Download App

Filmstars के ठुमकों पर बरसतें हैं करोड़ों

वाकया अब से कोई 8 साल पहले का है. मशहूर बौलीवुड अभिनेता शाहरुख खान एक शादी में शामिल होने के लिए दुबई गए थे. विवाहस्थल था नामी मेडिनाट जुमैराह होटल, मेजबान थे अहमद हसीम खूरी और मरियम ओथमन, जिन की गिनती खाड़ी के बड़े रईसों में शुमार होती है.

मौका था इन दोनों के बेटे की शादी का, जो इतने धूमधाम से हुई थी कि ऐसा लगा था कि इस में पैसा खर्च नहीं किया गया बल्कि फूंका और बहाया गया है. इस की वजह भी है कि शायद ही खुद अहमद हसीम खूरी को मालूम होगा कि उन के पास कितनी दौलत है.

एक आम पिता की तरह इस खास शख्स की यह ख्वाहिश थी कि बेटे की शादी इतने धूमधाम से हो कि दुनिया याद रखे और ऐसा हुआ भी, जिस में शाहरुख खान का वहां जा कर नाच का तड़का लगाना एक यादगार लम्हा बन गया था.

चूंकि खूरी शाहरुख के अच्छे परिचित हैं, इसलिए यह न सोचें कि वे संबंध निभाने और शिष्टाचारवश इस शादी में शिरकत करने गए थे, बल्कि हकीकत यह कि वह वहां किराए पर नाचने गए थे. आधे घंटे नाचने की कीमत शाहरुख ने 8 करोड़ रुपए वसूली थी और मेजबानों ने खुशीखुशी दी भी थी.

रियल एस्टेट से ले कर एयरलाइंस तक के कारोबार के किंग अहमद हसीम खूरी जो दरजनों छोटीबड़ी कंपनियों के मालिक हैं, के लिए यह वैसी ही बात थी जैसे किसी भेड़ के शरीर से 8-10 बाल झड़ जाना. लेकिन शाहरुख के लिए यह पैसा पूरी तरह से बख्शीश तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन बोनस जरूर था.

यह डील राशिद सैय्यद ने करवाई थी, जो दुबई में शाहरुख के इवेंट आयोजित करवाते हैं. इस डील में भी उन्हें तगड़ा कमीशन मिला था. यह वह दौर था जब शाहरुख खान अपनी बीमारी की वजह से निजी आयोजनों में जाने से परहेज करते थे, पर आधे घंटा ठुमका लगाने के एवज में मिल रही 8 करोड़ की रकम का लालच वह छोड़ नहीं पाए थे. क्योंकि सौदा कतई घाटे का न हो कर तगड़े मुनाफे का था.

ऐसा नहीं है कि शाहरुख देश की शादियों में नाचनेगाने की फीस चार्ज न करते हों. हां, वह कम जरूर होती है. आजकल वह शादियों में शामिल होने के 2 करोड़ लेते हैं और मेजबान अगर उन्हें नचाना भी चाहे तो यह फीस 3 करोड़ हो जाती है.

लेकिन समां ऐसा बंधता है कि लड़की या लड़के वाले के पैसे वसूल हो जाते हैं. शान से शादी करना हमेशा से ही लोगों की फितरत रही है और इस के लिए वे ज्यादा से ज्यादा दिखावा और खर्च करते हैं, जिस का बड़ा हिस्सा मनोरंजन पर खर्च होता है.

करोड़ों के ठुमके

एक दौर था जब अमीरों और जमींदारों के यहां की शादियों में नामी रंडियां, बेड़नियां और तवायफें दूरदूर से नाचने के लिए बुलाई जाती थीं. इन का नाच देखने और मुजरा सुनने के लिए खासी भीड़ इकट्ठी होती थी.

प्रोग्राम के बाद लोग मान जाते थे कि वाकई मेजबान इलाके का सब से बड़ा रईस और दिलदार आदमी है, जिस ने 11 बेड़नियां नचा कर फलां को मात दे दी, जो अपने बेटे की शादी में केवल 5 तवायफें ही ला पाया था.

5 हों या 7 या फिर 11, इन पेशेवर नचनियों को खूब मानसम्मान दिया जाता था और उन की खातिर खुशामद में कोई कमी नहीं रखी जाती थी. इन की फीस भी तब के हिसाब से तौलें तो किसी शाहरुख, सलमान, रितिक रोशन, अक्षय कुमार, कटरीना कैफ, अनुष्का शर्मा, रणवीर सिंह या प्रियंका चोपड़ा से कम नहीं होती थी.

ये सभी फिल्म स्टार शादियों और दूसरे निजी आयोजनों में हिस्सा लेने में अपनी और मेजबान की हैसियत के हिसाब से फीस लेते हैं, जो फिल्मों के अलावा इन की अतिरिक्त आमदनी होती है. हालांकि पैसों के लिए ये अब उद्घाटन के अलावा शपथ ग्रहण समारोहों तक में शामिल होने लगे हैं और विज्ञापनों व ब्रांड प्रमोशन से भी अनापशनाप कमाते हैं. लेकिन शादियों की बात कुछ अलग हटकर है.

वक्त के साथ शादियों के पुराने तौरतरीके बदले तो बेड़नियों और तवायफों की जगह फिल्म स्टार्स ने ले ली. शादियों में खासतौर से इन की मांग ज्यादा होती है, क्योंकि खुशी के इस मौके को लोग यादगार बना लेना चाहते हैं. ऐसे में अगर कोई फिल्मी सितारा वे अफोर्ड कर सकते हैं तो उसे बुलाने से चूकते नहीं.

ये डील सीधे भी होती हैं, पीआर एजेंसी और इवेंट कंपनियों के जरिए भी. और किसी जानपहचान वाले का फायदा भी उठाया जाता है. हालांकि अधिकांश बड़े सितारों ने इस बाबत अपने खुद के भी बिजनैस मैनेजर नियुक्त कर रखे हैं.

शाहरुख खान वक्त की कमी के चलते साल में 3-4 से ज्यादा शादियों में नहीं जाते. इस से ही उन्हें कोई 10 करोड़ की सालाना कमाई हो जाती है. शाहरुख की तरह ही सलमान खान भी साल में 3-4 शादियों में ही शिरकत करते हैं. हां, उन की फीस थोड़ी कम 2 करोड़ रुपए है.

सलमान शादियों में दिल से नाचते हैं और घरातियों और बारातियों को भी खूब नचाते हैं. शाहरुख के बाद सब से ज्यादा मांग उन्हीं की रहती है. आप जान कर हैरान हो सकते हैं कि इन दोनों के पास साल में ऐसे यानी पेड डांस के कोई 200 न्यौते आते हैं, लेकिन ये जाते सिर्फ 3 या 4 में ही हैं.

अक्षय नहीं दिखाते ज्यादा नखरे

जिन्हें शाहरुख या सलमान खान से मंजूरी नहीं मिलती, वे अक्षय कुमार जैसे स्टार की तरफ दौड़ लगा देते हैं जो आसानी से मिल जाते हैं और इन की फीस भी उन से कम होती है. आजकल अक्षय कुमार डेढ़ करोड़ में नाचने को तैयार हो जाते हैं क्योंकि उन का बाजार ठंडा चल रहा है.

अक्षय कुमार की यह खूबी है कि बेगानी शादी में यह दिखाने की पूरी कोशिश करते हैं कि वे वर या वधु पक्ष के बहुत अजीज हैं. अब यह और बात है कि समझने वाले समझ जाते हैं कि वे आए तो किराए पर नाचने हैं.

अक्षय कुमार से भी सस्ते पड़ते हैं रणवीर सिंह, जिन की शादी में नाचने की फीस सिर्फ एक करोड़ रुपए है और केवल शादी में शामिल होना हो यानी नाचना न हो तो वे 50 लाख में भी मुंह दिखाने को तैयार हो जाते हैं.

‘कहो न प्यार है’ फिल्म से रातोंरात स्टार बन बैठे रितिक रोशन शादी में शामिल होने के लिए एक करोड़ फीस चार्ज करते हैं और नाचना भी हो तो इस अमाउंट में 50 लाख रुपए और जुड़ जाते हैं. यानी डेढ़ करोड़ रुपए

कपूर खानदान के रणबीर कपूर कभीकभार ही ऐसे न्यौते स्वीकारते हैं, उन की फीस डेढ़ करोड़ रुपए है.

सस्ती पड़ती हैं एक्ट्रेस

नायकों के मुकाबले शादियों में नचाने को नायिकाएं सस्ती पड़ती हैं जबकि उन में आकर्षण ज्यादा होता है. सब से ज्यादा डिमांड कटरीना कैफ की रहती है, जिन की फीस बड़े नायकों के बराबर ढाई करोड़ रुपए है.

कटरीना को अपनी शादी में नाचते देखने का लुत्फ वही उठा सकता है, जो घंटा आधा घंटा के एवज में यह भारीभरकम रकम खर्च कर सकता हो. हालांकि ऐसे शौकीनों की कमी भी नहीं. कटरीना के बराबर ही मांग प्रियंका चोपड़ा की रहती है. उन की फीस भी ढाई करोड़ है, जिसे अदा कर उन से ठुमके लगवाए जा सकते हैं.

इन दोनों को टक्कर देने वाली करीना कपूर डेढ़ करोड़ में शादी को यादगार बनाने के लिए तैयार हो जाती हैं और नाचती भी दिल से हैं. तय है कपूर खानदान की होने के नाते वे भारतीय समाज और उस की मानसिकता को बारीकी से समझती हैं कि लोग बस इस मौके को जीना चाहते हैं जिस में उन का रोल एक विशिष्ट मेहमान का है.

उन के दादा राजकपूर की हिट फिल्म ‘प्रेम रोग’ में अचला सचदेव नायिका पद्मिनी कोल्हापुरे की शादी में बहैसियत तवायफ ही आई थीं. इस दृश्य के जरिए राजकपूर ने दिखाया था कि ठाकुरों और जमींदारों के यहां शादियों में नाचगाना 7 फेरों से कम अहमियत नहीं रखता और इस पर वे खूब पैसे लुटाते हैं.

रणवीर सिंह की पत्नी दीपिका पादुकोण भी सस्ते में शादी में जाने तैयार हो जाती हैं उन की फीस महज एक करोड़ रुपए है. नामी अभिनेत्रियों में सब से किफायती अनुष्का शर्मा हैं, जो शादी में शामिल होने के 50 लाख और नाचना भी हो तो एक करोड़ रुपए लेती हैं. क्रिकेटर विराट कोहली से शादी करने के बाद भी उन की फीस बढ़ी नहीं है.

वजह कुछ भी हो, शादी को रंगीन और यादगार बनाने के लिए अभिनेत्रियां कम पैसों में मिल जाती हैं. मसलन, सोनाक्षी सिन्हा जो मोलभाव करने पर 25 लाख में भी नाचने को राजी हो जाती हैं, जबकि वह भारीभरकम फीस वाली अभिनेत्रियों से उन्नीस नहीं और उन के मुकाबले जवान और ताजी भी हैं.

युवाओं में उन का खासा क्रेज है. सोनाक्षी से भी कम रेट में उपलब्ध रहती हैं दीया मिर्जा, सेलिना जेटली और गुजरे कल की चर्चित ऐक्ट्रेस प्रीति झिंगयानी और एक वक्त का बड़ा नाम अमीषा पटेल, जिन्होंने रितिक रोशन के साथ ही ‘कहो न प्यार है’ फिल्म से डेब्यू किया था.

इमेज है बड़ा फैक्टर

अपने बजट को ही नहीं बल्कि लोग इन कलाकारों को बुलाते समय अपनी प्रतिष्ठा और उन की इमेज को भी ध्यान में रखते हैं. क्या कोई अरबपति उद्योगपति राखी सावंत को अपने यहां शादी में बुलाएगा, जबकि उस की फीस महज 10 लाख रुपए है? जबाब है बिलकुल नहीं बुलाएगा, क्योंकि राखी की इमेज कैसी है यह सभी जानते हैं.

राखी सावंत को बुलाया तो जाता है और वह हर तरह से नाचती भी हैं लेकिन उन के क्लाइंट आमतौर पर वे नव मध्यमवर्गीय होते हैं जो अपनी धाक समाज में जमाना चाहते हैं.

यही हाल केवल 25 लाख में नाचने वाली पोर्न स्टार सनी लियोनी का है, जिन की क्लाइंटल रेंज उन्हीं की तरह काफी कुछ हट कर है.

राखी और सनी जैसी दरजन भर छोटी अभिनेत्रियों की आमदनी का बड़ा जरिया ये शादिया हैं, जिन में शिरकत करने और नाचने को वे एक पांव पर तैयार रहती हैं. इसी क्लब में मलाइका अरोड़ा भी शामिल हैं, जिन की फीस भी कम 15 लाख है.

हरियाणवी डांसर सपना चौधरी के धमाकेदार डांस और बेबाक अंदाज को तमाम लोग पसंद करते हैं. स्टेज शो के अलावा शादी समारोह में जाने के लिए वह एक लाख रुपए में ही तैयार हो जाती हैं. लेकिन वह 50 प्रतिशत एडवांस लेती हैं.

बड़े नायक और नायिकाएं अपने यहां शादियों में नचवा कर लोग न केवल अपनी रईसी झाड़ लेते हैं बल्कि धाक भी जमा लेते हैं. लेकिन कोई कभी खलनायकों को नहीं बुलाता. कभीकभार शक्ति कपूर शादियों में 10 लाख रुपए में ठुमका लगाने चले जाते हैं पर अब उन की इमेज कामेडियन और चरित्र अभिनेता की ज्यादा बन चुकी है. वैसे भी वह जिंदादिल कलाकार हैं जिस का बाजार और कीमत अब खत्म हो चले हैं.

बदलता दौर बदलते लोग

शादी में हंसीमजाक, नाचगाना न हो तो वह शादी कम एक औपचारिकता ज्यादा लगती है. इसलिए इन में हमेशा कुछ न कुछ नया होता रहता है.

60-70 के दशक में बेड़नियां और तवायफें नचाना उतने ही शान की बात होती थी, जितनी कि आज नामी स्टार्स को नचाना होती है. जरूरत बस जेब में पैसे होने की है. शादियों में नाचने से फिल्मी सितारों को आमदनी के साथसाथ पब्लिसिटी भी मिलती है.

इन के दीगर खर्च और नखरे भी आमतौर पर मेजबान को उठाने पड़ते हैं मसलन हवाई जहाज से आनेजाने का किराया, 5 सितारा होटलों में स्टाफ सहित ठहरने का खर्च और कभीकभी तो कपड़ों तक का भी. बशर्ते मेजबान ने यदि कोई ड्रेस कोड रखा हो तो नहीं तो ये लोग अपनी पसंद की पोशाक पहनते हैं.

शादियों में फिल्मी सितारों का फीस ले कर नाचने और ठुमकने का कोई ज्ञात इतिहास नहीं है, लेकिन इस की शुरुआत का श्रेय उन छोटीबड़ी आर्केस्ट्रा पार्टियों को जाता है, जिन्होंने 80 के दशक से शादियों में गीतसंगीत के स्टेज प्रोग्राम देने शुरू किए थे.

बाद में इन में धीरेधीरे छोटे और फ्लौप कलाकार भी नजर आने लगे. आइडिया चल निकला तो देखते ही देखते नामी सितारों ने इसे धंधा ही बना डाला.

शादियों में इस दौर में महिला संगीत और हल्दी मेहंदी का चलन भी तेजी से समारोहपूर्वक मनाने का बढ़ा था, जिस में रंग इन स्टार्स ने भरना शुरू कर दिया. थीम वेडिंग के रिवाज से भी इन की मांग बढ़ी.

इस के बाद भी यह बाजार बहुत बड़ा नहीं है क्योंकि इन की फीस बहुत ज्यादा है, जिसे कम लोग ही अफोर्ड कर पाते हैं. हां, सपना हर किसी का होता है कि उन के यहां शादी में कोई सलमान, शाहरुख, अक्षय, कटरीना या प्रियंका नाचें, लेकिन यह बहुत महंगा सपना है.

Romantic Poem : भीगते रहे हम, कमरे में बरसात हुई

जब तेरे बारे में दीवारों से कुछ बात हुई

भीगते रह गए हम, कमरे में बरसात हुई

गुल खिले, शाख झुकी और करामात हुई

तू नहीं आई तो खुशबू से बहुत बात हुई

मैं कई बार तेरे जिस्म के घर आया हूं

मगर तुम से अब तक न मुलाकात हुई

कब तेरा आना हुआ, कब बढ़ी है रौनक

कब मुकम्मल महफिल-ए-जज्बात हुई

तीन चीजों के अलावा न नजर आया कुछ

दिन निकला, ढली शाम, जिगर रात हुई.

– जिगर जोशी

online hindi story : कशमकश

 “तुम्हारे पापा नहीं रहे.” उस के फोन उठाते ही मां ने कहा और फफकफफक कर रो पड़ीं.

“क्या कह रही हैं आप? कल ही तो मैं ने उन से बात की थी. अचानक ऐसा क्या हुआ?” अनामिका ने खुद को संभालते हुए कहा.

“बेटा, रात में जब वे सोए थे तब तो ठीक थे. सुबह अपने समय पर नहीं उठे तो मैं ने सोचा शायद रात में ठीक से नींद न आई होगी. 7 बजे जब मैं नीबूपानी ले कर उन्हें जगाने गई तो देखा…” वाक्य अधूरा छोड़ कर वे फिर फफक पड़ीं.

“मां, संभालो खुद को, मैं आती हूं,” कह कर उस ने फोन रख दिया.

उस ने राजीव अंकल, जो उन के पड़ोसी व पापा के अच्छे मित्र थे, को फोन मिलाया. उन्होंने तुरंत फोन उठा लिया. वह कुछ कहने ही वाली थी कि उन्होंने कहा, “बेटा, तुम चिंता मत करना, मैं और तुम्हारी आंटी तुम्हारी मां के पास ही हैं.”

“अंकल, मैं शाम तक ही पहुंच पाऊंगी, चाहती हूं कि पापा का अंतिम संस्कार मेरे सामने हो.”

“ठीक है बेटा, मैं दिनेश के पार्थिव शरीर को बर्फ की सिल्ली पर रखवा देता हूं.”

“थैंक यू अंकल.”

अनामिका फ्लाइट का टिकट बुक करा कर पैकिंग करने लगी. 3 घंटे बाद उस की फ्लाइट थी. बेंगलुरु का ट्रैफिक, 2 घंटे उसे एयरपोर्ट पहुंचने में लगने थे. वह तो गनीमत थी कि बेंगलुरु से लखनऊ के लिए डायरैक्ट फ्लाइट मिल गई थी वरना समय पर पहुंचना मुश्किल हो जाता. टैक्सी में बैठते ही उस ने छुट्टी के लिए मेल कर, अपने बचपन के मित्र पल्लव, जो सीतापुर में रहता था, को फोन कर के पिता के बारे में बताया. उस की बात सुनकर वह स्तब्ध रह गया. कुछ देर बाद उस ने कहा, “मैं तुरंत सीमा के साथ आंटीजी के पास जाता हूं. तुम परेशान न होना, धैर्य रखना.” उस से बात कर उस ने अपने टीममेट अभिजीत को फोन कर वस्तुस्थिति से अवगत कराया. उस ने उसे सांत्वना देते हुए कहा कि वह यहां की चिंता न करे, काम का क्या, वह तो चलता ही रहेगा.

‘काम का क्या, वह तो चलता ही रहेगा’ अभिजीत के शब्द उस के कानों में गूंज रहे थे लेकिन इसी काम के लिए वह पिछले 2 वर्षों से घर नहीं जा पाई है. मां बारबार उस से आने के लिए कहतीं पर उस पर काम का प्रैशर बहुत अधिक था या वही अपना सर्वश्रेष्ठ परफौर्मैंस देने के लिए घर जाना टालती रही. माना आईटी क्षेत्र के जौब में पैसा अधिक है पर यह व्यक्ति का खून भी चूस लेता है. न खाने का कोई समय, न घूमने का, ऊपर से सिर पर छंटनी की तलवार अलग लटकी रहती है.

दस वर्ष हो गए उस को यह जौब करते हुए. मांपापा चाहते थे कि वह विवाह कर ले. विभव उसे चाहता है व उस से विवाह भी करना चाहता है लेकिन अपने औफिस में काम करने वाली अपनी सखियों नमिता और सुहाना की स्थिति देख कर उसे विवाह से डर लगने लगा है. परिवार बढ़ाने के लिए उन का नित्य अपने पतियों से झगड़े की बात सुन कर उसे लगने लगा था कि यदि वह अपने काम के साथ घरपरिवार को समय नहीं दे पाई तो उस के साथ भी यही होगा. वह 2 नावों की सवारी एकसाथ नहीं कर सकती. उस के लिए उस का कैरियर मुख्य है. यह सब सोचतेसोचते वह 32 वर्ष की हो गई लेकिन अपनी मनोस्थिति के कारण वह कोई भी फैसला लेने में खुद को असमर्थ पा रही है. अब तो पापा भी नहीं रहे. मां की जिम्मेदारी भी अब उस पर है. क्या विभव उस की मां की जिम्मेदारी लेने को तैयार होगा? वह विचारों के भंवर में डूबी ही थी कि एयरपोर्ट आ गया. उस ने जल्दी से टैक्सी का पैसा चुकाया और एयरपोर्ट के अंदर गई. बोर्डिग पास ले कर, सिक्यूरिटी चैक के बाद वह वेटिंगलाउंज में जा कर बैठी ही थी कि विभव का फोन आ गया.

“तुम ने बताया नहीं कि अंकल नहीं रहे,” विभव ने कहा.

वह समझ नहीं पा रही थी कि उस के प्रश्न का क्या उत्तर दे, तभी उस ने फिर कहा, “तुम कुछ कह क्यों नहीं रही हो, तुम ठीक तो हो न? बुरा न मानना यार, मुझे अभी पल्लव से पता चला तो मुझे लगा कि तुम ने उसे तो बता दिया पर मुझे नहीं.”

“विभव, मैं अभी बात करने के मूड नहीं हूं. वैसे भी, बोर्डिंग शुरू हो गई है,” कहते हुए अनामिका ने फोन काट दिया. विभव की यही बात उसे अच्छी नहीं लगती थी. हमेशा शिकायतें ही शिकायतें. और समय तो ठीक है पर आज…ऐसे समय में भी वह यह नहीं सोच पा रहा है कि मैं कितनी परेशान हूं. सांत्वना के दो शब्द कहने के बजाय आज भी सिर्फ शिकायत.

जिस्म एयरपोर्ट पर था लेकिन मन घर पहुंच गया था. पापा के पार्थिव शरीर को पकड़ कर मां के फफकफफक कर रोने की छवि आंखों के सामने आते ही उस की आंखों से आंसू निकल पड़े. उसे सदा से ही आंसू कमजोरी की निशानी लगते थे किंतु आज उस ने उन्हें बहने दिया. आज उसे लग रहा था कि ये आंसू ही तो हैं जो इंसान के दर्द को कम करने में सहायक होते हैं. मां अब पापा के बिना कैसे अकेले रहेंगी? वे तो दो जिस्म एक जान रहे हैं. कभी काम से पापा के बाहर जाने की बात यदि छोड़ दें तो मांपापा कभी अलग नहीं रहे. बोर्डिंग का एनाउंसमैंट होते ही उस ने बरसती आंखों को पोंछा व सब से पहले बोर्डिंग गेट पर जा कर खड़ी हो गई. मानो उस के बैठते ही प्लेन चल पड़ेगा. सच, कभीकभी मन तो तुरंत पहुंचना चाहता है और शायद पहुंच भी जाता है पर तन को बहुत सारे बंधनों व नियमों को मानना ही पड़ता है, बहुत सारी बाधाओं को झेलना पड़ता है.

आखिर प्लेन ने उड़ान भर ही ली. उस ने आंखें बंद कर लीं. बंद आंखों में अतीत के पल चलचित्र की तरह मंडराने लगे. उसे वह दिन याद आया जब उच्च शिक्षा के लिए लखनऊ शहर में उस का दाखिला होने के बाद पापा उसे होस्टल छोड़ने गए थे.

पापा के जाने के बाद उस की आंखें बरसने को आतुर थीं लेकिन आंसुओं को आंखों में ही रोक कर वह अपने कमरे में आ कर निशब्द एक ही जगह बैठी रह गई थी. मन में द्वंद चल रहा था. आखिर वह दुखी क्यों है? उस की ही इच्छा तो उस के पापा ने उस की मां के विरुद्ध जा कर पूरी की है. उस के मन के प्रश्न का उस के पास कोई उत्तर ही न था. वह एक छोटे कसबे से आई थी. जहां यहां आने से पहले वह खुश थी वहीं अब यहां आ कर न जाने क्यों मन में द्वन्द था, चिंताएं थीं, आशंका थी कि क्या वह इस बड़े शहर में खुद को एडजस्ट भी कर पाएगी. पापा की कपड़े की दुकान थी. वे खुद तो अधिक पढ़ेलिखे नहीं थे लेकिन मनमस्तिष्क से आधुनिक विचारधारा के पोषक थे. वे चाहते थे उन की बेटी इतनी सक्षम बने कि अगर कभी जीवन में कोई कठिनाई आए तो वह उस का सामना कर सके पर उस की मां उस के दूर जाने की आशंका मात्र से ही परेशान थीं. उन्हें लगता था कि उन की भोलीभाली बेटी शहर में अकेली कैसे रह पाएगी.

मां की आशंका गलत भी नहीं थी. पापा के विपरीत उन्होंने शुरू से ही दुनिया की कुत्सित नजरों से बचाने के लिए उसे इतने बंधन में रखा था कि वह किसी से भी बात करने या अकेले कहीं भी जाने में डरने लगी थी. स्कूल भेजना तो मां की मजबूरी थी. घर से स्कूल, स्कूल से घर ही उस की दुनिया थी. मां का अनुशासन या कहें रोकटोक उसे कोई स्वप्न देखने का अधिकार ही नहीं देती थी.

एक बार वह बूआ के घर गई. सीमा दीदी, बूआ की बेटी, जो उस समय डाक्टरी की पढ़ाई कर रही थी, को देख कर उस के नन्हें मन में भी एक नन्हा सपना तिर आया था. उस ने सुना था कि डाक्टर बनने के लिए बहुत अच्छे नंबर आने चाहिए. उस ने मन लगा कर पढ़ना शुरू कर दिया था. मैट्रिक में उस के 95 प्रतिशत अंक आए तो उस की बूआ ने के पापा से उस का शहर के अच्छे कालेज में दाखिला करवाने के लिए कहा. पापा को भी अपनी बहन की बात अच्छी लगी. सो, पापा ने इस शहर के अच्छे कालेज में दाखिला करवा कर, स्कूल के पास स्थित महिला होस्टल में उस के रहने की व्यवस्था कर दी है. पापा के जाते समय वह फूटफूट कर रोने लगी थी.

‘बेटा, रो मत. तेरे भविष्य के लिए ही तुझे यहां छोड़ रहे हैं. बस, अपना खयाल रखना. तुझे तो पता है तेरी मां तुझे ले कर कितनी पजेसिव है,’ कहते हुए पापा ने उस के सिर पर हाथ फेरा था व बिना उस की ओर देखे चले गए.

अपने आंसुओं को रोक कर वह अपने कमरे में आ गई पर उसे बारबार ऐसा लग रहा था कि उसे छोड़ कर जाते हुए पापा की आंखों में भी आंसू थे जिस की वजह से उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. यह विचार आते ही वह और उदास हो गई.

‘मैं अंजली, और तुम?’ अंजली ने कमरे में प्रवेश करते ही कहा.

‘मैं अनामिका,’ अपने विचारों के कवच से बाहर निकलते हुए उस ने कहा.

‘बहुत प्यारा नाम है, क्या करने आई हो?’

‘मैं ने यहां जयपुरिया कालेज में 11वीं में एडमिशन लिया है.’

‘जयपुरिया, उस में तो मैं भी पढ़ रही हूं.’

‘क्या 11वीं में?’

‘नहीं, 12वीं में.’

‘ओह,’ कहते हुए अनामिका के चेहरे पर उदासी झलक आई.

‘क्यों, क्या हुआ? अरे क्लास एक नहीं है तो क्या हुआ, हमारा आनाजाना तो साथ होगा,’ अंजली ने उस के चेहरे की उदासी देख कर कहा.

‘वह बात नहीं, मांपापा की याद आ गई,’ अनामिका ने रोंआसी आवाज में कहा.

‘मैं तुम्हारा दर्द समझ सकती हूं. जब भी कोई पहली बार घर छोड़ता है, उस की मनोदशा तुम्हारी तरह ही होती है. पर धीरेधीरे सब ठीक हो जाता है. आखिर, हम अपना कैरियर बनाने के लिए यहां आए हैं. अच्छा, बेसन के लड्डू खाओ. मैं भी कल ही आई हूं, मां ने साथ में रख दिए थे,’ अंजली ने अनामिका का मूड ठीक करने का प्रयास करते हुए कहा.

‘बहुत अच्छे बने हैं,’ अनामिका ने लड्डू खाते हुए कहा.

‘अच्छे तो होंगे ही, इन में मां का प्यार जो मिला है. अच्छा, अब मैं चलती हूं. थोड़ा फ्रैश हो लूं. अपने कमरे में जा रही थी, यह कमरा खुला देख कर तुम्हारी ओर नजर गई तो सोचा मिल लूं अपनी नई आई सखी से. मेरा कमरा तुम्हारे कमरे के बगल वाला है रूम नंबर 205. रात में 8 बजे खाने का समय है, तैयार रहना और हां, अपना यह बिखरा सामान आज ही समेट लेना, कल से तो कालेज जाना है,’ अंजली ने कहा.

अंजली के जाते ही अनामिका अपना सामान अलमारी में लगाने लगी कि तभी मोबाइल की घंटी बज उठी. फोन मां का था.

“बेटा, तू ठीक है न? सच तेरे बिना यहां हमें अच्छा नहीं लग रहा है. बहुत याद आ रही है तेरी.’

‘मां, मुझे भी,’ कह कर वह रोने लगी.

‘तू लौट आ,’ मां ने रोते हुए कहा.

‘अनामिका, क्या हुआ? अगर तू ऐसे कमजोर पड़ेगी तो पढ़ेगी कैसे? बेटा, रोते नहीं हैं. तेरी मां तो ऐसे ही कह रही है. अगर तुझे नहीं पढ़ना तो आ जा, मैं तुम्हें रोकूंगा नहीं लेकिन कोई भी फैसला लेने से पहले यह मत भूलना कि पढ़ाई के बिना जीवन बेकार है. चाहे लड़का हो या लड़की, जीवन के रणसंग्राम में खुद को स्थापित करने के लिए शिक्षा बेहद आवश्यक है. क्षणिक निर्णय सदा आत्मघाती होते हैं बेटा. सो, जो भी निर्णय लेना सोचसमझ कर लेना क्योंकि इंसान का सिर्फ एक निर्णय उस के जीवन को बना भी सकता है और बिगाड़ भी,’ पापा ने मां के हाथ से फोन ले कर कहा.

‘अरे, तुम अभी बात ही कर रही हो, खाना खाने नहीं चलना,’ अंजली ने कमरे में आ कर कहा.

‘पापा, मैं खाना खाने जा रही हूं, आ कर बात करती हूं.’

वह अंजली के साथ मेस में गई. वहां उस की तरह ही लगभग 15 लड़कियां थीं. सभी ने उस का बेहद अपनेपन से स्वागत किया. सब से परिचय करते हुए उस ने खाना खाया. रेखा और बबीता नौकरी कर रही थीं जबकि अन्य लड़कियां पढ़ रही हैं. खाना घर जैसा तो नहीं लेकिन ठीकठाक लगा.

खाना खा कर जब वह अपने कमरे में जाने लगी तो उस के साथ चलती रेखा ने उस के पास आ कर कहा, ‘अनामिका, तुम नईनई आई हो, इसलिए कह रही हूं, हम सब यहां एक परिवार की तरह रहते हैं. तुम खुद को अकेला मत समझना. कभी मन घबराए या अकेलापन महसूस हो, तो मेरे पास आ जाना. मेरे कमरे का नंबर 208 है.’

रेखा की बात सुन कर एकाएक उसे लगा कि जब ये लोग रह सकती हैं तो वह क्यों नहीं. मन में चलता द्वन्द ठहर गया था. अंजली ने बताया था कि सुबह 8 बजे नाश्ते का समय है. अपने कमरे में आ कर अब वह काफी व्यवस्थित हो गई थी. मां का फोन आते ही उस ने सारी घटनाओं के बारे में बताते हुए कहा, ‘मां, चिंता मत करो, मैं ठीक हूं, यहां सब लोग अच्छे हैं.’

‘ठीक है बेटा, ध्यान से रहना. आज के जमाने में किसी पर भरोसा करना ठीक नहीं है. कल तेरा स्कूल का पहला दिन है, अपना खयाल रखना. स्कूल से सीधे होस्टल आना और मुझे फोन करना.’

‘जी मां.’

ढेरों ताकीदें दे कर मां ने फोन रख दिया था. मां उस के लिए चिंतित जरूर रहती थीं लेकिन उन्होंने उसे कभी किसी ढोंग या ढकोसले, रूढ़ियों, बेड़ियों व परंपराओं में नहीं बांधा था.

समय पंख लगा कर उड़ता गया, पता ही नहीं चला. हायर सैकंडरी के साथ उस ने इंजीनियरिंग की कोचिंग शुरू कर दी. उस की खुशी की सीमा न रही जब वह जेईई मेंस में क्लियर हो गई. आईआईटी में दाखिले के लिए उसे जेईई एडवांस की परीक्षा देनी थी. उस की मेहनत का परिणाम था कि वह प्रथम बार में ही इस में भी सफल हो गई. आखिरकार, उसे आईआईटी कानपुर में दाखिला मिल गया. मांपापा की खुशी का ठिकाना न था. उन के परिवार में वह लड़के, लड़कियों में पहली थी जो इंजीनियरिंग पढ़ेगी. उस के बाद उस ने मुड़ कर नहीं देखा. मां कभी विवाह के लिए कहतीं तो वह कह देती ‘मुझे समय नहीं है’ या ‘जौब के साथ घरपरिवार’ मुझ से न हो पाएगा. वैसे भी, उसे कभी लगा ही नहीं कि उसे विवाह करना चाहिए. पिछले 10 वर्षो में वह कई लोगों के संपर्क में आई. कुछ लोगों ने उस से विवाह की इच्छा जताई पर वह आगे नहीं बढ़ पाई क्योंकि कुछ ही दिनों में उस पर उन की पुरुषवादी मानसिकता प्रभावी होने लगती और उसे अपने आगे बढ़े कदमों को पीछे खींचना पड़ता. इस के साथ ही उसे यह भी लगता कि वह अपने मातापिता की अकेली लड़की है, अगर कभी उन्हें उस की आवश्यकता पड़ी तो क्या उस से विवाह करने वाला पुरुष उस की भावनाओं को समझेगा.

जब वह छोटी थी तो अकसर मांपापा के हितैषी उन से परिवार के वारिस की बात करते तो पापा कहते कि मेरी अनामिका मेरे लिए पुत्र और पुत्री दोनों है. आजकल न पुत्र पास में रहता है और न पुत्री. फिर किसी से आस क्यों? माना मांपापा उस से आस नहीं करते हैं और न ही कभी करेंगे लेकिन उम्र की भी तो अपनी बंदिशें होती हैं.

“अब हम लखनऊ के चौधरी चरण सिंह एयरपोर्ट पर उतर रहे हैं” की आवाज ने उसे अतीत से वर्तमान में ला दिया. प्लेन की खिड़की से उसे नजर आते छोटेछोटे घरों, पेड़पौधों तथा पतली धार में दिखती गोमती नदी को देखना बहुत अच्छा लगता था पर आज उस को कुछ अच्छा नहीं लग रहा था. प्लेन के लैंड करते ही उस ने मोबाइल औन कर मां को फोन मिलाया. फोन चाचाजी ने उठाया. उस की बात सुन कर उन्होंने कहा, “बेटा, सब तेरा ही इंतजार कर रहे हैं.”

उस ने प्लेन में बैठेबैठे ही कैब बुक करवा दी जिस से बाहर निकलते ही वह चल सके. जैसे ही वह एयरपोर्ट से बाहर निकली, कैब मिल गई और वह तुरंत चल पड़ी. वह कुछ तो मिस कर रही थी, शायद पापा को. दरअसल जबजब भी वह घर आती थी, पापा का न जाने कितनी बार फोन आ जाता था, ‘बेटा, तू कहां तक पहुंची है, अभी आने में कितना समय और लगेगा.’

जब वह घर पहंचती, मांपापा गेट के पास खड़े उस का इंतजार करते मिलते. उस के पहुंचते ही गरमागरम जलेबियां और खस्ता मिल जाती थीं क्योंकि उसे जलेबियां बहुत पसंद थीं. आज इस समय वह सब से अधिक पापा के फोन को मिस कर रही थी.

लगभग डेढ़ घंटे में वह सीतापुर अपने घर पहुंची. सभी उस का इंतजार कर रहे थे. पल्लव और सीमा भी वहां उपस्थित थे. अंतिमक्रिया की सारी तैयारियां हो चुकी थीं. उस के घर पहुंचते ही परिवार के सदस्यों ने पिताजी के पार्थिव शरीर को श्मशान घाट ले जाने की तैयारी शुरू कर दी. उन को उठाने को चार लोग बढ़े तो उस ने कहा, “पिताजी को कंधा मैं भी दूंगी.”

“यह कैसी बात कर रही है बिटिया? हमारे घर की लड़कियां शवयात्रा में सम्मिलित नहीं होतीं. तेरा भाई अमित है न, वह बेटे की जिम्मेदारी निभाएगा,” उस के चाचा अविनाश ने उसे रोकते हुए कहा.

“बेटा, तेरे चाचा ठीक कह रहे हैं. अमित और रोमेश तो हैं ही,” उस के मामा जितेंद्र ने कहा. उन के पीछे खड़ा उन का पुत्र रोमेश भी उन का समर्थन करता प्रतीत हो रहा था.

“चाचाजी, प्लीज मुझे पापा के प्रति अपना कर्तव्य निभाने दीजिए,” उस ने मामा की बात को अनसुना करते हुए चाचाजी से कहा.

“बेटा, लेकिन…”

“राकेशजी, प्लीज, अनामिका ठीक कह रही है. दिनेशजी के लिए वह बेटी नहीं, बेटा ही थी. उन्होंने इसे उसी तरह काबिल और आत्मनिर्भर बनाया जैसा वे अपने बेटे को बनाते. इसे अपने पिता के प्रति कर्तव्य निभाने दीजिए.” राजीव अंकल का सहयोग मिलते ही उपस्थित सभी लोगों के सुर धीमे पड़ गए. उस ने शुरू से अंत तक सारे कर्तव्य निभाए. उस का बचपन का मित्र पल्लव और उस की पत्नी सीमा भी लगातार उसे सहयोग देते रहे. चाचाजी को उस की छोटी जाति के कारण उस का आना बिलकुल पसंद नहीं था लेकिन वे चुप ही रहे क्योंकि वे जानते थे कि उन के कहने का अनामिका पर कोई असर नहीं होगा. भाभी को तो होश ही नहीं है.

