Download App

हर उम्र के दर्शकों को भाएगी ‘द जंगल बुक’

जंगल बुक के किस्से हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा रहे हैं. मोगली, बालू, बखीरा, का और शेर खान भारतीय दर्शकों के प्रिय पात्र हैं. इस पर टीवी सीरियल भी बन चुके हैं. मगर यह फिल्म उस टीवी सीरियल से थोड़ी अलग और ज्यादा रोचक व मनोरंजक है. ‘‘आयरन मैन’’ फेम निर्देशक जोन फेवरीव की फिल्म ‘‘द जंगल बुक’’ में फोटो रियिलिस्टिक, जानवरों और वातावरण का सजीव मिश्रण है. इसके निर्माण में अत्याधुनिक तकनीक का सहारा लिया गया है.

फिल्म ‘‘द जंगल बुक’’ शावक भेडि़यों के परिवार द्वारा पालन पोषण किए गए मोगली (नील सेठी) के स्वयं की खोज के नवीनतम रोमांचक कारनामों का महाकाव्य है. वह अपने घर को जान या समझ पाता, उससे पहले ही उसके परिवार ने उसका परित्याग कर दिया था. रूडयर्ड किपलिंग द्वारा लिखी गयी उसी साहसिक कहानियों का यह एनीमेशन रूपांतरण है.

यह कहानी है शावक भेडि़यों के परिवार द्वारा पालन पोषण किए गए इंसानी संतान मोगली (नील सेठी) की स्वंय की खोज की. मोगली की परवरिश में बघीरा और दत्तक पिता अकेला का बहुत बड़ा योगदान है. बघीरा और मोगली के दत्तक पिता अकेला बार बार उसे अहसास दिलाते रहते हैं कि अब उसे भेडि़यों की तरह ही व्यवहार करना है. मगर मोगली की दत्तक मां मोगली के प्रति अपने प्यार के बीच में इस तरह की बातों को नहीं आने देना चाहती. तो दूसरी तरफ दूसरे जानवर भी अपने बीच एक इंसान की मौजूदगी को स्वीकार कर चुके हैं. मगर शेर खान इंसानों द्वारा चोटिल किए जाने का बदला मोगली से लेने की फिराक में रहता है. जब शेरखान भेडि़यों के पूरे समूह को धमकाता है कि वह मागेली को उसे सौंप दें, तो बघीरा निर्णय लेता है कि वह मोगली को सुरक्षित इंसानों के बीच पहुंचा देगा. पर रास्ते में मोगली और बघीरा बिछुड़ जाते हैं. रास्ते में मोगली को अजगर तथा एक पागल का सामना करना पड़ता है. लेकिन मोगली तो ईश्वर का ऐसा बच्चा है, जिसकी मदद के लिए कोई न कोई आ ही जाता है. वहां पर मोगली की मदद के लिए भालू बालू मौजूद होता है.

फिल्म में जानवरों का संसार इतने बेहतरीन तरीके से उभारा गया है कि फिल्म को देखते समय यह अहसास ही नहीं होता कि इस फिल्म को लांस एंजेल्स के डाउन टाउन स्थित स्टूडियो के अंदर फिल्माया गया है. फिल्म में सब कुछ इतने बेहतरीन तरीके से चित्रित किया गया है कि दर्शक को अहसास होता है कि वह मोगली के साथ उस जंगल का हिस्सा है. फिल्म का एक भी किरदार एनीमेटेड नहीं लगता. इसके लिए वहां की वीएफ एक्स टीम बधाई की पात्र है. फिल्म में हास्य के सीन भी काफी अच्छे बने हैं. गीत संगीत भी अच्छा है.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो मोगली के किरदार में नील सेठी ने जबरदस्त परफार्मेंस दी है. इस साल के कई अवार्ड उसकी झोली में जा सकते हैं. उसके अंदर दिग्गज कलाकारों को टक्कर देने की असीम क्षमता नजर आती है. इसके साथ ही फिल्म के हर कलाकार ने बेहतरीन काम किया है.

इस फिल्म को कई भारतीय भाषाओं में डब किया गया है. हिंदी में शेर खान को नाना पाटेकर तथा ओमपुरी ने बघीरा को आवाज दी है. इरफान खान पंजाबी भाषा में मोगली से बात करते हुए नजर आते हैं. इसके अलावा प्रियंका चोपड़ा, बेन किंग्सले, जियान कार्लो एस्पोसिटो, लुपिता नियांगो, इदरिस एल्बा, स्कारलेट जोहानसन, क्रिस्टोफर वाकेन तथा बिल मुरे ने भी आवाज दी है.

अमेरिकन फेंटसी व रोमांचक फिल्म ‘‘द जंगल बुक’’ के निर्देशक जोन फेवरीव की जितनी तारीफ की जाए, कम है. निर्देशक ने मोगली के बहाने जीवन के संघर्ष का बेहतरीन चित्रण किया है. पर फिल्म कहीं कहीं धीमी हो जाती है. लेकिन फिल्म हर इंसान को उसके बचपन के दिन जरुर याद दिलाएगी.

अब आपके मैसेज नहीं पढ़ सकेगा कोई और

व्हॉट्सएप पर मैसेज, फोटो, ऑडियो या वीडियो शेयर करते समय आपको डर रहता है कि कोई आपके द्वारा भेजी गयी जानकारी का दुरुपयोग न कर ले तो अब  निश्चिंत हो जाइए क्योंकि अब आपका मैसेज न तो हैकर और न हीं किसी देश की सुरक्षा एजेंसी ही पढ़ सकती है. अब सिर्फ मैसेज भेजनेवाला और जिसे भेजा गया है वही इस मैसेज को पढ़ पाएगा. व्हॉट्सएप मेसेंजर ने आए दिनों अपने डेटा हैक से जुडी समस्याओं की शिकायतें मिलने के बाद  यह बदलाव किया है, इस बदलाव से हैकर्स अब व्हॉट्सएप के इन्स्क्रिप्ट डेटा को डिकोड नहीं कर पाएंगे.

अब से पहले व्हॉट्सएप के मैसेज सुरक्षा एजेंसियों से लेकर हैकर तक कोई भी इंटरसेप्ट कर सकता था, लेकिन अब मैसेज ऐसे कोड में जाएगा कि कोई नहीं पढ़ पाएगा. व्हॉट्सएप मैसेजिंग से जुड़े अब तक कई ऐसे मामले आते रहे हैं जिनमें व्हॉट्सएप पर मैसेज को हैकर्स ने हैक कर कई खुफिया जानकारियां चुराई हैं. कई बार सरकार और सुरक्षा एजेंसियां भी सुरक्षा मामलों के चलते जरूरत पड़ने पर व्हॉट्सएप को ट्रेस करती रही हैं लेकिन व्हाट्सप्प के नए कदम से ऐसा नहीं हो पाएगा. दरअसल व्हॉट्सएप ने यूजर्स की निजता को ध्यान में रखकर व्हॉट्सएप के मेसेज की सुरक्षा बढ़ा दी है.

अब आपकी सभी कॉल, मैसेज, फोटो, वीडियो, फाइल, आवाज सब कुछ खास कोड के जरिए यूजर के पास जाएगा, उस खास कोड के जरिए वह मैसेज सुरक्षित रहेगा.

बिना सर्जरी के वजन घटाने की अनोखी तकनीक

मोटापे से परेशान लोग मोटापा कम करने के लिए अधिक डाइटिग करना, जिम जाना, घंटो वर्कआउट करना जैसे जानें कितने काम करते है. कुछ लोग तो दवाइयों और सर्जरी का सहारा लेने से भी नहीं चुकते  ऐसे लोगों के लिए अमेरिकी रेडियोलॉजिस्ट ने एक नए इमेड गाइडेड ट्रीटमेंट विकसित किया है, जिसे बैरियाटिक अर्टेरियल इमोबोलिजेशन (बीएई) कहा जाता है. यह पेट के एक हिस्से में खून की आवाजाही रोक देता है, जिससे वजन कम करने में मदद मिलती है.

शोध से पता चला है कि सर्जिकल गैस्ट्रिक बायपास प्रक्रिया (बैरियाटिक सर्जरी) की तुलना में इसमें कोई चीड़फाड़ नहीं की जाती है और मरीज जल्दी सामान्य भी होता है. इस शोध के दौरान सभी मरीजों में वजन की कमी और भूख में कमी देखी गई. एक महीने बाद उनके वजन में 5.9 फीसदी की कमी देखी गई. छह महीने बाद उनका बजन 13.3 फीसदी घट गया. इस शोध को  वेंकुवर, कनाडा में चल रहे सालाना वैज्ञानिक बैठक सोसाइटी ऑफ इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी 2016 में प्रस्तुत किया गया.

बिहार में खुलेंगे 138 कृषि मशीन बैंक

बिहार में इस साल 138 कृषि मशीन बैंकों की शुरुआत की जाएगी. इस से छोटे और मंझोले किसानों को काफी फायदा होगा. कृषि मंत्री राम विचार राय ने बताया कि गरीब किसान चाह कर भी खेती की मशीनों को इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं. उन के पास इतनी पूंजी नहीं होती है कि वे मशीनों को खरीद सकें. कृषि मशीनों का बैंक खुल जाने से किसानों को कम किराए पर मशीनें मिल सकेंगी.

मंत्री ने कहा कि पंचायतों में किसान समूहों या एनजीओ को कृषि मशीन बैंक चलाने की जिम्मेदारी दी जाएगी. पहले चरण में 10 लाख की लागत वाले 2 और 25 लाख की लागत वाले 1 बैंक की शुरुआत की जाएगी. इस के अलावा 40 लाख की लागत वाले 24 मशीन बैंक पूरे राज्य में खोले जाएंगे.

इन की कामयाबी के बाद हर पंचायत में मशीन बैंक खोले जाएंगे. हर बैंक को कुल लागत का 40 फीसदी अनुदान के रूप में दिया जाएगा. कृषि यांत्रिकरण के मामले में बिहार पहले ही राष्ट्रीय औसत को पार कर चुका है.          

पंचायतों को टैक्स वसूली का अधिकार

बिहार सरकार पंचायतों को मजबूत बनाने के लिए उन्हें टैक्स वसूलने का अधिकार देगी. इस दिशा में पंचायतीराज विभाग ने नियमावली बनाने की कार्यवाही शुरू कर दी है. राज्य पंचायती राज अधिनियम 2006 के तहत प्रस्ताव पास कर पंचायतों को टैक्स वसूली का अधिकार दे कर माली रूप से मजबूत बनाने की कवायद शुरू की गई है.

पंचायती राज विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक इस सिलसिले में वित्त विभाग से सहमति मांगी गई है. प्रस्ताव के मुताबिक कमर्शियल और आवासीय भवनों व सेवाओं के लिए पंचायतें अपने क्षेत्र में टैक्स वसूलने का काम करेंगी. इस से छोटी पंचायतों को कम से कम 10 हजार रुपए और बड़ी पंचायतों को 1 लाख रुपए तक की कमाई हर महीने हो सकती है. प्रस्ताव के लागू होने के बाद पंचायतें हर साल टैक्स वसूली की समीक्षा कर के कमाई को बढ़ाने का उपाय कर सकेंगी.

