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तारा और उनके टीनएज प्यार की कड़वी याद

बालीवुड में ‘‘मस्तराम’’ जैसी बोल्ड फिल्म से अपने अभिनय करियर की शुरूआत करने वाली तारा अलिषा बेरी ने टीनएज के कथानक वाली फिल्म ‘‘द परफैक्ट गर्ल’’ में अभिनय कर जबरदस्त शोहरत बटोरी थी. इन दिनों वह केपटाउन में फिल्मायी गयी विक्रम भट्ट निर्देशित अति बोल्ड व सेक्सी फिल्म ‘‘लव गेम्स’’ में अभिनय कर चर्चा में है.

फिल्म ‘द परफैक्ट गर्ल’’ में टीनएज लवर का किरदार निभा चुकी तारा अलीषा बेरी को भी टीनएज में किसी से प्यार हो गया था. जो बाद में उनका नहीं हो पाया. मगर उस प्यार को वह आज तक नहीं भुला पायी हैं. खुद तारा अलीषा बेरी कहती हैं-‘‘मेरा पहला प्यार रोमांटिक नहीं, बल्कि काफी ड्रामैटिक था. यह बड़ी दुःखद कहानी है. मैं बचपन से सोचती थी कि जब भी मैं किसी इंसान से मिलूंगी और मुझे लगेगा कि वह मेरी जिंदगी में होना चाहिए, तो वह हमेशा मेरी जिंदगी में रहेगा. पर ऐसा नहीं हो पाया.

मुझे लगता है कि उस वक्त मैं अपनी जिंदगी के बहुत खराब वक्त से गुजर रही थी. और वह पहला इंसान था, जिससे मैं अपनी जिंदगी की सारी बातें कह पायी थी. फिर वह जा रहा था, उसे वापस नहीं आना था, पर हम रोक नहीं पाए. यह टीनएज उम्र की बात है. यह वह उम्र होती है, जब आपके शरीर के हारमोंस बदल रहे थे. ऐसे वक्त में हम किसी से भी प्यार कर बैठते हैं. उस वक्त मेरी जिंदगी में वह युवक आया था, जिससे मैं हर तरह की बात कर रही थी. उससे जुड़ गयी थी. अब वह प्यार था या सिर्फ आकर्षण था, कह नहीं सकती. मेरे हिसाब से वह मेरा प्यार ही था. उसके बाद से वह मुझे मिला नहीं. पर मेरी मम्मी को लगता है कि शायद वह वापस आए और हमारी फिर से मुलाकात हो. मेरी मम्मी को उसके बारे में पता था.’’

टीनएज में प्रेमी को खोन के बाद प्यार को लेकर अपनी सोच के बारे में तारा अलीषा बताती हैं-‘‘अब मेरी जिंदगी में बहुत खुशी है. मैने देखा है कि लोग रिश्ते में एक दूसरे को बहुत नीचा गिराने का प्रयास करते हैं. अगर मैं किसी के साथ हूं, तो हम दोनों को एक दूसरे को सहयोग और खुशी देनी चाहिए. तनाव नहीं देना चाहिए. पर जब हम किसी के साथ जुड़े होते हैं, उस वक्त छोटी सी बात भी तनाव दे देती है. वैसे मैं किसी डिमांडिंग रिलेशनशिप में रहकर जिंदगी नही जी सकती. मेरी राय में जब आप अपनी जिंदगी में खुश होते हैं, तो आप कुछ न कुछ देते ही हो. फिलहाल मेरी जिंदगी में खुशी है.’’

ज्ञातब्य है कि तारा आलिषा बेरी की मां नंदिनी सेन भी अदाकारा हैं और जबकि किरण खेर उनकी सौतेली मां हैं.

गौरव अरोड़ा को मिला महेश भट्ट कैंप का सहारा

मशहूर माडल गौरव अरोड़ा इन दिनों बहुत खुश हैं. उनकी खुशी की वजह यह है कि उन्हे भी जान अब्राहम और इमरान हाशमी की ही तरह महेश भट्ट कैंप का सहारा मिल गया है. जी हां! जानन अब्राहम और इमरान हाशमी को बालीवुड में लांच करने का श्रेय महेश भट्ट को ही जाता है. अब महेश भट्ट की प्रोडक्शन कंपनी ‘‘विशेष फिल्मस’’ ने माडल गौरव अरोड़ा को एक नहीं बल्कि दो फिल्मों के लिए अनुबंधित किया है. सूत्रों के अनुसार ‘‘विशेष फिल्मस’’ के बैनर तले बन रही विक्रम भट्ट निर्देशित फिल्म ‘‘लव गेम्स’’ के अलावा ‘‘राज’’ सीरीज की चौथी फिल्म ‘‘राज 4’’ में भी गौरव अरोड़ा अभिनय करते हुए नजर आने वाले हैं.

अति बोल्ड व अति सेक्सी फिल्म ‘‘लव गेम’’ में गौरव अरोड़ा के साथ फिल्म ‘सिटी लाइट’ फेम अभिनेत्री पत्र लेखा और ‘मस्तराम’ फेम अभिनेत्री तारा अलीशा बेरी नजर आएंगी. जबकि फिल्म ‘‘राज 4’’ में गौरव अरोड़ा के साथ इमरान हाशमी भी होंगे. जान अब्राहम के बाद यह पहला मौका होगा जब गौरव अरोड़ा के रूप में महेश भट्ट किसी मशहूर माडल को बौलीवुड में ब्रेक दे रहे हैं.

केप टाउन में फिल्मायी जा चुकी फिल्म ‘‘लव गेम्स’’ से बौलीवुड में कदम रखने से उत्साहित गौरव अरोड़ा कहते हैं-‘‘भट्ट कैंप की फिल्म ‘लव गेम्स’ मेरे करियर की पहली फिल्म है. मैं बहुत खुश हूं कि जान अब्राहम, इमरान हाशमी और कंगना रानौट जैसे सफलतम कलाकारों को बालीवुड में लांच करने वाले महेश भट्ट जी ने मुझे अपनी कंपनी की फिल्म में अभिनय करने का मौका दिया है. मुझे लगता है कि किसी भी कलाकार के लिए बालीवुड में इससे बेहतरीन शुरूआत कुछ हो ही नहीं सकती. मेरी दूसरी खुशनसीबी है कि मुझे पत्रलेखा जैसी संजीदा अदाकारा के  साथ काम करने का अवसर मिला.’’

न्याय के इंतजार में पथराई बूढ़ी आंखें

चेहरे पर झुर्रियां, कंपकंपाती आवाज, आंखों पर मोटा चश्मा और बिना सहारे ठीक से चल पाने में असमर्थ 75 साल की एक बूढ़ी महिला को जिंदगी के आखिरी पड़ाव में जब सहारे की सख्त जरूरत थी तब उस पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. न्याय पाने के लिए पिछले 15 साल से कोर्टकचहरी के चक्कर लगाती उस बूढ़ी महिला की आंखों में उम्मीद की एक भी किरण अब नजर नहीं आती. हां, आंखों से आंसुओं की धार जरूर बहती है.

यह बूढ़ी महिला बेबस जिंदगी गुजार रही है. उस में जीने के लिए मोह नहीं है. मोह हो भी तो कैसे क्योंकि इस विधवा ने एकचौथाई जीवन तो पुलिसथानों व अदालतों के चक्कर काटतेकाटते गुजार दिया है. उस की बूढ़ी हड्डियों में अब इतनी जान नहीं है कि वह कोर्टकचहरी के चक्कर लगाती फिरे.

यह सचाई है जयपुर के चाकसू इलाके के कोटखावदा गांव की रहने वाली नर्बदा देवी की, जो 75 साल की हो चुकी है और पिछले 15 साल से दहेज उत्पीड़न के मामले में कोर्ट के चक्कर लगा रही हैं. नर्बदा देवी को दिल की बीमारी है. उस के जोड़ों में भी दर्द रहता है. जिस की वजह से वह ठीक से उठबैठ भी नहीं पाती. आंखों से दिखना भी कम हो गया है. 2 साल पहले ही उसे लकवे का अटैक पड़ चुका है, जिस से उस का दाहिना हाथ ठीक से काम नहीं करता.

नर्बदा के खिलाफ जो दहेज उत्पीड़न का मामला था उस की सुनवाई तकरीबन 15 साल से चल रही है. जब यह घटना घटी थी, उस समय नर्बदा की उम्र 60 साल रही होगी.

तारीख पर तारीख का एक और मामला है. दहेज उत्पीड़न के मामले में ही पिछले 12 साल से केस लड़ रहे 72 वर्षीय रामजीवन को बीते साल अगस्त माह में आजीवन कारावास यानी 14 साल की सजा हुई है. 72 साल की उम्र में हालत यह है कि उस को उठनेबैठने के लिए भी सहारे की जरूरत पड़ती है, तो आजीवन कारावास भोगने में उस की क्या हालत होगी, इस का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है. अगर यही फैसला 10 साल पहले आया होता तो शायद रामजीवन इसे झेलने की स्थिति में होता.

कहते हैं बच्चा और बूढ़ा एकसमान, यानी मातापिता को बच्चों के लालनपालन में जो मेहनतमशक्कत करनी पड़ती है, उन्हें जो प्यारदुलार देना पड़ता है, वैसी ही देखभाल बूढ़ों की भी करनी पड़ती है. ऐसे में किसी वृद्ध को जेल की कालकोठरी में डाल दिया जाना क्या उचित है?

सीखचों में कैद विचाराधीन कैदी

एक सवाल यह भी है कि अदालती मुकदमों में जटिलताओं के चलते विचाराधीन कैदियों को जेल में कैद रखा जा रहा है. दरअसल, इन में से ज्यादातर कैदी गरीब व कमजोर तबके से होते हैं, जो जमानत नहीं ले पाते और जेल में ही कैद रहते हैं. देश की अदालतों में आज लाखों मामले विचाराधीन हैं, जिन में सालोंसाल से फैसला नहीं हो पा रहा. देश में सैंट्रल जेल, जिला कारागार, उप कारागार, महिला कारागार, खुली जेलों समेत कुल 1,382 कारागारों में कैदियों की क्षमता 3 लाख 30 हजार निर्धारित है, लेकिन इन में कैदी इस से कहीं ज्यादा है. सब से चर्चित तिहाड़ जेल हो या छोटे शहर की कोई जेल, हर जगह निर्धारित तादाद से ज्यादा कैदी बंद हैं. इस वजह से कई बार कानूनव्यवस्था पर काबू पाना भी मुश्किल हो जाता है.

जेलों में कैद तकरीबन 4 लाख कैदियों में आधे से ज्यादा ऐसे हैं जिन्हें सजा नहीं मिली, फिर भी वे सालों से बंद हैं. जबकि न्याय का सिद्धांत कहता है कि सजा मिलने से पहले किसी को गुनाहगार नहीं माना जा सकता. इस समय देश की हरेक जेल में विचाराधीन कैदियों की तादाद 70 फीसदी तक है. जेलों में सजायाफ्ता कैदी कम और विचाराधीन कैदी ज्यादा हैं. ऐसे आरोपियों को भी जेल में कैद कर रखा है जिन का ट्रायल ही शुरू नहीं हुआ है. यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि ऐसे लोग भी हैं जिन पर आरोप साबित होने पर मिलने वाली सजा का पूरा वक्त ट्रायल के दौरान जेल में ही कट गया है. यह वाकई त्रासदीपूर्ण है. ऐसे लोगों की तादाद कम नहीं है, जो जमानती अपराध में कैद हैं. उन का हक है कि वे जमानत पर छूट कर बाहर आ सकें, लेकिन अभी तक वे जेल में कैद हैं.

महज शक के आधार पर सैक्शन 107 और 110 वाले मामलों में कैद लोगों को जेल में डाल कर रखा गया है. असलियत में इस का दोषी हमारा कानूनी सिस्टम ही है. यह बहुत ही धीमा काम करता है, जिस का खमियाजा लोगों को बेवजह भुगतना पड़ता है कि वे सालोंसाल जेलों में बंद रहते हैं. गरीब के लिए तो हालात और भी ज्यादा बदतर हो जाते हैं, अमीर बिरादरी तो जमानत पा कर बाहर आ जाती है. जब कानून साफतौर पर कहता है कि जमानती अपराध में जेल में कैद न रखा जाए और सैक्शन 107 व 110 में शक के आधार पर कैद में न रखें. तो सवाल है कि क्या मजिस्ट्रेट या हाईकोर्ट के जज को यह कानून मालूम नहीं है, जो विचाराधीन को जेल में रखवाते हैं.

जब कानून साफ है तो इन्हें कैद में रखने की प्रैक्टिस क्यों जारी है? सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा हुआ है, ‘बेल नौट जेल’ लेकिन अब तक इस का उलटा ही होता आया है, ‘जेल नौट बेल’, यानी जेल में अंदर बंद रखो, बाहर मत आने दो. इस गड़बड़ी में सब से बड़ा दोष हमारी पुलिस फोर्स का रहा है. वह शक के आधार पर लोगों को पकड़ लेती है और माली तौर पर कमजोर व पिछड़े लोगों को इस वजह से नहीं छोड़ती कि वे गायब हो जाएंगे. लेकिन यह तरीका सरासर गलत है. पुलिस हमेशा ‘एंटी पुअर’ सोच के नजरिए से काम करती है. यही वजह है कि अमीर लोग इस सिस्टम का भरपूर फायदा उठाते हैं.

जब इस सच को सब जानते हैं कि किसी आरोपी का 5 साल तक ट्रायल ही शुरू नहीं हुआ, तो बेहतर यही होगा कि उसे जेल में न डाला जाए. हालांकि हत्या, बलात्कार व डकैती जैसे गंभीर मामलों के आरोपी को जेल में रखा जा सकता है लेकिन मामूली चोरी के इल्जाम पर कैद रखना ठीक नहीं है. इसी तरह निचले स्तर पर न्यायिक तंत्र की बड़ी गलती है. मजिस्ट्रेट और सैशन जज कानून का पूरी तरह से पालन ही नहीं करते.

गलती पुलिस व अदालत की

आईपीएस अफसर रह चुके ज्ञानप्रकाश पिलानियां का कहना है, ‘‘अगर मामले की जांच चल रही है तो यह सरासर पुलिस की गलती है कि उस ने आरोपी को गिरफ्तार तो कर लिया लेकिन चार्जशीट पेश नहीं की है. इस बारे में जवाबदारी पुलिस की ही रहनी चाहिए. अगर ट्रायल में देरी हो रही है तो उस हालत में पुलिस और कोर्ट का कुसूर हो सकता है. लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि हमारे पुलिसिया तंत्र पर बहुत बड़ा बोझ है. जांच अफसर के पास इतने मामले होते हैं कि उस में न्याय कराने की ताकत ही नहीं होती.

‘‘अदालतों में भी मामले सालोंसाल लटके पड़े रहते हैं. जैसेतैसे अगली सुनवाई को लेने को ले कर टालमटोल चलती रहती है. ऐसा लगता है सारा सिस्टम ही इसी कवायद में लगा रहता है कि मामला खत्म ही नहीं होना चाहिए. ट्रायल को पुलिस और कोर्ट दोनों ही मुसीबत समझते हैं. दूसरी खामी यह है कि निचले स्तर पर बढि़या निगरानी ही नहीं होती है. सैशन कोर्ट और हाईकोर्ट को जांच करनी चाहिए कि मामले के निबटारे में इतनी देरी क्यों हो रही है और यह देरी जायज है या नाजायज?

‘‘अभी फुरती किसी भी स्तर पर दिखाई नहीं पड़ रही है. मामलों को लटकाते रहना वकीलों को भाता है. वे भी कमाई जारी रखने के लिए तारीख पर तारीख लेते रहते हैं. हर पेशी पर वे मोटी रकम वसूलते रहते हैं. दुनिया में कितने ही पुलिस और कानूनी तंत्र मैं ने देखे हैं. लेकिन जितनी देरी भारत में होती है उतनी और कहीं नहीं होती. बेहतर तो यह होगा कि हमें दंड न्याय प्रक्रिया को सुधारने पर जोर देना चाहिए था. सुधार भी ऊंचे लेवल से शुरू होना चाहिए था. रही बात पुलिस सुधार की, तो जब मैं पुलिस में था, तब भी खूब सुनी थी और अब भी वही सुन रहा हूं कि इस महकमे में कोई सुधार होता नहीं दिख रहा. ‘‘यही हाल न्यायिक सुधार का भी है. रसूखदार और अमीर लोगों को तो यह देरी अच्छी लगती है. वे पैसे के बल पर जमानत ले लेते हैं, तारीख बढ़वा लेते हैं लेकिन गरीब व कमजोर लोगों के लिए यह हालत भयानक है. मौजूदा सिस्टम ऐसा है जिस में बाहुबल, पैसा और राजनीतिक पहुंच वाले ही कामयाब हो रहे हैं.’’

मौजूद है नियम

दंड प्रक्रिया संहिता संशोधन अधिनियम 2005 के तहत संहिता में धारा 436-ए जोड़ी गई थी. इस धारा में कहा गया है कि विचाराधीन कैदी ने उसे अपराध के लिए दी जाने वाली सजा का आधे से अधिक समय जेल में काट लिया हो, तो उसे जमानत की जगह निजी मुचलके पर छोड़ा जा सकता है. ऐसे अपराधों को अलग रखा गया जिन में आजीवन कारावास या फांसी की सजा सुनाई जा सकती हो. साथ ही, यह भी कहा गया कि अपराध के लिए निर्धारित अधिकतम केंद्र अवधि से अधिक समय के लिए विचाराधीन कैदी को जेल में नहीं रखा जा सकता.

जेलों में विचाराधीन कैदियों की भारी तादाद को देखते हुए केंद्र सरकार रिहाई का प्रयास कर रही है. जनवरी 2013 में गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों के निजी सचिवों से रिहा होने के काबिल कैदियों की सूचियां तैयार करने और उन्हें रिहा करने के लिए जिला स्तर पर समीक्षा समितियां गठित करने को कहा था. ये समितियां जिला न्यायाधीशों की अध्यक्षता में बननी थीं और हर 3 महीने में समीक्षा की जानी थी, लेकिन ज्यादातर राज्यों में अभी तक समितियां ही नहीं बन पाईं.

क्या कहते हैं आंकड़े

कुल 3,85,135 कैदी देशभर की जेलों में बंद हैं. इन में से 66.2 फीसदी कैदी विचाराधीन हैं. देशभर की तमाम जेलों में इन विचाराधीन कैदियों की कुल संख्या 2,54,857 है. 1,226 विचाराधीन महिला कैदी अपने बच्चों के साथ जेल में रहने को मजबूर हैं. हैरान करने वाली बात यह है कि जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों में सब से ज्यादा तादाद युवाओं की है. 18 से 30 साल की उम्र के इन युवाओं की तादाद 46 फीसदी है. इस के बाद 40 फीसदी कैदी 31 से 50 साल की उम्र के हैं. दिलचस्प बात यह है कि 2,028 विचाराधीन कैदियों को जेल में 5 साल से ज्यादा का वक्त बीत गया है. गौरतलब है कि आपराधिक मामलों की सुनवाई में देरी की सब से बड़ी वजह, देश की जेलों में क्षमता से 12 फीसदी ज्यादा लोग कैद हैं. औसत 8 कैदियों पर एक जेलकर्मी है.

स्टार्टअप में महिलाओं की हिस्सेदारी की पहल

देश में रोजगार के अवसर बढ़ाने और उद्योगों के विस्तार के लिए 16 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘स्टार्टअप इंडिया’ को लौंच किया. इस से पहले मोदी देश में ‘मेक इन इंडिया’ की शुरुआत कर चुके हैं और इन दोनों योजनाओं का मकसद देश में कारोबार को बढ़ावा देना तथा औद्योगिक विकास के देशी स्वरूप को विकसित करना है. मेक इन इंडिया के तहत छोटी जरूरत की वस्तु से ले कर देश की सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण बड़ेबड़े उपकरणों तक का निर्माण देश में करना है. स्टार्टअप इंडिया के तहत हर हाथ को हुनर देना है. प्रत्येक व्यक्ति में कौशल विकसित कर के छोटेछोटे कारोबार शुरू कर के देश को औद्योगिक विकास की बुलंदियों तक पहुंचाना है.

प्रधानमंत्री के इस योजना को शुरू करने के बाद केंद्र सरकार के औद्योगिक नीति और संवर्द्धन विभाग के सचिव अमिताभ कांत ने स्पष्ट किया है कि महिलाओं की भागीदारी के बिना स्टार्टअप की सफलता अधूरी है. उन का विश्वास है कि समाज में असमानता को समाप्त करने के लिए और महिलाओं को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के वास्ते उन्हें स्टार्टअप से जोड़ने के लिए पहल करने की सख्त जरूरत है. महिलाएं उद्यमी बनें, इस के लिए उन के भीतर आत्मविश्वास विकसित करना जरूरी है. यह काम जिला स्तर पर औद्योगिक केंद्रों के जरिए ज्यादा प्रभावी तरीके से किया जा सकता है.

उन का मानना है कि महिलाएं स्टार्टअप इंडिया में ज्यादा भागीदारी कर सकें, इस के लिए छोटेछोटे कसबों में जिला औद्योगिक केंद्रों के जरिए कार्यशालाएं आयोजित की जाएंगी. यदि इस पहल पर ईमानदारी से काम होता है तो निश्चित रूप से महिलाओं की सामाजिक बराबरी में भागीदारी बढ़ेगी और स्टार्टअप योजना को गति मिलेगी.

सैक्स लाइफ: कबाड़ा करती गलतफहमियां

सैक्स ऐसा विषय है जिस के बारे में अंगूठाछाप इंसान से ले कर विशारद की उपाधि ले चुके विद्वान तक खुद को ऐक्सपर्ट मानते हैं और अपने मित्रों व परिजनों को अपने ज्ञान से सिंचित करते रहते हैं. लेकिन सच इस के ठीक विपरीत है. ज्यादातर लोग, चाहे वे अनपढ़ हों या डिगरीधारी, इस विषय पर आधीअधूरी, सुनीसुनाई और आधारहीन जानकारियां रखते हैं. इसी जानकारी के आधार पर वे अपने ज्ञान से मित्रों को सिंचित करने के बजाय चिंतित कर देते हैं. महिलाओं व पुरुषों में सैक्स को ले कर कई तरह की गलतफहमियां और भ्रामक जानकारियां रहती हैं, जिन की वजह से उन की सैक्स लाइफ चौपट हो जाती है. आइए, जानते हैं ऐसी ही कुछ गलतफहमियों और भ्रमों के बारे में. ह्यूमन सैक्सुअल रिस्पौंस के लेखक विलियम मास्टर्स एवं वर्जिनिया जौन्सन ने इन के बारे में काफी पहले बताया था, लेकिन ये भ्रम आज भी ज्यों के त्यों मौजूद हैं.

