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Happy New Year 2025 : कभी अलविदा न कहना

Happy New Year 2025 :  डलास (टैक्सास) में लीना से रीवा की दोस्ती बड़ी अजीबोगरीब ढंग से हुई थी. मार्च महीने के शुरुआती दिन थे. ठंड की वापसी हो रही थी. प्रकृति ने इंद्रधनुषी फूलों की चुनरी ओढ़ ली थी. घर से थोड़ी दूर पर झील के किनारे बने लोहे की बैंच पर बैठ कर धूप तापने के साथ चारों ओर प्रकृति की फैली हुई अनुपम सुंदरता को रीवा अपलक निहारा करती थी. उस दिन धूप खिली हुई थी और उस का आनंद लेने को झील के किनारे के लिए दोपहर में ही निकल गई.

सड़क किनारे ही एक दक्षिण अफ्रीकी जोड़े को खुलेआम कसे आलिंगन में बंधे प्रेमालाप करते देख कर वह शरमाती, सकुचाती चौराहे की ओर तेजी से आगे बढ़ कर सड़क पार करने लगी थी कि न जाने कहां से आ कर दो बांहों ने उसे पीछे की ओर खींच लिया था.

तेजी से एक गाड़ी उस के पास से निकल गई. तब जा कर उसे एहसास हुआ कि सड़क पार करने की जल्दबाजी में नियमानुसार वह चारों दिशाओं की ओर देखना ही भूल गई थी. डर से आंखें ही मुंद गई थीं. आंखें खोलीं तो उस ने स्वयं को परी सी सुंदर, गोरीचिट्टी, कोमल सी महिला की बांहों में पाया, जो बड़े प्यार से उस के कंधों को थपथपा रही थी. अगर समय पर उस महिला ने उसे पीछे नहीं खींचा होता तो रक्त में डूबा उस का शरीर सड़क पर क्षतविक्षत हो कर पड़ा होता.

सोच कर ही वह कांप उठी और भावावेश में आ कर अपनी ही हमउम्र उस महिला से चिपक गई. अपनी दुबलीपतली बांहों में ही रीवा को लिए सड़क के किनारे बने बैंच पर ले जा कर उसे बैठाते हुए उस की कलाइयों को सहलाती रही.

‘‘ओके?’’ रीवा से उस ने बड़ी बेसब्री से पूछा तो उस ने अपने आंचल में अपना चेहरा छिपा लिया और रो पड़ी. मन का सारा डर आंसुओं में बह गया तो रीवा इंग्लिश में न जाने कितनी देर तक धन्यवाद देती रही लेकिन प्रत्युत्तर में वह मुसकराती ही रही. अपनी ओर इशारा करते हुए उस ने अपना परिचय दिया. ‘लीना, मैक्सिको.’ फिर अपने सिर को हिलाते हुए राज को बताया, ‘इंग्लिश नो’, अपनी 2 उंगलियों को उठा कर उस ने रीवा को कुछ बताने की कोशिश की, जिस का मतलब रीवा ने यही निकाला कि शायद वह 2 साल पहले ही मैक्सिको से टैक्सास आई थी. जो भी हो, इतने छोटे पल में ही रीवा लीना की हो गई थी.

लीना भी शायद बहुत खुश थी. अपनी भाषा में इशारों के साथ लगातार कुछ न कुछ बोले जा रही थी. कभी उसे अपनी दुबलीपतली बांहों में बांधती, तो कभी उस के उड़ते बालों को ठीक करती. उस शब्दहीन लाड़दुलार में रीवा को बड़ा ही आनंद आ रहा था. भाषा के अलग होने के बावजूद उन के हृदय प्यार की अनजानी सी डोर से बंध रहे थे. इतनी बड़ी दुर्घटना के बाद रीवा के पैरों में चलने की शक्ति ही कहां थी, वह तो लीना के पैरों से ही चल रही थी.

कुछ दूर चलने के बाद लीना ने एक घर की ओर उंगली से इंगित करते हुए कहा, हाउस और रीवा का हाथ पकड़ कर उस घर की ओर बढ़ गई. फिर तो रीवा न कोई प्रतिरोध कर सकी और न कोई प्रतिवाद. उस के साथ चल पड़ी. अपने घर ले जा कर लीना ने स्नैक्स के साथ कौफी पिलाई और बड़ी देर तक खुश हो कर अपनी भाषा में कुछकुछ बताती रही.

मंत्रमुग्ध हुई रीवा भी उस की बातों को ऐसे सुन रही थी मानो वह कुछ समझ रही हो. बड़े प्यार से अपनी बेटियों, दामादों एवं 3 नातिनों की तसवीरें अश्रुपूरित नेत्रों से उसे दिखाती भी जा रही थी और धाराप्रवाह बोलती भी जा रही थी. बीचबीच में एकाध शब्द इंग्लिश के होते थे जो अनजान भाषा की अंधेरी गलियारों में बिजली की तरह चमक कर राज को धैर्य बंधा जाते थे.

बच्चों को याद कर लीना के तनमन से अपार खुशियों के सागर छलक रहे थे. कैसा अजीब इत्तफाक था कि एकदूसरे की भाषा से अनजान, कहीं 2 सुदूर देश की महिलाओं की एक सी कहानी थी, एकसमान दर्द थे तो ममता ए दास्तान भी एक सी थी. बस, अंतर इतना था कि वे अपनी बेटियों के देश में रहती थी और जब चाहा मिल लेती थी या बेटियां भी अपने परिवार के साथ हमेशा आतीजाती रहती थीं.

रीवा ने भी अमेरिका में रह रही अपनी तीनों बेटियों, दामादों एवं अपनी 2 नातिनों के बारे में इशारों से ही बताया तो वह खुशी के प्रवाह में बह कर उस के गले ही लग गई. लीना ने अपने पति से रीवा को मिलवाया. रीवा को ऐसा लगा कि लीना अपने पति से अब तक की सारी बातें कह चुकी थी. सुखदुख की सरिता में डूबतेउतरते कितना वक्त पलक झपकते ही बीत गया. इशारों में ही रीवा ने घर जाने की इच्छा जताई तो वह उसे साथ लिए निकल गई.

झील का चक्कर लगाते हुए लीना रीवा को उस के घर तक छोड़ आई. बेटी से इस घटना की चर्चा नहीं करने के लिए रास्ते में ही रीवा लीना को समझा चुकी थी. रीवा की बेटी स्मिता भी लीना से मिल कर बहुत खुश हुई. जहां पर हर उम्र को नाम से ही संबोधित किया जाता है वहीं पर लीना पलभर में स्मिता की आंटी बन गई. लीना भी इस नए रिश्ते से अभिभूत हो उठी.

समय के साथ रीवा और लीना की दोस्ती से झील ही नहीं, डलास का चप्पाचप्पा भर उठा. एकदूसरे का हाथ थामे इंग्लिश के एकआध शब्दों के सहारे वे दोनों दुनियाजहान की बातें घंटों किया करते थे.

घर में जो भी व्यंजन रीवा बनाती, लीना के लिए ले जाना नहीं भूलती. लीना भी उस के लिए ड्राईफू्रट लाना कभी नहीं भूली. दोनों हाथ में हाथ डाले झील की मछलियों एवं कछुओं को निहारा करती थीं. लीना उन्हें हमेशा ब्रैड के टुकड़े खिलाया करती थी. सफेद हंस और कबूतरों की तरह पंक्षियों के समूह का आनंद भी वे दोनों खूब उठाती थीं.

उसी झील के किनारे न जाने कितने भारतीय समुदाय के लोग आते थे जिन के पास हायहैलो कहने के सिवा कुछ नहीं रहता था.

किसीकिसी घर के बाहर केले और अमरूद से भरे पेड़ बड़े मनमोहक होते थे. हाथ बढ़ा कर रीवा उन्हें छूने की कोशिश करती तो हंस कर नोनो कहती हुई लीना उस की बांहों को थाम लेती थी.

लीना के साथ जा कर रीवा ग्रौसरी शौपिंग वगैरह कर लिया करती थी. फूड मार्ट में जा कर अपनी पसंद के फल और सब्जियां ले आती थी. लाइब्रेरी से भी किताबें लाने और लौटाने के लिए रीवा को अब सप्ताहांत की राह नहीं देखनी पड़ती थी. जब चाहा लीना के साथ निकल गई. हर रविवार को लीना रीवा को डलास के किसी न किसी दर्शनीय स्थल पर अवश्य ही ले जाती थी जहां पर वे दोनों खूब ही मस्ती किया करती थीं.

हाईलैंड पार्क में कभी वे दोनों मूर्तियों से सजे बड़ेबड़े महलों को निहारा करती थीं तो कभी दिन में ही बिजली की लडि़यों से सजे अरबपतियों के घरों को देख कर बच्चों की तरह किलकारियां भरती थीं. जीवंत मूर्तियों से लिपट कर न जाने उन्होंने एकदूसरे की कितनी तसवीरें ली होंगी.

पीले कमल से भरी हुई झील भी 10 साल की महिलाओं की बालसुलभ लीलाओं को देख कर बिहस रही होती थी. झील के किनारे बड़े से पार्क में जीवंत मूर्तियों पर रीवा मोहित हो उठी थी. लकड़ी का पुल पार कर के उस पार जाना, भूरे काले पत्थरों से बने छोटेबड़े भालुओं के साथ वे इस तरह खेलती थीं मानो दोनों का बचपन ही लौट आया हो.

स्विमिंग पूल एवं रंगबिरंगे फूलों से सजे कितने घरों के अंदर लीना रीवा को ले गई थी, जहां की सुघड़ सजावट देख कर रीवा मुग्ध हो गई थी. रीवा तो घर के लिए भी खाना पैक कर के ले जाती थी. इंडियन, अमेरिकन, मैक्सिकन, अफ्रीका आदि समुदाय के लोग बिना किसी भेदभाव के खाने का लुत्फ उठाते थे.

लीना के साथ रीवा ने ट्रेन में सैर कर के खूब आनंद उठाया था. भारी ट्रैफिक होने के बावजूद लीना रीवा को उस स्थान पर ले गई जहां अमेरिकन प्रैसिडैंट जौन कैनेडी की हत्या हुई थी. उस लाइब्रेरी में भी ले गई जहां पर उन की हत्या के षड्यंत्र रचे गए थे.

ऐेसे तो इन सारे स्थलों पर अनेक बार रीवा आ चुकी थी पर लीना के साथ आना उत्साह व उमंग से भर देता था. इंडियन स्टोर के पास ही लीना का मैक्सिकन रैस्तरां था. जहां खाने वालों की कतार शाम से पहले ही लग जाती थी. जब भी रीवा उधर आती, लीना चीपोटल पैक कर के देना नहीं भूलती थी.

मैक्सिकन रैस्तरां में रीवा ने जितना चीपोटल नहीं खाया होगा उतने चाट, पकौड़े, समोसे, जलेबी लीना ने इंडियन रैस्तरां में खाए थे. ऐसा कोई स्टारबक्स नहीं होगा जहां उन दोनों ने कौफी का आनंद नहीं उठाया. डलास का शायद ही ऐसा कोई दर्शनीय स्थल होगा जहां के नजारों का आनंद उन दोनों ने नहीं लिया था.

मौल्स में वे जीभर कर चहलकदमी किया करती थीं. नए साल के आगमन के उपलक्ष्य में मौल के अंदर ही टैक्सास का सब से बड़ा क्रिसमस ट्री सजाया गया था. जिस के चारों और बिछे हुए स्नो पर सभी स्कीइंग कर रहे थे. रीवा और लीना बच्चों की तरह किलस कर यह सब देख रही थीं.

कैसी अनोखी दास्तान थी कि कुछ शब्दों के सहारे लीना और रीवा ने दोस्ती का एक लंबा समय जी लिया. जहां भी शब्दों पर अटकती थीं, इशारों से काम चला लेती थीं.

समय का पखेरू पंख लगा कर उड़ गया. हफ्ताभर बाद ही रीवा को इंडिया लौटना था. लीना के दुख का ठिकाना नहीं था. उस की नाजुक कलाइयों को थाम कर रीवा ने जीभर कर आंसू बहाए, उस में अपनी बेटियों से बिछुड़ने की असहनीय वेदना भी थी. लौटने के एक दिन पहले रीवा और लीना उसी झील के किनारे हाथों में हाथ दिए घंटाभर बैठी रहीं. दोनों के बीच पसरा हुआ मौन तब कितना मुखर हो उठा था. ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उस की अनंत प्रतिध्वनियां उन दोनों से टकरा कर चारों ओर बिखर रही हों.

दोनों के नेत्रों से अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी. शब्द थे ही नहीं कि जिन्हें उच्चारित कर के दोस्ती के जलधार को बांध सकें. प्रेमप्रीत की शब्दहीन सरिता बहती रही. समय के इतने लंबे प्रवाह में उन्हें कभी भी एकदूसरे की भाषा नहीं जानने के कारण कोई असुविधा हुई हो, ऐसा कभी नहीं लगा. एकदूसरे की आंखों में झांक कर ही वे सबकुछ जान लिया करती थीं. दोस्ती की अजीब पर अतिसुंदर दास्तान थी. कभी रूठनेमनाने के अवसर ही नहीं आए. हंसी से खिले रहे.

एकदूसरे से विदा लेने का वक्त आ गया था. लीना ने अपने पर्स से सफेद धवल शौल निकाल कर रीवा को उठाते हुए गले में डाला, तो रीवा ने भी अपनी कलाइयों से रंगबिरंगी चूडि़यों को निकाल लीना की गोरी कलाइयों में पहना दिया जिसे पहन कर वह निहाल हो उठी थी. मूक मित्रता के बीच उपहारों के आदानप्रदान देख कर निश्चय ही डलास की वह मूक मगर चंचल झील रो पड़ी होगी.

भीगी पलकों एवं हृदय में एकदूसरे के लिए बेशुमार शुभकामनाओं को लिए हुए दोनों ने एकदूसरे से विदाई तो ली पर अलविदा नहीं कहा.

Sports : राइफल की रानी निशानेबाज सुमा शिरूर का इंटरव्‍यू

Sports : सुमा शिरूर भारतीय निशानेबाज हैं. वर्तमान में सुमा भारतीय जूनियर राइफल शूटिंग टीम की कोच हैं. सुमा शूटिंग में अबतक कई मैडल जीत चुकी हैं, वहीं उन्हें द्रोणाचार्य पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है.

जिंदगी में अगर कुछ कर दिखाने की हिम्मत आप में हैं, तो कितनी भी मुश्किलें रास्ते में आए, उसे पार कर अपनी मंजिल पा लेते हैं. ऐसा ही कर दिखाया है, कर्नाटक राज्य के चिक्काबल्लापुर में जन्मीं पूर्व भारतीय निशानेबाज सुमा शिरुर. वे 30 साल से शूटिंग के क्षेत्र में एक प्लेयर और अब कोच के रूप में बिता रही हैं.

वर्ष 1993 में महाराष्ट्र स्टेट शूटिंग चैम्पियनशिप से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली सुमा शिरूर ने साल 2002 और साल 2006 एशियन गेम्स में रजत और कांस्य पदक जीता है. साथ ही कौमनवेल्थ गेम्स में एक गोल्ड मैडल समेत 3 पदक जीते. उन्होंने 10 मीटर एयर राइफल संयुक्त विश्व रिकौर्ड बनाया हैं, उन्होंने क्वालिफिकेशन राउंड में अधिकतम 400 अंक बनाए हैं, जो उन्होंने 2004 एशियाई शूटिंग चैंपियनशिप कुआलालंपुर में हासिल किया था. सोमा के लिए Sports एक पैशन है.

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अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित

वर्ष 2003 में, उन्हें भारत सरकार द्वारा अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. आज वह भारतीय जूनियर राइफल शूटिंग टीम की ‘हाई परफौरमेंस कोच’ हैं. वर्ष 2020 पैरालिंपिक महिलाओं की SH1 स्पर्धा, 10 मीटर राइफल में स्वर्ण और महिलाओं की SH1 स्पर्धा, 50 मीटर 3 पोजिशन राइफल कांस्य पदक विजेता अवनि लेखरा की कोच भी हैं. 30 नवंबर 2022 को उन्हें भारत के राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.
आप को बता दें कि विनम्र, हंसमुख, धैर्यवान सुमा शिरुर ने नवी मुंबई से अपनी शिक्षा पूरी की. उन्होंने रसायन विज्ञान में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है. अपने स्नातक पाठ्यक्रम के दौरान, वह राष्ट्रीय कैडेट कोर का हिस्सा थीं. उसी दौरान उन्होंने तय कर लिया था कि उन्हें शूटिंग में रुचि है और उन्होंने द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता संजय चक्रवर्ती और महाराष्ट्र राइफल एसोसिएशन के श्री बीपी बाम की निगरानी में इस खेल को सीखना शुरू किया और कामयाबी हासिल की.
वर्ष 2018 से 2024 तक सुमा ने एक कोच के रूप में काम किया है, जिस में इस वर्ष पेरिस ओलंपिक में मनु भाकर ने 10 मीटर और 25 मीटर पिस्टल निशानेबाजी स्पर्धाओं में दो कांस्य पदक जीते. पैरालिंपिक के दौरान, निशानेबाज अवनि लेखरा ने पेरिस में महिलाओं की 10 मीटर एयर राइफल स्टैंडिंग एसएच1 स्पर्धा में अपना खिताब बरकरार रखा है और इस तरह वह पैरालिंपिक में दो स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय महिला बन गईं हैं.
अभी सुमा शूटिंग कोच से ब्रेक ले कर परिवार के साथ समय बिता रही है और खुद शूटिंग की प्रैक्टिस कर रही हैं, ताकि अपने खिलाड़ियों को खेल के नए तकनीक से परिचय करवा सकें.

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Sports में मिलती है खुशी

खिलाड़ियों का ओलंपिक में जीतने को ले कर सुमा कहती हैं, “शूटिंग में मैं ने ही ओलंपिक और पैरालिंपिक में बच्चों को गाइड किया है. मैं खिलाड़ी अवनी लेखरा की पर्सनल कोच हूं, उन्होंने टोकियो पैरालिंपिक में गोल्ड और ब्रौन्ज मैडल जीता है. पैरिस में भी गोल्ड जीता है.
“एक कोच के रूप में मेरे लिए ये बहुत ही संतोष और खुशी की बात है. sports के लिए खिलाड़ी जितना सैक्रिफाइस करता है, उतना कोच को भी करना पड़ता है. प्रैक्टिस के अलावा खिलाड़ियों के इमोशन भी ऊपरनीचे होते रहते हैं. लगातार गाइडेंस, जिम्मेदारी और एथलीट का ट्रस्ट कोच पर होता है, ऐसे मैं उन्हें उन के गोल तक पहुंचा सकूं. इसे मैँ शब्दों में बयां नहीं कर सकती.”

अधिक चुनौती

सुमा कहती हैं, “सीखने और सिखाने में बहुत अधिक अंतर होता है, जब हम एथलीट होते हैं तो सफलता और असफलता की जिम्मेदारी मेरी होती है, जबकि एक कोच बनने पर चुनौती अधिक होती है, क्योंकि ऐसे में मुझे एकदूसरे खिलाड़ी को समझना, सुनना और धैर्य रखना पड़ता है, ताकि सामने वाले खिलाड़ी का मूड और धैर्य को समझा जा सकें.
“कोच के तौर पर मैं ने खुद को बहुत बदला है, धीरज अपने अंदर लाई हूं. सब से अधिक चुनौती एक शूटर को कोच करना होता है, जिस में सही कौर्डिनेशन होना आवश्यक होता है. इस में समय लगता है, लेकिन अगर शूटर ने जल्दी कोई प्रतियोगिता खेली और हार गया, तो उस का मौरल टूट जाता है. खुद को दोषी मानने लगता है. उस फेज से उन्हें निकालने और खुद पर विश्वास बनाए रखना आसान नहीं होता. बहुत चुनौतीपूर्ण होता है.”

 

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स्वीकारें लर्निंग फेज को

इतनी बड़ी जनसंख्या होने के बावजूद हमारे देश के खिलाड़ी अधिक ओलंपिक मैडल नहीं ला पाते, जबकि छोटेछोटे देश ओलंपिक में गोल्ड मैडल लाते हैं, इस की वजह के बारे में सुमा बताती हैं कि इस के लिए पूरे चक्र को देखना पड़ेगा. देखा जाए तो 4 साल के इस चक्र में पिछले वर्षों से शूटिंग में खिलाड़ियों ने अच्छा प्रदर्शन किया है. ऐसे में लगातार विकास होने की जरूरत है, बैठ कर इंतजार करना ठीक नहीं, सभी को कन्सटेंट ग्रोथ को बनाए रखना पड़ता है, हर दिन नई सीख मिलती है, जिस के लिए फ्लैक्सिबल होना जरूरी है और बदलाव को खुद में लाना पड़ता है, इसे ओपन माइंड के साथ अपनाना पड़ता है. कभीकभी उस बदलाव को खिलाड़ी स्वीकार नहीं कर पाते, जबकि एक खिलाड़ी को हमेशा लर्निंग फेस में रहना जरूरी है.
वह कहती हैं, “हमारा देश काफी इमोशनल है, जिस का प्रभाव खिलाड़ियों पर पड़ता है और वे मैडल के करीब पहुंच कर भी कामयाब नहीं हो पाते, जबकि छोटेछोटे देश मैडल ले आते हैं. इस की वजह उन देशों के बच्चों में बचपन से अधिक आत्मविश्वास का होना है, जिस की कमी हमारे देश में है. अभी थोड़ी माइंडसेट बदली है और आगे कुछ अच्छा अवश्य होगा.”

 

पेरैंट्स का सहयोग जरूरी

सुमा कहती हैं, “हमारे देश में कहीं भी उच्च दर्जे की ट्रैनिंग क्लासेस नहीं हैं और किसी बच्चे ने शुरुआत बचपन में किसी खेल को सीखा है, तो उसे वह माहौल आगे चल कर नहीं मिलता. इन ट्रेनिंग सेंटर्स को अच्छा होने की आवश्यकता है, साथ ही अलगअलग खेल में जाने और सीखने का मौका बच्चों को कम उम्र से मिलना चाहिए, तब जा कर स्पोर्टिंग कल्चर होगा, जो नहीं है. इसलिए मातापिता भी उस ओर ध्यान नहीं देते, जबकि उन का सहयोग बहुत जरूरी होता है.”
वह कहती हैं, “मेरे ट्रेनिंग सेंटर में असिस्टेंट कोच भी महिला है, लड़कों की संख्या से मेरे पास लड़कियां ही अधिक आती है. इस के अलावा मेरी एकेडमी के साथ एक प्राइवेट कंपनी ने शूटिंग रेंज का पार्टनरशिप किया है, जिसे ‘गर्ल्स फौर गोल्ड’ नाम दिया गया है. इस प्रोग्राम के तहत 15 से 19 साल की लड़कियों के लिए पूरी स्पौन्सरशिप उन्होंने दिया है, इस में 7 लड़कियों को चुना गया है. इन लड़कियों को इंडिया के लिए मैडल लाने के लिए ट्रेनिंग दी जा रही है.”

Sports में राजनीति ठीक नहीं

इस के आगे सुमा कहती हैं, “राजनीति आजकल हर जगह है, ऐसे में खेल में होना कोई नई बात नहीं है. खेल में राजनीति गलत है, लेकिन खिलाड़ी को उस तरफ ध्यान दिए बिना आगे बढ़ते रहना है, तभी वे कामयाब हो सकते हैं.”

ये भी सही है कि sports के कुछ इक्विप्मन्ट काफी महंगे होते हैं, मसलन तीरंदाजी या शूटिंग दोनों में आम परिवार के बच्चे उसे खरीद नहीं पाते, ऐसे में उन के हुनर को आगे लाना संभव नहीं होता. इस के जवाब में सुमा कहती हैं कि “शुरुआत के स्तर पर उन्हें किसी क्लब से वह इक्विपमेंट मिल जाता है, लेकिन आगे चल कर उन्हें खुद के राइफल की जरूरत पड़ती है, जिस में सरकार के साथसाथ एकेडमी का सहयोग जरूरी है, जिस में सरकार और प्राइवेट संस्था का एक अच्छा कौम्बीनेशन होना चाहिए.
“मेरी एकेडमी के सारे अरेंजमेंट मैं ने अपनी तरफ से किए हैं, ऐसे में अगर सरकार की तरफ से कुछ ग्रांट मिलता है, तो मैं आगे कुछ अधिक अच्छा कर सकती हूं.”

Sports में किससे मिली प्रेरणा

सुमा ने 18 साल की उम्र में राइफल पकड़ी और शूटिंग की शुरुआत की थी. वे कहती हैं, “जब मैं ने शूटिंग की शुरुआत की थी, तो शूटिंग एक ओलंपिक स्पोर्ट है, ये भी पता नहीं था, लेकिन स्पोर्ट्स में मेरी बहुत रुचि थी, स्कूल के हर स्पोर्ट में मैँ भाग लेती थी और बेस्ट स्पोर्ट्स का एवार्ड भी मिला. इस के बाद जब मैं ने कालेज ज्वाइन किया, तो एनसीसी था, उसे मैं ने जौइन किया और वहां मेरे हाथ में बंदूक मिली. मैँ शूटिंग में अच्छा करने लगी थी, तब मेरे सीनियर मुझे महाराष्ट्र स्टेट एसोसिएशन के शूटिंग सेंटर में ले गए. वहां मुझे पता चला कि ये एक ओलिंपिक स्पोर्ट है और इसे करने की प्रेरणा मिली. मेरे मेहनत को देख कर मेरे पेरैंट्स ने सहयोग दिया, जबकि मेरे परिवार के सारे लोग एकेडमिकली बहुत स्ट्रौंग हैं. शादी के बाद मेरे सासससुर और पति का भी पूरा सहयोग मिला है.

पहली कामयाबी और शादी

सुमा हंसती हुई कहती हैं, “मेरी पहली बड़ी अचीवमेंट वर्ष 1995 है, जिस में मुझे कोमनवैल्थ शूटिंग चैंम्पियनशिप में मुझे मैडल मिला और एशियन शूटिंग के लिए चुनी गई. इस तरह साल 1995 में मेरी जिंदगी पूरी तरह से बदल गई.” सुमा आगे कहती हैं कि “शादी के बाद sports को लेकर  भी परिवार के साथ स्पर्धा में भाग लेना मुश्किल नहीं था, क्योंकि मैँ अपने पति सिद्धार्थ शिरुर को कालेज के समय से जानती थी और मेरी शादी भी साल 1999 में हुई जब मैं ने थोड़ी कामयाबी पा ली थी. पूरा सहयोग होने की वजह से मैँ आगे बढ़ सकी. साल 2001 में बड़ा बेटा हुआ. 2002 में एशियन गेम्स के दौरान बेटा बहुत छोटा था, लेकिन पति और सासससुर ने पूरा सहयोग दिया. 8 महीने के बेटे को ले कर मैँ कौमनवेल्थ गेम्स में गई और मैडल जीता. मेरे लिए यह बहुत बड़ी चुनौती और खुशी रही है.”

निशानेबाज के क्षेत्र में कब आए

sports woman सुमा कहती हैं कि बहुत छोटी उम्र में शूटिंग के क्षेत्र में आना सही नहीं होता, क्योंकि बच्चे का फिजिकल डेवलपमेंट इस खेल के लिए सही होना चाहिए, मिनमम उम्र 10 से 12 साल सही मानी जाती है, लेकिन बच्चे को छोटी उम्र से दूसरे खेलों में भाग लेने की जरूरत होती है, ताकि उन का शारीरिक ग्रोथ सही हो. इस के बाद शूटिंग शुरू कर सकते हैं. उस दौरान एक अच्छा एकेडमिक बैलेन्स होना चाहिए, ताकि पढ़ाई के साथसाथ खेल में भी पूरा मन बच्चा लगा सके, क्योंकि जिस भी खेल को वे चुनते हैं, उस में एक क्वालिटी टाइम और कमिटमेंट देना पड़ता है, जो उन के भविष्य में उन्हें उन के गोल तक पहुंचा सकता है.

रामभद्राचार्य और शंकराचार्य क्यों भड़के Mohan Bhagwat पर

Mohan Bhagwat : तंबाकू बनाने और बेचने वाले ही कैंसर की दवा बनाने लगें तो इसे आप क्या कहेंगे यह आरएसएस प्रमुख के हालिया बयानों से सहज समझा जा सकता है जिसे ले कर संत समाज उन पर भड़का हुआ है जो इशारा यह कर रहा है कि अब हज करने की तुक क्या?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने विगत दिनों एक ऐसा बयान दिया जो चर्चा का विषय बनने के बाद अब हिंदुओं के गले की हड्डी बनता जा रहा है. उन्होंने कहा, “धर्म के नाम पर होने वाले सभी उत्पीड़न और अत्याचार गलतफहमी और धर्म को समझ की कमी के कारण हुए हैं.”
महाराष्ट्र के अमरावती में महानुभाव आश्रम के शताब्दी समारोह में बोलते हुए मोहन भागवत ने कहा, “धर्म महत्वपूर्ण है और इस को उचित शिक्षा दी जानी चाहिए. धर्म का अनुचित और अधूरा ज्ञान अधर्म की ओर ले जाता है.” इस बयान की देशभर में चर्चा है इस के अलगअलग अर्थ निकाले जा रहे हैं लेकिन सब से बड़ा सवाल है कि मोहन भागवत को ऐसा क्यों कहना पड़ा है और इस के भीतर का अर्थ क्या है यह समझना आवश्यक है.
दरअसल, मोहन भागवत के अनुसार, धर्म हमेशा से अस्तित्व में रहा है और सब कुछ इस के अनुसार चलता है, इसीलिए इसे सनातन कहा जाता है.
उन्होंने यह भी कहा कि धर्म का आचरण ही धर्म की रक्षा है और अगर धर्म को सही तरीके से समझा जाए तो इस से समाज में शांति, सद्भाव और समृद्धि आ सकती है.
यह बयान एक महत्वपूर्ण समय पर आया है, जब देशभर में धर्म के नाम पर हिंसा और अत्याचार की घटनाएं बढ़ रही हैं. उत्तर प्रदेश हो या छत्तीसगढ़ अथवा जम्मूकश्मीर, मणिपुर, असम हर एक राज्य में माहौल विषाक्त होता चला जा रहा है. जो आने वाले समय में देश में अनेक संकट और विषमता है पैदा कर सकता है इस दिशा में सत्ता और समाज के अगुवा लोगों को सद्भावना का संदेश देना होगा.

भड़का संत समाज

मोहन भागवत की मंशा बहुत साफसुथरी या स्पष्ट थी इस में शक है लोग किसी नतीजे पर पहुंच पाते इस के पहले ही संत समाज ने धर्म के असल माने बता दिए कि धर्म का शांति, सद्भाव या भाईचारे से कोई लेनादेना नहीं है इस का असल मकसद लोगों के दिलोदिमाग और व्यक्तिगत सामाजिक जिंदगी पर शासन करना है जिस से वे पूजापाठी बने रह कर दानदक्षिणा के कारोबार के ग्राहक बने रहें और जो इस के आड़े आएगा उसे सबक सिखाने में धर्म के ठेकेदार हिचकिचाएंगे नहीं फिर भले ही वे धर्म का मतलब सिखाते रहने वाले मोहन भागवत ही क्यों न हों.

लोग भागवत से सहमत होने की वजह ढूंढ पाते इस से पहले ही साधुसंतों ने उन्हें अपने निशाने पर लेना शुरू कर दिया. ताजा बयान वैष्णव संत रामभद्राचार्य का है जिन्होंने भागवत से सहमत होने से इनकार करते हुए दो टूक कहा कि हम भागवत के अनुशासक हैं वे हमारे अनुशासक नहीं हैं जो भागवत की बात को हिंदू या हम मानें. इस के पहले एक शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने तो और भी तीखे अंदाज में कहा था कि जब उन्हें सत्ता हासिल करना थी तब वह मंदिरमंदिर करते थे अब सत्ता मिल गई तो मंदिर नहीं ढूंढने की सलाह दे रहे हैं.

देखा जाए तो ये संत गलत कुछ नहीं कह रहे हैं जिस का सार यह है कि अब हज करने क्यों जाया जा रहा है? आरएसएस ने अपने उद्भव से ही हिंदुओं को भड़काने का काम किया है और अब अहिंसा परमोधर्म जैसे आउटडेटेड उपदेश दे रहा है. अब बबूल बोकर गुलाब के फूल तो मिलने से रहे.

खास मकसद से दिए गए बयान के बाद भी मोहन भागवत की बातों का असर निम्नलिखित हो सकता है:

मोहन भागवत के बयान से लोगों को धर्म के प्रति नई सोच का आगाज हो सकता है. ऐसा सोचना भी बेईमानी है. वे धर्म को एक नए दृष्टिकोण से देख सकते हैं यह सोचने की भी कोई वजह नहीं और न ही वे इस के मूलसिद्धांतों को भूलने का प्रयास कर सकते हैं. ये बातें भी मन बहलाऊ ही हैं कि मोहन भागवत के बयान से सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा मिल सकता है. लोग धर्म के नाम पर हिंसा और अत्याचार को रोकने के लिए एकजुट हो सकते हैं और समाज में शांति और सद्भाव को बढ़ावा दे सकते हैं. मोहन भागवत के बयान का राजनीतिक प्रभाव भी हो सकता है. यह बयान भारतीय जनता पार्टी को धर्म के प्रति अपनी नीतियों को बदलने के लिए प्रेरित कर सकता है और धर्म के नाम पर हिंसा और अत्याचार को रोकने के लिए कदम उठा सकते हैं. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि लोग दोनों में से किस की बात पर ध्यान देते हैं.

मोहन भागवत के बयान से सामाजिक परिवर्तन की संभावना भी न के बराबर है क्योंकि उन की अब कोई सुनता नहीं और सुनता भी है तो उस पर अमल नहीं करता अगर अमल ही करना होता तो गांधी और नेहरू क्या बुरे थे. मोहन भागवत ने ऐसा बयान देने के पीछे कई कारण हो सकते हैं. यहां कुछ संभावित कारण हैं:

भागवत ने कहा है, ”धर्म की सही समझ और इस के मूलसिद्धांतों का पालन करना ही शांति और समृद्धि का मार्ग है”. यह बयान धर्म की सही समझ को बढ़ावा देने के लिए दिया गया हो सकता है. लेकिन यही धर्म की सही समझ होती तो देश का माहौल बिगड़ता ही क्यों?
भागवत ने कहा है कि धर्म के नाम पर हिंसा और अत्याचार को रोकने के लिए एकजुट होना आवश्यक है. यह बयान सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए दिया गया हो सकता है.

भागवत का बयान राजनीतिक संदेश भी हो सकता है. यह बयान भाजपा की धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक सद्भाव के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाने के लिए दिया गया हो सकता है. लेकिन भाजपा की तरफ से इस आशय का कोई वक्तव्य अभी तक न आना बताता है कि वह दो पाटों के बीच फंस चुकी है.
भागवत ने कहा है कि धर्म की सही समझ और इस के मूलसिद्धांतों का पालन करना ही विश्व शांति का मार्ग है. यह बयान विश्व शांति को बढ़ावा देने के लिए दिया गया हो सकता है.
भागवत का बयान हिंदू धर्म की रक्षा के लिए भी दिया गया हो सकता है. यह बयान हिंदू धर्म के मूल्यों और सिद्धांतों को बचाने और बढ़ावा देने के लिए दिया गया हो सकता है.

यह सवाल काफी संवेदनशील है, और इस का जवाब देना मुश्किल है क्योंकि हर धर्म की तरह हिंदू धर्म की बुनियाद भी हिंसा, बैर और झगड़ेफसाद जंग आदि पर ही रखी गई है.
हाल के वर्षों में भारत में धर्म के नाम पर हिंसा और अत्याचार की घटनाएं अत्यंत बढ़ गई हैं. कई मामलों में, हिंदू धर्म के नाम पर हिंसा और अत्याचार की घटनाएं हुई हैं.

ऐसे में मोहन भागवत का बयान एक प्रयास हो सकता है कि धर्म के नाम पर हिंसा और अत्याचार को रोका जाए. यह बयान एक संदेश हो सकता है कि धर्म की सही समझ और इस के मूलसिद्धांतों का पालन करना ही शांति और समृद्धि का मार्ग है.
लेकिन यह सवाल भी उठता है कि क्या यह बयान पर्याप्त है? क्या यह बयान धर्म के नाम पर हिंसा और अत्याचार को रोकने के लिए पर्याप्त है? यह स्पष्ट है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ हो या दुनिया की सब से बड़ी राजनीतिक पार्टी भाजपा को धर्म के नाम पर हिंसा और अत्याचार को रोकने के लिए और अधिक गंभीर प्रयास करने की आवश्यकता है.

दरअसल, असल लड़ाई दानदक्षिणा की हिस्साबांटी की है. संत समाज को लगता है कि सरकारी पैसे से संघ की इमारतें चमक रही हैं जबकि मोहन भागवत का सोचना यह हो सकता है कि मंदिर तो खूब चमक चुके हैं.

Anurag Basu : ब्‍लड कैंसर से जूझते हुए बनाई थी कंगना रनौट की ‘Gangster’

Anurag Basu :  शांत, धैर्यवान और हंसमुख अनुराग बासु ने फिल्म इंडस्ट्री में एक लंबा सफर तय किया है. इसमें उन्होंने एक स्टोरीटेलर के रूप में क्रीऐटिवटी, अडैप्टबिलटी और अथक परिश्रम से अपने आर्टिस्टिक हुनर को सबके सामने लाने की कोशिश की है. अनुराग एक अच्छे फ़िल्म, टीवी विज्ञापन, निर्माता, निर्देशक, अभिनेता और पटकथा लेखक के रूप में जाने जाते हैं उन्होंने कई बड़ी फिल्में और वेब सीरीज बनाई है.

अनुराग बसु का जन्म झारखंड के भिलाई क्षेत्र में एक आर्टिस्टिक बंगाली परिवार में हुआ है, जहां उनकी माँ दीपशखा बासु और पिता सुब्रतो बासु दोनों ही उच्च श्रेणी के थिएटर आर्टिस्ट रहे, जिसका प्रभाव अनुराग के जीवन पर पड़ा. अनुराग ने अपनी शुरुआती पढ़ाई भिलाई से पूरी की. उसके बाद उन्होंने अपनी स्नातक की पढ़ाई जबलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज से पूरा किया है. काम के दौरान उन्होंने तानी बसु से किया और दो बेटियों के पिता बने.

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Anurag Basu : कैरियर की शुरुआत

अनुराग का कैरियर टीवी धारावाहिकों से शुरू हुआ, जिसमें उन्होंने तारा, कोशिश.. एक आशा जैसी पोपुलर शोज बनाए. इसके बा उन्होंने सांस भी कभी बहू थी , कहानी घर – घर की, कसौटी जिंदगी की आदि कई धारावाहिकों के पायलट शो बनाए. इसके बाद उन्होंने खुद की कम्पनी शुरू की और कई धारावाहिकों का निर्माण किया, जिसमें मीत, मंजिले अपनी अपनी, एम आई आई टी, थ्रिलर एट 10, रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानियाँ आदि कई थे. टीवी की जर्नी को वे चुनौतीपूर्ण और रिवार्डिंग मानते है. Anurag Basu  कहना है कि टीवी में काम करना एक बवंडर में काम करने जैसा होता है, जिसमें लिमिटेड टाइम में हाई क्वालिटी कंटेन्ट का प्रेशर बना रहता है, इससे मुझे किसी भी बदलते परिस्थिति में मुझे कुछ अच्छा सोचने की सीख मिली. साथ ही दर्शकों की पसंद को जानने का मौका भी शो के जरिए मिलता रहा. टीवी में काम करना सभी कलाकारों के लिए भी बहुत जरूरी होता है, क्योंकि इससे कलाकार दर्शकों की पर्सनल लेवल से जुड़ जाता है और कलाकार के रोज – रोज की कोशिश उन्हे एक अच्छा कलाकार बनाती है.

anurag basu family

टीवी से फिल्मों का सफर

Anurag Basu  ने टीवी धारावाहिकों के हजारों एपिसोड शूट करने के साथ – साथ खुद को एक फिल्म मेकर के रूप में स्थापित किया है, जिसके लिए उन्हे काफी मेहनत करनी पड़ी, क्योंकि उनकी पहचान टीवी पर हो चुकी थी, लेकिन उनकी इच्छा थी कि वे एक बड़ी फिल्म का निर्देशन करें, ऐसे में छोटे पर्दे से बड़े पर्दे पर शिफ्ट करना उनके लिए एक बड़ा कदम था, जिसे उन्होंने सोच समझकर लिया, क्योंकि वे चाहते थे कि अब उन कहनियों को कही जाए, जिसे लोगों ने सालों से नहीं देखा है और ये कहनियाँ हमारे आसपास घट रही है, जिसमें जुनून, ईर्ष्या और व्यभिचार जैसे विषयों को लेना आवश्यक है. इसी शृंखला में उन्होंने मर्डर और बर्फ़ी जैसी फिल्में बनाकर एक चर्चित निर्देशक बने. उनका मानना है कि एक निर्देशक हर फिल्म से कुछ न कुछ सीखता है और मैंने भी सीखा है.

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20 सालों का साथ

Anurag Basu की कोर टीम पिछले 20 वर्षों से साथ काम कर रही है, प्रोडक्शन डिजाइन से लेकर सिनेमेटोग्राफर सभी आजतक साथ है. वे कहते है कि मेरी पहली फिल्म मेरे सारे ग्रुप की पहली फिल्म थी, सभी ने साथ मिलकर उस फिल्म को बनाई थी और आज भी साथ फिल्म्स बनाते है. उन्होंने फिल्म मेकिंग को खुद की उपलब्धि नहीं, बल्कि टीम की मेहनत को माना है, एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा है कि मैँ किसी स्क्रिप्ट को लिखने के बाद उसे शूट करते वक्त आर्टिस्ट को पूरी आजादी देता हूं ताकि वे उसे अपने तरीके से दृश्य को अच्छा बनाए, इसलिए कई बार स्क्रिप्ट मेरे पास होती है, लेकिन शूटिंग के दृश्य बदल जाते है और रिजल्ट अच्छा निकल कर आता है.

बासु ने हर तरह की कहानियों को कहने की कोशिश की है, जिसमें संगीत, रोमांस, थ्रिल आदि के सहारे उन्होंने दर्शकों को हमेशा कुछ नया दिया है. वे कहते है कि एक फिल्म मेकर होने के नाते मैँ हमेशा पूरे विश्व से प्रभावित रहता हूँ और किसी भी जोनर की संस्कृति और वहाँ के अनुभव को फिल्म की कहानी के जरिए लोगों तक पहुँचाने की कोशिश करता रहता हूँ. फिल्म जग्गा जासूस अधिक नहीं चली, लेकिन उसमें मैंने नए स्टाइल और एनिमेशन का प्रयोग किया है, क्योंकि आर्ट एक ईवोल्यूशन है, इसमें मैँ नए प्रयोग करता रहता हूँ, ताकि दर्शकों को कुछ नया देखने को मिले.

 

anurag basu gangster

Anurag Basu का संघर्ष  

अनुराग के टीवी से फिल्मों के कैरियर की शुरुआत आसान नहीं था, उन्हे बहुत संघर्ष करने पड़े, क्योंकि उन्हे प्रूव करना पड़ा कि वे एक अच्छे फिल्म मेकर है, लेकिन इसके लिए किसी बड़े फिल्म मेकर के अंदर उन्हे काम करने की जरूरत थी, जिसका मौका उन्हे भट्ट कैम्प से मिला. हालांकि उनके कैरियर की शुरुआत वर्ष 2003 में तुषार कपूर और एषा देओल स्टारर फिल्म कुछ तो है से हुआ और इस फिल्म का निर्माण एकता कपूर ने किया गया था,लेकिन यह फिल्म बॉक्स-ऑफिस पर कुछ खास कमाल नहीं दिखा सकी. इसके बाद बासु ने महेश भट्ट के साथ मिलकर फिल्म साया का निर्देशन किया. इस फिल्म में जॉन अब्राहम और तारा शर्मा मुख्य भूमिका में नजर आये थे, लेकिन पहली फिल्म की तरह उनकी यह फिल्म भी दर्शकों को कुछ खास पसंद नहीं आई. अनुराग कहते है कि मुझे ये प्रूव करना मुश्किल हो रहा था कि मैँ एक अच्छा फिल्म मेकर हूं, लेकिन एक दिन मुकेश भट्ट ने मुझे बुलाया और 7 लाख का ऑफर निर्देशन के लिए दिया, लेकिन तुरंत उन्होंने इसे दो फिल्मों की फीस बता दी, मैँ राजी हो गया, क्योंकि कोई काम मिल नहीं रहा था और तब फिल्म मर्डर बनी. ढाई करोड़ की फिल्म ने 80 करोड़ की कमाई की और मेरा निर्देशन सफल रहा. यह मेरी पहली हिट फिल्म साबित हुई.

 

फिल्म हिट तो डायरेक्टर हिट   

इसके बाद Anurag Basu  ने फिल्म गैंगस्टर और लाइफ इन ए मेट्रो जैसी फ़िल्में निर्देशित की, जिसे दर्शकों ने कुछ पसंद किया, लेकिन तभी उनके मस्तिष्क में बर्फ़ी फिल्म की कहानी आई और बासु ने इसे रणवीर कपूर, प्रियंका चोपड़ा और इलियाना डिक्रूज के साथ बनाई, जो उनके कैरियर की सबसे बड़ी हिट फिल्म फिल्म साबित हुई, क्योंकि इस फिल्म में दार्जिलिंग के एक गूंगे और बहरे व्यक्ति मर्फी “बर्फी” जॉनसन के जीवन और उसके दो महिलाओं श्रुति और झिलमिल के साथ सम्बन्धों को दर्शाती है, यह फिल्म दर्शकों और आलोचकों द्वारा हर जगह सराही गयी. इस फिल्म को कई पुरस्कार भी मिले.

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Anurag Basu  को हुआ था ब्लड कैंसर

अनुराग बसु को वर्ष 2004 में प्रोमाइलोसाइटिक ल्यूकेमिया नामक  ब्लड कैंसर था. इस बीमारी में बोन मैरो में सफ़ेद रक्त कोशिकाओं का उत्पादन बढ़ जाता है. अनुराग बसु कीमोथेरेपी और लगातार इलाज के बाद इस बीमारी से उबर चुके है. अब वे खुद की नियमित देखभाल से ठीक है. उस घटना के बारें में उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा है कि उन्हें इस बीमारी का पता तब चला, जब उनके मुंह में बड़े-बड़े छाले निकलने लगे थे.

वह डॉक्टर के पास तो गए, लेकिन वहां उनको कुछ मेडिकल टेस्ट के लिए एडमिट होने के लिए कहा गया था. अनुराग बिना टेस्ट कराए सेट पर वापस आ गए, लेकिन स्थिति ठीक न होने की वजह से उनको अस्पताल में भर्ती किया गया. इधर उनकी पत्नी दूसरी बार गर्भवती थी और डॉक्टर ने उन्हे कहा कि उनके पास जीने के लिए केवल 2 सप्ताह है. अनुराग घबराये नहीं और उस परिस्थिति से निकलने की कोशिश में लगे रहे.

उनके इलाज के दौरान, टीवी और फ़िल्म इंडस्ट्री के कई लोगों ने रक्तदान किया था. उन्होंने कीमोथेरेपी के दौरान मास्क पहनकर फ़िल्म ‘गैंगस्टर’ की शूटिंग की थी. उन्हें परिवार, दोस्तों, और चाहने वालों का पूरा समर्थन मिला, जिससे वे इस बीमारी से उबर पाए. वे आगे कहते है कि कैंसर से लड़ाई के बाद मेरा जीवन के प्रति नज़रिया ही बदल गया है.

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रियलिटी शोज में जज अब और नहीं

अनुराग हँसते हुए कहते है कि एक घटना ने मुझे रियलिटी शोज में काम करने से रोक दिया है. मैंने कई डांस शोज जज किये है, एक दिन एक मॉल में मैँ बच्चों सहित एक परिवार से मिला, बच्चों ने मेरे साथ पहले तो सेल्फ़ी ली, लेकिन तभी उन बच्चों की माँ ने मुझसे पूछा कि आपका डांस क्लास कहा है? उस दिन से मैंने सोच लिया है कि मैँ अब डांस रियलिटी शोज की जजिंग नहीं करूंगा.

 

इंडियन फिल्म्स है ग्लोबल फिल्म

अनुराग मानते है कि इंडियन फिल्म्स ग्लोबल ऑडियंस को ध्यान में रख कर बनाई जाती है, लेकिन आज किसी को अधिक सफलता नहीं मिल रही है. आशा है, जिस तरह चिकन टिक्का का टेस्ट विदेशों में लोगों ने डेवलप कर लिया है, वैसे ही हमारी फिल्मों को भी वे पसंद करने लगेंगे. देखा जाय तो कोरीयन फिल्म इंडस्ट्री हमारे से काफी बाद में शुरू हुई है, लेकिन उनकी फिल्में और वेब सीरीज को पूरे विश्व में लोग पसंद कर रहे है. वे अधिक फिल्म्स बनाते भी नहीं अच्छा कमाते है, जबकि बॉलीवुड काफी फिल्में बनाकर भी उतना कमा नहीं पा रही है.

इस प्रकार Anurag Basu की जर्नी डेली सोप ओपेरा से शुरू होकर सिनेमा और वेब सीरीज तक पहुँच चुकी है, जिसमें उनकी ग्रोथ, ऐडप्टैशन, आर्टिस्टिक और  समर्पण पूरी तरह से झलकता है. उन्होंने अलग – अलग कहानी के जरिए दर्शकों का मनोरंजन किया है और आगे भी कुछ नई कहानियों से दर्शकों का मनोरंजन करवाना चाहते है. वे कहते है कि मास्टरी एक जर्नी है, डेस्टिनेशन नहीं और आज भी मुझे एक नई कहानी कहने की उत्सुकता है.

 

 

 

 

 

Sexual Problems : पत्‍नी प्रैग्‍नेंट हैं लेकिन मैं हमबिस्‍तर होना चाहता हूं, क्‍या इससे खतरा है?

Sexual Problems :  1. सवाल

मेरी बीवी पेट से है और 7वां महीना चल रहा है. मेरा हमबिस्तरी करने का मन करता है, पर बीवी मना करती है. मुझे क्या करना चाहिए?

Sexual Problems : जवाब

आप को खुद पर काबू रखना चाहिए. ऐसी हालत में बिना बीवी की इच्छा के हमबिस्तरी करना बच्चे के भी लिए नुकसानदेह हो सकता है.

Sexual Problems :  2. सवाल
मैं 18 साल की लड़की हूं और एक 21 साल के लड़के से प्यार करती हूं. वह शादी से पहले मेरे साथ हमबिस्तरी करना चाहता है. लेकिन मैं मना करती हूं, क्योंकि कल को मेरी शादी उस से न हो कर किसी और से हो गई तो मुश्किल हो जाएगी. मैं क्या करूं?

Sexual Problems : 2. जवाब
जब खुद आप को समझ आ रहा है कि किसी और से शादी करने पर कोई दिक्कत खड़ी हो सकती है तो जहां तक हो सके हमबिस्तरी से परहेज ही करें. प्यार में हमबिस्तरी कभीकभी महंगी पड़ जाती है.  बेहतर होगा कि आप दोनों पहले अपने पैरों पर खड़े हो जाएं और अपने प्यार को शादी के अंजाम तक ले जाएं.  प्रेमी अगर हमबिस्तरी के बाबत ज्यादा जिद कर रहा है तो चौकन्नी रहें. सच्चे प्यार में आशिक और माशूका दोनों एकदूसरे के जज्बातों का खयाल रखते हैं. अगर वह आप को प्यार करता है तो मना करने का बुरा नहीं मानेगा.

 

आजकल लगभग सभी समाचारपत्रों और पत्रिकाओं में पाठकों की समस्याओं वाले स्तंभ में युवकयुवतियों के पत्र छपते हैं, जिस में वे विवाहपूर्व शारीरिक संबंध बना लेने के बाद उत्पन्न हुई समस्याओं का समाधान पूछते हैं.

विवाहपूर्व प्रेम करना या स्वेच्छा से शारीरिक संबंध बनाना कोई अपराध नहीं है, मगर इस से उत्पन्न होने वाली समस्याओं पर विचार अवश्य करना चाहिए. इन बातों पर युवकों से ज्यादा युवतियों को ध्यान देने की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में उन्हें दिक्कतों का सामना न करना पड़े :

विवाहपूर्व शारीरिक संबंध भले ही कानूनन अपराध न हो, मगर आज भी ऐसे संबंधों को सामाजिक मान्यता नहीं है. विशेष कर यदि किसी लड़की के बारे में समाज को यह पता चल जाए कि उस के विवाहपूर्व शारीरिक संबंध हैं तो समाज उस के माथे पर बदचलन का टीका लगा देता है, साथ ही गलीमहल्ले के आवारा लड़के लड़की का न सिर्फ जीना दूभर कर देते हैं, बल्कि खुद भी उस से अवैध संबंध बनाने की कोशिश करते हैं.

युवती के मांबाप और भाइयों को इन संबंधों का पता चलने पर घोर मानसिक आघात लगता है. वृद्ध मातापिता कई बार इस की वजह से बीमार पड़ जाते हैं और उन्हें दिल का दौरा तक पड़ जाता है. लड़की के भाइयों द्वारा प्रेमी के साथ मारपीट और यहां तक कि प्रेमी की जान लेने के समाचार लगभग रोज ही सुर्खियों में रहते हैं. युवकों को तो अकसर मांबाप समझा कर सुधरने की हिदायत देते हैं, मगर लड़की के प्रति घर वालों का व्यवहार कई बार बड़ा क्रूर हो जाता है. प्रेमी के साथ मारपीट के कारण लड़की के परिवार को पुलिस और कानूनी कार्यवाही तक का सामना करना पड़ता है.

अधिकतर युवतियों की समस्या रहती है कि उन्हें शादीशुदा व्यक्ति से प्यार हो गया है व उन्होंने उस से शारीरिक संबंध भी कायम कर लिए हैं. शादीशुदा व्यक्ति आश्वासन देता है कि वह जल्दी ही अपनी पहली पत्नी से तलाक ले कर युवती से शादी कर लेगा, मगर वर्षों बीत जाने पर भी वह व्यक्ति युवती से या तो शादी नहीं करता या धीरेधीरे किनारा कर लेता है. ऐसे किस्से आजकल आम हो गए हैं.

इस तरह के हादसों के बाद युवतियां डिप्रेशन में आ जाती हैं व नौकरी छोड़ देती हैं. इस से उबरने में उन्हें वर्षों लग जाते हैं. कई बार युवक पहली पत्नी के होते हुए भी दूसरी शादी कर लेते हैं. मगर याद रखें, ऐसी शादी को कानूनी मान्यता नहीं है और बाद में बच्चों के अधिकार के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ सकती है जिस का फैसला युवती के पक्ष में आएगा, इस की संभावना बहुत कम रहती है.

शारीरिक संबंध होने पर गर्भधारण एक सामान्य बात है. विवाहित युवती द्वारा गर्भधारण करने पर दोनों परिवारों में खुशियां मनाई जाती हैं वहीं अविवाहित युवती द्वारा गर्भधारण उस की बदनामी के साथसाथ मौत का कारण भी बनता है.

अभी हाल ही में मेरी बेटी की एक परिचित के किराएदार के घर उन के भाई की लड़की गांव से 11वीं कक्षा में पढ़ने के लिए आई. अचानक एक शाम उस ने ट्रेन से कट कर अपनी जान दे दी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि लड़की गर्भवती थी. उसे एक अन्य धर्म के लड़के से प्यार हो गया और दोनों ने शारीरिक संबंध कायम कर लिए, मगर जब लड़के को लड़की के गर्भवती होने का पता चला तो वह युवती को छोड़ कर भाग गया. अब युवती ने आत्महत्या का रास्ता चुन लिया. ऐसे मामलों में अधिकतर युवतियां गर्भपात का रास्ता अपनाती हैं, लेकिन कोई भी योग्य चिकित्सक पहली बार गर्भधारण को गर्भपात कराने की सलाह नहीं देगा.

अधिकतर अविवाहित युवतियां गर्भपात चोरीछिपे किसी घटिया अस्पताल या क्लिनिक में नौसिखिया चिकित्सकों से करवाती हैं, जिस में गर्भपात के बाद संक्रमण और कई अन्य समस्याओं की आशंका बनी रहती है. दोबारा गर्भधारण में भी कठिनाई हो सकती है. अनाड़ी चिकित्सक द्वारा गर्भपात करने से जान तक जाने का खतरा रहता है.

युवती का विवाह यदि प्रेमी से हो जाता है तब तो विवाहोपरांत जीवन ठीकठाक चलता है, मगर किसी और से शादी होने पर यदि भविष्य में पति को किसी तरह से पत्नी के विवाहपूर्व संबंधों की जानकारी हो गई तो वैवाहिक जीवन न सिर्फ तबाह हो सकता है, बल्कि तलाक तक की नौबत आ सकती है.

विवाहपूर्व शारीरिक संबंधों में मुख्य खतरा यौन रोगों का रहता है. कई बार एड्स जैसा जानलेवा रोग भी हो जाता है. खास बात यह है कि इस रोग के लक्षण काफी समय तक दिखाई नहीं देते हैं, लेकिन बाद में यह रोग उन के पति और होने वाले बच्चे को हो जाता है. प्रेमी और उस के दोस्तों द्वारा ब्लैकमेल की घटनाएं भी अकसर होती रहती हैं. उन के द्वारा शारीरिक यौन शोषण व अन्य तरह के शोषण की आशंकाएं हमेशा बनी रहती हैं.

 

Manishankar Ayyar : सोनिया गांधी से तकरार और मोदी से इकरार

Manishankar Ayyar :  कांग्रेस पार्टी में अनेक ऐसे नेता हैं जो अपनी विलासिता से कभी उबर नहीं पाए. वे अपने ड्राइंग रूम में बैठ कर भाजपा को कोसते हैं. अख़बारों में एडिटोरियल पेज के लिए अपने लेख भेजते हैं, ट्विटर पर एक्टिव रहते हैं. मीडिया में बयानबाजियां करते हैं, अपनी ही पार्टी की मिट्टी पलीद करते हैं मगर गरीब-गुरबा के दरवाजे तक जाना उनके कष्टों से रूबरू होना इन नेताओं को कष्टदायक लगता है. इस प्रवृत्ति के नेता दरअसल भीतर से लोकतंत्र के नहीं बल्कि राजशाही के हिमायती होते हैं.

‘A Maverick in Politics’ को लेकर चर्चा में Manishankar Ayyar

कांग्रेस नेता Manishankar Ayyar  अपनी नयी किताब ‘A Maverick in Politics’ को लेकर चर्चा में हैं. वे पहले भी कई बार अपनी बयानबाजियों को लेकर चर्चाओं में रहे. इन्हीं बयानबाजियों के चलते वे पार्टी से निष्कासित भी किये गए और इसी बड़बोलेपन की वजह से आज उनकी पार्टी के भीतर कोई पूछ नहीं है.

अपनी किताब में अय्यर ने अपने पोलिटिकल करियर सहित अपने राजनीतिक अनुभवों को साझा किया है मगर सबसे ज्यादा चर्चा जिस बात की हो रही है वह है गाँधी परिवार से बढ़ती उनकी तल्खियों की. गांधी परिवार और कांग्रेस नेतृत्व के बारे में अय्यर ने अपनी किताब में क़ाफीकुछ लिखा है जो निश्चित रूप से गाँधी परिवार को नुकसान पहुंचाने की नीयत से और अपनी भड़ास निकालते हुए लिखा गया है. इन बातों का फायदा भाजपा खूब उठाएगी इसमें कोई संदेह नहीं है.

कयास इस बात के भी लगाए जा रहे हैं कि 83 साल की उम्र में कहीं Manishankar Ayyar भाजपा में आने की जुगत तो नहीं ढूंढ रहे हैं क्योंकि किताब की बाबत एक इंटरव्यू में उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कभी भी चायवाला कहकर अपमानित नहीं किया.

सोनिया गाँधी पर Manishankar Ayyar का आरोप

कभी राजीव गांधी के ख़ास मित्रों में शुमार होने वाले अय्यर इस बात से बड़े तिलमिलाए नजर आते हैं कि सोनिया गाँधी ने उनको पूछना बंद कर दिया है और राहुल गांधी से मिलने का समय लेने के लिए उनको प्रियंका गाँधी वाड्रा से रिक्वेस्ट करनी पड़ी . वे लिखते हैं कि पिछले 10 साल में उन्हें सोनिया गांधी से सिर्फ एक बार मिलने का मौका मिला हैं. गांधी परिवार ने ही मेरा पॉलिटिकल करियर बनाया और बर्बाद भी किया है.
वे आगे लिखते हैं – एक बार राहुल गांधी को शुभकामनाएं भिजवाने के लिए मुझे प्रियंका गांधी को फोन करना पड़ा था. साथ ही एक बार उन्होंने सोनिया गांधी को मैरी क्रिसमस की शुभकामनाएं दीं तो मैडम ने कहा – ‘मैं क्रिश्चियन नहीं हूँ.’ मणिशंकर ने एक इंटरव्यू में कहा कि पिछले दस सालों में उन्हें राहुल गांधी से सिर्फ एक बार और प्रियंका गांधी से दो बार मिलने दिया गया है. हालाँकि प्रियंका से फ़ोनपर बात हो जाती है.

Manishankar Ayyar  ने अपनी किताब में लिखा है कि 2024 के चुनाव में उन्हें राहुल गांधी ने टिकट नहीं दिया. टिकट मांगने पर राहुल ने कहा – हरगिज मणिशंकर अय्यर को टिकट नहीं देंगे क्योंकि वो बहुत बुड्ढे हो गए हैं. बता दें कि 83 वर्षीय अय्यर तमिलनाडु के मयिलादुथुराई से तीन बार लोकसभा चुनाव जीते चुके हैं और राज्यसभा सांसद भी रह चुके हैं.

Manishankar Ayyar को कभी भी उस जनता के बीच जाकर उनकी परेशानिया हल करते नहीं देखा गया, जिस जनता ने उन पर विश्वास कर अपना बहुमूल्य मत उन्हें दिया. अय्यर दिल्ली में अपने आलीशान आवास में विलासिता का जीवन जीते रहे. अक्सर उनके आवास पर देर रात तक उनके पाकिस्तानी मित्रों की महफ़िलें भी सजती रही हैं. जिसमें कुलीन वर्ग की ‘भद्र’ महिलाएं शराब के जाम होंठों से लगाए अपने पुरुष मित्रों के कन्धों पर सिर टिकाये नजर आती थीं. मगर अय्यर के आवास पर गरीब जनता अपनी परेशानिया लेकर खड़ी कभी दिखी ही नहीं. और ना कभी अय्यर जनता के दरवाजे पर उनकी समस्याओं को जानने के लिए पहुंचे. तो अगर राहुल गांधी ने उनका टिकट काटा तो कुछ गलत नहीं किया.

किताब में प्रणब मुखर्जी का दर्द किया बयां

अपनी किताब में मणिशंकर अय्यर ने कांग्रेस नेतृत्व के फैसलों पर ऊँगली उठाई है. अय्यर कहते हैं – प्रणब मुखर्जी को उम्मीद थी कि उन्हें देश का प्रधानमंत्री और मनमोहन सिंह को राष्ट्रपति बनाया जाएगा. यदि मुखर्जी प्रधानमंत्री होते तो कांग्रेस 2014 के लोकसभा चुनाव में इतनी बुरी तरह नहीं हारती. अय्यर खुलासा करते हैं – 2012 से ही कांग्रेस की स्थिति खराब थी. सोनिया गांधी बहुत बीमार पड़ गईं थीं और मनमोहन सिंह को 6 बार बाईपास कराना पड़ा था, जिससे चुनाव में पार्टी अध्यक्ष और प्रधानमंत्री एक्टिव नहीं थे. ऐसी स्थिति प्रणब मुखर्जी बखूबी संभाल सकते थे. परन्तु मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाए रखने और प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति भवन भेजने के निर्णय ने संप्रग की तीसरी बार सरकार बनाने की संभावना खत्म कर दी.

अपनी किताब में Manishankar Ayyar  ने अपने राजनीतिक जीवन के शुरुआती दिनों, नरसिम्हा राव के समय, यूपीए वन में मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल और उसके बाद के पतन का भी जिक्र किया है. उन्होंने खासतौर से यूपीए टू के पतन की यादें किताब में लिखी है, कि जब उनकी पत्नी ने टेलीविजन के सामने यह कह कर अपनी निराशा जताई थी कि “आज कोई घोटाला नहीं हुआ.”

Manishankar Ayyar कांग्रेस के लिए कई मौकों पर ‘मणि’ साबित हुए. यूपीए वन और टू के दौरान जब भी पाकिस्तान के साथ रिश्ते बिगड़ने की चर्चा शुरू होने लगती, अय्यर पाकिस्तान उड़ जाते या फिर आगे आकर स्थिति संभाल लेते. लेकिन, साल 2014 के बाद से अय्यर के कुछ विवादित बोल कांग्रेस के लिए ‘विष’ साबित होने लगे. इससे, कांग्रेस ने धीरे-धीरे अय्यर से किनारा कर लिया. खासकर, पाकिस्तान और मुस्लिम प्रेम की वजह से अय्यर कई बार कांग्रेसी नेताओं के निशाने पर आये और भाजपा ने उनके बयानों को खूब भुनाया. उन दिनों भाजपा के बढ़ते हिंदुत्ववादी आडम्बरों से घरबराये राहुल और प्रियंका भी खुद को हिन्दू साबित करने के लिए मंदिरों और नदियों के दर्शन आरती करते नज़र आ रहे थे. राहुल गांधी बाकायदा जनेऊ संस्कार करते और प्रियंका गंगा घाट पर आरती करती दिखाई देती थीं. ऐसे में पाकिस्तान प्रेम और मुसलमान प्रेम में डूबे अय्यर के बोल कांग्रेस के लिए मुसीबत बन रहे थे और जब भाजपा ने उनके बयानों को उछालना शुरू किया तो इससे कांग्रेस को काफी नुक़सान पहुंचा. इससे भी राहुल गांधी अय्यर से चिढ गए थे.

साल 2014 के बाद से लगभग हर चुनाव से पहले मणिशंकर अय्यर का कुछ न कुछ बयान आ जाता, जिससे पार्टी बैकफुट पर आ जाती. अय्यर के पाकिस्तान प्रेम को भाजपा बीते कई चुनावों से इस्तेमाल कर खूब भुनाती आयी है. ऐसे में न चाहते हुए भी कांग्रेस ने बीते कुछ सालों में अय्यर को पार्टी की गतिविधियों से दूर कर दिया. गांधी परिवार ने भी अब अय्यर से काफी दूरी बना ली.

साल 2019 के आम चुनाव से ठीक पहले प्रधानमंत्री मोदी को लेकर अय्यर ने ऐसी अपमानजनक टिप्पणी कर दी, जिसको भाजपा ने चुनाव में बड़ा मुद्दा बना लिया. हालांकि, कांग्रेस पार्टी ने तब तक उन्हें निलंबित कर दिया था लेकिन, पार्टी को तब तक काफी नुकसान हो चुका था. भारत के पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव को भी अय्यर निशाने पर लेते रहे हैं. राव के बारे में तो उन्होंने यह तक कह दिया कि भाजपा के पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी नहीं. बल्कि, पीवी नरसिम्हा राव थे. क्योंकि जिस वक़्त बाबरी मस्जिद गिराई जा रही थी उस वक्त राव पूजा में व्यस्त थे.

मोदी को लेकर दिख रहे हैं नरम

83 साल के हो चुके Manishankar Ayyar  अब पीएम मोदी को लेकर काफी नरम दिख रहे हैं. उन्होंने अपने इंटरव्यू में कहा है कि उन्होंने कभी भी पीएम मोदी चायवाला नहीं कहा. अय्यर ने कहा है कि साल 2014 में गुजरात के मौजूदा सीएम नरेंद्र मोदी को विजेता के रूप में प्रचारित किया जा रहा था. इस बात से मैं भयभीत था कि जिस व्यक्ति की छवि गुजरात में मुसलमानों के नरसंहार के कारण दागदार है, वह महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के देश का नेतृत्व करने की आकांक्षा रख सकता है?’

अय्यर ने कहा है कि साल 2014 में कांग्रेस के अधिवेशन के दौरान एक इंटरव्यू में कहा था कि जो आदमी यह नहीं जानता कि सिकंदर कभी पाटलिपुत्र नहीं गया और तक्षशिला पाकिस्तान में है, वह प्रधानमंत्री की उस कुर्सी पर आसीन होगा, जिस पर कभी नेहरू बैठा करते थे. इसलिए मैंने कहा था कि भारत के लोग यह कभी स्वीकार नहीं करेंगे. फिर मैंने मजाक में बोल दिया कि अगर चुनाव हारने के बाद मोदी चाय परोसना चाहते हैं तो हम उनके लिए कुछ व्यवस्था कर सकते हैं.’

खैर, मोदी तो प्रधानमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हो गए मगर अय्यर की हालत ना घर की ना घाट वाली हो गयी. अब उन्हें इस बात से बड़ी परेशानी हो रही है कि उनको कोई पूछता ही नहीं है. दरअसल लोकतंत्र में जननेता और प्रिय नेता वही है जो जनता के बीच नजर आये. फिर भले वह नेक ना हो, धर्मनिरपेक्ष ना हो, दयालु न हो, लेकिन यदि वह लगातार जनता के संपर्क में है तो जनता उसे सिर आंखों पर बिठाएगी और उसकी जनता के बीच उसकी यही छवि उसकी पार्टी में उसका कद तय करेगी.

योगी आदित्यनाथ हों, अखिलेश यादव हों, राहुल गांधी हो, ममता बनर्जी हों, चंद्रशेखर आजाद रावण हों या नरेंद्र मोदी हों, ये सभी लोकप्रिय नेता इसलिए हैं क्योंकि वे जनता के बीच उठते बैठते हैं. उनकी समस्याएं सुनते हैं (भले उनका निवारण ना करते हों) समस्या सुन लेना ही उनको प्रसिद्धि दिला देता है.

Manishankar Ayyar  जैसे और भी कई

कांग्रेस पार्टी में अनेक नेता ऐसे रहे और आज भी हैं जो अपनी विलासिता से उबर नहीं पाए. वे अपने ड्राइंग रूम में बैठ कर भाजपा को कोसते हैं. अख़बारों में एडिटोरियल पेज के लिए अपने लेख भेजते हैं (जो अक्सर अच्छे लेखकों से लिखवाये हुए होते हैं.) वे ट्विटर पर एक्टिव रहते हैं. मीडिया में बयानबाजियां करते हैं, अपनी ही पार्टी की मिट्टी पलीद करते हैं मगर गरीब-गुरबा के दरवाजे तक जाना उनके कष्टों से रूबरू होना इन नेताओं को कष्टदायक लगता है. पार्टी लाइन से भी ये अलग चलते हैं. ऐसे नेता ना जनता के लिए कुछ करने की इच्छा रखते हैं और ना ही अपनी पार्टी को मजबूती देने का विचार इन्हें आता है. ये वही नेता हैं जिन्होंने राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा से भी दूरी बनाये रखी.

लोकतंत्र में नेता चाहे सत्ता में रहे या ना रहे परन्तु जनहित की भावना यदि उसकी है तो वह ज्यादा समय जनता के बीच ही नजर आएगा. वह जनता को उसके अधिकारों के प्रति सचेत करता नजर आएगा. उनके अधिकारों के लिए सड़क पर जुलूस निकालेगा. नारेबाजी करेगा. आंदोलन करेगा. भूख हड़ताल पर उतर जाएगा. सत्ता को हिलायेगा ताकि वह गरीब की आवाज पर कान धरे.

अरविन्द केजरीवाल, राहुल गांधी और चंद्रशेखर आजाद इसका उदाहरण हैं. पर मणिशंकर अय्यर, गुलाम नबी आजाद, दिग्विजय सिंह, जयराम रमेश, पी. चिदंबरम, अंबिका सोनी, मीरा कुमार जैसे कांग्रेसी नेताओं को क्या कभी ऐसा करते पाया गया है? फिर वे चाहते हैं कि उनकी पूछ भी बनी रहे. अगर किसी ने पूछना बंद कर दिया तो फिर ये उसके खिलाफ विषवमन करते फिरेंगे. जिस थाली में खाया उसी में छेद करेंगे.

Men Problem : मेरी छाती लड़कियों की तरह दिखने लगी है, क्‍या ये ठीक होगा ?

Men Problem : सवाल

मैं 12वीं कक्षा का छात्र हूं और डाक्टर बनने का इच्छुक हूं. समस्या यह है कि 13 साल की उम्र से मेरी दोनों छातियां लड़की की छातियों की तरह कुछकुछ बाहर की तरफ उठ आई हैं. मुझे चिंता है कि कहीं इस कारण मैं मैडिकल प्रवेश परीक्षा से पहले शारीरिक जांच के समय अनुत्तीर्ण न हो जाऊं? परेशान हूं. कृपया मुझे इस समस्या का उपाय बताएं ?

Men Problem :  जवाब

जिस समय लड़केलड़कियां बचपन की दहलीज लांघ किशोरावस्था में पहुंचते हैं उस समय उन में पुरुष और स्त्री यौन हार्मोन बनने लगते हैं. लड़कों में पुरुष हार्मोन और लड़कियों में स्त्री हार्मोन अधिक बनते हैं पर कुछ में विपरीत सैक्स के हार्मोन भी बनते हैं.

इसी के फलस्वरूप कुछ लड़कों की छाती लड़कियों की छाती जैसी बढ़ जाती है और कुछ लड़कियों में लड़कों की तरह चेहरे पर बाल आ जाते हैं. ऐसा हो तो बहुत विचलित होने की जरूरत नहीं होती. कई लड़कों में समय के साथ छातियां अपनेआप सही हो जाती हैं. अगर 18-20 साल की उम्र तक भी छातियां कम न हों और अटपटा लगे तो किसी कौस्मैटिक सर्जन से मिल कर सलाह ली जा सकती है.

अगर छातियां चरबी जमने से बढ़ी हुई हों तो लाइपोसक्शन द्वारा चरबी घटाई जा सकती है पर यदि छातियों में ग्रंथि ऊतक अधिक हों तो छोटे से औपरेशन से छातियों को छोटा किया जा सकता है.

जहां तक मैडिकल कालेज में प्रवेश के समय होने वाली शारीरिक जांच का सवाल है, उस बाबत आप चिंता त्याग दें. गाइनोकोमैस्टिया नामक यह समस्या मैडिकल जांच के समय अनुत्तीर्णता का कारण नहीं बन सकती.

Satire: सोसाइटी की शांति का सवाल है बाबा

Satire: सोसाइटी चुनाव में नवनिर्वाचित कुरसीधारी सोसाइटी के रखरखाव में फेरबदल न करें तो लोगों को बदलाव नजर कैसे आएगा भला, बस फिर क्या था, एक के बाद एक निर्णय लिए जाने लगे. ऐसे में सोसाइटी में हड़कंप तो मचना ही था.

बेचारेलाल की सोसाइटी में औनर्स एसोसिएशन का चुनाव हुआ और उस में कई वर्षों से विपक्ष में रह रहे दल को बहुमत मिला. बहुमत मिला मतलब सत्ता मिली. और कहते हैं कि सत्तासीन व्यक्ति के मस्तिष्क में दुर्योधन, रावण, कंस आदि की आत्माओं की फ्यूजन आत्मा का वास हो जाता है. परिणामस्वरूप, वे बड़े ही महत्त्वपूर्ण निर्णय लेने लगते हैं जो आमजन की निगाहों में अनापशनाप निर्णय माने जाते हैं.

बेचारेलाल की सोसाइटी के नवनिर्वाचित कुर्सीधारियों ने सब से पहले मंदिर के जीर्णोद्धार करने का निर्णय लिया. जीर्णोद्धार से पहले मंदिर के पुजारी को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. उन पर आरोप था कि पूर्व में जो सत्तासीन थे वे उन के पक्षपाती थे. जबकि, पुजारी को न पक्ष से मतलब था न विपक्ष से. उन्हें न तो पूरब से मतलब था न पश्चिम से न उत्तर से मतलब था न दक्षिण से. उन्हें मतलब था दक्षिणा से.

उन्हें जो कहा जाता था, करते थे. जितनी सामग्री दी जाती थी उस में से कुछ अपने लिए और अपनों के लिए बचा कर काम करते थे. बेचारेलाल को यह बात नहीं भायी. इसलिए नहीं कि वे नास्तिक थे. इसलिए भी नहीं कि वे प्रार्थनास्थल के सौंदर्यीकरण के विरुद्ध थे. इसलिए भी नहीं कि पुजारी से उन का कोई व्यक्तिगत संबंध था. बल्कि इसलिए कि पुजारी का जो काम था वह कर रहा था. जो वेतन ले रहा था, जितना वेतन ले रहा था उस के अनुसार काम कर रहा था. जहां तक मंदिर की बात है, वह बिलकुल अच्छी स्थिति में था और लोग पूरे भक्तिभाव से समुचित सुविधा के साथ पूजन कर रहे थे. ऐसे में मंदिर का जीर्णोद्धार करना उसी प्रकार था जैसे किसी स्वस्थ व्यक्ति को बीमार बना कर उस का इलाज करना.

उन्होंने माननीय अध्यक्ष और सचिव महोदय से कहा भी कि मंदिर पर जो खर्च हो रहा है उस खर्च को किसी कल्याणकारी काम के लिए किया जा सकता है. उदाहरण के लिए यदि मेंटिनैंस कम कर दिया जाए तो यह सभी फ्लैट औनर्स के लिए हितकर होगा. लेकिन पदासीनों को यह बात रास नहीं आई. उन का कहना था कि मेंटिनैंस कम होने से सोसाइटी की क्या इज्जत रह जाएगी. सोसाइटी जिन प्रमुख कारणों से पूरे इलाके में चर्चा में है उन में उच्च मेंटिनैंस भी एक है. चूंकि यह सोसाइटी की इज्जत का सवाल है, इसलिए मेंटिनैंस तो किसी हाल में कम नहीं किया जा सकता.

 

मंदिर का काम पूरा हुआ भी नहीं था कि नव सत्तासीन दल ने सभी टावरों के फ्लोर के टाइल्स को बदलने का निर्णय ले लिया. यहां भी स्थिति यह थी कि टाइल्स बिलकुल ठीक स्थिति में थे. उन का बदलना किसी लिहाज से उचित न था. पर दुर्योधन, कंस, रावण आदि की फ्यूजन आत्मा ने उन्हें यह निर्णय लेने के लिए प्रेरित किया और जब वे सत्ता में थे तो भला कौन रोक सकता था उन्हें. वे चाहे चमड़े का सिक्का चलाएं या राजधानी दिल्ली से बदल कर दौलताबाद ले जाएं. अपने देश में राइट टू रिकौल सिर्फ चर्चा करने के लिए होता है. एक बार जो कुरसी से चिपक जाता है वह तब तक उस के साथ सियामीज ट्विन बना रहता है जब तक दोबारा चुनाव नहीं होता और मतदाताओं का मोहभंग नहीं हो जाता.

बेचारेलाल ने फिर सु  झाव दिया कि इस कार्य के स्थान पर जो पैसे हैं उन से गरीबों के लिए लगातार भंडारा करवा दिया जाए ताकि जो भूखे सो रहे हैं उन्हें भरपेट भोजन मिल जाए पर सत्ताधीशों का तर्क था कि खाना खाने के चारपांच घंटों के बाद पच ही जाता है और पच जाने के बाद भूख फिर से हावी जो जाती है. ऐसे में कौन याद रखेगा कि उस ने खाना खाया था. सो, बेचारेलाल के इस प्रस्ताव को भी सत्ताधारियों ने ठुकरा दिया.

 

अभी भी एसोसिएशन के खाते में कुछ रकम बची हुई थी. सयाने पदाधिकारियों ने पढ़ा था कि ‘जल जो बाड़े नाव में घर में बाड़े दाम, दुओ हाथ उलीचिए यही सयानों काम’. तो फिर निर्णय लिया गया कि जिम में, स्विमिंग पूल में, लाइब्रेरी में और अन्य स्थानों में बायोमीट्रिक पद्धति स्थापित कर दी जाए.

बेचारेलाल ने फिर सु झाव दिया कि सिक्योरिटी गार्ड हर स्थान पर हैं ही, फिर बायोमीट्रिक पद्धति पर खर्च करने की क्या आवश्यकता है. इस के स्थान पर इस ठंड के मौसम में कंबल वितरण कर दिया जाए. गरीबों को सहारा मिल जाएगा. लेकिन उन के इस प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया गया, यह कह कर कि आज के जमाने में कोई किसी का एहसान नहीं मानता, इसलिए किसी को सहारा देने की आवश्यकता नहीं है.

इस प्रकार बेचारेलाल के हर प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया गया. आज स्थिति यह है कि एसोसिएशन का फंड समाप्त होने की कगार पर है. मंदिर का काम पूरा नहीं हो पाया है. अब औनर्स से चंदा मांगा जा रहा है मंदिर के काम को पूरा करने के लिए. फ्लोर पर टाइल्स बदलने का काम तो पूरा हो गया है पर सभी का मत है कि पहले जो टाइल्स लगे हुए थे वे बेहतर थे. जो बायोमीट्रिक पद्धति स्थापित की गई थी उस की अधिकांश डिवाइस खराब हो गई हैं और कुछ खराब होने की कगार पर हैं.

अब निश्चित था कि मेंटिनैंस चार्ज बढ़ाया जाना था और ऐसा किया गया. मेंटिनैंस चार्ज बढ़ते ही पुराने सत्तासीनोंको और ईमानदारी से कमाने वालों को परेशानी होने लगी. ईमानदारी से काम करने वाले का क्या था, वे अन्य खर्चों में कटौती कर मेंटिनैंस चार्ज का भुगतान करने लगे पर सत्तासीनों का तो सत्ता से हटते ही सोसाइटी के खर्च से जो हिस्सा मिलता था वह बंद हो गया था. सो, उन्हें दोगुना कष्ट हो रहा था. वे इस ताक में थे कि किस प्रकार वर्तमान पदाधिकारियों को सबक सिखाया जाए.

इस का मौका उन्हें मिल भी गया. एक दिन किसी टावर के बाहरी दीवार का प्लास्टर टूट कर किसी रहवासी पर गिर गया. बहुत छोटा सा टुकड़ा गिरा था, सो, चोट न के बराबर थी पर विरोधियों के लिए इस छोटे से टुकड़े का गिरना एक बड़ा मौका बन गया. जिसे चोट लगी थी वह कहता रहा कि मामूली सी खरोंच आई है पर विरोधी दल उस की बात मानने के लिए तैयार न थे. उस के मना करने के बावजूद उसे डाक्टर के पास ले गए. डाक्टर के मना करने के बावजूद उस के हाथ पर प्लास्टर चढ़वाया गया. फिर थाना जा कर रपट लिखवाई गई.

फिर ‘औनर्स एसोसिएशन हायहाय’ के नारे लगाए गए. दोनों पक्षों में काफी कहासुनी हुई. सोसाइटी की वीरानी में मानो बहार आ गई. दिनरात एकदूसरे के खिलाफ नारेबाजी और चुगली होने लगी.

विरोधी पक्ष में सब से प्रबल विरोधी थे दुखीलाल. उन्हें वैसे तो हर बात पर दुखी रहने का शौक था पर जब से खजांची पद से हटे थे तब से विशेष रूप से दुखी रहने लगे थे. सत्तापक्ष को लगा कि यदि दुखीलाल को सुखी कर दिया जाए तो ये जो हंगामा बरपा हुआ है उसे शांत किया जा सकता है. सो, उन की दुखीलाल से गुप्त बैठक हुई. उस बैठक में क्या निर्णय लिया गया, यह तो नहीं पता पर उस के बाद से दुखीलाल काफी सुखी दिखने लगे और सोसाइटी में शांति बहाल हो गई.

 

 

Superstition : साइकोएक्टिव ड्रैग्‍स जैसा है धार्मिक अंधविश्वास का नशा

Superstition : एक परिवार सायनाइड खा लेता है, एक महिला अपने लड्डू गोपाल को स्कूल भेजती है, कुछ बच्चे काल्पनिक देवताओं को अपना दोस्त मानते हैं. इन घटनाओं के पीछे छिपा है धार्मिक अंधविश्वास का वह असर जो मानव की सोच व व्यवहार को बुरी तरह प्रभावित करता है.

कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया पर एक वीडियो दिखा, जिस में एक महिला अनिरुद्धचार्य के समक्ष खड़ी माइक पर कह रही थी, ‘भगवान मिलने के लिए उसे बुला रहे हैं, वह भगवान से मिलने जाना चाहती है.’ वह यह बात बारबार दोहराती हुई कह रही थी. इसी तरह के एक अन्य वीडियो में एक दूसरी महिला भी कुछ इसी तरह की बात कहती हुई दिखी.

यह दूसरी महिला भी ठीक यही बात पूछ रही थी, ‘गुरुजी, मुझे भगवान कब मिलेंगे?’

इन दोनों ही महिलाओं में एक बात सामान्य है कि ये दोनों ही धार्मिक अंधविश्वास में इतनी गहराई तक डूबी हुई थीं कि ईश्वर संबंधित कल्पनाएं भी उन्हें सत्य लगने लगीं. वे इसे इस हद तक सत्य समझने लगीं कि इन के मन में ईश्वर से मिलने की गहरी इच्छा जागृत हो गई. ईश्वर से मिलने की व्याकुलता  इन की मानसिक स्थिति पर प्रश्नचिह्न तो लगाता ही है,  साथ ही, यह सवाल भी खड़ा करता है कि धार्मिक अंधविश्वास या फिर ईश्वर के प्रति अंधभक्ति किसी व्यक्ति के व्यवहार, उस के सोचनेसमझने की शक्ति व उस के क्रियाकलापों को किस तरह प्रभावित करता है.

कुछ वर्षों पहले राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले के एक निवासी ने ईश्वर से मिलने की चाहत में अपने पूरे परिवार के साथ खुदकुशी कर ली थी. यह घटना उस समय सोशल मीडिया पर काफी वायरल भी हुई थी.

यह घटना कुछ इस प्रकार है- गंगापुर सिटी का रहने वाला कंचन सिंह, जोकि पेशे से फोटोग्राफर था, ने भगवान से मिलने की चाह में परिवार के साथ सायनाइड मिला लड्डू खा कर खुदकुशी कर ली थी. कंचन सिंह ने परिवार के साथ इस सामूहिक खुदकुशी का वीडियो भी बनाया था.

अपने इस वीडियो में कंचन सिंह परिवार के हर शख्स से पूछता हुआ नजर आ रहा था कि वे सभी लोग क्यों मरना चाहते हैं व मरने के विषय में सब के विचार क्या हैं? तब सभी ने भगवान से मिलने के लिए मरने की इच्छा बतलाई थी.

धार्मिक अंधविश्वास का यह आलम है कि इस घटना में कंचन सिंह का पढ़ालिखा शिक्षित, पेशे से इंजीनियर भाई भी शामिल था. वीडियो बनाने के बाद पूरा परिवार एकसाथ पूजा की वेदी पर आ कर बैठ जाता है. कंचन सिंह ने सब को अपने हाथों से सायनाइड मिला लड्डू दिया. उस के बाद एक से 3 तक गिनती बोली और परिवार के 8 सदस्यों ने एकसाथ एक ही झटके में जहरीले लड्डू खा लिए जबकि कंचन की भांजी रश्मि ने लड्डू थूक दिया और दौड़ कर पड़ोसियों को बुला लाई. कंचन सिंह की मां और उस के भतीजेभतीजी की जान तो बचाई जा सकी, जबकि अन्य पांचों की मृत्यु हो गई.

शरीर पर कोई वश नहीं

ऊपर जिन घटनाओं का जिक्र किया है, वे इस बातों को प्रमाणित करती हैं कि धार्मिक अंधविश्वास किसी व्यक्ति के व्यवहार, उस की मनोदशा, धारणा एवं उस की चेतना को ठीक उसी प्रकार प्रभावित करती है जिस प्रकार साइकोएक्टिव ड्रग्स का असर किसी व्यक्ति पर दिखाई पड़ता है.

साइकोएक्टिव ड्रग्स एक तरह का रासायनिक यौगिक होता है जो हमारे व्यवहार को प्रभावित करता है. एक ऐसा यौगिक जो केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर कार्य करता है और व्यवहार व अनुभूति को बदल देता है. हमारा मानसिक स्वास्थ्य, हमारे विचार व भावनाएं हमारे सीएनएस यानी हमारे केंद्रीय तंत्रिका तंत्र द्वारा ही नियंत्रित किए जाते हैं. हमारा केंद्रीय तंत्रिका तंत्र एक प्रसंस्करण केंद्र है जो शरीर के हर क्रियाकलाप- हमारे विचार, हमारी भावनाओं से ले कर हमारे सभी प्रकार की हरकतों तक- को प्रबंधित करता है.

धार्मिक अंधविश्वास से ग्रसित व्यक्ति निराधार कल्पनाओं को सच समझने लगता है. ऐसे ही निराधार कल्पनाओं को सच सम?ाने वाले एक लड़के का जिक्र करना जरूरी जान पड़ रहा है. इस लड़के की उम्र लगभग 10-11 वर्ष के बीच होगी.

दोष मातापिता का भी

सोशल मीडिया पर इस बच्चे को यह कहते सुना जा सकता है कि, ‘मैं कृष्णा को अपना छोटा भाई मानता हूं. कृष्णा मेरे साथ पढ़ते हैं,  खेलते हैं, मस्ती करते हैं.’ उस की ये बातें उस की मानसिक दशा को उजागर करती हैं.

ऐसे देखा जाए तो इस में उस बच्चे का दोष भी नहीं, कुसूर उस के मातापिता का है जिस ने अपने बच्चे में वैज्ञानिक चेतना का विकास करने की जगह उसे धार्मिक अंधविश्वास की ओर इस कदर धकेल दिया कि वह निराधार कल्पनाओं को सच सम?ाने लगा है. अभिनव अरोड़ा एक अकेला बच्चा नहीं. उस की तरह के ही और भी बच्चे हैं जिन के खेलनेकूदने व पढ़ने की उम्र में उन्हें इस तरह की अंधभक्ति और अंधविश्वास की ओर धकेला जा रहा है. धु्रव व्यास,  भक्त भागवत ऐसे कई नाम गिने जा सकते हैं.

ये सभी तो बच्चे हैं, गलती तो बड़ों की है. अब जब बड़ों की बात चली ही है तो ऐसी बहुत सारी महिलाएं व तथाकथित पुरुष भी मिल जाएंगे जिन का व्यवहार, क्रियाकलाप, धार्मिक अंधविश्वास से प्रेरित उन की मनोदशा की कहानी कह रही होती हैं. ऐसे कई उदाहरण देखनेसुनने व पढ़ने को मिल सकते हैं.

आगरा के राजामंडी इलाके की निवासी अलका बंसल, जोकि पेशे से टीचर हैं, ने अपने घर में पूजे जाने वाले लड्डू गोपाल का स्कूल में एडमिशन कराया हुआ है. लड्डू गोपाल 98 फीसदी अंक ला कर अपनी योग्यता का परचम भी लहरा चुके हैं. इन का जन्मदिन भी सैलिब्रेट किया जाता है. तो वहीं यूपी के हमीरपुर जिले की रहने वाली महिला ने लड्डू गोपाल को लखनऊ स्थित एक स्कूल में दाखिला करा दिया जिस की प्रतिमाह 2,000 रुपए फीस भी अदा की जाती है. ?

हमीरपुर की रहने वाली ही एक और महिला ने तो लड्डू गोपाल का स्कूल में एडमिशन तो करवाया ही, साथ ही, एक केयरटेकर भी लगवाया है जो लड्डू गोपाल को स्कूल ले जाने व लाने के साथ उस की देखरेख भी करता है. लड्डू गोपाल के लिए स्कूल बैग, टिफिन, कौपीकिताब, पानी की बोतल जैसे वे सारे सामान भी खरीदे गए हैं जिन की जरूरत एक आम बच्चे को होती है.

बिजनौर के बारूकी के पास स्थित सिकोड़ा निवासी संदीप डबास की शुरुआत लड्डू गोपाल को घंटी बजा कर उठाने से शुरू होती है. वे लड्डू गोपाल का पालनपोषण अपने पुत्र की तरह करते हैं और 18 नवंबर को जन्मदिन भी मनाया जाता है. लड्डू गोपाल का एक स्कूल में एडमिशन कराया गया है.

इन सभी का व्यवहार, क्रियाकलाप इन की चेतना पर पड़े धार्मिक अंधविश्वास के प्रभाव का ही तो खुलासा कर रहे हैं.

अफीम जैसा अंधविश्वास

भारतीय विचारधारा में जहां अध्यात्मवाद की गहरी जड़ें दिखलाई पड़ती हैं, वहीं जड़वाद के भी दर्शन मिलते हैं. जहां अध्यात्मवाद में ईश्वर की सत्ता को प्रमाणित करने के लिए अनेक प्रकार की युक्तियों का समावेश हुआ है, वहीं ईश्वर की सत्ता को अस्वीकार करने के लिए भी तर्क रखे गए हैं. जड़वाद का एकमात्र उदाहरण चार्वाक है जो यह मानता है कि ‘ईश्वर का अस्तित्व नहीं है, ईश्वर को पाने की कल्पना एक प्रकार का पागलपन है, ईश्वरईश्वर का राग अलापना अपनेआप को धोखे में रखना है.’

चार्वाक ने यह बात स्पष्टतौर पर कही है कि, ‘ईश्वर को प्रसन्न रखने का विचार एक मानसिक बीमारी है.’ उन्होंने धर्म को अफीम के नशे की तरह ही हानिकारक माना है.

ऐसे ही, देश की आजादी के लिए हंसतेहंसते फांसी के फंदे पर लटक जाने वाले शहीद भगत सिंह की हम बात करें तो उन्होंने भी ईश्वर के अस्तित्व का पूरी तार्किकता से खंडन किया है. शहीद भगत सिंह ने लाहौर सैंट्रल जेल में अपनी कैद के दौरान इंग्लिश में एक लेख लिखा जिस का शीर्षक था- ‘मैं नास्तिक क्यों हूं?’ उस का प्रथम प्रकाशन लाहौर से छपने वाले एक अखबार में 27 सितंबर, 1931 को हुआ.

लेख में वे कहते हैं, ‘मुझे पूरा विश्वास है कि एक चेतन परमात्मा, जो प्रकृति की गति का दिग्दर्शन एवं संचालन करता है, का कोई अस्तित्व नहीं है.’ अपने इस लेख में वे आस्तिकों से कुछ प्रश्न पूछते हुए कहते हैं- ‘यदि आप का विश्वास है कि एक सर्वशक्तिमान सर्वव्यापक और सर्वज्ञानी ईश्वर है  जिस ने विश्व की रचना की तो कृपा कर के मुझे यह बताएं कि उस ने यह रचना क्यों की- कष्टों और संतापों से पूर्ण दुनिया, असंख्य दुखों के शाश्वत अनंत गठबंधनों से ग्रसित. एक भी व्यक्ति तो पूरी तरह संतुष्ट नहीं है.’

मस्तिष्क को तर्कविहीन बनाता अंधविश्वास

वे तर्क देते हुए आगे लिखते हैं, ‘कृपया यह न कहें कि यही उस का नियम है, यदि वह किसी नियम से बंधा है तो वह सर्वशक्तिमान नहीं है क्योंकि तब वह भी हमारी ही तरह नियमों का दास है. भगत सिंह ने अपने इस लेख में ईश्वर के अस्तित्व का पूरी तार्किकता से खंडन किया है. हंसतेहंसते देश के

लिए जान दे देने वाले भगत सिंह ने अंधविश्वासों के चंगुल में फंसे हुए ऐसे आजाद भारत की कल्पना तो बिलकुल ही नहीं की होगी.

भगत सिंह ने अपने इसी लेख में एक यह बात लिखी है, ‘मेरे भाग्य को किसी उन्माद का सहारा नहीं चाहिए.’ उन्माद यानी किसी दैवीय शक्ति पर भरोसा,  अंधविश्वास, पाखंड. उन्होंने इस तरह के अंधविश्वास को खतरनाक कहा है, मानव मस्तिष्क को मूढ़ बना देने वाला बताया है.

मूढ़ यानी धार्मिक अंधविश्वास में डूबे हुए व्यक्ति का मस्तिष्क तर्कविहीन हो जाता है. ऐसा व्यक्ति अपने इर्दगिर्द पारलौकिक शक्तियों को प्रत्यक्ष देखने लगता है, कभीकभी तो वह इस हद तक भ्रमित हो सकता है कि खुद को ईश्वरीय अवतार के रूप में देखने व समझने लगता है.

धार्मिक अंधविश्वास भगत सिंह के ही शब्दों में, ‘खतरनाक होता है क्योंकि यह मानव मस्तिष्क को मूढ़ बना देता है.’  साइकोएक्टिव ड्रग्स तो सिर्फ उसी व्यक्ति के लिए हानिकारक होती है जो इस का सेवन करता है, सिर्फ उसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचाती है जो इस ड्रग्स का आदी है लेकिन धार्मिक अंधविश्वास पूरे समाज, पूरे देश के लिए हानिकारक है क्योंकि इस का प्रसार किसी भी देश के अवाम, वहां के नागरिकों की तार्किक क्षमता को नष्ट कर उसे विवेकहीन बना देता है.

धार्मिक अंधविश्वास के चंगुल में फंसी हुई ऐसी विवेकहीन जनता धार्मिक और राजनीतिक सत्ता के लिए लाभकारी होती है. यही कारण है कि सत्ता में बैठे लोग और धर्म के दुकानदार अंधविश्वास को फैलाने का काम बड़े ही जोरशोर से करते हैं. इस के लिए धर्म के दुकानदारों को भरपूर पैसे मिलते हैं, यौनसुख के लिए औरतें मिल जाती हैं (यह बात किसी से छिपी नहीं है कि कैसे धार्मिक अंधविश्वास के चंगुल में फंसी हुई औरतों का शारीरिक शोषण होता है, आएदिन ऐसी घटनाएं देखनेसुनने को मिल ही जाती हैं) तो सत्ता के भूखे राजनेताओं और शासकों को मरनेमारने के लिए पुरुष मिल जाते हैं.

धर्म के दुकानदार और सत्तालोलुप  राजनेता दोनों ही आम आदमी को लूटने के लिए धार्मिक अंधविश्वासों पर मोहर लगाते हैं. चर्च और स्टेट असल में मिल कर आम आदमी को छुट्टा गुलाम बनाते हैं. इसी वजह से आज हिंदू का नारा लगा कर भाजपा-मोदी सत्ता में हैं और चर्च के सहारे अमेरिका में ट्रंप की सरकार बनने जा रही है.

 

Stories : हवलदार

Stories :  रमेश चंद की पुलिस महकमे में पूरी धाक थी. आम लोग उसे बहुत इज्जत देते थे, पर थाने का मुंशी अमीर चंद मन ही मन उस से रंजिश रखता था, क्योंकि उस की ऊपरी कमाई के रास्ते जो बंद हो गए थे. वह रमेश चंद को सबक सिखाना चाहता था. 25 साला रमेश चंद गोरे, लंबे कद का जवान था. उस के पापा सोमनाथ कर्नल के पद से रिटायर हुए थे, जबकि मम्मी पार्वती एक सरकारी स्कूल में टीचर थीं. रमेश चंद के पापा चाहते थे कि उन का बेटा भी सेना में भरती हो कर लगन व मेहनत से अपना मुकाम हासिल करे. पर उस की मम्मी चाहती थीं कि वह उन की नजरों के सामने रह कर अपनी सैकड़ों एकड़ जमीन पर खेतीबारी करे.

रमेश चंद ने मन ही मन ठान लिया था कि वह अपने मांबाप के सपनों को पूरा करने के लिए पुलिस में भरती होगा और जहां कहीं भी उसे भ्रष्टाचार की गंध मिलेगी, उस को मिटा देने के लिए जीजान लगा देगा. रमेश चंद की पुलिस महकमे में हवलदार के पद पर बेलापुर थाने में बहाली हो गई थी. जहां पर अमीर चंद सालों से मुंशी के पद पर तैनात था. रमेश चंद की पारखी नजरों ने भांप लिया था कि थाने में सब ठीक नहीं है. रमेश चंद जब भी अपनी मोटरसाइकिल पर शहर का चक्कर लगाता, तो सभी दुकानदारों से कहता कि वे लोग बेखौफ हो कर कामधंधा करें. वे न तो पुलिस के खौफ से डरें और न ही उन की सेवा करें.

एक दिन रमेश चंद मोटरसाइकिल से कहीं जा रहा था. उस ने देखा कि एक आदमी उस की मोटरसाइकिल देख कर अपनी कार को बेतहाशा दौड़ाने लगा था.

रमेश चंद ने उस कार का पीछा किया और कार को ओवरटेक कर के एक जगह पर उसे रोकने की कोशिश की. पर कार वाला रुकने के बजाय मोटरसाइकिल वाले को ही अपना निशाना बनाने लगा था. पर इसे रमेश चंद की होशियारी समझो कि कुछ दूरी पर जा कर कार रुक गई थी. रमेश चंद ने कार में बैठे 2 लोगों को धुन डाला था और एक लड़की को कार के अंदर से महफूज बाहर निकाल लिया.

दरअसल, दोनों लोग अजय और निशांत थे, जो कालेज में पढ़ने वाली शुभलता को उस समय अगवा कर के ले गए थे, जब वह बारिश से बचने के लिए बस स्टैंड पर खड़ी घर जाने वाली बस का इंतजार कर रही थी. निशांत शुभलता को जानता था और उस ने कहा था कि वह भी उस ओर ही जा रहा है, इसलिए वह उसे उस के घर छोड़ देगा. शुभलता की आंखें तब डर से बंद होने लगी थीं, जब उस ने देखा कि निशांत तो गाड़ी को जंगली रास्ते वाली सड़क पर ले जा रहा था. उस ने गुस्से से पूछा था कि वह गाड़ी कहां ले जा रहा है, तो उस के गाल पर अजय ने जोरदार तमाचा जड़ते हुए कहा था, ‘तू चुपचाप गाड़ी में बैठी रह, नहीं तो इस चाकू से तेरे जिस्म के टुकड़ेटुकड़े कर दूंगा.’

तब निशांत ने अजय से कहा था, ‘पहले हम बारीबारी से इसे भोगेंगे, फिर इस के जिस्म को इतने घाव देंगे कि कोई इसे पहचान भी नहीं सकेगा.’ पर रमेश चंद के अचानक पीछा करने से न केवल उन दोनों की धुनाई हुई थी, बल्कि एक कागज पर उन के दस्तखत भी करवा लिए थे, जिस पर लिखा था कि भविष्य में अगर शहर के बीच उन्होंने किसी की इज्जत पर हाथ डाला या कोई बखेड़ा खड़ा किया, तो दफा 376 का केस बना कर उन को सजा दिलाई जाए. शुभलता की दास्तान सुन कर रमेश चंद ने उसे दुनिया की ऊंचनीच समझाई और अपनी मोटरसाइकिल पर उसे उस के घर तक छोड़ आया. शुभलता के पापा विशंभर एक दबंग किस्म के नेता थे. उन के कई विरोधी भी थे, जो इस ताक में रहते थे कि कब कोई मुद्दा उन के हाथ आ जाए और वे उन के खिलाफ मोरचा खोलें.

विशंभर विधायक बने, फिर धीरेधीरे अपनी राजनीतिक इच्छाओं के बलबूते पर चंद ही सालों में मुख्यमंत्री की कुरसी पर बैठ गए. सिर्फ मुख्यमंत्री विशंभर की पत्नी चंद्रकांता ही इस बात को जानती थीं कि उन की बेटी शुभलता को बलात्कारियों के चंगुल से रमेश चंद ने बचाया था. बेलापुर थाने में नया थानेदार रुलदू राम आ गया था. उस ने अपने सभी मातहत मुलाजिमों को निर्देश दिया था कि वे अपना काम बड़ी मुस्तैदी से करें, ताकि आम लोगों की शिकायतों की सही ढंग से जांच हो सके. थोड़ी देर के बाद मुंशी अमीर चंद ने थानेदार के केबिन में दाखिल होते ही उसे सैल्यूट किया, फिर प्लेट में काजू, बरफी व चाय सर्व की. थानेदार रुलदू राम चाय व बरफी देख कर खुश होते हुए कहने लगा, ‘‘वाह मुंशीजी, वाह, बड़े मौके पर चाय लाए हो. इस समय मुझे चाय की तलब लग रही थी…

‘‘मुंशीजी, इस थाने का रिकौर्ड अच्छा है न. कहीं गड़बड़ तो नहीं है,’’ थानेदार रुलदू राम ने चाय पीते हुए पूछा.

‘‘सर, वैसे तो इस थाने में सबकुछ अच्छा है, पर रमेश चंद हवलदार की वजह से यह थाना फलफूल नहीं रहा है,’’ मुंशी अमीर चंद ने नमकमिर्च लगाते हुए रमेश चंद के खिलाफ थानेदार को उकसाने की कोशिश की.

थानेदार रुलदू राम ने मुंशी से पूछा, ‘‘इस समय वह हवलदार कहां है?’’

‘‘जनाब, उस की ड्यूटी इन दिनों ट्रैफिक पुलिस में लगी हुई है.’’

‘‘इस का मतलब यह कि वह अच्छी कमाई करता होगा?’’ थानेदार ने मुंशी से पूछा.

‘‘नहीं सर, वह तो पुश्तैनी अमीर है और ईमानदारी तो उस की रगरग में बसी है. कानून तोड़ने वालों की तो वह खूब खबर लेता है. कोई कितनी भी तगड़ी सिफारिश वाला क्यों न हो, वह चालान करते हुए जरा भी नहीं डरता.’’

इतना सुन कर थानेदार रुलदू राम ने कहा, ‘‘यह आदमी तो बड़ा दिलचस्प लगता है.’’

‘‘नहीं जनाब, यह रमेश चंद अपने से ऊपर किसी को कुछ नहीं समझता है. कई बार तो ऐसा लगता है कि या तो इस का ट्रांसफर यहां से हो जाए या हम ही यहां से चले जाएं,’’ मुंशी अमीर चंद ने रोनी सूरत बनाते हुए थानेदार से कहा.

‘‘अच्छा तो यह बात है. आज उस को यहां आने दो, फिर उसे बताऊंगा कि इस थाने की थानेदारी किस की है… उस की या मेरी?’’

तभी थाने के कंपाउंड में एक मोटरसाइकिल रुकी. मुंशी अमीर चंद दबे कदमों से थानेदार के केबिन में दाखिल होते हुए कहने लगा, ‘‘जनाब, हवलदार रमेश चंद आ गया है.’’

अर्दली ने आ कर रमेश चंद से कहा, ‘‘नए थानेदार साहब आप को इसी वक्त बुला रहे हैं.’’

हवलदार रमेश चंद ने थानेदार रुलदू राम को सैल्यूट मारा.

‘‘आज कितना कमाया?’’ थानेदार रुलदू राम ने हवलदार रमेश चंद से पूछा.

‘‘सर, मैं अपने फर्ज को अंजाम देना जानता हूं. ऊपर की कमाई करना मेरे जमीर में शामिल नहीं है,’’ हवलदार रमेश चंद ने कहा.

थानेदार ने उसे झिड़कते हुए कहा, ‘‘यह थाना है. इस में ज्यादा ईमानदारी रख कर काम करोगे, तो कभी न कभी तुम्हारे गरीबान पर कोई हाथ डाल कर तुम्हें सलाखों तक पहुंचा देगा. अभी तुम जवान हो, संभल जाओ.’’

‘‘सर, फर्ज निभातेनिभाते अगर मेरी जान भी चली जाए, तो कोई परवाह नहीं,’’ हवलदार रमेश चंद थानेदार रुलदू राम से बोला.

‘‘अच्छाअच्छा, तुम्हारे ये प्रवचन सुनने के लिए मैं ने तुम्हें यहां नहीं बुलाया था,’’ थानेदार रुलदू राम की आवाज में तल्खी उभर आई थी.

दरवाजे की ओट में मुंशी अमीर चंद खड़ा हो कर ये सब बातें सुन रहा था. वह मन ही मन खुश हो रहा था कि अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे. हवलदार रमेश चंद के बाहर जाते ही मुंशी अमीर चंद थानेदार से कहने लगा, ‘‘साहब, छोटे लोगों को मुंह नहीं लगाना चाहिए. आप ने हवलदार को उस की औकात बता दी.’’

‘‘चलो जनाब, हम बाजार का एक चक्कर लगा लें. इसी बहाने आप की शहर के दुकानदारों से भी मुलाकात हो जाएगी और कुछ खरीदारी भी.’’

‘‘हां, यह ठीक रहेगा. मैं जरा क्वार्टर जा कर अपनी पत्नी से पूछ लूं कि बाजार से कुछ लाना तो नहीं है?’’ थानेदार ने मुंशी से कहा.

क्वार्टर पहुंच कर थानेदार रुलदू राम ने देखा कि उस की पत्नी सुरेखा व 2 महिला कांस्टेबलों ने क्वार्टर को सजा दिया था. उस ने सुरेखा से कहा, ‘‘मैं बाजार का मुआयना करने जा रहा हूं. वहां से कुछ लाना तो नहीं है?’’

‘‘बच्चों के लिए खिलौने व फलसब्जी वगैरह देख लेना,’’ सुरेखा ने कहा.

मुंशी अमीर चंद पहले की तरह आज भी जिस दुकान पर गया, वहां नए थानेदार का परिचय कराया, फिर उन से जरूरत का सामान ‘मुफ्त’ में लिया और आगे चल दिया. वापसी में आते वक्त सामान के 2 थैले भर गए थे. मुंशी अमीर चंद ने बड़े रोब के साथ एक आटोरिकशा वाले को बुलाया और उस से थाने तक चलने को कहा. थानेदार को मुंशी अमीर चंद का रसूख अच्छा लगा. उस ने एक कौड़ी भी खर्च किए बिना ढेर सारा सामान ले लिया था. अगले दिन थानेदार के जेहन में रहरह कर यह बात कौंध रही थी कि अगर समय रहते हवलदार रमेश चंद के पर नहीं कतरे गए, तो वह उन सब की राह में रोड़ा बन जाएगा. अभी थानेदार रुलदू राम अपने ही खयालों में डूबा था कि तभी एक औरत बसंती रोतीचिल्लाती वहां आई.

उस औरत ने थानेदार से कहा, ‘‘साहब, थाने से थोड़ी दूरी पर ही मेरा घर है, जहां पर बदमाशों ने रात को न केवल मेरे मर्द करमू को पीटा, बल्कि घर में जो गहनेकपड़े थे, उन पर भी हाथ साफ कर गए. जब मैं ने अपने पति का बचाव करना चाहा, तो उन्होंने मुझे धक्का दे दिया. इस से मुझे भी चोट लग गई.’’

थानेदार ने उस औरत को देखा, जो माथे पर उभर आई चोटों के निशान दिखाने की कोशिश कर रही थी. थानेदार ने उस औरत को ऐसे घूरा, मानो वह थाने में ही उसे दबोच लेगा. भले ही बसंती गरीब घर की थी, पर उस की जवानी की मादकता देख कर थानेदार की लार टपकने लगी थी. अचानक मुंशी अमीर चंद केबिन में घुसा. उस ने बसंती से कहा, ‘‘साहब ने अभी थाने में जौइन किया है. हम तुम्हें बदमाशों से भी बचाएंगे और जो कुछवे लूट कर ले गए हैं, उसे भी वापस दिलाएंगे. पर इस के बदले में तुम्हें हमारा एक छोटा सा काम करना होगा.’’

‘‘कौन सा काम, साहबजी?’’ बसंती ने हैरान हो कर मुंशी अमीर चंद से पूछा.

‘‘हम अभी तुम्हारे घर जांचपड़ताल करने आएंगे, वहीं पर तुम्हें सबकुछ बता देंगे.’’

‘‘जी साहब,’’ बसंती उठते हुए बोली.

थानेदार ने मुंशी से फुसफुसाते हुए पूछा, ‘‘बसंती से क्या बात करनी है?’’

मुंशी ने कहा, ‘‘हुजूर, पुलिस वालों के लिए मरे हुए को जिंदा करना और जिंदा को मरा हुआ साबित करना बाएं हाथ का खेल होता है. बस, अब आप आगे का तमाशा देखते जाओ.’’ आननफानन थानेदार व मुंशी मौका ए वारदात पर पहुंचे, फिर चुपके से बसंती व उस के मर्द को सारी प्लानिंग बताई. इस के बाद मुंशी अमीर चंद ने कुछ लोगों के बयान लिए और तुरंत थाने लौट आए. इधर हवलदार रमेश चंद को कानोंकान खबर तक नहीं थी कि उस के खिलाफ मुंशी कैसी साजिश रच रहा था.

थानेदार ने अर्दली भेज कर रमेश चंद को थाने बुलाया.

हवलदार रमेश चंद ने थानेदार को सैल्यूट मारने के बाद पूछा, ‘‘सर, आप ने मुझे याद किया?’’

‘‘देखो रमेश, आज सुबह बसंती के घर में कोई हंगामा हो गया था. मुंशीजी अमीर चंद को इस बाबत वहां भेजना था, पर मैं चाहता हूं कि तुम वहां मौका ए वारदात पर पहुंच कर कार्यवाही करो. वैसे, हम भी थोड़ी देर में वहां पहुंचेंगे.’’

‘‘ठीक है सर,’’ हवलदार रमेश चंद ने कहा.

जैसे ही रमेश चंद बसंती के घर पहुंचा, तभी उस का पति करमू रोते हुए कहने लगा, ‘‘हुजूर, उन गुंडों ने मारमार कर मेरा हुलिया बिगाड़ दिया. मुझे ऐसा लगता है कि रात को आप भी उन गुंडों के साथ थे.’’ करमू के मुंह से यह बात सुन कर रमेश चंद आगबबूला हो गया और उस ने 3-4 थप्पड़ उसे जड़ दिए.

तभी बसंती बीचबचाव करते हुए कहने लगी, ‘‘हजूर, इसे शराब पीने के बाद होश नहीं रहता. इस की गुस्ताखी के लिए मैं आप के पैर पड़ कर माफी मांगती हूं. इस ने मुझे पूरी उम्र आंसू ही आंसू दिए हैं. कभीकभी तो ऐसा मन करता है कि इसे छोड़ कर भाग जाऊं, पर भाग कर जाऊंगी भी कहां. मुझे सहारा देने वाला भी कोई नहीं है…’’

‘‘आप मेरी खातिर गुस्सा थूक दीजिए और शांत हो जाइए. मैं अभी चायनाश्ते का बंदोबस्त करती हूं.’’

बसंती ने उस समय ऐसे कपड़े पहने हुए थे कि उस के उभार नजर आ रहे थे. शरबत पीते हुए रमेश की नजरें आज पहली दफा किसी औरत के जिस्म पर फिसली थीं और वह औरत बसंती ही थी. रमेश चंद बसंती से कह रहा था, ‘‘देख बसंती, तेरी वजह से मैं ने तेरे मर्द को छोड़ दिया, नहीं तो मैं इस की वह गत बनाता कि इसे चारों ओर मौत ही मौत नजर आती.’’ यह बोलते हुए रमेश चंद को नहीं मालूम था कि उस के शरबत में तो बसंती ने नशे की गोलियां मिलाई हुई थीं. उस की मदहोश आंखों में अब न जाने कितनी बसंतियां तैर रही थीं. ऐन मौके पर थानेदार रुलदू राम व मुंशी अमीर चंद वहां पहुंचे. बसंती ने अपने कपड़े फाड़े और जानबूझ कर रमेश चंद की बगल में लेट गई. उन दोनों ने उन के फोटो खींचे. वहां पर शराब की 2 बोतलें भी रख दी गई थीं. कुछ शराब रमेश चंद के मुंह में भी उड़ेल दी थी.

मुंशी अमीर चंद ने तुरंत हैडक्वार्टर में डीएसपी को इस सारे कांड के बारे में सूचित कर दिया था. डीएसपी साहब ने रिपोर्ट देखी कि मौका ए वारदात पर पहुंच कर हवलदार रमेश चंद ने रिपोर्ट लिखवाने वाली औरत के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की थी. डीएसपी साहब ने तुरंत हवलदार रमेश चंद को नौकरी से सस्पैंड कर दिया. अब सारा माजरा उस की समझ में अच्छी तरह आ गया था, पर सारे सुबूत उस के खिलाफ थे. अगले दिन अखबारों में खबर छपी थी कि नए थानेदार ने थाने का कार्यभार संभालते ही एक बेशर्म हवलदार को अपने थाने से सस्पैंड करवा कर नई मिसाल कायम की. रमेश चंद हवालात में बंद था. उस पर बलात्कार करने का आरोप लगा था. इधर जब मुख्यमंत्री विशंभर की पत्नी चंद्रकांता को इस बारे में पता लगा कि रमेश चंद को बलात्कार के आरोप में हवालात में बंद कर दिया गया है, तो उस का खून खौल उठा. उस ने सुबह होते ही थाने का रुख किया और रमेश चंद की जमानत दे कर रिहा कराया. रमेश चंद ने कहा, ‘‘मैडम, आप ने मेरी नीयत पर शक नहीं किया है और मेरी जमानत करा दी. मैं आप का यह एहसान कभी नहीं भूलूंगा.’’

चंद्रकांता बोली, ‘‘उस वक्त तुम ने मेरी बेटी को बचाया था, तब यह बात सिर्फ मुझे, मेरी बेटी व तुम्हें ही मालूम थी. अगर तुम मेरी बेटी को उन वहशी दरिंदों से न बचाते, तो न जाने क्या होता? और हमें कितनी बदनामी झेलनी पड़ती. आज हमारी बेटी शादी के बाद बड़ी खुशी से अपनी जिंदगी गुजार रही है.

‘‘जिन लोगों ने तुम्हारे खिलाफ साजिश रची है, उन के मनसूबों को नाकाम कर के तुम आगे बढ़ो,’’ चंद्रकांता ने रमेश चंद को धीरज बंधाते हुए कहा.

‘‘मैं आज ही मुख्यमंत्रीजी से इस मामले में बात करूंगी, ताकि जिस सच के रास्ते पर चल कर अपना वजूद तुम ने कायम किया है, वह मिट्टी में न मिल जाए.’’ अगले दिन ही बेलापुर थाने की उस घटना की जांच शुरू हो गई थी. अब तो स्थानीय दुकानदारों ने भी अपनीअपनी शिकायतें लिखित रूप में दे दी थीं. थानेदार रुलदू राम व मुंशी अमीर चंद अब जेल की सलाखों में थे. रमेश चंद भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी लड़ाई जीत गया था.

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