मां की स्थिति देख कर अनामिका सोच रही थी कि सच एक स्त्री का सारा मानसम्मान, साजश्रृंगार पति ही होता है. पति के बिना उस की ज़िंदगी अधूरी है. पापा थे भी ऐसे, उन्होंने सदा अपनी पत्नी के मानसम्मान को सर्वोपरि रखा था. उस ने कभी उन दोनों को झगड़ते नहीं देखा, न ही अपनी इच्छा को दूसरे पर थोपते देखा था. उस की नजरों में वे आदर्श पतिपत्नी थे.

मां की हालत देख कर उस ने छुट्टी बढ़ा ली. साथ ही, उसे वर्क फ्रौम होम की इजाजत मिल गई थी. लेकिन ऐसा कब तक चलेगा, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? नौकरी उस का पैशन है जबकि मां जिम्मेदारी. एक दिन उसे लैपटौप पर काम करते देख कर उस की मां ने कहा, “बेटा, तेरे काम में हर्जा हो रहा होगा. अब तू अपने काम पर लौट जा, मेरी चिंता मत कर. मैं अब ठीक हूं.”

“नहीं मां, आप की खुशी से ज्यादा मेरा काम नहीं है. मैं आप के लिए अपना जौब छोड़ सकती हूं पर आप को अकेले छोड़ कर नहीं जा सकती.”

“बेटा, मैं इतनी स्वार्थी कैसे हो सकती हूं कि अपनी खुशी के लिए तेरी खुशियां छीन लूं. माना तेरे पापा के जाने के कारण मैं दुखी हूं लेकिन अब मुझे उन के बिना जीने की आदत डालनी ही होगी. बेटा, हम सब इस दुनिया में अपनेअपने किरदार निभा रहे हैं. जब किसी किरदार का रोल खत्म हो जाता है तो उसे जाना ही पड़ता है. बेटा, तेरे पिता का इस संसार में किरदार खत्म हो गया था, इसलिए उन्हें जाना पड़ा. अब मुझे अपना और तुझे अपना किरदार निभाना है,” मां ने उस की ओर देखते हुए कहा.

“किरदार, आप क्या कह रही हैं मां? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है?” अनामिका ने कहा.

“बेटा, अब हमें अपनेअपने किरदार अर्थात अपने कर्तव्य निभाने होंगे. मुझे तेरे पापा की दुकान को संभालना होगा और तुझे अपना काम फिर जौइन करना होगा जिस के लिए तूने इतनी मेहनत की है.”

“मां, दुकान आप संभालोगी?” अनामिका ने आश्चर्य से पूछा.

“क्यों, क्या हुआ? जब तुम बाहर जा कर काम कर सकती हो तो मैं क्यों नहीं? वैसे भी, तुम्हारे पापा मुझ से दुकान की हर बात शेयर करते रहे हैं. मुझे विश्वास है मैं सब संभाल लूंगी. वैसे, भोला तो है ही, तुम्हारे पापा के कहीं जाने पर वही दुकान संभालता था. तेरे पापा को उस पर बहुत विश्वास था. कल जब तू सो रही थी तब वह आया था. वह कह रहा था कि मालकिन, जो होना था वह तो हो गया पर आप इस दुकान को बंद मत कीजिएगा. सदा मालिक का नमक खाया है. छोटा मुंह बड़ी बात मलकिन, मैं झूठ नहीं बोलूंगा. आप तो जानती ही हैं मालकिन कि इस दुकान में मालिक की यादें हैं.

“बेटा, मुझे उस की बात ठीक लगी. वह छोटा था, तभी तेरे पापा उसे गांव से ले कर आए थे. उस का विवाह भी हम ने ही करवाया था. अब इस उम्र में वह बालबच्चों को ले कर कहां जाएगा. तेरे पापा द्वारा छोड़ी जिम्मेदारियों का निर्वहन करना अब मेरा कर्तव्य ही नहीं, दायित्व भी है,” कहते हुए मां की आंखें भर आई थीं.

“आप का सोचना ठीक है मां, पर मां, आप अकेली कैसे रहोगी?” अनामिका की आंखों में चिंता झलक रही थी.

“मैं अकेली कहां हूं बेटा, मेरे साथ तेरे पापा की यादें हैं, अड़ोसीपड़ोसी हैं, भोला है. फिर, जब चाहूं, तुम से बात कर सकती हूं. इस मोबाइल की वजह से दुनिया बहुत छोटी हो गई है. बस, एक रिक्वैस्ट है, तू अब विवाह कर ले. देख, कोई बहाना मत करना. मातापिता के जीवन की यही सब से बड़ी खुशी है कि उन की संतान अपने घरपरिवार में खुश रहे,” मां ने चेहरे पर मुसकान लाते हुए, उसे समझाते हुए कहा.

“मां, विवाह करना आसान नहीं है. लेकिन आप को विश्वास दिलाती हूं कि जब भी मुझे समझने वाला लड़का मिल जाएगा, उसे आप से जरूर मिलवाऊंगी.”

“ठीक है बेटा, मेरी चिंता छोड़ कर अब तू अपने काम पर जा. तेरी खुशी ही मेरी खुशी है.”

आखिर मां की जिद के आगे अनामिका को हथियार डालने ही पड़े. वह बेंगलुरु लौटते हुए सोच रही थी कि उस की मां समय के साथ चलने का जज्बा ही नहीं रखतीं, बहादुर भी हैं.

अभी उसे बेंगलुरु आए हुए महीनाभर ही हुआ था कि भोला का फोन आया.

“दीदी, अब हम क्या कहें, कहने में अच्छा तो नहीं लग रहा है लेकिन अगर हम नहीं कहेंगे तो हम मालिक के प्रति अपना फर्ज नहीं निभा पाएंगे.”

“क्या हुआ भोला, खुल कर कहो?”

“दीदी, आप के आने के बाद रोमेश भैया दुकान पर आ कर बैठने लगे हैं. कभीकभी मामाजी भी आ जाते हैं. हिसाबकिताब के 2 रजिस्टर बना लिए हैं. मालिक का तो एक ही रजिस्टर था. हमें उन की नीयत ठीक नहीं लग रही है.”

“क्या, और मां?”

“रोमेश भैया के यहां आने के बाद उन्होंने दुकान पर आना बंद कर दिया है.”

“वे रहते कहां हैं?”

“मालकिन के घर में ही सब आ गए हैं.”

“अच्छा किया जो तुम ने हमें बता दिया. हम देखते हैं.”

“दीदी, मालकिन को न बताइएगा कि हम ने आप को बताया है वरना अगर मामाजी को पता चल गया तो वे हमें नौकरी से निकाल देंगे.”

“हम किसी को कुछ नहीं बताएंगे, तुम निश्चिंत रहो.”

रोमेश दुकान पर बैठने लगा है, सुन कर वह अचंभित थी. मामाजी अपने कार्य के प्रति कभी समर्पित नहीं रहे. पिता से विरासत में मिले व्यवसाय को उन्होंने सुरासुंदरी में गंवा दिया. मामीजी ने उन्हें उन के दुर्व्यसन से मुक्ति दिलवाने की बहुत कोशिश की लेकिन वे उन की हर कोशिश को अपने शक्ति बल से नाकाम कर देते थे. मामी यह सब सह नहीं पाईं. आखिरकार, एक दिन उन्होंने मौत को गले लगा लिया. मामाजी तब भी नहीं सुधरे. मां ने उन्हें समझाने की कोशिश की तो वे उन के साथ भी अभद्र व्यवहार करने लगे. पापा ने उन से दूरी बना ली थी. उन के स्वभाव के कारण मां भी उन से कतराने लगीं. मां को दुख था कि 10 वर्षीय रोमेश उचित देखभाल न होने के कारण आवारा लड़कों की संगत में पड़ कर बिगड़ता जा रहा है.

उसे कुछ समझ नहीं आया तो उस ने मां को फोन मिलाया. फोन उठाते ही मां ने कहा, “बेटा, तुम मेरी चिंता न किया करो. तेरे मामाजी और रोमेश मेरे पास आ गए हैं. रोमेश ने सब संभाल लिया है.”

“लेकिन मां…”

“वे सब भूलीबिसरी बातें हैं. मैं भूल चुकी हूं, तू भी भूल जा. वे दोनों मेरा बहुत खयाल रखते हैं.”

मां की बात सुन कर वह क्या कहती. उस ने फोन रख दिया. मां की बातों से उसे लगा, भोला सच कह रहा है. मामाजी ने मां को अपने मोहजाल में फंसा लिया है. फोन से उन्हें समझाना संभव नहीं है, क्योंकि यह बात इस समय वे समझ ही नहीं पाएंगी. अब उसे ही उन के इस तिलिस्म को तोड़ना पड़ेगा.

उस ने छुट्टी के लिए अप्लाई कर, टिकट बुक करवाया. जैसे भी वह लखनऊ पहुंची, अपने मित्र पल्लव को सारी बातें बताते हुए, उस से दुकान पहुंचने का आग्रह किया. दरअसल, वस्तुस्थिति का पता लगाने के लिए उस ने घर न जा कर, सीधे दुकान जाना उचित समझा. तब तक पल्लव भी वहां पहुंच चुका था. दुकान में प्रवेश करते ही उस ने देखा कि रोमेश दुकान में अपने मित्र के साथ शराब पीते हुए ताश खेल रहा है. दुकान के अन्य कर्मचारी उन की खातिरदारी में लगे हैं. बस, भोला ही कस्टमर को अटेंड कर रहा है. उसे देख कर एक खरीदार ने कहा, “हम तो वर्षों से यहीं से खरीदते आ रहे हैं. अब न वैसा सामान है न वैसा माहौल. अब कोई दूसरी दुकान ढूंढनी पड़ेगी.”

“चलो जी,, शराब की महक के कारण यहां बैठना भी मुश्किल हो रहा है,” उसी समय खरीदारी करने आई महिला ने उठते हुए अपने पति से कहा.

भोला उसे देख कर चौंक गया जबकि अपने खेल में मस्त रोमेश को उस के आने का पता ही नहीं चला.

“भोला, यहां क्या हो रहा है. तुम तो पुराने कर्मचारी हो, तुम ने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?”

उस की कड़क आवाज सुन कर रोमेश उठ खड़ा हुआ, बोला, “दीदी, आप अचानक, यहां  कैसे?”

“मैं अचानक यहां आई, तभी तो तुम्हारी करतूतों का पता चला. अभी यहां से 2 ग्राहक असंतुष्ट हो कर गए हैं. तुम तो अपनी हरकतों से पापा का नाम डुबोने में लगे हो.”

“सौरी दीदी, अब ऐसा नहीं होगा.”

“तुम ठीक कह रहे हो, अब ऐसा नहीं होगा. चाबी मुझे दो और निकल जाओ दुकान से. और तुम लोग ग्राहकों की सेवा के लिए नियुक्त किए गए हो न कि इन की सेवा के लिए. अब से भोला इस दुकान को संभालेगा तथा तुम सब को उस की बात माननी होगी,” अनामिका ने कड़क आवाज में रोमेश की ओर देखते हुए अन्य कर्मचारियों से कहा.

रोमेश उसे चाबी दे कर चला गया. अनामिका ने चाबी पल्लव को पकड़ाई तो वह झिझका लेकिन जब अनामिका ने कहा कि पापा के बाद इस शहर में वह सिर्फ उस पर ही भरोसा कर सकती है, तब उस ने चाबी ले ली. इस के बाद उस ने कहा, “भोला, तुम इन का मोबाइल नंबर नोट कर लो. अगर तुम्हें कोई परेशानी हो तो इन्हें फोन कर लेना. दुकान की एक चाबी तुम रखो तथा एक इन के पास रहेगी.”

वह पल्लव से फिर मिलने की बात कह कर अपने घर पहुंची. उसे देख कर मां चौंकीं, बोलीं, “बेटी, तू अचानक, सब ठीक तो है न.”

“सब ठीक है. मामा, आप यहां कैसे?” उस ने चौंकते हुए कहा.

“बेटी, तेरे भाई रोमेश ने दुकान का काम अच्छे से संभाल लिया है. तेरे मामा उसे गाइड करते रहते हैं.”

“मां, तुम्हें मामा और रोमेश के बारे में सब पता है, फिर भी…”

“अब वे बहुत बदल गए है,” मां ने अपने भाई की ओर देखते हुए कहा.

“मां, कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं होती,” कहते हुए उस ने मामा की ओर देखते हुए दुकान पर घटित सारी घटना उन्हें बताई तथा यह भी कि दुकान के इस माहौल के कारण ग्राहक भी असंतुष्ट हैं.

मामा जब तक कुछ कहते, रोमेश आ गया. रोमेश की हालत देख कर मामा कुछ कह नहीं पाए.

“मामा, आप मां के भाई हैं. मेरा आप को कुछ भी कहने का अधिकार नहीं है लेकिन क्या आप चाहते हैं कि मां भी आप की तरह बरबाद हो जाए. मेरी आप से विनती है कि आप मां को सम्मान से जीने दीजिए. उन से उन के अधिकार मत छीनिए,” कह कर वह अपने कमरे में चली गई.

वह अपने कमरे से बाहर तभी आई जब उसे महसूस हुआ कि मामा चले गए हैं. मां को उदास बैठा देख कर उस ने कहा, “मां, तुम मुझ से नाराज होंगी लेकिन मैं क्या करती? भोला ने मुझे फोन कर के बताया. वह बेहद चिंतित था. मैं सीधे घर न आ कर पहले दुकान इसीलिए गई थी जिस से कि वास्तविक स्थिति का पता लगा सकूं. जैसाकि मैं ने आप को बताया, स्थिति सचमुच भयावनी थी. अगर कुछ दिन और ऐसा चलता तो दुकान ही बंद करवानी पड़ जाती. तुम भोला पर विश्वास कर सकती हो, तो ठीक है, वरना हम दुकान को बेच देते हैं. तुम मेरे साथ में रहो.”

“नहीं बेटी, मैं तेरे पापा की अमानत को अपने जीतेजी नहीं बेचने दूंगी. तेरे मामा पर विश्वास कर मैं ने गलत किया. अब मैं खुद दुकान पर बैठूंगी.”

“ठीक है मां, जैसी तुम्हारी इच्छा. दुकान की एक चाबी तो भोला के पास है, दूसरी चाबी मैं ने पल्लव को दे दी है. मैं तो हूं ही, फिर भी अगर कभी कोई समस्या हो तो पल्लव या सीमा से बात कर लेना. बहुत ही भले हैं दोनों. तुम उन पर विशवास कर सकती हो,” मन की कशमकश को विराम देते हुए अनामिका ने उन की गोद में लेटते हुए कहा.

वे उस का सिर सहलाते हुए सोच रही थीं कि अनामिका के बाहर जाते ही दिनेशजी ने कहा था, सावित्री हर इंसान को समर्थ होना चाहिए जिस से वक्तजरूरत पर उसे किसी के सहारे की आवश्यकता न पड़े. अब वह किसी पर अंधविश्वास नहीं करेगी. वह खुद अपनी ज़िम्मेदारी उठाएगी. अपनी बेटी को व्यर्थ परेशान न करो, उसे अपनी ज़िंदगी जीने दो.

 

 

5 Awesome Love Stories : 5 गहरे प्‍यार की कहानियां

यहां पांच ऐसी बेहतरीन प्रेम कहानियां दी जा रही है, जिसे पढ़ कर आपको अहसास होगा कि किस तरह प्‍यार आज भी सबसे अनमोल है, यह भावना बेशकीमती है, जो हमारे मन की गहराइयों में रह कर हमें सबसे अपने से जोड़े रखती है, पढ़े 5 Awesome Love Stories : 5 गहरे प्‍यार की कहानियां

1. मौसमी बुखार: पति के प्यार को क्या समझ बैठी माधवी?

romantic-story

‘‘उठो भई, अलार्म बज गया है,’’ कह कर पत्नी के उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना राकेश ने फिर करवट बदल ली.

चिडि़यों की चहचहाहट और कमरे में आती तेज रोशनी से राकेश चौंक कर जाग पड़ा, ‘‘यह क्या तुम अभी तक सो रही हो? मधु…मधु सुना नहीं था क्या? मैं ने तुम्हें जगाया भी था. देखो, क्या वक्त हो गया है? बाप रे, 8…’’

पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

2. कहां हो तुम: क्या सच्चे दोस्त थे ऋतु और पिनाकी

romantic-story

ऋतु अपने कालेज के गेट के बाहर निकली तो उस ने देखा बहुत तेज बारिश हो रही है. ‘ओ नो, अब मैं घर कैसे जाऊंगी?’ उस ने परेशान होते हुए अपनेआप से कहा. इतनी तेज बारिश में तो छाता भी नाकामयाब हो जाता है और ऊपर से यह तेज हवा व पानी की बौछारें जो उसे लगातार गीला कर रही थीं. सड़क पर इतने बड़ेबड़े गड्ढे थे कि संभलसंभल कर चलना पड़ रहा था. जरा सा चूके नहीं कि सड़क पर नीचे गिर जाओ. लाख संभालने की कोशिश करने पर भी हवा का आवेग छाते को बारबार उस के हाथों से छुड़ा ले जा रहा था. ऐसे में अगर औटोरिक्शा मिल जाता तो कितना अच्छा होता पर जितने भी औटोरिक्शा दिखे, सब सवारियों से लदे हुए थे.

पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

3. उस रात: क्या सलोनी और राकेश की शादी हुई?

romantic-story

राकेश की उम्र 35 साल थी. सांवला रंग, तीखे नैननक्श. वह यमुनानगर में अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी बबीता, 2 बेटे 8 साला राजू और 5 साला दीपू थे. राकेश प्रोपर्टी डीलर था. सलोनी बबीता के दूर के रिश्ते के मामा की बेटी थी. वह जगतपुरा गांव में रहती थी. उस के पिताजी की 2 साल पहले खेत में सांप के काटने से मौत हो गई थी. परिवार में मां और छोटा भाई राजन थे. राजन 10वीं जमात में पढ़ रहा था. गांव में उन की जमीन थी. फसल से ठीकठाक गुजारा हो रहा था.

पूरी कहनी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

4. प्यार के काबिल: जूही और मुकुल के बीच क्या हुआ

romantic-story

मुकुल और जूही दोनों सावित्री कालोनी में रहते थे. उन के घर एकदूसरे से सटे हुए थे. दोनों ही हमउम्र थे और साथसाथ खेलकूद कर बड़े हुए थे.

दोनों के परिवार भी संपन्न, आधुनिक और स्वच्छंद विचारों के थे, इसलिए उन के परिवार वालों ने कभी भी उन के मिलनेजुलने और खेलनेकूदने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया था. इस प्रकार मुकुल और जूही साथसाथ पढ़तेलिखते, खेलतेकूदते अच्छे अंकों के साथ हाईस्कूल पास कर गए थे.

पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

5. जुगाड़: आखिर वह लड़की अमित से क्या चाहती थी?

romantic-story

मैं ठीक 10 बजे पूर्व निर्धारित स्थान पर पहुंच गया था. वह दूर से आती हुई दिखी. मैं ने मन ही मन में कहा ‘जुगाड़’ आ गई. हम ने फिर साथ में रिकशा लिया. इस बार मैं पहले की अपेक्षा अधिक चिपक कर बैठा शायद उसे आजमाना चाहता था.

पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

5 Best Romantic Stories : पांच प्रेम कहानियां

‘प्यार’ एक ऐसा अहसास है जिसे हर कोई जीना चाहता है. जब हम किसी से प्यार करते हैं तो उसमें केवल खूबियां ही नजर आती हैं, चाहे वह हमारे साथ धोखा ही क्यों न कर रहा हो. लेकिन हर प्यार के रिश्ते में ऐसा नहीं होता. तो इस आर्टिकल में हम आपके लिए लेकर आए हैं सरिता की 5 Best Romantic Stories

1. फैसला : क्या आदित्य की हो पाई अवंतिका

romantic-story

‘‘4 साल… और इन 4 सालों में कितना कुछ बदल गया है न,’’ अवंतिका बोली. ‘‘नहीं, बिलकुल नहीं… तुम पहले भी 2 चम्मच चीनी ही कौफी में लिया करती थी और आज भी,’’ आदित्य ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘अच्छा, और तुम कल भी मुझे और मेरी कौफी को इसी तरह देखते थे और आज भी,’’ अवंतिका ने आदित्य की ओर देखते हुए कहा. आदित्य एकटक दम साधे अवंतिका को देखे जा रहा था. दोनों आज पूरे 4 साल बाद एकदूसरे से मिल रहे थे. आदित्य का दिल आज भी अवंतिका के लिए उतना ही धड़कता था, जितना 4 साल पहले.

पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

2. तमाचा: सानिया ने किस तरह लिया अपने पति से बदला

romantic-story

सानिया के अब्बा एक मामूली से फोटोग्राफर थे, जबकि उस के होने वाले ससुर एक बड़े बिजनेसमैन थे. सानिया को उस की सास ने एक शादी में देखा था और तभी उसे पसंद कर लिया था. फिर जल्दी ही उस का रिश्ता भी तय हो गया. आज सानिया की शादी थी. लाल जोड़े में उस का हुस्न और निखर आया था. सभी सहेलियां उसे घेर कर बैठी थीं और हंसीमजाक कर रही थीं.

पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

3. अनकही पीड़: पुलिस को क्या सच्चाई पता चली?

romantic-story

कोरोना के चलते पूरे भारत में लाॅक डाउन हो गया. जो रेल जहां खडी थी वहीं खड़ी रह गई. हर कोई सोच रहा था कि रेल देरी से चल रही है इसलिए खडी है, पर यह नहीं पता था कि रेल तो लाॅक डाउन की वजह से खड़ी है.

पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

4. टीनऐजर्स लव: प्यार और वासना के बीच कैसे उलझ गई अस्मिता

romantic-story

आसमानी ड्रैस में बड़ी सुंदर लग रही हो, अस्मिता. बस, एक काम करो जुल्फों को थोड़ा ढीला कर लो.’’ अस्मिता कोचिंग क्लास की अंतिम बैंच पर खाली बैठी नोट बुक में कुछ लिख रही थी कि समर ने यह कह कर उन की तंद्रा तोड़ी. यह कह कर वह जल्दी ही अपनी बैंच पर जा कर बैठ गया और पीछे मुड़ कर मुसकराने लगा. किशोर हृदय में प्रेम का पुष्पपल्लवित होने लगा और दिल बगिया की कलियां महकने लगीं. भीतर से प्रणयसोता बहता चलता गया. उस ने आंखों में वह सबकुछ कह दिया था जो अब तक पढ़ी किताबें ही कह पाईं.

पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

5. रुक गई प्राची: क्या प्राची को प्यार मिल पाया

romantic-story

चंद्रभागाके तट पर खड़ी प्राची आंखों में असीम आनंद लिए विशाल समुद्र में नदियों का मिलन देख रही थी. तभी बालुई तट पर खड़ी प्राची के पैर सागर ने पखार लिए. असीम आनंद की अनुभूति गजब का आकर्षण होता है समुद्र का. प्राची का मन किया कि वह समुद्र का किनारा छोड़ कर उतरती जाए, समाती जाए, ठीक समुद्र के बीचोंबीच जहां नीला सागर शांत स्थिर है. शायद उस के अपने मन की तरह. फिर मन ही मन सोचने लगी कि क्यों आई सब छोड़ कर, सब को छोड़ कर या फिर भाग कर… सागर देखने की उत्कंठा तो कब से थी. वह पुरी पहुंचने से पहले कुछ देर के लिए कोर्णाक गई थी, पर उस का मन तो सागर में बसा था. उसे पुरी पहुंचने की जल्दी थी.

पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…

लुधियाना में गृहशोभा एम्पावर हर इवेंट की धूम

Grihshobha Empower Her: लुधियाना में 23 नवंबर 2024 को दिन में 11. 30 बजे होटल महाराजा रीजेंसी में दिल्ली प्रेस पब्लिकेशन की तरफ से ‘ गृहशोभा एम्पावर हर ‘ इवेंट का शानदार आगाज हुआ. यह गृहशोभा के साथ जुड़ कर महिलाओं के सीखने और सशक्तिकरण का एक खूबसूरत दिन था. तभी तो कार्यक्रम में हिस्सा लेने आई सभी महिलाएं बहुत उत्साह में नजर आ रही थी.

गृहशोभा के द्वारा कराए जा रहे ‘ गृहशोभा एम्पावर हर ‘ इवेंट्स का उद्देश्य महिलाओं को स्वास्थ्य, सौंदर्य और फाइनेंसियल प्लानिंग के क्षेत्र में आगे बढ़ने में मदद करना है. स्किनकेयर और हेल्थ टिप्स से लेकर स्मार्ट सेविंग आईडियाज से परिचित कराना है. यह कार्यक्रम महिलाओं को अपना सर्वश्रेष्ठ जीवन जीने के लिए सशक्त बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया . दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, लखनऊ और बैंगलोर जैसे शहरों के बाद लुधियाना में यह इवेंट आयोजित किया गया.

इस इवेंट के सहयोगी प्रायोजक डाबर खजूर प्राश, स्किन केयर पार्टनर ला शील्ड और होम्योपैथी पार्टनर SBL होम्योपैथी थे. इवेंट के दौरान कई तरह के सेशन और गेम्स आयोजित किए गए.

12 बजे तक पूरा हाल भर गया था. महिलाओं का स्वागत स्नैक्स और चाय के साथ हुआ. इसके बाद कार्यक्रम की शुरुआत वंदना ने अपने खूबसूरत अंदाज में किया और पूरे कार्यक्रम की रूपरेखा से दर्शकों को रूबरू कराया.

ब्यूटी और स्किन केयर सेशन

सब से पहले ब्यूटी और स्किन केयर सेशन की शुरुआत हुई. स्किनकेयर और ब्यूटी की दुनिया में एक प्रतिष्ठित नाम डॉ. मनीषा मित्तल है. ओरिसन सुपरस्पेशलिटी इनफर्टिलिटी एंड ट्रॉमा सेंटर की निदेशक डॉ. मनीषा ने त्वचा और बालों की देखभाल के लिए महत्वपूर्ण टिप्स दिए.

स्पोंसर्ड सेशन : डाबर( महिलाओं में आयरन की कमी पर सत्र)

डाबर खजूरप्राश द्वारा महिलाओं में आयरन की कमी और इस की अनदेखी की जाने वाली स्वास्थ्य समस्या पर बात की गई. यह समस्या ऊर्जा के स्तर, प्रतिरक्षा और समग्र स्वास्थ्य को प्रभावित करती है. इस सत्र के लिए मंच पर डॉ. निहारिका वात्स्यारिया पहुंचीं जो आयुष आयुर्वेद और पंचकर्म अस्पताल, स्त्री रोग में अभ्यास करने वाली एक आयुर्वेदिक चिकित्सक हैं और जिन के पास 8 वर्षों का अनुभव है. वह लुधियाना के गुरु नानक आयुर्वेद मेडिकल कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर भी हैं.

महिलाओं के लिए फाइनेंशियल प्लानिंग और इन्वेस्टमेंट सेशन

इस सेशन में विशेषज्ञ देवेंद्र गोस्वामी ने महिलाओं को महत्वपूर्ण जानकारियां दीं. उन्हें मनी मैनेजमेंट और फाइनेंसियल प्लानिंग में 21 से अधिक वर्षों का अनुभव है. उनके पास SCD गवर्नमेंट कॉलेज से स्नातक की डिग्री और PCTE से फाइनेंसियल प्लानिंग में मास्टर डिग्री है. उन्होंने शीर्ष बैंकों और बड़ी कंपनियों के साथ काम किया है. आज वे ब्लूरॉक वेल्थ प्राइवेट लिमिटेड के संस्थापक हैं.

उन्होंने बताया कि महिलाओं के लिए पैसे कमाना और उसे मैनेज करना करना सीखना क्यों जरूरी है. अपनी सैलरी का एक हिस्सा बचाना और उसे सही जगह निवेश करना आर्थिक स्वतंत्रता की ओर एक महत्वपूर्ण कदम है. निवेश के लिए ‘म्यूचुअल फंड’ में सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान एसआईपी के माध्यम से हर महीने एक छोटी राशि का निवेश किया जा सकता है. इसके साथ ही साथ जीवन बीमा और चिकित्सा बीमा का महत्व समझाया. इस तरह महिलाएं आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त कर सकती हैं और अपने जीवन को बेहतर बना सकती हैं.

इस के बाद ला शील्ड द्वारा प्रायोजित गेम्स हुए. इन गेम्स में महिलाओं ने खुल कर हिस्से लिए और गिफ्ट्स जीते. इस में स्किन केयर से जुड़े सवाल पूछे गए.

स्पोंसर्ड सेशन : ला शील्ड स्किन केयर

इस सेशन के लिए डर्मेटोलॉजी और कॉस्मेटोलॉजी में 22 से अधिक वर्षों की अनुभव रखने वाली डॉ. अमन दुआ ने बहुत महत्वपूर्ण जानकारियां दीं. वह एके क्लीनिक प्राइवेट लिमिटेड में मैनेजिंग डायरेक्टर और चीफ डर्मेटोलॉजिस्ट हैं जो हेयर ट्रांसप्लांट, चेहरे की सुंदरता, डर्मेटो-सर्जरी और एडवांस्ड कॉस्मेटोलॉजी में विशेषज्ञता रखती हैं. वह एसोसिएशन ऑफ़ हेयर रिस्टोरेशन सर्जन्स इंडिया की अध्यक्ष और बोर्ड गवर्नर के रूप में कार्यरत हैं. वह इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ़ हेयर रिस्टोरेशन सर्जन्स की फेलो भी हैं और IADVL और ACS(1) जैसे प्रतिष्ठित एसोसिएशन की सक्रिय सदस्य हैं.

एसबीएल सेशन

बीएचएमएस में स्वर्ण पदक विजेता और होम्योपैथी में एमडी डॉ. रिधिमा को 5 वर्षों से अधिक का अनुभव का अनुभव रखने वाली डॉ. रिधिमा लुधियाना में भगवान महावीर होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में सहायक प्रोफेसर के रूप में भी काम करती हैं. उन्होंने महिलओं को मेनोपॉज से जुड़ी महत्वपूर्ण बातों से अवगत कराया. साथ ही उन्होंने बताया कि इस तरह की समस्याओं में होम्योपेथी किस तरह से कारगर है.

नूट्रिशनिस्ट सेशन

अंत में नूट्रिशनिस्ट सेशन के तहत सिमरत कथूरिया जो अवार्ड विनिंग डाइट एंड वेलनेस कोच हैं मंच पर आईं. सिमरत डाइट कंपनी की संस्थापक हैं, एक ऐसी कंपनी जिसने 10,000 से ज़्यादा लोगों की मदद की है चाहे वह वेट मैनेजमेंट हो, त्वचा और बालों का स्वास्थ्य हो या स्पोर्ट्स नुट्रिशन हो. उन्हें इस फील्ड में कई पुरस्कार मिले हैं. डायटीशियन सिमरत ने पोषण, फिटनेस और स्वास्थ्य पर महिलाओं को शानदार सुझाव दिए. उन्होंने महिलाओं को सही पोषण और स्वास्थ्य के महत्व को समझाते हुए उनके जीवन के विभिन्न चरणों में संतुलित आहार, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाने पर चर्चा की. महिलाओं को अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देने, नियमित स्वास्थ्य जांच कराने और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित किया.

इस के साथ इवेंट अपने अंतिम चरण में पहुँच गया. महिलाओं ने भोजन का आनंद लेने के बाद पंजीकरण डेस्क से अपने गुडी बैग लिए और शानदार दिन बिता कर अपने घरों को चली गई .

Friendship : जुगाड़ वाली घुमक्‍कड़ी

हरीश अपने बनाए स्कैच में रंग भर रहा था. रविंद्र बैठा गिटार के तार कस रहा था कि तभी विकास आया और बोला, ‘‘यार रविंद्र, मैं अभीअभी नारायण के घर से आ रहा हूं. उस के पापा पहली तारीख को कंपनी के दौरे पर हिमाचल जा रहे हैं. वे नारायण को साथ चलने को कह रहे थे, लेकिन उस ने मना कर दिया जबकि उन की कंपनी की गाड़ी खाली जाएगी. क्यों न हम उस के पापा के साथ चले जाएं. बड़े दिनों से मन था चंडीगढ़ घूमने का. तू लगा न जुगाड़ उस के पापा से.’’

‘‘अरे भई, चले तो नारायण के पापा के साथ जाएंगे पर आएंगे कैसे? और फिर हमारे पास तो इतने पैसे भी नहीं कि वहां घूमफिर सकें,’’ हरीश बोला तो विकास ने उस की बात काटते हुए पंजाबी लहजे में कहा, ‘‘तू तो रहने ही दे काका. तूने तो बस कूंचियां फेरनी हैं. ड्राइंग बना ड्राइंग.’’

हरीश थोड़ा नाराज हो गया पर रविंद्र को बात जंच गई, ‘‘हां यार, चल नारायण के पापा से बात कर जाने का जुगाड़ लगाते हैं. पता है चंडीगढ़ इतना खूबसूरत और साफसुथरा शहर है कि सब का मन मोह ले. यह योजनाबद्ध तरीके से बसाया गया शहर है, जिसे वास्तुकार ली कार्बूजियर द्वारा डिजाइन किया गया था. यह प्रदूषण मुक्त, चौड़ी सड़कों वाला हरियाली से भरपूर शहर है. चल, चलते हैं नारायण के घर.’’ नारायण के पापा से मिल कर रविंद्र और विकास ने चंडीगढ़ सैरसपाटे की अपनी इच्छा जाहिर की तो वे बोले,

‘‘भई, गाड़ी में मैं और मेरा ड्राइवर जा रहे हैं बाकी सीटें खाली हैं. मैं तुम्हें साथ ले जा सकता हूं पर वापस लाने की गारंटी नहीं. मुझे आगे कितना समय लगे पता नहीं.’’

‘‘ बस अंकल, आप हमें चंडीगढ़ पहुंचा दें. आगे का जुगाड़ हम खुद कर लेंगे,’’ विकास ने कहा तो नारायण के पापा बोले, ‘‘ ठीक है, परसों सुबह 5 बजे अपने पीजी के बाहर मिलना, मैं वहीं से तुम्हें ले लूंगा.’’

‘‘ठीक है अंकल,’’ कह कर दोनों खुशीखुशी वापस आ गए.

हरीश, रविंद्र और विकास दिल्ली के एक कालेज में बीटैक फर्स्ट ईयर के छात्र थे और पीजी में रहते थे. तीनों को सैरसपाटे का बहुत शौक था. उन्होंने कई बार जुगाड़ लगा कर कई जगहें देखी थीं. तीनों ने 100-100 रुपए हर रोज के हिसाब से मिला कर हरीश के पास रखवा दिए. उन की इस जुगाड़ू प्रवृत्ति के कारण ही उन के दोस्तों ने उन का नाम जुगाड़ू घुमक्कड़ रख दिया था. हरीश जहां बहुत अच्छी ड्राइंग बनाता वहीं रविंद्र को गिटार बजाने का शौक था. विकास पंजाबी गीत गाने, मिमिक्री करने में माहिर था. कई नेता, अभिनेताओं की वह हूबहू आवाज निकाल लेता था. तीनों ने नैट से सर्च कर चंडीगढ़ की देखने लायक जगहों की जानकारी निकाली और लोकल बसों आदि के बारे में जाना. हरीश ने अपने एक  दोस्त से स्मार्टफोन ले लिया और उस में अपना सिम व मैमोरी कार्ड डाल लिया. फिर तीनों ने हलकेफुलके बैग तैयार कर लिए. रविंद्र ने अपना गिटार भी साथ ले लिया. हरीश ने स्कैच बुक रख ली.

सुबह नारायण के पापा आए. उन के साथ गाड़ी में बैठ वे चंडीगढ़ के लिए रवाना हो गए. लगभग 10 बजे वे चंडीगढ़ में थे. नारायण के पापा ने उन्हें सैक्टर 17 के बस अड्डे पर छोड़ा और विदा ली. अब उन्होंने अपने प्रोग्राम के मुताबिक नैट से ली जानकारी का प्रिंट निकाला औैर उस के अनुसार सब से नजदीक स्थित रोज गार्डन चल दिए. बस अड्डे से रोज गार्डन लगभग 2 किलोमीटर दूर है अत: यह दूरी उन्होंने पैदल ही पार करने की सोची. दोनों ने रास्ते से चने खरीदे और खाते हुए लगभग 20 मिनट में वे जाकिर हुसैन रोज गार्डन पहुंच गए. यह एशिया का सब से बड़ा रोज गार्डन है. इस में 1,600 से भी अधिक किस्म के गुलाब देख वे आश्चर्यचकित रह गए. यहां हर साल गुलाब पर्व भी मनाया जाता है. जिस का 50 रुपए टिकट लगता है लेकिन अभी तो वे यहां फ्री घूमे.

घूमतेघूमते दोपहर हो गई थी. खाने का वक्त भी था सो उन्होंने बाहर खड़े छोलेकुलचे वाले से छोलेकुलचे खाए औैर अपने अगले पड़ाव की तरफ चल दिए. इन का अगला डैस्टिनेशन रौक गार्डन था. 15 रुपए में वे बस से रौक गार्डन पहुंच गए. रौक गार्डन में ऐंट्री फीस 20 रुपए थी. वे टिकट ले कर अंदर गए. वहां लगे बोर्ड से उन्हें पता चला कि इस का निर्माण नेक चंद ने किया था. उन्हें इस के लिए पद्मश्री पुरस्कार से भी नवाजा गया था. यहां टूटे बरतनों, ट्यूबलाइट्स व अन्य बेकार वस्तुओं के इस्तेमाल से बनी मूर्तियां देखते ही बनती हैं. इन सजीव दिखने वाली मूर्तियों के साथ उन्होंने कई सैल्फी लीं. यहां बहते झरनों ने भी उन का मन मोह लिया.

रौक गार्डन का नजारा देख बाहर निकले तो शाम के 4 बजे थे. किसी से पूछने पर पता चला कि सुखना झील यहां से थोड़ी ही दूरी पर है. पास ही हैंड मोन्यूमैट भी है लेकिन उस के लिए परमिशन लेनी होती है अत: उन्होंने उसे बाहर से ही देखा और सुखना झील की ओर चल पड़े. सुखना झील मानवनिर्मित झील है. यह 3 किलोमीटर क्षेत्र में फैली है. इस का निर्माण 1958 में हुआ था. वे सुखना झील लगभग 20 मिनट में पहुंच गए. वहां काफी भीड़ थी, लेकिन माहौल खुशगवार था. वहां सामने मंच पर कोई पंजाबी गायक पंजाबी गीत गा रहा था, जिस पर सब झूम रहे थे. विकास तो ढोल की तान सुनते ही झूम उठा औैर वहां नाचते लोगों के साथ भांगड़ा करने लगा. हरीश ने उस के मस्ती भरे डांस की वीडियो रिकौर्डिंग कर ली व कई फोटो भी खींचे. गीत खत्म होने पर वे सुखना झील का सुखद नजारा देख गदगद हो गए. उन्होंने देखा कि यहां बोटिंग भी होती है. रविंद्र बोला, ‘‘यार, बोटिंग का तो काफी चार्ज है. चलो, यहीं से नजारे देखते हैं.’’

लेकिन विकास को यह गवारा न था, अत: वह बोला, ‘‘इतनी दूर आए हैं तो बोटिंग भी करेंगे. ठहरो, मैं कुछ जुगाड़ करता हूं,’’ कह वह एक ऊंचे चौबारे पर चढ़ गया. रविंद्र समझ गया कि विकास अपने रंग में आ गया है अत: साथ खड़ा हो गिटार बजाने लगा. तभी आवाज गूंजी, ‘‘जली को आग कहते हैं, बुझी को राख कहते हैं. उस राख से जो बारूद बने उसे विश्वनाथ कहते हैं.’’ अचानक शत्रुघ्न सिन्हा की आवाज सुन सब उस ओर मुखातिब हुए पर यह विकास था जो फिल्मी डायलौग बोल रहा था. विकास बोला, ‘‘दोस्तो, मैं आप को कुछ हस्तियों की आवाजें सुनाऊंगा जो पहचान ले, हाथ खड़ा करे. सही जवाब देने वाले को 10 रुपए इनाम मिलेगा पर अगर जवाब गलत हुआ तो 20 रुपए देने पडे़ंगे. फिर विकास ने कईर् फिल्मों के डायलौग बोले, लेकिन कइयों को लोग जज न कर पाए और गलत जवाब दिया जिस से उन की कमाई भी हुई. इसी तरह करते गलतसही जवाबों से मिमिक्री कर विकास ने लोगों को हंसाया और 500 रुपए इकट्ठे भी कर लिए. अब वे बोटिंग कर सकते थे.

एक घंटा उन्होंने खूब बोटिंग की. चप्पू चलाचला कर उन के पसीने छूट गए पर सुखना झील का व्यू और मौसम उन्हें थकने न दे रहा था तिस पर सूर्यास्त का नजारा देखना बड़ा मोहक लगा. बोटिंग का लुत्फ उठा वे झील से निकले तो भूख लग आई थी. अत: पास के एक ढाबे पर खाना खाया. दालमक्खनी और मिस्सी रोटी खाना उन्हें पंजाबी कल्चर का स्वाद दे गया. रात घिर आई थी. अब उन के सामने रात बिताने की समस्या थी. हरीश ने सुझाया, ‘‘क्यों न हम चंडीगढ़ रेलवे स्टेशन चलें. ट्रेन से जाने के बहाने वहीं रात बिताएंगे.’’ रविंद्र और विकास को भी उस का सुझाव पसंद आया, अत: वे चंडीगढ़ रेलवे स्टेशन चल दिए. सुखना लेक से स्टेशन थोड़ी दूर था अत: शेयरिंग औटो कर वे रेलवे स्टेशन पहुंचे.

रास्ते में उन्होेंने कई सैक्टर की मार्केट का नजारा देखा. स्टेशन पहुंच कर हरीश अपनी तरकीब भिड़ाता स्टेशन मास्टर के पास गया व बोला, ‘‘अंकल, हम स्टूडैंट हैं. सुबह ट्रेन पकड़नी है लेकिन रहने की व्यवस्था नहीं है. मेरे पिताजी भी नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर कार्यरत हैं. उन्होंने कहा था कि समस्या होने पर मैं आप से मिल लूं,’’ हरीश ने चालाकी से स्टेशन मास्टर के बैच पर लिखा उन का नाम पढ़ लिया था. पहले तो स्टेशन मास्टर नानुकर करने लगा लेकिन तीनों के हाथ में किताबें देख वह उन से इंप्रैस हो गया व उन्हें वेटिंग रूम में रहने की इजाजत दे दी. तीनों ने रात वेटिंग रूम में बिताई. सुबह उठ कर प्लेटफौर्म के सुलभ शौचालय जा कर फै्रश हुए और चायमट्ठी खा कर तैयार हो गए अपने अगले डैस्टिनेशन पर जाने को. अब वे संग्रहालय देखने गए. सरकारी संग्रहालय व कला दीर्घा में गांधार शैली की अनेक मूर्तियां देख वे अचंभित हुए. यहां अंतर्राष्ट्रीय डौल म्यूजियम में दुनियाभर की गुडि़याओं को रखा गया है. यहां पर 10 रुपए टिकट लगा.

अब वे अपने अंतिम डैस्टिनेशन पिंजौर गार्डन पहुंचे. हालांकि पिंजौर गार्डन चंडीगढ़ से 22 किलोमीटर दूर है पर पर्यटकों का पसंदीदा रिसौर्ट है, अत: वे इसे जरूर देखना चाहते थे. लेकिन वहां पहुंच उन्हें निराशा हाथ लगी क्योंकि वहां टिकट काफी महंगा था. रविंद्र बोला, ‘‘छोड़ो, इसे बाहर से ही देखो और वापसी का जुगाड़ करो.’’ विकास उसे निराश देख कर बोला, ‘‘ऐसे कैसे चले जाएं भई. इसे बिना देखे. पता है पिंजौर गार्डन की शानोशौकत कितनी निराली है. कोई जुगाड़ करना होगा.’’ हरीश बोला, ‘‘मैं वही तो बता रहा हूं. एक आइडिया है…’’ कहते हुए उस ने दोनों को अपनी तरकीब सुझाई तो वे खुश हो गए. अब पास के पेड़ की छांव तले विकास सामने बैठा और हरीश अपनी स्कैच बुक निकाल उस का स्कैच बनाने लगा. रविंद्र पीछे खड़ा उस की ड्रांइग देख रहा था.

विकास को स्कैच बनवाते देख आतेजाते लोग इकठ्ठे हो गए तो रविंद्र ने हरीश की तारीफ की, ‘‘क्या स्कैच बनाया है.’’ सुन कर अन्य लोग भी उस से स्कैच बनवाने को राजी हो गए. हरीश ने हर स्कैच के 150 रुपए लिए व कइयों के स्कैच बनाए व उस से मिले पैसों से पिंजौर गार्डन में टिकट ले कर घुस गए. सुंदरता से लबरेज पिंजौर गार्डन का लुक देखते ही बनता था. शहर की भीड़भाड़ से दूर खुशनुमा वातावरण से भरपूर पिंजौर ऐतिहासिक दृष्टि से भी मशहूर है. पिंजौर गार्डन की शाही शानोशौकत ने उन्हें मंत्रमुग्ध कर दिया था. अब शाम होने को थी और उन्हें अगले दिन कालेज भी अटैंड करना था. सो वापस जाने की समस्या पर विचार करने लगे, ‘‘चलो, इस का भी जुगाड़ करते हैं. पैसे तो हम खर्च करने से रहे, ’’रविंद्र ने कहा तो हरीश और विकास भी मुसकरा दिए. फिर सामने देख विकास बोला, ‘‘देखो, उस ढाबे पर कई ट्रक खड़े हैं. चलो, वहीं किसी से बात करें.’’ ‘‘तुम ठीक कहते हो, लेकिन कुछ जुगाड़ लगाना होगा यहां भी,’’ रविंद्र बोला.

फिर तीनों ढाबे पर पहुंचे. वहां कई ट्रक ड्राइवर खाना खा रहे थे. हरीश ने विकास से कहा, ‘‘यार, ये लोग पंजाबी कल्चर के लगते हैं. वैसे भी यहां पंजाबी कल्चर ज्यादा है. तू ही कुछ जुगाड़ बैठा.’’ ‘‘यह बात है तो हो जा शुरू,’’ कहते हुए विकास ने रविंद्र को इशारा किया तो रविंद्र ने गिटार बजाना शुरू कर दिया. हरीश भी पास की टेबल पर तबले की थाप देने लगा. विकास ने एक लोकप्रिय पंजाबी गीत गाना शुरू कर दिया, जिस से सब उन की ओर मुखातिब हुए. फिर उस के गाने की ताल पर झूमने लगे. गीत खत्म होते ही सब वाहवाह कर उठे. तभी हरीश नाटक करता हुआ हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘हम दिल्ली के एक कालेज के छात्र हैं. टूर पर चंडीगढ़ आए थे, लेकिन अपनी टीम से बिछुड़ गए. अगर आप मदद करें तो हम अपने साथियों से मिल सकते हैं. वे अभी कुछ ही दूर दिल्ली के रास्ते पर होंगे.’’ ‘‘ओए, तुसी चिंता न करो,’’ तभी एक सरदारजी पंजाबी लहजे में हिंदी में बोले, ‘‘मैं तुहानूं पहुंचाऊंगा दिल्ली, बै जाओ मेरे ट्रक विच.’’

अब उन की समस्या सौल्व हो गई थी. ट्रक में बैठे वे पंजाबी गाने सुनते सरदारजी से बातें करते रहे. सरदारजी ने बताया कि इतना घूमने के बाद भी तुम पुरानी कारों की मार्केट नहीं देख पाए. इस में सभी तरह की सैकंड हैंड कारें मिलती हैं. साथ ही उन्होंने बताया कि यहां सैक्टर 42 में सुखना लेक की तर्ज पर न्यू लेक  नाम से एक लेक हाल ही में बनी है. इस का भी आकर्षण देखते ही बनता है. बातों ही बातों में हरीश सरदारजी का पोट्रेट बनाता रहा. दिल्ली बौर्डर पर पहुंच सरदारजी से उन्होंने विदाई लेते वक्त वह पोट्रेट गिफ्ट किया तो सरदारजी बड़े खुश हुए. बौर्डर से डीटीसी की बस पकड़ वे पीजी पहुंच गए. अगले दिन वे कालेज गए तो दोस्तों को अपने चंडीगढ़ ट्रिप की सारी कहानी सुनाते हुए वहां लिए फोटोज और वीडियोज दिखाए और साथ ही बताया कि कैसे वे अपने जुगाड़ और हुनर से 100 रुपए पर डे से भी कम में चंडीगढ़ का सैरसपाटा कर पाए. उन का यात्रा वृत्तांत सुन पारुल एकदम बोल पड़ी, ‘‘अगली बार जाना तो मुझे भी संग लेना न भूलना.’’ जहां सभी दोस्त हतप्रभ थे. वहीं नारायण सोच रहा था, ‘काश, मैं भी इन के साथ शामिल होता तो कितना मजा आता.’

वाकई तुम जुगाड़ू घुमक्कड़ हो दोस्त. सभी बोले औैर मोबाइल में उन के फोटोज देखने लगे.

Relationship : एक बहू ऐसी भी

अपने साथ काम करने वाली किसी भी लड़की से गौतम औपचारिक बातचीत से ज्यादा ताल्लुकात नहीं बढ़ाता था. एक रोज एक रिपोर्ट बनाने के लिए उसे और श्रेया को औफिस बंद होने के बाद भी रुकना पड़ा और जातेजाते बौस ने ताकीद कर दी, ‘‘श्रेया को घर जाने में कुछ परेशानी हो तो देख लेना, गौतम.’’

पार्किंग में आने पर श्रेया को अपनी एक्टिवा स्टार्ट करने की असफल कोशिश करते देख गौतम ने कहा, ‘‘इसे आज यहीं छोड़ दो, श्रेया. ठोकपीट कर स्टार्ट कर भी ली तो रास्ते में परेशान कर सकती है. कल मेकैनिक को दिखाने के बाद चलाना.’’

‘‘ठीक है, पंकज से कहती हूं पिक कर ले,’’ श्रेया ने मोबाइल निकालते हुए कहा, ‘‘वह 15-20 मिनट में आ जाएगा.’’

‘‘उसे बुलाने से बेहतर है मेरी बाइक पर चलो,’’ गौतम बोला.

 

‘‘लेकिन मेरा घर दूसरी दिशा में है, तुम्हें लंबा चक्कर लगाना पड़ेगा.’’

‘‘यहां खड़े रहने से बेहतर होगा तुम मेरे साथ चलो. वैसे भी तुम्हें यहां अकेले छोड़ कर तो जाऊंगा नहीं.’’

बात श्रेया की समझ में आई और वह गौतम की बाइक पर बैठ गई. घर पहुंचने पर श्रेया का आग्रह कर के गौतम को अंदर ले जाना स्वाभाविक ही था. अपने पापा देवेश, मां उमा, छोटी बहन रिया और जुड़वां भाई पंकज से उस ने गौतम का परिचय करवाया.

‘‘ओह, मैं समझा था पंकज तुम्हारा बौयफ्रैंड है, सो तुम्हें लिफ्ट देने में कोई खतरा नहीं है,’’ गौतम बेसाख्ता कह उठा.

‘‘बेफिक्र रहो, पंकज के रहते मुझे बौयफ्रैंड की जरूरत ही महसूस नहीं होती,’’ श्रेया हंसी.

‘‘इसे छोड़ने आने के चक्कर में तुम्हें घर जाने में देर हो गई,’’ उमा ने कहा.

‘‘कोई बात नहीं आंटी, घर जा अकेले चाय पीता, यहां सब के साथ नाश्ता भी कर रहा हूं.’’

 

उमा को उस की सादगी अच्छी लगी. उस ने गौतम के परिवार के बारे में पूछा. गौतम ने बताया कि उस के कोई बहनभाई नहीं है. मातापिता यूनिवर्सिटी में प्राध्यापक थे. अब उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रत्याशियों के लिए अपना कोचिंग कालेज खोल लिया है.

‘‘छोटी सी फैमिली है मेरी, आप के यहां सब के साथ रौनक में बैठ कर बहुत अच्छा लग रहा है,’’ गौतम ने श्रेया के भाईबहन की ओर देखते हुए कहा, ‘‘आज पहली बार मम्मीपापा से शिकायत करूंगा कोई बहनभाई न देने के लिए.’’

‘‘अब मम्मीपापा तो बहनभाई दिलाने से रहे, यहीं आ जाया करो सब से मिलने. हमें भी अच्छा लगेगा,’’ देवेश ने कहा.

‘‘जी जरूर, अभी चलता हूं, पापा के आने से पहले घर पहुंचना है.’’

‘‘देर से पहुंचने पर पापा नाराज होंगे?’’ पंकज ने पूछा.

‘‘नाराज तो नहीं लेकिन मायूस होंगे जो मुझे पसंद नहीं है,’’ गौतम ने उठते हुए कहा, ‘‘पापा मुझे बहुत प्यार करते हैं और मैं उन्हें.’’

 

उस के बाद औफिस में तो दोनों के ताल्लुकात पहले जैसे ही रहे लेकिन जबतब श्रेया पापा की ओर से घर आने का आग्रह करने लगी जिसे गौतम तुरंत स्वीकार कर लेता था. एक रोज यह सुन कर कि गौतम को बिरयानी बहुत पसंद है, देवेश ने कहा, ‘‘हमारे यहां हरेक छुट्टी के रोज बिरयानी बनती है. कभी लखनवी, कभी हैदराबादी तो कभी अमृतसरी. तुम किसी रविवार को लंच पर आ जाओ.’’

‘‘रविवार की दावत तो मैं स्वीकार नहीं कर सकता अंकल, क्योंकि एक रविवार ही तो मिलता है पापा के साथ लंच करने को.’’

‘‘तो पापा को भी यहीं ले आओ.’’

‘‘हां, यह ठीक रहेगा,’’ गौतम फड़क कर बोला, ‘‘पापा को भी बिरयानी बहुत पसंद है.’’

‘‘तो ठीक है, इस रविवार को तुम पापामम्मी के साथ लंच पर आ रहे हो. मुझे उन का नंबर दो, मैं स्वयं उन से आने का आग्रह करूंगी,’’ उमा ने कहा.

‘‘इतनी औपचारिकता की आवश्यकता नहीं है आंटी, पापा मेरे कहने से ही आ जाएंगे. मम्मी तो शुद्ध शाकाहारी हैं, इसीलिए हमारे यहां यह सब नहीं बनता. मम्मी को फिर कभी ले आऊंगा, रविवार को मुझे और पापा को ही आने दीजिए,’’ कह करगौतम चला गया.

रविवार को गौतम अपने पापा ब्रजेश के साथ आया. देवेश और उमा को ब्रजेश बहुत सहज और मिलनसार व्यक्ति लगे और बापबेटे के आपसी लगाव व तालमेल ने उन्हें बहुत प्रभावित किया.

‘‘इतनी स्वादिष्ठ चिकन बिरयानी तो नहीं लेकिन गीता भी उंगलियां चाटने वाली मटर की कचौड़ी और अचारी आलू वगैरा बनाती है,’’ ब्रजेश ने कहा, ‘‘अगले रविवार को आप सब हमारे यहां आ रहे हैं?’’

देवेश और उमा सहर्ष मान गए. देवेश, उमा और श्रेया रविवार को गौतम के घर पहुंच गए. गीता भी बापबेटे की तरह ही मिलनसार और हंसमुख थी. कुछ ही देर में दोनों परिवारों में अच्छा तालमेल हो गया और वातावरण सहज व अनौपचारिक. उमा किचन में गीता का हाथ बंटाने चली गई, ब्रजेश ने बड़े शौक से सब को अपना पूरा घर दिखाया और फिर आने का अनुरोध किया.

‘‘जरूर आएंगे लेकिन उस से पहले गीता बहन को हमारे यहां आना है,’’ उमा ने कहा.

‘‘आप न कहतीं तो भी मैं इसे ले कर आने वाला ही था और आऊंगा भी,’’ ब्रजेश के कहने के अंदाज पर सभी हंस पड़े.

एक रोज गौतम लंचब्रेक में श्रेया के पास आया, ‘‘मेरे पापामम्मी तुम्हारे घर हमारी शादी की बात करने जा रहे हैं और यह तुम भी जानती हो कि तुम्हारे घर वाले इनकार नहीं करेंगे लेकिन इस से पहले कि तुम हां कहो, मैं तुम्हें कुछ बताना चाहता हूं, अपने और अपने परिवार के बारे में. मेरे जीवन में हमेशा सर्वोच्च स्थान मेरे पापा का ही रहेगा क्योंकि उन के मुझ पर बहुत एहसान हैं. वे मेरे जन्मदाता नहीं हैं. उन का देहांत तो मेरे जन्म के कुछ समय बाद ही हो गया था.

‘‘वैसे तो पापा भी वहीं पढ़ाते थे जहां मम्मी लेकिन वे मेरे मामा के दोस्त भी थे. सो, अकसर घर पर आया करते थे और मेरे साथ बहुत खेलते थे. एक रोज मामा से यह सुनने पर कि घर में मम्मी की दूसरी शादी की चर्चा चल रही है, उन्होंने छूटते ही पूछा, ‘गौतम का क्या होगा?’

‘‘शादी ऐसे व्यक्ति से ही करेंगे जो गौतम को अपने बेटे की तरह अपना मानेगा,’’ मामा ने जवाब दिया.

‘‘इस की क्या गारंटी होगी कि शादी के बाद वह अपनी बात पर कायम रहेगा?’’ पापा ने फिर प्रश्न किया.

‘‘ऐसे रिश्तों में तो हमेशा ही गारंटी से ज्यादा रिस्क रहता है, जो लेना पड़ता ही है,’’ मामा ने फिर जवाब दिया.

‘‘गौतम बहुत प्यारा बच्चा है, उस के साथ कोई रिस्क नहीं लेना चाहिए. मैं वादा करता हूं, गौतम को आजीवन पिता का प्यार दूंगा, गीता की शादी मुझ से कर दीजिए,’’ पापा ने छूटते ही कहा.

‘‘मम्मी के घर वाले तो तुरंत मान गए लेकिन पापा के घर वालों को यह रिश्ता मंजूर नहीं था. इसलिए पापा ने उन से रिश्ता तोड़ कर मेरे मोह में पुश्तैनी जायदाद भी छोड़ दी. यही नहीं, पापा उस समय आईएएस प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे थे लेकिन शादी के बाद उन्होंने पढ़ाई के बजाय अपना सारा ध्यान मेरे लालनपालन में लगा दिया और परीक्षा नहीं दी क्योंकि उन्हीं दिनों मम्मी का औपरेशन हुआ था और उन के लिए कई सप्ताह तक बैडरैस्ट अनिवार्य था.

‘‘यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि पापा ने अपना अस्तित्व ही मुझ में लीन कर दिया है. अब यह मेरा कर्तव्य है कि आजीवन पापा की खुशी को ही अपनी खुशी समझूं, शादी के बाद मेरी पत्नी को भी यह दायित्व निभाना पड़ेगा. जानता हूं श्रेया, घर वाले ही नहीं, हम दोनों भी एकदूसरे को चाहने लगे हैं, फिर भी हां करने से पहले मैं चाहूंगा कि तुम अच्छी तरह से सोच लो. तुम्हें उम्रभर संयुक्त परिवार में रहना होगा और वह भी पापामम्मी की आज्ञा या इच्छानुसार.’’

‘‘पापा बहुत सुलझे हुए सहृदय व्यक्ति हैं और तुम्हारी मम्मी भी. उन के साथ रहने में मुझे कोई परेशानी नहीं होगी और अगर होगी भी तो उस की शिकायत मैं कभी तुम से नहीं करूंगी,’’ श्रेया ने दृढ़ स्वर में कहा.

‘‘करोगी भी तो मैं सुनूंगा नहीं, यह अच्छी तरह समझ लो,’’ गौतम के स्वर में चुनौती थी.

जल्दी ही दोनों की शादी तय हो गई लेकिन तुरंत बाद ही एक अड़चन आ गई. औफिस के नियमानुसार वहां पतिपत्नी एकसाथ काम नहीं कर सकते थे. श्रेया ने बेहिचक नौकरी छोड़ दी. हनीमून से लौटने के बाद वह भी गीता और ब्रजेश के साथ कोचिंग कालेज में जाने लगी. उस ने वहां औफिस की सब व्यवस्था संभाल ली जो अब तक ब्रजेश संभालते थे. यह सब करने में वह ब्रजेश के और भी करीब आ गई, वैसे भी बहुत स्नेह करते थे वे उस से.‘‘यह काम संभाल कर तुम ने मुझे बहुत राहत दी है श्रेया, थक जाता था, पढ़ाने और फिर उस के बाद यह सब सिरखपाई वाले काम करने में. काम इतना ज्यादा भी नहीं है कि इस के लिए किसी को नियुक्त करूं,’’ एक रोज ब्रजेश ने कहा.

‘‘ऐसा है पापा तो यह काम अब आप मुझ पर ही छोड़ दीजिए, दूसरी नौकरी मिलने के बाद भी मैं इस के लिए समय निकाल लिया करूंगी,’’ श्रेया ने कहा.

‘‘मेरे लिए यानी अपने व्यथित पापा के लिए भी कभी थोड़ा समय निकाल सकोगी श्रेया?’’ ब्रजेश ने कातर भाव से पूछा.

श्रेया चौंक पड़ी, ‘‘क्या कह रहे हैं, पापा? आप और व्यथित? मम्मी और गौतम को पता चल गया तो वे आप से भी अधिक व्यथित हो जाएंगे.’’

‘‘उन दोनों को तो पता भी नहीं चलना चाहिए. वैसे भी वे कुछ नहीं कर सकते.’’

‘‘तो कौन कर सकता है, पापा?’’

‘‘तुम, केवल तुम, श्रेया,’’ ब्रजेश ने बड़े विवश भाव से कहा.

‘‘वह कैसे, पापा?’’ श्रेया ने सहमे स्वर में पूछा.

‘‘मेरी व्यथा, मेरी करुण कहानी सुनोगी?’’

‘‘जरूर, पापा. अभी सुना दीजिए न, अभी तो आप की क्लास भी नहीं है.’’

‘‘लेकिन यहां नहीं. लौंगड्राइव पर चलोगी मेरे साथ?’’

‘‘चलिए, एनिथिंग फौर यू, पापा.’’

‘‘मैडम को कह देना हम लाइबे्ररी जा रहे हैं, अगर लौटने में देर हो जाए तो वे मेरी क्लास में कल रात तैयार किया प्रश्नपत्र बांट दें,’’ ब्रजेश ने चपरासी से कहा और श्रेया के साथ बाहर आ गए.

गाड़ी चलाते हुए ब्रजेश चुप रहे, शहर से दूर एक बहुत बड़े अहाते में बनी हवेलीनुमा बहुमंजिली कोठी के सामने उन्होंने गाड़ी रोक दी.

‘‘यह हमारी पुश्तैनी कोठी है. पिताजी मेरे और गीता के विवाह के लिए एक ही शर्त पर राजी थे कि इस जायदाद पर सिर्फ उन के अपने खून यानी मेरी औलाद का ही हक होगा, गौतम का नहीं. गौतम के लिए ही तो मैं शादी कर रहा था, इसलिए मुझे यह बात इतनी बुरी लगी कि मैं ने फैसला कर लिया कि मेरी अपनी औलाद होगी ही नहीं. गीता के गर्भाशय में फाइब्रौयड्ज थे जिन का वह इलाज करवा रही थी लेकिन मैं ने उसे दवाएं खाने के बजाय औपरेशन करवा कर गर्भाशय ही निकलवाने को मना लिया. उस के बाद एक शहर में रहते हुए भी न कभी पिताजी ने मुझे बुलाया, न मैं स्वयं ही गया.

‘‘कुछ वर्ष पहले ही पिताजी का निधन हुआ है. मरने से पहले उन्होंने इच्छा जाहिर की थी कि अंतिम संस्कार के लिए मुझे बुला लिया जाए. जायदाद तो खैर लाचारी में मेरे नाम करनी ही थी क्योंकि दान देने से तो जायदाद पराए लोगों को ही मिलती, जो वे चाहते नहीं थे. लेकिन मरने से पहले एक मार्मिक पत्र भी लिखा था उन्होंने जिस में मुझ पर अपने परिवार की वंशबेल नष्ट करने व पुरखों की मेहनत से बनाई जायदाद को पराए खून के हाथों देने का आरोप लगाया था और अनुरोध किया था कि हो सके तो ऐसा होने से रोक दूं, अपने पूर्वजों का नाम जीवित रखने के लिए गौतम के अतिरिक्त भी अपना बच्चा पैदा करूं.

‘‘उस पत्र को पढ़ने के बाद मैं आत्मग्लानि से ग्रस्त हो गया हूं. एक जानेमाने परिवार की वंशबेल नष्ट करने का मुझे कोई हक नहीं है. क्या नहीं किया था दादाजी और पापा ने अपने वंश का गौरव बढ़ाने के लिए, मुझे खुशहाल जीवन देने के लिए और मैं ने उन का बुढ़ापा ही खराब नहीं किया बल्कि उन का वंश ही खत्म कर दिया, महज इसलिए कि गौतम के मन में हीनभावना न आए. गौतम और गीता समझदार थे. हमारा दूसरा बच्चा होने पर और उसे पिताजी की जायदाद मिलने पर उन्हें कोई मलाल नहीं होता, दोनों ही पिताजी की भावनाएं समझ सकते थे और गौतम के लिए तो मेरी और उस की मां की कमाई ही काफी थी. लेकिन भावावेश में आ कर मैं ने गीता की हिस्ट्रेक्टोमी करवा कर सब संभावनाएं ही खत्म कर दीं,’’ ब्रजेश बुरी तरह बिलख पड़े.

‘‘शांत हो जाइए, पापा. हुआ तो गलत ही पर उसे सुधारने के लिए अब कुछ नहीं हो सकता,’’ श्रेया ने असहाय भाव से कहा.

‘‘बहुतकुछ हो सकता है यानी सब ठीक हो सकता है श्रेया, अगर तुम चाहो तो.’’

‘‘मैं समझी नहीं, पापा. मैं भला क्या कर सकती हूं?’’ श्रेया ने हैरानी से पूछा.

‘‘मेरी वंशबेल को बढ़ा सकती हो, मुझे मेरे खून का वारिस दे कर,’’ ब्रजेश ने आकुलता से कहा.

‘‘वह तो समय आने पर मिल ही जाएगा पापा,’’ श्रेया ने शरमा कर कहा.

‘‘गौतम का नहीं, मेरे अपने खून का वारिस, श्रेया,’’ ब्रजेश ने शब्दों पर जोर दिया, ‘‘जिसे मैं पापा की अंतिम इच्छानुसार अपने पुरखों की विरासत सौंप सकूं. पापा ने वसीयत में बगैर किसी शर्त के सारी जायदाद मेरे नाम कर दी है जिस का मैं कुछ भी कर सकता हूं. केवल उस व्यक्तिगत पत्र में अपनी इच्छा जाहिर की है जिस का मेरे सिवा किसी को कुछ पता नहीं है. लेकिन मैं ग्लानिवश न उस जायदाद का स्वयं उपयोग कर रहा हूं न गीता और गौतम को करने दूंगा. उस का उपयोग केवल पापा के खून का वह असली वारिस करेगा जो दुनिया की नजरों में तो गौतम की पहली संतान होगी पर वास्तव में वह मेरी…ब्रजेश की होगी. गौतम की उस पहली संतान के नाम हर्षावेग में आ कर अपनी पुश्तैनी जायदाद करने पर किसी को न शक होगा न कुछ पता चलेगा.’’

ब्रजेश की बात का मतलब समझ आते ही श्रेया सिहर गई. इतनी घिनौनी, इतनी अनैतिक बात पापा जैसा संभ्रांत व्यक्ति कैसे कर सकता है? तो यह वजह थी पापा का उस पर इतना स्नेह लुटाने की? अच्छा सिला दे रहे थे पापा गौतम के प्यार और विश्वास का? लेकिन वह तो गौतम से विश्वासघात नहीं कर सकती, मगर गौतम को पापा की कलुषित भावनाओं के बारे में बताए भी तो कैसे? अव्वल तो गौतम इस बात पर विश्वास ही नहीं करेगा और करने पर सदमा बरदाश्त नहीं कर पाएगा…तो फिर क्या करे वह?

‘‘घबराओ मत श्रेया, न तो मैं तुम से जोरजबरदस्ती करूंगा और न ही कोई अश्लील या अनैतिक हरकत,’’ ब्रजेश ने समझाने के मकसद से कोमल स्वर में कहा, ‘‘मेरे पास इस समस्या का बहुत ही सरल समाधान है. बस, तुम्हें थोड़ी सी सतर्कता और गोपनीयता रखनी होगी. तुम ने स्पर्म ट्रांसप्लांट यानी आईवीएफ तकनीक के बारे में सुना होगा? जी, पापा सुना है.’’

श्रेया का स्वर कांप गया. पूर्णतया सक्षम पति के रहते किसी अन्य के वीर्य को अपनी कोख में रखने का विचार मात्र ही असहनीय था. लेकिन ब्रजेश की कातरता और विवशता, गौतम के लिए असीम मोह, गौतम का ब्रजेश से लगाव और उस के प्रति कृतज्ञता उसे बाध्य कर रही थी कि वह अपनी भावनाओं को कुचल कर, ब्रजेश की वंशबेल को हरीभरी रखे. इस के सिवा उस के पास कोई दूसरा विकल्प भी नहीं था. ब्रजेश को मना कर सकती थी लेकिन उस के बाद अगर वे उदास या व्यथित रहने लगे तो स्वाभाविक है उन पर जान छिड़कने वाला गौतम भी परेशान रहने लगेगा और एक खुशहाल परिवार अवसादग्रस्त हो जाएगा.

‘‘डा. अवस्थी मेरे बहुत अच्छे दोस्त हैं, उन के क्लीनिक में सबकुछ बहुत सावधानी से हो सकता है,’’ ब्रजेश ने कहा.

‘‘तो करवा लीजिए, पापा. आप जब कहेंगे मैं वहां चली जाऊंगी,’’ श्रेया ने दृढ़ स्वर में कहा, ‘‘चलिए, वापस चलते हैं. आप की क्लास का समय हो रहा है.’’

ब्रजेश ने विस्फारित नेत्रों से श्रेया को देखा. उन्होंने बहुत पौराणिक कथाएं पढ़ रखी थीं लेकिन जो श्रेया करने जा रही थी ऐसा तो उन काल्पनिक कथाओं की किसी भी नायिका ने कभी नहीं किया था. हाईपरसैंसिटिव और ईगोइस्ट ससुर की व्हिम्ज का दंश भोगने वाली श्रेया शायद पहली आधुनिक कर्तव्यनिष्ठ पुत्रवधू व पत्नी थी.

Emotional Story : ससुर जी

रवि ने उस दिन की छुट्टी ले रखी थी. दफ्तर में उन दिनों काम कुछ अधिक ही रहने लगा था. वैसे काम इतना अधिक नहीं था. परंतु मंदी के मारे कंपनी में छंटनी होने का डर था इसलिए सब लोग काम मुस्तैदी से कर रहे थे. बिना वजह छुट्टी कोई नहीं लेता था. क्या पता, छुट्टियां लेतेलेते कहीं कंपनी वाले नौकरी से ही छुट्टी न कर दें.

रवि का दफ्तर घर से 20 किलोमीटर दूर था. वह बस द्वारा भूमिगत रेलवे स्टेशन पहुंचता और वहां से भूमिगत रेलगाड़ी से अपने दफ्तर पहुंचता. 9 बजे दफ्तर पहुंचने के लिए उसे घर से साढ़े सात बजे ही चल देना पड़ता था. उसे सवेरे 6 बजे उठ कर दफ्तर के लिए तैयारी करनी पड़ती थी. वह रोज उठ कर अपने और विभा के लिए सवेरे की चाय बनाता था. फिर विभा उठ कर उस के लिए दोपहर का भोजन तैयार कर डब्बे में रख देती, फिर सुबह का नाश्ता बनाती और फिर रवि तैयार हो कर दफ्तर चला जाता था.

विभा विश्वविद्यालय में एकवर्षीय डिप्लोमा कोर्स कर रही थी. उस की कक्षाएं सवेरे और दोपहर को होती थीं. बीच में 12 से 2 बजे के बीच उस की छुट्टी रहती थी. घर से उस विश्वविद्यालय की दूरी 8 किलोमीटर थी. उन दोनों के पास एक छोटी सी कार थी. चूंकि रवि अपने दफ्तर आनेजाने के लिए सार्वजनिक यातायात सुविधा का इस्तेमाल करता था इसलिए वह कार अधिकतर विभा ही चलाती थी. वह कार से ही विश्वविद्यालय जाती थी. घर की सारी खरीदारी की जिम्मेदारी भी उसी की थी. रवि तो कभीकभार ही शाम को 7 बजे के पहले घर आ पाता था. तब तक सब दुकानें बंद हो जाती थीं. रवि को खरीदारी करने के लिए शनिवार को ही समय मिलता था. उस दिन घर की खास चीजें खरीदने के लिए ही वह रवि को तंग करती थी वरना रोजमर्रा की चीजों के लिए वह रवि को कभी परेशान नहीं होने देती.

रवि को पिताजी के आप्रवास संबंधी कागजात 4 महीने पहले ही मिल पाए थे. उस के लिए रवि ने काफी दौड़धूप की थी. रवि खुश था कि कम से कम बुढ़ापे में पिताजी को भारत के डाक्टरों या अस्पतालों के धक्के नहीं खाने पड़ेंगे. इंगलैंड की चिकित्सा सुविधाएं सारी दुनिया में विख्यात हैं. यहां की ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा’ सब देशों के लिए एक मिसाल है. खासतौर से पिताजी को सारी सुविधाएं 65 वर्ष से ऊपर की उम्र के होने के कारण मुफ्त ही मिलेंगी.

हालांकि भारत से लंदन आना आसान नहीं परंतु 3-3 कमाऊ बेटों के होते उन के टिकट के पैसे जुटाना मुश्किल नहीं था. खासतौर पर जबकि रवि लंदन में अच्छी नौकरी पर था. जब विभा का डिप्लोमा पूरा हो जाएगा तब वह भी कमाने लगेगी.

लंदन में रवि 2 कमरे का मकान खरीद चुका था. सोचा, एक कमरा उन दोनों के और दूसरा पिताजी के रहने के काम आएगा. भविष्य में जब उन का परिवार बढ़ेगा तब कोई बड़ा घर खरीद लिया जाएगा.

पिछले 2 हफ्तों से रवि और विभा पिताजी के स्वागत की तैयारी कर रहे थे. घर की विधिवत सफाई की गई. रवि ने पिताजी के कमरे में नए परदे लगा दिए. एक बड़ा वाला नया तौलिया भी ले आया. पिताजी हमेशा ही खूब बड़ा तौलिया इस्तेमाल करते थे. रवि अखबार नहीं खरीदता था, क्योंकि अखबार पढ़ने का समय ही नहीं मिलता था. किंतु पिताजी के लिए वह स्थानीय अखबार वाले की दुकान से नियमित अखबार देने के लिए कह आया. रवि जानता था कि पिताजी शायद बिना खाए रह सकते हैं परंतु अखबार पढ़े बिना नहीं.

रवि से पूछपूछ कर विभा ने पिताजी की पसंद की सब्जियां व मिठाइयां तैयार कर ली थीं. रवि और विभा की शादी हुए 3 साल होने को जा रहे थे. पहली बार घर का कोई आ रहा था और वह भी पिताजी. रवि और विभा बड़ी बेसब्री से उन के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे.

रवि ने एअर इंडिया वालों को साढ़े 11 बजे फोन किया. सूचना मिली, हवाई जहाज 4 बजे ही पहुंचने वाला था. रवि ने फिर 1 बजे एअर इंडिया के दफ्तर में फोन किया. इस बार एअर इंडिया वाले ने रवि की आवाज पहचान ली. वह झुंझला गया, ‘‘आप के खयाल से क्या हर 5 किलोमीटर के बाद विमानचालक मुझे बताता है कि कब हवाई जहाज पहुंचने वाला है. दिल्ली से सीधी उड़ान है. ठीक समय पर ही पहुंचने की उम्मीद है.’’ उस की बात सुन कर रवि चुप हो गया.

विमान साढ़े 4 बजे लंदन हवाई अड्डे पर उतर गया. रवि ने चैन की सांस ली. पिताजी को सरकारी कार्यवाही निबटाने में कोई परेशानी नहीं हुई. वे साढ़े पांच बजे अपना सामान ले कर बाहर आ गए. रवि पिताजी को देख कर खुशी से नाच उठा. खुशी के मारे उस की आंखों में आंसू आ गए.

विभा ने पिताजी के चरण छुए. फिर उन से उन का एअरबैग ले लिया. रवि ने उन की अटैची उठा ली. शाम के पौने 6 बजे वे घर की ओर रवाना हो गए. उस समय सभी दफ्तरों और दुकानों के बंद होने का समय हो गया था. अत: सड़क पर गाडि़यां ही गाडि़यां नजर आ रही थीं. घर पहुंचतेपहुंचते 8 बज गए. पिताजी सोना चाहते थे. सफर करने के कारण रात को सो नहीं पाए थे. दिल्ली में तो उस समय 2 बजे होंगे. इसलिए उन्हें नींद नहीं आ रही थी. विभा रसोई में फुलके बनाने लगी. रवि ने पिताजी के थैले से चीजें निकाल लीं. पिताजी मिठाई लाए थे. रवि ने मिठाई फ्रिज में रख दी. विभा सब्जियां गरम कर रही थी और साथ ही साथ फुलके भी बना रही थी. हर रोज तो जब वह फुलके बनाती थी तो रवि ‘माइक्रोवेव’ में सब्जियां गरम कर दिया करता था परंतु उस दिन रवि पिताजी के पास ही बैठा था.

विभा ने खाने की मेज सजा दी. रवि और पिताजी खाना खाने आ गए. पिताजी ने बस एक ही फुलका खाया. उन को भूख से अधिक नींद सता रही थी. खाने के पश्चात पिताजी सोने चले गए. रवि बैठक में टीवी चला कर बैठ गया.

विभा ने रवि को बुलाया, ‘‘जरा मेरी मदद कर दो. अकेली मैं क्याक्या काम करूंगी?’’
विभा ने सोचा कि आज रवि को क्या हो गया है? उसे दिखता नहीं कि रसोई का इतना सारा काम निबटाना है बाकी बची सब्जियों को फ्रिज में रखना है. खाने की मेज की सफाई करनी है. हमेशा तो जब विभा बरतन मांजती थी तब रवि रसोई संवारने के लिए ऊपर के सारे काम समेट दिया करता था.

रवि कुछ सकुचाता हुआ रसोई में आया और कुछ देर बाद ही बिना कुछ खास मदद किए बैठक में चला गया. विभा को रसोई का सारा काम निबटातेनिबटाते साढ़े 10 बज गए.

वह बहुत थक गई थी. अत: सोने चली गई.

सवेरे अलार्म बजते ही रवि उठ बैठा और उस ने विभा को उठा दिया, ‘‘कुछ देर और सोने दीजिए. अभी आप ने चाय कहां बनाई है?’’ विभा बोली.

‘‘चाय तुम्हीं बनाओ. पिताजी के सामने अगर मैं चाय बनाऊंगा तो वे क्या सोचेंगे?’’

पिताजी तो पहले ही उठ गए थे. उन को लंदन के समय के अनुसार व्यवस्थित होने में कुछ दिन तो लगेंगे ही. सवेरे की चाय तीनों ने साथ ही पी. रवि चाय पी कर तैयार होने चला गया. विभा दरवाजे के बाहर से सवेरे ताजा अखबार ले आई. पिताजी अखबार पढ़ने लगे. पता नहीं, पिताजी कब और क्या नाश्ता करेंगे?

उस ने खुद पिताजी से पूछ लिया, ‘‘नाश्ता कब करेंगे, पिताजी?’’

‘‘9 बजे कर लूंगा, पर अगर तुम्हें कहीं जाना है तो जल्दी कर लूंगा,’’ पिताजी ने कहा.

तब तक रवि तैयार हो कर आ गया. उस ने तो वही हमेशा की तरह का नाश्ता किया. टोस्ट और दूध में कौर्नफ्लैक्स.

‘‘विभा, पिताजी ऐसा नाश्ता नहीं करेंगे. उन को तो सब्जी के साथ परांठा खाने की आदत है और एक प्याला दूध. तुम कोई सब्जी बना लेना थोड़ी सी. दोपहर को खाने में कल शाम वाली सब्जियां नहीं चलेंगी. दाल और सब्जी बना लेना,’’ रवि बोला. दफ्तर जातेजाते पिताजी की रुचि और सुविधा संबंधी और भी कई बातें रवि विभा को बताता गया.

विभा को 10 बजे विश्वविद्यालय जाना था परंतु पिताजी का नाश्ता और भोजन तैयार करने की वजह से वह पढ़ने न जा सकी.

उस ने 2 परांठे बनाए और आलू उबाल कर सूखी सब्जी बना दी. वह सोचने लगी, ‘पता नहीं भारत में लोग नाश्ते में परांठा और सब्जी कैसे खा लेते हैं? यदि मुझ से नाश्ते में परांठासब्जी खाने के लिए कोई कहे तो मैं तो उसे एक सजा ही समझूंगी.’

‘‘विभा बेटी, मैं जरा नमक कम खाता हूं और मिर्चें ज्यादा,’’ पिताजी ने प्यार से कहा.

‘बापबेटे की रुचि में कितना फर्क है? रवि को मिर्चें कम और नमक ज्यादा चाहिए,’ विभा ने सोचा, ‘कम नमकमिर्च की सब्जियां बनाऊंगी. जिस को ज्यादा नमकमिर्च चाहिए वह ऊपर से डाल लेगा.’

नाश्ते के बाद विभा ने दोपहर के लिए दाल और सब्जी बना ली. यह सब करतेकरते 11 बज गए थे. विभा ने सोचा, ‘पिताजी को 1 बजे खाना खिला कर 2 बजे विश्वविद्यालय चली जाऊंगी.’

साढ़े ग्यारह बजे उस ने फुलके बना कर खाने की मेज पर खाना लगा दिया. पिताजी ने रोटी जैसे ही खाई उन के चेहरे के कुछ हावभाव बदल गए, ‘‘शायद तुम ने सवेरे का गुंधा आटा बाहर छोड़ दिया होगा, इसलिए कुछ महक सी आ रही है,’’ पिताजी बोले.

विभा अपने को अपराधी सी महसूस करने लगी. उस को तो रोटियों में कोई महक नहीं आई, ‘कुछ घंटों पहले ही तो आटा गूंधा था. खैर, आगे से सावधानी बरतूंगी,’ विभा ने सोचा. खाना खातेखाते सवा बारह बज गए. बरतन मांजने और रसोई साफ करने का समय नहीं था. विभा सब काम छोड़ कर विश्वविद्यालय चली गई.
विश्वविद्यालय से घर आतेआते साढ़े चार बज गए. पिताजी उस समय भी सो ही रहे थे. जब उठेंगे तो चाय बनाऊंगी. यह सोच कर वह रसोई संवारने लगी.

पिताजी साढ़े पांच बजे सो कर उठे. वे हिंदुस्तानी ढंग की चाय पीते थे, इसलिए दूध और चायपत्ती उबाल कर चाय बनाई. फल काट दिए और पिताजी की लाई मिठाई तश्तरी में रख दी. चाय के बरतन धोतेधोते साढ़े छह बज गए. वह बैठक में आ गई और पिताजी के साथ टीवी देखने लगी. 7 बजे तक रवि भी आ गया.

‘‘रवि के लिए चाय नहीं बनाओगी, विभा?’’ पिताजी ने पूछा.

विभा हमेशा की तरह सोच रही थी कि रवि दफ्तर से आ कर खाना ही खाना चाहेगा परंतु दिल्ली में लोग घर में 9 बजे से पहले खाना कहां खाते हैं.

‘‘चाय बना दो, विभा. खाने के लिए भी कुछ ले आना. खाना तो 9 बजे के बाद ही खाएंगे,’’ रवि ने कहा.

विभा कुछ ही देर में रवि के लिए चाय बना लाई. रवि चाय पीने लगा.

‘‘शाम को क्या सब्जियां बना रही हो, विभा?’’ रवि ने पूछा.

‘‘सब्जियां क्या बनाऊंगी? कल की तीनों सब्जियां और छोले ज्यों के त्यों भरे रखे हैं. सवेरे की सब्जी और दाल रखी है. वही खा लेंगे,’’ विभा ने कहा.

रवि ने विभा को इशारा करते हुए कुछ इस तरह देखा जैसे आंखों ही आंखों में उस को झिड़क रहा हो.

‘‘बासी सब्जियां खिलाओगी, पिताजी को?’’ रवि रुखाई से बोला.

‘‘मैं तो आज कोई सब्जी खरीद कर लाई ही नहीं. चलिए, बाजार से ले आते हैं. विमलजी की दुकान तो खुली ही होगी. इस बहाने पिताजी भी बाहर घूम आएंगे,’’ विभा ने कहा.

रवि ने अपनी चाय खत्म कर ली थी. वह अपनी चाय का प्याला वहीं छोड़ कर शयनकक्ष में चला गया. विभा को यह बहुत अटपटा लगा. सोचा, ‘क्या हो गया है रवि को? घर में नौकर रख लिए हैं क्या, जो कल से साहब की तरह व्यवहार कर रहे हैं.’

कुछ देर बाद तीनों विमल बाबू की दुकान पर पहुंच गए. रवि की जिद थी कि खूब सारी सब्जियां और फल खरीद लिए जाएं. पिताजी जरा कुछ दूरी पर देसी घी के डब्बे की कीमत देख कर उस की कीमत रुपए में समझने की कोशिश कर रहे थे.

‘‘इतनी सारी सब्जियों का क्या होगा? कहां रखूंगी इन को? फ्रिज में?’’ विभा ने शिकायत के लहजे में कहा.

‘‘जब तक यहां पिताजी हैं तब तक घर में बासी सब्जी नहीं चलेगी. मुझे तुम्हारे पीहर का पता नहीं, परंतु हमारे यहां बासी सब्जी नहीं खाई जाती,’’ रवि दबी आवाज में यह सब कह गया.

विभा को रवि के ये शब्द कड़वे लगे.

‘‘मेरे पीहर वालों का अपमान कर के क्या मिल गया तुम्हें?’’ विभा ने कहा.

घर आते ही रवि ने विभा को ताजी सब्जियां बनाने के लिए कहा. पिताजी ने जिद की कि नई सब्जी बनाने की क्या जरूरत है जबकि दोपहर की सब्जियां बची हैं. विभा की जान में जान आई. अगर सब्जियां बनाने लग जाती तो खाना खातेखाते रात के 11 बज जाते. पिताजी रसोई में ही बैठ गए. रवि भी वहीं खड़ा रहा. वह कभी विभा के काम में हाथ बंटाता और कभी पिताजी से बातें कर लेता. खाना 9 बजे ही निबट गया. रवि और पिताजी टीवी देखने लगे.

विभा रसोई का काम सवेरे पर छोड़ कर अपने अध्ययन कक्ष में चली गई. पढ़तेलिखते रात के 12 बज गए. बीचबीच में रसोई से बरतनों के खड़कने की आवाज आती रही. शायद रवि चाय या दूध तैयार कर रहा होगा अपने और पिताजी के लिए. विभा इतना थक गई थी कि उस की हिम्मत बैठक में जा कर टीवी देखने की भी न थी. बिस्तर पर लेटते ही नींद ने उसे धर दबोचा.

अलार्म की पहली घंटी बजते ही उठ गई विभा. रसोई में चाय बनाने पहुंची. पिताजी को वहां देख कर चौंक गई. पिताजी ने रसोई को पूरी तरह से संवार दिया था. बिजली की केतली में पानी उबल रहा था. मेज पर 3 चाय के प्याले रखे थे.

‘‘आप ने इतनी तकलीफ क्यों की?’’ विभा ने कहा.

‘‘अब मेरी सफर की थकान उतर गई है. मैं यहां यही निश्चय कर के आया था कि सारा दिन टीवी देख कर अपना समय नहीं बिताऊंगा बल्कि अपने को किसी न किसी उपयोगी काम में व्यस्त रखूंगा. तुम अपना ध्यान डिप्लोमा अच्छी तरह से पूरा करने में लगाओ. घर और बाहर के कामों की जिम्मेदारी मुझ पर छोड़ दो,’’ पिताजी बोले.

पिताजी की बात सुन कर विभा की आंखें नम हो गईं. पिताजी ने रवि को आवाज दी. रवि आंखें मलता हुआ आ गया. विभा ने सोचा, ‘रवि इन को मेहमान की तरह रखने की सोच रहा था? पिताजी क्या कभी मेहमान हो सकते हैं?’

शिकार

चेन्नई एक्सप्रेस तेजी से अपने गंतव्य की ओर दौड़ी जा रही थी. श्याम ने गाड़ी के डिब्बे की खिड़की से बाहर झांकते हुए कहा, ‘‘बस, थोड़ी ही देर में हम चेन्नई के सेंट्रल स्टेशन पर पहुंचने वाले हैं.

फिर उस ने अपनी नव विवाहिता पत्नी के चेहरे को गौर से निहारा. उसे अभी भी विश्वास नहीं हो रहा था कि उसे इतनी सुंदर और पढ़ीलिखी पत्नी मिली है. जब उसे अपने पिता का पत्र मिला था कि उन्होंने अपने मित्र की बेटी से उस की शादी तय कर दी है तो उसे बहुत गुस्सा आया था. लेकिन मीरा की एक झलक देखने के बाद उस का गुस्सा हवा हो गया था.

श्याम को अपनी ओर निहारते देख मीरा लजा गई. पर वह मन ही मन खुश थी. लेकिन उस वक्त उसे श्याम को यह जताना उचित नहीं लगा कि उस के मन में भी अपने विवाह को ले कर ढेर सारी शंकाएं थीं. एक अनजान व्यक्ति से शादी के गठबंधन में बंध कर उस के साथ पूरा जीवन बिताने के खयाल से ही वह भयभीत थी और मातापिता से विद्रोह करना चाहती थी.

लेकिन श्याम को देख कर उसे थोड़ा इत्मीनान हुआ. उस का चेहरामोहरा भी अच्छा था और वह स्मार्ट भी था. श्याम चेन्नई में एक निजी कंपनी में कार्यरत था. मीरा को ऐसा लगा कि श्याम के साथ उस की अच्छी भली निभ जाएगी और दोनों की जिंदगी आराम से कटेगी.

रेलगाड़ी से उतर कर श्याम और मीरा एक बेंच पर बैठ गए. श्याम ने अपना मोबाइल निकाला और मीरा की ओर देख कर बोला, ‘‘ओह, मेरे मोबाइल की बैटरी तो बिलकुल खत्म हो गई है. मैं ने अपने एक दोस्त को हमें पिक करने को कह दिया था, लेकिन वह कहीं दिख नहीं रहा. जरा अपना मोबाइल तो देना. मैं उसे फोन करता हूं, अभी तक आया क्यों नहीं?’’

फोन लगाने के कुछ देर बाद वह बोला, ‘‘ताज्जुब है, उस का फोन औफ है. जरा मैं बाहर देख कर आता हूं कि वह आया है कि नहीं. तुम यहीं ठहरो.’’

‘‘लेकिन मैं यहां अकेली…’’ मीरा ने चिंता जताई.

‘‘ओह… अकेली कहां हो. चारों ओर इतनी भीड़भाड़ है. फिर अपना सामान भी तो है. इस की निगरानी कौन करेगा? बस, मैं यों गया, यों आया.’’

श्याम तुरंत बाहर की ओर चला गया. मीरा के चेहरे पर थोड़ी परेशानी झलक आई. एक तो सफर की थकान, दूसरे एकदम अजनबी शहर. वह अपने बक्सों पर नजर गड़ाए एक बैंच पर सिकुड़ कर बैठ गई. बारबार उस की नजरें बाहर वाले उस गेट की तरफ उठ जातीं, जहां से उस का पति बाहर गया था. पलपल उस की अधीरता बढ़ती जा रही थी. श्याम को गए काफी समय हो गया था और उस का कोई अतापता नहीं था. उस ने कुढ़ कर सोचा, ‘कहां रह गए.’

सहसा उस ने देखा कुछ युवक उस के पास आ कर रुके. ‘‘भाभी.’’ एक ने कहा, ‘‘आप मीरा भाभी ही हैं न, श्याम की पत्नी?’’

‘‘हां, लेकिन आप लोग कौन?’’ उस ने सवालिया नजरें उन पर गड़ा दीं.

‘‘हम उस के जिगरी दोस्त हैं, हम लोग श्याम की बारात में मुंबई आए थे न. आप ने हमें पहचाना नहीं क्या? मैं अनंत हूं और ये तीनों मनोहर, प्रेम और मुरुगन. हम आप दोनों को लेने निकले थे, लेकिन रास्ते में हमारी गाड़ी खराब हो गई. हमें टैक्सी कर के आना पड़ा, पहुंचने में थोड़ी देरी हो गई… खैर, श्याम कहां हैं?’’

ये भी पढ़ें- जुर्म सामने आ ही गया

‘‘वो तो आप को ही खोजने गए हैं.’’

‘‘ओह, हमारी नजर उस पर नहीं पड़ी. कोई बात नहीं, चलिए चलते हैं. श्याम को बाहर से ले लेंगे.’’

उन्होंने मीरा को कुछ बोलने का अवसर नहीं दिया और उसे लगभग खदेड़ कर साथ ले चले.

‘‘श्याम कहीं दिखाई दे नहीं रहा है,’’ अनंत ने कहा, ‘‘कोई हर्ज नहीं, हम में से कोई एक यहां रुक जाएगा, और उसे अपने साथ औटो में ले आएगा. वैसे भी टैक्सी में 4 से अधिक सवारी नहीं बैठ सकतीं.’’

धोखे का शिकार हुई नवविवाहिता मीरा…उन्होंने मीरा को गाड़ी में बिठाया और आननफानन में टैक्सी चल पड़ी. मीरा के मन में धुकधुकी सी होने लगी. ये लोग उसे कहां लिए जा रहे हैं? अनजान शहर, अनजाने लोग. उस की घबराहट को भांप कर उस के साथ बैठा युवक हंसा, ‘‘भाभी, आप जरा भी न घबराएं. हम पर भरोसा कीजिए. हम चारों श्याम के बचपन के दोस्त हैं. अब तक हम बेसांटनगर में साथ ही रहते थे. अब उस ने अड्यार में किराए के एक दूसरे फ्लैट में शिफ्ट कर लिया है.’’

कुछ देर बाद टैक्सी रुकी.

‘‘आइए भाभी.’’ अनंत ने कहा.

मीरा ने चारों तरफ नजरें घुमाते हुए पूछा, ‘‘ये कौन सी जगह है?’’

‘‘ये हमारा घर है. आप को यहां थोड़ी देर रुकना पड़ेगा.’’

मीरा थोड़ी असहज हो गई, ‘‘लेकिन क्यों? और मेरे पति कहां रह गए?’’  उस ने पूछा.

‘‘बस, थोड़ी देर की बात है.’’ कहते हुए वे मीरा को घर के अंदर ले गए.

‘‘श्याम भी आता ही होगा. आप बैठिए. मैं आप के लिए कौफी बना कर लाता हूं.’’ अनंत ने कहा.

‘‘आप के घर में कोई महिला नहीं है क्या?’’ मीरा ने सवाल किया.

अनंत हंस दिया, ‘‘नहीं, हम चारों अभी कुंवारे हैं.’’

थोड़ी देर में कौफी आ गई. मीरा ने अनिच्छा से कौफी को मुंह लगाया. उस के मन में एक अनजाना सा डर बैठ गया था. वह सोच रही थी, ‘आखिर श्याम कहां रह गया और उस ने अब तक उस से फोन पर बात क्यों नहीं की?’

‘‘भाभी,’’ अनंत आत्मीयता से बोला, ‘‘हमारी कुटिया में आप के चरण पड़े. आप के साथ हमारी थोड़ी पहचान भी हो गई. हमें बड़ा अच्छा लगा. बाद में तो मिलनामिलाना होता ही रहेगा.’’

अनंत उस से जबरन नजदीकियां बनाना चाह रहा था. मीरा ने चिढ़ कर सोचा. यह जबरन उस के गले पड़ रहा है. बात इतनी ही नहीं है. इन सब ने एक तरह से उसे स्टेशन से अगवा कर लिया था और उस की मरजी के बगैर उसे वहां रोक रखा था. वे चारों उस के इर्दगिर्द शिकारी कुत्तों की तरह मंडरा रहे थे, पर उस से आंखें मिलाने से कतरा रहे थे.

उन के संदिग्ध व्यवहार से साफ लग रहा था कि उन के इरादे नेक नहीं हैं. उन की नीयत में खोट है. मीरा के मन में भय का संचार हुआ. उस ने उन लोगों के साथ आ कर बड़ी भूल की. अब वह उन के जाल से कैसे छूटेगी?

वह भयभीत थी. तभी अनंत ने अचानक अपने चेहरे से भलमनसाहत का मुखौटा उतार फेंका. उस के होंठों पर एक कुटिल मुसकान खेल रही थी, आंखों में वासना की लपटें दहक रही थीं.

पति के दोस्त ही निकले दरिंदे एकाएक उस ने मीरा पर धावा बोल दिया. मीरा की चीख निकल गई.

‘‘ये क्या कर रहे हैं आप?’’ उसने अपने आप को छुड़ाने की कोशिश की, ‘‘आप अपने होश में तो हैं न?’’

‘‘होश में था. अब तो मैं मदहोश हूं, आप के रूप ने मुझे दीवाना बना दिया है. भाभी, आप नहीं जानतीं कि आप की मदमाती आंखें कितना कहर ढा रही हैं. जब से हम लोगों ने शादी में आप की एक झलक देखी, तभी से हम आप पर बुरी तरह लटटू हो गए थे.’’

मीरा उस की बांहों में छपटपटाने लगी. लेकिन अनंत के बलिष्ठ बाजू उस के इर्दगिर्द कसते गए. आखिर उस ने मीरा को अपनी हवस का शिकार बना ही लिया. कुछ देर बाद वह उसे छोड़ कर चला गया. दरवाजा खुला और एक और व्यक्ति ने कमरे में प्रवेश किया. उसे देख कर मीरा के होश उड़ गए. ‘‘नहीं…’’ वह प्राणपण से चीख उठी. लेकिन उस की गुहार सुनने वाला वहां कोई नहीं था.

इज्जतआबरू लुटा कर असहाय रह गई. मीरा बिस्तर पर असहाय सी पड़ी थी. उस की आंखों से झरझर आंसू बह रहे थे. उस ने सोचा, अब वह इस नर्क से कैसे निकलेगी? वह अपने पति को क्या मुंह दिखाएगी? क्या कोई उस की बात पर यकीन करेगा? दोस्ती का दम भरने वाले अपने दोस्त की पत्नी से ऐसा घृणित आचरण कैसे कर सकते हैं? ये तो अमानत में खयानत हुई. क्या सभ्य समाज के सदस्य इस हद तक गिर सकते हैं? क्या दुनिया में इंसानियत बिलकुल मर गई है?

वे लोग मीरा के बदन से तब तक खेले, जब तक उन का मन नहीं भर गया. फिर उसे श्याम के घर पहुंचा दिया गया.

‘‘अपने नए घर में तुम्हारा स्वागत है मीरा,’’ श्याम ने हुलस कर कहा, ‘‘बताओ कैसा लगा तुम्हें ये घर? मैं ने थोड़ीबहुत साफसफाई करवा दी है और राशनपानी भी ले आया हूं. मैं ने बाथरूम में गीजर चला दिया है. तुम नहा धो लो.’’

मीरा जड़वत, गुमसुम बैठी रही.

‘‘चाय पिओगी? क्या बात है, तुम इतनी चुप क्यों हो? क्या नाराज हो मुझ से? सौरी, मुझे अचानक किसी जरूरी काम से जाना पड़ गया था. पर मैं जानता था कि मेरे दोस्त तुम्हें सहीसलामत यहां पहुंचा देंगे.’’

भग्न हृदय, मीरा मुंह नीचा किए कठघरे में खड़े मुलजिम की तरह बैठी रही. श्याम ने उसे झकझोरा, ‘‘क्या हुआ भई, तुम कुछ बोलती क्यों नहीं?’’

अचानक वह फूट पड़ी और बिलखबिलख कर रोने लगी.

‘‘अरे ये क्या? रो क्यों रही हो? क्या हुआ, कुछ तो बोलो?’’

मीरा ने सिसकते हुए टूटेफूटे शब्दों में उसे अपने साथ हुई त्रासदी के बारे में बताया. सुन कर श्याम सन्न रह गया. उस का चेहरा विवर्ण हो गया. उस ने अपना सिर दोनों हाथों में थाम लिया. फिर रुआंसे शब्दों में बोला, ‘‘हे भगवान, मैं नहीं जानता था कि मेरे दोस्त ऐसी घिनौनी हरकत करेंगे. यह तो हैवानियत की हद हो गई.’’

वह उत्तेजित सा हो कर कमरे में चहलकदमी करने लगा.

‘‘अब मेरा क्या होगा?’’ मीरा ने आंसू बहाते हुए कहा.

‘‘तुम क्यों फिक्र करती हो? इस में तुम्हारा कोई कसूर थोड़े ही है. मैं तुम्हें जरा भी दोष नहीं दूंगा. लेकिन एक बात बताओ. क्या तुम्हें पक्का यकीन है कि जो लोग तुम्हें स्टेशन पर लेने आए थे वे मेरे ही दोस्त थे? वे कोई गुंडे मवाली तो नहीं थे न, जो तुम्हें अकेली देख बहलाफुसला कर अपने साथ ले गए.’’

‘‘ये आप क्या कह रहे हैं?’’ मीरा ने तड़प कर कहा, ‘‘मैं क्या इतनी बेवकूफ हूं कि किसी भी अनजान आदमी के साथ मुंह उठा कर चल दूंगी? क्या मुझे किसी भलेमानस और गुंडेमवाली में फर्क करने की तमीज नहीं है? वैसे भी आप ही ने तो कहा था कि आप के दोस्त हमें स्टेशन पर लेने आएंगे. उन्हें मैं ने पहचान भी लिया था, तभी तो उन पर भरोसा कर के उन के साथ गई. पर उन्होंने इस बात का नाजायज फायदा उठाया और मेरे साथ ऐसा वहशियाना सलूक किया.’’

ये भी पढ़ें- क्योंकि मैं डिब्बा नहीं बन सकता

पति का प्यार, जो सिर्फ नाटक था. मीरा अपना मुंह ढांप कर सिसकने लगी. श्याम ने उसे अपनी बांहों में ले लिया और उसे दिलासा दी. उस के आंसू पोंछे, ‘‘रोओ नहीं, जो हो गया सो हो गया. बीती बात पर खाक डालो. इस घटना को एक हादसा समझ कर भूल जाओ.’’

‘‘नहीं, ये हादसा इतनी आसानी से नहीं भुलाया जा सकता. पिछले कुछ घंटों की दर्दनाक याद मेरे जेहन में नासूर बन कर हमेशा टीसती रहेगी. मैं तो कहीं मुंह दिखाने लायक भी नहीं रही. मेरे दामन में हमेशा के लिए दाग लग गया.’’

‘‘छि: ऐसी घिसीपिटी बातें न करो. मैं हूं न. मेरे रहते तुम्हें किसी बात की फिक्र करने की जरूरत नहीं है. हम दोनों मिल कर हर मुश्किल को सुलझाएंगे. हर मुसीबत का सामना करेंगे.’’

थोड़ी देर बाद मीरा ने आंसू पोंछ कर कहा, ‘‘अब आप का क्या करने का इरादा है?’’

‘‘सोच रहा हूं कि जा कर उन पाजी दोस्तों को खूब खरीखोटी सुनाऊं. उन की सात पुश्तों की खबर ले डालूं.’’ श्याम ने दांत पीस कर कहा.

‘‘बस इतना ही, और कुछ नहीं.’’

‘‘नहीं, मैं और भी बहुत कुछ कर सकता हूं. मैं उन्हें किराए के गुंडों से पिटवाऊंगा, उन की हड्डीपसली एक कर दूंगा. उन्हें जन्म

भर के लिए अपाहिज बना कर छोडूंगा.’’

‘‘लेकिन ये सजा उन नरपिशाचों के लिए नाकाफी है. इस की जगह हमें पुलिस में जाना चाहिए. अभी, इसी वक्त.’’

‘‘पुलिस!’’ श्याम बुरी तरह चौंक गया.

‘‘हां. पुलिस में जाए बिना काम नहीं चलेगा. उन गुनहगारों को उन के किए की सजा दिलानी ही होगी.’’

श्याम सोच में पड़ गया. ‘‘नहीं,’’ उस ने सर हिलाया, ‘‘पुलिस में जाना ठीक नहीं होगा.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘इसलिए कि इस से बात फैल जाएगी. अभी ये बात केवल हम दोनों तक ही सीमित है. पुलिस में रपट लिखाते ही सब कुछ जगजाहिर हो जाएगा. अखबार में सुर्खियां छपेंगी. गली मोहल्ले में हमारा नाम उछाला जाएगा. घरघर में चरचे होंगे. जितने मुंह उतनी बातें.’’

मीरा सोच भी नहीं सकती थी कि यह पति की शातिर चाल है. ‘‘लेकिन आजकल ऐसे मामलों में पीडि़त का नाम व पता गोपनीय रखा जाता है. उसे मीडिया और कानून की भरपूर मदद मिलती है, सहयोग मिलता है. पब्लिक की सहानूभूति उसी के साथ होती है. वे दिन लद गए जब बलात्कारी कुकर्म कर के बेदाग बच जाते थे और सारी जिल्लत और रुसवाई नारी को झेलनी पड़ती थी.’’

‘‘यह भी तो सोचो कि बात फैल गई और मेरे मातापिता को खबर लग गई तो प्रलय आ जाएगी. मेरे पिता दिल के मरीज हैं. वे इतना बड़ा आघात कभी नहीं सहन कर पाएंगे. उन्हें हार्ट अटैक आ सकता है.’’

‘‘तो क्या हम चुप लगा जाएं?’’ मीरा ने हैरत से पूछा.

‘‘हां, मेरी मानो तो इस बात पर परदा डालना ही ठीक रहेगा. आखिर इस बात का ढिंढोरा पीटने से हमें क्या हासिल होगा? बदनामी के सिवाय कुछ हाथ नहीं लगेगा. समय सब घाव भर देता है, हमें इस अप्रिय घटना को भूलना होगा. जो बीत गया सो बीत गया.’’

मीरा सोच में डूब गई. कुछ देर सन्नाटा छाया रहा. फिर श्याम बोला, ‘‘तुम नहाधो लो, सुबह की भूखी हो. मुझे भी जोरों की भूख लगी है. मैं पास के होटल से खाना ले आता हूं.’’

‘‘आप फिर मुझे अकेला छोड़ कर जा रहे हैं.’’ वह रुआंसी हो गई.

‘‘ओह, यहां इस बिल्डिंग में तुम्हें किसी तरह का खतरा नहीं है. अड़ोसपड़ोस में भले लोग रहते हैं. बाहर गेट पर चौकीदार तैनात है. दरवाजा अंदर से बंद कर लो. जब मैं लौटूं तभी खोलना. मैं जल्द से जल्द लौट आऊंगा.’’

श्याम अपनी मोटरसाइकिल पर सवार हो कर सीधा अपने दोस्तों के यहां पहुंचा.

‘‘आओ आओ यार,’’ उन्होंने उस का जिंदादिली से स्वागत किया.

‘‘अबे सालो,’’ श्याम ने उन्हें लताड़ा, ‘‘ये तुम लोगों ने मुझे किस मुसीबत में फंसा दिया?’’

‘‘क्यों क्या हुआ?’’

‘‘गधे की औलादों, मीरा को अपना अतापता बताने की क्या जरूरत थी. उसे अपने घर लाने के बजाय कहीं और ले जाते.’’

‘‘श्याम मेरे भाई, हमारा प्लान तो यही था कि उसे कार में इधरउधर घुमाते रहेंगे और अपना मतलब साध लेंगे. पर मांगी हुई कार ससुरी बीच रास्ते में टें बोल गई और लाचारी में हमें टैक्सी करनी पड़ी. अब टैक्सी में तो ये सब संभव नहीं था. लिहाजा हमें मीरा को अपने घर लाना पड़ा.’’

‘‘अब मैं मीरा को कैसे मनाऊं, कैसे समझाऊं. वह भरी बैठी है, पुलिस में जाने पर तुली है. अगर उसने थाने में रपट लिखाई तो पुलिस फौरन यहां आ धमकेगी और तुम सब को हथकड़ी लग जाएगी.’’

‘‘पुलिस?’’ वे घबरा कर बोले, ‘‘अरे यार इतना अंधेर तो न कर. अगर पुलिस ने हमें धर लिया तो हम सब बेमौत मर जाएंगे. हमारी जिंदगी तबाह हो जाएगी, नौकरी चली जाएगी, जेल में सड़ना पड़ेगा. और बदनामी होगी अलग से. हम तेरे पैर पकड़ते हैं. हमें इतनी बड़ी सजा न दिलवा. किसी भी तरह हमें पुलिस से बचा ले.’’

‘‘मैं भरसक कोशिश करूंगा कि वह पुलिस में न जाए पर पता नहीं वह मेरी बात मानेगी या नहीं. वह भोलीभाली गांव की गोरी तो है नहीं, जो रोधो कर, इस सब को अपनी किस्मत का खेल मान कर चुप हो जाएगी. खैर, मैं जरा जल्दी में हूं. तुम लोग जल्दी से मेरे पैसे निकालो.’’

‘‘ले भाई,’’ उन्होंने उस के हाथ में कुछ नोट थमा दिए.

‘‘ये क्या,’’ वह आग बबूला हुआ, ‘‘सिर्फ 4 हजार? मेरे तो 4 लाख रुपए बनते हैं. तुम सब ने 1-1 लाख देने का वादा किया था.’’

‘‘श्याम मेरे भाई, हम पर रहम कर. एक लाख बहुत बड़़ी रकम होती है. हमारे पास एक लाख न कभी हुए थे और न होंगे. हम सब छोटीमोटी नौकरी वाले हैं, रोज कुंआ खोदना और रोज पानी पीना.’’

‘‘तुम लोग पैदाइशी कमीने हो,’’ श्याम ने दांत पीस कर कहा, ‘‘जब देने की औकात नहीं थी तो वादा क्यों किया? बेकार में ये सब ड्रामा करना पड़ा. मेरी फजीहत करवाई. अगर मेरी पत्नी को असलियत मालूम हो गई तो वह मुझे कभी माफ नहीं करेगी. उम्र भर मुझे कोसती रहेगी. मुझे तो माया मिली न राम. और हां, तुम लोग अपनी खैरियत चाहते हो तो कुछ दिनों के लिए इधरउधर कहीं खिसक जाओ. मीरा गुस्से से उबल रही है. अगर उस ने पुलिस में जाने की जिद की तो मैं कुछ नहीं कर सकूंगा.’’

‘‘लेकिन यार सारा कुसूर हमारा थोड़े ही न है. हम ने तुझ से करार लिया था कि हम चारों एक बार तेरी पत्नी से सहवास करेंगे और इस के एवज में हर एक तुझे एकएक लाख रुपए देगा. ये सब तेरी मरजी से ही तो हुआ है. तुझ से इजाजत न मिलती तो क्या हम ऐसा कदम उठाने की जुर्रत करते? इस मामले में तू भी उतना ही दोषी है, जितना कि हम.’’

श्याम का चेहरा उतर गया. वह उस शाम की याद कर के मन ही मन तिलमिला उठा. श्याम अतीत में खो गया.

नाम श्याम पर काम किया. उस ने विनाश का शादी की शाम वह अपने दोस्तों के साथ बैठा शराब पी रहा था. सब के सब सुरूर में थे, नशे में झूम रहे थे.

‘‘मान गए यार श्याम,’’ उस के दोस्त बोले, ‘‘तेरी ससुराल वाले बड़े दरियादिल हैं. हम बारातियों की क्या खातिरदारी की है उन्होंने. तबीयत बागबाग हो गई.’’

‘‘ऊंह, कोरी खातिरदारी अपने किस काम की,’’ श्याम ने मुंह बना कर कहा, ‘‘मेरे पिताजी ने मुझसे कहा था कि वे मेरे ससुर से बात कर चुके हैं, उन्होंने मुझे शादी में कार देने का वादा किया है. लेकिन ससुर जी ने शादी में दिया ठेंगा, कहने लगे कि इतना पैसा खर्च करने की उन की सामर्थ्य नहीं है. वे मुझे एक स्कूटर दे कर टरकाना चाहते थे, पर मैं ने मना कर दिया. मुझे तो इतना गुस्सा आया कि उन से कह दूं, अपनी बेटी को भी अपने ही पास सहेज कर रखें.’’

‘‘पागल न बन यार. तेरी पत्नी तो रूप की खान है. वह एक बेशकीमती हीरा है, जिसे पा कर कोई भी अपना भाग सराहेगा. हम ने तो जब से उसे देखा है, तब से तेरी खुशकिस्मती पर रश्क कर रहे हैं. आहें भर रहे हैं कि हमें ऐसी परी क्यों नहीं मिली.’’

‘‘परी है सो ठीक है. लेकिन मुझे कार न मिलने का बहुत मलाल है.’’ श्याम कुढ़ कर बोला, ‘‘मैं ने तो मौडल और रंग भी पसंद कर रखा था. सोच रहा था कि शादी के बाद शान से कार चलाता हुआ घर पहुंचूंगा तो मोहल्ले वालों पर धाक जम जाएगी. अपने दिन तो तंगी और फाकामस्ती में गुजरते हैं. कार खरीदने की सामर्थ्य अपने में नहीं है.’’

‘‘मेरे दिमाग में एक बात आई है,’’ अनंत बोला, ‘‘अगर तू बुरा न माने तो कहूं.’’

‘‘बोल न. बेधड़क बोल.’’

‘‘एक तरीका है, जिस से तू कार के दाम हासिल कर सकता है. बाप ने न दिया न सही, उस की बेटी से वसूल ले.’’

‘‘क्या मतलब.’’

फिर नशे में धुत सब ने वह विनाशकारी प्लान बनाया था. अपने ही बुने जाल में फंस गया श्याम..श्याम उल्टे पांव घर लौटा. रास्ते भर वह अपने आप को धिक्कारता रहा. कैसी भयानक भूल कर दी थी उस ने. कैसा बचकाना काम किया था. अब वह अपने ही बुने जाल में कैसे निकलेगा? बिगड़ी बात कैसे बनाएगा? उसेबारबार अपनीपत्नी का आंसुओं से भीगा चेहरा याद आ रहा था.

उसे पश्चाताप हो रहा था कि क्या मीरा अपने इस कटु अनुभव से कभी उबर  सकेगी या उन दोनों के विवाहित जीवन को ग्रहण लग जाएगा?

उस ने खुद अपने सुखी संसार में आग लगा दी थी. अपने विवाहित जीवन में जहर घोल दिया था. उस का लालच उसे ले डूबा. अब वह कैसे इस भूल का सुधार करेगा. क्या मीरा उसे क्षमा कर देगी?

घर पहुंच कर उस ने मोटरसाइकिल पार्क की. उसे देख कर चौकीदार दौड़ा आया, ‘‘साहब, मेमसाहब बाहर गई हैं. बोलीं कि साहब आएं तो बता देना.’’

‘‘कहां गई हैं?’’

‘‘वे बोलीं कि साहब से कह देना, पुलिस स्टेशन गई हैं.’’

श्याम को काटो तो खून नहीं. वह वहीं जमीन पर धम से बैठ गया. ?

(कल्पना पर आधारित)

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें