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इन कारणों से भी बाउंस हो सकता है आपका चेक

हम अकसर ही किसी को पैसे देने की जगह चेक दे देते हैं. अगर आप किसी को चेक दे रहे हैं, या किसी से चेक के रूप में धन ले रहे हैं, तो आपको जरूर मालूम होना चाहिये कि किन कारणों से आपका चेक बाउंस हो सकता है.

आम तौर पर लोगों को लगता है कि चेक बाउंस होने का कारण अकाउंट में बैलेंस न होना है तो ऐसा नहीं है. चेक बाउंस होने के कई कारण हैं.

ये हैं चेक बाउंस होने के कारण

कम बैलेंस होना

अगर आपके अकाउंट में चेक पर लिखी राशि से कम बैलेंस है, तो आपका चेक बाउंस हो जाएगा. अकाउंट में राशि शून्य होने पर ही चेक बाउंस हो, ये जरूरी नहीं है.

जब फ्रीज हो जाए अकाउंट

अगर आपका अकाउंट किसी कारण से फ्रीज हो जाए तब भी आपका चेक बाउंस हो सकता है. अकाउंट फ्रीज होने के कई कारण हो सकते हैं. फ्रीज अकाउंट में पैसे होने पर भी चेक बाउंस हो जाएगा.

हस्ताक्षर

बैंक हमारे हस्ताक्षर की एक प्रति अपने पास सेव करके रखता है. अगर आपने किसी के नाम पर चेक इश्यू किया है, पर उस पर बैंक में मौजूद प्रति जैसे दस्तखत नहीं किए है, तो भी आपका चेक बाउंस हो जाएगा.

चेक में नाम या तारीख बदलना

मान लीजिए आपने किसी के नाम पर चेक इश्यू करना है, पर गलती से आपने उस व्यक्ति का नाम गलत लिख दिया या फिर कोई गलत तारीख लिख दे दी. तो बैंक आपका चेक रिजेक्ट कर सकता है. अगर आपने अमाउंट में भी कोई बदलाव किए हैं, तो बैंक आपका चेक रिजेक्ट कर सकता है.

पुरानी या पोस्ट डेटेड चेक

किसी भी मल्टीसिटी चैक की वैलिडीटी 3 महीने की होती है. अगर आपने 3 महीने पुरानी चेक बैंक में जमा की है, तो बैंक आपका चेक रिजेक्ट कर सकता है.

आखिर नीले रंग की ही जर्सी क्यों पहनती है भारतीय क्रिकेट टीम!

सीमित ओवरों की क्रिकेट में रंगीन यूनिफार्म के चलन को शुरू हुए 30 साल से अधिक समय गुजर चुका है. देखने वाली बात यह है कि इतने सालों बाद भी भारतीय टीम की जर्सी का मुख्य रंग नीला ही है. यही कारण है कि टीम इंडिया दुनिया भर में ‘मैन इन ब्लू’ के नाम से भी जानी जाती है. क्या आपने कभी ये सोचा है कि भारतीय टीम क्रिकेट मैदान पर नीले रंग की ही जर्सी पहनकर क्यों उतरती है?

आपको बता दें कि सीमित ओवरों की क्रिकेट में रंगीन जर्सी पहनने का सिलसिला 1970 के दशक में शुरू हुई वर्ल्ड क्रिकेट सीरीज से हुई. 1980 के इस टूर्नामेंट में भारतीय क्रिकेट टीम पहली बार हलके नीले और पीली धारियों वाली जर्सी में नजर आई थी.

इस जर्सी में आज की तरह बीसीसीआई का लोगो और टीम इंडिया का नाम नहीं लिखा होता था. 1992 विश्व कप में पहली बार टीम इंडिया की जर्सी में इंडिया का नाम लिखा गया और इस टूर्नामेंट में जर्सी हलके नीले (स्काई ब्लू) की जगह गहरे नीले रंग का प्रयोग किया गया.

हालांकि इसका कोई पुख्ता सुबूत नहीं है कि टीम इंडिया ने नीले रंग की ही जर्सी क्यों चुनी. लेकिन कुछ जानकारों के मुताबिक 1980 वर्ल्ड सीरीज के दौरान भारतीय टीम ने चमकीले नीले (लाइट ब्लू) रंग को अपने प्राइमरी रंग व पीले रंग को सेकंडरी रंग के रूप में चुना. इसके बाद से भारतीय टीम ने लगातार इसी रंग को अपनी ड्रेस में तरजीह दी.

बहरहाल, अगर इन सालों में भारतीय टीम के ड्रेस के पैटर्न पर नजर दौड़ाएं तो हर ड्रेस में नीला रंग मुख्य रंग के रूप में रहा है. वहीं पीले रंग का भी भारतीय टीम की जर्सी के साथ 2008 तक कोई ना कोई कनेक्शन जरूर रहा.

यहां तक की 1999 विश्व कप में भी भारतीय टीम की यूनिफार्म में सेकंडरी कलर के रूप में पीले रंग का ही इस्तेमाल किया गया था. लेकिन 1990 के ही दशक में पीले रंग के साथ ट्राई कलर (तिरंगे के रंगों) को बदलने के कई प्रयोग किए गए. साल 2000 के बाद पीला रंग जर्सी में लिखे इंडिया नाम तक ही सीमित रह गया और 2007- 08 के बाद से पीला रंग भारतीय टीम की जर्सी से पूरी तरह से गायब हो गया.

कालांतर की बात करें तो भारतीय टीम की ड्रेस ब्लू के कई शेड्स में बदली गई. यहां तक की अगर वर्तमान शेड्स से उन ड्रेसों की तुलना करें तो वह बहुत ज्यादा गाढ़ें नीले रंग वाली हुआ करती थी. यहां तक की 1992 के विश्व कप में भारतीय टीम की ड्रेस गाढ़े नीले कलर की कर दी गई थी. लेकिन उसके कुछ दिनों बाद ही फिर से भारतीय टीम की ड्रेस स्काई ब्लू कलर की हो गई.

यह ध्यान देने वाली बात है कि 1997 के पहले तक भारतीय टीम की जर्सी में बीसीसीआई का लोगो नहीं हुआ करता था. 1997 के बाद से भारतीय टीम की जर्सी में बीसीसीआई का लोगो जोड़ा गया.

आखिर कहां से और कब आया ये ‘हैशटैग’

आपने अक्सर फेसबुक, ट्विटर, गूगल प्लस के साथ अन्य जगहों पर हैशटैग के बारे में सुना होगा या देखा होगा. माइक्रो ब्लौगिंग वेबसाइट ट्विटर पर इसे 10 साल पहले शुरू किया गया था. लेकिन इसे ट्विटर ने नहीं बल्कि किसी और शख्स ने शुरू किया था. इससे पहले इसका इस्तेमाल न के बराबर होता था.

कब और कैसे हुई थी हैशटैग की शुरुआत

3 अगस्त 2007 को सबसे पहले गूगल के पूर्व कर्मचारी क्रिस मेसिना ने हैशटैग को अपने ट्वीट में इस्तेमाल किया था. अब इसके 10 साल पूरे हो गए हैं और अब ये एक तरह से @ की तरह ही डिजिटल सिंबल बन गया है.

आगे जाने हैशटैग की कहानी

हैशटैग की शुरुआत की कहानी काफी दिलचस्प है. ट्विटर के को फाउंडर बिज स्टोन के मुताबिक एक मार्केटिंग स्पेशलिस्ट क्रिस मेसिना (जो ट्विटर काफी यूज करते थे) एक दिन ट्विटर के दफ्तर आए और कहा कि उन दिनों ट्विटर की शुरुआत हो रही थी और हमारे औफिस में कोई भी आ सकता था. उन्होंने औफिस आकर हमें और ट्विटर के दूसरे कर्माचारियों को एक सलाह दी. जब वो सलाह दे रहे थे तब मैं ट्विटर के एक गंभीर दिक्कत को ठीक करने में लगा था, क्योंकि तब शुरुआती दिन थे और दिक्कतें काफी थीं.

ट्विटर के को फाउंडर आगे कहते हैं, ‘क्रिस मेसिना का प्रोपोजल ट्विटर की तरह ही काफी सिंपल, यूजफुल और बेहतरीन था. उन्होंन हमें पाउंड या हैश कैरेक्टर यूज करने के लिए कहा था जिससे ग्रुप से जुड़े ट्वीट एक जगह दिख सकें. यह काफी बेहतरीन आईडिया था, लेकिन मैंने इसे सुनकर अनसुना करते हुए ट्विटर की दिक्कतों को ठीक करने के लिए अपने कंप्यूटर स्क्रीन पर काम करना शुरू कर दिया. क्योंकि ट्विटर इस वजह से बंद हो गया था’.

ट्विटर को फाउंडर बिज स्टोन कहते हैं, ‘क्रिस मेसिना और हमारी बताचीत मजाक से खत्म हुई और मजाक ये था कि, ये एक अच्छा आईडिया है हम इसपर काम करेंगे. बातचीत के बाद वो चले गए और उन्होंने ट्विटर पर इसी आईडिया को फिर से प्रोपोज किया. 23 अगस्त 2007 को उन्होंने पहली बार हैशटैग यूज करते हुए ट्वीट किया. उनका यह ट्वीट पौपुलर होने लगा और हमने हैशटैग को ट्विटर से हाइपर लिंक कर दिया और सबके लिए इसे आसान कर दिया’.

देखें अक्षय और रजनीकांत की ‘2.0’ के मेकिंग सीन, जबरदस्त एक्शन से है भरपूर

रोबोट फिल्म जिस तरह  बाक्स आफिस पर सुपर हिट हुई थी. उसे ध्यान में रखते हुए फिल्म निर्माताओं ने रोबोट पार्ट 2 बनाने का सोचा. और फिर खबरे आती हैं की रोबोट फिल्म की शूटिंग स्टार्ट हो चुकी है, और इसमे अक्षय कुमार विलेन की भूमिका में हैं वहीं नायक के रुप मे साउथ सुपर स्टार रजनीकांत हैं. फिर क्या था दोनों  सुपरस्टार्स के फैन सोशल मीडिया पर ‘2.0’ को सर्च करने मे लग गयें. हाल ही में अक्षय कुमार ने अपने ट्विटर एकाउंट पर एक वीडियो अपलोड किया और यह वीडियो कुछ और नही बल्कि रोबोट ‘2.0’ का ही एक मेकिंग है.

इस वीडियो में  रजनीकांत और अक्षय कुमार दोनों का ही फिल्म में दिखने वाला लुक दिख रहा है. हालांकि, रजनीकांत के इस वीडियो में आप देखेंगे कि कैसे फिल्म में मेकअप के लिए अक्षय और रजनीकांत को घंटों एक ही जगह पर बैठे रहना पडता था. मेकअप के अलावा वीडियो में आपको फिल्म का भव्य सेट भी नजर आएगा. इस फिल्म में टेक्नोलोजी का जबरदस्त इस्तेमाल किया गया है. इस फिल्म को बनाने मे काफी पैसा खर्च किया गया हैं. उस फिल्म में एक से बढ़कर एक स्टंट के सीन को दिखाया गया है. इस फिल्म में वीएफएक्स और स्पेशल इफेक्टस पर खूब धयान दिया है फिल्म निर्माताओं ने, साथ ही इस फिल्म से दर्शको और फिल्म निर्माताओं को काफी उम्मीद है. इस फिल्म में मुख्य किरदार में अक्षय कुमार, रजनीकांत और एमी जैक्शन हैं.

राम रहीम कांड : अपने गिरहवान में भी झांके मीडिया

पंचकूला और सिरसा सहित दीगर इलाकों में बाबा राम रहीम के चेलों ने जो कहर ढाया, उसका कुछ हिस्सा रिपोर्टरों ने कथित तौर पर जान पर खेल कर दिखाया, उसके लिए वे साधुवाद के पात्र होते बशर्ते ऐसे बाबाओं को हीरो बनाने में मीडिया का कोई योगदान न होता. हरेक न्यूज चैनल ने दावा किया कि उसके कैमरामैन और रिपोर्टर ने जिंदगी की परवाह न करते हुये हिंसा का नंगा नाच और तांडव दर्शकों तक पहुंचाया.

पर किसी ने यह कहने या बताने का दुस्साहस नहीं किया कि आधी रात के बाद इन्हीं बाबाओं के चमत्कारी किस्से कहानी वे इश्तिहारों के जरिये दिखाकर तबियत से रेवेन्यू जनरेट करते हैं, यानि करोड़ों अरबों रुपए कमाते हैं. इसी बाबा राम रहीम का प्रचार प्रसार कभी मीडिया ने जमकर किया था और कभी आसाराम के प्रवचन दिखाकर और उसके आश्रम की होली दिखाकर भी टीआरपी बढ़ाई जाती थी. एक और बाबा था और अभी भी है, नाम है निर्मल बाबा जिसने एक वक्त मे टीवी के जरिये हाहाकार मचा दिया था. निर्मल बाबा रोज करोड़ो रुपए के विज्ञापन चेनल्स पर देता था, एवज मे उसके टोटके और कृपा बरसाने वाले उपाय छोटे पर्दे पर लोग देखते थे और उनके झांसे में आकर खूब दक्षिणा उस पर बरसाते थे. उसी दक्षिणा का कुछ हिस्सा निर्मल बाबा विज्ञापनो पर खर्च करता था. इस कारोबार का सीधा गणित यह था कि लोगों को उन्हीं के पैसे के दम पर लूटा जा रहा था और मीडिया अपने इस विज्ञापनदाता की काली करतूतों और ढोंग पाखंडो पर पर्दा डालने को मजबूर था.

आज भी भी चैनल्स पर धर्म, ज्योतिष और प्रवचनों वगैरह के प्रायोजित कार्यक्रम दिखाये जाते हैं. इनका असर लोगों पर कैसे कैसे होता है, इसकी जिम्मेदारी कोई चैनल नहीं लेता. न ले यह ज्यादा हर्ज की बात नहीं, हर्ज की बात है ऐसे बाबाओं को हीरो बनने देने में सहयोग करना, उनके भक्तों और अनुयायियों की तादाद बढ़ाना, फिर पोल खुलने पर उनकी हाय हाय करना और छाती पीट पीट कर नैतिकता और जिम्मेदारी का ढोल बजाना. राम रहीम जैसे रंगीन मिजाज बाबा यूं ही नहीं ब्रांड बन जाते. वे बगैर प्रचार प्रसार के अपना चमत्कारी कारोबार फैला ही नहीं सकते.

हरियाणा सरकार की नाकामी को पानी पी पी कर कोसने वाला मीडिया कभी अपनी गिरहबान में झांककर देखेगा क्या कि कैसे उसने राम रहीम को नाचते गाते और उसकी फिल्म के प्रचार के दौरान करिश्माई तरीके से दिखाया था. किसी रिपोर्टर में यह सोचने लायक बुद्धि नहीं थी क्या कि कैसे राम रहीम ने देखते ही देखते खरबों की अपनी बादशाहत खड़ी कर ली. दिन रात मेहनत कर अपनी जान पर खेलने वाले इन रिपोर्टरों का लालच निश्चित ही अपनी कुछ हजार रूपल्ली  की ग्लेमर भरी नौकरी नहीं बल्कि यह पत्रकारिता का वह जज्बा है जिसने तख्ते भी पलटे हैं और निजाम भी बदले हैं.

अब पत्रकारिता पेशेवर हो गई है, इसलिए पंचकूला की हिंसा के बीच जान पर खेलकर सच दिखाना कोई खोजी पत्रकारिता नहीं, बल्कि एक जोखिम भरा काम था. जरूरत स्टंटबाजी की नहीं, बल्कि ऐसे चमत्कारी बाबाओं की पैदावार में अपना योगदान न देने की है, जरूरत धार्मिक पाखण्डों को हतोत्साहित करने की है, जरूरत बाबाओं का महिमामंडन न करने की है. मीडिया को हर उस जगह एतराज दर्ज कराना होगा जहां आम लोगों को धर्म के नाम पर ठगे और छले जाने के षड्यंत्र रचे जाते हैं, नहीं तो राम रहीम पैदा होते रहेंगे, उन्माद बढ़ता रहेगा.

यहां भोपाल के एक वाकिए का जिक्र गौरतलब है, कोई 6-7 साल पहले कुछ तांत्रिक ठगी के आरोपों में धरे गए थे तो कुछ समाचार पत्रों ने उनके चमत्कारी और भ्रामक विज्ञापन न छापने की कसम खाई थी, जिसने जल्द ही व्यावसायिक विवशताओं और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के आगे दम तोड़ दिया था. अब इन बाबाओं के इश्तिहार खूब छप रहे हैं जिनसे नुकसान उस जनता का हो रहा है जो चेतन अचेतन में अभी भी मीडिया को प्रजातन्त्र का चौथा स्तम्भ मानती है. यह भरोसा हालांकि दरकने लगा है, लेकिन पूरी तरह टूट पाया तो देश में मीडिया के माने शुद्ध मनोरंजन रह जाएगा.

एक क्लिक पर उपलब्ध होंगी ईपीएफओ की तमाम सेवाएं, जानें कैसे

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) की सारी जानकारी अब एक क्लिक की दूरी पर होगी. यह व्यवस्था को अगस्त 2018 से पूरी तरह से लागू किए जाने की योजना है. सेवाओं के आनलाइन होने से औपचारिक क्षेत्र के कर्मचारियों और नियोक्ताओं को काफी सुविधा मिलेगी. इसमें कर्मचारी भविष्य निधि, पेंशन और बीमा योजनायें प्रमुख हैं. संस्था पहले ही ईपीएफ विथड्राल जैसी कई सेवाओं को आनलाइन कर चुकी है. सेवाओं के आनलाइन हो जाने से अंशधारकों का अधिकारियों से सीधा सामना नहीं होगा. इससे भ्रष्टाचार और प्रताड़ित किये जाने की गुंजाइश भी नहीं रहेगी. ईपीएफओ को डिजिटलाइज किए जाने से कम से कम पांच करोड़ लोगों को फायदा होगा.

केन्द्रीय भविष्य निधि आयुक्त वी.पी. जाय ने कहा, ईपीएफओ ने अगस्त 2018 तक इसे पूरी तरह से डिजिटल करने का लक्ष्य तय किया है.

उन्होंने कहा कि ईपीएफओ जैसे ही पूरी तरह से डिजिटल होगा, सभी सेवायें इलेक्ट्रानिक साधनों के जरिये लोगो को उपलब्ध हों जाएगी और उन्हे अपने काम के लिये दफ्तरों में आकर परेशान नहीं होना पड़ेगा.

ईपीएफओ के पास 10 लाख करोड़ रुपए की संपत्ति है और पिछले वित्‍त वर्ष में इसने 1.5 लाख करोड़ रुपए का निवेश किया है. ईपीएफओ तीन योजनाएं कर्मचारी भविष्‍य निधि योजना 1952, कर्मचारी पेंशन योजना 1995 और कर्मचारी डिपाजिट लिंक्‍ड इंश्‍योरेंस स्‍कीम 1976 का संचालित करती है.

कैदी बैंड : उत्कृष्ट विषय का घटिया प्रस्तुति करण

देश की जेलों में ऐसे लाखों कैदी बंद हैं, जिन्हें अदालत के इस फैसले का इंतजार है कि उन्होंने अपराध किया है या नहीं. ऐसे ही अंडर ट्रायल कैदियों की व्यथा को पेश करने वाली फिल्म है-कैदी बैंड. जो कि एक अति महत्वपूर्ण मुद्दे पर स्तरहीन फिल्म है. फिल्मकार हबीब फैजल का ध्यान अंडर ट्रायल के गंभीर मुद्दे की बजाय महज संजू व बिंदू की प्रेम कहानी को पेश करना ही रहा.

फिल्म की कहानी संजू (आदर जैन) और बिंदू (आन्या सिंह) के इर्द गिर्द घूमती है, जो कि जेल में बंद अंडर ट्रायल कैदी हैं. स्वतंत्रता दिवस के मौके पर संगीत कार्यक्रम पेश करने के लिए जेलर (सचिन पिलगांवकर) सात सदस्यीय संगीत प्रधान बैंड बनाता है, इन सात लोगों में संजू और बिंदू भी शामिल हैं. 15 अगस्त के समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में आए मंत्री इस बैंड को चुनाव होने तक जिंदा रखना चाहते हैं. इसी के चलते जेलर इनकी जमानत की अर्जी रोक देता है. इसका फायदा उठाकर यह बैंड पूरे संसार में लोकप्रिय हो जाता है. वहीं संजू और बिंदू के बीच प्रेम कहानी पनपती रहती है. फिर यह दोनों पूरे विश्व के लोगों को अंडर ट्रायल लोंगो की समस्या से अवगत कराने के लिए एक दिन जेल से भागने का प्रयास करते हैं.

पूरी फिल्म अस्वाभाविक घटनाक्रमों व किरदारों से युक्त है. अंडर ट्रायल कैदियों की हालत को भी बहुत ही ज्यादा सतही स्तर पर पेश किया गया है. लगता है कि खुद फिल्मकार इस समस्या से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं. फिल्मकार ने यह बताकर अपनी जिम्मेदारी को खत्म मान लिया कि अदालतों में जजों की संख्या के चलते ‘अंडर ट्रायल कैदियों’ की संख्या बढ़ते हुए विकराल समस्या बनी हुई है. इसके अलवा फिल्मकार ने इस बात पर ध्यान दिया कि गरीब लोगों के लिए न्याय पाना ज्यादा कठिन है. फिल्म को एडिट कर ठीक किया जा सकता था.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो फिल्म के नायक यानी कि रणबीर कपूर के कजिन आदर जैन अपरिपक्व कलाकार के तौर पर ही उभरते हैं. उन्हे अभी काफी मेहनत करने के अलावा बहुत कुछ सीखने की जरुरत है. वैसे आदर जैन के हिस्से फिल्म में ज्यादा कुछ करने को है भी नहीं. बल्कि फिल्म की नायिका आन्या सिंह की भी यह पहली फिल्म है, उनमें काफी संभावनाएं नजर आती हैं. सचिन पिलगांवकर जेलर के किरदार में काफी जमे हैं.

मगर ‘कैदी बैंड’ देखकर कहीं से नहीं लगता कि इसके निर्देशक वही हबीब फैजल हैं, जो अतीत में ‘‘दो दुनी चार’’ जैसी फिल्म दे चुके हैं. ‘कैदी बैंड’ में वह बुरी तरह से असफल रहे हैं. संगीतकार अमित त्रिवेदी ने ठीक ठाक संगीत परोसा है. फिल्म के कुछ गाने अच्छे बन पड़े हैं.

आदित्य चोपड़ा द्वारा ‘वायआर एफ’ के बैनर तले निर्मित फिल्म ‘‘कैदी बेंड’’ के लेखक व निर्देशक हबीब फैजल, संगीतकार अमित त्रिवेदी, कैमरामैन अनय गोस्वामी, तथा कलाकार हैं-आदर जैन, आन्या सिंह, सचिन पिलगांवकर व अन्य.

जौब खोने के डर से खरीद रहे हैं बीमा पालिसी तो जान लें ये बातें

यदि आपको लगता है कि आपकी कंपनी आपको नौकरी से निकाल सकती है तो ऐसा मत मानिये कि किसी प्रकार का जौब लास इंश्योरेंस आपको नई नौकरी पाने के दरमियान कुछ महीनों तक सहारा देता रहेगा.

इस बात के आसार भी हो सकते हैं कि आप इसकी पात्रता भी ना रखते हों. टेक्नोलाजी सेक्टर में छंटनी का दौर चल रहा है. ऐसे में कर्मचारी ऐसे किसी विकल्प की तलाश में हैं जिससे उन्हें जौब खोने का भी बीमा मिल सके.

बीमा पालिसी लेने से पहले कुछ बातें जरूर जान लें.

– स्टैंड अलोन जौब लास कवर उपलब्ध नहीं हैं. किसी भी प्रकार की बीमा कंपनी ऐसी पालिसी नहीं चलाती है. अन्य पालिसियां जो एक्सीडेंट और गंभीर बीमारी को कवर करती हैं, उसमें यह उपलब्ध है.

– यह केवल उन तीन सबसे बड़ी ईएमआई के लिए हैं जो कि अपनी आय का पचास प्रतिशत किश्त में चुकाते हैं.

– एक से तीन महीने का समय वेटिंग पीरीयड में आता है, इसका क्लेम केवल उसी समयावधि के लिए किया जा सकता है.

– छंटनी के मामले में पालिसी तभी लागू होती है जब नियोक्ता विलय या अधिग्रहण के चलते आपकी छंटनी कर दे. इसके लिए आपको छंटनी का लिखित प्रमाण चाहिये. बिना प्रमाण के लिए यह क्लेम मान्य नहीं होगा.

– कई पालिसियां ऐसी होती हैं जो कि इस तरह के क्लेम को मान्य नहीं करती. इसके अलावा विभिन्नी बीमा में छंटनी को एक सूची के जरिये देखा जाता है.

– यदि नौकरी के रिस्क को लेकर कोई क्लेम पेश किया जाता है तो इसमें बहुत सारी शर्तें देखना होंगी.

– नौकरी के लास कवर का सीमित क्षेत्र देखते हुए इसका कोई विकल्प उपलब्ध नहीं है.

– छंटनी का प्रमाण रखना बेहद जरूरी है क्योंकि वही चीज आपके काम आएगी यदि आपको क्लेम करने की पात्रता है.

फेसबुक पर किसी भी लिंक को क्लिक करना हो सकता है खतरनाक

फेसबुक पर यूजर्स के इनबाक्स में इमोजी के साथ एक लिंक मिल रही है. इस लिंक के जरिये पर्सनल इन्फार्मेशन ट्रेस की जा रही है. आपको बता दें कि इस लिंक से यूजर अक्सर कंफ्यूज हो जाता है और दोस्त के अकाउंट से आये लिंक को कोई सामान्य लिंक समझकर आसानी से क्लिक भी कर देता हैं.

क्लिक करने के बाद यह लिंक एक अलग विंडो पर खुलता है. इस विंडो पर आपको कई सारे एक के बाद एक अलग अलग डायलाग बाक्स खुलते दिखाईं देंगे. इसके बाद आप जिस पेज पर पहुंचेंगे, वह बिल्कुल यूट्यूब  जैसा दिखेगा, यूट्यूब  जैसा दिखने की वजह से कोई भी धोखा खा सकता है. यूजर उसे यूट्यूब वेबसाइट समझकर क्लिक भी कर देंगे.

इस पर क्लिक करने के बाद आगे की प्रक्रिया के लिए किसी अन्य नाम से एक्सटेंशन एड करने का आप्शन होगा. इस एक्सटेंशन को एड करने के साथ ही साथ आप इस जालसाजी में पूरी तरह से फंस जायेंगे. इस एक्सटेंशन से हैकर्स आपके सिस्टम की सारी गतिविधियों पर नजर रख सकेंगे.

दरअसल, लास्ट स्टेप में यूजर जिस एक्टेंशन को अपने ब्राउजर में एड करेगा,  वह बहुत बड़ा स्कैम है, इससे यूजरनेम, पासवर्ड, बैंक डिटेल सहित सभी जरूरी जानकारी हैकर्स तक पहुंच जायेगी. हैकर्स आपसे इन डिटेल के बदले फिरौती की मांग भी कर सकते हैं या फिर लाखों की जालसाजी बड़ी ही आसानी से कर सकते है.

कैसे करें बचाव

यूजर्स को किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर आने वाले अंजान लिंक पर क्लिक करने से बचना चाहिए. गलती से क्लिक कर भी दिया है, तो इस लिंक में मौजूद एक्जिट प्रोसेस को फौलो न करें. बेहतर यही होगा कि यूजर अलर्ट रहे क्योंकि इस प्रोसेस के जरिये आपको स्कैम में फंसाया जा सकता है.

..तो इसलिए जल्दी खराब हो जाता है आपका स्मार्टफोन

स्मार्टफोन का इस्तेमाल तो सभी करते हैं. आज स्मार्टफोन बच्चों से लेकर बड़ों तक की जरूरत है. स्मार्टफोन इस्तेमाल करते समय इसका खराब होना भी आम बात हो गई है. अगर स्मार्टफोन में जरा सा भी कुछ हो जाए तो हमारा पूरा ध्यान उसी पर लगा रहता है. मन में बस यही आता है कि किसी तरह हमारा फोन ठीक हो जाए.

लेकिन क्या आप जानते हैं ज्यादातर फोन, कंपनी की गलती से नहीं, बल्कि यूजर की गलती से खराब होते हैं? आज हम कुछ ऐसी ही गलतियों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसे अक्सर जाने-अनजाने में हम और आप करते हैं और इसका असर स्मार्टफोन पर होता है.

फोन में किसी भी चार्जर और ईयरफोन का उपयोग

फोन को चार्ज करने के लिए या फिर गाने सुनने के लिए हम किसी के भी चार्जर या ईयरफोन को अपने फोन से कनेक्ट कर देते हैं लेकिन आपको शायद नहीं मालूम इससे फोन को नुकसान ही होता है. किसी का पिन ढीला होता है तो कोई जल्दी लगता नहीं है ऐसे में फोन स्लाट खराब हो सकता है और फोन को काफी नुकसान होने की भी संभावना होती.

रात भर चार्जिंग पर रखना

हालांकि, कुछ फोन में यह आप्शन होता है कि फुल चार्ज होते ही चार्जिंग बंद हो जाती है, लेकिन हमारे यहां बिजली की स्थिति बहुत अच्छी न होने के कारण पावर हमेशा एक समान नहीं रहता है. ऐसे में रात भर फोन को चार्जिंग में लगाने से फोन और चार्जर दोनों को नुकसान पहुंच सकता है.

मेटल कवर का उपयोग

वैसे तो आप फोन की सुरक्षा के लिए उसमें मेटल कवर लगाते हैं लेकिन आप शायद नहीं जानते कि इससे भी फोन को नुकसान होता है. मेटल कवर की वजह से आपके फोन में नेटवर्क की समस्या हो सकती है. ऐसे में जब भी आप अपने फोन में कवर लगाते हैं उसे अच्छी तरह देख लें ओर हो सके तो कंपनी द्वारा लॉन्च किए गए कवर का ही उपयोग करें.

पसीना आए तो न करें इस्तेमाल

गर्मियों के दिनों में पसीना आना आम बात है. पसीना आते वक्त आप फोन पर बात करते हैं तो ये भी आपके मोबाइल के लिए काफी हानिकारक साबित हो सकता है. उस कंडीशन में आपके फोन में आपका पसीना जा सकता है और आपका स्पीकर खराब हो सकता है.

कहीं से भी एप इंस्टाल करना

एंड्रायड फोन में कभी ब्लूटूथ, कभी किसी पीसी से, तो कभी कार्ड से एप इंस्टाल कर लेते हैं, लेकिन यह नहीं जानते कि कितनी बड़ी भूल कर रहे हैं, क्योंकि इससे थर्ड पार्टी एप स्टोर और साइड लोडिंग की वजह से फोन में वायरस आने का खतरा होता है.

डैशबोर्ड पर फोन रख देना

अक्सर लोग कार के डैशबोर्ड पर फोन रख देते हैं. वे यह नहीं जानते कि ऐसा करना कितना नुकसानदेह है. कार का डैशबोर्ड अक्सर गर्म होता है, जिससे फोन की बैटरी कैपेसिटी कम हो जाती है. यदि ज्यादा गर्म हुआ तो फिर फटने का भी डर रहता है. वहीं गाड़ी मुड़ने के क्रम में गिरने का भी डर रहता है, इसलिए फोन को डैशबोर्ड पर न रखें.

कहीं भी फोन रख देना

फोन रखने को लेकर लोग लापरवाह होते हैं. जहां बैठते हैं वहीं रख देते हैं. रखने से पहले यह नहीं देखते कि नीचे का सर्फेस कैसा है. सख्त सर्फेस पर कैमरे और बाडी पर स्क्रैच पड़ने का खतरा होता है.

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