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प्रतिक्रिया

उम्र के 45 साल भी पूरे नहीं हुए कि मैं ब्लडप्रैशर, शुगर की दयादृष्टि का पात्र बन गया. लाख काबू पाने की कोशिश करता हूं मगर ब्याहता बीवी की तरह ये मेरा साथ छोड़ने को तैयार ही नहीं. उस पर लोगों की नसीहतें और परहेज, डाक्टर की दवाएं, इन सब ने मिल कर मुझे ज्यादा बीमार बना दिया.

पत्नी एक आदर्श ब्याहता का फर्ज निभाती, उन सब नसीहतों का पालन करती, बल्कि मुझ से जबरन पालन करवाती. करेले का जूस, करेले की सब्जी, सोयाबीन, इन सब को झेलझेल कर मेरी खानेपीने की इच्छाशक्ति ही लुप्त हो रही थी, इस पर मेरे वजन को ले कर डाक्टर ने मुझे घूमनेफिरने की हिदायत दे डाली. चैन की नींद जो आज तक नसीब होती थी, उस के भी अब लुप्त होने की आशंका थी.

‘‘अरे-रे…अब तो बख्शो मुझ गरीब को,’’ मैं विचारों में खोया था कि देखा पत्नी फिर से नाश्ते में करेले की सब्जी, मेथी की रोटी मेरे सामने ले आई.

‘‘क्यों जी, क्या बुराई है इन सब में? क्या पकड़े ही रखोगे मेरी इन सौतनों को,’’ वह दवा की शीशी हाथ में नचाते हुए बोली.

तभी मेरा बेटा जिम में पसीना बहा कर मेरे कमरे में आया. मां के सुर में सुर मिलाने की कमी थी शायद.

‘‘डैडी, मम्मी ठीक कहती हैं, मेरे दोस्तों के फादर आप से भी ज्यादा उम्र के हैं, मगर फिटनैस के मामले में जवानों को भी पछाड़ते हैं.’’

‘‘बेटा, तू कल से जिम छोड़, अपने डैडी को मौर्निंग वाक पर ले जाया कर. वैसे भी डाक्टर बता रहे थे कि सुबहशाम की सैर इन के लिए अच्छी है,’’ पत्नी ने अपनी शुभ राय अपने होनहार बेटे को देते हुए कहा.

अगले दिन से यह अभियान भी शुरू हो गया. मेरा श्रवण बेटा, जो सिर्फ मां का ही आज्ञाकारी था, पिता की आज्ञा का पालन जो कभीकभी, वह भी जेब ठंडी होने पर ही करता था, मुझे 5 बजे उठा कर पास के ही गार्डन में ले गया. 2-4 दिन की जद्दोजहद के बाद मुझे इस आदत को अपनाना पड़ा.

उस दिन मेरे श्रवण बेटे को दूसरे शहर जाना पड़ा. इसलिए, पत्नी ने मुझे उठाया और आनाकानी करने पर दरवाजे से बाहर धकेल दिया. अंदर से दरवाजा बंद कर लिया. मरता क्या न करता, जाना पड़ा. मगर सुबह की ठंडी हवा बैंच पर बैठते ही मुझ पर हावी हो गई और मन में एक झपकी और लेने की सोची. वैसे भी आज मेरे साथ कोई रोकनेटोकने वाला नहीं था. मगर तभी एक मधुर आवाज मेरे कानों में पड़ी.

‘‘हैलो अंकल,’’ नजर उठाई तो देखा 20-21 वर्ष की सुंदर सी बाला जौगिंग सूट में मुझ से ही मुखातिब थी.

‘‘हैलो…’’ मैं झेंप मिटाते हुए इधरउधर देखते हुए बोला. इस से पहले मैं ने उसे यहां नहीं देखा था या फिर वह मुझे नजर ही नहीं आई थी.

‘‘कमऔन अंकल,’’ वह हाथ का इशारा करते हुए आगे बढ़ गई और साथ ही मुझे मुड़मुड़ कर देखती रही, उठने का इशारा करती रही. मैं शर्म से पानीपानी हो रहा था. आलस्य ने आज मेरी चुगली कर दी थी. मैं झेंप मिटाने के लिए वहीं खड़ा बंदर की तरह उछलकूद करता रहा. आगे बढ़ने की हिम्मत जुटा ही न सका.

अगले दिन फिर वही रुटीन, वह मुझे आज भी वहीं मिली. दौड़तेदौड़ते वह मेरे पास आ कर रुक गई.

‘‘हाय अंकल,’’ वह मेरे साथसाथ तेज कदमों से चलती हुई बोली. साथ ही बातों का सिलसिला भी चलता रहा. मगर मुझे उस का बारबार अंकल कहना अखरता रहा.

‘‘बाय द वे, मुझे रजत शर्मा कहते हैं,’’ मैं ने उस की बात बीच में काटते हुए कहा, ‘‘आप चाहें तो मुझे रजत या फिर शर्माजी कह सकती हैं.’’

वह मेरी इस बात पर मुसकराई. अगले दिन मैं अपने बेटे से पहले ही उठ कर तैयार हो गया. शाम को मैं ने बालों को डाई किया था. अपनेआप को बारबार आईने में देखा. अपनी छोटीछोटी कमियों को दूर किया. जैसे, मूंछ में सफेद 2-4 बाल न दिखें और ऐसी ही छोटीछोटी कई कमियां. अब तो रोज सुबह होने का इंतजार रहता है. मैं और खुशी अच्छे दोस्त बन रहे थे. पत्नी और बेटा मेरे इस व्यवहार से कुछ संदिग्ध तो थे, मगर खुश थे. 1 महीने में ही मेरा पेट दिखना बंद हो गया था और शरीर में नई जान आ गई थी. शुगर और बीपी भी नौर्मल हो गए थे.

उस दिन मेरे बेटे का जन्मदिन था. उस के सभी दोस्त आ गए थे. मैं ने भी सोचा कि बेटे को मुंहतोड़ जवाब दूं. उसे और उस की मां को खुशी से मिलवाऊं. उस दिन बड़े जोरशोर से औरों की फिटनैस का बखान कर रहे थे. उन्हें भी तो पता चले मेरी ‘मार्केट वैल्यू’ और उस समय उन की प्रतिक्रिया देख कर मैं भी खुश होना चाहता था. मगर खुशी उस दिन सुबह गार्डन में दिखी ही नहीं. उस का फोन नंबर लेने के बारे में कभी सोचा ही नहीं था. मगर आज यह बात मुझे अपनी बेवकूफी लगी. मन उदासी से भर गया. आफिस में भी काम में मन नहीं लगा. शाम को सभी पार्टी की तैयारी में व्यस्त थे तभी ‘हैलो शर्माजी’ सुन कर मैं पीछे पलटा. सामने खुशी मुसकरा रही थी. तभी मेरा बेटा खुशी के पीछे आ खड़ा हुआ. डैड, यह है खुशी, माय फ्रैंड और दोनों ही एकदूसरे की ओर देख मुसकरा दिए. अब मेरी प्रतिक्रिया देखने लायक थी

उस का सच

उस के बारे में सुन कर धक्का तो लगा, किंतु आश्चर्य नहीं हुआ. कोसता रहा खुद को कि क्यों नहीं लिया गंभीरता से उस की बातों को मैं ने?

बीता वक्त धीरेधीरे मनमस्तिष्क पर उभरने लगा था…

लगभग 6 दशक से अधिक की पहचान थी उस से. पहली कक्षा से पढ़ते रहे थे साथसाथ. दावे से कह सकता हूं कि उस के दांत साफ करने से ले कर रात को गरम प्याला दूध पीने की आदत से परिचित था. उस की सोच, उस के सपने, उस के मुख से निकलने वाला अगला शब्द तक बता सकता था मैं.

पिछली कई मुलाकातों से ऐसा लगा, शायद मैं उसे उतना नहीं जानता था जितना सोचता था. हम दोनों ने एक कालेज से इंजीनियरिंग की. समय ने दोनों को न्यूयौर्क में ला पटका. धीरेधीरे मकान भी दोनों ने न्यूयौर्क के क्वींज इलाके में ले लिए. रिटायर होने के बाद धर्मवीर 10-12 मील दूर लौंग आईलैंड के इलाके में चला गया. तब से कुछ आयु की सीमाओं और कुछ फासले के कारण हमारा मिलनाजुलना कम होता गया.

पिछले 2 वर्षों में जब भी वह मुझ से मिला, उस में पहले जैसी ऊर्जा न थी. चेहरा उस का बुझाबुझा, बासे सलाद के पत्तों की तरह. उस की आंखों में जगमगाते दीये के स्थान पर बिन तेल के बुझती बाती सी दिखाई दी, जैसे जीने की ललक ही खो दी हो. उसे जतलाने की हिम्मत नहीं पड़ी. किंतु मैं बहुत चिंतित था.

एक दिन मैं ने उस के यहां अचानक जा धमकने की सोची. घंटी बजाई, दरवाजा पूरा खोलने से पहले ही उस ने दरवाजा मेरे मुंह पर दे मारा. मैं ने अड़ंगी डालते कहा, ‘अरे यार, क्या बदतमीजी है. रिवर्स गियर में जा रहे हो क्या? लोग तो अंदर बुलाते हैं. गले मिल कर स्वागत करते हैं. चायपानी पिलाते हैं और तुम एकदम विपरीत. सठियाये अमेरिकी बन गए लगते हो. अपना चैकअप करवाओ. ये लक्षण ठीक नहीं. देख, अभी शिकायत करता हूं,’ इतना कह कर मैं ‘भाभीभाभी’ चिल्लाने लगा.

‘क्यों बेकार में चिल्ला रहा है, तेरी भाभी घर पर नहीं है.’

‘चलो मजाक छोड़ता हूं. यह बताओ, हवाइयां क्यों उड़ी हैं? चेहरा देखा है आईने में? ऐसे दिखते हो जैसे अभीअभी तुम ने कोई डरावना सपना देख लिया हो. तुम्हारा ऐसा व्यवहार? समझ से बाहर है.’

‘बस, यार. शर्मिंदा मत करो.’

‘ठीक है. उगल डालो जल्दी से जो मन में है वरना बदहजमी हो जाएगी.’

‘कोई बात हो तो बताऊं?’ इतना कहते ही उस की आंखें भर आईं.

‘धर्मवीर, कभी ध्यान से देखा है खुद को, कितना दुबला हो गया है?’

‘दुबला नहीं, कमजोर कहो, कमजोर? कमजोर हो गया हूं.’

‘यार, कमजोर तो तू कभी नहीं था.’

‘अब हो गया हूं. कायर, गीदड़ बन गया हूं.’

‘किसी चक्करवक्कर में तो नहीं पड़ गया?’ मैं ने मजाक में कहा.

‘दिमाग तो ठीक है तेरा? तू भी वही धुन गुनगुनाने लगा. आजकल तो यह हाल है, झूठ और सच की परिभाषाएं बदल चुकी हैं. अज्ञानी ज्ञान सिखा रहा है. कौवा राग सुना रहा है. झूठों का बोलबाला है. कुकर्म खुद करते हैं, उंगली शरीफों पर उठाते हैं. तू तो जानता है, मेरा जमीर, मेरे कर्तव्य, मेरे उसूल कितने प्रिय हैं मुझे,’ इतना कहते ही उस के चेहरे पर उदासी छा गई.

‘हां, अगर ऐसी बात है तो चल, कहीं बाहर चल कर बात करते हैं.’

धर्मवीर ने पत्नी के नाम एक नोट लिखा, चाबी जेब में डाली और दोनों बाहर चल पड़े. सर्दी का मौसम शुरू हो चुका था. न्यूयौर्क की सड़कों पर कहींकहीं बर्फ के टुकड़े दिखाई दे रहे थे. सर्द हवाएं चल रही थीं. दोनों कौफीहाउस में जा कर बैठ गए और 2 कौफी मंगवाईं.

‘धर्मवीर, अब बताओ तुम ने दरवाजा क्यों बंद किया?’

‘हरि मित्तर, बात ही कुछ ऐसी है, न तो तुम्हें समझा सकूंगा और न ही तुम समझ पाओगे. तुम्हारे आने से पहले ‘वह’ आई थी. उस की झलक पाते ही बर्फ सा जम गया था मैं. बस, दे मारा दरवाजा उस के मुंह पर. ऐसी बेरुखी? इतनी बदतमीजी? क्यों की मैं ने? यह मेरी सोच से भी बाहर है. शर्मिंदा हूं अपनी इस हरकत पर, कभी माफ नहीं कर सकूंगा स्वयं को?

‘छीछीछी, नफरत हो रही है खुद से? सोचता हूं अगर मैं उस की जगह होता तो मुझे कैसा लगता? उस क्षण बुद्धि इतनी भ्रष्ट हो गई थी कि पूछा तक नहीं कि क्या काम है? क्या चाहिए? क्यों आई हो? हो सकता है पत्नी से कोई जरूरी काम हो? जीवन के इस पड़ाव में इतनी गुस्ताखी? क्या उम्र के साथसाथ नादानियां भी बढ़ती जाती हैं? सोच की शक्ति कम हो जाती है क्या? यह दोष बुढ़ापे पर भी नहीं मढ़ सकता. शेष इंद्रियां तो अक्षत (सहीसलामत) हैं. शायद भीरु हो गया हूं. चूहा बन गया हूं. बदतमीजी एक नहीं, दो बार हुई थी. 2 मिनट बाद ‘वह’ फिर अपनी सहेली को साथ ले कर आई. हाथ में कुछ किताबें थीं. लगता था सहेली कार में बैठी थी. मैं ने फिर वही किया. दरवाजा पूरा खोलने से पहले ही उस के मुंह पर दे मारा. बचपन से सीखा है अतिथियों का सम्मान करना. अभी बड़बड़ा ही रहा था कि फिर घंटी बजी. मैं दरवाजे तक गया. दुविधा में था. हाथ कुंडी तक गया, दरवाजा खोलते ही बंद करने ही वाला था कि तुम ने अड़ंगी डाल दी.’

‘यार यह ‘वह’ ‘वह’ ही करता रहेगा या कुछ बताएगा भी कि यह ‘वह’ शै है क्या?’

‘छोड़ यार, बेवजह किसी औरत का नाम लेना मैं ठीक नहीं समझता. जब हम क्वींज छोड़ कर लौंग आइलैंड में आए, सभी पड़ोसियों ने धीरेधीरे ‘कुकीज’ आदि से अपनाअपना परिचय दिया. उन में एक पड़ोसन ‘वह’ भी थी. थोड़े ही समय में उस का सरल निश्छल व्यवहार देख कर तुम्हारी भाभी की उस से दोस्ती हो गई. उन पतिपत्नी का हमारे यहां आनाजाना शुरू हो गया. निशा से यह बरदाश्त नहीं हुआ.’

‘यह निशा कौन है?’

‘दरअसल तुम्हारी भाभी की बचपन की सहेली है. उसी के कारण हम लौंग आइलैंड आए थे. जिस का बूटा सा कद, कसरत करने वाले गेंद की गोलाई सा शरीर और अल्पबुद्धि एवं उद्देश्य, सब के ध्यान का केंद्र बने रहना. जैसे सोने पे सुहागा. रानी मधुमक्खी निशा कैसे बरदाश्त कर सकती थी अपने राज्य क्षेत्र में किसी और का आगमन? उसे अपने क्षेत्र में खतरा लगने लगा. उस ने तुम्हारी भाभी के मस्तिष्क में शंकारूपी विष के डंक मारने शुरू कर दिए. वह विष इतना फैला कि नासूर बन गया.’

‘धर्मवीर, एक मिनट, फोन आ रहा है,’ कह कर मैं फोन सुनने लगा :

‘हां, बोलो मेमसाहब?’

‘जी, कहां रह गए. शाम को विवेक साहब के पास जाना है.’

‘ठीक है, तुम तैयार रहना. मैं 1 घंटे में पहुंच जाऊंगा.’ कह कर मैं फिर से मित्र से मुखातिब हुआ- ‘धर्मवीर, जाना पड़ेगा, हाईकमान का आदेश हुआ है. यह मोबाइल फोन भी जासूस से कम नहीं.’

‘सुनो, भाभी से जिक्र मत करना. तुम्हें तो पता है, औरतें ही सदा हमदर्दी का पात्र बनती हैं. हर तरफ औरतों की ताड़नाओं, अत्याचारों के चर्चे होते रहते हैं. ऐसी बात नहीं कि पुरुष औरतों के अत्याचारों के शिकार नहीं होते. जबान के खंजर पड़ते रहते हैं उन पर और वे चुप्पी साधे हृदय की व्यथा लिए अंधेरों में विलीन हो जाते हैं. न ही कोई उन्हें सुनता है और न ही विश्वास करता है.’

‘धर्मवीर, चिंता मत करो, समय के साथ सब ठीक हो जाएगा. स्थिति को सुधारने की कोशिश करते रहो. चलता हूं, जल्दी मिलेंगे.’

हरि मित्तर से मिल कर धर्मवीर का मन थोड़ा हलका हुआ. घर की दहलीज पार करते ही धर्मवीर की पत्नी ने प्रश्नों की बौछार कर दी.

‘कहां गए थे? बोलते क्यों नहीं? उसी से मिलने गए होगे? शर्म नहीं आती इस उम्र में? पता नहीं क्या जादू कर दिया है उस नामुराद कलमुंही ने?’

‘देखो विमला, तुम चाहती हो तो मैं फिर बाहर चला जाता हूं. तुम्हें जो कहना है, कहो. किसी और को बीच में घसीटने की कोई आवश्यकता नहीं,’ इतना कह कर मैं अपने कमरे में चला गया.

हरि मित्तर से मिले केवल 3 दिन ही हुए थे. धर्मवीर का मन हरि से बातें करने को बेचैन था. उस ने हरि को फोन किया. वह घर पर नहीं था. धर्मवीर ने संदेश छोड़ दिया.

शाम को फोन की घंटी बजी.

‘हां, बोलो हरि?’

‘धर्म, कल क्या कर रहे हो? चलना है कहीं?’

‘कल? कल नहीं, परसों ठीक रहेगा, तुम्हारी भाभी कहीं बाहर जाने वाली है.’

‘ठीक है, परसों जैक्सन हाइट में, वह ‘पायल’ वाला डोसे बहुत अच्छे बनाता है. वहीं मिलेंगे 12 बजे.’

डोसा खातेखाते हरि ने पूछा, ‘धर्मवीर, घर पर हालात कुछ सुधरे या नहीं?’

‘नहीं यार, क्या बताऊं. तुम्हारी भाभी को शंका का घुन लग गया है. उस की सोच अपाहिज हो गई है जो मेरे घर को बरबाद कर के ही रहेगी. निशा अपना काम करती जा रही है.’

‘लगभग 5 दशक दिए हैं इस घर और पत्नी को. शिकायत का कभी अवसर नहीं दिया. अब वही घर जेल लगता है. जहां अब सांस भी आजादी से नहीं ले सकता. अपनी इच्छानुसार वस्तु यहां से वहां नहीं टिका सकता. किसी से खुल कर बात नहीं कर सकता. जहां वर्षों की वफादारी पर विश्वास न कर के, खोखले, ओछे लोगों की बातें पत्थर की लकीर मानी जाती हैं. अब तो उन की ताड़ना के दायरे केवल हम दोनों के बीच ही नहीं रहे, बल्कि सामाजिक स्थलों में, परिचित लोगों के बीच हमें लताड़ना उन का मनोरंजन बन गया है. अब तुम्हीं बताओ, क्या साझेदारी इसे कहते हैं? क्या यही सुखी जीवन है? हरि, तुम भी तो शादीशुदा हो?’

‘धर्मवीर, भाभी तो बहुत पढ़ीलिखी और समझदार हैं, फिर इतनी असुरक्षित भावनाएं क्यों?’

‘हां, सो तो है, किंतु सोच सिमट गई है. क्या फायदा ऐसी पढ़ाई का, जिस की रोशनी में जीवन का रास्ता साफसाफ नजर आने के बावजूद आदमी उस पर चल न सके. घूमफिर कर शक की आग में खुद और दूसरों को भस्म करने की ठान ले.’

‘विश्वास नहीं होता. आज तक जब भी कहीं आदर्श दंपती का संदर्भ आता है, वहां तुम दोनों का उदाहरण दिया जाता है. स्थिति नाजुक है, बहुत समझदारी से काम लेना होगा. इतने वर्षों की साधना को हाथों से फिसलने मत देना. प्यार से समझाने का प्रयत्न करो.’

‘समझाऊं? किसे समझाऊं? जो सुनने को तैयार नहीं? जिस के लिए अर्थों की सारी ऊहापोह अब बासी हो गई है. स्थिति अब यह है कि मैं मुंह तक आए शब्द निगलने लगा हूं. किस के पक्ष में हथियार डालूं? सचाई के या उस झूठ के, जो मेरे घर में अशांति पैदा कर रहे हैं? सखी निशा का तो यह हाल है, अंगूर नहीं मिले तो खट्टे हैं. निशा की उकसाने की खुराकें तुम्हारी भाभी के चित्र पर पत्थर की लकीरें बन गई हैं, जैसे परमानैंट मार्कर से लिखी हों. निशा की बातों को ले कर उन के मन और मस्तिष्क को कुंठा की धुंध घेरने लगती है. उसी धुंध में झूठ का पल्ला भारी हो जाता है और सच दब जाता है. तुम तो जानते हो, झूठ से हमें कोई हमदर्दी नहीं.’

‘परेशान तो भाभी भी होंगी? पूछो उन से कि ऐसा उन्होंने क्या देखा, या तुम ने क्या किया? हर पल तो उन्हीं के पास बैठे रहते हो?’

‘जरूर होती होगी. कुछ देखा हो तो बताएं. कभीकभी तो अचानक उस के भीतर तूफानी तूफान करवटें ले बैठता है. तब वह जहान भर का अनापशनाप बोलने लगती है. कहीं का सिर, कहीं का धड़, मनगढ़ंत किस्से-लोग बातें करते हैं, तुम्हारी छवि खराब होती है, वगैरावगैरा. बस, मुंह खोलते ही चुभते कटाक्ष, काल्पनिक गंभीर इल्जाम मुझ पर थोपने आरंभ कर देती है. उस समय उस की बातों के गुलाब कम और कांटे अधिक मेरे दिल पर खरोंचें छोड़ जाते हैं.

‘मैं एक बार फिर चुप्पी साध लेता हूं. फिर कभी पास आ कर बैठ जाती है. कभी आधी रात को मेरे कमरे में आ कर पूछती है, आप ने बात करना क्यों छोड़ दिया? मुझे अच्छा तो नहीं लगता. पर बात भी क्या करूं, उन्हें मेरे शब्दों की अपेक्षा ही कहां है?  हजार बार कह चुका हूं, विमला, तुम्हारे सिवा कभी किसी को नहीं चाहा. मैं रिश्तों की अहमियत जानता हूं. पूरा जीवन तुम्हें दिया है. अब बचा ही क्या है मेरे पास?

‘कहती है, झूठ बोलते हो. अब तो वही है तुम्हारी सबकुछ? बदनाम कर देगी, तुम्हें? इस्तेमाल कर के छोड़ देगी तुम्हें? तुम नहीं जानते…आदमखोर है आदमखोर.

‘उस दिन मैं ने भी कह दिया, विमला, यह सबकुछ कहने की आवश्यकता नहीं. कैनवास तुम्हारे पास है. रंग तुम्हारे दिमाग में. जैसी चाहो तसवीर बना लो.

‘मैं गुस्से से बड़बड़ाता बाहर चला गया. हरि मित्तर, तुम्हीं बताओ, 70 से ऊपर आयु हो गई है. वैसे भी वर्षों से अलगअलग कमरों में बिस्तर हैं. क्या शोभा देती हैं ऐसी बातें? इस उम्र में अश्लील वाहियात तोहमतें सहता हूं. मेरी पत्नी होते हुए क्या वह नहीं जानती मेरी क्षमता? ऐसी घिनौनी बातें मुझे अंधेरी सुरंग में धकेल देती हैं.’

‘यार, स्थिति गंभीर है. तुम दोनों कहीं छुट्टियों पर क्यों नहीं चले जाते. बच्चों के पास चले जाओ…इस वातावरण से दूर.’

‘सभी उपाय आजमा चुका हूं. मेरे साथ कहीं चलने को तैयार ही नहीं होती. जबर्दस्ती तो कर नहीं सकता. एक आत्मनिर्भर स्वतंत्र अमेरिकी भारतीय नारी है. कुछ पूछते ही बौखला सी जाती है. मेरी हर बात, हर हावभाव, मेरे हर काम में मुझे अपमानित करने के लक्षण ढूंढ़ती रहती है.

‘आजकल तो यह अपने गुप्त समाचार विभाग की बिल्लियों के बहुत गुणगान करती रहती है. वह भूल जाती है कि मैं एक लंबे काल से उस के दुखसुख का साथी, जिसे मक्कार, झूठा, बेईमान, बदमाश, चोर, निर्लज्ज घोषित कर दिया गया है. जैसेजैसे उस के कटाक्ष लंबे होते जाते हैं, मेरे दुख बढ़ते जाते हैं. रही बात बच्चों की, तुम्हीं बताओ, भारतीय अमेरिकी बहुओं के घर भला कितने दिन जा कर रहा जा सकता है?’

‘धर्मवीर, मुझे तुम्हारी चिंता होने लगी है. बस, यही कह सकता हूं कि वार्त्तालाप का रास्ता खुला रहना जरूरी है.’

‘हरि मित्तर, कोशिश तो बहुत करता हूं. पर जब परिचित लोगों के सामने मेरी धज्जियां उड़ाई जाती हैं, लांछन लगाए जाते हैं तब मैं बौखला जाता हूं. बोलता हूं तो मुसीबत, नहीं बोलता तो मुसीबत. इस उम्र में इतना तोड़ डालेगी, वजूद इतना चकनाचूर कर डालेगी, कभी सोचा न था. जब स्थिति की जटिलता बेकाबू होने लगती है, मैं उठ कर बाहर चला जाता हूं या किताबों को उथलपुथल करने लगता हूं. तब दोनों अपनेअपने कोकून में बंद रहने लगते हैं, मानो एकदूसरे को रख कर भूल गए हों. साथ ही तो रह जाता है केवल? दिन बड़ी मुश्किल से गुजरते हैं. जैसे छाती पर कोई पत्थर रखा हो और रातें, जैसे कभी न होने वाली सुबह. कामना करता हूं, इस से अच्छा तो बाहर सड़क पर किसी खूंटी पर टंगा होता. थोड़ा जीवित, थोड़ा मृत. फिर सोचता हूं कहीं दूर भाग जाऊं जहां कम से कम ये लंबे दिनरात कलेजे पर अपना वजन महसूस करते तो नहीं गुजरेंगे. पूरे घर की हवा में उदासी छितरी रहती है. तब एहसास होता है, शायद यह उदासी मेरे मरते दम तक हवा में ही ठहरी रहेगी. तू भली प्रकार से जानताहै कि मेरे भीतर एक कैदखाना है. कैसे भाग सकता हूं यथार्थ से.

‘रही बात से बात कायम रखने की? जरूरत उस की है, मात्र उस की. इन लंबेलंबे दिनों और काली रातों के अटूट मौन में आवाज बनाए रखने की गरज भी उस की है, मात्र उस की. मेरी भावनाओं को कुचल कर चीथड़ेचीथड़े कर दिए हैं उस ने. गरीब हो गया हूं भावनाओं से. सरकतेरपटते रहते हैं मेरे शब्द, बेअसर, सपाट. तुम्हारी भाभी की चेतना सुनती नहीं, मस्तिष्क सोकता नहीं.’

हरि मित्तर ने घड़ी देखते हुए कहा, ‘धर्मवीर, बहुत देर हो गई है. मौसम भी खराब होता जा रहा है. अब चलते हैं. जल्दी ही मिलेंगे.’

धर्मवीर आज सबकुछ उगलने को तैयार था. धर्मवीर की बातें सुन कर हरि का मन भारी हो गया. उसे इस समस्या का कोई हल दिखाई नहीं दे रहा था कि वह कैसे धर्मवीर की सहायता करे.

धर्म को लगा जैसे कोई तो है, जो उसे समझता है. फोन की प्रतीक्षा करतेकरते धर्म ने 4 दिन बाद हरि को फोन किया, ‘हैलो हरि, कैसे हो?’

‘ठीक हूं, और तुम?’

कुछ ही देर में धर्म हरि के द्वार पर था.

‘धर्मवीर, आज तुम मेरे यहां आ जाओ. तुम्हारी भाभी अपने भाई के यहां गई है.’

‘चाय बनाओ, आता हूं.’

‘अंदर आओ धर्म, बैठो. आज मैं तुम्हें अपने इलैक्ट्रौनिक खिलौने दिखाता हूं. यह है मेरा आईपौड और यह ‘वी’ इस में अलगअलग खेल हैं. 4 लोग एकसाथ खेल सकते हैं. जब कुछ करने को नहीं मिलता, हम बूढ़ाबूढ़ी खेलते रहते हैं. या फिर ताश. चलो, एक गेम तुम्हारे साथ हो जाए. ध्यान भी दूसरी ओर जाएगा और समय का भी सदुपयोग हो जाएगा.’

‘नहीं यार, यह मुमकिन नहीं. मुझे समय व्यतीत करने की कोई समस्या नहीं. चलो, अगलीपिछली बातें करते हैं.’

‘धर्मवीर, अभी तक मैं यह समझ नहीं पाया कि तुम इतना कुछ अकेले क्यों सहते रहे? एक बार जिक्र तो किया होता?’

‘चाहता तो था किंतु कब एक शून्य मेरे चारों ओर भरता गया, पता ही नहीं चला. कोई ऐसा दिखाई भी नहीं दिया जिस से ऐसी व्यक्तिगत बात कर सकता, जो मेरे भयावह शून्य को समझता और मेरी बरबादी का कहानी पर विश्वास करता. 2 बार आत्महत्या का प्रयत्न भी किया. मुझे लगा, मुक्ति का रास्ता यही है. जानते हुए भी कि सब अलगअलग अपनीअपनी सूली पर चढ़ते हैं. कोई किसी के काम नहीं आता. किसी का दुख नहीं बांटता. केवल मुंह हिला देते हैं या तमाशा देखते हैं.’

‘धर्मवीर, मेरी तो सोच भी जवाब दे चुकी है. तुम किसी करीब के रिश्तेदार से बात कर के तो देखो या काउंसलिंग की मदद ले कर देखो. घर के वातावरण को सामान्य रखने का प्रयत्न करो. शायद कोई परिवर्तन आ जाए.’

‘हरि, यह भी सुन लो, एक दिन घर पर बहुत मेहमान आने वाले थे. सुबह से तुम्हारी भाभी अपने विरोधी भावों की धूपछांव में अपना कर्तव्य निभाती रही. दिन अच्छी तरह से बीता. शाम की चाय के समय किसी ने पूछ लिया कि तुम्हारी ‘उस’ सहेली का क्या हाल है?

‘‘उस’ शब्द सुनते ही मेरी पत्नी की उनींदी सी सुस्ती एकदम तन गई. उस का कभी न रुकने वाला राग शुरू हो गया. सभी मेहमानों के सामने उस ने मुझ पर अनेक लांछन लगा कर मेरे चरित्र की धज्जियां उड़ा दीं. एक ही झटके में मुझे घर छोड़ने को कहा. सामने बैठे मेरी जिह्वा तालू से चिपकने लगी. एक मौन जमने लगा. मैं चुप. सब चुप. खामोशी का एक पहाड़ और भीतर की उदासी मुझे चुभने लगी. मुझे लगा, शायद यह मौन सदा के लिए हमारे साथ बैठ जाएगा. मैं ने गहरी पीडि़त सांसें लीं. रुदन की अतिशयता से मेरा शरीर कांपने लगा. मैं पसीने से तर हो गया.

‘मेरे सीने में एक बेचैनी सी घर कर गई. अपनी खुद्दारी को इतना घायल कभी नहीं पाया. उस की बातों से ऐसा लगा, मानो अपराधबोध की छोटी सी सूई मन के अथाह सागर में डाल दी गई हो, जो तल में बैठ कर अपना काम करने लगी. उस ने भीतर से मुझे अस्थिर कर दिया. वह लगातार कहर ढाती शब्दावली का बोझ डालती रही. मैं अपने ही घर में कठघरे में खड़ा रहा जिस का प्रभाव मेरे रोजमर्रा के जीवन पर पड़ने लगा.’

‘धर्म, अगर तुम कहो तो मैं भाभी से बात कर के देखूं?’

‘ना-ना, जब से विमला को पता लगा कि हम दोनों हर हफ्ते मिलते हैं, उस ने तुम्हें दलाल के खिताब से सुशोभित कर दिया है. अब अपनी ही नियति में अकेला निशब्द सब सहता जा रहा हूं. मेरे उसूलों की गड्डमड्ड. उस दिन मेहमानों के सामने उस की निर्लज्जता का रूप देख कर मैं सकते में आ गया. वह रूप मेरे मन पर चिपका रहा. मैं चूरचूर हो गया. उसे मेरे टुकड़े भी पसंद नहीं थे. पर टुकड़े तो उसी ने किए थे. उस ने ही मेरे उसूलों को अस्वीकारा और मुझे 2 टुकड़ों में बांट दिया. मैं सफाई के बोझ से दबा पड़ा हूं. न जाने कौन सा मेरा हिस्सा हृदय रोग के हमले के बाद मर जाने वाले हृदयकोष्ट की तरह ठंडा हो गया.’

वह हमारी आखिरी मुलाकात थी. इस के बाद मुझे उस से मिलने का अवसर ही नहीं मिला.

काश उस से मिल पाता. आज इस वक्त मैं धर्मवीर के अंत्येष्टि संस्कार पर उस के घर बैठा खुद को धिक्कार रहा हूं. वह चिल्लाता रहा. मेरा दोस्त मोमबत्ती की तरह पिघलपिघल कर अंधेरों में विलीन हो गया. रहरह कर मुझे उस के शब्द याद आ रहे थे – ‘हरि, मेरे शब्दों की उसे (विमला) अपेक्षा ही कहां थी?’ मेरे भीतर का एहसास कातर पलपल छटपटाता रहा. मैं बोल नहीं पा रहा था पर उस के कहे शब्द बारबार मस्तिष्क को झकझोर रहे थे- ‘तारतार कर देने से वस्तु ही मिट जाती है. और मैं तो टर्रटर्र टर्राता रहा, विमला तुम्हीं को चाहा है, सिर्फ तुम्हीं को. चाहो तो अग्नि परीक्षा ले लो.’

नकली नोटों का सरकारी छापाखाना

पाकिस्तान में भारतीय मुद्रा के नकली नोट छपने की खबरें अकसर आती हैं. ये नकली नोट नेपाल के रास्ते भारत लाए जाते हैं. इस तरह की खबरों से लगभग सभी लोग चौकन्ना रहते हैं और सजगता के साथ बड़े नोट स्वीकार करते हैं. खुद सरकार की तरफ से नोटों की पहचान के बारे में सूचनाएं प्रसारित होती रहती हैं. इस से समाज में नकली नोटों के बारे में खासी जागरूकता आई है. उधर, होशंगाबाद की सरकारी प्रैस में ही नकली नोट छपने की खबर है. यह कर्मचारियों की लापरवाही का परिणाम है लेकिन यह लापरवाही गरीब को भारी पड़ने वाली है.

एक खबर के अनुसार, होशंगाबाद की सरकारी प्रिंटिंग प्रैस में गलती से 20 हजार करोड़ रुपए के 1 हजार मूल्य के नोट बिना सुरक्षा तार के छपे हैं. उन में से 10 हजार करोड़ रुपए के एकएक हजार के नोट बाजार में आ चुके हैं. समय रहते गलती पकड़े जाने पर 6 हजार करोड़ रुपए के 1-1 हजार रुपए के नोट जला दिए गए हैं. इस तरह की स्थिति तबाह करने वाली होती है. जिस व्यक्ति को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है उस से इस तरह की गलती की उम्मीद नहीं की जा सकती. यह बेहद और अतिमहत्त्व की जिम्मेदारी है. यह मानवीय भूल है लेकिन इस तरह की भूल भविष्य में नहीं होगी, यह सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है. 

अब आ गया इंटैलीजैंट कमोड

विज्ञान ने इस कदर हमारे जीवन को बदला है कि आज हम बिना साइंस के एक दिन भी जीने की कल्पना नहीं कर सकते. सुबह के उठने से ले कर शाम को सोने तक हम कहीं न कहीं विज्ञान से जुड़े रहते हैं. लासवेगास में चल रहे कंज्यूमर इलैक्ट्रौनिक शो में जापानी कंपनी टोटो ने इंटैलीजैंट कमोड का प्रदर्शन किया. यह इंटैलीजैंट कमोड पहले अपनेआप को कीटाणुमुक्त करता है, इस के बाद उपयोग करने वाले की सफाई करता है वह भी किसी और की सहायता लिए बिना. औटोमैटिक तरीके से ठंडे या गरम पानी की बौछार से सफाई करता है. मौसम को देखते हुए कमोड में लगे सैंसर उसी तरह के पानी का उपयोग करते हैं. इस्तेमाल के बाद भी आप को फ्लश करने की जरूरत नहीं है, वह भी आप के कमोड सीट छोड़ते ही अपनेआप हो जाएगा.

पेपर लैस सुपर हाइड्रोफिलिसिटी तकनीक पर आधारित यह कमोड पूरी तरह पर्यावरण के अनकूल है और न के बराबर हानिकारक अवशिष्ट निकालता है.

कोहरे से साफ पानी

हमारे यहां तो जैसे ही कोहरा पड़ना शुरू होता है, हवाई उड़ानों, ट्रेनों, सभी पर इस की मार पड़ती है. पर मोरक्को के निवासियों ने इस का नया उपयोग खोज लिया है. ग्रीन टैक्नोलौजी की मदद से वे कोहरे से साफ पानी पैदा कर रहे हैं. साउथ वैस्टन मोरक्को के समुद्र तट के समीप गांवों में ताजे मीठे पानी की किल्लत हमेशा रहती थी. वहां की महिलाओं को मीठे पानी की तलाश में कई मीटर का सफर तय करना पड़ता था. पास में मौजूद पहाडि़यों पर बड़ेबड़े धातु के छोटेछोटे छिद्रों वाले पैनल लगाए गए. उन पैनलों की निचली सतह पर पाइप लगाए गए. कोहरा इन धातु के पैनलों से आर्द्र हवा के कारण छोटीछोटी बूंदों में परिवर्तित हो जाता है.

समुद्र के पास और पहाड़ी पर होने की वजह आर्द्र हवा की उपलब्धता वहां सहज रहती है. पैनल पर स्थित ये बूंदें निचली सतह से होती हुई पाइप में इकट्ठा होती रहती हैं. जहां से लंबे पाइपों द्वारा उन को एक टैंक में स्टोर किया जाता है. जहां से पाइप के माध्यम से इन्हें घरों तक और पशुओं के चारागाहों तक पहुंचाया जाता है. इस विधि से प्राप्त पानी का खर्चा, टैंकर के पानी की तुलना में काफी कम आता है. यह एकदम साफ, स्वच्छ, प्राकृतिक स्रोत से प्राप्त पानी होता है.

फिल्म रिव्यू: क्या कूल हैं हम-3

यह पौर्न फिल्म ‘क्या कूल हैं हम’ की सीक्वल है. पिछली दोनों फिल्मों की तरह ही इस फिल्म में द्विअर्थी संवादों व फूहड़पन की भरमार है. फिल्म को बनाने वालों में किसी जमाने में मशहूर ऐक्टर रह चुके जितेंद्र की पत्नी शोभा कपूर और उन की बेटी एकता कपूर भी शामिल है. इस फिल्म ने अश्लीलता की सारी हदें तोड़ दी हैं. फिल्म का टाइटल भले ही ‘क्या कूल हैं हम’ हो परंतु यह फिल्म ‘क्या हौट हैं हम’ लगती है.

फिल्म की कहानी कन्हैया (तुषार कपूर) और उस के दोस्त रौकी (आफताब शिवदासानी) की है. कन्हैया की हरकतों से तंग आ कर उस का पिता (शक्ति कपूर) उसे घर से निकाल देता है. वह रौकी के साथ मिल कर अपने दोस्त मिकी (कृष्णा) के पास पताया चला जाता है. वहां कृष्णा पौर्न फिल्में बनाता है. एक दिन कन्हैया की नजर शालू (मंदना करीमी) पर पड़ती है, जिसे देखते ही उसे उस से प्यार हो जाता है. शालू अपने पिता (दर्शन जरीवाला) के साथ कन्हैया के घर आना चाहती है. कन्हैया रौकी को बाप बनने को कहता है परंतु मिकी कन्हैया का बाप बन कर उस के घर पहुंचता है. फिर वहां ऐसा घालमेल मचता है कि कन्हैया के 3-3 बाप होते हैं. असली बाप भी पहुंच जाता है. अंत में सारे किरदार समुद्र की रेत में धंस जाते हैं जिन्हें मिकी एअरबैलून के सहारे ऊपर खींच लेता है.

यह फिल्म पिछली दोनों फिल्मों के मुकाबले कमजोर है. पुरानी फिल्मों के सीन और गानों पर फूहड़ ऐक्ंिटग की गई है. हीरोइनों ने कम कपड़े पहन कर अपने उभारों व हावभावों से दर्शकों को रिझाने की कोशिश की है.

तुषार कपूर ने अब तक जितनी भी फिल्में की हैं सब में फ्लौप ही रहा है. आफताब शिवदासानी भी फ्लौप ऐक्टर है. कृष्णा की मौजूदगी कौमेडी नाइट्स से ज्यादा कुछ भी नहीं दर्शाती. फिल्म के संवाद द्विअर्थी और वाहियात हैं. गीतसंगीत बेकार है. छायांकन जरूर अच्छा है. फिल्म ऐसे युवाओं के लिए है जो पौर्न साइटें या अश्लील फिल्में देखना पसंद करते हैं, परिवार वालों के लिए तो कतई नहीं. इस तरह की फिल्मों पर सरकार द्वारा पाबंदी लगानी चाहिए.

फिल्म रिव्यू: चाक एन डस्टर

यह फिल्म शिक्षा के व्यवसायीकरण पर है. फिल्म एकदम सीधीसादी है, कहीं घुमावफिराव नहीं है, फिर भी काफी हद तक मन को छू लेती है. फिल्म अध्यापकों का सम्मान करना सिखाती है. आज के छात्र अपने शिक्षकों को भूल गए हैं. जिन शिक्षकों ने उंगली में कलम पकड़ा कर उन्हें लिखना सिखाया, पढ़ना सिखाया, उन्हें वे कभी हैप्पी बर्थडे तक विश नहीं करते जबकि सैलिब्रिटीज को ‘हैप्पी बर्थडे’ का मैसेज करना नहीं भूलते.

आज के दौर में यह फिल्म इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि आजकल नर्सरी स्कूलों में दाखिलों की चर्चा जोरों पर है. पब्लिक स्कूल वाले दाखिलों को ले कर खूब मनमानी कर रहे हैं. क्योंकि एडमिशन पर अदालतों तक को हस्तक्षेप करना पड़ता है. पब्लिक स्कूलों के रवैए से अभिभावक ही परेशान नहीं हैं, शिक्षकों को भी मैनेजमैंट परेशान करते हैं. उन से जम कर काम तो लिया जाता है परंतु उन की परेशानियों को नजरअंदाज कर दिया जाता है.

यह फिल्म कई मामलों में तो स्कूलों की पोल खोलती है परंतु कुछ मामलों में चुप्पी साध लेती है. बच्चों के ऐडमिशन के मामले में यह अभिभावकों की परेशानियों से मुंह फेर लेती है. फिल्म की कहानी कई हिस्सों में गुदगुदाती है, किरदारों से जोड़ती है, साथ ही कहींकहीं यह सपाट भी हो जाती है. कहानी एक निजी स्कूल की है. अनमोल पारीख (आर्यन बब्बर) स्कूल का ट्रस्टी है. स्कूल की अध्यापिकाओं में विद्या सावंत (शबाना आजमी) और ज्योति ठाकुर (जूही चावला) दोनों अपने छात्रों को मन से पढ़ाती हैं और खूब मेहनत करती हैं.

एक दिन स्कूल की पुरानी प्रिंसिपल इंदुशास्त्री (जरीना वहाब) को हटा कर सुपरवाइजर कामिनी गुप्ता (दिव्या दत्ता) को मैनेजमैंट पिं्रसिपल बना देता है. नई प्रिंसिपल के हिटलरी रवैए से स्कूल की सारी अध्यापिकाएं परेशान हैं. एक दिन कामिनी गुप्ता विद्या की काबिलीयत पर ही प्रश्न उठा देती है और उसे स्कूल से निकाल देती है. कामिनी गुप्ता स्कूल के बच्चों की फीस भी बढ़ा देती है. अध्यापिकाओं की मिलने वाली सुविधाएं भी खत्म कर देती है. विद्या को दिल का दौरा पड़ जाता है. उसे अस्पताल में भरती कराया जाता है. ज्योति ठाकुर खुल कर मैनेजमैंट के खिलाफ खड़ी होती है. उसे भी नौकरी से निकाल दिया जाता है. बात मीडिया तक पहुंचती है. एक न्यूज चैनल की रिपोर्टर भैरवी ठक्कर (रिचा चड्ढा) मामले को उछालती है. मैनेजमैंट मामला रफादफा करना चाहता है.

वह इन दोनों को स्कूल में वापस इस शर्त के साथ लेना चाहता है जब दोनों अपनी काबिलीयत साबित करें. इस के लिए एक क्विज में उन्हें हिस्सा लेना है. जीतने पर इन दोनों को 5 करोड़ रुपए इनाम भी मिलेंगे और मैनेजमैंट माफी मांग कर उन्हें वापस नौकरी पर भी ले लेगा. क्विज में दोनों सभी सवालों के सही जवाब दे कर जीत जाती हैं और उन की वाहवाही होती है. मैनेजमैंट की किरकिरी होती है.

फिल्म की कहानी ठीक है परंतु लगता है कहानी पर ज्यादा मेहनत नहीं की गई है. निर्देशक ने फिल्म में कई सवाल उठाए हैं, मसलन, क्या टीचर्स सम्मान के हकदार नहीं हैं? टीचर्स को आदर तक नहीं मिलता. रिस्पैक्ट सिर्फ पैसे वालों को मिलती है. टीचर्स को परीक्षा भवन में 3 घंटे की ड्यूटी के सिर्फ 25 रुपए मिलते हैं, एकएक परीक्षा की कौपी को चैक करने के लिए 4.25 रुपए मिलते हैं (निर्देशक का यह कहना सही नहीं लगता).

फिल्म का निर्देशन अच्छा है परंतु संवाद सपाट हैं. भावपूर्ण दृश्यों में संवाद असर नहीं छोड़ पाते. शबाना आजमी और जूही चावला की कैमिस्ट्री जमी है. दिव्या दत्ता ने नैगेटिव भूमिका अच्छी तरह की है. फिल्म का क्लाइमैक्स जोरदार है. ऋषि कपूर का क्विज आयोजन मजेदार बन पड़ा है. उस ने ‘कौन बनेगा करोड़पति’ की तर्ज पर क्विज का आयोजन किया है. इस फिल्म के बाद लगता है ऋषि कपूर को छोटे परदे पर भी बहुत से औफर मिलने लगेंगे. फिल्म के गीत शिक्षा से संबंधित ही हैं. उन का फिल्मांकन बढि़या हुआ है. छायांकन अच्छा है.   

 

फिल्म रिव्यू: चौरंगा

फिल्म चौरंगा आम मसाला फिल्मों से अलग है. अगर आप को जमीनी हकीकत वाली फिल्में पसंद आती हैं तो यह फिल्म आप के लिए है वरना आप इस फिल्म में कुछ नहीं पाएंगे. फिल्म के निर्देशक विकास रंजन मिश्रा की यह पहली फिल्म है. निर्देशक ने फिल्म की कहानी को बिहार की पृष्ठभूमि के इर्दगिर्द बुना है. फिल्म उस दौर की बात करती है जब समाज में जाति विभाजन था. दलितों को मंदिरों में जाने नहीं दिया जाता था. वे सवर्णों के कुओं से पीने का पानी नहीं ले सकते थे. सवर्ण उन्हें तो घृणा की दृष्टि से देखते थे लेकिन उन की महिलाओं से जबरन शारीरिक संबंध बनाने में पीछे नहीं रहते थे.

निर्देशक ने दलितों के साथ होने वाले भेदभाव और बरताव को बिना लागलपेट के इस फिल्म में उठाया है. इस के बावजूद फिल्म न तो चौंकाती है न ही दर्शकों पर अपना असर छोड़ पाती है. इस की वजह है दलितों के प्रति समाज में आया परिवर्तन. आज दलितों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार की घटनाएं आम नहीं हैं. यदाकदा ग्रामीण अंचलों में ही होती सुनाई पड़ती हैं.

फिल्म में बहुत सी छोटीछोटी बातों को इशारोंइशारों में कह दिया गया है. कहानी 2 दलित किशोर भाइयों के इर्दगिर्द घूमती है. 14 साल का संतू (सोहम मित्रा) अपने गांव में पालतू सूअर की देखभाल करता है. वह पढ़तालिखता नहीं है. हर वक्त जामुन के पेड़ पर चढ़ा रहता है जबकि उस का भाई बजरंगी (रिद्धि सेन) पढ़ने के लिए स्कूल जाता है. संतू रोजाना स्कूल जा रही गांव के दबंग धवल (संजय सूरी) की बेटी मोना (इना साहा) को देखता रहता है और मन ही मन उस से प्यार करता है. धवल संतू की मां धनिया (तनिष्ठा चटर्जी) के बड़े बेटे बजरंगी की पढ़ाई का खर्च उठाता है. बदले में वह उस से शारीरिक संबंध भी यदाकदा बनाता रहता है. धवल को जब अपनी बेटी के बजरंगी के प्यार में पड़ने की भनक लगती है तो वह बजरंगी को पीटता है जबकि उस के आदमी संतू को पकड़ने के लिए उस के पीछे दौड़ते हैं. बजरंगी को तो मार दिया जाता है जबकि संतू मालगाड़ी के पीछे भागता हुआ उस पर चढ़ जाता है और गांव से दूर निकल जाता है.

इस फिल्म के जरिए निर्देशक ने सिर्फ यही कहने की कोशिश की है कि आज भी देश में रोजाना 2 दलित मारे जाते हैं और हर 4 घंटे में दलित महिला का कहीं न कहीं बलात्कार किया जाता है. ‘चौरंगा’ जैसी फिल्में सिर्फ फिल्म समारोहों के लिए ही बनाई जाती हैं. इस फिल्म को भी देशविदेश के फिल्म समारोहों में प्रदर्शित किया जा चुका है. फिल्म की जम कर प्रशंसा भी हुई है और इसे कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं. फिल्म में 2 बातें मुख्य रूप से दिखाई गई हैं. एक तरफ वासना है. दबंग धवल जब चाहे धनिया से सैक्स कर के अपनी कुंठा को मिटाता है. दूसरी ओर किशोर प्रेम है. किशोरों में सैक्स को ले कर उत्सुकता है. संतू और बजरंगी छिप कर पत्रिका में छपी मौडल्स की तसवीरें देखते हैं और लड़की के वक्षों का विकास कैसे होता है, इस बारे में किताबों से जानकारी प्राप्त करते हैं.

दबंग लोग सिर्फ दलितों की औरतों के साथ ही संबंध नहीं बनाते, वे अपनी पत्नियों तक का दमन करते हैं. फिल्म में धवल की पत्नी के दमन को भी दिखाया गया है. दबंगों के पैर छूना, अपनी वाहवाही कराना गांवों में आम है. इस फिल्म में निर्देशक ने गांव के पुजारी की धूर्तता को भी दिखाया है. वह लगभग अंधा है पर है बड़ा धूर्त. धर्म की आड़ में वह अनैतिक काम भी करता है. फिल्म में इन छोटीछोटी बातों की आड़ में निर्देशक बहुत कुछ कह गया है. फिल्म का निर्देशन अच्छा है. संजय सूरी दबंग धवल की भूमिका में जंचा नहीं है. उस का लुक दबंगों वाला नहीं लगता. तनिष्ठा चटर्जी ने अपनी भूमिका बखूबी निभाई है. सोहम मित्रा ने भी अच्छा काम किया है.

फिल्म का पार्श्व संगीत अनुकूल है. अधिकांश शूटिंग रात को की गई है, इसलिए फिल्म कुछ डार्क भी हो गई है.

फिल्म रिव्यू: एअरलिफ्ट

फिल्म एअरलिफ्ट अक्षय कुमार की चिरपरिचित खिलाड़ीनुमा फिल्मों से कुछ अलग है. यह एक गंभीर फिल्म है और दर्शकों के दिलोदिमाग पर अपना असर छोड़ जाती है, साथ ही स्वार्थ को छोड़ कर अपने देश, देशवासियों के प्रति जज्बे को जगाती है. फिल्म सच्ची घटना पर आधारित है. 1990 में इराक द्वारा कुवैत पर हमला करने के बाद 1 लाख 70 हजार भारतीय कुवैत में फंस गए थे. उन के बिजनैस चौपट हो गए थे, उन के मकान, साजोसामान सब इराकी फौजियों द्वारा नष्ट कर दिए गए थे. कुवैत का शाही परिवार रातोंरात भाग कर वहां से सऊदी अरब चला गया था. भारतीय दूतावास से इन भारतीयों को कोई मदद नहीं मिल पा रही थी. ऐसी मुश्किल घड़ी में कुवैत के एक बिजनैसमैन रंजीत कत्याल (अक्षय कुमार) ने अपने परिवार की परवा न करते हुए उन 1 लाख 70 हजार भारतीयों को वहां से निकालने में मदद की और उन्हें जौर्डन के शहर ओमान तक सुरक्षित पहुंचा कर एअरलिफ्ट कराया.

1990 के इस एअरलिफ्ट अभियान को दुनिया का सब से बड़ा रेस्क्यू अभियान माना जाता है. उस वक्त इंद्र कुमार गुजराल भारत के विदेश मंत्री थे. उन के दखल के बाद ही भारतीयों को कुवैत से निकालने में मदद मिली. निर्देशक राजा कृष्णमेनन ने भारतीय सरकारी तंत्र की पोल खोली है. विदेश मंत्रालय में कार्यरत बाबू कितने गैरजिम्मेदार हैं, साथ ही मंत्री इतनी बड़ी समस्या को बजाय सुलझाने के किस तरह टालमटोल करते हैं, इस का सही खाका फिल्म में खींचा गया है.

फिल्म की सच्ची कहानी ही फिल्म की विशेषता है. फिल्म की यह कहानी कुछकुछ हौलीवुड फिल्म ‘सिंडलर्स लिस्ट’ से मिलतीजुलती है. ‘सिंडलर्स लिस्ट’ की कहानी भी सच्ची घटना पर आधारित थी. इस फिल्म में भी एक जरमन व्यापारी कई यहूदियों को नाजी सैनिकों के अत्याचार से बचाता है और 1 हजार से ज्यादा लोगों को वहां से निकालने में सफल होता है. फिल्म की कहानी में देशभक्ति है. फिल्म में संदेश है कि यह मत सोचो कि देश ने आप के लिए क्या किया, यह सोचो कि आप ने देश के लिए क्या किया.

शुरू से आखिर तक फिल्म पर निर्देशक की पकड़ बनी रहती है. निर्देशक ने कुवैत में युद्ध के हालात को सजीवता से फिल्माया है. इराकी सैनिकों द्वारा लोगों को पकड़पकड़ कर मार डालना, लूटपाट करना, संपत्तियों को नष्ट करना दिखा कर निर्देशक ने सद्दाम हुसैन की फौजों की बर्बरता को दिखाया है. दूसरी ओर एक ऐसे इंसान को दिखाया है जिसे कुवैत छोड़ कर जाने का मौका मिलता है और वह अपनी पत्नी अमृता (निमरत कौर) और बेटी को ले कर कुवैत छोड़ने को तैयार भी हो जाता है परंतु वहां रह रहे 1 लाख 70 हजार भारतीयों को छोड़ कर वह अकेला वहां से जाना नहीं चाहता.

फिल्म को देखते वक्त सिनेमाहौल में दर्शक कई बार तालियां बजा कर अक्षय कुमार की वाहवाही करते नजर आए. फिल्म की समाप्ति पर तो दर्शकों ने खड़े हो कर अक्षय कुमार को सलाम तक किया. फिल्म में आप को अक्षय कुमार के रोल में कोई हंसोड़पन देखने को नहीं मिलेगा, न ही उस के ऐक्शन देखने को मिलेंगे, फिर भी यह फिल्म पूरे परिवार के साथ बैठ कर देखने लायक है. फिल्म में कई पल ऐसे भी आते हैं जब अक्षय कुमार के साथसाथ दर्शक भी भावुक हो जाते हैं. ओमान में लहराते भारतीय झंडे को देख कर अक्षय का भावुक होने का दृश्य ऐसा ही है.

फिल्म में सिर्फ अक्षय ने ही बढि़या काम नहीं किया है, अक्षय की पत्नी की भूमिका में निमरत कौर ने भी आकर्षित किया है. ‘लंच बौक्स’ फिल्म में वाहवाही बटोर चुकी निमरत कौर खूबसूरत भी लगी है. ऐसे मुश्किल हालात में भी निर्देशक ने निमरत कौर के होंठों की लिपस्टिक और बालों की लटों पर खास ध्यान दिया है. मेजर खलाफ बिन जाएद की भूमिका में इनामुल हक की ऐक्टिंग भी अच्छी है. यह किरदार फनी तो है ही, साथ ही इस में खौफ भी है. कूरियन की भूमिका में निनाद कामत ने भी ध्यान खींचा है.

फिल्म का पार्श्व संगीत अच्छा है. फिल्म में शेखों के मनोरंजन के लिए रखे गए एक प्रोग्राम के दौरान अक्षय कुमार ने शराब पी कर सैक्सी सुंदरियों के साथ एक गाने पर परफौर्म भी किया है. फिल्म की सिनेमेटोग्राफी गजब की है. ‘एअरलिफ्ट’ जैसी फिल्मों को सरकार द्वारा टैक्सफ्री कर देना चाहिए.

राधा की तसवीर पर विवाद: सौंदर्य कला बनाम नग्नता

देवीदेवताओं की पेंटिंग्स को ले कर नग्नता और अश्लीलता का मुद्दा अकसर उठता रहता है. विश्वप्रसिद्ध आर्टिस्ट एम एफ हुसैन इस का बड़ा उदाहरण हैं. मूर्तियों और पेंटिंग की कला में कलाकार को सुंदरता दिखती है जबकि दूसरे लोगों को उन में अश्लीलता दिखती है. इतिहास में जाएं तो जाहिर होता है कि खजुराहो की मूर्तियों का जिक्र पूरे विश्व में होता है. मूर्तियों के चलते ही खजुराहो विश्व के पर्यटन स्थलों में शामिल है. पेंटिंग कला में तमाम ऐसी शैलियां हैं जिन में पेटिंग को बनाते समय कलाकार नारी अंगों को उभारता है. इन से प्रेरित हो कर फैशन और फिल्मी दुनिया में भी ऐसे तमाम प्रयोग होते रहते हैं जिन में नारी को पारदर्शी पोशाक पहने दिखाया जाता है. कई पेंटिंग्स में नारी को कपड़ों की जगह ज्वैलरी पहने दिखाया जाता है.

हर कलाकार अपनी कला को दिखाते समय उस में हर रंग भरने की कोशिश करता है ताकि उस की पेंटिंग खूबसूरत लगे और सराही जाए. बड़ीबड़ी आर्ट गैलरी में ऐसी पेंटिंग भरी पड़ी हैं. राधा और कृष्ण को ले कर बनाई गई पेंटिंग्स को रास पेंटिंग्स के नाम से जाना जाता है. हर शैली में कलाकारों ने अपनीअपनी तरह से रास पेंटिंग्स खूब बनाई हैं.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में अवध के नवाब वाजिदअली शाह फैस्टिवल के अवसर पर फिल्मकार मुजफ्फर अली ने कलात्मक नृत्य नाटिका ‘राधा कन्हैया का किस्सा’ दिखाने की पहल की. इस के प्रचार के लिए उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग ने राजधानी लखनऊ की सड़कों पर बड़ेबड़े होर्डिंग्स लगवाए. होर्डिंग में राधा और कृष्ण की पेंटिंग लगी थी जो राजस्थानी रास शैली में बनी थी.

भारतीय जनता पार्टी युवा मोरचा, बजरंगदल और हिंदू सेना को इस पेंटिंग पर आपत्ति थी. इन के लोगों ने सरकार के खिलाफ नारेबाजी की और होर्डिंग को हटाने के लिए लखनऊ जिला प्रशासन पर दबाव डाला. कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेई भी मौके पर पहुंचे. भाजपा ने इस कार्यक्रम को न करने की धमकी भी दी. उत्तर प्रदेश सरकार ने 14 फरवरी वेलैंटाइन डे को उत्तर प्रदेश पर्यटन दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया था. फिल्मकार मुजफ्फर अली का कलात्मक नृत्य नाटिका ‘राधा कन्हैया का किस्सा’ का प्रदर्शन इस में होना था.

नग्नता नहीं कला

भाजपा ने राधा की जिस पेंटिंग को ले कर बवाल किया उस में आपत्तिजनक कुछ भी नहीं था. नृत्य नाटिका ‘राधा कन्हैया का किस्सा’ के प्रचार के लिए शहर के कुछ हिस्सों में इस के होर्डिंग्स लगाए गए थे. कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश सरकार के पर्यटन विभाग का सहयोग था. होर्डिंग में राधाकृष्ण की जो पेंटिंग लगी थी वह रास शैली की पेंटिंग्स से ली गई थी. प्राचीन साहित्य कला को झुठलाते हुए उस का विरोध करना कुछ अजीब था पर भारतीय जनता पार्टी के कट्टरपंथी सोच वाले किस बात पर संवेदनशील हो जाएं, यह कहा नहीं जा सकता.

इस शैली में नारी के सौंदर्य को पारदर्शी तरीके से दिखाया जाता है. इस में ड्रैस की जगह पर ज्वैलरी को पहनाया जाता है. रास शैली की खासीयत यह होती है कि कपड़े न होते हुए भी पेंटिंग नारी सौंदर्य को मोहक ढंग से दर्शाती है. यह शैली हमारी विरासत का हिस्सा है.

इस कला में नारी सौंदर्य को उभारने में वक्षस्थल के आसपास के सौंदर्य को दिखाया जाता है. इस के बाद नारी के कमर के हिस्से, खासकर उस की नाभि और नितंब के पास वाले हिस्से को खूबसूरती से दर्शाया जाता है. वक्षस्थल और नाभि पर कपड़ों की जगह पर ज्वैलरी का प्रयोग होता है. केवल पेंटिंग कला ही नहीं, मूर्ति कला में भी इन चीजों का सदियों से बेहतर उपयोग किया जाता रहा है.

पेंटिंग कला की समीक्षा करने वाले कई लेखक मानते हैं कि अभिव्यक्ति की आजादी के चलते ही कलाकार अपनी कला के हिसाब से चीजों को देखने की कोशिश करते हैं. राजनीति में अपने फायदे के लिए इन को मुद्दा बना दिया जाता है. खुद मंदिरों में ऐसी तमाम मूर्तियां होती हैं जिन में नारी अंगों को निखारा गया है. उन को बेहतर कला का नमूना भी माना जाता है.

लखनऊ में राधा की पेंटिंग का मामला वाजिदअली शाह फैस्टिवल और फिल्मकार मुजफ्फर अली का था, ऐसे में यह मुद्दा भड़क सकता था. इस मर्म को समझते हुए राजनीति करने के लिए पोस्टर का विरोध यह कह कर किया गया कि इस में राधा को अर्द्धनग्न दिखाया गया है. भाजपा और उस से जुड़े संगठनों के तमाम विरोध के बाद भी नृत्य नाटिका ‘राधा कन्हैया का किस्सा’ का प्रदर्शन तय समय और जगह पर हुआ.

वोटबैंक की राजनीति

भाजपा के विरोध के बाद भी इस नाटिका का आयोजन किया गया. होर्डिंग की तोड़फोड़ करने वाले लोगों ने कार्यक्रम वाले दिन किसी तरह का विरोध नहीं किया. जिला प्रशासन को यह आशंका थी कि ये लोग विरोध कर सकते हैं. कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी शामिल हुए.

दरअसल, भाजपा और उस से जुड़े संगठन धर्म से जुड़े मसलों पर विवाद खड़ा कर के अपने हिंदुत्व वाले वोटबैंक को मजबूत करना चाहते हैं, इसलिए वे हर तरह का बहाना तलाश करते हैं. राधा की पेंटिंग विवाद भी उस का एक हिस्सा भर था. भाजपा छोटेबड़े स्तर पर अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए ऐसे विवादों को आंदोलन की शक्ल देने का काम करती है जिस से पूरे देश में दूसरे जरूरी मसलों के बजाय धर्म की राजनीति को चमकाने का पूरा मौका मिल सके.

लखनऊ की ऐतिहासिक छतर मंजिल में सजी रूमानी शाम में कत्थक नृत्य और संवादों के जरिए नृत्य नाटिका ‘राधा कन्हैया का किस्सा’ का मंचन किया गया. कई खूबसूरत बंदिशों, कथक की लडि़यों, गतियों और संवादों के जरिए पेश हुई नाटिका कलात्मक थी.

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उस मौके पर कहा कि तमाम तरह के भड़काऊ मुद्दे उठा कर कुछ लोग प्रदेश की छवि खराब करने में लगे हैं. कार्यक्रम बिना किसी विरोध के संपन्न हो गया. इस से साफ लगता है कि राधा की पेंटिंग के बहाने केवल इंटौलरैंस के मुद्दे को जिंदा रखने का प्रयास किया जा रहा था.

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