पंचायतें रिक्शा, ठेलागाड़ी, घोड़ागाड़ी और बैलगाड़ी जैसे वाहनों से टैक्स वसूल सकेंगी. इस के अलावा मेलों में सामान बेचने वालों और सेवा मुहैया कराने वालों से भी टैक्स वसूली की जाएगी. हर घर में पाइप से पानी सप्लाई करने के बदले भी पंचायतें टैक्स लेंगी.

देश में राजस्थान, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश में पंचायतों को टैक्स वसूली का अधिकार मिला हुआ है. केरल को पंचायती राज संस्थाओं द्वारा टैक्स वसूली का मौडल माना जाता है.           

सौहार्द पर टिका है बच्चों का भविष्य

झगड़ा करने वाले पति पत्नी आम हैं. मारपीट भी अनसुनी नहीं है. किसी भी आर्थिक व शैक्षिक स्तर पर हाथापाई पर उतर आना अजब नहीं होता. वाक्युद्ध तो प्रेम में डूबे पति पत्नी भी करते रहते हैं पर जल्द ही मान भी जाते हैं. अब बच्चे ज्यादा चौकन्ने होने लगे हैं. कानून, पुलिस, दादादादी, नानानानी से ज्यादा प्रभावशाली बच्चों की उपस्थिति झगड़े के दौरान होने लगी है.

कोलकाता के एक स्कूल की लड़की ने अपने मातापिता की पोलपट्टी तब खोल दी, जब उस ने स्कूल में दिए गए ‘माई फैमिली’ पर ऐस्से में घर में होने वाली मार पिटाई साफसाफ शब्दों में लिख दी. इस पर स्कूल ने ज्यादा समझदारी दिखाई और मातापिता को बुला कर उन्हें घर बांट लेने की सलाह दी ताकि बेटी मारपीट की दर्शक या शिकार न बने.

आज के बच्चे बहुत सी बातों की सहीगलत की समझ ही नहीं रखते, उसे कहने में भी हिचकते नहीं हैं. घर में दादादादी या नानानानी न हों तो वे स्कूल में मित्रोंसहेलियों व शिक्षकों से अपने दुख शेयर कर सकते हैं. शिक्षकों के लिए मातापिता की प्रतिष्ठा से ज्यादा बच्चों की सुखशांति महत्त्वपूर्ण होती है और उन के पास मातापिता को बुलाने का वह अधिकार है, जो मजिस्ट्रेटों के पास भी नहीं है और वह भी बिना वकील के.

पतिपत्नी बच्चे पैदा करने के बाद अपनी बहुत सी स्वतंत्रताएं खो देते हैं, यह उन्हें समझ लेना चाहिए. बच्चे उन के अपने सुखों, कैरियर, गुस्से, फ्रस्ट्रेशन से ऊपर हैं, यह समझ कर ही उन से व्यवहार करना चाहिए. बच्चों के प्रति ज्यादा लाडप्यार गलत है और उन की मनमानी सहना भी खतरनाक है पर उन की छत पर क्रैक्स न हों, यह जिम्मेदारी मातापिता की है.

स्कूलों को बच्चों को एनकरेज करना चाहिए कि वे घर की बातें शिक्षकों से शेयर करें. यह पाठ्यक्रम और बच्चों के विकास का हिस्सा हो. मातापिता अपनी प्राइवेसी में इसे दखल मान सकते हैं पर यह बच्चों के मानसिक व शारीरिक विकास के लिए जरूरी है.

यह नहीं भूलना चाहिए कि जो पतिपत्नी जराजरा सी बात पर घर में लड़ते हैं, वर्क प्लेस में एकदम दब्बू बन जाते हैं और दफ्तरों के अनुशासन चुपचाप सहते हैं, क्योंकि उन का वर्तमान और भविष्य इसी पर निर्भर है.

इसी तरह घरों में बच्चों का वर्तमान व भविष्य मातापिता के आपसी सौहार्द पर टिका है. मतभेद आम हैं पर उन में चीखनेचिल्लाने या हिंसा की जगह नहीं है. सामाजिक कानूनों, काउंसलरों और पारिवारिक दबावों से ज्यादा स्कूल का पीयर प्रैशर मातापिता को अनुशासित रखने में कारगर है. इस का सदुपयोग करा जाना चाहिए.

मुक्तेश्वर: हिमालय की गोद में प्रकृति का घर

नेचरलवर होने के साथसाथ आप फ्लाइंग स्पोर्ट्स के भी दीवाने हैं तो मुक्तेश्वर आप के लिए उपयुक्त पर्यटन स्थल है. उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में नैनीताल से लगभग 52 किलोमीटर की दूरी पर स्थित मुक्तेश्वर में ऊंची, हरीभरी पहाडि़यों और हजारों फुट गहरी खाइयों का अद्भुत नजारा देखने को मिलता है. कुहासे से भीगी सड़कें, धुंध के बादलों की अठखेलियां और चेहरे को छूती ठंडी हवाएं, मुक्तेश्वर तक जाने वाले रास्ते की ये ऐसी हवाएं हैं जो आप के सफर को यादगार बना देंगी.

खूबसूरत डगर : यों तो नैनीताल और काठगोदाम से उत्तराखंड परिवहन की बस से मुक्तेश्वर पहुंचा जा सकता है, लेकिन सफर का असली मजा लेना हो तो प्राइवेट टैक्सी या अपने निजी वाहन से यहां जाएं. चीड़, देवदार से लदे पहाड़ों को काट कर बनाया गया रास्ता बेहद घुमावदार है.

