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जानिए हैकर्स आखिर कैसे करते हैं आपके फोन को हैक

आज कल स्मार्ट फोन होना आम बात है और जाहिर सी बात है की आपको अपने फोन से लगाव हो ही जाता है. इसलिए आप अपना फोन बहुत हिफाज़त से रखते हैं. अगर धोखे से भी उसमें कुछ गलत हो तो आप काफी काफी परेशान हो जाते हैं. इसी से बचने के लिए आप अपने फोन में सिक्यूरिटी लगाते हैं, ताकि और कोई आपके फोन का डाटा देख न पाए. मगर हम आपको बता दें कि आप कितने भी सिक्यूरिटी कोड लगा लें, लेकिन आप हैकर्स की नजर से बच नहीं सकते. बता दें हैकर्स आपके फोन को कुछ ही मिनटों में हैक कर सकते हैं. हम आपको ऐसे तरीके बताने जा रहे हैं जिसके जरिये हैकर्स आपका फोन हैक करते हैं.

तरीका 1

पहले तरीके में हैकर्स आपके फोन सेटिंग्स पर कंट्रोल कर लेते हैं, जिसके जरिए वो आपके फोन में किसी भी तरह की छेड़खानी कर सकते हैं. इस तरीके में फोन के सिक्योर सौकेट लेयर का बाईपास और एन्क्रिप्शन लेयर को कमजोर करने का काम किया जाता है. अगर हैकर्स ये सब करने में कामयाब होते हैं तो महज 1 कमांड के जरिए आपके फोन का डाटा डिलीट किया जा सकता है. हैकर्स आपके फोन में एक कंट्रोल मैसेज भेजते हैं उसे ओपन करते ही आपकी डिवाइस पर हैकर्स का कंट्रोल हो जाता है.

तरीका 2

बता दें लैपटौप और फोन के सहारे आपका फोन हैक हो सकता है. क्यूंकि लैपटौप से वाई-फाई कनेक्ट होता है और फोन जीएसएम मौडम की तरह काम करता है. सबसे ज्यादा हैकर्स आपके फोन को रात में हैक करते हैं जब आप फोन चार्जिंग पर लगाकर छोड़ देते हैं. हैकर्स फोन पर एक मैसेज भेजते हैं, ये मैसेज हैकिंग टूल किट के जरिए भेजा जाता है. जिसके बाद हैकर्स आपके फोन में एप को रन कराते हैं, जिसके जरिए आपके फोन का डाटा चुराया जाता है. फिर हैकर्स के पास एक एसएमएस आता है, इस मैसेज में आपके फोन का इंटरनेशनल सब्सक्राइबर नंबर होता है, जिसे फोन का यूनिक आईडी भी कहा जाता है. इसके बाद हैकर्स आपके फोन पर पूरी तरह से कंट्रोल कर लेते हैं और आपका डाटा चुराने लगते हैं.

क्या! आपने अभी तक नहीं देखा क्रिकेट के इस अनोखे रिकार्ड का वीडियो

जैसे-जैसे कैरेबियिन प्रीमियर लीग का कारवां आगे बढ़ रहा है वैसे-वैसे इसमें रिकार्डों की झड़ी लगनी भी शुरू हो गई है. हाल ही में त्रिनबागो नाइट राइडर्स की टीम ने सेंट किट्स एंड नेविस पैट्रियट्स को एक रोमांचक मुकाबले में हरा दिया. इस मैच में नाइट राइडर्स के खिलाड़ी डैरेन ब्रावो ने विश्व रिकार्ड बना डाला.

अंतरराष्ट्रीय मैचों में अपने बल्ले से धूम मचाने वाले डैरेन ब्रावो ने यहां भी अपने बल्ले का कमाल दिखाया है. कैरेबियन प्रीमियर लीग डैरेन ब्रावो ने अपनी आतिशि बल्लेबाजी से ना केवल अपनी टीम ‘त्रिनबागो नाइट राइडर्स’ को जीत दिलाई बल्कि एक अनोखा रिकार्ड भी अपने नाम कर लिया है.

डैरेन ब्रावो ने 10 गेंदों का सामना करते हुए 6 छक्कों की मदद से 38 रन बनाए. ब्रावो ने अपनी पारी की शुरुआती 3 गेंद पर 3 छक्के मारे. इसके साथ ही 28 साल के डैरेन ब्रावो ने टी-20 में रिकार्ड कायम कर दिया. दरअसल, ब्रावो ने सबसे कम रनों की पारी में 6 छक्के ठोकने का रिकार्ड बना डाला. सबसे कम रनों की पारी (38 रन) के दौरान छह छक्के लगाने की बात करें, तो डैरेन की यह पारी रिकार्ड बुक में शामिल हो गई. चार साल पहले गेरेथ हापकिंस ने 39 रनों की पारी के दौरान इतने ही छक्के लगाए थे. इस मैच में डैरेन को ‘मैन आफ द मैच’ चुना गया.

बता दें कि कैरेबियन प्रीमियर लीग के 22वें मुकाबले में ‘त्रिनबागो नाइट राइडर्स’ ने ‘सेंट किट्स एंड नेविस पेट्रियट्स’ को डकवर्थ लुईस नियम के तहत 8 विकेट से हरा दिया. पहले टास जीतकर त्रिनबागो नाइट राइडर्स ने पहले गेंदबाजी करने का निर्णय लिया लेकिन क्रिस गेल (93) और लेविस (39) ने पहले विकेट के लिए 58 रन जोड़कर टीम को तेज शुरुआत दी. क्रिस गेल ने अपने बल्ले से आतिशी शाट खेलने जारी रखे और 47 गेंदों पर 8 छक्कों और 5 चौकों की मदद से 93 रन बनाकर आउट हुए. टीम ने 3 विकेट पर 162 रन बनाए.

लक्ष्य का पीछा करते हुए त्रिनबागो ने चौथे ओवर की पहली गेंद पर 34 रन बनाए, तभी मैच में बारिश ने खलल डाल दिया. इस समय ब्रेंडन मैकलम 34 रन बनाकर खेल रहे थे और सामने डैरेन ब्रावो आए ही थे. जैसे ही मैच शुरू हुआ, नाइटराइडर्स को 6 ओवर में 86 रनों का लक्ष्य दिया गया. त्रिनबागो के पास 17 गेंद बची थी और 52 रनों की आवश्यकता थी. डैरेन ब्रावो ने सैमुएल बद्री की तीन गेंदों पर लगातर छक्के जड़कर स्कोर आगे बढाया. अब जीत के लिए 2 ओवर में 33 रन चाहिए थे.

मैकलम और ब्रावो ने एक बार फिर आक्रामक रुख अपनाते हुए मोहम्मद नबी के ओवर में 3 छक्के और एक चौका लगाकर 23 रन प्राप्त कर लिये. छठे और अंतिम ओवर में 10 रनों की जरुरत थी और ब्रावो ने दो गेंदों पर लगातार छक्के जड़कर स्कोर सीधा 88 रन पहुंचाकर त्रिनबागो नाइट राइडर्स को 4 गेंद पहले जीत दिला दी. ब्रावो ने 6 और मैकलम ने 3 छक्के जड़े. पूरे मैच में 23 छक्के लगे.

सलमान, शाहरुख, आमिर को लेकर इस फिल्म का रीमेक बनाएंगे साजिद..!

बाक्स आफिस को हाउसफुल और हे बेबी जैसी सुपरहिट फिल्में देने वाले निर्देशक साजिद खान से जब पूछा गया कि यदि उन्हें सलमान, शाहरुख, आमिर इन तीनों खानो को लेकर एक साथ एक ही फिल्म के लिए काम करने का मौका मिले, तो वे कैसी फिल्म बनाना चाहेंगे? इस सवाल का जवाब देते हुए साजिद खान ने कहा- मैं तीनों सुपर खान के साथ अमर अकबर एंथनी फिल्म की एक कूल रीमेक बनाना चाहूंगा. यह रीमेक काफी नए स्टाइल की होगी. अमर अकबर एंथनी में एंथनी फिल्म की जान है इसलिए मैं एंथनी के साथ अमर और अकबर के किरदार को भी थोड़ा और उभारना चाहूंगा. उन्होनें यह भी कहा कि यदि तीन खान एक ही फिल्म में हुए, तो तीनों किरदारो का बराबर होना बेहद ही जरूरी है.

कुछ समय पहले जब किंग खान से निर्देशक साजिद की इस फिल्म के बारे में सवाल किया गया, तो उन्होंने जवाब दिया यदि कोई ऐसी स्क्रिप्ट है, तो एक्टर्स जरूर साथ काम करेंगे. लेकिन हमारे साथ आने से ज्यादा मुश्किल ऐसी स्क्रिप्ट लिखना है. उन्होंने कहा, इस तरह की फिल्म के लिए एक ऐसे निर्देशक की जरूरत है, जिसे साफ तौर पर पता हो कि उसे फिल्म में क्या चाहिए.

सुपरस्टार्स को साथ लाना क्यों है मुश्किल

फिल्म की कहानी एक ऐसी कहानी होनी चाहिए, जहां सभी सुपरस्टार्स को बराबर का किरदार मिले, सभी दमदार दिखें और कहानी भी काफी अच्छी हो. ये सब कुछ एक साथ होना काफी मुश्किल है.

इसके लिए तगड़े बजट की जरूरत होना आवश्यक है. क्योंकि एक ही फिल्म में सलमान, शाहरूख, आमिर यानि की बजट का ओवरडोज. प्रोड्यूसर को लगभग 300 करोड़ का बजट बनाना पड़ेगा.

इनकी पसंद भी अलग अलग है, आमिर रियल फिल्में बनाना पसंद करते हैं. तो शाहरुख, सलमान को चाहिए सिर्फ एंटरटेनमेंट. ऐसे में इन सभी को साथ लाना काफी मुश्किल है.

एक साथ इतने हीरो होंगे. तो हीरोइन भी चाहिए. ऐसे में इस फिल्म की एक्ट्रेस कौन होगी यह भी बड़ा सवाल है. लिहाजा, निर्देशक के लिए यह काफी मुश्किल भरा काम हो जाएगा कि आखिर किस एक्टर के लिए कौन सी एक्ट्रेस को लिया जाए.

सभी सुपरस्टार्स की फिल्म अलग अलग आती है तो कोई 300 करोड़ कमाता है तो कोई 200 करोड़. कुल मिलाकर बाक्स आफिस में 1000 करोड़ से ऊपर का कलेक्शन हो जाता है. लेकिन यदि एक ही फिल्म में सभी आएंगे तो फिल्म ज्यादा से ज्यादा 400 या 500 करोड़ तक की ही कमाई कर पाएंगी. ऐसे में बाक्स आफिस को नुकसान होगा.

टाइम मैनेजमेंट करना भी जरूरी है क्योंकि सभी सुपरस्टार्स एक साथ एक ही समय पर खाली हों, यह जरुरी नहीं. ऐसा होना काफी मुश्किल है. ऐसे में शूटिंग के लिए टाइम मैनेजमेंट करना एक अलग परेशानी होगी.

आयाराम गयाराम नीतीश कुमार और बिहार की राजनीति का बदलता स्वरूप

नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी भारतीय जनता पार्टी को किसी न किसी तरह से इंदिरा कांग्रेस की तरह पूरे देश में फैला देने के काम में लगी है. देश के विकास की बातें तो अब हवा सी हो गई हैं, पर विरोधी दल के विनाश की बातें चालू हैं. भारतीय जनता पार्टी की सरकार नोटबंदी, जीएसटी, सीबीआई, आईडी, दलबदल आदि हर तरह के हथियार अपना कर हर जगह सत्ता में आ रही है.

उत्तराखंड, गोवा और अरुणाचल प्रदेश में मोदी और शाह की जोड़ी ने अपने माहिरता पहले ही दिखा दी थी और अब बिहार में नीतीश कुमार को फांस कर 2015 के राज्य विधानसभा चुनावों में मिली करारी हार का बदला राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव पर मुकदमे ठोंक कर ले लिया. नीतीश कुमार, जो लालू प्रसाद यादव का बोझ नहीं उठाना चाहते थे और नरेंद्र मोदी से 2014 से पहले के मनमुटावों को दूर करने के लिए छटपटा रहे थे, इस मौके का पूरा फायदा उठा रहे हैं.

बिहार में अब भारतीय जनता पार्टी समर्थक सरकार बनी है, जिस में आयाराम गयाराम नीतीश कुमार फिर मुख्यमंत्री बने हैं. यह कोई अचरज नहीं है. बिहार को तो वैसे ही हिंदू कट्टरवादी शासकों की आदत रही है. लालू प्रसाद यादव से पहले बिहार की बागडोर उन्हीं के हाथों में रही थी, चाहे उस समय बिल्ला कांग्रेस का था. आज मुहर भारतीय जनता पार्टी की लग रही है, पर सत्ता में वही लोग रहेंगे, जो घोर जातिवादी हैं, पर उन का जातिवाद से मतलब केवल ऊंची जातियों का राज है.

नीतीश कुमार को 2015 के चुनावों में उम्मीद थी कि वे लालू प्रसाद यादव से ज्यादा सीटें ले जाएंगे, पर चुनाव नतीजों में जब तरहतरह के आरोपों से घिरे लालू प्रसाद यादव को ज्यादा वोट व ज्यादा सीटें मिल गईं, तो नीतीश कुमार चिड़चिड़े हो गए. वे अपनी साफ छवि का चक्कर बनाए रखने के लिए मौका ढूंढ़ रहे थे, जो केंद्र सरकार ने लालू परिवार पर रेलवे टैंडरों में गड़बड़ी के नाम पर उन्हें दे दिया.

नीतीश कुमार चाहे बात करने में कितने ही ठीक लगते हों, 1995 से ही वे पाले बदलते रहे हैं. लोहियावादी और कट्टरपंथी सोच के खिलाफ होने का मुखौटा पहना जरूर था, पर टोकन के नाम पर कुछ करने के अलावा उन्होंने पिछड़ी व निचली जातियों के लिए खास कभी कुछ न किया.

वे अभी बिहार में बने रहेंगे और सत्ता में रहेंगे. भाजपा अब सभी राज्यों में दलितों और पिछड़ों को ढूंढ़ढूंढ़ कर ऊंचे पदों पर बिठा रही है और एक तरह से जातिवाद में जकड़े समाज के टुकड़ों पर अलगअलग मुहर लगा रही है, ताकि ऊंची जातियों को राज करने का अवसर मिलता रहे.

बिहार की नौटंकी साफ कर रही है कि बिहार असल में फिसड्डी क्यों है. यहां जाति का सवाल काम से ज्यादा बड़ा है और नीतीश कुमार भी इस गुत्थी को सुलझाने के बजाय इसे उलझा कर सत्ता में बने रहने के जुगाड़ में लगे हैं. इस फेरबदल से बिहार के विकास के कदम बढ़ेंगे, यह तो भूल जाएं.

मैं ने खुद को हमेशा टीनएजर ही समझा है : सचिन पिलगांवकर

महज 4 साल की छोटी उम्र में मराठी फिल्म ‘हा माझा मार्ग एकला’ में बाल कलाकार के रूप में काम कर राष्ट्रपति पुरस्कार जीतने वाले अभिनेता सचिन पिलगांवकर ने मराठी और हिंदी फिल्मों के अलावा भोजपुरी फिल्मों में भी काम किया है.

हिंदी फिल्म ‘बालिका वधू’ उन की चर्चित फिल्म है, लेकिन जीवन का टर्निंग पौइंट उन की फिल्म ‘गीत गाता चल’ थी. इस फिल्म में उन की और सारिका की जोड़ी को दर्शकों ने खूब पसंद किया. फलस्वरूप ‘अंखियों के झरोखों से’ फिल्म बनी. फिल्म ‘नदिया के पार’ सचिन की सब से बड़ी हिट फिल्म थी. अभिनेत्री साधना सिंह के साथ उन की यह फिल्म सुपरडुपर हिट हुई. यही वजह थी कि राजश्री प्रोडक्शन वालों ने दोबारा उस फिल्म को 1994 में सलमान खान और माधुरी दीक्षित के साथ ‘हम आप के हैं कौन’ नाम से बनाया और एक बार फिर वह कामयाब रही.

अभिनय के साथसाथ सचिन ने मराठी और हिंदी फिल्मों के लिए निर्माता और निर्देशक का काम भी किया है. इतना ही नहीं, उन्होंने सिंगिंग और कौमेडी शो भी किए हैं. सचिन हर काम को चुनौती मानते हैं. उन के कामयाब फिल्मी सफर के साथसाथ उन का पारिवारिक जीवन भी बेहद सुखद है.

सचिन और सुप्रिया एक मराठी फिल्म के दौरान मिले, प्यार हुआ और फिर शादी कर ली. दोनों की एक बेटी श्रेया पिलगांवकार है, जो अभिनेत्री है. शांत और हंसमुख स्वभाव के सचिन से बात करना रोचक रहा. पेश हैं, कुछ अंश:

वैब सीरीज में काम करने की इच्छा कैसे पैदा हुई

वैब सीरीज भविष्य की एक बहुत बड़ी मांग है. जब मैं ने पहली बार 8-10 साल पहले सुना था तो महसूस हुआ कि यह भी औडियो विजुअल माध्यम है. यह भी किसी कहानी को कह सकता है, लेकिन इस की तकनीक अलग है. मुझे हर बदलाव को अपनाने में खुशी मिलती है. यही वजह है कि मैं ने 1995 में सब से पहले टीवी को अपनाया था. उस समय सैटेलाइट टीवी एक नई बात थी.

वैब सीरीज को भी मैं ने उसी तरह से अपनाया है. इस में अच्छी बात यह रही कि सैक्स से जुड़ी जिन बातों को समाज और परिवार कहने से कतराता है और चोरीछिपे उस बारे में बातें करता है, उसे मैं ने सामने आ कर एक सीरीज के रूप में दिखाया. इसे व्यक्ति किसी भी फोन या लैपटौप पर किसी भी समय जब चाहे देख सकता है. उसे एक आजादी मिलती है.

वैब सीरीज को करने के बाद मुझे बहुत खुशी मिली. मैं मनोरंजन के क्षेत्र से हूं और कोई काम जिस में कोई मैसेज हो तो मैं उसे तुरंत हां कर देता हूं.

बचपन से ले कर अब तक के फिल्मी कैरियर को कैसे देखते हैं

मैं इस कामयाबी को बहुत अधिक नहीं समझता. मैं तो अभी भी खुद को 18 वर्ष का ही समझता हूं. कभीकभार बचकानी हरकतें भी कर लेता हूं. मैं ने अपनेआप को हमेशा टीनएजर ही समझा है. इसीलिए किसी भी नई चीज को करने में उत्साह महसूस करता हूं.

मैं अपनेआप को कभी लीजेंड नहीं समझता और क्या अच्छा कर सकता हूं उस के बारे में सोचता हूं. यही वजह है कि मेरी यह लंबी पारी चल रही है. जब मैं 50 साल का हुआ था तब मैं ने एक जगह कहा था कि अब मुझे लगने लगा है कि मेरी जर्नी अब शुरू हुई है. इस की वजह यह है कि अब वही करना है, जिसे अब तक नहीं किया है. मेरे लिए, आप ने कितने साल इंडस्ट्री में गुजारे, इस से अधिक किया क्या, वह अधिक महत्त्व रखता है.

लोगों का मानना है कि सैक्स वैब सीरीज या सैक्स ऐजुकेशन से समाज और परिवार बिगड़ता है, महिलाओं पर अत्याचार बढ़ता है. इस बारे में आप की क्या राय है

जहां भी किसी बात की पाबंदी होती है, वहां लोग उसे सब से अधिक करते हैं. जिस प्रदेश में शराब पर रोक है, वहां सब से अधिक शराब की बोतलें बेची और खरीदी जाती हैं. लोग अधिक पैसे दे कर कहीं न कहीं से खरीदते हैं. जहां पर पाबंदी नहीं, वहां चोरी का धंधा नहीं है. वैसे ही सैक्स ऐजुकेशन एक ऐसी चीज है, जिस की जानकारी सब को होनी चाहिए.

मैं जब 6 साल का था तब मेरे पिता ने मुझे सैक्स के बारे में बताया था. 13 साल की उम्र में उन्होंने फिर से मुझे अच्छी तरह समझाया. 13 साल की उम्र में मैं और अधिक समझ सकता हूं. इसलिए उस हिसाब से समझाया. मेरी बेटी को मेरी पत्नी ने समझाया. हम दोनों आज भी अपनी 26 साल की बेटी के साथ बैठ कर बहुत सारे मुद्दों पर चर्चा करते हैं. हमारे आसपास कई ऐसे पुरुष हैं, जो हर दिन अपनी पत्नी का रेप करते हैं. उन पत्नियों को पता नहीं होता कि सैक्स और रेप में अंतर क्या है.

इसलिए सैक्स ऐजुकेशन केवल बच्चों में ही जरूरी नहीं, बल्कि महिलाओं में भी ऐसी जागरूकता होनी चाहिए. यह एक टैबू है, जिसे महिलाएं सामने आ कर बताना नहीं चाहतीं, क्योंकि उन्हें लगता है कि पति उन का भरणपोषण कर रहा है और वह कुछ भी करने का हक रखता है, जो गलत है.

आप सोशल मीडिया पर कितने ऐक्टिव हैं और क्या बच्चों पर इस का गलत असर पड़ता है

मैं अधिक ऐक्टिव नहीं, केवल फेसबुक पर जुड़ा हूं, ट्विटर पर नहीं हूं, क्योंकि उस में हर दिन कुछ पोस्ट करना पड़ता है. मैं मुक्त परिवेश में रहना पसंद करता हूं. मैं अपनी मां, पत्नी और बेटी को भी स्पेस देता हूं. मैं किसी पर अपनी कोई बात नहीं थोपता और कोई मुझ पर अपनी बात थोपे उसे भी नापसंद करता हूं.

मेरे हिसाब से जो भी नई चीज आती है, उस का कुछ सही और कुछ गलत परिणाम होता है. उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता. मातापिता को नजर रखनी पड़ती है कि बच्चे सोशल मीडिया का गलत प्रयोग न करें.

इंडस्ट्री में इतने सालों तक काम करते हुए आप इंडस्ट्री में कितना बदलाव महसूस करते हैं

मैं ने हर बदलाव को देखा है और फिर उसी के अनुसार आगे बढ़ने की कोशिश की है. अब फिल्म की कहानी और उस की तकनीक में बदलाव आया है. मैं ने हर कैमरे पर शूट किया है. ‘डेबरी’ नाम का कैमरा जिसे उठाने में 10 लोग लगते थे, उस कैमरे पर मैं ने बचपन में शूट किया. इस के बाद ‘मिचेल’, ‘मिचेल 2’, ‘एरी’ कैमरे के सारे वर्जन आए. इस तरह करतेकरते डिजिटल कैमरे का युग आ गया. मैं ने हर तरह के बदलाव को नजदीक से देखा है.

आप की फिटनैस का राज क्या है

मैं खुद से बहुत प्यार करता हूं. मैं संयम की जिंदगी जीता हूं. खाना सब पसंद है, लेकिन उस में संयम बरतता हूं. 8 घंटे की नींद लेता हूं और हफ्ते में 5 दिन जम कर बैडमिंटन प्रोफैशनल तरीके से कोच के साथ खेलता हूं.

क्या अभी कुछ और मराठी फिल्मों का निर्देशन करने की इच्छा है

मैं ने अभी तक हिंदी, मराठी और कन्नड़ कुल 21 फिल्मों का निर्देशन किया है. ‘कट्यार कालजात घुसली’ के बाद 2 मराठी फिल्मों ‘वारस’ और ‘जवानी जाने मन’ पर काम चल रहा है. कुछ नई कहानियां भी सुन रहा हूं. हिंदी फिल्मों में भी अभिनय करने की इच्छा है.

गरमियों के दिनों में भी इन आसान तरीकों से दिखें कूल और फ्रैश

चिलचिलाती धूप, धूलमिट्टी और उमस भरे गरमी के मौसम में अकसर हम बुझाबुझा सा महसूस करते हैं. हमारी त्वचा और बाल अपनी प्राकृतिक खूबसूरती खोने लगते हैं. मगर कुछ बातों का खयाल रखें, तो हम इस मौसम में भी कूल और फ्रैश महसूस कर सकते हैं.

नमकयुक्त पानी से नहाएं

गरमियों में रोज स्नान करने से शरीर की बदबू, संक्रमण और रोगाणुओं से हमारी रक्षा होती है. स्नान हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को भी मजबूत बनाता है.

इस मौसम में हमारे शरीर से काफी पसीना निकलता है, जिस के साथ शरीर के विषाक्त पदार्थ बाहर आते हैं. स्नान न केवल इन विषाक्त पदार्थों को साफ करता है, बल्कि जीवाणुओं और वायरस का भी खात्मा करता है. स्नान करने से नींद भी अच्छी आती है. नमकयुक्त पानी से नहाने से बढ़ती उम्र का असर भी बेअसर हो जाता है. इस से त्वचा मुलायम और चमकदार भी बनती है.

