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आपके लिए कौन रोएगा?

धनबल, बाहुबल, जनबल के इस युग में जहां सामाजिक परिर्वतन को सिरमौर बनने की दृष्टि से देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक गिरावट के दौर में एक ऐसा व्यक्तित्व भी देखने को मिलता है, जो लोगों की आस्था का केंद्र बनता है. लोग उनके लिए न सिर्फ आंसू बहाते हैं बल्कि प्राण तक न्यौछावर करने को तत्पर रहते हैं. आखिर इस शख्स में ऐसा क्या था, जो उसके जाने के बाद लोगों को रूला गया.

हम बात कर रहे हैं समाज में आई नैतिक मूल्यों की गिरावट के उस दौर की जहां कुर्सी पाने के लिए राजनेता, भाई-भाई का कत्ल करने पर आमादा है. चुनाव जीतने में धन का बोलबाला है. राजनीतिक सत्ता हथियाने के लिए किसी भी हद तक जाने को लोग आतुर हैं. ऐसे कठिन और विपरीत समय में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता का जाना और उनके लिए समूचे तमिलनाडु की जनता का ह्दय से विलाप, कोई छोटी बात नहीं है. यह वह जनता है जिसने अम्मा का बुरा वक्त भी देखा था और तब भी उनसे नजदीकियां कम नहीं हुयी थीं. आखिर अम्मा में ऐसा क्या था जो लोग उनके दीवाने हो गए. लोग न उनके लिए आंसू बहा रहे थे बल्कि अपना प्राणोत्सर्ग करने में भी उन्हें संकोच नहीं था. जनता का दीवानापन कोई छोटी बात नहीं है. खासतौर से जब व्यक्ति राजनीति में हो. हम जानते हैं कि राजनीति की राहें बहुत रपटीली और कंटकाकीर्ण हैं. जैसा कि हम जानते हैं कि हमारा लोकतंत्र जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए बना है. इसमें व्यक्ति मतदाता होता है और उसे अपना प्रतिनिधि चुनने की स्वतंत्रता होती है. बाद में वही प्रतिनिधि उस पर हूकूमत करता है. वही सत्ताधीश होता है. ग्राम पंचायत से लोकसभा तक मतदाता अपने भाग्यविधाता का निर्वाचन करता है. देखने में आता है कि चुनाव के वक्त राजनेता गिरगिट की तरह पैंतरे बदलते हैं और मतदाता रूपी भगवान को खुश करने के अनेक यत्न करते हैं. सीट या कुर्सी प्राप्त होने पर वह अभिमानी हो जाते हैं और उसी मतदाता से उन्हें बू आने लगती है. नौकरशाह उनके शार्गिद हो जाते हैं. तब जनता उन्हें उनकी राह अगले चुनाव में दिखाती है.

वर्तमान में सामाजिक और नैतिक मूल्यों की गिरावट चहुंओर है. राजनीति भी उससे अछूती कैसे रह सकती है. अनेक राजनेताओं पर समय-समय पर दाग लगते रहे हैं और उन दागों को धोने में कई की पूरी आयु निकल जाती है. ऐसे कुछ दाग अम्मा यानि जयललिता के जीवन पर भी लगे थे. उन्होंने न्यायपालिका में भरोसा रखा, जहां से वे निर्दोष साबित हुयीं. जयललिता के खिलाफ राजनीतिक षडयंत्र भी हुए, जेल भी जाना पडा. मारने की धमकियां भी मिलीं, लेकिन जनता में उनका जलवा कायम रहा. उनके जीवन में लाख बुराइयों के बीच अनेक अच्छाइयां भी मौजूद थीं. वह मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए मिलने वाले वेतन से गरीबों के लिए दो जून की रोटी मुहैया कराने का काम करती थीं. सरकारी अस्पतालों में गरीबों का इलाज उनकी प्राथमिकता में था. गरीबों के बच्चे स्कूलों तक जाएं, यह उनकी प्रतिबद्धता थी. उनके दरवाजे पर आने वाला कोई खाली हाथ न जाए, उसे न्याय मिले, उसकी बात सुनी जाए, प्रशासन उसके घर दस्तक दे, यह जवाबदेही उनके शासन में थी. उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रहते हुए जनता जो चाहती थी वह करने का प्रयास किया. इसी कारण वह लोगों के दिलों को जीतने में सफल रहीं. अम्मा की अनुपस्थिति लोगों को आज महसूस हो रही है. परंतु वह यह मानने को तैयार नहीं है कि उनकी प्यारी अम्मा अब इस दुनिया में नहीं हैं.

जयललिता को सत्ता में रहते हुए जनता की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में निश्चित रूप से कई कठिनाईयां आई होगीं. एक तो वह क्षेत्रीय दल की नेता थीं और केंद्र में उनके दल का ज्यादा  बहुमत नहीं था. परंतु जयललिता ने लोकतंत्र के उस जनमत हथियार का इस तरह इस्तेमाल किया कि वह केंद्र में भी ताकतवर नेता के रूप में जानी जाती रहीं. केंद्र भी उनकी बात को गंभीरता से सुनने के लिए मजबूर होता था. वह तमिलनाडु की जनता के हकों के लिए ताजिंदगी लड़ती रहीं. क्या भारत में अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री या अन्य जननेता उनके अच्छे कामों से सीख लेगें और जनता का दिल जीतने का प्रयास करेगें. अगर ऐसा नहीं होता है तो उनके लिए रोने वाला कौन होगा.

ऐसा नहीं है कि जयललिता ने तमिलनाडु की सारी समस्याएं हल कर दी हों और वहां की जनता अमन चैन की सांस ले रही हो. राज्य में अभी भी समस्याएं हैं जिनका हल निकाला जाना है. तमिलनाडु की तरह भारत के विभिन्न राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में भी समस्याएं हैं. आजादी के 70 वर्षों में कुछ प्रयास हुए हैं परंतु जनता की बुनियादी समस्याएं अभी भी कायम हैं.  सरकारें जनादेश प्राप्त करने से पूर्व घोषणा पत्र जारी करती हैं और उसके क्रियान्वयन में अपना कार्यकाल पूरा करती हैं. देखने में आया है कि ज्यादातर सरकारें घोषणा पत्र के बिंदुओं को अक्षरशः क्रियान्वित करने में असफल रहती हैं जिसके कारण जनाक्रोश बनना प्रारंभ हो जाता है. इसके साथ ही अगले चुनाव में कई बार जनमत वर्तमान सत्ता के विरूद्ध जाता है.

तमिलनाडु में जयललिता के साथ ऐसा कुछ हो चुका है, लेकिन वह गिरकर फिर खड़ी हुयीं और सरकारी योजनाओं के जरिए एवं अपने जनहितैषी फैसलों से जनता का दिल जीतने में कामयाब रहीं. यही वजह है कि आज समूचा तमिलनाडु उनके लिए रो रहा है और यह अप्रत्याशित घटना समूचे देश के लिए एक उदाहरण भी है. जनता का राजनेता के प्रति दीवानापन उनकी लोकप्रियता को दर्शाता है. हम उम्मीद कर सकते हैं कि भारत के विभिन्न प्रांतों के राजनेता इस घटना से कुछ सीख लेगें और जनता की समस्याओं को हल करते हुए जनता का दिल जीतने में कामयाब हो सकेगें.

कोहली मुझसे दोगुना आक्रामकः गांगुली

पूर्व भारतीय कप्तान सौरव गांगुली अपने क्रिकेट करियर के दौरान अपनी आक्रामकता के लिए मशहूर थे. उनका नाम भारत के सबसे तेजतर्रार कप्तानों में शुमार किया जाता है. हालांकि, उनका मानना है कि टीम इंडिया के मौजूदा टेस्ट कप्तान विराट कोहली उनसे भी कहीं ज्यादा आक्रामक हैं.

गांगुली मानते हैं बतौर कप्तान विराट के अंदर उनसे दोगुनी आक्रामकता है. कोलकाता में अपने फाउंडेशन और 'सौरव गांगुली क्रिकेट स्कूल' के लॉन्च के दौरान 'दादा' ने यह बात कही. उनका मानना है कि उनकी यह क्रिकेट अकादमी स्कूली स्तर से ही क्रिकेट सिखाने और पश्चिम बंगाल में क्रिकेट को एक नए स्तर पर ले जाने में मदद करेगी.

गांगुली ने बताया, 'हम अपने क्रिकेट कोचिंग स्कूल में 100-150 कोच नियुक्त करेंगे. हम विभिन्न स्कूलों के बच्चों को बुनियादी स्तर से क्रिकेट सिखाना शुरू करेंगे. आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को फ्री कोचिंग की सुविधा दी जाएगी.'

भारत और इंग्लैंड के बीच चल रही टेस्ट सीरीज में भारत 3-0 की अजेय बढ़त ले चुका है. अभी तक के 4 मैचों में कोहली की कप्तानी में टीम इंडिया मेहमान इंग्लैंड के ऊपर भारी पड़ी है. मुंबई में हुए पिछले टेस्ट में कप्तान कोहली ने 235 रनों की शानदार पारी भी खेली. विराट आक्रामकता और संयम के शानदार संतुलन का बेहतरीन उदाहरण हैं.

नोटबंदी की चाल

नोटबंदी का आर्थिक लाभ हो या न हो, उस ने सामाजिक नुकसान जरूर कर दिया है. देशभर के नागरिकों को सरकार ने एक झटके में गुनहगार बना दिया क्योंकि उन के पास अपने कमाए हुए 1,000 व 500 रुपए के नोट थे. 8 नवंबर की रात के बाद हर नागरिक अपने पुराने नोटों को इस तरह देख रहा है मानो उस ने ये कमाए नहीं, रिजर्व बैंक से चुराए थे.

लोगों को पापी की श्रेणी में रखने का यह बहुत पुराना फार्मूला है. बहुत राज्य इसे राज करने का सुगम तरीका मानते रहे हैं. गोरों की जमात में काला, कालों की जमात में गोरा, यहूदियों के बीच ईसाई, सुन्नी मुसलमानों के बीच शिया मुसलमान, काने, लंगड़े, बौने व लंबे समाज व धर्म के शिकार रहे हैं और लगभग हर धर्म व धर्म के सहारे राजा ज्यादा से ज्यादा लोगों को पापी या गुनहगार की श्रेणी में रखना चाहते रहे हैं. लोकतंत्र ने इस प्रवृत्ति को बदला था पर नोटबंदी जैसे फैसलों से  समाज में यह फिर दाखिल होने लगी है.

नोटबंदी का प्रभाव यह हुआ है कि अब समाचार आते हैं कि 2 लाख के पुराने नोट लिए व्यक्ति पकड़ा गया, ट्रेन से 11 लाख के पुराने नोटों सहित व्यक्ति जेल में, नगालैंड जाते 3.5 करोड़ रुपए पकड़े आदि. जिन नोटों पर लोगों का कानूनी, सामाजिक अधिकार था, एक झटके में वे गुनाह के सुबूत हो गए.

इस का मानसिकता पर असर पड़ता ही है. अपने कमाए हुए नोटों को नोटबंदी के चलते रखते हुए एक गरीब, सभ्य इंसान इस तरह घबराएगा कि मानो उस ने जहर की पुडि़यों को तिजोरी में रख रखा है. आदमी को कमजोर करने की यह पुरानी भगवाई तरकीब है पर आमतौर पर यह जनता के छोटे हिस्से पर लागू की जाती है. नरेंद्र मोदी ने देश को कठघरे में खड़ा कर डाला है. 1975-79 की आपातस्थिति की तरह हर मुंह पर अब ताला जड़ दिया गया है. हर कोई, जिस के पास 1,000-500 के नोट हैं, अपने को गुनहगार मान रहा है.

नोटबंदी ने तथाकथित नोट बदलने वाले गुनहगार भी पैदा कर दिए हैं. जैसे लड़कियों या मादक दवाओं की तस्करी होती है वैसे ही अब पुराने के बदले नए नोट देने की तस्करी शुरू हो गई है जो 30 दिसंबर तक चलेगी ही. एक पूरे समाज को अवैध घोषित कर देने का यह हथियार कैमिकल वैपन औफ मास डिस्ट्रक्शन बम की तरह है. यह लोगों को एकदम नहीं मारेगा. यह तो स्लो पौइजन की तरह हर बदन में घुस गया है.

 

नोटबंदी : हम सब कतार में हैं

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिनांक 8 नवंबर की शाम को टैलीविजन पर राष्ट्र के नाम संबोधन में देशवासियों से अचानक ही यह घोषणा कर दी कि आज रात, आधी रात के बाद से सारा देश कतार में आ जाएगा.

घोषणा होते ही मैं विस्मृत होतेहोते बचा और खुद समझने व टीवी चैनल के आगे बैठे हुए अपने परिवार के सदस्यों को भी समझाने की कोशिश करने लगा. उन्हें समझाने की कोशिश तो मैं जरूर कर रहा था लेकिन वास्तविकता यह थी कि यह सब सुन कर मैं खुद ही नहीं समझ पा रहा था कि क्या मेरा दिमाग और आंख दोनों ही अपनीअपनी जगह पर ठीक से काम कर रहे हैं. फिर भी मुझे विश्वास था कि मेरी आंख जो देख रही है वह सच है. मेरे सामने अपने देश के माननीय प्रधानमंत्री महोदय ही हैं और अपने देशवासियों को संबोधित कर रहे हैं मगर फिर भी दिमाग था कि बिलकुल ठिकाने पर आ ही नहीं रहा था. मुझे बारबार यही लग रहा था कि कहीं टैलीविजन के सामने मेरे पास बैठी हुई मेरी बेटी ने बिना मेरी इजाजत के टीवी चैनल बदल कर किसी मनोरंजक चैनल का पैरोडी शो तो नहीं लगा दिया, लगता है कि यह माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी की वेशभूषा में कोई बहरूपिया है. मैं ने तुरंत रसोईघर में जा कर एक गिलास ठंडा पानी पिया ताकि मेरा दिमाग कोमा में जातेजाते किसी तरह से बच जाए.

एक गिलास ठंडा पानी पी कर मैं अपने ड्राइंगरूम में टीवी के आगे लौटा और फिर सोचने लगा कि अभी तो आलोक पर्व यानी दीवाली का त्योहार निकला है और इस आलोक पर्व पर वर्षों से हमारे देश में अंधभक्ति और अंधश्रद्धा के तहत हिंदू परिवारों में रुपयों को धन नहीं बल्कि देवी लक्ष्मी माना जाता है और दीवाली पर देवी लक्ष्मी की तरह ही रुपयों की भी पूजा की जाती है. हमारे देश के तमाम लोग रुपयों का मतलब देवी लक्ष्मी ही मानते हैं. वैसे, रुपया हमारे देश भारत की मुद्रा का नाम है परंतु वास्तविकता में यदि देखा जाए तो अपने देशभर के तमाम लोगों के दिमाग के शब्दकोश में मुद्रा जैसे शब्द तो होते ही नहीं हैं, न ही उन्होंने कभी ये सुने ही होते हैं. उन के लिए तो रुपया मतलब केवल लक्ष्मी ही होता है. सारा दिमाग का फेर है.

अपने देश में किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उस के क्रियाकर्म का मामला हो या फिर किसी नवजात शिशु के जन्म के बाद उस के जन्मोत्सव का. ऐसे मामलों में अपने भारत के पंडितों की जेब जब तक 500-500 के हरे नोटों की जगह 1,000-1,000 के कई लाल नोटों से नहीं भरी जाती तब तक वे किसी को संतुष्टि, शांति का मंत्रोच्चारित हवाई टिकट देते ही नहीं हैं. इसी प्रकार किसी गर्भवती महिला के प्रसव के बाद उस के यहां जन्मे हुए नवजात शिशु को आशीर्वाद भी नहीं मिलता.

और इन नोटों को अवैध घोषित कर के नरेंद्र मोदी ने महा अन्याय किया है जैसे किसी की दुधारू गाय छीन ली हो. भक्तिमार्ग में कहा जाता है कि रुपयों को लक्ष्मी मानने की प्रक्रिया द्वापरयुग से आजकल यानी कलियुग तक चलती ही चली आ रही है और सृष्टि का विनाश होने तक चलेगी. लेकिन यह क्या? अचानक क्या हुआ? दिन प्रतिदिन, दिनदूनी रातचौगुनी बढ़ोतरी करने और देवी लक्ष्मी समान पूजी जाने वाली रुपएरूपी लक्ष्मी अब देवी नहीं, कागज के रंगीन टुकड़े मात्र रह जाएंगे, रद्दी हो जाएंगे, प्रचलन में नहीं रहेंगे और अवैध माने जाएंगे. यह कैसा आश्चर्य है? 

उस रात माननीय प्रधानमंत्री महोदय के देशहित में जारी किए गए ऐलान को अंत तक पूरी तरह सुन कर मैं ने अपने टीवी सैट को बंद किया और फिर रसोईघर में जा कर इस बार पूरे 4 गिलास ठंडा पानी पिया और अपने बिस्तर पर जा कर सोने लगा, परंतु मुझे उस रात बिल्कुल भी नींद नहीं आई. कई बार करवट बदलतेबदलते मैं ने सोने की अथाह कोशिश भी की मगर मेरी आंखों में नींद नहीं बल्कि दिलोदिमाग पर चिंता थी कि कहीं कल सुबह तक कालेधन की ताकत रखने वाले हमारे ही देश के गैरसामाजिक लोग प्रधानमंत्री के इस क्रांतिकारी फैसले के खिलाफ आंदोलित न हो उठें.

मुद्रा के चक्कर में कहीं लोगों के चेहरों की मुद्रा ही न बदल जाए क्योंकि हमारे देश के आला सरकारी अधिकारी हों या कर्मचारी, अपनी ईमानदार काबिलीयत पर कम, बल्कि कालीकमाई कर के सात पीढि़यों के लिए कालाधन एकत्रित करने का इंतजाम करने की अनैतिक प्रतिभा, तिकड़मबाजी, संपर्क, झूठी प्रशंसा और जुगाड़ में काफी माहिर हो चुके हैं. वे कालीकमाई करते भी हैं और करवाते भी हैं. वे कालाधन लेते भी हैं और मौका पड़ने पर देते भी हैं. वे अपनी मनचाही काले नोट उगलने वाली बेहतर सीट यानी पोस्ंिटग प्राप्त करने के चक्कर में सामाजिक मान्यताएं तोड़ने के साथ बिना शर्म महसूस किए रिश्वत देने का इंतजाम करते रहते हैं. उन के जीवन की सार्थकता दिनदूनी रातचौगुनी रिश्वत उगलने वाली सीट प्राप्त करने में ही निहित रहती है.

आधुनिकताभरे इस समाज ने सभ्य, सुसंस्कृत सोच की मानसिकता को इस कदर नीचे गिरा दिया है कि नौकरी लगने से पहले ही आज का युवा यह सोचने लगता है कि मैं जिस पद के लिए आवेदन कर रहा हूं उस में ऊपर की आमदनी कितनी है.

मैं प्रधानमंत्रीजी के नोटबंदी के कदम को एक क्रांतिकारी कदम की संज्ञा प्रदान कर थोड़ा प्रफुल्लित हो रहा था कि चलो देर आए दुरुस्त आए. अब कालेधन वालों की खैर नहीं. आखिर उन के बुरे दिन आ ही गए. मेरे पिताजी डिप्टी डायरैक्टर थे. वे कई केंद्रों के प्रमुख कार्यालयाध्यक्ष भी रहे. मगर मेरे घर में रिश्वत का एक चावल तक कभी नहीं पका. उन का सदा ही अपने बच्चों को यही समझाना रहता था, ‘रिश्वत की कमाई का भोजन खाने से तो अच्छा है कि भूखे रहा जाए. जितनी चादर हो उतना ही पैर फैलाना चाहिए. धन की हैसियत को सदा नियंत्रण में रखो, उसे सभ्य संस्कारों पर हावी मत होने दो. धन को अपनी ताकत और हवस कभी मत बनाओ. सरकारी कार्यालयों व अन्य संस्थानों में ऊपरी कमाई को सामाजिक मान्यता जरूर मिल रही है मगर यह देश के हित में नहीं है. ऊपरी कमाई करने वाला अधिकारी हो या चपरासी, वह समाजविरोधी व देशद्रोही किस्म का जानवर होता है, इंसान नहीं.’

बिस्तर पर करवटें बदलतेबदलते कब सुबह हो गई, पता ही तब चला जब मोबाइल में सुबह 5 बजे उठने की एकाएक घंटी बज उठी और तभी व्हाट्सऐप मैसेज मिला, ‘आज सभी विवाहित पुरुषों को पता चल जाएगा कि उन की पत्नी के पास कितना कालाधन है.’ तुरंत ही दूसरा व्हाट्सऐप मिला, ‘आज रात जिस घर की लाइट जलती हुई दिखे तो समझ लेना कि वहां नोटों की गिनती चल रही है.’ फिर तीसरा व्हाट्सऐप था, ‘मोदी, तेरी माया कोई समझ नहीं पाया. कल तक मांगने पर भी पेमैंट नहीं मिलती थी और आज पार्टी सामने से फोन कर रही है कि आप का पेमैंट कहां ले कर आऊं, कार्यालय में या रात के अंधेरे में आप के घर पर.’

अगले दिन नहाधो कर मैं भी बैंक पहुंचा और बैंक मैनेजर के परिचित होने के बावजूद भी मैं ने वहां भीड़भरी लंबी कतार में लग कर ही महात्मा गांधीजी के चित्र, उन के चश्मे व एक कदम स्वच्छता की ओर लिखे हुए भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित आर पटेल के हस्ताक्षरयुक्त मंगलयानमय नए 2 हजार रुपए के नोटों को प्राप्त कर लिया.

 

बैंक की लाइन में मुझे दिखाई दिए लखपति, ईमानदार, दलाल, मासिक आय, दिहाड़ी, साप्ताहिक व पाक्षिक पर कमाई करने वाले गरीब, कामगार वर्ग तक के लोग. उन की अंटी में 500 और 1,000 रुपए का एक नोट हो या अनेक, सभी को चिंता थी कि कहीं ये बेकार न हो जाएं. कुछ ऐसे लोग भी काफी परेशान थे जिन्होंने जीवनभर ईमानदारी के दम पर रुपया कमाया परंतु हाल ही में अपनी बेटी की शादी में खर्च करने के लिए बैंक से अपना लाखों रुपया नकद निकाल कर घर में रख लिया था.

तमाम सारी घरेलू महिलाओं का एक ऐसा वर्ग बेहद परेशान नजर आया जिन्होंने अपनेअपने पतियों से छिपा कर अपने घर की गुप्त तिजोरी में अपने मायके व इधरउधर से मिलेमिलाए तथा अपने ही पति की जेब काटकाट कर 500 तथा 1,000 रुपए के नोटों को जमा कर कई लाख रुपयों का जमावड़ा कर रखा था, जिस का उन के पति तक को 8 नवंबर, 2016 तक कुछ पता नहीं था. सब जग उजागर हो गया.

पुराने नोटों की अदलाबदली के चक्कर में आज हम सब आम नागरिक कतार में लगे हुए हैं. पूरा देश कतार में है, फिर भी मुझे कहीं भी एक भी अमीरजादा, करोड़पति किसी जगह बैंक की लाइन में लगा हुआ नहीं दिखा.

बैंक से लौटते समय दिलोदिमाग में निरंतर तमाम सारी बातें व प्रश्नउत्तर जन्म ले रहे थे कि रुपया तो अविनाशी है. रुपए का जन्म तो होता है किंतु मोदीजी के एक ऐलान पर उस की मृत्यु तो कभी हो ही नहीं सकती. संसार की इस सांसारिकता में रुपया न कभी मरा है, न मरेगा. वह न बंद हुआ है, न बंद होगा. हां, उस का आकार, रूप व रंग भले ही नया हो जाए. क्या मोदी, नोटबंदी से भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म कर पाएंगे? नहीं, कभी नहीं. हां, थोड़े दिनों के लिए थम भले ही जाए. कुछ दिनों बाद ही भ्रष्टाचारी नए नोट में रिश्वत लेना शुरू कर देंगे. इलैक्ट्रौनिक विज्ञान व प्रिंटिंग की मदद से जल्दी ही नए नोटों की नकल भी अवश्य कर ली जाएगी और वे फिर बाजार में चला दिए जाएंगे. भ्रष्टाचार का यह दैत्यावतार तो सिर्फ मनुष्य की अपनी निजी मानसिकता द्वारा ही मारा जा सकता है, मोदी सरकार हो या अन्य कोई, इसे नहीं मार सकती. वास्तव में भ्रष्टाचार रुपए की तरह अविनाशी हो चुका है जिसे कभी खत्म नहीं किया जा सकता.

तभी मेरे किंकर्तव्यविमूढ़, अशांत और चिंतित मन पर व्हाट्सऐप मैसेज ने फिर प्रहार किया, जिस में लिखा था, ‘मेरे अलगअलग बैंकों में 4 अकाउंट हैं. अभी तक सभी में जीरो बैलेंस है. संकट की इस घड़ी में किसी मित्र के काम आ सकता हूं तो जरूर संपर्क करें. आप को बिल्कुल भी कतार में लगने की आवश्यकता नहीं है. मैं हूं ना. यह सूचना नोटबंदी के उपलक्ष्य में मित्रहित में जारी.’ तुरंत ही दूसरा व्हाट्सऐप था, ‘आखिर बूढ़ी मां के खाते में उस के बेटे ने वर्षों बाद ही सही, मगर पूरे ढाई लाख रुपए डाल ही दिए. आखिर बुरे वक्त में मां ही काम आई. जिस को रुपया डूबाने वाला रहा था, उस को मां ने तैरा दिया.’

मैं ने भी वर्षों पहले अपना शरीर त्याग चुकी मां को याद किया और कहा, मां, तेरा देश आज बदलाव की कतार में है. जिन रुपयों की तू अपनी अंधभक्ति और अंधश्रद्धा रख कर नित्य दर्शन किया करती थी, वे आज मात्र कागज के टुकड़े सिद्ध हो गए हैं. कुलमिला कर भ्रष्टाचार, कालाधन और सीमापार से होने वाली नकली नोटों की तस्करी पर लगाम लगाने के लिए हम सब कतार में जरूर हैं. पूरा देश कतार में है, पर एक हैं. हम अनेक होने के बावजूद भी एक हैं. हमें अपने भारतीय होने पर गर्व है. वाह क्या बात है. हम केवल अपने देश ही नहीं बल्कि विश्व के लिए मिसाल हैं.  

मेरी शादी को 5 वर्ष हो चुके हैं. सहवास के लिए पत्नी कभी इच्छा जाहिर नहीं करती. बताएं क्या करूं.

सवाल

मैं 30 वर्षीय युवक हूं. शादी को 5 वर्ष हो चुके हैं. 2 बच्चे हैं. बेटा 3 साल का है और बेटी 1 साल की. घर में हमारे अलावा बीमार मां है. पत्नी बहुत ही सुंदर और सुशील है. घर के कामकाज, बच्चों की परवरिश के अलावा मेरी मां की सेवा भी बखूबी करती है. पर रात को कमरे में आते ही निढाल हो जाती है. सहवास के लिए उस ने कभी इच्छा जाहिर नहीं की. मेरे पहल करने पर भी कोई उत्साह नहीं दिखाती. कई बार तो उस की बेरुखी देख कर मेरा मूढ़ ही बिगड़ जाता है. मैं कई कई दिन इच्छा जाहिर नहीं करता. पर उसे कोई फर्क नहीं पड़ता. बताएं क्या करूं?

जवाब

आप की बीवी घर की देखभाल करती हैं. 2 छोटे बच्चे  हैं, जिन की परवरिश अपनेआप में काफी जिम्मेदारी का काम है. इस के अलावा वे आप की मां की सेवा भी करती हैं. जाहिर है इन सब दायित्वों को पूरा करतेकरते वे थक जाती होंगी. उस के बाद आप चाहते हैं कि रात को वे तरोताजा नजर आएं. सहवास के लिए उत्साह दिखाएं तो यह कैसे संभव है?

आप घर के कार्यों में और बच्चों की देखरेख में पत्नी की मदद करें. संभव हो तो कोई मेड रख लें. इस से उन्हें कुछ राहत मिलेगी और फिर आप को उन से कोई शिकायत नहीं रहेगी.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.    

नेशनल बॉक्सिंग चैंपियनशिपः मनोज कुमार ने जीता गोल्ड

गुवाहटी में चल रहे नेशनल बॉक्सिंग चैंपियनशिप में देशभर के मुक्केबाज अपने मुक्कों का दम दिखा रहे हैं. भारत की तरफ से दो बार ओलंपिक खेल चुके अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाज मनोज कुमार ने 69 किलोग्राम भरवर्ग में गोल्ड मेडल अपने नाम किया. फाइनल मुकाबले में उन्होंने सर्विसेज के दुर्योधन सिंह को एक संघर्षपूर्ण मुकाबले में शिकस्त दी.

मनोज और दुर्योधन के बीच गोल्ड मेडल के लिए जबरदस्त मुकाबला देखने को मिला. दोनों ही मुक्केबाजों ने जबरदस्त खेल दिखाया. लेकिन मनोज ने अपने अनुभव का पूरा फायदा उठाया और मुकाबला 3-2 से अपन नाम किया. राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक दिलाने वाले मनोज कुमार ने सेमीफाइनल में चंडीगढ़ के अंकुश हुड्डा पर आसान जीत दर्ज थी.

सर्विसेज के दुर्योधन सिंह और दिल्ली के युवा मुक्केबाज प्रयाग चौहान के बीच हुआ मुकाबला एक तरफा रहा. इस मुकाबले को दुर्योधन ने 5-0 से अपने नाम किया और सिल्वर मेडल पर कब्जा जमाया. प्रयाग को ब्रॉन्ज मेडल से संतोष करना पड़ा. प्रयाग जूनियर एशियन चैंपियन, जूनियर एशियन में देश का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं.

इसके अलावा प्रयाग ने यूथ कॉमनवेल्थ गेम्स में ब्रॉन्ज मेडल भी अपने नाम किया हैं. प्रयाग दिल्ली में द्रोणाचार्य अवार्डी बॉक्सिंग कोच एस.आर सिंह से मुक्केबाजी के गुर सीखते हैं.

मेरे शरीर के कई हिस्सों पर स्ट्रैच मार्क्स हो गए हैं. इसे दूर करने के उपाय बताएं.

सवाल

18 वर्षीय युवती हूं. मेरे शरीर के कई हिस्सों पर स्ट्रैच मार्क्स हो गए हैं जो न केवल खराब दिखते हैं, बल्कि उन की वजह से मैं शौर्ट ड्रैसेज और स्लीवलैस कपड़े भी नहीं पहन पाती हूं. कृपया स्ट्रैच मार्क्स को दूर करने के उपाय बताएं?

जवाब

स्ट्रेच मार्क्स या शरीर पर दिखने वाली सफेद धारियां तब होती हैं जब अचानक आप का वजन बढ़ता है और फिर आप उसे ऐक्सरसाइज के द्वारा घटाने की कोशिश करती हैं. इस के अलावा डिलिवरी के बाद भी जब बढ़ा वजन घटता है तो पेट के अलावा शरीर के उन हिस्सों पर भी स्ट्रैच मार्क्स दिखाई देते हैं जहां वजन कम होता है.

दरअसल, त्वचा की 2 सतहें होती हैं ऊपरी और भीतरी. जब वजन बढ़ता है तो त्वचा में खिंचाव आता है और त्वचा की ऊपरी सतह स्ट्रैच हो जाती है. लेकिन भीतरी त्वचा इस स्ट्रैच को सह नहीं पाती और त्वचा के भीतरी टिशूज टूट जाते हैं, जिस से स्ट्रैच मार्क्स बनते हैं. वैसे तो स्ट्रैच मार्क्स हटाने के लिए कई तरह की स्ट्रैच मार्क्स रिमूवल क्रीम व लोशन उपलब्ध हैं, लेकिन आप चाहें तो घरेलू उपाय भी अपना सकती हैं.

आप उन स्थानों पर जहां स्ट्रेच मार्क्स हैं ऐलोवेरा जैल लगाएं. ऐलोवेरा जैल त्वचा को टोन करने के साथसाथ उसे हाइड्रेट भी करता है जिस से स्ट्रैच मार्क्स धीरेधीरे हलके होते जाते हैं. इस के अतिरिक्त आप नीबू का रस या आलू का रस भी प्रभावित स्थान पर लगा सकती हैं. इस से भी स्ट्रैच मार्क्स के हलके होने में मदद मिलेगी.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.              

झूठ की नींव पर खड़ा प्रेम का महल

हत्या तो जघन्य अपराध है ही, उस से भी जघन्य और क्रूरता की हदें पार करने वाला अपराध है किसी को आग लगा कर या उस के ऊपर तेजाब डाल कर जिंदा जला देना. इस तरह की घटनाओं में अगर पीड़ित जिंदा बच जाता है तो उसे प्रतिदिन तिलतिल कर मरना होता है. इस तरह के अपराधों में बेरहम अपराधियों को उन के घिनौने अपराध के लिए जितनी भी सजा दी जाए, कम है.

इसी तरह के एक जघन्य अपराध का फैसला 25 अक्तूबर, 2016 को पंजाब के जिला मोंगा की सत्र एवं जिला अतिरिक्त जज लखविंदर कौर दुग्गल की अदालत में सुनाया जाना था. चर्चित मामला होने की वजह से फैसले को सुनने के लिए अदालत में काफी भीड़ लगी थी. भीड़ के बीच चल रही खुसुरफुसुर तब एकदम से सन्नाटे में बदल गई, जब ठीक साढ़े 10 बजे अदालत कक्ष में सत्र एवं जिला अतिरिक्त जज लखविंदर कौर दुग्गल आ कर बैठीं.

उन के सीट पर बैठते ही रीडर ने मनदीप कौर तेजाब कांड की फाइल उन की ओर बढ़ा दी. इस के बाद पुलिस ने 8 लोगों को ला कर कठघरे के पास खड़ा कर दिया, जिस में 2 अधेड़ उम्र की महिलाएं भी थीं. चूंकि इस मामले की बहस वगैरह सब हो चुकी थी, इसलिए सभी उत्सुक थे कि कितनी जल्दी फैसला सुनाया जाए.

इस मामले में जज ने क्या फैसला सुनाया, यह जानने से पहले आइए इस मामले के बारे में जान लें, जिस से पता चले कि जज ने दोषियों को जो सजा दी, वे इसी लायक थे या वे इस से भी अधिक सजा के हकदार थे.

सरदार शमशेर सिंह जाट एक बड़े किसान थे. वह जिला मोंगा के गांव दइया कलां मेहना के रहने वाले थे. वह सुखी और संपन्न तो थे ही, सेवा भाव वाले संस्कारी भी थे. अपनी संतानों को भी उन्होंने अच्छे संस्कार दिए थे. यही वजह थी कि हर तरह से सुखीसंपन्न होने के बावजूद उन की बेटी मनदीप कौर ने बीएससी करने के बाद नर्सिंग का डिप्लोमा किया और अस्पताल में नौकरी कर मरीजों की सेवा करने लगी थी.

बेटी की इस नौकरी से घर का कोई भी सदस्य खुश नहीं था, क्योंकि उन के यहां किसी चीज की कमी नहीं थी. इसलिए कोई नहीं चाहता था कि कुछ रुपयों के लिए मनदीप रातदिन धक्के खाए. लेकिन जब मनदीप कौर ने पिता को सेवा वाली बात याद दिला कर कहा कि यह सब तो उन्हीं लोगों द्वारा दी गई शिक्षा का नतीजा है, तब पिता ही नहीं, घर के सभी लोग लाजवाब हो गए थे.

अस्पताल में ही नौकरी के दौरान मनदीप कौर की मुलाकात हरिंदर सिंह से हुई थी. वह अपने किसी बीमार रिश्तेदार का हालचाल लेने अस्पताल आया था. वह सुंदर और गबरू जवान था, इसलिए मनदीप कौर उस की ओर आकर्षित हो गई थी. मनदीप कौर भी कम सुंदर नहीं थी, इसलिए हरिंदर सिंह ने भी जब पहली बार उसे देखा था तो उस का भी दिल उस पर आ गया था.

बहरहाल, इसी पहली मुलाकात में ही दोनों एकदूसरे के दिलों में गहराइयों तक उतर गए थे. जल्दी ही उन का यह प्यार शादी तक पहुंच गया था. दोनों की शादी में किसी को कोई ऐतराज भी नहीं था, क्योंकि कदकाठी, रंगरूप और खूबसूरती में दोनों की जोड़ी लाखों में एक थी. इस के अलावा दोनों की जाति भी एक थी.

हरिंदर सिंह रायकोट के थाना सदर के गांव रसीन के रहने वाले परमजीत सिंह का बेटा था. वह भी जाट था और गांव का सुखीसंपन्न किसान था. उस ने मनदीप कौर को बताया था कि वह पंजाब पुलिस में सबइंसपेक्टर है. इसीलिए जब शादी की बात चली तो एक तो लड़का खूबसूरत था, दूसरे बढि़या सरकारी नौकरी थी, इस के अलावा काफी जमीनजायदाद भी थी, इसलिए मनदीप कौर के घर वालों को इस शादी पर कोई ऐतराज नहीं था.

इन्हीं सब वजहों से जब हरिंदर सिंह के मातापिता और मामामामी मनदीप कौर से रिश्ते के लिए आए तो घर वालों ने खुशीखुशी हामी भर दी थी. इस के बाद 21 मार्च, 2010 को दोनों परिवारों की रजामंदी से मनदीप कौर और हरिंदर सिंह की शादी हो गई थी. इस शादी से दोनों ही बहुत खुश थे.

शादी के 3-4 महीने बाद हरिंदर की खुशी भले ही कायम रही हो, पर मनदीप कौर की खुशी कायम नहीं रह सकी थी. इस की वजह यह थी कि शादी से पहले हरिंदर सिंह ने मनदीप कौर को अपने बारे में जो कुछ बताया था, वह सब झूठ था. उस ने अपने बारे में बताया था कि वह कोई नशा नहीं करता और पंजाब पुलिस में इंसपेक्टर है. जबकि हकीकत यह थी कि हरिंदर सिंह बेकार और आवारा किस्म का युवक था. रही बात नशे की तो वह पक्का शराबी था. वह पंजाब पुलिस में सबइंसपेक्टर की कौन कहे सिपाही भी नहीं था.

शादी के बाद कुछ दिनों तक मनदीप कौर को यही लगता रहा कि शादी की वजह से हरिंदर ने छुट्टियां ले रखी होंगी. लेकिन जब काफी दिन गुजर गए और उस ने ड्यूटी जाने का नाम नहीं लिया तो एक दिन उस ने पूछा, ‘‘थानेदार साहब, कितने दिनों की छुट्टियां ले रखी हैं. कब जाना है ड्यूटी पर?’’

‘‘तुम मेरी छुट्टियों को ले कर  क्यों परेशान हो रही हो? नईनई शादी है, घूमोफिरो और मौज करो. रही बात नौकरी की तो उसे पूरी जिंदगी करनी है.’’ हरिंदर सिंह ने कहा.

मनदीप अपनी ड्यूटी पर जाने लगी थी. 3-4 महीने बीत जाने के बाद भी जब हरिंदर सिंह अपनी ड्यूटी पर नहीं गया तो मनदीप कौर को संदेह हुआ. उसे लगा कि कहीं उस के साथ कोई धोखा तो नहीं हुआ? क्योंकि हरिंदर अब रोज ही शराब के नशे में धुत हो कर घर आने लगा था. शुरूशुरू में उस ने कहा था कि शादी की खुशी में यारदोस्त जबरदस्ती पिला देते हैं.

लेकिन शादी के 6 महीने हो जाने के बाद ऐसे कौन दोस्त थे, जो अभी भी शादी की खुशियां मना रहे थे. लेकिन अहम सवाल यह था कि हरिंदर सिंह अपनी ड्यूटी पर क्यों नहीं जा रहा था? इन्हीं बातों को ले कर अब लगभग रोज ही हरिंदर सिंह और मनदीप कौर में झगड़ा होने लगा. इस की एक वजह यह भी थी कि शराब पीने के लिए हरिंदर मनदीप कौर से पैसे मांगने लगा था.

आखिर एक दिन मनदीप कौर के सामने साफ हो गया कि हरिंदर सिंह पंजाब पुलिस में सबइंसपेक्टर तो क्या, सिपाही भी नहीं है. अब स्पष्ट हो गया कि हरिंदर ने उस से छल किया था. उसी बीच एक दिन जो हुआ, मनदीप कौर ने कभी उस की कल्पना भी नहीं की थी.

शराब के नशे में धुत्त हरिंदर सिंह ने पैसे को ले कर मनदीप कौर की पिटाई करते हुए कहा था, ‘‘सुनो, मैं भले ही पंजाब पुलिस में सबइंसपेक्टर नहीं हूं, लेकिन तुम्हारा पति जरूर हूं, इसलिए मैं जो भी कहूं, उसे तुम चुपचाप मानो. क्योंकि अब तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती. तुम खूबसूरत थी, इसलिए झूठ बोल कर मैं ने तुम से शादी की थी.’’

यह सुन कर मनदीप कौर के पैरों तले से जमीन खिसक गई. अब उसे अपनी शादी के इस फैसले पर पछतावा हो रहा था. अगली सुबह वह चुपचाप उठी और बिना किसी से कुछ कहे अपना सामान समेटा और मोगा स्थित अपने पिता के घर आ गई. उस रात अच्छी तरह सोचसमझ कर उस ने यह कदम उठाया था.

मनदीप कौर के इस तरह घर छोड़ कर जाने से हरिंदर और उस के घर वाले बौखला उठे. हरिंदर के पिता परमजीत सिंह बिरादरी के कुछ प्रतिष्ठित लोगों को साथ ले कर शमशेर सिंह के घर पहुंचे. इन लोगों ने कहा कि हरिंदर ने झूठ बोला या कुछ भी किया, उस सब को भूल कर मनदीप को हरिंदर के साथ भेजो. गलती उस की है. उस ने एक बहू की मर्यादा को भंग किया है. बिना बताए घर छोड़ कर मायके चली आई है, इसलिए उसे ससुराल वालों के पैर पकड़ कर माफी मांगनी चाहिए.

यह चोरी और सीनाजोरी वाली बात थी. मनदीप कौर की जगह कोई भी होता, यह बात कतई न मानता. जबकि उस के साथ तो जबरदस्त धोखा हुआ था. मनदीप कौर ने ससुराल जाने से साफ मना कर दिया तो हरिंदर सिंह और उस के घर वाले खाली हाथ लौट गए.

यही नहीं, अगले दिन मनदीप कौर ने जिला एवं सत्र न्यायाधीश कर्मजीत सिंह की अदालत में हरिंदर सिंह और उस के घरवालों के खिलाफ धोखाधड़ी, घरेलू हिंसा, दहेज और खर्चे का मुकदमा दायर कर दिया. यह मुकदमा अभी विचाराधीन है. मुकदमा दायर होते ही हरिंदर सिंह और उस के घर वालों की ओर से मनदीप कौर पर दबाव बनाने के लिए लगातार धमकियां दी जाने लगीं कि वह मुकदमा वापस ले कर समझौता कर ले, वरना ठीक नहीं होगा.

मनदीप कौर ने उन धमकियों के खिलाफ पुलिस में शिकायत भी की, पर पुलिस की ओर से कोई कारवाई नहीं की गई. 11 जुलाई, 2013 को सुबह साढ़े 9 बजे मनदीप कौर अपने पिता शमशेर सिंह के साथ स्कूटर से कचहरी जा रही थी, तभी गुरुकुल स्कूल के थोड़ा पीछे कोकरी कलां ड्रेन पुल के पास कोकरी कलां गांव की ओर से आ रहे 2 मोटरसाइकिल सवारों ने उन्हें रोक लिया.

दोनों मोटरसाइकिलों पर 4 लोग सवार थे. उन में एक मनदीप कौर का पति हरिंदर सिंह भी था. मोटरसाइकिल खड़ी कर के चारों उतरे. 2 लोगों के हाथों में जग थे, जिन में तेजाब भरा था. हरिंदर अपने एक दोस्त के साथ शमशेर सिंह के स्कूटर के पास पहुंचा और मनदीप कौर की ओर देख कर उस ने गुस्से से कहा, ‘‘तुझ से कहा था न कि मुकदमा वापस ले कर समझौता कर ले. नहीं मानी न मेरी बात, अब ले भुगत.’’

इतना कह कर उस ने जग में भरा तेजाब मनदीप कौर पर उछाल दिया. इस के बाद साथी के हाथ से जग ले कर उस ने उस में भरा तेजाब शमशेर सिंह के ऊपर उड़ेल दिया. बापबेटी तेजाब की जलन से स्कूटर सहित गिर कर छटपटाने लगे. कुछ लोगों ने बापबेटी को सड़क पर तड़पते देखा तो उन्हें उठा कर नजदीकी सिविल अस्पताल पहुंचाया और इस घटना की सूचना पुलिस को दे दी.

सिविल अस्पताल में प्राथमिक उपचार के बाद बापबेटी की गंभीर हालत को देखते हुए फरीदकोट मैडिकल कालेज रैफर कर दिया गया. मनदीप कौर की बाईं आंख और सीना बुरी तरह से जल गया था. शमशेर सिंह का सीना, पीठ और चेहरा जला था. यह खबर मनदीप कौर के गांव पहुंची तो दोपहर तक घर तथा गांव के तमाम लोग फरीदकोट पहुंच गए.

थानाकोतवाली फरीदकोट से एएसआई गुलजार सिंह और जयपाल सिंह ने आ कर शमशेर सिंह और मनदीप कौर का बयान लिया. चूंकि अपराध दूसरे शहर में हुआ था, इसलिए ताजी स्थिति और बयान की कौपी थानाकोतवाली फरीदकोट पुलिस ने थाना अजीतवाला, जिला मोंगा भेज दी.

शाम 4 बजे थाना अजीतवाला पुलिस एवं डीएसपी जसविंदर सिंह ने फरीदकोट आ कर शमशेर सिंह और मनदीप कौर का एक बार फिर बयान लिया और तत्काल इस मामले को 11 जुलाई, 2013 को अपराध संख्या 49/2013 पर भादंवि की धारा 307, 326ए, 120बी के तहत हरिंदर सिंह व अन्य अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर हरिंदर सिंह की तलाश शुरू कर दी.

अगले दिन पुलिस ने इस तेजाब कांड के 8 अभियुक्तों को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया, जहां से पूछताछ एवं सबूत जुटाने के लिए सभी अभियुक्तों को रिमांड पर सौंप दिया गया.

थाना अजीतवाला पुलिस ने जिन 8 लोगों को गिरफ्तार किया था, उन में मनदीप कौर का पति हरिंदर सिंह, उस के 3 दोस्त परवान सिंह, दपिंदर सिंह, जगजीत सिंह उर्फ जग्गा, हरिंदर के पिता परमजीत सिंह, मां कर्मजीत कौर, मामा सुरजीत सिंह और मामी सुखमिंदर कौर थीं. रिमांड के दौरान पुलिस ने वे जग भी बरामद कर लिए थे, जिन से दोनों पर तेजाब डाला गया था. पुलिस ने दोनों मोटरसाइकिलें भी बरामद कर ली थीं. रिमांड खत्म होने के बाद सभी को जेल भेज दिया गया था.

हरिंदर के मातापिता और मामामामी की जमानतें हो गई थीं, लेकिन हरिंदर और उस के दोस्त जेल में ही रहे. इस केस की पूरे 3 साल तक सुनवाई चली. शमशेर सिंह और मनदीप कौर को इलाज के लिए डेढ़ साल से भी ज्यादा समय तक अस्पताल में रहना पड़ा. मनदीप कौर की एक आंख पूरी तरह से खराब हो गई थी. बापबेटी के इलाज पर डेढ़ साल में करीब 50 लाख रुपए खर्च हुए थे. इस खर्च में सरकार की ओर से एक पैसे की भी मदद नहीं मिली थी.

इस मुकदमे में 29 गवाहों की गवाही हुई. इन में वे 3 लोग भी शामिल थे, जिन्होंने हरिंदर सिंह और उस के साथियों को मनदीप कौर और शमशेर सिंह पर तेजाब डालते देखा था. उन्होंने ही बापबेटी को अस्पताल पहुंचाया था. गवाहों में डाक्टर, फोटोग्राफर, पुलिस वाले एवं डीएसपी जसविंदर सिंह तथा फरीदकोट मैडिकल कालेज के सीएमओ भी  थे.

25 अक्तूबर, 2016 को अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश लखविंदर कौर ने इस मुकदमे में अपना फैसला सुनाते हुए कहा था कि पुलिस ने इस मामले में अपनी जांच पूरी तरह से और सही ढंग से की है. वैसे तो यह अपराध इतना जघन्य एवं क्रूरताभरा है कि इस में पीडि़तों की भले ही मौत नहीं हुई, पर हर पल मौत का भयानक साया उन के इर्दगिर्द मंडराता रहा.

भुक्तभोगी इतने भयानक और डरावने हो गए हैं कि अब वह समाज और समाज की धारा से आजीवन जुड़ नहीं सकते. इस के लिए अगर मौत की सजा का भी प्रावधान हो तो भी कम है, फिर भी कानून के मद्देनजर यह अदालत हरिंदर सिंह, परवान सिंह, दपिंदर सिंह और जगजीत सिंह को दोषी करार देते हुए इस अपराध के लिए उम्रकैद की सजा देती है.

इसी के साथ हरिंदर सिंह पर 10 लाख रुपए का आर्थिक दंड लगा कर उसे पीडि़ता मनदीप कौर और शमशेर सिंह को मुआवजे के रूप में देने का आदेश दिया. इसी के साथ 1 लाख रुपए का और जुरमाना लगाया. शेष 3 अभियुक्तों परवान सिंह, दपिंदर सिंह और जगजीत सिंह पर भी 1-1 लाख रुपए का जुरमाना तथा 1-1 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया.

जुरमाना राशि न अदा करने पर हरिंदर को 3 साल अतिरिक्त सजा तथा शेष तीनों अभियुक्तों को 2-2 साल अतिरिक्त सजा भुगतने का आदेश दिया. इसी के साथ पंजाब सरकार को भी पीडि़ता की स्थिति को देखते हुए 15 दिनों के भीतर 5 लाख रुपए नकद राशि मुआवजे के रूप में देने का आदेश दिया.

शेष 4 अभियुक्तों हरिंदर के पिता परमजीत सिंह, मां कर्मजीत कौर, मामा सुरजीत सिंह और मामी सुखमिंदर कौर को सबूतों के अभाव की वजह से बरी कर दिया. झूठ की बुनियाद पर हरिंदर सिंह ने सपनों का जो महल खड़ा किया था और मनदीप कौर ने अपनी जो प्रेमनगरी बसाई थी, उस का ऐसा दुखद दृश्य सामने आएगा, मनदीप कौर ने सोचा भी नहीं था.?

लेखक : हरमिंदर खोजी

अंतोनियो गुतेरेस और भारत

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव के रूप में अंतोनियो गुतेरेस को शरणार्थियों की बढ़ती संख्या, आतंक और गृह युद्ध, उभरते संकीर्ण राष्ट्रवाद, आर्थिक संकट और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं का सामना करना है. उन्होंने कहा है कि वे शांति और विकास के लिए समर्पित होंगे तथा इस विश्व संस्था में जरूरी सुधारों के लिए प्रयासरत होंगे.

समाजवादी नेता के रूप में पुर्तगाल के प्रधानमंत्री रह चुके गुतेरेस साल 2005 से 2015 तक संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी संस्था यूएनएचसीआर के प्रमुख रहे हैं. वे वैश्विक आतंकवाद और चरमपंथ तथा शरणार्थी संकट के अंतर्संबंधों को बेहतर समझते हैं. अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के जटिल संजाल ने आतंक पर कठोर रुख अपनाने की उनके पूर्ववर्ती बान की मून की कोशिशों को फलीभूत नहीं होने दिया है.

संयुक्त राष्ट्र महासभा की चिंताएं सुरक्षा परिषद में विशिष्ट सदस्य के रूप में बैठी महाशक्तियों की आपसी राजनीति में उलझी रह जाती हैं. भारत समेत अनेक देश संयुक्त राष्ट्र को उत्तरोत्तर लोकतांत्रिक बनाने की मांग बरसों से करते रहे हैं, जिनमें सबसे प्रमुख सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाना है.

पाकिस्तान की शह पर भारत-विरोधी गतिविधियों को अंजाम देनेवाले आतंकी सरगना मसूद अजहर पर पाबंदी लगाने का प्रस्ताव चीन के अड़ियल रवैये के कारण कई महीनों से लंबित है. भारत ने 1996 में अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर समेकित सम्मेलन का प्रस्ताव दिया था, जिसे संयुक्त राष्ट्र महासभा ने स्वीकृत भी कर लिया है, पर अमेरिका, इसलामी देशों के समूह और लैटिन अमेरिकी देशों के अड़ंगे के चलते दो दशकों बाद भी इस पर कोई निर्णय नहीं लिया जा सका है, जबकि आपत्ति जतानेवाले देश भी आतंकी गतिविधियों का निशाना बनते रहे हैं.

भारत ने लगातार यह मांग की है कि राज्य-प्रायोजित आतंकवाद पर कठोर रुख अपनाने की जरूरत है तथा संयुक्त राष्ट्र को बिना किसी पक्षपात और पूर्वाग्रह के इस दिशा में ठोस पहल करनी चाहिए. अभी चीन ने फिर से यह संकेत दिया है कि वह मसूद अजहर के मसले पर अपनी राय में बदलाव नहीं करेगा.

कुछ दिन पहले सुरक्षा परिषद के आतंक-विरोधी इकाई के प्रमुख ने यह कहते हुए भारत को धैर्य रखने की अजीब सलाह दी थी कि संस्था की कार्यवाही की प्रक्रिया में विलंब होता है. नये महासचिव की इस बात से उम्मीद बंधी है कि वे जरूरी मुद्दों पर ध्यान देंगे और कामकाज में अनावश्यक देरी की मुश्किल हल करेंगे. गुतेरेस सुलझे व्यक्तित्व के धनी हैं. विवादों के समाधान में व्यक्तिगत रूप से रुचि लेने का उनका वादा भरोसा जगाता है. पर, भारत समेत अन्य देशों को सकारात्मक सहयोग के साथ दबाव बनाये रखना भी जरूरी होगा.

जियो ला रहा है आपके लिए पोकेमॉन गो

​रिलायंस जियो इन्फोकॉम ने जानकारी दी है कि उसने पॉप्युलर गेम 'पोकेमॉन गो' को भारत में लॉन्च करने के लिए द पोकेमॉन कंपनी के साथ मिलकर निऐंटिक के साथ पार्टनरशिप की है. निऐंटिक ने ही पूरी दुनिया में धूम मचाने वाले ऑगमेंटेड रिऐलिटी गेम 'पोकेमॉन गो' को डिवेलप किया है.

जियो ने बताया कि जियो सिम इस्तेमाल करने वाले ग्राहक पोकेमॉन गो गेम को खेल पाएंगे और जियो के हैपी न्यू इयर ऑफर के तहत 31 मार्च, 2017 तक इसके लिए उन्हें कोई डेटा चार्ज भी नहीं देना होगा.

इस असोसिएशन से रिलायंस डिजिटल स्टोर्स, जियो रीटेल लोकेशंस और चार्जिंग स्टेशन इस गेम को खेलने वालों को पोकेस्टॉप्स और जिम्स के रूप में नजर आएंगे. यह गेम बुधवार, 14 दिसंबर से खेला जा सकेगा.

जियो चैट में पोकेमॉन प्लेयेर्स एक्सक्लूसिव पोकेमॉन गो चैनल को भी ऐक्सेस कर सकेंगे. यहां पर उन्हें डेली टिप्स, कॉन्टेंट और क्लू वगैरह मिलेंगे. कंपनी की तरफ से जारी बयान में कहा गया है, 'निऐंटिक के साथ हमारी पार्टनरशिप से हमारे ग्राहक जियो मोबाइल ब्रॉडबैंड नेटवर्क पर कॉन्टेंट को इंजॉय कर सकते हैं.'

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