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विस्फोटक जत्था

सुबह पांच बजे, 13 अगस्त, 2023, दामया घाटी.

महेश सार्थक ने अपने विस्फोटक सूचक यंत्र को यहांवहां घुमाया और कदम उठाने से पहले उच्च आवाज वाले अलार्म की खतरे की घंटी को सुनने के लिए उस पर पूरा ध्यान दिया. सूर्य अभी तक क्षितिज के नीचे ही था, उस का उदय नहीं हुआ था और दामया नदी के पानी से पोषित ‘तहली ज़ोन’ अभी भी ठंडा और नम था और इसी वजह से सैनिकों का जमावड़ा था. वातावरण में मौन इस वक़्त अच्छी बात लग रही थी. यही वह आवाज थी जिसे इस वक़्त हर सैनिक सुनना चाहता था. महेश ने सूखी नदी के किनारे विस्फोटकों की अपनी धीमी खोज जारी रखी.

लांस नायक महेश सार्थक अपनी टुकड़ी की ओर से गश्त पर जाने वाला पहला सैनिक था. जिम्मेदारी लेना उस के कर्तव्यों में से एक था. उस के पीछे मूक मानव श्रृंखला में एक सैनिक कंपनी थी, जिस में 130 सैनिक थे और हर सैनिक पूरी तरह से महेश के नक्शेकदम पर चलने की कोशिश कर रहा था. भारतीय बेस के आसपास आतंकवादियों ने भूमिगत विस्फोटक खानों जाल बुन दिया था.

महेश सार्थक अपने काम में माहिर था, इसीलिए शायद उसे कंपनी की ओर से सब से पहले जाने के लिए कहा गया था. पांच महीने पहले दामया पहुंचने के बाद से उस ने जितने गश्त किए थे, उस की गिनती वह खो चुका था. अब उस के पास बस एक और महीना था और फिर घरवापसी अपनी मंगेतर के पास. दो महीने पहले छुट्टी ले कर जब वह घर गया था तो उस ने शादी की बात उठाई थी. तुरंत हामी मिलने पर उस ने 2024 की शुरुआत में शादी करने का फैसला कर लिया.

शरीर से मजबूत वह एक हट्टाकट्टा इंसान था, लेकिन चेहरे पर कोई गंभीर भाव नहीं थे. उलटे, सब के साथ मुसकरा कर ही बात करता था. 25 वर्षीय यह जवान इस वक़्त दामया के सब से खतरनाक और विस्फोटकग्रस्त क्षेत्रों में से एक के बीच से एक सुरक्षित मार्ग ढूंढ़ने की कोशिश कर रहा था. अपनी पूरी कंपनी की सुरक्षा की जिम्मेदारी उस के सिर पर थी. जब भी वह भारतीय बेस छोड़ कर आतंकवादियों से बदहवास इस इलाके में औपरेशन के लिए निकलता, उस के पेट से एक अजीब लहर उठती. शायद किसी भयावह आशंका से उत्पन्न लहर. पांच महीनों से लगातार उठने वाली इस लहर की उसे आदत हो गई थी. उस ने इस लहर के साथ जीना सीख लिया था और यह स्वीकार कर लिया था कि गलत जगह पर एक कदम का मतलब तुरंत मौत या अंगभंग हो सकता है.

इस अजीबोगरीब लहर का साथ शायद अच्छा था. इसी लहर की वजह से शायद उसे अपनी और अपने साथियों की परवा थी. इस लहर ने उस की इंद्रियों को पैना कर दिया था और उसे जिंदा रखा था.

महेश हमेशा इस बात पर जोर दिया करता था कि गश्त में अगला आदमी उस से कम से कम 5 मीटर पीछे रहे – उस के द्वारा धीमे स्वर में दिए गए आदेश को सुनने के लिए यह काफी था, लेकिन यह इतनी दूरी जरूर थी कि अगर गलती से महेश आतंकवादियों द्वारा रखे गए विस्फोटक पर पांव रख देता है तो पीछे वाले व्यक्ति को कुछ न हो.

आज सुबह मिशन का उद्देश्य दामया शहर के दक्षिणपश्चिम में एक मार्ग को साफ करना था. कुछ समय पहले तक जहां भारतीयों ने बेस बनाई थी, वह आतंकवादियों का अड्डा था. अब यह भारतीय सेना के कब्जे में था. इस बेस के सुरक्षित परिवेश से बाहर निकलने के आदेश की प्रतीक्षा करते हुए कई सैनिक शारीरिक रूप से बीमार हो गए थे.

यह एक खतरनाक मिशन था और हर कोई इस बात को जानता था. महेश के साथ 8 ऐसे जवान थे जो इस आगे बढ़ने वाली सेना की अग्रिम पंक्ति में थे और इस का महत्त्वपूर्ण हिस्सा थे. इस से पीछे चलने वाली सेना सुदृढ हो गई थी. इस औपरेशन में वे वही काम कर रहे थे जो शतरंज के खेल में सामने की पंक्ति में 8 मोहरे करते हैं. सुबहसुबह के अंधेरे में सैनिक एक कतार में अपनी बेस से बाहर निकले. कोई कुछ नहीं बोला. धूल में चलते हुए केवल बूट के कदमों की नरम गड़गड़ाहट ही सुनी जा सकती थी. केवल आधा किलोमीटर चलने के बाद ही गोलाबारूद, पानी और वायरलैस यंत्र के बोझ से दबे हुए कई सैनिक भारी सांस लेने लगे. उन की वरदी पसीने से लथपथ शरीर से चिपक गई.

महेश इस मार्ग को जानता था और उसे कमर तक गहरे दामया नदी के ठंडे पानी व उस से आगे की घाटी में अपनी टीम को पहुंचाने में कोई परेशानी नहीं हुई. दुश्मन के किसी भी संकेत के लिए सचेत, नदी किनारे से संभल कर वह अपनी सेना की टुकड़ी को आगे ले आया.

कोई नहीं जानता था कि महेश ने उस क्लिक की आवाज को सुना या नहीं जो विस्फोटक पर उस के पांव पड़ने की वजह से हुई. लेकिन अगर उस ने सुना भी, तो भी प्रतिक्रिया करने का कोई समय नहीं था. देखते ही देखते विस्फोटक के अंदर का इलैक्ट्रिकल सर्किट पूरा हो गया, उस में बिजली का प्रवाह हुआ और 20 किलो के घरेलू बम के अंदर दबा डेटोनेटर फट गया. धमाके से महेश हवा में ऊपर उछला और धरती पर गिरा. घटनास्थल पर ही उस ने अपने दोनों पैर खो दिए.

हवलदार प्रसाद दीवान, एक बम निबटान विशेषज्ञ, ने कवर लिया क्योंकि विस्फोट की आवाज घाटी में फैल गई. धुएं और धूल का एक गाढ़ा भूरा गुबार दामया के आकाश में चमकने लगा.

कंपनी में बहुत पीछे हवलदार प्रसाद अनैच्छिक रूप से दबी हुई सांस में बुदबुदाने लगा. दामया में 4 महीनों के दौरान उस ने 80 बमों को निष्प्रभावी कर दिया था और अब वह घर में बने विस्फोटकों व पारंपरिक विस्फोटकों के फटने की आवाज के बीच अंतर बता सकता था. लेकिन इतना करने के बावजूद आज के इस धमाके से उस की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई.

हवलदार प्रसाद औपरेशन के दौरान विस्फोटक की खोज के मामले में सहायता प्रदान करने के लिए कंपनी से जुड़ा हुआ था. उस की टीम के 2 हिस्से थे– एक विस्फोटक निबटान टीम और एक खोजकर्ता टीम. धमाके से खोजकर्ता तुरंत कार्रवाई की तैयारी करने लगे. दो मिनट बाद ही कंपनी के सामने से किसी ने उन्हें आपातकालीन हैलिकौप्टर को भूमि पर उतारने के लिए मैदान साफ़ करने हेतु आगे बुलाया. और तब ही उन्हें पता चला कि एक व्यक्ति हताहत हुआ है.

कंपनी के आगे के भाग में विस्फोट का दृश्य बन गया था. महेश निश्चल पड़ा था, खून से लथपथ आंखें आसमान की ओर ताक रही थीं. हितेश और शंकर महेश के 2 सब से अच्छे साथी, 2 युवा सैनिक जो महेश के भाई जैसे बन गए थे. दोनों अपने घायल कमांडर की ओर धीरेधीरे सावधानी से बढ़े. उस की चोटों को देख कर उन के चेहरे दहशत से भर गए.

भारतीय बेस को एक जरूरी संदेश भेजा गया. ‘विस्फोटक हमला.घायल.’

‘चिंता मत करो, महेश, हम तुम्हें बाहर निकालने वाले हैं, दोस्त. सबकुछ ठीक हो जाएगा,’ हितेश ने कहा. सैनिकों ने महेश के जर्जर हुए शरीर को एक स्ट्रेचर पर उठा लिया. उस के पैरों के स्थान पर रक्तरोधक लगाया. उस के तीव्र दर्द के निदान के लिए मार्फिन दी. हितेश और शंकर ने स्ट्रेचर उठा लिया और तेजी से उस मैदान की तरफ बढ़ने लगे जहां आपातकालीन हैलिकौप्टर ज़मीन पर उतरने वाला था. जब अचानक हितेश की नज़र महेश पर पड़ी तो उस ने देखा कि महेश ने सांस लेना बंद कर दिया था. ‘महेश, दोस्त, सांस लो,’ हितेश रोया.

हितेश द्वारा बोले गए ये उस के अंतिम शब्द थे.

महेश के शरीर से थोड़ी हरकत देख कर हितेश और शंकर ने जैसे ही स्ट्रेचर पर लेटे महेश को आगे ले जाना चाहा, वैसे ही एक और बड़े पैमाने पर विस्फोट हुआ. हितेश और शंकर मारे गए. फिर चीखपुकार शुरू हो गई.

‘क्या हो रहा है?’ कंपनी के एकदम पीछे खड़े हवलदार टिल्लू सारथी ने कहा. दूर कंपनी के सामने से घबराहट की आवाजें तेज होती गईं.

‘प्रकृति ही जाने,’ हवलदार प्रसाद ने उत्तर दिया, ‘लेकिन जरूर कुछ बुरा है.’

हवलदार टिल्लू खोजकर्ता टीम का प्रमुख सदस्य था. दोनों ने एकदूसरे को देखा लेकिन कोई नहीं बोला. यह एक मूक पुष्टि थी कि कुछ बहुत बुरा घटा है.

कंपनी के पीछे मौजूद खोजकर्ता टीम ने कार्रवाई के लिए खुद को तैयार किया. हवलदार प्रसाद ने अपने उपकरणों की जांच की. उस ने यह सुनिश्चित किया कि उन के वायरकटर उस के शरीर के सुरक्षा कवच के सामने और विस्फोटक सूचक यंत्र बगल में सुरक्षित हैं. उस के बाकी के आवश्यक उपकरण उस के बैग में समाहित थे. अभी उस की तैयारियां पूरी ही हो रही थीं कि काले-लाल चेहरे वाला एक युवा सिपाही सामने की ओर से आया. ‘हमें आगे खोज दल की जरूरत है,’ वह हकलाया, ‘आगे कई लोग हताहत हुए हैं.’

हवलदार प्रसाद ने उसे ढांढ़स बंधाते हुए कहा, ‘हिम्मत रखो.’ फिर अपने सहयोगी हवलदार टिल्लू की ओर मुड़ कर कहा, ‘टिल्लू, सावधान रहना. कुछ पता नहीं कि आगे क्याक्या, कहांकहां रखा हुआ हो सकता है.’

हवलदार प्रसाद ने अंतिम ब्रीफिंग के लिए अपनी टीम को इकट्ठा किया. ‘पता नहीं आगे क्या चल रहा है, लेकिन कुछ अच्छा प्रतीत नहीं हो रहा. सब लोग होशियार रहना,’ अपनी टीम के साथ खोजकर्ताओं में से एक की ओर मुड़ते हुए उस ने कहा, ‘हमें नहीं पता कि कंपनी के सामने चल रहे साथियों से कुछ छूट गया है या नहीं, इसलिए मैं चाहता हूं कि आप घटनास्थल तक का रास्ता साफ कर दें. जहां पर घायल हैं वहां से करीब 30 मीटर की दूरी पर हम रुकेंगे और आकलन करेंगे. हर कोई एक पंक्ति में एकदूसरे के आगेपीछे चलेगा.’

किनारे के दोनों ओर के नरकट नदी के तल के साथसाथ लंबे और मोटे होते जा रहे थे और घायलों की चीखों को वापस विस्फोट के इन शिकारियों की ओर ले आ रहे थे. जैसेजैसे यह दस्ता सामने नरसंहार के दृश्य के करीब आता गया, उन्होंने सैनिकों को उन के पेट के बल लेटे, सिर पर दोनों हाथ रखे सिर को बचाते होने की अवस्था में पाया. कुछ सिपाही शून्य में ताक रहे थे. उन के चेहरों पर दहशत के भाव अपनी कहानी खुद बयां कर रहे थे.

प्रमुख खोजकर्ता रुक गया और हवलदार प्रसाद उस की तरफ बढ़ गया. दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला. खोजकर्ता धीरेधीरे मृतकों और घायलों तक पहुंचने के लिए रास्ता सुरक्षित कर रहे थे. सामने पहुंच कर हवलदार प्रसाद के चेहरे से पसीने की बूंदें बहने लगीं और तबाही की भयावहता को देखते हुए उस ने ज़ोर से सांस ली. मृत और घायल – कुल छह सैनिक – 200 वर्ग मीटर के क्षेत्र में फैले हुए थे. अघायल सैनिक भी इस विस्फोटक खदान के अंदर फंसे हुए थे. उन्हें भी मुक्त करना होगा. दूर कुछ सिपाहियों की अनियंत्रित आवाजें सुनाई दे रही थीं. अब केवल खोजकर्ता ही चल रहे थे, घायलों को प्रोत्साहन के दो शब्द के अलावा उन का मौन उन की एकाग्रता को दर्शा रहा था.

जहां हवलदार प्रसाद खड़ा था, उस के सब से नजदीक के शरीर के पैर नहीं थे और केवल एक हाथ था, खून से लथपथ सैनिक विस्फोट की चपेट में आ गया था. बम के चलते बने गड्ढे के दूसरी तरफ एक और सैनिक पड़ा हुआ था. यह उस सैनिक का मृत शरीर था जो अजीब तरह से मुड़ा हुआ था और उस के पैर नहीं थे. विस्फोट ने दोनों सैनिकों को विपरीत दिशाओं में लगभग 20 मीटर की दूरी तक उछाला था. अपने अनुभव से हवलदार प्रसाद ने ज्ञात किया कि यह 20-30 किलोग्राम भारी उपकरण था, जो घर में ही बना हुआ विस्फोटक था. एक बम दस्ते के रूप में अपनी जिंदगी में पहली बार हवलदार प्रसाद का सामना एक बड़े पैमाने पर हुई विस्फोटक घटना से हुआ था.

अपने आसपास की बरबादी को देख कर हवलदार प्रसाद को 3 हफ्ते पहले सेना के औपरेशन के दौरान मारे गए बमनिरोधक विशेषज्ञ हवलदार मनोज शर्मा की मौत दिमाग में घूमने लगी.

लेकिन इस वक़्त समय था ध्यान केंद्रित करने का, एक योजना तैयार करने का, यह पता लगाने की कोशिश करने का कि क्या चल रहा था. दो विस्फोटों के आकार और स्थिति ने उसे बताया कि बमों को एक केंद्रीय बैटरी स्रोत से जोड़ा गया होगा. लेकिन वह स्रोत कहां था? घायलों की प्राथमिकता थी, मृतकों को बाद में एकत्रित किया जाएगा, यह हमेशा का नियम था. लेकिन अब महत्त्वपूर्ण यह सुनिश्चित करना था कि कोई और हताहत न हो. खोजकर्ताओं में से एक ने जमीन का हर टुकड़ा अच्छे से छान मार लिया और अपने खोजी उपकरण से मार्ग को साफ़ और सुरक्षित करते हुए दर्दनाक व घायल अवस्था में पड़े हुए एक सैनिक तक पहुंचने में कामयाब हो गया. वहीं उस घायल सैनिक के पास उस का उपकरण बजा जिस से विस्फोटक वहां मौजूद होने का अंदेशा हुआ. उस ने तुरंत सभी से कहा, ‘एक यहां है.’ विस्फोटक उस जगह से एक हाथ की दूरी पर था जहां घायल लेटा हुआ था.

अब निर्णायक समय आ गया था. हर कोई जानता था कि आतंकवादी विस्फोट की आवाज की ओर बढ़ रहे होंगे और हताहतों को निकालने के लिए आए सैनिकों पर घात लगा कर हमला करने की उम्मीद कर रहे होंगे. एक सुरक्षात्मक घेरा डालने, दूरस्थ वाहनों का उपयोग करने, या प्रसाद के लिए अपना सुरक्षात्मक बम सूट पहनने का समय नहीं था. यह आपातकालीन श्रेणी की कार्रवाई थी, जिस का अभ्यास केवल 2 ही परिस्थितियों में कराया जाता था- या तो एक बंधक परिदृश्य जहां एक निर्दोष व्यक्ति को विस्फोटकों से बांध दिया गया हो, या फिर ऐसा कुछ जहां कार्रवाई न करने का अर्थ एक बड़े पैमाने पर दुर्घटना की आशंका और ज्यादा से ज्यादा हताहतों की संख्या निश्चित हो.

दोनों ही स्थितियों में खुद की जान की कीमत पर भी दूसरे लोगों की जान बचाने पर जोर दिया जाता था. हवलदार प्रसाद जानता था कि क्या करना है. बैटरी के स्रोत को ढूंढना होगा, उस ने मन ही मन सोचा. वह रेंगते हुए उस ओर पहुंचा जहां उसे लगा कि सब से पहले वाले बम को दफनाया गया था. उस ने पहले विस्फोटक की प्रैशर प्लेट और फिर 20 किलो के बम का पता लगाया. बम को खोज कर उस ने घायल को सांत्वना दी कि वह ठीक हो जाएगा और उस से शांत रहने का आग्रह किया. उस ने बम से जुड़ा हुआ एक तार ढूंढ़ निकाला और उसे काट दिया. तार काटते वक़्त वह सोच रहा था कि कहीं आतंकवादियों ने ऐसा सर्किट न बनाया हो कि तार के काटने मात्र से ही एक और विस्फोट हो जाए. अगर आतंकवादियों ने ऐसा किया है तो चंद सैकंडों में उसके भी परखच्चे उड़ जायेंगे. लेकिन तार काटने से कोई धमाका नहीं हुआ.

निष्प्रभावीकरण को पूरा करने से पहले ही एक खोजकर्ता ने महेश, जो अभी भी जीवित था और जमीन पर तड़प रहा था, के पास एक और विस्फोटक पाया. जैसे ही प्रसाद ने इस विस्फोटक तक पहुंचने का अपना मार्ग साफ किया, एक तार उन क्षेत्रों में जाता दिखाई दिया जहां बम रखे गए थे. इस बात की पूरी संभावना थी कि प्रसाद द्वारा किया जा रहा यह अभियान अब किसी छिपे हुए आतंकवादी द्वारा लक्षित किया जा रहा हो.

खोजकर्ताओं को यह भी स्वीकार करना पड़ा कि किसी भी अन्य विस्फोटक में अब बहुत कम धातु प्राप्त होने के आसार हो सकते हैं और इस तरह वे अब अपने विस्फोटक सूचक यंत्रों पर भरोसा नहीं कर सकते. अब तक आसमान में सूरज उगना शुरू हो गया था और भारतीय बेस के खुफिया अधिकारियों द्वारा बम खोजने वालों को चेतावनी दी जा रही थी कि आतंकवादी दामया क्षेत्र में बढ़ रहे हैं. हवलदार प्रसाद इस संदेश को सुन कर हरकत में आ गया. एक और विस्फोटक मिला. एक बार फिर यह एक प्रैशरप्लेट वाला विस्फोटक था जो एक केंद्रीय बैटरी स्रोत से जुड़ा था. इस से तुरंत प्रसाद को समझ आ गया कि वह एक जटिल उपकरण प्रणाली वाले विस्फोटक के साथ जूझ रहा था. ऐसा विस्फोटक जो दामया में नहीं देखा गया था. वह अब पूरी तरह से एक नई खतरनाक दुनिया में प्रवेश कर चुका था जहां उसे केवल अपनी बुद्धि और कौशल पर भरोसा करना था. बेहद तनावपूर्ण स्थिति में भी उसे तुरंत यह जानकारी हो गई कि सभी बमों को ठीक उसी तरह से बिछाया गया है जैसे कि विस्फोटक क्रमांक एक और दो थे- एक प्रैशरप्लेट उपकरण जो 20 किलो की विस्फोटक सामग्री के ऊपर रखा गया था. इस बात की भी पूरी संभावना थी कि यदि एक बम फटा तो वे सभी एक ही समय में फटेंगे.

फिर से प्रसाद ने इसे भी निष्प्रभावी किया और सावधानी बरती, कोई भी त्रुटि घातक साबित हो सकती थी. इस उपकरण के निष्प्रभावी होने के दो मिनट से भी कम समय के बाद मृत सैनिकों में से एक के पास एक और विस्फोटक खोजा गया. यह विस्फोट उपकरण वहां रखा गया था जहां से सैनिकों को हताहतों को ले जाने के लिए गुजरना होता. इसे भी प्रसाद ने पूरी तन्मयता के साथ निष्क्रिय किया.

जैसे ही सूरज ने वादी को रोशन करना शुरू किया, चारों ओर अशांत मिट्टी के काले धब्बे दिखने लगे. प्रत्येक स्थल के नीचे एक बम छिपा हुआ था. दो हज़ार स्क्वायर मीटर के क्षेत्र में बम खोजने वालों को 7 बम मिले. इस के अलावा उन्होंने जमीनी निशानों से अन्य 6 उपकरणों के स्थानों की पहचान की. आतंकवादियों द्वारा एक विस्फोटक उपकरण लगाए जाने के बाद वहां के आसपास की धरती पर ये निशान अब सूरज की रोशनी में साफ़ नज़र आ रहे थे.

इस से पहले कि घायलों को निकाला जा सके, निष्कर्षण मार्ग पर खोजे गए 2 और उपकरणों को प्रसाद ने निष्प्रभावी किया.

नरसंहार के बावजूद हवलदार प्रसाद तब तक अपना संयम बनाए रखने में कामयाब रहा जब तक कि स्ट्रेचर ले कर चिकित्सा दल नहीं पहुंचा. कंपनी में पीछे मौजूद सैनिक जब आगे पहुंचे और उन्हें पता चला कि कौन मृत है या गंभीर रूप से जख्मी हो गया है, तो बरबस उन की आंखों से आसूं निकल आए. यह स्पष्ट था कि टीम के युवा सैनिकों का आपस में भाईचारा था. उन में से एक ने जब अपने दोस्त को दामया नदी की धूल में मृत पड़ा देखा तो बेकाबू हो कर रोने लगा. औपरेशन में शामिल सभी लोगों को अचानक जो कुछ हुआ था उस की पूरी भयावहता महसूस होने लगी. उस समय तक हवलदार प्रसाद और उन की टीम पूरी तरह से आतंकवादी बमों का पता लगाने व उन्हें बेअसर करने पर ध्यान केंद्रित कर रही थी.

हवलदार प्रसाद के घटनास्थल पर पहुंचने के ठीक 45 मिनट बाद 13 विस्फोटक उपकरणों का पता लगा लिया गया था और उन्हें निष्क्रिय कर दिया गया था. बमों के बेअसर होने के बाद घायलों और मृतकों को वहां से निकाला गया. लांस नायक महेश सार्थक को भारतीय बेस से मिलिट्री अस्पताल तक पहुंचाया गया. युद्ध के मैदान से निकाले जाने के कुछ महीनों बाद उन की स्थिति में सुधार आया. अन्य घायल सैनिकों की भी हालत में सुधार आया.

भारतीय बेस से आधुनिक हथियारों से लैस भारतीय सेना के जवानों की टुकड़ी ने दामया घाटी में अग्रसर होते आतंकवादियों के चारों ओर घेरा डाल दिया और उन्हें मार गिराया.

story : हिल स्टेशन पर तबादला

भगत राम का तबादला एक सुंदर से हिल स्टेशन पर हुआ तो वे खुश हो गए, वे प्रकृति और शांत वातावरण के प्रेमी थे, सो, सोचने लगे, जीवन में कम से कम 4-5 साल तो शहरी भागमभाग, धुएं, घुटन से दूर सुखचैन से बीतेंगे.

पहाड़ों की सुंदरता उन्हें इतनी पसंद थी कि हर साल गरमी में 1-2 हफ्ते की छुट्टी ले कर परिवार सहित घूमने के लिए किसी न किसी हिल स्टेशन पर अवश्य ही जाते थे और फिर वर्षभर उस की ताजगी मन में बसाए रखते थे.

तबादला 4-5 वर्षों के लिए होता था. सो, लौटने के बाद ताजगी की जीवनभर ही मन में बसे रहने की उम्मीद थी. दूसरी खुशी यह थी कि उन्हें पदोन्नति दे कर हिल स्टेशन पर भेजा जा रहा था.

साहब ने तबादले का आदेश देते हुए बधाई दे कर कहा था, ‘‘अब तो 4 वर्षों तक आनंद ही आनंद लूटोगे. हर साल छुट्टियां और रुपए बरबाद करने की जरूरत भी नहीं रह जाएगी. कभी हमारी भी घूमनेफिरने की इच्छा हुई तो कम से कम एक ठिकाना तो वहां पर रहेगा.’’

‘‘जी हां, आप की जब इच्छा हो, तब चले आइएगा,’’ भगत राम ने आदर के साथ कहा और बाहर आ गए.

बाहर साथी भी उन्हें बधाई देने लगे. एक सहकर्मी ने कहा, ‘‘ऐसा सुअवसर तो विरलों को ही मिलता है. लोग तो ऐसी जगह पर एक घंटा बिताने के लिए तरसते हैं, हजारों रुपए खर्च कर डालते हैं. तुम्हें तो यह सुअवसर एक तरह से सरकारी खर्चे पर मिल रहा है, वह भी पूरे 4 वर्षों के लिए.’’

‘‘वहां जा कर हम लोगों को भूल मत जाना. जब सीजन अच्छा हो तो पत्र लिख देना. तुम्हारी कृपा से 1-2 दिनों के लिए हिल स्टेशन का आनंद हम भी लूट लेंगे,’’ दूसरे मित्र ने कहा.

‘‘जरूरजरूर, भला यह भी कोई कहने की बात है,’’ वे सब से यही कहते रहे.

घर लौट कर तबादले की खबर सुनाई तो दोनों बच्चे खुश हो गए.

‘‘बड़ा मजा आएगा. हम ने बर्फ गिरते हुए कभी भी नहीं देखी. आप तो घुमाने केवल गरमी में ले जाते थे. जाड़ों में तो हम कभी गए ही नहीं,’’ बड़ा बेटा खुश होता हुआ बोला.

‘‘जब फिल्मों में बर्फीले पहाड़ दिखाते हैं तो कितना मजा आता है. अब हम वह सब सचमुच में देख सकेंगे,’’ छोटे ने भी ताली बजाई.

मगर पत्नी सुजाता कुछ गंभीर सी हो गई. भगत राम को लगा कि उसे शायद तबादले वाली बात रास नहीं आई है. उन्होंने पूछा, ‘‘क्या बात है, गुमसुम क्यों हो गई हो?’’

‘‘तबादला ही कराना था तो आसपास के किसी शहर में करा लेते. सुबह जा कर शाम को आराम से घर लौट आते, जैसे दूसरे कई लोग करते हैं. अब पूरा सामान समेट कर दोबारा से वहां गृहस्थी जमानी पड़ेगी. पता नहीं, वहां का वातावरण हमें रास आएगा भी या नहीं,’’ सुजाता ने अपनी शंका जताई.

‘‘सब ठीक  हो जाएगा. मकान तो सरकारी मिलेगा, इसलिए कोई दिक्कत नहीं होगी. और फिर, पहाड़ों में भी लोग रहते हैं. जैसे वे सब रहते हैं वैसे ही हम भी रह लेंगे.’’

‘‘लेकिन सुना है, पहाड़ी शहरों में बहुत सारी परेशानियां होती हैं-स्कूल की, अस्पताल की, यातायात की और बाजारों में शहरों की तरह हर चीज नहीं मिल पाती,’’ सुजाता बोली.

भगत राम हंस पड़े, ‘‘किस युग की बातें कर रही हो. आज के पहाड़ी शहर मैदानी शहरों से किसी भी तरह से कम नहीं हैं. दूरदराज के इलाकों में वह बात हो सकती है, लेकिन मेरा तबादला एक अच्छे शहर में हुआ है. वहां स्कूल, अस्पताल जैसी सारी सुविधाएं हैं. आजकल तो बड़ेबड़े करोड़पति लाखों रुपए खर्च कर के अपनी संतानों को मसूरी और शिमला के स्कूलों में पढ़ाते हैं. कारण, वहां का वातावरण बड़ा ही शांत है. हमें तो यह मौका एक तरह से मुफ्त ही मिल रहा है.’’

‘‘उन्नति होने पर तबादला तो होता ही है. अगर तबादला रुकवाने की कोशिश करूंगा तो कई पापड़ बेलने पड़ेंगे. हो सकता है 10-20 हजार रुपए की भेंटपूजा भी करनी पड़ जाए और उस पर भी आसपास की कोई सड़ीगली जगह ही मिल पाए. इस से तो अच्छा है, हिल स्टेशन का ही आनंद उठाया जाए.’’

यह सुन कर सुजाता ने फिर कुछ न कहा. दफ्तर से विदाई ले कर भगत राम पहले एक चक्कर अकेले ही अपने नियुक्तिस्थल का लगा आए और 15 दिनों बाद उन का पूरा परिवार वहां पहुंच गया. बच्चे काफी खुश थे.

शुरूशुरू की छोटीमोटी परेशानी के बाद जीवन पटरी पर आ ही गया. अगस्त के महीने में ही वहां पर अच्छीखासी ठंड हो गई थी. अभी से धूप में गरमी न रही थी. जाड़ों की ठंड कैसी होगी, इसी प्रतीक्षा में दिन बीतने लगे थे.

फरवरी तक के दिन रजाई और अंगीठी के सहारे ही बीते, फिर भी सबकुछ अच्छा था. सब के गालों पर लाली आ गई थी. बच्चों का स्नोफौल देखने का सपना भी पूरा हो गया.

मार्च में मौसम सुहावना हो गया था. अगले 4 महीने के मनभावन मौसम की कल्पना से भगत राम का मन असीम उत्साह से भर गया था. उसी उत्साह में वे एक सुबह दफ्तर पहुंचे तो प्रधान कार्यालय का ‘अत्यंत आवश्यक’ मुहर वाला पत्र मेज पर पड़ा था.

उन्होंने पत्र पढ़ा, जिस में पूछा गया था कि ‘सीजन कब आरंभ हो रहा है, लौटती डाक से सूचित करें. विभाग के निदेशक महोदय सपरिवार आप के पास घूमने आना चाहते हैं.’

सीजन की घोषणा प्रशासन द्वारा अप्रैल मध्य में की जाती थी, सो, भगत राम ने वही सूचना भिजवा दी, जिस के उत्तर में एक सप्ताह में ही तार आ गया कि निदेशक महोदय 15 तारीख को पहुंच रहे हैं. उन के रहने आदि की व्यवस्था हो जानी चाहिए. निदेशक के आने की बात सुन कर सारे दफ्तर में हड़कंप सा मच गया.

‘‘यही तो मुसीबत है इस हिल स्टेशन की, सीजन शुरू हुआ नहीं, कि अधिकारियों का तांता लग जाता है. अब पूरे 4 महीने इसी तरह से नाक में दम बना रहेगा,’’ एक पुराना चपरासी बोल पड़ा.

भगत राम वहां के प्रभारी थे. सारा प्रबंध करने का उत्तरदायित्व एक प्रकार से उन्हीं का था. उन का पहला अनुभव था, इसलिए समझ नहीं पा रहे थे कि कैसे और क्या किया जाए.

सारे स्टाफ  की एक बैठक बुला कर उन्होंने विचारविमर्श किया. जो पुराने थे, उन्होंने अपने अनुभवों के आधार पर राय भी दे डालीं.

‘‘सब से पहले तो गैस्टहाउस बुक करा लीजिए. यहां केवल 2 गैस्टहाउस हैं. अगर किसी और ने बुक करवा लिए तो होटल की शरण लेनी पड़ेगी. बाद में निदेशक साहब जहांजहां भी घूमना चाहेंगे, आप बारीबारी से हमारी ड्यूटी लगा दीजिएगा. आप को तो सुबह 7 बजे से रात 10 बजे तक उन के साथ ही रहना पड़ेगा,’’ एक कर्मचारी ने कहा तो भगत राम ने तुरंत गैस्टहाउस की ओर दौड़ लगा दी.

जो गैस्टहाउस नगर के बीचोंबीच था, वहां काम बन नहीं पाया. दूसरा गैस्टहाउस नगर से बाहर 2 किलोमीटर की दूरी पर जंगल में बना हुआ था. वहां के प्रबंधक ने कहा, ‘‘बुक तो हो जाएगा साहब, लेकिन अगर इस बीच कोई मंत्रीवंत्री आ गया तो खाली करना पड़ सकता है. वैसे तो मंत्री लोग यहां जंगल में आ कर रहना पसंद नहीं करते, लेकिन किसी के मूड का क्या भरोसा. यहां अभी सिर्फ 4 कमरे हैं, आप को कितने चाहिए?’’

भगत राम समझ नहीं पाए कि कितने कमरे लेने चाहिए. साथ गए चपरासी ने उन्हें चुप देख कर तुरंत राय दी, ‘‘कमरे तो चारों लेने पड़ेंगे, क्या पता साहब के साथ कितने लोग आ जाएं, सपरिवार आने के लिए लिखा है न?’’

भगत राम को भी यही ठीक लगा. सो, उन्होंने पूरा गैस्टहाउस बुक कर दिया. ठीक 15 अप्रैल को निदेशक महोदय का काफिला वहां पहुंच गया. परिवार के नाम पर अच्छीखासी फौज उन के साथ थी. बेटा, बेटी, दामाद और साले साहब भी अपने बच्चों सहित पधारे थे. साथ में 2 छोटे अधिकारी और एक अरदली भी था.

सुबह 11 बजे उन की रेल 60 किलोमीटर की दूरी वाले शहर में पहुंची थी. भगत राम उन का स्वागत करने टैक्सी ले कर वहीं पहुंच गए थे. मेहमानों की संख्या ज्यादा देखी तो वहीं खड़ेखड़े एक मैटाडोर और बुक करवा ली.

शाम 4 बजे वे सब गैस्टहाउस पहुंचे. निदेशक साहब की इच्छा आराम करने की थी, लेकिन भगत राम का आराम उसी क्षण से हराम हो गया था.

‘‘रहने के लिए बाजार में कोई ढंग की जगह नहीं थी क्या? लेकिन चलो, हमें कौन सा यहां स्थायी रूप से रहना है. खाने का प्रबंध ठीक हो जाना चाहिए,’’ निदेशक महोदय की पत्नी ने गैस्टहाउस पहुंचते ही मुंह बना कर कहा. उन की यह बात कुछ ही क्षणों में आदेश बन कर भगत राम के कानों में पहुंच गई थी.

खाने की सूची में सभी की पसंद और नापंसद का ध्यान रखा गया था. भगत राम अपनी देखरेख में सारा प्रबंध करवाने में जुट गए थे. रहीसही कसर अरदली ने पूरी कर दी थी. वह बिना किसी संकोच के भगत राम के पास आ कर बोला, ‘‘व्हिस्की अगर अच्छी हो तो खाना कैसा भी हो, चल जाता है. साहब अपने साले के साथ और उन का बेटा अपने बहनोई के साथ 2-2 पेग तो लेंगे ही. बहती गंगा में साथ आए साहब लोग भी हाथ धो लेंगे. रही बात मेरी, तो मैं तो देसी से भी काम चला लूंगा.’’

भगत राम कभी शराब के आसपास भी नहीं फटके थे, लेकिन उस दिन उन्हें अच्छी और खराब व्हिस्कियों के नाम व भाव, दोनों पता चल गए थे.

गैस्टहाउस से घर जाने की फुरसत भगत राम को रात 10 बजे ही मिल पाई, वह भी सुबह 7 बजे फिर से हाजिर हो जाने की शर्त पर.

निदेशक साहब ने 10 दिनों तक सैरसपाटा किया और हर दिन यही सिलसिला चलता रहा. भगत राम की हैसियत निदेशक साहब के अरदली के अरदली जैसी हो कर रह गई.

निदेशक साहब गए तो उन्होंने राहत की सांस ली. मगर जो खर्च हुआ था, उस की भरपाई कहां से होगी, यह समझ नहीं पा रहे थे.

दफ्तर में दूसरे कर्मचारियों से बात की तो तुरंत ही परंपरा का पता चल गया. ‘‘खर्च तो दफ्तर ही देगा, साहब, मरम्मत और पुताईरंगाई जैसे खर्चों के बिल बनाने पड़ेंगे. हर साल यही होता है,’’ एक कर्मचारी ने बताया.

दफ्तर की हालत तो ऐसी थी जैसी किसी कबाड़ी की दुकान की होती है, लेकिन साफसफाई के बिलों का भुगतान वास्तव में ही नियमितरूप से हो रहा था. भगत राम ने भी वही किया, फिर भी अनुभव की कमी के कारण 2 हजार रुपए का गच्चा खा ही गए.

निदेशक का दौरा सकुशल निबट जाने का संतोष लिए वे घर लौटे तो पाया कि साले साहब सपरिवार पधारे हुए हैं.

‘‘जिस दिन आप के ट्रांसफर की बात सुनी, उसी दिन सोच लिया था कि इस बार गरमी में इधर ही आएंगे. एक हफ्ते की छुट्टी मिल ही गई है,’’ साले साहब खुशी के साथ बोले.

भगत राम की इच्छा आराम करने की थी, मगर कह नहीं सके. जीजा, साले का रिश्ता वैसे भी बड़ा नाजुक होता है.

‘‘अच्छा किया, साले साहब आप ने. मिलनेजुलने तो वैसे भी कभीकभी आते रहना चाहिए,’’ भगत राम ने केवल इतना ही कहा.

साले साहब के अनुरोध पर उन्हें दफ्तर से 3 दिनों की छुट्टी लेनी पड़ी और गाइड बन कर उन्हें घुमाना भी पड़ा.

छुट्टियां तो शायद और भी लेनी पड़ जातीं, मगर बीच में ही बदहवासी की हालत में दौड़ता हुआ दफ्तर का चपरासी आ गया. उस ने बताया कि दफ्तर में औडिट पार्टी आ गई है, अब उन के लिए सारा प्रबंध करना है.

सुनते ही भगत राम तुरंत दफ्तर पहुंच गए और औडिट पार्टी की सेवाटहल में जुट गए. साले साहब 3 दिनों बाद ‘सारी खुदाई एक तरफ…’ वाली कहावत को चरितार्थ कर के चले गए, मगर औडिट पार्टी के सदस्यों का व्यवहार भी सगे सालों से कुछ कम न था. दफ्तर का औडिट तो एक दिनों में ही खत्म हो गया था लेकिन पूरे हिल स्टेशन का औडिट करने में एक सप्ताह से भी अधिक का समय लग गया.

औडिट चल ही रहा था कि दूर की मौसी का लड़का अपनी गर्लफ्रैंड सहित घर पर आ धमका. जब तक भगत राम मैदानी क्षेत्र के दफ्तर में नियुक्त थे, उस के दर्शन नहीं होते थे, लेकिन अचानक ही वह सब से सगा लगने लगा था. एक हफ्ते तक वह भी बड़े अधिकारपूर्वक घर में डेरा जमाए रहा.

औडिट पार्टी भगत राम को निचोड़ कर गई तो किसी दूसरे वरिष्ठ अधिकारी के पधारने की सूचना आ गई.

‘‘समझ में नहीं आता कि यह सिलसिला कब तक चलेगा?’’ भगत राम बड़बड़ाए.

‘‘जब तक सीजन चलेगा,’’ एक कर्मचारी ने बता दिया.

भगत राम ने अपना सिर दोनों हाथों से थाम लिया. घर पर जा कर भी सिर हाथों से हट न पाया क्योंकि वहां फूफाजी आए हुए थे.

बाद में दूसरे अवसर पर तो बेचारे चाह कर भी ठीक से मुसकरा तक नहीं पाए थे, जब घर में दूर के एक रिश्तेदार का बेटा हनीमून मनाने चला आया था.

उसी समय सुजाता की एक रिश्तेदार महिला भी पति व बच्चों सहित आ गई थी. और अचानक उन के दफ्तर के एक पुराने साथी को भी प्रकृतिप्रेम उमड़ आया था. भगत राम को रजाईगद्दे किराए पर मंगाने पड़ गए थे.

वे खुद तो गाइड की नौकरी कर ही रहे थे, पत्नी को भी आया की नौकरी करनी पड़ गई थी. सुजाता की रिश्तेदार अपने पति के साथ प्रकृति का नजारा लेने के लिए अपने छोटेछोटे बच्चों को घर पर ही छोड़ जाया करती थी.

उधर, दफ्तर में भी यही हाल था. एक अधिकारी से निबटते ही दूसरे अधिकारी के दौरे की सूचना आ जाती थी. शांति की तलाश में भगत राम दफ्तर में आ जाते थे और फिर दफ्तर से घर में. लेकिन मानसिक शांति के साथसाथ आर्थिक शांति भी छिन्नभिन्न हो गई थी. 4 महीने कब गुजर गए, कुछ पता ही न चला. हां, 2 बातों का ज्ञान भगत राम को अवश्य हो गया था. एक तो यह कि दफ्तर के कुल कितने बड़ेबड़े अधिकारी हैं और दूसरी यह कि दुनिया में उन के रिश्तेदार और अभिन्न मित्रों की कोई कमी नहीं है.

‘‘सच पूछिए तो यहां रहने का मजा ही आ गया…जाने की इच्छा ही नहीं हो रही है, लेकिन छुट्टियां इतनी ही थीं, इसलिए जाना ही पड़ेगा. अगले साल जरूर फुरसत से आएंगे.’’ रिश्तेदार और मित्र यही कह कर विदा ले रहे थे. उन की फिर आने की धमकी से भगत राम बुरी तरह से विचलित होते जा रहे थे.

‘‘क्योंजी, अगले साल भी यही सब होगा क्या?’’ सुजाता ने पूछा. शायद वह भी विचलित थी.

‘‘बिलकुल नहीं,’’ भगत राम निर्णायक स्वर में चीख से पड़े, ‘‘मैं आज ही तबादले का आवदेन भिजवाए देता हूं. यहां से तबादला करवा कर ही रहूंगा, चाहे 10-20 हजार रुपए खर्च ही क्यों न करने पड़ें.’’

सुजाता ने कुछ न कहा. भगत राम तबादले का आवेदनपत्र भेजने के लिए दफ्तर की ओर चल पड़े.

VIDEO : रेड वेलवेट नेल आर्ट

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Smart Parenting : नए मेहमान की जिम्‍मेदारियों से डरें नहीं

जहां नन्हे मेहमान के आने से घर में रौनक आ जाती है, घर में चारों तरफ बच्चे की किलकारियां गूंजती हैं, वहीं घर का हर सदस्य उत्सुकता से भर जाता है. पेरैंट्स को तो ऐसा लगता है जैसे उन की जिंदगी में नई ऊर्जा का संचार हुआ हो. लेकिन नन्हे के आने से पेरैंट्स का लाइफस्टाइल भी पूरी तरह से प्रभावित होता है, जिसे शुरुआत में तो वे हंसीखुशी स्वीकार लेते हैं, लेकिन बाद में रूटीन में भी बदलाव उन की जिंदगी पर असर डालने लगता है. ऐसे में जरूरी है कि रूटीन में बदलाव से निबटने के लिए योजना बना कर चलें.

खानपान में लापरवाही: पूरा दिन बच्चे की केयर में मातापिता अपने खानपान पर बिलकुल ध्यान नहीं देते हैं. समय नहीं मिलने के कारण वे जो मिल गया वही खा लेते हैं. भले ही फास्टफूड खा कर ही पूरा दिन क्यों न बिताना पड़े और फिर यही अनहैल्दी ईटिंग हैबिट्स उन्हें बीमार कर देती हैं.

कैसे निबटें: जब भी कुछ नया होता है तो बदलाव आना स्वाभाविक है. लेकिन उस बदलाव के अनुसार खुद को ऐडजस्ट करना बड़ी चुनौती होती है. अगर आप अकेले रहते हैं तो आप अपना खानपान संबंधी टाइमटेबल बना कर चलें, जिस से अनहैल्दी खाने का सवाल ही न उठे. जैसे आप ब्रेकफास्ट में स्प्राउट्स, अंडा, चीला बगैरा ले सकते हैं. इसी तरह लंच में दाल, रोटी, दही, छाछ या फिर उबले चने और रात के डिनर में ओट्स बगैरा ले सकते हैं, जो हाई फाइबर रिच डाइट होती है. इस बीच आप को जब भी भूख का एहसास हो तो आप फू्रट्स, चने बगैरा लें, जो आप की भूख को शांत करने के साथसाथ आप को हैल्दी भी रखेंगे.

सोने के समय में कमी: बच्चे के आने से पेरैंट्स की नींद में खलल पड़ता है, क्योंकि अब अपने हिसाब से नहीं बल्कि बच्चे के हिसाब से सोनाउठना पड़ता है, जो थकान के साथसाथ तनाव का भी कारण बनता है और जिस का असर उन की पर्सनल के साथसाथ प्रोफैशनल लाइफ पर भी पड़ता है.

कैसे निबटें: ऐसे समय में पेरैंट्स को मिल कर जिम्मेदारी निभानी चाहिए, जैसे आप घर पर हैं तो आप अपने हसबैंड के सामने घर के सभी जरूरी काम निबटा लें ताकि बच्चे के सोने पर आप भी अपनी नींद पूरी कर सकें और फिर जब आप का पार्टनर काम से घर लौटे तो आप के फ्रैश होने के कारण उन्हें भी आराम मिल सके. रात को भी इसी तरह मैनेज करने से आप पहले की तरह ही अपना रूटीन बना सकते हैं.

 

इमोशनल बैलेंस: वर्किंग होते हुए भी पहले घंटों एकदूसरे को टाइम देना, एकदूसरे की हर बात सुनना, लेकिन बाद में बच्चे में बिजी रहने के कारण पार्टनर एकदूसरे को वक्त नहीं दे पाते हैं. रोमांस तो उन की लाइफ में रह नहीं जाता, जिस से उन के बीच इमोशनली अटैचमैंट में कमी आती है.

कैसे निबटें: पेरैंट्स बनने का मतलब यह नहीं कि आप एकदूसरे के साथ रोमांस जताना ही छोड़ दें, एकदूसरे को छेड़ना ही छोड़ दें, बल्कि पहले की तरह ही पार्टनर के साथ रोमांटिक रहें. उस की फीलिंग्स को समझें और टाइम दें. हो सके तो डिनर या फिर रोमांटिक डेट्स पर भी जाएं. इस से लाइफ में रोमांस बना रहता है वरना नीरसता आने से लाइफ बोरिंग लगने लगती है.

 

अनुशासन में कमी: अकसर हमें अनुशासन में रहना पसंद होता है जैसे टाइम पर उठना, खाना, कहीं बाहर जाना है तब भी टाइम से निकलना, ऐक्सरसाइज बगैरा. लेकिन पेरैंट्स बनने के बाद हम चाह कर भी खुद को अनुशासन में नहीं रख पाते, जो हमें अंदर ही अंदर परेशान करता है.

कैसे निबटें: भले ही शुरुआत के 1-2 हफ्ते आप के बहुत बिजी निकलें, लेकिन बाद में आप अपना शैड्यूल बना कर चलें, जैसे अगर आप बाहर ऐक्सरसाइज के लिए नहीं जा सकते तो घर में ही करें और अगर डिनर फिक्स टाइम पर नहीं हो पा रहा तो निडर को टाइम पर करने के लिए उस में ओट्स, सूप, सलाद, खिचड़ी शामिल करें, जो कम समय में बनने के साथसाथ ज्यादा हैल्दी भी है. इस से आप बाहर का खाने से भी बच जाएंगे और स्वस्थ भी रहेंगे. इसी तरह आप बाकी चीजों को भी मैनेज कर के नई स्थितियों से आसानी से निबट सकते हैं.

Time Management : घरदफ्तर के कामों को मैनेज नहीं कर पा रही हूं

मेरा सवाल :

Time Management : मैं वर्किंग वुमन हूं. शाम को 7 बजे तक घर वापस आती हूं. रिश्तेदार काफी हैं, इसलिए अकसर शाम के टाइम मेहमान आ जाते हैं सासससुर से मिलने क्योंकि वे दोनों तो घर पर ही रहते हैं. सब से फोन पर बात करते रहते हैं. उन्हें घर बुलाते रहते हैं. मेहमान भी उन की नाराजगी दूर करने के लिए आ जाते हैं. लेकिन उन का चायपानी, नाश्ता तो मुझे ही देखना पड़ता है. अब बच्चे, उन का होमवर्क, घर का काम, मेहमानदारी आदि इतना भार हो जाता है कि कई बार जी करता है सब छोड़ कर कहीं चली जाऊं. आप ही बताएं समय की कमी और जिम्मेदारियों के बीच तालमेल कैसे बिठाऊं?

जवाब

वाकई वर्किंग वुमन के लिए कई जिम्मेदारियां निभाना चुनौतीपूर्ण होता है. हम आप को कुछ सुझाव दे रहे हैं जो आप की दिनचर्या को सरल बनाने में मदद कर सकते हैं.

 

अगर घर में मेहमान आने की संभावना रहती है तो हफ्ते की शुरुआत में ही खानेपीने की तैयारी कर लें. कुछ स्नैक्स और हलके भोजन को तैयार कर फ्रिज में रख सकती हैं जो मेहमानों के आने पर जल्दी से परोसने में मदद करेंगे.

बच्चों को रूटीन में डालें. बच्चों को उन के होमवर्क और पढ़ाईर् के लिए एक नियमित समय दें, जैसे, आप काम पर हों तो वे अपना होमवर्क करें ताकि शाम को आप के पास बस चैक करने का काम हो.

परिवार का सहयोग लें. अपने पति और बच्चों को छोटीछोटी जिम्मेदारियां सौंपें. बच्चे अपनी किताबें या खिलौने समेट सकते हैं और पति मेहमानों का स्वागत कर सकते हैं.

वीकैंड में आने वाले हफ्ते के लिए थोड़ी तैयारी कर लें. अगर संभव हो तो ग्रौसरी, घर के जरूरी सामान और अन्य जरूरतों के लिए औनलाइन शौपिंग करें. इस से बाहर जा कर समय बरबाद नहीं करना पड़ेगा.

हफ्तेभर के खाने का मैन्यू पहले से तय कर लें. इस से रोज सोचने में समय नहीं लगेगा कि क्या बनाना है. मेहमानों के लिए तैयारियां सीमित रखें. खुद पर बहुत ज्यादा दबाव न डालें कि हमेशा कुछ खास ही खाने में पेश करना है.

माइक्रो ब्रेक्स लें. दिनभर की भागदौड़ में थोड़ी देर आराम करना जरूरी है. 10 मिनट का छोटा ब्रेक ले कर चायकौफी का आनंद लें. इस से आप की ऊर्जा वापस आएगी और तनाव कम भी होगा.

अपने पति और परिवार के अन्य सदस्यों को अपनी जिम्मेदारियों के बारे में बताएं ताकि वे आप की स्थिति को समझे  और संभव हो तो मदद करें.

 

 

 

Online Shopping : एमआरपी का भ्रमजाल

लेेखक – विजय कुमार श्रीवास्‍तव

MRP तय करने का कोई कठोर नियम नहीं होता. कंपनियां इसे अपनी मरजी से तय करती हैं और इसे इतना ऊंचा रखती हैं कि खुदरा विक्रेताओं को भी अच्छा मुनाफा मिल सके.

 

समाज में बदलाव होते रहते हैं और बाजार में उपभोक्ताओं की आदतें भी बदलती रहती हैं. अब वस्तुओं, दवाओं आदि के पैकेटों पर छपे अधिकतम खुदरा मूल्य को ही लें.

 

10-15 वर्ष पहले तक हम यह देखा करते थे कि जहां से हम सामान खरीद रहे हैं वहां हम से अधिकतम खुदरा मूल्य से अधिक तो नहीं लिया जा रहा. अब यह देखते हैं कि विक्रेता इस मूल्य के ऊपर कितना डिस्काउंट दे रहा है. डिस्काउंट मिल भी खूब रहा है लेकिन सब को नहीं.

 

डिस्काउंट की संस्कृति सब से अधिक दवाओं के व्यापार पर हावी है. कम से कम महानगरों और शहरों में एलोपैथिक दवाएं बेचने वाले अधिकांश दुकानदार एमआरपी से 10 प्रतिशत कम लिया करते हैं पर यह जरूरी नहीं कि डिस्काउंट बिन मांगे मिल जाए.

 

हाल में मैं डाक्टर को दिखाने के बाद प्रिस्क्रिप्शन ले कर नजदीक की दुकान पर दवा खरीदने गया. डिस्काउंट मिलने की पुष्टि मैं ने दुकानदार से पहले ही कर ली थी. मेरे सामने एक और ग्राहक आया. उस ने मु?ा से भी ज्यादा मूल्य की दवाएं खरीदीं. न उस ने डिस्काउंट के बारे में पूछा, न दुकानदार ने उसे डिस्काउंट दिया. वास्तविकता यह है कि कम आय

 

वाले, अल्पशिक्षित व्यक्ति अज्ञानतावश एमआरपी पर वस्तुएं खरीदा करते हैं. पढ़ेलिखे और अच्छा पैसा कमाने वाले लोग एमआरपी पर मिलने वाली छूट का भरपूर लाभ उठा रहे हैं.

 

एमआरपी की अवधारणा हमारे देश में नागरिक आपूर्ति मंत्रालय द्वारा वर्ष 1990 में लागू की गई थी. इस का उद्देश्य कर चोरी को रोकना तथा खुदरा विक्रेताओं को मुनाफाखोरी करने से रोकना था. एमआरपी सभी करों को मिला कर होता है. बहुत लोग इसे मानक या वाजिब मूल्य के रूप में देखते हैं, जबकि यह मुद्रित किया हुआ वह अधिकतम मूल्य है जिस पर आप को सामान बेचा जाना है. दुकानदार मुद्रित कीमत से अधिक कीमत नहीं ले सकता लेकिन इस से कम कीमत पर बिक्री जरूर कर सकता है.

 

मौल्स में स्थित स्टोरों, रिटेल चेनों और गलीमहल्ले के दुकानदारों के लिए भी एमआरपी से कम कीमत पर सामान बेचना आम बात हो चुकी है. वे जानते हैं कि ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए अब यह जरूरी हो गया है. कई दुकानों पर बोर्ड भी लगे होते हैं जिन में एमआरपी पर न्यूनतम कुछ (7 से 10 ) प्रतिशत छूट देने की बात कही गई होती है.

 

औनलाइन शौपिंग का चलन

 

औनलाइन शौपिंग की लोकप्रियता किस तरह से बढ़ रही है, यह हमारी आंखों के सामने है. लोगों ने करीबकरीब यह मान लिया है कि औनलाइन खरीदारी एमआरपी पर नहीं करनी है. पहले लोग अलगअलग ऐप या वैबसाइट पर जा कर देखते हैं कि जो सामान उन्हें खरीदना है, कहां सब से कम कीमत पर मिल रहा है, इस के बाद ही वे अपना और्डर प्लेस करते हैं. काफी लोगों की दिनचर्या का कुछ समय इसी में जाता है.

 

मेरे एक संबंधी बेंगलुरु में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में ऊंचे पद पर हैं, कुछ समय पहले तक उन का पूरी तरह से वर्क फ्रौम होम चल रहा था जिस में उन्हें हद से हद 4-6 घंटे दैनिक कार्य करना होता था. जब मैं ने उन से पूछा कि खाली समय में वे क्या करते हैं तो उन का जवाब था- ‘मोबाइल पर देखता रहता हूं कि कहां, क्या सस्ता मिल रहा है.’ एमआरपी को धता बता कर खरीदारी करना मध्य तथा उच्च वर्ग का शगल बनता जा रहा है. इस प्रवृत्ति का लाभ उठाने के लिए कंपनियां मार्जिन खूब बढ़ा कर अनापशनाप कीमतें मुद्रित करने लगी हैं. ग्राहक को लगता है कि डिस्काउंट पर सामान खरीद कर वह फायदे में है पर वास्तव में हमेशा ऐसा नहीं होता.

 

मनोविज्ञान का फायदा

 

एमआरपी पर छूट का समीकरण कई बार समझ में नहीं आता. सब से बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों में से एक के कुछ उत्पादों के अलगअलग विक्रेताओं द्वारा वसूले जाने वाले मूल्य की तुलना के समय कुछ चौंकाने वाली बातें सामने आईं. इस कंपनी का एक लोकप्रिय शैंपू ब्रैंड है जिस के 650 मिलीलिटर की बोतल की छपी हुई कीमत 730 रुपए है. एक ऐप पर इसे 578 रुपए और दूसरे पर इसे 530 रुपए में बेचा जा रहा है जबकि एक तीसरे पर एक खरीदो एक मुफ्त पाओ के हिसाब से यानी आधी कीमत पर मिल रहा है.

 

टूथपेस्ट की एक बड़ी कंपनी के एक खास टूथपेस्ट के 2 पैकेट कहीं 10, कहीं 25 तो कहीं 30 प्रतिशत की छूट पर बिक रहे हैं. अब जानकार लोग कीमतों की तुलना कर के न खरीदें तो क्या करें पर एक निश्चित एमआरपी होने के बावजूद किसी वस्तु को बेचने की कीमतों में इतना अधिक अंतर होना गले के नीचे नहीं उतरता.

प्रतिस्पर्धा का बहाना

 

बाजार में प्रतिस्पर्धा अच्छी बात है लेकिन प्रतिस्पर्धा का लाभ जहां तक हो सके सभी को समान रूप से मिलना चाहिए. ग्राहक अपने मनोविज्ञान को भले न समझें पर कंपनियों तथा उन के उत्पादों को बेचने वालों ने इसे खूब समझ रखा है और वे इस का बढ़चढ़ कर लाभ उठा रहे हैं. हमें 499 रुपए छपे मूल्य वाली वस्तु 349 रुपए में मिल जाती है तो इस सौदे से हम खुश हो जाते हैं पर हमें शायद यह नहीं मालूम होता कि वस्तु की अंतर्निहित कीमत 100 रुपए भी नहीं है.

 

जब एयरलाइंस हवाई टिकटों को मनमाने दामों पर बेचने लगी थीं तो सरकार ने हस्तक्षेप कर इन टिकटों हेतु ‘कैप’ यानी उच्चतम सीमा निर्धारित करने का निर्णय लिया पर साबुन, तेल, बिस्कुट आदि जैसी चीजों के लिए न तो यह संभव है और न ही व्यावहारिक. एमआरपी के साथ एक और समस्या है, हवाई अड्डों पर और फैन्सी रैस्तरां में एमआरपी से ज्यादा वसूला जाता है. इन स्थानों पर यदि पानी की 20 रुपए की बोतल के लिए 80 रुपए और चिप्स के 45 रुपए के पैकेट के लिए 110 रुपए चुकाने पड़ें तो यह सामान्य बात मानी जाती है.

 

देश में उपभोक्ता संरक्षण कानून के साथ एकाधिकार और प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार अधिनियम भी काफी समय से लागू है जो उपभोक्ताओं का शोषण रोकने के लिए है. यहां प्रतिवाद तो शायद ही कोई करता है. प्रतिवाद करे भी तो उत्तर अकसर यही मिलता है कि खरीदना, न खरीदना आप की मरजी है, कीमत तो बढ़ी हुई ही लगेगी.

 

निस्संदेह एमआरपी अपने वर्तमान स्वरूप में दिखावा है और आगे भी इस के इसी रूप में बने रहने की उम्मीद है. एक उपभोक्ता के रूप में हमआप यही कर सकते हैं कि बचत तो अधिक से अधिक करें लेकिन सिर्फ इसलिए कि कोई चीज एमआरपी से काफी नीचे कीमत पर मिल रही है, अनावश्यक खरीदारी न करें.

Superstitions : सांप से जुड़े मिथक का सच

ज्ञान की क्रांति के बावजूद समाज में सांपों को ले कर अंधविश्वास फलफूल रहा है. अभी भी लोग दूसरों की कहीसुनी बातों पर यकीन कर झूठ को सच मान लेते हैं. इस से वे अपनी जान को जोखिम में डालते हैं. सांपों से जुड़े तथ्यों को जानें. मध्य प्रदेश के भोपाल के पास गनियारी गांव के 25 साल के नारायण सिंह खेतीबाड़ी के काम से अपने खेत गए हुए थे. 3 मई, 2022 की शाम 5 बजे उसे खेत में सांप ने डस लिया. जैसे ही नारायण के घर वालों को खबर लगी, वे उसे अस्पताल ले जाने के बजाय पास के ही गांव बेनीपुर में रहने वाले नाग बाबा के पास झाड़फूंक कराने ले गए.

गांव के लोगों का नाग बाबा के ऊपर इतना भरोसा था कि सांप का जहर वह झाड़फूंक के जरिए खत्म कर देता है. आसपास के कई गांवों के लोग बाबा के पास रोजाना उपचार के लिए जाते हैं. झाड़फूंक करने वाले नाग बाबा ने सर्प दंश से पीडि़त युवक के गले में एक माला पहनाई और धूप जला कर करीब 2 घंटे तक वह झाड़फूंक करता रहा, मगर नारायण की हालत सुधरने के बजाय बिगड़ने लगी. रात 8 बजे उसे भोपाल के नैशनल हौस्पिटल लाया गया, मगर तब तक देर हो चुकी थी.

नारायण की हालत देख कर डाक्टरों ने उसे हमीदिया अस्पताल रैफर कर दिया. रात 10 बजे हमीदिया अस्पताल के डाक्टर ने उसे मृत घोषित कर दिया. डाक्टरों ने घर वालों को बताया कि सांप का जहर पूरे शरीर में फैल चुका है, यदि उसे जल्द अस्पताल लाया जाता तो उस की जान बचाई जा सकती थी. सूचना और संचार तकनीक की क्रांति के बावजूद समाज में अभी भी सांपों को ले कर अंधविश्वास फलफूल रहा है. अभी भी लोग दूसरों की कहीसुनी बातों पर यकीन कर ?ाठ को सच मान लेते हैं.

इस तरह के अंधविश्वास को बढ़ावा देने का काम धर्म के दुकानदारों द्वारा कथाकहानियों में, टीवी पर दिखाए जाने वाले सीरियल और फिल्मों के माध्यम से बखूबी किया जा रहा है. टैलीविजन चैनलों पर दिखाए जाने वाले नागनागिन के सीरियल और ‘नागिन’, ‘नगीना’ जैसी दर्जनों फिल्मों में की गई नागलोक की कपोल कल्पना, इच्छाधारी नाग, बदला लेने वाले नाग, मणि रखने वाले नागों की कहानियां लोगों के दिलोंदिमाग में इस कदर बैठ गई हैं कि वे इन्हें सच मानने लगे हैं. सांपों से जुड़े अंधविश्वास हमारे समाज में सांपों को ले कर कई तरह के अंधविश्वास और भ्रम फैले हुए हैं. गांवदेहात में तो बाकायदा इन की देवीदेवताओं की तरह पूजा की जाती है. नागपंचमी के दिन इन्हें दूध पिलाने की परंपरा है.

सांपों को ले कर कई फिल्में भी बनी हैं जिन में दिखाया जाता है कि नागलोक एक अलग संसार है. ‘नागिन’, ‘नगीना’ जैसी कई फिल्मों में यह कहानी दिखाई गई है कि नाग नागिन के जोड़े में से किसी एक को मारने पर वे अपने साथी की मौत का बदला लेते हैं. इसी प्रकार इच्छाधारी सांप और मणि रखने वाले सांपों की कहानियां गंवई इलाकों में लोगों को सुना कर सांपों के प्रति डर दिखाया जाता है. वास्तव में विज्ञान कहता है कि न तो सांप दूध पीते हैं और न ही इच्छाधारी होते हैं. सांप बीन की धुन पर नाचते हैं, यह भी एक अंधविश्वास है, क्योंकि सांप के कान ही नहीं होते.

गांवदेहात में पंडेपुजारी भी नागपंचमी पर इन का पूजनपाठ करा के भोलेभाले लोगों से दानदक्षिणा बटोर कर अपनी जेबें भरने का काम करते हैं. फुटपाथ पर बिकने वाला साहित्य, हमारी फिल्में और धार्मिक पुराण अंधविश्वास से भरे पड़े हैं. सांप का दूध पीना, सांप का बदला लेना, बीन पर नाचना, मूंछों वाले सांप, दोमुंह वाले सांप, इच्छाधारी नाग, नागमणि होने जैसी बातों से जुड़ी कहानियों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. जीव विज्ञान के अनुसार सांप एक मांसाहारी जीव है जो मेंढक, चूहा, पक्षियों के अंडे व अन्य छोटेछोटे जीवों को खा कर अपना पेट भरते हैं. दूध इन का आहार नहीं है. संपेरों को जब भी सांप को दूध पिलाना होता है तो वे उन्हें भूखाप्यासा रखते हैं.

भूखेप्यासे सांप के सामने जब दूध लाया जाता है तो वह उसे पी लेता है. हमारे समाज में ऐसी भ्रांति है कि यदि कोई मनुष्य किसी सांप को मार दे तो मरे हुए सांप की आंखों में मारने वाले की तसवीर उतर आती है, जिसे पहचान कर सांप का साथी उस का पीछा करता है और उस को काट कर वह अपने साथी की हत्या का बदला लेता है. यह सांपों से जुड़ा एक ऐसा अंधविश्वास है जिस का हमारे यहां कहानियों और ढेर सारी फिल्मों में जम कर इस्तेमाल हुआ है. लेकिन यदि हम बात वैज्ञानिक दृष्टिकोण से करें तो इस में तनिक मात्र भी सचाई नहीं है. सांप अल्प बुद्धि वाले जीव होते हैं.

इन का मस्तिष्क इतना विकसित नहीं होता है कि ये किसी घटनाक्रम को याद रख सकें. वैज्ञानिक सिद्धांत के अनुसार जब कोई सांप मरता है तो वह अपने गुदाद्वार से एक खास तरह की गंध वाला तरल छोड़ता है जो उस प्रजाति के अन्य सांपों को आकर्षित करता है. इस गंध को सूंघ कर दूसरे सांप मरे हुए सांप के पास आते हैं जिन्हें देख कर यह सम?ा लिया जाता है कि दूसरे सांप अपने मरे हुए सांप की हत्या का बदला लेने आए हैं. कई बार जिस लाठीडंडे से सांप को मारा जाता है, उस में वह तरल पदार्थ चिपक जाता है. जब उस डंडे को घर के अंदर रखा जाता है तो दूसरे सांप उस गंध से आकर्षित हो कर घर में घुस जाते हैं और हम यह समझ लेते हैं कि सांप का दूसरा साथी बदला लेने आया है.

सड़कों पर खेलतमाशा दिखाने वाले कुछ लोग सांप को अपनी बीन की धुन पर नचाने का दावा करते हैं जबकि यह पूरी तरह से अंधविश्वास है क्योंकि सांप के कान ही नहीं होते. दरअसल यह बात सांपों की देखने व सुनने की शक्तियों और क्षमताओं से जुड़ी है. सांप हवा में मौजूद ध्वनि तरंगों पर प्रतिक्रिया नहीं दर्शाते पर धरती की सतह से निकले कंपनों को वे अपने निचले जबड़े में मौजूद एक खास हड्डी के जरिए ग्रहण कर लेते हैं. सांपों की नजर ऐसी है कि वे केवल हिलतीडुलती वस्तुओं को देखने में अधिक सक्षम हैं. संपेरे की बीन को इधरउधर लहराता देख कर नाग उस पर नजर रखता है और उस के अनुसार ही अपने शरीर को लहराता है और लोग सम?ाते हैं कि सांप बीन की धुन पर नाच रहा है.

 

सांपों से जुड़ी एक अन्य मान्यता यह है कि कई सांप मणिधारी होते हैं यानी इन के सिर के ऊपर एक चमकदार, मूल्यवान और चमत्कारी मणि होती है. यह मणि यदि किसी इंसान को मिल जाए तो उस की किस्मत चमक जाती है. यह मान्यता भी पूरी तरह से अंधविश्वास है क्योंकि दुनिया में अभी तक 3,000 से भी ज्यादा प्रजातियों के करोड़ों सांप पकड़े जा चुके हैं लेकिन किसी के पास भी इस प्रकार की कोई मणि नहीं मिली है. तमिलनाडु के इरुला जनजाति के लोग, जो सांप को पकड़ने में माहिर होते हैं, भी मणिधारी सांप के होने से इनकार करते हैं.

कभीकभी जेनैटिक चेंज की वजह से ऐसे सांप पैदा हो जाते हैं जिन के एक सिर की जगह 2 सिर होते हैं. ऐसा इंसान सहित इस धरती के किसी भी प्राणी के साथ हो सकता है. लेकिन ऐसा कोई भी सांप नहीं होता है जिस के दोनों सिरों पर मुंह होते हैं. होता यह है कि कुछ सांपों की पूंछ नुकीली न हो कर मोटी और ठूंठ जैसी दिखाई देती है. चालाक संपेरे ऐसे सांपों की पूंछ पर चमकीले पत्थर लगा देते हैं जो आंखों की तरह दिखाई देते हैं और देखने वाले को यह लगता है कि इस सांप के दोनों सिरों पर 2 मुंह हैं. सांपों की एक प्रजाति ‘हौर्नड वाइपर’ के सींग तो होते हैं पर सांप की किसी भी प्रजाति की मूंछें नहीं होती हैं क्योंकि सांप सरीसृप (रेप्टाइल) वर्ग के जीव हैं. इन के शरीर पर अपने जीवन की किसी भी अवस्था में बाल नहीं उगते. होता यह है कि सांप को कोई खास स्वरूप देने पर अच्छी कमाई हो सकती है.

इसी लालच में संपेरे घोड़े की पूंछ के बाल को बड़ी ही सफाई से सांप के ऊपरी जबड़े में पिरो कर सिल देते हैं. इस के अलावा जब कोई सांप अपनी केंचुली उतारता है तो कभीकभी केंचुली का कुछ हिस्सा उस के मुंह के आसपास चिपका रह जाता है. ऐसे में उस सांप को देख कर मूंछों का भ्रम होने लगता है. इसी तरह सांपों की किसी भी प्रजाति में उड़ने का गुण नहीं होता है. लेकिन भारत और दक्षिणपूर्वी एशिया के वर्षा वनों (रेन फौरेस्ट) में एक सांप पाया जाता है जिस का नाम फ्लाइंग स्नेक है. हालांकि इन में भी इन के नाम के अनुरूप उड़ने का गुण नहीं होता है. ये फ्लाइंग स्नेक अपना अधिकांश समय वर्षा वनों के ऊंचेऊंचे पेड़ों पर बिताते हैं. इन सांपों को जब एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर जाना होता है तो ये अपने शरीर को सिकोड़ कर छलांग लगा देते हैं. जब ये सांप उछल कर एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर जाते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे ये उड़ रहे हों. हालांकि इस तरह से यह 100 मीटर तक की दूरी तय कर लेते हैं.

एक बहुप्रचलित मान्यता जिस का कि हमारे फुटपाथ पर बिकने वाली किताबों और फिल्मों में जम कर प्रयोग हुआ है वह यह है कि कुछ सांप इच्छाधारी होते हैं यानी वे अपनी इच्छा के अनुसार अपना रूप बदल लेते हैं और कभीकभी ये मनुष्यों का रूप भी धारण कर लेते हैं. यह भी एक मान्यता मात्र है जोकि पूरी तरह से गलत है. जीव विज्ञान के अनुसार इच्छाधारी सांप सिर्फ मनुष्यों का अंधविश्वास और कोरी कल्पना है, इस से ज्यादा और कुछ नहीं. नाग से रचाई शादी इसी तरह की अंधविश्वासी कहानियों के फेर में पड़ कर नाग देवता से शादी रचाने का एक दिलचस्प मामला मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में देखने को मिला है. पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के गृहजिले छिंदवाड़ा के परासिया विधानसभा के आदिवासी अंचल के धमनिया पंचायत के गांव सित्ताढाना निवासी इंदर के 2 बेटे और 2 बेटियां हैं. जिन में 18 वर्षीया छोटी बेटी गीता 8वीं के बाद पढ़ाई छोड़ चुकी है.

गीता को नागपंचमी में सपने में घर और खेत पर सांप दिखाई देते थे. गीता की मानें तो उसे सपने में नाग देवता आते थे और उस से शादी करने की बात करते थे. यह बात गीता ने अपने घर वालों से कही तो पहले तो किसी को भरोसा ही नहीं हुआ. लेकिन जब गीता बारबार नाग देवता से शादी करने की बात कहने लगी और शादी नहीं होने पर जान देने की धमकी देने लगी तो बेटी की जिद के आगे अनपढ़ मातापिता को विवश हो कर उस की बात माननी पड़ी. 15 सितंबर, 2020 को लाल जोड़े में दुलहन बन कर आई गीता के परिवार के लोगों ने घर के पास बने नागदेवता के पूजन स्थल पर लोहे से बने नागदेवता के साथ रीतिरिवाजों के साथ गीता की शादी करवाई. जब लोग मानसिक बीमारियों के शिकार होते हैं तो वे भूतप्रेत, ?ाड़फूंक जैसे अंधविश्वास को मानने लगते हैं.

वास्तव में यह सच नहीं होता. नाग से शादी रचाने की यह अनूठी घटना भी एक प्रकार के मानसिक रोग से पीडि़त होने की कहानी ही है. छिंदवाड़ा के मनोचिकित्सक डा. आर एन साहू ने बताया कि ऐसा होना एक प्रकार का ट्रांसस्टेट है. जब हमारा अचेतन मन चेतन मन पर हावी हो जाता है तो फिर इंसान ऐसी गतिविधियां करता है. असल में इस दौरान ब्रेन का डिफैंस मैकेनिज्म कमजोर हो जाता है जिस से हम अचेतनता की बातों को सही मानने लगते हैं. छिंदवाड़ा की घटना में भी उस लड़की के साथ ऐसा ही हुआ है. सब से ज्यादा खतरा खेतों में खेतखलिहान में रातदिन काम करने वाले मजदूर, किसान को हर पल सावधान रहने की जरूरत है. खेतीबाड़ी से जुड़े कामों में सांप के काटने का खतरा हर पल बना रहता है. कई बार खेत में काम करते वक्त जहरीले जीवजंतुओं के काटने की घटनाएं सामने आती हैं.

खेतों में पाए जाने वाले सांप वैसे तो चूहों से फसलों की रक्षा करते हैं पर सांप को सामने देख कर डर के मारे सभी की घिग्घी बंध जाती है. अकसर खेत में उगी घनी फसल के बीच या खेत की मेड़ पर उगी झाडि़यों में सांप छिपे रहते हैं. अनजाने ही खेत में काम करने वाले के पैर सांप के ऊपर पड़ जाते हैं, तभी सांप अपने बचाव के लिए अपने फन से उसे डस भी लेते हैं. सांप के काटने के इलाज की सही जानकारी न होने से लोग झाड़फूंक के चक्कर में पड़ जाते हैं. यदि काटने वाला सांप जहरीला निकला तो जान से भी हाथ धोना पड़ता है. देश के ज्यादातर हिस्सों में सब से ज्यादा सर्पदंश की घटनाएं वर्षाकाल में सामने आती हैं पर ठंड और गरमी के मौसम में भी खेतों में लगी फसल में काम करते वक्त सर्पदंश से लोग प्रभावित हो जाते हैं. विटनरी कालेज,

जबलपुर के सर्प विशेषज्ञ गजेंद्र दुबे के मुताबिक, भारत में सांपों की लगभग 270 प्रजातियां पाई जाती हैं जिन में से लगभग 10 से 15 प्रजाति के सांप ही ज्यादा जहरीले होते हैं. भारत में करैत, कोबरा नाग, रसेल वाइपर, सा स्केल्ड वाइपर, किंग कोबरा, पिट वाइपर सब से जहरीले सांप हैं. देश में लगभग हर साल 50 हजार लोग सर्पदंश से प्रभावित होते हैं. कई बार सांप जहरीला न भी हो तो भी किसान सांप के काटने के भय से घबरा जाते हैं और हार्ट अटैक से मर जाते हैं. सांप काटने पर ?ाड़फूंक से बचें अकसर सांप के काटने पर लोग ?ाड़फूंक के चक्कर में जल्दी आ जाते हैं. किसानी महल्ला साईंखेड़ा के दरयाव किरार को जुलाई 2018 में धान के रोप लगाते समय सांप ने दाएं हाथ की उंगली में काट लिया.

उन्होने फौरन हाथ के ऊपरी हिस्से में कपड़ा बांध लिया और अपने सहयोगी के साथ झाड़फूंक करने वाले पंडा के पास पहुंच गए. करीब 5-6 घंटे ?ाड़फूंक करने के बाद शाम को घर आ गए. रात्रि में 11 बजे के लगभग जब उन्हें लगातार उल्टियां होने लगीं तो परिवार के लोग उन्हें अस्पताल ले कर गए जहां लगातार 5 दिन तक इलाज चलने के बाद उन की हालत में सुधार हुआ. माहिर लोग बताते हैं कि यदि सांप जहरीला नहीं होता तो पीडि़त व्यक्ति को कुछ नहीं होता. इस वजह से ?ाड़फूंक को लोग सही मान लेते हैं जिन लोगों का यह तरीका ठीक नहीं है. कभी किसी को सांप काटे तो तुरंत ही उसे अस्पताल ले जाना चाहिए. आजकल के नौजवान मोबाइल फोन में सोशल मीडिया की गलत जानकारी को सही मान कर गलतफहमी के शिकार हो जाते हैं और सांप के काटने पर गलत तरीके अपना लेते हैं. अक्तूबर 2019 में मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के गांव चांदनखेड़ा में धान के खेत में दवा का छिड़काव कर रहे एक युवा किसान राजकुमार को सांप ने डस लिया.

राजकुमार ने व्हाट्सऐप पर आए एक मैसेज में पढ़ा था कि सांप के काटने पर उस स्थान पर कट लगा लेना चाहिए. सो, उस ने जल्दबाजी में सांप के जहर से बचने के लिए अपने पास रखे ब्लेड से हाथ में कट लगा लिया. उसे लगा कि खून के साथ सांप का जहर निकल जाएगा लेकिन ज्यादा खून बह जाने के कारण जब उस की हालत बिगड़ने लगी तो साथ में काम कर रहे उस के चाचा द्वारा उसे अस्पताल पहुंचाया गया. जहां डाक्टर ने उसे एंटी स्नेक वीनम इंजैक्शन लगा कर सांप के जहर से बचा लिया. सांप के काटने के इलाज की सही जानकारी जरूर रखनी चाहिए. सर्पदंश के इलाज में माहिर सरकारी अस्पताल में पदस्थ डाक्टर राशि राय बताती हैं कि विषैले सांप के काटने वाले स्थान पर तीव्र जलन, हाथपैरों में झनझनाहट, पसीना छूटना, मिचली आना, अनैच्छिक मलमूत्र त्याग, पलकों का गिरना, पुतलियों का विस्तारित होना जैसे लक्षण सामने आते हैं. कई बार सर्पदंश के शिकार ऐसे मरीज इलाज के लिए आते हैं जिन में ये लक्षण नजर नहीं आते तो यह माना जाता है कि सांप जहरीला नहीं था. सो, सांप के काटने पर हो सके तो मोबाइल से उस की फोटो खींच लें जिस से यह पहचान की जा सके कि सांप किस प्रजाति का है. सांप की पहचान नहीं होने पर डाक्टरों को लक्षणों के आधार पर इलाज करना पड़ता है क्योंकि यदि सांप जहरीला न हो तो एंटी स्नेक वीनम इंजैक्शन के गलत परिणाम भी सामने आते हैं.

सर्पदंश से बचने के लिए सावधानियां और सरकारी सहायता वर्षाकाल में हर सरकारी अस्पताल में प्रतिमाह औसतन 20 लोग सर्पदंश के इलाज हेतु आते हैं. जागरूकता के अभाव में कई बार झाड़फूंक में फंस कर अपनी जान से भी हाथ धो बैठते हैं. जिला अस्पताल नरसिंहपुर की सिविल सर्जन डा. अनीता अग्रवाल बताती हैं कि जिस अंग में सांप ने काटा है उसे पानी से साफ कर स्थिर रखने का प्रयास करें और अंग के पास किसी भी प्रकार का कट न लगाएं क्योंकि इस से टिटनैस होने का खतरा रहता है. सर्पदंश के स्थान पर कपड़े या धागे की पट्टी बांधते समय इस बात का ध्यान जरूर रखें कि वह इतनी टाइट न बांधें कि रक्तसंचार पूरी तरह बंद हो जाए. रक्तसंचार बिलकुल बंद होने से अंग के कटने की स्थिति बन सकती है.

सांप के काटने पर किसी तांत्रिक, गुनिया, पंडा या ओझा के पास जा कर झाड़फूंक करवाने के बजाय बिना समय गंवाए सीधे अस्पताल पहुंचना चाहिए. आजकल हर सरकारी अस्पताल में पर्याप्त संख्या में एंटी स्नेक वीनम इंजैक्शन मौजूद हैं. तमाम सावधानियां बरतने के बाद लोग सर्पदंश का शिकार हो जाते हैं और झाड़फूंक के फेर में पड़ कर या अपने घरेलू नुस्खे अपनाने की वजह से जान से हाथ धो बैठते हैं. सर्पदंश से मौत होने पर आजकल देश के अधिकांश राज्यों की सरकारें पीडि़त परिवार को सहायता उपलब्ध कराती हैं.

अलगअलग राज्यों में अलगअलग सहायता राशि देने का प्रावधान है. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश में 4 लाख रुपए, पंजाब में 3 लाख, झारखंड में ढाई लाख रुपए की सरकारी सहायता देने का नियम है. यह सहायता राशि मृतक के निकटतम संबंधी या वारिस को प्रदान की जाती है. सर्पदंश से मृत्यु होने पर मृतक का पोस्टमार्टम कराना जरूरी होता है. सरकारी सहायता प्राप्त करने के लिए अपनी तहसील के राजस्व अधिकारी, एसडीएम या तहसीलदार दफ्तर में मृत्यु के 15 दिन के भीतर आवेदन करना जरूरी है. आवेदन के साथ राशनकार्ड, आधार कार्ड की प्रमाणित प्रति के साथ पोस्टमार्टम रिपोर्ट और मृत्यु प्रमाण पत्र जमा कराना अनिवार्य है.

PMO : नकली राष्‍ट्रीय सलाहकार बन करोड़ों की ठगी करने वाली शातिर औरत

उच्चशिक्षित 29 वर्षीय कश्मीरा संदीप पवार ऐसी शातिर युवती है, जो खुद को प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) की राष्ट्रीय सलाहकार बताती थी. अपना रुतबा दिखा कर उस ने पति गणेश गायकवाड़ के साथ मिल कर लोगों से लाखों रुपए इतनी आसानी से ठग लिए कि…

कोर्ट के नोटिस के बाद सतारा (महाराष्ट्र) पुलिस सक्रिय हुई और कश्मीरा और उस के पति गणेश के खिलाफ काररवाई शुरू कर दी. 82 लाख रुपए की ठगी करने की 3 शिकायतें मिलने के बाद 19 जून, 2024 को रात करीब 11 बजे सतारा पुलिस 29 वर्षीय कश्मीरा संदीप पवार और उस के पति 32 वर्षीय गणेश गायकवाड़ के घर पहुंची. 

कश्मीरा के बारे में आसपास रहने वाले लोग जानते थे कि वो पीएमओ में अधिकारी है, जहां वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सीधे बात करती है, वहीं गृहमंत्री अमित शाह के इतने करीब है कि वह उन्हें अंकल कहती है. पुलिस जब उस के घर पहुंची तो जो बात पता चली, उस से सभी हैरान रह गए. बात ही कुछ ऐसी थी. पता चला कि कश्मीरा पीएमओ में कोई अफसर नहीं, बल्कि एक जालसाज है. अब तक वह अपने पति के साथ मिल कर कई लोगों से लाखों रुपए की ठगी कर चुकी है. 

प्रधानमंत्री के नाम पर ठगी कोई नई बात नहीं है. पिछले साल भी किरण पटेल नाम के ठग ने अपने आप को आईएएस अफसर बताते हुए पीएमओ से जुड़ा होने की बात कही और अधिकारियों के साथ मीटिंग कर उन पर खूब रौब जमाया था. लेकिन आखिर में उस की हनक धरी की धरी रह गई. वह पुलिस द्वारा धरा गया और उसे जेल की हवा खानी पड़ी. 

वहीं संजय शेरपुरिया नाम के एक शातिर ठग ने लोगों से पीएमओ से जुड़ा होने की बात कह कर कारोबारियों, बैंकों व अन्य से करोड़ों रुपए की ठगी की. लेकिन बाद में उसे भी जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ा. 11 दिसंबर, 2017 को महाराष्ट्र के एक मराठी अखबार के मुख्यपृष्ठ पर एक खबर छपी थी. इस में कहा गया था कि महाराष्ट्र के सतारा की रहने वाली एक युवा महिला कश्मीरा संदीप पवार को पीएमओ (प्रधानमंत्री कार्यालय) ने अपना राष्ट्रीय सलाहकार मनोनीत किया है. कश्मीरा संदीप पवार अब सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात कर के उन के साथ सलाहमशविरा कर सकती हैं.  

कुछ देर बाद एक मराठी चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज चली. इस में दावा किया गया था कि 24 साल की कश्मीरा संदीप पवार सीधे अजीत डोभाल को रिपोर्ट करेंगी. चैनल के एक रिपोर्टर ने कश्मीरा का इंटरव्यू भी लिया. अपने साक्षात्कार में कश्मीरा ने बताया, ”पीएमओ में नियुक्ति के बाद मैं ने सतारा के जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय से वीडियो कौन्फ्रैंसिंग के जरिए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल व पीएमओ के शीर्ष अधिकारियों से भी संवाद किया.’’ कश्मीरा ने बताया, ”मैं पीएमओ से जुड़ कर ग्रामीण विकास विभाग में काम करूंगी.’’ 

साक्षात्कार में कश्मीरा ने यह भी बताया कि उस ने केंद्र सरकार के मेक इन इंडिया कार्यक्रम के तहत एक कौंपटिशन जीता है. इस के लिए उसे राष्ट्रपति के हाथों अवार्ड भी मिला है. उस के बनाए स्मार्ट विलेज प्रोजेक्ट पर उत्तर प्रदेश के 3 गांवों में काम हुआ है. उस ने बताया कि मैं पीएमओ से जुड़ कर अलगअलग फील्ड की स्कीम के बारे में केंद्र सरकार को सलाह दूंगी. कश्मीरा ने दावा किया कि एमपीएससी का एग्जाम पास कर उसे डिप्टी कलेक्टर पद पर नियुक्ति मिली थी, बाद में उसे पीएमओ से अटैच किया गया. कश्मीरा से पहला इंटरव्यू पत्रकार विनय कदम (परिवर्तित नाम) ने लिया था. 

कश्मीरा ने क्यों किया होटल पर कब्जा

होटल व्यवसायी फिलिप भंबल ने दिसंबर, 2022 में सतारा पुलिस में कश्मीरा और गणेश के खिलाफ शिकायत की थी. शिकायत में कहा गया था कि कश्मीरा और गणेश पूरे महाराष्ट्र में लोगों को पीएमओ में नियुक्ति के दस्तावेज और उत्तर प्रदेश, त्रिपुरा, नागालैंड और लोकसभा सचिवालय के टेंडर दिखा कर धोखा दे रहे हैं.

इतना ही नहीं, अपनी बात को बल देते हुए फिलिप ने अपनी शिकायत के साथ दस्तावेजों की प्रति भी संलग्न की थी. इस शिकायत की जांच करने के बाद सतारा सिटी पुलिस स्टेशन में 4 जनवरी, 2023 को भादंवि की धारा 170 (लोक सेवक के रूप में प्रतिरूपण करने के लिए दस्तावेजों का उपयोग करना) के अंतर्गत अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की गई थी.

इस से पहले भी 9 दिसंबर, 2020 को फिलिप भंबल ने सतारा में कश्मीरा और गणेश के खिलाफ भादंवि की धारा 380, 427, 454, 411 के अंतर्गत रिपोर्ट दर्ज कराई थी. व्यवसायी फिलिप ने रिपोर्ट में आरोप लगाया था कि परिचित होने के कारण उस ने कश्मीरा और गणेश को अपना होटल किराए पर दिया था. लेकिन उन लोगों ने होटल को गैरकानूनी गतिविधियों का अड्डा बना लिया और खाली करने से इंकार कर दिया.

शुरू हो गई कश्मीरा के बैंक अकाउंट की भी जांच

फिलिप के अनुसार जब उसे इस बात की जानकारी हुई कि कश्मीरा और गणेश लोगों के साथ धोखाधड़ी कर रहे हैं तो उस ने जिला कलेक्टर, सतारा पुलिस और पीएमओ में शिकायत दर्ज कराई थी. तारा सिटी थाने के इंसपेक्टर आर.बी. मस्के ने बताया कि अब तक 3 लोगों ने अपनी शिकायतें दर्ज कराई हैं. आरोप है कि दोनों आरोपियों ने 82 लाख रुपए की धोखाधड़ी उन के साथ की है. 

इंसपेक्टर मस्के के अनुसार आगे की जांच के बाद एफआईआर में भादंवि की धारा 420, 465, 468 और 471 को जोड़ा गया. दोनों की संलिप्तता की जांच के साथ ही पीएमओ से बात की गई. इस के साथ ही आरोपियों के बैंक खातों की जांच भी शुरू कर दी.17 जून, 2024 को पुणे के एक व्यवसायी गोरख मराल ने कश्मीरा और उस के पति गणेश के खिलाफ पुणे शहर के बंड गार्डन पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई थी. मराल ने दोनों पर सरकारी टेंडर दिलाने के बदले 50 लाख रुपए की धोखाधड़ी करने का आरोप लगाया था. 

मराल ने पुलिस को बताया कि आरोपियों ने दिसंबर, 2019 और मार्च 2022 के बीच 50 लाख रुपए के बदले वाट्सऐप पर उस के साथ टेंडर डाक्यूमेंट्स शेयर किए थे. व्यवसायी से कश्मीरा और गणेश कई बार काउंसिल हाल और पुणे के कई स्थानों पर मिले भी थे. गणेश ने उस से कश्मीरा की तारीफ में छपी औनलाइन रिपोर्ट दिखा कर और उन के साथ कई दस्तावेज साझा कर उस का विश्वास हासिल किया.

मराल ने बताया, 20 नवंबर, 2019 को वाट्सऐप पर एक लेटर साझा किया, जिस पर पीएम नरेंद्र मोदी के हस्ताक्षर थे. इस लेटर में कश्मीरा की पीएम के राष्ट्रीय सलाहकार और भारत के काउंसलर के रूप में नियुक्ति का उल्लेख था. 

क्यों भेजते थे राष्ट्रपति भवन के फरजी लेटर

कश्मीरा के पति गणेश ने रा (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग, विदेशी खुफिया एजेंसी) के साथ संबंध होने का दावा किया और केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा उसे जारी किया गया एक हथियार लाइसैंस भी साझा किया. सतारा पुलिस ने उन दस्तावेजों की जांच शुरू कर दी है जो आरोपी ने व्यवसायी के साथ साझा किए थे.

दोनों शातिर ऐसे घूमते थे जैसे कि वे सरकार में वीआईपी हों. पीएमओ और राष्ट्रपति भवन के फरजी लेटर लोगों को भेजते थे. सरकारी नौकरी लगवाने के नाम पर मोटी रकम लेते थे. वहीं फरजी टेंडर डाक्यूमेंट्स भेज कर लोगों को फंसाते थे. ये अलगअलग राज्यों के टेंडर होते थे. मोदी व शाह से बात करने का नाटक करते थे. मीडिया रिपोर्टों ने भी उन के झूठे दावों को सही साबित करने में मदद की. दोनों के फरजीवाड़े के बारे में गोरख मराल ने पुलिस को बताया था, लेकिन लिखित शिकायत करने के बावजूद पुलिस ने दोनों के खिलाफ कोई काररवाई नहीं की. 9 सितंबर, 2020 को गोरख मराल ने केस दर्ज कराया था.

पुलिस ने कश्मीरा को सही मानते हुए उल्टा गोरख मराल व फिलिप भंबल के खिलाफ जबरन वसूली का केस दर्ज कर दिया. गोरख मराल परेशान हो गया. उसे न्याय नहीं मिल रहा था. इस पर वह वर्ष 2023 में हाईकोर्ट गया. हाईकोर्ट ने पीएमओ, कलेक्टर और सतारा पुलिस को नोटिस जारी किया. कोर्ट के आदेश पर सतारा पुलिस हरकत में आ गई और कश्मीरा संदीप पवार व उस के पति गणेश गायकवाड़ की तलाश शुरू कर दी. फिर पुलिस ने दोनों को धोखाधड़ी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. 20 जून, 2024 को दोनों को सतारा पुलिस ने न्यायालय के समक्ष पेश किया, जहां से उन्हें 2 दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया गया.

दोनों से पूछताछ के बाद पता चला कि फिलिप भंबले और गणेश गायकवाड़ एक ही कालेज में पढ़ते थे. इस के चलते दोनों में गहरी दोस्ती थी. गणेश को शराब की लत थी. वर्ष 2017 में फिलिप ने उसे रिहैबिलिटेशन सेंटर में भरती करवाया था. इस के बाद गणेश ने फिलिप को कश्मीरा से मिलवाया था. गणेश ने कहा था कि कश्मीरा पीएमओ में अधिकारी है. गणेश ने 6 मई, 2018 को सोशल मीडिया पर एक फोटो पोस्ट की थी, जिस में बताया था कि यह फोटो कश्मीरा की जौइनिंग वाले दिन की है.

कैसे हुई कश्मीरा और गणेश की शादी

तीनों अकसर मिलतेजुलते रहते थे. कश्मीरा और गणेश का फिलिप के होटल में आनाजाना भी रहता था. गणेश और कश्मीरा के बीच नजदीकियां बढ़ीं और साल 2020 में फिलिप ने दोनों की शादी महाबलेश्वर के एक मंदिर में करवा दी. चूंकि फिलिप कश्मीरा को बहन मानने लगा था, इस के चलते उस ने कश्मीरा का कन्यादान भी किया था. मजे की बात यह है कि पकड़े जाने पर कश्मीरा गणेश को अपना केवल दोस्त ही बताती थी. जबकि फिलिप के पास उन की शादी के फोटो भी हैं. एक दिन कश्मीरा और गणेश ने फिलिप से कहा कि वह अपना होटल उन्हें लीज पर दे दे. इस पर फिलिप ने दोनों को अपना होटल दे दिया. क्योंकि वह कश्मीरा को अपने परिवार के मेंबर की तरह ही मानता था. 

होटल को गणेश और कश्मीरा ने कुछ ही दिनों में अपराधियों का अड्डा बना दिया. जहां होटल में पहले रोजाना की आमदनी 70 हजार रुपए होती थी, वहीं वह घट कर मात्र 5 हजार रुपए रह गई. यह देख कर फिलिप ने उन से होटल वापस मांगा तो होटल से कब्जा छोडऩे को मना कर दिया. इतना ही नहीं, विवाद बढऩे पर उन दोनों ने मिल कर फिलिप के साथ मारपीट की.  

ठगों ने दर्ज कराया झूठा मामला

इस के बाद दोनों ने मिल कर होटल को हड़पने के लिए षडयंत्र रचा. गोरख मराल ने कश्मीरा और गणेश दोनों पर भरोसा किया था. उल्टा चोर कोतवाल को डांटे कहावत उस समय सच साबित हुई, जब सरकारी टेंडर दिलाने के नाम पर मराल द्वारा दिया गया अपना पैसा वापस मांगने तथा स्थानीय होटल व्यवसायी फिलिप द्वारा अपना होटल वापस करने की कहने पर उल्टा 10 जनवरी, 2023 को सतारा सिटी पुलिस स्टेशन में कश्मीरा ने जबरन वसूली का झूठा मामला दर्ज करा दिया. 

कश्मीरा ने मराल और स्थानीय होटल व्यवसायी फिलिप भंबल सहित 2 अन्य पर 50 लाख रुपए की मांग करने और उन के बीच विवाद के बाद जबरन 50 हजार रुपए लेने का आरोप लगाया था. हालांकि इस रिपोर्ट में कश्मीरा ने अपनी पीएमओ में नियुक्ति का कोई जिक्र नहीं किया था. इतना जरूर कहा गया था कि उस के पास समाजशास्त्र में मास्टर डिग्री है. 

कश्मीरा व गणेश की गिरफ्तारी के बाद एसपी (सतारा) समीर शेख ने प्रैस कौन्फ्रैंस में जानकारी दी कि कश्मीरा और गणेश सरकारी टेंडर दिलाने के नाम पर ठगी करते थे. दोनों के खिलाफ भादंवि की धारा 420 (धोखाधड़ी), 465 (जालसाजी), 468 (जाली दस्तावेज) या इलेक्ट्रास्निक रिकौर्ड तैयार करना, 471 (जाली दस्तावेजों का धोखाधड़ी से इस्तेमाल) में एफआईआर दर्ज कर पूछताछ शुरू हो गई.

एसपी ने बताया कि हम क्राइम में कश्मीरा और गणेश के शामिल होने की जांच कर रहे हैं. वेरिफिकेशन के लिए पीएमओ से संपर्क किया है. आरोपियों के बैंक खातों की जांच भी की जा रही है. पीडि़त 49 वर्षीय गोरख मराल बिल्डिंग मैटेरियल सप्लायर हैं. कश्मीरा और गणेश ने सरकारी टेंडर दिलाने के नाम पर उन से 50 लाख रुपए मांगे. मराल ने बताया कि दिसंबर, 2019 से मार्च 2022 के बीच कैश और औनलाइन रुपए दे दिए गए. इस के बाद कश्मीरा व गणेश ने वाट्सऐप पर उन्हें टेंडर डाक्यूमेंट शेयर किया.

40 से ज्यादा लोगों से ऐसे की ठगी

कश्मीरा का पहला इंटरव्यू पत्रकार विनय कदम ने लिया था. ये पत्रकार बताते हैं, कश्मीरा के पीएमओ का सलाहकार बनने की खबर कई अखबारों के फ्रंट पेज पर छपी थी. कश्मीरा के घर पहुंचने वाला वह पहला पत्रकार था. कश्मीरा अपने इंटरव्यू में इतनी आत्मविश्वास से भरपूर थी कि पत्रकार को लगा ही नहीं कि वह झूठ बोल रही है. 

विनय के अनुसार कश्मीरा ने जिन लोगों को अपनी ठगी का शिकार बनाया है, वे उस का 6 साल पुराना इंटरव्यू देख कर मुझ से संपर्क कर रहे हैं. इस हिसाब से एक अनुमान के अनुसार कश्मीरा और गणेश ने 40 से ज्यादा लोगों को शिकार बनाया है.

करोड़ों की लग्जरी कारें हैं कश्मीरा के पास

सतारा के वरिष्ठ पत्रकार विजय मांडके ने बताया कि कश्मीरा पवार ने सतारा के प्रसिद्ध निर्मला कौन्वेंट स्कूल से पढ़ाई की है. उस की इंंग्लिश अच्छी है. उस के मातापिता चाहते थे कि वह अधिकारी बने. इसलिए ग्रैजुएशन के बाद कश्मीरा एमपीएससी की तैयारी करने लगी. लेकिन वह इस परीक्षा को पास नहीं कर सकी. 

कश्मीरा ने अपने मातापिता को भी स्वयं के अधिकारी बनने और प्रधानमंत्री कार्यालय में सलाहकार नियुक्त होने का फरजी लैटर दिखाया था. इस के बाद प्रिंट व इलैक्ट्रौनिक मीडिया में खबरें आने के बाद सभी को कश्मीरा की बात पर पूरा भरोसा भी हो गया था.  कश्मीरा की मां एक स्कूल में प्रिंसिपल हैं, जबकि पिता जल आपूर्ति विभाग में कार्यरत हैं. कश्मीरा ने गणेश गायकवाड़ से प्रेम विवाह किया था. 

गणेश आदतन अपराधी है. दोनों पर टेंडर दिलवाने व सरकारी नौकरी दिलवाने के नाम पर लोगों से लाखों रुपए की ठगी करने का आरोप है. ठगी का शिकार हुए लोग रा (रिसर्च ऐंड एनलिसिस विंग) और पीएमओ का नाम सुन कर पुलिस से शिकायत करने से बचते रहे. कश्मीरा और उस के पति गणेश को लग्जरी कारों का शौक है. उन के पास रेंज रोवर, बीएमडब्लू और पोर्श जैसी मंहगी कारें हैं. इस के साथ ही उन के पास 27 लाख रुपए की एक बाइक भी है. फरेब का खेल खेल रहे कश्मीरा और गणेश दोनों वीआईपी की तरह घूमते थे. गणेश के पास वीवीआईपी बैज और फरजी डिप्लोमैटिक पासपोर्ट भी था. फरेब का यह खेल महाराष्ट्र के पुणे (पूना) में खेला गया.

लोगों के लालच की वजह से धोखेबाज व जालसाज ये बंटी और बबली 82 लाख की ठगी करने में सफल हो गए. लोगों को पहले इन के बारे में सही तथ्य जुटा लेने चाहिए थे कि जिस कार्यालय से वे जुड़ा होने का दावा करते हैं वास्तव में उस से जुड़े हैं या नहीं. जागरूक बन कर ही ऐसे ठगों के मंसूबों पर पानी फेरा जा सकता है.

फरेबी किरण याद आ गया 

ठगी की दुनिया में जब भी चर्चा होती है तो अब तक सब से पहला नाम नटवरलाल का आता था. लेकिन ये बात पुरानी हो गई. क्योंकि अब जो ठगी होती है उस में नटवरलाल पीछे रह जाता है. पिछले साल यानी 2023 में किरण पटेल नाम का एक फंदेबाज पीएमओ का बड़ा अधिकारी बन कर दिल्ली से कश्मीर तक सैकड़ों अधिकारियों को बेवकूफ बना कर अपना उल्लू सीधा करता रहा. जब 16 मार्च की रात को सोशल मीडिया पर उस का सच सामने आया तो दिल्ली में हड़कंप मच गया था. 

खुद को प्रधानमंत्री कार्यालय का एडीशनल डायरेक्टर बता कर किरण पटेल ने कश्मीर जा कर जेड प्लस श्रेणी की सिक्योरिटी ले ली. वीआईपी गाड़ी, सुरक्षा के लिए जैमर तथा साथ में सुरक्षा बल की 2 गाडिय़ां, ये था ठग किरण पटेल का काफिला.बताते चलें कि किरण पटेल ने अक्तूबर 2022 से मार्च 2023 तक खुद को पीएमओ का फरजी अफसर बता कर जम्मूकश्मीर में अधिकारियों के साथ गोपनीय मीटिंगें कीं. 

 किरण पटेल गुजरात में अहमदाबाद के दसक्रोई तहसील के नाज गांव का निवासी है. एक साल पहले उस ने अहमदाबाद के पौश इलाके सिंधुभवन के पास नया बंगला खरीदा. उस के भारतीय जनता पार्टी व मीडियाकर्मियों से अच्छे संबंध थे. भाजपा के कई बड़े नेताओं के साथ सोशल मीडिया पर उस की तसवीरें भी अकसर दिखाई दे जाती थीं. 

इन तसवीरों का इस्तेमाल वह अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए करता था. वह अकसर बीजेपी पार्टी कार्यालय में जब भी कोई बड़ा कार्यक्रम होता था तो वहां पर भी दिखाई देता था. वह लग्जरी कारों का शौकीन है. कश्मीर पहुंच कर उस ने खुद को पीएमओ का एडीशनल डायरेक्टर बता कर कुछ अधिकारियों से संपर्क किया और सुरक्षा हासिल कर ली थी. अधिकारियों को फटकारने व एक माह में 4 बार कश्मीर आने पर उस पर शक हुआ. 

जांच हुई तो पता चला कि वह फरजी है. वह श्रीनगर के फाइव स्टार होटल ललित के कमरा नंबर 1107 में ठहरा था. वहीं से उसे गिरफ्तार किया गया. भारत के सब से सुरक्षा वाले राज्य में यह ठग सभी की आंखों में धूल झोंकता रहा और जेड प्लस की सुरक्षा तक प्राप्त कर ली.

संजय शेरपुरिया ने ठगे 12 करोड़

गाजीपुर के शेरपुर का निवासी संजय प्रकाश राय उर्फ संजय शेरपुरिया खुद को प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) का अफसर बताता था. उस ने वरिष्ठ नौकरशाहों और राजनेताओं से नजदीकी का दावा कर कई लोगों को धोखा दे कर उन से मोटी रकम ठगी. पुलिस ने जालसाजी के आरोप में पिछले साल उसे गिरफ्तार किया था.

लखनऊ पुलिस द्वारा की गई प्राथमिकी के बाद प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने भी संजय शेरपुरिया के खिलाफ धनशोधन (मनी लांड्रिंग) के तहत आरोप पत्र दाखिल कर दिया था. पिछले साल 28 जुलाई को दिल्ली की पटियाला हाउस अदालत में विशेष पीएमएलए अदालत के समक्ष लखनऊ पुलिस ने शिकायत दर्ज कराई थी. 

ईडी ने 42 स्थानों पर छापे मारे थे, इन में प्रमुख रूप से नोएडा, दिल्ली, गुरुग्राम, गाजीपुर, फरीदाबाद, पुणे, गांधीधाम आदि शामिल हैं. इस के कुछ महीने बाद महाठग संजय को उत्तर प्रदेश के लखनऊ में विभूति खंड से एसटीएफ ने गिरफ्तार कर लिया.

संजय ने खुद को सामाजिक कायकर्ता और पीएमओ से जुड़ा हुआ बता कर झूठे वायदे करते हुए चुनाव में टिकट दिलवाने, अफसरों के ट्रांसफर व पोस्टिंग कराने, काले धन को सफेद धन में बदलने के नाम पर बिंदु फैशन प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक नवीन कुमार मल्होत्रा से एक करोड़, मेटा डिजायन सोल्यूशन प्राइवेट मिमिटेड के निदेशक सुनील चंद गोयल से 51.50 लाख की ठगी की थी. 

संजय शेरपुरिया ने ईडी की कररवाई को मैनेज कराने के लिए कारोबारी गौरव डालमिया की कंपनी से 6 करोड़ रुपए लिए थे, जो संजय के एनजीओ के खाते में आए थे. वह बैंक को भी करोड़ों रुपए का चूना लगाने में पीछे नहीं रहा. वह ठगी भी हाईटेक तरीके से करता था. उस ने दिल्ली में जहां आवास बनाया था, वहां लगे वाईफाई का नाम पीएम आवास लिख रखा था. अधिकतर लोगों को वह यही बताता था कि वह पीएमओ से संबंधित काम देखता है. यह आवास इसीलिए मिला है. 

संजय पर आरोप यह भी है कि वह एनजीओ में डोनेशन के नाम पर करोड़ों का घपला करता था. अलगअलग आईडी कार्ड दे कर ठगी करता था ताकि उस की वास्तविक पहचान उजागर न हो सके. भाजपा के शीर्ष नेताओं के साथ फोटो खिंचवा कर वह सोशल मीडिया पर खुद की ब्रांडिंग करता था. इस से लोग इस महाठग के मायाजाल में फंस जाते थे.

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Divorce : धर्मेंद्र और हेमामालिनी वाली कहानी

Divorce : शादीशुदा राजेश से प्रेम होने पर अकेलेपन का दंश  झेल रही निशा घर बसा कर उस के बच्चों की मां बनने का सपना देखने लगी. लेकिन राजेश की पत्नी सरोज से मिलने के बाद अपने सपनों को हकीकत में बदलना क्या निशा के लिए आसान था?

 

 

आज मेरा 32वां जन्मदिन था और मैं यह दिन राजेश के साथ गुजारना चाहती थी. उन के घर 10 बजे तक पहुंचने के लिए मैं ने सुबह 6 बजे ही कार से सफर शुरू कर दिया.

 

राजेश पिछले शनिवार को अपने घर गए थे लेकिन तेज बुखार के कारण वह सोमवार को वापस नहीं लौटे. आज का पूरा दिन उन्होंने मेरे साथ गुजारने का वादा किया था. अपने जन्मदिन पर उन से न मिल कर मेरा मन सचमुच बहुत दुखी होता.

 

राजेश को अपने प्रेमी के रूप में स्वीकार किए मुझे करीब 2 साल बीत चुके हैं. उन के दोनों बेटों सोनू और मोनू व पत्नी सरोज से आज मैं पहली बार मिलूंगी.

 

राजेश के घर जाने से एक दिन पहले हमारे बीच जो वार्तालाप हुआ था वह रास्ते भर मेरे जेहन में गूंजता रहा.

 

‘मैं शादी कर के घर बसाना चाहती हूं…मां बनना चाहती हूं,’ उन की बांहों के घेरे में कैद होने के बाद मैं ने भावुक स्वर में अपने दिल की इच्छा उन से जाहिर की थी.

 

‘कोई उपयुक्त साथी ढूंढ़ लिया है?’ उन्होंने मुझे शरारती अंदाज में मुसकराते हुए छेड़ा.

 

उन की छाती पर बनावटी गुस्से में कुछ घूंसे मारने के बाद मैं ने जवाब दिया, ‘मैं तुम्हारे साथ घर बसाने की बात कर रही हूं.’

 

‘धर्मेंद्र और हेमामालिनी वाली कहानी दोहराना चाहती हो?’

 

‘मेरी बात को मजाक में मत उड़ाओ, प्लीज.’

 

‘निशा, ऐसी इच्छा को मन में क्यों स्थान देती हो जो पूरी नहीं हो सकती,’ अब वह भी गंभीर हो गए.

 

‘देखिए, मैं सरोज को कोई तकलीफ नहीं होने दूंगी. अपनी पूरी तनख्वाह उसे दे दिया करूंगी. मैं अपना सारा बैंकबैलेंस बच्चों के नाम कर दूंगी… उन्हें पूर्ण आर्थिक सुरक्षा देने…’

 

उन्होंने मेरे मुंह पर हाथ रखा और उदास लहजे में बोले, ‘तुम समझती क्यों नहीं कि सरोज को तलाक नहीं दिया जा सकता. मैं चाहूं भी तो ऐसा करना मेरे लिए संभव नहीं.’

 

‘पर क्यों?’ मैं ने तड़प कर पूछा.

 

‘तुम सरोज को जानती होतीं तो यह सवाल न पूछतीं.’

 

‘मैं अपने अकेलेपन को जानने लगी हूं. पहले मैं ने सारी जिंदगी अकेले रहने का मन बना लिया था पर अब सब डांवांडोल हो गया है. तुम मुझे सरोज से ज्यादा चाहते हो?’

 

‘हां,’ उन्होंने बेझिझक जवाब दिया था.

 

‘तब उसे छोड़ कर तुम मेरे हो जाओ,’ उन की छाती से लिपट कर मैं ने अपनी इच्छा दोहरा दी.

 

‘निशा, तुम मेरे बच्चे की मां बनना चाहती हो तो बनो. अगर अकेली मां बन कर समाज में रहने का साहस तुम में है तो मैं हर कदम पर तुम्हारा साथ दूंगा. बस, तुम सरोज से तलाक लेने की जिद मत करो, प्लीज. मेरे लिए यह संभव नहीं होगा,’ उन की आंखों में आंसू झिलमिलाते देख मैं खामोश हो गई.

 

सरोज के बारे में राजेश ने मुझे थोड़ी सी जानकारी दे रखी थी. बचपन में मातापिता के गुजर जाने के कारण उसे उस के मामा ने पाला था. 8वीं तक शिक्षा पाई थी. रंग सांवला और चेहरामोहरा साधारण सा था. वह एक कुशल गृहिणी थी. अपने दोनों बेटों में उस की जान बसती थी. घरगृहस्थी के संचालन को ले कर राजेश ने उस के प्रति कभी कोई शिकायत मुंह से नहीं निकाली थी.

 

सरोज से मुलाकात करने का यह अवसर चूकना मुझे उचित नहीं लगा. इसलिए उन के घर जाने का निर्णय लेने में मुझे ज्यादा कठिनाई नहीं हुई.

 

राजेश इनकार न कर दें, इसलिए मैं ने उन्हें अपने आने की कोई खबर फोन से नहीं दी थी. उस कसबे में उन का घर ढूंढ़ने में मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई. उस एक- मंजिला साधारण से घर के बरामदे में बैठ कर मैं ने उन्हें अखबार पढ़ते पाया.

 

मुझे अचानक सामने देख कर वह पहले चौंके, फिर जो खुशी उन के होंठों पर उभरी, उस ने सफर की सारी थकावट दूर कर के मुझे एकदम से तरोताजा कर दिया.

 

‘‘बहुत कमजोर नजर आ रहे हो, अब तबीयत कैसी है?’’ मैं भावुक हो उठी.

 

‘‘पहले से बहुत बेहतर हूं. जन्मदिन की शुभकामनाएं. तुम्हें सामने देख कर दिल बहुत खुश हो रहा है,’’ राजेश ने मिलाने के लिए अपना दायां हाथ आगे बढ़ाया.

 

राजेश से जिस पल मैं ने हाथ मिलाया उसी पल सरोज ने घर के भीतरी भाग से दरवाजे पर कदम रखा.

 

आंखों से आंखें मिलते ही मेरे मन में तेज झटका लगा.

 

सरोज की आंखों में अजीब सा भोलापन था. छोटी सी मुसकान होंठों पर सजा कर वह दोस्ताना अंदाज में मेरी तरफ देख रही थी.

 

जाने क्यों मैं ने अचानक अपने को अपराधी सा महसूस किया. मुझे एहसास हुआ कि राजेश को उस से छीनने के मेरे इरादे को उस की आंखों ने मेरे मन की गहराइयों में झांक कर बड़ी आसानी से पढ़ लिया था.

 

‘‘सरोज, यह निशा हैं. मेरे साथ दिल्ली में काम करती हैं. आज इन का जन्मदिन भी है. इसलिए कुछ बढि़या सा खाना बना कर इन्हें जरूर खिलाना,’’ हमारा परिचय कराते समय राजेश जरा भी असहज नजर नहीं आ रहे थे.

 

‘‘सोनू और मोनू के लिए हलवा बनाया था. वह बिलकुल तैयार है और मैं अभी आप को खिलाती हूं,’’ सरोज की आवाज में भी किसी तरह का खिंचाव मैं ने महसूस नहीं किया.

 

‘‘थैंक यू,’’ अपने मन की बेचैनी के कारण मैं कुछ और ज्यादा नहीं कह पाई.

 

‘‘मैं चाय बना कर लाती हूं,’’ ऐसा कह कर सरोज तेजी से मुड़ी और घर के अंदर चली गई.

 

राजेश के सामने बैठ कर मैं उन से उन की बीमारी का ब्योरा पूछने लगी. फिर उन्होंने आफिस के समाचार मुझ से पूछे. यों हलकेफुलके अंदाज में वार्तालाप करते हुए मैं सरोज की आंखों को भुला पाने में असमर्थ हो रही थी.

 

अचानक राजेश ने पूछा, ‘‘निशा, क्या तुम सरोज से अपने और मेरे प्रेम संबंध को ले कर बातें करने का निश्चय कर के यहां आई हो?’’

 

एकदम से जवाब न दे कर मैं ने सवाल किया, ‘‘क्या तुम ने कभी उसे मेरे बारे में बताया है?’’

 

‘‘कभी नहीं.’’

 

‘‘मुझे लगता है कि वह हमारे प्रेम के बारे में जानती है.’’

 

 

कुछ देर खामोश रहने के बाद मैं ने अपना फैसला राजेश को बता दिया, ‘‘तुम्हें एतराज नहीं हो तो मैं सरोज से खुल कर बातें करना चाहूंगी. आगे की जिंदगी तुम से दूर रह कर गुजारने को अब मेरा दिल तैयार नहीं है.’’

 

‘‘मैं इस मामले में कुछ नहीं कहूंगा. अब तुम हाथमुंह धो कर फ्रैश हो जाओ. सरोज चाय लाती ही होगी.’’

 

राजेश के पुकारने पर सोनू और मोनू दोनों भागते हुए बाहर आए. दोनों बच्चे मुझे स्मार्ट और शरारती लगे. मैं उन से उन की पढ़ाई व शौकों के बारे में बातें करते हुए घर के भीतर चली गई.

 

घर बहुत करीने से सजा हुआ था. सरोज के सुघड़ गृहिणी होने की छाप हर तरफ नजर आ रही थी.

 

मेरे मन में उथलपुथल न चल रही होती तो सरोज के प्रति मैं ज्यादा सहज व मैत्रीपूर्ण व्यवहार करती. वह मेरे साथ बड़े अपनेपन से पेश आ रही थी. उस ने मेरी देखभाल और खातिर में जरा भी कमी नहीं की.

 

उस की बातचीत का बड़ा भाग सोनू और मोनू से जुड़ा था. उन की शरारतों, खूबियों और कमियों की चर्चा करते हुए उस की जबान जरा नहीं थकी. वे दोनों बातचीत का विषय होते तो उस का चेहरा खुशी और उत्साह से दमकने लगता.

 

हलवा बहुत स्वादिष्ठ बना था. साथसाथ चाय पीने के बाद सरोज दोपहर के खाने की तैयारी करने रसोई में चली गई.

 

‘‘सरोज के व्यवहार से तो अब ऐसा नहीं लगता है कि उसे तुम्हारे और मेरे प्रेम संबंध की जानकारी नहीं है,’’ मैं ने अपनी राय राजेश को बता दी.

 

‘‘सरोज सभी से अपनत्व भरा व्यवहार करती है, निशा. उस के मन में क्या है, इस का अंदाजा उस के व्यवहार से लगाना आसान नहीं,’’ राजेश ने गंभीर लहजे में जवाब दिया.

 

‘‘अपनी 12 सालों की विवाहित जिंदगी में सरोज ने क्या कभी तुम्हें अपने दिल में झांकने दिया है?’’

 

‘‘कभी नहीं…और यह भी सच है कि मैं ने भी उसे समझने की कोशिश कभी नहीं की.’’

 

‘‘राजेश, मैं तुम्हें एक संवेदनशील इनसान के रूप में पहचानती हूं. सरोज के साथ तुम्हारे इस रूखे व्यवहार का क्या कारण है?’’

 

‘‘निशा, तुम मेरी पसंद, मेरा प्यार हो, जबकि सरोज के साथ मेरी शादी मेरे मातापिता की जिद के कारण हुई. उस के पिता मेरे पापा के पक्के दोस्त थे. आपस में दिए वचन के कारण सरोज, एक बेहद साधारण सी लड़की, मेरी इच्छा के खिलाफ मेरे साथ आ जुड़ी थी. वह मेरे बच्चों की मां है, मेरे घर को चला रही है, पर मेरे दिल में उस ने कभी जगह नहीं पाई,’’ राजेश के स्वर की उदासी मेरे दिल को छू गई.

 

‘‘उसे तलाक देते हुए तुम कहीं गहरे अपराधबोध का शिकार तो नहीं हो जाओगे?’’ मेरी आंखों में चिंता के भाव उभरे.

 

‘‘निशा, तुम्हारी खुशी की खातिर मैं वह कदम उठा सकता हूं पर तलाक की मांग सरोज के सामने रखना मेरे लिए संभव नहीं होगा.’’

 

‘‘मौका मिलते ही इस विषय पर मैं उस से चर्चा करूंगी.’’

 

‘‘तुम जैसा उचित समझो, करो. मैं कुछ देर आराम कर लेता हूं,’’ राजेश बैठक से उठ कर अपने कमरे में चले गए और मैं रसोई में सरोज के पास चली आई.

 

हमारे बीच बातचीत का विषय सोनू और मोनू ही बने रहे. एक बार को मुझे ऐसा भी लगा कि सरोज शायद जानबूझ कर उन के बारे में इसीलिए खूब बोल रही है कि मैं किसी दूसरे विषय पर कुछ कह ही न पाऊं.

 

घर और बाहर दोनों तरह की टेंशन से निबटना मुझे अच्छी तरह से आता है. अगर मुझे देख कर सरोज तनाव, नाराजगी, गुस्से या डर का शिकार बनी होती तो मुझे उस से मनचाहा वार्तालाप करने में कोई असुविधा न महसूस होती.

 

उस का साधारण सा व्यक्तित्व, उस की बड़ीबड़ी आंखों का भोलापन, अपने बच्चों की देखभाल व घरगृहस्थी की जिम्मेदारियों के प्रति उस का समर्पण मेरे रास्ते की रुकावट बन जाते.

 

 

मेरी मौजूदगी के कारण उस के दिलोदिमाग पर किसी तरह का दबाव मुझे नजर नहीं आया. हमारे बीच हो रहे वार्तालाप की बागडोर अधिकतर उसी के हाथों में रही. जो शब्द उस की जिंदगी में भारी उथलपुथल मचा सकते थे वे मेरी जबान तक आ कर लौट जाते.

 

दोपहर का खाना सरोज ने बहुत अच्छा बनाया था, पर मैं ने बड़े अनमने भाव से थोड़ा सा खाया. राजेश मेरे हावभाव को नोट कर रहे थे पर मुंह से कुछ नहीं बोले. अपने बेटों को प्यार से खाना खिलाने में व्यस्त सरोज हम दोनों के दिल में मची हलचल से शायद पूरी तरह अनजान थी.

 

कुछ देर आराम करने के बाद हम सब पास के पार्क में घूमने पहुंच गए. सोनू और मोनू झूलों में झूलने लगे. राजेश एक बैंच पर लेटे और धूप का आनंद आंखें मूंद कर लेने लगे.

 

‘‘आइए, हम दोनों पार्क में घूमें. आपस में खुल कर बातें करने का इस से बढि़या मौका शायद आगे न मिले,’’ सरोज के मुंह से निकले इन शब्दों को सुन कर मैं मन ही मन चौंक पड़ी.

 

उस की भोली सी आंखों में झांक कर अपने को उलझन का शिकार बनने से मैं ने खुद को इस बार बचाया और गंभीर लहजे में बोली, ‘‘सरोज, मैं सचमुच तुम से कुछ जरूरी बातें खुल कर करने के लिए ही यहां आई हूं.’’

 

‘‘आप की ऐसी इच्छा का अंदाजा मुझे हो चुका है,’’ एक उदास सी मुसकान उस के होंठों पर उभर कर लुप्त हो गई.

 

‘‘क्या तुम जानती हो कि मैं राजेश से बहुत पे्रम करती हूं?’’

 

‘‘प्रेम को आंखों में पढ़ लेना ज्यादा कठिन काम नहीं है, निशाजी.’’

 

‘‘तुम मुझ से नाराज मत होना क्योंकि मैं अपने दिल के हाथों मजबूर हूं.’’

 

‘‘मैं आप से नाराज नहीं हूं. सच तो यह है कि मैं ने इस बारे में सोचविचार किया ही नहीं है. मैं तो एक ही बात पूछना चाहूंगी,’’ सरोज ने इतना कह कर अपनी भोली आंखें मेरे चेहरे पर जमा दीं तो मैं मन में बेचैनी महसूस करने लगी.

 

‘‘पूछो,’’ मैं ने दबी सी आवाज में उस से कहा.

 

‘‘वह 14 में से 12 दिन आप के साथ रहते हैं, फिर भी आप खुश और संतुष्ट क्यों नहीं हैं? मेरे हिस्से के 2 दिन छीन कर आप को कौन सा खजाना मिल जाएगा?’’

 

‘‘तुम्हारे उन 2 दिनों के कारण मैं राजेश के साथ अपना घर  नहीं बसा सकती हूं, अपनी मांग में सिंदूर नहीं भर सकती हूं,’’ मैं ने चिढ़े से लहजे में जवाब दिया.

 

‘‘मांग के सिंदूर का महत्त्व और उस की ताकत मुझ से ज्यादा कौन समझेगा?’’ उस के होंठों पर उभरी व्यंग्य भरी मुसकान ने मेरे अपराधबोध को और भी बढ़ा दिया.

 

‘‘राजेश सिर्फ मुझे प्यार करते हैं, सरोज. हम तुम्हें कभी आर्थिक परेशानियों का सामना नहीं करने देंगे, पर तुम्हें, उन्हें तलाक देना ही होगा,’’ मैं ने कोशिश कर के अपनी आवाज मजबूत कर ली.

 

‘‘वह क्या कहते हैं तलाक लेने के बारे में?’’ कुछ देर खामोश रह कर सरोज ने पूछा.

 

‘‘तुम राजी हो तो उन्हें कोई एतराज नहीं है.’’

 

‘‘मुझे तलाक लेनेदेने की कोई जरूरत महसूस नहीं होती है, निशाजी. इस बारे में फैसला भी उन्हीं को करना होगा.’’

 

‘‘वह तलाक चाहेंगे तो तुम शोर तो नहीं मचाओगी?’’

 

मेरे इस सवाल का जवाब देने के लिए सरोज चलतेचलते रुक गई. उस ने मेरे दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए. इस पल उस से नजर मिलाना मुझे बड़ा कठिन महसूस हुआ.

 

‘‘निशाजी, अपने बारे में मैं सिर्फ एक बात आप को इसलिए बताना चाहती हूं ताकि आप कभी मुझे ले कर भविष्य में परेशान न हों. मेरे कारण कोई दुख या अपराधबोध का शिकार बने, यह मुझे अच्छा नहीं लगेगा.’’

 

‘‘सरोज, मैं तुम्हारी दुश्मन नहीं हूं, पर परिस्थितियां ही कुछ…’’

 

उस ने मुझे टोक कर अपनी बात कहना जारी रखा, ‘‘अकेलेपन से मेरा रिश्ता अब बहुत पुराना हो गया है. मातापिता का साया जल्दी मेरे सिर से उठ गया था. मामामामी ने नौकरानी की तरह पाला. जिंदगी में कभी ढंग के संगीसाथी नहीं मिले. खराब शक्लसूरत के कारण पति ने दिल में जगह नहीं दी और अब आप मेरे बच्चों के पिता को उन से छीन कर ले जाना चाहती हैं.

 

‘‘यह तो कुदरत की मेहरबानी है कि मैं ने अकेलेपन में भी सदा खुशियों को ढूंढ़ निकाला. मामा के यहां घर के कामों को खूब दिल लगा कर करती. दोस्त नहीं मिले तो मिट्टी के खिलौनों, गुडि़या और भेड़बकरियों को अपना साथी मान लिया. ससुराल में सासससुर की खूब सेवा कर उन के आशीर्वाद पाती रही. अब सोनूमोनू के साथ मैं बहुत सुखी और संतुष्ट हूं.

 

‘‘मेरे अपनों ने और समाज ने कभी मेरी खुशियों की फिक्र नहीं की. अपने अकेलेपन को स्वीकार कर के मैं ने खुद अपनी खुशियां पाई हैं और मैं उन्हें विश्वसनीय मानती हूं. उदासी, निराशा, दुख, तनाव और चिंताएं मेरे अकेलेपन से न कभी जुड़ी हैं और न जुड़ पाएंगी. मेरी जिंदगी में जो भी घटेगा उस का सामना करने को मैं तैयार हूं.’’

 

मैं चाह कर भी कुछ नहीं बोल पाई. राजेश ठीक ही कहते थे कि सरोज से तलाक के बारे में चर्चा करना असंभव था. बिलकुल ऐसा ही अब मैं महसूस कर रही थी.

 

 

सरोज के लिए मेरे मन में इस समय सहानुभूति से कहीं ज्यादा गहरे भाव मौजूद थे. मेरा मन उसे गले लगा कर उस की पीठ थपथपाने का किया और ऐसा ही मैं ने किया भी.

 

उस का हाथ पकड़ कर मैं राजेश की तरफ चल पड़ी. मेरे मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला, पर मन में बहुत कुछ चल रहा था.

 

सरोज से कुछ छीनना किसी भोले बच्चे को धोखा देने जैसा होगा. अपने अकेलेपन से जुड़ी ऊब, तनाव व उदासी को दूर करने के लिए मुझे सरोज से सीख लेनी चाहिए. उस की घरगृहस्थी का संतुलन नष्ट कर के अपनी घरगृहस्थी की नींव मैं नहीं डालूंगी. अपनी जिंदगी और राजेश से अपने प्रेम संबंध के बारे में मुझे नई दृष्टि से सोचना होगा, यही सबकुछ सोचते हुए मैं ने साफ महसूस किया कि मैं पूरी तरह से तनावमुक्त हो भविष्य के प्रति जोश, उत्साह और आशा प्रदान करने वाली नई तरह की ऊर्जा से भर गई हूं.

मौडर्न बहुओं की बैस्‍ट फ्रैंड बन गई हैं Mother in law

 

Mother in Law & Dauther in law Relation : मौडर्न समय में रिश्ते जोरजबरदस्ती से नहीं बल्कि आपसी तालमेल से बनाने पड़ते हैं. तालमेल ऐसा जिस में दबनेदबाने की भावना न हो और एकदूसरे के प्रति सम्मान हो. सासबहू को ले कर समाज में परसैप्शन है कि इन का नेचर आपस में लड़ने?ागड़ने का है पर आज के बदले समय में सासबहू में तालमेल दिखाई देने लगा है. इवनिंग वाक से वापस आते हुए लिफ्ट में मेरे सामने रहने वाली मिसेज मौली अपने बेटे की पत्नी के साथ मिल गईं. अकसर सासबहू की यह जोड़ी मुझे आतेजाते मिल ही जाती है. उन्हें यों एकसाथ देख कर मैं ने कहा, ‘‘कहां चली यह सासबहू की खूबसूरत जोड़ी?’’ ‘‘मेला, मूवी और बाहर ही डिनर ले कर घर आने का प्लान है आंटी,’’ बहू आरती ने अपनी सास की ओर मुसकरा कर देखते हुए कहा.

‘‘वाह, आदर्श सासबहू हो आप दोनों,’’ मैं ने कहा तो बहू खिलखिलाते हुए बोली, ‘‘बाय द वे आंटी, क्या हम सासबहू लगती हैं?’’ ‘‘रियली नहीं, मुझे तो हमेशा आप दोनों मांबेटी ही लगती हो. अभी ही देख लो, दोनों ही जींसटौप में हो. मांबेटी भी नहीं, बहनें ही अधिक लग रही हो,’’ मैं ने हंस कर कहा तो वे दोनों खुश होते हुए चली गईं. सच में आज सासबहू की परिभाषा पूरी तरह से उलट गई है. मुझे अपनी मां का बहू रूप आज भी याद है जब उन के मुख पर घूंघट हुआ करता था. उसी घूंघट में वे घर के समस्त कार्यों को निबटाती थीं. घरबाहर सभी जगह पर मजाल है कि उन का घूंघट जरा सा भी ऊंचा हो जाए. उन की अपनी कोई मरजी न थी. बस, दादी के निर्देशों का पालन भर करना होता था. जब मैं बहू बन कर अपनी ससुराल आई तो घूंघट का स्थान सिर के पल्ले ने ले लिया और हमें घरबाहर के विभिन्न मुद्दों पर अपनी राय सासुमां के सामने रखने का अधिकार तो था परंतु अंतिम निर्णय सासुमां का ही होता था जो अप्रत्यक्ष रूप से घर के मर्दों का ही हुआ करता था.

 

आज की daugher in law परिवार में समानता का अधिकार रखती है. उस के पहनावे में साड़ी का स्थान जींसटौप, कुरतेलैगिंग्स और अन्य आधुनिक परिधानों ने ले लिया है. वह अपने पति के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़ी है. परिवार में उस की राय बहुत माने रखती है. न केवल पति बल्कि सासससुर भी उस की राय को तवज्जुह देते हैं. यह बदलाव सासबहू के रिश्ते में भी परिलक्षित होता है. वे आज सासबहू कम, मांबेटी, बहनें या दोस्त अधिक हैं. जो एकदूसरे को बखूबी सम?ाती हैं, साथसाथ शौपिंग करती हैं, मूवी देखती और घूमती हैं. एकदूसरे के बारे में उस की उम्र के मानसिक स्तर पर जा कर सोचती हैं और एकदूसरे का खयाल रखना भी बखूबी जानती हैं.

छोटा होता परिवार का आकार इस बदलाव का सब से बड़ा कारण है परिवार का छोटा होता आकार. मेरी बूआ के 4 बेटे थे. बूआ सदैव एक न एक बहू को अपने साथ रखती थीं. एक बेटेबहू से बिगड़ जाने पर कोई न कोई उन की देखभाल के लिए उपलब्ध रहता ही था. परंतु आज परिवार में एक या दो संतानें ही होती हैं. श्रद्धा कहती है, ‘‘आज की कटु सचाई तो यह है कि हम सासबहुएं एकदूसरे की पूरक बन गई हैं क्योंकि पहले की तरह आज कई बच्चे तो होते नहीं कि एक के पास नहीं पट रही तो दूसरे या तीसरे के पास चले जाएंगे. एक ही बेटा है और एक ही बहू. हमें उन के साथ और उन्हें हमारे साथ ही रहना है तो फिर क्यों न हंसीखुशी रहा जाए.’’ इसी प्रकार एक मल्टीनैशनल कंपनी में सीए के पद पर कार्यरत प्रियंका कहती हैं, ‘‘हमें उन की जरूरत है और उन्हें हमारी. आज सोसाइटी में इतना अधिक एक्सपोजर है कि बच्चों को कदमकदम पर किसी मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है और वह मार्गदर्शक उन के ग्रांडपेरैंट्स से बढ़ कर कोई नहीं हो सकता.

 

‘‘उन के सुरक्षित हाथों में अपने बच्चों को छोड़ कर हम निश्चिंतता से काम कर पाते हैं. आजीवन अपने बच्चों के लिए खटने वाले मातापिता के लिए भी यह अपनी मेहनत को सफल होते देखने का स्वर्णिम पल होता है. उन्हें भी इस उम्र में किसी सहारे की आवश्यकता होती है और वह सहारा उन के बच्चों से अच्छा कोई नहीं हो सकता. थोड़े उन के और थोड़े हमारे बदलने से बात बन जाती है. ‘‘मेरे विवाह के इन 7 वर्षों में हम ने छोटेबड़े सभी त्योहार, बर्थडे, एनिवर्सरी जैसे सभी अवसरों को सदैव एकसाथ ही सैलिब्रेट किया है. यदि हम नहीं जा पाते हैं तो उन यादगार पलों में मम्मीपापा हमारे साथ होते हैं क्योंकि वे हमारी जौब की विवशताओं को भलीभांति सम?ाते हैं.

मेरे दोनों बच्चे अपने ग्रांडपेरैंट्स के साथ ही पलेबढ़े हैं.’’ बेटी की कमी पूरी करती बहुएं वर्तमान समय में जिन परिवारों में बच्चों के नाम पर केवल एक या दो बेटे ही हैं वहां पर बेटियों के लिए तरसती मां के लिए बेटे की पत्नी अर्थात बहू उन की बेटी की कमी को पूरी करती है. बेटी को ले कर अपने समस्त अरमानों को वे अपनी बहू के जरिए पूरा कर रही हैं. बहुएं भी अपनी सास को मां समान ही मानती हैं. परिधान, हेयरस्टाइल और ज्वैलरी का निर्धारण कर अपनी सास को आधुनिक और स्टाइलिश बना रही हैं. 2 बेटों की मां मेरी चचेरी बहन नीता का ही उदाहरण ले लीजिए. वह कहती है, ‘‘दूसरे बेटे के समय मुझे  बेटी की बड़ी चाह थी परंतु दूसरा भी बेटा होने के बाद बेटी की चाह मन में ही रह गई पर जब से बड़े बेटे का विवाह हुआ है, बहू रागिनी के रूप में मुझे बेटी मिल गई है.

बेटी वाले सारे अरमान मैं अपनी बहू के जरिए पूरा कर रही हूं. ‘‘कई बार तो अपनी कुछ नितांत निजी बातें, जिन्हें मैं पति के साथ भी शेयर नहीं कर पाती, बहू के साथ सा?ा करती हूं. अपनी मजबूत अंडरस्टैंडिंग के कारण हम बिना कहे ही एकदूसरे की बातें सम?ा जाते हैं.’’ इस के अतिरिक्त आज की सासें अपनी बहू की इच्छाओं का मान रखना भी बखूबी जानती हैं. अंजू को मैंटेनैंस के कारण कौटन पहनना कभी नहीं भाया परंतु कल वह बड़ी ही सुंदर कौटन साड़ी में थी तो मैं ने कहा, ‘‘तुम्हें तो कौटन पसंद नहीं था, फिर आज यह खूबसूरत कौटन साड़ी?’’ ‘‘बहू की पसंद है, उस का कहना है कि कौटन मेरे ऊपर बहुत फबता है, इसलिए अब यह मेरा भी पसंदीदा फैब्रिक हो गया है,’’ अंजू ने अपनी बहू की प्रशंसा करते हुए कहा. आत्मनिर्भर होती बेटियां पहले जहां बेटी को पढ़ालिखा कर उस का विवाह कर देना ही मातापिता अपना मुख्य दायित्व समझते थे,

 

वहीं आज के मातापिता बेटों की ही भांति बेटियों को भी पूरी तरह शिक्षित कर आत्मनिर्भर बना कर ही विवाह करते हैं. यही बेटियां आगे चल कर आत्मनिर्भर बहुएं बनती हैं क्योंकि लड़के भी आज नौकरीपेशा पत्नी को ही प्राथमिकता दे रहे हैं जो कंधे से कंधा मिला कर न केवल आर्थिक बल्कि जीवन के प्रत्येक मोरचे पर अपने पति का साथ निभा सके. कुछ मामलों में लड़कियों को बच्चे होने के बाद नौकरी छोड़नी पड़ती है. ऐसे में घर पर रहने के साथसाथ अपने परिवार की संपूर्ण देखभाल करने का दायित्व भी बहू का ही होता है. गौरव एक मल्टीनैशनल कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत है. प्रतिदिन गाजियाबाद से अपने औफिस दिल्ली जाने के लिए उसे सुबह 8 बजे निकलना पड़ता है. रात को 9 बजे ही घर वापस आ पाता है. ऐसे में पीछे रह गए वृद्ध सासससुर के साथसाथ 9 वर्षीय बेटे की शिक्षा का दायित्व भी गौरव की पत्नी गरिमा के कंधों पर है. गौरव स्वयं कहता है,

‘‘गरिमा मु?ा से कहीं बेहतर ढंग से घरबाहर सभी कुछ मैनेज कर लेती है. मेरे औफिस जाने के बाद पापामम्मी को डाक्टर के पास ले जाने से ले कर बेटे को पढ़ाने तक का सारा काम वही संभालती है और इसीलिए मैं अपने काम पर बेहतर ढंग से कंसन्ट्रेट कर पाता हूं.’’ सम?ादार होती सास आज की सास शिक्षित हैं. वे जानती हैं कि प्रतिदिन औफिस जाने वाली बेटे के बराबर पैकेज लेने वाली बहू को किसी भी प्रकार के बंधन, फिर वह चाहे रहनसहन हो या खानपान में बांधना अनुचित है क्योंकि बंधन जहां रिश्ते में खटास उत्पन्न करेगा वहीं आजादी रिश्ते की डोर को मजबूत और रेशमी बनाएगी. वे सम?ाती हैं कि आज की बहुओं को बेटी जैसी ही आजादी और प्यार दे कर ही उन का प्यार पाया जा सकता है. सुनंदा के पति जब बेटे के विवाह के बाद उस के पोस्ंिटग स्थल पर गए तो बहू को शौर्ट्स पहने देख कर अचंभित रह गए. अपनी पत्नी से दबे स्वर में बोले, ‘‘तुम ने इसे कपड़ों के बारे में कुछ नहीं सम?ाया?’’ ‘‘नहीं, मैं ने उसे अपनी मरजी से ही पहनने को कहा है.’’

‘‘तुम्हें पता है न, इस तरह के कपड़े घर की बहू पहने, यह बिल्कुल भी पसंद नहीं है मु?ो,’’ पतिदेव बोले. ‘‘ठीक है, मैं उसे साड़ी या सूट पहनने को कह देती हूं. परंतु फिर जब भी हम अपने बेटे के पास आएंगे तो बहू को अपने स्वाभाविक रहनसहन में परिवर्तन करना पड़ेगा जो निश्चय ही उसे और बेटे को पसंद नहीं आएगा और हमारा आना उन्हें भारस्वरूप प्रतीत होगा. ‘‘हम उन के साथ लंबे समय तक खुशीखुशी रह सकें, इस के लिए आवश्यक है कि हम उन के जीने के अंदाज और तौरतरीकों में अनावश्यक हस्तक्षेप न करें. उन्हें उन की जिंदगी अपने ढंग से जीने दें. जब बेटी पहन सकती है तो बहू क्यों नहीं? उस की भी तो इच्छाएं हैं. फिर आप जैसा कहें,’’ सुनंदा अपने पति को सम?ाते हुए बोली. ‘‘हां, शायद तुम ठीक कह रही हो. तुम्हारी सम?ादारी पर मु?ो गर्व है,’’ उन्हें भी अपनी पत्नी की बात जंच गई. समधीसमधन भी हो रहे प्यारे आज की बेटियां अपने मातापिता को ले कर बहुत पजैसिव होती हैं. उन की देखभाल करना वे अपनी जिम्मेदारी सम?ाती हैं.

मेरी बहन अनुजा ने इस मर्म को भलीभांति सम?ा लिया था. उस के बेटे ने जब सिंगापुर घूमने के लिए सुनंदा और उस के पति से भी चलने के लिए कहा तो वह बोली, ‘‘हम केवल तभी तुम लोगों के साथ चलेंगे जब स्निग्धा भी अपने मांपापा को साथ चलने के लिए तैयार करे.’’ स्निग्धा को तो मनमांगी मुराद मिल गई. वह तो कब से यही सोच रही थी परंतु संकोच में कह नहीं पा रही थी. अपनी सास की बात सुन कर वह सास के गले से लग गई और बोली, ‘‘मां आप कैसे मेरे मन की बातें बिना बोले ही सम?ा लेती हो?’’ सुनंदा कहती है, ‘‘मेरे ऐसा करने से बहू की नजरों में मैं बहुत ऊंची उठ गई. आखिर मेरे बेटे की ही भांति अपने मातापिता के लिए वह भी तो कुछ करना चाहती है, उस ने भी उन्हें ले कर कुछ सपने देखे होंगे. आखिर उस के मातापिता ने भी अपनी बेटी को आत्मनिर्भर बनाने में उतनी ही मेहनत और खर्चा किया है जितना हम ने, फिर उस के मातापिता के साथ भेदभाव क्यों?

‘‘कोई भी बहू अपने सासससुर का तभी मन से सम्मान कर पाएगी जब हम उस के मातापिता को सम्मान देंगे. प्रारंभ से ही हम ने ऐसा नियम बनाया है कि जब भी हम बेटेबहू के साथ घूमने जाते हैं तो बहू के मातापिता सदैव साथ में होते हैं. इस से हमें कंपनी तो मिलती ही है, बहू भी अपने मातापिता की ओर से नि रहती है जिस का सीधा असर हमारे परिवार के वातावरण और आपसी संबंधों पर परिलक्षित होता है.’’ आज बेटाबेटी का भेद पूरी तरह समाप्त हो चुका है. ऐसे में बहू के मातापिता को हेय नजरों से देखना अथवा उन्हें अपने से निम्नस्तर का सम?ाना सर्वथा अनुचित है. दरअसल, आज की लड़कियां अपने सासससुर के साथ बेटी बन कर रहती हैं. उन की प्रत्येक छोटीछोटी आवश्यकता का ध्यान रखती हैं. परंतु इस के साथ ही वे अपने मातापिता के लिए भी ससुराल के सदस्यों से मान और सम्मान की अपेक्षा रखती हैं जो सर्वथा उचित भी है. परंतु समस्या तब आती है जब अभिभावक अपने ही बच्चों के साथ कोई सम?ाता करने को तैयार नहीं होते.

जैसे, जब सासें अपनी बहू की भावनाओं का मान रखने की अपेक्षा अपने ईगो को ही सर्वोपरि रखने लगती हैं, जब अभिभावक बेटे द्वारा किए गए समस्त अनुचित कार्यों का दायित्व बहू पर डाल देते हैं, जब सासें बहुओं से आवश्यकता से अधिक अपेक्षाएं रखना प्रारंभ कर देतीं हैं अथवा बहू जब केवल ससुराल के अन्य सदस्यों की अपेक्षा अपने पति से ही मतलब रखती है, जब बहू अपनी मां के आगे सास को कुछ नहीं सम?ाती, जब अपनी ससुराल में भी मां की राय के अनुसार कार्य करती है और जब इन्हीं छोटीछोटी बातों को तूल दे कर बड़ा कर दिया जाता है तो यही छोटी बातें कब बड़ी हो कर रिश्तों में जहर घोलना प्रारंभ कर देती हैं, हम समझ ही नहीं पाते.

सासबहू का रिश्ता बेहद नाजुक होता है जिस के लिए सास और बहू दोनों को ही मानसिक रूप से तैयारी करनी होती है. सास को जहां बहू के हाथों अपना बेटा छिनता प्रतीत होता है वहीं बहू अपने पति पर एकाधिकार चाहती है. बहू यदि सास को ले कर शंकित और भ्रमित होती है तो सास भी चिंतित होती है कि वह अपनी बहू की कसौटी पर खरी उतर भी पाएगी या नहीं. रिश्ता कोई भी हो, उस की सफलता परस्पर समझदारी, विश्वास, सहयोग और समर्पण में ही निहित होती है. छोटीछोटी बातों को इग्नोर कर, एकदूसरे को यथोचित मानसम्मान दे कर और 2 पीढि़यों के अंतर को भलीभांति समझ कर व वक्त के अनुसार स्वयं में थोड़ा सा बदलाव कर के सासबहू के रिश्ते को अधिक खूबसूरत, प्यारा और आदर्श बनाया जा सकता है.

Office Romance : जब हो जाए लेडी बौस से प्‍यार

Office Romance :  लेडी बौस सुंदर हो तो उस पर दिल आना स्वाभाविक है. लेकिन यहां खतरे बहुत अधिक हैं. ऐसे में सावधानी से काम लें. ज्यादातर मामलों में यह प्यार एकतरफा होता है. यह बात और है कि कहानियों में ऐसे प्यार को काफी रंगीन बना कर पेश किया जाता है. दीपक की पहली जौब एक मल्टीनैशनल कंपनी में थी. छोटे से सीतापुर शहर का रहने वाला दीपक पहली बार किसी बड़े शहर आया था. सरकारी स्कूल से उस ने कक्षा 12 तक की पढ़ाई की, उस के बाद इंजीनियरिंग करने के लिए प्रवेश परीक्षा दी. जहां से उस का सलैक्शन बीटैक करने के लिए हो गया.

दीपक ने कंप्यूटर साइंस से 4 साल में इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की. वहां से ही उस का चयन मुंबई की एक मल्टीनैशनल कंपनी में हो गया. दीपक के लिए यह सपने जैसा था. सबकुछ एक के बाद एक जल्दीजल्दी हो गया. नौकरी के कुछ माह तक तो उसे कुछ सम झ ही नहीं आ रहा था. धीरेधीरे वह नौकरी और मुंबई की जिंदगी में रचनेबसने लगा. नौकरी के 6 माह बाद उस की कंपनी ने नए लोगों और पुराने अधिकारियों को 3 दिनों के लिए गोवा भेज दिया. वे 3 दिन मस्तीभरे थे. मीटिंग तो नाममात्र की थी. बाकी केवल आउटिंग होनी थी जिस से लोग आपस में सहज हो सकें. दीपक के साथ नौकरी करने वालों में लड़केलड़कियां दोनों थे. गांव से बाहर आ कर पहली बार उस ने लड़कियों को इतने करीब से देखा था.

दीपक की नजर अपने साथ काम करने वाली लड़कियों से अधिक अपनी जूनियर एचआर मैनेजर रुचि पर टिक जाती थी. देखा जाए तो रुचि उम्र में दीपक से 10 साल बड़ी थी. दीपक धीरेधीरे रुचि के प्रति आकर्षित होने लगा. उस का मन कर रहा था कि वह ज्यादा से ज्यादा रुचि के साथ रहे. गोवा में 3 दिनों के टूर में उसे यह मौका भरपूर मिला. दीपक का समय अपने साथियों से अधिक रुचि के साथ बीत रहा था. रुचि और दूसरे लोग यह सोच रहे थे कि एचआर मैनेजर को प्रभावित करने के लिए दीपक ऐसा कर रहा है. असल में दीपक उस के आकर्षण में यह सब कर रहा था. गोवा टूर खत्म हो गया. वापस लोग मुंबई आए और अपनेअपने काम पर लग गए. दीपक का कोई सीधा काम रुचि से नहीं पड़ता था.

ऐसे में उस के सामने दिक्कत यह हो रही थी कि वह कैसे बहाना बना कर रुचि से मिलने जाए. दीपक अब यह कोशिश करने लगा कि जिस समय रुचि औफिस में आए और जिस समय छुट्टी हो, वह रिसैप्सन एरिया में रहे, जिस से रुचि से मिलनेदेखने का मौका मिल जाए. रुचि अकसर देर से औफिस आती थी और देर से औफिस से जाती थी. दीपक आता तो समय से था पर काम का बहाना बना कर देर तक काम करता रहता था. जैसे ही रुचि के जाने का समय होता था वह भी अपना काम खत्म कर लेता था. यह सिलसिला चलता रहा. कभी दीपक बात करने का साहस नहीं कर पाया. दीपक ने यह पता लगा लिया था कि रुचि ने अभी शादी नहीं की है. यह जान कर दीपक का मन खुश हो गया.

दीपक का समय बलवान था. औफिस से निकल कर वह ओला बुक कर रहा था तो पता चला कि आज ओला नहीं चल रही, हड़ताल है. वह सोचने लगा कि अब कैसे घर जाएगा. उस के साथ के लोग पहले ही जा चुके थे. इतने में रुचि ने उस से पूछा, ‘क्या हो गया?’ ‘कुछ नहीं मैम, आज ओला नहीं चल रही. घर जाने की दिक्कत हो रही है,’ दीपक ने कहा. रुचि बोली, ‘कोई बात नहीं, मेरे साथ चलो, मैं छोड़ दूंगी.’ दीपक के लिए यह कल्पना से बाहर की बात थी. वह तैयार हो गया. रुचि की कार में बैठते हुए वह बेहद खुश था. वह ध्यान लगा कर रुचि को कार चलाते देख रहा था. रुचि ने पूछा, ‘क्या देख रहे हो?’ ‘आप कार चलाती हुई बहुत अच्छी लग रही हैं. मु झे कार चलानी नहीं आती,’ दीपक ने कहा. ‘कोई बात नहीं, मैं तुम को कार चलाना सिखा दूंगी’ रुचि ने कहा. एक चौराहे पर दीपक ने कहा,

‘बस, यहीं छोड़ दीजिए. आगे कुछ दूरी पर मैं रहता हूं.’ रुचि ने कार रोकी. दीपक उतरते हुए बोला, ‘मैम, आगे एक कौफी शौप है. अगर आप को बुरा न लगे तो कौफी पी लें.’ दीपक ने जिस तरह से कहा था, रुचि मना नहीं कर पाई. दोनों ने कौफी पी. ज्यादा बातें इधरउधर की हो रही थीं. दीपक का मन कर रहा था कि वह अपने मन की बात कह दे पर उसे डर लग रहा था. कौफी पीते हुए पहली बार उस ने रुचि के साथ मोबाइल से सैल्फी ली. यहां से दोनों की बातचीत का रास्ता खुल गया. मोबाइल पर अब मैसेज आने लगे. रातभर दीपक रुचि के साथ वाली सैल्फी ही देखता रहा. अब रुचि उसे और भी अच्छी लगने लगी थी. रुचि को भी दीपक की याद आने लगी थी. एक दिन वह छुट्टी ले कर अपने गांव आ गया.

वहां उस की मां की तबीयत ठीक नहीं थी. मां बारबार कह रही थी कि ‘मेरे जिंदा रहते तुम शादी कर लो.’ दीपक 2 दिनों के बाद वापस आ गया. इधर दीपक की मां की तबीयत खराब होने की बात रुचि को पता चली तो वह फोन कर हालचाल लेने लगी. मुंबई वापस आया तो दीपक और रुचि फिर उसी कौफी शौप पर बैठे. दीपक ने पूरी बात बताई. रुचि ने कहा, ‘तुम शादी कर लो. अब तो तुम्हारा वेतन भी अच्छा हो गया है.’ दीपक यह सुनते ही बिना किसी लागलपेट के बोला, ‘मैम, मैं आप को पंसद करता हूं. आप के अलावा किसी और से शादी की बात नहीं सोच सकता.’ दीपक के यह कहते ही कुछ समय के लिए दोनों चुप हो गए. रुचि ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा,

‘हम एकदूसरे को इतना जानते नहीं हैं कि शादी कर लें और फिर तुम उम्र में भी हम से छोटे हो. तुम्हारे घर वालों को एतराज हुआ तो?’ ‘आप जैसी लड़की लाखों में एक है. मेरी मां बहुत खुश होगी,’ दीपक ने कहा. रुचि ने एक दिन का समय मांगा और अगले दिन वह औफिस से छुट्टी ले कर दीपक के साथ उस की मां से मिलने गांव गई. वहां से 2 दिनों बाद वापस आ कर रुचि ने अपने मातापिता को भी पूरी बात बताई. दीपक ने अपनी मां और पिता को मुंबई बुला लिया और दोनों ने पहले सगाई और बाद में शादी कर ली. बड़ा कारण शारीरिक आकर्षण हर किसी के साथ ऐसा नहीं होता. कई बार महिला बौस से प्यार का इजहार भी नहीं हो पाता. महिला बौस से प्यार क्यों हो जाता है? इस का सब से बड़ा कारण शारीरिक आकर्षण होता है. महिला बौस में अपना एक अलग स्टाइल और आकर्षण होता है.

यह लोगों को लुभाता है. ऐसे ही आकर्षण के चलते कई बार अपनी टीचर से लोग प्यार कर बैठते हैं. बड़ी उम्र की औरतों के साथ प्यार और शादी के उदाहरण बहुत मिलते हैं. इन में से अधिकतर केवल खयालों में रह जाते हैं. आजकल ऐसी बहुत सारी कहानियां सोशल मीडिया पर पढ़ने को मिलती हैं जिन में महिला बौस के साथ प्यार की सीमा से पार सैक्स तक लोग पहुंच जाते हैं. ऐसी तमाम कहानियां लेखक के मन की उपज भी होती हैं. लेकिन जिस तरह से पुराने समय में भी ऐसे प्यार को ले कर लिखा गया है, उस से साफ है कि लैडी बौस से प्यार लोगों को हो ही जाता है. इस की वजह यह भी होती है कि उस के साथ औफिस का एक लंबा समय बीतता है.

सुंदरता के प्रति सहज आकर्षण होता है. संभल कर करें प्यार का इजहार एकतरफा किसी का चाहना बुरा नहीं होता. लेडी बौस के साथ प्यार हो जाए तो उस का इजहार संभल कर करें. इस में नौकरी जाने का खतरा होता है. यह जरूरी नहीं कि जिसे आप चाहते हों वह भी आप को चाहे तो प्यार का इजहार करने से पहले यह जरूर जान लें कि वह आप को प्यार करता है या नहीं. प्यार के लिए जोरजबरदस्ती उचित नहीं होती. यह अपराध की भावना को जन्म देता है. अगर प्यार हो गया और दूसरा प्यार नहीं कर रहा तो उसे भूल जाने में ही भलाई होती है. फिल्मों में एक गाना है- ‘वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन उसे इक खूबसूरत मोड़ दे कर छोड़ना बेहतर…’ लेडी बौस से प्यार हो जाए तो पहले समझ लें कि आप का प्यार अंजाम तक पहुंचने वाला है या नहीं. अगर आप को यह लगता है कि प्यार अपने अंजाम तक नहीं पहुंचेगा तो उसे छोड़ देना बेहतर होता है. इस को एक गाने से सम झने की कोशिश करें- ‘खता तो तब है जब हाल ए दिल किसी से कहें, किसी को चाहते रहना कोई खता तो नहीं…’

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