भ्रम : सैक्सुअल परफौर्मेंस पर फोकस करना जरूरी है

सच : यह एक बड़ी भूल है. सैक्स कोई प्रोजैक्ट नहीं है जिस की एकएक ऐक्टिविटी पूर्वनियोजित और डैडलाइन से बंधी हो. अगर आप पहले से सोची हुई योजना पर अमल करते हुए अपने पार्टनर को छूते हैं और उस की ठीक वैसी ही प्रतिक्रिया नहीं पाते हैं, तो आप को निराशा ही हाथ लगेगी और आप कभी ठीक से सैक्स का आनंद नहीं उठा पाएंगे. मास्टर्स एवं जौन्सन कहते हैं, परफौर्मेंस का विश्लेषण करने के बजाय चीजों को अपने तरीके से होने दें और सैक्स का भरपूर आनंद उठाएं.

भ्रम : एक ही पार्टनर के साथ बारबार सैक्स से ऊब होने लगती है.

सच : सैक्स में ऊब होने की वजह लंबे समय तक एक ही पार्टनर के साथ समागम नहीं, बल्कि अपने पार्टनर की इच्छाओं को ठीक से न समझ पाना है.

मास्टर्स एवं जौन्सन का मानना है कि जीवनभर एक ही साथी के साथ यौन समागम निरंतर आनंददायक हो सकता है, बशर्ते साथी की इच्छा का सम्मान किया जाए और उस का सहयोग किया जाए. संबंधों में ऊब से बचने और ताजगी बरकरार रखने के लिए यौन संबंधों को जरा क्रिएटिव, एडवैंचरस और प्लेफुल बनाना जरूरी है. नए तरीके, नई जगह आजमाना जरूरी है, न कि नया पार्टनर.

भ्रम : पुरुषों में सैक्स किशोरावस्था में चरम पर होता है, फिर ढलान पर आने लगता है.

सच : दरअसल, टेस्टोस्टेरौन नामक पुरुष हार्मोन, जो यौन संबंधों में रोमांच जगाता है, वह 18-19 वर्ष की आयु में सब से उच्च स्तर पर होता है, लेकिन यह गलत है कि इस के बाद यह ढलान पर आने लगता है. वैसे भी पुरुषों का सैक्स पूरी तरह फिजियोलौजी पर निर्भर नहीं करता. वह खुद के बारे में कैसा महसूस करता है, अपने पार्टनर के बारे में क्या सोचता है और उस के शरीर की सैक्सुअल संबंधों में कैसी प्रतिक्रिया है आदि सारी बातें सैक्सुअल परफौर्मेंस को प्रभावित करती हैं. अपनी हैल्थ और फिटनैस पर ध्यान देने वाले पुरुष अधेड़ावस्था या वृद्धावस्था में भी अपने जीवनसाथी के सहयोग से अच्छा सैक्स करने में सक्षम होते हैं.

भ्रम : सैक्स में महिलाओं को पुरुषों से कम दिलचस्पी होती है.

सच : अगर कोई महिला पूरी तरह से स्वस्थ है, प्रसन्नचित्त रहती है, उस में ऊर्जा है और समय भी है, तो उस में सैक्स इच्छा निश्चित तौर पर एक पुरुष से ज्यादा होती है. इस बात से लगभग सभी सैक्स स्पैशलिस्ट सहमत हैं. लेकिन फिर भी महिलाओं को ले कर यह भ्रम इसलिए व्याप्त है क्योंकि शुरू से ही वे ऐसे माहौल में पलीबढ़ी होती हैं जहां उन्हें सौम्य बने रहने, कम बोलने और सैक्स जैसे विषयों पर चर्चा करने से बचने की सलाह दी जाती है. भले ही आजकल कुछ महिलाएं सैक्स पर खुल कर चर्चा करने से नहीं कतरातीं पर अब भी ज्यादातर महिलाएं सैक्स के मामले में पैसिव रहती हैं और अपनी फीलिंग्स का खुल कर इजहार करने से बचती हैं. लेकिन इस का मतलब यह बिलकुल नहीं कि उन को सैक्स की इच्छा नहीं होती.

भ्रम : महिला को ‘खुश’ करने की जिम्मेदारी पुरुष की.

सच : बिलकुल गलत. और यह भी गलत है कि पुरुष को खुश करने की जिम्मेदारी महिला की होती है. विशेषज्ञ कहते हैं सैक्स न तो सिर्फ पुरुष द्वारा करने की चीज है न ही महिला द्वारा. सैक्स तो वह आनंददायक प्रक्रिया है जो स्त्री और पुरुष एकदूसरे के साथ करते हैं, इसलिए इस में किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि दोनों की जिम्मेदारी होती है कि वे एकदूसरे को खुश करने की कोशिश करें और अपने पार्टनर की पसंदीदा ऐक्टिविटीज करें. सैक्स क्रिया के दौरान पति या पत्नी को अपने साथी की जरूरत या उस की चाह के मुताबिक यौन क्रीड़ा कर के उसे संतुष्ट करना चाहिए.

भ्रम : हफ्ते या 10 दिन में एक बार ही सैक्स करना चाहिए, वरना ऊब होने लगती है.

सच : कई लोग कहते हैं कि सैक्स करने से कमजोरी आ जाती है, कई कहते हैं कि लंबे अंतराल पर सैक्स करने से ज्यादा आनंद आता है वरना ऊब होने लगती है. ये दोनों बातें गलत हैं. सैक्स ऐक्सपर्ट लौरी मिंट्ज कहते हैं, ‘‘आप हफ्ते में कितनी बार सैक्स करते हैं, यह आप की इच्छा पर निर्भर करता है. अगर आप बीमार नहीं हैं, कोई सैक्सुअल डिजीज से पीडि़त नहीं हैं या किसी प्रकार की मजबूरी नहीं है, तो आप अपनी इच्छानुसार यौन क्रीड़ा का आनंद उठा सकते हैं. सैक्स का मतलब रोज संभोग करना नहीं, एकदूसरे को पुचकारना, बांहों में लेना और दुलारना भी आनंददायक हो सकता है.’’

प्यार की बात करो

जब कभी

इश्क प्यार की बात करो

न कभी

जीतहार की बात करो

दो घड़ी ये

मिलन की हमारे लिए

कीमती हैं

दीदार की बात करो

डर गए तो

गए इस जमाने से हम

अब चलो

आरपार की बात करो

संग मिल के सनम

खाई थी जो कसम

वक्त है इकरार का

बात करो.

  – शंभु शरण मंडल

पोंगापंथियों का नया अड्डा: सोशल मीडिया

सोशल मीडिया यानी फेसबुक, वाट्सऐप और ट्विटर के जरिए पोंगापंथ को बढ़ावा देने का काम बड़ी तेजी से होने लगा है. फेसबुक और वाट्सऐप पर रोज ऐसे मैसेज सैकड़ों की संख्या में आते हैं जिन में पूजापाठ, हवनयज्ञ और तमाम तरह के दोषों को दूर करने के उपाय बताए जाते हैं. कुछ संदेशों में तो मैसेज फौरवर्ड करने के लिए कहा जाता है. मैसेज फौरवर्ड करने पर लाभ और न करने पर हानि का भय भी दिखाया जाता है. खास मौकों को छोड़ दें तो वाट्सऐप ग्रुप में सब से अधिक मैसेज पोंगापंथी विचारों को फैलाने वाले ही आते हैं. इस तरह के मैसेज से धर्म के धंधे को बढ़ावा मिल रहा है. सोशल मीडिया को हथियार बना कर इस काम को किया जा रहा है. पश्चिमी सभ्यता की आलोचना करने वाले पश्चिम से आई इस तकनीक की बुराईन कर के उस का सहारा ले रहे हैं.

सोशल मीडिया के जरिए धर्म और दूसरी तरह की बातों को एक से दूसरे तक पहुंचाने में कोई मेहनत नहीं करनी होती. फेसबुक पर शेयर कर के या वाट्सऐप पर फौरवर्ड कर के एक मैसेज को दूसरे तक पहुंचाया जाता है. एक बार मैसेज जब फौरवर्ड हो जाता है तो बहुत सारे लोग खुद भी अपनेआप ऐसे मैसेज को आगे भेजने लगते हैं. ऐसे मैसेज को मैसेज का ट्रेंड होना या वायरल होना भी कहा जाता है. फेसबुक पर ऐसे फोटो वाले मैसेज एकदूसरे को शेयर या टैग किए जाते हैं. वाट्सऐप पर फोटो को ओपन करने से लोग बचने की कोशिश करते हैं तो मैसेज को टाइप कर के भेजा जाने लगा. यह मैसेज एक जगह पर टाइप कर के वाट्सऐप किए जाते हैं. धीरेधीरे ये बहुत सारे लोगों तक पहुंच जाते हैं. सोशल मीडिया पर मैसेज के तेजी से ट्रेंड होने के रिकौर्ड में सब से ज्यादा धार्मिक मैसेज का है. अश्लील या फनी मैसेज भी धर्म के मैसेज से कम तेजी से फैलते हैं.

बड़ा माध्यम है वाट्सऐप ग्रुप

वाट्सऐप ग्रुप मैसेज और प्रचारप्रसार का सब से बड़ा जरिया बन गया है. एक ग्रुप में 100 मैंबर होते हैं. किसी ग्रुप में मैसेज पहुंचने का मतलब होता है कि वह 100 लोगों तक एक बार में ही पहुंच जाता है. ऐसे में अगर कोई मैसेज 100 ग्रुप में पहुंच जाए तो वह 10 हजार लोगों तक पहुंच सकता है. इतने लोगों तक पहुंचने के बाद मैसेज आगे भी फौरवर्ड होने लगता है. मैसेज को इस तरह से बनाया जाता है कि हर आदमी उस से अपना जुड़ाव महसूस करता है. मैसेज के संदेश से लोगों को धार्मिक रूप से डराने की कोशिश की जाती है. धर्म से जुड़ी सलाहें इस तरह के मैसेज में दी जाती हैं जो आदमी को अपने लाभ की लगती हैं. पोगापंथ का प्रचार करने वाले अब रोज राशिफल और दूसरे तमाम तरह के मुहूर्त को बताने लगे हैं.

धर्म का प्रचार करने वाले पहले भी इस तरह के साधनों का प्रयोग करते थे. पोस्टकार्ड और पैंफलेट के जरिए ऐसा प्रचार होता था. अखबारों में विज्ञापन व किस्सेकहानी के जरिए भी इस तरह के प्रचार किए जाते थे. ये सभी माध्यम खर्चे वाले होते थे. इन के जरिए संदेश को आगे फैलाने में परेशानी व समय भी लगता था. वाट्सऐप और फेसबुक के जरिए मैसेज को आगे पहुंचाने में समय व पैसा दोनों ही बचते हैं. ज्यादा लोगों तक और सीधी पहुंच होने से यह तेजी से लोकप्रिय होता जा रहा है. कुछ समय पहले धार्मिक भावनाओं को भड़काने में सोशल मीडिया का बड़ा हाथ सामने आया. कई जगहों पर प्रशासन द्वारा इस के खिलाफ कड़े कदम उठाए गए. धार्मिक प्रचार इस तरह के कानून के दायरे में न आने से बच जाता है. इस का कोई विरोध भी नहीं करता. इस वजह से इस को आगे बढ़ाने में अड़चन नहीं आती है.

मुफ्तखोरी का जरिया

वाट्सऐप पर मैसेज मुफ्तखोरी का जरिया बन गए हैं. इस के जरिए पितृयज्ञ, अतिथियज्ञ और ऐसे ही तमाम यज्ञ के जरिए संतमहात्मा के कपड़े पहनने वाले का इंतजाम हो जाता है. पढ़ेलिखे, नई उम्र के लोग इस तरह के धार्मिक कर्मकांडों को बहुत जानतेसमझते नहीं थे. अब इस तरह के मैसेज के जरिए उन को इन सब की जानकारी होने लगी है. वे जब कभी परेशानी में पड़ते हैं तो इस ओर उन का ध्यान जाता है. ऐसे मैसेज नई उम्र के युवाओं को बहकाने का काम करते हैं.

ऐसे मैसेज का प्रचार करने वाले अपने लिए दानदक्षिणा का इंतजाम कर लेते हैं. मैसेज ऐसे होते हैं जिन से यह लगता है कि हर समस्या का निदान यहां पर है. पुत्र या पुत्री प्राप्ति के लिए आयुर्वेद ग्रंथों का हवाला दे कर समझाया जाता है कि माहवारी के बाद कब संबंध बनाएं. मैसेज के जरिए केवल आदमी की सोच को ही प्रभावित नहीं किया जाता बल्कि उस के बैडरूम के अंदर बनने वाले संबंधों को भी प्रभावित करने का प्रयास होता है. मैसेजों में धर्म का प्रचार करने वाले संदेशों को तर्क और विज्ञान की कसौटी पर भी खरा साबित करने का प्रयास होता है. यज्ञ करने के पीछे तर्क दिया जाता है कि जल, वायु और पृथ्वी को इस के जरिए शुद्ध किया जा सकता है, यही नहीं, प्रदूषण को रोक कर ओजोन परत को भी बचा सकते हैं. मैसेजों में 5 तरह के यज्ञ को जरूर बताया जाता है.

दरअसल, यज्ञ और हवन के नाम पर कर्मकांड करने वालों को दक्षिणा मिल जाती है. इस तरह के मैसेज के विरोध में तर्क सहित कोई बात समझाने की कोशिश नहीं की जाती है कि जिस से पढ़ने वाला इस को सही न माने और तर्क सहित अपनी बात करे. इस तरह सोशल मीडिया के रूप में धर्म का प्रचार करने वालों को एक बड़ा हथियार मिल गया है. ऐसे में अगर सोशल मीडिया का प्रयोग करने वालों को सच समझाया नहीं गया तो वे धर्म के अंधविश्वास और रूढि़वादिता का शिकार हो जाएंगे. धर्म का प्रचार करने वालों के मुकाबले ऐसी बातों की पोल खोलने वालों की संख्या और प्रयास दोनों ही सीमित हैं.

हमारी बेडि़यां

बात मई महीने की है. मेरी बहू के चाचाजी की मृत्यु हो गई थी. उन की अरथी उठने में दोपहर के 12:30 बज चुके थे. धूप अपने चरम पर थी. चाचाजी के बेटे ज्यों ही पैर में चप्पल डालने के लिए आगे बढ़े, उसी समय एक बुजुर्ग ने उन से कहा, ‘अरे बेटा, यह क्या कर रहे हो, बेटे तो नंगेपैर ही अरथी उठाते हैं.’ हमारे शहर में शववाहन की व्यवस्था नहीं है तथा मुक्तिधाम भी बहुत दूर है. चिलचिलाती धूप में बिना चप्पल के नंगेपैर चलने के कारण चाचाजी के बेटे के पैरों में छाले पड़ गए और तीव्र गरमी के कारण उन्हें बुखार भी हो गया जिस की वजह से उन्हें अस्पतल में भरती रहना पड़ा.

– विद्यादेवी व्यास, रतलाम (म.प्र.)

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पूर्वी उत्तर प्रदेश में रिवाज है कि जब नई दुलहन आती है तो सब से पहले गृहप्रवेश के बाद बहू को रसोई में ले जाते हैं. सारा खाना जो उस के आने के उपलक्ष्य में बनवाया गया होता है उसे बहू से छुआ कर ‘बहुतबहुत’ कहलवाया जाता है. मान्यता है ऐसा कर घर हमेशा भरापूरा रहता है. मेरे एक रिश्तेदार के यहां शादी थी. बरात पास के शहर में गई थी. दूसरे दिन लौटने में शाम हो गई. बहू की प्रारंभिक रस्में करा कर उस की ननद व जेठानियां रसोई में ले गईं. एक तो यात्रा की थकान, दूसरे घूंघट. बहू ने आदेशानुसार खाने में उंगलियां डालना शुरू कर दिया. चूल्हे पर भरी कड़ाही कढ़ी रखी थी. बहू ने जैसे ही कढ़ी में उंगलियां डाल कर ‘बहुतबहुत’ कहना चाहा, मारे जलन के चिल्ला पड़ी. कढ़ी भीतर से बहुत गरम थी. बेचारी दो दिन तक इस अजीबोगरीब रिवाज के कारण उंगलियां पकड़े बैठी रही.

– निधि अग्रवाल, फिरोजाबाद (उ.प्र.)

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हमारी मौसी के बच्चे जीवित नहीं बचते थे, पैदा होते ही खत्म हो जाते थे. उन के यहां एक बेटा हुआ. वह 1 माह का हो गया. तभी गांव में एक ढोंगी बाबा आया. उस ने मौसी से कहा कि सूर्यग्रहण के समय इस बच्चे को कपड़े उतार कर घूरे पर डाल आना तथा एक पैर घूरे में गाड़ देना. आगे सब ठीक हो जाएगा. कुछ दिनों के बाद सूर्यग्रहण हुआ. मौसी ने बाबा के कहे अनुसार किया. सूर्यग्रहण खत्म होने के बाद मौसी उस बच्चे को घूरे पर से उठा लाईं. गोबर में पैर दबे होने के कारण पैर में संक्रमण हो गया. बच्चा बड़ा होता गया, पैर सड़ता गया. तमाम डाक्टरों से इलाज कराया, पैर का गलना जारी रहा. आखिरकार, घुटने के नीचे से पैर कटवाना पड़ा.

– एस पी सिंह, लखनऊ (उ.प्र.)

फिल्मों की फिसलती जबान

झल्ली पटाका, होर नचदी, साला खड़ूस, आज फिर पीने की तमन्ना है, कमीना है दिल, कुकु माथुर की झंड हो गई, फुकरे, कमीने, बंबू लग गया, हर फ्रैंड कमीना होता है और क्यूतियापा. ये तमाम अश्लील और गालियों के लहजे वाली जबान किसी और की नहीं, बल्कि उस सिनेमा की है जो इन दिनों समाज और समाज की जबान को गालियों भरे डायलौग, हिंगलिश टाइटल की खिचड़ी और स्लैंग भाषा के पैरों तले कुचलने पर आमादा है. शायद इसीलिए आज की फिल्मों के टाइटल, किरदार, थीम और संवाद व गाने के नाम बदजबानी से भरे पड़े हैं. इस से पहले तक तो फिल्मों में सिर्फ अश्लीलता और द्विअर्थी संवादों का रोना था लेकिन अब हिंदी के साथ अंगरेजी के बेस्वाद कौकटेल और गालियों के मौकटेल ने यूथ व टीन जैनरेशन की जबान ही गंदी कर दी है.

फिल्मकारों को शायद इस बात का इल्म नहीं है कि कुछ अलग करने के नाम पर जो फूहड़ता वे परोस रहे हैं वह तुरंत यूथ की जबानी डिक्शनरी में दर्ज हो जाती है. फिर वे आपसी संवादों में दोस्तों को फुकरे, फेल होने पर झंड हो गई या बंबू लग गया जैसी भाषा का बेपरवाही से प्रयोग करते हैं. ये सब फिल्मों की फिसलती जबान के साइड इफैक्ट ही तो हैं जो असर बन कर नैक्स्ट जैनरेशन की बातचीत के लहजे पर बदजबानी का लेबल चस्पां कर रहा है.

सालों पहले फिल्म खलनायक के विवादित गीत, ‘चोली के पीछे…’ पर बवाल मचाने वाले अब हनी सिंह के गाने ‘… में दम हो तो बंद करवा लो’ पर कितने मजे के साथ शादी और पार्टी में थिरकते हैं, सब जानते हैं. ‘शूटआउट ऐट वडाला’ में पौर्न स्टार सनी लिओनी पर फिल्माया गया बेहूदा गाना ‘लैला तेरी ले लेगी…’ बदजबानी की सभी हदें लांघ जाता है. सनी पर ही ‘मस्तीजादे’ में इतने अश्लील संवाद व दृश्य रचे गए हैं जिन्हें लिखना मुमकिन नहीं है. यही कहानी ‘क्या कूल हैं हम 3’ की भी है. मानो एडल्ट सर्टिफिकेट के साथ इन्हें किसी भी तरह के भौंडेपन को दिखाने का लाइसैंस मिल जाता है.

कह के लूंगावाले किरदार

अनुराग कश्यप की बहुचर्चित फिल्म ‘गैंग्स औफ वासेपुर’ के पोस्टर्स पर बोल्ड अक्षरों में ‘तेरी कह के लूंगा’ छापा गया था. इस पर गाना भी बना. इस स्लैंगनुमा वाक्य का असर देखिए कि फिल्म की रिलीज के पहले ही दिल्ली के जनपथ से ले कर लखनऊ और मुंबई के बाजारों में ‘तेरी कह के लूंगा’ लोगो वाली टी शर्ट की जोरदार बिक्री हुई. दोस्तों में ‘तेरी कह के लूंगा’ वाला मजाक शुरू हो गया.

फिल्मकारों के मानसिक दिवालिएपन का नमूना फिल्म ‘ग्रैंड मस्ती’ में दिखा. फिल्म में 3 अभिनेत्रियों के नाम क्रमश: रोज, मेरी और मारलो रखे गए. फिर इन नामों को एकसाथ रोज मेरी मारलो बारबार बोल कर न सिर्फ हंसी का विद्रूप चेहरा दिखा, बल्कि महिलाओं को भी स्लैंग के कीचड़ में घसीटा गया. इसी तरह फिल्म ‘फुकरे’ में एक किरदार का नाम चूचा था. रणबीर कपूर की फिल्म ‘ये जवानी है दीवानी’ में पहाड़ पर चढ़ने के दौरान एक महिला किरदार का संवाद है कि ‘तू पहाड़ चढ़ने आया है या लड़कियां…’ इस बदजबानी से न तो सैंसर को कोई एतराज है और न ही भाषा के तथाकथित ठेकेदारों को.

गालियों की कौमेडी

यशराज बैनर तले बनी फिल्म ‘शुद्ध देसी रोमांस’ में किराए के बराती अरेंज करने वाला एक मारवाड़ी किरदार हर दूसरे सीन में बहन की गाली देसी लहजे में ‘भेंडचो-भेंडचो’ बोल कर जबरन हंसाने की कोशिश करता है. इस बात की परवा किए बगैर कि ये भद्दी गाली सिनेमाघरों व टीवी में महिला व छोटेछोटे बच्चों के कानों में दर्ज हो रही है. ‘गैंग्स औफ वासेपुर’ में भी गालियां कौमिक अंदाज में दिखीं. एकता कपूर की फिल्म ‘रागिनी एमएमएस 2’ में तो अंगरेजी के एफ अक्षर वाली गाली चिल्लाचिल्ला कर दी गई. कुछ अरसे पहले तक प्रकाश झा की फिल्मों ‘गंगाजल’, ‘अपहरण’ आदि में लोकल जबान का पुट दे कर गाली परोसी जाती थी लेकिन तब फिल्म की थीम सीरियस होती थी और अब कौमिक. एकता कपूर की फिल्म ‘क्या कूल हैं हम 3’ और ‘मस्तीजादे’ पर तो सैंसर को 100 से ज्यादा कट और साउंड बीप लगाने पड़ रहे हैं.

फूहड़ टाइटल्स, हिंगलिश खिचड़ी

फिल्में हिट कराने के कुछ प्रचलित टोटकों में टाइटल को बोल्ड व स्लैंगनुमा बनाना भी शामिल है. एकता कपूर की फिल्म ‘कुकू माथुर की झंड हो गई’ को ही ले लीजिए. दिल्ली के टीनएजर्स के इर्दगिर्द बनी इस फिल्म में किसी का फेल होना, झंड होना बताया गया है. एमटीवी पर भी ‘झंड होगी सब की’ सीरियल प्रसारित हुआ. पहले इस शो का नाम ‘बकरा’ था लेकिन बीते सालों में जब शो की लोकप्रियता धुंधलाने लगी तो इस का नाम ‘झंड होगी सब की’ कर दिया गया. इस शो में सैलिब्रिटी को बेवकूफ बना कर उस के मुंह से कहलवाया जाता है कि मेरी झंड हो गई. ‘कमीने’ में शाहिद कपूर शान से खुद को कमीना कहते हैं. फिल्म ‘चश्मेबद्दूर’ में ‘हर एक फ्रैंड कमीना होता है…’ गाना दोस्ती की कितनी फूहड़ परिभाषा व्यक्त करता है, सोचने वाली बात है. इस तरह फिल्म ‘बंबू’, ‘ओ तेरी’, ‘ले गया सद्दाम’ जैसे टाइटल न सिर्फ भाषा से खिलवाड़ करते हैं बल्कि समाज के एक बडे़ तबके को गंदी बातें बोलना भी सिखाते हैं.

साजिद खान की फिल्म ‘हमशकल्स’ को गौर करें तो हिंदी या उर्दू में हमशक्ल के बहुवचन के लिए कोई अलग शब्द नहीं है. इस पर साजिद खान का बेतुका तर्क है कि फिल्म में 3 हमशक्ल हैं तो वे हमशकल्स हो जाएंगे. टाइटल के प्रति ऐसी लापरवाही कई फिल्मों में दिखाई पड़ी है. शाहिद कपूर की फिल्म ‘फटा पोस्टर निकला हीरो’ में ‘निकला’ को उच्चारण के हिसाब से ‘निखला’ लिखा गया था. टाइगर श्रौफ की फिल्म ‘हीरोपंती’ को ले कर किसी को खयाल नहीं रहा कि सही शब्द हीरोपंथी है. करण जौहर की फिल्म ‘हंसी तो फंसी’ को अंगरेजी में लिखते समय हंसी और फंसी में ‘एन’ लगाने की चिंता नहीं की गई. अंगरेजी अक्षरों का उच्चारण लिखते तो नाम हंसी तो फंसी होता. यह भाषा और जबान के साथ लापरवाही नहीं तो और क्या है. यह एक सांस्कृतिक सवाल है और इसे महज हिंदी के हित की चिंता के भीतर नहीं देखना चाहिए.

स्लैंग ट्रैंड और गुंडा

90 के दशक में मिथुन चक्रवर्ती फिल्मों में लगभग आउट होते जा रहे थे, लिहाजा उन्होंने अपनी तमाम जमापूंजी को ले कर ऊटी में होटल व्यवसाय शुरू किया और वहीं शिफ्ट हो गए. अपने नए बिजनैस को पुश करने के लिए मिथुन ने बी और सी ग्रेड की फिल्में इस शर्त पर स्वीकार कीं कि सारी फिल्म ऊटी में शूट होंगी और फिल्म का कास्ट ऐंड कू्र सिर्फ उन के ही होटल में ठहरेगा. इस तरह वे यूनिट के साथ न सिर्फ फिल्म चंद दिनों में पूरी कर लेते बल्कि उन के होटल भी खूब कमाई करने लगे. इस तरह महीने में मिथुन की 2 से 3 फिल्में रिलीज होतीं और छोटे शहरों में अच्छी कमाई भी करतीं. उस दौर की फिल्मों को मिथुन फैक्ट्री फिल्म कहा गया.

उसी दौर में सी ग्रेड फिल्मों के नामी निर्देशक कांति शाह ने मिथुन को ले कर फिल्म ‘गुंडा’ बनाई. फिल्म में हर किरदार का नाम गालियों जैसा था और संवादों में फूहड़ता कूटकूट कर भरी थी. बलात्कार के दृश्यों को फूहड़ हास्य और अश्लील अंदाज में पेश किया गया. अपने चीप और चीजी कथानक के चलते फिल्म ने आश्चर्यजनक तौर से सफलता हासिल की. इस की आलोचना भी हुई लेकिन इस ने एक कल्ट स्टेटस हासिल कर लिया. आज यूट्यूब पर यूथ इस फिल्म की मजेदार समीक्षा कर रहे हैं.

इन तमाम घटनाक्रमों को बताने का असल मकसद यह बताना है कि तब की बी और सी ग्रेड की फिल्मों के तेवर आज की ए गे्रड फिल्मों में पूरी तरह से नजर आ रहे हैं. कौन सोच सकता था कि आज की फिल्में अश्लीलता और भाषा के खिलवाड़ के मामले में ‘गुंडा’ जैसी फिल्मों को पीछे छोड़ देंगी.

सवाल यह है कि मानसिक दिवालिएपन के कगार पर खड़े फिल्म उद्योग को भाषा, व्याकरण के साथ इस तरह का भद्दा मजाक करने का हक किस ने दिया, समाज के नए तबके और नई पीढ़ी की जबान खराब करने का हक किस ने दिया. मनोरंजन के नाम पर दर्शकों के सामने परोसे जा रहे फूहड़पन के खिलाफ न तो सैंसर बोर्ड अपनी आवाज बुलंद करता है और न ही धर्म व संस्कृति के नाम पर बातबात में हंगामा मचाने वाले लोग आवाज उठा रहे हैं. आखिर कब तक सिनेमा की इस फिसलती जबान के साइड इफैक्ट से बेखबर फिल्मकार बदजबानी, अश्लीलता और भाषा के साथ खिलवाड़ कर कमाई का यह धंधा जारी रखेंगे?     