फलों के बाग : काठगोदाम या नैनीताल से लगभग 20 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद ही आप को सड़़क के किनारे फलों के बाग दिखने लगेंगे. बाग की देखरेख करने वाले सड़क किनारे ताजे आड़ू, खुबानी और सेब इत्यादि बेचते रहते हैं. कुछ पैसे ले कर ये लोग आप को बाग में घूमने और यहां बिताए यादगार पलों को कैमरे में कैद करने की इजाजत भी दे देते हैं. यकीन मानिए, रसभरी खुबानी और आड़ू के ये बाग घूमने के बाद आगे के सफर के लिए आप का उत्साह दोगुना हो जाएगा.

टी टाइम ब्रैक : मुक्तेश्वर के रास्ते में रोडसाइड ढाबे कम हैं. ज्यादातर ढाबों पर ब्रैकफास्ट, स्नैक्स और चाय के लिए रुका जा सकता है. गरमी के मौसम में इन ढाबों के बाहर एक ‘डू नौट मिस’ खाने की चीज मिलती है और वह है सफेद दानों से भरा भुट्टा. अपना अलग ही स्वाद और मिठास लिए यह भुट्टा आप को जरूर भाएगा. हां, खाने के पहले मोलभाव जरूर कर लें क्योंकि सिर्फ एक भुट्टा खा कर न तो आप का पेट भरेगा और न ही मन. यदि आप नौनवेज खाने के शौकीन हैं और अक्तूबर से नवंबर के बीच मुक्तेश्वर जाने की योजना बना रहे हैं तो यहां के टी पौइंट्स पर मिलने वाला मुरगे का अचार जरूर चख कर देखें.

क्या देखें

प्रकृति के खूबसूरत नजारों को देखने के साथसाथ यहां देखने की कुछ ऐसी जगहें भी हैं जहां गए बगैर आप का सफर अधूरा है :

हिमालय दर्शन : मुक्तेश्वर के पीडब्लूडी रैस्टहाउस के पार्क से हिमालय की नंदा देवी, त्रिशूल और पंचचूली चोटियों का विहंगम दृश्य देखते ही बनता है.

चौली की जाली : इसे चौथी जाली के नाम से भी जाना जाता है. पहाड़ से बाहर की तरफ निकली इस बड़ी चट्टान से भी हिमालय का सुंदर नजारा मिलता है.

यह चट्टान वैसे तो प्रकृति की एक अद्भुत रचना है मगर अंधविश्वास ने इस पत्थर के टुकड़े को भी नहीं छोड़ा. इस चट्टान में एक बड़ा होल है. अंधविश्वासी मानते हैं कि यह देवी का पवित्र स्थान है और जो निसंतान महिला इस होल में देख कर मन्नत मांगेगी, उसे संतान की प्राप्ति होगी. आप इन बेसिरपैर की मान्यताओं से दूर रहेंगे तो इस जगह का असली आनंद उठा सकेंगे.

सीतला एस्टेट : ट्रैकिंग के शौकीन लोग मुक्तेश्वर से 5 किलोमीटर की दूरी तय कर के सीतला गांव जा सकते हैं. सीतला एस्टेट नए रूप में आज भी यहां मौजूद हैं. ट्रैकिंग करने का सब से अच्छा समय सुबह का है. बर्ड फोटोग्राफी के शौकीन लोगों के लिए सीतला गांव के रास्ते में बहुत कुछ है. चिडि़यां अपने लिए खाना ढूंढ़ने के लिए सुबह ही निकलती हैं. ऐसे में आप को इन की फोटोग्राफी करने का अच्छा मौका मिलेगा. सीतला एस्टेट के सुइट्स में रुकने का इरादा है तो पहले से बुकिंग करा के आना होगा.

कैंपिंग और फ्लाइंग स्पोर्ट्स : ऐडवैंचर के शौकीन लोग मुक्तेश्वर के पास सरगाखेत इत्यादि गांव में कैंपिंग, हाइकिंग और पैराग्लाइडिंग का आनंद उठा सकते हैं. कैंपिंग और हिल स्पोर्ट्स का असली मजा मार्च से जून के दौरान आता है.

सीजन में इन सब का आनंद उठाने के लिए पहले से बुकिंग करवाएं. दोस्तों के गु्रप या परिवार के साथ कैंपिंग करने आएं तो जीप सफारी जरूर करें. हाइकिंग, रौक क्लाइंबिंग और पैराग्लाइडिंग के लिए फिट होना बेहद जरूरी है. उत्तराखंड टूरिज्म की वैबसाइट पर इस से जुड़ी जानकारी उपलब्ध है.

कैंप बुक कराने से पहले यह जरूर सुनिश्चित करें कि टौयलेट, टैंट या बाथिंग टैंट में रनिंग वाटर और दूसरी जरूरी सुविधाएं हैं या नहीं. इन कैंपों में रहनेखाने और हिल स्पोर्ट्स, जीप सफारी इत्यादि का पैकेज अलगअलग होता है. ऐसे में यह सुविधा लेने का प्रतिव्यक्ति खर्चा 7 हजार रुपए तक जा सकता है जोकि मुक्तेश्वर आनेजाने के खर्चे के अतिरिक्त होगा. अपने टूर औपरेटर से सारी जानकारी पहले से लें.

कहां ठहरें

मुक्तेश्वर और उस के आसपास कई रिजौर्ट्स हैं. सीजन में 2 स्टार रिजौर्ट का टैरिफ भी कम से कम 3 हजार रुपए से शुरू होता है. पहले से बुक कराए बगैर यहां आने की गलती न करें. सीजन में सारे रिजौर्ट्स बुक रहते हैं. ऐसे में यदि आप को कोई कमरा मिल भी गया तो आप को उस के 5 हजार रुपए तक भी देने पड़ सकते हैं.

कैसे जाएं

मुक्तेश्वर से काठगोदाम रेलवे स्टेशन लगभग 65 किलोमीटर की दूरी पर है जोकि देश के सभी प्रमुख स्थानों से रेलमार्ग द्वारा जुड़ा है. काठगोदाम से प्राइवेट टैक्सी या उत्तराखंड परिवहन की बस से मुक्तेश्वर आया जा सकता है. मुक्तेश्वर से लगभग 100 किलोमीटर की दूरी पर पंतनगर हवाई अड्डा है. हवाई मार्ग से यहां आने का प्लान न ही बनाएं तो बेहतर होगा क्योंकि यहां आने वाली उड़ानों की संख्या काफी कम है और फिर यहां से मुक्तेश्वर जाना आप के यात्रा बजट को बिगाड़ भी सकता है.

सड़क मार्ग से मुक्तेश्वर आने के लिए दिल्ली, उत्तर प्रदेश परिवहन की बसें उपलब्ध हैं. इस के अलावा आप अपनी सुविधानुसार निजी वाहन से भी आजा सकते हैं. यदि आप नैशनल हाइवे नं. 24 से लखनऊ की तरफ से आ रहे हैं तो बरेली, भोजीपुरा, हल्द्वानी, काठगोदाम होते हुए मुक्तेश्वर आ सकते हैं. यदि दिल्ली से नैशनल हाइवे नं. 24 से आ रहे हैं तो गाजियाबाद, मुरादाबाद, रामपुर, रुद्रपुर, हल्द्वानी, काठगोदाम सड़क मार्ग सही रहेगा.

ताकि ट्रिप का मजा न हो किरकिरा

मुक्तेश्वर का सफर आप के लिए सिरदर्द न बने, इस के लिए कुछ बातों का ध्यान जरूर रखें :

–       अपने साथ ठीकठाक कैश ले कर जाएं. काठगोदाम से निकलने के बाद एटीएम की सुविधा बहुत कम है और यदि है भी तो ज्यादातर में कैश नहीं होता. प्लास्टिक मनी ज्यादातर जगहों पर नहीं चलती.

–       मार्च से जून के बीच में भी यहां तापमान 10-12 डिगरी सैल्सियस तक आ सकता है, इसलिए हलके गरम कपड़े ले जाएं.

–       अन्य पहाड़ी रास्तों की अपेक्षा मुक्तेश्वर तक का रास्ता बहुत ज्यादा घुमावदार है. वौमिटिंग से निबटने की तैयारी कर के निकलें.

–       फ्लाइंग स्पोर्ट्स करने जा रहे हैं तो उस के हिसाब से कपड़े, जूते व अन्य सामान जरूर रख लें. यदि हाइट का फोबिया है या पैराग्लाइडिंग और हाइकिंग की जरूरी जानकारी नहीं है तो यह सब करने का बिलकुल प्रयास न करें.

चलो चलें बरोट और लुहारडी की वादियों में

भारत के ताज की सुरभि है हिमाचल प्रदेश. इसलिए हम ने सैरसपाटे के लिए इस के खूबसूरत स्थल बरोट और लुहारडी को चुना. पंजाब के पठानकोट से हम 3 दोस्त-मैं, राज वकील और मनमोहन धकालवी कार से निकल पड़े. पठानकोट से 5 किलोमीटर दूर से ही पहाड़ी क्षेत्र शुरू हो जाता है. सब से पहले हिमाचल का बैरियर आता है. यहां पर बसा गांव है तंडवाल. यहां से छोटीछोटी पहाडि़यां शुरू हो जाती हैं. हिमाचल के होटल, सड़क के इर्दगिर्द हरेभरे वृक्षों की छांव, छोटेछोटे खेत, आम, अमरूद, लीची और फलों के बाग हैं.

कई गांव निकलते हुए हम पहुंचे जसूर. यह छोटा सा शहर है. यहां कई होटल तथा ऐतिहासिक स्थल हैं. यहां से बड़े पहाड़ों की शृंखला शुरू होती है. यहां के टेढ़ेमेढ़े रास्ते अपनी पहचान करवाते हैं. फिर आ जाता है नूरपुर. इस शहर में एक प्राचीन ऐतिहासिक किला है. नूरपुर में लक्कड़ का कारोबार बहुत होता है. कांगड़ा में प्रवेश करते हुए हम ने शाम को मालमपुर के रेलवे रैस्ट हाउस में प्रवेश किया. यह रैस्ट हाउस बहुत ही मनमोहक स्थान पर है. साफस्वच्छ रैस्ट हाउस था. यहां हम ने एक दोस्त के फोन पर रेलवे विभाग के उच्च कर्मचारी के नाम पर कमरा बुक करवाया. वहां के कर्मचारी ने हम से एक रात के मात्र 30 रुपए लिए.

यहां हम ठहरे. रैस्ट हाउस के पास ही बड़ा बाजार है. यहां सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं. सुबह हम निकल पड़े मंजिल की ओर. रास्ते में कहींकहीं रुक कर फोटोग्राफी का आनंद लेते रहे. बैजनाथ बाईपास से कुछ किलोमीटर दूर ऊपर पहाड़ी से बैजनाथ शहर बहुत अच्छा दिख रहा था. दूर से छोटे घरों के समूह मन को भा रहे थे. वादियों के सुंदर दृश्य नजर आ रहे थे. खड्डे तथा ऊंची पहाडि़यों का सुमेल आंखों को अच्छा लग रहा था. यह दृश्य हृदय तथा मस्तिष्क को आनंद व सुकून पहुंचाने वाला था.

