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रंगून : मनोरंजन की बजाय उबाऊ

दुखांत फिल्में बनाने वाले फिल्मकार के रूप में पहचान रखने वाले विशाल भारद्वाज इस बार भी अपनी फिल्म ‘‘रंगून’’ में वही सब लेकर आना चाहते थे, लेकिन इस बार विशाल भारद्वाज बुरी तरह से मात खा गए हैं. ये फिल्म तो जैसे खत्म होते होते मनोरंजन देने की बजाय थका देती है.

फिल्म की कहानी 1943 की पृष्ठभूमि पर आधारित है. भारत में मौजूद ब्रिटिश सैनिक हिटलर से लड़ाई लड़ रहे हैं और उधर सुभाषचंद्र बोस सिंगापुर में ‘आजाद हिंद फौज’ गठित कर ब्रिटिश सेना से युद्ध कर अंग्रेजों को भारत से भगाकर देश को आजाद कराना चाहते हैं. ब्रिटिश सेना में ही कार्यरत सैनिक जमादार नबाब मलिक (शाहिद कपूर) कुछ सैनिकों को मारकर और जापान की जेल से भागकर भारत पहुंचता है और अपने ब्रिटिश सेना के मुखिया जनरल डेविड हार्डिंग्स (ब्रिटिश अभिनेता रिचर्ड मैकबे) से कहता है कि उसने आजाद हिंद फौज के 27 सैनिकों को मार गिराया है.

उधर फिल्मकार रूसी बिलमोरिया (सैफ अली खान) जूलिया (कंगना रानौट) को लेकर एक्शन फिल्म बना रहे हैं. रूसी ने अनाथ जूलिया को हजार रूपए में खरीदा और फिल्म बनाते-बनाते रूसी को जूलिया से प्यार हो जाता है. उधर जूलिया के साथ रूसी की हर फिल्म सुपर हिट हो रही है. फिल्म की एक पार्टी में ब्रिटिश सेना के डेविड के अलावा भारत के एक राजा अपनी तीन पत्नियों के साथ पहुंचते हैं. जहां वह राजा एक तलवार दिखाते हुए डेविड से पूछता है कि यह तलवार उन्हें उपहार में दी जाए या वह इसे छीनकर लेना चाहेंगे. राजा कहता है कि यह तलवार आजाद हिंद फौज को जीतने के लिए बारूद व हथियार दिला सकती है. डेविड छीनने की बात कहकर राजा को तलवार वापस दे देता है. अब डेविड, रूसी के सामने प्रस्ताव रखता है कि वह जूलिया के साथ बर्मा में उनके सैनिकों के मनोरंजन के लिए कार्यक्रम करे. रूसी तैयार हो जाते हैं. राजा व जमादार नबाब मलिक मिलकर योजना बनाते हैं. जूलिया के मेकअप मैन व स्पॉट ब्वॉय जूफी से मिलकर जूलिया के बक्से में तलवार रखवा देते हैं, जिससे वह तलवार आजाद हिंद फौज तक पहुंच जाए.

जब सभी लोग बर्मा जाने के लिए मुंबई से ट्रेन में सवार होते हैं, पर ऐन वक्त पर रुसी को रूकना पड़ता है. उधर रेलवे ट्रैक दुर्घटनाग्रस्त हो जाने से बर्मा के पास ट्रेन रूक जाती है. सभी नदी से बर्मा पहुंचने का प्रयास करते हैं, तभी आजाद हिंद फौज के सैनिक हमला कर देते हैं. इसमें जूफी गायब हो जाता है. जूलिया व नबाब मलिक एक साथ होते हैं, बाकी लोग निकल जाते हैं.

अपने रास्ते पर आगे बढ़ते हुए जंगल के रास्तें कीचड़ में गुत्था गुथ्थी करते करते जूलिया व नबाब मलिक में प्यार हो जाता है. पर अंत में डेविड अपने सैनिकों के साथ जूलिया व नबाब को ढूंढ़ लेते हैं. अब रूसी भी पहुंच जाते हैं. कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. अंततः रुसी, नबाब मलिक के खून के प्यासे हो जाते हैं. डेविड को शक हो जाता है कि उनकी सेना में आजाद हिंद फौज के कुछ जासूस हैं. वह जांच शुरू कर देता है. पर अंत में नबाब मलिक व जूलिया मारे जाते हैं. रूसी ही आजाद हिंद फौज तक उस तलवार को पहुंचाते हैं.

फिल्म ‘रंगून’ शुरू होने के चंद मिनटों के बाद ही इतिहास से हटकर त्रिकोणीय प्रेम कहानी में बदल जाती है. इंटरवल के बाद अचानक देशभक्ति का तड़का जोड़ दिया जाता है, पर फिल्म देखते समय ये अहसास होता है कि मखमल के पर्दे पर जगह जगह पैबंद लगे हुए हैं. विशाल भारद्वाज का मकसद द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि में एक प्रेम कहानी के साथ देशभक्ति की भावना को पर्दे पर उकेरना था, पर वह अपने इस मकसद में बुरी तरह से मात खा गए. शायद विशाल भारद्वाज स्वयं ये भूल गए कि वह फिल्म को कहां से कहां ले जाना चाहते हैं. पूरी फिल्म मैलोड्रैमैटिक लगती है. फिल्म में संजीदगी का घोर अभाव है. फिल्म में ब्रिटिश सेना के अफसर को जोकर बनाकर पेश किया गया है, जो कि किसी अजूबे जैसा लगता है.  

सैफ अली, कंगना रानौट व शाहिद कपूर की मौजूदगी और अरुणाचल प्रदेश जैसी खूबसूरत व अच्छी लोकेशन के बावजूद भी विशाल भारद्वाज, अपनी फिल्म में इतिहास को ठीक से उकेर पाने में असफल रहे. इतिहास को सही ढंग से उकेरने के लिए जिन चीजों और आस पास के माहौल की जरुरत होती है, उसे भी गढ़ने में विशाल विफल रहे. कीचड़ व मिट्टी में सने प्यार करते, कंगना रानौट व शाहिद कपूर दोनों की पोशाक पर मेहनत की गयी है, पर इसके बाद भी दोनों किरदार अच्छे से नहीं उभर पाते.

स्टंट क्वीन नाडिया की नकल पर रचे गए जूलिया के किरदार में कंगना रानौट कुछ जगहों पर ध्यान खिंचती हैं. चलती ट्रेन की छत पर भागने के अलावा उनसे कुछ स्टंट सीन अच्छे बन पड़े हैं. कंगना रानौट ने अपनी तरफ से काफी मेहनत की है, मगर कमजोर पटकथा के चलते वह दर्शकों के दिल में अपनी जगह नही बना पांई. इसी तरह सैफ अली खान इस फिल्म में एक्शन प्रधान फिल्म निर्माता, रूसी के रूप में बेहतर जमे हैं. कई जगह उनके किरदार में भी दुविधा नजर आती है, पर यह भी एक कमजोर पटकथा की ही निशानी है. शाहिद कपूर भी अपेक्षाओं पर कुछ खास खरे नही उतरे हैं. 

जहां फिल्म के गीत-संगीत का सवाल है, तो वे सारे अच्छे है. फिल्म के कुछ संवाद बेहतरीन बने हैं, मगर कहीं-कहीं कहानी में सही पटकथा का अभाव खलता है. फिल्म के कैमरामैन पंकज कुमार ने बेहतरीन काम किया है, बस इस बार फिल्म में नाटकीयता पिरोने में विशाल भारद्वाज बुरी तरह से असफल रहे हैं. यदि आप ‘मकबूल’, ‘ओमकारा’, ‘हैदर’ वाले विशाल भारद्वाज को ‘रंगून’ में तलाशेंगे, तो आपको घोर निराशा मिलेगी.

विशाल भारद्वाज, आशीष पॉल व वॉयकाम 18 निर्मित फिल्म ‘‘रंगून’’ की पूरी टीम मे फिल्म के निर्देशक व संगीतकार विशाल भारद्वाज, लेखक विशाल भारद्वाज, मैथ्यू रॉबिन्स व सब्रीना धवन, कैमरामेन पंकज कुमार तथा कलाकारों हैं कंगना रानौट,सैफ अली, शाहिद कपूर, रिचर्ड मैकबे व अन्य.

मोना डार्लिंग : समय व पैसे की बर्बादी

कहानी एक कॉलेज कैंपस के इर्द गिर्द घूमती है, जहां मोना के साथ पढ़ रहे चार लड़कों की रहस्यमय तरीके से मौत हो जाती है. जबकि मोना (सुजाना मुखर्जी) गायब है. पुलिस इसकी जांच पड़ताल शुरू कर देती है. उधर मोना की दोस्त सारा (दिव्या मेनन) अपने एक अन्य दोस्त व कंप्यूटर में माहिर विक्की (अंशुमन झा) की मदद से मोना की तलाश शुरू करती है. सारा को कहीं से कोई जवाब नहीं मिल रहा. तब सारा कॉलेज के डीन (संजय सूरी) के पास जाती है, जहां पहले से ही पुलिस इंस्पेक्टर कमल मौजूद हैं. वह डीन से कहती है कि, ‘मोना गायब है. उसका पता नहीं चल रहा हैं.’  इस पर डीन उसे जवाब देता है कि, ‘तुम जाओ, हम देख लेंगे.’ डीन के पास से सारा निराश होकर लौट आती है. तब कंप्यूटर का मास्टर विक्की उसकी मदद के लिए तैयार होता है. विक्की व सारा रात के अंधेरे में उस जगह पर जाते हैं, जहां उन चारों विद्यार्थियों की लाश मिली थी. वहां उन्हें कालेज के ट्रस्टी के बेटे समीर की लाश मिलती है और उन्हें एहसास होता है कि वहां पर कोई आया है, तो वह दोनों वहां से डर कर भागते हैं.

दूसरे दिन सारा, विक्की को बताती है कि मोना तो समीर से प्यार करती थी. लेकिन एक दिन प्यार करते हुए समीर उसका वीडियो बना लेता है, इसका पता चलने पर मोना ने समीर के मुंह पर चांटा जड़कर समीर से रिश्ता खत्म कर दिया था. समीर ने गुस्से में मोना को बदनाम करने के लिए उस वीडियो को फेसबुक पर डाल दिया. तब विक्की उस फेसबुक पेज को तलाशता है, तथा यह सच सामने आता है कि जिसने भी मोना के इस पेज से भेजी गयी फ्रेंडशिप को स्वीकार किया, वह मारा गया. सारा व विक्की यह बात पुलिस इंस्पेक्टर कमल और डीन को बताते हैं. डीन इस आईडी को बंद करने के लिए कहते हैं. लेकिन मोना का अब तक कोई पता नहीं है.

एक दिन सारा को मोना की लाश मिल जाती है और उसे लगता है कि उसने आत्महत्या कर ली है. मगर इसी बीच विक्की के हाथ एक सबूत लगता है, जिससे जाहिर होता है कि मोना की हत्या की गयी है. तब वह यह सच बताने के लिए सारा के पास जाता है. वह सारा को डीन सर के पास जाने को कहता है और खुद लायब्रेरी जाता है. सारा डीन के घर का दरवाजा खटखटाती है. डीन उसे घर के अंदर बैठाते हैं. उधर विक्की कंप्यूटर पर कुछ ढूंढ़ रहा है. जबकि सारा की नजर डीन के घर के अंदर टंगी एक पेटिंग पर पड़ती है. और उसे कुछ याद आता है. वह ऊपर कमरे की तरफ बढ़ना चाहती है.

तभी डीन आकर उसे बताते हैं कि एक दिन मोना भी उनके घर की चाभी चुराकर यहां आई थी और उनके गुप्त रूम का ताला खोलकर अंदर गई थी. तब उसे एक रूम में डीन की पत्नी एक स्ट्रेचर पर मिली थी, जिसकी मौत पांच वर्ष पहले हो चुकी थी. पर डीन ने प्यार के कारण उसकी लाश को रखा हुआ है क्योंकि डीन का दावा है कि वह अपने प्यार की ताकत के बल पर एक न एक दिन अपनी पत्नी को जिंदा कर देगा. डीन की पत्नी की लाश देखकर मोना भागना चाहती है, पर उसी वक्त वहां डीन आ जाता है. अब डीन उसे पकड़कर एक प्रयोग शुरू करता है. लेकिन प्रयोग सफल नहीं हो पाता है और मोना की मौत हो जाती है. पर उसी प्रयोग की वजह से मोना की आईडी में कुछ गड़बड़ी हो जाती है.

तब सारा अपनी जान बचाने के लिए डीन सर के उपर एक लोहे का सामान उठाकर मारती है और डीन बेहोश हो जाते हैं. सारा, विक्की को फोन लगाती है, पर उस वक्त विक्की अपने फोन से दूर होता है, इसलिए उसे पता नहीं चलता. सारा डीन के हाथ पैर बांधकर पुलिस को फोन करती है. पुलिस अफसर को वह सारी कहानी बताती है. पर वह पुलिस इंस्पेक्टर कमल भी डीन से मिला हुआ होता है. इसलिए वह पुलिस इंस्पेक्टर, सारा को ही बेहोश कर देता है और डीन के बंधन खोलकर सारा को लेकर उसी रूम में जाते हैं और सारा को उसी स्ट्रेचर पर लिटाते हैं, जिस पर मोना को लिटाकर असफल प्रयोग किया था.

इधर कंप्यूटर पर खोज कर रहे विक्की को मोना पर डीन के प्रयोग करने का वीडियो मिलता है. अब उसे समझ में आ जाता है कि सारा की जिंदगी खतरे में है. वह तुरंत डीन के घर जाता है. पुलिस इंस्पेक्टर कमल, विक्की पर गोली चलाता है. विक्की गिरता है. पर विक्की, मोना की फेसबुक आईडी पर फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजने में सफल हो जाता है. कमरे की लाइट जलने व बुझने लगती है. कंप्यूटर में से एक रोशनी निकलती है, जो कि मोना की आत्मा है, वह पुलिस इंस्पेक्टर कमल और डीन को मारकर गायब हो जाती है. सायरा को होश आता है. विक्की भी बच जाता है. सब कुछ सामान्य हो जाता है.

फिल्म ‘‘मोना डार्लिंग’’ की कहानी में कुछ भी नयापन नहीं है. बल्कि यह फिल्म 2002 की अमरीकन सुपरनेचुरल पॉवर वाली फिल्म ‘‘रिंग’’, 1998 की जापानी सायकोलॉजिकल फिल्म ‘‘रिंग’’,‘वॉर्नर ब्रदर्स’ की फिल्म ‘‘फ्रेंड्स रिक्वेस्ट’’ को मिलाकर बनायी गयी चूंचूं का मुरब्बा है. मजेदार बात यह है कि हाल ही में अमरीका में एक बार फिर ‘रिंग’ का रीमेक किया गया है, जो कि बहुत जल्द प्रदर्शित होने वाली है.

फिल्म बहुत धीमी गति से आगे बढ़ती है. फिल्म के एडीटर ने भी फिल्म को तहस-नहस किया है. फिल्म के अंदर एक ही गाना है. बीच पर फिल्माया गया यह रोमांटिक गाना बहुत ही घटिया है और फिल्म के साथ कहीं भी फिट नहीं बैठता. गाने के बोल व संगीत बहुत घटिया हैं. फिल्म की पटकथा में गड़बड़ी है. हत्यारे के बारे में बीस मिनट बाद ही एहसास हो जाता है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो अंशुमन झा, सुजाना मुखर्जी और दिव्या मेनन ने ठीक ठाक अभिनय किया है. मगर संजय सूरी ने यह फिल्म क्यों की, यह बात समझ से परे हैं. 1 घंटा 59 मिनट की अवधि की फिल्म ‘‘मोना डार्लिंग” का निर्माण ‘‘फस्ट रे फिल्मस’’ और ‘‘अल्ट जे फिल्मस’’ के बैनर तले निखिल चैधरी, कैलाश के, पंकज गारडी, हितेश गारीडी ने किया है. लेखक व निर्देशक शशी सुदिगल, गीतकार समीर सतीजा, संगीतकार मनीष जे टीपु, कास्ट्सूम तानिया ओयक, नृत्य निर्देशक जयेश प्रधान, कला निर्देशक दीपांकर मोंडल, कैमरामैन सपन नरूला, एडीटर आसिफ पठान, पार्श्व संगीत सुदीप स्वरुप, नृत्य निर्देशक जयेश प्रधान तथा कलाकार हैं- सुजाना मुखर्जी, अमिष्का सूद, आशीष चैधरी, यश योगी, योगेश भट्ट, सूर्यवीर यादव, हर्ष नागर, सुशांत वशिष्ठ, दिव्या मेनन, ध्रुव हाइना लोहुमी, आचार्य अजय वर्मा, सचिन कथूरिया, नरेश मोसेन, संदीप बासु, बिमलेंदू जेना, संजय सूरी, अंशुमान झा, मुकेश भट्ट, तारा खान, प्रशांत सिंह व अन्य.

‘गुजरात के गधे’ पर भिड़े मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री

चुनाव इसलिये होते हैं कि जनता विकास और तरक्की की बात करने वाले को वोट देकर सरकार बनाने में मदद करे. नेता बहुत होशियार होते हैं. वह ऐसा कोई वादा न करना पड़े इसके लिये बेकार की जुमले बाजी करते हैं. जिससे समाज की बदहाली, बेकारी और पिछड़ेपन पर बात न हो सके. उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में पूरी तरह से चुनावी जुमले उछाल कर वार पर वार हो रहे हैं. एक दल और नेता ऐसी जुमलेबाजी करता है तो दूसरा उसको आगे बढ़ाने का काम करता है. ऐसे में धीरे-धीरे सभी एक सा काम करने लगते हैं.

उत्तर प्रदेश में ताजा विवाद गुजरात के गधे का लेकर छिड़ गया है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन के एक विज्ञापन का जिक्र करते कहा कि फिल्मों के महानायक को गुजरात के गधों का विज्ञापन नहीं करना चाहिये.

असल में अभिनेता अमिताभ बच्चन ने गुजरात पर्यटन को बढ़ावा देने के लिये कई तरह के विज्ञापन किये हैं. एक विज्ञापन में वह गुजरात के गधे का विज्ञापन भी कर चुके हैं. गुजरात में गधे की मशहूर नस्ल है. यही कारण है कि वहां पर साल 2013 में गुजरात के गधे को लेकर केन्द्र सरकार ने डाक टिकट भी जारी किया था. उस समय केन्द्र में कांग्रेस के अगुवाई वाली यूपीए की सरकार थी. ऐसे में अमिताभ बच्चन के प्रचार में किसी तरह के हर्ज करने वाली बात नहीं थी.

चुनावी जुमले की तरह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने इसका प्रयोग कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कटाक्ष किया. अखिलेश यादव के साथ काम करने वाले लोगों को यह उम्मीद नहीं थी कि प्रधानमंत्री मोदी गधे पर किये गये इस कटाक्ष को प्रचार का जरीया बना लेंगे.

23 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में चुनावी रैली थी. प्रधानमंत्री मोदी ने गधे को ही अपना हथियार बना लिया. प्रधानमंत्री ने कहा गधे से प्रेरणा ली जा सकती है. वह अपने मालिक के प्रति वफादार होता है. वह चीनी और चूना में फर्क करना पंसद नहीं करता. मैं तो उससे प्रेरणा लेकर बिना थके काम करने में यकीन रखता हूं. यही नहीं प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि अखिलेश सरकार जानवरों में भी जातिवादी मानसिकता दिखाती है. भैंस खो गई तो उसने पूरे प्रदेश की पुलिस लगा दी. गधे का विज्ञापन भी देखना गवारा नहीं. अखिलेश गुजरात के लोगों ने नफरत करते हैं. गांधी, पटेल, दयानंद सरस्वती यहीं के थे.

असल में चुनावी समय में ऐसे जुमले नई बात नहीं हैं. खबरिया चैनलों पर यह जुमलेबाजी ब्रेकिंग बाइट का काम देती हैं. परिचर्चा का विषय बन जाती है. ऐसे में चुनाव के मुख्य मुद्दे पीछे छूट जाते हैं. अखिलेश यादव का प्रचार तंत्र और चुनावी जुमले का मुकाबला करने वाले लोग भाजपा और प्रधानमंत्री के प्रचार तंत्र से कमजोर हैं. ऐसे में हर चाल में उनकी मात हो जाती है. चुनाव प्रबंधन में लगे अखिलेश यादव के लोग पूरी तरह से समर्पित नहीं हैं. ऐसे में वह मात खा जाते हैं. चुनावी जुमलों का मुकाबला करने के लिये अखिलेश के पास पूरा सिस्टम नहीं है. ऐसे में उनका वार उन पर भी भारी पड़ जाता है.

गुजरात के गधे को नाम लेकर अखिलेश ने प्रधानमंत्री को दांव पर लगाया तो प्रधानमंत्री मोदी ने गधे को अचछा बता कर अखिलेश को कटघरे में खड़ा कर दिया. गधे को चुनावी जुमला बनाना मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री जैसे पद पर बैठे लोगों को शोभा नहीं देता है. इससे दोनो ही पदों की गरिमा गिरती है.

संत महात्माओं की काली दास्तान

हमारे देश में लोग संतों और महात्माओं को इतनी ज्यादा अहमियत देते हैं कि गरीब लोग भी दिनरात मेहनत कर के खुद रूखासूखा खा कर अपनी जिंदगी गुजारते हैं, मगर इन की सेवा में वे अपना सबकुछ गंवा देते हैं. उन की इसी सेवाभक्ति को देख कर जब किसी को कोई रोजगार नहीं मिलता है, तो वह साधुमहात्मा बन कर ऐशोआराम की जिंदगी बिताता है. एक 40 साला तथाकथित महात्मा ने बताया कि पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई करने के कई साल बाद भी जब उन्हें कहीं नौकरी नहीं मिली, तो वे परेशान हो कर एक महात्माजी के पास चले गए और आश्रम में रह कर उन की सेवा करने लगे. उस आश्रम में बड़ेबडे़ नेता, अफसर व सेठसाहूकार उन महात्मा की शरण में आते थे और उन्हें भारीभरकम दक्षिणा देते थे. उन की खूबसूरत बीवीबहन, बेटियां भी उन महात्मा की खूब सेवा किया करती थीं.

कई लोग तो महात्मा की सेवा के लिए अपने घर की औरतों को आश्रम में भी छोड़ जाते थे. एक रात वे 40 साला महात्मा आश्रम में ही बने अपने कमरे में सो रहे थे, तभी एक 30 साला खूबसूरत औरत उन के कमरे में आ कर उन्हें जगाते हुए बोली कि उसे बड़े महात्माजी ने सेवा के लिए भेजा है. उस औरत की समस्या यह थी कि शादी के 2 साल बाद भी उसे कोई औलाद नहीं हुई थी. उस औरत ने उन से यह भी कहा कि आप के आशीर्वाद से वह जल्द ही मां बन सकती है. इतना कह कर वह उन के पैर दबाने लगी. पैर दबाने के बाद उस औरत ने महात्मा के शरीर की मालिश करने के लिए उन के कपड़े उतार दिए थे. काफी देर मालिश कर के वह बगल में ही लेट कर उन के बदन पर अपने नाजुक हाथों को फेरते हुए अपने मुंह को कानों पर ला कर कोयल जैसी मीठी आवाज में पूछ रही थी कि वह इस सेवा से मां तो बन जाएगी न?

यह कहते हुए वह महात्मा से लिपट कर गुदगुदी करने लगी थी. उस की इन हरकतों के जवाब में महात्मा भी उस के साथ वैसी ही हरकतें करने लगे. जब उस औरत को मां बनने का पूरा यकीन हो गया, तो वह अपने घर चली गई. 2 महीने बाद जब वह औरत अपने परिवार के साथ वापस आई, तो पेट से थी. उस के घर वाले और वे महात्मा बहुत खुश थे. देश का एक 60 साला नामी संत अपनी दास्तान सुनाते हुए कहने लगा कि वह बचपन में बहुत शैतान था. उस का पढ़ाईलिखाई में बिलकुल मन नहीं लगता था. वह अपने स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों से भी लड़ताझगड़ता रहता था. एक बार एक छात्र ने उस की शिकायत मास्टर से की, तो उस मास्टर ने उसे खूब मारा.

मास्टर की पिटाई से नाराज हो कर उस ने पत्थर से उस छात्र का सिर फोड़ दिया.  जब मास्टर ने उस के घर वालों से इस हरकत की शिकायत की, तो उन्होंने उसे डांटा. उस ने घर से भागने में ही अपनी भलाई समझी और हमेशा के लिए  घर छोड़ दिया था. घर से भाग कर वह लड़का संतमहात्माओं के पास रहने लगा था. वहां पर उस ने उन संतमहात्माओं से जंगल की जड़ीबूटियों से ऐसीऐसी दवाएं बनाने के नुसखे सीखे कि धीरेधीरे उस की उन दवाओं से लोगों को फायदा होने लगा था.

आज वह देश का एक नामी संत है. देश में उस के बड़ेबड़े कारोबार चल रहे हैं. देशविदेश में उस के बनाए सामान बिक रहे हैं. इसी तरह एक 55 साला साधु ने अपनी दास्तान सुनाते हुए बताया कि वे पढ़ाई में कमजोर थे. उन के घर वाले भी पड़ोस में रहने वाले एक लड़के की तारीफ करते नहीं थकते थे. वे उस लड़के के बारे में कहा करते थे कि वह पढ़लिख कर एक दिन बहुत बड़ा सरकारी अफसर बनेगा. उन की बातों को सुन कर उन साधु ने अपने दिल में ठान लिया था कि वे भी अपने तेज दिमाग से बड़ेबड़े अफसरों और नेताओं से अपनी खुशामद कराएंगे. यह सोच कर वे एक बड़े संत के आश्रम में जा कर उन की सेवा करने लगे. धीरेधीरे अपने इलाके में उन का नाम होने लगा था. उन में इतना दिमाग था कि कुछ बेरोजगार नौजवानों की सेवा लेना भी उन्होंने शुरू कर दिया था.

वे नौजवान अपने इलाके के लोगों से मिल कर उन की समस्याएं इकट्ठा करने लगे थे. उन्होंने उन की समस्याओं को उन साधु को बताना शुरू कर दिया था. पीडि़त लोग अपनी समस्याओं के समाधान के लिए उन के पास आने लगे थे. वे संत उन के कहने से पहले ही जब समस्या बताने लगते, तो वे लोग उन्हें सुन कर हैरान हो जाते. ज्यादातर लोग उन्हें बहुत पहुंचा हुआ संत मानने लगे थे. वे खुश हो कर उन की खूब सेवा किया करते और भारीभरकम भेंट देने लगे थे. बड़ेबड़े नेता, अफसर और सेठसाहूकार उन्हें अपने यहां बुला कर खूब दक्षिणा देने लगे थे. उन्होंने उन के कई जगह बड़ेबड़े आश्रम भी बनवा दिए थे.

अपने गांव का पढ़ाई में होशियार वह दूसरा लड़का भारतीय प्रशासनिक सेवा का अफसर हो गया था. जब एक मामले में वह फंसा, तो वह उन साधु की शरण में आ कर मामले से बचाने के लिए उन के हाथपैर जोड़ने लगा. तब बाबा ने ही नेताओं और अफसरों से कह कर उसे बचाया था. इन तथाकथित संतमहात्माओं की दास्तान से यही नतीजा निकलता है कि देश के लोग 21वीं सदी में भी अंधविश्वासों में ऐसे जकड़े हैं कि वे उन की सेवा में अपना सबकुछ हंसीखुशी लुटाने को तैयार रहते हैं.

जवानों का बोलना मना है

‘जय जवान, जय किसान’ का नारा भारत के प्रधानमंत्री रह चुके लाल बहादुर शास्त्री ने दिया था. उन्होंने माना था कि देश जवानों और किसानों से चलता है. उस के बाद जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने ‘जय जवान, जय किसान’ के साथसाथ ‘जय विज्ञान’ को भी जोड़ा यानी टैक्नोलौजी की भी बातें होने लगीं. लेकिन आज ‘जय जवान, जय किसान’ और ‘जय विज्ञान’ से जुड़े तीनों समूहों का हाल बेहाल है. जवानों को दिमागी रूप से पंगु बना कर उन के वेतनमान में बढ़ोतरी तो की गई, लेकिन उन की हालत भी एक नए गुलामों की तरह ही है. वहीं किसानों और मजदूरों की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ, बल्कि उन की हालत और भी खराब होती जा रही है.

हमारे देश के वैज्ञानिकों और विज्ञान के छात्रों की हालत भी कुछ खास ठीक नहीं है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राज में भौतिक शास्त्र व रसायन शास्त्र के बजाय ज्योतिष शास्त्र पढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है. नई आर्थिक नीति लाने वाली कांग्रेस सरकार ने अपनी ही पार्टी के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के ‘जय जवान, जय किसान’ के सपनों को मटियामेट कर दिया. कांग्रेस शासित नरसिंह राव व मनमोहन सिंह द्वारा नई आर्थिक नीति लागू होने के बाद किसानों की जमीनें पूंजीपतियों को दी जाने लगीं. बड़े पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए किसानों पर दबाव बनाया गया कि वे नई तरह की खेती करें. इस नई खेती के चलते बहुत से किसान कर्ज के जाल में फंस कर खुदकुशी करने लगे.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, साल 1995 से ले कर अब तक तकरीबन साढ़े 3 लाख किसान खुदकुशी कर चुके हैं, जबकि गैरसरकारी आंकड़े इस से भी ज्यादा हैं. सरकारी नीतियों ने इन किसानों को ‘जय किसान’ की जगह ‘मर किसान’ बना दिया. अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने के बाद किसानों की हालत सुधरी नहीं, बल्कि बदतर ही हुई और उन्हीं के शासन में जवानों के शव उठाने वाले ताबूत का घोटाला हो गया. ‘जय विज्ञान’ का नारा देने वाली अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने श्रम कानूनों में संशोधन किया और ठेकेदारी प्रथा को लागू किया. मजदूरों को न्यूनतम वेतन से भी आधे पैसों पर काम करना पड़ रहा है और उन की मेहनत की कमाई लूट बन कर ठेकेदारों को मालामाल कर रही है. हालत यह हो गई कि सभी सरकारी दफ्तरों में फोर्थ क्लास के कर्मचारी ठेके पर रखे जाने लगे. यहां तक कि डाक्टर और मास्टर भी ठेकेदारी प्रथा के शिकार हो गए. यही हालत ‘श्रमेव जयते’ की भी है.

मोदी सरकार के आने के बाद देश में ऐसा माहौल बनाया गया कि जवान ही ‘देशभक्त’ हैं और उन्हीं की बदौलत हम सुरक्षित और जिंदा हैं. आप उन पर कोई सवाल नहीं उठा सकते, क्योंकि इस से उन का मनोबल गिरता है. वहां कोई भ्रष्टाचार नहीं है, जाति और धर्म का भेदभाव नहीं है. नतीजतन, ड्यूटी के बाद बैंक या एटीएम की लाइन में अपनी तकलीफ जाहिर करने पर भी किसी शख्स को ड्यूटी पर तैनात जवानों के साथ जोड़ कर देशभक्ति का पाठ पढ़ाते कुछ सिरफिरे मिल जाते हैं. झूठी देशभक्ति के जज्बे दिखा कर सही सवालों को हमेशा छिपाया गया है.

ऐसा नहीं है कि तेज बहादुर यादव का वीडियो वायरल होने से पहले मंत्रियों, अफसरों, मीडिया वालों को इस तरह के गलत बरताव का पता नहीं था. इस वीडियो के आने से पहले भी जवानों की खुदकुशी, डिप्रैशन, अफसरों के बुरे बरताव, छुट्टियां नहीं मिलने व अपने साथियों पर गोली चलाने की खबरें कई बार आ चुकी हैं. यहां तक कि वीके सिंह ने भी माना है कि सेना का जनरल रहते हुए रक्षा सौदों में उन्हें घूस का औफर मिला था. डीजल बेचने या दूसरे सामान की हेराफेरी के मामले भी आ चुके हैं. दबी जबान में औरतों के साथ होने वाली हिंसा की बातें भी सामने आती रही हैं.

तेज बहादुर यादव ने अपनी बात को लोगों तक पहुंचाने के लिए सोशल साइट का इस्तेमाल किया, लेकिन यही बात सीमा सुरक्षा बल के अफसरों को नागवार गुजरी. वे इसे अनुशासनहीनता और तय की गई गाइडलाइंस का उल्लंघन मान रहे हैं. यहां तक कि सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक रह चुके जनरल प्रकाश सिंह का भी कहना?है, ‘‘जवान ने नियमों का उल्लंघन किया है. कमांडैंट से शिकायत करनी चाहिए थी. डीआईजी, आईजी से शिकायत की जा सकती थी.’’ पूर्व महानिदेशक जनरल प्रकाश सिंह को यह डर है कि जवान इस तरह से करने लगेंगे, तो अनुशासन छिन्नभिन्न हो जाएगा. तेज बहादुर यादव का कहना है कि इस की सूचना उस ने अपने कमांडैंट को पहले दी थी और बारबार कहने पर भी ऐक्शन नहीं लिया गया. क्या यही सब बातें ‘अनुशासनहीनता’ में आती हैं? सीमा सुरक्षा बल के जम्मू फ्रंटियर के आईजी डीके उपाध्याय ने यह बयान दिया है कि वीडियो वायरल करने वाला जवान आदतन अनुशासनहीन है. उस के खिलाफ नशे में धुत्त रहने, सीनियर अफसरों के साथ बदसुलूकी करने, यहां तक कि सीनियर अफसर पर बंदूक तानने की शिकायतें आती रही हैं.

तेज बहादुर यादव का साल 2010 में कोर्ट मार्शल किया गया था, लेकिन उस के परिवार वालों को ध्यान में रखते हुए बरखास्त करने के बजाय 89 दिनों की कठोर सजा सुनाई गई. इस तरह के आरोप के जवाब में तेज बहादुर यादव कहता है, ‘‘मुझे गोल्ड मैडल समेत 14 पदक मिल चुके हैं. मैं ने अपने कैरियर में कुछ गलतियां भी की हैं, लेकिन बाद में उन में सुधार भी किए हैं.’’ तेज बहादुर यादव के परिवार वालों का कहना है कि जब भी वे घर आते थे, तो खाने को ले कर शिकायत करते थे. उन की पत्नी शर्मिला यादव अफसरों को कठघरे में खड़ा करते हुए पूछती हैं, ‘‘मेरे पति दिमागी तौर पर बीमार या अनुशासनहीन थे, तो उन को देश के संवेदनशील इलाके में बंदूक क्यों थमाई गई?’’

तेज बहादुर यादव की ही तरह बाड़मेर के जागसा गांव के खंगटाराम चौधरी सीमा सुरक्षा बल में थे, जिन्होंने 30 दिसंबर को वीआरएस ले ली थी. खंगटाराम कहते हैं, ‘‘जवानों को ऐसा खाना खाने को दिया जाता है, जिसे आम आदमी नहीं खा सकता है. उस खाने को जवान मजबूरी में खाते हैं.’’ खंगटाराम के पिता एसके चौधरी का कहना है, ‘‘पहले खुशी हुई थी कि बेटा फौज में गया है, लेकिन वहां की परेशानियों को देख कर लगता है कि अच्छा हुआ कि वह यहां आ गया है और अब साथ में खेती का काम करेगा, तो कम से कम भरपेट खाना तो खाएगा.’’ तेज बहादुर यादव द्वारा लगाए गए आरोप को जब मीडिया ने लोगों से जानने के लिए बात की, तो श्रीनगर में सुरक्षा बलों के कैंपों के आसपास रहने वाले लोगों ने कहा कि बाजार से आधे रेट पर पैट्रोल, डीजल, चावल, मसाले जैसी चीजें मिल जाती हैं.

फर्नीचर के एक दुकानदार ने बताया कि फर्नीचर खरीदने की जिन लोगों की जिम्मेदारी है, वे कमीशन ले कर उन लोगों को और्डर देते हैं, पैसों के लिए सामान की क्वालिटी से भी समझौता करने को तैयार हो जाते हैं. तेज बहादुर यादव का वीडियो आने के बाद केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, वायु सेना और सेना के जवानों ने भी अपनीअपनी बात रखी. रोहतक के वायु सेना के एक पूर्व जवान ने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को चिट्ठी लिख कर मौत की गुहार लगाई है, ताकि उसे जलालत भरी जिंदगी से छुटकारा मिल सके. इस जवान का आरोप है कि वायु सेना के अफसरों को 14 हजार रुपए नहीं देने पर उसे कई झूठे आरोप लगा कर नौकरी से निकाल दिया. इसी तरह केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, मथुरा के जवान जीत सिंह ने मिलने वाली सुविधाओं में भेदभाव का आरोप लगाया है. सेना के जवान यज्ञ प्रताप ने वीडियो जारी कर सेना के अफसरों पर आरोप लगाया है कि अफसर सैनिकों से कपड़े धुलवाते हैं, बूट पौलिश कराते हैं, कुत्ते घुमाने और मैडमों के सामान लाने जैसे काम करवाते हैं. यह खबर जब मीडिया में आ रही थी, तो उसी समय यह खबर भी आई कि बिहार के औरंगाबाद में केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल के जवान बलवीर कुमार ने इंसास राइफल से अपने सहकर्मियों की हत्या कर दी. पुलिस अधीक्षक सत्यप्रकाश ने घटना की जानकारी देते हुए बताया कि बलवीर कुमार ने छुट्टी पर जाने के लिए आवेदन किया था. उसे छुट्टी नहीं मिल पाई और दूसरे जवानों ने उस पर तंज कसा, तो गुस्से में आ कर उस ने गोलीबारी कर दी.

उसी दिन पुलवामा जिले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल  का जवान वीरू राम रैंगर ने खुद को गोली मार कर खुदकुशी करने की कोशिश की थी. सेनाध्यक्ष ने जवानों से कहा है कि वे अपनी बात सोशल मीडिया पर नहीं उठाएं. उस के लिए सेना मुख्यालय, कमान मुख्यालय व निचले स्तर के कार्यालयों में शिकायत पेटी रखने की घोषणा की और कहा कि इन पेटियों के माध्यम से उठाए गए मुद्दों को मैं खुद देखूंगा. हम सभी जानते हैं कि जेल, थानों या दूसरे दफ्तरों में इस तरह के बौक्स पहले से ही वहा रखे हैं और उन पर भी यही लिखा होता?है कि आप की पहचान गुप्त रखी जाएगी और इस को अधिकारी ही खोलेंगे. लेकिन हम इस तरह के बौक्स के परिणाम को भी जानते हैं. सेना के दफ्तरों में शिकायत निवारण बौक्स अभी तक क्यों नहीं था? जवानों के दर्द को गृह मंत्रालय ने बेबुनियाद बता कर खारिज कर दिया है यानी कम शब्दों में कहा जाए, तो गृह मंत्रालय और अधिकारी जवानों को झूठा बता रहे हैं. यह हैरानी की बात है कि तेज बहादुर यादव और इरफान ने वीडियो बना कर जो सुबूत सरकार और जनता तक पहुंचाए हैं, उन को सरकार मानने से इनकार कर रही है. क्या जवानों के साथ इस तरह का बरताव नहीं होता है?

ऐसा सवाल सोशल मीडिया पर आ जाने से पूंजीवादपरस्त मीडिया घराने भी इस मामले को उठाने के लिए मजबूर हुए. सीमा सुरक्षा बल के एक जवान इरफान ने 29 अप्रैल को वाराणसी में प्रैस कौंफ्रैंस कर के बताया था कि भारतबंगलादेश सीमा पर अधिकारी तस्करी कराते हैं और जो जवान मुंह खोलने की बात करता है, उसे फर्जी मुठभेड़ में मार दिया जाता है.

इरफान ने बताया कि 15 जनवरी, 2016 को 50 बंगलादेशी भारत में आना चाहते थे, तो उस ने घुसपैठ कराने से इनकार कर दिया. इसी बीच एक घुसपैठिए ने सीमा सुरक्षा बल के कमांडर को फोन कर के इरफान से बात कराई. कमांडर ने इरफान को सभी घुसपैठियों को आने देने के लिए आदेश दिया.

इरफान ने इस घटना की शिकायत जब अधिकारियों से की, तो उसे चुप रहने की नसीहत दी गई. 19 जनवरी की रात जब गेट खोला गया था, तो उस का वीडियो इरफान ने बनाया था. उस की शिकायत भी अधिकारियों से की गई, लेकिन कोई असर नहीं हुआ. इरफान ने सीमा की बाड़ को काटते और जोड़ते हुए भी कुछ घुसपैठियों को पकड़ा था. उन लोगों ने भी कमांडर के आदेश पर ऐसा करने की बात कबूली थी. इस का वीडियो भी इरफान ने मीडिया के सामने दिखाया था. इरफान का कहना है कि सीमा सुरक्षा बल के अधिकारी सीमा पार तस्करी कराते हैं. साथ ही, उस ने यह भी बताया कि लंगर में बंगलादेशी घुसपैठियों को उस ने काम करते हुए देखा था और पूछने पर उसे बताया गया कि कमांडर ने रखा है.

इरफान आगे बताता है कि जब अधिकारियों के सामने तस्करी की कलई खोली थी, तो उसे कमरे में बंद कर के पीटा गया था और सिगरेट से दागा गया था. उस के बाद इरफान सीमा सुरक्षा बल की नौकरी छोड़ कर अपने गांव आ गया. इरफान ने बताया कि अधिकारी उस के पीछे पड़े हुए हैं और उसे भगोड़ा घोषित करने की धमकी दे रहे हैं. वह सीमा सुरक्षा बल में नहीं जाना चाहता. उस के बाद इरफान के साथ क्या हुआ, किसी को नहीं पता है. तेज बहादुर यादव, खंगटाराम, जीत सिंह या इरफान का न तो यह पहला मामला है और न ही आखिरी. ऐसा होता रहा है और होता रहेगा. जब किसान अपनी खेती की जमीन को तथाकथित तरक्की के लिए पूंजीपतियों को नहीं देना चाहते, तो इन्हीं जवानों को भेजा जाता है कि जाओ तुम ‘देशभक्त’ होने का परिचय दो. मजदूर जब अपनी मांगों को ले कर धरनाप्रदर्शन करते हैं या आदिवासी, दलित अपनी जीविका के साधन की मांग करते हैं, तो इन्हीं ‘देशभक्तों’ द्वारा उन का कत्लेआम कराया जाता है. उस समय इन जवानों को ‘देशभक्त’ का तमगा दे दिया जाता है.

जब यही ‘देशभक्त’ जवान अपनी मांगों को उठाते हैं, तो इन को भगोड़ा, अनुशासनहीन, नशेड़ी बना कर सजा मुकर्रर की जाती है. ये जवान उन्हीं मजदूरकिसान के बेटे हैं, जिन पर अफसरों के कहने पर वे लाठियां और गोलियां बरसाते हैं. अफसरों का वर्ग अलग होता है. वे सांसदों, विधायकों, मंत्रियों, नौकरशाहों के घरों से आते हैं, जिस की न तो जमीन जाती है और न ही जान. इस समाज में जवान, किसान और विज्ञान से जुड़े तीनों समूहों को मिल कर लड़ना होगा, तभी वे जीत सकते हैं, नहीं तो किसी दिन किसान मारा जाएगा, जवान मारा जाएगा और विज्ञान को टोकरी में फेंक दिया जाएगा. 

औफिस में बोल्डनैस सही या गलत

‘‘देखोदेखो सर ने बैल बजाई. अब डीप नैक का टौप और मिनी स्कर्ट पहने टीना कैबिन में पहुंच जाएगी और फिर अपनी आंखों को घुमाते हुए सर से ऐसे बातें करेगी कि वे उसे एकटक देखते रह जाएंगे. अरे सरजी, कभी हमें भी बुला लिया कीजिए. क्या हम में कांटे लगे हैं? आप कहें तो हम भी कल से शौर्ट्स पहन कर आ जाएंगी.’’

 ‘‘चुप कर पगली. हम कभी इतने छोटे कपड़े नहीं पहन सकतीं, भले हमें नौकरी ही क्यों न छोड़नी पड़े.’’

 ‘‘तो फिर क्या हम हमेशा यों ही कुढ़ती रहेंगी, अपनी अदाओं से बौस को नचाने वाली टीना को देख कर?’’

औफिस में उपस्थित सोनम और सुमन की बातें सुन कर स्टाफ के सभी लोग मंदमंद मुसकरा रहे थे, लेकिन टीना के कैबिन से बाहर आते ही सब के मुंह बन गए. टीना सब को यों घूर रही थी मानो मन ही मन गा रही हो, ‘ये दुनिया… ये दुनिया पीतल दी, बेबी डौल मैं सोने दी… बेबी डौल मैं सोने दी…’ और जवाब में स्टाफ कह रहा हो कि चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात…

बहुत से औफिसों का है यही हाल

यह हाल सिर्फ सोनम और सुमन के औफिस का नहीं, बल्कि ऐसे कई औफिसों का है, जहां सैक्सुअली ऐक्टिव रहने वाली लड़कियों का राज चलता है, जो अपनी बोल्डनैस के चलते बौस को अपनी जेब में रखती हैं और इस का खमियाजा बेचारी दूसरी लड़कियों को भुगतना पड़ता है. इस तरह की बोल्ड लड़कियों की वजह से स्टाफ की आम लड़कियों को किस तरह के मैंटल और फाइनैंशियल हैरेसमैंट का सामना करना पड़ता है, आइए जानते हैं:

बस हमें ही पड़ती है डांट

इस तरह की लड़कियां चाहे कोई भी गलती करें, बौस उन्हें जल्दी नहीं डांटता, बल्कि जिन की गलती नहीं है, उन्हें डांट कर अपना गुस्सा शांत करता है. ऐड एजेंसी में कार्यरत शशिकला यादव कहती हैं, ‘‘मेरे साथ कई बार इस तरह का वाकेआ हुआ है जब मेरी हौट कलीग की गलती पर बौस उसे डांटने के बजाय मुझे कैबिन में बुला कर फटकारने लगता है. शुरुआत में मैं कुछ नहीं कहती थी, लेकिन बाद में मुझे लगा कि उस की गलती की सजा मुझे क्यों? इसलिए फिर मैं बौस के पास सुबूत के साथ जाने लगी, उन्हें यह बताने को कि गलती किस की है. ऐसे में मजबूरन बौस को उसे बुला कर मेरे सामने डांटना पड़ता. अभिनय ही सही, लेकिन यह देख कर मेरे दिल को ठंडक मिलती है.’’

शशिकला की तरह ऐसी और भी कई लड़कियां हैं, जिन की गलती न होने पर भी बोल्डनैस परोसती लड़कियों की वजह से बौस की खरीखोटी सुननी पड़ती है.

हौट होती हैं लेकिन टेलैंटेड नहीं

ऐक्सपोर्टइंपोर्ट कंपनी में कार्यरत प्रीति कहती हैं, ‘‘मैं उस वक्त मन मसोस कर रह जाती हूं जब किसी मीटिंग में सीनियोरिटी और टैलेंट के हिसाब से बौस के साथ जाने का हक मेरा होता है, लेकिन बौस नए क्लाइंट से मिलने के लिए मेरी हौट कलीग को साथ ले जाता है. खून तो उस वक्त खौल उठता है जब मीटिंग से आने के बाद जो काम उसे करना है, वह मेरे मत्थे बौस यह कह कर मड़ देता है कि तुम उस से काफी सीनियर हो, इसलिए यह काम तुम करो. तब जी चाहता है कह दूं कि आप भी जानते हैं कि इसे कुछ नहीं आता, मैं इस से ज्यादा टेलैंटेड हूं, इसलिए आप यह काम मुझे सौंप रहे हैं.’’

इस में दोराय नहीं है कि कई कंपनियों में नए क्लाइंट से मिलनेमिलाने के लिए खूबसूरत लड़कियों को आगे किया जाता है, इस सोच के साथ कि शायद इन की ओर आकर्षित हो कर बात बन जाए. लेकिन इन लड़कियों की वजह से टेलैंटेड लड़कियों को जो सहना पड़ता है, उस की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता.

तेजी से बढ़ता है सैलरी ग्राफ

ऐसी लड़कियां जब किसी औफिस में खाली जगह भरने जाती हैं तो पहले ही अपनी हौटनैस दिखा कर अच्छा पैकेज पा जाती हैं और जैसेजैसे ये कंपनी में पुरानी होती जाती हैं इन का सैलरी ग्राफ भी बहुत बढ़ जाता है. हाल ही में पीआर एजेंसी जौइन करने वाली निशा सिंह कहती हैं, ‘‘मैं ने अपनी पुरानी कंपनी इसी वजह से छोड़ी थी, क्योंकि वहां 4 साल काम करने पर भी मेरी सैलरी 6 हजार बढ़ी, जबकि मेरी हौट और बौस से सब से ज्यादा क्लोज ऐक्स कलीग की 2 साल में ही 6 हजार सैलरी बढ़ाई गई, जबकि मैं उस से ज्यादा काम करती थी और उस से कहीं ज्यादा टेलैंटेड भी थी.’’

किसी कंपनी द्वारा ऐसा करना आम लड़कियों का आर्थिक शोषण नहीं तो और

क्या है?

बौस की होती है खूब मेहरबानी

बात छुट्टी की हो या प्रमोशन की, सुनने के बाद बौस की भौंहें तन ही जाती हैं, लेकिन जब बोल्ड टाइप की इन लड़कियों को छुट्टी की दरकार होती है तो इन्हें बौस या एचआर की ओर से तुरंत मंजूरी मिल जाती है, जिस की वजह है बौस का इन पर जरूरत से ज्यादा मेहरबान होना. ऐसी लड़कियों को प्रमोशन के लिए खुद को प्रूव करने की जरूरत नहीं होती, जबकि बाकी लड़कियां इतनी मेहनत करने के बाद भी अपने  हक का पद नहीं पा सकतीं, प्रमोशन की तो बात ही छोड़ दें.

बैंकर रोशनी कहती हैं, ‘‘मेरे साथ भी यही हुआ था. मैं अपनी कलीग से ज्यादा सीनियर थी, लेकिन मेरी बजाय बौस ने मुझे मिलने वाली पोस्ट उसे दी थी, सिर्फ इसलिए, क्योंकि वह बोल्ड और हौट थी और मैं साधारण सी दिखने वाली लड़की. अत: मैं ने वह औफिस छोड़ दिया.’’

बाकी भी करते हैं जीहुजूरी

कहते हैं बौस अगर कह दे कि सूरज पश्चिम से उगता है तो कर्मचारी भी इसे ही सच मान लेते हैं. ऐसे में अगर बौस की किसी कर्मचारी पर विशेष कृपा हो, तो बाकियों को भी उस की जीहुजूरी करनी पड़ती है. बौस से करीबी की वजह से ऐसी लड़कियों के पैर कभी जमीं पर नहीं टिकते. किसी से बात करना तो दूर ये उन की तरफ देखती भी नहीं हैं. ऐसे में चपरासी से ले कर बाकी स्टाफ के लोगों को भी जरूरत पड़ने पर खुद इन से बोलना पड़ता है. इतना ही नहीं, अगर किसी चपरासी को एकसाथ कोई आम और इस तरह की खास लड़की काम कहे, तो वह भी पहले खास लड़की की ही बात सुनता है, क्योंकि वह उस से पंगा ले कर बौस की नजरों में नहीं आना चाहता, फिर चाहे आम लड़की का काम औफिस के नजरिए से ज्यादा खास ही क्यों न हो.

बोल्डनैस परोसतीं लड़कियां जाएं संभल

बोल्डनैस परोसती लड़कियों के विषय में यह कहना गलत नहीं होगा कि वे जो कुछ भी कर रही हैं, वह सिर्फ चार दिन की चांदनी है, आने वाली रात उन के लिए गहरा अंधकार ले कर आएगी. किस तरह की परेशानियों से उन्हें जूझना पड़ सकता है? आइए, जानें:

चार दिन की है चांदनी : आज आप के पीछे दीवानों की तरह घूमने वाला आप का बौस हमेशा आप पर यों ही लट्टू रहे यह जरूरी नहीं. यह खेल तो सिर्फ चार दिन का है. जहां आप की जवानी ढली, वहीं आप बौस की निगाहों से भी दूर होती चली जाएंगी. यह आप का हमसफर नहीं है जो जवानी के साथसाथबुढ़ापे में भी आप का साथ दे. यह भी हो सकता है कि कल को अगर आप से खूबसूरत लड़की औफिस में आए तो वह आप को छोड़ कर उस का दीवाना बन जाएगा.

झेलनी पड़ेगी बदनामी: माना कि बौस का साथ आप को पैसों के साथसाथ तरक्की की सीढि़यां भी मुहैया करवा रहा है, लेकिन यह न भूलें कि बौस की आप पर यह मेहरबानी आप के चरित्र पर सवाल उठा सकती है. आजकल की महंगाई में कोई बिना किसी फायदे के किसी को 1 रुपया तक नहीं देता, तो भला आप का बौस आप पर हजारों क्यों उड़ा रहा है, यह सवाल औफिस में गौसिप का विषय बन सकता है.

सैक्स सिंबल बन जाएंगी: आप के ऐसे रवैए से हो सकता है कि आप बौस और औफिस स्टाफ की नजरों में महज सैक्स सिंबल बन कर रह जाएं खासकर तब जब बौस शादीशुदा हो. ऐसे में बौस भी आप को सिर्फ अपनी आंखें सेंकने के इरादे से देखेगा और औफिस स्टाफ भी आप के प्रति बौस की रखैल का नजरिया रखेगा.

काम के साथ कामलीला भी: सब से बड़ा और कड़वा सच यह है कि बौस अगर आप की अदाओं पर फिदा है, तो वह आप से काम भी चाहता है और आप के साथ कामलीला भी करना चाहता है. ऐसे में आप यह सोचें कि आप सिर्फ कामलीला कर के बच जाएंगी और औफिस का काम नहीं करेंगी तो आप गलत हैं, क्योंकि आप को काम करने के लिए ही रखा गया है.

छंटनी में आप का नंबर होगा पहला: नुकसान होने पर कंपनी में छंटनी की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. अगर आप के दफ्तर में भी छंटनी शुरू हो जाए, तो आप का नंबर सब से पहला होगा, क्योंकि आप जो भी काम कर रही हैं उस से बौस का केवल मनोरंजन हो रहा है, कंपनी का मुनाफा नहीं.

पर्सनल लाइफ में बढ़ेंगी मुश्किलें: अगर आप किसी औफिस में अपनी जवानी का इस तरह गलत फायदा उठा रही हैं तो हो सकता है कि आप की इतनी बदनामी हो कि वह बदनामी आप की पर्सनल लाइफ को भी डिस्टर्ब कर दे. यह न भूलें कि दुनिया बहुत छोटी है. आप के ये कारनामे अगर आप के होने वाले हमसफर के कानों में पड़ गए तो आप की शादी होनी मुश्किल हो जाएगी. अत: औफिस में प्रेजैंटेबल नजर आने में कोई बुराई नहीं है, बल्कि यह तो एक अच्छी आदत है, मगर बोल्ड या हौट बनने की कोशिश भूल से भी न करें वरना बदनामी और खैराती तरक्की के अलावा आप को कुछ हासिल नहीं होगा. मेहनत से मिली तरक्की आप को सम्मान और संतुष्टि का एहसास दिलाएगी और आप जिंदगी का हर पल सुकून से जी पाएंगी.            

काम बोलता है चापलूसी नहीं

माना कि इस तरह की मानसिक प्रताड़ना आप के मनोबल को कमजोर कर सकती है, जिस से आप का आत्मविश्वास डगमगा सकता है, लेकिन दूसरों की वजह से अपनेआप को कमजोर न पड़ने दें. इस में आप का ही नुकसान होगा. बेहतर यही है कि आप ऐसे लोगों की गतिविधियों को नजरअंदाज करते हुए अपने काम पर ध्यान दें और अपने काम से मतलब रखें. कुछ लोग उन की बराबरी करने के लिए खुद भी वैसा ही बनने की कोशिश करते हैं, लेकिन आप ऐसा करने की गलती न करें. दूसरों की तरह बनने के बजाय अपनेआप को संवारें ताकि लोग आप की तरह बनना चाहें. यह बात गांठ बांध लें कि अगर आप टेलैंटेड हैं, काबिल हैं तो आप को कुछ बोलने की जरूरत नहीं है, काम खुद बोलता है.

क्लीनिकल साइकोलौजिस्ट, निमिषा कहती हैं कि रिसर्च के अनुसार अकसर जब हम अंदर से कमजोर होते हैं, तो हमारा आत्मविश्वास डगमगाने लगता है, जिस से हमारे व्यक्तित्व में निम्न बदलाव आते हैं:

– हम दूसरों से खुद की तुलना करते हैं और खुद को उन से कम पाने पर अपनेआप को पीडि़त महसूस करते हैं, जो हमें मानसिक रूप से बीमार कर देता है.

– हम हीन मानसिकता का शिकार हो जाते हैं, जिस से अपनी तरक्की में हम खुद ही रुकावट बन कर खड़े हो जाते हैं.

– अपने अंदर की आग को शांत करने के लिए हम कई बार गलत राह पकड़ लेते हैं जैसे सिगरेट, शराब पीना आदि.

– बहुत ज्यादा स्ट्रैस लेने से हम कई बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं.

– हम जब अपने आसपास के वातावरण से खुश नहीं होते, तो उसे सुधारने के बजाय दूसरों को दोषी मानने लगते हैं.

– हम अपनेआप और दूसरों के आलोचक बन जाते हैं. अपने बेसिरपैर वाले आलोचनावादी विचार से अपना नुकसान तो करते ही हैं, दूसरों की आलोचना कर उन से भी रिश्ता बिगाड़ लेते हैं.

 

विद्युत सुरक्षा ऐसे करें सुनिश्चित

आग की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए विद्युत सुरक्षा की जरूरत हर व्यक्ति के लिए चिंता का प्रमुख विषय है. आजकल हो रही आग की घटनाओं के पीछे इलैक्ट्रिकल शौर्ट सर्किट को आम कारण बताया जाता है. ऐसा अकसर सुरक्षा से संबंधित महत्त्वपूर्ण सावधानियों को नजरअंदाज करने अथवा जानेअनजाने उपकरण का दुरुपयोग करने के कारण होता है.

इलैक्ट्रिकल शौक्स एवं आग की घटनाओं से मौत तक हो सकती है. ये घटनाएं अकसर वायरिंग और इलैक्ट्रिकल सिस्टम के कमजोर एवं अनुचित प्रतिष्ठापन के कारण होती हैं. अनिवार्य नैशनल इलैक्ट्रिकल कोड (एनईसी) के प्रावधानों के बारे में जानकारी रखना भी जरूरी है. आग की घटनाओं और इलैक्ट्रिकल शौक्स के खिलाफ सुरक्षा के लिए इन नियमों के क्रियान्वयन के लिए सुदृढ़ प्रमाणन प्रक्रिया का निर्माण करें.

विद्युत सुरक्षा से संबंधित सावधानियां बरतने से अपने व अपने परिवार के लिए सुरक्षित जिंदगी सुनिश्चित की जा सकती है:

– मल्टीपिन प्लग्स का इस्तेमाल कर सिंगल पौइंट (सौकेट आउटलेट) को ओवर प्लग न करें.

– प्लग्स अच्छी तरह कस कर लगाए गए हों, क्योंकि ढीले रहने पर उन में स्पार्किंग होने से आग की घटना की आशंका रहती है.

– आग बुझाने के यंत्र काम करने की स्थिति में होने चाहिए.

– ट्यूबलाइट के बजाय एलईडी बल्ब्स का प्रयोग करें. इस से बिजली की बचत भी होगी.

– बिजली के सभी उपकरण लगाने के लिए हमेशा प्रशिक्षित एवं प्रमाणित इलैक्ट्रिशियन की ही मदद लें.

– इमरजैंसी के दौरान भागने के लिए सीढि़यों एवं रिफ्यूज एरिया को खाली रखना चाहिए.

यदि आप घर पर इलैक्ट्रिक सिस्टम लगा रहे हैं, तो आप को इन उपायों को ध्यान में रखना चाहिए:

उपकरणों की सुरक्षा: अपने विद्युत उपकरणों एवं उन के तारों की नियमित जांच करें. कटेफटे अथवा क्षतिग्रस्त विद्युत तार को फौरन बदल दें अन्यथा कोई जानलेवा दुर्घटना हो सकती है. अपने विद्युत उपकरणों के पास कोई ज्वलनशील पदार्थ न रखें खासतौर से रसोई में इस बात का पूरा ध्यान रखें, जहां गैस स्टोव, सिलैंडर के कारण विद्युत उपकरणों में आग लगने की घटनाओं का सब से अधिक जोखिम रहता है. कई सारे ऐडौप्टर्स का उपयोग कर पावर पौइंट्स को ओवरलोड न करें.

उचित अर्थिंग: अर्थिंग सब से महत्त्वपूर्ण सुरक्षा उपकरण है. अर्थ्ंिग सिस्टम को दक्ष बनाए रखें. इस की जांच तकनीशियन से कराएं. इलैक्ट्रिकल लीकेज प्रोटैक्शन डिवाइसेज ऐसी स्थिति से पैदा होने वाले खतरे से बचने का सर्वश्रेष्ठ समाधान हैं.

ओवरहीटिंग का जोखिम: सभी विद्युत उपकरणों को निश्चित करंट में परिचालित करने के लिए डिजाइन किया जाता है. यदि करंट शौर्ट सर्किट, अर्थ फाल्ट अथवा इलैक्ट्रिकल ओवरलोडिंग के कारण अधिक हो जाता है, तो उपकरण ओवरहीट हो जाएगा अथवा उस में आग लग सकती है. विद्युत उपकरणों को सुरक्षित परिचालन के लिए अधिकतम कुछ कूलिंग अथवा वैंटिलेशन की जरूरत पड़ती है.

आवासीय वायरिंग: संपूर्ण वायरिंग प्रक्रिया में अमूमन 4 घटक शामिल होते हैं- पावर (मेन वोल्टेज), लोड कंडक्टर और स्विच. आवासीय परिसर में लाइटिंग एवं पावर पौइंट्स की कम से कम संख्या होनी चाहिए. घरों में विद्युत उपकरणों एवं यूपीएस आदि का अधिक इस्तेमाल होने पर आप को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि समान आकार के न्यूट्रल कंडक्टर को फेज में किया

गया है.

आउटडोर वायरिंग: इमारत के बाहर व अपने ऐरिया में लैंप पोस्ट के लिए हुई वायरिंग पर नजर रखें. खंभों अथवा पेड़ों से लटक रहे किसी भी खुले तार को ले कर सावधान रहें. यदि आप को ऐसा कुछ दिखाई देता है तो फौरन स्थानीय सेवा प्रदाता को इस की सूचना दें और इसे सही कराएं.

गगनचुंबी इमारतें

इन उपायों के अलावा गगनचुंबी इमारतों में निम्न बातों का जरूर ध्यान रखें:

विद्युत वितरण नैटवर्क: बस्बार आधारित नैटवर्क का चुनाव करें जोकि फ्लोर की पूरी ऊंचाई में केबल डालने की तुलना में भरोसेमंद एवं सुरक्षित है. केबल जौइंट्स और कनैक्शंस की समयसमय पर जांच करनी चाहिए ताकि हौटस्पौट से बचा जा सके.

लिफ्ट एवं इमरजैंसी सिस्टम्स: सुनिश्चित करें कि सर्वश्रेष्ठ उपकरण एवं ऐक्सैसरीज का इस्तेमाल किया जाए ताकि इमरजैंसी के दौरान वे आप को धोखा न दें.

रिन्यूवल्स: रिन्यूवल इंटीग्रेटेड इमारतों के मामले में इंटरकनैक्शन मामलों एवं फेल्योर के कारण बाद में इस से होने वाले नुकसान से बचने के उपाय करें.

इस के अतिरिक्त यदि आप के यहां बिजली का कोई काम हो रहा है तो इन एहतियाती कदमों से किसी भी अप्रत्याशित दुर्घटना को रोकने में मदद मिल सकती है:

– इलैक्ट्रिकल परमिट एवं इलैक्ट्रिकल इंस्टालेशन निरीक्षण आवश्यक है.

– सेवा उपकरण को कनैक्टेड लोड की आपूर्ति करने के लिए पर्याप्त क्षमता का होना चाहिए.

– सेवा उपकरण को सुरक्षा नियमों के अनुसार ही लगाया जाना चाहिए.     

– अमोल कलसेकर, चीफ मैनेजर, बिल्डिंग वायर इंटरनैशनल कौपर ऐसोसिएशन औफ इंडिया            

स्वार्थ से उठें ऊपर

रात 10 बजे कावेरी और उस के पति सोमेश सोने की तैयारी कर ही रहे थे कि तभी डोरबैल बजी. कावेरी ने दरवाजा खोला तो अपनी बेटी मिनी की घनिष्ठ सहेली तनु और उस के मम्मीपापा रवि और अंजू को सामने खड़ा पाया. कावेरी और सोमेश ने उन का स्वागत किया. मिनी और तनु दोनों सीए कर रही थीं. 10 दिन बाद ही सीए की परीक्षाएं थीं. रवि भी सीए थे.

हालचाल के बाद कौफी के घूंट भरते हुए रवि ने पूछा, ‘‘मिनी बेटा, सब समझ आ गया है न?’’

‘‘बस एक चैप्टर में कुछ चीजों में बारबार कन्फ्यूजन हो रही है, अंकल,’’ मिनी ने कहा.

 ‘‘अरे, लाओ, आया हूं तो बता देता हूं.’’

‘‘थैंक्स अंकल, अभी बुक लाती हूं,’’ मिनी उत्साहित हो उठी.

तनु भी मिनी के साथ अंदर चली गई.

तभी अंजू ने कहा, ‘‘अरे छोडि़ए, देर हो जाएगी समझाने में. अब तक तो मिनी की तैयारी हो भी चुकी होगी.’’

रवि ने कहा, ‘‘जब तक तुम कौफी पिओगी, मैं समझा दूंगा.’’

मिनी बुक ले कर आई तो अंजू ने कहा, ‘‘पहले हम कौफी पी लें, तुम लोग अंदर जा कर बातें कर लो.’’

रवि ने गंभीरतापूर्वक कहा, ‘‘आओ मिनी, बुक दिखाओ, बातों में क्यों टाइम खराब करोगी?’’

हावी होता स्वार्थ

अंजू लगातार अपनी निरर्थक बातों से पढ़ाई का यह टौपिक बदलने का प्रयास करती रही. बड़ा अजीब सा माहैल बन गया था. पति एक बच्ची की पढ़ाई में मदद करना चाह रहा था, तो पत्नी उसे ऐसा करने नहीं दे रही थी. कावेरी, सोमेश और मिनी एकदूसरे का मुंह देख रहे थे. मां की हरकतों से तनु भी शर्मिंदा दिखी.

रवि पत्नी की बातों को नजरअंदाज कर मिनी को कुछ जरूरी पौइंट्स समझाने लगे, तो जल्दी से कौफी का कप खाली कर अंजू खड़ी हो गई, ‘‘चलिए, देर हो रही है.’’

‘‘अभी थोड़ा टाइम लगेगा मुझे, आप सब लोग बातें करो तब तक.’’

‘‘नहीं, अब चलते हैं,’’ अंजू की पूरी कोशिश थी कि रवि मिनी को कुछ समझा न पाए.

तभी तनु ने कहा, ‘‘मौम, शांति से बैठो न प्लीज. 10 मिनट की बात है.’’

‘‘नहींनहीं, बहुत रात हो गई है.’’

तनु गुस्से में बोली,  ‘‘पहले ही आप इतनी रात को यहां आई हैं, क्योंकि अचानक आप का मूड बन गया था. फिर अब तो काम की बात के लिए आप को बैठने के लिए कहा जा रहा है. डैड बहुत अच्छा समझाते हैं. मिनी को भी समझने दो मौम. बहुत मुश्किल चैप्टर है.’’

‘‘नहीं, फिर कभी आएंगे. मिनी खुद कर लेगी. उस के तो 10वीं और 12वीं कक्षा में भी तुम से ज्यादा मार्क्स आए थे.’’ यह सुन कर कावेरी हैरान हो गई कि ये दिमाग में क्याक्या सोच कर रखती हैं. यह तो साफसाफ ईर्ष्या दिख रही है. दोनों सहेलिया हैं. कभी किसी के मार्क्स ज्यादा आते हैं तो कभी किसी के.

अंजू दरवाजे पर जा कर खड़ी ही हो गई तो रवि और तनु को भी उठना पड़ ही गया. रवि और तनु अंजू की इस हरकत पर शर्मिंदा दिखे.

तीनों के जाने के बाद मिनी ने उतरा चेहरा लिए कहा, ‘‘अंकल को कितनी नौलेज है. कितना अच्छा समझा रहे थे. थोड़ा टाइम और मिल जाता तो…’’

कावेरी ने बेटी को पुचकारा, ‘‘कोई बात नहीं, अंकल से फोन पर पूछ लेना या किसी दिन उन के घर चली जाना.’’

‘‘वहां भी आंटी बताने नहीं देंगी मौम. फोन पर ही कोशिश करूंगी.’’

कावेरी और सोमेश को बेटी की बात उदास कर गई. सालों पुराने संबंध में अंजू की इस हरकत से एक खटास आ गई.

कावेरी सोने तक यही सोच रही थी कि क्या हो जाता अगर रवि मिनी को कुछ समझने में मदद कर देते? स्वार्थ क्यों इनसान पर इतना हावी हो जाता है कि इनसान एकदूसरे की मदद करना, किसी के काम आना जैसे इनसानियत के मूलभूत गुण भी भूल जाता है. क्यों स्वार्थ में लोग सालोें का संबंध भुला देते हैं?

कैसे पाएं छुटकारा

तनु को भी अपनी मां के व्यवहार पर शर्म आई, रवि को भी अपनी पत्नी की मानसिकता पर दुख हुआ, यह साफसाफ दिखाई दिया. फिर अंजू का दिल इतना छोटा क्यों हो गया कि उस ने अपनी बेटी की घनिष्ठ सहेली की मदद नहीं करने दी?

येल सैंटर की एक रिसर्च के अनुसार आजकल लोगों में ईर्ष्या की भावना बढ़ गई है, जिस से लोग ज्यादा तनाव में रहने लगे हैं. ईर्ष्या की भावना कार्यक्षेत्र, परिवार, दोस्ती और रोमांस कहीं भी पनप सकती है. ईर्ष्या आप के मन की शांति न छीन ले, इसलिए आप को ईर्ष्या की भावना महसूस होते ही इस से छुटकारा पा लेना चाहिए.

आज सोशल मीडिया हमारे जीवन का एक हिस्सा हो गया है. जब हम दोस्तों को अच्छी जगह यात्रा करते, घूमते देखते हैं तो अनजाने में ईर्ष्या से भर उठते हैं.

जूडिथ और लौफ, अपनी बुक ‘इमोशनल फ्रीडम’ में कहती हैं कि किसी से अपनी तुलना न करें. ‘योको ओनो’ का कहना है कि ईर्ष्या को प्रशंसा में बदल दें और फिर देखिए यह प्रशंसा आप के जीवन का हिस्सा हो जाएगी. भले ही किसी व्यक्ति से आप को चिढ़ होती है, आप अपनी ईर्ष्या को नम्रता में बदल दें और किसी से भी अपनी तुलना से बचें.

स्वार्थी न बनें

अगर हम स्वार्थ, ईर्ष्या की भावना एक तरफ रख किसी के काम आ जाएं, तो इस से हमें क्या नुकसान हो जाएगा. आत्मविश्वासी व्यक्ति अपने जीवन में स्वार्थ और ईर्ष्या को स्थान नहीं देता.

पारुल सहगल अपने एक औनलाइन शो में कहती हैं, ‘‘ईर्ष्या इनसान के दिमाग को थका देती है. ईर्ष्या से दूर रहने के लिए सोशल नैटवर्क से ब्रेक ले लें. फेसबुक अपडेट्स, ट्वीट्स, इंस्टाग्राम की कई पोस्ट से आप को ईर्ष्या हो सकती है.’’

‘रेबेका लेमेर्सन’ का आर्टिकल ‘डोंट एन्वी मी’ हाल ही में खूब वायरल हुआ. उस  में था कि हमें दूसरों का जीवन ज्यादा सुखद लगता है. हमें लगता है सब हम से ज्यादा सुखी हैं. स्वार्थ और ईर्ष्या दोनों मजबूत से मजबूत रिश्ते में भी दरार पैदा कर सकते हैं. ये नकारात्मकता बढ़ाते हैं, जिस से हमारा खुद का जीवन ही प्रभावित होता है. इसलिए ईर्ष्यालु और स्वार्थी न बनें.     

बेअसर नोटबंदी

नोटबंदी का फरमान जारी हुए 50 से ज्यादा दिन गुजर चुके हैं, पर न तो देश में सोना बरसा है और न ही चौराहे के पुलिस वाले ने अपना हफ्ता लेना बंद किया है. देशभर में काले धन की कमाई, बेईमानी, आतंकवाद, नकली नोटों का कारोबार कोई कम नहीं हुआ दिख रहा. जो दिख रहा है, वह यह है कि गरीब आदमी अमीरों को मारने की कोशिश में मारा गया है.

भारतीय जनता पार्टी के पंडों की अगुआई में फौज ने जम कर नारे लगाए हैं कि लाइनों में लग कर गरीबों ने अमीरों की अक्ल दुरुस्त की है, पर जरा सी आंख खोल कर देखें, तो न सड़कों पर गाडि़यों की कमी हुई है, न बडे़ बाजारों में भीड़ कम हुई है और न ही शादियों का रंग फीका पड़ा है. सोने और हीरे के जवाहरात भी ठाट से उसी तरह बिक रहे हैं. अगर कुछ नहीं बिक रहा है तो वह है खेतों से अनाज, सब्जियां और मंडियों से कच्चा सामान.

नोटबंदी की गाज गिरनी थी अमीरों पर, लेकिन गिरी है छोटे आम आदमी पर, जिसे 45 सौ रुपए लेने के लिए अकाउंट खोलने पड़ रहे हैं, लाइनों में खड़ा होना पड़ रहा है. शुरू में तो इन लोगों को कमीशन का कुछ पैसा मिला, पर अब वह भी मिलना बंद हो गया, क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार ही सारा धन, काला हो या सफेद, बैंकों में जमा हो कर रिजर्व बैंक के पास पहुंच गया है. नोटबंदी की वजह से सिवा छोटे हलके नोट आए और पूरे 50 दिन देशभर में भूचाल सा आया रहा, इस के अलावा कुछ लाभ नहीं हुआ.

हो सकता है कि जिन्होंने अपना पैसा फर्जी खातों में जमा कराया था, उन्हें बाद में आयकर विभाग के लोग पकड़ें, पर वे क्या नोटबंदी का अमृत पी कर शरीफ हो गए हैं? वे भी देश का हिस्सा हैं और जानते हैं कि रिश्वत लेनादेना न तो बंद हुआ है और न हो सकता है. वे क्यों न रिश्वत की मांग कर के उन लाखों मामलों को निबटाएंगे, जिन में शक होगा कि नोटों की हेराफेरी हुई है? या तो ये मामले ऐसे ही पड़े रहेंगे या जम कर उसी तरह आयकर वाले पैसा बनाएंगे, जैसा 50 दिन बैंक वालों ने बनाया है.

रही बात चुनावों में दलों को कमजोर करने की तो वह भी आधीअधूरी लग रही है. जिन 5 राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, वहां तैयारियों में कोई फीकापन नहीं. हो सकता है कि भारतीय जनता पार्टी को फायदा हो, पर यह उस की धर्म और जाति को इस्तेमाल करने और मुसलिमों व दलितों के बारे में सोच का नतीजा होगा. नरेंद्र मोदी के यज्ञ में आखिर ऊंचों ने भाग लिया है और वे ही दिखेंगे, इस में शक नहीं. चुनावी सोच नोटबंदी को सही साबित तो नहीं करेगी.

छैमार गैंग : शादी के लिए 6 हत्याएं

कुप्रथाएं अपराधी भी बनाती हैं. लखनऊ पुलिस ने एक ऐसे लुटेरे गैंग का परदाफाश किया है, जिस के सदस्य शादी करने से पहले 6 हत्याएं करते हैं. पंजाब के इस गैंग को इस वजह से ही ‘छैमार गैंग’ के नाम से जाना जाता है. यह गैंग लूट के दौरान विरोध करने पर हत्या करता है. यह गैंग केवल उत्तर प्रदेश में ही नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली में भी डकैती डालता है. लखनऊ पुलिस ने पंजाब से आए इस गिरोह के 4 सदस्यों को एसटीएफ के सहयोग से मडियांव थाना इलाके में पकड़ा. इन के पास से 2 तमंचे, चाकू, नकदी और जेवर मिले.

3 साल पहले इस गैंग ने जौनपुर के शाहगंज इलाके में डाका डाला था. जौनपुर पुलिस ने इन के 2 सदस्यों पर 2-2 हजार रुपए का इनाम भी ऐलान कर रखा था. लखनऊ के ट्रांस गोमती इलाके के एएसपी दुर्गेश कुमार ने बताया कि रात को पुलिस को यह सूचना मिली थी कि पंजाब के ‘छैमार गैंग’ के कुछ सदस्य डकैत घैला पुल के पास मौजूद हैं. एसटीएफ के एसआई विनय कुमार और मडियांव इलाके के इंस्पैक्टर नागेश मिश्रा ने पुलिस बल के साथ इन की घेराबंदी की. पुलिस को देख कर इन डकैतों ने फायरिंग कर दी, पर जवाबी फायरिंग में ये लोग भागने लगे. इसी दौरान पुलिस ने इस गिरोह के 4 बदमाशों को पकड़ लिया. इन की पहचान कदीम उर्फ पहलवान, अली उर्फ हनीफ, मुन्ना उर्फ बग्गा और सलमान उर्फ अजीम के रूप में हुई. इन के पास से जौनपुर में हुई लूट का सामान भी बरामद किया गया.

दरअसल, ये लोग ‘छैमार गैंग’ के सदस्य थे. ‘छैमार गैंग’ पंजाब के बदमाशों द्वारा तैयार किया गया गैंग है. ये लोग लोकल अपराधियों को अपने साथ रेकी के लिए रखते हैं और उस घर की तलाश करते हैं, जहां पर इन्हें डाका डालना होता है. इस के बाद का काम ‘छैमार गैंग’ का होता था. लोकल अपराधी कत्ल करने में पीछे हट जाते थे, इसलिए ‘छैमार गैंग’ के क्रूर सदस्य कत्ल को अंजाम देते थे. ये अपना ठिकाना बदलते रहते थे, जिस से इन की शिनाख्त नहीं हो पाती थी. 6 कत्ल करने के बाद ये डकैत शादी कर अपना घर बसा लेते थे. लूट के पैसे से ये अपना काम चलाते थे.

आज भी बहुत से लोग हत्या जैसे अपराध को बाहुबल से जोड़ कर देखते हैं, जिस वजह से ऐसी प्रथाएं भी चलती हैं. अपराधी खुद का दामन बचाने के लिए ऐसी प्रथाओं का हवाला देते हैं. ये लोग अपने नाम और गैंग का नाम बदल कर आपराधिक वारदातों को अंजाम देते हैं.

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