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कुछ कहती हैं तसवीरें

महक का कारोबार : ये नजारे हैं अहमदाबाद के एक अगरबत्ती बनाने वाले कारखाने के. चंदन या केवड़े जैसी खुशबू देने वाली अगरबत्तियां बहुत मेहनत से बनाई जाती हैं. यहां ढाई किलोग्राम वजन की 5 फुट लंबी अगरबत्तियां खासतौर पर दीवाली के लिहाज से बनाई गई हैं, जो 24 घंटे तक जलती रहती हैं.

ऐसे करें व्हाट्सएप से वीडियो कॉलिंग

इंस्टैंट मैसेजिंग एप व्हाट्सएपमें यूजर्स के लिए वीडियो कॉलिंग का फीचर जारी कर दिया गया है. हालांकि, ये फीचर अभी एंड्रायड और विंडोज बीटा एप में ही पेश किया गया है. अगर आपने व्हाट्सएप बीटा एप को इंस्टॉल कर लिया है तो आप वीडियो कॉलिंग फीचर को इस्तेमाल कर सकते हैं. हम आपको व्हाट्सएप से वीडियो कॉल करने का तरीका बताने जा रहे हैं.

कैसे करें वीडियो कॉलिंग?

1. सबसे पहले व्हाट्सएप ओपन करें.

2. इसके बाद कॉन्टेक्ट पर टैप करें.

3. जिसे भी आप वीडियो कॉल करना चाहते हैं उसके नाम पर क्लिक करें.

4. इसके बाद स्क्रीन पर सबसे ऊपर बने फोन आइकन पर टैप करें.

5. इसमें दो ऑप्शन आएंगे जिसमें से आपको वीडियो कॉल पर टैप करना है.

6. इसके बाद आपकी वीडियो कॉल कनेक्ट हो जाएगी.

ध्यान रहे कि व्हाट्सएप पर वीडियो कॉलिंग तभी संभव है जब दोनों यूजर्स के पास व्हाट्सएप का बीटा वर्जन डाउनलोड हो.

अगर यूजर के पास व्हाट्सएप का बीटा वर्जन नहीं है और उन्हें इस फीचर का लाभ तुरंत लेना है, तो यूजर को व्हाट्सएप बीटा प्रोग्राम के लिए साइन अप करना होगा. एंड्रायड पर व्हाट्सएप बीटा प्रोग्राम में साइन अप करने के लिए निम्नलिखित तरीके का इस्तेमाल करना होगा.

1. इसके लिए गूगल प्ले में जाएं और व्हाट्सएप सर्च करें.

2. इसके बाद व्हाट्सएप की गूगल प्ले लिस्टिंग ओपन करें.

3. जो पेज आपके सामने ओपन होगा उसे नीचे स्क्रॉल करें.

4. यहां आपको बीटा टेस्टर दिखाई देगा उसमें ‘I am in’ पर टैप कर दें.

5. इसके बाद जो स्क्रीन ओपन होगी उसमें पुष्टि करें.

6. इसके बाद गूगल प्ले स्टोर के व्हाट्सएप लिस्टिंग पेज पर वापस आएं.

7. यहां आपको व्हाट्सएप बीटा वर्जन पर अपडेट करने का विकल्प दिखाई देगा.

8. अब इसे अपडेट करें.

इसके बाद आप वीडियो कॉलिंग कर पाएंगे.

बेहद गुणी होता है गुड़

आमतौर पर मिठास के लिए लोग चीनी यानी शक्कर की ओर भागते हैं. कोई भी मिठाई या मीठी चीज बनाने के लिए ज्यादातर शक्कर को ही तरजीह दी जाती है. मगर वैज्ञानिकों व डाक्टरों के मुताबिक चीनी सेहत के लिए ज्यादा मुनासिब नहीं होती. इसीलिए खानपान के विशेषज्ञ मिठास के लिए हमेशा गुड़ के इस्तेमाल पर जोर देते?हैं. इस मामले में गांवों में रहने वाले लोग ज्यादा समझदार होते?हैं, वे ज्यादातर मीठी चीजें बनाने के लिए गुड़ का ही इस्तेमाल करते हैं. गांव के लोग तो चाय भी चीनी की बजाय गुड़ से बनाना पसंद करते हैं. वैसे ओछी मानसिकता वाले लोग गुड़ खाना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं. इसी किस्म के एक सज्जन से जब गुड़ की चाय की बात चली तो वे अनजान बन गए. मेरे ही गांव के वे सज्जन काफी समय से बड़े शहर में रह रहे?हैं. उन्हें एक रोज जुकाम था, तो मैं ने गुड़ व अदरक की चाय पीने की सलाह दे दी. इस पर वे तपाक से बोले कि ‘क्या गुड़ की भी चाय बनती है?’

इस किस्म के लोग चीनी के इस्तेमाल को शान की बात मानते हैं. ऐसी घटिया सोच वालों की बात को छोड़ दिया जाए तो इस हकीकत से इनकार नहीं किया जा सकता कि गुड़ बेहद गुणकारी होता है. अपनी गरम तासीर और सोंधे मीठे जायके के लिए जाना जाने वाला गुड़ आयरन से भरपूर होता?है.

बुंदेलखंड जैसे इलाकों में गुड़ को गोलगोल बड़े लड्डुओं के आकार में बना कर बेचा जाता?है, तो तमाम इलाकों में इसे 10 और 5 किलोग्राम के बड़ेबड़े आकारों में

ढाल कर मार्केट में पेश किया जाता है. साधारण चौकोर बट्टियों या गोल भेलियों के आकार में भी गुड़ बाजार में मौजूद रहता?है. आजकल तो तमाम बड़ी कंपनियां हाईजीनिक तरीके से (यानी बगैर हाथ के इस्तेमाल के) मशीनों के जरीए पैक कर के गुड़ पेश कर रही?हैं. हाईजीन यानी सफाई का खास खयाल रखने वालों के लिए यह महंगा गुड़ अच्छा रहता है.

बहरहाल, कुछ कत्थई और पीला सा नजर आने वाला गुड़ किसी भी आकार और प्रकार में मिले, मगर होता?है गुणों से भरपूर. सेहत के लिहाज से इस के फायदे बेशुमार हैं. आइए डालते हैं एक नजर गुड़ के खास फायदों पर:

* गुड़ का सब से ज्यादा इस्तेमाल सर्दीजुकाम की तकलीफ होने पर किया जाता है. इस की गरम तासीर सर्दीजुकाम में बहुत राहत पहुंचाती?है. इसे पानी में डालने के बाद अच्छी तरह खौला कर पीने पर यह दवा जैसा असर करता है. गुड़ का पानी पीना अच्छा न लगे तो गुड़ की चाय अदरक डाल कर बनाएं. यह जायकेदार चाय सर्दीजुकाम में बहुत राहत पहुंचाती है गुड़ की चाय में दूध हमेशा चाय आंच से उतारने के कुछ देर बाद डालना चाहिए. ऐसा करने से दूध फटता नहीं है.

* गुड़ का रोजाना इस्तेमाल करने वालों का हाजमा हमेशा दुरुस्त रहता है. दरअसल गुड़ शरीर में मौजूद पाचन संबंधी एंजाइमों की क्रियाशीलता बढ़ा देता है. यह आंतों को सही तरीके से काम करने में मदद पहुंचाता है. जब आतें सही तरीके से काम करती हैं, तो कब्ज की तकलीफ नहीं होती?है, यानी पेट कायदे से साफ हो जाता है.

* गुड़ के रोजाना इस्तेमाल से शरीर में खून की कमी की शिकायत नहीं होती?है,?क्योंकि इस में भरपूर मात्रा में आयरन मौजूद होता?है. इस के नियमित इस्तेमाल से खून में हिमोग्लोबिन की मात्रा भी सही बनी रहती है, जो कि अच्छी सेहत के लिए बहुत जरूरी है.

* शरीर के जोड़ों में दर्द व तकलीफ होने पर गुड़ को गिलास भर दूध या अदरक के साथ खाने से बहुत आराम मिलता है.

* गुड़ के भरपूर इस्तेमाल से बदन की तमाम हड्डियां मजबूत होती हैं, नतीजतन आर्थराइटिस की शिकायत भी नहीं होती. इस के अलावा हड्डियों संबंधी तमाम छोटीमोटी तकलीफों से नजात मिल जाती है.

* गुड़ खून बढ़ाता ही नहीं, बल्कि खून साफ भी करता है. इस के रोजाना इस्तेमाल से खून साफ होता रहता है. खून साफ रहने से सेहत भी सही बनी रहती है.

* यह महज खून की सफाई ही नहीं करता, बल्कि अहम अंग लीवर कीभी सफाई करता है. गुड़ खाने से शरीर में मौजूद हानिकारक आक्सिंस बाहर निकल जाते हैं और लीवर की सफाई हो जाती है. लीवर शरीर का अहम अंग होता?है और अच्छी सेहत के लिए इस का सहीसलामत रहना जरूरी है. गुड़ को लीवर का रक्षक कह सकते?हैं.

* गुड़ में अच्छीखासी मात्रा में एंटीआक्सीडेंट्स व मिनरल पाए जाते हैं, जो अच्छी सेहत के लिए जरूरी होते?हैं. इस में पाए जाने वाले सेलेनियम व जिंक जैसे मिनरल स्वस्थ शरीर के लिए बहुत जरूरी होते?हैं.

* मोटे और वजनी लोगों के लिए भी गुड़ कारगर साबित होता?है. ज्यादा वजन वालों को गुड़ का नियमित इस्तेमाल करना चाहिए. यह शरीर में पानी की मात्रा सही कर के वजन को काबू में रखता?है.

* वैज्ञानिकों के मुताबिक गुड़ खाने से इनसान का मिजाज अच्छा हो जाता?है, नतीजतन वह मन लगा कर कोई भी काम करता?है.

* गुड़ खाने वालों को सिरदर्द जैसी तकलीफों से नजात मिल जाती है. माइग्रेन की तकलीफ में भी गुड़ कारगर किरदार निभाता?है और राहत पहुंचाता?है.

* रोजाना गुड़ खाने वालों की याददास्त बेहतर होती है और भूलने की शिकायत कम हो जाती?है. इस के इस्तेमाल से दिमाग लंबे अरसे तक चौकस बना रहता है.

* गुड़ एक उम्दा काम्पलेक्स कार्बोहाइड्रेट होता?है. इस के इस्तेमाल से शरीर लंबे अरसे के लिए मजबूत बना रहता?है. यह शरीर को धीरेधीरे ऊर्जा पहुंचाता है. इस के इस्तेमाल से शुगर का लेवल जल्दी से नहीं बढ़ता है.

* गुड़ के इस्तेमाल से सांस से जुड़ी तकलीफें भी दूर होती?हैं. अस्थमा या ब्रोनकाइटिस जैसी सांस संबंधी दिक्कतें गुड़ खाने वालों को कम होती?हैं.

* गुड़ में तिल मिला कर बनाए गए लड्डू खाने से सांस संबंधी दिक्कतें नहीं होती हैं. बगैर लड्डू बनाए गुड़ व तिल खाने से भी फायदा होता?है.

* मासिक धर्म के दौरान होने वाले दर्द और क्रैंप्स जैसी तकलीफों में भी गुड़ खाने से आराम मिलता?है. गुड़ खाने से इनसान का मूड भी अच्छा हो जाता है.

* अगर गला बैठ जाए और आवाज ढंग से न निकले, तो पके हुए चावलों के साथ गुड़ मिला कर खाने से बहुत फायदा होता है और गला बहुत जल्दी ठीक हो जाता?है. कुछ ही देर में आवाज ठीक से निकलने लगती?है.

* गुड़ खाने से टाक्सिन दूर होते?हैं, नतीजतन त्वचा खिल जाती है. इस के इस्तेमाल से कीलमुहासों से?भी नजात मिल जाती है. गुड़ का इस्तेमाल एक्ने की दिक्कत भी दूर करता है.

* बच्चा होने के बाद औरत के पेट की सफाई व पोषण के लिहाज से?भी गुड़ बेहद कारगर व फायदेमंद रहता?है. इसीलिए डिलीवरी के बाद महिलाओं को गुड़ के सिठौरे (मेवे वाले खास लड्डू) वगैरह बना कर काफी समय तक खिलाए जाते हैं.

* रोजाना खाना खाने के बाद मिठाई के तौर पर थोड़ा सा गुड़ खाना स्वाद, सेहत व हाजमे के लिहाज से काफी कारगर होता है.

* गुड़ में तिल व मूंगफली मिला कर बनाए गए लड्डू या चिक्की (पट्टी) स्वाद व स्वास्थ्य के लिए उम्दा होते हैं.

* गुड़ व लाई (मुरमुरा) मिला कर बनाए गए लड्डू या पट्टी भी हलके नाश्ते के लिहाज से बेहतर होते हैं.

* गुड़ मिला कर बनाए गए बाजरे के पुए (तिल भी मिला सकते?हैं) और गुड़, देशी घी व बाजरे की रोटी से बनाया गया मलीदा भी सेहत व स्वाद के लिहाज से लाजवाब होते?हैं.

यानी कुल मिला कर गुड़ हमारे स्वाद व सेहत की कसौटी पर खरा सोना साबित होता?है, लिहाजा इस का भरपूर इस्तेमाल करना चाहिए. अलबत्ता शुगर के मरीज इसे अपने डाक्टर से पूछ कर ही इस्तेमाल करें.                   

नक्सली बन रहे हैं नए जमींदार

जमींदारों, सामंतों और अगड़ी जाति के रईसों के खिलाफ लड़ाई छेड़ने वाले नक्सलियों की नई खेप के सैंकड़ों लोग आज खुद नए जमाने के जमींदार बन चुके हैं. कई नक्सली अब जमींदार, ठेकेदार और कारोबारी  बनने की राह पर चल पड़े हैं. उनका कारोबार ऐसा चमक रहा है कि अच्छे-अच्छे कारोबारी उनसे काफी पीछे छूट गए हैं. अपने पैठ वाले इलाकों में सरकार के बराबर अपनी ‘सरकार’ चलाने वाले नक्सलियों ने पहले पैसा और प्रोपर्टी बनाने का नया फंडा अपनाया. उसके बाद पिछले 5-6 सालों से कई बड़े नक्सली सड़क, पुल, पुलिया बनाने से लेकर सरकारी योजनाओं में भाड़े पर ट्रैक्टर, जेसीबी मशीन, हाईवा मशीन, टीवर, डंपर आदि लगाने लगे हैं. इतना ही नहीं कई बिहार के इलाकों में तो सरकारी कामों का ठेका लेकर नक्सली ठेकेदार बन कर मोटी कमाई कर रहे हैं.

कुछ दिनों पहले खुफिया विभाग ने सरकार को रिपोर्ट सौंपी थी कि सरकारी योजनाओं में कई नक्सली पेटी कंट्रेक्टर के तौर पर काम कर रहे हैं. योजनाओं का ठेका हासिल करने वाली बड़ी बड़ी कंपनियों को धमका कर नक्सली छोटे-छोटे कामों का ठेका अपने हाथ में ले लेते हैं और बड़ी ठेका कंपनियां इस डर से नक्सलियों को ठेका दे देती हैं कि काम आसानी से हो सकेगा और नक्सलियों और अपराधियों की ओर से कोई परेशानी खड़ी नहीं की जाएगी. बड़ी ठेका कंपनियों की इस सोच को नक्सली जम कर भुना रहे हैं और खूब मलाई काट कर रहे हैं.

पिछले साल जमुई के हार्डकोर नक्सली पालुस हैम्ब्रम की एक जेसीबी मशीन पुलिस के हाथ लगी थी, उसके बाद ही पुलिस के माथे पर बल पड़ गए थे. पुलिस ने इस मामले की जांच शुरू की तो कई चौंकाने वाली बातों का पता चला. उसके बाद खुफिया विभाग ने भी नक्सलियों के कारोबारी बनने वाली रिपोर्ट भी राज्य सरकार को सौंप दी. इससे नक्सलियों के व्यापारी बनने की बात पक्की हो गई. पुलिसिया जांच में उन्हें इस बात के कई पक्के सबूत मिल चुके हैं कि नक्सलियों ने अपने रिश्तेदारों और भरोसेमंदों को पेटी कंट्रेक्टर के धंधे में उतार रखा है और बड़ी कंपनियों पर धौंस जमा कर अपनी हूकूमत चला रहे हैं. बैठे-ठाले ठेका से होने वाले मुनाफे की रकम का बड़ा हिस्सा नक्सलियों के पास पहुंच रहा है. इससे वह बड़े ही आराम से लखपति-करोड़पति बन रहे हैं.

नक्सली असर वाले इलाकों में अकसर जेसीबी मशीन और डंपर आदि नक्सलियों द्वारा जलाने की वारदातें होती रहती हैं. पहले पुलिस यह समझती थी कि नक्सली सरकारी कामों को रोकने और ठेकेदारों से लेवी वसूलने के लिए ऐसा करते हैं, पर ऐसा नहीं है. नक्सली अपने जेबीसी और हाईवा मशीनों आदि को किराए पर लगाने के लिए दूसरे ठेकेदारों की मशीनों में आग लगा देते हैं. नक्सलियों के डर से अब कोई भी ठेकेदार निर्माण कंपनियों को मशीन देने से बिदकने लगे हैं. निर्माण कंपनियों को इससे कोई दिक्कत नहीं हुई, बल्कि नक्सनी उन्हें मशीने मुहैया करा रहे हैं और उनकी हिफाजत का भी भरोसा दिला रहे हैं.

ठेकेदारी समेत कई कारोबार में घुसे नक्सलियों की संख्या बढ़ती ही जा रही है. पुलिस मुख्यालय ने बिहार में अरबों रूपए को काम कर रही ठेका कंपनियों से उनके पेटी कंट्रेक्टरों की लिस्ट मांगी है. पुलिस को पूरा यकीन है कि या तो कुछ नक्सलियों ने खुद ठेका ले रखा है या फिर अपने करीबियों को ठेका दिलवा दिया है. ठेकदारों और नक्सलियों की इस सांठ-गांठ की रिपोर्ट से पुलिस और सरकार के होश उड़े हुए हैं. सूबे के तमाम सरकारी योजनाओं में लगे जेसीबी, टीवर, टैक्टर, ट्रक और हाईवा मशीनों के मालिक कौन-कौन लोग हैं, इसकी लिस्ट तैयार की जा रही है.

कुछ साल पहले ही खुफिया विभाग ने पुलिस को आगाह कर दिया था कि पेटी कंट्रेक्टर के काम में लग कर कई नक्सली करोड़पति बन बैठे हैं. एके-47, बंदूक और पिस्तौल के जोर पर वह बड़ी ठेका कंपनियों के जरिए लाखों रूपए कमा रहे हैं. पुलिस महकमे से मिली जानकारी के मुताबिक पटना में पिछले दिनों पकड़े गए नक्सलियों के पास से 68 लाख रूपए बरामद हुए. जहानाबाद में गिरफतार नक्सलियों के पास से 27 लाख 50 हजार रूपए और 5 मोबाइल फोन जब्त किए गए. औरंगाबाद में नक्सलियों के पास से 3 लाख 34 हजार रूपए और एक बोलेरो गाड़ी, गया में नक्सलियों के पास से 15 लाख रूपए, मुंगेर में नक्सलियों के पास से एक कार, 50 हजार रूपया और पिस्तौल बरामद किए गए.

गौरतलब है कि एक जेबीसी मशीन की कीमत 25 से 30 लाख रूपए के करीब होती है और इसका किराया प्रति घंटा एक हजार से 1500 रूपया होता है. टीपर की कीमत भी 30 लाख रूपए के आसपास है और उसका किराया रोजाना 5 हजार रूपया मिल जाता है. सड़क एवं पुल-पुलियों के काम में इन मशीनों को महीनों इस्तेमाल किया जाता है. इससे साफ हो जाता है कि मशीनों के किराए से ही नक्सलियों की जेबें किस कदर गरम हो रही है.

पुलिस हेडक्वाटर के सूत्रों पर भरोसा करें तो बिहार के कई नक्सलियों की करोड़ों की दौलत का पता करने का काम शुरू किया गया है. उसके बाद उनकी गैरकानूनी तरीके से बनाई गई संपत्ति को जब्त करने का काम चालू किया जा सकता है. गया जिला के देवकुमार यादव, मुंगेर के बाबूलाल यादव तथा अधिकलाल पंडित, औरंगाबाद के अखिलेश कुमार, अर्जुन सिंह, मृत्युंजय मिश्रा, यमुना मिस्त्री, नन्हे पासवान, दुधेश्वर, दीवीलाल, सत्यनारायण प्रजापति, ललन जी, राहुल, बिहारी, राजकिशोर यादव, सुभाष यादव, बिंदेश्वर पासवान एवं सुनी खत्री, सीतामढ़ी के संतोष झा और मृत्युंजय कुमार, जमुई के पांचू मुर्मू उवं पालुस हैम्ब्रम, मुजफ्फरपुर के अवध किशोर साह, संजय ठाकुर और विजय नाम के करोड़पति नक्सलियों की चल और अचल संपत्ति को खंगाला जा रहा है.

पुलिस का दावा है कि जमुई के नक्सली कमांडर बीरबल और रमेश हेम्ब्रम ने करोड़ों रूपए की दौलत बना रखी है. दोनों नक्सलियों के पास 80 लाख रूपए से ज्यादा की दौलत आंकी गई है. जमुई के लक्ष्मीपुर थाना के चपलवा गांव में बीरबल का 12 कमरों का घर है और उसकी कीमत 30 लाख रूपए आंकी गई है. जमुई के बाहर भी बीरबल ने प्रोपर्टी बना रखी है, जिसका पता लगाने में पुलिस लगी हुई है. वह फिलहाल जमुई जेल में बंद है.

चिंतक हेमंत राव कहते हैं कि नक्सलियों के करोबारी और करोड़पति बनने से यह साफ है कि नक्सल आंदोलन अपनी राह से भटक चुका है. पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी में 18 मई 1967 को नक्सली आंदोलन की नींव रखने वाले कानू सन्याल ने अपनी जिंदगी के आखिरी दिनों में यह कबूल किया था कि नक्सल आंदोलन अपने मकसद से भटक गया है. गरीबों और शोषितों को सामंतवाद के चंगुल से नजात दिलाने और उन्हें उनका हक और इंसाफ देने की नीयत से जिस नक्सल आंदोलन की शुरूआत की गई थी, वह आज लूटखसोट, भयादोहन और ऐयाशी का अड्डा बन कर रह गया है. गरीबों को जमींदारों और ऊंची जातियों की जुल्मों से बचाने की बात करने वाले नक्सलियों का एक बड़ा तबका पहले तो जुल्मी बना और अब कारोबारी बनने की राह पर चल पड़ा  है.

किसानों को सही दाम दिलाना हमारा मकसद

अब किसान जागरूक हो रहे हैं. वे सरकार और समाज द्वारा चलाई जा रही हर सहूलियत का फायदा उठा कर उन्हें खेतीकिसानी में इस्तेमाल कर रहे हैं और खेती के मुनाफे को बढ़ा रहे हैं. मिलते हैं एक ऐसे ही किसान बीजेंद्र कुमार सिंह से. पानीपत के रहने वाले बीजेंद्र कुमार कुछ समय पहले तक साधारण किसान ही थे. वे सब्जी की खेती करते और सब्जी को पास की मंडी में जो भी दाम मिलता बेच आते. इस से बीजेंद्र का बस दो समय की रोटी का ही जुगाड़ हो पाता था. खेती से भी तरक्की की जा सकती है या उस से भी सुखसुविधाएं जुटाई जा सकती हैं, वे नहीं जानते थे. कुछ समय पहले उन का संपर्क किसानों को बाजार से जोड़ने और उन्हें उन के उत्पादों के सही दाम दिलाने का काम कर रही एक कंपनी ‘क्रोफार्म’ से हुआ.

‘क्रोफार्म’ के संपर्क में आने पर बीजेंद्र ने अपने साथी किसानों को इकट्ठा किया और एक संस्था बनाई. इस संस्था को उन्होंने ‘द न्यू पानीपत कोआपरेटिव वेजीटेबल एंड फ्रूट ग्रोअर मार्केटिंग सोसायटी’ नाम दिया. ‘क्रोफार्म’ के सीईओ एवं सहायक संस्थापक वरुण खुराना ने बताया कि किसान पैदावार तो खूब कर रहे हैं, लेकिन उन्हें उन की पैदावार का सही दाम नहीं मिल रहा है, जबकि उपभोक्ता महंगे दामों में किसानों के उत्पादों को खरीद रहे हैं. कृषि के क्षेत्र में उत्पादक और उपभोक्ता के बीच की कडि़यों को कम कर के ‘क्रोफार्म’ किसान और उपभोक्ता, दोनों को ही फायदा पहुंचा सकती है. वरुण के मुताबिक उन की कंपनी का मकसद किसानों को उन के उत्पादों का सही मूल्य दिलाना, उत्पादों को खराब होने से बचा कर उस का भरपूर इस्तेमाल करना, किसानों को उन के उत्पादों को बिकवाने में मदद करना और उपभोक्ताओं को सही दाम में सही चीज पहुंचाना है.

‘क्रोफार्म’ किसानों से उन के उत्पाद खरीद कर बड़ीबड़ी रिटेल कंपनियों जैसे रिलायंस, मैट्रो, बिग बाजार, बिग बास्केट, फ्रूट वर्क्स आदि के साथसाथ स्थानीय बाजार में पहुंचाती है. इस काम के लिए कंपनी ने देशभर में 10000 से भी ज्यादा किसानों के साथ करार किया हुआ है. वरुण बताते हैं कि उन्होंने अपने सभी किसानों को मोबाइल फोन नेटवर्क के साथ जोड़ा हुआ है. सभी किसानों के पास विभिन्न उत्पादों के अलगअलग मंडियों के दाम भेज दिए जाते हैं और मंडी भाव के आधार पर ही गांव में ही किसानों को उन के उत्पाद के भाव दे दिए जाते हैं. इस से किसान को अपने सामान को मंडी तक ले जाने की परेशानी भी नहीं उठानी पड़ती. उन्हें घर बैठे ही मंडी के हिसाब से दाम मिल जाते हैं. उन्होंने बताया कि कंपनी ने इलाके के अनुसार खरीद केंद्र बनाए हुए हैं. खरीद केंद्र गांवों में या गांव के नजदीक ही बनाए गए हैं, ताकि किसानों को वहां तक अपना सामान लाने में कोई परेशानी न हो. कंपनी ने अभी तक मुंबई, बेंगलूरू, पुणे, हैदराबाद, जयपुर, दिल्ली और पानीपत के किसानों के साथ संपर्क बनाया है. वरुण बताते हैं कि उन की कंपनी 1 लाख किसानों तक अपनी पहुंच बनाने के लक्ष्य पर काम कर रही है. जल्दी ही इस आंकड़े को हासिल कर लिया जाएगा.

‘क्रोफार्म’ से जुड़ने या इस के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए किसान इन नंबरों पर संपर्क कर सकते हैं: नितिन धाकड़ (दिल्ली और आसपास) 7291998117, किशोर अंबरे (महाराष्ट्र) 8108029029, महानतेश (कर्नाटक) 8123436910.

 

– वरुण खुराना

गंभीर की जगह ले सकते हैं लोकेश राहुल

टीम इंडिया के चीफ कोच अनिल कुंबले ने साफ किया कि कर्नाटक के ओपनर लोकेश राहुल इंग्लैंड के खिलाफ दूसरे टेस्ट मैच में खेलेंगे. राजकोट में भारत और इंग्लैंड के बीच खेला गया पहला टेस्ट ड्रॉ रहा था जिसमें राहुल मैच फिटनेस साबित नहीं कर पाने के कारण खेल नहीं सके थे.

उन्होंने कर्नाटक के लिए राजस्थान के खिलाफ रणजी ट्रॉफी मैच खेल न केवल अपनी मैच फिटनेस साबित की बल्कि इस मैच में 76 और 106 रन की बेहतरीन इनिंग्स खेल फॉर्म में होने का प्रमाण भी दे दिया. राहुल और मुरली विजय दूसरे टेस्ट में ओपनिंग करेंगे जिसका मतलब है कि दिल्ली के ओपनर गौतम गंभीर को प्लेइंग इलेवन से बाहर होना पड़ सकता है.

गंभीर नहीं दिखे सहज

राजकोट टेस्ट में गंभीर ने पहली इनिंग्स में 29 रन बनाए थे जबकि दूसरी में वह खाता भी नहीं खोल सके. स्टुअर्ट ब्रॉड और क्रिस वोक्स ने अपनी स्विंग और बाउंस से गंभीर को खासा परेशान किया था. यही वजह रही कि विशाखापत्तनम से थोड़ी दूरी पर स्थित विजयानगरम में राजस्थान के खिलाफ रणजी मैच खेल रहे कर्नाटक के लोकेश राहुल को टीम से जोड़ने का फैसला सिलेक्टर्स ने लिया.

कोच की सोच

कोच कुंबले ने कहा कि अभी टेस्ट मैच शुरू होने में काफी समय है. राहुल सिलेक्शन के लिए उपलब्ध थे. हम चाहते थे कि वह स्टार्टिंग लाइनअप में हों इसलिए उन्हें टीम में शामिल किया गया है. वह चोट से उबर चुके हैं और उन्होंने प्रोटोकॉल का पालन करते हुए रणजी ट्रॉफी मैच भी खेल लिया है. मंगलवार को उन्होंने सेंचुरी बनाई और मैच की पहली इनिंग्स में 70 प्लस का स्कोर भी किया. चूंकि रणजी ट्रॉफी मैच विजयनगरम में हो रहा है जो विशाखापट्टनम से काफी करीब है इसलिए उन्हें टीम में शामिल करना अच्छा फैसला है.

एंडरसन टारगेट नहीं

दूसरे टेस्ट मैच में इंग्लैंड के अनुभवी पेसर जेम्स एंडरसन के खेलने की संभावनाओं के बारे में जब कुंबले से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि हमारा फोकस केवल एक प्लेयर पर नहीं है. एंडरसन ने 450 प्लस टेस्ट विकेट लिए हैं जो उनके अनुभव को दर्शाता है. वह भारत में पहले भी खेल चुके हैं. वह इंग्लैंड के बेहतरीन पेसर हैं. टीम में आपको अनुभव की जरूरत होती है और जब कोई अनुभवी प्लेयर सिलेक्शन के लिए उपलब्ध रहता है तो इससे टीम मजबूत होती है. हम इंग्लैंड को एक टीम के तौर पर देख रहे हैं न कि हमारा ध्यान किसी व्यक्तिगत प्लेयर पर है.

पेसर्स का तारीफ

कुंबले ने पेसर्स उमेश यादव और मोहम्मद शमी की भी तारीफ की जिन्होंने कम विकेट मिलने के बावजूद न्यूजीलैंड के खिलाफ टेस्ट सीरीज और इंग्लैंड के खिलाफ पहले टेस्ट मैच में प्रभावी बोलिंग की. कुंबल ने कहा कि पेसर्स शमी और उमेश ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया. दोनों की बॉल रिवर्स स्विंग हुई जिससे इंग्लैंड के बैट्समेन परेशानी में पड़े. दोनों ने न केवल राजकोट बल्कि न्यूजीलैंड के खिलाफ भी बढ़िया बोलिंग की. भुवी (भुवनेश्वर कुमार) और सभी पेसर्स अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं.

कैचिंग की चिंता

राजकोट टेस्ट में भारतीय टीम ने 6 कैच टपकाए और इस पहलू पर कुंबले की भी बारीक नजर है. कुंबले ने कहा कि मैं टीम के साथ साढ़े तीन महीने से हूं और इस दौरान उसने तीनों डिपार्टमेंट (बैटिंग, बोलिंग और फील्डिंग) में अच्छा प्रदर्शन किया है. कैचिंग एक ऐसा पहलू है जिस पर टीम खुद को गौरवान्वित महसूस करती है. हमने राजकोट में कैचिंग के मामले में खुद को निराश किया. इस पूर्व लेग स्पिनर ने बोलर्स का बचाव करते हुए कहा कि राजकोट की पिच बैटिंग के लिए अच्छी थी और मैच में 6 सेंचुरी लगी.

कैसे बनाएं किसान बगीचे की रूपरेखा

बगीचे की अच्छी योजना वही कही जाती है जिस में कि हर पेड़ को बढ़ने के लिए सही जगह मिल सके, पेड़ों की देखरेख करने में कोई परेशानी न हो व पेड़ देखने में सुंदर लगें. बगीचे में कम से कम खर्च हो, इस के लिए जहां तक हो सके पेड़ों को सीधी लाइन में लगाना अच्छा रहता है. बगीचे की रूपरेखा बनाने की खास विधियां इस तरह से हैं:

* वर्गाकार विधि

* आयताकार विधि

* त्रिभुजाकार विधि

* षट्भुजाकार विधि

* पंचभुजाकार विधि

* कंटूर विधि

वर्गाकार विधि : यह विधि सब से आसान है. इसे ज्यादातर किसान इस्तेमाल में लाते हैं. किनारों से करीब 6 मीटर जगह छोड़ कर पेड़ लगाने का काम शुरू करना चाहिए. इस विधि में पेड़ों को सीधी लाइन में लगाया जाता है और पेड़ से पेड़ व लाइन से लाइन की दूरी समान होती है.

इस विधि में सब से पहले एक आधार रेखा खींची जाती है, जो पौधे लगाने की दूरी के आधे अंतर पर खींची जाती है. माना कि पौधे लगाने की दूरी 10 मीटर है, तो पहली लाइन की दूरी 5 मीटर रखनी चाहिए. आधार रेखा के दोनों तरफ से समानांतर रेखाएं खींची जाती हैं और जहां पर ये रेखाएं खत्म होती हैं, वहीं पर इन को एक समानांतर रेखा से मिला देते हैं. इस के बाद तय दूरी पर आधार रेखा पर रेखाएं खींचते हैं. रेखाएं जहां पर एकदूसरे  को काटती हैं, उन जगहों पर पौधे लगाए जाते हैं. इस विधि द्वारा पौधे एक सीधी रेखा में होते हैं और पौधों में एक तय दूरी होने की वजह से बाग घना नहीं हो पाता है. इस से सिंचाई, निराईगुड़ाई, कीटनाशक का छिड़काव, पौधों की कटाईछंटाई व सधाई वगैरह बागबानी के काम करने आसान होते हैं. इस विधि में 2 लाइनों में 4 पौधे मिल कर एक वर्ग तैयार करते हैं.