दोपहर को हम गुम्मा गांव में पहुंचे. यहां पहाड़ों के बीच का रास्ता अंगरेजी के ‘सी’ अक्षर की भांति दिखता है. इस मोड़ पर एक ढाबे में हम ने दोपहर का भोजन किया. यहां की झूलती पहाडि़यों के दृश्य देखते ही बनते हैं. जब सूर्य की किरणें हरीभरी पहाडि़यों पर पड़ती हैं तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे हरियाली के ऊपर प्रकृति ने सोने की पारदर्शी सुनहरी चादर ओढ़ा दी हो. गुम्मा खूबसूरत घाटी का नाम है. गुम्मा की घाटी में खूब सब्जियां होती हैं. फलों के खेत भी मिलते हैं.

मंडी जिले की जोगेंदर नगर तहसील में जोगेंदर मंडी सड़क पर जोगेंदरनगर से 11 किलोमीटर दूर गुम्मा गांव एक घुमावदार स्थान पर स्थित है. घुमाव से ही यहां का घुमा नाम पड़ा जो बाद में गुम्मा हो गया. गुम्मा में पत्थर के काले नमक की खानें हैं. इन काले नमक की खानों से गुम्मा की एक विशिष्ट पहचान है. नमक की खानें केंद्रीय सरकार के नियंत्रण में हैं. यह नमक पशुओं को खिलाने के काम आता है. घोघड़ाधार जिला मंडी की एक प्रमुख पर्वत श्रेणी है. इस पर्वत श्रेणी के अंतर्गत डायना पार्क, हिमरी गंगा आदि स्थान दर्शनीय हैं. इस की उत्तरी ढलानों का जलप्रवाह विभिन्न नालों के जरिए ऊहल नदी में तथा दक्षिणी ढलानों का अधिकांश जलप्रवाह विभिन्न नालों के रूप में रणा खड्ड में संगम करता है.

गुम्मा (घोघुड़ाधन) चीड़, शीशम, सेमल के वनों के लिए प्रसिद्ध है. यहां घने वन हैं. झटीगरी, मंडी राजवंश की ग्रीष्मकालीन राजधानी थी. गुम्मा के आसपास कई छोटेबड़े प्रपात पहाडि़यों की सुंदरता को चार चांद लगाते हैं. गुम्मा से ऊपर की ओर कुछ घंटों का सफर तय कर हम झटीगरी के चौक में पहुंच गए. यहां चाय पीते वक्त मैं ने दुकानदार से पूछा, ‘यहां देखने वाली कोई जगह है?’ उस ने कहा कि यहां से लगभग 1 किलोमीटर दाईं ओर ऊंची पहाड़ी पर एक प्राचीन स्थान है, रानी की कोठी.

रानी की कोठी तक एक पथरीला, ऊबड़खाबड़ रास्ता जाता नजर आता है. सीधी चढ़ाई पर सांस फूलने लगती है क्योंकि रास्ते के पत्थर समतल नहीं हैं. यहां पहुंचते ही किसी आनंदविभोरावस्था में आप चले जाएंगे. यहां बर्फीली हवाएं घेर लेती हैं. यहां तिकोने पहाड़ों के बीच प्राचीन छोटीछोटी कोठियां नजर आती हैं. घने वृक्षों के बीच रानी की कोठी लगभग 1 एकड़ के समतल क्षेत्र में फैली है. इस के आगे थोड़ा रास्ता छोड़ कर फिर लगभग 1 एकड़ समतल पहाड़ी है. यहां से चोटियों के दिलकश नजारे दिखाई देते हैं.

रानी की कोठी जोगेंदर नगर से 32 किलोमीटर दूर है. यह 2,130 फुट की ऊंचाई पर है. बताया जाता है कि इस क्षेत्र का राजा गरमी के दिनों में यहां आया करता था. झटीगरी के नीचे घाटी का खूबसूरत दृश्य देखते ही बनता है. झटीगरी में आलुओं का व्यापार बड़े पैमाने पर होता है. यहां आलू बहुत पैदा होता है. रानी की कोठी के खुले आंगन में बच्चों के खेलनेकूदने के लिए अच्छा वातावरण है. घुमक्कड़ लोग अपने साथ फोल्डिंग तंबू ले कर आते हैं क्योंकि यहां कब बूंदाबांदी या तेज बारिश आ जाए, पता नहीं. बारिश में यहां प्राकृतिक दृश्य देखने का अपना अलग ही आनंद होता है. रानी की कोठी में रात के समय जब चांदसितारे साफ मौसम में झिलमिलाते हैं तो दृश्य स्वप्नलोक से कम नहीं होता.

रानी की कोठी (झटीगरी) से हम बरोट की ओर बढ़े. बरोट जाने के लिए घटासनी जाना पड़ता है. घटासनी एक छोटा सा शहर है. पठानकोट (पंजाब) से घटासनी लगभग 190 किलोमीटर की दूरी पर है. घटासनी से बरोट जाने का रास्ता एकदम सीधी चढ़ाई वाला है. यह रास्ता एक बड़े दरवाजेनुमा लगता है जैसे किसी बड़े महल का मुख्य गेट. हमारा मित्र राज डर गया. कहने लगा, छोड़ो यार, यह तो एकदम सीधी चढ़ाई है और सड़क भी बिलकुल छोटी है. चलो, वापस चलें. परंतु मैं ने देखा एक बस हमारे आगे जा रही थी. मैं ने कहा, ‘यार, जब यह बस, जा सकती है तो हम क्यों नहीं जा सकते. हिम्मत करो, चलो.’

घटासनी एक सुंदर घाटी है. घटासनी से बरोट जाते समय सुंदर दृश्य देखने को मिलते हैं. पहाड़ों के साथसाथ सड़क, नीचे खड्ड, खड्ड में सांप की भांति बहता दरिया दिल को दहला देते हैं. रास्ते में हुरला गांव में प्राचीन पहाड़ी शैली के घर दिखाई देते हैं. चीड़ के घने जंगलों से गुजरती सड़क से जब कार गुजरी तो एक अजीब सा डर लगने लगा.

मनमोहक बरोट

कई छोटेबड़े पड़ाव पार करते हुए थकेहारे हम बरोट पहुंचे. हिमाचल प्रदेश का यह विशेष अद्भुत नजारों वाला स्थान है. हम गाड़ी एक होटल के पास खड़ी कर के घूमने लगे. बरोट नगर खूबसूरती की जीवंत मिसाल है. ऊंचे पहाड़ों में बसा यह सुंदर नगर ऐसे प्रतीत होता है जैसे आसमान की गोद में कोई बच्चा खेल रहा हो.

बरोट ऊहल दरिया के छोर पर बसा हुआ है. दरिया के साथसाथ होटल बने हुए हैं. दरिया अपने से अलग हो कर कई झीलों का स्वरूप लेता है. हरीभरी पहाडि़यां अतुल्य सौंदर्य के गीत गाती प्रतीत होती हैं. दूर पहाड़ी की चोटी पर चढ़ कर सुबह का सूर्य देखने का अद्भुत आनंद है. ऐसा लगता है जैसे आसमान से कोई रोशनी नंगेपांव उतर रही हो.

शाम को ठंडी हवाओं में आसमान जब साफ होता है तो चांदतारों की बरात के साथ शामिल होना कितना अच्छा, कितना सुखद, कितना हृदयमयी हो जाता है. बादलों को छूना कितना अच्छा लगता है. बादल नीचे और आप ऊपर, जैसे आसमान में उड़ रहे हों. अच्छेअच्छे मनमोहक दृश्य आप के मनमस्तिष्क में सदैव के लिए कैद हो जाते हैं.

मंडी जिले की चुहार घाटी में नदी के किनारे बसा बरोट एक रमणीय स्थान है. बरोट का नाम जलविद्युत उत्पादन के इतिहास में बहुत प्रसिद्ध है. सन 1925 में ब्रिटिश सरकार की ओर से अंगरेजी सेना के इंजीनियर कर्नल बंटी तथा मंडी के राजा जोगेंदर सेन के बीच एक अनुबंध हुआ जिस से जोगेंदर नगर की शानन और बस्सी जलविद्युत परियोजना साकार हुई. इस परियोजना का जलभंडारण केंद्र बरोट में बना. यहीं से 2 बड़े पाइपों से पानी ले जा कर शानन और बस्सी में बिजली उत्पादन किया जाता है. यहां सरकारी होटल, रैस्ट हाउस भी हैं.

बरोट की विशेषता यह भी है कि यहां बहुत विशाल मत्स्य विभाग ट्राउट मछली केंद्र भी है. यहां ट्राउट सफेद मछली का बीज भी तैयार किया जाता है. यह नवंबर से फरवरी तक बंद रहता है. इस को मत्स्य पालन विभाग, हिमाचल प्रदेश ने संभाल रखा है. ट्राउट मछली फार्म में 400 रुपए किलोग्राम के हिसाब से मछली व्यापारियों को दी जाती है. जबकि बाजार में यह 800 से ले कर 1000 रुपए किलोग्राम के हिसाब से बेची जाती है. यह सफेद रंग की होती है तथा देखने में अति सुंदर लगती है. यह मछली ऊहल दरिया के ठंडे पानी में होती है. बर्फ से भी ज्यादा ठंडे तापमान में रहती है.

हिमाचल सरकार ने विशेष किस्म के उपकरण लगा कर इस मछली के पालन का प्रबंध किया हुआ है. यह मछली आम (साधारण) मछली से अलग होती है. बरोट के आसपास कई स्थान देखने वाले जैसे नारगु वाइल्डलाइफ सैंटर, हर्बल म्यूजियम, हर्बल गार्डन इत्यादि हैं.

बरोट से कुछ दूरी पर एक स्थान देखने योग्य है. यह स्थान लुहारडी है. बरोट से छोटे रास्ते से होते हुए हम वहां पहुंचे. लुहारडी प्रकृति की गोद में बसा एक छोटा गांव है. कांगड़ा जिले की बैजनाथ तहसील के छोटा भंगाल क्षेत्र के इस गांव में पहले केवल लुहार समुदाय के लोग रहते थे. उसी आधार पर यहां का नाम लुहारडी पड़ा.

लुहारडी गांव में लगभग 100 घर होंगे. यहां के एक नवयुवक राजेश कुमार ने बताया कि यहां के लोग शाही राजपूत की फौज में थे. इस के आसपास 11 गांव पड़ते हैं. यहां के लोग कृषि तथा हथकरघा का काम करते हैं. विशेषतौर पर महिलाएं हथकरघा का काम करती हैं. यहां सब्जियां भी होती हैं. यहां 3 से 4 फुट तक बर्फ पड़ती है. यहां के लोग भेड़बकरी का भी व्यापार करते हैं. सर्दी में जोगेंदर नगर का रास्ता, बर्फ पड़ने के कारण बंद हो जाता है. लुहारडी से सीधी चढ़ाई वाले रास्ते से 14 किलोमीटर दूर स्थित प्रसिद्ध ‘देना सर झील’ तक की पहाड़ी यात्रा पैदल ही करनी पड़ती है. कोई भी वाहन यहां नहीं जा सकता.

