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मिड डे मील : रसोइयों को नहीं मिला पैसा

बच्चे पढ़ाई के प्रति दिलचस्पी दिखाएं, अपने साथ दोपहर का खाना भी न लाएं, पर स्कूल समय पर आएं, इस के लिए सरकार ने मिड डे मील योजना चलाई थी. बच्चों को पढ़ाई के प्रति जागरूक करने के लिए सरकार की ओर से मुफ्त कापी किताब और ड्रेस देने का भी ऐलान कर दिया गया. बच्चों को दोपहर का खाना देने के लिए रसोइयों को रखा गया. इस के एवज में उन्हें मेहनताना दिया जाता था.

परंतु अफसोस की बात यह है कि इन रसोइयों को पिछले 7 महीनों से पैसा नहीं मिला है, लिहाजा घर पर उन्हें पैसों की किल्लत से जूझना पड़ रहा है. इस के अलावा इन रसोइयों को काम करने में कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है.

बता दें कि शहर के सरकारी स्कूलों में मिड डे मील का खाना बनाने वाले रसोइयों को पिछले 7 महीने से पैसा नहीं मिला है. इन में काकोरी, सरोजनीनगर, चिनहट समेत कई ब्लाकों के तकरीबन 2 हजार रसोइए शामिल हैं.

रसोइयों के मुताबिक, उन के खाते में अब तक वेतन का पैसा नहीं अया है. वहीं विभागीय अफसरों का कहना है कि अक्षय पात्र फाउंडेशन को अक्तूबर महीने तक का भुगतान कर दिया गया है.

प्राथमिक विद्यालय लालताखेड़ा काकोरी की खाना बनाने वाली ने बताया कि उन्हें जुलाई, 2015 से पैसा नहीं मिला है, वहीं प्राथमिक विद्यालय चौकड़ीखेड़ा की खाना पकाने वालियों ने बताया कि पैसा न मिलने की वजह से उन्हें घर चलाना मुश्किल हो गया है.

अक्षय पात्र फाउंडेशन की ओर से जितने भी ब्लाकों में मानदेय यानी वेतन दिया जाता है, उन सभी में रसोइयों का यही हाल है. कुछ ब्लाकों में सितंबर महीने से पैसा नहीं दिया गया है, तो कुछ में जुलाई महीने से पैसा बाकी है.

शहर के सभी ब्लाकों में तकरीबन 4 हजार रसोइए काम कर रहे हैं. 5 ब्लाक चिनहट, काकोरी, सरोजनी नगर, मोहनलालगंज और नगर क्षेत्र में अक्षयपात्र फाउंडेशन ही मिड डे मील देने का काम करता है, इसलिए इन ब्लाकों के तकरीबन 2 हजार रसोइयों को पैसे देने का जिम्मा अक्षयपात्र फाउंडेशन का है. यह मानदेय विभाग की ओर से अक्षयपात्र फाउंडेशन को दे दिया जाता है. इस फाउंडेशन को पैसा सिर्फ ट्रांसफर करना होता है. पैसा देने के बावजूद इन रसोइयों के खातों में अब तक पैसा ट्रांसफर नहीं किया गया है.  

 

अफसरों ने बरबाद कीं 5 करोड़ की कृषि मशीनें

झारखंड सरकार ने छोटे और मंझोले किसानों को खेती की मशीनों के प्रति जागरूक बनाने के लिए बड़े तामझाम के साथ 5 करोड़ रुपए की मशीनें खरीदी थीं. इन मशीनों का कोई इस्तेमाल नहीं होने से वे कबाड़ में बदल गई हैं. इन महंगी मशीनों को किसानों के बीच प्रदर्शित करने और उन्हें किराए पर देने की योजना थी. पिछले 12 सालों के दौरान न कभी इन मशीनों को प्रदर्शन में रखा गया और न ही किसानों को किराए पर दिया गया. मशीनों पर करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद भी सरकार को राजस्व के रूप में एक फूटी कौड़ी भी नहीं हासिल हुई.

राज्य के कृषि विभाग ने साल 2004 में 5 करोड़ रुपए खर्च कर के बड़ी और छोटी 70 कृषि मशीनों को खरीदा था. 3 करोड़ 95 लाख रुपए में 22 कंबाइंड हार्वेस्टर खरीद गए. उस समय 1 कंबाइंउ हार्वेस्टर की कीमत 17 लाख, 99 हजार रुपए थी. इसी तरह से 74 लाख 58 हजार रुपए खर्च कर के 44 पैंडी ट्रांसप्लांटर खरीदे गए. 1 पैंडी ट्रांसप्लांटर की कीमत उस वक्त 1 लाख 70 हजार रुपए थी. 2 लाख 74 हजार रुपए में 4 सीड प्रोसेसरों की खरीद की गई थी.

कृषि विभाग के सूत्रों ने बताया कि झारखंड में बड़े जोत वाले खेतों की संख्या काफी कम है और करीब 63 फीसदी सीमांत किसान हैं. ऐसे में बड़ी और महंगी कृषि मशीनों की जरूरत ही नहीं थी. छोटी जोत वाले खेतों में ये मशीनें इस्तेमाल नहीं की जा सकती हैं. रांची समेत धनबाद, देवघर, गोड्डा, साहेबगंज, पाकुड़ आदि जिलों के जिला कृषि पदाधिकारियों ने साल 2008 में ही विभाग को बता दिया था कि उन के जिलों में उन मशीनों की कोई जरूरत नहीं है. दिलचस्प बात यह?है कि विभाग ने कंबाइंड हार्वेस्टर और पैडी ट्रांसप्लांटर तो खरीद लिए, पर आज तक उन्हें चलाने के लिए ड्राइवरों की बहाली नहीं की गई.

बिना ड्राइवर के पटरियों पर दौड़ेगी दिल्ली मेट्रो

क्या आप जानते हैं की दिल्ली की जान दिल्ली मेट्रो इस साल के अंत तक अपने थर्ड फेज में बिना ड्राइवर के ही पटरियों पर दौड़ती दिखेगी. बिना ड्राईवर के चलने वाली यह मेट्रो कम्यूनिकेशन बेस्ड ट्रेन कंट्रोल सिस्टम (सीबीटीसी) तकनीक पर आधारित  होगी. दुनिया के कई शहरों में बिना ड्राइवर वाली ट्रेन चल रही हैं लेकिन दिल्ली वालों के लिए यह पहला मौका होगा, जब दिल्ली वाले बिना ड्राइवर की ट्रेन में सफ़र करने का आनंद उठा सकेंगे. साल के अंत तक ये ट्रेन पश्चिमी जनकपुरी से बॉटेनिकल गार्डेन तक करीब 37 किलोमीटर और शिव विहार से मजलिस पार्क करीब 57 किलोमीटर तक चलेगी.

बुधवार को पहली बार इस मेट्रो को मुकुंदपुर डिपो में बिना ड्राइवर के चलाया गया. दक्षिण कोरिया से आई छह डिब्बों की इस मेट्रो ट्रेन की औसत रफ्तार और इसके डिब्बों की चौड़ाई भी आम मेट्रो ट्रेन से ज्यादा है. जहाँ आम मेट्रो के डिब्बों की चौड़ाई 2.9 मीटर है, वहीं हाईटेक ट्रेन के डिब्बों की चौड़ाई 3.2 मीटर है. इसकी फ्रिक्वेंसी भी दूसरी लाइन की मेट्रो से ज्यादा होगी, क्योंकि इसकी औसत रफ्तार 5 किमी/घंटा ज्यादा है. चौड़ाई ज्यादा और ड्राइवर केबिन हटने से इसमें 280 लोग ज्यादा बैठ भी सकते है. यही नहीं इसमें सीटें भी ज्यादा देने की कोशिश की गई है और यह वाईफाई कनेक्शन से भी लैस होगी इन खास ट्रेनों से 33 फीसदी बिजली की कम खपत होगी.

स्पीड के अलावा इनके अंदर का लुक भी बदला हुआ नजर आएगा. हर कोच में अलग-अलग रंग की सीट होंगी. लेडीज कोच की सीट्स पिंक कलर में रखी गई हैं. जबकि नॉर्मल कोच में ब्लू, रेड और ऑरेंज कलर की सीट होंगी. इनके अंदर जगह ज्यादा होगी. यही नहीं अंदर एलसीडी स्क्रीन भी लगे होंगे. जो आपको आने वाले स्टेशन और ट्रेन रूट की जानकारी देंगे. थर्ड फेज में इन ट्रेनों को मजलिस पार्क-शिव विहार और जनकपुरी पश्चिम-बॉटनिकल गार्डन के रूट पर चलाया जाएगा.

ओरिजनल पैकिंग में नकली माल

अनु ने अपने बर्थडे पर ब्रांडेड एंड्रायड फोन खरीदा पर ये क्या कुछ दिन बाद ही उस मोबाइल फोन पर प्रौब्लम होने लगी. जब वह मोबाइल ले कर पास के सर्विस सैंटर गई तो वहां पर उसे पता चला मोबाइल फोन तो नकली है. यह सुन कर वह सोच में पड़ गई ऐसा कैसे हो सकता है उस ने तो ब्रांडेड मोबाइल फोन लिया है?

नकली माल की है धूम?

आजकल सस्ते स्मार्ट फोन की धूम है हर ब्रांड का अपना मौडल मौजूद है और जो ब्रांड मार्केट में पसंद किया जाता है. उस के नकली फोन भी मार्केट में मिलते हैं. कभीकभी तो ओरिजनल पैकिंग में भी नकली स्मार्ट फोन मिलते हैं जैसे अनु के साथ हुआ. इसलिए जब भी नया मोबाइल खरीदे उस से पहले सावधानी बहुत जरूरी है.

सावधानियां

  • जब भी नया स्मार्ट फोन खरीदे उसे चैक जरूर करें सब से पहले जीएसएम एरीना www.gsmarena.com पर जा कर मौडल का सही नंबर लिख लें जिस भी स्मार्ट फोन के मौडल पर आप की नजर है उस के फीचर के बारे में सब कुछ जानने की कोशिश करें.
  • जब आप स्मार्टफोन खरीद रहे हैं तो उस के मौडल नंबर औपरेटिंग सिस्टम का वर्जन और ब्रौडबैंड वर्जन पर नजर रखें.
  • एंड्रायड स्मार्टफोन की सैटिंग में जाने के बाद ‘अबाउट फोन’ में जा कर आप यह पता कर सकते हैं कि औपरेटिंग सिस्टम कौन सा इस्तेमाल हो रहा है.
  • आईफोन पर आप सैटिंग में जा कर जनरल में जाए और ‘अबाउट’ चुन कर यह पता कर सकते हैं. जब आप उस मेन्यू पर होते हैं तो आप का डिवाइस नंबर और ब्रौडबैंड नंबर भी दिखेगा और जो मौडल नंबर औपरेटिंग सिस्टम और ब्रौडबैंड नंबर आप ने शुरू में नोट किया था, अब उसे एक बार देख लें, स्मार्टफोन का IMEI नंबर भी आप को अबाउट या अबाउट फोन में मिल जाएगा. हर मोबाइल फोन का एक यूनिक IMEI नंबर होता. एक बार आप को IMEI नंबर मिल गया, उसे आप वेबसाइट पर डाल कर चैक कर सकते हैं कि स्मार्टफोन ओरिजनल है या नहीं. अगर IMEI नंबर सही नहीं है तो वह नकली है.

