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देशद्रोही कौन

प्रतिष्ठित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में 9 फरवरी, 2016 को जिस प्रकार राजनीति का घिनौना खेल खेला गया उस से शायद ही कोई छात्र आहत होने से बचा हो. मौका छात्रों के एक समूह द्वारा आयोजित अफजल गुरु की फांसी की तीसरी बरसी पर एक कार्यक्रम का था जिस का छात्रों ने प्रचार भी काफी किया था, लेकिन छात्रसंघ के संयुक्त सचिव सौरभ कुमार द्वारा पत्र लिख कर इसे रोकने की मांग की गई थी, जिस कारण इस प्रोग्राम पर रोक लगा दी गई, लेकिन छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने इसे सांस्कृतिक कार्यक्रम के रूप में आयोजित किया.

दरअसल, सौरभ कुमार एबीवीपी का सदस्य है, जो आरएसएस का एक छात्र संगठन है और भाजपा से जुड़ा है. ऐसे में जब इस कार्यक्रम का आयोजन हुआ तो इस में जम कर नारेबाजी की गई. नारेबाजी करने वाले कौन थे यह कोई नहीं जान पाया. इस का किसी को भी भान नहीं था कि मामला इस कदर गड़बड़ा जाएगा कि छात्रों को देशद्रोही तक करार दे दिया जाएगा और इस की एवज में उन छात्रों को भी परेशानी होगी जिन का दूरदूर तक इस से कोई वास्ता नहीं था. इस कार्यक्रम के दौरान शोरशराबे के बीच नारेबाजी किस ने की इस का साफ पता नहीं चल पाया, लेकिन छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को हिरासत में ले लिया गया और 15 फरवरी को उसे कोर्ट में पेश किया गया तथा उस पर देशद्रोह का आरोप लगा. इतना ही नहीं जब कन्हैया को 15 फरवरी को कोर्ट में पेश किया गया तो वहां कुछ कट्टरपंथियों, जिन में ओम प्रकाश शर्मा नामक एक वृद्ध भी था, द्वारा उसे पीटा गया. जाहिर है कि भगवाकरण की आड़ में यह खेल खेला गया. सचाई यह है कि कन्हैया छात्रसंघ का अध्यक्ष होने के साथसाथ अंधविश्वासी विचारधारा का कट्टर विरोधी भी है, जिसे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद कतई बरदाश्त नहीं करती, क्योंकि एबीवीपी आरएसएस का छात्र संगठन है. इस से साफ जाहिर है कि एबीवीपी की शह प्रदर्शनकारियों को रही होगी और कन्हैया की आवाज दबाने में उन्होंने कोई कोरकसर नहीं छोड़ी और उसे देशद्रोही बना दिया.

कौन नहीं है देशद्रोही

यहां एक तर्क यह दिया जा रहा है कि सरकार द्वारा जेएनयू को करोड़ों रुपए अनुदान में दिए जाते हैं जिस से वहां के छात्र पढ़ते हैं, ऐसे में वहां पढ़ने वाले छात्र जिस देश के पैसे से पढ़ रहे हैं उसी देश के खिलाफ नारे लगा रहे हैं, तो क्यों न जेएनयू के छात्र गुरुकुली छात्रों की तरह पंडों की सीख मान कर रहें, यह तर्क पूर्णतया गलत है. हमें यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि देश पुलिस पर कितना खर्च करता है, पर पुलिस न कानून बनाए रखती है न सुरक्षा देती है और ऊपर से हफ्ता वसूलती है सो अलग. तो क्या पुलिस को देशद्रोही न माना जाए? अरबों रुपए मंदिरों की सुरक्षा व शांति के लिए बरबाद किए जाते हैं पर मिलता क्या है? क्या इन मंदिरों को देशद्राही कह कर बंद करने की मांग नहीं उठनी चाहिए?

स्कूल प्रबंधक बड़ीबड़ी बिल्डिंग्स सरकार से अनुदान में जमीन ले कर खड़ी करते हैं और फिर मनमानी फीस वसूलते हैं बावजूद इस के छात्रों को कोचिंग के सहारे रहना पड़ता है, तो क्या यह देशद्रोह नहीं है?

सरकारी बाबू भ्रष्टाचार से जेबें भरते हैं. मोटी सैलरी लेने के बावजूद काम नहीं करते और सहूलतों व भत्तों के नाम पर, घूमने के नाम पर फर्जी बिल बना कर, यात्रा भत्ते दिखा कर देश का पैसा डकारते हैं तो क्या यह देशद्रोह नहीं?

कितने घोटालों में नेता लिप्त हैं और बावजूद इस के साफ बच जाते हैं, क्या वे देशद्रोही नहीं हैं?

व्यापारी करोड़ों रुपए का टैक्स नहीं देते क्या वे देशद्रोही नहीं हैं? 1 लाख करोड़ रुपए बैंकों का उधार ले कर लोग डकार गए, उन्हें भी क्या देशद्रोही ही कहा जाए. सड़क पर टैंट लगा कर जागरण करने वाले क्या देशद्रोही नहीं हैं? जो काला धन लाने से रोक लेते हैं, क्या वे देशद्रोही नहीं हैं?

वामपंथी बनाम कट्टरपंथी

दरअसल, वामपंथी या अंधविश्वास विरोधी होना ही जेएनयू की विशेषता है. वह यही खुले विचार देता है और पुरातनपंथी दलदल से निकलने का रास्ता सुझाता है, जो कट्टरपंथियों को नहीं सुहाता. जैसा कि ऊपर बताया गया है कि सौरभ कुमार एबीवीपी का सदस्य भी है और एबीवीपी आरएसएस का छात्र संगठन, तो जाहिर है उसे वामपंथी कभी नहीं भाएंगे. साथ ही वामपंथी विचारधारा आगे बढ़ने से अंधविश्वास की अपनी भगवा दुकानदारी खत्म होती नजर आई और उन्होंने इसे कुचलने की कोशिश की. क्या कट्टरपंथी नहीं हैं असली देशद्रोही?

अपनी वामपंथी विचारधारा के चलते जेएनयू में महिसासुर दिवस मनाने, योगगुरु रामदेव के विरोध के कारण यह संस्थान हिंदुत्व व पुरातनवाद के विरोधी के रूप में चर्चित हो गया है, जिस कारण धर्मावलंबियों को अपनी नैया डूबती नजर आई और यही कारण रहा कि वे नई सोच, नई क्रांति, नए विचारों को आगे नहीं बढ़ने देना चाहते और खाप पंचायतों की तरह तुगलकी फरमान सुनाते हुए युवा विचारों के खिलाफ खड़े हो जाते हैं.

फर्जी वीडियो टेप का बड़ा खेल

बिना जांचेपरखे कन्हैया की फर्जी वीडियो क्लिपिंग सोशल मीडिया पर व न्यूज चैनल्स पर वायरल कर देना और फिर उसी के आधार पर कन्हैया और उस के साथियों को देशद्रोही करार देना कहां की अक्लमंदी है.

लेकिन हुआ ऐसा ही. बिना जांचे और तह तक पहुंचे ही कन्हैया को जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया गया, लेकिन जब दिल्ली सरकार ने जिलाधिकारी जांच में वायरल हुई वीडियो की फोरैंसिक जांच करवाई, तब कहानी कुछ और ही सामने आई, जिस से इस बात की पुष्टि हुई कि वीडियो के साथ छेड़छाड़ की गई थी. इसी आधार पर कन्हैया को क्लीनचिट भी मिली. पहले ही इस ओर सतर्कता क्यों नहीं बरती गई. क्यों कन्हैया को जेल में डालने की नौबत आई?

इस पूरे प्रकरण से तो ऐसा लग रहा है कि असल में देशद्रोही नारे लगाने वालों को राजनीतिक दल विशेष की शह मिली हुई थी और अशांति फैला कर वे अपना उल्लू सीधा करना चाहते थे.

कन्हैया की जीभ के 5 लाख, गोली मारने के 11 लाख रुपए

जहां देशभर में यही गूंज है कि कन्हैया ने देशद्रोह के नारे लगाए इसलिए उसे किसी भी कीमत पर बरदाश्त नहीं किया जाना चाहिए, जबकि इस बात का कोई सुबूत नहीं कि कन्हैया ने ऐसा कोई घिनौना कृत्य किया हो कि सब उस के खून के प्यासे हो जाएं.

इस से ज्यादा शर्मनाक घटना तो अभी हाल में हुई, जब बदायूं भारतीय जनता युवा मोरचा के जिलाध्यक्ष कुलदीप वार्ष्णेय द्वारा कन्हैया की जीभ काट कर लाने वाले को 5 लाख रुपए देने की घोषणा की गई. इस बात से सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि ऐसे बयान देने से देश में यह आग और फैलेगी. आप ही सोचिए दोष युवा सोच में  है या ऐसे नेताओं में, ऐसे में कोन है देशद्रोही?

एक ओर देशद्रोही कन्हैया को गोली मारने वाले को 11 लाख रुपए देने वाले पोस्टर भी लगाए गए जो पूर्वांचल सेना के अध्यक्ष की ओर से लगे. पुलिस की नाक के नीचे किए गए ये कृत्य, भले ही बाद में एफआईआर दर्ज कर आदर्श शर्मा को गिरफ्तार किया गया हो पर असल सवाल यह है कि देशद्रोह के नाम से कन्हैया को बदनाम करने वाले देशद्रोही कौन हैं?

जेएनयू के छात्र अपने खुले विचारों के कारण जाने जाते रहे हैं, निर्भया कांड हो या किसान आत्महत्या, यूजीसी फैलोशिप या अन्य कोई सामाजिक मुद्दा रहा हो, जेएनयू ने सदा अपनी सहभागिता प्रदर्शित की है फिर वे अब ऐसा कृत्य क्यों करेंगे कि उन्हें देशद्रोही कहा जाए?

बहरहाल, कन्हैया को 2 मार्च को दिल्ली हाईकोर्ट से कुछ शर्तों पर 6 महीने की बेल मिल गई है. तिहाड़ जेल से आने के बाद जेएनयू में खुशी का माहौल दिखा और कन्हैया कुमार ने 3 मार्च को करीब 50 मिनट का भाषण दिया और साफ किया कि उस का रोल मौडल अफजल गुरु नहीं बल्कि रोहित वेमुला है.

कन्हैया का सुबूतों के अभाव में बेल पर छूटने से साफ जाहिर है कि वह देशद्रोही नहीं बल्कि देशद्रोही वे कट्टरपंथी हैं जो युवाओं की, नए विचारों, नई सोच और क्रांति की आवाज दबाने में लगे हैं. जाहिर है कट्टरपंथी भगवाकरण के आगे न सोचते हैं न चाहते हैं. इसीलिए उन्हें नई सोच और विचारों के पर कतरने से भी गुरेज नहीं. असली देशद्रोही तो उन्हें मानना चाहिए जो भगवाकरण की आड़ में फलफूल रहे हैं और अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते हुए रोहित वेमुला का केस हो या कन्हैया का, को राजनीतिक रंग देते हुए, नई पीढ़ी को देशद्रोही करार दे रहे हैं.

कन्हैया को देशद्रोही बनाने का सिलसिलेवार घटनाक्रम

9 फरवरी, 2016 : जेएनयू में वामपंथी स्टूडैंट्स के एक ग्रुप ने अफजल गुरु और जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के कोफाउंडर मकबूल भट्ट की याद में एक प्रोग्राम रखा, जिसे सांस्कृतिक कार्यक्रम का नाम दिया गया. इसी कार्यक्रम में जेएनयू के साबरमती होस्टल के सामने शाम को कुछ लोगों ने देशविरोधी नारे लगाए फिर एबीवीपी व वामपंथी छात्रों में झड़प हुई.

10 फरवरी, 2016 : नारेबाजी की वीडियो क्लिपिंग सामने आई.

12 फरवरी, 2016 : पुलिस ने नारेबाजी करने व देशद्रोह के आरोप में कन्हैया कुमार को गिरफ्तार किया. फिर कन्हैया को पटियाला हाउस कोर्ट में पेश किया गया जहां से उसे 3 दिन के रिमांड पर भेजा गया.

15 फरवरी, 2016 : कन्हैया को फिर कोर्ट में पेश किया गया और 2 दिन के रिमांड पर भेजा गया. इसी दौरान वकीलों ने कोर्ट में नारेबाजी कर रहे छात्रों को पीटा.

भाजपा एमएलए ओम प्रकाश शर्मा पर भी कन्हैया को पीटने का आरोप लगा.

17 फरवरी, 2016 : दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने कन्हैया को 2 मार्च तक न्यायिक हिरासत में भेजा.

18 फरवरी, 2016 : कन्हैया ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की.

19 फरवरी, 2016 : कन्हैया को सुप्रीम कोर्ट के बजाय हाईकोर्ट में जाने की सलाह दी गई.

2 मार्च, 2016 : हाईकोर्ट ने कन्हैया को कुछ शर्तों पर 6 महीने की अंतरिम जमानत दी.

3 मार्च, 2016 : कन्हैया ने तिहाड़ से आने के बाद जेएनयू में 50 मिनट का भाषण दिया.

4 मार्च, 2016 : कन्हैया ने स्पष्ट किया कि वह अफजल गुरु को नहीं रोहित वेमुला को अपना आदर्श मानता है.

पारुल भटनागर

‘धूम्रपान’ बनाता है बेरोजगार

आज तक आप ने धूम्रपान से होने वाले शारीरिक नुकसान व गंभीर बीमारियों के बारे में सुना होगा लेकिन धूम्रपान ना केवल आप के स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक है बल्कि इस का असर आप की आमदनी पर भी पड़ता है. जी हां जो लोग धूम्रपान करते हैं उन की वित्तीय स्थिति धूम्रपान नहीं करने वाले लोगों की तुलना में कम होती है.

यह बात एक शोध में सामने आई है अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के सहायक प्रोफेसर और इस शोध के नेतृत्वकर्ता जुडिथ प्रोचास्का ने मिल कर धूम्रपान से होने वाली वित्तीय हानि का खुलासा किया है. इस नए शोध में जुडिथ और न के दल ने 131 बेरोजगार धूम्रपान प्रतिभागियों और 120 बेरोजगार धूम्रपान न करने वाले प्रतिभागियों पर एक साल तक अध्ययन किया. इस दौरान प्रतिभागियों का अध्ययन के पहले, छठे और फिर 12वें महीने में आकलन किया गया.

जुडिथ के अनुसार शोध में धूम्रपान करने और न करने वाले प्रतिभागियों के बीच कई मामलों में अंतर पाए गए. उदाहरण के तौर पर धूम्रपान करने वाले प्रतिभागी शिक्षा, आयु और स्वास्थ्य के मामले में धूम्रपान न करने वाले प्रतिभागियों से पीछे थे.

दरअसल धूम्रपान करने वाले लोग मानते हैं कि धूम्रपान उन के काम के प्रदर्शन को बढ़ाता है, लेकिन वास्तव में निकोटिन के अस्थायी व उत्तेजक प्रभाव के कारण वे थोड़ी देर ही काम कर पाते हैं और जैसे ही प्रभाव खत्म होता है, वे तनाव महसूस करने लगते हैं, उन्हें फिर से धूम्रपान की जरूरत पड़ती है, जिस की वजह से वे ज्यादा बे्रक लेते हैं और उन का काम प्रभावित होता है.

शोध के अनुसार, धूम्रपान करने वाले प्रतिभागियों को फिर सेरोजगार प्राप्त करने की दर धूम्रपान न करने वाले प्रतिभागियों से 24% कम ही. जुडिथ के अनुसार निष्कर्षों में पाया गया है कि धूम्रपान करने वालों को नौकरी हासिल करने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. यह शोध अमेरिकी पत्रिका जेएएमए में प्रकाशित हुआ है.

भारतीय महिलाओं के साहस को समर्पित है ‘कैबरे’

ऋचा चड्ढा अभिनीत फिल्म 'कैबरे' के साथ शुरुआत कर रहे नवोदित फिल्मकार कौस्तव नारायण नियोगी ने कहा कि यह फिल्म भारतीय महिलाओं के साहस को सलाम करती है. नियोगी ने कहा, "फिल्म 'कैबरे' एक लड़की की कहानी है, जिसकी यात्रा झारखंड के एक छोटे से गांव से शुरू होती है. गांव में उसके साथ दर्दनाक हादसा होता है और इसके बाद वह काम ढूंढ़ने मुंबई आती है."

उन्होंने कहा, "फिल्म 'कैबरे' भारतीय महिलाओं के साहस को एक श्रद्धांजलि है. मैं महिलाओं का बहुत सम्मान करता हूं, जो अपनी आजीविका के लिए देश के विभिन्न भागों से आकर संघर्ष कर रही हैं. यह एक साहसी महिला की एक जीवन यात्रा है."

पूजा भट्ट द्वारा निर्मित इस फिल्म में ऋचा चड्ढा, गुलशन देवैया और एस. श्रीसंत प्रमुख भूमिकाओं में हैं. नियोगी फिल्म निर्देशक बनने का श्रेय पूजा भट्ट को देना चाहते हैं. उनका कहना है कि पूजा ने उन्हें इसके लिए प्रेरित किया.

उन्होंने कहा, "इसका श्रेय पूजा भट्ट को जाता है. मैं विज्ञापन की दुनिया से हूं और वह हमेशा मुझसे कहती थीं कि मुझमें कहानी सुनाने के गुण हैं और मुझे किसी दिन फिल्म-निर्देशन करना चाहिए. वह कहती रहीं और आखिरकार मैंने फिल्म के निर्देशन का फैसला किया."

मेरी हर फिल्म को रीमेक माना जाता है: मनीष शर्मा

फिल्मकार मनीष शर्मा को 'बैंड बाजा बारात' और 'शुद्ध देसी रोमांस' जैसी फिल्मों के लिए जाना जाता है और उनका कहना है कि उनकी हर फिल्म को लोग किसी ओर फिल्म की रीमेक मानते हैं, जो गलतफहमी है. ऐसी रिपोर्ट हैं कि शर्मा की आगामी फिल्म 'फैन' हॉलीवुड फिल्म 'द फैन' से प्रेरित है, जिसमें रॉबर्ट डी नीरो मुख्य भूमिका में हैं.

अपनी फिल्म के प्रचार के लिए यहां एक संवाददाता सम्मलेन में शामिल हुए मनीष ने कहा, "जब लोग 'फैन' देख लेंगे, तो उन्हें अपने सवालों का सही जवाब मिल जाएगा. हमारी फिल्म और 'द फैन' के बीच कोई भी समानता नहीं है."

मनीष ने आगे कहा, "लोगों के मुताबिक, मेरी हर फिल्म किसी और फिल्म की रीमेक होती है. 'बैंड बाजा बारात' के वक्त भी ऐसा हुआ था. जब यह फिल्म बन रही थी तो लोग कहा करते थे कि मैं 'वेडिंग प्लानर' की रीमेक बना रहा हूं."

'फैन' फिल्म में शाहरुख को दोहरे किरदार में देखा जाएगा और मनीष का कहना है कि यह एकदम अलग फिल्म है. शाहरुख अभिनीत फिल्म शुक्रवार को रिलीज हो रही है. इसके अलावा उन्हें 'रईस' और गौरी शिंदे की फिल्म में भी देखा जाएगा.

रजनीकांत ने किया ‘कबाली’ की रिलीज का खुलासा

सुपरस्टार रजनीकांत इन दिनों अपनी आगामी फिल्म 'कबाली' को लेकर काफी चर्चा में बने हुए हैं. इस फिल्म की रिलीज डेट की जानकारी देते हुए रजनीकांत ने बताया बहुप्रतीक्षित तमिल फिल्म 'कबाली' दुनियाभर में मई या जून में रिलीज होगी. यह रजनीकांत की 161वीं फिल्म है. तमिल अभिनेता ने कहा, कि फिल्म मई के अंतिम सप्ताह या जून की शुरुआत में सिनेमाघरों में रिलीज की जाएगी. पा. रंजीत के निर्देशन में बनी इस फिल्म में रजनीकांत एक गैंगस्टर की भूमिका में नजर आएंगे. उनका किरदार असल जिंदगी में चेन्नई के डॉन कहे जाने वाले कबालीश्वरन से प्ररित है.

फिल्म में रजनीकांत के साथ अभिनेत्री राधिका आप्ते भी मुख्य भूमिका में नजर आएंगी. कबाली में फिल्माए गए मारधाड़ वाले दृश्यों की शूटिंग मलेशिया में की गई है. फिल्म में राधिका दिग्गज अभिनेता रजनीकांत की पत्नी की भूमिका में दिखेंगी. फिल्म में इन दोनों के अलावा दिनेश, धनसिका, प्रकाश राज, गजाराज और कलइरसन भी नजर आएंगे.

अभिनेता के रूप में तीन दशकों की अपनी यात्रा में रजनीकांत ने हिन्दी और दक्षिण भारतीय फिल्मों में काम किया है. देश में बड़ी संख्या में उनके प्रशंसक हैं.

104 साल की उम्र में गुदवाया टैटू

अभी तक तो युवाओं के ही सिर चढ़ कर बोलता था टैटू का क्रेज लेकिन अब तो 104 साल के वृद्ध में भी इस के प्रति दीवानगी देखी गई तभी तो उन्होंने अपने 104वें जन्मदिन पर टैटू बनवा कर दुनिया के सामने एक अलग उदाहरण पेश किया. इस शख्स का नाम है जो जैक, जो ब्रिटेन का निवासी है. उन्होंने अपनी दाईं बांह पर कोई डिजाइन नहीं बनवाया बल्कि ‘जैको 6.4.1912’ गुदवाया है, जो उन के उपनाम और जन्मतिथि का मिश्रण है.

उन के इस कारनामे को देख कर दुनिया भी उन्हें सलाम करती है तभी तो उन का नाम गिनीज बुक औफ वर्ल्ड रिकौर्ड्स में दर्ज किया गया है. जिस उम्र में लोग हिम्मत हार जाते हैं उस उम्र में अगर कोई ऐसा करने के बारे में सोचता है तो वाकई काबिलेतारीफ है.

टैटू गुदवाने के बारे में सोचते वक्त उन के मन में जरा भी डर नहीं था जबकि वे इस बात को भलीभांति जानते थे कि इस उम्र में स्किन में सुई गुदवाने से ज्यादा कष्ट होगा लेकिन हिम्मत हारना जो जैसे उन्होंने सीखा ही नहीं है और इस के लिए वे कोई भी कीमत चुकाने के लिए तैयार थे. उन की यही हिम्मत टैटू गुदवाने के समय देखी भी गई.

उन की बेटी जैनी भी अपने पिता के बारे में यही कहती हैं कि मेरे पिता बहुत ही जिंदादिल इंसान हैं. वे अपनी जिंदगी में आने वाली हर चुनौती को खुशीखुशी ऐक्सैप्ट करते हैं और उसे पूरा कर के भी दिखाते हैं.

उन की लंबी उम्र का राज यही है कि वे हर मुश्किल सिचुऐशन में भी खुश रहना पसंद करते हैं और हार्डवर्क करने में विश्वास रखते हैं. हर कोई व्यक्ति उन का दोस्त, उन के साथ वक्त बिताना पसंद करता है ताकि उन में भी वो हिम्मत आ सके.

VIDEO: लता मंगेशकर ने की पाकिस्तानी ऑटो चालक की तारीफ

भारतरत्न स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर को हिन्दी सिनेमाजगत में एक जगमगाता हुआ नाम माना जाता है. सुरों की इस मल्लिका को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका हैं. उन्होंने अपनी मधुर आवाज से दुनियाभर के लोगों को अपना दीवाना बनाया है. लेकिन अब ऐसा व्यक्ति सामने आया है जिसकी आवाज सुनकर लगा मंगेशकर भी उसकी सराहना के लिए मजबूर हो गई हैं.

दरअलस हाल ही में उन्होंने एक ऑटो रिक्शा चालक से बड़े गुलाम अली खां की शैली में 'ठुमरी' का विशुद्ध रूप सुनकर उसकी प्रशंसा की. वह खुशी से फूले नहीं समा रहा. ऑटो रिक्शा चालक मास्टर असलम की गाई ठुमरी सोशल मीडिया पर वायरल हो गई. कई लोग यह जानकर हैरान थे कि गुलिस्तान-ए-जौहर के 'परफ्यूम चौक' का निवासी यह गायक कराची में ऑटो रिक्शा चलाता है.

एक समाचारपत्र में मंगलवार को आई खबर के मुताबिक, सोशल मीडिया पर क्लिप अपलोड किए जाने के कुछ घंटों बाद ही लता मंगेशकर ने उसे अपने फेसबुक पेज पर शेयर कर लिया. लता ने साथ ही लिखा कि ऐसे कलाकारों को रिक्शा चलाने की जगह किसी मंच पर माइक्रोफोन के सामने खड़े होकर गाना चाहिए.

समाचारपत्र के मुताबिक, "लताजी से प्रशंसा कोई छोटी बात नहीं है. यह किसी की प्रतिभा को स्पष्ट मान्यता दिया जाना है." समाचारपत्र के अनुसार, असलम ने कहा, "मैंने जब इसके बारे में सुना, मेरी आंखों में आंसू आ गए. मैं उनका आभार कैसे प्रकट करूं. वह एक दिग्गज कलाकार हैं, गायन की देवी हैं और मैं केवल एक शौकिया गायक हूं. उनके सामने मैं धूल का एक कण भी नहीं हूं."

रणवीर सिंह के हीरो हैं बिग बी अमिताभ बच्चन

बॉलीवुड अभिनेता रणवीर सिंह ने काफी कम समय में हिन्दी सिनेमाजगत में एक खास नाम बना लिया है. लेकिन महानायक अमिताभ बच्चन से अपने बारे में प्रशंसा पाना किसी के भी सम्मान की बात है. हाल ही में एक कार्यक्रम में मेगास्टार अमिताभ बच्चन द्वारा अपनी प्रशंसा सुनकर रणवीर गदगद हो उठे हैं. रणवीर ने सोमवार की शाम हेल्लो कार्यक्रम में 'सुपरस्टार ऑफ द ईयर' का पुरस्कार जीता, वहींउन्होंने कहा कि अमिताभ ने जो भी मंच पर मेरे बारे में कहा है, मैं उससे गदगद हो उठा हूं.

रणवीर ने ट्विटर पर लिखा, "मेरे हीरो! अमिताभ बच्चन ने मंच पर जो कुछ भी कहा है, उससे मैं गदगद हूं और यह क्षण मेरे लिए हमेशा यादगार रहेगा." वहीं अमिताभ ने कहा कि उन्होंने 'बाजीराव मस्तानी' के अभिनेता के लिए जो कुछ भी कहा है, उनके हर शब्द का कोई न कोई अर्थ है.

बिग बी ने ट्विटर पर लिखा, "मेरे प्रत्येक शब्द का मतलब है और मैं लगातार हमेशा उनके लिए प्रार्थना करूंगा, यह भी सच है. आपको प्यार."

रणवीर इन दिनों आदित्य चोपड़ा के निर्देशन में बन रही फिल्म 'बेफिक्रे' की शूटिंग में व्यस्त हैं. इस फिल्म में उनके साथ अभिनेत्री वाणी कपूर भी मुख्य भूमिका निभाती हुई नजर आएंगी.

वहीं दूसरी तरफ अमिताभ बच्चन इन दिनों अभिनेत्री तापसी पन्नू के साथ शूजित सरकार की फिल्म 'पिंक' की शूटिंग में व्यस्त हैं. 'पीकू' के अभिनेता सुजॉय घोष द्वारा निर्मित फिल्म 'टीई3एन' पर भी काम कर रहे हैं. इसमें विद्या बालन और नवाजुद्दीन सिद्दीकी प्रमुख भूमिकाओं में हैं.

वाह री छुट्टी…!

स्कूलों से छुट्टियां सारे वर्ष का सब से आनंदित समय होता है. पर क्यों? क्यों स्कूल के दिन हमें भारी लगते हैं जहां नया ज्ञान मिलता है, संगीसाथी मिलते हैं, तरहतरह के सवाल मिलते हैं और फिर उन के उत्तर भी मिलते हैं. जहां किताबों में जानकारी की नदियां हैं, लाइबे्ररी ज्ञान की विशाल झील है. जब चाहो उस में गोता लगाओ और बेहद उपयोगी जानकारी ले आओ. क्यों छुट्टी अच्छी लगती है, जब मालूम न हो कि सारा दिन क्या करना है? यदि पिता काम पर हों, मां घर पर हों तो परेशानी कि मां के काम करो या उन के काम में रुकावट न बनो. दोनों काम पर हों तो सारा दिन क्या करो. बाहर अब साथी नहीं दिखते. घरों में छतें कम हो रही हैं. पड़ोस वाली आंटियां भाव नहीं देतीं. पड़ोसी बच्चे दूसरे स्कूलों के हैं, अलग पसंद वाले हैं. फिर छुट्टी की ऐसी चाहत क्यों?

यह इसलिए कि हमारा देश छुट्टी मनाने को काम समझता है. 11 से 13 मार्च को रविशंकर नाम के गुरु ने सैकड़ों मंत्रियों, नेताओं, बच्चों से छुट्टी करवा दी कि यज्ञहवन देखो, रागरंग देखो, योग उपासना देखो. न ज्ञान, न काम, न प्रयोग, न सवाल. बस, समय बरबाद करने में प्रधानमंत्री भी लगे थे, केंद्रीय मंत्री और दिल्ली सरकार के मंत्री भी लगे रहे छुट्टी मनाने में. देश के लिए फैसलों से छुट्टी, लोगों की परेशानियां सुनने से छुट्टी. छुट्टी ही काम हो गया. वाह, जहां बुजुर्ग, सफल कहे जाने वाले समय की बरबादी को काम कहेंगे, वहां छुट्टी के प्रति ललक क्यों नहीं होगी. जहां मंत्री, अफसर, व्यापारी, मातापिता अपनीअपनी जिम्मेदारी छोड़ कर 3 दिन के लिए लाखों की संख्या में यमुना नदी को नष्ट करने को कर्तव्य कहेंगे वहां छुट्टी को महान नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे.

ये सब लोग जो यहां जमा हुए, जिन्होंने यज्ञहवन में घी डाला, जिन्होंने भजन गाए, जिन्होंने प्रवचन दिए कुछ बनाते नहीं, कुछ सुधारते नहीं, कुछ ज्ञान नहीं देते, जीवन सुखद नहीं बनाते. वे बस, बहकाते हैं. मैं बैठाबैठा व्यस्त हूं, डिस्टर्ब न करो. हम 5 लाख, 10 लाख, 20 लाख लोग जमा हैं, हमारी छुट्टी है, हमारे लिए काम करो, खानेपीने का इंतजाम करो, बसें चलवाओ, रोशनी करवाओ. यही तो बच्चे करते हैं छुट्टी में. वहीं से सीखते हैं कि मां पिज्जा मंगवा दो क्योंकि खुद व्हाट्सऐप पर बिजी हैं, कोने में बैठ कर सुकून से. इस देश में छुट्टी ही मुक्ति है. छुट्टी ही सफलता है. छुट्टी ही लक्ष्य है. छुट्टी है तो परमज्ञान है. जो बड़े सिखाएंगे वही छोटे सीखेंगे. जय छुट्टी. जय हौलीडे. जय पूजा डे.

ईशान किशन: अंडर-19 भारतीय क्रिकेट टीम का कप्तान

3 वर्ष की अल्पायु में ही क्रिकेट का बल्ला थामने वाले ईशान की क्रिकेट के प्रति दीवानगी उम्र के साथसाथ बढ़ती गई और अपनी मेहनत व लगन के बल पर उस ने न केवल अंडर-19 क्रिकेट टीम में जगह बनाई बल्कि कप्तान बन बैठा. अब ईशान का लक्ष्य नैशनल टीम में शामिल होना है. उस के मातापिता को पूरा यकीन था कि उन का लाड़ला अवश्य एक दिन उन का नाम रोशन करेगा. हर मातापिता की तरह ईशान के पेरैंट्स भी चाहते थे कि उन का बेटा पहले पढ़ाई पूरी करे, उस के बाद ही अपने खेल के शौक को पूरा करे, लेकिन उस के साथ ऐसा नहीं हो सका. पढ़ाई से ज्यादा ईशान को क्रिकेट से लगाव था और क्रिकेट को ही वह जिंदगी का लक्ष्य मान चुका था. बचपन से ही प्लास्टिक के छोटे से बैट से उस की ऐसी यारी हुई कि बस उस के साथ ही सोना और जागना होता था. ईशान की दीवानगी आखिर रंग लाई और आज वह भारतीय क्रिकेट की अंडर-19 टीम का कप्तान बन गया. क्रिकेट का दीवाना ईशान किशन कहता है कि नैशनल क्रिकेट टीम में शामिल होना उस का लक्ष्य है.

18 जुलाई, 1998 को पटना में जन्मे किशन का बचपन से ही क्रिकेट से लगाव था. अपने बड़े भाई राज किशन को क्रिकेट खेलते देख ईशान में भी क्रिकेट का शौक पैदा हुआ और उस ने बल्ला थाम लिया. बड़े भाई राज ने क्रिकेट के प्रति ईशान की दीवानगी देख उसे क्रिकेट के गुर सिखाने शुरू कर दिए. ईशान मानता है कि उस के बडे़ भाई ने उस की खातिर अपने क्रिकेट के शौक को कुरबान कर दिया. 2008 में ईशान ने पहली बार छत्तीसगढ़ के खिलाफ बिहार की ओर से मैच खेला. उस के बाद वर्ष 2012 में झारखंड की अंडर-16 क्रिकेट टीम में उसे शामिल किया गया. 17 दिसंबर, 2014 को ईशान ने रणजी ट्रौफी ग्रुप सी में प्रथम श्रेणी के क्रिकेट से अपने कैरियर की धमाकेदार शुरुआत की. झारखंड और असम के बीच खेले गए मैच में ईशान ने 60 रन बना कर क्रिकेट के महारथियों को अपनी ओर आकृष्ट किया.

पटना डीपीएस से 9वीं कक्षा की पढ़ाई के बाद 2011 में वह रांची चला गया और वहां स्टील अथौरिटी औफ इंडिया (सेल) की रांची टीम के साथ जुड़ गया. सेल की ओर से ईशान ने 2013 और 2014 में जम कर क्रिकेट खेला. उस के बाद झारखंड क्रिकेट टीम अंडर-16 और फिर अंडर-18 में उस ने अपनी जगह बना ली. साल 2014 में वह झारखंड की रणजी टीम के लिए चुना गया. 2015 के आखिरी रणजी मैच में जम्मू के खिलाफ ईशान ने 109 रन बना कर क्रिकेटप्रेमियों के दिल में अपनी जगह बना ली. 2015 में वह ट्राई नेशन सीरीज के लिए भारतीय टीम से खेला. कोलंबो में भारतीय टीम ने श्रीलंका को हरा कर खिताब पर कब्जा कर लिया.

ईशान ने फर्स्ट क्लास के 10 मैच खेले और 736 रन बनाए, जिस में उस का हाई स्कोर 109 रन रहा. ईशान ने लिस्ट ए में खेले गए 6 मैचों में 149 रन बनाए और उस का हाईस्कोर 44 रन रहा. टी-20 के खेले गए 14 मैचों में ईशान के बल्ले से कुल 235 रन निकले, जिस में उस का हाईस्कोर 48 रन था. बाएं हाथ का बैट्समैन और विकेटकीपर ईशान भारतीय क्रिकेट टीम के धुरंधर कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को अपना आदर्श मानता है. धोनी के बाद क्रिकेट में झारखंड का परचम लहराने के लिए तैयार ईशान के पिता प्रणव कुमार पांडे को पूरा यकीन है कि उन का बेटा जल्द ही भारतीय क्रिकेट टीम का दमदार चेहरा बनेगा. ईशान की मां सुचित्रा सिंह बताती हैं कि 3 साल की उम्र से ही ईशान ने बल्ला थाम लिया था और उम्र बढ़ने के साथसाथ क्रिकेट के प्रति उस की दीवानगी भी बढ़ती गई. उस की स्कूल की कौपीकिताबों में क्रिकेट खिलाडि़यों के फोटो रखे रहते थे. सैकड़ों बार इस के लिए उसे डांट पड़ी पर उस का जनून कम नहीं हुआ.

ईशान स्कूल से घर आता और प्रैक्टिस के लिए मैदान में पहुंच जाता था. उस की लगन को देख कर पिता ने 2005 में बिहार क्रिकेट संघ की एकेडमी में उसे दाखिला दिला दिया. उसी साल देहरादून में एसआईएस क्रिकेट टूरनामैंट में ईशान को जब पहली बार बैस्ट क्रिकेटर का अवार्ड मिला तो लगा कि अब उसे क्रिकेट में ही कैरियर बनाना चाहिए. पटना क्रिकेट संघ के सचिव अजय नारायण शर्मा कहते हैं कि उन्होंने तो 6-7 साल पहले ही ईशान को भारतीय क्रिकेट का स्टार मान लिया था. ईशान ने अपनी मेहनत और लगन से साबित कर दिया कि प्रतिभा को निखरने से रोका नहीं जा सकता. बिहार क्रिकेट संघ के अध्यक्ष मृत्युंजय तिवारी को अफसोस है कि बिहार का होने के बाद भी ईशान जैसे प्रतिभाशाली खिलाड़ी को झारखंड से खेलने का मौका मिला. वे कहते हैं कि अगर बिहार क्रिकेट संघ जिंदा होता तो उस के जैसे कई खिलाडि़यों को दूसरे राज्यों से नहीं खेलना पड़ता.

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