मंडी में व्यास नदी के दाएं किनारे प्रवेश करने वाली सब से बड़ी नदी ऊहल है. गहरी खाइयों में बहने के कारण इस नदी का जल सिंचाई हेतु प्रयोग में नहीं लाया जाता. मात्र बरोट में सरोवरों में जलसंग्रह कर सुरंग के जरिए जोगेंदर नगर पहुंचाया गया जहां पूर्व पंजाब (अविभाजित पंजाब) के समय 1930-33 में शानन विद्युत परियोजना आरंभ कर उस समय अमृतसर और लाहौर (पाकिस्तान) को बिजली की आपूर्ति की जाती थी. यहां के हृदयस्पर्शी, मिलनसार, मीठे स्वभाव के लोग अच्छे लगते हैं. यहां गरमी के मौसम में भी ठंड पड़ती है. यहां सैलानियों के लिए रहने का पूरा इंतजाम है.

– बलविंदर 'बालम' 

युवा दिखना है तो धैर्य रखना सीखें

क्या आप को हर काम की जल्दी होती है, आप फटाफट काम खत्म करने में विश्वास रखती हैं, कोई आप की बात नहीं सुनता है तो तुरंत अपना धैर्य खो देती हैं तो जरा ध्यान दीजिए. कहीं आप की यह आदत आप को बुढ़ापे की तरफ ना ले जाए. कहने का तात्पर्य यह है कि आप अपनी उम्र से पहले ही बुढ़ी नजर ना आने लगें.

आप सोच रही होंगी कि भला आप की इन आदतों का बुढ़ापे से क्या संबंध है, तो आप को बता दें कि यह बात एक अध्ययन में सामने आई है कि जो युवा महिलाएं धैर्य नहीं रखती हैं वे बुढ़ापे की तरफ जल्दी बढ़ती हैं, जबकि धैर्य रखने वाली महिलाएं अपनी युवावस्था को अधिक समय तक बनाए रख सकती हैं.

नैशनल यूनिवर्सिटी औफ सिंगापुर (एनयूएस) के अनुसंधानकर्त्ताओं ने पाया है कि धैर्य ना रखने वाली युवा चीनी महिलाओं में कोशिकीय स्तर पर तेजी से वृद्धावस्था की ओर अग्रसर होने के लक्षण दिखाई देते हैं. उन्होंने पाया कि उतावलापन रखने वाली युवा महिलाओं की कोशिकाएं धैर्य रखने वाली युवा महिलाओं की कोशिकाओं के मुकाबले शीघ्रता से बुढ़ापे की ओर बढ़ती हैं. अनुसंधानकर्त्ताओं ने स्नातक कर रही 1,158 चीनी लड़कियों को अध्ययन में शामिल किया था.

रिश्तों पर भी पड़ता है असर

धैर्य ना रखने से आप केवल बुढ़ापे की ओर अग्रसर नहीं होती बल्कि इस का असर आप के रिश्तों पर भी पड़ता है. आप उन के साथ चिड़चिड़ा व्यवहार करने लगती हैं, उन की पूरी बात सुने बगैर ही रिऐक्ट कर देती हैं.

धैर्य रख कर आप ना केवल अपनी युवावस्था को बनाएं रख सकती हैं बल्कि खुश भी रह सकती हैं. इस से आप का स्ट्रैस लैवल भी कम होता है. आप में निर्णय लेने की क्षमता विकसित होती है. जिस से आप समझ पाते हैं कि आप के लिए क्या सही है और क्या गलत.

 

सोने की नौकरी करना चाहेंगे आप

अभी तक आप ने ऐसी नौकरियों के बारे में सुना होगा जिस में कंपनी कर्मचारियों से सिर्फ काम ही मांगती है उन्हें काम में जरा भी लापरवाही बरदाश्त नहीं होती लेकिन अब एक कंपनी ने पूरी ठाठबाट वाली यानी सोने की नौकरी के लिए वैकेंसी निकाली है.

सुन कर आप को लग रहा होगा कि सोने की नौकरी क्या कंपनी का दिमाग खराब हो गया है जो उन के दिमाग में ऐसा आइडिया आया. क्या मेहनत करने वाले लोग दुनिया में नहीं रहे जो कंपनी को आलसी लोगों की जरूरत पड़ गई.

तो आप को बता दें कि कंपनी अर्बन लैडर ने अपने गद्दों की जांच के लिए ऐसी वैकेंसी निकाली है. उन्हें ऐसे व्यक्ति की तलाश है जो पूरे दिन मजे से गद्दों पर आराम फरमाए और फिर उन्हें बताए कि गद्दे कितने आरामदायक हैं.

यहां तक कि कंपनी ने लिंक्डिन डौट कौम पर ऐड भी निकाला है जिस में लिखा है, ‘हमें एक आलसी व्यक्ति की तलाश है जो बिस्तर से निकलना ही नहीं चाहता हो.’ तो है न कमाल की नौकरी. जिस में पूरे दिन सोने को मिलेगा और बदले में तनख्वाह भी मिलेगी. तो अगर आप भी खूब आलस काटने में विश्वास करते हैं तो जल्दी करिए ताकि ये नौकरी आप के हाथ से न जाने पाए.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें