Download App
Home » पृष्ठ 3750

धर्मजनित विचारशून्यता

देश के साथ कठिनाई यह है कि यहां गंभीर व पेचीदा मामलों पर बहस न के बराबर होती है और उन के हल निकालने के प्रयास किए ही नहीं जाते जबकि निरर्थक, निरुद्देश्य मामलों से अखबार और स्क्रीनें पटी रहती हैं. बुद्धिजीवी तक हैरान रहते हैं कि अगर प्रचार माध्यमों में गंभीर मामलों के हल को ढूंढ़ने के प्रयास न होंगे तो क्या पीपल के पेड़ के नीचे या चौराहे पर चाय की दुकानों में होंगे.

पिछले दिनों क्या सुर्खियां बनीं? आईपीएल का घोटाला और मोदीआडवाणी महाभारत. दोनों में देश के हितअहित का कोई प्रश्न नहीं. दोनों से गरीब की रोटी में कोई वृद्धि नहीं होती. दोनों का बढ़ती महंगाई, घटती कार्यकुशलता, बेकारी, कानूनी अव्यवस्था से कोई संबंध नहीं. पर देश के बुद्धिजीवी तक इन मामलों पर अपने सद्विचार देते नजर आए, मानो आईपीएल में फिक्सिंग किसी विदेशी ताकत का हमला हो और मोदीआडवाणी युद्ध धार्मिक युद्ध ही रहा हो जिस में घर जल रहे हों या निर्दोष लोगों की मौत हो रही हो.

नक्सली समस्या ने छत्तीसगढ़ में इस दौरान सिर उठाया, कांग्रेसी नेताओं की हत्याएं हुईं पर दूसरे दिन ही मामले को अखबारों के पृष्ठ 14 पर दफन कर डाला गया. यह हमारी पुरानी कमजोरी है जिस के कारण हम 2000 साल से भी ज्यादा गुलाम रहे हैं. हम अपनी हर समस्या का निदान तो किसी भगवान पर छोड़ देते हैं, यज्ञ, हवन कर लेते हैं, दिनों नहीं महीनों चर्चा करते रहते हैं.

देश की समस्याएं जस की तस हैं तो इसलिए कि उन्हें पैदा करने वाले जानते हैं कि कोई न तो समस्याओं के बारे में ज्यादा पूछताछ करेगा न यह बताएगा कि इन का हल क्या हो. अगर इन बातों को कहीं गंभीरता से लिया जाएगा तो बंद गोष्ठियों में लिया जाएगा जहां न जनप्रतिनिधि होंगे न नीति निर्धारक.

देश में जो भी थोड़ीबहुत चमक दिख रही है वह निजी फायदे के लिए किए गए फायदों और नईनई तकनीक के कारण दिख रही है. तकनीक तो हम बाहर से खरीद रहे हैं और निजी फायदे के कामों में नेता और अफसर मोटी रिश्वतें खा रहे हैं. धर्मजनित विचारशून्यता इस देश की सब से बड़ी कमजोरी है और हर नए दिन यह बीमारी फैलती नजर आ रही है.

 

भाजपा का खयालीपुलाव

नरेंद्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी का मुख्यतम नेता मान लेने में ही जिन्हें भलाई दिख रही है उन्होंने जिस तरह का हंगामा खड़ा किया वह आने वाले दिनों का संकेत दे रहा है. नरेंद्र मोदी का बुलडोजर भारतीय जनता पार्टी के रहेसहे देश के प्रति चिंता करने वाले नेताओं को रौंद कर धार्मिक संकीर्णता की कंटीली झाडि़यों के लिए जगह खाली करने को चल पड़ा है.

वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने भांप लिया कि नरेंद्र मोदी फैक्टर न भारतीय जनता पार्टी के लिए हितकारी है न देश के लिए और न ही उन के बचेखुचे दिनों के लिए. नरेंद्र मोदी को इस समय भारतीय जनता पार्टी के लिए पार्टी सौंपना अनिवार्य है क्योंकि 2014 के चुनाव के लिए जो पैसा चाहिए वह सिवा गुजरात के और कहीं से नहीं मिल सकता और धर्मभीरु गुजराती सेठ नरेंद्र मोदी जैसे कट्टरवादी को पूरा समर्थन देने को तैयार हैं, खासतौर पर तब जब वे नियमकानून को ताक पर रखने की हिम्मत रखते हों.

भारतीय जनता पार्टी की दिल्ली की बागडोर उन हाथों में है जो आजमाए हुए हैं पर असफल हैं. राजनाथ सिंह बेमुरव्वती से अध्यक्ष पद से हटाए जा चुके हैं और उन के राज्य उत्तर प्रदेश में भाजपा साफ हो चुकी है. अरुण जेटली सफल वक्ता व वकील हैं पर चुनाव नहीं लड़ सकते. सुषमा स्वराज अपने गृहराज्य हरियाणा से कोसों दूर हैं. कर्नाटक के अनंत कुमार या आंध्र प्रदेश के वेंकैया नायडू अपने राज्यों में पार्टी को 2-4 सीटें भी नहीं जिता सकते.

इन नेताओं के पास नरेंद्र मोदी के अलावा कोई चारा नहीं, चाहे उन की पैठ गुजरात के बाहर केवल उच्च वर्गों के कट्टर हिंदूपंथियों तक ही क्यों न हो. इस वर्ग का पार्टी और उस के  आका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर पूरा कब्जा है और ये इस मौके को खोना नहीं चाहते कि कहीं नरेंद्र मोदी की कलई बिहार के लालू यादव की तरह न खुल जाए. नरेंद्र मोदी को हड़बड़ी में पार्टी की कमान सौंपना जरूरी है क्योंकि बाकी सभी नेता अपने कमजोर हाथों को जानतेपहचानते हैं.

लालकृष्ण आडवाणी ने 3 दिन तक मंथरानुमा नाटक किया पर इस पर जीत न मिली. नरेंद्र मोदी पार्टी की चमक बने रहे पर उन का कद थोड़ा घट जरूर गया. वे अब मुखर, रोबीले और दंभी तरीके से व्यवहार करने से कतराएंगे. यह भी स्पष्ट हो गया है कि पार्टी लालकृष्ण आडवाणी जैसों के बगैर एक नहीं रहेगी और उस का 2014 के चुनाव जीतने का सपना फिलहाल खयालीपुलाव से ज्यादा नहीं है.

बीमा कंपनियों पर चिदंबरम की लगाम

बीमा क्षेत्र में सरकार को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. सरकार को बड़ा लाभांश देने वाली सरकारी बीमा कंपनियां इधर कुछ ढीली पड़ गई हैं जिस से सरकार की चिंता बढ़ी है. इस चिंता की बड़ी वजह बीमा कंपनियों की अंधी कमाई पर रोक और आम निवेशक का ध्यान रखे बिना मोटी रकम ऐंठने की नीतियों पर चला बीमा नियामक संगठन-‘इरडा’ का डंडा है.

इरडा ने बीमा कंपनियों की मनमानी पर लगाम कसी है. खासकर यूनिट लिंक्ड इंश्योरैंस प्लान यानी यूलिप से जुड़े विवाद के बाद पता लगा कि इस क्षेत्र में अंधी कमाई हो रही है. पहले जीवन बीमा निगम का एकछत्र राज था. वह जो भी पौलिसी लाती, चल पड़ती थी. उस की मनमानी पर अंकुश निजी?क्षेत्र की कंपनियों के बीमा क्षेत्र में आने के बाद शुरू हुआ. बीमा कंपनियों की मनमानी को रोकने के लिए सरकार ने इरडा का गठन किया.

इरडा ने यूलिप विवाद के सितंबर 2010 में कुछ नए दिशानिर्देश तैयार कर लागू किए जिस का सीधा लाभ उपभोक्ता को होने लगा. बीमा कंपनियों की मनमानी इन नियमों से नियंत्रित हुई लेकिन कंपनियों का मुनाफा घटने लगा. सरकारी और निजी क्षेत्र की कंपनियां उपभोक्ताओं पर मनमानी करने से कतराने लगीं. लाभ का धंधा माना जाने वाला बीमा व्यवसाय ठंडा पड़ गया तो वित्तमंत्री पी चिदंबरम को?स्वयं दखल देना पड़ा और उन्होंने बीमा कंपनियों, खासकर जनरल और जीवन बीमा कंपनी के विकास पर कड़ी निगाह रखनी शुरू कर दी. उन्होंने कंपनियों को हर माह प्रगति रिपोर्ट देने को भी कहा है.

बीमा क्षेत्र में वे विदेशी निवेश के पक्षधर हैं और इस के लिए वे विपक्षी दलों के साथ 49 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति देने पर भी विचार करने को तैयार हैं. जनता के हितों की बात करते ही लाभ पर कैंची चलती है तो सब की आंखें खुलने लगती हैं लेकिन जब जनता की जेब कटती है तो सभी आंखें मूंदे रहते हैं. यह स्थिति चिंतनीय है और जनहित को महत्त्व दिया जाना जरूरी है. 

गठबंधन की गांठ

नरेंद्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी की बागडोर सौंप देने पर कभी उस की साथी रही कई पार्टियों का राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से हट जाना आश्चर्य की बात न होगी. बिहार के नीतीश कुमार ने तो नाता तोड़ ही लिया है. हालिया उपचुनाव में महाराजगंज की सीट पर लालू यादव के उम्मीदवार की जीत के बावजूद उन्होंने अपना गुस्सा दिखा दिया.

जयललिता अभी भारतीय जनता पार्टी का साथ दे रही हैं पर चुनावों के नजदीक उन्हें एहसास हो जाएगा कि न केवल मुसलिम, दलित व अति पिछड़े भी नरेंद्र मोदी के हिंदुत्व और विरोधियों को सबक सिखाने की रणनीति का कोई स्वागत न करेंगे.

1998 के बाद भारतीय जनता पार्टी को जो सफलता मिली उस का बड़ा कारण बाबरी मसजिद का ढहाना नहीं था, कांग्रेस के नेतृत्व का ढह जाना था. 1991 में प्रधानमंत्री बने नरसिम्हा राव नेता की मिट्टी के नहीं बने थे. वे वैसे ही प्रदेशीय नेता थे जैसे नरेंद्र मोदी हैं और कांग्रेस की रगरग की उन्हें कोई पहचान न थी. उन्होंने कांग्रेस का बेड़ा गर्क किया तो भारतीय जनता पार्टी को ही नहीं कई और पार्टियों को पैर जमाने का मौका मिल गया.

जो पार्टी 1984 में 400 सीटें जीती थी और अगले चुनाव में उस को हार का सामना करना पड़ा तो उस की वजह थी विश्वनाथ प्रताप सिंह की साजिश और राजीव गांधी का नौसिखियापन. पर 2004 तक सोनिया गांधी ने सिद्ध कर दिया कि विषम स्थितियों में लड़ने की उन की क्षमता अन्य किसी नेता से ज्यादा है, नरेंद्र मोदी से भी ज्यादा.

यह बात राज्यों के दूसरी पार्टियों के नेता समझते हैं और इसीलिए पूर्णबहुमत न होने के बावजूद 2004 से 2009 और 2009 से अब तक कांग्रेस राज भी करती रही व रिश्वतखोरी भी करती रही. अन्ना हजारे की मुहिम भी उसे न हिला पाई.

नरेंद्र मोदी के खाते में केवल 2002 के हिंदू-मुसलिम दंगे हैं जिन से कट्टर हिंदू बेहद खुश हैं और आज ढोल बजा रहे हैं पर आम भारतीय शंकित व भयभीत है. प्रकाश सिंह बादल को छोड़ कर कोई नरेंद्र मोदी से खुश नजर नहीं आ रहा पर यह नहीं भूलना चाहिए कि 1947 से 1990 तक हुए सिख-हिंदू विवाद में भारतीय जनता पार्टी के नरेंद्र मोदी टाइप नेता ही अकालियों का विरोध करते रहे हैं.

राजनीति कोई सीधीसपाट सड़क नहीं है. इस में घेरे और घेरों में?घेरे होते हैं. नरेंद्र मोदी अपने दंभी व ‘मैं ही सही हूं’ वाले व्यवहार से एनडीए समर्थित पार्टियों को साथ ले चल सकेंगे, असंभव लगता है. अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी कट्टर होते हुए भी कम से कम सौम्य तो थे. कोई आश्चर्य नहीं कि बिहार के नीतीश कुमार के तलाक के बाद और पार्टियों ने भी इस की तैयारी करनी शुरू कर दी हो.

 

विरोधाभासों की नौकरी

कुछ समय पहले एक सर्वेक्षण आया था कि उड्डयन जैसे क्षेत्र में भी युवाओं को रोजगार के लिए परेशान होना पड़ रहा है. देश या विदेश में भारी खर्च कर के युवा पायलट या चालक दल का सदस्य बनने के लिए ठोकरें खा रहा है लेकिन उसे रोजगार नसीब नहीं हो रहा. सरकारी विमानन कंपनी से ज्यादा पाने के चक्कर में निजी क्षेत्र में गए अनुभवी पायलट भी परेशान हैं. इस खबर को देख कर लगा कि किसी भी क्षेत्र में जाइए, नौकरी का बड़ा संकट है. लेकिन यदि आप में काबिलीयत है तो सफलता हाथ पकड़ कर मंजिल तक ले जाएगी और फिर सारी सुविधाएं दे कर शर्त भी रखेगी कि यही नौकरी करनी पड़ेगी.

नागरिक उड्डयन प्राधिकरण ने भी आजकल यही नीति अपना ली है. उस की दिक्कत है कि केबिन क्रू यानी चालक दल के सदस्य बिना पूर्व सूचना के इस्तीफा दे देते हैं. इस तरह की स्थिति में एअरलाइंस के लिए यात्रियों को गंतव्य तक पहुंचाने का संकट पैदा हो जाता था. कंपनी की अंतिम समय में उड़ान तक रद्द करनी पड़ती थी जिस से यात्रियों को भी दिक्कत होती.

प्राधिकरण के लिए कर्मचारियों का यह रुख जनहित के विरुद्ध है और कर्मचारी के खिलाफ कार्यवाही करने वाला कदम है. कई विदेशी एअरलाइंस के साथ भारतीय एअरलाइंस का कड़ा कंपीटिशन चल रहा है और आखिरी क्षण में यदि चालक दल के सदस्य के त्यागपत्र के कारण उड़ान रद्द होती है तो कंपनी की परेशानी बढ़ जाती है. इस तरह की संकटकारक स्थिति से निबटने के लिए प्राधिकरण को फिलहाल एक बड़ा कदम यही सूझा है कि अब पूर्व सूचना दिए बिना कोई क्रू सदस्य इस्तीफा नहीं देगा. इस्तीफा देने के लिए उसे कम से कम 3 महीने पहले सूचना देनी होगी. इस तरह की लगाम कसने से स्थिति कितनी नियंत्रित होगी, यह तो समय ही बताएगा लेकिन इस से साफ हो गया है कि कंपनी और कर्मचारियों का एकदूसरे के लिए विशेष महत्त्व है और उन्हें परस्पर सहयोग के जरिए ही आगे बढ़ना चाहिए.

सबकुछ गांव में ही रखा है

अब तक गांव का गरीब और कमजोर रोजगार की तलाश में शहरों में?भटकता था और रोजीरोटी का जुगाड़ होने के बाद बेहतर भविष्य के लिए शहरों में ही पूरी तरह पलायन कर जाता था. लेकिन अब स्थिति बदलने लगी है. ‘इतिहास स्वयं को दोहराता है’ वाली कहावत सच होती दिखाई दे रही है. जीवन को आसान और आरामदायक बनाने के नाम पर शहरों को बरबाद कर चुकी धुरंधर कार निर्माता कंपनियां अब गांव की तरफ रुख कर रही हैं. उन का यह रुख चालाकीभरा है. वे गांव को सिर्फ कमाई के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश में हैं. ये कंपनियां गांव में आम आदमी को रोजगार देने नहीं जा रही हैं बल्कि गांव की संपन्नता का दोहन करने के लिए वहां पहुंचने की रणनीति बना रही हैं. इन के कारखाने शहरों और महानगरों में ही रहेंगे, लेकिन बाजार गांव होगा.

कार निर्माता कंपनियों का कहना है कि गांव में संपन्नता है. संयुक्त परिवार की परंपरा है और अच्छा बाजार भी है इसलिए कसबों व?छोटे शहरों में?डेरा डाल कर उन तक पहुंचना है. महानगरों में कारों की बिक्री का आंकड़ा कुछ कमजोर हो रहा है लेकिन गांव में 2011 में कारों की बिक्री 15 फीसदी बढ़ी है. वर्ष 2012 में यह 17 प्रतिशत रही और 2014 तक इस के 20 फीसदी तक पहुंचने की उम्मीद है. तेजी से बढ़ रहे ग्रामीण बाजार को कंपनियां भुनाना चाहती हैं और लगभग हर मौडल की कार गांव तक पहुंचाना चाहती हैं.

 

कमजोर अर्थव्यवस्था में भी बाजार आसमान पर

शेयर बाजार में मई में उछाल का दौर रहा. सूचकांक थोड़ाबहुत उतारचढ़ाव के बीच भी लगभग तेजी पर ही रहा. अफवाहों के कारण कुछ दिन जरूर हलके रहे लेकिन ज्यादा समय तक बाजार में तेजी का ही रुख रहा. 8 मई को बीएसई का सूचकांक इस वर्ष दूसरी बार 20 हजार अंक के?स्तर को पार कर गया. इस से पहले ऐसा 18 जनवरी को हुआ.

बाजार में मजबूती का रुख रहा बढ़त का सिलसिला थमा नहीं और 16 मई को यह लगातार 3 दिन की बढ़त के बाद 28 माह के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया. इस दिन बाजार ने भले ही मामूली 34 अंक की बढ़त हासिल की थी लेकिन यह स्तर बाजार को लंबे समय बाद मिला है जिस से निवेशकों के चेहरों पर खुशी थी.

इस से पहले 29 अक्तूबर, 2007 को बाजार पहली बार 20 हजार अंक के पार पहुंचा था और फिर 8 जनवरी, 2008 को यह 21 हजार के स्तर को भी पार कर गया?था. फिर मंदी का दौर शुरू हुआ और बाजार ने लोगों को खूब छकाया.

बाजार कमजोर अर्थव्यवस्था के बावजूद ऊंचाई पर है और ब्याज दरें भी बढ़ नहीं रही हैं लेकिन शेयर सूचकांक चढ़ रहा है. विश्लेषकों को यह ट्रैंड समझ नहीं आ रहा है. उन का कहना है कि यह स्थिति स्थायित्व प्रदान करने वाली नहीं है. हालांकि कुछ जानकार कहते हैं कि कुछ माह तक बाजार में रौनक का यही माहौल बना रहेगा. ब्याज दरों में कटौती होती है तो भी सूचकांक हलका नहीं पड़ेगा. बाजार की तेजी की एक वजह कंपनियों के सकारात्मक परिणाम भी बताए जा रहे हैं.

 

आप के पत्र

सरित प्रवाह, मई (द्वितीय) 2013

संपादकीय टिप्पणी ‘कानून के हाथ’ बहुत ही सटीक है. इंटरनैशनल क्रिमिनल कोर्ट यानी अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय अब सही शक्ल लेने लगा है और नरेंद्र मोदी जैसे शासकों की नींद हराम कर सकता है, जो आज भी अपने गुनाहों के लिए अफसोस जाहिर करना तो दूर उन के सहारे अपना नया रास्ता खोज रहे हैं. आज एक ऐसे शासक का बहुमत के सहारे भी राज करना खतरे से खाली नहीं है जो नरसंहार के लिए जिम्मेदार है.

इस तरह के कानून का हमेशा स्वागत होगा जिस में जनता की भलाई छिपी हो. वैसे भी यह सत्य है कि कानून के हाथ लंबे होते हैं. अपराधी ने अगर अपराध किया है तो उसे दंड मिलना ही है. अब सरकारें अपनी जनता के खिलाफ सेना का इस्तेमाल नहीं कर सकतीं, यह खुशी की बात है कि अब जनता के प्रति अपराध एक हद तक ही किए जा सकते हैं.

सदियों से राजा जमीन, पैसे या धर्म के कारण लाखों की जान ले कर तालियां पिटवाते रहे हैं, हर देश की फौज का काम अपने आदमियों को मारना रहा है, मगर इस कानून के अमल में आने से ऐसे लोग बच नहीं सकेंगे. अगर पिछले 28 साल के दंगों के मामले फिर खुल जाएं तो आश्चर्य नहीं. ये वे घाव हैं जो समय के चलते भी नहीं भरते, न्याय की पट्टी ही उन्हें ठीक कर सकती है. हां, लकीरें फिर भी रह जाती हैं, चोट पर भी, दिलों पर भी.

 कैलाश राम गुप्ता, इलाहाबाद (उ.प्र.)

*

आप की टिप्पणी ‘कानून के हाथ’ पढ़ी. बहुत अच्छी लगी. नए कानून के तहत 2 देशों के शासकों को अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय द्वारा दंडित किए जाने से मानवजाति का भविष्य और उज्ज्वल दिखाई देने लगा है. अब बहुमत से चुन कर आए शासक भी नरसंहार करने के बाद बच नहीं पाएंगे. अभी तक यह बहाना था कि हमें जनता ने चुना है इसलिए हमारे अपराध क्षम्य हैं.

इस कानून के हाथ को और मजबूती मिलनी चाहिए ताकि वह अधिक से अधिक फैसलों के द्वारा मानवजाति को?न्याय दे सके.

माताचरण पासी, वाराणसी (उ.प्र.)

*

आप की टिप्पणी ‘मोदी पर भ्रम’ में आप ने मोदी की बड़ी तीखी आलोचना कर डाली है. पढ़ कर ऐसा लगा मानो मोदी से आप की व्यक्तिगत  दुश्मनी हो. एक तरफ तो आप ने उन्हें कृष्ण बना डाला है और दूसरी ओर हिटलर. जबकि कृष्ण एक रचनात्मक पहल है और हिटलर एक विध्वंसक, विघटनकारी. विचारों का ऐसा विरोधाभास क्यों?

देश के अगले प्रधानमंत्री के मंथन के बीच केवल मोदी ही हैं जो ताल ठोक कर दबंगई से देश सुधारने और बदलने की बात कर रहे हैं. बाकी प्रधानमंत्री पद की दौड़ के दावेदार तो मेमने की तरह मिमिया ही रहे हैं. हाल ही में ‘देश का प्रधानमंत्री कौन’ के लिए जनमत संग्रह कराए जाने पर मोदी को 55 प्रतिशत मत हासिल हुए जबकि आडवाणी को 10 प्रतिशत, राहुल गांधी को 15 प्रतिशत, सुषमा स्वराज को

10 प्रतिशत और पी चिदंबरम को 15 प्रतिशत मत ही प्राप्त हुए. वैसे भी अब तो भारतीय जनता पार्टी ने मोदी को चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बना दिया है और पार्टी को पूर्ण बहुमत मिलता हुआ दिखाई दे रहा है.

विजय यादव, जबलपुर (म.प्र.)

*

आप की टिप्पणी ‘लालच का फेर’, अच्छी लगी. कोलकाता की सारदा चिटफंड कंपनी ने भोलेभाले गरीब लोगों के करोड़ों रुपए डकार लिए. गरीब लोग मेहनत कर के पैसा कमाते हैं और मोटे ब्याज के लालच में या एजेंटों द्वारा सब्जबाग दिखाए जाने के चलते वे अपना पैसा गंवा बैठते हैं.

देश में वर्षों से ऐसी चिटफंड कंपनियां सरकारों की नाक तले बेखौफ हो कर लूट का धंधा कर रही हैं. सरकार तो लीपापोती करती है, जब पानी सिर के ऊपर से गुजर जाता है. आप ने सही लिखा है कि लोग खुद जागरूक नहीं होंगे तो वे लुटते ही रहेंगे, क्योंकि व्यवस्था ही कुछ ऐसी है.

प्रदीप गुप्ता, बिलासपुर (म.प्र.)

*

संपादकीय टिप्पणी ‘लालच का फेर’ बहुत अच्छी लगी. लालच एक तरफ तो सारदा चिटफंड की तरह अनपढ़, मजदूर, बेसमझ, गरीब को और गरीब बना रहा है तो दूसरी ओर वही पैसे का लालच पढ़ेलिखों को, अच्छा पैसा कमाने वालों को, समझदार लोगों को, करोड़पतियों को तरहतरह के घोटालों (जिन में क्रिकेट की स्पौट फिक्सिंग भी शामिल है) के जरिए और ज्यादा अमीर बना रहा है.

ओ डी सिंह, बड़ौदा (गुजरात)

*

दरिंदगी का रूप

मई (द्वितीय) अंक में ‘गुडि़या रेप केस : शर्मसार होती इंसानियत’ रिपोर्ट पढ़ी. कुछ ही दिन पहले एक और शर्मनाक खबर अखबारों में पढ़ने को मिली थी कि दक्षिण में 80 साल की वृद्धा का रेप किया गया. यानी 5 साल की बच्ची व 80 साल की वृद्धा पर ऐसे कृत्य करने वाला इंसान नहीं दरिंदा ही कहा जाएगा.

टी सी डी गाडेगावलिया, नई दिल्ली

*

लूट का धंधा

मई (द्वितीय) अंक में ‘चिटफंड का धंधा, छोटी लूटों का मोटा फंदा’ शीर्षक से प्रकाशित अग्रलेख पढ़ा. सब से बड़ी विडंबना यह है कि पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह घपलेघोटाले उजागर हो रहे हैं, उस से देश में चिंता का वातावरण बन गया है. इस में हाल ही में चिटफंड कंपनियों द्वारा की गई धोखाधड़ी की कड़ी और जुड़ गई है.

ये घोटालेबाज राजनीतिक पार्टियों के समर्थन के बगैर नहीं पनप सकते. गरीब और जरूरतमंद लोग यह सोच कर निवेश करते हैं कि वे भी थोड़ा मुनाफा कमा लें, लेकिन वे बेवकूफ बनाए जाते हैं.

आजकल बैंकों व डाकघरों में अल्पबचत योजना में मिलने वाली ब्याज दर घटती जा रही है. शासन चाहे तो ऐसी योजना बनाए जिस में कम से कम गरीबों को अतिरिक्त बोनस जरूर मिले. ताकि वे चिटफंडों में निवेश न कर अपने पैसे का सुरक्षित व फायदेमंद निवेश कर सकें. अब समय आ गया है कि देश में बढ़ रहे आर्थिक अपराध को रोकने के लिए नए सिरे से सोचा जाए. केंद्र सरकार को समय के साथ हो रहे बदलाव के तहत ऐसा कानून बनाना होगा कि कोई उस के चंगुल से छूट न पाए. तभी लूट का यह सिलसिला थम सकेगा.

प्रकाश दर्पे, इंदौर (म.प्र.)

*

प्रेरणादायक लेख

मई (द्वितीय) अंक में प्रकाशित ‘देहदान : परिजनों की आपत्ति पर सरकार सख्त’ लेख पढ़ा. यह प्रेरणादायक, सराहनीय व सजग करने वाला ठोस कदम है. सरकार के साथसाथ धार्मिक व सामाजिक संगठनों को भी सहयोगी बनना चाहिए क्योंकि उन का समाज पर अधिक प्रभाव है.

ऐसे कदम सामाजिक सहयोग के बिना सफलता नहीं पा सकते. समय की पुकार है कि दकियानूसी, रूढि़वादिता, अर्थहीन, उद्देश्यहीन मान्यताओं से निकल कर मानवहित में देहदान कर विशिष्ट व्यक्ति बनें.

डा. एस के गौड़

*

शमशाद बेगम का परिवार

मई (द्वितीय) अंक में प्रकाशित लेख ‘शमशाद बेगम : छोड़ गईं बाबुल का घर’ बहुत रोचक व तथ्यपरक लगा. लेख में शमशाद बेगम के पति व परिवार के बारे में जानकारी नहीं दी गई है. यह नहीं बताया गया कि शमशाद बेगम ने एक हिंदू गणपत लाल बट्टो से विवाह किया था. वे पति की मृत्यु के बाद अपनी इकलौती बेटी ऊषा और दामाद कर्नल योगेश रत्रा व नातीनातिनी के साथ मुंबई में अंतिम दिनों तक रहीं.

सुनील कुमार चौबे, वाराणसी (उ.प्र.)

*

सरिता का सरोकार

आज के इस दौर में जब पूरी दुनिया पैसे की दौड़ में अंधी है, सरिता ने अंधविश्वास के खिलाफ जो लड़ाई छेड़ रखी है उस के लिए कोटिकोटि धन्यवाद. सरिता पढ़ कर लगता है कोई तो है जो गर्त में जा रहे इस समाज के लिए कुछ कर रहा है.   

अनिल तिवारी 

*

रजनीश का भ्रम

मई (प्रथम) अंक में प्रकाशित ‘तथाकथित ब्रह्मज्ञानी रजनीश का भ्रमजाल’ में शीला ने रजनीश के पाखंड को उजागर किया है लेकिन कन्फर्म तब होगा जब विवेक नाम की अंगरेज सैके्रटरी रजनीश से अपने अंतरंग संबंधों को उजागर करे. प्रथम वैज्ञानिक समाजवादी होने के नाते मैं ने यह माना कि देशदुनिया में आज जो बड़े आदमी हैं, उन्हें सौ साल बाद कोई शायद ही याद करे जबकि रजनीश या ओशो छाए रह सकते हैं. उन से जब मिलने गया था तो सोचा शिष्टाचार के मुलम्मे में कू्रर प्रयोग कर रहा यह आदमी फ्रौड है या वास्तव में बुद्ध पुरुष. मैं ने रजनीश के पैर छुए और आंखों से पूछा कि पांव बुद्ध पुरुष की तरह ठंडे कहां हैं, वैसे भूरी आंखों में सागर की शांति जरूर थी. अंतत: मैं निर्णय न कर सका.     

अशीश कुमार चौधरी, दरभंगा (बिहार)

यह भी खूब रही

घटना मेरे बचपन की है जब प्रथम बार स्कूली शिक्षा के लिए मेरा दाखिला कक्षा 6 में हुआ था. स्कूल का सत्र शुरू हुए मात्र 12 दिन ही हुए थे.

इसी बीच एक दिन मेरी माताजी, जो (अब इस दुनिया में नहीं हैं) थोड़ाबहुत हिंदी पढ़ीलिखी थीं, मुझ से घर पर पढ़ाई करने के लिए कहने लगीं. जवाब में मेरा कहना था कि अभी तो मेरी किताबें भी बाजार से खरीद कर नहीं आई हैं तो मैं क्या पढ़ूं. इस पर वे समझाती हुई कहने लगीं कि क्लास में मास्टर साहब ने जो लिखवाया है वही याद कर लो.

मेरे द्वारा यह कहने पर कि क्लास टीचर ने तो अभी तक दैनिक टाइमटेबल ही लिखवाया है, वे जोर दे कर कहने लगीं कि इसी को अच्छी तरह याद कर लो.
माताजी का यह कहते ही वहां पर उपस्थित भैयाभाभी सहित सभी लोग खूब हंसे. माताजी को जब यह समझ आया तो उन का चेहरा देखने लायक था. बाद में वे भी हंसे बिना नहीं रह सकीं.
बी एस भटनागर, आगरा (उ.प्र.)

*

भारतीय दूतावास, कुवैत में मेरा कार्यकाल समाप्त होने पर मुझे 1990 में स्थानांतरण होने पर भारतीय उच्चायोग, इस्लामाबाद जाना था. कुवैत में भारतीय समाज की एक संस्था ने मेरे विदाई समारोह में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया. इस प्रकार के कार्यक्रम आमतौर पर भारतीय दूतावास के औडिटोरियम में पूर्वानुमति से आयोजित होते थे. ‘सुर संगम’ नामक इस संस्था के निदेशक अनुमति के लिए दूतावास के सूचना अधिकारी के पास पहुंचे और उन से कहा, ‘‘एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए 19 जुलाई को दूतावास का औडिटोरियम चाहिए.’’

सूचना अधिकारी ने पूछा, ‘‘सांस्कृतिक कार्यक्रम किस खुशी में हो रहा है?’’

‘‘माथुर साहब के जाने की खुशी में,’’ सुर संगम के निदेशक के मुंह से यह बात एकदम निकली.
फिर अपनी बात का अर्थ समझ कर झेंपते हुए फौरन कहा, ‘‘दरअसल, माथुर साहब के सम्मान में विदाई समारोह के लिए.’’
दूतावास के सूचना अधिकारी ने जब यह बात हंसते हुए मुझे बताई तो मुझे भी हंसी आ गई.
सुरेश मल माथुर, जोधपुर (राजस्थान)

 

हमारा ग्वाला कुछ दिनों से दूध ठीक नहीं ला रहा था. एक दिन मैं ने उस से कहा, ‘‘आज तो दूध में बहुत पानी मिलाया लगता है.’’
इस पर वह बोला, ‘‘मेमसाहब, आप हर रोज सब्जी बनाती हो, कभी नमक कम तो कभी ज्यादा भी तो पड़ जाता है.’’

उस की बात सुन कर मुझे खूब हंसी आई.
निर्मल कांता गुप्ता, कुरुक्षेत्र (हरियाणा)

सफर सुहाना अनजाना

घटना बहुत पुरानी है. मैं किसी कार्यवश बदायूं गया. उसी दिन दोपहर में वहां दंगा हो जाने के कारण  72 घंटे का कर्फ्यू लग गया. आवागमन रुक गया. 4 दिन बाद पुलिसलाइन से कुछ गिनीचुनी बसें लोगों को मात्र बदायूं की सीमा पार करा रही थीं. उस बस में सवार हो कर सीमा तक पहुंचा. वहां एक छोटा सा कसबा था. रेलवे स्टेशन या बस अड्डे पहुंचने के लिए भी कोई सवारी नहीं मिल पा रही थी. माहौल में भय व सन्नाटा व्याप्त था. तभी एक बस आती दिखाई दी. बस की सीढि़यों पर खड़े हो कर सवारियों पर एक नजर डाली. सभी यात्री दूसरे संप्रदाय के थे.

मैं उलटे पांव उस बस से उतरने को हुआ. तभी एक सज्जन मेरी मुश्किल भांप गए. दंगे के माहौल में, विश्वास टूटने से दोनों वर्गों के लोग एकदूसरे को आशंकाभरी नजरों से देखते हैं.

वे कहने लगे, ‘‘मानवीय संवेदनाओं का कोई मजहब नहीं होता. अपनी स्वार्थपूर्ति करने वाले लोग ही भाईचारे का माहौल बिगाड़ने की कोशिश करते हैं. दंगाई सिर्फ दंगाई ही होते हैं.’’

उन की बातों से मेरा हौसला बंध गया. रास्तेभर बातें करते हम लोग बरेली बस अड्डे पर पहुंचे. हाथ मिला कर एकदूसरे से विदा ली.

इस तरह उन अनजान महोदय के कारण मेरा सफर सुहाना बन गया. आज भी स्मृतियों में उन का चेहरा घूम जाता है.
शशि, कानपुर (उ.प्र.)

मैंऔर मेरे पति 2 वर्ष पहले रेलयात्रा कर रहे थे. बीच में दिल्ली से गाड़ी बदलनी थी. हम सुबह 9 बजे ही दिल्ली पहुंच गए जबकि अगली गाड़ी 2 बजे आनी थी. लगभग सवा 2 बजे घोषणा हुई कि लुधियाना जाने वाली गाड़ी प्लेटफौर्म नंबर 5 पर आ रही है. हम दोनों सामान सहित प्लेटफौर्म तक पहुंचे. 2.30 बजे गाड़ी आई और हम भीड़ में जगह बनाते हुए गाड़ी में चढ़ गए. लग रहा था कि जैसे जंग जीत ली हो, पर कहां जनाब.

लगभग 20 मिनट तक गाड़ी प्लेटफौर्म पर रुकी रही. एकाएक लोगों की सुगबुगाहट से आभास हुआ कि यह वह गाड़ी नहीं है जिस में हमारा आरक्षण है. हमारी वाली गाड़ी सामने वाले प्लेटफौर्म पर खड़ी थी. किसी तरह हांफते हुए नीचे उतरे तो क्या देखते हैं कि सामने वाली गाड़ी प्लेटफौर्म छोड़ चुकी है, हमें दूर गार्ड हरी झंडी हिलाते हुए दिखाई दे रहा था.

इस तरह लगभग आधे दिन के इंतजार के बाद भी हमारी गाड़ी छूट गई थी.

बाद में हमें ज्ञात हुआ कि एक ही नाम की 2 गाडि़यां आमनेसामने आ जाने की वजह से ऐसा हुआ. कई लोगों की गाड़ी इस वजह से छूट गई थी. इस के बाद जब भी रेलयात्रा करते हैं, इस अनुभव को सदा याद करते हैं.
शिखा बजाज, लुधियाना (पंजाब)

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें