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कृषि जगत से जुड़े मार्च के जरूरी काम

मस्ती और धूमधाम से भरपूर त्योहार होली के रंगों से सराबोर मार्च का महीना खेती के लिहाज से काफी खास होता है. किसान होली के नशे में चूर हो कर अपने खेती के जरूरी कामों को नजरअंदाज नहीं कर सकते. हकीकत तो यह है कि होली के सुरूर और जोश से किसानों के काम करने की कूवत में काफी इजाफा हो जाता है. इसी महीने रबी की तमाम खास फसलें पक रही होती हैं, तो दूसरी ओर जायद मौसम की तमाम फसलों की बोआई का सिलसिला भी चालू हो जाता है.

एक ओर गेहूं की फसल में दाने बनने लगते हैं, तो दूसरी ओर गन्ना कटाई के लिए तैयार हो जाता है. खेती की हरीभरी गतिविधियां किसानों को निहाल किए रहती हैं. आइए डालते हैं एक तीखी सी नजर मार्च महीने के दौरान किए जाने वाले खेती के खासखास कामों पर:

* बात मीठे से शुरू करें तो लहलहाते हुए गन्ने नजर आने लगते?हैं. पिछली फसल के गन्ने कटाई के लिए पूरी तरह तैयार हो चुके होते हैं, लिहाजा सहूलियत के मुताबिक यह काम निबटाएं.

* गन्ने की नई फसल की बोआई का सिलसिला भी मार्च में ही शुरू हो जाता है, लिहाजा इस काम को वरीयता दे कर निबटाना चाहिए. गन्ने की बोआई के लिए 3 आंखों वाले गन्ने के?टुकड़ों को इस्तेमाल करें.

* बोआई करने से पहले गन्ने के टुकड़ों को उपचारित करना न भूलें.

* गन्ना बोने के लिए शुगरकेन प्लांटर का इस्तेमाल करना बेहतर रहेगा. इस के जरीए बोआई करने से बोआई का काम बेहद करीने से और बराबरी से होगा.

* खेत में गन्ना बोने से पहले अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद या कंपोस्ट खाद जरूरत के मुताबिक अच्छी तरह मिलाएं. खेत में खाद मिलाने से पहले तमाम तरह के खरपतवार निकालना

न भूलें.

* किसान चाहें तो मरजी के मुताबिक गन्ने के 2 कूंड़ों के बीच लोबिया, मूंग या उड़द बो सकते?हैं. चारे के लिहाजा से बोया जाने वाला मक्का भी 2 कूंड़ों के बीच लगाया जा सकता?है. इस तरह गन्ने के साथ अतिरिक्त फसलें बो कर किसान ज्यादा फायदा उठा सकते हैं.

* इस महीने के दौरान गेहूं की बालियों में दूध तैयार होने लगता है और साथ ही दाने बनने शुरू हो जाते?हैं, लिहाजा फसल का खासतौर पर खयाल रखना चाहिए.

* गेहूं की बालियों में दूध बनने के दौरान पौधों को पानी की ज्यादा दरकार होती?है, लिहाजा खेत में नमी कायम रखना जरूरी?है. ऐसे में खेतों की सिंचाई का खास खयाल रखें.

* मार्च में अकसर तेज हवाओं और अंधड़ों का दौर चलता रहता?है. यह दौर दिन के वक्त ज्यादा चलता?है. ऐसे आलम में सिंचाई करना ठीक नहीं रहता, लिहाजा गेहूं के खेतों की सिंचाई का काम रात के वक्त निबटाएं.

* दलहनी फसल उड़द की बोआई का काम पहली से 15 मार्च के बीच निबटाना सही रहेगा. बोने से पहले उड़द के बीजों को राइजोबियम कल्चर या कार्बंडाजिम से उपचारित करें. बोआई के लिए 30 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. उड़द की बोआई लाइनों में करीब 25 सेंटीमीटर का अंतर रखते हुए करें.

* दलहनी फसल मूंग की बोआई का इरादा हो, तो इस काम को 15 मार्च के बाद कर सकते?हैं. आमतौर पर मूंग की बोआई का काम 15 मार्च से 15 अप्रैल के दौरान निबटाना मुनासिब होता?है. मूंग की बोआई के लिए भी 30 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. बोआई करने से पहले बीजों को उपचारित करना न भूलें. बोआई लाइनों में करें और लाइनों के बीच का फासला 25 सेंटीमीटर रखें.

* मार्च में सरसों की फसल पक कर तैयार हो चुकी होती है. जब सरसों की 75 फीसदी फलियां पक कर सुनहरेपीले रंग की हो जाएं, तो फसल की कटाई कर लेनी चाहिए.

* पिछले महीने बोई गई सूरजमुखी के खेतों पर नजर डालें. यदि खेतों में नमी कम दिखाई दे, तो जरूरत के हिसाब से सिंचाई करें. यदि खेत में पौधे ज्यादा घने दिखाई दें, तो अतिरिक्त पौधे उखाड़ कर मवेशियों को खिला दें. आमतौर पर 2 पौधों के बीच 2 फुट का फासला रखना सही रहता है.

* मवेशियों को चारे की दरकार हमेशा रहती है, लिहाजा उस का बंदोबस्त करना भी निहायत जरूरी है. चारे के लिहाज से मार्च में ज्वार, बाजरा व सूडान घास बोई जा सकती है.

* अपने प्याज व लहसुन के खेतों का मुआयना करें. उन की पनपती फसलों को देखभाल की काफी दरकार रहती है. इस बीच खेतों में खरपतवार काफी हो गए होंगे, लिहाजा खेतों की बाकायदा निराईगुड़ाई करें. कृषि वैज्ञानिकों से सलाह ले कर सही मात्रा में यूरिया का छिड़काव करें. यूरिया की खुराक मिलने से फसल काफी बेहतर हो जाती है.

* अपने आलू के खेतों का मुआयना करें. यदि फसल पूरी तरह तैयार हो चुकी हो, तो जल्दी से जल्दी उस की खुदाई का काम खत्म करें. खुदाई करने के बाद खेतों को आगामी फसल के लिए तैयार करें.

* मार्च का महीना गुणकारी हलदी और अदरक की बोआई के लिए भी मुफीद होता है. सब्जी और मसाले से जुड़ी अदरक और मसालों की दुनिया की रंगत हलदी की फसलें बो कर किसान काफी कमाई कर सकते?हैं.

* बोआई करने के लिए हलदी व अदरक की एकदम स्वस्थ गांठों का इस्तेमाल करें. इन की बोआई 50×25 सेंटीमीटर के फासले पर करें.

* पिछले महीने बोई गई भिंडी, राजमा व लोबिया के खेतों का जायजा लें. अगर खरपतवार दिखाई दें, तो खेतों की निराईगुड़ाई करें. निराईगुड़ाई के बाद खेतों की सिंचाई कर के टाप ड्रेसिंग के रूप में यूरिया डालें.

* ज्यादातर तो बैगन की रोपाई का काम फरवरी में कर लिया जाता?है, मगर अभी भी बैगन लगाने का इरादा हो तो मार्च में भी इस की रोपाई कर सकते?हैं. रोपाई के बाद हलकी सिंचाई करना न भूलें, इस से पौधे सही तरीके से लग जाते?हैं.

* पिछले महीने लगाए गए बैगन के पौधों की निराईगुड़ाई करें व तमाम खरपतवार निकाल दें. इस के बाद जरूरी लगे तो हलकी सिंचाई करें.

* सब्जी वाली मीठी हरी मटर का दौर जाने के बाद मार्च में दाने वाली मटर की फसल तैयार हो जाती?है. मटर की फलियां सूख कर पीली लगने लगें, तो कटाई का काम निबटाएं. मटर के दानों को गहाई के बाद इतना सुखाएं कि उन में सिर्फ 8 फीसदी नमी बाकी रहे.

* अपने आम के बागों का मुआयना करें, क्योंकि मार्च के दौरान हापर कीट व फफूंद से होने वाले रोगों का खतरा बढ़ जाता?है. बीमारियों या हापर कीट का अंदेशा लगे, तो कृषि विज्ञान केंद्र के माहिरों से सलाह ले कर दवाओं का इस्तेमाल करें.

* अपने अमरूद के बाग का भी जायजा लें. इस दौरान अमरूद के पेड़ों में तना बेधक कीट का खतरा ज्यादा होता है. ऐसा होने पर कृषि वैज्ञानिक से पूछ कर माकूल दवा का इस्तेमाल करें.

* अंगूर के गुच्छों को फूल खिलने की अवस्था में जिब्रेलिक अम्ल के 50 पीपीएम वाले घोल में पेड़ में लगी हालत में ही थोड़ी देर के लिए डुबोएं. ऐसा करने से अंगूर बिल्कुल सुरक्षित रहते हैं.

* अंगूर की फसल को कीटों व रोगों से बचाने के लिए कृषि वैज्ञानिक की सलाह ले कर दवाओं का इस्तेमाल करें.

* इस महीने पपीते के पौधे तैयार करने के लिए नर्सरी में बीज बो सकते?हैं. यदि पहले बोए गए बीजों से पौधे तैयार हो चुके हों, तो उन की रोपाई करें.

* अपने अमरूद, आम व पपीता वगैरह के पुराने बागों की सही तरीके से सफाई करें. बीचबीच में फालतू पौधे निकल आए हों, तो उन्हें जड़ से निकाल कर नष्ट कर दें.

* अगर फूलों की खेती में दिलचस्पी है, तो मार्च में रजनीगंधा और गुलदाउदी की रोपाई करें. रोपाई के बाद पौधों की हलकी सिंचाई जरूर करें.

* जाती ठंड व आती गरमी के इस मार्च महीने में गायभैंसों को अकसर अफरा की तकलीफ हो जाती?है, लिहाजा उन्हें फूली हुई बरसीम खाने को न दें.

* पशुओं के रहने की जगह पर ध्यान दें और जरूरत के मुताबिक उम्दा कीटनाशक दवाओं का छिड़काव करें ताकि हानिकारक कीड़ों से बचाव हो सके.

* होली में अकसर बच्चे मवेशियों को?भी रंगों व कीचड़ वगैरह से पोत कर सराबोर कर देते हैं, लिहाजा उन की सफाई का खास खयाल रखें. भैंसों व उन के बच्चों के फालतू बाल नाई बुला कर कटवा दें. बिलकुल छोटे बच्चों के बाल न काटें, क्योंकि उन्हें कैंची या ब्लेड लगने से नुकसान हो सकता?है.

* गायभैंसें अगर हीट में आएं तो बगैर वक्त गवांए उन्हें समय रहते अस्पताल ले जा कर या डाक्टर बुला कर गाभिन कराएं.

* मवेशी डाक्टर से पूछ कर अपने तमाम मवेशियों (गाय, भैंस, भेड़, बकरी वगैरह) को पेट के कीड़े मारने वाली दवा जरूर खिलाएं.

* मुरगियां नाजुक होती हैं, लिहाजा उन की देखभाल ढंग से करें. उन के दरबों की सफाई का पूरा खयाल रखें. 

कुछ कहती हैं तसवीरें

मेले के जलवे : ये मोहक नजारे हैं देश भर में मशहूर सूरजकुंड मेले के. हसीनाओं के मादक ठुमकों ने माहौल को नशीला बना दिया था, तो पर्दानशीन बुतों के पकवानों ने एकबारगी लोगों की भूख बढ़ा दी. दर्शकों का जोश भी काबिलेगौर था.

खोया चाकलेट बरफी गजब का स्वाद चाकलेट का अंदाज

तमाम तरह की मिठाइयां मूल रूप से खोए, अनाजों, मेवों और चीनी से ही मिल कर बनती हैं. मिठाइयां बनाने के शौकीन लोग तरहतरह के प्रयोग कर के खाने वालों को अलगअलग स्वाद का एहसास कराने की कोशिश करते रहते?हैं. खोया चाकलेट बरफी भी इसी कोशिश का नतीजा है. यह 2 तरह बनती?है. पहली खोया चाकलेट परतदार बरफी होती?है, जो खोए और चाकलेट के दोहरे स्वाद का एहसास कराती है. यह परतदार बरफी खाने में जितनी स्वादिष्ठ होती है, उतनी ही दिखने में भी अलग होती है. दूसरी किस्म की बरफी खोया चाकलेट की साधारण बरफी होती है, जिस में खोए के स्वाद में चाकलेट का अंदाज दिखता?है. दोनों ही तरह की बरफियों में खोए के साथ मेवों का इस्तेमाल किया जाता है. दोनों में फर्क यह होता?है कि परतदार बरफी में चाकलेट और खोया अलगअलग परतों में दिखते?हैं और दूसरी किस्म में केवल एक ही तरह की बरफी दिखाई पड़ती है.

खोया चाकलेट परतदार बरफी बनाने के लिए पहले खोए की परत तैयार की जाती है, फिर चाकलेट की परत तैयार होती है. दोनों को एकदूसरे के?ऊपर रख कर जमा दिया जाता?है. खोया चाकलेट की साधारण बरफी तैयार करने के लिए खोए में चाकलेट पाउडर और मेवे मिला कर एक जैसी ही बरफी तैयार की जाती है.

कुछ लोग परतदार बरफी पसंद करते?हैं, तो कुछ लोग दूसरी बरफी पसंद करते हैं. चाकलेट खोया बरफी देखने में चाकलेट पीस की तरह लगती?है. इसे और अच्छा बनाने के लिए चांदी के वर्क से सजा दिया जाता?है. खाने वाले को क्रंची स्वाद का एहसास हो इस के लिए बरफी में अलगअलग तरह के मेवे मिलाए जा सकते?हैं.

मिठाइयों की माहिर प्रिया अवस्थी कहती हैं, ‘मुझे तो चाकलेट खोया की साधारण बरफी ज्यादा अच्छी लगती है. परतदार बरफी देखने में बरफी जैसी ही लगती है, मगर साधारण चाकलेट खोया बरफी चाकलेट जैसी नजर आती?है.’

जरूरी सामग्री : खोया 300 ग्राम, चीनी पाउडर, 100 ग्राम, 5-6 छोटी इलायचियों का पाउडर. चाकलेट बरफी परत के लिए : खोया 200 ग्राम, चीनी पाउडर 70 ग्राम, कोको पाउडर 2 टेबल स्पून, घी 2 टेबल स्पून.

विधि?: खोया बरफी बनाने के लिए खोए को कद्दूकस कीजिए. फिर कढ़ाई में 1?छोटा चम्मच घी डाल कर गरम कर लीजिए. गैस एकदम धीमी रखिए. घी पिघलने के बाद कद्दूकस किया हुआ खोया और चीनी पाउडर डाल दीजिए.

लगातार चलाते हुए खोए चीनी के आपस में ठीक से मिलने तक भूनिए. सही तरह से मिलने के बाद मिश्रण को धीमी गैस पर 5-6 मिनट तक लगातार चलाते हुए पका लीजिए. फिर इस में इलायची पाउडर मिला दीजिए. प्लेट में घी लगा कर चिकना कीजिए और मिश्रण को जमने के लिए प्लेट में डालिए और घी लगे चम्मच से एक जैसा फैला कर 1 घंटे तक ठंडा होने दीजिए.

चाकलेट बरफी की परत तैयार करने के लिए कढ़ाई में एक छोटा चम्मच घी, कद्दूकस किया खोया, चीनी पाउडर और कोको पाउडर डालें. मिश्रण को धीमी आंच पर लगातार चलाते हुए खोया चीनी के मिलने तक भूनें. खोया व चीनी अच्छी तरह मिलने के बाद मिश्रण को धीमी आंच पर 4-5 मिनट तक लगातार चलाते हुए भूनें.

चाकलेट का मिश्रण बरफी जमाने के लिए तैयार है. चाकलेट वाले तैयार मिश्रण को ठंडे किए हुए बर्फी के मिश्रण के ऊपर डालिए और घी लगे चम्मच से फैला कर एक जैसा कर दीजिए. बरफी को जमने के लिए ठंडी जगह पर 2-4 घंटे के लिए रख दीजिए. इस के बाद बरफी तैयार हो जाएगी, जमी तैयार बरफी को अपने मनपसंद टुकड़ों में काट लीजिए.       ठ्ठ

महावीर जांगड़ा की नई सौगात आलू ग्रेडिंग मशीन

आलू की खेती करने के लिए बोआई से ले कर निराईगुड़ाई, मिट्टी चढ़ाने व आलू की खुदाई तक के कामों के लिए अनेक मशीनें बाजार में मौजूद हैं, जो आलू किसानों का खेती का काम आसान कर रही हैं. लेकिन मौजूदा समय में आलू की ग्रेडिंग यानी छंटाई करने वाली मशीनें न के बराबर हैं. इसी समस्या का समाधान किया है महावीर जांगड़ा ने, जो पिछले कुछ अरसे से इस मशीन को बनाने में जुटे थे. उन की मेहनत रंग लाई और उन की बनाई आलू छंटाई मशीन अब पूरी तरह तैयार है. महावीर जांगडा इस से पहले भी अनेक कृषि यंत्र बना चुके हैं. उन के बनाए यंत्रों में जड़ वाली सब्जी की धुलाई मशीन, बैड प्लांटर व मल्टी क्रौप बीजाई मशीन, स्प्रे पंप, फल ग्रेडिंग मशीनें खास हैं. अपने बनाए यंत्रों के बारे में और ज्यादा जानकारी देते हुए महावीर जांगड़ा ने बताया, ‘कृषि यंत्रों से मेरा लगाव बचपन से ही रहा?है. जब मैं छठी क्लास में था, तभी से मैं छोटेमोटे कृषि के औजार बनाने लगा था. साल 1988 में मैं बैलगाड़ी बनाने और थ्रैसर रिपेयरिंग जैसे काम भी करने लगा था.

‘साल 1990 में मैं ने 500 लीटर व 1100 लीटर के स्प्रे पंप बनाए. उसी दौरान हमारे गांव बाडोपट्टी व बहबलपुर में गाजर की खेती होने लगी. तब मैं ने गाजर, अरबी व अदरक धोने की छोटी मशीन बनाई, जिसे आसपास के लोगों ने काफी पसंद किया. उस की सफलता को देखते हुए मैं ने ट्रैक्टर के साथ चलने वाली गाजर धोने वाली मशीन बनाई, जो आज काफी पसंद की जा रही है. ‘इसी तरह सिलसिला आगे बढ़ता रहा और मैं अनेक मशीनें बनाने की दिशा में काम करने लगा. मेरे बनाए कृषि यंत्रों पर सरकार द्वारा सब्सिडी भी मिलने लगी और मैं ने अमन विश्वकर्मा इंजीनियरिंग वर्क्स के नाम से अपने कृषि यंत्रों को विस्तार दिया. ‘अभी हाल ही में मैं ने आलू की छंटाई करने वाली मशीन बनाई है. आलू की खुदाई के बाद उन की छंटाई करना भी जरूरी होता है. बीज के लिए अलग, बाजार के लिए अलग, स्टोरेज के लिए अलग आलू की छंटाई करनी होती है. मजदूरों द्वारा छंटाई करने पर ज्यादा समय लगता है. अगर हम आलू के ढेर को ज्यादा समय तक खेत में खुला छोड़ देंगे तो उन पर सूरज की रोशनी पड़ने से वे हरे हो जाते हैं. इसलिए आलू के ढेर को कपड़े, टाट या बोरी से ढेर को ढक देना चाहिए, जिस से हवा तो पास हो लेकिन धूप न लगे. हवा लगने के बाद जब आलू की मिट्टी सूख जाए तो उन की छंटाई करनी चाहिए. बड़े, मध्यम व छोटे आलू को बाजार भेज दिया जाता है. बीज के लिए मध्यम आकार के आलू ठीक रहते हैं. उन्हें अगले साल के बीज के लिए रख लिया जाता है.

‘2 हार्स पावर की मोटर से चलने वाली हमारी आलू ग्रेडिंग मशीन को ट्रैक्टर के साथ जोड़ कर भी चलाया जा सकता है. आलू छंटाई मशीन को ट्रैक्टर से जोड़ कर एक स्थान से दूसरे स्थान तक आसानी से ले जाया जा सकता है. आलू छंटाई मशीन की काम करने की कूवत 40 से 50 क्विंटल प्रति घंटा है. यह मशीन आलू की 4 साइजों में छंटाई करती है. पहले भाग में 20 से 35 मिलीमीटर, दूसरे भाग में 35 से 45 मिलीमीटर, तीसरे भाग में 45 से 55 मिलीमीटर और चौथे व आखिरी भाग में सब से बड़े आकार के आलू छंटते हैं. ‘इस मशीन की सब से खास बात यह है कि ग्रेडिंग करते समय आलू को किसी तरह का नुकसान नहीं होता. जैसा आलू डालोगे वैसा ही निकलेगा. आलू छंटाई के समय ही सीधे बोरे में भरा जाता है. बोरों को मशीन से लगा दिया जाता है, जिस की सुविधा मशीन में की गई है. इस आलू ग्रेडिंग मशीन की कीमत तकरीबन 1,65000 रुपए रखी गई है. ‘इस मशीन के विषय में या हमारी किसी भी अन्य मशीन के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए आप विकास जांगड़ा से मोबाइल नंबर 09813048612 व महावीर जांगड़ा से मोबाइल नंबर 09896822103 पर बात कर सकते हैं.’

 

 

 

 

समेकित खेती प्रणाली ने अनीता को दिलाई अलग पहचान

अगर इनसान में कुछ कर गुजरने का जज्बा होता है, तो कामयाबी उस के कदम चूमती है. नालंदा जिले के चंडी प्रखंड के अनंतपुर गांव की रहने वाली अनीता कुमारी का जज्बा कुछ ऐसा ही है. अनीता ने बताया कि वे बीए (गृहविज्ञान) पास कुशल गृहणी थीं. उन के पति संजय कुमार बीए पास करने के बाद नौकरी की तलाश में काफी भटके, मगर जब नौकरी नहीं मिल पाई तो खेती करने लगे. उन लोगों के पास खेती लायक 3 एकड़ 23 डिसीमल जमीन थी.

पति के साथ मेहनत करने के बाद किसी तरह अनीता के परिवार का गुजारा चल रहा था. अनीता सोचती थीं कि किस प्रकार से बच्चों को अच्छी तालीम दी जाए. इसी समस्या को ले कर अनीता कृषि विज्ञान केंद्र हरनौत गईं. वहां के कार्यक्रम संचालक से उन की मुलाकात हुई. उन्होंने अनीता को मशरूम उत्पादन की सलाह दी. कार्यक्रम संचालक के सहयोग से अनीता कृषि तकनीकी प्रबंध अभिकरण (आस्था) के जरीए सब से पहले रांची के कृषि विश्वविद्यालय गईं. वहां उन्होंने मशरूम उत्पादन के तौरतरीके सीखे और उस के फायदे आदि के बारे में जानकारी हासिल की. इस के बाद अनीता ने राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय पूसा, समस्तीपुर और पंतनगर के कृषि विश्वविद्यालय में जा कर मशरूम उत्पादन के साथसाथ उस के बीज उत्पादन की तकनीक भी सीखी. आज अनीता इस काम में इतनी माहिर हो चुकी हैं कि अपने गांव में रोजाना 100 किलोग्राम मशरूम उत्पादन के लक्ष्य को अगले सीजन तक हासिल कर लेंगी. अनीता के समझाने से 200 लोग मशरूम उत्पादन की तालीम ले चुके हैं, जिन में ज्यादातर महिलाएं?हैं. इन लोगों ने मशरूम उत्पादन भी शुरू कर दिया है.

अनीता मशरूम के बीज भी तैयार कर रही हैं. कृषक हित समूह की सचिव अनीता विकलांग महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनाने में जुटी?हैं. राष्ट्रीय बागबानी मिशन के तहत अनीता को मशरूम स्पानलैब स्थापित करने के लिए करीब 15 लाख रुपए की जरूरत थी. उन्हें सरकार की ओर से 90 फीसदी सब्सिडी यानी 13 लाख 50 हजार रुपए अनुदान के रूप में दिए गए. मशरूम उत्पादन व मधुमक्खीपालन की बदौलत अनीता की डिमांड जिले और राज्य के बड़े अधिकारियों के किचन तक हो गई?है. ग्रामीण महिलाओं की माली हालत सुधारने के लिए राज्य सरकार की ओर से चलाए जा रहे ग्रामीण जीविकोपार्जन कार्यक्रम ‘जीविका’ की जिम्मेदारी भी उन्हीं को दी गई है.

समेकित कृषि प्रणाली ने अनीता व उन के परिवार की हालत ही बदल दी है. आज अनीता बदहाली की जिंदगी से निकल कर खुशहाल जिंदगी गुजार रही हैं. आज वे मशरूम उत्पादन, मशरूम बीज उत्पादन, मछलीपालन, मधुमक्खीपालन व मुरगीपालन वगैरह के साथसाथ अन्य फसलों की खेती भी कर रही हैं.

मशरूम व मशरूम बीजों की 5 जिलों में बिक्री : अनीता आज मशरूम उत्पादन कक्ष व मशरूम बीज लैब की स्थापना कर चुकी हैं. उन के यहां रोजाना 20 किलोग्राम मशरूम का उत्पादन हो रहा है. इस के अलावा रोजाना 100 किलोग्राम मशरूम बीज का उत्पादन भी हो रहा है. मशरूम व मशरूम के बीजों को 5 जिलों भागलपुर, पटना, हाजीपुर, नालंदा व मुंगेर में सप्लाई किया जा रहा है.

पटना के 575 घरों में हो रही होम डिलीवरी : अनीता मशरूम का अचार भी बनाती है. उन का क्षितिज एग्रोटेक से टाईअप हुआ है. इस के जरीए पटना के 575 घरों में मोबाइल से होम डिलीवरी हो रही है. शहद, अचार, सत्तू, आटा, चावल, मसूर दाल, चना दाल, अरहर दाल व बासमती चावल की डिलीवरी की जा रही है. वे एमेजेन कंपनी से भी बात कर रही?हैं, ताकि उन के उत्पाद देश के हर राज्य व विदेशों में रहने वाले लोगों को आसानी से मिल सकें. हर साल 3 क्विंटल शहद का उत्पादन : अनीता को मधुमक्खी के 50 बक्सों से हर साल 3 क्विंटल शहद हासिल हो रहा है. इस से करीब 45000 रुपए सालाना की आमदनी हो रही है.

सम्मान से काम का जोश बढ़ा : साल 2012 में उन्हें बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर द्वारा नवाचार कृषक पुरस्कार से नवाजा गया. साल 2015 में उन्हें भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली द्वारा जगजीवन राम अभिनव किसान पुरस्कार से नवाजा गया. इन सम्मानों से नवाजे जाने पर अनीता कहती हैं कि यह तो उन के काम का इनाम है. ये पुरस्कार मिलने से उन में नया जोश व उत्साह पैदा हुआ है और भविष्य में कुछ और बेहतर करने की प्रेरणा मिली है.

ई मंडी किसानों के लिए दूर की कौड़ी

काफी तामझाम के साथ पिछले साल कुछ राज्यों में शुरू की गई ई मंडी फिलहाल किसानों से काफी दूर नजर आ रही?है. ज्यादातर किसान इस में खास दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं. पिछले दिनों केंद्र सरकार ने माना है कि ई कृषि बाजार में किसानों की दिलचस्पी नहीं जग सकी है. इस में किसानों की दिलचस्पी बढ़ाने और ज्यादा किसानों को इस से जोड़ने के लिए योजना बनाने की दरकार है. अब ई मंडी को सहकारी बैंकों से जोड़ने की बात की जा रही है. जानकार बताते हैं कि किसानों को ई मंडी से जोड़ने के लिए सहकारी बैंकों को?भी उस से जोड़ने की जरूरत?है. गौरतलब है कि अधिकतर किसानों के खाते सहकारी बैंकों में ही हैं. ई मंडी किसानों और अनाज कारोबारियों के बीच जगह नहीं बना सकी है. कृषि विभाग का दावा है कि पिछले साल तक 10 राज्यों में 250 अनाज मंडियों को इलेक्ट्रोनिक सिस्टम से जोड़ा जा चुका है, जबकि हकीकत यह है कि 250 ई मंडियों में से केवल 100 ही काम कर रही हैं.

केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह का मानना है कि सभी राज्यों के कृषि विभागों को अपनेअपने राज्यों में ई मंडी को ले कर वर्कशाप आयोजित करने और किसानों को इस के बारे में जानकारी देने की जरूरत है. अभी किसानों के लिए यह मुश्किल और समझ के बाहर की चीज लग रही है, जिस वजह से किसान ई मंडी से कतरा रहे हैं. नकदी की किल्लत को दूर करने में ई मंडी की खासी भूमिका हो सकती है. आनलाइन भुगतान से किसानों और कारोबारियों को नकदी के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा. किसान रामप्रवेश सिंह कहते हैं कि ई मंडी से जुड़ने पर बड़े किसानों और कारोबारियों को फायदा हो सकता है. कोई संगठन या समूह यदि इस से जोड़ा जाए तो उन्हें ई मंडी से ज्यादा फायदा हो सकता है. छोटे और मंझोले किसानों को खास फायदा नहीं है, इसलिए वे ई मंडी में दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं.

गौरतलब है कि इलैक्ट्रानिक कृषि बाजार को पिछले 1 जुलाई को मंजूरी दी गई थी. किसानों, व्यापारियों, आयातकों, निर्यातकों को उस से जोड़ा गया है. सरकार का दावा है कि आनलाइन ट्रेडिंग होने से कृषि बाजार में पारदर्शिता आएगी. इस का सब से बड़ा मकसद किसानों को बिचौलियों से बचाना है. देश के 8 राज्यों में 21 कृषि मंडियों को इलेक्ट्रानिक मंडी का रूप दिया गया. इस के लिए राष्ट्रीय कृषि बाजार पोर्टल की शुरुआत की गई. कृषि बाजार में बिचौलयों की गहरी पैठ है और वे किसानों के उत्पादों को काफी कम कीमत पर खेतों से ही उठा लेते हैं. किसान भी औनेपौने भाव में अपने उत्पादों को बेच देते है, क्योंकि उन्हें बाजार की जरा सी भी समझ नहीं है और न ही बाजार तक उन की पहुंच है. गुजरात, तेलंगाना, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा में ई मंडी की शुरुआत की गई थी. उस के जरीए गेहूं, मक्का, ज्वार, चना, बाजरा, आलू, कपास समेत 25 फसलों को सूचीबद्ध किया गया है. 1 जुलाई 2018 तक 585 व्यापार बाजारों को ई मंडी से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है.

केंद्रीय कृषि मंत्री दावा करते हैं कि ई मंडी से किसानों को उन की उपज की बेहतर से बेहतर कीमत मिल सकेगी. किसानों को यह पता नहीं होता है कि उन के उत्पाद की बाजार में क्या कीमत है? किसानों के लिए किसी लाइसेंसधारी खरीदार के बारे में पता लगाना भी मुश्किल होता है. ई मंडी के जरीए किसान अपने घर बैठे ही अपने उत्पादों की कीमत और मांग का पता लगा सकेंगे.

सरकार ने काफी ई मंडियों का बुनियादी ढांचा तो तैयार कर लिया है, लेकिन किसानों की दिलचस्पी नहीं होने से वे सफेद हाथी बन कर रह गई हैं. कृषि विभाग का दावा है कि सितंबर 2016 तक करीब 47000 कारोबारियों, 26000 कमीशन एजेंटों और करीब डेढ़ लाख किसानों का ई मंडी में रजिस्ट्रेशन किया जा चुका?है. इतना ही नहीं 14 राज्यों से 400 मंडियों को इलेक्ट्रोनिक सिस्टम से जोड़ने का प्रस्ताव केंद्रीय कृषि मंत्रालय को मिल चुका है. हर मंडी को विकसित करने पर 5 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं. मंडी के कारोबार को अपडेट करने के लिए 1 वाच टावर बनाया गया है और फसलों की कीमतों को दिखाने के लिए 5 एलईडी टीवी लगाए गए हैं.

किसान भले ही ई मंडी से कम जुड़ रहे हों, लेकिन सरकार इस बात के लिए अपनी पीठ थपथपा रही है कि पायलट परियोजना में ही करीब 450 करोड़ रुपए मूल्य के डेढ़ लाख टन कृषि उत्पादों का ई कारोबार हो चुका है. पायलट परियोजना में केवल 25 उत्पादों को कारोबार की मंजूरी दी गई थी, जो अब बढ़ कर 69 हो चुकी है. पहले चरण में मार्च 2018 तक 585 मंडियों के जोड़ने का लक्ष्य रखा गया था, पर मार्च 2017 तक ही 400 मंडियों के ई मंडी में तब्दील होने का अंदाजा है. कुछ पढ़ेलिखे किसान ई मंडी की ओर कदम बढ़ाने लगे हैं. मंडी के सीजन में रोजाना काफी ज्यादा अनाज बिखर कर बरबाद हो जाता है. किसान उमेश कुमार बताते हैं कि किसान मंडी में अनाज बेचने आते हैं, तो वहां तक लाने, बेचने के लिए जमीन पर रखने और उसे दोबारा पैक करने के दौरान काफी अनाज गिर कर बरबाद होता है. नीलामी के दौरान प्लेटफार्म से ले कर तोल स्टैंड तक किसानों की मेहनत से पैदा किया गया काफी अनाज बरबाद होता है. ई मंडी से किसानों के जुड़ने से उन की मेहनत की कमाई बरबाद नहीं होगी और उन की आमदनी में भी इजाफा हो सकेगा.

ई मंडी : एक नजर

* ई मंडी एक साफ्टवेयर है, जिस में किसान अपने उत्पादों से संबंधित डाटा अपलोड कर सकते?हैं.

* आनलाइन देश की विभिन्न मंडियों के उत्पादों की कीमत पता लगा सकेंगे.

* ई मंडी से जुड़ने के लिए किसानों को मंडी लाइसेंस लेना होगा, उस के बाद तमाम राज्यों की मंडियों में उत्पाद बेचने की छूट होगी.

* किसान किसी भी मंडी से अपनी फसलों का सौदा तय कर सकते?हैं.

* इस से किसानों को बिचौलियों और कालाबाजारियों से छुटकारा मिल सकेगा.

* खरीदार फसलों की खरीद पर पैसा सीधे किसान या व्यापारी के बैंक एकाउंट में जमा करेंगे. मंडी शुल्क की राशि मंडी के एकाउंट में जमा करनी होगी.

गुणों की हिफाजत करे सब्जियों की प्रोसेसिंग

सब्जियों की प्रोसेसिंग का खास मकसद उन का इस प्रकार रखरखाव करना है, ताकि उन्हें बाजार की मांग के हिसाब से कभी भी इस्तेमाल में लाया जा सके. ज्यादा हुई पैदावार की प्रोसेसिंग कर के फसल के दौरान हुए नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है. सेहत के प्रति लोगों की जागरूकता की वजह से सब्जियों की प्रोसेसिंग में इजाफा हुआ है. लोगों के तेजी से शहरों में बसने व औरतों के घर से बाहर काम के लिए जाने की वजह से इतना समय नहीं होता कि सब्जियों को छील कर पकाया जा सके, इसलिए लोग प्रोसेस्ड सब्जियों को खरीदना पसंद करने लगे?हैं. इस के अलावा सब्जियों की प्रोसेसिंग किसानों की आमदनी बढ़ाने व गांवों में रोजगार देने में काफी मददगार साबित हो रही है.

खाने की चीजों को लंबे समय तक रखने के लिए तापमान का उपचार देना प्रोसेसिंग कहलाता है. डब्बाबंदी उद्योग में डब्बों में गरम या?ठंडा करने के उपचार देने को प्रसंस्करण कहते हैं. गरम या?ठंडा करना जीवाणुओं को खत्म करने के लिए किया जाता?है. ज्यादातर अम्लीय सब्जियों से?भरे डब्बों को 110 डिगरी सेंटीग्रेड तापामन में उपचार कर प्रसंस्करित किया जाता है. अम्ल की वजह से जीवाणुओं का विकास रुक जाता?है और उन के बीजाणु बनना भी बंद हो जाते हैं. डब्बों में इस्तेमाल की गई चीनी की चाशनी भी जीवाणुओं को रोकने में मददगार होती है.

प्रसंस्करण से सब्जियों का इस प्रकार रखरखाव किया जाता?है, ताकि उन्हें बाजार की मांग के मुताबिक कभी भी इस्तेमाल में लाया जा सके. प्रसंस्करण द्वारा जरूरत से?ज्यादा पैदावार व कटाई के बाद के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है. प्रसंस्करण अपना कर हम सब्जियों के 100 फीसदी उत्पादन का इस्तेमाल कर सकते?हैं. सब्जियों के प्रसंस्करण से निम्न फायदे हैं:

* कीमती उत्पाद बनाने के लिए उत्पादन का बिना खराब हुए पूरा इस्तेमाल किया जा सकता है.

* एक जगह से दूसरी जगह तक ले जाने और रखरखाव की लागत में काफी हद तक कमी की जा सकती है.

* बिना मौसम के और पूरे साल सब्जियों के संरक्षित उत्पादों द्वारा ताजी सब्जियों जैसा आनंद लिया जा सकता है.

* सब्जी उत्पादों में बेहतर गुणवत्ता नियंत्रण बनाए रखा जा सकता है.

सब्जी प्रसंस्करित उत्पादों को तैयार करने के लिए बहुत से तरीके?हैं, जिन्हें अपना कर हम सब्जियों का पूरी तरह से फायदेमंद इस्तेमाल कर सकते हैं. सब्जी गूदा और जूस : कुछ सब्जियों जैसे?टमाटर को कई तरह के उत्पादों को तैयार करने के लिए उस और गूदे के रूप में परिरक्षित किया जा सकता?है. सब्जी रस व गूदा की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि उन्हें निकाले जाने के एकदम बाद सुरक्षित किया जाए.

टमाटर का इस्तेमाल पूरे साल सभी सब्जियों में व दूसरी खाने की चीजों में किया जाता है. बड़े कारोबारियों द्वारा टमाटर का परिरक्षण साबुत टमाटर या इस का रस निकाल कर और गाढ़े गूदे के?रूप में किया जाता?है. टमाटर का दूसरा खास उत्पाद चटनी या सास है. बाजार में टमाटर के ये पदार्थ काफी महंगे बिकते?हैं, यही वजह है कि ये पदार्थ आम आदमी खरीद नहीं पाता है.

टमाटर का पकाया हुआ गाढ़ा गूदा (बीज और छिलके समेत) ताजे टमाटर जैसा ही काम करता है. इस गूदे को टमाटर क्रश या साबुत टमाटर का गूदा कहते?हैं. पूरे साल में केवल कुछ हफ्ते ही?टमाटर सस्ते और काफी मात्रा में मिलते?हैं. ऐसे समय पर?टमाटर का गूदा गाढ़ा कर के रखा जा सकता है. गाढ़े गूदे में ग्लेशियल ऐसेटिक एसिड डाल कर 5 मिनट तक आग पर पकाने के बाद रसायन डाल कर गूदे को परिरक्षित किया जा सकता है. यह रसायन फफूंदी और दूसरे जीवाणुओं को गूदे को खराब करने से रोकता है और उस के रंग, स्वाद व पौष्टिकता को ठीक बनाता है.

कम लागत वाले उपाय : रस और गूदे का परिरक्षण कम लागत वाला सब से बढि़या तरीका है, अगर उसे गरम या पाश्चुरीकृत कर के कार्क के ढक्कन वाली बोतलों में रखा जाए. इस के अलावा दूसरा उपाय यह?है कि रस या गूदे के परिरक्षक के लिए उस में केएमएस के नाम से लोकप्रिय पोटेशियम मेटाबाइ सलफाइट जैसे रसायनिक परिरक्षण मिलाए जाएं.

उच्च तकनीक प्रसंस्करण : गूदा परिरक्षण के लिए मौजूद तकनीकों में त्वरित प्रशीतन (तेजी से ठंडा करने वाली) सब से अच्छी तकनीक है, क्योंकि इस से गूदे में कुदरती गुण बने रहते?हैं. बरफ से?ठंडी की जाने वाली सब्जियों की गुणवत्ता को बनाए रखने में प्रशीतन दर की खास भूमिका है. बेहतर गुणवत्ता हासिल करने के लिए त्वरित प्रशीतन की जरूरत होती है.

बल्क एसेप्टिक पैकेजिंग के उत्पादों को खास तरीके से पैकेज किया गया भोजन माना जाता?है, जिस से कि गूदे को विसंक्रमित कर के उसे बिना दोबारा गरम किए विसंक्रमण के लिए एसेप्टिक वातावरण के तहत विसंक्रमित पैकेजिंग सामग्री में पैक कर दिया जाता है.  एसेप्टिक प्रसंस्करित भोजन में रस अलग नहीं होते जो कि आमतौर पर दोबारा गरम करने के दौरान हो जाते?हैं, जिस से उन के स्वाद में इजाफा होता है और साथ ही ऊर्जा की खपत भी कम होती है. इस के अलावा इस से पैकेजिंग सामग्री और ढुलाई लागत में?भी काफी बचत होती है. ज्यादातर सब्जी उत्पाद जैसे कि पेय, कैचअप, चटनी आदि गूदे या रस से तैयार किए जाते?हैं. बल्कि एसेप्टिक पैक गूदे को इस्तेमाल करने का सब से बड़ा फायदा यह?है कि इस से ऐसी सब्जियों जो जल्दी खराब होने वाली होती?है, के रखरखाव से बचा जा सकता है. इस के अलावा छिलका व बीज के?रूप में निकाली गई फालतू सामग्री को?भी कई उत्पादों में इस्तेमाल किया जा सकता?है.

टमाटर का गूदा बनाना

पके हुए लाल व सख्त टमाटरों को धो कर काला व हरा हिस्सा अलग करने के बाद छोटे टुकड़ों में काटें.

स्टील के भगोने में डाल कर कटे हुए टमाटरों को आग पर पकाएं और थोड़ा ठंडा होने पर मिक्सी में पीस कर गूदा बनाएं. गूदे को तब तक उबालें जब तक कि उस का वजन एकतिहाई रह जाए और गाढ़ा पेस्ट बन जाए. उस के बाद 5 मिलीलीटर ग्लेशियल ऐसीटिक एसिड प्रति किलोग्राम गूदे के हिसाब से डाल कर 5 मिनट तक दोबारा पकाएं. 0.4 ग्राम पोटेशियम मेटाबाइसल्फाइट व 0.2 ग्राम सोडियम बेंजोइट प्रति किलोग्राम गूदे के हिसाब से थोड़े पानी में?घोल कर गूदे में मिलाएं. तैयार गूदे को सूखे कांच के जार में मुंह तक?भर दें. जार को बंद करने के बाद सूखी व ठंडी जगह पर रखें.

सब्जी की प्रोसेसिंग

सब्जियों को लवणीय जल या 3 फीसदी नमक, 0.8 फीसदी एसीटिक एसिड और 0.2 फीसदी पोटेशियम मेटाबाइसलफाइट के साधारण घोल में भिगो कर परिरक्षित किया जा सकता?है. उस के बाद सब्जी के?टुकड़ों को अचार या चटनी बनाने में इस्तेमाल किया जा सकता है. सब्जियों के तरहतरह के रूप जैसे फांकें, क्यूब्स, कतरन आदि एल्यूमीनियम की?ट्रे में रख कर डीहाइड्रेटर में रख कर सुखाए जा सकते हैं. सुखाने से पहले तैयार सब्जियों को पोटेशियम मेटाबाइसलफाइट के घोल में उपचारित कर दिया जाए तो अच्छा रहता है. ऐसा करने से कीड़े व फफूंदी आदि नहीं लगते और रंग भी चमकदार हो जाता है. सूखे पदार्थों को सील बंद कर के डब्बों में बंद कर के रखा जाता?है, जिस से नमी की मात्रा सूखे पदार्थों को नुकसान नहीं पहुंचा पाती है.

किण्वन विधि से भी सब्जियों का प्रसंस्करण किया जाता है. इस विधि में न केवल सब्जियों को नष्ट होने से बचा सकते हैं, बल्कि इस से उन के पौष्टिक व खनिज तत्त्व भी कम नष्ट होते?हैं. किण्वन के दौरान सब्जियों में लैक्टिक अम्ल बनाने वाले जीवाणुओं द्वारा सब्जियों की कुदरती शक्कर लैक्टिक अम्ल में बदल दी जाती है. यह लैक्टिक अम्ल सब्जियों को परिरक्षित करने में मददगार होता है. खुंबी के प्रसंस्करण के लिए खुंबी को तोड़ कर साफ पानी से धोया जाता है. परिरक्षण से पहले 2-3 मिनट तक उबलते हुए पानी में डाला जाता?है, ताकि भंडारण के समय इन का रंग अच्छा रहे. ताजे पानी में 2 फीसदी नमक, 2 फीसदी चीनी, 0.5 फीसदी साइट्रिक एसिड, 1 फीसदी ऐस्कोरबिक और 0.1 फीसदी पोटेशियम मेटाबाइसलफाइड मिला कर रासायनिक घोल तैयार किया जाता है. उपचारित खुंबी को शीशे के जार में भर देते?हैं और तैयार किया गया घोल इतनी मात्रा में डालते हैं कि खुंबी उस में अच्छी तरह डूब जाए. जार को अच्छी तरह ढक्कन लगा कर बंद कर के ठंडी जगह पर रखा जाता है.

प्रसंस्करण और भंडारण में सब्जियों की गुणवत्ता को बनाए रखना बहुत जरूरी?है. पहले छीलने और काटे जाने वाली सब्जियां आसानी से धोई जा सकने वाली होनी चाहिए ताकि उन की गुणवत्ता अच्छी बनी रहे. इसलिए अच्छी गुणवत्ता की तैयार सब्जियों के लिए प्रसंस्करण से पहले सब्जियों की सावधानी से छंटाई जरूरी है. गाजर, आलू, मूली और प्याज के लिए अच्छी किस्म का होना बहुत जरूरी है. उदाहरण के लिए गाजर और शलजम में रेशेदार भाग उत्पादों में इस्तेमाल नहीं किए जा सकते, क्योंकि ये उत्पाद की गुणवत्ता पर असर डालते हैं. प्रसंस्करण से पहले सब्जियों को क्लोरीन (25-50 पीपीएम) के घोल से धोना चाहिए और उस के बाद क्लोरीन की मात्रा कम करने के लिए उन को पेय जल में भिगो देना चाहिए. यदि छीलने की जरूरत हो तो चाकू से छीला जाना चाहिए. पहले से छीले हुए और फांकें किए गए सेबों और आलुओं का भूरा होना एक समस्या है, जिस से बचने के लिए उन्हें हलके सल्फाइट के?घोल में डालना चाहिए.

जब सब्जियों की बहुतायत होती है, उस समय सब्जियों की वैज्ञानिक ढंग से प्रोसेसिंग कर के उन को उस वक्त इस्तेमाल किया जा सकता?है, जब उन का मौसम नहीं होता?है. इस प्रकार सब्जियों को इच्छानुसार कभी भी इस्तेमाल किया जा सकता है.

प्रसंस्करण उत्पादों पर असर डालने वाली वजहें

*      सब्जियों की बाहरी और अंदरूनी गुणवत्ता (किस्म, बढ़वार के हालात, कटाई, नुकसान, आयु वगैरह.)

*      छीलने और काटने से पहले और बाद में सब्जियों की धुलाई.

*      छीलने व काटने का तरीका.

*      धुलाई के समय इस्तेमाल किए गए पानी की गुणवत्ता.

*      पैकिंग विधियां और सामग्री.

*      भंडारण का तापमान.

 

अभिषेक बहुगुणा, बिरेंद्र प्रसाद व संध्या बहुगुणा

 

उड़द की आधुनिक खेती

दलहनी फसलों में उड़द की एक खास जगह है. शाकाहारी व्यक्तियों के लिए प्रोटीन की जरूरत पूरी करने में दलहनी फसलों का खास योगदान है. दलहनी फसलों में प्रोटीन की मात्रा 15 से 34 फीसदी पाई जाती है. दलहनी फसलों की खेती से मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ती है. इन फसलों की खेती में नाइट्रोजन वाले उर्वरक कम डालने की जरूरत पड़ती है, क्योंकि इन फसलों की जड़ों की गांठों में पाए जाने वाले जीवाणुओं द्वारा वायुमंडल से नाइट्रोजन ले कर इक्ट्ठा किया जाता है. लिहाजा दलहनी फसलों की खेती करने से किसानों को दोहरा मुनाफा मिलता है.

उड़द की खेती आधुनिक विधि से करने में उपज ज्यादा होती है. यदि कोई किसान फसल पकने के समय खड़ी फसल से फलियों की तोड़ाई कर लेता है, तो खेत में बचे हुए खाली पौधों की खेत में ही जुताई कर देने से मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ व जीवाणुओं की मात्रा में इजाफा होगा, जिस से कि अगले मौसम में उस खेत में दूसरी फसल को लाभ पहुंचता है. जमीन का चुनाव : उड़द की खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी जिस में पानी की रुकावट न हो बढि़या मानी गई है. वैसे किसी भी तरह की मिट्टी में इस की खेती कामयाबी से की जा सकती है.

बोने का सही समय : उड़द की बोआई के लिए मार्च का पहला हफ्ता मुनासिब माना जाता है. लेकिन इस की बोआई अपै्रल तक की जा सकती है. उड़द की बोआई अरहर के साथ मिला कर मिलवां खेती के रूप में की जाती है. अच्छी उपज के लिए समय से बोआई करना मुनासिब रहता है.

बीज की मात्रा : 1 हेक्टेयर बोआई के लिए करीब 25 से 30 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है. जहां तक हो सके प्रमाणित बीज का ही इस्तेमाल करें, जो कि सरकारी बीज गोदामों या कृषि विश्वविद्यालयों पर मिलता रहता है. सरकारी बीज की दुकानों से भी बीज ले सकते हैं.

बोआई : उड़द की खेती के लिए कूंड़ों में बोआई करना ठीक रहता है. इस में कूंड़ से कूंड़ की दूरी 30 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 10 सेंटीमीटर रखनी चाहिए. उड़द की बोआई बिखेर कर करनी चाहिए, क्योंकि पाटा लगाते समय यदि बीज इकट्ठा हो जाएंगे तो एक ही स्थान पर पौधों की संख्या ज्यादा हो जाएगी व फसल की बढ़वार नहीं होगी.

बीज उपचार :  बोआई से पहले बीजों का उपचार करना जरूरी होता है. यह काम कम लागत में किया जा सकता है. यह फसल की अच्छी पैदावार व बीमारियों की रोकथाम के लिए बेहतर होगा. 3 ग्राम थीरम प्रति किलोग्राम बीज की दर से ले कर बीजों को उपचारित करने के बाद बीजों को राईजोबियम कल्चर के 1 पैकेट से 10 किलोग्राम बीजों की दर से उपचारित करें, इस से फसल की पैदावार में बढ़ोत्तरी होगी.

खाद व उर्वरक : दलहनी फसलों की खेती में उर्वरकों का कम इस्तेमाल करना चाहिए. यदि कंपोस्ट व गोबर की सड़ी हुई खाद मौजूद हो, तो उसे खेत में जरूर डालें. इस से मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरा शक्ति बढ़ती है. उड़द की खेती के लिए 15 से 20 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस और 20 से 30 किलोग्राम गंधक प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई से पहले इस्तेमाल करने से उपज में इजाफा होगा.

सिंचाई : जायद मौसम में उड़द की खेती करने के लिए सिंचाई की जरूरत पड़ती है. हर हफ्ते जरूरत के मुताबिक सिंचाई करनी चाहिए. गरमी में पानी की ज्यादा जरूरत पड़ती है.

खरपतवारों की रोकथाम : बोआई के 20 से 25 दिनों बाद निराई व गुड़ाई कर के समय से खरपतवारों को निकाल देना चाहिए. चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के लिए खरपतवार नाशक दवा का भी इस्तेमाल किया जा सकता है. इस के लिए फल्यूक्लोरीन 45 फीसदी दवा की 2 लीटर मात्रा 700 से 800 लीटर पानी में घोल कर बोआई से पहले छिड़काव कर के खेत में मिला देना चाहिए. यदि यह दवा न मिले तो दूसरी दवा लासों की 4 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से 700 से 800 लीटर पानी में घोल कर बोआई के तुरंत बाद छिड़काव करें.

उड़द के खास कीट

काला लाही (माहूं) : पौधे से फली निकलने की अवस्था में इस कीट के शिशु व वयस्क पौधों की पत्तियों पर पाए जाते हैं. ये बसंतकालीन फसल की कोमल टहनियों, फूलों व कम पकी फलियों से रस चूसते हैं, जिस से पौधे कमजोर हो जाते हैं. मानसून से पहले हलकी बारिश होने पर फलियां और दाने कमजोर होते हैं. पुरवा हवा बहने से गरमी की फसल पर इन की संख्या अचानक तेजी से बढ़ सकती है.

रोकथाम : माहूं का हमला होने पर पीले चिपचिपे ट्रैप का इस्तेमाल करें, जिस से माहूं ट्रैप पर चिपक कर मर जाएं. परभक्षी काक्सीनेलिड्स या सिरफिड या क्राइसोपरला कार्निया का संरक्षण कर के 50000-100000 अंडे़ या सूंडि़यां प्रति हेक्टयर की दर से छोड़ें. नीम का अर्क 5 फीसदी या 1.25 लीटर नीम का तेल 100 लीटर पानी में मिला कर छिड़कें. ज्यादा प्रकोप होने पर मेटासिस्टाक्स 25 ईसी या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल या डाइमेथोएट 30 ईसी का 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी का छिड़काव करें.

हरा फुदका (जैसिड) : फसल की शुरुआती अवस्था से ले कर इस के शिशु व वयस्क पौधों की पत्तियां व फलियां निकलने तक आक्रमण कर के रस चूसते हैं. इस से पत्तियां पीली पड़ जाती हैं और आखिर में सूख कर झड़ने लगती हैं.

रोकथाम : कीट की संख्या नुकसान के स्तर से ऊपर जाते ही मेटासिस्टाक्स 25 ईसी या डाइमेथोएट 30 ईसी या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल या थायोमेक्जाम 25 ईसी का 1 मिलीमीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें.

सफेद मक्खी : ये कीट पौधों से रस चूस कर पत्तियों पर रस छोड़ते हैं. द्रव पर काला चूर्णी फफूंदी (शूटी मोल्ड) के पनपने और फैलने के कारण प्रकाश संश्लेषण की क्रिया बाधित होती?है. पीला मोजैक के विषाणु के तेजी से फैलाव से पत्तियां पीलीपड़ जाती हैं और फलियां कम लगती हैं और उन का आकार सामान्य से छोटा होता है. उन में दाने पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते. फसल पूरी तरह से बरबाद हो जाती है.

रोकथाम : बोआई से 24 घंटे पहले डायमेथोएट 30 ईसी कीटनाशी रसायन से 8.0 मिलीलीटर प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार करना चाहिए. मिथाइल डेमीटान (मेटासिस्टाक्स) 25 ईसी का 625 मिलीलीटर या मैलाथियान 50 ईसी या डायमेथोएट 30 ईसी का 1 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से जरूरत पर छिड़काव करना चाहिए.

थ्रिप्स : उड़द की फसल पर फूल की दशा में गरमी की बोआई में थ्रिप्स का मुलायम कलियों पर हमला होता है. ये कीट फूलों को बहुत नुकसान पहुंचाते हैं. बसंत व गरमी में फूल खिलने से पहले ही झड़ जाते हैं. दाने सही तरह से नहीं बन पाते. सभी रस चूसक कीटों में थ्रिप्स सब से ज्यादा नुकसानदायक है.

रोकथाम : जमीन में नमी की कमी होने पर 1 बार हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए ताकि थ्रिप्स के हमले को कम किया जा सके. थ्रिप्स की रोकथाम के लिए फूल खिलने से पहले ही डायमेथोएट 30 ईसी या मैलाथियान 50 ईसी का 1 लीटर प्रति हेक्टेयर या मेटासिसटाक्स 25 ईसी का 700 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

खास रोग

पीली चितेरी रोग (येलो मोजेक) : यह विषाणु द्वारा पैदा होने वाला सब से ज्यादा विनाशकारी रोग है. यह विषाणु बीज व छूने से नहीं फैलता. पीली चितेरी रोग सफेद मक्खी (बेमिसिया टैबेसाई) जो एक रस चूसक कीट है, के द्वारा फैलता है. इस रोग की उग्र दशा में 100 फीसदी तक उपज का नुकसान होता है. जो पौधे शुरुआत में ही रोग ग्रसित हो जाते है, वे बिना कोई उपज दिए ही खत्म हो जाते हैं.

रोकथाम : रोग रोधी प्रजातियां नरेंद्र उड़द 1, आईपीयू 94-1 (उत्तरा), आजाद उड़द 1, केयू 300, शेखर 2 आदि लगाएं. सफेद मक्खी की रोकथाम के लिए फसल पर मेटासिस्टाक्स या डामेथोएट या मोनोक्रोटोफास (0.04 फीसदी) से छिड़काव करना चाहिए.

झुर्रीदार पत्ती रोग (लीफ क्रिंकल) : यह रोग उड़द बीन लीफ क्रिंकल विषाणु द्वारा होता है. रोग का फैलाव पौधे के रस व बीज से होता है. यह खेत में लाही (माहूं) व अन्य कीटों द्वारा भी फैलता है. इस रोग के लक्षण फसल बोने के 3-4 हफ्ते बाद नजर आते हैं. रोगी पत्तियों की परत पर सिकुड़न (झुर्रियां) व मरोड़पन होता है. रोगी पौधों में फूल देर से आते?हैं और वे छोटे व गुच्छेदार हो जाते हैं. अधिकतर कलिकाएं व फूल पूरी तरह से बढ़वार होने से पहले ही गिर जाते हैं.

रोकथाम : यह रोग सफेद मक्खी या माहूं द्वारा फैलता है, इसलिए इस की रोकथाम करने के लिए फसल पर मेटासिस्टाक्स या मैलाथियान या डायमेथोएट या मोनोक्रोटोफास (0.04 फीसदी) से छिड़काव करना चाहिए.

सर्कोस्पोरा पत्र बुंदकी रोग (सर्कोस्पोरा लीफ स्पाट) : इस रोग के लक्षण पत्तियों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे के रूप में दिखाई देते हैं. धब्बों का बाहरी भाग भूरे रंग का होता है. ये धब्बे पौधे की शाखाओं व फलियों पर भी बन जाते हैं. सही वातावरण में ये धब्बे बड़े आकार के हो जाते हैं और फूल आने व फलियां बनने के समय रोगी पत्तियां गिर जाती हैं.

रोकथाम : बोआई से पहले बीजों को कवकनाशी कार्बाडेंजिम 2 ग्राम या थीरम 2-5 ग्राम से प्रति किलोग्राम की दर से उपचारित करना चाहिए. फसल पर रोग के लक्षण दिखाई पड़ते ही कार्बेंडाजिम (0.1 फीसदी) या मैंकोजेब (0.2 फीसदी) कवकनाशी के घोल का छिड़काव करना चाहिए.

चूर्णी फफूंदी रोग (पाउड्री मिल्ड्यू) : यह रोग इरीसिफी पोलीगोनाई नामक कवक द्वारा पैदा होता है. गरम और सूखे वातावरण में यह रोग तेजी से फैलता है. इस रोग में पौधों की पत्तियों, तनों व फलियों पर सफेद चूर्णी धब्बे दिखाई देते हैं. ये धब्बे बाद में मटमैले रंग के हो जाते हैं. रोग के बहुत ज्यादा प्रकोप से पत्तियां पूरी विकसित होने से पहले ही सूख जाती हैं.

रोकथाम : फसल पर रोग के लक्षण दिखाई देते ही कार्बेंडाजिम 1 ग्राम या सल्फेक्स 3 ग्राम का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए.

राइजोक्टोनिया जाल अंगमारी (वेब ब्लाइट) : यह रोग राइजोक्टोनिया सोलेनाई नामक कवक द्वारा पैदा होता है, जो माकूल वातावरण मिलने पर जल्दी ही फैल कर डंठल व तने तक पहुंच जाता है. इस रोग में पत्तियां पहले पीली और बाद में भूरे रंग की हो कर सूख जाती हैं. ज्यादा प्रकोप में धब्बे पकी फलियों पर भी दिखाई देते हैं.

रोकथाम : बोआई से पहले बीजों को कवकनाशी जैसे थीरम या वाइटावैक्स की 2.5 ग्राम मात्रा से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर के बोना चाहिए. खड़ी फसल में संक्रमण दिखाई देने पर कार्बाडेंजिम (बेनोमिल) का 1 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए.

कटाईगहाई

जब फसल 80 फीसदी तक पक जाती है, तो उसे जड़ से उखाड़ लेते हैं. उड़द की फलियां गुच्छों में लगती हैं. पूरी फसल में फलियों को 2 से 3 बार में तोड़ लिया जाता है. आमतौर पर खरीफ की फसल में कुछ फलियां आखिर तक बनती रहती हैं. ऐसी दशा में पकी फलियों को तोड़ना फायदेमंद होगा. तकरीबन 80 फीसदी फलियां पकने पर फसल की कटाई कर सकते हैं. पकी फसल पर बारिश होने की हालत में फलियों के अंदर दाने जमने लगते हैं. इसलिए मौसम को ध्यान में रखते हुए फसल की कटाई व फलियों की तोड़ाई करना फायदेमंद रहता है.

उपज : उड़द की औसत उपज 10 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है. वैज्ञानिक विधि से खेती करने पर इस की पैदावार 25 क्विंटल प्रति हेक्टयर तक ली जा सकती है.

सिर्फ कोहली नहीं, ये भी हुए हैं ‘डक’ के शिकार

टीम इंडिया के कप्‍तान विराट कोहली के नाम के आगे 0 का स्‍कोर आमतौर पर कम ही दिखाई देता है. इस दौर में तो शायद बिल्‍कुल नहीं जब विराट करियर के सर्वश्रेष्‍ठ बल्‍लेबाजी फॉर्म से गुजर रहे हैं. ऑस्‍ट्रेलिया के खिलाफ पुणे टेस्‍ट में जब विराट बिना कोई रन बनाए आउट हुए तो स्‍टेडियम में मौजूद दर्शकों के चेहरे पर निराशा साफ देखी जा सकती थी.

बाएं हाथ के तेज गेंदबाज मिचेल स्‍टार्क ने जब विराट को 0 के स्‍कोर पर आउट किया और ऑस्‍ट्रेलियाई टीम के खिलाड़ि‍यों की खुशी का ठिकाना नहीं था. आखिर क्‍यों न हो, विराट को वह टीम इंडिया का सबसे खतरनाक बल्‍लेबाज मान रही थी.

टेस्‍ट क्रिकेट के लिहाज से विराट दो साल से अधिक समय के बाद 0 के स्‍कोर पर आउट हुए हैं. इससे पहले वे 7 अगस्‍त 2014 से ओल्‍डट्रेफर्ड, मैनचेस्‍टर टेस्‍ट की पहली पारी में बिना कोई रन बनाए आउट हुए थे. समग्र रूप से देखें तो 104 इंटरनेशनल मैचों (टेस्‍ट, वनडे और टी20) के बाद विराट 0 के स्‍कोर पर आउट हुए हैं  आखिरी बार वे वर्ष 2014 में कार्डिफ वनडे में बिना कोई रन बनाए आउट हुए थे.

भारतीय क्रिकेट टीम में विराट के अलावा कई ऐसे बल्लेबाज भी हैं जिनके नाम एकदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट इतिहास में सबसे ज्यादा शून्य पर आउट होने का रिकॉर्ड है. अगर भारत के टॉप-5 ऐसे बल्लेबाजों की बात की जाए जो अपने एकदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट करियर में सर्वाधिक बार शून्य पर आउट हुए हैं तो उनमे सभी दिग्गज शामिल हैं.

लेकिन उस सूची में एक नाम ऐसा भी है जिसका नाम क्रिकेट जगत के सबसे महान बल्लेबाजों की कतार में शामिल है और हमेशा ही रहेगा. वह नाम कोई और नहीं बल्कि क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले भारतीय टीम के पूर्व महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर का है. जो अपने एकदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट करियर में सबसे ज्यादा शून्य पर आउट हुए हैं. वह अपने करियर में 20 बार शून्य पर आउट हुए हैं जो भारतीय क्रिकेट इतिहास में सबसे ज्यादा है. उनके अलावा और भी कई ऐसे दिग्गज हैं जिनका नाम इस सूची में शामिल है.

एकदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में भारत की तरफ से शून्य पर आउट होने वाले टॉप बल्लेबाज

बल्लेबाज

मैच

शून्य

सचिन तेंदुलकर

463

20

जवागल श्रीनाथ

229

19

अनिल कुंबले

269

18

युवराज सिंह

290

18

हरभजन सिंह

234

17

सौरव गांगुली

308

16

 

मिल गई इनकम टैक्स न भरने वालों को माफी

इनकम टैक्स अच्छे-अच्छों की नींद उड़ा देता है. कुछ महानुभाव लोग तो साम दाम दंड भेद से इसके शिकंजे से बच जाते हैं, पर कुछ मासूमों पर आयकर भी भारी मार पड़ती है. ये वे लोग हैं जिनको टैक्स काटने के बाद ही सैलेरी नसीब होती है. सरकार के भी रंग अजीब हैं. सरकार ने नोटबंदी कर ईमानदारों की नींद हराम करने में कोई कसर बाकी न रखी. जो धांधली करते थे, धांधली करने के नए तरीके कब का निकाल चुके होंगे.

सरकार ने टैक्स न भरने वालों पर एक बार फिर दया दिखाई है. केंद्र सरकार ने 100 रुपए तक के बकाया इनकम टैक्स वाले लोगों का टैक्स माफ कर दिया है. ऐसे करीब 18 लाख बकाएदार हैं, जिनके ऊपर 100 रुपए तक का आयकर बकाया है. केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड और सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज ने मिलकर यह फैसला लिया है.

सरकार का नुकसान, आपका फायदा

सरकार के इस फैसले से सरकार को तकरीबन 7 करोड़ रुपए नुकसान होगा. बताया जा रहा है कि इस फैसले से करीब 18 लाख मामले खत्म हो जाएंगे. इसका मसकद प्रशासनिक कार्यकुशलता में सुधार करना और कर संग्रह की लागत कम करना है. जिन लोगों के बस कुछ रुपयों के कर बकाए हैं उन्हें आसानी से रिफंड दिया जा सकेगा.

वित्त मंत्री ने भरी हामी

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी इस माफीनामे पर अपनी मुहर लगा दी है. जेटली ने इस कदम को डेलीगेशन ऑफ पावर रूल्स, 1978 के तहत मंजूरी दी है, जिसमें वित्त मंत्री को कोई भी टैक्स बकाया माफ करने का अधिकार है. इस नियम के तहत मुख्य आयुक्तों को 25 लाख रुपये तक का बकाया माफ करने का अधिकार है.

इनका टैक्स हुआ माफ

100-5000 रुपए तक के बकाया टैक्स के करीब 22 लाख मामले सरकार के पास लंबित हैं. इनमें से सरकार ने 100 रुपए तक के इनकम टैक्स एरियर माफ कर दिए हैं यानी कुल 18 लाख बकाया टैक्स देनदारों को बड़ी राहत मिल गई है.

इसलिए लिया गया ये फैसला

टैक्स चोरी करने वालों कड़ी कार्रवाई करने के बजाए नर्मी से पेश आने की भी वजह है. सरकार ने इस फैसले के पीछे वाजिब कारण भी दिए हैं. सरकार ने पैसे और समय बचाने के लिए यह कदम उठाया है.18 लाख लोगों से 100 रुपये टैक्स वसूलने पर सरकार को उतना टैक्स नहीं आता जितना 18 लाख लोगों से बकाया वसूलने में आयकर विभाग का पैसा खर्च हो जाता. इसी तरह से 100-5000 रुपए तक के बकाया टैक्स के करीब 22 लाख मामले सरकार के पास लंबित हैं.

गौरतलब है कि सरकार को इस फैसले पर घेरा जा सकता है, जैसा की होता आया है. पर सरकार ने अपना काम आसान करने के लिए ही यह नर्मी दिखाई है. सरकार के इतने मेहरबान होने की असल वजह तो सरकार से संबंधित लोग ही जाने. पब्लिक सब जानते हुए भी खामोश है, क्योंकि वोट डालने के अलावा वो हाथ उठाए भी तो कैसे उठाए.

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