गजेंद्र चौहान: छात्रों के लिए युद्धिष्ठिर नहीं दुर्योधन

‘‘आ गए सत्संग में हम, संग सत् का हो गया, दुर्गति जाती रही, जब गुरु के मत का हो गया. परम आदरणीय, परम पूजनीय, आसाराम बापूजी को दंडवत् प्रणाम करता हूं…’’ ये शब्द गजेंद्र चौहान ने एक प्रवचन कार्यक्रम के दौरान आसाराम के लिए कहे थे.

गजेंद्र को आसाराम के साथ सभा में नृत्य करते हुए भी देखा गया. वही आसाराम, जो एक नाबालिग लड़की का रेप करने के मामले में जेल में बंद है.

धर्म के प्रचार के लिए गजेंद्र कई प्रकार के अंधविश्वास को गढ़ने वाले चमत्कारी लौकेट का विज्ञापन करते देखे गए. जब भी उन से देश के विकास की बात की गई, तो उन्होंने हमेशा नरेंद्र मोदी को धर्म का रखवाला बताया. उन की वजह से ही देश में कुछ होगा, अन्यथा नहीं, ऐसा वे कहते हैं.

वर्ष 1988 में टैलीविजन धारावाहिक महाभारत में चौहान ने युधिष्ठिर की भूमिका निभाई थी. इस के अलावा उन्होंने कई ऐसी फिल्मों में काम किया जिन्हें सी ग्रेड या ‘सौफ्ट पौर्न’ मूवी कहा जा सकता है. गजेंद्र चौहान की फिल्म और टैलीविजन इंस्टिट्यूट औफ इंडिया, पुणे में नियुक्ति को वहां के छात्र सिरे से नकारते आ रहे हैं. गजेंद्र का इस बारे में कहना है, ‘‘मैं 35 साल से इस क्षेत्र में हूं. जो काम मिला, उसे किया क्योंकि इंडस्ट्री में गौडफादर के बिना काम नहीं मिलता. कला का कोई ग्रेड नहीं होता. छात्रों का विरोध विपक्ष की साजिश है.’’

एफटीआईआई के छात्र उन की नियुक्ति को सत्ताधारी पार्टी द्वारा शक्ति प्रयोग मानते हैं. छात्रों का मानना है कि चौहान किसी भी रूप में उन का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते क्योंकि इस से पहले इस पोस्ट पर ए गोपालकृष्णन, गिरीश कर्नाड, सईद मिर्जा जैसे अनुभवी और प्रतिभाशाली लोगों की नियुक्ति हुई थी. उस लिहाज से गजेंद्र चौहान का ऐक्टिंग कैरियर सी ग्रेड का है.

नियुक्ति के तकरीबन 6 महीने बाद ही अभिनेता और भाजपा सदस्य गजेंद्र चौहान भारतीय फिल्म एवं टैलीविजन संस्थान में चेयरमैन का पदभार संभाल लिया. चौहान की नियुक्ति के विरोध में एफटीआईआई के छात्रों ने पिछले साल 12 जून से ले कर 28 अक्तूबर तक हड़ताल की थी. हड़ताल खत्म होने के बाद छात्रों ने कक्षा में जाना शुरू किया था लेकिन वे आज भी चौहान से संतुष्ट नहीं और आगे भी प्रदर्शन करते रहेंगे. दिल्ली के खामपुर गांव के रहने वाले गजेंद्र ने औल इंडिया मैडिकल साइंस से पैरामैडिकल की पढ़ाई पूरी की. वहीं काम किया. अभिनय के शौक की वजह से वे मुंबई आए और रोशन तनेजा के ऐक्टिंग स्कूल में अभिनय सीखा.

युधिष्ठिर की भूमिका उन के जीवन का टर्निंग पौइंट था, जिस में उन के काम की सराहना की गई. लेकिन बाद में उन्होंने कई बी और सी ग्रेड की फिल्मों में काम किया. अभिनय के साथसाथ उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया. भारतीय जनता पार्टी के साथ उन का नाम हमेशा जुड़ा रहा. उन का कहना है कि मैं ने कला में राजनीति से अधिक समय बिताया है. ऐसे में मुझे एक मौका एफटीआईआई में काम करने का मिलना चाहिए.

अभिनेता ऋषि कपूर छात्रों का समर्थन करते हैं. उन के हिसाब से छात्र अगर गजेंद्र को नहीं चाहते तो उन्हें उस पद से त्यागपत्र दे देना चाहिए. भाजपा समर्थक अनुपम खेर का भी कहना है कि गजेंद्र पढ़ेलिखे हैं लेकिन इस पद के लिए सिनेमा की अच्छी जानकारी रखने वाला व्यक्ति चाहिए. जो निसंदेह गजेंद्र में नहीं है. इस के अलावा रजनीकांत, अमिताभ बच्चन, श्याम बेनेगल, दिबाकर बैनर्जी आदि सभी ने अनुपम खेर के मत का ही समर्थन किया.

अगर चौहान के फिल्मी ग्राफ पर नजर डाली जाए तो पहली फिल्म ‘जंगल लव’ थी जिस में उन की भूमिका बहुत छोटी थी. ‘खुली खिड़की’ जैसा नाम से स्पष्ट है. ‘मर्डर मिस्ट्री’ में कई पात्रों के बीच गजेंद्र पर भी संदेह किया जाता है. गजेंद्र की फिल्मों की सूची अगर देखें तो निर्देशक ने उन्हें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने लायक समझा ही नहीं. इस बारे में गजेंद्र का कहना है, ‘‘बड़ी फिल्मों में महत्त्वपूर्ण भूमिका केवल गौडफादर होने से मिलती है. इस का अर्थ यह नहीं है कि मैं अभिनय नहीं कर सकता. अभी भी मैं टीवी पर ‘अधूरी कहानी हमारी’ में पिता की भूमिका निभा रहा हूं.’’

गजेंद्र चौहान ने काफी जद्दोजहद के बीच एफटीआईआई के अध्यक्ष का पद संभाला है. आंदोलनकारी छात्रों ने ‘गजेंद्र गोबैक’ के नारे लगाए. चौहान ने आंदोलन को ले कर कहा, ‘‘इस से सब से अधिक नुकसान छात्रों का हो रहा है. उन का शैक्षणिक सत्र खराब हो चुका है. यहां प्रवेश पाना बहुत कठिन होता है. पूरे भारत से चुन कर हर विषय में केवल 10 छात्र ही प्रवेश पाते हैं. ऐसे में उन की शिक्षा ठीक से न हो पाना दुखदायी है. मैं सकारात्मक सोच के साथ छात्रों की समस्याओं को निबटाना चाहता हूं. सरकार ने जिम्मेदारी दी है, उसे पूरा करने के लिए यहां पर हूं.’’ सरकार द्वारा किसी और को चेयरमैन बनाए जाने के सवाल पर उन का कहना था कि यह सरकार के ऊपर है कि वह किस का चुनाव करती है. ‘‘मैं काम पर विश्वास करता हूं. अगर मुझे मौका मिला है तो कर के दिखाऊंगा.’’ प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ उन का कहना है कि कानून अपना काम करेगा पर अगर वे मुझ से संपर्क करेंगे तो मैं अवश्य, जितना संभव होगा, सहायता करूंगा.

पुलिसिया कार्यवाही के बीच गजेंद्र चौहान ने एफटीआईआई में प्रवेश तो पा लिया है, अब देखना है कि आगे वे किस तरह से छात्रों के बीच अपनी साख जमाते हैं. विचारों का भगवाकरण जो नरेंद्र मोदी के साथ शुरू हुआ है, कहां तक जाएगा, इस पर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता. सिनेमा जैसी विधा पर पहले ही धर्म की मुहर लग जाए तो फिल्मों का नाश जरूर होगा. चाहे हिंदू धर्म का उद्धार हो या न हो

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