क्रिसमस पर हम लोग गोआ घूमने गए. वहां के प्रसिद्ध चर्च को देख कर निकले ही थे कि सामने जमीन पर बैठा एक बच्चा हाथ में सूखी रोटी ले कर बड़े स्वाद से खा रहा था. मन करुणा से भर उठा. कुछ दूर जा कर हम फिर मौजमस्ती में मशगूल हो गए. शाम तक घूमतेघूमते इतने थक गए थे कि अपने नियत स्थान से दोबारा निकलने की हिम्मत ही नहीं थी. इसलिए हम ने रास्ते में ही खाना पैक करवाया और अपने स्थान पर वापस आ गए.आधी रात को मेरी नातिन भूख के कारण उठ बैठी और खाना मांगने लगी. मरता क्या न करता, हम ने बचा हुआ खाना उस के सामने रख दिया. रोटी सूख चुकी थी और दाल ठंडी थी. पर ये क्या? एकएक कौर पर नखरे करने वाली वह बच्ची वही सूखी रोटी, ठंडी दालसब्जी के साथ बड़े स्वाद से खाए जा रही थी. मैं उस के मुख पर तृप्ति के भाव देख रही थी. जेहन में उस बच्चे की तसवीर फिर से घूमने लगी और मन सोचने लगा, ‘बेचारा कौन है? गरीबी या भूख, जो अमीर व गरीब सब को बेबस कर देती है.’

मन में एक विचार कौंध गया ‘स्वादिष्ठ नहीं है’, ‘इच्छा नहीं है’ या ‘अच्छा नहीं है’ कह कर कितना अच्छाखासा भोजन हम अपनी थाली में छोड़ देते हैं, जिस से अनगिनत लोगों की भूख शांत हो सकती है.

- बिमला महाजन, पटियाला (पं.)

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2 साल पहले मैं अपनी दीदी के यहां से भिवाड़ी से जयपुर आ रही थी. मैं कई सालों बाद अकेले सफर कर रही थी. जब कंडक्टर ने रुपए ले कर मुझे टिकट नहीं दिया और मेरे मांगने पर आगे बढ़ गया तो मैं बहुत चिंतित थी कि कहीं चैकिंग के दौरान मुझे बिना टिकट देख कर बस से बाहर न उतार दिया जाए.

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