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…तो इस कारण ‘नीरजा’ मे अभिनय कर रहे हैं शेखर

सोनम कपूर के अभिनय से सजी आगामी फिल्म 'नीरजा' में गायक-संगीतकार शेखर रवजियानी पहली बार अभिनय करते हुए नजर आएंगे. उन्होंने कहा कि उन्होंने निर्देशक राम माधवानी के साथ दोस्ती के चलते इस फिल्म में काम किया. शेखर ने कहा, "राम कई सालों से मेरे करीबी दोस्त हैं और उन्होंने मुझे फिल्म करने के लिए जोर दिया और मैं दोस्ती के कारण मना नहीं कर सकता था."

वह फिल्म की शूटिंग के समय कैमरे का सामना करते हुए वह चिंतित नहीं थे. उन्होंने कहा, "जहां राम जैसा फिल्म-निर्देशक हो तो चिंता करने की कोई बात ही नहीं है. काम सरल और तनाव-मुक्त है. मैंने बहुत आनंद लिया, यह बहुत खूबसूरत फिल्म थी."

उल्लेखनीय है कि 5 सितंबर, 1986 को आतंकवादियों ने विमान कंपनी पैन एम की उड़ान संख्या 73 को कराची में अगवा किया था. नीरजा भनोट इसमें परिचारिका थीं. विमान में सवार यात्रियों को आतंकवादियों से बचाने की कोशिश में नीरजा की जान चली गई. नीरजा भनोट की बायोपिक 'नीरजा' में सोनम कपूर मुख्य भूमिका में हैं. अभिनेत्री शबाना आजमी फिल्म में नीरजा की मां की भूमिका में नजर आएंगी.

इस बारे में बात करते हुए शेखर ने कहा, "सोनम शानदार हैं और वह 'आई हेट लव स्टोरीज' के बाद से मेरी अच्छी दोस्त हैं. इसमें मैंने संगीत दिया था. फिल्म में सोनम नीरजा भनोट और राम माधवानी फिल्म निर्देशक हैं तो मैं बहुत खुश हुआ." फिल्म की कहानी एवं पटकथा सैविन क्वाड्रास ने लिखी है.

सलमान नहीं, इनके साथ वैलेंटाइंस डे मनाएंगी कैटरीना

रणबीर कपूर और कैटरीना कैफ के ब्रेकअप की खबरें पिछले दिनों काफी मीडिया में छाई हुई थी. इसके अलग होने के बाद कैट का नाम एक बार से उनके एक्स ब्वॉयफ्रेंड सलमान खान के साथ जोड़ा जाने लगा था. लेकिन अब हाल ही में खबर आई है कि कैट सलमान या रणबीर के साथ नहीं बल्कि सिद्धार्थ मल्होत्रा के साथ अपना वेलेंटाइन्स डे मनाने वाली है.

दरअसल हाल ही में अभिनेता सिद्धार्थ मल्होत्रा का कहा है कि वेलेंटाइंस डे पर उनका कोई खास प्लान नहीं है और वह इस दिन को अपनी आने वाली फिल्म 'बार बार देखो' की शूटिंग करते हुए सह-अभिनेत्री कैटरीना कैफ के साथ बिताएंगे. सिद्धार्थ का यह जवाब उस समय आया, जब 'कपूर एंड संस' के ट्रेलर के लांच के मौके पर उनसे यह पूछा गया कि वह यह दिन किसके साथ बिता रहे हैं.

सिद्धार्थ ने कहा, "अब तक तो मेरा 'बार बार देखो' की शूटिंग पर जाने का प्लान है. मैं अपने क्रू मेंम्बर्स साथ रहूंगा." रणबीर से ब्रेकअप होने के बाद कैटरीना ने हालांकि साफ कर दिया कि वह कभी भी वेलेंटाइंस डे नहीं मनातीं.

कैटरीना इन दिनों आदित्य रॉय कपूर के साथ अपनी फिल्म 'फितूर' के प्रमोशन में काफी व्यस्त हैं. गौरतलब है सिद्धार्थ और आलिया इन दिनों एक दूसरे को डेट कर रहे हैं. अब ऐसे में अगर सिद्धार्थ वेलेंटाइंस डे पर कैटरीना के साथ रहेंगे और फिल्म की शूटिंग करेंगे, तो उनकी प्रेमिका आलिया भट्ट का भी ऐसा ही कुछ प्लान है. आलिया ने कहा है कि वह गोवा में अपनी फिल्म की शूटिंग कर रही होंगी. यह फिल्म गौरी शिंदे बना रही हैं. इस फिल्म में आलिया शाहरुख के साथ अभिनय करती हुई नजर आएंगी.

इसके अलावा सिद्धार्थ और आलिया जल्द ही शकुन बत्रा के निर्दशन में बनी आगामी फिल्म 'कपूर एण्ड सन्स' में नजर आने वाले हैं. फिल्म में इन दोनों के अलावा फवाद खान और ऋषि कपूर भी मुख्य भूमिका में नजर आएंगे. फिल्म 18 मार्च को सिनेमाघरों में रिलीज की जाएगी.

VIDEO: कुश्ती के दांव-पेंच सीख रहीं हैं अनुष्का, पर क्यों

फिल्म 'सुल्तान' में सुपरस्टार सलमान खान के साथ मंच साझा कर रहीं अभिनेत्री अनुष्का शर्मा  कुश्ती के दांव-पेंच सीख रही हैं ताकि वो सलमान की इस फिल्म में अपने किरदार के साथ इंसाफ कर पाएं. अनुष्का फिल्म सुल्तान में सलमान की हीरोइन लगने के लिए इन दिन जीतोड़ मेहनत कर रही हैं.

अनुष्का ने ट्विटर पर एक तस्वीर साझा की, जिसमें वह कुश्ती के मैदान में नजर आ रही हैं. इसमे वह नीले रंग की टी-शर्ट और शार्ट्स पहने हुए हैं. गौरतलब है कि सलमान खान फिल्म सुल्तान में पहलवान की भूमिका में हैं.

तस्वीर का शीर्षक अभिनेत्री ने लिखा, "न दर्द, न फायदा सिर्फ 'सुल्तान' के लिए कुश्ती का प्रशिक्षण." फिल्म में अनुष्का पहली बार एक रेसलर की भूमिका निभाती हुई नजर आएंगी. वह अपने इस किरदार को लेकर काफी उत्साहित हैं.

काफी दिनों से फिल्म में सलमान के लुक का खुलासा किया जा रहा था. कुछ दिन पहले आए एक लुक में वह क्लीन शेव दिख रहे थे और इसके बाद जारी किए गए एक लुक में वह कुश्ती के मैदान में दिखाई दे रहे थे. जिसमें उनके नाक से खून निकलता और माथे पर पसीना दिखाई दे रहा था.

