंद की खेती

जमींकंद को पहले छोटे पैमाने पर ही उगाया जाता था, लेकिन कृषि वैज्ञानिकों ने लगातार खोज के बाद इस की कई उन्नतिशील प्रजातियां भी विकसित की हैं. अब इसे बड़े पैमाने पर व्यावसायिक रूप से भी उगाया जाने लगा?है. जमींकंद की देशी प्रजातियों में कड़वापन व चरपरापन ज्यादा पाया जाता है, जबकि उन्नत प्रजातियों में चरपरापन व कड़वापन न के बराबर होता है. बाजार में जमींकंद की भारी मांग को देखते हुए इस की व्यावसायिक खेती बेहद लाभदायक साबित हो रही?है जमींकंद की खेती के लिए नमगरम व ठंडेसूखे दोनों मौसमों की जरूरत पड़ती है. इस से जमींकंद के पौधों व कंदों का सही तरीके से विकास होता है. बोआई के बाद जमींकंद के बीजों को अंकुरण के लिए ऊंचे तापमान की जरूरत होती है, जबकि पौधों की बढ़वार के लिए समान रूप से अच्छी बारिश जरूरी होती?है. कंदों के विकास के लिए ठंडे मौसम की जरूरत होती है

जमीन का चयन : जमींकंद की खेती के लिए रेतीली दोमट मिट्टी सब से अच्छी मानी जाती है, क्योंकि इस तरह की मिट्टी में कंदों की बढ़ोतरी तेजी से होती है. जमींकंद के लिए जमीन की जलधारण कूवत अच्छी होनी चाहिए. यह ध्यान रखना चाहिए कि चिकनी व रेतीली जमीन में जमींकंद की फसल न ली जाए, क्योंकि इस तरह की मिट्टी में कंदों का विकास रुक जाता है.

जमीकंद की रोपाई से पहले खेत की कल्टीवेटर या रोटावेटर से जुताई कर के उस में पाटा लगा देना चाहिए. अच्छी पैदावार के लिए बोआई के समय ही 20 टन प्रति हेक्टेयर की दर से गोबर की सड़ी खाद को खेत में बिखेर कर मिला देना चाहिए.

प्रजातियों का चयन : जमींकंद की देशी प्रजाति तो हमेशा उगाई जाती रही है, लेकिन व्यावसायिक रूप से इस की 3 प्रजातियां अभी तक ज्यादा सही पाई गई हैं.

गजेंद्र 1?: यह जमींकंद की सर्वाधिक उत्पादन वाली प्रजाति मानी जाती है. इस प्रजाति में चरपरापन नहीं होता है, क्योंकि इस में कैल्शियम व आक्सैट की मात्रा कम पाई जाती है. इस से जीभ व गले में जलन नहीं होती है. यह प्रजाति खाने में सब से अच्छी होती है, इसलिए इस का बाजार भाव अन्य प्रजातियों के मुकाबले ज्यादा होता है. इस प्रजाति के गूदे का रंग हलका गुलाबी होता है. इस के खाली खेत में गेहूं की बोआई समय से की जा सकती है. इस प्रजाति की औसत उपज 300 से 400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

संतरा गाची : इस प्रजाति के पौधों की बढ़वार तेजी से होती है. इस के कंदों में चरपरापन ज्यादा पाया जाता है. इस की औसत उपज 50-75 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

कोववयूर : यह ज्यादा उपज देने वाली प्रजाति है. इस के पौधों की बढ़वार संतरा गाची की तरह ही होती है. इस की औसत उपज 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

उपरोक्त तीनों प्रजातियों की बोआई का सही समय उत्तर भारत में फरवरी से मार्च के दौरान व दक्षिण भारत में मई में होता है.

बोआई विधि : जमींकंद की बोआई के लिए पहले से तैयार किए गए खेत में 3-3 फुट की दूरी पर 30 सेंटीमीटर गहरा, लंबा व चौड़ा गड्ढा खोद लिया जाता है. इस प्रकार प्रति हेक्टेयर करीब 10 हजार गड्ढे तैयार हो जाते?हैं. खेत में तैयार छोटे कंदों जिन का औसत भार 250 ग्राम का होता है या बड़े कंदों के 500 ग्राम तक के टुकड़े काट कर खोदे गए गड्ढों में रोप देते हैं. रोपे गए स्थान पर पिरामिड के आकार में मिट्टी चढ़ा देते हैं और उसे घासफूस से ढक देते हैं ताकि खेत में से नमी न खत्म होने पाए. इस से कंदों में अंकुरण जल्दी होता?है.

बीज की मात्रा : बोआई के लिए 500 ग्राम तक के बीज (कंदों के टुकड़े) ठीक रहते हैं. इस प्रकार 1 हेक्टेयर खेत के लिए 50 क्विंटल बीज की जरूरत पड़ती है. गरमियों में मानसून से पहले 1 बार सिंचाई जरूरी होती है. कम बारिश की हालत में समयसमय पर सिंचाई करते रहना चाहिए. नमी बनाए रखने के लिए बोआई के बाद खेत में भूसी की परत, पुआल या सूखी पत्तियां बिछा देनी चाहिए.

खरपतवार : जमींकंद की फसल के साथ खरपतवार का उग आना आम बात है. ऐसे में पूरी फसल के दौरान 2-3 बार निराईगुड़ाई जरूर करनी चाहिए. पहली निराईगुड़ाई 40-60 दिनों बाद व दूसरी 80-90 दिनों बाद करनी चाहिए. हर गुड़ाई के बाद पौधों पर मिट्टी जरूर चढ़ाएं.

कीट : कृषि विज्ञान केंद्र बंजरिया (बस्ती) के डा. प्रेमशंकर के अनुसार जमींकंद की फसल में जुलाई से सितंबर महीनों के दौरान तंबाकू की सूंडी का प्रकोप देखा गया है. यह पत्तियों को खा कर हानि पहुंचाती है. इस की रोकथाम के लिए मेथेमिल लिक्विड दवा का छिड़काव करना चाहिए. इस के अलावा एंडोकार्ग दवा का छिड़काव भी कारगर होता है.

रोग : जमींकंद की फसल को 2 तरह के रोग नुकसान पहंचाते हैं. झुलसा रोग फाइटोफ्थोरा कोलोकेमी नामक फफूंद के कारण लगता?है. इस से जमींकंद की पत्तियां झुलस जाती हैं और तना गलने लगता है. इस के अलावा कंदों की बढ़वार भी रुक जाती है. दूसरा रोग पत्ती व कंद विगलन का होता है. इस से पत्तियां व कंद सड़ने लगते हैं. इन दोनों रोगों की रोकथाम के लिए सिक्सर नाम के रसायन की 300 ग्राम मात्रा को 200-300 लीटर पानी में मिला कर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करना चाहिए. दूसरी दवा क्यूरेट गोल्ड की

600 ग्राम मात्रा को 200-250 लीटर पानी में मिला कर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करना चाहिए.

खुदाई : जमींकंद की फसल अक्तूबर महीने से खुदाई के लिए तैयार हो जाती है. इसे हर हाल में नवंबर से दिसंबर तक खोद लेना चाहिए. खुदाई करते समय कंदों को कटने से बचाने पर पूरा ध्यान देना चाहिए. कंदों की खुदाई से 20 दिन पहले ही खेत की सिंचाई बंद कर देनी चाहिए.

उपज व लाभ : जमींकंद की उपज फसल की देखरेख व प्रजाति पर निर्भर करती है. अगर 500 ग्राम भार के बीजों की बोआई की गई है, तो प्रति हेक्टेयर 400 क्विंटल की उपज मिलती?है, जो 20-40 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से आसानी से बेची जा सकती है. जमींकंद की खेती के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए डा. दिनेश कुमार यादव के मोबाइल नंबर 9451997620 पर संपर्क करें. फसलसुरक्षा के बारे में डा. प्रेमशंकर के मोबाइल नंबर 9935668097 पर संपर्क किया जा सकता है.

फसल को दीमक से बचाने में कारगर सफेदा की लकड़ी

फसल को खेतखलिहान में दीमक से महफूज रखने और पैदावार को नुकसान से बचाने के लिए राजस्थान के सीकर जिले की एक महिला किसान भगवती देवी की देसी विधि कारगर साबित हुई है. यह विधि दूसरे किसान भी अपने खेतों में अपना कर दीमक से होेने वाले नुकसान से बच सकते हैं.

जयपुर में किसानों की एक गोष्ठी में भाग लेने आई भगवती देवी ने बताया, ‘सीकर जिले के दांता में मेरा खेत है. मेरे पति सुंडाराम खेती के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किसान हैं. उन के साथ रह कर मुझे भी बहुतकुछ सीखने, समझने और करने का मौका मिला है. खेतों में दीमक की समस्या आम बात है. मेरे खेत में भी यह समस्या थी, लेकिन अब नहीं है.

‘गांवों में जलाने के लिए खेतों व जंगलों से लकडि़यां इकट्ठा की जाती हैं. मैं भी जलाने के लिए लकडि़यां लाती थी. एक दिन मैं ने देखा कि जलाने के लिए जमा की गई बबूल, खेजड़ी, बेर, आड़ू, शीशम व यूकलिप्टस आदि की लकडि़यों में से यूकलिप्टस की लकड़ी में  दीमकें लगी हुई थीं और वह भी बहुत ज्यादा तादाद में. यह देख कर मेरे दिमाग में खयाल आया कि अगर यूकलिप्टस की लकडि़यों के टुकड़े खेत में खड़ी फसलों के आसपास डाल दिए जाएं, तो फसल में लगने वाली दीमक से फसल को बचाया जा सकता है.

‘मैं ने इस बारे में अपने पति से सलाहमशविरा किया और प्रयोग के तौर पर अपने खेत में खड़ी बाजरे की फसल के पास यूकलिप्टस (जिसे बोलचाल की जबान में सफेदा कहते हैं) की लकड़ी के छोटेछोटे टुकड़े कुछकुछ दूरी पर रख दिए. कुछ दिनों बाद मैं ने देखा कि डाले गए लकड़ी के टुकड़ों में काफी तादाद में दीमकें लगी हुई थीं और फसल दीमकों से बची हुई थी.

‘इस के बाद अगले रबी के मौसम में गेहूं की फसल के दौरान भी यह विधि इस्तेमाल की. गेहूं की फसल भी दीमकों से मुक्त रही. खेत में खड़ी फसल से 4 इंच दूरी पर रखी गई सफेदा की लकड़ी के नीचे बहुत ज्यादा संख्या में दीमकें थीं, पर गेहूं के पौधों के पास वे बिलकुल नहीं थीं. हम ने अपने खेत में गेहूं की बोआई मिर्ची की फसल के बाद की थी. इस लिहाज से गेहूं की फसल 1 महीना देरी से तैयार होनी थी. देरी से फसल तैयार होने पर गरमी बढ़ जाती है और ऐसी हालत में दीमक लगने का खतरा बढ़ जाता है. मगर गरमी बढ़ने के बावजूद हमारी फसल दीमक से बची रही. इस से यह बात पक्की हो गई कि यह विधि कारगर साबित हो सकती है.

‘आमतौर पर खेत में फसलों को दीमक से बचाने के लिए गोबर और मक्का निकालने के बाद बचे हुए खाली भुट्टों का प्रयोग किया जाता है, लेकिन फिर भी दीमक का थोड़ाबहुत असर फसल पर हो ही जाता है. लेकिन हमारे द्वारा खेत में सफेदा की लकड़ी के टुकड़ों से किया गया बंदोबस्त एकदम सफल रहा. बाद में हम ने अपनी इस सफलता की जानकारी कृषि विभाग के स्थानीय अधिकारियों व कृषि विज्ञान केंद्र फतेहपुर शेखावटी के वैज्ञानिकों को भी दी.

‘दीमक रोधी इस विधि के लिए हम ने अपनी फसल की सिंचाई फव्वारा विधि से की, जिस में प्रति एकड़ में 32 टोटियां रखी. 1 टोंटी के क्षेत्र में सफेदा की लकड़ी का 2 फुट लंबा व 3 इंच मोटा टुकड़ा रखा.लकड़ी के ये टुकड़े बराबर दूरी पर रखे. इन टुकड़ों की कीमत करीब 10 रुपए प्रति टुकड़ा आई. इस तरह 1 एकड़ में रखे 32 टुकड़ों पर करीब 320 रुपए खर्च हुए. लकड़ी के इन टुकड़ों को 3 फसलों तक इस्तेमाल किया जा सकता है. इस के बाद सफेदा की नई लकड़ी के टुकड़े रखने पड़ते हैं.’  पूरी जानकारी के लिए इस पते पर संपर्क करें : भगवती देवी, पत्नी सुंडाराम वर्मा, गांव : दांता, तहसील: दांता रामगढ़, जिला : सीकर, राजस्थान. फोन नंबर : 01577-270074.

तरल जैविक उर्वरक से मिले फसल को फायदा

आज की खेती में रासायनिक खादों का बहुत इस्तेमाल किया जाने लगा?है, जिन से पैदावार में इजाफा जरूर होता है, लेकिन खेती को काफी नुकसान भी होते हैं. रासायनिक खादों से हमें केवल एकदो तरह के ही तत्त्व मिलते?हैं, जबकि हमारी खेती की जमीन को अन्य तत्त्वों की भी जरूरत होती?है. इन तत्त्वों की कमी के कारण मिट्टी की सेहत पर भी खराब असर पड़ता है. इसलिए खेती में हमें जैविक उर्वरक भी इस्तेमाल करने चाहिए.

क्यों जरूरी हैं जैविक उर्वरक

खेती की जमीन की पैदावार कूवत और मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए रासायनिक खादों के साथ जैविक उर्वरकों का इस्तेमाल करने की भी खास जरूरत?है, जिस से खेत की मिट्टी की सेहत बनी रहे और फसल से अच्छी पैदावार मिले. पिछले कुछ समय तक जैविक उर्वरक पाउडर के रूप में आते?थे, लेकिन अब ये जैविक उर्वरक तरल रूप में भी आने लगे हैं.

क्या है तरल जैविक उर्वरक

जैविक तरल उर्वरक जीवाणुओं के ऐसे उत्पाद हैं, जो लंबे समय तक सक्रिय रह कर मिट्टी के पोषक तत्त्वों को बनाए रखते?हैं और खेत की फसल की पैदावार बढ़ाते?हैं. साथ ही मिट्टी की उर्वरक कूवत भी बढ़ाते हैं. तरल जैविक उर्वरक पाउडर वाले उर्वरकों से ज्यादा प्रभावी हैं. नेशनल फर्टीलाइजर्स 3 प्रकार के तरल जैविक उर्वरक बना रही?है, जो आने वाले वक्त में किसानों के लिए कारगर साबित होंगे.

किसान राइजोबियम तरल

* यह तरल उर्वरक खासकर दलहनी फसलों जैसे चना, अरहर, मूंग, उड़द, मसूर, बरसीम, सोयाबीन वगैरह के लिए उपयोगी है.

* इस तरल उर्वरक को बीजों के साथ मिला कर फसल बोने पर जीवाणु जड़ों में घुस कर छोटीछोटी गांठें बना लेते हैं, जिन में बहुत मात्रा में जीवाणु रहते हैं. इन से पौधों को पोषण मिलता है, जिस से उपज में बढ़त होती है.

* राइजोबियम जीवाणुओं से जमीन को पोषक तत्त्व मिलते हैं, जिन से पौधों की जड़ों का विकास होता है व पौधों को मजबूती मिलती है.

किसान एजोटोबेक्टर तरल

यह गैरदलहनी फसलों जैसे गेहूं, धान, ज्वार, बाजरा, कपास, गन्ना, मक्का, आलू, सब्जियों व फलों के लिए उपयोगी है.

* इस के प्रयोग से पौधों का अंकुरण जल्दी व स्वस्थ होता?है.

* फसल को अनेक रोगों से मुक्त रखता है.

* इस के प्रयोग से 20 से 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन की बचत होती?है.

* फसल में 10 से 20 फीसदी की पैदावार बढ़ती?है.

किसान पीएसबी तरल उर्वरक

* मिट्टी के पीएच मान को मुनासिब रखता?है.

* इस के प्रयोग से फास्फोरस की 25 से 3 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की बचत होती है.

* जड़ों का अच्छा विकास होता है.

* पैदावार में 10 से 20 फीसदी बढ़ोतरी होती?है.

* सभी फसलों के लिए अच्छा है.

तरल जैविक उर्वरकों की खासीयतें

* तरल जैविक उर्वरक 3 गुना ज्यादा प्रभावशाली होते हैं व इन में 45 से 50 डिगरी तापमान सहने की कूवत होती?है.

तरल जैविक प्रयोग में खास सावधानियां

* राइजोबियम तरल जीवाणु का इस्तेमाल उसी फसल के लिए करें, जिस फसल का नाम इस पर लिखा हो.

* तरल जैविक उर्वरक को अन्य किसी कीटनाशक दवा या अन्य किसी रासायनिक खाद के साथ मिला कर इस्तेमाल न करें.

* तरल जैविक उपचारित बीज को छाया में ही रखें और बोआई वाले दिन ही बीज को उपचारित करें.

कॉमेडी क्लासेज में पहुंची ‘डायरेक्ट इश्क’ की टीम

प्रदीप शर्मा निर्मित फिल्म ‘डायरेक्ट इश्क’ 19 फरवरी को रिलीज़ होगी. इस फिल्म को प्रमोट करने रजनीश दुग्गल, निधि सुब्बैयह और स्वाति शर्मा ‘शो’ में पहुंचे, जिसे एंकर कर रहे थे करन वाही और सुगंधा मिश्रा.

शो में स्वाति ने ‘डायरेक्ट इश्क’ गाना गाया और रजनीश दुग्गल और निधि ने परफॉर्म किया. एपिसोड 14 फ़रवरी को दिखाया जायेगा. 

 

वॉर्न के आरोपों पर बोले स्टीव वॉ, नहीं बनाया ‘बलि का बकरा’

स्टीव वा ने महान स्पिनर शेन वार्न पर पलटवार किया है, जिन्होंने दोनों के बीच लंबे समय से चले आ रहे विवाद को यह कहकर बढ़ा दिया था कि आस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान एक स्वार्थी क्रिकेटर हैं.

वा ने अपने जवाब में कहा कि वेस्टइंडीज में 1999 में हुए टेस्ट के लिए जब उन्होंने इस लेग स्पिनर को टीम से बाहर किया था तो वह सिर्फ एक कप्तान के रूप में अपना काम कर रहे थे.

वार्न ने इससे पहले कहा था कि वह जिन क्रिकेटरों के साथ खेले उनमें वा सबसे स्वार्थी थे. इस लेग स्पिनर ने यह भड़ास 17 साल पहले वेस्टइंडीज दौरे के दौरान अंतिम टेस्ट की अंतिम एकादश से उन्हें बाहर किए जाने को लेकर निकाली थी.

वा ने इसके बाद अगले दिन सोशल मीडिया पर लिखा था, ‘मैं जवाब के साथ उसके बयान को सही नहीं ठहराना चाहता.’ वा ने हालांकि इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वार्न को बाहर करना कड़ा फैसला था लेकिन कप्तान के रूप में उनके काम का हिस्सा था. ट्रिपल एम कमर्शियल रेडियो ने वा के हवाले से कहा, ‘ईमानदारी से कहूं तो शेन को ही नहीं बल्कि किसी भी खिलाड़ियों को बाहर होने के लिए कहना आसान नहीं होता.’

वा ने कहा, ‘एडम डेल या ग्रेग ब्लेवेट को भी यह कहना आसान नहीं था कि उन्हें टेस्ट मैच के लिए बाहर किया गया है. मुझे कई खिलाड़ियों को यह कहना होता था कि वे नहीं खेल रहे.’ उन्होंने कहा, एक कप्तान के रूप में यह सबसे मुश्किल काम था. लेकिन यही कारण है कि आप कप्तान हो, लोग आपसे उम्मीद करते हैं कि आप टीम के फायदे के लिए कड़े फैसले करोगे.’

वा कहा, ‘आपको कई बार ऐसा करना पड़ता है और आपको तैयार रहना चाहिए कि सभी लोग आपको पसंद नहीं करेंगे.’ वार्न ने रीयलिटी टीवी शो ‘आई एम सेलीब्रिटी. गेट मी आउट आफ हियर’ में हिस्सा लेने के दौरान कहा था कि वह उन्हें बाहर करने के फैसले से ‘काफी निराश’ थे और महसूस कर रहे थे कि वा ने उन्हें ‘बलि का बकरा’ बनाया 

लगातार 100 टेस्ट खेल ब्रैंडन मैक्कुलम ने रचा इतिहास

न्यूजीलैंड के कप्तान ब्रैंडन मैक्कुलम लगातार सौ टेस्ट मैच खेलने वाले दुनिया के पहले खिलाड़ी बन गए हैं. शुक्रवार को वेलिंगटन के बेसिन रिजर्व पर ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पहला टेस्ट शुरू होते ही उन्होंने यह इतिहास रच दिया.

वैसे पदार्पण के बाद से लगातार सबसे ज्यादा टेस्ट मैच खेलने का कीर्तिमान अभी भी मैक्कुलम के नाम पर ही दर्ज है. ब्रैंडन ने जब पिछले वर्ष दिसंबर में श्रीलंका के खिलाफ दूसरा टेस्ट खेला था तो उन्होंने एबी डी'विलियर्स के रिकॉर्ड को तोड़ा था. उनका वह पदार्पण के बाद से लगातार 99वां टेस्ट मैच था.

34 वर्षीय मैक्कुलम ने 10 मार्च 2004 को हैमिल्टन में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ टेस्ट पदार्पण किया था. आज के टेस्ट से पहले वे लगातार 99 टेस्ट मैच खेल चुके हैं. इसमें उन्होंने 38.48 की औसत से 6273 रन बनाए हैं. इनमें 11 शतक और 31 अर्द्धशतक शामिल हैं.

विकेटकीपर के रूप में उन्होंने टेस्ट मैचों में 205 शिकार (194 कैच और 11 स्टम्पिंग) किए हैं. वे टेस्ट मैचों में एक विकेट भी हासिल कर चुके हैं. उनका वन-डे और टी-20 करियर समाप्त हो चुका है. उन्होंने 260 वन-डे में 30.41 की औसत से 6083 रन बनाए और 71 टी-20 मैचों में 35.66 की औसत से 2140 रन बनाए.

राहुल द्रविड़ चौथे नंबर पर
– दक्षिण अफ्रीका के एबी डी'विलियर्स ने दिसंबर 2004 में टेस्ट पदार्पण के बाद से लगातार 98 टेस्ट खेले.

– इस सूची में तीसरे क्रम पर पूर्व ऑस्ट्रेलियाई विकेटकीपर एडम गिलक्रिस्ट हैं, जिन्होंने नवंबर 1999 में टेस्ट पदार्पण के बाद से लगातार 96 टेस्ट मैच खेले.

– भारत के राहुल द्रविड़ इस मामले में 93 टेस्ट के साथ चौथे स्थान पर है.

– वैसे यदि करियर के दौरान कभी भी लगातार सबसे ज्यादा टेस्ट मैच खेलने की बात की जाए, तो यह रिकॉर्ड ऑस्ट्रेलिया के एलन बॉर्डर के नाम दर्ज है जिन्होंने लगातार 153 टेस्ट मैच खेले थे. इस मामले में इंग्लैंड के कप्तान एलिस्टेयर कुक 124 टेस्ट खेलकर दूसरे स्थान पर है.

 

 

 

 

गेहूं का जहरीला प्रोटीन ग्लूटेन शरीर के लिए घातक

अगर अचानक डाक्टर किसी से गेहूं की रोटी खाना बंद करने के लिए कहे और बताए कि यह आप के लिए जहर है तो एकबारगी सुनने वाला चौंक जाएगा. सदियों से तो लोग गेहूं की ही रोटी खाते आ रहे हैं. भला रोजरोज मक्का, रागी, ज्वार, बाजरा या चने की रोटी खाई जाती है क्या?

गेहूं की रोटी खाने से मना करने की वजह है गेहूं में पाया जाने वाला एक प्रोटीन जो गेहूं के अलावा जौ, राई व टिट्रिकेल (गेहूं और राई के संयोग से तैयार एक प्रजाति) में भी पाया जाता है. इस प्रोटीन को ग्लूटेन कहते हैं. यही वह प्रोटीन है, जो गेहूं के आटे को गूंधने पर उसे बांध देता है और उसे बेल कर रोटी या पूरी वगैरह बनाई जाती हैं.

जिन अनाजों में यह ग्लूटेन प्रोटीन नहीं पाया जाता है, उन का आटा गूंधना और रोटी बनाना कठिन होता है. लेकिन भारत के गांवों में ऐसे अनाजों की रोटियां भी खूब खाई जाती हैं. अब सेहत का खयाल रखने वाले शहरी लोगों ने भी ऐसे अनाजों को अपने भोजन में शामिल कर लिया है ग्लूटेन प्रोटीन सीलिएक रोग से पीडि़त लोगों के लिए काफी खतरनाक होता है. सीलिएक रोग से पीडि़त लोगों को गेहूं की रोटी खाने से पेट में अफरा, गैस, डायरिया, उल्टी, माइग्रेन (सिर दर्द) और जोड़ों के दर्द की तकलीफ हो सकती है.

सीलिएक रोग सीधे छोटी आंत की पाचनक्रिया को प्रभावित करता है. डाक्टरों के मुताबिक सीलिएक रोग एक लाइलाज बीमारी है, जिस से बचने के लिए परहेज ही इकलौता रास्ता है. यही वजह है कि आज बाजार में ग्लूटेनफ्री आटा भी मिलता है, जिसे सफेद चावल के आटे, आलू के स्टार्च, टैपियोका के स्टार्च, ग्वार गम और नमक मिला कर बनाया जाता?है. गेहूं खाने का खास अनाज है, जो 20 फीसदी से ज्यादा ऊर्जा व पोषक तत्त्वों की आपूर्ति करता है. इनसान कम से कम पिछले 10 हजार सालों से गेहूं के साथ ग्लूटेन को भी इस्तेमाल करता चला जा रहा है. अमेरिकी वैज्ञानिक डा. डेविड पर्लमुटर ग्लूटेन के सख्त विरोधी हैं. उन का कहना है कि आज 40 फीसदी अमेरिकी लोग ग्लूटेन को नहीं पचा सकते. बाकी 60 फीसदी भी इस की चपेट में आ रहे हैं. डा. डेविड ने गेहूं, चीनी व दूसरी कार्बोहाइड्रेट वाली चीजों को इनसानों लिए घातक बताया है. डा. विलियम डेविस ने अपनी किताब ‘व्हीट बेली’ में गेहूं के ग्लूटेन को भोजन का जहर मानते हुए इसे दमा, अस्थिरोगों, रक्त वाहिनियों के रोगों व दिमाग के रोगों की वजह बताया है.

गेहूं से होने वाले रोगों से बचने के लिए चौलाई, कुटू, मक्का, काला चना, तिल, रामदाना, चावल, बाजरा, ज्वार, सोयाबीन, अखरोट, बादाम, पिस्ता आदि से बनी चीजें खाने की सलाह दी जाती है. डबलरोटी बनाने में वाइटल व्हीट ग्लूटेन का इस्तेमाल किया जाता है, जो पेट के लिए खतरनाक होता?है. लिहाजा डबलरोटी खाने से बचना ही बेहतर है.

ड्रिप इरिगेशन : फायदे का सौदा

आजकल खेतीबारी में हो रही रिसर्च से खाद, बीज, दवा और तकनीक में तरक्की जारी है, जिस से खेती  की क्वालिटी व पैदावार में भी काफी इजाफा हो रहा है. लेकिन देश में अभी भी कुछ किसान ऐसे हैं, जो इन नई सहूलियतों में होने वाले खर्चों से बचने के लिए खेती के पुराने तरीकों को ही अपनाए रखना चाहते हैं. वहीं कुछ किसान ऐसे भी हैं, जिन्होंने समय के साथ चल कर नए तरीकों को अपनाया. नतीजतन, इन किसानों ने अपने खेतों को कारोबार जैसा बना दिया है और कम खर्च में ही पहले से अच्छी क्वालिटी की ज्यादा पैदावार पा रहे हैं.

इन्हीं नई तकनीकों में से एक है ड्रिप इरिगेशन सिस्टम, जो बूंदबूंद कर के सभी फसलों को बराबर से और उन की जरूरत के मुताबिक पानी देता है. यह पुराने तरीकों के मुकाबले बहुत कम पानी में ही कई गुना ज्यादा उत्पादन देता है. साथ ही, खेती में होने वाले कई तरह के खर्चों को भी कम कर देता है. यानी एक बार होने वाले थोड़े से ज्यादा खर्च के बाद हमेशा के लिए हर तरह से ज्यादा मुनाफा.

पैसों की बचत

इस तकनीक से सिंचाई करने से 60 से 70 फीसदी पानी की बचत होती है. इस सिस्टम को लगवाने के बाद किसानों ने महसूस किया कि ड्रिप इरिगेशन से और भी फायदे हैं. सरकार अगर इस के लिए सब्सिडी नहीं देती, तब भी वे इसे लगवाते, क्योंकि कुछ फसलों के बाद होने वाली बचत और फायदे से इस का पूरा खर्च निकल आता है. खजोड़ मल कहते हैं कि यहां खेतों में पानी देने के लिए मेंड़ बनवाने में मजदूरों पर काफी पैसा खर्च होता है. इस के अलावा मेंड़ों पर खरपतवार उग आते हैं, जिन की निराईगुड़ाई के लिए अलग से खर्चा करना पड़ता है. वहीं ड्रिप सिस्टम से पैसों की बचत होती है. इस के अलावा फसल 15-20 दिन पहले पक कर तैयार हो जाती है. सभी फसलों को बराबर और जरूरत के मुताबिक पानी मिलने से सभी पौधों में ज्यादा उत्पादन होता है. यानी ड्रिप इरिगेशन से 20 से 30 फीसदी खर्च की बचत होती है.

कैसे काम करता है यह

ड्रिप इरिगेशन सिस्टम में खेत या बगीचे में कतार में बिछे पाइपों से उन में लगे छोटेछोटे ड्रिपर के जरीये पूरी फसल या पेड़ों को बूंदबूंद पानी से सींचा जाता है. इस सिस्टम में कुएं या बोरिंग पाइप से मोटर द्वारा पानी बाहर निकाला जाता है, जो सैंड फिल्टर से छनता हुआ गुजरता है. इस के बाद पानी एक दूसरे स्क्रीन फिल्टर से गुजरता है, जिस से बारीक मिट्टी भी छन जाती है. छनने के बाद यह पानी मोटे पीवीसी पाइप से होता हुआ खेतों में बिछे हुए लेटरल पाइपों तक पहुंचता है. ये लेटरल पाइप थोड़ीथोड़ी दूरी पर फसल के साथसाथ कतार में बिछाए जाते हैं. लेटरल पाइपों में थोड़ीथोड़ी दूरी पर ड्रिपर लगे रहते हैं, जिन से बूंदबूंद पानी बाहर निकलता है.

एक ड्रिपर पौधों के आसपास चारों ओर 30 सेंटीमीटर इलाके को सिंचित कर देता है. इतना ही नहीं, सैंड फिल्टर और स्क्रीन फिल्टर के बीच में एक फर्टिलाइजर टैंक भी लगा रहता है, जिस में खाद या दवा डाल सकते हैं. यह दवा पानी के साथ घुल कर फसल या पेड़ों तक पहुंचती है. इस तकनीक से पानी केवल पौधों में ही जाता है. इस तरह पानी की 60 से 70 फीसदी तक की बचत होती है. खेतों में लगाए गए ये पाइप 12 से 15 साल तक खराब नहीं होते हैं. इस के ड्रिप को साल में 1 या 2 बार साफ कर लेना चाहिए. किसानों को यह ड्रिप सिस्टम लगवाना थोड़ा महंगा जरूर लगता है, लेकिन कई राज्यों की सरकारें इसे लगवाने में सब्सिडी भी देती हैं. ड्रिप सिस्टम से होने वाली कई तरह की बचतों के साथ पैदावार में होने वाले फायदे से 2-3 फसलों में ही इस पूरे सिस्टम का खर्च वसूल हो जाता है. कंपनी के कर्मचारी खुद आ कर इसे लगा जाते हैं. किसान इस सिस्टम को हासिल करने या इस के बारे में जानकारी लेने के लिए नीचे दिए गए नंबरों पर संपर्क कर सकते हैं:

* किसान इरिगेशन लिमिटेड, मुख्य कार्यालय, मुंबई, फोन नंबर : 022 28478505.

* राजस्थान कार्यालय, जयपुर, फोन नंबर : 0141-2372495, 3246336.   

फायदे

  1.  ड्रिप इरिगेशन से 60 से 70 फीसदी पानी की बचत होती है. बचे पानी से दूसरी फसल की सिंचाई की जा सकती है.
  2.  सभी पौधों को बराबर और जरूरत के मुताबिक पानी मिलता है और पहले से 25 से 30 फीसदी  ज्यादा पैदावार होती है.
  3.  सभी पौधे एकसमान और जल्दी बढ़ते हैं.
  4.  खाद और दवा पौधों को बराबर मिलती है और उन की बरबादी नहीं होती.
  5.  पहाड़ी व ऊंचीनीची जमीन पर भी ड्रिप से सिंचाई कर के अच्छी फसल तैयार की जा सकती है.
  6.  जहां पानी की कमी हो, वहां के लिए यह सिस्टम बहुत ही फायदेमंद है.
  7.  इस से खरपतवार पूरे खेत में न हो कर केवल पौधों के पास ही उगते हैं, जिन्हें आसानी से दूर किया जा सकता है.
  8.  इस सिस्टम को चलाने में केवल 1 आदमी की जरूरत होती है.
  9.  इस सिस्टम से पौधों में होने वाली बीमारियों की रोकथाम होती है, क्योंकि पुराने तरीके से खुला पानी देने से बीमारी एक पौधे से दूसरे पौधे में फैलती है

फितूरः कन्फ्यूज निर्देशक की घटिया फिल्म

चार्ल्स डिकेन के उपन्यास ‘‘ग्रेट एक्सपेक्टैशन’’ पर अभिषेक कपूर फिल्म ‘‘फितूर’’ लेकर आए हैं, जिसे देखने का अर्थ खुद को सजा देना है. यह एक घटिया फिल्म है, जो कि कहानी के स्तर पर भी दर्शक को कन्फ्यूज करती है. निर्देशक अभिषेक कपूर भी पूरी तरह से कन्फ्यूज नजर आते हैं. उन्हे समझ में नही आ रहा है कि वह कहानी व अपने किरदारों को किस दिशा में ले जाएं.

फिल्म की कहानी एक तेरह वर्षीय लड़के नूर (आदित्य रॉय कपूर) से शुरू होती है, जो कि अपनी बहन व जीजा जुनेद के साथ रहता है. एक दिन वह एक आतंकवादी (अजय देवगन) को उसकी धमकी से डरकर खाना खिला देता है, इस बात से वह आतंकवादी सुधर कर दिलदार के नाम से लंदन में बस जाता है. दूसरी तरफ नूर की मुलाकात बेगम हजरत की बेटी फिरदौस (कटरीना कैफ) से होती है. फिरदौस को नूर के जूते पसंद आ जाते हैं. इसी बात से प्रभावित होकर बेगम हजरत नूर को अपने अस्तबल में घोड़ों की देखभाल करने का काम दे देती हैं और उसे धमकी देती हैं कि वह काम पर ध्यान दे, प्यार के चक्कर में ना पडे़.

बाद में बेगम हजरत को फिरदौस और नूर के बीच बढ़ती नजदीकियां पसंद न आने पर वह फिरदौस को लंदन भेज देती हैं. इधर नूर की गरीबी का मजाक उड़ाते हुए उससे कहती हैं कि यदि फिरदौस को पाना है, तो उसके काबिल बनो. लंदन में फिरदौस की मुलाकात पाकिस्तान सरकार के मंत्री मुफ्ती (अक्षय ओबेराय) के बेटे बिलाल (राहुल भट्ट) से होती है और दोनो के बीच प्यार हो जाता है. इधर नूर बड़ा होकर एक बेहतरीन चित्रकार बन चुका है. बेगम हजरत नूर से मिलने आती है और उसकी चित्रकारी देखकर प्रभावित हो जाती है. तभी एक अंजान इंसान की तरफ से नूर के पास संदेश आता है कि उसे वजीफा दिया गया है और वह दिल्ली जाकर चित्रकारी के क्षेत्र में कुछ कारनामा करे.

दिल्ली में उसे रहने के लिए आलीशान मकान मिला है. लीना (लारा दत्ता) वहां उसकी मेंटर बनी होती हैं. देखते ही देखते नूर बहुत बड़ी हस्ती बन जाता है. नूर की पेंटिग्स की एक्जबीशन लगती है, जहां फिरदौस से नूर की की मुलाकात होती है. नूर को फिरदौस बताती है कि वह बिलाल से सगाई करने जा रही है. पर नूर, फिरदौस से सेक्स संबंध स्थापित करता है, जिसकी खबर बेगम हजरत को मिलती है और बेगम हजरत का फोन पाकर फिरदौस तुरंत दिल्ली से कश्मीर पहुंच जाती है. यहां बीमार बेगम हजरत, फिरदौस को याद दिलाती हैं कि उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि वह एक लावारिस बच्ची थी, जिसे उन्होंने अपनी हवेली के लिए एक बेटी की जगह दी और अब वह हवेली के लिए एक नया वारिस भी चाहती हैं. तब फिरदौस का दिल्ली में बैठे नूर को पत्र मिलता है कि वह वापस लंदन जा रही है और यदि जिंदगी रही तो कभी मुलाकात होगी.

फिरदौस ने पत्र मे लिखा है कि उसके साथ उसने जो समय बताया, उसे भी वह भूल जाए. नूर वापस कश्मीर आकर बेगम हजरत की हवेली पहुंचता है, जहां फिरदौस के साथ साथ बेगम हजरत से मुलाकात होती है. यहीं पर बेगम हजरत अपने अतीत को याद करती हैं कि वह मुफ्ती से प्यार करती थी और उसके पिता ने उसकी शादी कहीं और तय कर दी थी. वह मुफ्ती के साथ घर से भागते समय अपने साथ लाखों रूपए के जेवर लेकर जाती हैं. मगर बेगम हजरत से सारे जेवर अपने हाथ में लेकर उसे धोखा देकर मुफ्ती गायब हो जाता है. इधर बेगम हजरत मां बनने वाली हैं, तो उसके पिता डॉक्टरों को बुलाने के बजाए चाहते हैं कि उसका बेटा मर जाए. अब बेटा कहां गया, इसका पूरी तरह से खुलासा नहीं होता है, पर पता चलता है कि वह नूर ही है. उधर यह बात भी खुलती है कि बेगम हजरत की हवेली के नौकर की बेटी है फिरदौस, जिसे जन्म देते ही नौकर की पत्नी मर गयी थी और बेगम ने अपना लिया था.

यह भी स्पष्ट होता है कि मुफ्ती को अपनी गलती का अहसास हैं और वह अभी भी बेगम हजरत से प्यार करते हैं. इसीलिए वह अपने बेटे बिलाल की शादी फिरदौस से कराना चाहता है. उधर एक बार फिर अंजान मददगार नूर को एक पेंटिग एक्जबीशन का हिस्सा बनने के लिए लंदन जाने के लिए कहता है. लंदन में नूर से मिलने बेगम हजरत आती हैं. यहीं पर नूर की मुलाकात उस आतंकवादी से होती है, जिसे उसने बचपन में एक दिन खाना खिला दिया था. वह आतंकवादी यानी कि दिलदार बताता है कि  उसकी वजह से वह सुधर गया और वह उसकी मदद कर रहा है. नूर को उसकी मदद से इस उंचाई पर पहुंचने पर कोफ्त होती है. कहानी तेजी से बदलती है. बेगम हजरत की मौत के बाद एक लॉकेट फिरदौस को मिलता है, उससे फिरदौस को सारा सच पता चलता है. वह बिलाल के साथ अपनी सगाई तोड़कर नूर के पास पहुंच जाती है.

फिल्म की गति बहुत धीमी है. इसलिए भी बोरियत होती है. कहानी कन्फ्यूजन पैदा करती रहती है. दर्शक की समझ में नहीं आता कि बेगम हजरत, नूर के साथ हैं या उसके खिलाफ हैं. फिल्म में नूर का संवाद है-‘‘दूध मांगोगे तो खीर देंगे, कश्मीर मांगोगे तो चीर देंगे’’ की आवश्यकता समझ से परे है. फिल्म के कुछ सीन भी बेवजह और जबरन पिरोए गए लगते हैं. फिल्म देखकर लगता है कि फिल्म निर्देशक अपनी इस फिल्म के माध्यम से प्रधानमंत्री मोदी को प्रभावित करना चाहते हैं, इसीलिए इसमें पाकिस्तानी एंगल पिरोया गया है. फिल्म देखते समय इस बात का अहसास होता है कि इस फिल्म की कुछ दिन शूटिंग करने के बाद रेखा ने यह फिल्म क्यों छोड़ दी थी.

मगर निर्देषक अभिषेक कपूर के सिर पर रेखा का भूत सवार नजर आता है. इसलिए उन्होने तब्बू को रेखा का ही लुक देने की कोशिश की है. बेगम हजरत का अतीत बताते समय युवा बेगम हजरत के किरदार में अदिति राव हादरी को पेश करने का औचित्य भी समझ से परे है. इंटरवल के पहले दर्शकों को कश्मीर के कुछ खूबसूरत सीन नजर आ जाएंगे, मगर इंटरवल के बाद दर्शक सोचेगा कि वह कब बाहर चला जाए.

आदित्य रॉय कपूर ने नूर के किरदार के साथ न्याय करने का पूरा प्रयास किया है. मगर कटरीना कैफ निराश करती है. उनके अमरीकन एसेंट वाली हिंदी विचलित करती है. फिल्म में आदित्य व कटरीना की केमिस्ट्री कहीं से प्रभावित नहीं करती. यह दोनो प्रेमी प्रेमिका के रूप में ठीक नहीं लगते हैं. संजीदा प्रेम कहानी का अभाव है. तब्बू ने फिर से साबित किया है कि वह बेहतरीन अदाकारा हैं. मगर लारा दत्ता, अदिति राव हादरी व अजय देवगन को जाया किया गया है. यह फिल्म दर्शकों की सहनशक्ति की परीक्षा लेने के अलावा कुछ नहीं है.

सिरैमिक टैक्नोलौजी: अपनी सोच से गढ़ें कुछ नया

सिरैमिक टैक्नोलौजी इंजीनियरिंग एवं टैक्नोलौजी की एक ऐसी उभरती शाखा है, जिस के अंतर्गत सिरैमिक मैटीरियल की प्रौपर्टी, मैन्युफैक्चरिंग, डिजाइनिंग और उस के कार्यों का विधिवत अध्ययन किया जाता है. एक सिरैमिक डिजाइनर का वास्ता इंडस्ट्री, घरगृहस्थी, शिक्षण संस्थान, कौरपोरेट हाउस तथा अन्य जगहों पर प्रयोग होने वाले सिरैमिक बरतनों के विभिन्न डिजाइनों से पड़ता है. ये सिरैमिक बरतन न सिर्फ देखने में सुंदर होते हैं बल्कि उपयोग की दृष्टि से भी लाभकारी साबित होते हैं.

सिरैमिक प्रोडक्ट के अंतर्गत टेबल और किचन के बरतनों के साथसाथ सुंदर दिखने वाले फ्लावरपौट, बिल्डिंग मैटीरियल आदि को शामिल किया जाता है. सीमेंट को भी सिरैमिक मैटीरियल से जोड़ कर देखा जाता है. सिरैमिक टैक्नोलौजिस्ट सिरैमिक मैटीरियल के अध्ययन, शोध एवं विकास, विभिन्न इंजीनियर्स के साथ प्लांट व अन्य मशीनरी की डिजाइनिंग और निर्माण संबंधी प्रक्रिया को अंजाम देते हैं. इस के अलावा इस में प्लानिंग एवं विभिन्न प्रक्रियाओं को लागू करने, ग्लास, पोर्सिलेन, सीमेंट, इंसुलेटर्स, तामचीनी, कंपोजिट मैटीरियल आदि की डिजाइन तथा उन के विकास से जुड़े कार्य भी प्रमुखता से संपन्न होते हैं. कोई भी छात्र जो सिरैमिक टैक्नोलौजी के क्षेत्र में कैरियर बनाने का इच्छुक है, उसे रोजगार के अवसरों में आने वाली परेशानियों के लिए खुद को तैयार रखना होगा. बतौर प्रोफैशनल्स आप सिरैमिक बरतन बनाने वाली कंपनियों, स्टील फैक्टरी एवं किसी लैब में रिसर्चर के रूप में जौब पा सकते हैं.

कोर्स एवं संबंधित योग्यता

यदि आप सिरैमिक टैक्नोलौजी के बैचलर प्रोग्राम में दाखिला चाहते हैं तो आप को 12वीं की परीक्षा अच्छे अंकों सहित विज्ञान विषयों से पास होना जरूरी है. कई ऐसे इंजीनियरिंग कालेज भी हैं जो सिरैमिक में 4 वर्षीय बीई या बीटैक कोर्स कराते हैं. इन कोर्सों में चयन भी इंजीनियरिंग की अन्य शाखाओं की तरह प्रवेश परीक्षा के बाद ही मिल पाता है. बैचलर के बाद डेढ़ वर्षीय एमटैक का रास्ता खुलता है, जबकि पीएचडी डिगरी के लिए रिसर्च से जुड़े कार्य करने पड़ते हैं.

प्रचलित कोर्स

–       बीई/बीटैक इन सिरैमिक टैक्नोलौजी.

–       कौरैस्पौंडैंस कोर्स इन सिरैमिक (बीएससी के समकक्ष).

–       एमटैक इन सिरैमिक टैक्नोलौजी.

–       पीएचडी इन सिरैमिक टैक्नोलौजी.

रोजगार के पर्याप्त अवसर

कोर्स के पश्चात छात्रों को सरकारी और प्राइवेट दोनों सैक्टरों में रोजगार के अवसर प्राप्त होते हैं. प्राइवेट सैक्टर में डिग्रीधारक सिरैमिक बरतन बनाने वाली यूनिट एवं अन्य कंपनियों में सिरैमिक टैक्नोलौजिस्ट तथा सिरैमिक डिजाइनर के रूप में जौब पा सकते हैं. सिरैमिक डिजाइनर का काम जटिल रासायनिक प्रक्रियाओं में आधारभूत सिरैमिक मैटीरियल का प्रयोग करना होता है. यदि कोई छात्र अपना व्यवसाय शुरू करना चाहे तो वह आगे चल कर स्वयं का व्यवसाय शुरू कर सकता है.

इंडियन स्पेस रिसर्च और्गेनाइजेशन (इसरो), भाभा एटौमिक रिसर्च सैंटर, डिफैंस मैटेलौजिकल रिसर्च लेबोरेटरी एवं इंस्टिट्यूट फौर प्लाज्मा रिसर्च सहित अन्य संस्थानों में भी ट्रेंड लोगों की भारी मांग है.

प्रैजैंस औफ माइंड की दरकार

सिरैमिक टैक्नोलौजी के क्षेत्र में छात्र के पास कई तरह के अतिरिक्त गुणों का भी होना जरूरी है. जैसे कि उन्हें बिना किसी भय एवं लापरवाही के खतरों का सामना व उन को हैंडिल करना आना चाहिए. प्रोफैशनल बनने के लिए उन के पास एक अच्छा प्रैजैंस औफ माइंड होना जरूरी है. इस फील्ड में संस्थाएं अपने एंप्लाई से कार्य के प्रति समर्पण व अनुशासन मांगती हैं. आजकल तो कंप्यूटर व तकनीक के दखल के चलते उन का गहरा ज्ञान भी जरूरी हो गया है. परिस्थितियां यदि अपने पक्ष में नहीं भी हैं तो उन्हें अपने पक्ष में करने का कौशल अभ्यर्थी में होना चाहिए.

मिलने वाली सैलरी

इस क्षेत्र में वेतन सिरैमिक इंजीनियर की योग्यता, अनुभव, कार्यस्थल व जौब की प्रकृति पर निर्भर करता है. छात्र ग्रैजुएशन के पश्चात ही 25-30 हजार रुपए प्रतिमाह कमा सकते हैं. जैसेजैसे उन का अनुभव बढ़ता है, उसी हिसाब से वेतन में भी बढ़ोतरी होती है. अमूमन 3-4 साल के अनुभव के बाद 40-45 हजार रुपए मासिक आसानी से मिल जाते हैं. विदेशों में आमदनी की कोई निश्चित सीमा नहीं होती है

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