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थाइलैंड में डौल मेनिया

औनलाइन मेनिया के बारे में तो आप ने सुना ही होगा लेकिन क्या कभी आप ने डौल मेनिया के बारे में सुना है. तो अब सुन लें. थाइलैंड में इन दिनों डौल मेनिया छाया हुआ है. डौल रखने की सनक लोगों पर इस कदर हावी है कि वे इस के लिए हजारों रुपए तक खर्च करने को तैयार हो गए हैं. सिर्फ घर ला कर उसे शोकेस में ही नहीं रखते बल्कि उसे अपने साथ हर जगह घुमाने भी ले जाते हैं. जो खुद खाते हैं वो उसे भी औफर करते हैं. अपने बच्चे की तरह उस की हर छोटीबड़ी चीजों का खयाल रखते हैं यानी बिलकुल चाइल्ड जैसी केयर.

यहां तक कि कुछ लोग जब रात को डौल को अपने साथ सुलाते हैं तो बीचबीच में उठ कर देखते रहते हैं ताकि डौल को किसी प्रकार की कोई परेशानी न हो. इस के लिए वे अपनी नींद तक को ताक पर लगा देते हैं.

आखिर हो भी क्यों न इतना प्यार. एक तो लुक वाइज बिलकुल चाइल्ड जैसी लगती है और दूसरा जब इसे रखने के पीछे कहा जा रहा हो कि जो इसे रखेगा वो जल्द ही अमीर बन जाएगा. अमीर बनने की चाह हर किसी में होती है और जब एक डौल रखने भर से काम बन सकता है तो भला कौन इसे रखना पसंद नहीं करेगा. तभी तो थाइलैंड में डौलों की बाढ़ आ गई है.

यहां के लोग डौल को चाइल्ड ऐंजल नाम दे रहे हैं और उन के साथ सैल्फी खींच कर उसे सोशल साइट्स पर भी अपडेट कर दुनिया को हैरान कर रहे हैं.

लोगों में देखादेखी की आदत बहुत होती है उसी देखादेखी ने थाइलैंड में डौलों के प्रति लोगों की दीवानगी को बढ़ावा दिया है. सेलेब्स ने इस डौल को सब से पहले अपने पास रखा फिर तो हर किसी ने इसे रखना शुरू कर दिया. यहां तक कि अब कई होटलों में भी डौल को साथ लाने पर विशेष छूट दे कर लोगों को डौल रखने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है.

लेकिन जहां तक बात समझ आ रही है तो वो यही है कि चीन से बड़े पैमाने पर ऐसी डौलें लाने का उद्देश्य भ्रामक प्रचार के जरिए अपने कारोबार में बढ़ोत्तरी करना है.

कैसी शिक्षा, जिसमें देशद्रोह के आरोप लगें

किशोरावस्था में किशोरों के मन में रोमांस, रोमांच, मौजमस्ती और कैरियर से भी पहले देशभक्ति का जज्बा होता है. यह बात अलग है कि अन्य इच्छाओं की तरह वे इसे खुल कर व्यक्त नहीं करते. इसी उम्र में वे सिस्टम यानी व्यवस्था के बारे में सोचते हैं, उस का विश्लेषण करते हैं और इस के प्रति अपनी राय कायम करते हैं.

यह राय आमतौर पर अच्छी नहीं होती. देश के प्रति तो कतई नहीं, क्योंकि जब उन्हें अपने चारों ओर भाईभतीजावाद, भ्रष्टाचार, पाखंड, घूसखोरी, जातिगत व धार्मिक भेदभाव, शोषण, अपराध और घोटाले इफरात में होते दिखते हैं तो वे देश चलाने वालों के प्रति आक्रोशित हो उठते हैं. किसी भी स्कूल या कालेज में देखें छात्रों के बीच बहस का एक बड़ा मुद्दा मौजूदा सिस्टम ही होता है. ‘मैं अगर प्रधानमंत्री होता तो यह कर डालता, वह कर डालता,’ जैसे जुमले बोलने से शायद ही कोई छात्र अपनेआप को रोक पाता हो. ये बातें और जोश नादानी नहीं, बल्कि आने वाले कल के देश के आधार लेते विचार हैं.

इन टीनएजर्स को नजरंदाज करने की स्थिति में कोई नहीं है खासतौर से वैचारिक संगठन, राजनीतिक दल तो कतई नहीं, इसलिए तरहतरह के टोटकों से छात्रों को अपने पाले में खींचने की कोशिशें लोकतंत्र की स्थापना के बाद से ही होती रही हैं. ये कोशिशें अब शबाब पर हैं, क्योंकि छात्र लोकतंत्र के सही माने समझने लगे हैं कि इस में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है और इसे जो भी हम से छीनेगा वह हमारा और देश का दुश्मन ही होगा.दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में बीते दिनों जो हाई वोल्टेज ड्रामा हुआ वह छात्रों के लिहाज से बहुत बुरा था. शिक्षण संस्थानों में क्या हो रहा है यह इस मामले से पता चला कि कैसे प्रतिभाशाली नेताओं की कमी से जूझ रहे राजनीतिक दल  और वैचारिक संगठन छात्रों की ऊर्जा पर अपनी रोटियां सेंक रहे हैं और इन सरकारी एजेंसियों का बेजा इस्तेमाल भी कर रहे हैं.

कन्हैया कुमार नामक एक साधारण छात्र रातोंरात महानायक बन गया, लेकिन पूरे मामले में छात्रों की निगाह में दोषी सरकार ही रही, जो निहायत ही स्वाभाविक बात है, क्योंकि इस हाहाकारी मामले में सब से ज्यादा दुर्गति अगर किसी की हुई तो वे छात्र ही हैं, जो कैरियर बनाने के लिए दिनरात हाड़तोड़ मेहनत कर पढ़ रहे थे. इन छात्रों को पुलिस, कानून और अदालत का कतई तजरबा नहीं, न ही छात्र चाहते हैं कि पढ़ाई के दौरान उन्हें इन की जरूरत पड़े. लग ऐसा रहा है मानो देशभर के छात्रों को एक धमकी दे दी गई है कि अगर बोले तो अंजाम यही होगा, लेकिन जरूरी नहीं कि हर दफा कन्हैया जैसा हीरो पैदा हो.

क्या है घटना

जेएनयू का नाम देश के नामी और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में शुमार है. किसी भी होनहार छात्र का सपना यहां पढ़ने का होता है. ऐसा ही एक मामूली खातेपीते घर का छात्र बिहार के बेगुसराय जिले का कन्हैया कुमार जेएनयू से पीएचडी कर रहा है. कन्हैया के पिता अपाहिज हैं और मां की कमाई से घर खर्च चलता है जो आंगनबाड़ी सेविका हैं. उन की आमदनी महज 3,500 रुपए महीना है. सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि अन्य छात्रों की तरह कन्हैया किन अभावों में पलाबढ़ा है. घटना के दिन यानी 9 फरवरी को जेएनयू के छात्रों के एक समूह ने कश्मीर पर आधारित एक कार्यक्रम ‘द कंट्री विदाउट पोस्टऔफिस’ का आयोजन किया था. इस दिन फांसी पर चढ़ाए जा चुके आतंकी अफजल गुरु की बरसी भी थी.

आरोप है कि छात्रों ने कार्यक्रम में भारत विरोधी और पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाए. ‘हमें चाहिए कश्मीर की आजादी’, ‘अफजल गुरु जिंदाबाद’, ‘कितने अफजल मारोगे, हर घर से अफजल निकलेगा’ जैसे नारे लगे. एक शिक्षण संस्थान में छात्रों द्वारा इस तरह के नारे लगाना चिंता का विषय था, लिहाजा जैसे ही इस कार्यक्रम का वीडियो वायरल हुआ और न्यूज चैनल्स पर दिखाया गया तो देखते ही देखते जेएनयू पर देशभर में हल्ला मच गया. 2 दिन बाद कन्हैया कुमारको दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. आरोप राष्ट्रद्रोह का लगाया और धारा 124ए के तहत मामला दर्ज किया गया. इस बीच मचे दंगल और बवंडर के दौरान सभी लोगों को यह पता चला कि कन्हैया औल इंडिया स्टूडैंट फैडरेशन का अध्यक्ष भी है और खुले तौर पर वामपंथी विचारधारा का हो कर उस का कट्टर समर्थक ही नहीं बल्कि हिस्सा भी है. एक साल पहले जेएनयू छात्रसंघ चुनाव में उस ने आइसा के उम्मीदवार को हराया था, लेकिन अपने भाषणों में वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और एबीवीपी जो आरएसएस का आनुषंगिक संगठन है को हमेशा निशाने पर लेता रहा था.

दोटूक कहा जाए तो वह भगवा खेमे का घोर विरोधी है. 11 फरवरी तक देश के लोग यही सोचते और कहते रहे कि जेएनयू में पढ़ाई के नाम पर देशद्रोह का पाठ्यक्रम चलता है और इस यूनिवर्सिटी पर वामपंथियों का कब्जा है. यह प्रचार करने में एबीवीपी का रोल अहम रहा, जिस ने छात्रसंघ चुनाव की खुन्नस निकालने का हाथ आया मौका गंवाया नहीं. इधर वामपंथी भी चुप नहीं बैठे और खुल कर कन्हैया के समर्थन में आ गए कि वह निर्दोष है. वामपंथियों ने सीधेसीधे सरकार पर हमला बोला कि वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला दबा रही है यानी इस मामले पर जैसी कि उम्मीद थी राजनीति शुरू हो गई. माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी  और डी राजा ने सरकार विरोधी मोरचा संभाला हुआ था. उन का साथ कांगे्रस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी दिया और सीधे कन्हैया समर्थक छात्रों का हौसला बढ़ाने जेएनयू कैंपस पहुंच गए और जम कर नरेंद्र मोदी सरकार की खिंचाई की. फिर तो जिस के मन में जो आया उस ने जम कर जहर उगला. भाजपा राहुल और येचुरी को भी देशद्रोही करार देती रही तो पलटवार में ये लोग सरकार पर मुंह बंद करने का आरोप मढ़ते रहे.

कन्हैया की गिरफ्तारी के बाद एक मुसलिम छात्र उमर खालिद का नाम सुर्खियों में आया तो मामला और गरमा गया. आग में घी डालने का काम प्रोफैसर एस आर गिलानी ने भी दिल्ली के प्रैस क्लब में एक पत्रकार वार्त्ता आयोजित कर किया, उन्हें भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. उमर फरार हो गया जिस के बारे में कहा गया कि वह एक आतंकवादी का बेटा है और वह और गिलानी दोनों ही कश्मीर समर्थक हैं. इधर कन्हैया खुद को बेगुनाह बताता रहा लेकिन उस की बात किसी ने नहीं सुनी. उलटे जब उसे पेशी के लिए दिल्ली की पटियाला हाउस अदालत ले जाया गया तो वकीलों के एक गुट ने उस पर हमला कर दिया.

अभी तक यह साबित नहीं हुआ था कि वीडियो में दिख रहे और नारे लगा रहे छात्र कन्हैया और उमर ही हैं. इस के बाद संसद में भी इस मसले पर दंगल हुआ, जिस में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी का भाषण इतनी सुर्खियों में रहा कि सोशल मीडिया पर उन्हें देवी और दुर्गा कहा गया.

घटना से ज्यादा शर्मनाक

इस लंबेचौड़े ड्रामे में शिक्षा और शैक्षणिक परिसरों की गतिविधियों की चर्चा हाशिए पर चली गई. जेएनयू पुलिस छावनी बना, जिस के चलते छात्र दहशत में रहे. किसी ने यह नहीं पूछा कि विश्वविद्यालय परिसर में क्यों छात्रों ने नारे लगाए थे. यह सच है पर वे कौन थे, इस की जांचपड़ताल और पहचान करने की कोशिश क्यों नहीं की गई? इन छात्रों ने कोई हत्या नहीं की थी, हिंसा, तोड़फोड़ या आगजनी भी नहीं की थी, इस के बावजूद इन्हें गुनाहगार मानते हुए इन के साथ आम मुजरिमों जैसा बरताव क्यों किया गया?

जो एबीवीपी खुल कर कन्हैया और उमर के विरोध में आई थी वह धीरेधीरे अपने कदम वापस खींचने लगी, तो बहस और चर्चा का रुख पलट गया. कहा यह भी गया कि प्रदर्शनकारी छात्रों को एबीवीपी की शह थी और जानबूझ कर यह नाटक किया गया था. अब तक लोग यह भी मानने लगे थे कि छात्र कोई भी हो एक दफा मकसद से भटक सकता है पर देश विरोधी नारे नहीं लगा सकता, तो भगवा खेमा खिसियाता नजर आया. असल बहस भी इसी वक्त पटरी पर आई कि क्या देशभक्त वही है जो खुद को फख्र से हिंदू कहे और वंदे मातरम के नारे लगाए? क्या यही लोकतंत्र है, जिस में इन्हें ही अपनी बात कहने का अधिकार है किसी वामपंथी को नहीं? क्या गैर भगवा या गैर हिंदू विचारधारा का आदमी स्वत: ही राष्ट्रद्रोही हो जाता है?

बहस राष्ट्रद्रोह की परिभाषा और उदाहरणों पर भी हुई. ये बातें एकदम बेमानी नहीं थीं जो दरअसल एबीवीपी की पोल खोलती थीं कि इस छात्र संगठन पर उम्रदराज लोगों का कब्जा है और ये लोग भगवा नीति और सोच थोपने पर आमादा हैं. जेएनयू तो इस के लिए एक सुनहरा मौका था. मार्च के पहले हफ्ते तक इस मसले पर छाया कुहरा छंटा तो पता चला कि वायरल हुए वीडियो से छेड़छाड़ की गई थी और कन्हैया पर राष्ट्रद्रोह का मामला प्रथम दृष्टया साबित नहीं हुआ, इसलिए उसे अंतरिम ही सही, जमानत भी मिल गई. अदालत ने कमोवेश वही चिंता जाहिर की जो विवाद की शुरुआत में लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन जाहिर कर चुकी थीं कि देखा यह जाना चाहिए कि क्यों हमारे छात्र राह भटक रहे हैं.

जमानत पर छूटते ही कन्हैया ने सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खिंचाई की तो लोग उस के मुरीद हो उठे, खासतौर से इस वाक्य पर कि हम भारत से नहीं भारत में आजादी चाहते हैं. 5 मार्च को अपनी पत्रकार वार्त्ता में कन्हैया ने खुल कर अपने मन की बात भी कह डाली कि उस का आदर्श अफजल नहीं बल्कि रोहित वेमुला है. गौरतलब है कि दलित छात्र रोहित वेमुला ने कालेज प्रबंधन प्रताड़ना से तंग आ कर हैदराबाद में खुदकुशी कर ली थी. जाहिर है कन्हैया जिस आजादी की बात कर रहा है वह सवर्ण और सामंतवाद से छुटकारा पाने की है जिस का रास्ता राजनीति तो कतई नहीं. शिक्षण संस्थाओं में पनपता जातिवाद और वर्गभेद है जिस के खिलाफ अब उस तबके के छात्र बिगुल बजाने लगे हैं जो सदियों से शोषित रहे हैं.

दरअसल, रोहित और कन्हैया जैसे छात्रों का आक्रोश और भड़ास गुरुकुल व्यवस्था से चली आ रही है जिस में अर्जुन को हीरो बनाए रखने को एकलव्य का अंगूठा काट लिया जाता था, जिस में पढ़ने का अधिकार राजकुमारों और ऊंची जाति वालों को ही होता था. अब लोकतंत्र के चलते हर कोई पढ़ रहा है तो समाज पर से ऊंची जाति वालों का दबदबा खत्म हो रहा है और वे यह साबित करना चाहते हैं कि कोई अल्पसंख्यक या छोटी जाति वाला छात्र देशभक्त नहीं हो सकता. वह तो स्वाभाविक रूप से देशद्रोही है, क्योंकि वह सिस्टम को धार्मिक नजरिए से भी बदलने की बात कर रहा है. भले ही कन्हैया अब सधे और मंजे नेताओं की तरह भाषण देने लगा हो पर इतना तय है कि उस के बहाने एक सच फिर उजागर हुआ है कि भाजपा समर्थित भगवा खेमा देश में अपने सिवा किसी और को नहीं देखना चाहता. एबीवीपी के बुढ़ाते छात्र नेता लोकतंत्र की नहीं रामराज्य की बात कर रहे हैं. इसलिए हर बार चुनावों और बहसों में भी मुंह की खा रहे हैं.

जेएनयू के मामले में भी ऐसा ही हुआ पर वह छात्रों के हितों की नहीं बल्कि चिंता की बात है. जब तक कोई हिंसक वारदात न हो तब तक शिक्षण संस्थानों में पुलिस का प्रवेश वर्जित होना जरूरी है. छात्रों को गिरफ्तार किया जाना उन का मनोबल तोड़ने वाली बात है और उन्हें बगैर जुर्म साबित हुए जेल भेजा जाना तो उन के अधिकारों का हनन है. छात्रों को देशद्रोही कहना एक विचारधारा की अगुआई करने वालों का पूर्वाग्रह है. छात्रों को भी पूरा अधिकार है कि वे देश के मौजूदा हालात का आकलन, मूल्यांकन और विश्लेषण करें और उसे व्यक्त भी करें, जिस से नई पीढ़ी क्या सोच रही है यह पूरा देश जाने. इन्हीं टीनएजर्स के पास अब खुले विचार और नएनए आइडियाज होते हैं, इन्हें प्रोत्साहित किया जाना चाहिए न कि जेएनयू जैसे ड्रामे के चलते हतोत्साहित करना चाहिए.

अगर कन्हैया व उमर जैसे जागरूक और बुद्धिजीवी छात्र यह सोचते और कहते हैं कि देश अतिवादियों यानी भगवाधारियों के हाथ में जा रहा है तो वे गलत नहीं हैं. उन को इसीलिए वामपंथी और कांगे्रस समर्थित कह कर राजनीतिक विवादों और थानों में घसीटा जाता है कि वे उस राजनीति का हिस्सा बन गए जिस पर आम लोग ज्यादा ध्यान नहीं देते, क्योंकि राजनीति में आने के बाद छात्रों का जोश ठंडा पड़ जाता है और वे मकसद से भटक जाते हैं. कन्हैया जैसे छात्रों की तादाद करोड़ों में है जो सरकार और प्रधानमंत्री की वादाखिलाफी और हिंदुत्व प्रभावित नीतियों से खफा हैं. इस का यह मतलब नहीं कि वे देशद्रोही हैं बल्कि उन की आवाज कुचलने व उन्हें देशद्रोही साबित करने की साजिश रची जाती है तो यह निश्चित रूप से उन की शिक्षा में व्यवधान डालने जैसी बात है.

देश के माहौल पर जो पैनी नजर टीनएजर्स रख सकते हैं उतनी तो व्यावसायिक होता वह मीडिया भी नहीं रख सकता जो खुद 2 विचारधाराओं के बीच फंसा पिस रहा है. अगर कुछ छात्रों को देश का माहौल दलित और अल्पसंख्यक विरोधी लग रहा है तो इस की वजहें भी हैं जिन पर से बवाल मचा कर ध्यान हटाने की कोशिश शिक्षण संस्थाओं में दहशत फैला कर की जा रही है.

समय बड़ा अनमोल

आज के किशोर हर परीक्षा में सफलता तो पाना चाहते हैं, लेकिन उस के लिए समयानुकूल प्रयत्न नहीं करते जबकि उन्हें एकएक मिनट का फायदा उठाना चाहिए. ऐसा कोई नहीं जिसे सफलता पाने की चाहत न हो. सभी सफल होने के लिए अपनेअपने स्तर पर प्रयास करते हैं. भांतिभांति के लक्ष्य निर्धारित किया करते हैं. कोई साहित्यकार बनना चाहता है तो कोई अभिनेता. किसी का लक्ष्य डाक्टर बनना है तो किसी को इंजीनियर बनने की चाहत है. लेकिन लक्ष्य हासिल करने के लिए जो एक प्रमुख बात है, उस पर गौर करने से अकसर वे चूक जाते हैं और वह है, समय का सही उपयोग.

दुनिया के उन तमाम लोगों, जो अपनेअपने क्षेत्र में सफलता की चोटी पर पहुंचने में कामयाब हुए, के संस्मरणों से ज्ञात होता है कि उन लोगों ने समय के महत्त्व को बखूबी समझा एवं उस का पूरापूरा सदुपयोग किया. किसी भी लक्ष्य को हासिल करने की पहली शर्त यही है कि आप अपना प्रत्येक कार्य समय पर करें और व्यर्थ में समय न गंवाएं. एक कहावत भी है, ‘यदि कोई एक कौड़ी को तुच्छ समझता है तो वह कभी सहस्र प्राप्त नहीं कर सकता.’ ठीक इसी तरह जीवन का एक भी क्षण व्यर्थ में नष्ट करने वाले व्यक्ति सफलता हासिल नहीं कर सकते.

जीवन का प्रत्येक क्षण मूल्यवान है इसलिए सफलता हासिल करने की चाहत रखने वाले व्यक्ति को चाहिए कि वह समय के महत्त्व को समझे. प्रत्येक पल बहुमूल्य होता है, इसलिए हर पल का सदुपयोग करें. काम के मामले में समय की पाबंदी का विशेष ध्यान रखें. एक बार अमेरिका के राष्ट्रपति जौर्ज वाशिंगटन के सचिव देर से दफ्तर पहुंचे. कारण पूछे जाने पर वे बोले, ‘‘श्रीमान, घड़ी की सुस्त रफ्तार के कारण मुझे देर हो गई.’’ वाशिंगटन ने तुरंत कहा, ‘‘महोदय या तो आप अपनी घड़ी बदलिए या फिर मुझे अपना सचिव बदलना पड़ेगा.’’

इंगलैंड के प्रख्यात उपन्यासकार वाल्टर स्काट की सफलता का राज समय का पूरापूरा सदुपयोग ही था. व्यर्थ में वक्त बरबाद करना उन्हें कतई पसंद नहीं था. उन की दिनचर्या प्रात: 5 बजे से आरंभ हो जाती थी. नाश्ता करने से पहले ही उन के दिन के काम का अधिकांश हिस्सा समाप्त हो जाता था. उन्होंने एक नौजवान को एक बार सलाह देते हुए कहा था, ‘समय पर ठीक ढंग से काम करने की आदत डालो. कुछ करना हो, जल्दी कर डालो. काम करने के बाद ही आराम करो. काम खत्म करने से पहले आराम करने का खयाल तो दिमाग में आने भी मत दो.’ आइंस्टाइन ने भी कहा है कि समय ही मनुष्य का निर्माता है. अगर हम समय के महत्त्व को समझें तथा अपना समय सही ढंग से गुजारें तो दुनिया की कोई भी ताकत हमें सफलता हासिल करने से नहीं रोक सकती.

गंभीरता से पड़ताल करें तो ज्ञात होगा कि हम अपनी जिंदगी का 15वां हिस्सा भी सही ढंग से व्यतीत नहीं करते. उदाहरण के लिए एक ही दिन व रात को लें. 6 घंटे की स्वस्थ नींद एवं 6 घंटे बीचबीच में आराम या दूसरे कामों में लगाने के बाद पूरे 12 घंटे आप के पास होते हैं. 12 में से और 2 घंटे भी छोड़ दें, तब भी कुल 10 घंटे एकदम खरे आप के पास बचते हैं. क्या आप वास्तव में इन 10 घंटों को भी सही ढंग से व्यतीत करते हैं? इन 10 घंटों में भी तल्लीन हो कर काम करते हैं? अगर 10 घंटे भी आप अपने लक्ष्य के प्रति गंभीर हो कर काम नहीं कर पाते, तो आप सफलता पाने के हकदार कैसे हो सकते हैं?

सफल होने के लिए तो समय के महत्त्व को समझना ही होगा. समय की बरबादी सफलता की परम शत्रु है और सफलता का मित्र है, समय का सदुपयोग. इसलिए अभी वक्त है अगर आप अब तक भी वक्त के महत्त्व को नकारते आए हैं तो इसी क्षण से अपना रवैया बदल दीजिए. कहा भी गया है कि वक्त बड़ा बलवान है. इसलिए समय की ताकत को समझिए. जो वक्त आप ने व्यर्थ में व्यतीत कर दिया, उसे भूल जाइए. गुजरा हुआ वक्त लौट कर नहीं आता. इसलिए उस का मातम मनाने से कुछ हासिल भी नहीं होने वाला. आप इसी क्षण से अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए जीजान से जुट जाइए. समय के महत्त्व का पूरा ध्यान रखिए. एक पल भी जाया न होने दीजिए. वह दिन दूर नहीं, जब सफलता आप के कदम चूमेगी.

नई टीमें, नया अंदाज, अब चढ़ेगा आईपीएल का बुखार

आईसीसी ट्वंटी 20 विश्वकप की खुमारी खत्म हो चुकी है और अब नए तेवर, नई  टीमों और बदले हुए अंदाज के साथ इस फॉर्मेट के सबसे लोकप्रिय टूर्नामेंट इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) का बुखार चढ़ने जा रहा है.

आईपीएल का नौ अप्रैल से शुरू होने वाला नौंवां संस्करण इस बार कई मायनों में पिछले आठ संस्करणों से अलग होगा. पिछले आठ संस्करणों की दो टीमें चेन्नई सुपरकिंग्स और राजस्थान रायल्स भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते दो सत्रों के लिए बाहर हो चुकी हैं और उनकी जगह गुजरात लायंस और राइजिंग पुणे सुपरजाएंट्स को लाया गया है.

टूर्नामेंट में कुल आठ टीमें हैं लेकिन माहौल बिल्कुल बदल चुका है. पुरानी दो टीमों के कई खिलाड़ी दो नई टीमों में पहुंच चुके हैं. चेन्नई के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी इस बार पुणे टीम की कप्तानी संभाल रहे हैं जबकि आठ साल तक उनके टीम साथी रहे सुरेश रैना गुजरात का नेतृत्व कर रहे हैं. धोनी ने आईपीएल में सबसे ज्यादा 96 मैचों में कप्तानी की है और उनका सफलता प्रतिशत 61.05 है. ऑलराउंडर सुरेश रैना आईपीएल के शीर्ष स्कोरर हैं और उन्होंने लगातार 132 मैच खेलकर 3699 रन बनाए हैं.

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास ले चुके तेज गेंदबाज जहीर खान दिल्ली डेयरडेविल्स की बागडोर संभाल रहे हैं. जहीर के साथ ही संन्यास लेने वाले विस्फोटक बल्लेबाज वीरेंद्र सहवाग अब किंग्स इलेवन पंजाब के साथ खिलाड़ी के रूप में नहीं बल्कि मेंटर के रूप में उतरेंगे. राजस्थान रायल्स के साथ खिलाड़ी, कप्तान और मेंटर के रूप में लंबी पारी खेलने वाले राहुल द्रविड़ नौंवें सत्र में दिल्ली डेयरडेविल्स के मेंटर बने हैं और उन पर इस फिसड्डी टीम को सुधारने की भारी जिम्मेदारी होगी.

आईपीएल में स्पॉट फिक्सिंग और सट्टेबाजी के संकट से गुजरने के बाद आईपीएल के नौंवें संस्करण पर सभी लोगों की निगाहें रहेंगी. स्पॉट फिक्सिंग और सट्टेबाजी का मामला हालांकि आईपीएल के छठे संस्करण का था लेकिन उसके बाद दो संस्करण पुरानी आठ टीमों के साथ निकल गए लेकिन नौंवें संस्करण में दो नई टीमें आने से काफी कुछ बदल चुका है.

यह भी देखना दिलचस्प होगा कि एक सप्ताह पहले समाप्त हुए ट्वंटी 20 विश्वकप का आईपीएल पर कैसा असर रहता है. विश्वकप समाप्त होने के एक सप्ताह बाद ही आईपीएल शुरू हो रहा है और ट्वंटी 20 के ओवरडोज को क्रिकेटप्रेमी कितना पचा पाते हैं, इस पर आईपीएल की सफलता निर्भर करेगी. पिछले दो महीनों में एशिया कप और विश्वकप ट्वंटी 20 फॉर्मेट के थे और आईपीएल इसी प्रारूप में खेला जाना है. इसमें फर्क सिर्फ इतना ही होगा कि आईपीएल टीमों में विदेशी और भारतीयों का रोमांचक तालमेल रहेगा.

आईपीएल शुरू होने से पहले बांबे हाईकोर्ट में यह मामला भी उठाया गया था कि महाराष्ट्र में सूखे के कारण इस राज्य में होने वाले आईपीएल मैचों को दूसरी जगह शिफ्ट किया जाए. हालांकि आईपीएल अध्यक्ष राजीव शुक्ला ने साफ किया था कि मुंबई, पुणे और नागपुर में होने वाले आईपीएल मैचों को दूसरी जगह शिफ्ट नहीं किया जाएगा.

आईपीएल नौ इस बार कई मायनों में अलग होगा. आईपीएल में पहली बार एलईडी स्टम्प्स का प्रयोग किया जाएगा. विश्वकप में भी एलईडी लाइट स्टम्प्स काफी सफल रहे थे और आईपीएल में इनके इस्तेमाल से इस टूर्नामेंट का आकर्षण काफी बढ़ जाएगा.

टूर्नामेंट का पहला मुकाबला गत चैंपियन मुंबई और नई टीम पुणे के बीच खेला जाएगा. नौंवें सत्र के लीग दौर में कुल 56 मुकाबले खेले जाएंगे. प्लेऑफ 24, 25 और 27 मई को होंगे जबकि इस टूर्नामेंट का फाइनल 29 मई को मुंबई में खेला जाएगा.

अंडमान निकोबार: कल का काला पानी, आज धरती का स्वर्ग

भारतीय इतिहास में कभी ‘काला पानी’ के नाम से कुख्यात अंडमान निकोबार के द्वीप आज अपने प्राकृतिक सौंदर्य, विशाल व मनमोहक समुद्रतटों और एकांत की सुहानी छटा के जरिए सैलानियों को बारबार आने का आमंत्रण देते प्रतीत होते हैं. मनोहारी बीच, ऐडवैंचर आइलैंड व वाटर स्पोर्ट्स की अनूठी दुनिया में आप का स्वागत है. अंडमान की सौम्यता और उस के प्राकृतिक सौंदर्य को आधुनिक युग जरा भी कम नहीं कर पाया है. यहां आ कर आप को एक असीम शांति की अनुभूति होगी. साफस्वच्छ सागर तट, अतीत की स्मृतियों को अपने में समेटे खंडहर और अनेक प्रकार की दुर्लभ प्रजाति की वनस्पतियों को अंडमान आज भी अपने आगोश में संजोए हुए है.

भारतीय इतिहास में ‘काला पानी’ के नाम से प्रसिद्ध अंडमान द्वीप, अब एक बेहतरीन पर्यटक स्थल के रूप में विख्यात हो चुका है. यहां मौजूद सैलुलर जेल में स्वाधीनता संघर्ष के लिए अपने प्राण गंवाने वाले देशप्रेमियों की दास्तां दर्ज है. इस के साथ ही, यहां का लुभावना प्राकृतिक सौंदर्य और तटों से टकराती सागर की लहरों की मोहक सुंदरता अपनेआप में बेमिसाल है.

अंडमान निकोबार की भाषा हिंदी क्यों : 19वीं सदी के मध्य में ब्रिटिश तथा भारतीय लोग अंडमान निकोबार में बस गए थे. उन के सांस्कृतिक विकास के तहत हिंदी व अंगरेजी भाषा का विकास हुआ. अभी वहां पर हिंदू, सिख, ईसाई तथा मुसलमानों की मिलीजुली आबादी है. लगभग 15 प्रतिशत हिंदी लिखते व बोलते हैं बाकी लोग बंगाली, तमिल, मलयालम, पंजाबी, तेलुगू व निकोबारी बोली का इस्तेमाल करते हैं.

सामाजिक स्थिति : अंडमान निकोबार द्वीप समूह जिसे हम मिनी इंडिया भी कह सकते हैं क्योंकि यहां की 50 प्रतिशत आबादी 1947 व उस के बाद यहां आ कर बस गई थी. खास बात यह रही कि यहां पर लंबे समय तक जेल में रह रहे कैदी भी जेल से छूटने के बाद यहीं बसते चले गए. बंगाली शरणार्थी, जो पूर्व पाकिस्तान से आए थे, ने भी यहीं शरण ले ली थी. सो, मुसलमानों की जनसंख्या दूसरी जातियों से अधिक है. यहां सभी धर्मों के लोग मिलजुल कर रहते हैं. ये समाज की हर गतिविधि से जुड़े रहते हैं.

खेती के लिए जमीन : यहां प्रत्येक परिवार के पास 5 एकड़ जमीन है. प्रत्येक परिवार को सरकार द्वारा 1,050 रुपए घर बनाने व जानवरों के रखरखाव तथा फसलों के बीज के लिए दिए जाते हैं.

क्या खरीदें : अंडमान निकोबार द्वीप समूह में खरीदारी के लिए सागरिका एंपोरियम प्रसिद्ध है. यहां से वस्त्र, गहने, आदिवासियों द्वारा बनाई गई डौल्स, पुस्तकें तथा सजे हुए समुद्री शंख आदि वस्तुएं खरीदी जा सकती हैं.

कुछ अनजानी बातें : शब्द अंडमान और निकोबार मलय भाषा से लिए गए हैं. निकोबारी यहां की मुख्य भाषा नहीं हैं. यहां के आदिवासी पर्यटकों से ज्यादा बातचीत करना पसंद नहीं करते. सब से बड़े समुद्री कछुए का घोंसला यहीं पर है. व्यावसायिकमछलीपालन पर यहां प्रतिबंध है. सब से बड़ा और्थ्रोपौड नामक समुद्री जीव यहां पर पाया जाता है. भारतीय करैंसी के 20 रुपए के नोट पर अंडमान निकोबार के आइलैंड का चित्र अंकित है. यह द्वीप तितलियों की पसंदीदा जगह है.

जीवनशैली : अंडमान निकोबार में सड़कें साफसुथरी हैं. यहां के लोगों में सरलता बहुत है. बेईमानी देखने तक को नहीं मिलती. टैक्सियां दाम तय कर के चलती हैं. अंडमान निकोबार में सभी धर्मों व प्रांतों के लोग रहते हैं. इन में आपस में इतना भाईचारा है कि यहां कभी जातीय दंगे नहीं हुए.

दर्शनीय स्थल

प्राकृतिक खूबसूरती से भरपूर अंडमान निकोबार में कई स्थल देखने लायक हैं :

सैलुलर जेल : यहां के प्रमुख दर्शनीय स्थानों में से एक है सैलुलर जेल. यह कारागार 7 शाखाओं में बंटा हुआ है. इस कारागार के पास ही स्थित है एक पुराना पीपल का पेड़ जो सैकड़ों भारतीय स्वाधीनता सेनानियों पर किए गए अंगरेजी सरकार के अत्याचार का मूक गवाह है. ब्रिटिश शासकों ने सैलुलर जेल की नींव 1897 में रखी थी. इस के अंदर 694 कोठरियां हैं जिन्हें इस तरह बनाया गया था कि कैदियों का आपस में मेलमिलाप न हो पाए. औक्टोपस की तरह कई शाखाओं का फैलाव लिए इस विशालकाय कारागार के अब केवल 3 अंश बचे हैं. इस कारागार की दीवारों पर उन शहीदों के नाम खुदे हैं जिन्होंने देश पर अपने प्राण न्योछावर कर दिए. जेल के पास एक संग्रहालय स्थित है. इस में उन अस्त्रशस्त्रों को सुरक्षित रखा गया है जिन से स्वाधीनता सेनानियों पर अत्याचार किए जाते थे. इस के साथ ही कुछ दुर्लभ दस्तावेज भी मौजूद हैं.

कार्बिन कोव्स बीच : हरेभरे वृक्षों से घिरा कार्बिन कोव्स बीच एक मनोरम स्थल है जहां आप समुद्र में डुबकी लगा कर तैरते हुए पानी के नीचे की दुनिया का अवलोकन कर सकते हैं. लेकिन इस से पहले ज्वार का समय और पानी के बहाव के संबंध में पूरी जानकारी प्राप्त करना जरूरी है. सैलानी यहां सूर्यास्त का अद्भुत नजारा भी देखते हैं. यह ‘बीच’ प्राकृतिक खूबसूरती के लिए जाना जाता है.

रौस आइसलैंड : पोर्टब्लेयर के नजदीक स्थित है ‘रौस द्वीप’. छोटीछोटी खाडि़यों से घिरा यह छोटा सा द्वीप अपनी खूबसूरती के लिए जाना जाता है. 50 वर्षों से भी ज्यादा समय तक यह अंगरेजों के अधीन था. यहां स्थित ब्रिटिशकालीन खंडहरों में वास्तुशिल्प के बेजोड़ नमूने देखे जा सकते हैं. यह द्वीप 200 एकड़ में फैला हुआ है. फीनिक्स उपसागर से नाव द्वारा कुछ ही मिनटों में यहां पहुंचा जा सकता है.

पिपोघाट फार्म : 80 एकड़ में फैले पिपोघाट फार्म में दुर्लभ प्रजातियों के पेड़पौधों और अनेक जीवजंतुओं का अवलोकन किया जा सकता है. एशिया की सब से प्राचीन लकड़ी कटाई की मशीन ‘छाथम सौ मिल’ यहीं पर है. इस के अलावा, यहां 2 संग्रहालय और चिडि़याघर भी देखने योग्य हैं. पैलियोलिथिक युग में रहने वाले मनुष्यों की जीवनशैली का संपूर्ण चित्रण यहां स्थित समुद्री म्यूजियम में मौजूद है.

पोर्टब्लेयर : आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित अंडमान की राजधानी पोर्टब्लेयर में पर्यटकों की सुविधाओं और उन के मनोरंजन के कई इंतजाम किए गए हैं. यहां जलक्रीड़ा की भी व्यवस्था है जो एक अतिरिक्त आकर्षण का केंद्र है. यहां स्थित ‘माउंट हैरी’ पिकनिक स्पौट के रूप में मशहूर है.

किसी जमाने में पराधीन भारत से लाए गए बंदियों को पोर्ट ब्लेयर के पास वाइपर द्वीप पर उतारा जाता था. अब इसे भी एक पिकनिक स्पौट के रूप में विकसित कर दिया गया है. इसी तरह सिंक और रैडस्किन द्वीपों से भी सागर के सौंदर्य को निहारा जा सकता है. यहां पर सी बोटिंग, वाटर स्कीइंग, वाटर सर्फिंग, वाटर स्कूटर की सुविधाएं उपलब्ध हैं. यानी, यहां वाटर ऐडवैंचर गेम्स का भी लुत्फ उठाया जा सकता है.

कैसे जाएं

वायु मार्ग : इंडियन एअरलाइंस के विमान सप्ताह में 3 बार पोर्टब्लेयर से चेन्नई, दिल्ली और भुवनेश्वर आतेजाते हैं. सप्ताह में 3 बार ये कोलकाता के लिए भी उड़ान भरते हैं.

समुद्र मार्ग : कोलकाता, चेन्नई और विशाखापट्टनम से पानी के जहाज द्वारा पोर्टब्लेयर जा सकते हैं. जाने में 2-3 दिन का समय लगता है.

कहां ठहरें : द अंडमान बीच रिजौर्ट कराविन्स कोव, द अंडमान वे आईलैंड मैरीन हिल, पोर्टब्लेयर, निकोबारीब काटेजेज, मेगापोड नैस्ट जैसे कई होटलों में ठहरने की उचित व्यवस्था है.

कब जाएं

वैसे वर्षभर यहां खूब रौनक रहती है, फिर भी घूमने के लिए अक्तूबर से जून तक का समय यहां के लिए सब से उत्तम होता है.

गाड़ी का रजिस्ट्रेशन

मैं ने एक बार एक कामर्शियल गाड़ी खरीदी. मेरे दोस्त रमाकांत ने भी कुछ दिन बाद एक कामर्शियल गाड़ी खरीद ली. उस का ट्रांसपोर्ट का लंबाचौड़ा कारोबार था और इस क्षेत्र में उसे काफी महारत हासिल थी. अपनी गाड़ी का रजिस्ट्रेशन कराने में मेरी हालत खराब हो गई, क्योंकि कभी पैन कार्ड, तो कभी आधार कार्ड और न जाने कितने कागजात देखे, तब जा कर मैं रजिस्ट्रेशन करा पाया. नए आरटीओ अफसर से मेरा पहली बार वास्ता पड़ा था और मैं भुक्तभोगी था, यही जान कर मेरे दोस्त रमाकांत ने मुझ से सलाह लेने की सोची और एक दिन घर आ कर वह मुझ से रजिस्ट्रेशन के बारे में जानकारी लेने लगा.

मैं ने उसे बताया, ‘‘इस बार जो आरटीओ अफसर आया है, वह बहुत नियमकानून मानने वाला कड़क अफसर है. सारे कागजात खुद देखता है और गाड़ी के मालिक से भी मिल कर बात करता है.’’

‘‘क्याक्या कागजात देखता है यार?’’ रमाकांत ने पूछा.

मैं ने बताया, ‘‘आधार कार्ड, पैन कार्ड, वोटर कार्ड, बिजली का बिल, टैलीफोन का बिल, 4 पासपोर्ट साइज फोटो… तब कहीं जा कर रजिस्ट्रेशन करता है. इन 5 कागजात में से 3 को दिखाना जरूरी कर रखा है.’’ रमाकांत ने मजाक में कहा, ‘‘देखो यार, मैं तो केवल वोटर कार्ड और फोटो ले जा कर अपनी गाड़ी का रजिस्ट्रेशन करा लूंगा और रजिस्ट्रेशन भी उसी दिन ही होगा. इस के बाद पार्टी.’’ मैं ने सहमति में सिर हिला दिया. बात आईगई हो गई. नियम के मुताबिक कुछ दिन बाद मेरे दोस्त रमाकांत को भी आरटीओ दफ्तर से बुलावा आया. उस दिन वह अपने ट्रक ड्राइवर की गंदी सी लुंगी और करता पहन कर अफसर के कमरे में रसीद समेत दाखिल हुआ.

जब उस आरटीओ अफसर ने अंगरेजी में पूछा कि वाट डू यू ब्रिंग? तो जवाब में रमाकांत ने कहा, ‘‘साहब, मैं तो केवल हिंदी और उर्दू जानता हूं.’’वह आरटीओ अफसर बंगाली था. उस ने अपनी टूटीफूटी हिंदी में पूछा, ‘‘क्याक्या कागज लाया है?’’रमाकांत ने तुरंत अपना वोटर कार्ड और लुंगी में खींचे गए 2 फोटो आरटीओ अफसर के आगे कर दिए. आरटीओ अफसर ने जैसे ही पैन कार्ड कहने की कोशिश की, तो रमाकांत ने उसे बीच में ही टोक दिया और बोला, ‘‘साहब, मेरे पास पैंट नहीं है. 2 लुंगी और 2 कुरते हैं. मैं एक धोता हूं, एक पहनता हूं.’’

तब आरटीओ अफसर ने समझाया, ‘‘पैंट नहीं…’’ तो रमाकांत ने बीच में बात काटते हुए कहा, ‘‘हांहां, मुझे मालूम है कि पैंट पहनी जाती है, पर मेरे पास पैंट नहीं है. जब मैं ने डीलर से गाड़ी खरीदी थी, तब भी मैं ने लुंगी ही पहनी थी. देखिए, मेरे ये लुंगी वाले 2 फोटो,’’ कह कर वह आरटीओ अफसर के सामने फोटो वाला हाथ नचाने लगा.

इस से घबरा कर आरटीओ अफसर ने कहा, ‘‘और क्या कागज हैं?’’

‘‘और कुछ नहीं हैं. मैं ट्रक चलाता हूं, उसी में सोता हूं. कभीकभार मैं इधरउधर सो जाता हूं. मेरे पास केवल वोटर कार्ड है. जब पैसा लिया, तब तो डीलर बोला नहीं था कि रजिस्टे्रशन कराने के लिए पैंट पहननी होगी. मैं 53 साल का हूं, अभी तक पैंट नहीं पहनी. मैं लुंगी पहन कर ही गाड़ी चलाता हूं.’’

आरटीओ अफसर ने माथे पर आए पसीने को अपने सफेद रूमाल से पोंछा. वह उस घड़ी को कोस रहा था, जब उस ने इस देहाती ट्रक ड्राइवर को दफ्तर में बुलाया था.

इधर मेरा दोस्त यही सुर अलाप रहा था, ‘‘आप के दफ्तर में जब टैंपरेरी रजिस्ट्रेशन हुआ था और पैसा ले कर रसीद दी थी, तब भी नहीं बोला गया था कि पैंट पहनने वाला आदमी ही गाड़ी खरीद सकता है और उस का रजिस्ट्रेशन करा सकता है.

‘‘मैं किसी को नहीं छोड़ूंगा, टैंपरेरी रजिस्ट्रेशन के नाम से जो पैसा लिया है, वह भी वापस दो. अपनी रसीद रखो. मैं थाने में जाऊंगा और शिकायत करूंगा. मुझे अनपढ़ जान कर आरटीओ अफसर और डीलर ने मिल कर मेरी 35 साल की कमाई हजम कर ली.’’ आरटीओ अफसर हैरानपरेशान था. यह उस की जिंदगी का पहला और कड़वा अनुभव था. वह निढाल हो कर कुरसी पर बैठ गया. मेज पर रखे गिलास का पूरा पानी एक ही सांस में गटक गया, फिर रमाकांत को बैठाया, अपने हाथों से पीने के लिए पानी दिया और बोला, ‘‘ठीक है, तुम दस्तखत कर दो.’’

दस्तखत करते ही आरटीओ अफसर ने तुरंत रमाकांत को गाड़ी का रजिस्ट्रेशन कर के सर्टिफिकेट थमा दिया और हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘आप बेफिक्र हो कर लुंगी में ही गाड़ी चलाइए, कोई आप को पैंट पहनने को नहीं कहेगा.’’ रमाकांत हंसतेहंसते बाहर आ गया. दूसरे दिन मुझे रमाकांत ने चटकारे ले कर सारा मामला बताया कि कैसे उस ने गंवार बन कर एक पढ़ेलिखे अफसर को दिन में तारे दिखा दिए.

पाक टीम का कोच बनना चाहता है यह भारतीय खिलाड़ी

टीम इंडिया के पूर्व क्रिकेटर विनोद कांबली ने पाकिस्तान क्रिकेट टीम के मुख्य कोच बनने की इच्छा जाहिर की है. कांबली ने ट्विटर के जरिए पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड को अपनी इच्‍छा से अवगत कराया है.

गौर हो कि पीसीबी ने अपने ऑफिशियल पेज पर कोच के लिए विज्ञापन डाला था. कांबली ने विज्ञापन को देखते ही अर्जी डाल दी. उन्होंने ट्वीट कर कहा कि पीसीबी को कोच की जरूरत है मैं उपस्थिति हूं.

इसके बाद उन्होंने अपने एक पाकिस्तानी क्रिकेट फैन ने ट्वीट को रिट्वीट किया. उसने लिखा, कैसे वो एक खतरनाक देश में आकर रहेंगे. कांबली ने इसका जवाब दिया, मैं बेराजगार नहीं हूं, जब वसीम अकरम भारत आकर आईपीएल टीम के कोच बन सकते हैं तो फिर वो क्‍यों नहीं.

राधा, रवि और हसीन सपने

‘‘अगर तुम ने मेरी बात नहीं मानी, तो मैं खुद को खत्म कर लूंगी. फिर तुम मुझे कभी नहीं पा सकोगे. अगर तुम वाकई मुझ से प्यार करते हो, तो जैसा मैं कहती हूं, वही तुम्हें करना होगा.’’

रवि ने जब राधा की धमकी सुनी, तो उस के होश उड़ गए. उस ने कभी नहीं सोचा था कि राधा अपने ही भाई को मौत के घाट उतारने के लिए इस कदर बेकरार होगी.

रवि एक बार फिर उसे समझाते हुए बोला, ‘‘राधा, अगर हम ने तुम्हारे भाई उमेश की जान ली, तो हमें भी अपनी जवानी जेल की दीवारों के बीच गुजारनी पड़ सकती है.’’

रवि की बात सुनते ही राधा गुस्से में बोली, ‘‘तो ठीक है, तुम जाओ यहां से. मैं सबकुछ समझ गई. तुम्हें मेरी बात पर जरा भी भरोसा नहीं है…’’

इतना कह कर राधा ने रवि की तरफ से मुंह फेर लिया और करवट बदल कर दूसरी तरफ देखने लगी. रवि और राधा इस वक्त रवि के घर की दूसरी मंजिल पर पलंग पर बिना कपड़ों के लेटे थे. रवि का सारा मजा किरकिरा हो गया था, लेकिन वह हार मानने वाला नहीं था. रवि ने राधा को अपनी तरफ घुमा कर पहले जी भर कर चूमा और फिर जब दोनों प्यार की आग में दहकने लगे, तो एकदूसरे में समा गए.  राधा रवि को तब से चाहती थी, जब वह 12वीं जमात के इम्तिहान देने शहर के स्कूल गई थी. चूंकि राधा और रवि एक ही जगह के रहने वाले थे, इसलिए वहां उन की जानपहचान हो गई थी. राधा अगड़ी जाति की थी और रवि निचली जाति का, इसलिए दोनों के लिए परेशानी थी. लेकिन तकरीबन 3 साल तक लुकछिप कर मुहब्बत करने के बाद जब एक दिन राधा ने परिवार वालों को अपने और रवि के बीच प्यार और शादी की तमन्ना वाली बात बताई, तो उस के घर का माहौल अचानक खराब हो गया.

राधा की 5 बहनों की शादी हो चुकी थी. वह सब से छोटी थी. उमेश इन बहनों के बीच अकेला भाई था. उसी ने राधा के इस प्यार का विरोध किया था. राधा की मां काफी बूढ़ी हो चुकी थीं. पिताजी की मौत एक हादसे में पहले ही हो चुकी थी. उमेश को पिताजी की जगह क्लर्क की नौकरी मिल चुकी थी. उमेश शादीशुदा था, लेकिन राधा का बेहद विरोधी था, इसीलिए राधा भाई उमेश और भाभी साक्षी को अपना दुश्मन मानती थी. जब एक दिन रात को राधा रवि से फोन पर बातें कर रही थी, तभी उमेश ने उसे बातें करते देख कई तमाचे जड़ दिए थे. इतना ही नहीं, राधा के हाथ से मोबाइल फोन छीन कर उसे बड़ी बहन के घर छोड़ आया था. राधा रवि को किसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहती थी, वहीं उमेश की जिद थी कि वह राधा की शादी रवि से कभी नहीं होने देगा.

राधा चाहती थी कि रवि उमेश को जान से मार दे, ताकि उस के प्यार पर कोई पाबंदी लगाने वाला न बचे, लेकिन रवि राधा की बात मानने को तैयार नहीं था. वह जानता था कि राधा जो चाहती है, वह जुर्म है. लकिन रवि भी इश्क की चाशनी का स्वाद चख चुका था. लाख मना करने के बाद भी आखिर में वह वही करने को तैयार हो गया, जो राधा चाहती थी. तय समय और तारीख पर रवि को राधा के फोन का इंतजार था.

जब राधा का फोन आया, तब रवि तुरंत अपने मनसूबों को अंजाम देने चल दिया. राधा और रवि एकएक कदम सावधानी से आगे बढ़ा रहे थे. शायद इसीलिए जब वे दोनों एकसाथ उमेश के कमरे के पास पहुंचे, तो अचानक राधा ने रवि को हाथ से इशारा कर के रोक दिया और अकेले ही उस के कमरे में घुस गई. राधा ने सब से पहले कमरे की लाइट जलाई और देखा कि उमेश गहरी नींद में सो गया है या नहीं. जब राधा को इतमीनान हो गया कि उमेश गहरी नींद में है, तो उस ने रवि को अंदर बुलाया.

रवि ने उमेश को चादर में लपेट दिया और जोर से उस का गला दबाने लगा. उमेश छटपटा कर पलंग के नीचे गिर गया, लेकिन जल्दी ही राधा और रवि ने उस पर काबू पा लिया था. जब उन दोनों को भरोसा हो गया कि उमेश अब जिंदा नहीं है, तभी उन्होंने उसे छोड़ा था. फिर उन दोनों ने उमेश का बिस्तर ठीक किया और दोबारा चादर इस तरह ढक दी, जैसे वह गहरी नींद में सो रहा हो. फिर वे दोनों एकदूसरे को बांहों में भर कर चूमने लगे. उस समय राधा काफी सैक्सी लग रही थी. एक बार जब राधा की प्यास जाग जाती थी, तो आसानी से उसे संतुष्ट कर पाना सब के बस की बात न थी. रवि कसरती बदन का मालिक था. वह राधा को बेहद और भरपूर मजा देता था, इसीलिए राधा उसे जीजान से चाहती थी. राधा और रवि इस कदर इश्क में अंधे हो गए कि बगल में पड़ी लाश भी न दिखाई दी. दोनों वहीं पर प्यार के समुद्र में गोते लगाने लगे.

सुबह हुई, तो राधा बिलखबिलख कर पूरे महल्ले के सामने कह रही थी, ‘‘हाय, मेरा एकलौता भाई… कहां चला गया तू…’’ उस ने उमेश की मौत को स्वाभाविक मौत मानने पर सब को मजबूर कर दिया था.

पुलिस भी यही मान कर चल रही थी कि उमेश की मौत स्वाभाविक है कि तभी थाना इंचार्ज ने कहा, ‘‘उमेश की तो शादी हो चुकी है. इस की बीवी को आ जाने दीजिए.’’ तब राधा ने बड़ी चालाकी से कहा, ‘‘अरे साहब, वह तो इस से झगड़ा कर के मायके गई है. वह आ भी जाएगी, तो क्या करेगी. कम से कम मेरे भाई का अंतिम संस्कार तो समय पर हो जाने दीजिए.’’ राधा की बारबार अंतिम संस्कार की बात पर पहले तो सभी को अटपटा लगा, लेकिन जब वह लाश के सड़नेगलने की बात करने लगी, तो पुलिस भी इस के लिए राजी हो गई. पुलिस अपना काम पूरा समझ कर वहां से जाने ही वाली थी, तभी बाजी पलट गई. उसी वक्त उमेश की पत्नी साक्षी अपने मायके वालों के साथ वहां आ गई. साक्षी ने आते ही पुलिस से लाश का पोस्टमार्टम कराने की बात कही, तो राधा के होश उड़ गए. जैसे ही पुलिस को पोस्टमार्टम की रिपोर्ट मिली, तो पुलिस तुरंत हरकत में आ गई.

शक होते ही राधा को तुरंत गिरफ्तार कर पुलिस थाने ले आई. इस के बाद पुलिस रवि की खोज में दौड़ गई और उसे भी धर दबोचा. राधा और रवि के हसीन सपने बहुत देर तक पुलिस केसामने टिक न सके.

राधा खुद अपनी जबान से काली करतूत बयान करने लगी, ‘‘साहब, हम 6 बहनें हैं. उमेश मेरा एकलौता भाई था. लेकिन केवल कहने का भाई था. उसे अपनी बीवी के अलावा किसी और की चिंता न थी. वह अपनी बीवी के कहने पर मुझ पर जुल्म ढाता था, इसलिए मैं ने उसे खत्म करने का फैसला कर लिया था.

‘‘मैं मौके की तलाश में थी, तभी इस का अपनी बीवी से झगड़ा हो गया. वह अपने मायके चली गई. मैं ने मौका पा कर रवि को फोन कर के बुलाया था. हम दोनों ने उमेश का गला दबा कर उसे मार डाला था.

‘‘साहब, मैं रवि से प्यार करती हूं और उसे मैं किसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहती थी…’’ राधा बिना किसी झिझक के अपना बयान दे रही थी. रवि पुलिस के सामने जहां फूटफूट कर रो रहा था, वहीं राधा की आंखों में आंसू का एक भी कतरा नहीं था. उसे अपने हसीन सपनों के लिए भाई की जान लेने का जरा भी दुख नहीं था.

सामने आया जडेजा की शादी का कार्ड, 17 को चढ़ेंगे घोड़ी

टीम इंडिया के आलराउंडर रविंद्र जडेजा की शादी का कार्ड सामने आ चुका है. जडेजा 17 अप्रैल को अपनी मंगेतर रीवाबा संग सात फेरे लेंगे. शादी राजकोट में होगी.

शादी में क्रिकेट जगत और राज्य की कई राजनैतिक हस्तियां शामिल होंगी. वेडिंग कार्ड बहुत ज्यादा आकर्षक है. कार्ड पर सबसे ऊपर RR लिखा है जिसका मतलब है रविंद्र और रीवाबा. शादी राजकोट के कालावड रोड पर स्थित सीजंस होटल में होगी जिसमें दोनों परिवार के करीबी ही शामिल होंगे.

जबकि 18 तारीख को जडेजा के मूल गांव हाडाटोडा में ग्रैंड रिसेप्शन होगा. 16 तारीख को जडेजा की शादी का संगीत रखा गया है. मालूम हो कि आईपीएल के बीच में जडेजा की शादी होने के कारण टीम इंडिया के सर जी 14 अप्रैल को पुणे के खिलाफ और 16 अप्रैल को मुंबई इंडियन्स के खिलाफ होने वाले मैच में शामिल नहीं हो पायेंगे.

देश की पत्नियों एक हो जाओ

अगर सर्वोच्च न्यायालय ने सरदारों पर चुटकुलों पर कोई प्रतिबंध लगा दिया तो पक्की बात है कि आलिया भट्ट, रजनीकांत, जाटों और उन सब से पहले पत्नियों की सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के लिए लाइन लग जाएगी. सरदारों पर जोक्स इतने लोकप्रिय हैं कि स्वयं एक सिख लेखक खुशवंत सिंह ने सरदार जोक्स के कई कलैक्शन प्रकाशित किए थे और आज भी वे खूब बिकते हैं. सोशल मीडिया पर सरदार और संताबंता के चुटकुले भरे पड़े हैं पर उन्हें सिख जोक्स कहा जा सकता है या नहीं, अभी मालूम नहीं. पत्नियां अपने ऊपर बनने वाले चुटकुलों से उतनी ही परेशान हैं जितने सरदार, जाट, चौधरी और हरियाणवी. यह तो माना जा सकता है कि ये चुटकुले पूरी जमात को मजाक का निशाना बनाने के लिए गढ़े जाते हैं पर ये असल में खटाखट दोहराए तभी जाते हैं, जब इन में कुछ सत्यता हो.

समाज असल में उन समूहों को नीचा दिखाने के लिए चुटकुले गढ़ता है, जिन्हें अपमानित कर के उन का आत्मविश्वास कमजोर करा जा सके और वे सिर न उठा सकें. सिखों के प्रति चुटकुलों का राज भी शायद यही है कि जब साधारण वर्गों के लोग सिख धर्म अपना कर सामाजिक सीढ़ी चढ़ने लगे तो उन का मजाक उड़ाया जाने लगा. यही औरतों के साथ हो रहा है. जब से औरतों ने अपने अधिकारों की मांग करनी शुरू की और पतियों से बराबरी, तब से उन का मजाक बनाया जा रहा है ताकि सामूहिक रूप से उन्हें अपमानित करा जा सके. ऐसा दुनिया के सारे देशों में होता है. इंगलैंड और अमेरिका में पोलिश व ज्यू जोक्स प्रचलित हैं, क्योंकि सीधेसादे बेचारे गरीब पोलिश मजदूर व ज्यू शरणार्थी जब यूरोपीय शहरों में पहुंचते थे तो दूसरों की तरह बराबर का सम्मान पाने की कोशिश करते थे. वह न दिया जाए इसलिए उन पर चुटकुले गढ़े जाते और जम कर दोहराए जाते और ज्यादातर में उन्हें मूर्ख दिखाया जाता.

औरतों को भी सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना चाहिए, क्योंकि पत्नियों पर चुटकुले पूरे समूह का अपमान है. पत्नीभक्ति तो देशभक्ति की तरह है और जैसे देशभक्ति को चुनौती मिलते ही भगवा खून खौलने लगता है, पत्नीभक्ति पर आपेक्ष पर चुप नहीं रहना चाहिए. देश की पत्नियो एक हो जाओ, अपमान न सहो

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