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500-1000 बैनः पुणे अंतरराष्ट्रीय मैराथन स्थगित

केंद्र सरकार के 1000 और 500 रूपये के नोटों को बंद करने के फैसले को देखते हुए पुणे अंतरराष्ट्रीय मैराथन (पीआईएम) के आयोजकों ने इस प्रतियोगिता को स्थगित कर दिया और अब इसे जनवरी 2017 में आयोजित किया जाएगा.

31वीं पुणे अंतरराष्ट्रीय मैराथन 2016 का आयोजन चार दिसंबर को होना था. इसे 1983 से ही देश की चोटी की मैराथन में एक माना जाता है. पीआईएम के उपाध्यक्ष अभय छाजद ने कहा, ‘‘हर वर्ष विभिन्न देशों के विदेशी एथलीटों सहित हजारों धावक इस मैराथन में हिस्सा लेने के लिये पुणे आते हैं लेकिन 500 रूपये और 1000 रूपये के नोटों के बंद किये जाने के कारण भागीदारों और स्वयंसेवकों को परेशानी उठानी पड़ सकती है.’’

कांग्रेस अध्यक्ष छाजद ने कहा कि प्रतियोगिता का कुछ खर्चा डेढ़ करोड़ रूपये है और अधिकतर लेनदेन चेक से होता है. उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन कई छोटे खर्चे हैं जिन्हें ऑनलाइन या चेक से नहीं किया जा सकता है.’’

गोलमाल की शिकार किसानों की टे्रनिंग योजनाएं

भारत के किसान अपनी खेती को ले कर हमेशा परेशान रहते हैं कि कब उन की फसल पर मौसम और बीमारियों की मार पड़ जाए और खूनपसीने से तैयार की गई फसल बरबाद हो जाए. यही नहीं किसानों को खादबीज पानी और खेती के यंत्रों की समस्याएं भी झेलनी पड़ती हैं. कुछ ऐसा ही हाल पशुपालन व बागबानी वगैरह का भी है. किसानों को अन्नदाता कहा जाता है. यह कहने और सुनने दोनों में बहुत अच्छा लगता है. लेकिन देश के 1 अरब से भी ज्यादा लोगों का पेट भरने वाले ये किसान सरकारी कामकाज में ढील व खेतीकिसानी की योजनाओं में गोलमाल के चलते बदहाली का शिकार होते जा रहे हैं. इन किसानों की बदहाली किसी से भी छिपी नहीं है.

ऐसे में किसानों को अच्छी खाद, बीज, सही मशीनों के चयन व बाढ़ या सूखे से निबटने के तरीकों की जानकारी होना जरूरी हो जाता है. खेतीकिसानी की इन्हीं समस्याओं से निबटने के लिए सरकार ने केंद्र व राज्य लेवल पर अलगअलग महकमे बना रखे हैं. इन में से कुछ महकमों का काम खेतीकिसानी से जुड़ी योजनाओं का प्रचारप्रसार करने व ट्रेनिंग देने का भी है. खेतीकिसानी से जुड़े महकमों में कृषि, पशुपालन, बागबानी, डेरी, मछलीपालन वगैरह खास हैं. इन्हीं खास महकमों द्वारा किसानों के लिए सैकड़ों अनुदान व ट्रेनिंग की योजनाएं भी चलाई जा रही हैं, जिन के लिए केंद्र व राज्य सरकारें हर साल अरबों रुपए खर्च करती हैं.

सरकार द्वारा किसानों के लिए चलाए जा रहे ट्रेनिंग कार्यक्रमों का हाल बहुत ही बुरा है, क्योंकि ज्यादातर ट्रेनिंग योजनाएं भ्रष्ट अधिकारियों व संस्थाओं के गोलमाल का शिकार हो कर सिर्फ उन्हीं का पेट भर रही हैं. ऐसे में ट्रेनिंग के अभाव में किसानों को खेती, बागबानी, पशुपालन वगैरह पर सही जानकारी न मिलने से तमाम तरह की परेशानियों से गुजरना पड़ता है. कभीकभी भारी नुकसान के चलते किसान आत्महत्या करने पर भी मजबूर हो जाते हैं.

किसानों के ट्रेनिंग के पैसे से अधिकारी भर रहे हैं जेब : जिला व राज्य स्तर पर कृषि विभाग द्वारा तमाम तरह की ट्रेनिंग की योजनाएं चलाई जा रही हैं. ये ट्रेनिंग अलगअलग स्कीमों के तहत अलगअलग आयोजित होती हैं, जिन में सपोर्ट टू स्टेट एक्सटेंशन प्रोग्राम फार एक्सटेंशन रिफार्म्स ‘आत्मा’, आईसोपाम योजना, भूमि एवं जल संरक्षण योजना, बीज ग्राम योजना, भूमि सेना योजना, आइपीएम प्रदर्शन सहित सैकड़ों तरह की योजनाओं पर अरबों रुपए खर्च किए जाते हैं. लेकिन ये योजनाएं महंगी साबित हो रही हैं. सपोर्ट टू स्टेट एक्सटेंशन प्रोग्राम फार एक्सटेंशन रिफार्म्स योजना में अंतर्राज्यीय स्तर पर 1250 रुपए प्रति किसान प्रतिदिन के हिसाब से 7 दिनों का प्रशिक्षण आयोजित किया जाता है. वहीं राज्य के अंदर 1000 रुपए प्रति किसान प्रतिदिन व जिले के अंदर 400 रुपए प्रति किसान प्रतिदिन के हिसाब से ट्रेनिंग आयोजित करने पर खर्च किए जाते हैं. उत्तर प्रदेश में साल 2014-15 में इस तरह की ट्रेनिंग सिर्फ कागजों में निबटा दी गई और कोई भी किसान ट्रेनिंग योजना का फायदा नहीं ले पाया.

इस के अलावा किसान समूहों के गठन व उन के प्रशिक्षण पर प्रति विकास खंड 75 किसानों के लिए 10-15 किसानों के समूह पर 5 हजार रुपए प्रति समूह खर्च किए जाने थे, लेकिन इन योजनाओं पर भी विभाग के भ्रष्ट अधिकारियों के गोलमाल के चलते पानी फिर गया.

इस तरह से करोड़ों रुपए सिर्फ ट्रेनिंग के नाम पर कागजों में खर्च कर दिए जाते हैं, लेकिन किसान इस का फायदा नहीं ले पाते हैं. उत्तर प्रदेश में हर विकास खंड में किसानों के प्रशिक्षण के लिए 3-3 फार्म स्कूलों का गठन किया गया है, जिन में किसानों को प्रशिक्षण देने का काम किया जाता है. और इन स्कूलों पर हर साल प्रति स्कूल 24414 रुपए खर्च किए जाते हैं, लेकिन ये स्कूल कागजों में ही चलाए जा रहे हैं. जिन गांवों में इन स्कूलों का संचालन किया जा रहा है, उन गांवों के किसानों को  नहीं पता है कि उन के गांव में किसी तरह का फार्म स्कूल चलाया जाता है. इस के अलावा जिला स्तर पर रबी और खरीफ के मौसम में किसानों और वैज्ञानिकों के साथ बातचीत करने के लिए 20-20 हजार रुपए खर्च करने होते हैं, लेकिन ये सभी योजनाएं सिर्फ दिखावा बन कर रह गई हैं.

किसानों के दौरे : किसानों के ज्ञान व विकास के लिए उन्हें दूसरे राज्यों के साथ राज्य के अंदर व जिले के अंदर विश्वविद्यालयों, कृषि संस्थानों व प्रगतिशील किसानों के यहां दौरे कराए जाने की व्यवस्था है. ये दौरे निजी संस्थाओं व एनजीओ द्वारा आयोजित किए जाते हैं, जिन में किसानों के लिए आनेजाने की फ्री व्यवस्था के साथसाथ रहने, खाने व खेती से संबंधित परचों की भी फ्री व्यवस्था की जानी होती है. लेकिन ये दौरे सिर्फ कागजों तक सिमटे हैं. किसानों का आरोप रहता है कि उन्हें तय समय सीमा तक न ही दौरे कराए  गए और न ही उन के खानेपीने वगैरह की व्यवस्था की गई.

हाल ही में 19 मार्च से 21 मार्च 2016 तक नई दिल्ली में पूसा द्वारा किसान मेले का आयोजन किया गया था, जिस में तमाम राज्यों से सैकड़ों किसानों को भेजा गया. बस्ती जिले से कृषि विभाग द्वारा एनजीओ के माध्यम से किसानों को इस 3 दिनों के मेले में भेजा गया था, लेकिन उन्हें दिन में ही दिल्ली से वापस लौटा लाया गया. इस टीम का हिस्सा रहे प्रगतिशील किसान राममूर्ति मिश्र का कहना है कि जिस संस्था द्वारा उन्हें दौरे पर ले जाया गया था, न ही उस के द्वारा सही भोजन दिया गया और न ही उन के ठहरने का सही इंतजाम किया गया. इस के अलावा 3 दिनों के इस टूर को केवल 1 दिन में निबटा दिया गया.

1 किसान पर राज्य के बाहर 7 दिनों की यात्रा के लिए प्रति दिन 800 रुपए, राज्य के भीतर प्रति दिन 400 रुपए और जनपद के भीतर प्रति दिन 300 रुपए खर्च किए जाते हैं, लेकिन भ्रष्ट अधिकारियों के चलते ये रुपए भी कम पड़ जाते हैं. अगर किसानों को सही से ट्रेनिंग दी जाए तो वे बदहाली से बचेंगे भी और उत्पादन में बढ़ोतरी भी होगी.

एनजीओ और महकमे की मिलीभगत से योजनाओं में हो रहा गोलमाल : कृषि महकमे द्वारा किसानों को ट्रेनिंग देने के लिए एनजीओ और गैर सरकारी संस्थाओं की मदद ली जाती है, जिन का काम किसानों को विशेषज्ञों के जरीए फसल सुरक्षा, जोखिम से बचाव व कृषि तकनीकी में माहिर करना होता है, लेकिन अधिकारियों के साथ मिल कर ये संस्थाएं सरकारी पैसों को डकार जाती हैं.

नेशनल मिशन औन औयल एंड औयल पौम योजना के तहत किसानों को प्रशिक्षण देने के लिए 2014-15 में 30 किसानों के समूहों को 2 दिनों का प्रशिक्षण दिया जाना था, जिस पर प्रति प्रशिक्षण 24000 रुपए खर्च किए जाने थे. इसी प्रकार कृषि महकमे से जुड़े प्रसार अधिकारियों के लिए 2 दिनों के प्रशिक्षण पर 3600 रुपए खर्च किए जाने थे, वहीं आईपीएम प्रदर्शन व प्रशिक्षण पर 10 हेक्टेयर पर 26500 रुपए तय किए गए थे. लेकिन अधिकारियों व संस्थाओं की मिलीभगत से किसानों को इस का फायदा नहीं मिल पाया.

किसान राधेश्याम चौधरी का कहना है कि कृषि महकमा किसानों से जुड़ी ट्रेनिंग की योजनाओं का लाभ किस किसान को देता है, इस का पता ही नहीं चल पाता है. उन्हें व उन के गांव के किसी भी किसान को कृषि महकमे की किसी भी ट्रेनिंग में आज तक शामिल होने का मौका नहीं मिल पाया.

कृषि महकमे के माध्यम से ही बीज ग्राम योजना, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन वगैरह के प्रशिक्षण की जिम्मेदारी भी सौंपी गई है. इन्हीं योजनाओं से जुड़े एक गोलमाल का मामला बस्ती जिले में देखने को मिला जब 2015-16 में आत्मा योजना के तहत विकास खंड स्तर पर कृषि मेलों व कृषि निवेश गोष्ठी का आयोजन कर किसानों को प्रशिक्षित किया जाना था. इन दोनों कार्यक्रमों के लिए 75000 व 15000 रुपयों की व्यवस्था की गई थी, लेकिन इस में लगाए गए एनजीओ ने कृषि महकमे के अधिकारियों के साथ मिल कर एक ही जगह पर 15000 के बजट वाले कार्यक्रम में ही 75000 के कार्यक्रम का बैनर लगा कर कार्यक्रम निबटा दिया, जिस का फायदा किसानों को नहीं मिल पाया. इस के चलते कृषि विभाग और उस से जुड़े एनजीओ द्वारा एक ही मद में करीब 10 लाख

50 हजार रुपए का गोलमाल कर लिया गया.

इन्हीं संस्थाओं के द्वारा उद्यान, पशुपालन व गन्ना विभाग वगैरह से जुड़े प्रशिक्षणों का आयोजन भी किया जाना होता है, जो सिर्फ कागजी खानापूर्ति तक ही सिमटा हुआ है.

बच्चों को बैठा कर निबटा दी जाती है ट्रेनिंग : किसानों की ट्रेनिंग के लिए आयोजित होने वाले किसान मेलों व कृषि गोष्ठियों का यह हाल है कि इस से जुड़े अधिकारी व एनजीओ से जुड़े लोग छोटेछोटे स्कूली बच्चों को बैठा कर ट्रेनिंग का काम निबटा देते हैं. बस्ती जिले में इस तरह से तमाम ट्रेनिगों में कृषि से हट कर दूसरे लोगों को बैठा कर ट्रेनिंग का काम निबटा दिया गया. जब इस मसले पर कृषि से जुड़े अधिकारियों से बात करने की कोशिश की गई तो सभी अधिकारी अपना पल्ला झाड़ते नजर आए और कोई भी अधिकारी इस पर कुछ बोलने को तैयार नहीं हुआ.

धराशाई हुईं प्रचारप्रसार योजनाएं : कृषि महकमे की सारी योजनाओं के प्रचारप्रसार के लिए प्रसार शिक्षा एवं प्रशिक्षण ब्यूरो बनाए गए हैं, जिन का काम किसानों को ट्रेनिंग देने के साथसाथ उन की योजनाओं का प्रचारप्रसार भी करना होता है. ये इलेक्ट्रानिक व प्रिंट मीडिया के साथसाथ खेती की पत्रिका छापने में अपनी खास भूमिका निभाते हैं. लेकिन इन की पहुंच किसानों तक न हो कर मात्र कुछ जगहों तक ही सिमट कर रह गई है. इन के द्वारा छापी जाने वाली पुस्तकों, परचों, फोल्डरों, चार्टों, कैलेंडरों व पत्रिकाओं में कृषि से जुड़े इतने कठिन शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है, जिन्हें समझना किसानों के बस की बात नहीं है.

किसान गिरीशचंद्र शुक्ल का कहना है कि कृषि महकमे द्वारा टे्रनिंग के तमाम आयोजन जिला स्तर पर निबटा दिए जाते हैं और उन में कुछ गिनेचुने किसान ही शामिल किए जाते हैं. प्रचारप्रसार के अभाव में इन का फायदा छोटे किसानों को नहीं मिल पाता है. इसलिए सरकार को चाहिए कि जितने भी ट्रेनिंग प्रोग्राम आयोजित किए जाएं वे ब्लाक स्तर से  ले कर न्याय पंचायत स्तर पर आयोजित हों और उन में छोटे किसानों को भी शामिल होने का मौका मिले, क्योंकि छोटे किसानों को इन की ज्यादा जरूरत होती है. अकसर जानकारी की कमी के कारण नुकसान के चलते छोटे किसान टूट जाते हैं और आत्महत्या करने पर मजबूर होते हैं.

प्रशिक्षण योजनाओं के आयोजन से पहले  इन के प्रचारप्रसार के लिए प्रचार शिक्षा एवं प्रसारण ब्यूरो के माध्यम से जिला स्तर पर काफी पैसा दिया जाता है, जिस के द्वारा इलैक्ट्रानिक व प्रिंट मीडिया में विज्ञापन व खबरों के माध्यम से भी इस का प्रचारप्रसार किया जाना जरूरी होता है. इस के अलावा दीवार लेखन, होर्डिंग वगैरह माध्यमों से प्रचारप्रसार को गांव स्तर पर किया जाना जरूरी किया गया है, लेकिन ये सभी आदेश सिर्फ आदेश बन कर ही रह गए हैं.

नाकाम साबित हो रही हैं किसानों के लिए की जाने वाली बहालियां : किसानों को फील्ड लेवल पर ट्रेनिंग देने के लिए तकनीकी सहायकों की तैनाती की गई है, जो किसानों की समस्याओं का उन के गांव स्तर पर हल करने के लिए लगाए गए हैं. ये ऐसे लोग हैं, जो तकनीकी रूप से किसानों को गांव में टे्रनिंग मुहैया कराते हैं. लेकिन इन तकनीकी सहायकों का लाभ किसानों को नहीं मिल पाता है, क्योंकि ये लोग गांव में जाते ही नहीं हैं, बल्कि जिला मुख्यालयों पर ही अधिकारियों के आगेपीछे लगे रहते हैं.

किसान बृजेश शुक्ल का कहना है कि उन के गांव के लिए किस व्यक्ति को तकनीकी सहायक के रूप में रखा गया है, उन्हें आज तक नहीं पता चल पाया, न ही कभी तकनीकी सहायकों द्वारा उन के गांव में खेतीकिसानी को ले कर कोई ट्रेनिंग आयोजित की गई, जबकि इन बहालियों पर सरकार द्वारा करोड़ों रुपए खर्च कर दिए जाते हैं.

इस के अलावा कृषि महकमे में अलग से प्रशिक्षण देने के लिए लोगों की भर्ती भी की जाती है, जो जिलों में होने वाली ट्रेनिंग देने की जिम्मेदारियां निभाते हैं, लेकिन जिलों की ट्रेनिंगें भी सिर्फ कागजों में निबटा दी जा रही हैं.

नहीं मिल पाता किसानों को योजनाओं का लाभ : किसान अश्वनी शुक्ल का कहना है कि सरकार द्वारा किसानों के लिए जितनी भी ट्रेनिंग की योजनाएं चलाई जा रही हैं, अगर उन का इस्तेमाल सही तरीके से किया जाए तो न ही किसान की फसल जोखिम का शिकार होगी और न ही किसानों को खेती से नुकसान उठाना पड़ेगा. लेकिन जितनी भी ट्रेनिंग की योजनाएं सरकारों द्वारा चलाई जा रही हैं, वे सिर्फ कुछ किसानों को ही पता चल पाती हैं. ये वे किसान होते हैं, जो विभाग की सभी अनुदान योजनाओं का लाभ लेते हैं और आधा कमीशन कृषि महकमे के अधिकारियों को सौंप देते हैं. छोटी जोत के किसान को ऐसी ट्रेनिंग नहीं मिल पाती है.

किसानों के लिए केंद्र व राज्य सरकारों के मिलेजुले प्रयास से कृषि से जुड़ी इतनी योजनाएं चलाई जा रही हैं कि उन की गिनती कर पाना मुमकिन नहीं है. ऐसे में एक योजना की ट्रेनिंग में कई योजनाओं के बजट को खारिज करने के उद्देश्य से बैनर बनवा कर लगा दिए जाते हैं और एक ही कार्यक्रम के फोटोग्राफ का उपयोग कर इन ट्रेनिंग योजनाओं को कागजों में ही निबटा दिया जाता है. कुछ इसी तरह के एक गोलमाल का खुलासा बस्ती जिले के कप्तानगंज के लहिलवारा गांव में हुआ था, जिस में किसानों की एक योजना में गांव के किसानों की फर्जी लिस्ट लगा कर लाखों रुपए का गोलमाल कर लिया गया था. आरटीआई से हुए इस खुलासे में किसानों ने खूब हल्ला मचाया, लेकिन बड़े अधिकारियों ने मामूली कार्यवाही कर के अपना पल्ला झाड़ लिया था.

राज्य स्तरीय ट्रेनिंग संस्थाएं साबित हो रहीं बेकार : राज्यों में किसानों को खेतीकिसानी से जुड़े मुद्दों पर ट्रेनिंग देने के लिए राज्य कृषि प्रबंधन संस्थान की स्थापना की गई है, जिस का काम किसानों को नई कृषि तकनीकी का प्रशिक्षण देने के साथसाथ खेती से जुड़ी हर जानकारी मुहैया कराना होता है. इस के लिए केंद्र व राज्य दोनों स्तर से पैसा दिया जाता है. उत्तर प्रदेश में साल 2015-16 में राज्य कृषि प्रबंधन संस्थान रहमान खेड़ा द्वारा बस्ती जिले के 1-2 किसानों को साल में 1 बार ही प्रशिक्षण दिया गया, जबकि इस के लिए उस संस्था को करोड़ों रुपए की मदद दी गई.

अगर किसानों को खेतीकिसानी, पशुपालन, उद्यान वगैरह से जुड़ी ट्रेनिंगों को सही तरीके से दिया जाए, तो वे जानकारी का फायदा उठा कर न सिर्फ अपनी स्थिति को ठीक कर सकेंगे, बल्कि देश के विकास में भी बढ़चढ़ कर हिस्सा ले सकेंगे. किसानों को खेतीकिसानी से जुड़े जितने भी नुकसान होते हैं, वे मात्र जानकारी न होने की वजह से होते हैं. ऐसे में अगर कृषि महकमा किसानों के लिए चलाई जा रही योजनाओं में पैसे की चोरी व गोलमाल करना छोड़ दे तो देश के किसानों की हालत सुधर सकती है.

ऑनलाइन ट्रांजैक्शंस पर हैकर्स की नजर

500 और 1000 रुपये के नोट बंद होने के बाद ऑनलाइन ट्रांजैक्शंस में बढ़ोतरी हुई है. पिछले कुछ समय से देश में ऑनलाइन शॉपिंग करने वालों की संख्या भी बढ़ी है. फ्लिपकार्ट और ऐमजॉन जैसे बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियों ने सेल के जो आंकड़े दिए हैं, वे बताते हैं कि ऑनलाइन शॉपिंग भारत में हिट हो रही है. शॉपिंग के अलावा ऑनलाइन बैंकिंग और बिल पेमेंट जैसे कई काम किए जाते हैं. इससे सुविधा तो होती है, मगर हैकर्स का खतरा भी बना रहता है. पिछले दिनों एसबीआई, यस बैंक, एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक और ऐक्सिस बैंक जैसे बड़े बैंक भी हैकिंग से प्रभावित हो गए.

हैकर्स से बचना है तो यह पता होना चाहिए कि वे आपका पैसा चुराते किस तरह से हैं. अगर आपको उनके तौर-तरीकों का पता होगा तो आप सावधान रह सकते हैं. जानें, किन 6 ट्रिक्स से वे फर्जीवाड़ा करते हैं:

1. फार्मिंग ( Pharming)

इस तकनीक के तहत धोखाधड़ी करने वाले आपको नकली वेबसाइट पर ले जाते हैं, जो देखने में एकदम असली लगेगी. जैसे ही आप ट्रांजैक्शन करने के लिए अपन नेटबैंकिंग या कार्ड की डीटेल्स डालेंगे, उसे हैकर्स चुरा लेंगे और बाद में मिसयूज करेंगे.

2. कीस्ट्रोक लॉगिंग ( Keystroke logging)

आप गलती से कोई सॉफ्टवेयर डाउनलोड कर लेते हैं, जो चुपके से आपकी जानकारियां (नेटबैंकिंग के पासवर्ड और कार्ड की डीलेट्स आदि) हैकर्स को भेजता रहता है.

3. मैलवेयर ( Malware)

हैकर्स ऐसा सॉफ्टवेयर तैयार करते हैं जो एटीएम या बैंक सर्वर्स के कंप्यूटर सिस्टम को डैमेज कर देते हैं. इससे वे गोपनीय जानकारियां हासिल कर लेते हैं.

4. फिशिंग और विशिंग (Phishing & vishing)

फिशिंग में स्पैम मेल के जरिए बेवकूफ बनाया जाता है. आपको लगेगा कि ईमेल असली सोर्स से आई है, मगर वह हैकर्स द्वारा भेजी गई होती है. इसी तरह से मोबाइल फोन के मेसेज या SMS के जरिए ऐसा करने को Vishing कहा जाता है. इस तरीके से आपको बातों में फंसाकर आपका पासवर्ड, पिन या अकाउंट नंबर हासिल कर लिया जाता है.

5. सिम बदलना (SIM swipe fraud)

इस तरीके से धोखाधड़ी करने वाले लोग आपके फर्डी आईडी प्रूफ की मदद से आपके मोबाइल ऑपरेटर से ड्यूप्लिकेट सिम कार्ड हासिल कर लेते हैं. ऑपरेटर आपके असली सिम को डीऐक्टिवेट कर देता है और ठग आपके नंबर पर वन टाइम पासवर्ड (OTP) जेनरेट करके भारी-भरकम ऑनलाइन ट्रांजैक्शंस कर लेता है.

6. अनसेफ ऐप्स (Unsafe apps)

जेनुइन ऐप स्टोर्स के अलावा किसी वेबसाइट वगैरह से ऐप डाउनलोड करना खतरनाक होता है. ऐसे ऐप्स भी कई बार डाउनलोड हो जाते हैं, जो आपके फोन से पासवर्ड वगैरह चुराकर हैकर्स को भेज देते हैं. इन डीटेल्स की मदद से वे गलत ट्रांजैक्शंस को अंजाम दे देते हैं.

टीम में सिर्फ चार खिलाड़ियों की जगह पक्की

दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ दूसरे टेस्ट में शर्मनाक हार के बाद ऑस्ट्रेलियाई कोच डेरेन लेहमन बेहद नाराज हैं. उनकी नाराजगी का आलम ये है कि आज उन्होंने सबके सामने ये तक कह दिया कि टीम में सिर्फ चार खिलाड़ी ऐसे हैं जिनकी जगह पक्की है, बाकी सब पर कभी भी गाज गिर सकती है.

गौरतलब है कि पहले टेस्ट मैच में हार के बाद दूसरे टेस्ट मैच में भी कंगारुओं ने अपने ही घर में हारकर (पारी और 80 रन से हार) सीरीज गंवा दी. दूसरे टेस्ट के अंत में ऑस्ट्रेलिया ने 20 ओवर में महज 32 रन के अंदर 8 विकेट गंवा दिए जो हार का बड़ा कारण बना. इस हार से निराश और नाराज कोच डेरेन लेहमन आज भड़के हुए नजर आए और उन्होंने सबके सामने अपनी बात रख दी.

लेहमन ने साफ तौर पर कहा कि ऑस्ट्रेलियाई टीम में सिर्फ चार खिलाड़ियों की जगह पक्की है. ये खिलाड़ी हैं स्टीवन स्मिथ, डेविड वॉर्नर, मिशेल स्टार्क और जोश हेजलवुड. इनके अलावा बाकी सभी खिलाड़ियों को कभी भी टीम से बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है. लेहमन ने सभी खिलाड़ियों को ऑस्ट्रेलिया के घरेलू शील्ड टूर्नामेंट में खेलने की नसीहत दी है जहां से वो अपना रास्ता बनाए व खुद को बेहतर भी बनाएं.

कपास से खिले हेमाराम

राजस्थान सूबे के जोधपुर जिले के खारियामीठापुर गांव के 60 साला किसान हेमाराम के पास 20 बीघे जमीन है. हेमाराम वैसे तो पढ़ेलिखे नहीं हैं, लेकिन खेती का काम बहुत लगन व मेहनत से करते हैं. वे नई तकनीक व नवाचारों में आगे रहते हैं. खेती में सौंफ, मिर्ची, धनिया, मेथी, कपास और रिजका की बोआई करते हैं. उन्हें खरीफ में कपास की खेती में नवाचारों से अधिक लाभ मिला है. वे आजकल बीटी कपास बोते हैं, इस में लट कीट का प्रकोप नहीं होता है. उन्होंने कपास की सहभागी परियोजना से संपर्क कर के कपास की नई किस्म बायर सरपास 7007 की बोआई मई महीने में की. वे हर साल 6-7 बीघे में कपास की बोआई करते हैं. जमीन में पीएच बढ़ रहा है, खारच की वजह से छोटी उम्र में पौधे ज्यादा मरते हैं, इसलिए सब से पहले बोआई में नवाचार किए और डोलियां बना कर डोलियों पर बीज की बोआई की जिस से खारे पानी से छोटे पौधों पर असर कम  हो व पौधे कम से कम मरें. जहां कहीं पौधे मर गए वहां उसी उम्र के पौलीथीन थैलियों में उगाए पौधे लगा कर पौधों की संख्या बराबर रखी.

वे गरमियों में ट्रैक्टर से खेत की तैयारी कर देते हैं. बोआई से पहले गोबर की खाद देते हैं. वे घर पर ही 6-7 पशु रखते हैं. उन से प्रति दिन 20 लीटर दूध सुबह और 20 लीटर दूध शाम को मिल जाता है. पशुओं से मिले गोबर की खाद डालने से फसलें अच्छी होती हैं. बोआई के समय डीएपी और यूरिया खाद डालते हैं और बाद में यूरिया पहली सिंचाई पर और फिर कलियां बनते समय देते हैं. इस प्रकार कुल उर्वरक 75 किलोग्राम नाइट्रोजन और 35 किलोग्राम फास्फोरस देते हैं.

कपास की खड़ी फसल पर सफेद मक्खी और हरातेला कीट (रस चूसक कीट) का प्रकोप बहुत होता है. रोकथाम के लिए कोन्फिडोर का छिड़काव करते हैं. हेमाराम ने कीट नियंत्रण में भी नवाचार किए. कपास की पत्तियों पर 2 से अधिक हरातेला कीट या 6 से 8 सफेद मक्खी दिखने पर छिड़काव किया. ज्यादातर किसान अंधाधुंध छिड़काव करते हैं जिस से खर्चा अधिक होता है और कीटों की रोकथाम सही नहीं होती. दूसरे छिड़काव में टेमरान गोल्ड कीटनाशी के इस्तेमाल से फसल स्वस्थ रही. फसल पर फूल आते समय इफको के एनपीके 19:19:19 घुलनशील उर्वरक के 1 फीसदी घोल (यानी 15 लीटर पानी में 150 ग्राम उर्वरक) का छिड़काव किया और प्लानोफिक्स 4 मिलीलीटर प्रति 15 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव किया. इस से फल गिरने की शिकायत बिलकुल नहीं रही और फसल पर अधिक फूल और डोडे खिले. संतुलित उर्वरक से सूखने की बीमारी भी नहीं लगी. कपास खिलने पर चुगाई में खास ध्यान दिया और कपास को मिलावट से बचाया. उन्हें 42 क्विंटल प्रति हेक्टेयर कपास का उत्पादन मिला, जो एक रिकार्ड है. जोधपुर जिले में कपास का अधिक उत्पादन लेने वाले हेमाराम को भारतीय वस्त्र उद्योग परिसंघ और कपास विकास एवं अनुसंधान संगठन द्वारा नागोर जिले के सोथला गांव में विशाल किसान मेले में नकद राशि व प्रशस्तिपत्र दे कर सम्मानित किया गया. हेमाराम पिछले 40 सालों से कपास की खेती करते हैं. वे उन्नत तकनीक के लिए तमाम गोष्ठियों और मेलों में भाग लेते हैं. उन्हें प्रति हेक्टेयर 70 हजार रुपए से ज्यादा शुद्ध लाभ कपास की खेती में नवाचारों से मिला है. हेमाराम बताते हैं कि उन्हें उन्नत तकनीक से पैदावार बढ़ाने की प्रेरणा कृषि वैज्ञानिकों से मिली है. वे पढ़ेलिखे नहीं है, लेकिन खेती का तजरबा हासिल कर के किसानों को लाभ देते रहे हैं.

अधिक जानकारी के लिए किसान हेमाराम के फोन नंबर 9983119750 और लेखक के फोन नंबर 9414921262 पर संपर्क कर सकते हैं.

रबी दलहनी फसलों में संतुलित पोषक तत्त्व प्रबंधन

चना, मटर, मसूर और राजमा रबी सीजन की प्रमुख दलहनी फसलें?हैं और देश के अलगअलग हिस्सों में पैदा की जाती?हैं. देश में कुल पैदा होने वाली दलहन में करीब 64 फीसदी रबी की फसलें होती हैं. विश्व दलहन उत्पादन के करीब 36 फीसदी रकबे के साथ भारत दुनिया का सब से बड़ा दलहन उत्पादक देश है, मगर अफसोस कि फिर भी हमें दलहनी फसलों को भारी मात्रा में विदेशों से आयात करना पड़ रहा है. एक अनुमान के मुताबिक हमारी जरूरत का करीब 70 फीसदी चना आयात करने के बाद मिल पाता है.

दलहनी फसलों का खास महत्त्व इन के पोषण मूल्य को ले कर है. ये फसलें जड़ों में गांठों के पाए जाने की वजह से वायुमंडल की 78 फीसदी नाइट्रोजन को खेतों में इकट्ठा करने का काम करती हैं. दूसरी ओर ये शाकाहारी लोगों के लिए प्रोटीन का बड़ा जरीया हैं. विश्व खाद्य एवं कृषि संगठन और विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक एक शाकाहारी वयस्क व्यक्ति को प्रतिदिन 104 ग्राम दलहन अपनी प्रोटीन जरूरत के लिए चाहिए, मगर आर्थिक समीक्षा 2012-13 के मुताबिक 104 ग्राम के मुकाबले यह केवल 39.4 ग्राम ही मिल रहा है.

पैदावार बढ़ाने के लिए किसानों को रबी दलहनी फसलों के लिए सही प्रबंधन करना चाहिए, इस प्रबंधन में सब से जरूरी है संतुलित उर्वरकों का इस्तेमाल. संतुलित उर्वरकों से न केवल पैदावार बढ़ाई जा सकती?है, बल्कि खेती की लागत भी घटाई जा सकती है.

संतुलित उर्वरक : फसल की जरूरत या मिट्टी की जरूरत के हिसाब से पोषक तत्त्वों का सही अनुपात संतुलित उर्वरक कहलाता है. वास्तव में संतुलित उर्वरकों की पूर्ति मिट्टी की जांच के बाद जरूरत के मुताबिक इस्तेमाल करने पर हो सकती?है.

संतुलित पोषक तत्त्व प्रबंधन

संतुलित पोषक तत्त्व प्रबंधन की बात की जाए, तो मिट्टी की सेहत को बनाए रखने और भरपूर पैदावार के लिए सभी पोषक तत्त्वों के स्रोतों जैसे रासायनिक उर्वरकों और खादों (हरी खाद, कंपोस्ट, गोबर की खाद व जैव उर्वरक वगैरह) का सही इस्तेमाल होना चाहिए.

कार्बनिक खाद : कार्बनिक खादों में गोबर की खाद, वर्मी कंपोस्ट, नैडप कंपोस्ट, बायोगैस स्लरी, मुरगी की बीट, तिलहन

फसलों की खलियां, शुगरमिल की प्रेसमड आदि शामिल होती हैं. अलगअलग फसलों में इन का इस्तेमाल कर के रासायनिक उर्वरकों की मात्रा कम की जा सकती है. इस के अलावा

इन खादों के इस्तेमाल से हम मिट्टी की

जीवांश कार्बन और फास्फोरस की मात्रा को बढ़ा सकते?हैं.

गोबर की खाद का रासायनिक उर्वरकों के साथ इस्तेमाल करने से मिट्टी का गठन, पानी सोखने की कूवत, बनावट और हवा संचार कूवत में सुधार होता?है. इस से मिट्टी में सूक्ष्म जीवाणुओं की क्रियाशीलता बढ़ती है.

हरी खाद : इस में खासतौर से लोबिया, सनई, ढैंचा, जंगली नील व करंज वगैरह की पत्तियां शामिल होती हैं. हरी खाद का इस्तेमाल करने से नाइट्रोजन की मात्रा में 30 फीसदी की कमी की जा सकती है. यह मिट्टी में मौजूद पोषक तत्त्वों के भंडार को गतिशील बनाती है. इस से मिट्टी में रहने वाले सूक्ष्म जीवों के लिए मुनासिब माहौल बनता है, जिस से दलहनी फसलों की गांठों द्वारा मिट्टी में नाइट्रोजन फिक्स करने में मदद मिलती है.

फसल अवशेष : इस में धान, गेहूं,?ज्वार, बाजरा, मक्का, अरहर, चना व अन्य दलहनी फसलों और गन्ना के अवशेष (ठूंठ और पत्तियां) शामिल होते हैं. मिट्टी में फसल के अवशेष को मिलाने से मिट्टी की उत्पादकता, पोषक तत्त्वों की आपूर्ति, सूक्ष्म जीव और एंजाइम की गतिविधियां बढ़ती हैं. इस से मिट्टी की भौतिक बनावट, नाइट्रोजन इस्तेमाल की कूवत और सूक्ष्म पोषक तत्त्वों के इस्तेमाल में सुधार होता है.

जैव उर्वरकों का इस्तेमाल : दलहन से संबंधित 2 प्रकार के जैव उर्वरक होते हैं. पहला अलगअलग दलहनी फसलों के लिए खास राइजोबियम कल्चर, जो कि दलहनी फसलों की जड़ों की गांठों में नाइट्रोजन बढ़ाने में मदद करता?है. दूसरा फास्फोरस साल्बुलाइजिंग बैक्टीरिया (पीएसबी कल्चर), जो मिट्टी में न घुलने वाली फास्फोरस को घुलने लायक रूप में मुहैया कराता है.

ध्यान देने वाली बात है कि जैव उर्वरकों

के इस्तेमाल से 15-25 फीसदी तक फसल की बढ़ोतरी होती है, करीब 10-30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर नाट्रोजन की बचत हो जाती?है और 20-30 फीसदी प्रति हेक्टेयर फास्फेट मिल जाती है.

रासायनिक उर्वरकों का सही इस्तेमाल : इस के तहत मिट्टी की जांच के बाद मिली हिदायत के मुताबिक किन उर्वरकों को कितनी मात्रा में, किस प्रकार से, किस जरीए से और किस समय इस्तेमाल करना होगा जैसी बातों का ध्यान रखना चाहिए. हालांकि मात्र रासायनिक उर्वरकों से फसलों की सभी तत्त्वों की जरूरतों को पूरा नहीं कर सकते हैं. यही वजह है कि कार्बनिक खाद, हरी खाद, फसल अवशेष व जैव उर्वरकों वगैरह का भी इस्तेमाल किया जाता है.

उर्वरकों व खादों वगैरह

का इस्तेमाल

* कार्बनिक खादों, हरी खादों और फसल अवशेषों को बोआई से 1 या डेढ़ महीने पहले खेत की तैयारी के समय इस्तेमाल करना चाहिए.

* सभी प्रकार के रासायनिक उर्वरकों और कार्बनिक खादों का इस्तेमाल मिट्टी की जांच की रिपोर्ट के मुताबिक ही करना चाहिए.

* बीज उपचार के लिए 200 ग्राम जैव उर्वरक (खास दलहन फसल के लिए राइजोबियम कल्चर और पीएसबी कल्चर) का आधा लीटर पानी में घोल बनाएं. घोल को 10 किलोग्राम बीजों के ढेर पर धीरेधीरे डाल कर हाथों से मिलाएं, ताकि जैव उर्वरक अच्छी तरह से बीजों पर चिपक जाए. इस के बाद उपचारित बीजों को छाया में सुखा कर तुरंत बोआई करें.

* मिट्टी के उपचार के लिए जैव उर्वरक के 10 पैकेटों की प्रति एकड़ के हिसाब से जरूरत पड़ती है. जैव उर्वरक के 10 पैकेटों को 25 किलोग्राम मिट्टी या 25 किलोग्राम कंपोस्ट में अच्छी तरह मिलाएं. इस तरह तैयार मिश्रण को बोआई के समय या 24 घंटे पहले 1 एकड़ रकबे में समान रूप से छिड़कें.

* बीजों की मात्रा घटने या बढ़ने की हालत में जैव उर्वरकों को उसी के मुताबिक घटा या बढ़ा लेना चाहिए.

* खेत में जैव उर्वरकों का इस्तेमाल सुबह या शाम के वक्त करें.

कुछ और खास बातें

* दलहनी फसलों में फास्फोरस की पूर्ति के लिए डीएपी का बारबार इस्तेमाल न करें. अच्छा होगा कि फास्फोरस की पूर्ति सिंगल सुपर फास्फेट यानी एसएसपी के जरीए करें.

* दलहनी फसलों में सल्फर, जिंक और मोलीबिडनम की भूमिका बहुत अहम होती है, इसलिए इन का इस्तेमाल कृषि वैज्ञानिकों से सलाह ले कर करना चाहिए.

* चने में असिंचित या देर से बोआई की दशा में 2 फीसदी यूरिया के घोल का पर्णीय छिड़काव करना चाहिए.

* बची हुई यूरिया की टापड्रेसिंग बोआई के 25-30 दिनों के बाद करनी चाहिए.

* सल्फर की कमी की दशा में 2-3 फीसदी घुलनशील सल्फर का पर्णीय छिड़काव करना चाहिए. इस से एक ओर जहां सल्फर की पूर्ति होगी, वहीं दूसरी ओर सर्दी में चूर्णिल आसिता रोग व पाले से भी बचाव हो जाएगा. ठ्ठ

मेथी की वैज्ञानिक खेती

पालक के बाद मेथी दूसरी पत्तेदार या भाजी वाली फसल है, जिस की खेती पूरे देश में की जाती है. मेथी की गिनती मसालेदार फसलों में होती है और इस का इस्तेमाल दवाएं बनाने में भी होता है. मेथी गुणों से भरपूर होती है. इसलिए इस की मांग साल भर बनी रहती है. मेथी में प्रोटीन काफी मात्रा में पाया जाता है. इस में सूक्ष्म तत्त्व भी मौजूद होते हैं. यह विटामिन सी के अलावा विटामिन के का भी अच्छा जरीया है. आयुर्वेद में मेथी का गुणगान जम कर किया जाता है. यह बात नाशक है और कफ हटाती है. गर्भवती औरतें इस का सेवन करें, तो गर्भाशय ठीक रहता है और दूध भी ठीकठाक बनता है. मेथी सर्दियों की खास फसल है. अब तो इस के तरहतरह व्यंजन भी बनने लगे हैं. मेथी के लड्डू सेहत बनाने वाले होते हैं, जो अब मिठाई की दुकानों पर भी मिलने लगे हैं. कई बीमारियों और जाड़ों में मेथी खाने की सलाह दी जाती है. आइए जानें कि कैसे मेथी की वैज्ञानिक तरीके से खेती कर के ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है.

मिट्टी और जलवायु

मेथी की खेती के लिए कम तापमान और औसत बारिश वाले इलाके सही होते हैं. यह पाले को दूसरी फसलों के मुकाबले ज्यादा बरदाश्त कर लेती है, इसलिए पंजाब, राजस्थान, दिल्ली सहित तमाम उत्तरी सूबों में इस की खेती कामयाबी से की जाती है. दक्षिण भारत में भी इसे सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है, लेकिन ज्यादा बारिश वाले इलाकों में इस की खेती नहीं की जा सकती. दक्षिण भारत में यह खरीफ की, जबकि उत्तरी भारत में रबी की फसल है.

वैसे तो मेथी की खेती सभी तरह की मिट्टियों में की जा सकती है, लेकिन चिकनी मिट्टी इस की खेती के लिए ज्यादा मुफीद होती है जिस का पीएच मान 6-7 के बीच होता है. जहां पानी के निकास के बेहतर इंतजाम होते हैं, वहां इस की पैदावार ज्यादा मिलती है.

बोआई

सितंबर से ले कर मार्च तक के महीने मेथी की बोआई के लिए ठीक रहते हैं. पहाड़ी इलाकों में इसे जुलाई से ले कर अगस्त तक बोया जा सकता है.

मेथी की खेती में इन खास बातों का हमेशा ध्यान रखना चाहिए:

* 1 हेक्टेयर के लिए औसत बीज दर 20 किलोग्राम होती है.

* अगर भाजी के लिए फसल उगाई जा रही है, तो इसे 8-10 दिनों के अंतर से बोना चाहिए, जिस से भाजी हर समय मिलती रहे. इस के लिए खेत को 8-10 हिस्सों या छोटीछोटी क्यारियों में बांट लेना चाहिए. क्यारियों की

मेंड़ पर मूली लगा कर और पैसा कमाया जा सकता है.

* अगर केवल बीज के लिए फसल

बोई जा रही है, तो बोआई नवंबर के आखिर तक कर लेनी चाहिए. इस के लिए बीज दर 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर ठीक रहती है.

* ज्यादा पैदावार लेने के लिए लाइन से लाइन की दूरी 20 से 30 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 10 सेंटीमीटर रखी जानी चाहिए.

* मेथी की बोआई छिटकवां विधि से भी की जा सकती है.

खाद और उर्वरक

मेथी अपने आप में एक खाद वाली फसल है, इसलिए इस के लिए ज्यादा खाद व उर्वरक इस्तेमाल नहीं करने पड़ते. लेग्यूमिनेसी यानी दलहनी कुल की होने के कारण यह वायुमंडल से नाइट्रोजन इकट्ठा कर लेती है. लेकिन पत्तियां और बीज ज्यादा तादाद में हासिल करने के लिए खाद व उर्वरक निम्नलिखित तादाद में देने चाहिए.

* खेत तैयार करते 150 क्विंटल गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर से डालें.

* 20 किलोग्राम फास्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश बोआई के वक्त प्रति हेक्टेयर की दर से डालें.

* मैगनीज और जिंक देने से मेथी की पैदावार बढ़ती है, लिहाजा कृषि वैज्ञानिकों से राय ले कर इन का इस्तेमाल भी करें.

* बोआई के बाद 20 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर की दर से देने पर पैदावार ज्यादा मिलती है.

सिंचाई

मेथी की अच्छी बढ़वार के लिए 4 बार सिंचाई करना ठीक रहता है. अगर खेती भाजी के लिए की जा रही है, तो हर कटाई के बाद सिंचाई करनी चाहिए. लेकिन बीज के लिए फसल ली जा रही है, तो बोआई के 1 महीने बाद और फूल बनते समय सिंचाई जरूर करनी चाहिए. फलियां भरते वक्त भी 1 सिंचाई करने से बीजों की तादाद बढ़ती है.

खरपतवारों की रोकथाम

ज्यादा पैदावार के लिए जरूरी है कि खरपतवारों को पनपने न दिया जाए. मेथी की फसल शुरुआत में धीमी गति से बढ़ती है, इसलिए इस समय में खेत से खतरपतवार निकाल देने चाहिए वरना वे मेथी के पौधों से ज्यादा बढ़ कर पैदावार घटा देते हैं. 1 महीने के बाद मेथी की फसल तेजी से बढ़ती है, इसलिए इस के बाद खरपतवार ज्यादा नहीं फैल पाते. अगर बोआई से पहले फ्लूक्लोरेलीन नाम की दवा 1 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में मिला दी जाए तो खरपतवार ज्यादा नहीं होते.

रोग और कीट

पत्ता रोग : यह बीमारी मेथी में आमतौर पर हर जगह पाई जाती है, जो सर्कोस्पोरा ट्रेवरसियान नाम की फफूंद की वजह से होती है. इस की मार से छोटेछोटे गोल भूरे रंग के धब्बे पत्ती पर बन जाते हैं. शुरुआत में ये हलके और अलगअलग दिखाई देते हैं, पर बड़े हो जाने पर बहुत से धब्बे मिल कर एक धब्बा बना लेते हैं.

इस बीमारी की रोकथाम के लिए लक्षण दिखते ही ब्लाइटाक्स 50 नाम की दवा का 0.3 फीसदी का घोल बना कर छिड़कना चाहिए. छिड़काव से पहले पत्तियों की कटाई कर के उन्हें 8-10 दिनों बाद इस्तेमाल करना ठीक रहता है.

पाउडरी सिड्यू : एरीसाइफी नाम की फफूंद से होने वाले इस रोग में पत्तियों के

ऊपर चूर्ण जैसी परत जमी दिखाई देती है. अगर वक्त रहते इसे काबू न किया जाए, तो फसल की बढ़वार रुक जाती है और दाम भी अच्छे नहीं मिलते.

इस की रोकथाम के लिए घुलने वाली गंधक का 0.2 फीसदी घोल बना कर छिड़कना कारगर साबित होता है. इस के अलावा

कैरोथेन नाम की दवा का 0.1 फीसदी वाला घोल छिड़कना चाहिए. रोग का असर कम

न हो तो दवा को 15-20 दिनों बाद फिर छिड़कना चाहिए.

डाउनी मिल्ड्यू : यह रोग भी फफूंद से फैलता है, जिस के शुरुआती लक्षण पत्तियों

की निचली परत पर दिखते हैं. इस से पौधों की बढ़वार रुक जाती है और फलियां पीली हो कर झड़ने लगती हैं.

इस की रोकथाम के लिए रिडोमिल दवा का 0.2 फीसदी का घोल छिड़कना चाहिए. अगर पहली बार में पूरा असर न दिखे तो फिर 10-15 दिनों बाद छिड़काव करना चाहिए.

जड़ गलन : मेथी में होने वाली यह बीमारी भी आम है और बेहद नुकसानदेह है, जिस में पहले पत्तियों का सूखना शुरु होता है और फिर धीरेधीरे पूरा पौधा सूख जाता है. अगर पौधा बड़ा हो गया हो तो ये लक्षण भी देर से दिखते हैं. इस से बचने के लिए बीजों को ट्राइकोडर्मा नाम की दवा से उपचारित कर के बोना चाहिए, 1 किलोग्राम बीज के लिए दवा की 4 ग्राम मात्रा ठीक रहती है. अगर मेथी हर साल उगाई जानी है, तो खेत की गरमियों में जुताई करने से भी फायदा होता है.

एफिड या माहू : मेथी में लगने वाले कीड़ों में एफिड खास है, जो अधिकतर बीज के लिए बोई गई फसल पर लगता है. एफिड छोटेछोटे कीट होते हैं, जो पत्तियों, फलियों और पौधे के दूसरे हिस्सों को कुतर कर कमजोर बना देते हैं.

एफिड से बचने के लिए डाइमेथोएट नाम की दवा 25 ईसी को 4 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़कना चाहिए.

कटाई और पैदावार

पत्ती यानी भाजी वाली फसल की पहली कटाई बोआई के 3 हफ्ते बाद की जाती है. तब तक पौधों की ऊंचाई करीब 25-30 सेंटीमीटर तक हो जाती है. हमारे देश में मेथी की कटाई के अलगअलग तरीके चलन में है. कहींकहीं पूरा पौधा ही जड़ सहित उखाड़ कर गुच्छे बना कर बेचा जाता है, तो कहींकहीं डालियों को काट कर बेचा जाता है. कसूरी मेथी की कटाई देर से की जाती है. अगर मेथी की कटाई ज्यादा की जाए तो जाहिर है कि उस का बीज कम मिलता है, इसलिए मेथी की कटाई तभी करनी चाहिए, जब बाजार में भाव अच्छा हो.

अगर 1 बार कटाई के बाद बीज लिया जाए, तो औसत पैदावार 6-8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर मिलती है और 4-5 कटाइयां की जाएं तो यही पैदावार घट कर 1 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रह जाती है. भाजी या हरी पत्तियों की पैदावार 70-80 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक मिलती है. नवंबर और मार्चअप्रैल में भाजी महंगी बिकती है, इसलिए जल्द या देर से ली जाने वाली किस्में बोई जानी चाहिए. मेथी की पत्तियों को सुखा कर गरमियों में बेचने से भी 100 रुपए प्रति किलोग्राम तक दाम मिल जाते हैं. अगर वैज्ञानिक तरीके से मेथी की खेती की जाए, तो 1 हेक्टेयर से करीब 50000 रुपए कमाए जा सकते हैं.         

मेथी की उन्नत किस्में

मेथी की आमतौर पर उगाई जाने वाली खास किस्में निम्नलिखित हैं :

कसूरी मेथी : यह किस्म भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद दिल्ली द्वारा विकसित की गई है. इस की पत्तियां छोटी और हंसिए के आकार की होती हैं. इस में 2-3 बार कटाई की जा सकती है. इस किस्म की यह खूबी है कि इस में फूल देर से आते हैं और पीले रंग के होते हैं, जिन में खास किस्म की महक भी होती है. बोआई से ले कर बीज बनने तक यह किस्म लगभग 5 महीने लेती है. इस की औसत पैदावार 65 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

लाम सिलेक्शन : दक्षिणी राज्यों में इस किस्म को बीज लेने के मकसद से उगाया जाता है. इस का पौधा औसत ऊंचाई वाला, लेकिन झाड़ीदार होता है. इस में शाखाएं ज्यादा निकलती हैं.

पूसा अर्ली बंचिंग : मेथी की इस जल्द पकने वाली किस्म को भी आईसीएआर द्वारा विकसित किया गया है. इस के फूल गुच्छों में आते हैं. इस में 2-3 बार कटाई की जा सकती है. इस की फलियां 6-8 सेंटीमीटर लंबी होती हैं. इस किस्म का बीज 4 महीने में तैयार हो जाता है.

यूएम 112 : यह मेथी की उन गिनीचुनी किस्मों में से एक है, जो सीधी बढ़ती है. इस के पौधे औसत से लंबे होते हैं. भाजी और बीज दोनों के लिहाज से यह किस्म उम्दा होती है.

कश्मीरी : मेथी की कश्मीरी किस्म की ज्यादातर खूबियां हालांकि पूसा अर्ली बंचिंग किस्म से मिलतीजुलती हैं, लेकिन यह 15 दिन देर से पकने वाली किस्म है, जो ठंड ज्यादा बरदाश्त कर लेती है. इस के फूल सफेद रंग के होते हैं और फलियों की लंबाई 6-8 सेंटीमीटर होती है. पहाड़ी इलाकों के लिए यह एक अच्छी किस्म है.

हिसार सुवर्णा : चौधरी चरणसिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार द्वारा विकसित की गई यह किस्म पत्तियों और दानों दोनों के लिए अच्छी होती है. इस की औसत उपज 16 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. सर्कोस्पोरा पर्र्ण धब्बा रोग इस में नहीं लगता है. हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के लिए यह एक बेहतर किस्म है. इन किस्मों के अलावा मेथी की उन्नतशील किस्में आरएमटी 1, आरएमटी 143 और 365, हिसार माधवी, हिसार सोनाली और प्रभा भी अच्छी उपज देती हैं.

बार बार पैसे बदलने पर लगेगा ‘बैन’

अब बैंक काउंटर पर 4,500 के नोट एक्सचेंज कराने वालों को चुनाव की तर्ज पर उंगली पर नहीं मिट सकने वाली स्याही लगाई जाएगी. इसके जरिये यह पक्का किया जाएगा कि लोग नोट एक्सचेंज कराने के लिए फिर से लाइन में ना लगें. इसका मकसद मनी लॉन्ड्रिंग रोकना और लोगों की सहूलियतें बढ़ाना है. सरकार ने जन धन खाताधारकों को भी सावधान किया है कि वे बेईमान लोगों के बहकावे में आकर उन्हें अपने एकाउंट्स के इस्तेमाल की इजाजत ना दें.

एक अधिकारी ने बताया, 'सरकार को यह बात पता चली है कि कई जगहों पर एक ही आदमी नोट बदलने के लिए कई बार लाइन में लग रहा है. हमें कुछ ऐसे लोगों के बारे में भी सूचना मिली है, जो ब्लैक मनी को व्हाइट में बदलने की कोशिश कर रहे हैं और उन्होंने ऐसे लोगों का संगठित ग्रुप बना लिया है, जिन्हें नोट बदलने के लिए एक से दूसरे ब्रांच में भेजा रहा है.'

सरकार ने करेंसी नोटों की किल्लत के कारण जरूरी सामानों की सप्लाई पर नजर रखने के लिए कैबिनेट सेक्रेटरी की अगुवाई में उच्चस्तरीय कमेटी बनाई है. दास ने बताया कि अलग-अलग एजेंसियों के अधिकारियों को मिलाकर एक टास्क फोर्स बनाया गया है, जिसका काम कुछ संवेदनशील इलाकों में नकली करेंसी के सर्कुलेशन और सिस्टम में जमा हो रही ब्लैक मनी पर नजर रखना है.

कैश के तेजी से वितरण के लिए माइक्रो एटीएम का इस्तेमाल बढ़ाने की कोशिश की जा रही है. दास ने बताया कि सरकार जन धन खाते में डिपॉजिट पर कड़ी नजर रख रही है. दरअसल, ब्लैक मनी डिपॉजिट करने के लिए कई ऐसे खातों का गलत इस्तेमाल हो रहा है.

संसद से सड़क तक संग्राम के आसार

संसद के आज से शुरू हो रहे शीतकालीन सत्र के पहले मौसम भले ही ठंडक का एहसास देने लगा हो, लेकिन संसद के अंदर खासी गरमी के आसार दिख रहे हैं. तय है कि यह संसद सत्र सत्ता और विपक्ष, दोनों के लिए बड़ी व बराबर की चुनौतियां पेश करेगा. जीएसटी की राह आसान होने की दृष्टि से पिछला सत्र सरकार के लिए जितना भी सुखद रहा हो, लेकिन यह सत्र नोटबंदी के ताप से उपजी गरमी में डूबेगा-उतराएगा, इसमें शक नहीं. यह सत्र उस वक्त शुरू हो रहा है, जब सरकार और विपक्ष, दोनों के पहले से तयशुदा एजेंडे बदल चुके हैं और यह मसला दोनों के लिए खासी चुनौती खड़ी करेगा. यानी भोपाल जेल ब्रेक कांड और एनकाउंटर से उपजे हालात, गुजरात पेट्रोलियम में कई हजार करोड़ के घोटाले और सर्जिकल स्ट्राइक के बाद विपक्ष, खासतौर से कांग्रेस के जेहन से निकले सवाल नोटों की आंच के सामने अब शायद उतना ताप नहीं दिखा पाएं.

विधायी काम के लिहाज से सबसे महत्त्वपूर्ण जीएसटी बिल है, जिस पर अब सहमति बन गई है और जिसे लोक सभा में पास कराने में सरकार को कोई दिक्कत नहीं है तथा जिसको राज्य सभा से पास कराने की अनिवार्यता भी नहीं है. बात इस बिल भर की होती तो सरकार एकदम निश्चिंत रह सकती थी पर मामला उससे भी बड़े आर्थिक फैसले, नोटबंदी का है जिस पर कांग्रेस के उप नेता आनन्द शर्मा पहले ही मतविभाजन वाले प्रावधान 267 के तहत नोटिस दे चुके हैं. सदन में दलों की जो स्थिति है, उसके हिसाब से सरकार के लिए मतविभाजन से भी कोई खतरा नहीं है, पर इससे भी ज्यादा बड़ी बात यह है कि सरकार के इस फैसले पर जिस तरह पक्ष और विपक्ष बंट गए हैं, उसमें अचानक भाजपा सांसदों का एक बड़ा वर्ग सरकार के फैसले के विरोध में वोट दे दे, इसकी कोई संभावना नहीं है.

पर भाजपा के लोग प्रधानमंत्री के इस बड़े फैसले को लेकर जितने उत्साहित हैं और इसे काला धन, भ्रष्टाचार, आतंकवाद-नक्सलवाद की फंडिंग पर प्रहार मान रहे हैं, उसमें लगता नहीं कि वे विपक्ष द्वारा किये जाने वाले विरोध से कहीं भी सहमत हो सकते हैं पर विपक्ष लोगों की परेशानियों को मुद्दा बनाकर सरकार को घेरने और अपनी एकता सुदृढ़ करने के इस अवसर को हाथ से जाने देना नहीं चाहेगा. उसकी बैठकों में जिस तरह का माहौल दिख रहा है, उसे लेकर सरकार को चिंतित होना चाहिए.

अब विपक्ष अपने विरोध से खुद को काला धन का पक्षधर बताने की हद तक तो नहीं जाएगा पर इस फैसले की हर कमी को और लोगों को हो रही बेशुमार तकलीफ को मसला बनाएगा ही. सदन का सीधा दबाव न होने से अभी सरकार ने हफ्ते भर में रोज नई स्थिति के मद्देनजर अपने फैसले में बदलाव किए हैं, लोगों की तकलीफों को देखकर कुछ कदम वापस भी लिए हैं. आखिर सरकार भी लोगों की तकलीफों से बेखबर नहीं रह सकती. और फैसला चाहे जितना बड़ा हो उसकी कई कमजोरियां पहले दिन से दिखने लगी हैं. कुछ बदलाव इनके व्यावहारिक अनुभव को देखने के बाद हुए हैं. विपक्ष इन सवालों पर और संभव है कि कुछ नए पहलू उठाते हुए सरकार को घेरने की कोशिश करेगा.

पर इससे ज्यादा बड़ा मसला विपक्षी एकजुटता का है. विपक्षी दलों की तैयारी बैठक में जिस तरह माकपा के सीताराम येचुरी और तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ’ब्रायन मिले उससे लगा ही नहीं कि बंगाल की राजनीति में अभी तक इनकी जानी दुश्मनी रही है और अब ममता बनर्जी माकपा से भी सहयोग करने को तैयार हैं. हालांकि येचुरी ने सारदा आदि घोटाले में तृमूकां पर पर उठी उंगली के बाबत थोड़ा सतर्क होकर ही सदन में साथ देने पर अड़े थे. अब तृमूकां व माकपा जैसी सहमति मायावती-मुलायम यादव और कांग्रेस और आप के बीच भी बनती दिख रही है. जाहिर है यह मामला सिर्फ  हाउस के अंदर भर का नहीं रहेगा और एक बार झिझक टूटी और दोस्ती हुई तो वह राजनीति के अन्य मोचरे पर भी जाएगी.

जीएसटी का मामला हो या नोटबंदी का सरकार बताना चाहेगी कि उसने एक आर्थिक क्रांति के द्वार बस खोल ही दिये हैं; क्योंकि इन दो फैसलों से अर्थव्यवस्था की सारी परेशानियां दूर करने के दावे किए जाते रहे हैं. विपक्ष की कोशिश होगी कि सरकार जीएसटी का सारा श्रेय अकेले न ले और नोटबंदी को आर्थिक संकट का बुलावा साबित करे. वह इसमें कितना सफल होगी; यह आने वाले दिन ही बताएंगे, पर इसमें सरकारी पक्ष इन फैसलों के गुणगान के साथ यह कोशिश भी करेगा कि विपक्ष को काले धन का पोषक बता दे.

यह नाजुक मसला है और कोई भी पक्ष जरा भी घमंड में रहा या चूक गया तो इतने बड़े फैसलों का लाभ-घाटा उसके सिर ही खुद ब खुद मढ़ दिया जाएगा. सो यह देखना दिलचस्प होगा कि अगले दो-तीन दिन में ही पक्ष और प्रतिपक्ष किस तरह की गोटियां खेलते हैं और साथ ही नोटबंदी की मुहिम भी क्या रु ख लेती है. अभी तो आम लोगों और छोटे व्यवसायियों के साथ ही शेयर बाजार, वित्तीय बाजार और अन्य क्षेत्रों से भी कोई बहुत उत्साहजनक प्रतिक्रिया नहीं आई है. सभी लाभ बता रहे हैं पर डरे हुए हैं और भविष्यवाणी करने को कोई तैयार नहीं है.

लगभग ऐसा ही संवेदनशील और पक्ष-विपक्ष को बांटने वाला मसला कश्मीर और सर्जिकल स्ट्राइक का है और तय मानिये ये मसले भी इस सत्र में कम जोर-शोर से नहीं उठेंगे. सर्जिकल स्ट्राइक के औचित्य पर तो कम सवाल उठेंगे पर उसके लाभ और पहली बार होने के दावे पर जरूर हंगामा होगा. कश्मीर भी दो महीने से जिस तरह रो-रो कर थक-सा गया है, उसकी शिकायत आक्रोश में बदली है और सरकार बातचीत की जगह बंदूक और छर्रे की जो नीति चला रही है, उस पर भी सवाल उठेंगे. कुछ और मसले हैं, जो सत्र को जीवंत बनाएंगे. एक चैनल पर रोक का फैसला और जनेवि से एक छात्र के गायब होने का सवाल भी उठेगा.

सो भले इस सत्र में महत्त्वपूर्ण विधेयकों की लाइन नहीं लगी है, न कोई बजट पेश होना है तब भी इसके काफी गरमागरम रहने के साथ पक्ष और प्रतिपक्ष की राजनीति में नई दिशा तय करने की उम्मीद की जा सकती है. पर मुश्किल यह भी है कि प्रधानमंत्री समेत शासक जमात तो प्रभावी और बड़े फैसले करने के साथ राजनैतिक लाभ लेने और चौतरफा सटीक जवाब देने के लिए जैसे पूरा चौकस दिखता है-बेलगाम, गोवा और गाजीपुर में मोदी के भाषण का यही लब्बोलुआब है-तो विपक्ष अभी शरमा-शरमा कर ही हाथ मिलाने में पूरी तरह खुलता भी नहीं दिखता है. इसी पृष्ठभूमि में संसद चल रही है.

रिश्तों में बदलाव की बहार

अमेरिका में रिपब्लिकन राष्ट्रपति के रूप में डोनाल्ड ट्रंप के चुने जाने का भले ही कुछ शहरों और राज्यों में प्रतिक्रिया स्वरूप विरोध के तात्कालिक स्वर सुने गए हैं, लेकिन इतना तय है कि अमेरिकी राजनय ही नहीं, ट्रंप की भूमिका वैश्विक व्याकरण में भी बदलाव लाने जा रही है. इसके संकेत अभी से मिलने शुरू भी हो गए हैं. वैश्विक व्याकरण के बदलाव के सकारात्मक और नकारात्मक पहलू क्या होंगे, यह तो बाद में पता चलेगा, लेकिन फिलहाल जहां पाकिस्तान थोड़ा सहमा हुआ है, वहीं भारत को उम्मीद है कि दोनों देशों के रिश्ते नई ऊंचाई छू सकेंगे. दूसरी तरफ चीन के राष्ट्रपति की अपेक्षा है कि उनके देश और अमेरिका के रिश्तों में संतुलन बना रहे, लेकिन सबसे ज्यादा रेखांकित किए जाने लायक बदलाव रूस और अमेरिका के बीच नजर आएगा, जो अबतक दो ध्रुव की तरह एक-दूसरे के विरोधी रहे हैं.

अमेरिका में चुनावों की प्रक्रिया खत्म होने के बाद पहली बार रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन और नवनिर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच फोन पर हुई बातचीत में दोनों देशों के बीच संबंध सामान्य करने को लेकर सहमति बन जाने की खबर आई है. खुद क्रेमलिन की तरफ से जानकारी दी गई है कि दोनों नेताओं ने एक निजी बैठक के प्रावधान को लेकर सहमति व्यक्त की हैं. उधर नवनिर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति के सत्ता हस्तांतरण दल ने भी वाशिंगटन में इसकी पुष्टि करते हुए कहा है कि पुतिन ने ऐतिहासिक चुनाव जीतने पर बधाई देने के लिए डोनाल्ड ट्रंप को फोन किया था. क्रेमलिन के अनुसार, पुतिन और ट्रंप ने मौजूदा समय में रूस और अमेरिका के संबंधों की अत्यंत असंतोषजनक स्थिति को रेखांकित किया और इन्हें सामान्य बनाने के लिए सक्रिय रूप से साझे तौर पर काम करने की जरूरत का एलान किया. बताया गया है कि पुतिन ने ट्रंप को उनके प्रचार अभियान के दौरान किए गए वादों को पूरा करने में सफलता मिलने की कामना की और एक-दूसरे के घरेलू मामलों में हस्तक्षेप न करने तथा समानता व आपसी सम्मान के आधार पर नए प्रशासन के साथ साझेदारी की वार्ता शुरू करने की तत्परता व्यव्यक्त की.

याद होगा कि सीरिया में रूस की बड़ी मौजूदगी और आतंकवादियों के खिलाफ उसकी कार्रवाई के तौर-तरीकों पर अमेरिका को अबतक गहरा एतराज रहा है, लेकिन अब ट्रंप और पुतिन के बीच जहां सीरिया में संकट सुलझाने के मामलों पर चर्चा हुई है, वहीं दोनों ने अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद और अतिवादी कट्टरपंथ के सबसे बड़े शत्रु यानी आईएस के साथ संघर्ष में एकजुट होने की आवश्यकता पर सहमति जताई है.

इस बीच ट्रंप की टीम ने कहा है कि दोनों नेताओं ने दोनों देशों के सामने मौजूद खतरों और चुनौतियों पर चर्चा की. साथ ही आर्थिक मामलों व अमेरिका-रूस के दौ सौ वर्ष पुराने संबधों पर दोनों राष्ट्र प्रमुखों ने न सिर्फ बात की है, बल्कि वाशिंगटन से जारी बयान के मुताबिक ट्रंप ने पुतिन से कहा है कि वे रूस और रूसी लोगों के साथ मजबूत स्थाई संबंध बनाने के इच्छुक हैं. दोनों नेताओं ने अंतरराष्ट्रीय मसलों पर मिलकर काम करने की उम्मीद जताई है. गौरतलब है कि पुतिन ने अमेरिकी चुनाव प्रचार के दौरान ट्रंप को अपना मौन समर्थन दिया था, जबकि ट्रंप ने कई बार खुलकर पुतिन के कामकाज की तारीफ की थी.

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