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आर्थिक बोझ बनती शिक्षा

‘पढ़ोगेलिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगेकूदोगे होगे खराब,’ पुराने जमाने में पढ़ाई न करने वाले बच्चों से ऐसी बातें कही जाती थीं. आज के समय के हिसाब से इस कहावत में थोड़ा बदलाव आ गया है. अब बच्चों को पढ़ाने में मातापिता की हालत खराब हो जाती है. इस बात का भी कोई भरोसा नहीं है कि पढ़ने पर भी आप के लाड़ले नवाब बन भी सकेंगे.

करीब ढाई दशक से शिक्षा के क्षेत्र में ग्लोबलाइजेशन का असर देखने को मिला है. इस से उच्च शिक्षा का विस्तार हुआ है और इस के प्रति मध्यवर्गीय परिवारों में उत्सुकता जगी है. मध्यवर्ग के आर्थिक रूप से समृद्ध हो जाने से उन्होंने बचपन से बच्चों को महंगी शिक्षा देनी शुरू कर दी और जिस का संबंध उन के सामाजिक स्टेटस से भी देखा जाने लगा. हालात ये हैं कि कभी विश्वगुरु कहलाने वाले भारत की एक भी यूनिवर्सिटी या कालेज दुनिया के टौप 200 विश्वविद्यालयों या कालेजों में जगह नहीं बना पाई है. आज के दौर में शिक्षा या तो गुणवत्तापूर्ण है ही नहीं या फिर लोगों की पहुंच से बाहर है.

निजीकरण से आए बदलाव

शिक्षा के निजीकरण के बाद देश में कई बदलाव देखने को मिले. पहले तो निजी शिक्षण संस्थान हर छोटेबड़े शहर में कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हैं. निजी क्षेत्र होने के कारण इन के शुल्क में सरकार या सरकारी संस्थाओं का हस्तक्षेप नाममात्र का रह जाता है. सिर्फ मुनाफा कमाने के लिए खुले ये संस्थान ग्रामीण और शहरी इलाकों में युवाओं को जौब प्लेसमैंट के सपने दिखा कर मोटी फीस वसूलते हैं. इस के चलते कई बार मांबाप को अपनी जमीनजेवर या फिर जमा रकम तक खर्च करनी पड़ती है.

दूसरी बात है कि इन में गुणवत्ता की जांच के लिए प्रभावी इंतजाम न होने से ये सिर्फ डिगरी या डिप्लोमा दे देते हैं. मार्केट में हर साल ऐसे युवाओं की खेप आ जाती है जिन्हें दरदर की ठोकर खाने के बाद अपने को ठगे जाने का एहसास होता है.

3 हिस्सों में करना पड़ता है खर्च

मोटेतौर पर हम बचपन की पढ़ाई से ले कर प्रोफैशनल कोर्स तक की पढ़ाई को 3 हिस्सों में बांट सकते हैं. पहला हिस्सा नर्सरी क्लास से ले कर 8वीं तक का है. यहां तक की पढ़ाई में सब से ज्यादा निजीकरण का प्रभाव देखने को मिलता है. हर गलीमहल्ले में खुले प्ले स्कूल इस का उदाहरण हैं, जो प्राइमरी स्कूलों में ऐडमिशन के वादे कर अभिभावकों से मोटी रकम वसूलते हैं.

8वीं के बाद पेरैंट्स को भी लगता है कि बच्चे को अच्छे स्कूल में दाखिला दिलाना है. इन क्लासेज में बच्चे की आगे की स्ट्रीम भी तय कर ली जाती है. इस दौरान आगे की क्लासेज के लिए भी बच्चों की तैयारी शुरू हो जाती है.

10वीं के बाद बच्चों की पढ़ाई पर अभिभावकों को और ध्यान देना पड़ता है और इस के बाद बच्चे अगर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं तो उस के लिए अलग क्लासेज लेनी पड़ती हैं. अगर प्रोफैशनल कोर्स करना है तो कई संस्थानों में उस केऐडमिशन की तैयारी के लिए ट्यूशन लेनी पड़ती है. सब से अहम 12वीं के बाद प्रोफैशनल कोर्सेज या गे्रजुएशन लैवल की पढ़ाई होती है जो बच्चों के कैरियर में काम आती है. इसलिए अभिभावक कोई कोताही नहीं बरतना चाहते हैं. इन

3 हिस्सों की पढ़ाई पर बहुत ज्यादा पैसा खर्च होता है. आइए एक नजर हर हिस्से की पढ़ाई में होने वाले खर्च पर डालते हैं.

नर्सरी से 8वीं तक

दिल्ली के 2 प्राइवेट स्कूलों में बात करने पर हम ने देखा कि वहां नर्सरी में ऐडमिशन के लिए 50 हजार से 1.25 लाख रुपए तक आप को खर्चने होंगे. ऐडमिशन फीस 25 हजार से ले कर 50 हजार रुपए तक है, जो हर साल आप को देनी होगी. इस के अलावा हर 3 महीने में 15 से 20 हजार रुपए तक आप को फीस के देने होंगे. हर महीने होने वाले एडवैंचर कैंप, टूर, पिकनिक, प्रोजैक्ट्स, स्टेशनरी, ड्रैस, कल्चरल ऐक्टिविटी और ट्रांसपोर्ट के नाम पर सालभर में 20 से 30 हजार रुपए तक जाते हैं. अगर बच्चे के लिए ट्यूशन लगाई जाती है तो कम से कम 1 हजार रुपए महीना और खर्चने होते हैं. इस तरह नर्सरी के बच्चे के लिए आप को पहले साल 2 से 2.5 लाख रुपए तक खर्च करने पड़ेंगे.

9वीं से 12वीं तक

9वीं क्लास में आ कर बच्चे की पढ़ाई के अलावा दूसरे खर्च भी बढ़ जाते हैं. करीब 25 हजार रुपए रीऐडमिशन या ऐडमिशन के नाम पर लिए जाते हैं. इस के बाद हर क्वार्टर की फीस करीब 15 से 20 हजार रुपए जाती है. यहां भले ही स्कूल की ड्रैस, ट्रांसपोर्ट, बुक्स का खर्च नहीं लेते हैं लेकिन बच्चों की पौकेटमनी, टूर, फेयरवैल पार्टी का खर्च करीब 10 हजार बढ़ जाता है.

इस के अलावा इन क्लासों में हर महीने जाने वाली ट्यूशन फीस भी हजारों रुपए बैठती है. इस तरह 9वीं से 12वीं तक हर साल 1 से 1.25 लाख रुपए खर्च होते हैं. 11वीं और 12वीं में आईआईटी या अन्य प्रतियोगिता के लिए 2 साल की तैयारी की फीस करीब 1.5 लाख रुपए तक बैठती है, यानी कुल मिला कर लगभग 8 लाख रुपए बैठती है.

12वीं के बाद

यह सब से अहम हिस्सा है, बच्चों की पढ़ाई, खर्च के मामले में भी और कैरियर के लिहाज से भी.

तैयारी : सीए या सीए की तैयारी में 8 से 10 हजार रुपए महीना जाता है, जो साल का एक से 1.25 लाख रुपए बैठता है. करीब 2 साल की तैयारी में खर्च आता है 2 से 2.5 लाख रुपए.

प्रोफैशनल कोर्सेज : बीसीए करने के लिए सरकारी हो या प्राइवेट कालेज, 1 से 1.5 लाख रुपए सालाना खर्च आता है. और 3 साल के कोर्स के 4-5 लाख रुपए. करीब इतना ही खर्च बीबीए और बीजेएमसी में भी आता है. 4 साल के कोर्स में बीटेक, बीफार्मा, एचएम में 1 साल का 1 से 2 लाख रुपए तक खर्च हो जाता है, जो 8 लाख रुपए तक बैठता है. इन कोर्सेज के लिए 8 से 10 लाख रुपए डोनेशन के रूप में मांगे जाते हैं. मैडिकल फील्ड में तो सब से बुरा हाल है. बता दें कि हम ने यहां होस्टल खर्च शामिल नहीं किया है. साथ ही, हर स्कूल व हर शहर के स्कूलों व कालेजों की फीस अलगअलग होती है. इस आंकड़े को फाइनल आंकड़ा न समझें.

कैसे करें प्लानिंग

हम 3 चरणों में प्लानिंग कर सकते हैं.

पहला चरण : नर्सरी से 8वीं तक की पढ़ाई में हर साल आने वाला 2 से 3 लाख रुपए के खर्च के लिए आप को अपने घरखर्च, कपड़ों और अपने शाही शौकों में थोड़ी कटौती करनी होगी, साथ ही बच्चों की हर साल जाने वाली रीऐडमिशन की बड़ी रकम को मैनेज करने के लिए आप बैंक में रिकरिंग डिपौजिट यानी आरडी या पोस्ट औफिस की छोटी स्कीम साल या डेढ़ साल वाली का खाता खोल सकते हैं.

दूसरा चरण : 9वीं से 12वीं की पढ़ाई के दौरान स्कूली खर्च भले ही थोड़ा कम हो जाता है लेकिन बच्चे का अपना खर्च बढ़ जाता है. वह पौकेटमनी या दोस्तों को देख कर पहननेखाने के खर्च बढ़ाने की मांग करता है, जैसा कि हम ने ऊपर बताया है. इस चरण में आप के 1 से 1.25 लाख रुपए सालाना खर्च होंगे. इस के लिए भी आप को अपनी आरडी जारी रखनी पड़ेगी, जिस की रकम अब थोड़ी सी बढ़ानी होगी. दूसरा औप्शन यह है कि जो आप ने एलआईसी का मनीबैक या अन्य पौलिसी प्लान लिए थे, उन का इस्तेमाल इस चरण में हो सकता है.

तीसरा चरण : 12वीं के बाद कंपीटिशन की तैयारी में सालाना 2 से 2.5 लाख रुपए खर्च आता है. अगर आप का बच्चा प्रोफैशनल कोर्स कर रहा है तो खर्च 3 से 4.5 लाख रुपए सालाना पहुंच जाएगा. इस के लिए आप की एलआईसी, जो मैच्योर हो रही होगी, की रकम का इस्तेमाल हो सकेगा.

यहां कर सकते हैं खर्च कम

प्लानिंग के अलावा आप को जिस चीज पर ज्यादा ध्यान देना है वह है खर्च में कटौती. किसी ने ठीक ही कहा है, ‘पैसा ज्यादा कमाने से नहीं थोड़ा बचाने से रुकता है.’ इसलिए हम आप को इन्हीं 3 चरणों में कुछ टिप्स बता रहे हैं, जिन्हें आजमा कर आप इस दौरान होने वाले खर्च कम कर सकेंगे. बच्चों की पढ़ाई की शुरुआत में आप जौब में होते हैं, आप का औफिस घर से दूर भी हो सकता है. इस दौरान आप का खर्च, रैंट, महंगे कपड़े, अच्छा खाना व दूसरी अन्य चीजों पर ज्यादा खर्च होता है. बच्चा छोटा है तो आप 1 बीएचके फ्लैट में फैमिली को ऐडजस्ट करें. अगर घर अपना ही है तो, हर महीने किराए का समझ थोड़ा पैसा बचा कर सेविंग करें. इसी तरह बाहर खाने की जगह घर में ही खाना खाएं. स्मार्ट शौपिंग करें. छोटी क्लासों में बच्चे को ट्यूशन पढ़वाने के बजाय घर पर स्वयं पढ़ाएं. बाहर पढ़ाना है तो इस दौरान आप पार्टटाइम कोई काम करें.

8वीं के बाद ट्यूशन के दौरान घर में आप की हाउसवाइफ पत्नी छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ा सकती हैं. इस से बच्चे की पढ़ाई और ट्यूशन का खर्च निकल जाएगा. महंगे स्कूल टूर से बचें और फैमिली के साथ साल में एक बार जा कर एंजौय कर सकते हैं.

बच्चा एक ही अच्छा

एक अनुमान के अनुसार, एक बच्चे की शुरुआती पढ़ाई से ले कर 12वीं के बाद तक पढ़ाई में लगभग 50 लाख रुपए का खर्च आ रहा है. जैसे आप अपनी बजट की प्लानिंग करते हैं, ठीक वैसे ही फैमिली प्लानिंग करनी भी बेहद जरूरी है. एक बच्चे के होने से आप उस को बेहतर भविष्य दे पाएंगे. ऐसा नहीं है कि सिर्फ एक बच्चा ही सभी के हो, इस के लिए अगर आप का दूसरा बच्चा भी है तो उस के लिए आप एक बच्चे को दादादादी या नानानानी के पास शुरुआती कुछ साल भेज सकते हैं और जब वह समझदार हो जाए तो उसे बेहतर पढ़ाई देने के लिए अपने पास बुला उस का भविष्य सुरक्षित कर सकते हैं. बस, जरूरत है कि आप प्लानिंग के साथ ही चलें.

महिला सशक्तीकरण, लेकिन कैसा

एक युग में हिंदू समाज के ब्राह्मण, नेता और समाज व धर्म के ठेकेदार बाल विवाह का प्रचारप्रसार करते थे. ऐसे में मूढ़मति लोग अपनी छोटी मासूम बेटियों का विवाह 50-60 साल के बूढ़ों से भी कर देते थे.

बाल विवाह की कुप्रथा के कारण समाज में युवा विधवाओं की संख्या बढ़ने लगी. कई सती प्रथा की शिकार होने लगीं. ‘विधवा’ का ठप्पा लगने के बाद युवतियों को सफेद कपड़े पहनने, जमीन पर सोने, एक वक्त खाने और मुंडन कराने जैसे नियम मानने पड़ते. शादी के अवसरों पर उन्हें आमंत्रित नहीं किया जाता. कुल मिला कर महिलाओं की स्थिति बड़ी दयनीय थी. ऐसे में समाज में महिलाओं को सम्मानजनक स्थान दिलाने, उन के अधिकारों की बात उठाने और उन्हें बराबरी का दरजा दिलाने के लिए राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, स्वामी विवेकानंद, शरतचंद्र चटर्जी और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे समाज सुधारक आगे आए.

ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने समाज की युवा विधवाओं और परित्यक्ताओं को अच्छे तरीके से जीने का हक दिलाने, नारी को सम्मान दिलाने के लिए 987 लोगों द्वारा हस्ताक्षरित एक प्रस्ताव भारत की लैजिस्लेटिव कौंसिल को भेजा. प्रस्ताव में हिंदू विवाह अधिनियम में उपयुक्त परिवर्तन का निवेदन किया गया. काउंसिल के वरिष्ठ सदस्य सर जेम्स कोलविले ने इस बिल का समर्थन किया. आधुनिक भारत में नारी सशक्तीकरण की शुरुआत यहां से ही हुई. पूरे देश में इस बिल के पक्षविपक्ष में हजारों प्रस्ताव आए, लेकिन अंत में 26 जुलाई, 1856 को विधवाओं द्वारा पुनर्विवाह का रास्ता खोलने वाला ‘धारा एक्सवी 1856’ कानून पास हो गया. ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने 10 वर्ष की आयु में विधवा हुई बर्दवान की कालीमती देवी और पंडित श्रीशचंद्र विद्यारत्न का विवाह कर कानून को व्यावहारिक जामा पहना दिया. विद्यासागर ने खुद अपने बेटे का विवाह भी एक विधवा से ही करवाया.

आगे चल कर आजाद भारत में हिंदू विवाह अधिनियम में और भी संशोधन हुए. महिलाओं को तलाक का अधिकार भी मिला. स्त्री की स्वतंत्र सत्ता को समाज और कानून दोनों ने सम्मानित किया. 1978 से जब घरेलू हिंसा की वारदातों में इजाफा हुआ तो नारी सशक्तीकरण के और उपाय सोचे जाने लगे. 1983 में क्रिमिनल लौ ऐक्ट पास किया गया, जिस में धारा 498ए शामिल की गई. इस के तहत किसी महिला के पति या उस के रिश्तेदारों द्वारा की गई हिंसा के लिए सजा का प्रावधान है.

यह धारा इतनी कठोर है कि आरोपित व्यक्ति को बिना वारंट गिरफ्तार कर लिया जाता है और उस की बेल भी नहीं हो सकती. दहेज के मामलों से निबटने के लिए भारतीय दंड संहिता में कई संशोधन जोड़े गए. 2005 में घरेलू हिंसा कानून आया, जो 2006 से लागू हुआ.

पर बन गया महिला सख्तीकरण

शिक्षा, कारोबार, विज्ञान, चिकित्सा, कानून, पुलिस, सेना, राजनीति, खेल आदि सभी क्षेत्रों में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी बढ़ी, जो एक जिम्मेदार समाज के लिए आवश्यक भी है और महत्त्वपूर्ण भी. लेकिन इस आपाधापी में समाज का भीतर ही भीतर काफी अहित भी हो रहा है. पारिवारिक और सामाजिक तानाबाना ढीला पड़ने लगा है. पति और पत्नी कहने भर को दो जिस्म एक जान हैं.

हकीकत तो यह है कि स्नेह, अपनापन और अधिकार की भावना का क्षरण होने लगा है, जिसे हम बारीकी से न देखें तो जानना भी मुश्किल है. नारी और पुरुष को एकदूसरे का पूरक मानने के बजाय प्रतिद्वंद्वी माना जाने लगा है. जरा बताएं, किस भाईबहन में आपस में झगड़े नहीं हुए होंगे या कभी भाई ने अपनी बहन को चांटा नहीं लगा दिया होगा? क्या कभी पिता किसी गलती पर अपनी बेटी को चपत नहीं लगा देता? मां अपनी बेटी को कस कर डांट नहीं लगा देती?

ऐसे मामलों में तो कभी पुलिस या कानून को बीच में नहीं लाया जाता. पति अधिकारपूर्वक अपनेपन से पत्नी के साथ प्यार कर ले, तो यह रेप हो गया (केस नं. 1). सासससुर अपनी बहू को अधिकारपूर्वक उस की गलती पर डांट दें, तो यह ‘प्रताड़ना’ हो गया. ननद अपनी भाभी को जरा ऊंची आवाज में बोल दे, तो यह भाभी का अपमान हो गया (केस नं. 2). यहां आप गौर करें तो पाएंगे कि सशक्तीकरण ‘बहू’ या ‘पत्नी’ नाम की नारी का ही हुआ है. सास और ननद जैसी नारी का तो ‘निर्बलीकरण’ ही हो गया है. (केस नं. 3 में देखें). यौन उत्पीड़न के कानून का कैसा दुरुपयोग किया जाता रहा है. घूर कर देखना, गंदी निगाहों से देखना, अश्लील शब्दों का इस्तेमाल करना, शारीरिक संबंधों का प्रस्ताव देना आदि आरोपों के लिए तो मैडिकल जांच या प्रमाण की भी जरूरत नहीं. किसी स्त्री द्वारा इतना कहना भर काफी है और पुरुष के चरित्र की चिंदीचिंदी हो जाती है. आरोप प्रमाणित हो या न हो लेकिन वह बेचारा भरे समाज में सिर उठा कर चलने तक को तरस जाता है. हर इंसान उसे ऐसे देखने लगता है मानो वह हवस का पुतला, बलात्कारी और चरित्रभ्रष्ट इंसान है.

जरा सोचिए, आज महिलाओं ने जो तरक्की की है क्या उस में पुरुषों का कोई योगदान नहीं? पुरुष के सहयोग के बिना नारी अकेली आगे कैसे बढ़ सकती है? आखिर प्रकृति की ये दोनों कृतियां मिल कर ही तो संपूर्ण हुई हैं. फिर पुरुषों की इतनी गलत छवि प्रस्तुत कर के क्या हासिल होने वाला है?

कुछ समय पहले बेंगलुरु हाईकोर्ट के न्यायाधीश मंजूनाथ भी यह कहने के लिए मजबूर हो गए थे कि महिला सशक्तीकरण के नाम पर समाज का कबाड़ा हो रहा है. यद्यपि उन के कथन को ले कर बड़ा बवाल मचा लेकिन उन की बातों में काफी हद तक सचाई है. एक महिला समाजसेवी भी उन के इस विचार से इत्तफाक रखती हैं. उन का कहना है, ‘‘ऐसे कई मामले होते हैं जिन में पुरुष को गलत इरादों के साथ बलात्कारी, सताने वाला या छेड़छाड़ का दोषी बना दिया जाता है. ऐसा या तो बदला लेने के लिए किया जाता है या पैसे ऐंठने के लिए.’’

कानून के दुरुपयोग का आलम कुछ ऐसा है कि मकानमालिक किराया बढ़ाने के लिए दबाव डाले या घर खाली करने के लिए कहने लगे, तो उस घर की महिलाएं उसे फंसा देने की धमकी दे सकती हैं. बौस अपनी महिला कर्मचारी की मनमानी से तंग हो कर उसे नौकरी से निकालने की धमकी दे तो उसे भी बदले में ‘मोलेस्टेशन’ केस में फंसाने की धमकी मिल सकती है.

ऐसे मामलों की छानबीन करने वाले जज, वकील, पुलिस और सामाजिक संगठन कई बार यह समझने के बावजूद कुछ नहीं कर पाते क्योंकि वे कानून के दायरे में ही ऐसा कर सकते हैं. एक जज ने इस स्थिति से दुखी हो कर कहा भी है, ‘‘बड़े दुख की बात है कि कमजोर, बीमार और उम्रदराज पुरुषों को भी बलात्कार जैसे मामलों में गलत आरोप से बख्शा नहीं जाता.’’ महिला बलात्कार का गलत आरोप भी लगा दे तो उस की बात को सोलह आना सच मान कर कार्यवाही की जाती है.

जो कानून महिलाओं के लिए समाज में सम्मान और अधिकार दिलाने के लिए बनाए गए थे, उन को अब पति और ससुराल वालों के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है.

सिक्के का दूसरा पहलू

बड़ा बवाल मचाया जाता है कि महिलाओं पर विवाह के बाद अत्याचार होते हैं लेकिन नैशनल क्राइम ब्यूरो के रिकौर्ड्स बताते हैं कि महिलाओं की तुलना में विवाहित पुरुष आत्महत्या करने को ज्यादा मजबूर होते हैं. इस की वजह है मानसिक अशांति और तनाव, पत्नी द्वारा आएदिन कलह, कानून का डर दिखाना और पति के मातापिता का तनाव आदि.

तलाक के ज्यादातर मामलों में पत्नियों को ही बच्चों की देखभाल सौंपी जाती है, पति का बच्चों के प्रति कितना भी स्नेह हो, यह माने नहीं रखता. तलाक के बाद पति द्वारा उन्हें भरणपोषण की एक खास रकम देनी पड़ती है. पति की चलअचल संपत्ति में भागीदारी का आदेश भी दिया जा सकता है. भले ही पत्नी ने खुद ही यह तलाक लेने का निश्चय किया हो और पति तथा उस के परिवार वालों द्वारा की गई सुलह की हर कोशिश ठुकरा दी हो. पति को ही अपनी पत्नी, बच्चे, विवाहित जीवन, मातापिता का चैन आदि खोने पर मजबूर होना पड़ता है क्योंकि पूरा सिस्टम इस पूर्वाग्रह से ग्रस्त है कि पत्नी ‘बेचारी महिला’ है.

हमारा सिस्टम और समाज यह भी भूल जाता है कि अमीर घराने की महिलाएं, उच्च पदों पर नौकरी करने वाली महिलाएं और मानसिक रूप से अस्वस्थ महिलाएं या असहिष्णु महिलाएं ऐसा करने में जरा भी आगापीछा नहीं सोचतीं. घरेलू खटपट के मामले में महिलाओं में जीरो टौलरेंस के मामले बढ़ रहे हैं. पाश्चात्य विचारों से बुरी तरह प्रभावित ये महिलाएं छोटी सी बात पर भरीपूरी गृहस्थी को ठोकर मार कर आगे बढ़ने को तत्पर रहती हैं क्योंकि हर कोई उन्हें उकसाने और उन का साथ देने को तैयार बैठा दिखता है. यह ताज्जुब की बात है कि ज्यादातर महिलाएं कोर्ट के माध्यम से अलग होना चाहती हैं क्योंकि फैमिली कोर्ट के फैसलों में उन्हें ज्यादा फायदा मिलता है.

समाज को छिन्नभिन्न करने की इस कोशिश में बाजारवाद की भी घिनौनी भूमिका है. टीवी सीरियल दिनरात यही दिखाने में लगे हैं कि कैसे बहू ने सासससुर और पति की अक्ल ठिकाने लगा दी, कैसे छलकपट से उन्हें समझौता करने पर मजबूर कर दिया. नारी सशक्तीकरण के नाम पर खेल खेला जा रहा है. मुट्ठीभर महिलाएं मीडिया में छाई हुई हैं और करोड़ों स्त्रियां उन के जैसी बनने की चाहत में घर की जिम्मेदारियों को तुच्छ समझ कर, पति को अपने सपनों का हंता मान कर भागदौड़ में लगी हैं, मन में कुंठित हो रही हैं, येनकेनप्रकारेण धन कमाने के लिए जुटी हुई हैं. ये हर वक्त या तो टैंशन में रहती हैं या अकड़ में या फिर अपने आसमानी अरमानों को पूरा करने के चक्कर में किसी के हाथों पहले जानबूझ कर समर्पण कर देती हैं और बाद में शोरगुल मचाती हैं जैसा कि कुछ महीने पहले एक अभिनेत्री और उस की सहेली ने एक निर्देशक पर झूठा आरोप लगाया था, ये मोहतरमा राजनीति में भी चारों खाने चित हो चुकी हैं. ऐसी महिलाएं खुद भी दुखी रहती हैं और अपने पति, बच्चों, सासससुर आदि को भी दुखी रखती हैं.

समाज भी बहकावे में

कहते हैं कि एक झूठ को बारबार बोला जाए और जोरजोर से बोला जाए तो वह सच व विवेक पर हावी हो जाता है. यह बात यहां भी लागू होती है. नारी अधिकार, नारी अधिकार, इतनी बार और इतने शोर के साथ बोला गया है कि इस के आगे पुरुष अधिकार नाम की चीज किसी को नजर ही नहीं आती.

एक समय था जब मातापिता, बेटीदामाद के बीच हुई खटपट व झगड़ों को साधारण बात मानते थे और अपनी बेटियों को सहिष्णु बनने की सलाह देते थे, लेकिन आज स्थिति बिलकुल उलट है. बेटी पति के खिलाफ कोई आरोप लगा दे, तो बेटी के मांबाप उसे (दामाद को) पूरे समाज में नंगा कर देने की धमकी देने लगते हैं. ये सब कानून के डंडे और सामाजिक तानेबाने के ढीले पड़ने की वजह से हुआ है. कोई पति सबकुछ भूल कर विवाह बचाने की कोशिश करता है तो पत्नी और भी अकड़ जाती है और समझती है कि यह कानून के डर से ऐसा कर रहा है, इसीलिए इसे मजा चखाना जरूरी है.

सच तो यह है कि महिलाओं के सशक्तीकरण की गलत व्याख्या की गई है. समझना होगा कि महिला सशक्तीकरण का सही मकसद और महत्त्व ‘स्त्रीत्व’ को बचाना है, न कि पुरुष के ऊपर धौंस जमाना या उसे नीचा दिखाना. महिला सशक्तीकरण का मतलब है जीवन के उतारचढ़ाव और चुनौतियों का मुकाबला करने में सक्षम होना, न कि पारिवारिक जीवन को तहसनहस करना.

सशक्तीकरण का असली उद्देश्य तब पूरा होगा जब नारी सकारात्मक रूप से सोचने की ताकत बढ़ा लेगी. आत्महत्या जैसे कदम नहीं उठाएगी, अपने बच्चों का भविष्य संवारने के काबिल बनेगी, बुरे दिनों में पति की ताकत बनेगी, बीमार सासससुर की पूरी क्षमता के साथ वैसी ही तीमारदारी करेगी जैसी अपने मातापिता की करती है, भटकते पति को पूरी ताकत के साथ रास्ते पर ला सकेगी, आर्थिक रूप से सशक्त होगी ताकि पति पर निर्भर न होना पड़े. लेकिन कानून की आड़ में महिलाओं का सुपीरिएरिटी कौंप्लैक्स का शिकार होना और एकल जिंदगी जीने की जिद करना समाज को नुकसान ही पहुंचाएगा. ऐसे में यह प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाएगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे देश में नारी सशक्तीकरण की दिशा भटक गई है.   

– – साथ में ललिता गोयल व दीप तिवारी

बात ऐसे बनी

हमारे पड़ोस में शुक्ला परिवार रहता था. उस परिवार में पति, पत्नी और 2 बच्चे थे. बच्चों में बेटी आरती बड़ी थी और बेटा रोहन 7 वर्ष का था. मांबाप का दुलारा होने के कारण रोहन काफी जिद्दी स्वभाव का हो गया था परिवार के मुखिया अमित जब भी कोई खानेपीने का सामान घर लाते, उस सामान पर रोहन अपना अधिकार जमा कर परिवार के किसी सदस्य को न देता. उस की इस खराब आदत से परिवार के सभी लोग परेशान थे. एक बार अमित एक दर्जन केले और आधा किलो सेब ले कर आए. रोहन ने जैसे ही देखा, अपनी आदत के अनुसार सेब और केले पर अपना हक जमा लिया और कहने लगा, ‘‘यह सब केले और सेब मैं ही खाऊंगा, किसी को भी कुछ नहीं दूंगा.’’

अमित को गुस्सा आ गया, कहने लगे, ‘‘ठीक है, ये सेब और केले तुम अकेले ही खाओगे, अगर एक भी केला और सेब छोड़ा तो मारमार कर हड्डीपसली एक कर दूंगा.’’ रोहन सेब और केले खाने लगा. जब पेट भर गया तो केले और सेब छोड़ कर डर के मारे रोने लगा. उस दिन के बाद से उस की जिद करने की आदत छूट गई.

विवेक कुमार यादव, नीलगिरी (तमिलनाडु)

*
मेरे पति बहुत शराब पीते थे. उन की इस आदत के कारण मैं बहुत परेशान रहती थी. पीने के बाद कई बार ये ऐसी हरकतें करते थे जिस से मुझे सब के सामने बहुत शर्मिंदा होना पड़ता था. शराब के कारण हम दोनों पतिपत्नी की आपस में लड़ाई भी बहुत होती थी. कईकई दिनों तक बोलचाल बंद रहती थी. फिर भी इन्होंने शराब पीना नहीं छोड़ा.

एक दिन मैं, मेरी बेटी और मेरे पति हम तीनों टैलीविजन देख रहे थे. टैलीविजन में एक डौक्यूमैंट्री फिल्म में शराब के बारे में दिखा रहे थे कि कैसे शराब पीने से तड़पते हुए एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई. उस की पत्नी और बच्चे रो रहे थे. तभी मेरी बेटी अचानक बोल उठी, ‘‘पापा, शराब पीने से क्या आप का भी यही हाल होगा? तब मैं और मम्मी क्या करेंगे?’’

मेरे पति एकदम सकपका गए. सच, जो काम इतने समय से मैं नहीं कर पाई, बेटी के दो बोल ने यह काम कर दिखाया.

बेटी की बात सुन कर मेरे पति ने उसी समय निर्णय लिया कि आज के बाद वे कभी भी शराब नहीं पिएंगे. आज मैं अपने पति और बेटी के साथ बहुत खुश हूं.

रमा गुप्ता, अशोक विहार (दिल्ली)

कबीर की आखिरी शादी

अभिनेता कबीर बेदी अपने अभिनय से ज्यादा व्यक्तिगत रिश्तों को ले कर सुर्खियों में रहते हैं. 70 साल की उम्र में जब उन्होंने अपने से काफी कम उम्र की 42 साला दोस्त परवीन दुसांज से शादी रचाई तो उन की बेटी पूजा बेदी ने सोशल मीडिया में चुटकी ले कर अपनी होने वाली मां पर निशाना क्या साधा, सब उन के पीछे ही पड़ गए.

कबीर के मुताबिक, यह उन की आखिरी शादी है. इस से पहले भी 3 बार शादी के बंधन में बंध चुके कबीर मशहूर नृत्यांगना प्रोतिमा गौरी बेदी, ब्रिटिश फैशन डिजाइनर सुजेन हम्प्रेज और टीवी एवं रेडियो पर्सनैलिटी निकी बेदी के साथ शादी कर चुके हैं. अब ऐसे में उन के मुंह से आखिरी शादी की बात सुनना जरा अजीब लगता है.

पचड़े में नवाजुद्दीन

कई बार कामयाबी की भी कीमत चुकानी पड़ती है. खासतौर पर मुंबई में सोसायटी में रहने वाले कलाकारों को अपने पड़ोसियों से कानूनी पचड़ों का सामना करना पड़ता है. इसी तरह का एक विवाद नवाजुद्दीन सिद्दीकी के पीछे पड़ गया है.

नवाजुद्दीन के खिलाफ एक महिला ने मुंबई के वर्सोवा पुलिस स्टेशन में मारपीट व छेड़छाड़ की शिकायत दर्ज कराई है. मामला यह था कि पार्किंग के मुद्दे पर आपसी झड़प हो गई थी. बवाल इस हद तक बढ़ गया कि महिला ने नवाजुद्दीन के खिलाफ धारा 354 के तहत मामला दर्ज कर दिया है. हालांकि नवाज इस बात से इनकार कर रहे हैं.  

डीडीसीए खेलकांड

नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में सब से ज्यादा बोलने वाले मंत्री अरुण जेटली को आम आदमी पार्टी ने बुरी तरह घेरा. दिल्ली के क्रिकेट स्टेडियम को ले कर रस्साकशी का जो दौर चला उस में अरुण जेटली चैनलों, अखबारों को इंटरव्यू देने में ऐसे लगे रहे जैसे अभिनेताअभिनेत्री अपनी फिल्मों के प्रमोशन के लिए इंटरव्यू देने में लगे रहते हैं.

मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो द्वारा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के दफ्तर में एक अफसर के केबिन में डाले गए छापे से शुरू हुआ था. सीबीआई चाहे जो कहे, एक मुख्यमंत्री के दफ्तर पर छापा मारा जाए तो सरकार व मुख्यमंत्री की छवि तो खराब होगी ही. शासन हो या व्यापार, सैकड़ों कागज ऐसे मिल जाएंगे जो पहली बार में गलत लगेंगे चाहे बाद में उन का औचित्य सिद्ध किया जा सके.

मायावती, मुलायम सिंह, जयललिता, शरद पवार जैसे नेता तो सीबीआई जांच से घबरा जाते हैं पर अरविंद केजरीवाल दूसरी मिट्टी के बने निकले. उन्होंने दिल्ली डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष रहे अरुण जेटली के अध्यक्षीय काल में बने स्टेडियम की मिट्टी की परतें उधेड़नी शुरू कर दीं. नतीजतन, नरेंद्र मोदी के इकलौते मंत्री, जिन के पास वकालत से बहुत अच्छी, शुद्ध आय वर्षों से चली आ रही थी, खुद कठघरे में खड़े नजर आए.

यह मामला आंधी की तरह रहा जो फिलहाल ठंडा पड़ गया है जैसा मध्य प्रदेश के शिवराज सिंह के व्यापमं घोटाले के मामले में हुआ या जैसा ललित मोदी के राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे या विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के संबंधों को ले कर हुआ. बहरहाल, अरुण जेटली को सफाई देनी पड़ी और इस का अपरोक्ष लाभ कांगे्रस को मिला, फलत: नैशनल हैराल्ड का मामला फीका पड़ गया.

भाजपा इस मामले से इतनी चिंतित हो गई कि इस के अपने सांसद कीर्ति आजाद, जो खुद क्रिकेटर रहे हैं और जिन्होंने डीडीसीए कांड का परदाफाश करने का बीड़ा उठा रखा है, को समझाने के लिए बुलाने को अमित शाह मजबूर हो गए.

डेढ़ साल में भारतीय जनता पार्टी को समझ आ गया है कि शासन चलाने में भ्रष्ट आचरण तो अपनाना ही होगा क्योंकि उलझे मामलों को हल करने के शौर्टकट अपनाने ही पड़ते हैं.

इस सारे मामले में कभी किसी पर दोष साबित होंगे, ऐसा लगता नहीं है. जो पहले दिखता है, वह साबित करना असंभव सा है. अरुण जेटली पर आरोप चाहे जितने लगें, न नरेंद्र मोदी उन्हें छोड़ने वाले हैं, न डीडीसीए. यह कांड यही साबित करेगा कि राजनीति का मतलब हमारे देश में एक कांड से दूसरे कांड में जाना है, एक निर्माण से दूसरे निर्माण में नहीं.

टैनिस पर फिक्सिंग का साया

क्या हो गया है खेलों को, क्रिकेट के बाद अब टैनिस पर फिक्सिंग का साया मंडरा रहा है. आस्ट्रेलियन ओपन से ठीक पहले टैनिस जगत के 16 पेशेवर खिलाडि़यों के फिक्सिंग में शामिल होने के सुबूत मिले हैं. बजफीड न्यूज और ब्रिटिश ब्रौडकास्टिंग कौर्पोरेशन ने इस का खुलासा किया है.

खेल प्रेमियों को तो आभास तक नहीं होता कि फलां मैच में किस खिलाड़ी की हार या जीत होने वाली है. माना जाता है कि सट्टेबाजों द्वारा मैच फिक्स करने के लिए खिलाडि़यों को 50 हजार डौलर का प्रस्ताव दिया जाता था. इतने रुपए पा कर भला खिलाडि़यों का मन क्यों नहीं डोलेगा.

इस खुलासे के बाद भले ही चार टैनिस निकायों-महिला टैनिस संघ, अंतर्राष्ट्रीय टैनिस संघ, टैनिस पेशेवर संघ और ग्रैंड स्लैम बोर्ड के पदाधिकारी यह दंभ भर रहे हों कि उन का तंत्र मजबूत है और किसी भी तरह का भ्रष्टाचार करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा पर यह तय है कि खेल संघ खेल को बचा पाने में असफल रहे हैं.

टैनिस संघों की हिदायत के बाद भी खिलाड़ी मैच फिक्स कर रहे हैं. इस का मतलब तो यही है कि खिलाडि़यों को कोई भय नहीं है. ऐसे में खिलाडि़यों का मनोबल बढ़ता है.

वर्ष 2007 में एसोसिएशन औफ टैनिस प्रोफैशनल ने एक जांच शुरू करवाई थी. जांच में 2 खिलाडि़यों निकोलाई देविदेको और मार्टिन वास्लयो आर्गुल्यो के बीच खेल में कथित सट्टेबाजी के मामले की जांच की जानी थी. बाद में इन दोनों खिलाडि़यों के खिलाफ कोई सुबूत नहीं मिला था पर इस जांच में नामचीन व बड़े खिलाडि़यों के नाम सामने आए जिन्होंने मैच फिक्स किए थे. पर हुआ क्या, जांचदल ने वर्ष 2008 में रिपोर्ट पेश की और कहा कि 28 खिलाडि़यों के खिलाफ जांच हो. लेकिन मामला आगे नहीं बढ़ पाया.

जाहिर है जब मामला आगे बढ़ ही नहीं पाता और खिलाडि़यों के ऊपर कार्यवाही होती ही नहीं है तो भला खिलाड़ी इस से डरेंगे क्यों? खेल संघों के पदाधिकारी केवल जांच की बात करते हैं पर जांच केवल कागजों में ही होती है यदि वे खिलाडि़यों व सट्टेबाजों पर लगाम लगाते तो खेल की ऐसी दुर्गति  न होती.

फोर्ड मोटर का नया सफर

अमेरिकी मोटर वाहन निर्माता कंपनी फोर्ड मोटर भारतीय कार बाजार में अपनी पैठ बनाने का प्रयास लंबे समय से कर रही है. पिछले 2 दशकों में देश के आटो मार्केट में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का वह लगातार प्रयास कर रही है लेकिन कंपनी भारतीय कार बाजार में सिर्फ 3 फीसदी कब्जा ही कर सकी है. यह रफ्तार बहुत धीमी है और इस बात का उस को एहसास है. वह अब मारुति सुजूकी की राह पर चल पड़ी है.

कंपनी को अब समझ आया है कि यदि उसे अपनी बाजार हिस्सेदारी बढ़ानी है तो महानगरों के साथ ही छोटे शहरों व कसबों का रुख करना पड़ेगा. उस के लिए कंपनी ने अपनी रफ्तार तेज कर दी है. कंपनी के एक अधिकारी का कहना है कि उस ने छोटे शहरों में उपभोक्ता सेवा केंद्रों की संख्या बढ़ाने का निर्णय लिया है. इस के साथ ही, वह अपने बिक्री केंद्रों की संख्या भी बढ़ा रही है. कंपनी का लक्ष्य जल्द ही 5 प्रतिशत बाजार हिस्सेदारी हासिल करना है. इस के लिए वह अगले 5 साल में देश में 500 वर्कशौप खोलेगी. अब तक उस के 250 वर्कशौप देश के विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे हैं.

कंपनी का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों से वह लगातार अपनी कार्यशालाएं खोल रही है और उन में 50 फीसदी कार्यशालाएं छोटे शहरों में खोली गई हैं. अच्छी बात यह है कि दुनिया की बड़ी कंपनियों की समझ में आने लगा है कि भारतीय बाजार महानगरों और बड़े नगरों तक ही सीमित नहीं है बल्कि छोटे नगरों व कसबों में भी है. उस का बड़ा फायदा देश के युवाओं को मिलेगा और उन्हें रोजगार के लिए महानगरों का रुख नहीं करना पड़ेगा.

शेयर बाजार में भूचाल

बौंबे स्टौक एक्सचेंज यानी बीएसई के सूचकांक में इस साल की शुरुआत से ही गिरावट का रुख रहा है लेकिन 20 जनवरी को बाजार में भूचाल आ गया और सूचकांक 640 अंक गिर कर 20 माह के निचले स्तर पर आ कर 24 हजार अंक नीचे चला गया.

मोदी सरकार के कार्यकाल में सूचकांक अब सब से निचले स्तर पर पहुंचा है. पिछले वर्ष मार्च के बाद सूचकांक 6 हजार अंक तक गिर चुका है जबकि इस साल अकेले जनवरी में बाजार 8 प्रतिशत यानी 2,055 अंक तक गिर चुका है. रुपए में भी डौलर के मुकाबले जबरदस्त गिरावट दर्ज की गई है. इस गिरावट की वजह विश्व बाजार में कच्चे तेल की कीमत के 12 साल में सब से निचले स्तर पर पहुंचने और चीन में अर्थव्यवस्था में भारी गिरावट को माना जा रहा है. चीन में सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की दर 25 साल में सब से ज्यादा सुस्ती पर है. वह दुनिया की तेजी से बढ़ती और दूसरी सब से बड़ी अर्थव्यवस्था है और ड्रैगन की अर्थव्यवस्था की रफ्तार 1990 के बाद अब सब से कमजोर है जिस से वैश्विक बाजारों में हलचल है.

चीन की अर्थव्यवस्था में गिरावट की वजह उस के निर्यात में गिरावट को बताया जा रहा है जिस का बड़ा असर उस के शेयर बाजार पर पड़ा और चीनी स्टौक मार्केट धराशायी हुआ है. नतीजतन, विश्व के वित्तीय बाजार में खलबली मची. चीन में औद्योगिक विकास की दर में भी जबरदस्त गिरावट आई है. इन सब कारणों से उस की अर्थव्यवस्था ढही है जिस का सीधा असर भारतीय शेयर बाजार में देखने को मिला है.

हौलीवुड में धनुष

तमिल फिल्म अभिनेता धनुष सिर्फ 2 हिंदी फिल्मों के जरिए ही इतने चर्चित हो गए हैं कि उन्हें हिंदी समेत तमाम भाषाओं की फिल्मों के औफर मिल रहे हैं. वे हौलीवुड में भी अभिनय की पारी शुरू कर रहे हैं. धनुष ईरान मूल के फ्रांसीसी निर्देशक मर्जने सत्रापी की फिल्म ‘द एक्स्ट्राऔर्डिनरी जर्नी औफ द फकीर हू गौट ट्रैप्ड इन एन इकिया कपबोर्ड’ में काम करेंगे.

इस फिल्म में प्रसिद्ध हौलीवुड अभिनेत्री उमा थर्मन भी नजर आएंगी. फिल्म में ‘बैंडिट क्वीन’ की अभिनेत्री सीमा बिस्वास भी हैं. वैसे, चूंकि फिल्म भारतीय संदर्भ में बन रही है और इस की निर्माण टीम में मुंबई के फिल्म प्रोडक्शन हाउस भी शामिल हैं, इसलिए इसे पूरी तरह से हौलीवुड फिल्म नहीं कहा जा सकता है लेकिन फ्रैंच फिल्मकार के साथ काम करना धनुष के लिए काफी चुनौतीपूर्ण व रोमांचक होगा.

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