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इन 5 महिला बॉडी बिल्डर्स से जरा बच के ही रहना

बॉडी बिल्डिंग को आमतौर पर पुरुषों का ही खेल समझा जाता है. बॉडी बिल्डिंग भारत में तेजी से बढ़ते हुए खेलो में से एक है वह भी तब जब महिलाओं के लिए बॉडी बिल्डिंग जैसा खेल ही स्वीकार्य नहीं है. इस खेल के साथ महिलायें भी बॉडी बिल्डिंग में अपना एक अलग मुकाम बना रही हैं.

इन महिला बॉडी बिल्डर्स ने भारत में ही नहीं बल्कि विदेशो में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है. तो आइए दानते हैं भारत की 5 महिला बॉडी बिल्डर्स के बारे में.

श्वेता राठौर

श्वेता राठौर भारत की पहली ऐसी महिला बॉडी बिल्डर हैं जिन्होंने उज्बेकिस्तान में हुई 49वीं एशियाई चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल जीता था. श्वेता भारतीय बॉडी बिल्डिंग मॉडल भी है. यह पहली महिला हैं जिन्होंने भारत की तरफ से वर्ल्ड चैंपियनशिप में मेडल जीता था. इसके अलावा श्वेता फिटनेस फिजिक 2014 में मिस वर्ल्ड रह चुकी हैं और 2015 में मिस एशिया भी बन चुकी हैं.

कोंग्ब्रलात्पम रेबिटा देवी

रेबिटा देवी बायोकेमेस्ट्री की स्टूडेंट रह चुकी हैं और ममोटा देवी के बाद यह दूसरी महिला थी जिसने साल 2014 में मुंबई में हुई वर्ल्ड चैंपियनशिप की बॉडी बिल्डिंग केटेगरी में कांस्य पदक जीता था लेकिन इसके बावजूद दुर्भाग्य से इन सबके बावजूद रेबिटा को अपने दोस्तों और राह चलते लोगों से बुरे और भद्दे कमेंट सुनने को मिलते थें.

करुना वाघमारे

मिस इंडिया फिटनेस फिजिक टाइटल जीत चुकी करुना ने 46वें एशियाई बॉडी बिल्डिंग में भारत का प्रतिनिधित्व किया था और चीन में हुई फिजिक स्पोर्ट्स चैंपियनशिप्स में भी अच्छा प्रदर्शन किया.

इसके अलावा करुना ने कर्नाटक के बीदर में इंडियन बॉडी बिल्डिंग फेडरेशन (Indian Body Building Federation) की तरफ से आर्गनाइज्ड की गयी प्रतियोगिता में भी हिस्सा लिया था.

किरण डेम्बला

आपको जानकर हैरानी होगी की यह फिटनेस ट्रेनर पहले एक ट्रेंड क्लासिकल सिंगर रह चुकी हैं और बाद में यह प्रोफेशनल फिटनेस ट्रेनिंग की दुनियां में आ गयी, जहां अन्य महिलायें आने से पहले कई बार सोचती है की इसे अपना करियर बनायें या नहीं.

सोनाली स्वामी

सोनाली स्वामी एक सर्टिफाइड जुम्बा और बोव्का इंस्ट्रक्टर है और अपनी कड़ी मेहनत से यह साबित कर चुकी है की बॉडी बिल्डिंग सिर्फ लडॉको का ही खेल नहीं है. सोनाली के 2 बच्चे भी है और यह बखूबी अपनी फॅमिली के साथ अपने करियर को भी संभल रही है.

ये है ऑस्‍कर जीतने वाला पहला मुस्लिम अभिनेता

ऑस्कर जीतने के साथ ही महेरशला अली ये अवार्ड जीतने वाले पहले मुस्लिम अभिनेता बन गए हैं. उन्हें फिल्म ‘मूनलाइट' में नशीली दवाओं का कारोबार करने वाले एक व्यक्ति की भूमिका के लिए सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेता की श्रेणी में ऑस्कर पुरस्कार दिया गया. 43 वर्षीय अली को ऑस्कर समारोह की पहली ट्राफी के तौर पर सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेता की श्रेणी में पुरस्कार अभिनेत्री एलीशिया विकान्दर ने दिया, जिन्हें पिछले साल सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेत्री की श्रेणी में इस प्रतिष्ठित पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.

अली ने पुरस्कार मिलने के बाद कहा ‘मैं अपने शिक्षकों तथा प्राध्यापकों को धन्यवाद देना चाहूंगा जिन्होंने कहा था कि यह तुम्हारे बारे में नहीं बल्कि किरदारों के बारे में है.'

अभिनेता ने अपनी पत्नी अमातुस सामी करीम का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि उन्होंने उस समय भी उनका साथ दिया जब वह अपने पहले बच्चे को जन्म देने वाली थीं. चार दिन पहले ही अली और अमातुस की पहली बिटिया का जन्म हुआ है.

‘मूनलाइट' में जुआन नामक ड्रग डीलर की भूमिका के लिए अली के नाम की सिफारिश निर्माता अडेल रोमान्स्की ने की थी, जिन्होंने ‘किक्स' में अली के साथ काम किया था. बेरी जेनकिन्स ने निर्देशन में बनी इस फिल्म में अली ऐसे ड्रग डीलर बने हैं जो शिरोन नामक एक युवा के लिए संरक्षक की भूमिका भी निभाता है. अली का वास्तविक नाम महेरशला लहर शबाज है और उन्होंने वर्ष 1999 में इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया था.

क्यों जिंदा है डायन प्रथा

16 अक्तूबर, 2014… गुवाहाटी से 180 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक छोटा सा गांव कारबी एंगलौंग, जहां पिछले कुछ महीनों से हो रही आकस्मिक मौतों की वजह ढूंढ़ने का प्रयास जारी था. गांव के बुजुर्गों ने इस के पीछे किसी डायन का हाथ होने की संभावना व्यक्त की और फिर संभावित डायन का पता लगाने के लिए लोगों की सभा बुलाई गई. मंत्रोच्चारण के दौरान भीड़ में से किसी बुजुर्ग महिला ने देबोजानी बोरा की तरफ इशारा करते हुए चिल्ला कर कहा, ‘‘यही डायन है. इसे सजा दो.’’ उस महिला के यह कहने भर की देर थी कि पूरी भीड़ उस पर टूट पड़ी. मछली पकड़ने वाले जाल में बांध कर उसे इतना पीटा गया कि वह बुरी तरह घायल हो गई और उसे अस्पताल ले जाना पड़ा. आप को जान कर आश्चर्य होगा कि जिस देबोजानी बोरा को डायन घोषित किया गया वह गोल्ड मैडलिस्ट थी. जन्म से इसी गांव में रहती आई थी. 3 बच्चों की मां 51 वर्षीय देबोजानी खेतों में काम करने के साथसाथ ऐथलैटिक्स की प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा लेती रही थीं. उन्होंने बहुत से नैशनल मीट्स में असम का प्रतिनिधित्व किया था. भारत के लिए 2011 में जैवलीन थ्रो में गोल्ड मैडल भी जीता था.

अफसोस की बात है कि भले ही हम आज 21वीं सदी की दहलीज पर खड़े हैं, विकास के नएनए मानदंड तय कर रहे हैं, मगर अभी भी हमारे समाज में कई ऐसी प्रथाएं व परंपराएं हैं, जो पिछड़ी मानसिकता एवं भेदभावपूर्ण रवैए की द्योतक हैं. उदाहरण के लिए डायन प्र्रथा को ही लें, जिस ने कितनी ही निर्दोष महिलाओं की जिंदगी तबाह की है.

क्या है डायन प्रथा

देश के कुछ राज्यों के पिछड़े इलाकों में ओझाओं, तांत्रिकों के कहने पर किसी भी महिला को डायन करार दिया जाता है. ऐसे मामले साधारणतया तब होते हैं जब गांव वाले ओझा के पास किसी व्यक्ति या कई व्यक्तियों की गंभीर बीमारी, आपदा या फिर परिवार, गांव पर पड़ी किसी भारी मुसीबत को दूर करने के लिए पहुंचते हैं. ओझा अपनी तंत्रमंत्र की शक्ति के छलावे में डाल कर इस परेशानी के लिए किसी महिला को दोषी ठहरा उसे डायन घोषित कर देता है. तब सारे गांव वाले उसे सजा देने पर उतारू हो उठते हैं. उस महिला को खींच कर भीड़ के सामने लाया जाता है और फिर निर्वस्त्र कर मारापीटा जाता है. कई दफा तो उस का सिर मुंडवा कर और चेहरे पर कालिख पोत कर पूरे गांव में भी घुमाया जाता है. चाकू आदि किसी तेज धार वाले औजार से चीरे तक लगाए जाते हैं. उसे मलमूत्र पीने तक को मजबूर किया जाता है.  इतना सह कर भी यदि महिला जीवित रह जाती है तो उसे गांव से निकाल दिया जाता है.

वजह

अशिक्षा: डायन प्रथा के वजूद की अहम वजहें हैं-अशिक्षा और अंधविश्वास का चक्रव्यूह. इस तरह की घटनाएं ज्यादातर दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में होती हैं, जहां शिक्षा और स्वच्छता का अभाव होता है.

संपत्ति पर अधिकार जमाने की इच्छा: अधिकतर आदिवासी समुदायों में महिलाओं को पुरुषों की तुलना में जमीन पर ज्यादा अधिकार प्राप्त होते हैं. इस संपत्ति पर अधिकार जमाने के लिए उन्हें डायन साबित करने की कवायद शुरू की जाती है खासकर उन महिलाओं को निशाने पर रखा जाता है, जिन के आगेपीछे कोई नहीं होता जैसे विधवाएं, अकेली रह रही महिलाएं, बूढ़ी औरतें आदि.

ओझाओं के निजी स्वार्थ: जब ओझातांत्रिकों के जादूटोने मरीजों को ठीक करने में नाकामयाब रहते हैं तो वे बचाव के लिए नया रास्ता खोजते हैं. अपनी शक्ति दिखाने के लिए गरीब और निरीह औरतों को बलि का बकरा बनाते हैं. नैशनल क्राइम रिकौर्ड्स ब्यूरो के हाल के डाटा के मुताबिक डायन हत्या के नाम पर 2000 से 2012 के बीच करीब 2,097 लोगों की हत्या की गई, जिन में से 363 मामले अकेले झारखंड से थे. सोचने वाली बात यह है कि सिर्फ भारत में ही नहीं, दूसरे देशों में भी ऐसे मामले बखूबी पाए जाते हैं. मसलन, तंजानिया, नाइजीरिया, दक्षिण अफ्रीका, इंगलैंड जैसे देशों में भी यह प्रपंच रचा जाता है. मूलतया बिहार की रहने वाली समाज सेविका संध्या सिन्हा कहती हैं, ‘‘गांवों में गरीब महिलाओं का शोषण होता है, कभी पैसों के लिए तो कभी देह के लिए. बिहार में 1-2 जिलों को छोड़ कर कहीं भी औरतों को किसान का दर्जा नहीं मिला है. भले ही वे रातदिन खेतों में काम करती हों, पर सरकारी योजनाओं का लाभ उन्हें महिला होने की वजह से नहीं मिल सकता. अब मान लीजिए कि एक व्यक्ति की केवल 3 बेटियां हैं, तो उस की सारी संपत्ति बेटियों के नाम ही हो जाएगी, पर जब बात योजनाओं का लाभ उठाने की हो, तो यही बात अभिशाप बन जाती है.

कई दफा ऐसा भी होता है जब घर का कोई सदस्य महिला पर गलत नजर रखता है, मगर महिला उसे स्वीकारती नहीं तब मौका मिलते ही वह उस महिला को डायन के रूप में प्रचारित कर अपना बदला पूरा करता है. इन इलाकों में साधारणतया मुखिया और पुजारी (पंडित) 2 ही ऐसे शख्स होते हैं, जिन की बात गांव का हर सदस्य मानता है. इन दोनों को रुपयों के बल पर वश में करना कोई कठिन काम नहीं केवल रुपयों का चढ़ावा चढ़ जाए फिर धर्म और अंधविश्वास के नाम पर उस महिला की जिंदगी से खिलवाड़ करने में थोड़ा भी समय नहीं लगता.’’ कहने को सरकार इस मामले में कानून द्वारा लगाम कसने के प्रयास करती रही है. उदाहरण के तौर पर छत्तीसगढ़ का टोनही प्रताड़ना निवारण ऐक्ट औफ 2005, बिहार का प्रिवैंशन औफ विच प्रैक्टिसेज ऐक्ट (1999) और विचक्राफ्ट प्रिवैंशन ऐक्ट 2001, झारखंड. राजस्थान सरकार एक ड्राफ्ट लैजिशलेशन के साथ लाई है, जिस के अंतर्गत एक महिला को डायन के नाम पर प्रताडि़त और बेइज्जत करने वालों के लिए कठोर कानूनों का प्रावधान है. मगर अभी भी वे परिणाम देखने को नहीं मिले हैं, जिन की अपेक्षा है.

इन अत्याचारों और अंधविश्वासी माहौल के बीच एक नाम उभरा है बीरूबाला राबा का, जिन्होंने अपने ऊपर हुए अत्याचार के विरुद्घ न सिर्फ आवाज उठाई वरन औरों को भी इस से आजादी की राह दिखाई है. 62 साल की बीरूबाला को स्वयं में एक संस्था माना जा सकता है. असम के गोलपारा जिले के धाकुर विला नाम के गांव में रहने वाली इस महिला ने अपनी जिंदगी इस प्रथा के खिलाफ लड़ने में समर्पित कर दी है. इस जंग के दौरान कई दफा उन्हें हत्या की धमकी भी मिली. शारीरिक, मानसिक आघात भी किए गए. मगर इस दृढ़निश्चयी  महिला ने अपनी लड़ाई नहीं छोड़ी. 1999 में ‘असम महिला समता सोसाइटी’ नामक एक एनजीओ ने उन्हें समर्थन दिया.

डायन प्रथा के अलावा बीरूबाला लोगों में शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और शराब के बुरे प्रभाव को ले कर भी जागरूकता ला रही हैं. 4 जुलाई, 2015 को उन के प्रयासों के लिए उन्हें ‘12वें उपेंद्र नाथ ब्रह्म सोल्जर औफ ह्यूमैनिटी अवार्ड’ से सम्मानित किया गया. वे असम सरकार का बैस्ट सोशल ऐंटरप्रन्योर अवार्ड भी पा चुकी हैं. समाज सेविका, संध्या सिन्हा (फाउंडर मैंबर औफ वूमन पौलिटिकल फोरम) कहती हैं, ‘‘औरत की सब से बड़ी दुश्मन उस की खामोशी है. वह स्वयं तो अत्याचार का विरोध नहीं करती है, किसी और के साथ गलत हो रहा हो तो भी उस के विरुद्घ आवाज नहीं उठाती. उस में गलत को गलत कहने की हिम्मत नहीं. उसे डर रहता है कि साथ देने के आरोप में उस के साथ भी मारपीट की जाएगी. ‘‘वह संस्कार के नाम पर चुप रह जाती है. उसे यह नहीं पता कि संस्कार और अंधविश्वास के बीच फर्क होता है. जिस दिन औरत यह बात समझ जाएगी, उस की स्थिति भी सुधर जाएगी. हमारे देश में हर समस्या से जुड़े कानून हैं, जो महिलाओं की मदद के लिए बनाए गए हैं. बस, जरूरत है सिर्फ जागरूकता की.’’

अमिताभ और जया के रिश्ते पर अमर सिंह का बड़ा खुलासा

समाजवादी पार्टी के पूर्व महासचिव और राज्यसभा सांसद अमर सिंह एक ऐसे राजनेता हैं, जो अपने बयानों की वजहों से याद किये जाते है. हालांकि फिलहाल अमर सिंह समाजवादी पार्टी से बाहर चल रहे हैं और जिसकी वजह सीधे तौर पर यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बताये जाते हैं. आपको बता दें कि अमरसिंह ने पिछले दिनों एक वेबसाइट को इंटरव्यू दिया है जिसमें उन्होंने बच्चन परिवार के बारे में कुछ ऐसी बातें बाताई हैं जिसको सुनकर आपको यकीन नहीं होगा.

जी हां बॉलीवुड में बच्चन परिवार अपनी मान-मर्यादा और परंपरा के लिये जाना जाता है. लेकिन 20 सालों तक बच्चन परिवार के सबसे करीबी मित्र रहे अमर सिंह ने खुद ही बच्चन परिवार के सदस्यों के बारे में कुछ ऐसी बातें कह दी है कि आपको यकीन नहीं होगा.

अमर सिंह का कहना है कि बच्चन परिवार के अंदर कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है – “करीब 15 सालों तक जया बच्चन ने अपने सास-ससुर के साथ बुरा बर्ताव किया. जया अमिताभ के सामने ही उनका अपमान करती थी, लेकिन अमिताभ चुप रह जाते थे. इसी बात से नाराज़ होकर अमिताभ और जया एक दूसरे से अलग हो गए, आज भी वे दोनों अलग-अलग घर में रहते हैं.”

अमिताभ मुंबई के प्रतीक्षा में रहते है तो वहीं जया दूसरे बंगले जलसा में रहती हैं. अमर सिंह ने आगे बताया कि यही नहीं अभिषेक और ऐश्वर्या भी अपने मां-पिता से दूर रहने पर मजबूर है, उनका कहना है कि बच्चन परिवार में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है.

अमर सिंह ने आगे उनके और बच्चन परिवार के रिश्ते पर भी बात की जिसमें उन्होंने कहा कि “अमिताभ बच्चन मेरे घनिष्ठ मित्र रहे हैं, लेकिन अब मुझे अमिताभ का चाल, चरित्र और चेहरा समझ में आ गया है. अमिताभ से अलग होकर मैंने अपनी जिंदगी से गंदगी को छान लिया है.”

आपको बता दें कि अमर सिंह और बच्चन परिवार पहले करीबी दोस्त हुआ करते थे, लेकिन कुछ समय से उनके बीच ये दोस्ती नहीं रही है. हालांकि बच्चन परिवार को लेकर अमर सिंह ने जो बात कही है, उसमें किस हद तक सच्चाई है ये तो फिलहाल हम नहीं जानते हैं. लेकिन किसी परिवार के अंदर की बात  इस तरह से उजागर करना भी सही नहीं है.

स्वाद लाजवाब

सोया स्पैगेटी

1 बड़ा चम्मच औलिव औयल – 2 प्याज कटे – 2 गाजर कटी – 1 बड़ा चम्मच धनियापत्ती बारीक कटी – 2 बड़े चम्मच लीक बारीक कटी – 1/2 कप हरा प्याज कटा – 1 कप लालपीली शिमलामिर्च कटी – 2 कलियां लहसुन कटीं – 1 तेजपत्ता – थोड़ी सी तुलसीपत्ती – 1 छोटा चम्मच लालमिर्च के बीज – 2 बड़े चम्मच टोमैटो प्यूरी – 60 ग्राम सोया ग्रैनुअल्स – 1 बाउल स्पैगेटी पकी – नमक व कालीमिर्च स्वादानुसार.

विधि

एक कड़ाही में तेल गरम कर के तेजपत्ता, प्याज, गाजर, लीक, धनियापत्ती, हरा प्याज, शिमलामिर्च और लहसुन डाल कर भूनें. सोया ग्रैनुअल्स और मशरूम को गरम पानी में कुछ देर तक भिगो कर रखें और फिर इन को पानी से निकालें. सोया ग्रैनुअल्स और मशरूम को तैयार मिश्रण के साथ 5 मिनट तक भूनें. अब इस में टोमैटो प्यूरी, तुलसीपत्ती, मिर्च के बीज, नमक व कालीमिर्च डाल कर पकाएं. पक जाने पर स्पैगेटी के साथ परोसें.

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कड़ाही चिकन

सामग्री

– 500 ग्राम बोनलैस चिकन – 2 बड़े प्याज कटे – 4 टमाटर कटे – 1/2 छोटा चम्मच जीरा पाउडर – 1 छोटा चम्मच धनिया पाउडर – 2 शिमलामिर्चें कटी – 1/2 छोटा चम्मच लालमिर्च पाउडर – 1/2 छोटा चम्मच हलदी पाउडर – 1 बड़ा चम्मच टोमैटो प्यूरी – 1 तेज पत्ता – 1/2 छोटा चम्मच चिकन मसाला – 1 बड़ा चम्मच तेल – नमक स्वादानुसार – 1/2 छोटा चम्मच जीरा – 1/2 छोटा चम्मच अदरकलहसुन बारीक कटे.

विधि

एक पैन में जीरा पाउडर व धनिया पाउडर डाल कर ड्राई रोस्ट कर लें. अब एक कड़ाही में तेल गरम कर के जीरा, तेजपत्ता, अदरकलहसुन, प्याज व हरीमिर्च डाल कर भूनें. फिर टमाटर के साथ रोस्टेड जीरा व धनिया पाउडर, नमक, हलदी, लालमिर्च पाउडर व टोमैटो प्यूरी डाल कर अच्छी तरह भूनें. अब थोड़े से पानी के साथ चिकन डालें और ढक कर चिकन पक जाने तक पकाएं. फिर चिकन मसाला व शिमलामिर्च डाल कर 2 मिनट तक और पकाएं, धनियापत्ती से सजा कर परोसें.

टिप की परंपरा है गलत

रेस्तरांओं ने आजकल सर्विस चार्ज लगा कर भारीभरकम बिलों पर एक और बोझ जोड़ दिया है. होता यह है कि बिल में जुड़ कर आने वाले सर्विस चार्ज के बाद वेटर हाथ बांध कर खड़ा हो जाता है और अच्छी सेवा के पैसे देने के बाद ग्राहक को असल संतुष्टि के लिए कुछ और पैसे छोड़ने पड़ते हैं या वेटर के तीखे रुख का सामना करना पड़ता है. अच्छी सेवा के लिए टिप देना असल में गलत है और इसे सामंती युग की देन समझा जाना चाहिए जब राजा या दरबारी अपने सेवकों को समयसमय पर पैसे देते रहते थे ताकि वे विद्रोह न करें और विश्वसनीय बने रहें. खाने के बाद खाने के दाम मैन्यू के हिसाब से देने के बाद टिप की परंपरा गलत है, क्योंकि वेटरों को वेतन देने का काम रेस्तरां मालिकों का है. ग्राहक ने जितना खाया उतना पैसा दिया, हिसाब बराबर. जापान व पूर्वी देशों में यह चलन बिलकुल नहीं है पर अमेरिका में भरपूर है.

अगर टिप देने का कोई औचित्य है तो हर जगह होनी चाहिए. अगर आप कपड़े खरीदती हैं और सेल्स गर्ल्स 20-25 पोशाकें दिखाती हैं तो क्या वे टिप की अधिकारी हो जाती हैं? डाक्टर यदि अच्छा काम करे तो क्या फीस के  साथसाथ टिप भी मांगे? टिप का वातावरण अपनेआप में गलत है. सरकारी अस्पतालों में बच्चे पैदा होने पर नर्स को खुश हो कर टिप देने की परंपरा है, यह भी गलत है. कई घरों में अतिथि जाते समय घर के नौकरों को टिप देते हैं, जो गलत है. अतिथि के कारण जो अतिरिक्त काम नौकर ने किया उस की भरपाई का जिम्मा घर के मालिक का है.

कंज्यूमर मामलों के मंत्रालय ने जो आदेश रेस्तरांओं में टिप देने पर दिया है वह आधाअधूरा है. होना यह चाहिए कि यह बिलकुल बंद हो जाए. इस पर पूरी तरह से निषेध हो. यह केवल रेस्तरांओं में ही नहीं, व्यवसाय के हर क्षेत्र में हो. टिप की परंपरा गलत है, क्योंकि इस से अमीर और फैजदिली का अंतर स्पष्ट होता है. यह सेवा देने वाले को अवसर देती है कि वह सेवा में कमीबढ़ती करे ताकि टिप मिलने का अवसर मिले. रेस्तरांओं को चाहिए कि वे अपने वेटरों को वेतन ही इस प्रकार दें कि टिप की गुंजाइश ही न रहे. वेटरों को किसी भी तरह की टिप न लेने दें. टिप इनसैंटिव की तरह वेतन में से देना ही ग्राहकों को अच्छी सेवा सुरक्षित करना माना जाए.

नोटबंदी का कुछ तो मुआवजा मिलता

अरुण जेटली के नए बजट में एक भी ऐसी छूट नहीं दिखी जिस से लगे कि नोटबंदी के कारण जो सजा पूरे देश को मिली थी और अभी भी चालू हो, उस का कुछ मुआवजा घरवालियों को देने की कोई नीयत हो. सरकार के पास बजट एक ऐसा माध्यम होता है जिस से वह कुछ छूट दे कर जनता को सांत्वना दे सकती है पर घरघर में हुई दिक्कत पर न प्रधानमंत्री को कोई गम है न ही वित्तमंत्री को. अगर नोटबंदी जाली नोटों अथवा आतंकवाद या कालाधन रखने वालों के कारण की गई थी तो करोड़ों घरों को सजा देने का औचित्य ‘मित्रों’ वाली सरकार आज तक स्पष्ट नहीं कर पाई. सरकार का हुक्म तो ऐसा था मानो सास ने कह दिया कि सारे बहूबेटे रोज 5 बजे उठें और मन करे या न करे उन के पैर छू कर जरूर जाएं. एक निरर्थक आदेश जिस का कोई लाभ नहीं पर हिटलरी अंदाज में अपनी ताकत दिखाना.

बजट में सरकार कुछ सहूलतें आसानी से दे सकती थी. खानेपीने की चीजों पर सर्विस टैक्स समाप्त करा जा सकता था, साडि़यों पर उत्पाद शुल्क हटाया जा सकता था, कौस्मैटिक्स को दवाओं की श्रेणी में रख कर कर मुक्त करा जा सकता था. इन से सरकार को आमदनी कम होती पर ज्यादा नहीं पर औरतों को तो लगता कि उन्हें नोटबंदी के कहर का कुछ मुआवजा तो मिला.

असल में हर शासक के सिर पर ताकत का भूत चढ़ ही जाता है. नरेंद्र मोदी के इतने गुणगान उन की पार्टी ने ही नहीं मध्यवर्ग ने भी गाए कि उन्होंने सोचना शुरू कर दिया कि उन के फैसले उस राजा की तरह के हैं, जो बिना कपड़े पहन कर बाजार में निकला था यह सोच कर कि उस ने विशिष्ट कपड़े पहन रखे. सरकार ने नोटबंदी यह सोच कर लागू की थी कि इस से धड़ाधड़ कालाधन सरकार के हाथ में आएगा और जनता पर टैक्स लगाए बिना खजाना भर जाएगा. अब जब सरकार के पल्ले न के बराबर कुछ पड़ा है तो वह खिसियाई हुई है और बजट में उस ने कुछ भी छूट नहीं दी है.

उलटे व्यापारियों और उद्योगपतियों पर शिकंजा कसा गया है शायद अपनी खीज उतारने के लिए कि उन्होंने नोटबंदी के नारे को सच्चा बनाने में साथ क्यों नहीं दिया. असल में नोटबंदी आम व्यक्ति को यह एहसास दिला गई है कि सरकार के एक फैसले से लाखों नहीं करोड़ों लोगों को नुकसान पहुंच सकता है. अमेरिका के नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी मुसलिम देशों से आने वालों को वीजा न दे कर या आईटी कंपनियों में एच-1बी वीजा को सख्त बना कर नोटबंदी जैसा काम कर रहे हैं. दुनिया की जनता खासतौर पर मांएं और पत्नियां एक बार फिर असमंजस के माहौल में जीने को मजबूर हैं. कल क्या होगा, बच्चों का क्या होगा, चूल्हा जलेगा या नहीं, ये सवाल तकनीकी उन्नति के बावजूद खब्ती शासकों के कारण खड़े हो गए हैं.

गूगल से जीमेल यूजर्स को क्यों हैं शिकायतें

कुछ समय पहले खबर थी की गूगल ने ऐलान किया है कि जीमेल इस साल के आखिरी तक क्रोम के पुराने वर्जन को सपोर्ट करना बंद कर देगा. गूगल से यह भी खबर मिली थी कि विंडोज एक्सपी और विंडोज विस्टा इस्तेमाल करने वाले जीमेल यूजर इससे प्रभावित हो सकते हैं. कंपनी ने कहा कि यह उन तरीकों में से एक है जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि नए क्रोम वर्जन में दिए गए लेटेस्ट सिक्योरिटी अपडेट सभी यूजर को मिल सके.

और अभी खबर है कि कुछ जीमेल यूजर्स को अपने अकाउंट को लॉगइन करने में कुछ समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. गूगल ने भी स्वीकार किया है कि कुछ जीमेल यूजर को अपने अकाउंट से अचानक साइन आउट होने की शिकायतें मिली हैं. अभी गूगल इस मामले की जांच कर रहा है. हालांकी गूगल ने अपने यूजर्स के अकाउंट की सुरक्षा की जिम्मेदारी ली है और यह साफ कर दिया है कि इस समस्या से अकाउंट को किसी भी तरह की हैकिंग या असुरक्षा का कोई खतरा नहीं है.

कंपनी के प्रोडक्ट फोरम द्वारा लगातार इस समस्या की वजह जानने की कोशिश की जा रही है. और गूगल ने अपने यूजर से अकाउंट को दोबारा साइनइन करने को कहा है. और अगर आपको पासवर्ड याद नहीं है तो अपना पासवर्ड जानने के लिए (g.co/recover) का इस्तेमाल करें.
गूगल के जीमेल अकाउंट के लॉगिन की बहुत सारी समस्या के बारे में जानकारी मिली है. पर अभी यह स्पष्ट नहीं है कि ये इस नए साइन आउट की समस्या से सीधे तौर पर जुड़ी हैं या नहीं.

असफल सरकार का सफल प्रचार

मोदी सरकार की ‘सफलता’ इस बात की मिसाल है कि मीडिया और संगठित प्रचारतंत्र के जरिये एक असफल सरकार को सफल दिखाया जा सकता है. यह प्रमाणित किया जा सकता है, कि सरकार की उपलब्धियां बेमिसाल हैं. भारत के राजनीतिक परिदृश्य में यही हो रहा है.

कोई नाराज हो, पत्थर फेंके या जूता, जहां भी मौका मिले, वह अपना विरोध दर्ज कराये कोई फर्क नहीं पड़ता. सरकार अपनी सफलता दिखा रही है. प्रचारतंत्र उसे प्रचारित कर रहे हैं, मीडिया इसे मोदी के लिये दीवानगी दिखा रही है.

यह बात किसी भी लोकतंत्र और देश की आम जनता के लिये तय है. सरकार ऐसा क्यों कर रही है? यदि आप सवाल करेंगे, तो अपने को खतरों से घिरा हुआ पायेंगे. मोदी सरकार के पीछे की ताकतें जितनी संगठित हैं, उतनी ही मजबूत है. और उनकी सोच देश, दुनिया और आम लोगों के लिये उतनी ही खतरनाक हैं. भाजपा अब प्रतिक्रियावादी, छोटे बनियों की पार्टी नहीं रह गयी है, वह राष्ट्रीय, बहुराष्ट्रीय निजी कम्पनियों के हितों को पूरा करने वाली पार्टी बन गयी है. और संघ की हिन्दूवादी सोच हिन्दू राष्ट्रवाद को आक्रामक बना रही है. वित्तीय ताकतें भारतीय लोकतंत्र के विरूद्ध वित्तीय तानाशाही को बढ़ा रही हैं, और संघ, भाजपा तथा उसके सहयोगी संगठन राजनीतिक तानाशाही के लिये काम कर रही है.

सरकार अपनी असफलताओं की जानकारी आम लोगों तक पहुंचने नहीं दे रही है, और उसका प्रचारतंत्र तथा कारपोरेट हितों से संचालित मीडिया सिर्फ सफलतायें दिखा रही है. आने वाले कल के सुखद सपने दिखा रही है. फेके गये जूतों पर भी सोने का बर्क चढ़ा रही है. मोदी को नायाब, बेमिसाल और ‘देश में ऐसा कोई नहीं हुआ’ के नजरिये को फैला रही है. और जिस तरह, जिस अंदाज में यह किया जा रहा है, उसे देख कर यही लग रहा है, कि इस झूठ को सच दिखाने के लिये वह किसी भी हद को लांघ सकती है. लोकतंत्र और जनमत का भी लिहाज नहीं करेगी.

आप समझ सकते हैं कि वह क्या करेगी? अपने को सफल दिखाने की राजनीति, किसी भी देश और देश की आम जनता के पक्ष में नहीं होती. ऐसी सरकारें आम जनता पर बंदूकें तानती हैं. ऐसी सरकारें आम जनता को अपने सांचे में ढ़ालती हैं. ऐसी सरकारें एक राष्ट्र, एक दल और एक नेता की बातें करती हैं, आम जनता की नहीं सुनतीं.

यह सब ठीक वैसे ही होगा जैसे दुनिया के बाकी देशों में हुआ और हो रहा है, यह तो हम नहीं कह सकते, मगर किसी भी देश को ऐसे अंजाम तक पहुंचाने वाली ताकतें एक हो गयी हैं. साम्राज्यवादी हस्तक्षेप और वित्तीय ताकतों की भूमिका इतनी बढ़ गयी है कि दुनिया के ज्यादातक देशों की सूरतें एक सी होती जा रही हैं. यदि ऊपर से देखने में कोई फर्क है तब भी उनकी आंतरिक संरचना एक सी हो गयी है. इसलिये यह मानने की विवशता है, कि अपने को सफल दिखाने की नीति देश की आम जनता को सिर्फ धोखा देना नहीं है, बल्कि उसे धोखे में रखने की ऐसी नीति है कि वह अपने पक्ष में खड़ी न हो सके.

एक 14-18 या 22 पेज के अखबार में यदि 6 से 8 बड़े विज्ञापन सरकार अपनी उपलब्धियों को गिनाने के लिये खरीदे, तो उसकी बेचैनी और खर्च का अंदाजा लगाया जा सकता है, जबकि यह हो रहे खर्च का मामूली सा हिस्सा है. सरकार के बारे में छपी खबरें भी विज्ञापन का ही दर्जा रखती हैं.

अब धर्म की आग में और जलेगी दुनिया

किसी न किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह करना ही था. अमेरिका को अब एक सिरफिरा, दंभी और न देश, न जनता, न पार्टी की चिंता करने वाला राष्ट्रपति मिला है, जो मुसलिमों, लैटिनियों, मैक्सिकियों, इमिग्रैंटों, चीनियों, अखबार वालों सब से बिना चेहरे पर शिकन लाए ‘अमेरिका फर्स्ट’ कह कर कुछ भी कर सकता है. उस ने मुसलिमों के देश में प्रवेश पर पाबंदियां लगा कर यह साबित कर दिया है कि उस की पहले की बातें नरेंद्र मोदी के नारे ‘अच्छे दिन’ की तरह केवल चुनावी जुमले नहीं थे. वह अमेरिकन समाज के तानेबाने को तारतार करने की हिम्मत रखता है, उस से चाहे लाभ हो या न हो.

उस ने कुछ मुसलिम बहुल देशों से वीजा प्राप्त मुसलिमों के अमेरिका में प्रवेश पर जैसे ही प्रतिबंध लगाया. अमेरिका देश भर में मुसलिम विरोधी तत्त्व खड़े हो गए हैं. 2-4 जगह मसजिदें जला दी गई हैं. 2002 में मुसलिम आतंकवादियों द्वारा न्यूयौर्क के ट्विन टौवर पर हमले का बदला अब फिर शुरू हो गया है, क्योंकि अफगानिस्तान, इराक, लीबिया, सीरिया को तहसनहस करने के भी मुसलिम आतंकवादियों ने अपना कहर ढाहना बंद नहीं किया है. अब हिटलरी अंदाज में इंतहाई बदला लेने का माहौल डोनाल्ड ट्रंप तैयार कर रहे हैं और अगर वे चुनाव जीत सकते हैं तो देश में ही नहीं विश्व भर में मुसलिम विरोधी माहौल पैदा कर सकते हैं, क्योंकि कितने ही देश मुसलिम आतंकवाद के शिकार हो चुके हैं. डोनाल्ड ट्रंप गलत हैं, खब्ती हैं, मूर्ख हैं पर उन का मुकाबला अपने से कहीं ज्यादा कट्टरों से है, जो अपने गांव, शहर, देश और धर्म वालों किसी की भी चिंता नहीं करते और धर्म की आग में किसी को भी झोंकते हुए अपनेपराए को भूल जाते हैं.

अगर डोनाल्ड ट्रंप के लिए ‘अमेरिका फर्स्ट’ नारा है तो मुसलिम कट्टरपंथियों के लिए ‘इसलाम फर्स्ट’ है. अब समय आ गया है जब पश्चिमी एशिया के अमीर मुसलिम देश अफगानिस्तान, पाकिस्तान, इंडोनेशिया, मलयेशिया, सूडान, नाइजीरिया, सोमालिया, इजिप्ट, लीबिया की सरकारें यह तय करें कि इसलाम के नाम पर कहर को अपने देशों में ही समाप्त करना होगा वरना डोनाल्ड ट्रंप हर देश में पैदा हो जाएंगे. इसलाम हो या हिंदू धर्म अथवा ईसाई धर्म, किसी में कोई हीरेमोती नहीं जड़े हैं कि उसे मानने वाले सुखी हो जाते हैं. सभी धर्म फसाद की जड़ ज्यादा हैं, प्रेम का कम.

सिरफिरा शासक डोनाल्ड ट्रंप गलत कर रहा है पर अगर गोरी चमड़ी वाले अमेरिकी उसे समर्थन दे रहे हैं तो समझा जा सकता है कि उदारता की सीमा पूरी हो चुकी है और दंभी राष्ट्रपति के नेतृत्व में अमेरिका ने इसलाम पर ही नहीं हर गैर गोरे अमेरिका में रह रहे लोगों पर भी धावा बोल दिया है.

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