पाकिस्तान निर्वाचन आयोग (ईसीपी) ने शनिवार को संसद के 336 सदस्यों की सदस्यता इसलिए निलंबित कर दी, क्योंकि उन्होंने अपनी संपत्ति की घोषणा नहीं की थी. कानून के अनुसार, संसद के सभी सदस्यों को हर साल 30 सितंबर से पहले अपनी संपत्तियों की घोषणा करनी होती है, जिनमें पत्नी और बच्चे की संपत्ति भी शामिल है.

यह पहली बार नहीं हुआ, जब पाकिस्तान में इतने सदस्यों की सदस्यता निलंबित हुई हो. आयोग निलंबन पहले भी करता रहा है और कानूनी औपचारिकता पूरी होने के बाद सदस्यता की बहाली भी हो ही जाती है. मगर यहां सवाल यह है कि कानून बनाने वाले वे लोग, जिनसे समाज के लिए रोल मॉडल बनने की उम्मीद करते हैं, कानून और संविधान के प्रति थोड़ा सा भी सम्मान प्रदर्शित क्यों नहीं करते? दुर्भाग्यपूर्ण है कि कानून की अनदेखी के इन मामलों में सभी राजनीतिक दल, यहां तक कि संसद में प्रतिपक्ष के नेता सैयद खुर्शीद शाह, मंत्री खुर्रम दस्तगीर, शेख राशिद अहमद और डॉ. आरिफ अल्वी तक शिामल हैं.

संपत्ति की घोषणा का यह मामला इसलिए भी जटिल नहीं है कि यह सिर्फ जन-प्रतिनिधियों पर ही लागू नहीं है. देश के कानून के अनुसार, तमाम सरकारी कर्मचारियों को सामान्य प्रक्रिया के तहत हर वर्ष अपनी संपत्ति का ब्योरा देना ही होता है और माना जाता है कि इससे भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी. यह सही है कि ऐसे लोग अपनी संपत्ति से संबंधित दस्तावेज सौंप ही देंगे और उनकी सदस्यता भी बहाल हो ही जाएगी, लेकिन यह संबंधित कानून के सम्मान का मामला है.

यह भी देखा गया है कि जन-प्रतिनिधि संसद में हफ्तों, कई बार तो महीनों तक नहीं आते, लेकिन अपना वेतन नियमित रूप से उठाते रहते हैं. सदन में कोरम का पूरा न होना रोजमर्रा की बात है. मंत्री तक संसद की कार्यवाही और सत्रों में रुचि नहीं लेते दिखते. खैर जो भी हो, उम्मीद की जानी चाहिए कि पाकिस्तान के सांसद अपनी संपत्तियों का न सिर्फ ब्योरा देंगे, बल्कि पूरी ईमानदारी से देंगे, क्योंकि अपवाद को छोड़ दें, तो ब्योरा देने की यह परंपरा मात्र एक रस्म अदायगी बनकर रह गई है.

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