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सिर्फ कोहली नहीं, ये भी हुए हैं ‘डक’ के शिकार

टीम इंडिया के कप्‍तान विराट कोहली के नाम के आगे 0 का स्‍कोर आमतौर पर कम ही दिखाई देता है. इस दौर में तो शायद बिल्‍कुल नहीं जब विराट करियर के सर्वश्रेष्‍ठ बल्‍लेबाजी फॉर्म से गुजर रहे हैं. ऑस्‍ट्रेलिया के खिलाफ पुणे टेस्‍ट में जब विराट बिना कोई रन बनाए आउट हुए तो स्‍टेडियम में मौजूद दर्शकों के चेहरे पर निराशा साफ देखी जा सकती थी.

बाएं हाथ के तेज गेंदबाज मिचेल स्‍टार्क ने जब विराट को 0 के स्‍कोर पर आउट किया और ऑस्‍ट्रेलियाई टीम के खिलाड़ि‍यों की खुशी का ठिकाना नहीं था. आखिर क्‍यों न हो, विराट को वह टीम इंडिया का सबसे खतरनाक बल्‍लेबाज मान रही थी.

टेस्‍ट क्रिकेट के लिहाज से विराट दो साल से अधिक समय के बाद 0 के स्‍कोर पर आउट हुए हैं. इससे पहले वे 7 अगस्‍त 2014 से ओल्‍डट्रेफर्ड, मैनचेस्‍टर टेस्‍ट की पहली पारी में बिना कोई रन बनाए आउट हुए थे. समग्र रूप से देखें तो 104 इंटरनेशनल मैचों (टेस्‍ट, वनडे और टी20) के बाद विराट 0 के स्‍कोर पर आउट हुए हैं  आखिरी बार वे वर्ष 2014 में कार्डिफ वनडे में बिना कोई रन बनाए आउट हुए थे.

भारतीय क्रिकेट टीम में विराट के अलावा कई ऐसे बल्लेबाज भी हैं जिनके नाम एकदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट इतिहास में सबसे ज्यादा शून्य पर आउट होने का रिकॉर्ड है. अगर भारत के टॉप-5 ऐसे बल्लेबाजों की बात की जाए जो अपने एकदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट करियर में सर्वाधिक बार शून्य पर आउट हुए हैं तो उनमे सभी दिग्गज शामिल हैं.

लेकिन उस सूची में एक नाम ऐसा भी है जिसका नाम क्रिकेट जगत के सबसे महान बल्लेबाजों की कतार में शामिल है और हमेशा ही रहेगा. वह नाम कोई और नहीं बल्कि क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले भारतीय टीम के पूर्व महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर का है. जो अपने एकदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट करियर में सबसे ज्यादा शून्य पर आउट हुए हैं. वह अपने करियर में 20 बार शून्य पर आउट हुए हैं जो भारतीय क्रिकेट इतिहास में सबसे ज्यादा है. उनके अलावा और भी कई ऐसे दिग्गज हैं जिनका नाम इस सूची में शामिल है.

एकदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में भारत की तरफ से शून्य पर आउट होने वाले टॉप बल्लेबाज

बल्लेबाज

मैच

शून्य

सचिन तेंदुलकर

463

20

जवागल श्रीनाथ

229

19

अनिल कुंबले

269

18

युवराज सिंह

290

18

हरभजन सिंह

234

17

सौरव गांगुली

308

16

 

मिल गई इनकम टैक्स न भरने वालों को माफी

इनकम टैक्स अच्छे-अच्छों की नींद उड़ा देता है. कुछ महानुभाव लोग तो साम दाम दंड भेद से इसके शिकंजे से बच जाते हैं, पर कुछ मासूमों पर आयकर भी भारी मार पड़ती है. ये वे लोग हैं जिनको टैक्स काटने के बाद ही सैलेरी नसीब होती है. सरकार के भी रंग अजीब हैं. सरकार ने नोटबंदी कर ईमानदारों की नींद हराम करने में कोई कसर बाकी न रखी. जो धांधली करते थे, धांधली करने के नए तरीके कब का निकाल चुके होंगे.

सरकार ने टैक्स न भरने वालों पर एक बार फिर दया दिखाई है. केंद्र सरकार ने 100 रुपए तक के बकाया इनकम टैक्स वाले लोगों का टैक्स माफ कर दिया है. ऐसे करीब 18 लाख बकाएदार हैं, जिनके ऊपर 100 रुपए तक का आयकर बकाया है. केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड और सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज ने मिलकर यह फैसला लिया है.

सरकार का नुकसान, आपका फायदा

सरकार के इस फैसले से सरकार को तकरीबन 7 करोड़ रुपए नुकसान होगा. बताया जा रहा है कि इस फैसले से करीब 18 लाख मामले खत्म हो जाएंगे. इसका मसकद प्रशासनिक कार्यकुशलता में सुधार करना और कर संग्रह की लागत कम करना है. जिन लोगों के बस कुछ रुपयों के कर बकाए हैं उन्हें आसानी से रिफंड दिया जा सकेगा.

वित्त मंत्री ने भरी हामी

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी इस माफीनामे पर अपनी मुहर लगा दी है. जेटली ने इस कदम को डेलीगेशन ऑफ पावर रूल्स, 1978 के तहत मंजूरी दी है, जिसमें वित्त मंत्री को कोई भी टैक्स बकाया माफ करने का अधिकार है. इस नियम के तहत मुख्य आयुक्तों को 25 लाख रुपये तक का बकाया माफ करने का अधिकार है.

इनका टैक्स हुआ माफ

100-5000 रुपए तक के बकाया टैक्स के करीब 22 लाख मामले सरकार के पास लंबित हैं. इनमें से सरकार ने 100 रुपए तक के इनकम टैक्स एरियर माफ कर दिए हैं यानी कुल 18 लाख बकाया टैक्स देनदारों को बड़ी राहत मिल गई है.

इसलिए लिया गया ये फैसला

टैक्स चोरी करने वालों कड़ी कार्रवाई करने के बजाए नर्मी से पेश आने की भी वजह है. सरकार ने इस फैसले के पीछे वाजिब कारण भी दिए हैं. सरकार ने पैसे और समय बचाने के लिए यह कदम उठाया है.18 लाख लोगों से 100 रुपये टैक्स वसूलने पर सरकार को उतना टैक्स नहीं आता जितना 18 लाख लोगों से बकाया वसूलने में आयकर विभाग का पैसा खर्च हो जाता. इसी तरह से 100-5000 रुपए तक के बकाया टैक्स के करीब 22 लाख मामले सरकार के पास लंबित हैं.

गौरतलब है कि सरकार को इस फैसले पर घेरा जा सकता है, जैसा की होता आया है. पर सरकार ने अपना काम आसान करने के लिए ही यह नर्मी दिखाई है. सरकार के इतने मेहरबान होने की असल वजह तो सरकार से संबंधित लोग ही जाने. पब्लिक सब जानते हुए भी खामोश है, क्योंकि वोट डालने के अलावा वो हाथ उठाए भी तो कैसे उठाए.

अपरिपक्व का पर्यायवाची शब्द है ‘पप्पू’

किसी को आभिजात्य तरीके से बेज्जत करने के लिए अपरिपक्व से बेहतर कोई दूसरा शब्द डिक्शनरी में हो भी नहीं सकता. नादान, नासमझ अनुभवहीन, बच्चा या कम बुद्धि वाला राहुल गांधी को कहतीं तो यह बात दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के व्यक्तित्व से न तो मेल खाती और न ही उस पर इतना ध्यान दिया जाता जितना कि दिया जा रहा है. एक वक्त में नेहरू-गांधी परिवार के सामने सर झुकाये हाथ बांधे अर्दलियों की तरह खड़ी रहने बाली शीला दीक्षित में एकाएक ही इतनी हिम्मत कहां से आ गई कि वे राहुल गांधी को घुमा फिराकर ही सही पप्पू कह बैठीं, यह कोई शोध का विषय नहीं है. यह बड़ी कड़वी हकीकत है कि राहुल-सोनिया गांधी की अनदेखी उनसे बर्दाश्त नहीं हो रही थी जिसके चलते महज ध्यान बटाने के लिए शीला दीक्षित ने एक गैर जरूरी बात कह डाली जिसका न मौसम था, न मौका था और न ही कांग्रेस में दस्तूर है.

बात अब बाजार में आ ही गई है तो तय है बहुत दूर तक जाएगी. मुमकिन है दो-चार और बूढ़े कांग्रेसी अपनी विदाई या सन्यास की स्क्रिप्ट इस तरह लिखना पसंद करें. ये शीला की तरह ही वे लोग होंगे जो हिम्मत हार बैठे हैं और उन्हें समझ आ गया है कि अब कांग्रेस में रहते सत्ता की मलाई पहले की तरह चांदी की कटोरी में रखी नहीं मिलने वाली बल्कि अब खुद मेहनत कर अपनी जमीन और जनाधार बनाना होगा जो इस पकी उम्र और परिपक्वता की स्थिति में इनसे तो होने से रहा.

ये वही शीला दीक्षित हैं जिन्हें जब कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट किया था तब उन्हें इस फैसले में यह अपरिपक्वता नजर नहीं आई थी. जिस नेत्री की हैसियत अपनी खुद की सीट जीतने की न हो वह क्या खाकर यूपी की सत्ता कांग्रेस को दिला पाएगी. वह ब्राह्मण वोट भी उन पर भरोसा नहीं करता जिसके दम पर कांग्रेस और राहुल गांधी यूपी में वापसी नहीं तो बेहतर मुकाम का ख्वाब देखने लगे थे. जल्द ही राहुल ने भूल सुधारी और अखिलेश यादव से हाथ मिला लिया नतीजतन शीला दीक्षित हाशिये पर आ गईं और उन्हें प्रचार की जिम्मेदारी देने काबिल भी नहीं समझा गया.

बात बुरी लगने वाली तो थी क्योंकि हड़बड़ाए मीडिया ने भी शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पेश किए जाने पर अच्छा रेस्पांस दिया था लेकिन चार दिन बाद ही सभी को समझ आ गया था कि कांग्रेस अब कुछ भी कर ले उसका हर दांव उल्टा पड़ेगा. भाजपा, सपा और बसपा के मुकाबले न तो उसके पास जमीनी नेता हैं और न ही मतदाता की दिलचस्पी उसमें रह गई है. सबसे बड़े सूबे में खुद को बनाए और बचाए रखने के लिए उसने एक बेहतर रास्ता, सपा से गठबंधन का चुना जिसका नतीजा भी सामने है कि अब पसीने बसपा और भाजपा दोनों को छूट रहे हैं. सबसे अहम बात मुद्दत से कोई और तो क्या क्या सोशल मीडिया भी राहुल गांधी को पप्पू नहीं कह रहा था. ऐसे में राहुल गांधी अपरिपक्व हैं अभी उन्हें और समय दिया जाना चाहिए जैसी बात ठीक वैसी ही है कि कुनबे का कोई बुजुर्ग बच्चे की तरह पैर पटक कर रोये.

बात अकेले शीला दीक्षित की ही नहीं है. यूपी में एक रणनीति के तहत कांग्रेस ने सभी दिग्गजों को प्रचार से दूर ही रखा है जिसका मकसद राहुल की छवि चमकाना ही है. यह कदम कितना कारगर साबित होगा यह तो 11 मार्च को पता चलेगा लेकिन सवर्ण कांग्रेसी नेताओं को अपना भविष्य खतरे में लग रहा है. इसके साथ ही कांग्रेस को भी समझ आ रहा है कि उसने अपना परंपरागत दलित पिछड़ा वोट बैंक इन्हीं सामंतवादी नेताओं पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करने की वजह से खोया था जो बेपेंदी के लोटे की तरह हमेशा कुर्सी की तरफ लुढ़के थे. राहुल गांधी कोई चमत्कारी नेता नहीं हैं, लेकिन कांग्रेस को वापस लड़ाई में लाने के लिए कुछ अपरिपक्वताएं दिखा रहे हैं तो पप्पू तो कहे ही जाएंगे. वैसे भी पुराने पापियों से छुटकारा पाना एकदम आसान काम है भी नहीं. पूरे देश में कांग्रेस दलित आदिवासियों और पिछड़ों से दूर रहने की सजा किस तरह भुगत रही है यह बात किसी सबूत की मोहताज नहीं.

जब मैच के दौरान ही जडेजा करने लगे डांस

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच चार मैचों की सीरीज का पहला टेस्ट मैच पुणे के महाराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन स्टेडियम पर खेला जा रहा है। मैच के तीसरे दिन ही खेल एक रोमांचक मोड़ पर पहुंच चुका है जहां दोनों ही टीमें काफी अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं. मैच में आगे क्या होगा यह बता पाना बहुत ही मुश्किल है.

टीम इंडिया अपनी पहली पारी में मात्र 105 रनों पर ढ़ेर हो गई लेकिन इन सबसे दूर टीम इंडिया के स्पिन गेंदबाज रविंद्र जडेजा लाइव मैच के दौरान डांस करते नजर आए.

जी हां, सुनकर अजीब लग सकता है लेकिन यह सच है. दरअसल दूसरी पारी में बल्लेबाजी करने आए ऑस्ट्रेलियाई कप्तान स्टिव स्मिथ को जडेजा ने 12वें ओवर के चौथी गेंद पर हैरान रह गए और उन्हें वह गेंद समझ नहीं आई.

जडेजा के इस गेंद पर बीट होने के बाद स्मीथ ने जिस तरह का रिएक्शन दिया था जडेजा ने भी ठीक उसी तरह उसे दोहराया. जडेजा को ऐसा करते देख मैदान पर साथी खिलाड़ी समेत कप्तान स्मिथ भी मुस्कुरा गए.

आप भी देखें जडेजा का यह डांस वीडियो.

जब कंगना ने साधा विशाल भारद्वाज पर निशाना

बचपन से ही विद्रोही स्वभाव की कंगना रनौत बेलगाम बोलती हैं. वह किसी को भी बख्शती नही हैं. कुछ दिनों पहले ही हमने आपको बताया था कि ‘‘वाड़िया मूवी टोन’’ ने विशाल भारद्वाज पर अदालत में आरोप लगाया है कि विशाल भारद्वाज ने अपनी फिल्म ‘‘रंगून’’ में कंगना रनौत के किरदार जूलिया को उनकी फिल्म ‘हंटरवाली’ व हीरोईन नाडिया की नकल पर गढ़कर कॉपीराइट कानून का उल्लंघन किया है.

इस आरोप से खुद को बचाने व फिल्म को तयशुदा समय पर प्रदर्शित करने के मकसद से विशाल भारद्वाज ने सेंसर बोर्ड से फिल्म के पारित होने के बाद ‘रंगून’ से करीबन 40 मिनट के दृश्यों पर कैंची चला दी. इन दृश्यों में ज्यादातर दृश्य कंगना रनौत के किरदार जूलिया के थे. उसके बाद जब विशाल भारद्वाज ने अदालत में अपना पक्ष रखा, तो अदालत ने उन्हें दो करोड़ की बैंक गारंटी देने के बाद ही ‘रंगून’ को 24 फरवरी को प्रदर्शित करने की इजाजत दी.

मगर 24 फरवरी को फिल्म ‘‘रंगून’’ के प्रदर्शित होने पर बॉक्स ऑफिस पर यह फिल्म टें बोल गयी. ‘रंगून’ पूरे भारत में 1800 स्क्रीन्स में प्रदर्शित हुई है. इससे बौखलाकर कंगना रनौत ने अपने तीर विशाल भारद्वाज के खिलाफ छोड़ दिए.

कंगना रनौत ने विशाल भारद्वाज को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा है, ‘‘मेरी सारी आशाओं व उम्मीदों पर तुशारापात हो गया. जब मुझे निर्माता निर्देशक ने बताया कि फिल्म के कुछ दृश्य काटने पड़े हैं, तो मैंने सोचा नहीं था कि जो मेरे पसंदीदा दृश्यों व फिल्म के अंदर मेरे जूलिया के किरदार के ग्राफ को आगे बढ़ाने के लिए अति आवष्यक दृश्यों पर ही कैंची चलाई है. मैं अपने किरदार की तैयारी बहुत ही ज्यादा लीनियर तरीके से करती हूं. पर जब मैंने फिल्म देखी और विशाल सर ने समझाया कि उन्हें दृश्यों पर कैंची क्यों चलानी पड़ी, तो इस फिल्म से मेरी सारी उम्मीदें खत्म हो गयीं.’’

कंगना रनौत आगे कहती हैं कि ‘‘माना कि फिल्म में किस दृश्य को रखना है और किसे को नहीं, यह निर्माता व निर्देशक का विषेशाधिकार है. लेकिन जब मुझे पता चला कि फिल्म में मेरे जो अति उम्दा परफॉर्मेंस वाले दृश्य थे, उन्हीं पर कैंची चला दी गयी, तो मेरी उम्मीदों पर पानी फिर गया. मेरी समझ में आ गया कि अब मेरे काम की तारीफ नहीं होनी है.’’

उधर शाहिद कपूर व सैफ अली खान ने अभी तक फिल्म ‘रंगून’ के दृश्यों को सेंसर होने के बाद विशाल भारद्वाज द्वारा कैंची चलाए जाने पर चुप हैं. इतना ही नहीं कंगना के इस बयान पर विशाल भारद्वाज भी खामोश हैं.

मगर बॉलीवुड में कंगना के इस बयान को फिल्म ‘‘रंगून’’ के बॉक्स आफिस पर असफल होने की स्थिति में भी अपनी कमीज को सफेद बनाए रखने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है.

राबड़ी देवी ने उड़ाई नीतीश की नींद

राबड़ी देवी ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नींद उड़ा दी है. इतना ही नहीं उन्होंने महागठबंधन के अंदर भी खलबली मचा दी है. नीतीश के भाजपा से हाथ मिलाने की अटकलों के बीच राबड़ी ने तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाने की मांग उठा कर राज्य के सियासी हलकों में हलचल सी मच गई है.

राजद का खेमा पिछले कुछ महीने से राबड़ी के दुलारे और बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने की हवा बनाने में लगा हुआ है. इस हवा को राबड़ी देवी ने यह कह कर गरम कर दिया है कि राज्य की जनता तेजस्वी को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहती है. राबड़ी को अपने बेटे में मुख्यमंत्री बनने के सारे गुण भी दिखाई देने लगे है.

राजद के एक बड़े नेता दबी जुबान में कहते हैं कि हर मां अपने बेटे को बड़े से बड़ा पद पर बैठा देखना चाहती है. राबड़ी देवी ने भी अपने बेटे को मुख्यमंत्री बनाने की बात कह कर कोई गुनाह नहीं किया है. इसके साथ ही वह यह भी कहते हैं कि ऐसी बातों को पार्टी पफोरम से बाहर नहीं उठानी चाहिए. अपनी मां के बयान पर तेजस्वी यादव कहते हैं कि हर पार्टी के कार्यकर्ताओं की भावना होती है, उसका नेता उच्च पद पर बैठे. यह कोई नई बात नहीं है.

23 फरवरी को बिहार विधान सभा के सेशन की शुरूआत होने पर राबड़ी देवी विधान सभा पहुंची थीं. उन्होंने पत्राकारों से बातचीत करते हुए कहा कि बिहार की जनता चाहती है कि तेजस्वी बिहार के मुख्यमंत्री बनें. जो जनता चाहती है, वह होना ही चाहिए. लोकतंत्रा में जनता मालिक होती है. जनता ने अपनी इच्छा जाहिर कर दी है.

जब उनसे पूछा गया कि क्या नीतीश कुमार मुख्यमंत्री के तौर पर सही तरीके से काम नहीं कर रहे हैं? क्या महागठबंधन के नेता को बदलने की बात चल रही है? इन सवालों से घबरा कर राबड़ी ने सफाई दी कि नीतीश महागठबंधन के नेता हैं और पूरी अवधि तक मुख्यमंत्री बने रहेंगे.

पिछले महीने राजद नेताओं की बैठक में पहली बार लालू यादव के सामने तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाने की मांग उठाई गई थी. लालू ने अपने नेताओं को यह समझाते हुए शांत किया था कि तेजस्वी भविष्य के मुख्यमंत्री हैं. विधान सभा में राबड़ी ने तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाने की वकालत करने के कुछ ही घंटे के बाद राजद विधयकों की बैठक में भी तेजस्वी के मुख्यमंत्री बनाने को लेकर नारे लगाए गए. विधयकों की मांग और नारों को देख-सुन कर लालू मंद-मंद मुस्कुराते रहे.

तेजस्वी के मुख्यमंत्री बनाने संबंधी राबड़ी की मांग पर जदयू का कहना है कि लोकतंत्रा में अपनी बात कहने की पूरी आजादी है. कोई कुछ भी कह सकता है. जदयू नेता श्याम रजक कहते हैं कि कोई कुछ भी कहे पर नीतीश महागठबंधन के नेता हैं और आगे भी रहेंगे.

राबड़ी के बयान से पैदा हुए सियासी हलचल के बीच भाजपा को महागठबंधन को घेरने का मौका मिल गया है. विधान सभा में विरोधी दल के नेता प्रेम कुमार चुटकी लेते हुए कहते हैं कि राबड़ी देवी के बयानों से साबित हो गया है कि राजद को अब नीतीश कुमार के नेतृत्व में भरोसा नहीं रह गया है. इसी वजह से तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनाने की मांग उठने लगी है. 

लॉन्च हुई KTM DUKE की नयी बाईक, ये है खासियत

ऑस्ट्रियाई मोटरसाइकिल निर्माता इंडस्ट्रीज KTM ने बजाज ऑटो कंपनी के साथ मिलकर भारत में नयी Duke 200 लॉन्च की है. भारतीय बाजार में आज ड्यूक श्रृंखला के दो नये बाईक Duke 390 और 200 उतारे गए हैं. ड्यूक 200 की दिल्ली एक्स शोरूम कीमत 1.43 लाख रुपये है, वहीं ड्यूक 390 की कीमत 2.50 लाख रुपये है. रिपोर्ट्स के मुताबिक कंपनी ने पुरानी KTM Duke 200 को बंद कर दिया है. ये नयी स्पोर्ट्स बाईक्स KTM Duke 200 का नया एडिशन हैं. इन नई बाइक्स की बुकिंग आज से शुरू कर दी गई है. भारत में इनकी डिलिवरी मार्च से शुरू हो जाएगी.

इनकी डिजाइन की बात करें तो, लुक्स के मामले में ये बिल्कुल अपने पुराने वर्जन जैसी ही दिखती हैं. पर बाईक में कुछ खास बदलाव जरूर हुए हैं, जिसमें सबसे खास इसमें शामिल किया गया नया डेकल है. ड्यूक 390 की सबसे खास बात, इसकी मोबाइल से कनेक्टिविटी है. आपके स्मार्टफोन को बाइक से कनेक्ट किया जा सकता है और आपके फोन पर आने वाली कॉल्स और ऑडियो प्लेयर को इससे पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है और इनकी जानकारी आपके डिस्प्ले पर प्रदर्शित हो जाएगी.

इसके अलावा Duke 200 में 199.5 cc का लिक्विड एण्ड कूल्ड सिंगल सिलिंडर पेट्रोल इंजन लगा हुआ है. बाईक का यह इंजन 25 हॉर्स पावर और 19Nm पावर का टॉर्क देता है. नयी ड्यूक 200 में छह स्पीड गियरबॉक्स दिए गए हैं और साथ ही वेड मल्टि डिस्क टच भी बाईक की खासियत है.

लॉन्च हुई नयी बाईक्स में एक दम नयी एलईडी हेडलाइट के साथ-साथ, नया डिजिटल कलस्टर भी दिया गया है. इनके अलावा बाईक में दोनों ही व्हील्स में डिस्क ब्रेक लगे हुए हैं और इसमें मोनोशॉक बैक भी है.

इस नयी बाइक ड्यूक 200 का व्हीलबेस 1367mm का है जबकि इसकी लंबाई 2050 mm है. मतलब अगर हम बाइक की डायमेंशन्स की बात करें तो यह बाइक 730mm चौड़ी है और इसकी हाइट 810mm है.  बाईक की ग्राउंड क्लियरेंस लगभग 178mm की है. खबरों के अनुसार कंपनी का दावा है कि यह नयी बाईक 35 किलोमीटर प्रति लीटर का माइलेज देगी.

यह ऐप बताएगा दोस्तों और बच्चों की सही लोकेशन

एक ऐसा ऐप जो आपके दोस्तों और आपके परिवार के सदस्यों के बारे में बिना फोन करे ही आपको उनकी सारी जानकारी दे देगा. गूगल प्ले स्टोर में एक ऐसा ऐप है जिससे आप यह तक पता कर सकते हैं कि आपके दोस्त और आपके परिवार के सदस्य कहां है.

फैमिली लोकेटर-जीपीएस ट्रैकर ऐप हर वक्त आपको अपने परिजनों और दोस्तों से जोड़े रखता है. यह ऐप जो आपके दोस्तों के बारे में बिना फोन करे ही आपको उसके बारे में सारी जानकारी दे देगा. आपके परिजन या दोस्त किसी मुसीबत में हैं तो आप उन्हें फोन करके उनकी लोकेशन जान लेते हैं ताकि जल्दी से जल्दी आप उनके पास पहुंच सकें लेकिन इस ऐप से बिना फोन करे ही आप उनकी लोकेशन तक आसानी से पहुंच सकते हैं.

आपके फोन कॉन्टैक्ट में मौजूद सभी लोग आपकी लोकेशन नहीं देख सकते हैं. इस ऐप को डाउनलोड करने के बाद एक ग्रुप बनाना होता है जिसे सर्कल नाम दिया गया है. इस ऐप में जितने चाहें उतने सर्कल बनाए जा सकते हैं. सर्कल में मौजूद हर एक सदस्य एक दूसरे की लोकेशन देख सकता है. सर्कल में यूजर को शामिल करने की कोई सीमा नहीं है.

जरूरत पड़ने पर सर्कल छोड़ भी सकते हैं. हर एक दोस्त की लोकेशन पर उनकी फोटो दिखती है जो बड़ी दिलचस्प होती है. इसमें चैटिंग का भी विकल्प है. इस ऐप को गूगल प्ले स्टोर पर 4.4 रेटिंग दी गई है.

रंगून : मनोरंजन की बजाय उबाऊ

दुखांत फिल्में बनाने वाले फिल्मकार के रूप में पहचान रखने वाले विशाल भारद्वाज इस बार भी अपनी फिल्म ‘‘रंगून’’ में वही सब लेकर आना चाहते थे, लेकिन इस बार विशाल भारद्वाज बुरी तरह से मात खा गए हैं. ये फिल्म तो जैसे खत्म होते होते मनोरंजन देने की बजाय थका देती है.

फिल्म की कहानी 1943 की पृष्ठभूमि पर आधारित है. भारत में मौजूद ब्रिटिश सैनिक हिटलर से लड़ाई लड़ रहे हैं और उधर सुभाषचंद्र बोस सिंगापुर में ‘आजाद हिंद फौज’ गठित कर ब्रिटिश सेना से युद्ध कर अंग्रेजों को भारत से भगाकर देश को आजाद कराना चाहते हैं. ब्रिटिश सेना में ही कार्यरत सैनिक जमादार नबाब मलिक (शाहिद कपूर) कुछ सैनिकों को मारकर और जापान की जेल से भागकर भारत पहुंचता है और अपने ब्रिटिश सेना के मुखिया जनरल डेविड हार्डिंग्स (ब्रिटिश अभिनेता रिचर्ड मैकबे) से कहता है कि उसने आजाद हिंद फौज के 27 सैनिकों को मार गिराया है.

उधर फिल्मकार रूसी बिलमोरिया (सैफ अली खान) जूलिया (कंगना रानौट) को लेकर एक्शन फिल्म बना रहे हैं. रूसी ने अनाथ जूलिया को हजार रूपए में खरीदा और फिल्म बनाते-बनाते रूसी को जूलिया से प्यार हो जाता है. उधर जूलिया के साथ रूसी की हर फिल्म सुपर हिट हो रही है. फिल्म की एक पार्टी में ब्रिटिश सेना के डेविड के अलावा भारत के एक राजा अपनी तीन पत्नियों के साथ पहुंचते हैं. जहां वह राजा एक तलवार दिखाते हुए डेविड से पूछता है कि यह तलवार उन्हें उपहार में दी जाए या वह इसे छीनकर लेना चाहेंगे. राजा कहता है कि यह तलवार आजाद हिंद फौज को जीतने के लिए बारूद व हथियार दिला सकती है. डेविड छीनने की बात कहकर राजा को तलवार वापस दे देता है. अब डेविड, रूसी के सामने प्रस्ताव रखता है कि वह जूलिया के साथ बर्मा में उनके सैनिकों के मनोरंजन के लिए कार्यक्रम करे. रूसी तैयार हो जाते हैं. राजा व जमादार नबाब मलिक मिलकर योजना बनाते हैं. जूलिया के मेकअप मैन व स्पॉट ब्वॉय जूफी से मिलकर जूलिया के बक्से में तलवार रखवा देते हैं, जिससे वह तलवार आजाद हिंद फौज तक पहुंच जाए.

जब सभी लोग बर्मा जाने के लिए मुंबई से ट्रेन में सवार होते हैं, पर ऐन वक्त पर रुसी को रूकना पड़ता है. उधर रेलवे ट्रैक दुर्घटनाग्रस्त हो जाने से बर्मा के पास ट्रेन रूक जाती है. सभी नदी से बर्मा पहुंचने का प्रयास करते हैं, तभी आजाद हिंद फौज के सैनिक हमला कर देते हैं. इसमें जूफी गायब हो जाता है. जूलिया व नबाब मलिक एक साथ होते हैं, बाकी लोग निकल जाते हैं.

अपने रास्ते पर आगे बढ़ते हुए जंगल के रास्तें कीचड़ में गुत्था गुथ्थी करते करते जूलिया व नबाब मलिक में प्यार हो जाता है. पर अंत में डेविड अपने सैनिकों के साथ जूलिया व नबाब को ढूंढ़ लेते हैं. अब रूसी भी पहुंच जाते हैं. कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. अंततः रुसी, नबाब मलिक के खून के प्यासे हो जाते हैं. डेविड को शक हो जाता है कि उनकी सेना में आजाद हिंद फौज के कुछ जासूस हैं. वह जांच शुरू कर देता है. पर अंत में नबाब मलिक व जूलिया मारे जाते हैं. रूसी ही आजाद हिंद फौज तक उस तलवार को पहुंचाते हैं.

फिल्म ‘रंगून’ शुरू होने के चंद मिनटों के बाद ही इतिहास से हटकर त्रिकोणीय प्रेम कहानी में बदल जाती है. इंटरवल के बाद अचानक देशभक्ति का तड़का जोड़ दिया जाता है, पर फिल्म देखते समय ये अहसास होता है कि मखमल के पर्दे पर जगह जगह पैबंद लगे हुए हैं. विशाल भारद्वाज का मकसद द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि में एक प्रेम कहानी के साथ देशभक्ति की भावना को पर्दे पर उकेरना था, पर वह अपने इस मकसद में बुरी तरह से मात खा गए. शायद विशाल भारद्वाज स्वयं ये भूल गए कि वह फिल्म को कहां से कहां ले जाना चाहते हैं. पूरी फिल्म मैलोड्रैमैटिक लगती है. फिल्म में संजीदगी का घोर अभाव है. फिल्म में ब्रिटिश सेना के अफसर को जोकर बनाकर पेश किया गया है, जो कि किसी अजूबे जैसा लगता है.  

सैफ अली, कंगना रानौट व शाहिद कपूर की मौजूदगी और अरुणाचल प्रदेश जैसी खूबसूरत व अच्छी लोकेशन के बावजूद भी विशाल भारद्वाज, अपनी फिल्म में इतिहास को ठीक से उकेर पाने में असफल रहे. इतिहास को सही ढंग से उकेरने के लिए जिन चीजों और आस पास के माहौल की जरुरत होती है, उसे भी गढ़ने में विशाल विफल रहे. कीचड़ व मिट्टी में सने प्यार करते, कंगना रानौट व शाहिद कपूर दोनों की पोशाक पर मेहनत की गयी है, पर इसके बाद भी दोनों किरदार अच्छे से नहीं उभर पाते.

स्टंट क्वीन नाडिया की नकल पर रचे गए जूलिया के किरदार में कंगना रानौट कुछ जगहों पर ध्यान खिंचती हैं. चलती ट्रेन की छत पर भागने के अलावा उनसे कुछ स्टंट सीन अच्छे बन पड़े हैं. कंगना रानौट ने अपनी तरफ से काफी मेहनत की है, मगर कमजोर पटकथा के चलते वह दर्शकों के दिल में अपनी जगह नही बना पांई. इसी तरह सैफ अली खान इस फिल्म में एक्शन प्रधान फिल्म निर्माता, रूसी के रूप में बेहतर जमे हैं. कई जगह उनके किरदार में भी दुविधा नजर आती है, पर यह भी एक कमजोर पटकथा की ही निशानी है. शाहिद कपूर भी अपेक्षाओं पर कुछ खास खरे नही उतरे हैं. 

जहां फिल्म के गीत-संगीत का सवाल है, तो वे सारे अच्छे है. फिल्म के कुछ संवाद बेहतरीन बने हैं, मगर कहीं-कहीं कहानी में सही पटकथा का अभाव खलता है. फिल्म के कैमरामैन पंकज कुमार ने बेहतरीन काम किया है, बस इस बार फिल्म में नाटकीयता पिरोने में विशाल भारद्वाज बुरी तरह से असफल रहे हैं. यदि आप ‘मकबूल’, ‘ओमकारा’, ‘हैदर’ वाले विशाल भारद्वाज को ‘रंगून’ में तलाशेंगे, तो आपको घोर निराशा मिलेगी.

विशाल भारद्वाज, आशीष पॉल व वॉयकाम 18 निर्मित फिल्म ‘‘रंगून’’ की पूरी टीम मे फिल्म के निर्देशक व संगीतकार विशाल भारद्वाज, लेखक विशाल भारद्वाज, मैथ्यू रॉबिन्स व सब्रीना धवन, कैमरामेन पंकज कुमार तथा कलाकारों हैं कंगना रानौट,सैफ अली, शाहिद कपूर, रिचर्ड मैकबे व अन्य.

मोना डार्लिंग : समय व पैसे की बर्बादी

कहानी एक कॉलेज कैंपस के इर्द गिर्द घूमती है, जहां मोना के साथ पढ़ रहे चार लड़कों की रहस्यमय तरीके से मौत हो जाती है. जबकि मोना (सुजाना मुखर्जी) गायब है. पुलिस इसकी जांच पड़ताल शुरू कर देती है. उधर मोना की दोस्त सारा (दिव्या मेनन) अपने एक अन्य दोस्त व कंप्यूटर में माहिर विक्की (अंशुमन झा) की मदद से मोना की तलाश शुरू करती है. सारा को कहीं से कोई जवाब नहीं मिल रहा. तब सारा कॉलेज के डीन (संजय सूरी) के पास जाती है, जहां पहले से ही पुलिस इंस्पेक्टर कमल मौजूद हैं. वह डीन से कहती है कि, ‘मोना गायब है. उसका पता नहीं चल रहा हैं.’  इस पर डीन उसे जवाब देता है कि, ‘तुम जाओ, हम देख लेंगे.’ डीन के पास से सारा निराश होकर लौट आती है. तब कंप्यूटर का मास्टर विक्की उसकी मदद के लिए तैयार होता है. विक्की व सारा रात के अंधेरे में उस जगह पर जाते हैं, जहां उन चारों विद्यार्थियों की लाश मिली थी. वहां उन्हें कालेज के ट्रस्टी के बेटे समीर की लाश मिलती है और उन्हें एहसास होता है कि वहां पर कोई आया है, तो वह दोनों वहां से डर कर भागते हैं.

दूसरे दिन सारा, विक्की को बताती है कि मोना तो समीर से प्यार करती थी. लेकिन एक दिन प्यार करते हुए समीर उसका वीडियो बना लेता है, इसका पता चलने पर मोना ने समीर के मुंह पर चांटा जड़कर समीर से रिश्ता खत्म कर दिया था. समीर ने गुस्से में मोना को बदनाम करने के लिए उस वीडियो को फेसबुक पर डाल दिया. तब विक्की उस फेसबुक पेज को तलाशता है, तथा यह सच सामने आता है कि जिसने भी मोना के इस पेज से भेजी गयी फ्रेंडशिप को स्वीकार किया, वह मारा गया. सारा व विक्की यह बात पुलिस इंस्पेक्टर कमल और डीन को बताते हैं. डीन इस आईडी को बंद करने के लिए कहते हैं. लेकिन मोना का अब तक कोई पता नहीं है.

एक दिन सारा को मोना की लाश मिल जाती है और उसे लगता है कि उसने आत्महत्या कर ली है. मगर इसी बीच विक्की के हाथ एक सबूत लगता है, जिससे जाहिर होता है कि मोना की हत्या की गयी है. तब वह यह सच बताने के लिए सारा के पास जाता है. वह सारा को डीन सर के पास जाने को कहता है और खुद लायब्रेरी जाता है. सारा डीन के घर का दरवाजा खटखटाती है. डीन उसे घर के अंदर बैठाते हैं. उधर विक्की कंप्यूटर पर कुछ ढूंढ़ रहा है. जबकि सारा की नजर डीन के घर के अंदर टंगी एक पेटिंग पर पड़ती है. और उसे कुछ याद आता है. वह ऊपर कमरे की तरफ बढ़ना चाहती है.

तभी डीन आकर उसे बताते हैं कि एक दिन मोना भी उनके घर की चाभी चुराकर यहां आई थी और उनके गुप्त रूम का ताला खोलकर अंदर गई थी. तब उसे एक रूम में डीन की पत्नी एक स्ट्रेचर पर मिली थी, जिसकी मौत पांच वर्ष पहले हो चुकी थी. पर डीन ने प्यार के कारण उसकी लाश को रखा हुआ है क्योंकि डीन का दावा है कि वह अपने प्यार की ताकत के बल पर एक न एक दिन अपनी पत्नी को जिंदा कर देगा. डीन की पत्नी की लाश देखकर मोना भागना चाहती है, पर उसी वक्त वहां डीन आ जाता है. अब डीन उसे पकड़कर एक प्रयोग शुरू करता है. लेकिन प्रयोग सफल नहीं हो पाता है और मोना की मौत हो जाती है. पर उसी प्रयोग की वजह से मोना की आईडी में कुछ गड़बड़ी हो जाती है.

तब सारा अपनी जान बचाने के लिए डीन सर के उपर एक लोहे का सामान उठाकर मारती है और डीन बेहोश हो जाते हैं. सारा, विक्की को फोन लगाती है, पर उस वक्त विक्की अपने फोन से दूर होता है, इसलिए उसे पता नहीं चलता. सारा डीन के हाथ पैर बांधकर पुलिस को फोन करती है. पुलिस अफसर को वह सारी कहानी बताती है. पर वह पुलिस इंस्पेक्टर कमल भी डीन से मिला हुआ होता है. इसलिए वह पुलिस इंस्पेक्टर, सारा को ही बेहोश कर देता है और डीन के बंधन खोलकर सारा को लेकर उसी रूम में जाते हैं और सारा को उसी स्ट्रेचर पर लिटाते हैं, जिस पर मोना को लिटाकर असफल प्रयोग किया था.

इधर कंप्यूटर पर खोज कर रहे विक्की को मोना पर डीन के प्रयोग करने का वीडियो मिलता है. अब उसे समझ में आ जाता है कि सारा की जिंदगी खतरे में है. वह तुरंत डीन के घर जाता है. पुलिस इंस्पेक्टर कमल, विक्की पर गोली चलाता है. विक्की गिरता है. पर विक्की, मोना की फेसबुक आईडी पर फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजने में सफल हो जाता है. कमरे की लाइट जलने व बुझने लगती है. कंप्यूटर में से एक रोशनी निकलती है, जो कि मोना की आत्मा है, वह पुलिस इंस्पेक्टर कमल और डीन को मारकर गायब हो जाती है. सायरा को होश आता है. विक्की भी बच जाता है. सब कुछ सामान्य हो जाता है.

फिल्म ‘‘मोना डार्लिंग’’ की कहानी में कुछ भी नयापन नहीं है. बल्कि यह फिल्म 2002 की अमरीकन सुपरनेचुरल पॉवर वाली फिल्म ‘‘रिंग’’, 1998 की जापानी सायकोलॉजिकल फिल्म ‘‘रिंग’’,‘वॉर्नर ब्रदर्स’ की फिल्म ‘‘फ्रेंड्स रिक्वेस्ट’’ को मिलाकर बनायी गयी चूंचूं का मुरब्बा है. मजेदार बात यह है कि हाल ही में अमरीका में एक बार फिर ‘रिंग’ का रीमेक किया गया है, जो कि बहुत जल्द प्रदर्शित होने वाली है.

फिल्म बहुत धीमी गति से आगे बढ़ती है. फिल्म के एडीटर ने भी फिल्म को तहस-नहस किया है. फिल्म के अंदर एक ही गाना है. बीच पर फिल्माया गया यह रोमांटिक गाना बहुत ही घटिया है और फिल्म के साथ कहीं भी फिट नहीं बैठता. गाने के बोल व संगीत बहुत घटिया हैं. फिल्म की पटकथा में गड़बड़ी है. हत्यारे के बारे में बीस मिनट बाद ही एहसास हो जाता है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो अंशुमन झा, सुजाना मुखर्जी और दिव्या मेनन ने ठीक ठाक अभिनय किया है. मगर संजय सूरी ने यह फिल्म क्यों की, यह बात समझ से परे हैं. 1 घंटा 59 मिनट की अवधि की फिल्म ‘‘मोना डार्लिंग” का निर्माण ‘‘फस्ट रे फिल्मस’’ और ‘‘अल्ट जे फिल्मस’’ के बैनर तले निखिल चैधरी, कैलाश के, पंकज गारडी, हितेश गारीडी ने किया है. लेखक व निर्देशक शशी सुदिगल, गीतकार समीर सतीजा, संगीतकार मनीष जे टीपु, कास्ट्सूम तानिया ओयक, नृत्य निर्देशक जयेश प्रधान, कला निर्देशक दीपांकर मोंडल, कैमरामैन सपन नरूला, एडीटर आसिफ पठान, पार्श्व संगीत सुदीप स्वरुप, नृत्य निर्देशक जयेश प्रधान तथा कलाकार हैं- सुजाना मुखर्जी, अमिष्का सूद, आशीष चैधरी, यश योगी, योगेश भट्ट, सूर्यवीर यादव, हर्ष नागर, सुशांत वशिष्ठ, दिव्या मेनन, ध्रुव हाइना लोहुमी, आचार्य अजय वर्मा, सचिन कथूरिया, नरेश मोसेन, संदीप बासु, बिमलेंदू जेना, संजय सूरी, अंशुमान झा, मुकेश भट्ट, तारा खान, प्रशांत सिंह व अन्य.

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