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इस तरह विश्व शक्तियों से आगे निकला भारत

फॉरन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (एफडीआई) आकर्षित करने के मामले में भारत ने चीन को पीछे छोड़ दिया है. रिपोर्ट के मुताबिक इंडिया ने 63 बिलियन डॉलर के एफडीआई प्रॉजेक्टस को 2015 में आकर्षित किया. इसके साथ ही 697 प्रॉजेक्टस में 8 पर्सेंट की बढ़ोतरी हुई है. यह जानकारी द फाइनैंशल टाइम्स के एफडीआई डिविजन ने दी है. 2015 में बड़ी कंपनियों में फॉक्सकॉन, सनएडिशन ने 5 और 4 बिलियन डॉलर के प्रॉजेक्टस में इन्वेस्टमेंट की हामी भरी हैं.

भारत ने इस मामले में चीन को पीछे छोड़ दिया है. पिछले एक साल में कोयला, तेल, प्राकृतिक गैस और अक्षय ऊर्जा सेक्टर्स में बड़े प्रॉजेक्टस की घोषणा की गई. रिपोर्ट के मुताबिक 2015 में भारत पहली बार एफडीआई के मामले में शिखर पर पहुंचा. भारत ने चीन के साथ अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया. अमेरिका ने 2015 में 59.6 बिलियन डॉलर और चीन ने 56.6 बिलियन डॉलर एफडीआई आकर्षित किए.

केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री जयंत सिन्हा ने ट्वीट कर कहा,' एफडीआई आकर्षित करने के मामले में भारत टॉप पर पहुंच गया'. दावा किया गया है कि 2015 में एफडीआई आकर्षित करने वाले टॉप 10 राज्यों में पांच भारतीय राज्य हैं. इस दौरान गुजरात ने 12.4 बिलियन डॉलर एफडीआई आकर्षित किए. महाराष्ट्र ने पूरे साल में शानदार प्रदर्शन करते हुए 8.3 बिलियन डॉलर की एफडीआई को आकर्षित किया.

दूरसंचार कंपनियां मालामाल, ग्राहक बेहाल

देश में चार-पांच दूर संचार कंपनियों का एक गुट एक अरब ग्राहक जोड़े हुए हैं और प्रतिदिन 250 करोड़ रुपये कमा रहे हैं, पर वे सेवा को बेहतर बनाकर कॉल ड्रॉप रोकने के लिए अपने नेटवर्क पर जरूरी निवेश नहीं कर रहे हैं. सरकार ने यह जानकारी बुधवार को सुप्रीम कोर्ट को दी.

अटर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा कि ये कंपनियां आउटगोइंग कॉल (अपने नेटवर्क से की गई कॉल) के जरिए प्रतिदिन 250 करोड़ रुपये कमा रही हैं. इनके कारोबार की वृद्धि जबरदस्त है, लेकिन वे कॉल ड्रॉप पर अंकुश के लिए सेवाओं की गुणवत्ता सुधारने के लिए अपने नेटवर्क पर बहुत कम निवेश कर रही हैं.

भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) की ओर से उपस्थित रोहतगी ने न्यायमूर्ति कुरियन जोसफ तथा न्यायमूर्ति आर.एफ. नरीमन की पीठ के समक्ष नियामक द्वारा दूरसंचार कंपनियों पर लगाए गए जुर्माने को उचित बताया.

क्या है पूरा मामला: सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, वोडाफोन, भारती एयरटेल और रिलायंस सहित 21 दूरसंचार कंपनियों ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है जिसमें ट्राई के जनवरी से कॉल ड्रॉप के लिए ग्राहकों को मुआवजा देने के फैसले को उचित ठहराया गया है.

अटर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने उठाए ये मुद्दे

·       61 प्रतिशत ग्राहक आधार बढ़ा: अटर्नी जनरल ने कहा कि 2009 से 2015 के दौरान दूरसंचार कंपनियों के ग्राहकों का आधार 61 प्रतिशत बढ़ा है. वे स्पेक्ट्रम के एक हिस्से का इस्तेमाल डेटा के लिए कर रही हैं और पैसा बना रही हैं.

·       डेटा की लागत अधिक: रोहतगी ने कहा कि डेटा सेवाओं की लागत कॉल्स से अधिक बैठती है. कोई भी कंपनी यहां परमार्थ के लिए नहीं है. वे यहां एक अरब ग्राहकों के साथ मुनाफा कमाने के लिए हैं. वे हर चीज के लिए पैसा लेती हैं.

·       स्पेक्ट्रम की कमी एक बहाना: अटर्नी जनरल ने कहा कि दूरसंचार ऑपरेटर कॉल ड्रॉप के लिए स्पेक्ट्रम की कमी को वजह बताते हैं, लेकिन हालिया 700 मेगाहट्र्ज स्पेक्ट्रम की नीलामी में स्पेक्ट्रम बिक नहीं पाया. उन्होंने कहा कि चाहे आपके पास स्पेक्ट्रम है या कम स्पेक्ट्रम है, यह ट्राई की समस्या नहीं है. यदि आपके पास कम स्पेक्ट्रम है तो आपको या तो अपने ग्राहकों की संख्या कम करनी चाहिए या प्रौद्योगिकी में निवेश करना चाहिए. कोई भी यह कहते हुए आगे नहीं आया है कि मेरे हाथ भरे हुए हैं और मुझे और ग्राहकों की जरूरत नहीं है.

गर्भावस्था में कैसा हो आहार

गर्भ धारण करना किसी भी महिला के जीवन की सब से बड़ी खुशी होती है. मगर इस दौरान उसे कई सावधानियां भी बरतनी पड़ती हैं. आज नारी पर घरबाहर दोनों जिम्मेदारियां हैं. वह घर, बच्चों, औफिस सभी को हैंडल करती है. आधुनिक युग की नारी होने के नाते कुछ महिलाएं धूम्रपान और शराब आदि का भी सेवन करने लगी हैं. यही वजह है कि गर्भावस्था में उन्हें अपनी खास देखभाल की जरूरत होती है. थोड़ी सी सावधानी बरतने पर मां और शिशु दोनों स्वस्थ और सुरक्षित रह सकते हैं.

पौष्टिक आहार लेना जरूरी

आप मां बनने वाली हैं, तो यह जरूरी है कि आप पौष्टिक आहार लें. इस से आप को अपने और अपने गर्भ में पल रहे शिशु के लिए सभी जरूरी पोषक तत्त्व मिल जाएंगे. इन दिनों आप को अधिक विटामिन और खनिज, विशेषरूप से फौलिक ऐसिड और आयरन की जरूरत होती है. गर्भावस्था के दौरान कैलोरी की भी कुछ अधिक जरूरत होती है. सही आहार का मतलब है कि आप क्या खा रही हैं, न कि यह कि कितना खा रही हैं. जंक फूड का सेवन सीमित मात्रा में करें, क्योंकि इस में केवल कैलोरी ज्यादा होती है बाकी पोषक तत्त्व कम या कह लें न के बराबर होते हैं.

मलाई रहित दूध, दही, छाछ, पनीर आदि का शामिल होना बहुत जरूरी है, क्योंकि इन खाद्यपदार्थों में कैल्सियम, प्रोटीन और विटामिन बी-12 की ज्यादा मात्रा होती है. अगर आप को लैक्टोज पसंद नहीं है या फिर दूध और दूध से बने उत्पाद नहीं पचते, तो अपने खाने के बारे में डाक्टर से बात करें.

पेयपदार्थ

पानी और ताजे फलों के रस का खूब सेवन करें. उबला या फिल्टर किया पानी ही पीएं. घर से बाहर जाते समय पानी साथ ले जाएं या फिर अच्छे ब्रैंड का बोतलबंद पानी ही पीएं. ज्यादातर रोग जलजनित विषाणुओं की वजह से ही होते हैं. डब्बाबंद जूस का सेवन कम करें, क्योंकि इन में बहुत अधिक चीनी होती है.

वसा और तेल

घी, मक्खन, नारियल के दूध और तेल में संतृप्त वसा की ज्यादा मात्रा होती है, जो ज्यादा गुणकारी नहीं होती. वनस्पति घी में वसा अधिक होती है. अत: वह भी संतृप्त वसा की तरह शरीर के लिए अच्छी नहीं है. वनस्पति तेल वसा का बेहतर स्रोत है, क्योंकि इस में असंतृप्त वसा अधिक होती है.

समुद्री नमक या आयोडीन युक्त नमक के साथसाथ डेयरी उत्पाद आयोडीन के अच्छे स्रोत हैं. अपने गर्भस्थ शिशु के विकास के लिए अपने आहार में पर्याप्त मात्रा में आयोडीन शामिल करें.

गर्भावस्था से पहले आप का वजन कितना था और अब आप के गर्भ में कितने शिशु पल रहे हैं, उस हिसाब से अब आप को कितनी कैलोरी की जरूरत है, यह डाक्टर बता सकती हैं.

गर्भावस्था में क्या न खाएं

– गर्भावस्था के दौरान कुछ खाद्यपदार्थों का सेवन न करें. ये शिशु के लिए असुरक्षित साबित हो सकते हैं. जैसे अपाश्चयुरिकृत दूध (भैंस या गाय का) और उस से बने डेयरी उत्पादों का सेवन गर्भावस्था में सुरक्षित नहीं है. इन में ऐसे विषाणुओं के होने की संभावना रहती है, जिन से पेट के संक्रमण का खतरा रहता है. कहीं बाहर खाना खाते समय भी पनीर से बने व्यंजनों से बचें.

– सभी किस्म के मांस को तब तक पकाएं जब तक कि उस से सभी गुलाबी निशान न हट जाएं. अंडे को भी अच्छी तरह पकाएं.

– विटामिन और खनिज की अधिक खुराक लेना भी शिशु के लिए हानिकारक हो सकता है. कोई भी दवा बिना डाक्टर की सलाह के न लें.

– आज बहुत सी महिलाएं कामकाजी हैं, जो प्रैगनैंसी के दौरान भी औफिस जाती हैं और उन की डिलिवरी भी सामान्य होती है. लेकिन आप की प्रैगनैंसी में कौंप्लिकेशंस हैं, तो सफर में अपना खास खयाल रखें. सफर पर जाने से पहले डाक्टर से जरूर मिल लें. अधिकतर मामलों में प्रैगनैंसी के दौरान ट्रैवलिंग सेफ होती है, फिर भले ही आप ट्रैवलिंग कार से कर रही हो, बस से या फिर ट्रेन से. लेकिन कुछ प्रिकौशंस को ध्यान में रखें तो आप और आप के बच्चे को किसी भी अचानक होने वाली घटना से बचाया जा सकता है.

– प्रैगनैंसी में शुरू के 3 महीने और आखिर के 3 महीने सब से ज्यादा महत्त्वपूर्ण होते हैं. इस दौरान सफर करने से बचें.

– अगर किसी महिला को डाक्टर ने प्रैगनैंसी के हाई रिस्क पर होने की वजह से पूरी तरह बैड रैस्ट की सलाह दी है तो ऐसी महिलाओं के लिए यात्रा करना हानिकारक हो सकता है.

इन बातों को रखें याद

– सब से पहले तो किसी भी हालात में शरीर में पानी की कमी न होने दें. अगर आप विमान से सफर कर रही हैं तो नमी का स्तर कम होने के कारण डीहाईडे्रशन की संभावना रहती है. पैर फैलाने के लिए पर्याप्त जगह वाली  सीट लें. रैस्टरूम सीट के करीब हो.

– अगर आप कार द्वारा लंबी दूरी का सफर तय कर रही हैं, तो सीट बैल्ट पेट के नीचे बांधें. कार की अगली सीट पर बैठें और स्वच्छ हवा के लिए खिड़की खुली रखें. ब्लडप्रैशर सामान्य रखने, ऐंठन और सूजन से बचने के लिए पैरों को फैलाती और मूवमैंट में रखें.

– गर्भावस्था के दूसरे फेज यानी 3 से 6 महीने के बीच का समय सुरक्षित होता है. इन महीनों के दौरान मौर्निंग सिकनैस, अधिक थकान, सुस्ती जैसी शिकायतें कम ही होती हैं.

– ऐसी जगह जाने से बचें जहां किसी संक्रमित बीमारी का प्रकोप फैला हो.

– गर्भावस्था के 14 से 28 सप्ताहों के बीच ही यात्रा करें.

– सफर के दौरान डाक्टर के निर्देशों का पालन करते हुए दवा साथ रखें. डाक्टर के पेपर्स और उन का फोन नंबर हमेशा साथ रखें ताकि आपातकाल में उस का उपयोग कर पाएं.

– सफर में ज्यादा भागदौड़ न करें, क्योंकि आप जितनी अशांत रहेंगी, आप के बीमार होने की आशंका उतनी ही अधिक होगी.

नशीले पदार्थों से दूर रहें

गर्भावस्था में महिलाएं नशीले पदार्थों के सेवन से दूर रहें. साथ ही उन दवाओं से भी परहेज करें, जिन में ड्रग्स की मात्रा अधिक हो. यदि इस अवस्था में महिला शराब, सिगरेट, तंबाकू, पान, बीड़ी या गुटका का सेवन करती है तो इस का गर्भ में पल रहे शिशु पर प्रतिकूल असर पड़ता है. उस में शारीरिक दोष, सीखने की अक्षमता और भावनात्मक समस्याएं पैदा हो सकती हैं.

गर्भावस्था के शुरू के 10 हफ्तों के बाद शिशु के शरीर का विकास तेजी से होने लगता है और इस में नशीले पदार्थों के सेवन का असर इतना खतरनाक पड़ता है कि उस के नर्वस सिस्टम के साथ आंखें भी खराब हो सकती हैं. इस के अलावा बच्चा ऐब्नौर्मल पैदा हो सकता है, समयपूर्व प्रसव भी हो सकता है, जिस से शिशु पर जान का जोखिम बना रहता है.

– डा. मोनिका अग्रवाल, गाइनोकोलौजिस्ट एवं हाई रिस्क प्रैगनैंसी कंसल्टैंट, एटलांटा अस्पताल, गाजियाबाद

बौडी स्किनकेयर भी है जरूरी…!

भ्रम और तथ्य

भ्रम: बौडी लोशन केवल ड्राई स्किन वालों के लिए होते हैं.

तथ्य: उम्र और प्रदूषण का फर्क त्वचा पर भी पड़ता है जिससे त्वचा की नमी और पीएच बैलेंस बिगड़ जाता है. इसलिए ऐसे बौडी लोशन का चुनाव करें जो वर्ष भर आपकी त्वचा की सुरक्षा करे.

भ्रम: सारे मौइश्चराइजर एक जैसे होते हैं.

तथ्य: मौइश्चराइजर कई प्रकार के होते हैं जिन्हें आप अपनी त्वचा के अनुसार चुन सकती हैं. सही मिश्रण वाला मौइश्चराइजर वह होता है जिसमें ग्लिसरीन, डाईमैथिकन और जैली जैसे बहुमूल्य पदार्थों की सही मात्रा हो. ऐसे बौडी मौइश्चराइजर का चुनाव करें जो आपकी त्वचा को गहराई से मौइश्चराइज कर उसे डैमेज होने से बचाए.

भ्रम: बौडी लोशन की आवश्यकता केवल सर्दियों में ही पड़ती है.

तथ्य: सर्दी हो या गरमी, मौइश्चराइजर की जरूरत त्वचा को हर मौसम में पड़ती है. कई महिलाएं गरमी के मौसम में सिर्फ इस डर से मौइश्चराइजर का इस्तेमाल नहीं करतीं, क्योंकि उनकी यह मान्यता है कि मौइश्चराइजर लगाने से उन्हें अधिक पसीना आएगा और त्वचा चिपचिपी हो जाएगी. लेकिन यह गलत सोच है. वास्तव में कड़ी धूप आपकी त्वचा को नुकसान पहुंचाती है और उसे रूखी व बेजान बना देती है. आप ऐसे बौडी लोशन का चुनाव करें जो नौनस्टिकी होने के साथसाथ आपकी त्वचा को हाइड्रेटेड और मुलायम रखे.

सिर्फ निखरा चेहरा काफी नहीं

आप मानें या न मानें लेकिन ज्यादातर भारतीय महिलाएं अपनी बौडी की स्किनकेयर की तरफ काफी लापरवाही बरतती हैं. यही कारण है कि हमारा सारा ध्यान चेहरे की खूबसूरती की तरफ होता और हम अपनी बौडी की उपेक्षा करने लगते हैं. चेहरे के साथ ही शरीर के बाकी हिस्सों की देखभाल ही महिलाओं को संपूर्ण खूबसूरती दे सकती है.

पर्यावरण का त्वचा पर बुरा प्रभाव

त्वचा के डैमेज होने का बड़ा कारण है सूर्य की तेज किरणें. सूर्य की हानिकारक यूवी किरणों से त्वचा झुलस जाती है, और जब आप इसकी ओर ध्यान नहीं देती हैं तो यह अंदर से डैमेज होने लगती है. इससे त्वचा में समय से पहले झांइयां और एजिंग मार्क्स दिखने लगते हैं. त्वचा का दुश्मन अकेला सूर्य ही नहीं बल्कि प्रदूषण, धूल मिट्टी और खराब हवा भी है. क्या आप जानती हैं धूल के कण त्वचा के पोर्स से 20 गुना छोटे होते हैं और इसलिए त्वचा में इनका प्रवेश करना बहुत आसान है. ये कण त्वचा की एपिडर्मिस परत की गहराई में प्रवेश कर जाते हैं और इससे त्वचा डीहाइड्रेटेड हो जाती है. वहीं प्रदूषण त्वचा की कोलोजन और लिपिड लेयर को नष्ट कर देता है जिससे त्वचा पर बुरा प्रभाव पड़ता है.

नमी की कमी

हम सभी को पता है कि त्वचा में नमी बरकरार रहने से वह हाइड्रेटेड और कोमल रहती है. इससे त्वचा में युवापन और ताजापन बना रहता है और उसकी सेहत भी सही रहती है. त्वचा पर मौइश्चराइजर की परत उसे पर्यावरण से होने वाले नुकसानों से बचा कर रखती है और उसमें नमी को कायम रखती है.

डिस्कोथिक में शौर्ट स्कर्ट वाली महिलाएं बैन

महिलाओं के कपड़ों को ले कर एक बार फिर होहल्ला मचा हुआ है. निशाना इस बार चंडीगढ़ की महिलाएं बनी हैं. दरअसल, 1 अप्रैल, 2016 से ऐडमिनिस्ट्रैशन द्वारा शहर में लागू हुई ‘कंट्रोलिंग औफ प्लेसेज औफ पब्लिक एम्यूजमैंट, 2016’ पौलिसी के तहत डिस्कोथिक में महिलाओं को कम कपड़े खासतौर पर शौर्ट स्कर्ट पहन कर जाने पर रोक है. ऐडमिनिस्ट्रैशन ने नाईटक्लबों और बारों में महिलाओं द्वारा कम और भड़काऊ कपड़े पहन कर आने को इंडीसैंस करार दिया है. इतना ही नहीं, पौलिसी के तहत बार डिस्कोथिक की टाइमिंग को भी 2 घंटे कम कर दिया गए हैं. जहां बार और नाईटक्लब पहले रात के 2 बजे तक खुले रहते थे वहीं अब रात के 12 बजे तक ही खुलेंगे.

पौलिसी के तहत एक नोडल कमेटी बनाई गई है जिस में डिप्टी कमिश्नर चेयरमैन और म्यूनिसिपल कमिश्नर, एसएसपी, हैल्थ सर्विसेस ऐंड ऐक्साइज डायरैक्टर और टैक्स कमिश्नर को कमेटी का मैंबर बनाया गया है.

फिलहाल मोरल पुलिसिंग के नाम पर प्रशासन द्वारा थोपे गए इस फैसले का शहर के बार और डिस्कोथेक संचालक विरोध कर रहे हैं. उन का कहना है कि महिलाओं के कपड़ों पर फैसला सुनाने वाला प्रशासन कौन होता है? यह महिलाओं के अधिकारों का हनन है जिसे किसी भी सूरत में बरदाश्त नहीं किया जाएगा.

सवाल है कि आखिर महिलाओं के कपड़े इतने महत्त्वपूर्ण क्यों हैं? क्यों हमेशा पुरुष तय करते हैं कि महिलाएं क्या पहनें और क्या नहीं? किस स्थान पर उन्हें क्या पहनना चाहिए इस को ले कर पिछले कई वर्षों से विवाद चल रहा है. कभी कौलेज और मंदिरों में महिलाओं के जींसपैंट पहन कर प्रवेश करने पर पाबंदी लगा दी जाती है तो कभी क्लीवेज दिखाने पर बवाल मच जाता है. आखिर क्यों महिलाओं को खुद की मरजी से कैसे भी कपड़े पहनने की आजादी नहीं है?

चर्चित लेखिका तसलीमा नसरीन भी अपने एक लेख में इस बात का जिक्र कर चुकी हैं. उदाहरण देते हुए तसलीमा लिखती हैं, ‘‘मैं बचपन से ही सोचती थी कि मेरा भाई घर में जिस तरह आजादी के साथ निकर और बनियान पहन कर घूमता है वैसे मैं क्यों नहीं घूम सकती? गरमी लगने पर जिस तरह वह अपने कपड़े उतार देता है वैसे मैं क्यों नहीं कर सकती? गरमी तो मुझे भी लगती है. बस इसलिए क्योंकि मेरी शारीरिक संरचना उस से अलग है.’’

हर बहन या कहिए कि हर महिला के मन में यह बात कभी न कभी आती होगी कि कपड़ों के चुनाव की आजादी उसे क्यों नहीं मिली? कभी समाज के ठेकेदार तो कभी घर पर ही मातापिता बेटियों को बचपन से ही ‘ऐसे बैठो’, ‘पैर ढको’, ‘ये मत पहनो’ जैसी बातें कह कर उन की कपड़ों के चुनाव और पसंद को दबाने का प्रयास करते हैं उन्हें झिझकने पर मजबूर करते हैं, संस्कारों की दुहाई देते हैं. कपड़ों को संस्कारों से जोड़ने की जरूरत ही क्या? सिर से पांव तक कपड़ों से लिपटे पुरुष यदि शराब पीते हैं, तो क्या वे संस्कारी हैं? अपेक्षा सिर्फ महिलाओं से ही क्यों की जाती हैं? यदि कोई महिला शौर्ट ड्रैस पहनने का शौक रखती है, तो इस में बुराई क्या है? लेकिन पुरुष जमात छोटे कपड़े पहने किसी महिला को इस कदर घूरता है कि जैसे महिला न्यूड हो.

जाहिर है, प्रशासन इस तरह के जब प्रतिबंध लगाता है, तो इस में भी वह पुरुषों का स्वार्थ देखता है. नाईटक्लब, बार और डिस्कोथिक जैसी जगहों पर कोई भी महिला साड़ी या सलवारसूट में लिपटी हुई तो आएगी नहीं. यदि आ भी गई तो सहज ढंग से मनोरंजन नहीं कर पाएगी. एक समय आएगा जब महिलाओं का ऐसी जगह आना ही बंद हो जाएगा और इन जगहों पर पुरुषों का पूरी तरह अधिकार हो जाएगा और वे इसे अपनी ऐयाशी का अड्डा बना सकेंगे.

अब डिस्कोथिक जैसी जगहों पर महिलाओं के शौर्ट स्कर्ट या कम कपडे़ पहनने पर हायतौबा मचा कर प्रशासन अपनी इस मंशा को जाहिर कर ही दिया है, तो सवाल यह है कि क्या महिलाओं के पहने कपड़ों से पुरुषों की खराब नीयत को नियंत्रित किया जा सकता है? अगर हां, तो कैसे?

केवल महिलाओं पर ही मर्यादा, इज्जत आदी भारीभरकम शब्द लाद कर प्रशासन न केवल उन पर अपनी पसंद के कपड़े पहनने की आजादी छीन रहा है, बल्कि पुरुषों को महिलाओं पर हावी होने और उन्हें कमजोर समझने का अधिकार भी दे रहा है. जबकि जरूरत महिलाओं के कपड़ों पर नहीं बल्कि छोटी सोच रखने वाले पुरुषों की नजरों और समझ पर पाबंदी लगाने की है .

तीन राज्यों के लिए 842 करोड़ की सहायता राशि मंजूर

केंद्र ने कर्नाटक, पुडुच्‍चेरी, और अरुणाचल प्रदेश के लिए 842.7 करोड़ रुपये की सहायता मंजूर की है. ये राज्य सूखे या बाढ़ से प्रभावित हैं. सूखा प्रभावित कर्नाटक के लिए 723.23 करोड़ रुपये तथा बाढ़ से प्रभावित पडुच्‍चेरी के लिए 35.14 करोड़ रुपये और अरुणाचल प्रदेश के लिए 84.33 करोड़ रुपये मंजूर किए गए हैं.

आधिकारिक प्रवक्ता ने कहा कि गृह मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई उच्च-स्तरीय समिति की बैठक में इन राज्यों को सहायता प्रदान करने के प्रस्तावों को मंजूरी दी गई. इस बैठक में वित्त मंत्री अरुण जेटली, कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह, गृह सचिव राजीव महर्षि और आवास, वित्त तथा कृषि मंत्रालयों के अधिकारी शामिल थे. समिति ने केंद्रीय दल की रपट के आधार पर प्रस्ताव की जांच की. टीम सूखे से प्रभावित कर्नाटक और बाढ़ पीडि़त पुदुच्‍चेरी व अरुणाचल प्रदेश भेजी गई थी.

अरुणाचल प्रदेश को दी गई 84.33 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता में 18 करोड़ रुपये राष्ट्रीय ग्रामीण पेय जल कार्यक्रम के तहत दिए गए हैं. महाराष्ट्र और कर्नाटक समेत 10 राज्यों ने अपने यहां कई हिस्सों में सूखा घोषित किया है. इन राज्यों को इस स्थिति से निपटने के लिए 10,000 करोड़ रुपये से अधिक केंद्रीय सहायता प्रदान की जा चुकी है. पुडुच्‍चेरी दिसंबर 2015 में भारी बारिश से आई बाढ़ से प्रभावित हुआ है. अरुणाचल में भी पिछले साल बाढ़ आई थी.

 

बिहार में भूतों ने भी छोड़ दी दारू

बिहार में शराबबंदी के बाद इंसानों के साथ-साथ अब भूतों ने भी दारू पीना छोड़ दिया है. चौंकिए मत. हंसिए भी नहीं. यह न तो कोई मजाक है और न ही पोंगापंथ को बढ़ावा देने की कोई कवायद है. बिहार में शराबबंदी का असर भूतों पर भी हुआ है. सच में भूतों ने भी दारू से तौबा कर ली है. वह भी शराबबंदी के स्पोर्ट में खड़े हो गए हैं और बगैर दारू के चढ़ावे के ही पोंगापंथियों के जिस्मों से बाहर निकलने लगे हैं.

बिहार के हर गांव में भूत भगाने का खुला खेल सदियों से चलता रहा है. भूत भगाने के काम में जम कर दारू का इस्तेमाल होता है. भूत भगाने वाले ओझा-गुनी खुद भी दारू पीते हैं और भूत को भी दारू पिलाने का दावा करते हैं. भूत भगाने के बहाने ओझा पीडि़तों के परिवार वालों से दारू की कई बोतलें ठगता रहा है. ओझाओं को दावा है कि दारू पिए बगैर भूत भागता नहीं है. किसी भी इंसान के शरीर में अगर भूत-प्रेत घुस जाता है तो उसे भगाने के लिए दारू पिलाना जरूरी है.

हैरत की बात है कि जब से बिहार में शराबबंदी लागू हुई है, तब से भूतों ने बगैर दारू पिए ही इंसानों के शरीर से भागना शुरू कर दिया है. नीतीश कुमार को तो इस बात पर फख्र होना चाहिए कि शराबबंदी के बाद भी कई दारूबाज इंसान चोरी-छुपे शराब पीने की जुगत में लगे हुए हैं, पर भूत उनके आदेश को सौ फीसदी पालन कर रहे हैं. नीतीश के इस फैसले का सम्मान करते हुए भूतों ने दारू से तौबा कर ली है.

पिछले 8 से 15 अप्रैल तक चले चैत्र महीने के नवरात्रा के दौरान राज्य के कई इलाकों में भूतों की शराफत देखने को मिली. नवरात्रा के दौरान जहां-तहां लगने वाले मेलों में भूत झाड़ने का काम कापफी जोर-शोर से चलता रहा है. खास कर गंगा समेत कई नदियों के किनारे भूत भगाने और झाड़ने के नाम पर पोंगापंथ का खुल्मखुल्ला खेल चलता है. सैंकड़ों ओझा कई जगहों पर हवनकुंड बना कर अपनी दुकान लगा कर बैठ जाते हैं. भोले-भाले और अंधविश्वासी गांव वाले किसी भी तरह की बीमारी या बच्चा नहीं होने की समस्या लेकर ओझाओं के पास पहुंचते हैं. ओझा मरीज की पड़ताल करने के बाद कहता है कि उसके शरीर में भूत या प्रेत घुस गया है. भूत भगाने के नाम पर ओझा कई तरह का ड्रामा रचता है. कभी वह नाचने लगता है तो कभी लाठी भांजने लगता है. कभी चिल्लाने लगता है तो कभी अकरम-बकरम बोलने लगता है. उसके बाद ओझा पीडि़त के घरवालों से हवन-पूजा के लिए कई तरह के सामान लाने की लिस्ट थमा देता है. इसके अलावा 8-10  बोतल दारू की भी मांग की जाती है.

आजकल भूत भगाने के नाम पर ओझाओं की ड्रामेबाजी थोड़ी बदल गई है. पटना के कलेक्टेरियट घाट पर लगे भूत भगाने के मजमा में ओझा दारू के बगैर ही भूत भगाने का ड्रामा करता दिखा. जहानाबाद की सुनीता नाम की एक महिला के शरीर में घुसे भूत को भगाने के दौरान ओझा कहता है- ‘देख रहे हैं न भूत महाराज. गंगा सूखी है और गंगा का किनारा भी सूखा है. पिछली बार यहां आए थे तो शराब की धारा बहती थी. पर क्या करें? अब तो पूरा इलाका ही सूखा हुआ है. अब आपको मनाने के लिए क्या करें. सरकार ने कानून ही ऐसा बना दिया है. इस साल तो आपको दारू के बगैर ही संतोष करना पड़ेगा.’

उसके बाद ओझा चीखने-चिल्लाने लगता है. जमीन पर लाठियां पटकने लगता है. कुछ बुदबुदाने लगता है. उसके बाद पीडि़त महिला का बाल पकड़ कर खींचने लगता है. वह चिल्लाता है-‘ भूत महाराज! इस बार आपको दारू का प्रसाद नहीं मिलेगा. दारू के बिना ही आपको इस औरत का शरीर छोड़ना पड़ेगा.’ उसके बाद आंखें बंद कर ओझा कुछ मंतर पढ़ने का ढोंग करता है और फिर जोर से डंडा को जमीन पर पटकता है. इसके बाद वह पीडि़त औरत के परिवार वालों से कहता है कि अब जाइए. सब ठीक हो गया. भूत भाग गया. बहुत दिक्कत हुई. बिना दारू पिए बगैर कहीं भूत जाने का नाम लेता है? दारू के बिना काफी मेहनत करनी पड़ी, तब भूत भागा.

देखा आपने. बिहार में इंसानों से ज्यादा भूत ही शराबबंदी के आदेश को मान रहे हैं. इससे तो यही साबित होता है कि पोंगापंथ की दुकान कभी कमजोर नहीं पड़ती है. ठग और ढ़ोगीबाबा लोगों को ठगने के लिए समय के साथ नए तरीके भी ईजाद कर ही लेता है.

जापान में बढ़ा स्टाइलिश एलईडी स्कर्ट्स का क्रेज

जापान अपने अजीबो गरीब आविष्कारों के लिए काफी पॉप्युलर है. चाहे तकनीक के क्षेत्र में हो या फिर फैशन. यदि फैशन को तकनीक का साथ मिल जाए तो इसका रिजल्ट कुछ अलग हो सकता है. फैशन को मजेदार बनाने के लिए कपड़ों के साथ कई एक्सपेरिमेंट किए जाते हैं, काफी जोड़तोड़ के बाद जाकर ही कुछ अच्छा बनता है.

ऐसा ही कुछ जापान में हो रहा है. जहाँ लड़कियों की शॉर्ट स्कर्ट्स को सजा दिया गया है एलईडी लाइट्स से, हालांकि ये थोड़ी अजीब है लेकिन अब फैशन तो फैशन है. और यह फैशन वहां खूब पसंद भी किया जा रहा है. इन एलईडी स्कर्ट्स को हिकारू स्कर्ट्स का नाम दिया गया है और अभी ये काफी ट्रेंड में हैं.

यह हिकारू स्कर्ट्स जापान के डिज़ाइनर कियोयुकी अमानो ने डिजाईन की है. इन स्कर्ट्स को बनाने में एलईडी लाइट्स का प्रयोग किया गया है. इनमें नीचे अन्दर की ओर एलईडी लाइट्स लगी हैं. फिलहाल इन स्कर्ट्स की कीमत और उपलब्धता की कोई जानकारी नहीं है

हो जाइए तैयार, आ रहा है ग्लास बॉडी वाला iPhone

अब तक जो स्मार्टफोन देखने को मिले हैं, वे मेटल और प्लास्टिक से मिलकर बने होते हैं. लेकिन अमेरिकी स्मार्टफोन निर्माता कंपनी एप्पल एक ऐसा स्मार्टफोन लेकर आने वाली है, जो पूरी तरह ग्लास से बना होगा.

इस कांसेप्ट को सुनकर ही आपको हैरत हो रही होगी, लेकिन ये पूरी तरह सच है. एप्पल ने इस ग्लास फोन का डिजाइन बना लिया है, जो जल्द ही मार्केट में पेश होने वाला है.

2017 में बाजार में कदम रखने वाले इस iPhone में काफी कुछ अलग होगा. इसमें AMOLED डिसप्ले के साथ-साथ वायरलैस चार्जिंग की भी सुविधा उपलब्ध होगी.

इसकी डिजाईन काफी पतली और हल्की है. इस iPhone का नाम iPhone8 या iPhone7s  रखा जाये इस पर अभी विचार नहीं किया गया है.

युवाओं का वर्तमान और भविष्य नष्ट

मैडिकल कालेजों में सीटों की बिक्री होती है और उन सीटों की भी जो हैं ही नहीं. इस देश में भ्रष्टाचार को इतनी मान्यता मिली हुई है कि आप किसी को भी कहें कि 10 लाख रुपए में कोई न हो सकने वाला काम हो जाएगा, तो वह मान जाएगा. इस मानसिकता का लाभ उठा कर शातिर लोग मैडिकल प्रवेश परीक्षाओं में असफल छात्रों के मातापिता के नामपते मालूम कर उन्हें कहते हैं कि विशेष कोटे वाली सीटें उन्हें एक रकम देने पर मिल सकती हैं. आमतौर पर मैडिकल की पढ़ाई के लालची छात्र इस तरह के झांसे में आ जाते हैं और 50-60 लाख रुपए तक खर्च कर डालते हैं. पुलिस ने जिन मामलों में छानबीन की वहां पता चला कि छात्र और अभिभावक को कालेज तक ले जाया गया, एक औफिस में बैठाया गया. वहां कंप्यूटर पर ऐडमिशन लिस्ट दिखाई गई. नकली कन्फर्मेशन पत्र दिया गया.

मातापिता और छात्र उस समय इतने पगलाए होते हैं कि वे साधारण छानबीन भी नहीं करते, क्योंकि वे जानते हैं कि वे खुद कुछ गलत कर रहे हैं. वे खुद को अपराधी मानते हैं और लुकाछिपी का खेल मिल कर खेलते हैं.

इस तरह की धांधली हर क्षेत्र में हो रही है और इस के लिए जिम्मेदार पूरा समाज है. हमारे यहां शिक्षा का ढांचा ही ऐसा खड़ा किया गया है कि इस में योग्यता, चुनौती, परिश्रम की कीमत कम है और शौर्टकट की ज्यादा. शिक्षा को कमाऊतंत्र बनाया गया है और तकनीकी शिक्षा को खासतौर पर. जो वास्तव में मेधावी हैं उन्हें स्थान मिल ही जाता है इसलिए किसी तरह रेलगाड़ी चल रही है पर सड़कों और रेलों की तरह पूरा अमला गंद और बदबू से दबा है. मैडिकल कालेज में प्रवेश और व्यापम तो नमूना मात्र हैं और केवल हवा में तिनके हैं जबकि हम पूरी रेतीली आंधी में घिरे हैं.

हमारा देश, सरकार व समाज मिल कर युवाओं का वर्तमान और भविष्य दोनों नष्ट कर रहे हैं. हमारे यहां जो शिक्षा दी जा रही है, वह यही बताती है कि कैसे बेईमानी करो. यह भव्य भारत का भव्य भविष्य है. यह जगद्गुरु भारत है. यह ज्ञान का स्रोत है. वाह क्या कहने!

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