यह फिल्म शिक्षा के व्यवसायीकरण पर है. फिल्म एकदम सीधीसादी है, कहीं घुमावफिराव नहीं है, फिर भी काफी हद तक मन को छू लेती है. फिल्म अध्यापकों का सम्मान करना सिखाती है. आज के छात्र अपने शिक्षकों को भूल गए हैं. जिन शिक्षकों ने उंगली में कलम पकड़ा कर उन्हें लिखना सिखाया, पढ़ना सिखाया, उन्हें वे कभी हैप्पी बर्थडे तक विश नहीं करते जबकि सैलिब्रिटीज को ‘हैप्पी बर्थडे’ का मैसेज करना नहीं भूलते.

आज के दौर में यह फिल्म इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि आजकल नर्सरी स्कूलों में दाखिलों की चर्चा जोरों पर है. पब्लिक स्कूल वाले दाखिलों को ले कर खूब मनमानी कर रहे हैं. क्योंकि एडमिशन पर अदालतों तक को हस्तक्षेप करना पड़ता है. पब्लिक स्कूलों के रवैए से अभिभावक ही परेशान नहीं हैं, शिक्षकों को भी मैनेजमैंट परेशान करते हैं. उन से जम कर काम तो लिया जाता है परंतु उन की परेशानियों को नजरअंदाज कर दिया जाता है.

यह फिल्म कई मामलों में तो स्कूलों की पोल खोलती है परंतु कुछ मामलों में चुप्पी साध लेती है. बच्चों के ऐडमिशन के मामले में यह अभिभावकों की परेशानियों से मुंह फेर लेती है. फिल्म की कहानी कई हिस्सों में गुदगुदाती है, किरदारों से जोड़ती है, साथ ही कहींकहीं यह सपाट भी हो जाती है. कहानी एक निजी स्कूल की है. अनमोल पारीख (आर्यन बब्बर) स्कूल का ट्रस्टी है. स्कूल की अध्यापिकाओं में विद्या सावंत (शबाना आजमी) और ज्योति ठाकुर (जूही चावला) दोनों अपने छात्रों को मन से पढ़ाती हैं और खूब मेहनत करती हैं.

एक दिन स्कूल की पुरानी प्रिंसिपल इंदुशास्त्री (जरीना वहाब) को हटा कर सुपरवाइजर कामिनी गुप्ता (दिव्या दत्ता) को मैनेजमैंट पिं्रसिपल बना देता है. नई प्रिंसिपल के हिटलरी रवैए से स्कूल की सारी अध्यापिकाएं परेशान हैं. एक दिन कामिनी गुप्ता विद्या की काबिलीयत पर ही प्रश्न उठा देती है और उसे स्कूल से निकाल देती है. कामिनी गुप्ता स्कूल के बच्चों की फीस भी बढ़ा देती है. अध्यापिकाओं की मिलने वाली सुविधाएं भी खत्म कर देती है. विद्या को दिल का दौरा पड़ जाता है. उसे अस्पताल में भरती कराया जाता है. ज्योति ठाकुर खुल कर मैनेजमैंट के खिलाफ खड़ी होती है. उसे भी नौकरी से निकाल दिया जाता है. बात मीडिया तक पहुंचती है. एक न्यूज चैनल की रिपोर्टर भैरवी ठक्कर (रिचा चड्ढा) मामले को उछालती है. मैनेजमैंट मामला रफादफा करना चाहता है.

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