अली अब्बास जफर द्वारा निर्देशित फिल्म यशराज फिल्म्स के बैनर तले आदित्य चोपड़ा द्वारा निर्मित है. फिल्म में सलमान खान पहलवान केसरी के किरदार में नजर आएंगे, इस फिल्म के लिए उन्होंने अपना वजन भी बढ़ाया है साथ ही वह काफी मेहनत भी कर रहे हैं. खबरों के अनुसार इस फिल्म में सलमान एक पिता के किरदार में भी नजर आने वाले हैं. और फिल्म के क्लाइमेक्स में वह अपने ही बेटे के साथ लड़ते हुए दिखेंगे.

फिल्म में रणदीप हुड्डा भी प्रमुख भूमिका में नजर आएंगे. फिल्म ईद के मौके पर सिनेमाघरों में रिलीज की जाएगी.

खाद नहीं जैविक खाद, घटेगी लागत बढ़ेगा मुनाफा

चालू मौसम में गेहूं की बोआई के समय एक बार फिर से खाद की बढ़ी कीमतों से किसानों की लागत बढ़ रही है और मुनाफा घट रहा है. ऐसे में अगर किसान रासायनिक खाद की जगह पर जैविक खाद का प्रयोग करें तो न केवल किसानों का मुनाफा बढ़ेगा, बल्कि खेत की सेहत भी ठीक रहेगी. रासायनिक खाद का प्रयोग खेत की मिट्टी की जांच के बाद ही जरूरत के अनुसार करें. अंधाधुंध रासायनिक खाद का प्रयोग करने से पैदावार बढ़ने के बजाय खेत को नुकसान होता है और खेती की लागत भी बढ़ती है. ऐसे में किसान को ही परेशान होना पड़ताहै.

जिस समय किसान अपने खेतों में बोआई कर रहे थे, उस समय खाद की दुकानों से डीएपी खाद गायब हो गई थी, जिस से किसानों को महंगे दामों पर खादें खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ा. जब किसान गेहूं की फसल काटने के लिए तैयार हो रहे थे और गेहूं की फसल में आखिरी बार खाद डालने की बारी आई तो दुकानों से यूरिया खाद गायब हो गई. यूरिया संकट ने किसानों के सामने समस्या खड़ी कर दी. रबी की फसलों विशेषकर गेहूं की फसल में जनवरीफरवरी के दौरान खाद डालने की जरूरत होती है. इस समय तक गेहूं में दूसरी और तीसरी सिंचाई की जरूरत होती है. इस के बाद यूरिया खाद डाली जाती है.

यूरिया खाद दुकानों में भरपूर मात्रा में न होने से किसानों को महंगे दामों पर इसे खरीदना पड़ रहा है. इस के चलते यूरिया के लिए मारामारी मची है. उत्तर प्रदेश के बहुत सारे जिलों में यूरिया खाद की कालाबाजारी शुरू हो गईहै. तमाम किसान कृषि विभाग को इस बारे में शिकायतें भी भेज रहे हैं, लेकिन विभाग इस बात को मान ही नहीं रहा है कि प्रदेश में यूरिया खाद की कोई कमी है. उत्तर प्रदेश में यूरिया खाद का भाव 3 सौ रुपए प्रति बोरी है. खाद की कमी के चलते किसानों को 375 से 400 रुपए प्रति बोरी खाद खरीदनी पड़ रही है. सब से बड़ी परेशानी उन जिलों में है, जहां पर सहकारी संस्थाएं काम नहीं कर रही हैं. मगर अब खाद की कमी से परेशान होने की जरूरत नहीं है. किसानों को इस की जगह पर जैविक खाद का प्रयोग करना चाहिए. इस से पैदावार बढ़ेगी और लागत मूल्य कम होगा.

रासायनिक खाद की जगह जैविक खाद

गेहूं की बोआई के समय प्रदेश में डीएपी खाद की कमी हो गई थी, जिस का प्रभाव गेहूं की फसल पर पड़ रहा है. डीएपी खाद की कमी को पूरा करने के लिए किसान गेहूं में यूरिया ज्यादा डालना चाह रहे थे. अब यूरिया भी नहीं मिल रही है, जिस से गेहूं की पैदावार पर असर पड़ेगा. गेहूं की बोआई के समय ही आलू की बोआई भी होती है, इसलिए आलू किसान भी डीएपी खाद न मिलने से परेशान हुए थे. किसान सेवा केंद्रों पर आधी रात से लाइन लगाए खड़े किसान जब बेकाबू हो जाते थे, तो धरनाप्रदर्शन करने लगते थे, जिसे काबू करने के लिए पुलिस को लाठियां चलानी पड़ती थीं. किसानों को खाद मिलने की जगह पर पुलिस की लाठियां खानी पड़ती थीं.

उस समय भी कृषि विभाग के अधिकारी खाद की कमी को नहीं मानते थे. अफसरों का कहना था कि किसान खाद को खरीद कर जमा कर रहे हैं, जिस से बाजार में खादों के दाम बढ़ गए हैं. किसान जबरदस्ती की हड़बड़ी दिखा कर परेशानी पैदा कर रहे हैं.

किसानों का कहना है कि जब तक गेहूं की बोआई चली तब तक खाद का संकट बना रहा. कृषि विभाग ने रबी फसलों की बोआई के लिए बहुत सारी योजनाएं तो पहले बना ली थीं, पर खाद संकट न हो इस की कोई योजना नहीं बनाई. इसी का नतीजा है कि डीएपी के बाद यूरिया खाद का संकट आ गया है.

कृषि विभाग ने हर जिले में खाद वितरण पर नजर रखने के लिए कंट्रोल रूप भी बनाए थे, जहां पर किसान अपनी शिकायत दर्ज करा सकते थे. यह व्यवस्था की गई कि खाद का वितरण सरकारी कर्मचारी की मौजूदगी में ही किया जाए. इस के लिए ब्लाक, तहसील या फिर विभाग का कर्मचारी वहां पर मौजूद रहे. इस के बाद भी जिलेवार हालात बहुत खराब दिखे.

जब बोआई का समय आता है तभी बाजार से खाद गायब हो जाती है. खाद की कमी से कालाबाजारी होने लगती है. किसानों को महंगे दामों पर खाद खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है.

नए तरीके से बनाएं जैविक खाद

खाद की कमी केवल बड़े शहरों में ही नहीं है. छोटे शहरों का हाल भी बुरा है. जालौन जिले के माधौगढ़, आटा व जोल्हूपुर इलाके के किसान डीएपी और यूरिया खाद के न मिलने से परेशान हैं. जालौन के किसानों का कहना है कि मटर, चना, मसूर, तिलहन और गेहूं की बोआई के समय डीएपी खुले बाजार में मौजूद नहीं थी, जिस के कारण उन्हें बहुत परेशान होना पड़ा.

सरकार ने किसानों को राहत देने के नाम पर सरकारी कीमत पर खाद वितरण का काम पीसीएफ और सहकारी समितियों के द्वारा कराने की योजना भी बनाई, समितियों के जरीए उन किसानों को खाद मिल रही है,जो समितियों के सदस्य हैं. जरूरत इस बात की है कि रासायनिक खाद की जगह पर जैविक खाद का प्रयोग किया जाए. किसानों को नए तरीके से जैविक खाद बनाने के तरीके बताए जाएं, जिस से उन को लाभ हो.

समितियों के कर्मचारियों के द्वारा भी खाद की बिक्री में मनमानी की जा रही है. ये लोग मनचाहे तरीके से खाद बांटते हैं. कुछ समितियां लाइसेंस धारक खाद विक्रेताओं को अधिक पैसे ले कर खाद बेच देती हैं. समितियों द्वारा 1 एकड़ खेत के लिए 1 बोरी खाद दी गई थी, जो जरूरत से काफी कम थी. फतेहपुर और कानपुर जिलों में भी खाद की कमी नजर आती है. साधन सहकारी समितियों में खाद की खेप आते ही दबंग और बड़े किसान उस पर कब्जा कर लेते हैं. इस से छोटे किसानों को खाद का संकट पैदा हो जाता है. बाजार में खाद की कीमत उछाल मारने लगती है. अफरातफरी में किसान खाद को ज्यादा खरीद लेते हैं. खाद की कमी की परेशानी को दूर करने का एकमात्र उपाय है कि जैविक खाद का प्रयोग बढ़ाया जाए. इस से ही किसानों को लाभ होगा.

डिजिटल क्रांति: अंधेरे का धुआं

सच सुबह की सूर्य की किरणों की तरह जरूरी है. जैसे एलईडी लाइट्स सूर्य का मुकाबला नहीं कर सकतीं ठीक वैसे ही सच का मुकाबला भी झूठ नहीं कर सकता. यह जरूर है कि जब से मानव सभ्य हुआ है उस ने झूठ का एक बहुत बड़ा बोझ सिर पर लाद रखा है और यह बोझ अब बढ़ रहा है. रीतिरिवाजों, धार्मिक अंधविश्वासों, काल्पनिक कहानियों, दुनिया के पैदा होने के झूठे तरीकों के बोलबाले का 500 साल पहले पर्दाफाश होना शुरू हुआ और नतीजा रहा औद्योगिक क्रांति, कानून का राज, लोकतंत्र, विज्ञान का विकास, नई तकनीक, मशीनें और अब मोबाइल डिजिटल युग.

मोबाइल और कंप्यूटर का डिजिटल युग अब झूठ का सब से बड़ा निर्माता बन गया है. धर्म के बाद इसी का नंबर आएगा.

धार्मिक पुस्तकों में जितना झूठ भरा है, डिजिटल डिवाइसों ने सब ग्रहण कर लिया है. अब इस झूठ को जम कर फैलाया जा रहा है. सूर्य की तेज रोशनी में अंधेरी काली किरणें कैसे फैलाई जा सकती हैं, डिजिटल क्रांति में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं.

यह काली स्याही दिमाग को कुंद बना रही है, देखा जा सकता है. आज का युवा डिजिटल नशे में सोचनेपरखने और तर्क करने की कला खो रहा है. जो मैसेज आया, अगर चटपटा है तो आगे 100 लोगों को भेज दो. सच है या काला, जानने की कोशिश भी न करो. किसी का क्लिप बनाया, आगे खिसका दो, वायरल कर दो. बिना जाने कि यह किस तरह नुकसान पहुंचा सकता है. अपनी ओर से जोड़ने की कुछ जरूरत ही नहीं. दूसरे को तो एहसास दिलाना है कि आप मौजूद हैं, बस. क्या कह रहे हैं, सच कह रहे हैं, झूठ कह रहे हैं, यह न आप जानते हैं न दूसरी तरफ वाला.

देश में हताशा है. अर्थव्यवस्था कमजोर हो रही है. कानून ढीला हो रहा है. अभी पश्चिम एशिया सा हाल नहीं हुआ है पर हो सकता है. अमेरिका में डिजिटल क्रांति के पलेफले लोग बंदूकें उठाए निहत्थे निर्दोषों को मारने लगे. यूरोप में मार खाए रिफ्यूजियों के पास मोबाइल जरूर हैं पर उन से वे शरण देने वालों के खिलाफ जहर उगल रहे हैं क्योंकि डिजिटल क्रांति रोशनी की क्रांति नहीं, अंधेरे का धुआं बन गई है.

घरों में बच्चे, युवा, औरतें, मांएं डिजिटल चटरपटर करती रहती हैं. काम की बातें भूल, केवल भ्रम, केवल झूठ, केवल घटाटोप अंधियारा, गलत बात सैकंडों में सैकड़ों के पास. सही बात को लेने वाला कोई नहीं.

वैज्ञानिक खोजों ने जीवन सुगम बनाया था तो बम भी बनाए थे. इसी तर्ज पर डिजिटल क्रांति उजाले के साथ काली आंधी भी ला रही है. कल के लिए क्या तैयार हैं? क्या कोई अरविंद केजरीवाल है जो कह सके कि मोबाइलों पर केवल ईवन बातें होंगी, औड नहीं?

न बनने दें बच्चों को ‘साइलेंस विक्टिम’

कुछ समय पहले की बात है. कोलकाता के एक उपनगर चौथी कक्षा की एक बच्ची हर रोज पढ़ने जाता थी. बल्कि उसे जबरन भेजा जाता था. माता-पिता यही समझते थे कि दूसरे छोटे बच्चों की तरह उनकी बच्ची भी ट्यूशन पढ़ने जाने में आनाकानी करती है. मां उसे रोज बहला-फुसला कर ट्यूटर के घर छोड़ आया करती थी. अचानक एक दिन वह बच्च जख्मी हालत में रोते-रोते घर पहुंच जाती है. बच्ची ने बताया ट्यूटर ने उसके साथ गलत हरकत की. दरअसल, बच्ची को प्यार-दुलार करने के बहाने ट्यूटर अक्सर उसके बदन में इधर-उधर हाथ लगाने की कोशिश किया करता था. इसकी शिकायत बच्ची ने अपने माता-पिता से कई बार की थी. लेकिन घरवाले बच्ची का आशय समझ नहीं पाए थे.

मुंबई अंधेरी में एक स्कूल के प्रिंसिपल को छह साल के बच्चे का यौन शोषण करने के मामले पोकसो के तहत गिरफ्तार किया गया. बच्चे ने मां को बताया कि दोपहर को जब वह टौयलेट गया तो प्रिंसिपल ने उसके प्राइवेट पार्ट्स को हाथ लगाया.

मालदह में 13 साल की एक लड़की के साथ उसी के स्कूल के एक छात्रों के एक दल ने स्कूल परिसर में यौन उत्पीड़न की कोशिश की. लड़कों के दल में से एक छात्र लगभग हर रोज उसे फब्तियां कसता था. फिर एक दिन उसने लड़की को प्रेम निवेदन किया. जवाब में लड़की ने उसे बुरी तरह झिड़क दिया था. इससे नाराज लड़कों के दल ने छुट्टी के समय मौका देखकर लड़की को उसकी सहेली के साथ घेर लिया. पहले तो लड़की को थप्पड़ मारा और फिर सब उन दोनों के साथ छेड़खानी करने लगे.

दिल्ली रोहिणी के मैक्सफोर्ट स्कूल में आठ साल की एक लड़की के साथ शिक्षक ने स्कूल परिसर में छेड़खानी करने की कोशिश की. ऐसा एक बार नहीं दो बार हुआ. पहली बार लड़की ने अपनी खुद की आशंका को झिड़क दिया. लेकिन जब उसके साथ दोबारा ऐसा ही हुआ तो लड़की ने घरवालों को इसक शिकायत की. इसके बाद अभिभावकों ने स्कूल में प्रदर्शन किया.

एक अन्य घटना में मुंबई के प्रभादेवी स्कूल बधिर और शारीरिक रूप से विकलांग बच्चे के प्रभादेवी स्कूल में प्रिंसिपल और एक टीचर ने मिलकर एक बधिर बच्ची का यौन शोषण किया. बच्ची ने बताया कि स्कूल की और भी छह बच्चियों के साथ भी इस तरह की घटना घट चुकी है. बाद में पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार किया.

कोलकाता के जादवपुर इलाके में एक स्कूल में एक लड़के ने टौयलेट में एक लड़की के साथ बलात्कार की कोशिश की. लड़का स्कूल की दीवार फांद कर परिसर में घुस आया था. इसका घटना के बाद अभिभावकों ने जमकर हंगामा किया.

ये तो स्कूल में बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न की घटनाएं हैं. पिंकी विरानी ने अपनी किताब ‘बीटर चौकलेट: चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज इन इंडिया’ में एक सर्वे का जिक्र किया है, जो बताता है कि 90 फीसदी मामलों में पिता, भाई, चाचा, मामा जैसे परिजन और पारिवारिक मित्र, ड्राइवर, नौकर-चाकर, दरवान भी प्यार-दुलार के बहाने अक्सर बच्चों यौन उत्पीड़न करते हैं. सहूलियत भरी जिंदगी जीने के लिए माता-पिता दोनों सर्विस करते हैं. जाहिर है भाग-दौड़ की जिंदगी में बच्चे जल्द ही आया व पारिवारिक सदस्यों के हवाले कर दिए जाते हैं. ऐसे करीबी लोगों के के चेहरे के पीछे कोई मुखौटा है, बच्चे और माता-पिता समझ नहीं पाते हैं. माता-पिता के सामने दादा, ताऊ, काका, चाचा, मामा चौकलेट या टौफी देकर स्नेह जताते हों, लेकिन माता-पिता के पीठ पीछे या टैरेस या किसी सूनसान जगह में बच्चों को ले जाकर अपनी विकृत लालसा पूरा करते हैं.

यूनिसेफ, सेव द चिल्ड्रन, केंद्रीय समाज कल्याण मंत्रालय और स्वयंसेवी संस्थाओं की ओर से समय-समय पर जितनी भी सर्वे हुए हैं, उनका लब्बोलुआव यही है कि समाज के हर स्तर पर पांच से लेकर 18 साल के बच्चों का शारीरिक शोषण हो रहा है. प्रयास नामक स्वयंसेवी संस्था ने 13 राज्यों में कराए गए सर्वेक्षण में समाज के हर तबके के 18 साल के 12500 बच्चों से बातचीत का नतीजा भी यही कहता है कि प्रति तीन में से दो का कभी-न-कभी यौन शोषण हुआ है. वहीं 18 से 24 साल के 2324 लड़के-लड़कियों माना कि इसमें बहुतों के साथ उम्र के विभिन्न पड़ाव पर यौन शोषण हुआ है. पूरे सर्वे में पाया गया कि 99 प्रतिशत बच्चे ‘साइलेंट विक्टिम’ बनते हैं. 70 प्रतिशत बच्चे चाहे लड़का हो या लड़की यौन उत्पीड़न की बात छिपा लेते हैं. किसको नहीं बताते या किसी को पता नहीं चल पाता है. कई बार बच्चे इतने छोटे होते हैं कि या तो समझ नहीं पाते हैं, या बता नहीं पाते हैं. 20 प्रतिशत मामले में बच्चों की शिकायत करने पर भी माता-पिता मामले को पचा जाते हैं या छिपा लेते हैं. समाज में बदनामी से डर कर आरोपी पर कोई कार्रवाई नहीं करते हैं.

मुंबई की भी एक अन्य स्वयंसेवी संस्था ने देश के 500 शहरों में शिक्षित और संभ्रांत मध्यवर्गीय परिवार की महिलाओं पर सर्वे किया. जिन महिलाओं से इस बारे में बात की गयी उनमें से 450 महिलाएं ‘हाईवे’ फिल्म की वीरा त्रिपाठी पायी गयीं, जिसका चाचा उसका यौन शोषण किया करता था और उसकी मां उसकी शिकायत को दबा देती थी. अक्सर ये महिलाएं बचपन में कभी-न-कभी, किसी-न-किसी उम्र में एक बार या एक से अधिक कई बार यौन उत्पीड़न की शिकार हो चुकी थीं. इनमें 40 प्रतिशत महिलाएं करीबी रिश्तेदारों द्वारा यौन उत्पीड़न की शिकार हुई थीं. 70 प्रतिशत का यौन शोषण पारिवारिक मित्रों या दूर के उम्रदराज रिश्तेदारों ने किया था. आजकल तो लड़कों का भी यौन उत्पीड़न आम है. एक सर्वे में 150 लड़कों से इस मुद्दे पर बात हुई, ‍इनमें से 15 प्रतिशत लड़के बचपन में पिता, ताऊ, काका और पड़ोसी द्वारा लांक्षित होते थे. 

मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट कहता है कि पूरे देश में हर 23 मिनट में एक बच्चे का अपहरण होता है. अपहृत बच्चों में ज्यादातर का किसी-न-किसी रूप में यौन शोषण होता है. कुछ मामलों में तो अपहरण का मकसद यौन उत्पीड़न और विकृत यौन लालसा की प्राप्ति होता है. केवल और केवल फिरौती के लिए भी अपहरण होता है, लेकिन उन बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न होता है. अपहृत बच्चे खाड़ी के देशों में भी भेज दिए जाते हैं.

गंभीरता से लें बच्चों की बातों को

कोलकाता के नेशनल इंस्टीट्यूट औफ विहेवियरल साइंस की मनोचिकित्सक श्रीलेखा विश्वास का कहना है कि भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में पिडोफिल नामक मानसिक विकार वाले लोगों की बड़ी जमात सक्रिय है. बड़े पैमाने पर बच्चों का कभी पा‍रिवारिक सदस्यों, कभी पारिवारिक मित्रों, कभी सगे-संबंधियों तो कभी ड्राइवरों, रसोइयों, दरवानों और नौकर-चाकरों जैसे परिवार के अन्य परिचितों द्वारा सेक्सुअल शोषण होता है. श्रीलेखा का कहना है कि समाज में बच्चे आमतौर पर ‘वल्नरबल’ यानि अरक्षित होते हैं. कि हमारे आसपास मुखौटाधारी रिश्तेदार व मित्र होते हैं. माना ऐसे लोगों से की पहचान मुश्किल है और इन लोगों से बच्चों को दूर रखना भी एक चुनौती भरा काम है. लेकिन माता-पिता इतना तो कर सकते हैं कि बच्चों को हमेशा अपनी निगरानी में रखें. निगरानी का इंतजाम करें. और जब कभी बच्चा ऐसा कुछ बताने की कोशिश करे तो उसे गंभीरता से लेते हुए उसकी बात को तरजीह दें. अनसुना न करे. न ही वहम बता कर टाल दें.

बच्चों को बनाएं जागरूक

वे यह भी कहती हैं कि बच्चों में थोड़ी समझदारी आने के साथ या फिर उनके परिचितों का दायरा बढ़ने के साथ उन्हें यह समझना जरूरी है कि छिपा कर किया गया कोई भी काम गलत होता है. अगर कोई उनके साथ कुछ इस तरह पेश आए जो उनके मन को अच्छा न लगे. कोई कुछ ऐसा काम करने को कहे जो जो करने से उनके मन का साथ न हो, या हिचक मन में आए तो यह बात वे माता-पिता को जरूर बताएं. उन्हें यह भी बताएं कि अगर कोई प्यार-दुलार करते हुए उनके गुप्तांग या बदन के किसी हिस्से को हाथ लगाएं तो तुरंत माता-पिता को बताना चाहिए. बच्चों को जागरूक बनाने का दायित्व माता-पिता का है, क्योंकि बच्चे ‘साइलेंट विक्टिम’ बनेंगे. बच्चों के उम्र के हिसाब से खुलेतौर पर या सहज रूप से बातचीत के जरिए बच्चों को सचेत करना जरूरी है.

ऐसे करें अपने नए पड़ोसी का स्वागत

कई महीनों से आप अपने सामने के फ्लैट पर ‘फौर सेल’ का बोर्ड देख रही थीं और आज अचानक उस पर ‘सोल्ड’ का बोर्ड देखा, तो सब से पहले मन में यही खयाल आया होगा कि इसे किस ने खरीदा और कौन हमारा पड़ोसी बनने आ रहा है? नए पड़ोसी के आने से मन में वैसी ही खुशी होती है जैसी मनपसंद कार गिफ्ट में मिलने पर. पड़ोसियों से मधुर संबंध सभ्य समाज की निशानी होता है. हम दोस्त तो नए बना सकते हैं, मगर पड़ोसी बदलना हमारे बस में नहीं होता.

प्रधानमंत्री की कुरसी संभालने के बाद से नरेंद्र मोदी भी पड़ोसियों से संबंध बेहतर करने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं. दुनिया भर के देशों में दोस्ती का हाथ बढ़ा रहे हैं. फिर हमें अपनी यानी भारतीय संस्कृति भी यही सिखाती है कि हमें अपने पड़ोसियों से अच्छे रिश्ते बना कर रखने चाहिए, क्योंकि एक अच्छा पड़ोसी 10 रिश्तेदारों के बराबर होता है.

आइए, जानते हैं नए पड़ोसियों से संबंधों की शुरुआत की कहानी कहां से लिखी जा सकती है:

कौन है नया पड़ोसी

सब से पहले यह जानकारी हासिल करें कि आप का नया पड़ोसी कौन है? कोई बच्चों वाली फैमिली है, वृद्ध दंपती हैं, सिंगल पर्सन है या फिर नयानवेला जोड़ा है. इस बात की जानकारी लेने से आप को यह समझने में आसानी होगी कि आप के नए पड़ोसी को नए घर में शिफ्ट होने पर सब से पहले किस चीज की जरूरत पड़ सकती है. नए पड़ोसी को वैल्कम करने को ले कर टीवी पर आप ने एक ऐड जरूर देखा होगा, जिस में एक वृद्ध दंपती अपनी गाड़ी में सामान ले कर आते हैं और बिल्डिंग के सारे लोग एकदूसरे को उन के फोटो मैसेज कर सामान शिफ्ट करने में उन की मदद करते हैं. अगर यह सच हो तो उस वृद्ध दंपती के लिए नए घर का अनुभव कितना सुखद हो सकता है, यह आप सोच भी नहीं सकते हैं.

चायकौफी औफर करें

यदि आप ने कभी नए घर में सामान शिफ्ट किया हो तो आप को अवश्य पता होगा कि नए घर में जाना और सैटल होना कितना थका देने वाला काम होता है. नए घर में पहुंच कर अकसर ऐसा होता है कि 1 कप चाय या कौफी बनाने का इंतजाम भी एकदम से नहीं हो पाता है. ऐसे में आप के नए पड़ोसी के आने पर आप उन्हें 1 कप गरमगरम चाय या कौफी औफर कर जानपहचान शुरू कर सकती हैं. आप चाहें तो उन के लिए दोपहर या रात का खाना भी बना कर दे सकती हैं. खाना देते समय एक बात का ध्यान जरूर रखें कि पैक खाने के साथ डिस्पोजेबल प्लेट्स और गिलास भेजें ताकि अगर वे अपने बरतन न निकाल पाएं, तो खाना खाने में असुविधा न हो.

वैल्कम बास्केट

आप अपने पड़ोसी के लिए एक वैल्कम बास्केट बना कर भी उन का स्वागत कर सकती हैं. आप बाजार से एक प्यारी सी बास्केट खरीदें, उस में कुछ शोपीस सजा कर एक वैल्कम कार्ड रखें और नए पड़ोसी को औफर करें. आप इसे पड़ोसी के आने के फौरन बाद दे सकती हैं. लेकिन जिस दिन वे आएं हो सकता है शिफ्टिंग के कारण बहुत व्यस्त हों, तो आप दूसरे दिन इसे दे सकती हैं.

कोई पौधा या डायरैक्टरी भेंट करें

आप अपने पड़ोसी को कोई पौधा भी भेंट कर सकती हैं. कोई शोपीस या फूल का प्लांट एक पौट के साथ दे कर आप उन्हें अपना गार्डन बनाने में मदद कर सकती हैं. अगर वे किसी दूसरे शहर से आए हैं, तो आप उन्हें अपने शहर का मैप या अन्य जानकारी जैसे सोसाइटी में रहने वाले लोगों के फोन नंबर व पते से संबंधित डायरैक्टरी, बुक या सामान भेंट कर सकती हैं. हो सके तो पहली बार अपने पड़ोसी के साथ वहां की मार्केट या शौपिंग कौंप्लैक्स में जाएं. ऐसा करने से आप के पड़ोसी को अच्छा लगेगा और उसे सुविधा भी होगी.

व्यक्तिगत रूप से मिलें

अपने नए पड़ोसी के सैटल हो जाने के बाद जब आप उन से व्यक्तिगत रूप से मिलें तो उन के परिवार के बारे में पूछें. यदि आप घर में खिलौने देख रही हैं, तो बच्चों के बारे में पूछ सकती हैं और अपने बारे में बता सकती हैं. आप वहां टंगी किसी तसवीर के व्यक्ति के बारे में भी पूछ सकती हैं. उन के गार्डन में उगने वाले पौधों के बारे में बात कर सकती हैं और यह बता सकती हैं कि गार्डनिंग का शौक आप भी रखती हैं. अगर उन के घर में हौबी इक्यूपमैंट देख रही हैं, तो उस के बारे में जानकारी ले सकती हैं या कोई पैट हो तो उस के बारे में चर्चा कर सकती हैं. बस यह ध्यान रहे कि उन की निजी जिंदगी में दखल की जो सीमा होती है उस के भीतर ही चर्चा हो.

वैल्कम डिनर

आप अपने नए पड़ोसी को अपने घर बुला कर एक वैल्कम डिनर भी दे सकती हैं. अगर आप को उन की डाइट की चिंता है, तो आप पहले से ही उन की पसंदनापसंद पूछ कर उन के मुताबिक खाना बना सकती हैं. उन को पहले से ही आश्वस्त करें कि यह डिनर कैजुअल है. उन्हें कुछ भी गिफ्ट लाने की कोई आवश्यकता नहीं है.

इन टिप्स पर गौर कर आप जल्द ही पाएंगी कि अपने पड़ोसी से आप ने अच्छी दोस्ती कर ली है और किसी जरूरत के वक्त आप अकेली नहीं हैं.

40 के बाद भी कुछ इस तरह दिखें जवां

बेशक महिला हमेशा खूबसूरत और जवां दिखना चाहती हैं, लेकिन उम्र बढ़ना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसे रोका नहीं जा सकता. हालांकि मेकअप ऐसा विकल्प है, जो चेहरे से कुछ साल तक की उम्र छिपा सकता है, लेकिन चेहरे पर हमेशा मेकअप लगा कर रखना भी संभव नहीं है. 40 की उम्र पार होते ही चेहरे पर बढ़ती उम्र की लकीरें नजर आनी शुरू हो जाती हैं, जो 50 तक पहुंचतेपहुंचते गहरी होती जाती हैं. लेकिन उम्र बढ़ने के बावजूद चमकती और कसी हुई त्वचा सभी की चाहत होती है.

आमतौर पर लोग सुंदरता को कायम रखने के लिए घरेलू उपाय अपनाते हैं, लेकिन अगर घरेलू उपायों के साथ ही आज के नए जमाने की ब्यूटी टैक्नीक का भी सहारा लिया जाए तो लंबे समय तक सैलिब्रिटीज जैसी खूबसूरती बरकरार रह सकती है, जो उम्रदराज होने पर भी अपनी उम्र से छोटी नजर आती हैं. इतना ही नहीं, इस तरह की तकनीक से त्वचा की रंगत भी उजली की जा सकती है, जिसे कई बौलीवुड ऐक्ट्रैस अपना चुकी हैं. इस के लिए आप को किसी ऐक्सपर्ट और ऐक्सपीरियंस्ड डर्मैटोलौजिस्ट और कौस्मैटोलौजिस्ट का चयन करना होता है, जो आप की त्वचा और उम्र के हिसाब से उचित तकनीक का प्रयोग करे.

आइए, जानते हैं कि 40 के पार की महिलाओं के लिए कौनकौन सी आधुनिक तकनीकें उपलब्ध हैं:

त्वचा की कसावट के लिए बोटोक्स: बोटोक्स का इंजैक्शन मसल्स में लगाया जाता है. यह त्वचा पर उभरी झुर्रियों और लकीरों को मिटाने का काम करता है, इसलिए इस से उम्र कम लगने लगती है. हालांकि इस इंजैक्शन का असर स्थाई नहीं रहता. समयसमय पर इसे लगवाते रहना पड़ता है. 30 से 60 साल तक की उम्र के लोग इस का इस्तेमाल कर रहे हैं और 40 से अधिक उम्र के लोगों में इस का प्रचलन अधिक है. इस में एक सिटिंग में 8 हजार से 12 हजार तक का खर्च आता है.

फिलर्स: त्वचा में कसाव लाने व झुर्रियों को मिटाने के लिए फिलर्स का प्रयोग किया जाता है. यह भी एक तरह का इंजैक्शन होता है और त्वचा की ऊपरी सतह को ही छूता है. यह बोटोक्स की तरह त्वचा के अंदर नहीं जाता. इस की सहायता से चेहरे को आकर्षक शेप में लाया जा सकता है.

लेजर थेरैपी: उम्र के हिसाब से बनने वाले त्वचा के दागधब्बे व गड्ढे मिटाने में यह लेजर थेरैपी कारगर साबित होती है. चेहरे के अनचाहे बालों को हटाने के लिए भी इस थेरैपी का प्रयोग किया जाता है.

लाइपोसक्शन: आमतौर पर 40 की उम्र के बाद से शरीर पर चरबी बढ़ने लगती है, जिस की वजह से शरीर का आकार बेडौल नजर आता है. लाइपोसक्शन ट्रीटमैंट चरबी की समस्या से मुक्ति दिलाता है, इसलिए मोटापा से परेशान लोग इस तकनीक का सहारा लेते हैं. इस के तहत एक छोटी सी सर्जरी के जरीए पेट या शरीर के दूसरे हिस्सों से फैट को गलाया जाता है. यह काम कई बार कुछ इंजैक्शनों की मदद से भी किया जाता है. इस ट्रीटमैंट में ज्यादा कष्ट नहीं होता.

स्किन पौलिशिंग: 40 की उम्र तक आतेआते हमारी त्वचा तमाम तरह के पर्यावरण और शारीरिक बदलाव संबंधी असर झेल चुकी होती है. धूप, टैनिंग, पिगमैंटेशन, दागधब्बे, झांइयां, मुंहासे, हर रोज का प्रदूषण और धूलमिट्टी हमारी त्वचा को धूमिल, अस्वस्थ, रूखी और बेजान बना देती है. धूमिल व बेजान हो चुकी त्वचा की ऊपरी परत को हटा कर इसे दोबारा जवां और निखरी बनाने में माइक्रोडर्माऐब्रोजन के जरीए स्किन पौलिशिंग की प्रक्रिया बेहद कारगर साबित होती है. इस प्रक्रिया में त्वचा की मृत कोशिकाओं को हटाने के लिए उस में छोटेछोटे क्रिस्टल डाले जाते हैं और उन्हें तकनीकी तरीके से बेहद सौम्यता से त्वचा पर घुमाया जाता है. यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जो आप की त्वचा को ऐक्फोलिएट और पौलिश करती है और त्वचा की अशुद्धियां निकालने की प्राकृतिक क्षमता को बढ़ाती है. आमतौर पर इसे चेहरे, गरदन, पीठ और हाथों को खूबसूरत, मुलायम और दागरहित बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

औक्सीजन इन्फ्यूजन स्किन थेरैपी: औक्सीजन न सिर्फ हमारे जीवन बल्कि शरीर के सभी अंगों की जीवनरेखा होता है. रक्तसंचार के माध्यम से शरीर के सभी हिस्सों, जिस में त्वचा भी शामिल है, तक औक्सीजन पहुंचता है. यह त्वचा की रिपेयरिंग और नवीनीकरण प्रक्रिया को बढ़ाता है और उसे फ्री रैडिकल्स से मुक्त करने में सहायक होता है. पर्यावरण संबंधी कारणों जैसे कि यूवी रेडिएशन और प्रदूषण का हमारी त्वचा और इस के रिपेयर होने एवं नवीनीकरण की प्राकृतिक क्षमता पर असर पड़ता है. औक्सीजन इन्फ्यूजन थेरैपी में त्वचा के भीतर औक्सीजन की डोज दी जाती है, जिस से इस की रिपेयरिंग और नवीनीकरण की क्षमता बढ़ती है. परिणामस्वरूप त्वचा पर से झांइयां, दागधब्बे हटते हैं और यह जवां और निखरी हुई दिखती है. इस में माइक्रोनीडलिंग जैट का इस्तेमाल करते हुए, त्वचा की अंदरूनी परत में औक्सीजन की डोज दी जाती है. यह प्रक्रिया ठीक उसी तरह से काम करती है, जैसे त्वचा के ऊपर लगाया गया कोई नमी बढ़ाने वाला तत्त्व अथवा सीरम करता है.

ब्रोलिफ्ट: ब्रोलिफ्ट यानी भौंहों को तीखापन देने के लिए भी बोटोक्स का इस्तेमाल किया जाता है. बोटोक्स जब किसी मांसपेशी में लगाया जाता है, तब यह मांसपेशी को आराम पहुंचाता है और वहां की बारीक रेखाएं और झुर्रियां हटाता है. आईब्रोज का आकार ठीक करने के लिए जब इस का इस्तेमाल होता है तब डाक्टर उन मांसपेशियों में बोटोक्स लगाते हैं, जिन के चलते भौंहें नीचे की ओर झुकी होती हैं. इस से भौंहों को ऊपर खींचने वाली मांसपेशी फांटेलिस सही ढंग से काम करती है. इस प्रक्रिया में सिर्फ कुछ मिनटों का ही समय लगता है और बेहद आसानी से भौंहों को आर्च शेप दे कर चेहरे को आकर्षक बना दिया जाता है.

त्वचा की चमक के लिए फिलर्स: उम्र बढ़ने पर प्रतिदिन के काम और औफिस व परिवार की जिम्मेदारी निभाना काफी थका देने वाला होता है. साथ ही मौसम की मार, नींद पूरी न होने और खराब खानपान से भी त्वचा पर खराब असर पड़ता है. परिणामस्वरूप त्वचा अपनी प्राकृतिक चमक खो देती है और उस पर बारीक रेखाएं नजर आने लगती हैं. ह्यालुरौनिक ऐसिड बेस्ड फिलर जैसे कि जुवेडर्म रिफाइन का एक सैशन त्वचा की खोई रंगत और चमक लौटा सकता है. अगर त्वचा का उभार कम हो गया है, तो जुवेडर्म वौल्यूमा अपने हाइड्रेटिंग और फिलिंग ह्यालुरौनिक ऐसिड जैल के गुणों से इसे वापस जवां बना देता है. यह प्रक्रिया आंखों के नीचे से काले घेरे व बारीक लाइनें हटाने और आप के होंठों को दिलकश बनाने के लिए भी इस्तेमाल की जा सकती है.

स्किन लाइटनिंग: स्किन लाइटनिंग के जरीए फ्रैश और ग्लोइंग लुक आसानी से मिल सकता है. त्वचा के प्रकार के अनुसार डाक्टर यह सुनिश्चित करता है कि स्किन लाइटिंग के लिए किस प्रकार की प्रक्रिया जैसे टौपिकल कौस्मैटिक, कैमिकल पील या लेजर का प्रयोग किया जाएगा. स्किन लाइटनिंग ट्रीटमैंट की शुरुआत से पहले उस के फायदे और साइट इफैक्ट की जानकारी भी ले लेनी जरूरी होती है. ऐडवांस स्किन लाइटिंग ट्रीटमैंट के लिए स्किन टाइप के अनुसार 5-6 सैशन की आवश्यकता होती है. ट्रीटमैंट के कुछ दिनों बाद ही आप को अपनी त्वचा हलकी और उजली नजर आने लगेगी. इस के साथ ही अगर किसी को ऐक्ने, ओपन पोर्स, झुर्रियों या फोटो डैमेज जैसी समस्या है, तो लाइनिंग इफैक्ट के कारण इस में काफी फायदा नजर आएगा. ऐडवांस लेजर में विभिन्न प्रकार के पील्स और कौमेलन ट्रीटमैंट का प्रयोग किया जाता है.

ऐंटीऐजिंग: ऐंटीऐजिंग थेरैपी ओवरऔल फिजिकल कंडीशन को इंपू्रव करती है. परिणामस्वरूप थकान कम महसूस होती है. चाल और पोस्चर में परिवर्तन आता है और कार्यक्षमता बढ़ती है. ऐंटीऐजिंग ट्रीटमैंट के अंतर्गत चेहरे और शरीर के कुछ लक्षणों जैसे फाइन लाइंस, झुर्रियां, ऐज स्पौट, अनईवन स्किन टोन आदि का उपचार किया जाता है.

इलैक्ट्रोलिसिस: इस विधि के जरीए अनचाहे बालों को पूरी तरह जड़ से निकाल दिया जाता है. इस में एक बहुत महीन इलैक्ट्रिक सूई को बालों के रोम में डाल देते हैं, जो बालों को जला कर बाहर निकाल देती है. यह प्रक्रिया महंगी है और इसे विशेषज्ञ से ही करवाएं. जरा सी गलती आप की त्वचा खराब कर सकती है.

लेजर तकनीक: अनचाहे बालों को लेजर द्वारा स्थाई तौर पर हटाया जा सकता है. इस में लगभग 7 से 8 सिटिंग्स लगती हैं. लेजर हेयर रिमूवल की प्रक्रिया में हेयर फौलिकल्स को स्थाई रूप से हटा दिया जाता है. हेयर फौलिकल या बालों की जड़ ही वह जगह होती है जहां से बाल दोबारा उग जाते हैं. यही कारण है कि शेविंग या वैक्सिंग के बाद दोबारा बाल आ जाते हैं. इस प्रक्रिया में हाई ऐनर्जी वाले लेजर का इस्तेमाल कर के हेयर फौलिकल्स को स्थाई रूप से खत्म कर दिया जाता है. ऐसे में बाल वापस नहीं आते हैं. यह प्रक्रिया कई सिटिंग्स में पूरी होती है.

अनचाहे बालों के लिए: अनचाहे बाल महिलाओं की एक आम समस्या हैं. इन को हटाने के तमाम उपाय किए जाते हैं, लेकिन ये दोबारा आ जाते हैं. अनचाहे बालों से छुटकारा पाने के लिए ऐसे उपाय अपनाने चाहिए, जिस से आप की त्वचा को भी कोई नुकसान न पहुंचे और आप की खूबसूरती भी बरकरार रहे. अनचाहे बालों को हटाने का एक बहुत ही लाभकारी और सब से ज्यादा इस्तेमाल में आने वाला तरीका है वैक्सिंग. वैक्सिंग से अनचाहे बाल पूरी तरह साफ हो जाते हैं और त्वचा मुलायम हो जाती है. चेहरे के बाल हटाने के लिए कटोरी वैक्सिंग की जाती है. वैक्सिंग के बाद बाल लंबे समय तक दोबारा नहीं आते, क्योंकि इस में बालों को त्वचा के अंदर से जड़ों से निकाला जाता है.

– डा. रोहित बतरा

फेसबुक की दोस्ती में तबाह हुआ परिवार

28 साल की अर्चना को जेल में एक सप्ताह तक का समय बीत चुका था. उसे अपने किये काम पर अब तक कोई पछतावा नहीं हुआ था. 8 वें दिन उसे पता चला कि जेल में बंद उसके साथी अजय से मिलने उसका भाई आया था. जो जेल में उसके लिये जरूरत का सामान लाया था. जिसमें मंजन, दांत साफ करने का ब्रश और कपडे जैसे जरूरत के छोटे छोटे सामान थे. 22 जनवरी को जब पुलिस ने अर्चना को अपने पति 40 साल के ओमप्रकाश यादव और 4 साल के बेटे नितिन की हत्या के आरोप में पकडा तो कुछ समय तक अर्चना के पिता और दूसरे संबंधी उसके बचाव की कोशिश कर रहे थे. पुलिस ने जब अर्चना और अजय को पकड कर कचहरी में मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया तो वहां केवल अर्चना की बहनें ही साथ थी. थाना और कचहरी तक अर्चना ने खुद को संभाल रखा था. जेल में समय बीता तो उसे लगा कि अब पूरी दुनिया में उसका कोई नहीं है. उस दिन अर्चना फूटफूट कर रोई.

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले की रहने वाली अर्चना यादव की शादी ओमप्रकाश यादव से हुई थी. ओमप्रकाश गोरखपुर में आंखों के डाक्टर थे. अर्चना से उनकी दूसरी शादी थी. अर्चना का घरेलू काम में मन नहीं लगता था, वह राजनीति में अपना कैरियर बनाना चाहती थी. इसके लिये वह प्रयास करने मे लगी थी. अर्चना अपने खाली समय में सोशल मीडिया में काफी एक्टिव रहती थी. फेसबुक और वाट्सअप पर उसने कई दोस्त बना रखे थे. इनमें शिकोहाबाद का रहने वाला अजय यादव भी था. अजय ने अपने फेसबुक पर मुलायम सिंह यादव, शिवपाल, डिंपल और अखिलेश यादव के साथ अपनी फोटो लगा रखी थी. अजय अपने को मुलायम सिंह यादव यूथ बिग्रेड का सचिव बताता था. अर्चना ने उसे देखकर दोस्ती कर ली. फेसबुक से शुरू हुई यह दोस्ती फोन वाट्सअप से होते हुये शारीरिक संबंधों तक पहुच गई. अजय ने अर्चना को कहा था कि वह समाजवादी पार्टी में उसको जगह दिला देगा.

अर्चना के स्वभाव को उसका पति पंसद नहीं कर रहा था. वह बारबार अर्चना को मना कर रहा था. इससे अर्चना को परेशानी होने लगी. इससे दोनो के बीच टकराव होने लगा अजय से दोस्ती के बाद पति से अर्चना दूरियां बढ रही थी. 20 जनवरी को पति और और बेटे की हत्या करने के बाद अर्चना ने आरोप दूसरे पर लगाने शुरू किये. पुलिस ने फोन की जांच और दूसरे सबूतों के आधर पर अर्चना और अजय को जेल भेजा. अर्चना से जब यह सवाल किया गया कि तो उसने कहा ‘मेरा बेटा था मैने मार दिया’. जेल में रहने के बाद अब अर्चना को अपने किये पर पछतावा हो रहा है. अर्चना ने अपने मित्र अजय का बचाव करने का प्रयास भी किया. अब ऐसा पछतावा करने से क्या लाभ?

सरकार का किसानों को फसल बीमा का तोहफा

सरकार ने नए साल के मौके पर देश के किसानों को खास तोहफा दिया है. इस का लाभ देश भर के 14 करोड़ किसान उठा सकेंगे. सरकार की इस घोषणा से मकर संक्रांति व पोंगल जैसे त्योहारों पर किसानों की खुशी दोगुनी हो गई.

नई फसल बीमा योजना को ले कर सरकार पूरी सावधानी बरत रही है, ताकि इस योजना का हश्र भी पिछली योजनाओं जैसा ही न हो जाए. पिछले 3 दशकों से चलाई जा रहीं अलग अलग फसल बीमा योजनाएं केवल 23 फीसदी किसानों तक ही पहुंच पाई हैं. इन योजनाओं में ज्यादातर उन किसानों को ही शामिल किया गया है, जिन्होंने बैंकों से कृषि लोन लिया था. इसलिए इसे फसल बीमा की जगह बैंक ऋण बीमा योजना के तौर पर ही जाना गया. प्रस्तावित मसौदे में सभी किसानों को शामिल करने के लिए इस का दायदा बढ़ाया गया है. सरकार का अनुमान है कि प्रस्तावित नई फसल बीमा योजना में 50 फीसदी से अधिक किसान शामिल हो जाएंगे. इस के लिए बीमा प्रीमियम का 90 फीसदी से अधिक हिस्सा केंद्र व राज्य सरकारें वहन करेंगी. बीमा योजना की घोषणा के बाद सब्सिडी का बोझ देख कर राज्य सरकारें विरोध जता सकती हैं. किसानों को प्रीमियम के रूप में बीमित राशि का डेढ़ से ढाई फीसदी ही देना होगा.

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