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स्टार्टअप का जमाना

देश में स्टार्टअप की शुरुआत ने नए कीर्तिमान बनाए हैं. माना जा रहा है कि अगले 3-4 वर्ष में हजारों नए स्टार्टअप ऐसे होंगे जहां अरबों रुपए का कारोबार हो रहा होगा. स्टार्टअप इसलिए महत्त्वपूर्ण हो गए हैं क्योंकि अब आईआईटी और आईआईएम से निकलने वाले युवा कोई नौकरी पकड़ने के बजाय स्टार्टअप शुरू करने को तरजीह देने लगे हैं.

कई प्रतिष्ठित कंपनियों के नियोक्ता यह देख कर परेशान हैं कि जब वे किसी नामी आईआईटी या आईआईएम संस्थान में लगने वाले जौब मेले में नौकरी के लिए युवाओं का चयन करने जाते हैं, तो उन में से 15-20 फीसदी युवा लाखों रुपए महीने का वेतन ठुकरा देते हैं. पहले ऐसा नहीं था. आखिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि युवा नौकरी के बड़े औफर्स ठुकराने लगे हैं?

इस सवाल का एक जवाब है स्टार्टअप. अब काबिल नौजवान किसी नामी संस्थान से ऊंची डिग्री लेने के बाद नौकरी करने के बजाय अपना स्टार्टअप शुरू करने के बारे में सोचने लगे हैं. वे किसी कंपनी में लाखों रुपए की नौकरी करने के स्थान पर अपना स्टार्टअप शुरू कर खुद मालिक बनने और अपने जैसे योग्य युवाओं को शानदार पैकेज वाली नौकरी देने का सपना देखने लगे हैं. इसी सोच का असर है कि पिछले कुछ वर्षों में देश में सैकड़ों स्टार्टअप खुल गए हैं और बेमिसाल कामयाबी के आधार पर वे दूसरों को भी स्टार्टअप खोलने की प्ररेणा देने लगे हैं.

क्या है स्टार्टअप

प्राय: स्टार्टअप ऐसी कंपनी को कहा जाता है, जो अभी अपने शुरुआती दौर में है यानी किसी उद्यमी ने अपने किसी विचार को मूर्त रूप देना शुरू किया है. एक तरह से यह प्रायोगिक तौर पर किसी व्यवसाय की शुरुआत करना हुआ. ऐसी कंपनियां छोटे स्तर पर शुरू की जाती हैं और आगे बाजार में टिके रहने के लिए इन्हें अकसर किसी पूंजीपति से अतिरिक्त धन (फंडिंग) की जरूरत होती है. 90 के दशक में अनेक डौटकौम (इंटरनैट) कंपनियों की स्थापना के दौर में यह शब्द चलन में आया था, पर 21वीं सदी के पहले दशक में ऐसी दर्जनों स्टार्टअप कंपनियां अस्तित्व में आईं. आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों से डिग्री हासिल करने के बाद युवाओं ने फ्लिपकार्ट, स्नैपडील, शादी डौटकौम जैसे स्टार्टअप न सिर्फ शुरू किए बल्कि उन की सफलता ने साबित कर दिया कि कैसे देश में हजारों नए रोजगार और बेशुमार पूंजी पैदा की जा सकती है.

मिसाल के तौर पर वर्ष 2007 में महज 40 हजार रुपए से शुरू किए गए स्टार्टअप ‘फ्लिपकार्ट’ ने यह उदाहरण पेश किया है कि करोड़ों रुपए का कारोबार करने के लिए सब से ज्यादा जरूरी चीज है जज्बा. नई सोच के साथ शुरू किए गए अन्य स्टार्टअप ने फ्लिपकार्ट जैसी ही सफलताएं दोहराई हैं.

भारत एक नया स्टार्टअप मुल्क

स्टार्टअप कंपनियों की मौजूदगी बढ़ने से हमारा देश दुनिया में सब से युवा स्टार्टअप मुल्क बन गया है. आंकड़ों के मुताबिक देश में 72 फीसदी स्टार्टअप कंपनियों के संस्थापक 35 साल से कम उम्र के युवा हैं. इसे एक शानदार उपलब्धि माना जा सकता है. यही नहीं, रोजगार तलाश करने वाले प्रतिभाशाली युवा बड़ी कंपनियों के बजाय इन से काम कराना पसंद कर रहे हैं. खुद सरकार को स्टार्टअप कंपनियों में देश का बेहतर भविष्य दिखाई दे रहा है. प्रधानमंत्री कार्यालय भी उन्हें प्रोत्साहित करने की योजना पर काम कर रहा है.

आंध्र प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे कई राज्यों की सरकारों ने स्टार्टअप कंपनियों को वित्तीय मदद देने और जरू री इंफ्रास्ट्रक्चर मुहैया कराने की योजना पर काम शुरू कर दिया है. इस प्रोत्साहन के पीछे यह विचार काम कर रहा है कि इस से बड़ी संख्या में रोजगार का सृजन होगा जो बेरोजगार युवाओं के लिए सब से ज्यादा जरूरी चीज है.

नौकर नहीं, मालिक बनें

हमारे देश में एक दौर ऐसा भी था जब सरकारी नौकरी को सब से सुरक्षित माना जाता था. इस के बाद प्राइवेट सैक्टर में ऊंची नौकरी को प्रतिष्ठा की नजर से देखने का दौर भी आया, जो बहुराष्ट्रीय कंपनियों की आमद के साथ थोड़ा फीका पड़ गया लेकिन जैसी सनसनी पिछले एक दशक के भीतर स्टार्टअप कंपनियों ने अपनी कामयाबी से फैलाई है, उस से एक नई उम्मीद की किरण देश में जगी है. अब ज्यादातर युवा अपना स्टार्टअप शुरू करने को एक रुतबे की बात मानते हैं, इसी सोच का नतीजा है कि देश में पिछले 5 वर्ष में कई बेहतरीन स्टार्टअप शुरू हुए हैं जिन्होंने बाजार का रुख ही बदल कर रख दिया है.

नौसकौम 2014 की रिपोर्ट के अनुसार देश में 3,100 स्टार्टअप थे, जिन की संख्या 2020 तक बढ़ कर 11,500 होने का अनुमान है. टैक्सी बुकिंग, भोजन का और्डर, औनलाइन शौपिंग, फ्लाइट, होटल आदि की बुकिंग से ले कर कई ऐसे काम हैं, जिन में पहले कई झंझट थे, पर स्टार्टअप कंपनियों ने ईकौमर्स का सहारा ले कर ये सारे काम इतने आसान कर दिए हैं कि अब वे चुटकी बजाते ही हो जाते हैं. यही नहीं अब कई बड़ी पुरानी कंपनियों में भी स्टार्टअप कंपनियों को ले कर दिलचस्पी जग रही है और वे इस में या तो निवेश कर रही हैं या फिर अपना कामकाज इन्हें सौंप रही हैं.

जैसे 2015 में दिग्गज आईटी कंपनी इन्फोसिस ने घोषणा की है कि वह करीब ढाई करोड़ डौलर का निवेश भारतीय स्टार्टअप कंपनियों में करेगी. टाटा की सहयोगी इलैक्ट्रौनिक कंपनी क्रोमा अपने कामकाज का कुछ हिस्सा स्टार्टअप कंपनियों को सौंप चुकी है.

ये उदाहरण साबित करते हैं कि देश में स्टार्टअप में निवेश के लिए कितना उत्साही माहौल है. इस उत्साह का कारण यह है कि यहां उपभोग का एक बड़ा बाजार उपलब्ध है. ऐसे ग्राहकों की भारी संख्या मौजूद है जो इंटरनैट से जुड़ कर खरीदबिक्री का दायरा बढ़ा रहे हैं. बड़े शहरों में ही नहीं, गांवकसबों में भी तकनीक के सहारे व्यवसायी अपना सामान बेचने में सफल हो रहे हैं. ग्राहकों को औनलाइन शौपिंग के जरिए वह सुविधा मिल रही है कि वे देश के किसी भी कोने में बैठ कर अपनी इच्छानुसार कोई सामान खरीद सकते हैं.

स्टार्टअप सफल क्यों हुए

अगर इस सवाल का जवाब खोजा जाए कि देश में सैकड़ों बड़ी कंपनियों के रहते स्टार्टअप सफल क्यों हुए, तो इस का उत्तर आसानी से मिल जाता है. कुछ साल पहले फिल्म का टिकट खरीदने के लिए घंटों लाइन में लगना पड़ता था, पिज्जा मंगाने के लिए फोन करने या खुद रेस्तरां जाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था.

औनलाइन शौपिंग से ले कर होटल या फ्लाइट की बुकिंग के लिए दुकान पर जाना या एजेंट की मदद लेना ही एकमात्र चारा था. पर मोबाइल इंटरनैट के प्रचलन में आते ही इंटरनैट पर इन सारी चीजों को मुहैया कराने वाले स्टार्टअप सामने आए, जिन से घंटों का काम चुटकियों में करना मुमकिन हो गया.

स्टार्टअप कंपनियों की सफलता का आलम यह है कि अब ज्यादातर मांबाप चाहते हैं कि उन की संतानें या तो अपना स्टार्टअप बनाएं या फिर किसी अच्छे स्टार्टअप के साथ जुड़ कर काम करें.

शादी जैसे मामलों में भी स्टार्टअप से जुड़े युवाओं को प्राथमिकता दी जाने लगी है. स्टार्टअप की सफलता का एक मुख्य आधार मोबाइल इंटरनैट का तेज प्रसार भी है. हमारे देश में आज 35 से 40 करोड़ लोग इंटरनैट से जुड़े हुए हैं. वे इंटरनैट का इस्तेमाल ईमेल भेजने से ले कर फेसबुक, व्हाट्सऐप का प्रयोग करने के अलावा औनलाइन शौपिंग करने में कर रहे हैं.

यही नहीं, देश में मोबाइल इंटरनैट काफी तेजी से बढ़ रहा है, इस कारण यह अनुमान लगाया जा रहा है कि स्टार्टअप के मामले में अमेरिका ने जो मुकाम 20 वर्ष में और चीन ने जिस जगह को 10 साल में हासिल किया है, भारत के युवा वह लक्ष्य अगले 5 वर्ष में ही हासिल कर लेंगे. आज करीब 4 करोड़ लोग रोजाना मोबाइल इंटरनैट पर सक्रिय रहते हैं, इस के आधार पर कहा जा सकता है कि वे ऐसे संभावित ग्राहक हैं जिन की तलाश सैकड़ों स्टार्टअप को हो सकती है.

कैसे करें शुरुआत

ध्यान रहे कि कोई भी नया स्टार्टअप व्यवसाय शुरू करने जैसा ही कठिन है. लेकिन जिस तरह सरकारें और कई बड़ी कंपनियां स्टार्टअप को मदद मुहैया करा रही हैं, उस में स्टार्टअप शुरू करना अक्लमंदी का काम कहलाएगा. फिर भी स्टार्टअप के लिए एक रूपरेखा बना लेना समझदारी होगी और इस के लिए इन बातों पर विचार करना जरूरी है :

–       क्या हम कोई ऐसा सामान या सेवा देने जा रहे हैं जिस की लोगों को जरूरत है?

–       अगर दूसरी कंपनियां हमारे स्टार्टअप जैसे काम कर रही हैं, तो उन से अलग और बेहतर होने की कितनी गुंजाइश है?

–       क्या मेरा स्टार्टअप मुझे व मेरे स्टार्टअप में काम करने वाले अन्य युवाओं के लिए आर्थिक तौर पर फायदेमंद होगा?

–       अगर स्टार्टअप सफल नहीं रहा तो प्लान बी क्या है यानी नुकसान की स्थिति में खुद के लिए व अन्य कर्मचारियों के भविष्य के लिए कोई योजना है या नहीं?

–       क्या यह स्टार्टअप पेटेंट नियमों और देश के कानूनों का ध्यान रख पाएगा? कोई सेवा या सामान ग्राहकों तक कैसे पहुंचेगा और उत्पादन के लिए कच्चा माल आदि कहां से मिलेगा? क्या जिन लोगों को स्टार्टअप में काम करने के लिए भरती किया जा रहा है, वे वास्तव में योग्य व समर्थ हैं?

–       क्या निवेश के लिए बैंकों और बड़ी कंपनियों से बात की गई है? निवेश या तो खुद किया जा सकता है या फिर बैंक से लोन ले कर, किसी को स्टार्टअप में हिस्सेदारी दे कर या इस काम के लिए बड़ी पूंजी मुहैया कराने वाले लोगों के जरिए. जो सामान या सेवा दी जाने वाली है, उस के बारे में पहले से कोई फीडबैक उपलब्ध है या नहीं?

इन गलतियों से बचें

अकेले शुरुआत ल्ल अगर किसी व्यवसाय का खुद को या परिवार में किसी सदस्य को कोई पूर्व अनुभव नहीं है, तो स्टार्टअप के लिए अकेले शुरुआत करने से बचना चाहिए. अच्छा होगा कि इस में किसी योग्य व्यक्ति को साझीदार बनाया जाए.

गलत स्थान का चयन ल्ल जिस सामान या सेवा की जहां जरूरत है, उसी से जुड़ा स्टार्टअप वहां खोला जाए. अगर स्थान चयन में गलती कर दी गई, तो नुकसान की भरपाई करना मुश्किल हो सकता है.

प्रतिस्पर्धा से भय ल्ल अगर यह डर सता रहा है कि जिस सामान या सेवा को ले कर आप का स्टार्टअप आ रहा है, वह तो बाजार में पहले से मौजूद है, तो इस डर को मन से निकाल देना चाहिए. ध्यान रहे कि बाजार में वही टिकता है, जो बेहतर होता है. हमेशा दूसरों से बेहतर करने की कोशिश करनी चाहिए.

बदलाव का संकोच ल्ल आज जिस का सिक्का चल रहा है, जरूरी नहीं कि कल भी वही सेवा या सामान बिके. इसलिए स्टार्टअप को नए बदलावों और चुनौतियों के लिए तैयार रहना चाहिए.

धीमी शुरुआत ल्ल स्टार्टअप की सुस्त शुरुआत सारी मेहनत पर पानी फेर सकती है. जोरदार प्रचार और कड़ी प्रतिस्पर्धा ही जीत की कुंजी है.

कम पूंजी ल्ल जितने धन की जरूरत है, अगर उस से काफी कम पैसा ले कर स्टार्टअप शुरू किया जा रहा है, तो सफलता मिलने में काफी कठिनाई आ सकती है.

ज्यादा पैसा ल्ल इसी तरह वैंचर कैपिटलिस्ट या बैंक से जरूरत से ज्यादा कर्ज लेना भी मुश्किलें खड़ी कर सकता है, क्योंकि दोनों ही अपनी पूंजी, पर अधिक ब्याज लेने या ज्यादा कमाई करने से नहीं चूकेंगे.

खुद मेहनत से बचना ल्ल अगर शुरुआत से ही यह मान लिया गया कि आप स्टार्टअप के मालिक हैं, तो ऐसे स्टार्टअप को बचाए रखना नामुमकिन हो जाता है.

ग्राहकों को न पहचान पाना ल्ल अगर किसी स्टार्टअप को यही नहीं मालूम कि उस के सामान व सेवाओं के ग्राहक कौन व कहां हैं, तो ऐसा स्टार्टअप खड़ा नहीं हो सकता.

कहां से लें मदद

केंद्र और राज्य सरकारें देश में स्टार्टअप के लिए बेहतर माहौल बना रही हैं, इसलिए अगर कोई युवा बेहतरीन विचार के साथ सरकारी संगठनों या निजी कंपनियों के पास सलाह और पूंजी की मांग करने जाता है, तो उसे वहां से पूरी मदद मिल सकती है. फिर भी अन्य कंपनियों की तरह स्टार्टअप को कुछ बुनियादी तैयारियां अवश्य कर लेनी चाहिए. जैसे, उसे प्राइवेट लिमिटेड कंपनी अथवा सोल प्रोपराइटरशिप के तहत अपने स्टार्टअप का पंजीरकण कराना होगा.

किसान सुविधा एप से मुट्ठी में जानकारी

खेत से खलिहान तक, खलिहान से मंडी तक किस चीज में है तेजी, किस मे है मंदी, किस फसल में कौन सा बीज बोएं, क्या खाद डालें, बीमारी होने पर क्या कीटनाशक दवाएं डालें, कैसा रहेगा मौसम, कैसे होगी मिट्टी जांच, क्या है किसानों के लिए नई स्कीमें, पशुओं की देखभाल वगैरह ऐसे अनेक सवाल हैं, जिन का के जवाब अब आप को मोबाइल पर ही मिल जाएंगे. कहीं भी दूर जाने की जरूरत नहीं. जी हां, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों की इन्हीं समस्याओं के लिए ‘किसान सुविधा एप’ लांच किया है, जिसे अपने एंड्राइड मोबाइल पर लोड करने के बाद किसानों को खेतीकिसानी से संबंधित हर प्रकार की सटीक जानकरी लगातार मिल सकेगी.

इस ‘किसान सुविधा एप’ से जुड़े होंगे देश के जानेमाने कृषि वैज्ञानिक व एक्सपर्ट लोग, जो किसानों की समस्याओं के समाधान इस एप के जरीए चुटकियों में करेंगे. प्रधानमंत्री ने रेडियो पर ‘मन की बात’ कार्यक्रम के दौरान ‘किसान सुविधा एप’ की जम कर तारीफ की. उन्होंने कहा कि आप इसे  ट्राई तो कीजिए कुछ कमी होगी तो मुझे शिकायत कीजिए. आप की हर परेशानी दूर की जाएगी. मोदी सरकार की किसानों को लुभाने की मुहिम के तहत उठाया गया यह कदम तारीफ के लायक कहा जा सकता  है. वाकई मोदी को किसानों की काफी फिक्र  है. इस से मोदी के आनलाइन प्रेम का भी पता चलता  है. वे लगातार आधुनिक बन रहे हैं.

ग्रीन लेडी जया देवी

कुछ खास कर के ही खास मुकाम हासिल किया जा सकता है. पानी के इंतजाम के बल पर बिहार का नक्सल प्रभावित इलाका धरहरा तरक्की की नई कहानी लिख रहा है. यह तब्दीली आई है 500 हेक्टेयर जमीन पर वाटरशेड बनने के बाद. इस वाटरशेड से खेती सरल हुई और भूगर्भ पानी का लेवल भी बेहतर हुआ. इस से करीब 50000 किसानों को फायदा पहुंचा. मगर यह काम दोचार दिनों में नहीं हुआ. इस मुहिम में जया देवी और उन की टीम के साथियों की 10 सालों से ज्यादा की मेहनत शामिल है. ग्रीन लेडी के नाम से मशहूर सामाजिक वर्कर सराधी की जया देवी ने विलेज वाटरशेड के सर्वे का काम साल 2002 में शुरू किया था. उन्होंने साल 2005 में इस की बुनियाद रखी और साल 2012 में काम मुकम्मल किया.जया देवी ने नाबार्ड द्वारा चलाई जाने वाली योजनाओं के जरीए करेली, कोयलो, अमरासनी, सखौल, गौरैया, लकड़कोला व बरमसिया विलोखर में वाटरशेड बनवाए हैं. पानी बचाने के लिहाज से इन इलाकों में तालाब, चेक डैम व पत्थरमिट्टी के अवरोध बांध  वगैरह बनाए गए हैं.

ईमार्केटिंग से जुड़ेंगी देश की मंडियां

केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने पटना में कहा कि केंद्र सरकार ईमार्केटिंग के जरीए देश की 585 मंडियों को जोड़ने जा रही है. यह कार्यक्रम 14 अप्रैल से शुरू हो जाएगा. इस के लिए राज्य सरकारों से प्रस्ताव मांगे गए हैं. उन्होंने आगे बताया कि 14 राज्यों ने सौ से ज्यादा शहरों का प्रस्ताव भेजा है, लेकिन बिहार, केरल और पंजाब से एक भी शहर का प्रस्ताव नहीं भेजा गया है. कृषि मंडी विकसित करने के लिए हर शहर को 30 लाख रुपए दिए जाएंगे. लाइसेंसी दुकानदार ही किसानों से उत्पाद खरीद पाएंगे, साथ ही किसानों को देश की विभिन्न मंडियों में अपने उत्पादों की कीमत देखने की सुविधा होगी. राज्य में पशुधन के विकास के लिए मोतिहारी में पशु मेला सह वैज्ञानिक सत्र का आयोजन किया जा रहा है, जिस में पशुओं के स्वास्थ्य की जांच की जाएगी और वैज्ञानिक पशुपालन के बारे में जानकारी दी जाएगी. कृषि मंत्री की बात से सूबे के तमाम किसानों व पशुपालकों के चेहरे खिल गए.

किसानों को 5 रुपए में भरपेट भोजन

राजस्थान सरकार किसानों के लिए अनेक फायदेमंद योजनाओं में जुटी है, जिस से किसानों में खुशी का माहौल है. अपनी खेत की उपज को ले कर मंडी आने वाले किसानों के लिए दोपहर के भोजन की योजना शुरू की गई है. इस में किसानों को मात्र 5 रुपए में भरपेट भोजन कराया जा रहा है. उदयपुर संभाग मुख्यालय स्थित कृषि उपज मंडी में किसानों को घर जैसा माहौल महसूस हो रहा है. यहां आने वाले किसान ज्यादातर दूरदराज के गांवकसबों से आते हैं. हालांकि किसानों को खाने की जो थाली परोसी जा रही है, उस की कीमत 40 रुपए है, लेकिन किसानों से मात्र 5 रुपए ही लिए जा रहे हैं. शेष 35 रुपए का भुगतान मंडी समिति द्वारा अनुदान के रूप में किया जाता है. यह सुविधा किसानों के साथसाथ पंजीकृत पल्लेदारों को भी प्राप्त है. भोजन की थाली में 8 रोटियां, दाल और सब्जी के साथ सर्दियों के दिनों में 50 ग्राम गुड़ और गरमियों में 200 मिलीलीटर छाछ मिलती है. उदयपुर मंडी में आने वाले किसानों के लिए यह योजना बहुत ही लोकप्रिय साबित हो रही है. इस योजना के तहत अब तक तकरीबन 30 हजार किसान लाभान्वित हो चुके हैं. यह तादाद लगातार बढ़ रही है.

क्यों हुए शाहरुख़ सलमान के कायल

सलमान खान के फैंस में एक नाम और जुड़ गया है और वो नाम है शाहरुख़ खान का. सुल्तान का टीज़र देखने के बाद शाहरुख़ खुद को रोक नहीं पाए और उन्होंने अपनी ख़ुशी ट्विटर पर कुछ इस तरह जाहिर की.

शाहरुख़ ने लिखा है ,'क्या बात है, हरियाणा का शेर आ गया, सुल्तान भाईजान.'

मेरे बच्चे के दूध के दांतों के बीच काफी स्पेस है. कहीं यह चिंता की बात तो नहीं.

सवाल

मेरे बच्चे के दूध के दांतों के बीच काफी स्पेस है. कहीं यह चिंता की बात तो नहीं?

जवाब

आगे के दूध के दांतों के बीच स्पेस होना सामान्य प्रकृति है और यह अच्छी बात है. स्पेस होने से बड़े और स्थाई दांतों के लिए हड्डी को विकसित होने के लिए पर्याप्त जगह मिलेगी और जब ये दांत निकलेंगे तब वे इस हड्डी पर अच्छी तरह फिट होंगे. स्थाई दांत निकलने के बाद यह जगह खुदबखुद भर जाएगी और जबड़े का आकार बढ़ जाएगा.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

मेरे बच्चे का पहला दांत कब निकलेगा.

सवाल

मेरे बच्चे का पहला दांत कब निकलेगा?

जवाब

दूध के पहले दांत निकलने की औसत आयु 6 से 9 माह है. इस में अंतर भी हो सकता है यानी इस समय से पहले या बाद में भी दांत निकल सकते हैं, पर उसे सामान्य ही माना जाता है. आमतौर पर सब से पहले आगे नीचे की ओर दांत निकलते हैं. लड़कियों के दांत आमतौर पर लड़कों से पहले निकलते हैं.

 

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बेन रेखी मनाली में फिल्मा रहे हैं फिल्म ‘आश्रम’

वैश्वीकरण के चलते बौलीवुड की फिल्में धीरे धीरे पूरे विश्व में अपनी धाक बनाती जा रही हैं. तो दूसरी तरफ हौलीवुड की फिल्में भारत में हिंदी, तमिल, तेलगू व मलयालम भाषाओं में डब होकर रिलीज हो रही हैं. यानी कि हालीवुड फिल्मों के लिए भारतीय दर्शक बहुत बड़ा बाजार बनता जा रहा है. इतना ही नहीं अब हौलीवुड के फिल्मकारों को भारतीय सभ्यता व संस्कृति मोहने लगी है. जिसके चलते कई हौलीवुड निर्देशक भारतीय पृष्ठभूमि की कहानी गढ़कर अपने हौलीवुड कलाकारों के संग भारत में अपनी फिल्म की शूटिंग करने के लिए विवष हो रहे हैं. ऐसे ही फिल्मकारों में से एक हैं बेन रेखी. बेन रेखी लंबे समय से अपनी फिल्म ‘‘आश्रम’’ को भारत में फिल्माना चाह रहे थे, पर जब उन्हे भारतीय फिल्मकार गुनीत मोंगा का साथ मिला, तो उनका यह सपना पूरा हो रहा है. बेन रेखी इन दिनों अमेरिकन कलाकारों के संग मनाली में अपनी अंग्रेजी भाषा की अंतरराष्ट्रीय फिल्म ‘‘आश्रम’’ की शूटिंग कर रहे हैं. इस फिल्म में कल पेन, मेलिसा लियो, हेरा हिलमर जैसे अमरीकन कलाकारों के साथ भारतीय अदाकारा राधिका आप्टे भी अभिनय कर रही हैं. यह अंग्रेजी भाषा की स्प्रिच्युल फैंटसी थ्रिलर फिल्म है. फिल्म की कहानी हिमालय में बसे योगियों के इर्द गिर्द घूमती है.

फिल्म ‘‘आश्रम’’ के सह निर्माता गुनीत मोंगा इस फिल्म के साथ जुड़ने की चर्चा चलने पर कहते हैं-‘‘विश्व के दर्शकों को भारतीय परिवेष की कहानियां सुनाना हमेशा उत्साहवर्धक होता है. अंग्रेजी भाषा के सिनेमा में यह मेरा पहला कदम है. जिसमें अमरीकन कलाकार व निर्देशक बेन रेखी के साथ भारतीय अदाकारा राधिका आप्टे भी काम कर रही हैं.’’

अमरीकन अभिनेता कल पेन ने ट्वीट करके कहा है-‘‘अंततः गुनीत मोंगा के सहयोग से हमारी फिल्म ‘आश्रम’ का निर्माण शुरू हुआ. हमने मनाली में शूटिंग करनी शुरू कर दी है और 15 अप्रैल को राधिका आप्टे भी इस फिल्म की शूटिंग करने के लिए मनाली पहुंच जाएंगी.’’

फिल्म ‘‘आश्रम’’ की कहानी भारत में हिमालय पर बसे एक आश्रम के इर्द गिर्द घूमती है, जहां एक नास्तिक अमरीकन जेमी एक गुप्त संदेश पाकर पहुंचा है. वह अपनी गायब प्रेमिका की तलाश में है. अपनी इस यात्रा के दौरान वह किन बातों का अहसास करता है, यही कहानी है.

‘उला’ के रिलीज न हो पाने के लिए मैं दोषी नहीं: राधिका

सिनेमा में कलाकार की ईमेज बहुत मायने रखती है. कहने के लिए कलाकार इस बात से इंकार करता रहता है. पर हर कलाकार किसी न किसी ईमेज के अंदर ही हमेशा कैद रहता है. उसी ईमेज के अनुरूप किरदार निभाते हुए वह अपना करियर आगे बढ़ाता रहता है. मगर राधिका आप्टे ने बार बार अपनी ईमेज बदलती आ रही हैं. उनकी इस ईमेज का खामियाजा तमिल फिल्म ‘‘उला’’ के निर्माता को भुगतना पड़ रहा है. जी हां! अब तक चालीस फिल्मों में अभिनय कर अंतरराष्ट्रीय ख्याति बटोर चुकी राधिका आप्टे की ईमेज एक ‘नेक्स्ट डोर गर्ल’ की रही है. फिल्म ‘उला’ में भी उन्होने इसी तरह का किरदार निभाया है. लेकिन 2015 में ‘बदलापुर’, हंटर’ जैसी फिल्मों के अलावा लघु फिल्म ‘आहिल्या’ में अति बोल्ड व सेक्सी किरदार निभाने के अलावा सेक्स पर बेबाक बयानबाजी के चलते उनकी ईमेज ऐसी बदली कि फिल्म ‘उला’ के निर्माता परेशान हैं. पर खुद राधिका आप्टे इस बात से सहमत नहीं हैं. वह तो पवन कृपलानी निर्देशित फिल्म ‘‘फोबिया’’ को लेकर ही उत्साहित हैं. जिसमें उन्होने ‘‘अग्रो फोबिया’’ से पीडि़त लड़की का किरदार निभाया है.

हाल ही में जब उनसे हमारी मुलाकात हुई तो हमने उनसे पूछा कि क्या उन्हें नही लगता कि एक कलाकार होने के नाते उनकी इमेज का असर दूसरी फिल्मों पर भी पड़ता है? तो राधिका आप्टे ने बड़ी साफगोई के साथ कहा कि,‘‘मुझे ऐसा नहीं लगता.’’

हमने उनसे कहा कि ,‘‘आपने दक्षिण की फिल्म ‘उला’ में गर्ल नेक्स डोर का किरदार निभाया. उसके बाद आपने एक लघु फिल्म ‘आहिल्या’ में जिस तरह से बोल्ड व सेक्सी किरदार निभाया, उससे ‘उला’ के निर्माता परेशान हैं?’’ इस पर राधिका आप्टे ने कहा- ‘‘उनकी परेशानी मेरी समझ से परे है. दर्शक हर कलाकार को हर फिल्म में अलग अंदाज में देखना पसंद करता है. मैंने ‘उला’ की शूटिंग तीन साल पहले खत्म की थी. उन्होंने पिछले तीन साल से अब तक इस फिल्म को रिलीज नहीं किया. वह रिलीज क्यों नहीं करना चाहते, मुझे पता नहीं. मैने उनसे फिल्म के रिलीज के बारे में कभी कोई सवाल नहीं किया. जबकि मेरी लघु फिल्म ‘आहिल्या’ छह माह पहले आयी थी. ‘आहिल्या’ के बाद प्रदर्शित फिल्म ‘‘मांझी द माउंनटेन मैन’ में दर्शकों ने मुझे काफी पसंद किया. यहां तक कि ‘आहिल्या’ के बाद ही मेरी फिल्म ‘कौन कितने पानी में’ रिलीज हुई. यह फिल्म भले ना चली हो, पर इस फिल्म में भी दर्शकों ने मुझे बहुत पसंद किया. इस फिल्म का किरदार भी काफी हद तक ‘गर्ल नेक्स्ट डोर’ वाला ही था.’’

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