आयताकार विधि : यह विधि वर्गाकार विधि की तरह ही होती है. इस में अंतर यह है कि लाइन से लाइन की दूरी पौधे से पौधे की दूरी से ज्यादा होती है. इस विधि में 2 लाइनों में 4 पौधे मिल कर एक आयत बनाते हैं, इसलिए इस को आयताकार विधि कहते हैं. पेड़ों को फैलने व बढ़ने के लिए सही जगह मिलती है, जिस से बागबानी संबंधी काम करने में आसानी रहती है.

त्रिभुजाकार विधि : इस विधि में लाइन व पौधे की आपसी दूरी वर्गाकार विधि की तरह ही होती है. इस विधि में अंतर यह है  कि दूसरी लाइन में पहली लाइन के 2 पौधों के बीच 1 पौधा लगाया जाता है. इस प्रकार 3 पौधे मिल कर एक त्रिभुज बनाते हैं. पेड़ों को फैलने व बढ़ने के लिए सही जगह मिल जाती है, जिस से बागबानी के काम करने में आसानी रहती है. इस विधि को अपनाने में कोई खास फायदा नहीं होता है.

षट्भुजाकार विधि : इस विधि में 6 पौधे मिल कर षट्भुजाकार आकार बनाते हैं और 7वां पौधा इन के बीच में लगाया जाता है. इस विधि में पौधों को फैलने व बढ़ने के लिए सही जगह मिलती है. इस विधि में बगीचा ज्यादा घना होता है, लेकिन बागबानी के काम करने में आसानी रहती है. इस विधि में 15 फीसदी ज्यादा पेड़ लगाए जाते हैं. यह विधि मुश्किल होने की वजह से कम इस्तेमाल में लाई जाती है. इस विधि में लाइन की दूरी पौधों की दूरी से कम होती है. इस विधि में पौधों का फासला हर दिशा में बराबर होता है.

पंचभुजाकार विधि : यह विधि वर्गाकार विधि की तरह ही होती है. इस में अंतर इतना होता है कि हर वर्ग के बीच में एक पौधा ज्यादा लगाया जाता है. इस विधि में वर्गाकार विधि से लगभग दोगुने ज्यादा पेड़ लगाए जाते हैं, जिस से बगीचा ज्यादा घना हो जाता है. इस वजह से बागबानी के काम करने में परेशानी होती है. इस विधि में चारों कोनों में स्थायी पौधे लगाए जाते हैं और बीच में पूरक पौधे (जैसे पपीता, फालसा, अनन्नास आदि जल्दी फल देने वाले पौधे) लगाए जाते हैं. जब स्थायी पौधों का फैलाव ज्यादा हो जाता है, तो पूरक पौधों को काट कर निकाल देते हैं.

कंटूर विधि : यह विधि ज्यादातर पहाड़ी इलाकों में जहां जमीन ऊंचीनीची या ऊबड़खाबड़ होती है, अपनाई जाती है. इस में पौधे सीधी लाइन में न लगा कर जमीन की बाहरी रेखा के मुताबिक लगाए जाते हैं. पौधों को पानी की जरूरत पड़ने पर बरतनों से पानी दिया जाता है. इस विधि में दूसरी विधियों के मुकाबले पौधों की संख्या कम होती है. शहरों के पास वाले ज्यादातर बागों में पंचभुजाकार विधि का इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि शहरों के पास की जमीन ज्यादा महंगी होती है और इस विधि में अन्य विधियों के मुकाबले ज्यादा पौधे लगाए जाते हैं. इस विधि में पूरक पौधों से उस वक्त आमदनी मिलनी शुरू हो जाती, जब स्थायी पौधे बढ़ रहे होते हैं. इस विधि से बाग से जल्दी ही फल मिलने लगते हैं.

संध्या बहुगुणा व अभिषेक बहुगुणा

नोट बैन से कट रही बैंक केशियर्स की जेब

सरकार के नोट बैन के फैसले से आम जनता को बहुत परेशानी हो रही है. पर नोट बैन से बैंक के कैशियर्स भी बहुत प्रभावित हो रहे हैं. कई बैंक ऑफिसर्स के मुताबिक कैशियर्स को अपने अकाउंट्स सेटल करते वक्त रोजाना अपनी सैलरी में कम से कम 2,000 रुपये का नुकसान हो रहा है. एक ब्रांच में हर दिन कम से कम 1.35 करोड़ रुपये की करेंसी एक्सचेंज की जा रही है. कभी-कभी ऐसा भी होता है कि डिपॉजिट से ज्यादा पैसे निकल जाते हैं. इस अमाउंट को कैशियर की सैलरी से काट लिया जाता है.

4,500 रुपये तक के नए करेंसी नोट्स पाने के लिए पांच साल के बच्चे भी आधार कार्ड के साथ लाइन लगा रहे हैं. केंद्र ने अब इलेक्शन में फर्जी वोटिंग को रोकने में इस्तेमाल आने वाली स्याही का उपयोग करेंसी एक्सचेंज करने की प्रक्रिया में करने का फैसला किया है. जल्द न मिटने वाली यह स्याही 500 और 1,000 रुपये के पुराने नोट्स बदलने वाले व्यक्ति के दाएं हाथ की उंगली में लगाई जाएगी. एक ही व्यक्ति कई बार करेंसी बदलने के लिए आ रहे हैं, जिससे बैंकों में लंबी लाइनें लग रही हैं. इंक मार्किंग के साथ-साथ बैंकों में लगने वाली भीड़ को मैनेज करने के लिए यह फैसला लिया गया है.

बैंकों और एटीएम के बाहर लगने वाली भीड़ को कम करने की कोशिश के तहत फाइनेंस मिनिस्ट्री ने रविवार को करेंसी एक्सचेंज फैसिलिटी और डेली कैश विदड्रॉल लिमिट में छूट की घोषणा की थी. इसके बाद बैंकों को वरिष्ठ नागरिकों और दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए अलग लाइनें लगाने की सलाह दी गई.

अब एटीएम से निकलेंगे 20 और 50 रुपए के नोट

नोटबंदी के बाद पिछले करीब एक हफ्ते से देशभर में चल रही नकदी की दिक्कत के बीच भारतीय स्टेट बैंक ने एक राहत भरी खबर दी है. जल्द ही एसबीआई अपने एटीएम से 20 और 50 रुपये के नोट निकालने की सुविधा देने जा रहा है. इस सुविधा के बाद ग्राहकों को एटीएम से 20 और 50 रुपए के नोट मिल सकेंगे. बैंक के इस फैसले से यकीनन उपभोक्ताओं को सुविधा होगी. इसके साथ ही लोग एटीएम से 2000 के नए नोट भी निकाल सकेंगे.

एसबीआई की अध्यक्ष अरुणधति भट्टाचार्या ने इसकी घोषणा करते हुए कहा कि भीड़ कम होते ही बैंक 50 और 20 रुपये वितरित करना शुरू कर देगा. केंद्र सरकार ने बैंकों से एक दिन में चार हजार की बजाए 4500 रुपये निकालने की अनुमति दे दी है. इसके अलावा सरकार ने पुराने नोटों की वैधता और 10 दिन के लिए बढ़ा दी है.

अब अस्पतालों, मेट्रो स्टेशनों, शमशान घाट, दवा की दुकानों, पेट्रोल पंपों में 24 नवंबर तक 500 और 1000 रुपये के पुराने नोट स्वीकार किए जाएंगे. 8 नवंबर की रात से मोदी सरकार के फैसले के बाद 500 और 1000 के नोट अब अमान्य हो गए है जिन्हें 30 दिसंबर तक बैंक और डाकघरों में बदलकर नए नोट लिए जा सकते हैं.

शहर और शहरी

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु कभी देश का गार्डन सिटी हुआ करता था पर अब वह ट्रैफिक जाम सिटी बन गया है. लगभग पूरे बेंगलुरु में सड़कों पर 12-14 घंटे ट्रैफिक जाम रहता है. ऊंचाई पर बसे इस शहर की ठंडक गाडि़यों के निकले धुएं, अंधाधुंध भवन निर्माण और बढ़ती आबादी के कारण समाप्त हो गई है. राज्य सरकार ने 1,000 करोड़ रुपए खर्च कर के बेंगलुरु के मध्य से स्टील फ्रेम पर, 6.7 किलोमीटर का फ्लाईओवर बनाने की योजना बनाई पर शहरवासी उस का विरोध कर रहे हैं कि उस से शहर का सौंदर्य नष्ट हो जाएगा. इस तरह की समस्याएं सारे शहरों में हैं. यह तो अब पक्का है कि गांवोंकसबों से भारी संख्या में लोग पहले निकट के बड़े शहर में जाएंगे और फिर दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु में पैर जमाने की कोशिश करेंगे क्योंकि इन्हीं शहरों में कैरियर बन रहे हैं और इन्हीं में जीवन की विविधता मिलती है. बाकी शहर और कसबे अभी भी 19वीं सदी में जी रहे हैं जहां अपनी मरजी से जीनारहना भी कठिन है. ऐसे में इन बड़े शहरों को अपने में और भीड़ को खपाना पड़ेगा चाहे इन का सौंदर्य नष्ट हो, आनेजाने की सुविधा तो देनी ही होगी.

नागरिकों को जरूरी सुविधाएं देने की जिम्मेदारी सरकार की है. इस के लिए सरकार व स्थानीय प्रशासन योजनाएं बनाते हैं. हर सरकार और नगरनिकाय सिर्फ पैसे लूटने के लिए इस तरह की योजनाएं बनाते हैं क्योंकि सत्ताधारी नेता जानते हैं कि जब तक काम पूरा होगा तब फीता काटने के लिए वे होंगे नहीं. वे टैंडर जारी करते समय रिश्वत ले कर काम को भूल जाते हैं और सारी योजना व दूरदर्शिता धरी रह जाती है. यदि किसी कारण जनता का विरोध होने लगे तो हर नेता सोचता है कि 5-10 साल में पूरे होने वाले काम में वह नाराजगी क्यों मोल ले.

यह देश की लाचारी है कि यहां की जनता ने हर काम का जिम्मा या तो निकम्मे अफसरों पर छोड़ रखा है या टैंपरेरी पौलिटीशियनों पर. हमारे नागरिक अपनेआप तो कालोनी या बिल्ंिडग की वैलफेयर एसोसिएशन भी नहीं चला पाते और अधपढ़े नेताओं से उम्मीद करते हैं कि वे शहरों को चमका दें. शहरों को साफ रखने के लिए झोंपड़पट्टी से ले कर भव्य भवनों तक को लोग खुद आसानी से साफ रख सकते हैं, वाहन कम खरीद सकते हैं, कम सामान फेंकने की आदत डाल सकते हैं. लेकिन चूंकि विरोध करना आसान है, इसलिए वे हल्ला मचाते रहते हैं. और इसी का फायदा हमारे नेता व नौकरशाह उठा रहे हैं.

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