जब भी आप फोन खरीदें औथोराइडज्ड शौप्स से ही खरीदें और उस का पक्का बिल जरूर लें.

‘सिटी लाइट्स’ के बाद मेरे पास नहीं था काम: पत्रलेखा

फिल्म 'लव गेम्स' में जल्द ही नजर आने वाली अभिनेत्री पत्रलेखा ने हाल ही में अपना एक दर्द बयां किया है. पत्रलेखा पिछले काफी वक्त से अपने फिल्मी करियर को लेकर परेशान हैं. उन्होंने वर्ष 2014 में आई हंसल मेहता के निर्देशन में बनी फिल्म 'सिटी लाइट्स' में एक ग्रामीण महिला का किरदार निभाया था. फिल्म में निभाई गई उनकी भूमिका के लिए उन्होंने फिल्म समीक्षकों से काफी सराहना हासिल की थी लेकिन उनका कहना है कि फिल्म के बाद उन्हें काम की कोई और पेशकश नहीं मिली और वह काम की तलाश में फिल्मकार महेश भट्ट के पास गई थीं.

पत्रलेखा ने कहा, "फिल्म 'सिटी लाइट्स' के बाद मुझे कोई काम नहीं मिला. मैं महेश सर के पास गई और उनसे कहा कृपया मुझे काम दें, इसके बाद उन्होंने मुझे विक्रम भट्ट सर से मिलने के लिए कहा." पत्रलेखा ने अपनी नई फिल्म 'लव गेम्स' के प्रचार के दौरान संवाददाताओं से कहा, "मैं 'लव गेम्स' देने के लिए दोनों की शुक्रगुजार हूं. लोग मुझे मेरे अभिनय में बदलाव के लिए बधाई दे रहे हैं लेकिन इसका श्रेय विक्रम सर को जाता है. 26 साल की अभिनेत्री फिल्म में रमोना रायचंद नाम की एक अमीर आकर्षक महिला के किरदार में नजर आएंगी.

फिल्म के निर्देशक विक्रम भट्ट ने पत्रलेखा की तारीफ करते हुए कहा, "पत्रलेखा इस भूमिका में शानदार रही हैं और उनमें काफी धैर्य एवं साहस है. मैंने उनसे कहा था कि उन्हें आरामतलब स्थिति से बाहर निकलना होगा और उन्होंने किसी चीज के लिए मना नहीं किया."

एरोटिक-ड्रामा फिल्म में पत्रलेखा के साथ नवोदित अभिनेता गौरव अरोड़ा और अभिनेत्री तारा अलीशा बेरी मुख्य भूमिकाओं में हैं.

बिपाशा और करण को प्रियंका ने दी शादी की शुभकामनाएं

बॉलीवुड अभिनेत्री बिपाशा बसु और करण सिंह ग्रोवर की शादी की खबरें पिछले काफी वक्त से मीडिया में छाई हुई हैं. लेकिन दोनों में से किसी ने भी अपने रिश्ते के बारे में खुलकर बात नहीं की. अब अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ने इनकी शादी की खबरों पर मोहर लगा दी है. उन्होंने हाल ही में ट्वीट कर इन दोनों को शुभकामनाएं दी हैं.

प्रियंका ने लिखा, "मैं अपनी दोस्त बिपाशा और उनके होने वाले पति करण सिंह ग्रोवर को दिल से शुभकामनाएं देती हूं." पिछले दिनों आई खबर के मुताबिक करण और बिपाशा 30 अप्रैल को शादी के बंधन में बंध जाएंगे.

सूत्रों के अनुसार इन्होंने मुंबई का एक होटल भी बुक कर लिया है. बिपाशा शादी में ट्रेडिशनल बंगाली लिबास में नजर आने वाली हैं. पिछले दिनों खबर आई थी कि दोनों ने गुपचुप सगाई रचा ली है. हालांकि अब तक इन दोनों में से किसी ने भी अब तक इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की है.

खबरों की मानें तो करण की मां बिपाशा को पहले अपनी बहू के रुप में उनकी पिछली जिंदगी को लेकर स्वीकार नहीं कर रही थीं. बिपाशा की जिंदगी में पहले भी कई लोग ऐसे आए हैं जिनके साथ उनका अफेयर रहा है, लेकिन एक समय के बाद उन्होंने बिपाशा को नकार दिया. बिपाशा और जॉन लंबे समय तक एक दूसरे के साथ रिलेशनशिप में रहें है. हालांकि अब करण की मां इनके रिश्ते के लिए राजी हो गई हैं.

करण सिंह ग्रोवर इससे पहले भी दो बार शादी कर चुके हैं. सबसे पहले उनकी शादी वर्ष 2008 में टीवी अभिनेत्री श्रद्धा निगम से हुई थी, लेकिन दोनों का रिश्ता लंबे समय तक नहीं चल पाया और इनका तलाक हो गया.

इसके बाद करण ने 2012 में अभिनेत्री जेनिफर विंगेट से शादी कर ली, लेकिन इन दोनों का रिश्ता भी जल्द ही टूट गया और करण और बिपाशा के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं.

करण और बिपाशा की मुलाकात फिल्म 'अलोन' के सेट पर हुई थी. खबरों के अनुसार उस वक्त बिपाशा हरमन बावेजा को डेट कर रही थीं. हरमन को बिपाशा का परिवार बहुत पसंद करता था, दोनों एक दूसरे से शादी भी करने वाले थे, लेकिन बात नहीं बन पाई और इनका रिश्ता टूट गया. इसके बाद करण और बिपाशा के बीच नजदीकियां बढ़ीं.

सलमान खान ने 9 दिन के भांजे को दिया 1 करोड़ का तोहफा

बॉलीवुड दंबग सलमान खान की लाडली बहन अर्पिता ने हाल ही में एक बेटे को जन्म दिया है. इस बच्चे का नाम आहिल रखा गया है. इस नन्हें मेहमान के आने से पूरे खान परिवार में खुशियों का माहौल छाया हुआ है. सुपस्टार सलमान ने अपने इस नन्हें भांजे को एक ऐसा गिफ्ट दिया है जो जिसे देने के बारे में सिर्फ दबंग सलमान ही सोच सकते हैं. उन्होंने अपने इस छोटे से भांजे को चमचमाती हुई कार गिफ्ट की है. अर्पिता ने 30 मार्च को मुंबई के खार में स्थित हिंदुजा अस्पताल में बेटे को जन्म दिया था. इसके बाद मंगलवार को उन्हें हॉस्पिटल से छुट्टी दे दी गई और वह सीधे अपने पर पहुंची.

अर्पिता और आयुष की शादी 2014 में हैदराबाद के फलकनुमा पैलेस में हुई थी. इनकी शादी काफी धूम धाम से की गई थी जिसमें बॉलीवुड के साथ-साथ कई राजनेता भी नजर आए थे. आहिल, आयुष और अर्पिता का पहला बच्चा है.

अर्पिता के नवजात बच्चे की कई तस्वीरे सोशल मीडिया पर शेयर की जा चुकी हैं. हाल ही में सलमान की भी अपने भांजे साथ खेलते हुए तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर की गई थीं.

सलमान खान इन दिनों अपनी आगामी फिल्म ‘सुल्तान’ की शूटिंग में व्यस्त हैं. फिल्म में सलमान हरियाणा के पहलवान केसरी का किरदार निभाते हुए नजर आएंगे. खास इस फिल्म के लिए उन्होंने कुश्ती के दांव पेंच सीखे हैं. फिल्म में एक पहलवान की तरह भारी और फिट दिखने के लिए उन्होंने काफी मेहनत की है. फिल्म में सलमान के साथ अनुष्का शर्मा भी मुख्य भूमिका में दिखेंगी.

इस तरह पीएम मोदी ने किया तिरंगे का बार-बार अपमान…!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने योग को नई पहचान दिलाई. पीएम मोदी ने योग को दुनिया भर में पहुंचाया, लेकिन इस योग दिवस में ही उनसे ऐसी भूल हो गई कि मामला कोर्ट तक जा पहुंचा है. मामला तिरंगे के अपमान से जुड़ा है. शिकायतकर्ता ने पीएम के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है.

दिल्ली की एक अदालत ने शिकायतकर्ता की बातों का संज्ञान लिया है. कोर्ट ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर राष्ट्रीय ध्वज के अपमान के आरोप पर संज्ञान लिया है. इस आरोप के मुताबिक पिछले साल अंतरराष्ट्रीय योग दिवस और अमेरिकी यात्रा के दौरान पीएम ने राष्ट्रीय ध्वज का अपमान किया था. मामले का संज्ञान लेते हुए मेट्रोपॉलिटन मैजिस्ट्रेट स्निग्धा सरवरिया ने सुनवाई के लिए 9 मई की तारीख तय की है. वहीं शिकायतकर्ता ने मांग की है कि कोर्ट पुलिस को इस मामले में पीएम के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दे.

क्या है पूरा मामला?

शिकायतकर्ता आशीष शर्मा ने पीएम के खिलाफ तिरंगे के अपमान को लेकर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. उन्होंने आरोप लगाया है कि अंतराष्ट्रीय योग दिवस के दौरान पीएम ने इंडिया गेट पर राष्ट्रीय झंडे का अंगोछे की तरह इस्तेमाल किया. पीएम मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को राष्ट्रीय झंडा देते वक्त उस पर दस्तखत किए. कोर्ट ने आशीष शर्मा को साक्ष्य जमा करने का आदेश दिया है.

फ्लैग कोड ऑफ इंडिया के तहत क्या है नियम?

फ्लैग कोड ऑफ इंडिया के तहत अगर कोई शख़्स झंडे को किसी के आगे झुका देता हो, उसे कपड़ा बना देता हो, मूर्ति में लपेट देता हो या फिर किसी मृत व्यक्ति (शहीद हुए जवानों के अलावा) के शव पर डालता हो, तो इसे तिरंगे का अपमान माना जाएगा. तिरंगे की यूनिफॉर्म बनाकर पहन लेना भी ग़लत है. अगर कोई शख़्स कमर के नीचे तिरंगा बनाकर कोई कपड़ा पहनता हो तो यह भी तिरंगे का अपमान है. प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट टू नेशनल ऑनर ऐक्ट-1971 की धारा-2 के मुताबिक, ध्वज और संविधान के अपमान करने वालों के खिलाफ सख्त क़ानून हैं.

देश की इन दिग्गज हस्तियों ने किया है तिरंगे का अपमान

मल्लिका शेरावत

विवादों से मल्लिका शेरावत का पुराना नाता है. अपनी फिल्म डर्टी पॉलिटिक्स के पोस्टर में मल्लिका तिरंगे में लिपटी हुई लाल बत्ती वाली गाड़ी पर बैठी नजर आई.

सानिया मिर्जा

टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा ने तिरंगा पहनने की हिमाकत तो नहीं की, लेकिन स्मार्ट फोटोग्राफी के नमूने ने उन्हें विवादों में लाकर खड़ा कर दिया था. उनकी एक तस्वीर को देखकर ऐसा लगता है कि सानिया मिर्जा तिरंगे को अपना पैर दिखा रही हैं. हालांकि सानिया मिर्जा ने इसकी सफाई दी थी और साथ ही कहा था कि तिरंगे की शान के लिए वो टेनिस खेलना भी छोड़ सकती हैं.

मंदिरा बेदी

एक्ट्रेस और होस्ट मंदिरा बेदी भी इस लिस्ट में शुमार हैं. एक क्रिकेट मैच को होस्ट करने के दौरान मंदिरा ने फ्लैग थीम साड़ी पहनी थी. टूर्नामेंट में हिस्सा लेने वाले हर देश का झंडा उनकी साड़ी में था. तिरंगा उनके घुटने के नीचे पड़ा था जिसे लेकर विवाद खड़ा हो गया था.

शाहरुख खान

बॉलीवुड के किंग खान को पुणे पुलिस ने कथित तौर पर तिरंगे का अपमान करने के लिए धरा था. लोक जनशक्ति पार्टी के नेशनल सेक्रेटरी रवि ब्राह्मे ने शाहरुख खान के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी. एक यू-ट्यूब वीडियो में शाहरुख खान को तिरंगे का अपमान करते देखा गया था.

मालिनी रमानी

साल 2000 में डिजाइनर मालिनी रमानी उस समय विवादों में फंस गई थीं जब उन्होंने तिरंगे की ड्रेस पहनी थी.

सेक्सुअल कंटेंट की वजह से सिनेमा नही चलेगा: इम्तियाज

‘‘सोचा ना था’’, ‘‘आहिस्ता आहिस्ता’’, ‘‘जब वी मेट’’, ‘‘लव आजकल’’, ‘‘राक स्टार’’, ‘‘काकटेल’’, ‘‘हाइवे’’, ‘‘तमाशा’’ जैसी फिल्मों के सर्जक इम्तियाज अली भी अब डिजिटल मीडियम के लिए एक सात मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘इंडिया टुमारो’ लेकर आए हैं. उनका मानना है कि बिजनेस यानी कि बाजार सिनेमा को बदल रहा है. इतना ही नही उनका मानना है कि सेक्सुल कंटेट से सिनेमा सफल नहीं हो सकता.

व्यापार की वजह से सिनेमा में बदलाव की आपकी जो सोच या समझ है, उसकी वजह क्या है?

– पिछले दिनों मुझे ब्रसेल्स में ‘ग्लोबल इंडिया बिजनेस समिट’ में निमंत्रित किया गया था. मैंने वहां पाया कि लोग डिजिटल बूम व डिजिटल सिनेमा के भविष्य को लेकर अति उत्साहित हैं. सभी का मानना था कि पूरे विश्व में अब 2जी से 4जी आ रहा है, जिसके चलते अब बड़ी फिल्में और लंबी लंबी फाइलें भेजना आसान हो रहा है. रिलायंस जैसी कई कंपनियों ने तो बहुत बड़ा नेटवर्क बनाना शुरू किया है. यह सब जानकर मेरे दिमाग में आया कि यदि ऐसा है, तो हम बड़ी आसानी से अपने मोबाइल पर तीन घंटे की फिल्म देख सकते हैं. अब स्वाभाविक तौर पर जितनी फिल्में बन रही हैं, उससे कहीं ज्यादा फिल्मों और मनोरंजन प्रधान सामग्री की जरूरत पडे़गी. तो उसे बनाने का काम तो हम फिल्मकारों को ही करना पड़ेगा. इसलिए मैं कह रहा हूं कि अब बिजनेस/बाजार सिनेमा को बदल रहा है.

देखिए,अब सिनेमा में जो बदलाव मेरी समझ में आ रहा है,वह यह है कि अब दर्शक अपने मोबाइल फोन पर सिर्फ तीन घंटे की फिल्म नहीं देखना चाहता, बल्कि अब वह चाहता है कि 5 से 15 मिनट की या एक घंटे लंबी अवधि वाली फिल्मों को मोबाइल पर देखे. यदि कोई दर्शक बस या लोकल ट्रेन में यात्रा कर रहा है, तो हो सकता है कि उसके पास मोबाइल पर व्यस्त होने के लिए कुछ समय ही हो. इसी वजह से मेरे दिमाग में आया कि मेरे पास तमाम कहानियां ऐसी हैं, जिन्हें मैं अब तक नहीं बना पाया, क्योंकि यह कुछ कहानियां या विचार ऐसे हैं, जिन पर दो से तीन घंटे की फिल्म बनाना संभव नहीं है. पर यह विचार या यह कहानियां इतनी अच्छी हैं कि मैं इन्हें 5 मिनट से लेकर 15 मिनट की अवधि वाली फिल्म का रूप दे सकता हूं. यही सोच कर मैंने अपनी प्रोडक्शन कंपनी ‘‘विंडो सीट फिल्म’’ के बैनर तले फिल्म ‘‘इंडिया टुमारो’’ बनायी है. इस फिल्म में मैंने इंसान की उम्मीदों की बात की है.

पर आपने सात मिनट की फिल्म ‘‘इंडिया टुमारो’’ में एक वेश्या को कहानी की हीरोइन के रूप में क्यों पेश किया है?

– इसके पीछे मेरी सोच यह है कि समाज तेजी से बदल रहा है,जिसके चलते हर तबके के लोगों का विकास होना संभव है. एक फिल्मकार के नाते मेरा काम लोगों की उम्मीदों को बढ़ाना है. मैंने अपनी इस फिल्म में समाज के सबसे निचले तबके को कहानी का केन्द्र बनाकर उसके उत्थान व विकास करने की उम्मीदों के साथ एक नया संदेश देने की कोशिश की है. इसलिए मैंने अपनी इस फिल्म में एक वेश्या को हीरोइन बनाकर दिखाया है कि वह किन्ही मजबूरियों के चलते वेश्या के पेशे में है, पर उसे बिजनेस, मार्केटिंग और शेयर बाजार के उतार चढ़ाव की जितनी बेहतरीन समझ है, वह समझ उन तमाम बडे़ व्यापारियों में भी नही है, जो कि लंबे समय से शेयर बाजार में खेल रहे हैं. हमारी इस फिल्म की नायिका की बातों से यह बात उभरकर आती है कि कल को यदि वह शेयर बाजार में उतरे, तो अच्छी समझ के साथ बिजनेस करते हुए किसी भी मुकाम पर पहुंच सकती है. मेरी यह फिल्म नारी सशक्तिकरण की बात भी करती है.

पर एक फिल्मकार के तौर पर आपको डिजिटल मीडिया से पैसे की रिकवरी कहां से होगी?

– मोबाइल का नेटवर्क बहुत तेजी से फैल रहा है. अब सिर्फ शहरों में नहीं, बल्कि छोटे छोटे गांवों में भी जो कम शिक्षित इंसान हैं, वह भी मोबाइल लेकर घूमने लगे हैं. उसकी समझ में आ गया है कि इंटरनेट काम की चीज है, जिसके माध्यम से वह देश के किसी भी कोने में बैठकर मनोरंजन ढूंढ़ सकता है. शहरों में ऑटो रिक्शा, टैक्सी ड्रायवर, इन सभी के लिए तो मोबाइल पर सब कुछ मुफ्त में ही मिल रहा है.

पर क्या 5 या 7 मिनट की यह फिल्में मुफ्त में बनती रहेंगी? इन फिल्मों में काम करने के लिए कलाकार पैसा कभी नहीं मांगेगा?

– ऐसा नहीं होगा. लेकिन अब ‘रेवेन्यू माडल’ क्या बनेगा, यह पता करना है. क्योंकि इस संसार में मुफ्त में कोई इंसान कोई काम नहीं करता. पर रेवेन्यू माडल में कई चीजें समाहित हो जाती हैं. कई बार विज्ञापन के माध्यम से पैसे इकट्ठा होते हैं. हो सकता है कि कल को जब मोबाइल पर ही मनोरंजन के सारे साधन उपलब्ध हो जाएं, तो मोबाइल धारक को कुछ रकम चुकानी पडे़, पर वह इतनी बड़ी रकम नहीं होगी कि मोबाइल धारक चुकाना ना चाहे. जब टीवी पर सीरियलों का निर्माण शुरू हुआ था, तब बहुत कम बजट में सीरियल बन रहे थे. किसी को अहसास नहीं था कि उन्हें पैसे मिलेंगे या नहीं? पर अब सीरियलों का बजट बहुत लंबा चौड़ा हो गया है. कलाकारों को भी सीरियलों में काम करने के लिए बड़ी रकम मिलने लगी है. जिस तरह से टीवी का एक रेवेन्यू माडल तय हो चुका है, धीरे से डिजिटल मीडिया का भी रेवेन्यू माडल तय हो जाएगा.

यदि इस तरह की फिल्मों के लिए बजट नहीं हुआ, तो क्या यह फिल्में महज नए कलाकारों या तकनीशियनों के लिए सिर्फ प्रयोगशाला बनकर रह जाएंगी? या कुछ लोग इसे शौकिया करेंगे?

– देखिए, मैंने बजट ना होने की बात इसलिए की थी, क्योंकि इस तरह कि फिल्मों के लिए बजट की जरूरत नहीं होती है. अब मैंने तो इस फिल्म का आधे से ज्यादा हिस्सा एक दिन एक सेट पर बडे़ कैमरे से फिल्माया है और दूसरा आधा हिस्सा अपने आइफोन पर फिल्माया है. मगर दूसरे लोग भी इस तरह की फिल्मों को अपने आईफोन पर फिल्मा सकते हैं. कुछ साल पहले मैंने ‘राजधानी एक्सप्रेस’ में यात्रा के दौरान  में आईफोन से ही एक फिल्म बनायी थी. उसमें धन नहीं खर्च हुआ था. फिर उसे अपने निजी कम्प्यूटर पर ही एडिट कर रिलीज किया था. पर विदेशों में वेब सीरीज बहुत बन रही हैं. उनका रेवेन्यू माडल सेट हो चुका है, तो वह दर्शकों की संख्या के आधार पर ही सेट हुआ होगा. मेरा अनुमान है कि एक वक्त वह आएगा, जब भारत में भी बड़े बजट की वेब फिल्में या डिजिटल फिल्में बन सकेंगी और यह फिल्में हिंदुस्तानी लोग ही बनाएंगे.

पिछले कुछ माह के अंतराल में जो भी वेब सीरीज बनी हैं, उनमें सेक्स हावी नजर आ रहा है. हर किसी को लगता है कि इंटरनेट पर मनोरंजन परोसने के लिए उन्हें सेंसर की जरूरत नहीं है, इसलिए अब वह ऐसी वेब सीरीज में किसी भी मात्रा मे सेक्स सीन रख सकते हैं. इस तरह की वेब सीरीज बनाने वालों में शराज फिल्म्ससहित बडे़ बैनर शामिल हैं. तो क्या डिजिटल या वेब सीरीज के नाम पर सिर्फ सेक्स परोसा जाएगा?

– मैं सबसे पहले स्पष्ट कर दूं कि मेरी फिल्म ‘इंडिया टुमारो’ में सेक्स नहीं है. मेरी फिल्म एक वेश्यालय में फिल्मायी गयी हैं, क्योंकि नायिका वेश्या है, पर हमने उसके कपड़े नहीं उतरवाए हैं. मैं सेक्स को किसी भी कंटेट का हिस्सा नहीं मानता. दूसरे क्या कर रहे हैं, इस पर मैं टिप्पणी नहीं कर सकता. माना कि वेब सीरीज या डिजीटल सिनेमा में सेंसरशिप के कोई नियम लागू नहीं होते हैं, पर फिल्मकार के तौर पर हम सेल्फसेंसरशिप का पालन करते हैं. वैसे सेंसरशिप सेक्स का भी होता हैं और भाषा का भी होता है. हर फिल्मकार अपनी समझ के अनुसार फिल्म बना रहा है. हो सकता है कि कुछ फिल्मकार जो कुछ अपनी फिल्मों में नही दे पा रहे हैं, वह यहां देने की कोशिश कर रहे हों. पर मेरी राय में सेक्स के आधार पर आप सफलता के पायदान नही चढ़ सकते. क्योंकि लोग सिर्फ सेक्स नही देखना चाहते. आज के दर्शक को पता है कि वह मनोरंजन के नाम पर क्या देखना चाहता है. वह रिश्ते की कहानी या सेक्स या प्यार या संवेदनाएं या भावनाओं को देखना चाहता है. अब तक सिनेमा में यह सब एक साथ मिश्रित करके परोसा जाता रहा है, पर अब ऐसा नहीं होगा. जिन्हे पार्न देखना होगा, वह पारिवारिक फिल्म देखने क्यों जाएगा. बहुत जल्द पार्न के लिए अलग सिनेमा घर भी तय हो जाएंगे. सिर्फ सेक्स के आधार पर कोई सिनेमा नहीं चल सकता. मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि सिर्फ सेक्सुअल कंटेंट की वजह से सिनेमा नही चलेगा.

डिजिटल मीडिया या वेबसीरीज का रेवेन्यू माडल तय हो जाएगा, तो इसका टीवी पर क्या असर पडे़गा?

– कुछ देर पहले मैं यही कह रहा था कि बिजनेस सिनेमा को बदल रहा है.डिजिटल या वेबसीरीज का रेवेन्यू माडल तय होने के बाद पहला बदलाव यह होगा कि सिनेमा ज्यादा सशक्त व प्योर हो जाएगा. फिल्मकार बहुत कुछ कहना चाहता है, वह जो कहना चाहता है, उसे वह फिलर के तौर पर अपनी फिल्म में परोस देता है, जबकि वह उसकी फिल्म की कहानी का अहम हिस्सा नहीं होता है. अब फिल्मकार को ऐसा करने की जरुरत नहीं पड़ेगी. क्योंकि अब उसे अपने मन की बात कहने के लिए वेब सीरीज नामक नया माध्यम मिल रहा है. हर फिल्मकार सिनेमा की बात सिनेमा में करेंगें. हर फिल्मकार अपने विचार रखने के लिए वेब सीरीज का सहारा लेगा. अब मुझे ‘इंडिया टुमारो’ का सीन ‘जब वी मेट’ में डालने की जरुरत नहीं पड़ेगी. इससे सिनेमा में ‘शुद्धता’ आएगी, जिसका फायदा दर्शक को ही मिलेगा. इसी तरह टीवी के कार्यक्रम भी शुद्ध हो जाएंगे.

द ब्लू बेरी हंटः कम बजट में बनी बेहतरीन फिल्म

जब बौलीवुड में कई सौ करोड़ रूपए की लागत वाली फिल्में भी निराश कर रही हों, ऐसे में महज चालीस लाख रूपए की लागत से ‘द ब्लू बेरी हंट’ जैसी फिल्म का निर्माण कर फिल्मकार अनूप कूरियन ने साबित कर दिखाया कि अच्छी फिल्में बजट की मोहताज नहीं होती हैं.

फिल्म ‘‘द ब्लू बेरी हंट’’ की कहानी पूरी तरह से केरला की पहाड़ी इलाके वागामोन में अपने प्रिय पालतू कुत्ते के पी के साथ रह रहे कर्नल (नसिरूद्दीन शाह) के इर्द गिर्द घूमती है. वह किस तरह अपने स्टेट में मारिजुआना/गांजा की ‘ब्लू बेरी हंक’ की दुर्लभ और बेशकीमती फसल उगाने के लिए तैयार हो जाते हैं. इस फसल की खेती करना कानूनन जुर्म है. पर उन्हे कानून की परवाह नही है. उन्होने अपनी व ब्लू बेरी हंक फसल की निगरानी रखने के लिए चारों तरफ से छह सीसीटीवी कैमरे फिट कर रखे हैं और इन कैमरों के सामने जब भी कोई गतिविधि होती है, तो उसकी सूचना तुरंत उन्हे उनके कम्प्यूटर के साथ साथ मोबाइल पर मिल जाती है. वह बंदूक चलाने में भी माहिर हैं. तो वहीं नदी में तैरना जानते हैं. उन्होंने इस बेशकीमती फसल को जार्ज (पी जे उन्नीकृष्णन) के माध्यम से बेचने का सौदा कर रखा है.

एक दिन जार्ज अपने साथ बिहार निवासी सेठ (विपिन शर्मा) को लेकर पहुंचता है, यह बात कर्नल को अच्छी नहीं लगती. लेकिन बिहारी सेठ का मानना है कि वह पैसा देते हैं तो फसल का सबूत भी देखना चाहते हैं. फसल पूरी तरह से तैयार हो जाती है. चार दिन बाद उसे काटकर बेचना है. पर तभी एक युवक कर्नल को मारने पहुंचता है, मगर कर्नल के खुफिया कैमरे उन्हें इत्तला दे देते हैं और वह मारा जाता है. उसके बाद सेठ फिर जार्ज के साथ आता है. और एक कहानी सुनाकर अपने साथ बंदी बनाकर लायी गयी लड़की जया (आहाना कुमरा) को उनके पास सुरक्षित रखने के लिए छोड़ जाता है. धीरे धीरे जया, कर्नल का दिल जीत लेती है और कर्नल उसे उसकी मां के पास वापस भेजने का वादा कर देते हैं. उसके बाद एक महाराष्ट्यिन उन्हे मारने आता है. पर वह कर्नल की बजाय कर्नल के कुत्ते को मौत के घाट उतारता है. फिर कर्नल उसे मौत के घाट उतार देते हैं.

कर्नल के अरबपति बनने का दिन आ गया है. इसलिए वह जार्ज के पास जाते हैं, पता चलता है कि दो दिन से जार्ज लापता है. कर्नल फसल के एवज में एडवांस में मिली रकम एक लिफाफे में रखकर जार्ज के बेटे को देकर वापस आते हैं, तो उनके घर के पास ही उन पर हमला हो जाता है. उनके पेट में गोली लगती है.पर वह एक हत्यारे को भी मारने में सफल हो जाते हैं. उसके बाद घायल अवस्था में वह अपने घर के अंदर जाकर जया को कुछ पैसे देते हैं और उससे कहते हैं कि वह बिना देर किए उनकी मोटर सायकल से सीधे कोचीन एअरपार्ट जाए. वहां से वह अपनी मां के पास जा सकती है. लेकिन पहले वह मुंबई जाए. कर्नल कहता है-‘‘आप मुंबई जाइए. वहां कोलाबा की बिल्डिंग पूर्णिमा के चौथे माले पर आप जिस इंसान को पाएंगे. उससे मैं प्यार करता हूं. उससे कहना कि मैं अभी भी उससे प्यार करता हूं’’ जया को मजबूरन जाना पड़ता है. इधर कर्नल की मौत हो जाती है.

कम बजट यानी कि सिर्फ चालीस लाख रूपए की लागत में बनी फिल्म ‘‘द ब्लू बेरी हंट’’ पूर्णरूपेण नसिरूद्दीन शाह की फिल्म है. वह एक हीरो की तरह तीस फुट से नीचे कूदते हुए नजर आए हैं. फिल्म में दूसरे पात्र बीच बीच में आते रहते हैं. मगर वह शुरू से अंत तक हैं. लेखक व निर्देशक अनूप कूरियन ने मारिजुआना फसल का भी मानवीयकरण किया है. फिल्म में कर्नल मारिजुआना के पौधों के संग बातें करते हैं, उनसे उनका प्रिय गाना पूछते हैं और गाते हैं तथा एक गाना जया से भी इन मारिजुआना के पौधों के के लिए गंवाते हैं. फिल्म को केरला के वागामोन गांव की खूबसूरत लोकेशन पर फिल्माया गया है. फिल्म में गांजा या अफीम की खेती के साथ अपराधियों के जुड़ाव का भी जिक्र है. फिल्म में इस बात का भी जिक्र है कि मारिजुआना यानी कि गांजा की खेती पर प्रतिबंध है, मगर यह बहुत बेहतरीन दर्द नाशक दवा है. उच्च रक्चाप, डायबिटीज व कैंसर के मरीजों को मारिजुआना दी जाती है. इस तरह लेखक व निर्देशक अनूप कोरियन ने बड़ी खूबसूरती से मारिजुआना की खेती को कानूनन वैध करने के लिए एक बहस छेड़ने का काम भी कर दिया.

फिल्म की कहानी के मोड़ बनावटी नहीं लगते. मगर फिल्म धीमी गति से आगे बढ़ती है. बजट की कमी के चलते भी कुछ कमियां नजर आती हैं. आम मुंबईया मसाला फिल्मों की तरह फिल्म में नाचगाना नहीं है, मगर फिल्म लोगों को बांधकर रखती है. कैमरामैन कुछ बंधे हुए नजर आए हैं. वागामोन के जंगल की खूबसूरती परदे पर सही ढंग से नहीं उभर पायी है.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो नसिरूद्दीन शाह की अभिनय प्रतिभा पर सवाल नहीं उठाए जा सकते. जबकि वह कुछ सीन में आश्चर्यचकित करते हैं. जया के किरदार में अहाना कुमरा के लिए करने को कुछ खास नही है,पर वह फिल्म में खूबसूरत लगी हैं. विपिन शर्मा सहित दूसरे कलाकारों के हिस्से भी अभिनय प्रतिभा दिखाने का अवसर नहीं आता.

एक घंटे पचपन मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘द ब्लू बेरी हंट’’ का निर्माण ‘‘वीज्युअल पब्लिसिटी’’ के बैनर तले अरूण कोरियन ने किया है. लेखक व निर्देशक अनूप कोरियन हैं जो कि इससे पहले अपनी पहली फिल्म ‘‘मानसरोवर’’ के लिए कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय अवार्ड हासिल कर चुके हैं. फिल्म के संगीतकार परेश  नरेश, कैमरामैन विश्वमंगल तथा कलाकार हैं- नसिरूद्दीन शाह, अहना कुमरा, विपिन शर्मा, विनय फोर्ट व अन्य.

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