मौइश्चराइजर और सनस्क्रीन

गरमी के मौसम में त्वचा बेजान और रूखी दिखने लगती है. सूर्य की तेज किरणें त्वचा को डैमेज कर सकती हैं. ऐसे में आवश्यक है कि आप किसी अच्छी क्वालिटी की मौइश्चराइजर क्रीम का प्रयोग करें. मौइश्चराइजर से त्वचा की नमी और चमक बरकरार रहती है. प्राकृतिक तरीकों से भी त्वचा को मौइश्चराज्ड कर सकती हैं.

ब्यूटी ऐक्सपर्ट निर्मल रंधावा कहती हैं कि गरमियों में सूर्य की हानिकारक यूवीबी किरणों के संपर्क में आने से त्वचा को नुकसान पहुंचता है. वह जल भी सकती है. ऐसे में सनस्क्रीन का प्रयोग आवश्यक हो जाता है. यह सूर्य की किरणों से त्वचा को बचाने के लिए सुरक्षा कवच तैयार करता है. इस मौसम में कम से कम 30 एसपीएफ वाली सनस्क्रीन क्रीम घर से बाहर निकलने से करीब 15-20 मिनट पहले लगा लेनी चाहिए.

त्वचा की देखभाल

यदि इस मौसम में त्वचा की सही देखभाल न की जाए तो सनबर्न, त्वचा में चिपचिपापन या फिर स्किन ऐलर्जी की समस्या भी पैदा हो सकती है. अत: इस मौसम में कुछ इस तरह करें त्वचा की रक्षा:

जहां तक संभव हो सके तेज धूप में न निकलें. सूर्य की सीधी किरणें त्वचा के कोलोजन और इलास्टिक टिशूज को नष्ट कर उसे हानि पहुंचाती हैं. अगर निकलना जरूरी ही हो तो सनस्क्रीन क्रीम लगा कर ही निकलें.

धूप में निकलते समय आंखों पर काला चश्मा लगा लें ताकि आंखों के नीचे की नाजुक त्वचा सुरक्षित रहे.

गरमी के मौसम में स्किन की रोज क्लीनिंग, टोनिंग और मौइश्चराइजिंग जरूर करें. इस के लिए अपनी त्वचा के अनुरूप प्रोडक्ट्स खरीदें या फिर प्राकृतिक चीजों का इस्तेमाल करें जैसे कच्चे दूध से क्लीनिंग करें तो गुलाबजल से टोनिंग. ऐलोवेरा जैल का इस्तेमाल मौइश्चराइजिंग के लिए करें.

सप्ताह में कम से कम 1 दिन त्वचा को ऐक्सफौलिएट जरूर करें. इस से रक्तसंचार सुचारु होता है और त्वचा की बाहरी सतह पर मौजूद मृत कोशिकाएं बाहर निकल जाती हैं.

बालों की देखरेख

गरमी के मौसम में ह्यूमिडिटी लैवल अधिक होने की वजह से बालों को नुकसान पहुंचता है. अत: बालों की तंदुरुस्ती को कायम रखना जरूरी है. इस संदर्भ में बिग बौस हेयर सैलून ऐंड स्पा के संस्थापक हरीश भाटिया के बताए कुछ टिप्स पेश हैं:

इस मौसम में प्राकृतिक तरीकों से बालों को स्टाइल दें, हीट का प्रयोग कम से कम करें.

शैंपू के बाद हलका गरम तेल बालों के सिरों से ले कर जड़ों तक लगाएं और हलकी मसाज करें. इस से रक्तसंचार बढ़ेगा और बाल चमकदार व सेहतमंद दिखेंगे.

यदि तैरने जा रही हों, तो पानी में उतरने से पहले बालों को पानी से भिगो लें. इस से ये कम मात्रा में क्लोरीन अब्जौर्व करेंगे.

बालों में नियमित कंडीशनर और हेयर सनस्क्रीन क्रीम का प्रयोग करें.

मेकअप

गरमी के दिनों में मेकअप में भी हलकी रंगत अच्छी लगती है. इस मौसम में वाटरप्रूफ मेकअप बेहतर विकल्प है, क्योंकि यह पसीने से धुलता नहीं है.

ब्यूटी ऐक्सपर्ट निर्मल रंधावा कहती हैं, ‘‘गरमियों में आईशैडो क्रीम या ग्लिटर के प्रयोग से बचें. हलके रंग के केक आईशैडो का इस्तेमाल करें. आंखों के मेकअप के लिए एक रंग के शेड्स का प्रयोग करें. आईलाइनर के साथ वाटरप्रूफ मसकारे का प्रयोग करें. होंठों के लिए भी हलके रंग जैसे पीच, गुलाबी या फिर भूरे का प्रयोग करें.’’

कैसे रहें हाइड्रेटेड

हमेशा अपने साथ पानी की बोतल जरूर रखें और नियमित अंतराल पर पानी पीती रहें. दिन में कम से कम 10-12 गिलास पानी जरूर पीएं. इस से शरीर हाइड्रेटेड और ऊर्जावान रहेगा. इस मौसम में फल और सब्जियां जिन में पानी की मात्रा अधिक होती है जैसे तरबूज, अंगूर, खरबूज, तुरई, मूली वगैरह का ज्यादा सेवन करें.

डियो छोड़ें

पसीने की बदबू दूर करने के लिए अकसर डियो का इस्तेमाल करते हैं. डियो ब्रैंडेड ही खरीदें. लोकल डियो में कैमिकल्स काफी मात्रा में होते हैं. ऐसे डियो केवल बदबू दबाने का काम करता है. यदि आप इसे डाइरैक्ट स्किन पर स्प्रे करेंगी तो सूर्य के संपर्क में आने पर यह ऐलर्जी का कारण बन सकता है. इसलिए नामी कंपनी का डियो ही इस्तेमाल करें. गरमियों में टैलकम पाउडर या फ्रैगरैंस वाले साबुन का इस्तेमाल भी कर सकती हैं.

लैमन, मैंथोल, लैवेंडर, रोज, जैसमिन जैसी कई तरह की खुशबुओं में उपलब्ध साबुन और पाउडर प्रकृतिक तत्त्वों प्रयोग से बनाए जाते हैं. आकर्षक महक वाला साबुन और टैलकम पाउडर आप को अंदर से तरोताजा बनाता है. इन में चिकित्सीय गुण भी होते हैं. टैलकम पाउडर आर्मपिट और दूसरी जगहों से मौइश्चर अब्जौर्ब करता है. इस से पसीना कम निकलता है. फंगल इन्फैक्शन से भी बचाव होता है.

गरमी के मौसम में पसीने की समस्या बढ़ जाती है. शरीर के कुछ खास हिस्से ऐसे होते हैं जहां बालों की मौजूदगी पसीना, बदबू और इन्फैक्शन की वजह बन सकती है. इसलिए बेहतर होगा कि पहले ही इन्हें हटा लिया जाए.

निर्मल रंधावा कहती हैं कि शरीर के अनचाहे बालों से छुटकारा पाने के लिए वैक्सिंग और शेविंग सब से सहज तरीके हैं. स्थायी रूप से शरीर से बाल हटाने के लिए लेजर तकनीक का प्रयोग किया जाता है, जो काफी सफल और बेहतर तरीका है.

इन सभी बातों का ध्यान रखने के साथसाथ अपने व्यक्तित्व को और निखारने के लिए भीनीभीनी सुगंध वाली परफ्यूम का भी इस्तेमाल करें. ताजगी और खुशबू का कौंबिनेशन लोगों को आप का दीवाना बना देगा.

प्राकृतिक सौंदर्य की छटा बिखेरता डलहौजी, आप भी एक बार घूम आएं

अंगरेजों ने अपने शासनकाल के दौरान हिल स्टेशन तब बनवाए जब वे देश की भीषण गरमी से उकता गए. गरमी के मौसम में सुकून भरे पल किसी ठंडी और शांत जगह पर बिता सकें, इस के लिए देश के पहाड़ी इलाकों में खूबसूरत और मनोरम ठिकानों की तफ्तीश कर उन्होंने देश में हिल स्टेशन परंपरा शुरू की. आज भी देश में पर्यटन के सब से मजेदार और मनभावन ठिकाने यही स्टेशन माने जाते हैं. डलहौजी इसी हिल स्टेशन परंपरा का एक हिस्सा है.

डलहौजी का पर्वतीय सौंदर्य सैलानियों के दिल में ऐसी अनोखी छाप छोड़ देता है कि यहां बारबार आने का मन करता है. 19वीं सदी में अंगरेज शासकों द्वारा बसाया गया यह टाउन अपने ऐतिहासिक महत्त्व और प्राकृतिक रमणीयता के लिए जाना जाता है. यहां मौजूद शानदार गोल्फ कोर्स, प्राकृतिक अभयारण्य और नदियों की जलधाराओं के संगम जैसे अनेक स्थलों के आकर्षण में बंधे हजारों पर्यटक हर वर्ष आते हैं.

प्राकृतिक सौंदर्य, मनमोहक आबोहवा, ढेरों दर्शनीय स्थल और देवदार के घने जंगलों से घिरा डलहौजी, हिमाचल प्रदेश के चंपा जिले में स्थित खूबसूरत हिल स्टेशन है. यह स्थल 5 पहाडि़यों कठलौंग, पोट्रेन, तेहरा, बकरोटा और बलून पर बसा है.

समुद्रतल से 2 हजार मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह टाउन 13 किलोमीटर के छोटे से क्षेत्रफल में फैला है. एक ओर दूरदूर तक फैली बर्फीली चोटियां तो दूसरी ओर चिनाब, व्यास और रावी नदियों की कलकल करती जलधारा, मनमोहक नजारा पेश करती है.

पंचपुला और सतधारा

डलहौजी से केवल 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, पंचपुला. इस का नाम यहां पर मौजूद प्राकृतिक कुंड और उस पर बने छोटेछोटे 5 पुलों के आधार पर रखा गया है. यहां से कुछ दूरी पर एक अन्य रमणीय स्थल सतधारा झरना स्थित है. किसी समय तक यहां 7 जलधाराएं बहती थीं. लेकिन अब केवल एक ही धारा बची है. बावजूद इस के, इस झरने का सौंदर्य बरकरार है. माना जाता है कि सतधारा का जल प्राकृतिक औषधीय गुणों से भरपूर और अनेक रोगों का निवारण करने की क्षमता रखता है.

खजियार का सौंदर्य

डलहौजी हिल स्टेशन की यात्रा बगैर खजियार देखे अधूरी ही लगती है. यह स्थल डलहौजी से 27 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. दरअसल, खजियार उस मनमोहक झील के लिए प्रसिद्ध है जिस का आकार तश्तरीनुमा है. यह स्थल देवदार के लंबे और घने जंगलों के बीच स्थित है.

गोल्फ खेलने के शौकीन पर्यटकों को यह स्थान विशेषरूप से पसंद आता है, क्योंकि यहां एक शानदार गोल्फ कोर्स भी मौजूद है. इस के साथ ही व्यास, रावी और चिनाब नदियों का अद्भुत संगम यहां से 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित डायनकुंड में देखा जा सकता है. यह डलहौजी का सब से ऊंचा स्थल है.

चंबा का दिल कहे जाने वाले हरियाले चैगान के एक छोर पर बने हरिराय मंदिर में अद्वितीय कलाकौशल की झलक देखने को मिलती है. यहीं पर भूरी सिंह संग्रहालय है, जहां ऐतिहासिक दस्तावेज, पेंटिंग्स, पनघट शिलाएं, अस्त्रशस्त्र और सिक्के संग्रहीत हैं.

आकर्षक है डलहौजी का जीपीओ इलाका

डलहौजी का जीपीओ इलाका भी काफी चहलपहल भरा माना जाता है. जीपीओ से करीब 2 किलोमीटर दूर सुभाष बावली है. कहा जाता है कि इस जगह पर सुभाष चंद्र बोस करीब 5 महीने रुके थे. इस दौरान वे इसी बावली का पानी पीते थे. यहां से बर्फ से ढके ऊंचे पर्वतों का विहंगम नजारा देखते ही बनता है. सुभाष बावली से लगभग आधा किलोमीटर दूर स्थित जंध्री घाट में मनोहर पैलेस ऊंचेऊंचे चीड़ के पेड़ों के बीच स्थित है. यह जगह चंबा के पूर्व शासक के पैलेस के लिए भी प्रसिद्ध है.

कब जाएं

डलहौजी का मौसम वैसे तो साल भर सुहाना रहता है, लेकिन सब से उपयुक्त समय अप्रैल से जुलाई और अक्तूबर से दिसंबर के बीच का माना जाता है.

चटनी की चटपटी चर्चा का लुत्फ आप भी उठाइये जनाब

मिस चटनी के तेवर बदल रहे हैं. पहले तो हरीमिर्च, धनिया, पुदीना, कच्चा आम या कच्ची इमली, काला या सेंधा नमक, गुड़, हींग या लहसुन के साथ सिलबट्टे पर पिस कर चुनार या खुर्जा पौटरी के बरतन में बैठ जाती थीं और वहां से फूल की थाली में केले के पत्ते पर. ताजी पिसीं और ताजी खाई गईं. अब बासी चटनी में वह बात कहां

पकी इमली के गूदे, गुड़, कालानमक और लालमिर्च, भुने जीरे, बारीक कटे छुहारोंखजूरों के साथ भी पकींघुटीं. अनार के दाने, अंगूर और केले के कतले भी मिलाए. कभी समोसे का कोना तो कभी पकौड़ी का सिरा चूमा या फिर आलू की टिक्की, दहीबड़े पर लाड़ से पसरीं और खाने वाले को चटखारे दिलवाए. कभी गोलगप्पे के निढाल पानी में तीखामीठा हौसला भरा, तो कभी भेलपूरी को चटपटा बनाया.

पुरानी दिल्ली में दरीबे के साबुत मेथीदाने, मोटी सौंफ, जीरा, गुड़, कमरख, कचरी, साबुत सूखी लालमिर्च, सूखे कच्चे आम, पिसी हलदी, धनिया, नमक का मिश्रण बन रात भर पानी में भीगीं. सुबह हलवाइयों ने धीमी आंच पर खूब पका कर खस्ता कचौरी के साथ क्या परोसा कि खाने वाले पत्तल तक चाट गए.

दक्षिणी भारत पहुंचीं तो नारियल, कच्ची अदरक, मूंग/चने या उरद की भुनी दाल, भुनी मूंगफली, भुने तिल, करीपत्ते, हरीमिर्च, दही/नीबू के साथ पिस कर गोरीचिट्टी बन गईं या रोस्टेड टमाटर, प्याज, सूखी लालमिर्च के साथ लाल हो लीं. फिर हींग, राई के छौंक से नजर उतरवाई. अदरक, तिल और रसीले टमाटरों की हौट हैदराबादी चटनी बन कर कलौंजी का छौंक लगवाया.

कोंकणा महाराष्ट्र में हरीमिर्च, प्याज, लहसुन के साथ थेचा बनीं. करेले तक से रिश्ता जोड़ा. सूखे नारियल, मेथीदाने, लहसुन, लालमिर्च, कोकम के साथ ड्राई कोकोनट चटनी बनीं. कच्छ के रण में कभी गाजर, पत्तागोभी और कसी हुई कच्ची आम्बा हलदी के साथ दहीकुचुंबर हुईं तो कभी अधपके कसे आम के साथ मीठा छुंदा. बेसन और खट्टी दही दोनों को कढ़ी बनने देने से पहले ले उड़ीं और गुजराती फाफड़ा चटनी बन गईं.

जहां एक तरफ बंगाल के जादू ने सिर पर सवार हो कर सरसों के तेल में पंचफोड़न के साथ अनन्नास, आमपापड़, किशमिश, कच्चे पपीते का अनारोशेर बना दिया वहीं असम, मिजोरम में उबले आलू, सूखी मछली, टमाटर संग जूकान माछोर चटनी बन लोगों को चटपटा जायका चखाया. इंजली और पान चटनी भी बन कर देखा. उत्तराखंड में जाड़ों के साने हुए नीबू की नकल की और दही के साथ कुचली मूली, नीबू, दाडि़म, तिल और भांग के भुने बीजों को भी चुपके से कूट लिया.

राजस्थान में लहसुनी चटनी बनीं और झरबेरी के साथ खूब घुटीं. रजवाड़ों की मेवों पगी नवरत्न चटनी बन कर राजसी भोज में शामिल हुईं.

हरियाणवियों ने उन्हें हरे चने, हरी मटर, पके अमरूद या आंवले की चटनी बनाया, तो हिमाचल वालों ने बेसन, पालक संग पथेड़ू चटनी. अमृतसर में कूंडीसोटे में दरड़ी, प्याज, पुदीने, मिर्च, अनारदाने, नमक के साथ कुटींघुटीं. कश्मीर पहुंचीं तो खुबानीआलूबुखारे या शफतालू की कश्मीरी चटनी बनीं.

फिर चलीं विदेश

स्वादवर्धक और पाचक अपने विशाल परिवार के अन्य सदस्यों से मिलने और नए फूड ट्रैंड्ज जानने के लिए मिस चटनी विदेश चलीं. अंडे की जर्दी, लहसुन पेस्ट, नीबू रस, औलिव औयल, मस्टर्ड पाउडर, नमक और लालमिर्च की फ्रैंच मेयोनीज सौस भारत में फूड क्राफ्ट इंस्टिट्यूट्स एक जमाने से बेसिक रशियन सलाद के साथ सर्व करवाते रहे हैं.

स्पेन में मिली क्रीम कलर की एयोली यानी मेयोनीज की पूर्वज यानी निरे औलिव औयल और दानेदार नमक के साथ अच्छी तरह घोटे हुए पिसे लहसुन की सौस. मेयोनीज को ब्लैंडर/प्रोसैसर में फेंट भी लो पर एयोली तो खरल में मूसल से ही घुटे.

इटली में पेस्टो से मुलाकात हुई. पेस्टो यानी पेस्ट यानी नर्म बेसिल की पत्तियों, घिसी लहसुन, चिलगोजों, औलिव औयल, भुरभुरी पारमेजन चीज, नमक और काली या सफेदमिर्च के साथ पिसी चटनी. चाहा तो नीबू का रस मिलाया और चिलगोजों के अलावा अखरोट या हरे पिस्ते भी साथ पीसे, ऊपर एक झीनी परत औलिव औयल की ओढ़ ली तो हवा से रंग बदलने का डर भी नहीं. 1-2 दिन फ्रिज में भी रह लीं. भारत में बेसिल की ताजा पत्तियां और पारमेजन चीज खोजनी पड़ेगी. ये सब चीजें न मिलीं तो हरीमिर्च, धनिए, पुदीने, करीपत्ते, हरी प्याजलहसुन की नरम पत्तियों, छिले बादाम के साथ पिस कर पेस्टो का नया अवतार लेंगी.

ग्रीस में त्जात्जीकी बनीं. खीरे को छील कर बीज निकाले और घिस कर पानी निचोड़ लिया. योगर्ट में खीरा, दानेदार नमक, पिसी काली/सफेद मिर्च, पिसे लहसुन, लैमन जेस्ट, नीबू रस और बारीक कटी ताजा हरी सोया की पत्तियों के साथ मिल कर कूलकूल हो गईं.

इन के परिवार का एक सदस्य बाबा गनूश बैंगन के बिहारी चोखे का मिडलईस्टर्न बिरादर निकला. चोखा क्या, घिसे लहसुन, नीबू रस, भुनेकुटे तिल, जीरे और औलिव औयल मिली और भुने चिलगोजों, कटी पार्सले, कटे औलिव से सजी भुने बैंगन के गूदे की चटनी. मिडलईस्ट में ही हुमुस दिखा यानी उबलेमसले काबुली चनों की चटनी. बारीकी सूझी तो छिलका उतार कर मसला. नीबू रस, घिसे लहसुन, औलिव औयल, नमक, पिसी लालमिर्च के साथ स्वादानुसार चटपटा किया. औलिव औयल की बूंदों पर कुछ उबले काबुली चने, चिलगोजे सजा कर चिप्स, क्रैकर्ज के साथ परोसा.

इन का मैक्सिकन रिश्तेदार गुआकामोले

जरा अलग था. नाशपाती की शक्ल के हरे/काले रंग के मोटे छिलके वाले ऐवोकाडो के अंदर का गूदा जैसे मक्खन, जिस में हरीमिर्च, धनिया, प्याज, लहसुन खूब बारीक काट कर नमक, कालीमिर्च व नीबू रस के साथ मिला कर चिप्स, क्रैकर्ज के साथ जल्दी खाने वाला वरना इन के काले होने का डर रहता है.

स्वदेश लौट कर मिस चटनी पुरानी कुटनी ढूंढ़ निकलवाएंगी और अब उन्हीं में कुटपिस कर लोट लगाएंगी. कई नए स्वरूप सोच कर स्वादवर्धक और पाचक मिस चटनी स्वदेश लौटी आईं. ताजा तोरी, हरे टमाटर को बेस बना कर देखेंगी. अनारदाने की चटनी में नीबू और नारंगी का जेस्ट मिलाएंगी. बारीक हरे सोए को पहचान दिलवाएंगी. चटनी के अलावा कभीकभी डिप भी कहलाना चाहेंगी.

इस बार जाड़ों में हरी मेथी, हरी मटर, हरे छोलिए, हरी प्याज, हरी लहसुन, हरे धनिएपुदीने के बिलकुल नरम पत्तों और हरीमिर्च के साथ सिर्फ नमक व नीबू के रस में पिस कर सिंधी पराठों या शामी कबाब की सोहबत करेंगी. बारीकी से उकता चली हैं. ‘पेजेंट फूड’ यानी ग्रामीण खानपान के मुताबिक थोड़ा रफ लुक अपनाना चाहती हैं जैसे साल्सा, रैलिश. सिलबट्टे पर पिसने का मजा ही अलग है.

आदिवासियों की इस बगावत को कुछ तरह भी समझे सरकार

‘देश में आजादी के इतिहास की बात होती है, तो कुछ लोगों की चर्चा बहुत होती है. कुछ लोगों की आवश्यकता से अधिक होती है, लेकिन आजादी में जंगलों में रहने वाले हमारे आदिवासियों का योगदान अप्रतीक था. वे जंगलों में रहते थे. बिरसा मुंडा का नाम तो शायद हमारे कानों में पड़ता है, लेकिन शायद कोई आदिवासी जिला ऐसा नहीं होगा, जहां 1857 से ले कर आजादी आने तक आदिवासियों ने जंग न की हो, बलिदान न दिया हो. आजादी क्या होती है, गुलामी के खिलाफ जंग क्या होती है, उन्होंने अपने बलिदान से बता दिया था.’ -नरेंद्र मोदी, 15 अगस्त, 2016.

भारत के प्रधानमंत्री ने यह बात लाल किले की प्राचीर से कही और सही बात कही, लेकिन एक बात जो उन की जबान पर आई, पर उन्होंने उसे दबा दिया और आदिवासियों की लड़ाई को आजादी तक ही सीमित कर दिया, वह लड़ाई अब भी जारी है, जिस का वर्तमान रूप माओवाद के नाम से जाना जाता है.

दरअसल, आदिवासी जनता देशीविदेशी पूंजीपतियों के रहमोकरम पर जिंदा नहीं रहना चाहती है और इस के लिए वह हर रोज जद्दोजेहद कर रही है.

नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में आदिवासी जनता के बलिदानों का जिक्र कर के अपनेआप को पहले की सरकारों से अलग दिखाने की कोशिश की थी, लेकिन उन की सरकार का पूरा रवैया पहले की सरकारों जैसा ही है.

आर्थिक नीतियों को और तेज रफ्तार से लागू करने के नाम पर आदिवासियों के जीने के साधनों जल, जंगल और जमीन को छीना जा रहा है.

इतना ही नहीं, ‘मेक इन इंडिया’ के नाम पर खनिजों को खानों से खोद कर देशीविदेशी लुटेरों को लूटने के लिए खुली छूट दी जा रही है. जंगल से लूटे गए माल को शहरों और विदेशों तक

में पहुंचाने के लिए जंगली इलाकों में 6 लाइन की सड़कें बनवाई जा रही हैं, समुद्री तटों पर बंदरगाह बनवाए जा रहे हैं. इस लूट के विरोध में आदिवासी खड़े हैं. कहीं माओवादी आंदोलन की अगुआई में वे हथियारबंद हैं, तो कहीं धरनाप्रदर्शन के द्वारा इस लूट को रोकना चाहते हैं. उन्हें कहींकहीं थोड़ीबहुत जीत भी मिल जाती है.

माओवादी इलाकों में सरकारों के कई साल पहले लिए गए फैसले लागू नहीं किए जा सके. जैसा कि बस्तर के लोहंडीगुडा में 2044 हैक्टेयर जमीन में बनने वाला टाटा का स्टील प्लांट 5 जून, 2005 से 4-5 नवीनीकरण के बावजूद 2016 में रद्द कर दिया गया. यही हाल दूसरे इकरारनामों का भी है.

सरकार आदिवासियों की जद्दोजेहद के चलते इन कंपनियों के लिए जमीन छीन नहीं पा रही है. आदिवासियों ने जिस तरह से अंगरेजों की गुलामी को नहीं स्वीकारा था, उसी तरह से वे देशीविदेशी पूंजीपतियों की गुलामी को स्वीकार नहीं करना चाहते हैं. वे अपनी आजादी को बचाए रखने के लिए अपने जीने के साधन जल, जंगल और जमीन पर हक चाहते हैं.

आदिवासी खुले में जीना चाहते हैं. इसी जिंदगी में उन को आजादी मिलती है. उन की आजादी और जीविका के साधनों को छीनने के लिए सरकार ने अर्द्धसैनिक बलों के जवानों को खुली

छूट दे रखी है कि आदिवासियों की हत्याबलात्कार करो, उन के घरों को लूटो.

इस विरोध को दबाने के लिए अंगरेजों की फूट डालो और राज करो की नीति के तहत साल 2004 में छत्तीसगढ़ में सलवाजुडूम चलाया गया, जिस में 650 गांव को जला दिया गया, औरतों से बलात्कार किए गए, सैकड़ों लोगों को मार दिया गया, लाखों लोग गांव छोड़ने पर मजबूर हुए, हजारों लोगों को उन के गांव से उठा कर कैंपों में रखा गया, जिस का खर्च टाटा और एस्सार जैसी कंपनियों ने उठाया.

सरकार द्वारा बनाई गई कमेटी का कहना है कि अमेरिका में कोलंबस के बाद जमीन हड़पने की सलवाजुडूम सब से बड़ी मुहिम थी.

तब गृह मंत्री रह चुके पी. चिदंबरम ने आदिवासी इलाकों में माओवादियों के सफाए के लिए आपरेशन ग्रीन हंट चलवाया था. तब आदिवासी इलाकों में एक जंग सी छिड़ गई थी.

अमीर की सेना द्वारा फर्जी मुठभेड़, गांवों में लूटपाट, बलात्कार बढ़ गए. मिशन 2016 के तहत बस्तर इलाके में 134 लोगों की हत्याएं की गईं. सोनी सोरी के गुप्तांग में पत्थर डालने वाले अफसर को साल 2013 में राष्ट्रपति द्वारा वीरता पुरस्कार से नवाज दिया गया. इसी तरह एसएसपी रहते हुए एसआरपी कल्लुरी को भी वीरता पुरस्कार दिया गया. 30 अक्तूबर, 2015 को नैशनल लैवल की औरतों का एक दल जगदलपुर और बीजापुर गया था.

इस दल ने रिपोर्ट दी कि 19-20 से 24 अक्तूबर, 2015 के बीच छत्तीसगढ़ के बासागुडा थाने के तहत चिन्न गेल्लूर, गुंडुम और बुड़गी चेरू गांवों में सुरक्षा बलों ने वहां की औरतों के साथ लैंगिक हिंसा और मारपीट की.

पेदा गेल्लूर और चिन्न गेल्लूर गांवों में ही कम से कम ऐसी 15 औरतें मिलीं, जिन के साथ लैंगिक हिंसा की वारदातें हुई थीं. इन में से 4 औरतें जांच दल के साथ बीजापुर आईं और कलक्टर, पुलिस कमिश्नर व ऐडिशनल पुलिस कमिश्नर के सामने अपने बयान दर्ज कराए.

इन औरतों के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था. पेट से हुई एक औरत के साथ नदी में ले जा कर कई बार सामूहिक बलात्कार किया गया. औरतों की छातियों को निचोड़ा गया, उन के कपड़े फाड़ दिए गए. मारपीट, बलात्कार के अलावा उन के घरों से रुपयापैसा लूटा गया. उन के चावल, दाल, सब्जी व जानवरों को खा लिया गया और जो बचा उसे साथ ले गए. घरों में तोड़फोड़ की गई और उन का सामान भी लूटा गया.

15 जनवरी, 2016 को मानवाधिकार संगठन के एक और समूह की टीम छत्तीसगढ़ गई थी. इस टीम का अनुभव भी अक्तूबर में गई टीम जैसा ही रहा था.

इस तरह की खबरें बड़े अखबारों की बड़ी सुर्खियां नहीं बन पाती हैं. राष्ट्रीय मीडिया में ऐसी खबरें तब आती हैं, जब बीजापुर के सरकिनागुडा जैसी घटना होती है, जिस में 17 गांव वालों, जिन में 6 बच्चे भी शामिल थे, को मौत की नींद सुला दिया जाता है.

ऐसी खबरों पर रायपुर से ले कर दिल्ली तक यह कह कर खुशियां मनाई जाती हैं कि बहादुर जवानों को बड़ी कामयाबी मिली है. नक्सलियों को मांद में घुस कर मारा, माओवादियों को धूल चटाई वगैरह.

झीरम घाटी या सुकमा जैसी बड़ी घटनाएं होती हैं, तो बड़े अखबारों में इन को कायराना हमला, माओवादियों की हताशा बताया जाता है, जबकि आदिवासी अपने वजूद को बचाने के लिए एकजुट हो कर लड़ रहे हैं, चाहे आप इन की जद्दोजेहद को जिस नाम से भी पुकारें.

शांति बहाली के लिए लोगों को उन का अधिकार देना पड़ेगा. राज व्यवस्था की जड़ में शोषण, उत्पीड़न और भ्रष्टाचार है. माओवाद उन्मूलन के नाम पर भी व्यवस्था भ्रष्टाचार करती है. जवानों के हथियार खरीदने से ले कर उन के खाने के सामान तक में कमीशन लिया जाता है और उन को खराब क्वालिटी का खाना और साजोसामान दिया जाता है. फर्जी माओवादी को आत्मसमर्पण कराने के बाद पैसा डकार लिया जाता है.

सरकार भूल जाती है कि जनता टैक्स इसलिए देती है, ताकि वह लोगों को सिक्योरिटी दे और शांति बनाए रखे. कोई भी इनसानों के बहने वाले खून पर खुशी नहीं मना सकता. यहां तक कि माओवादी भी मानते हैं कि जवान उन के दुश्मन नहीं हैं. वे कहते हैं कि सैनिकों पर की गई कार्यवाही को जवाबी हमले के रूप में देखना चाहिए.

जो जवान मारे गए हैं, वे सड़क बनाने से जुड़ी सिक्योरिटी में लगे हुए थे. मारे गए जवानों को इस सड़क से कोई फायदा नहीं होने वाला था. ये जवान गरीब परिवारों से आते हैं और उन का परिवार जिस जगह पर रहता है, उन के यहां भी ऐसी सड़कें नहीं होंगी. उन के परिवारों को टूटेफूटे रास्तों से ही अस्पताल व स्कूलकालेज जाना पड़ता होगा. लेकिन छत्तीसगढ़ के दूरदराज इलाकों में भी अच्छी सड़कों को बनाया जा रहा है, ताकि पूंजीपतियों द्वारा वहां की प्राकृतिक संपदा को लूट कर ले जाया जा सके. इन्हीं लूटों में से कुछ हिस्सा पा कर शासक वर्ग उन की सिक्योरिटी करने के लिए इन जवानों को वहां भेजता है, जिस का विरोध वहां की जनता कर रही है.

माओवादियों का कहना है कि वे हिंसावादी नहीं हैं, लेकिन सामंती ताकतों, देशीविदेशी कारपोरेट घरानों की नुमाइंदगी करने वाली सरकारों द्वारा

हर पल की जा रही हिंसा के जवाब में वे भी हिंसा को अंजाम देने के लिए मजबूर हैं.

रायपुर की डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे ने अपनी फेसबुक वाल पर लिखा है, ‘हम सभी को अपने गरीबान में झांकना चाहिए, सचाई खुद ब खुद सामने आ जाएगी. इस घटना में दोनों तरफ से मरने वाले अपने देशवासी हैं, इसलिए कोई भी मरे, तकलीफ हम सब को होती है. लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था को आदिवासी इलाकों में जबरदस्ती लागू करवाना, उन को जल, जंगल और जमीन से बेदखल करने के लिए गांव का गांव जला देना, आदिवासी औरतों के साथ बलात्कार करना, आदिवासी औरतें नक्सली हैं या नहीं, इस का प्रमाणपत्र देने के लिए उन की छाती को निचोड़ कर देखा जाता है.

‘टाइगर प्रोजैक्ट के नाम पर आदिवासियों को जल, जंगल और जमीन से बेदखल करने की रणनीति बनती है, जबकि संविधान की 5वीं अनुसूची में शामिल होने के चलते सरकार को कोई हक नहीं बनता आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन को हड़पने का. आखिर यह सबकुछ क्यों हो रहा है  सच तो यह है कि सारे प्राकृतिक खनिज संसाधन इन्हीं जंगलों में हैं, जिन्हें उद्योगपतियों और पूंजीपतियों को बेचने के लिए खाली करवाना है. आदिवासी जल, जंगल और जमीन खाली नहीं करेंगे, क्योंकि यह उन की मातृभूमि है.’

इस समस्या का समाधान सैनिक हल नहीं है. अभी तक की सरकारी रिपोर्ट बताती है कि नक्सलवाद की वजह सामाजिक व आर्थिक समस्या है.

मारे गए जवान सौरभ के पिता की बातों पर ध्यान देना होगा, जो सुझाव देते हैं कि सरकार ठंडे दिमाग से बातचीत के जरीए इस मसले का हल निकाले. नक्सलियों को मुख्यधारा में लाए, उन्हें काम दे, उन के बालबच्चों को पढ़ाए.

लोगों को काम मिलेगा, तो नक्सली नहीं पैदा होंगे. अगर शांति लानी है, तो इस समस्या का हल दमन से नहीं, राजनीतिक बातचीत से निकलेगा, नहीं तो धरती खून से लाल होती रहेगी, देशवासी मरते रहेंगे, जेलों में लोग सड़ते रहेंगे और लोग गुलाम सरीखी जिंदगी जीने को मजबूर रहेंगे और यह जंग यों ही चलती रहेगी.

उत्तर प्रदेश में आधी आबादी शराब के खिलाफ, ठेकों का विरोध जारी

देश के सब से बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के कई हिस्से इन दिनों शराब के खिलाफ आंदोलन के चलते सुर्खियों में हैं. वहां के तकरीबन 3 दर्जन जिलों में शराब के ठेकों का विरोध जारी है.

विरोध की यह आवाज आधी आबादी यानी औरतों की है. जाहिर है, शराबखोरी से सब से ज्यादा पीडि़त भी वे ही होती हैं. घर के कमाऊ सदस्य जब दिनरात हाड़तोड़ मेहनत से हासिल कमाई शराब ठेकों के हवाले कर देते हैं, तो परिवार के पेट पालने की चुनौती औरतों को ही झेलनी पड़ती है. आबादी के बीच बने शराब के ठेकों ने औरतों और लड़कियों का राह चलना दूभर कर रखा है, सो अलग.

कानपुर में यह सब देख कर मैं भी बहुत दुखी हुआ. वजह, मेरे महल्ले में रहने वाले और मुझ से तकरीबन 15 साल छोटे ओमप्रकाश उर्फ बउवा की शराबखोरी. सुबह 6 बजे जब मैं दूध लेने निकला, तो देखा कि महल्ले में मौजूद शराब ठेके के बाहर वह नशे में धुत्त था. उस ने मुझ से 20 रुपए मांगे. मैं ने बिना संकोच किए पैसे दे दिए. दोपहर बाद वह मेरे घर आया और उस ने

50 रुपए मांगे. मैं ने मना किया, तो बोला, ‘‘बिना 2 क्वार्टर अंदर किए मुझे कुछ समझ नहीं आता.’’

बउवा घरों में पुताईपेंटिंग का काम करता था. वह अच्छा कारीगर और बहुत मेहनती था. वह रोजाना 5-7 सौ रुपए कमाता था. अकेली बीमार मां को बेसहारा छोड़ उस ने खुद को शराब के हवाले कर दिया. इस तरह गरीब परिवारों को तबाह कर रही है शराब.

उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ सालों में शराब ठेकों की तादाद बेहिसाब बढ़ी है. सवा किलोमीटर के दायरे में 3-4 शराब के ठेके आसानी से देखे जा सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट द्वारा नैशनल हाईवे व स्टेट हाईवे पर बने शराब के ठेके 5 सौ मीटर दूर भेजने संबंधी आदेश के बाद भी राज्य सरकार ने उन्हें आबादी के बीच शिफ्ट कर दिया.

दुख की बात है कि सुप्रीम कोर्ट की इस जनहितकारी मंशा के खिलाफ दांवपेंच आजमाए जा रहे हैं, जो देशभर में सड़क हादसों में घायल लोगों की बढ़ती तादाद के मद्देनजर एक फैसले के रूप में सामने आई है.

शराब पी कर गाड़ी चलाने, अपनी और दूसरों की मौत की वजह बनने की सोच पर रोक लगाने के मकसद से नैशनलस्टेट हाईवे पर शराब के ठेके को हटाने का फैसला अमान्य बनाने की ऐसी ओछी कोशिश आखिर किस लिहाज से ठीक है   यह मजाक नहीं तो और क्या है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अमल करने के लिए उत्तर प्रदेश समेत देश के कई राज्यों ने अपने यहां के स्टेट हाईवे को शहरी रोड ऐलान करनेकराने की कोशिश शुरू कर दी है.

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और पंजाब इस दौड़ में फिलहाल आगे हैं. असम, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, गोवा, झारखंड, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल और हरियाणा भी कतार में हैं यानी इन राज्यों की सरकारें जनहित में हजारों करोड़ रुपए के राजस्व का नुकसान उठाने के मूड में नहीं हैं.

अफसोस यह कि एक साल पहले बिहार सरकार द्वारा लिया गया शराबबंदी का फैसला देश के लिए नजीर नहीं बन पाया. यह कहना कतई गलत नहीं होगा कि काबिलेतारीफ है नीतीश कुमार का हौसला. यानी अगर सरकार चाहे तो कुछ भी मुमकिन नहीं है.

बिहार सरकार के मुखिया नीतीश कुमार ने 1 अप्रैल, 2016 से राज्य में पूरी तरह से शराबबंदी लागू कर दी. सरकार के तेवर देख शासनप्रशासन ने भी सख्ती अख्तियार कर ली. छापेमारी हुई, सामूहिक जुर्माना हुआ. हां, गोपालगंज हादसे ने ठेस जरूर पहुंचाई. लेकिन, वहां शराबबंदी किसी हद तक गरीबों की झोली में खुशियां डालने में कामयाब रही.

बकौल सुप्रीम कोर्ट, नेशनलस्टेट हाईवे पर शराब बेचे जाने के नुकसानदेह पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. जीवन के अधिकार और रोजगार के मौलिक अधिकार के बीच तालमेल बनाने पर जोर देते हुए अदालत ने कहा कि एक तरफ लोगों को शराब पी कर गाड़ी चलाने वालों से बचाने की जरूरत है, तो दूसरी तरफ शराब कारोबार के व्यापारिक हित हैं. लेकिन दूसरा हित पहले के बाद आएगा यानी पहले जीवन का अधिकार और उस के बाद रोजगार का अधिकार.

अदालत ने यह भी साफ किया कि उस ने यह आदेश दे कर न तो किसी नियम का उल्लंघन किया है और न ही कानून बनाने की कोशिश की है, बल्कि जनस्वास्थ्य और सुरक्षा के मद्देनजर ऐसा किया गया है.

दरअसल, शराबखोरी से कहीं बड़ी समस्या यह है कि हमारे देश में शराब के बनाने और उस की मार्केटिंग के लिए कोई राष्ट्रीय नीति नहीं है. सबकुछ राज्यों के जिम्मे छोड़ दिया गया है. राज्यों में काबिज सरकारें अपने राजनीतिक नफानुकसान के मद्देनजर मनमाने फैसले लेती रही हैं.

आबकारी नीति को राज्य सरकारों का मसला बनाने का नतीजा यह है कि जिसे जो समझ में आ रहा है, वह उसे अंजाम दे रहा है. शराब कैसे बिके, कहां बिके, कितनी कीमत पर बिके, कब बिके और कब न बिके, इस बाबत हर राज्य में अलगअलग इंतजाम हैं.

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में लाख कमियों के बावजूद दोपहर 12 बजे से रात 10 बजे तक शराब बेचने और बंदी के दिन असल बंदी का सख्त प्रावधान है, जबकि उत्तर प्रदेश में न समय का प्रावधान है और न कीमत का. आलम यह कि आप 15 अगस्त, 26 जनवरी, होली और दीवाली के दिन भी बेहिचक खुलेआम शराब खरीद सकते हैं.

कोढ़ में खाज पैदा कर रहा है शराब के ठेकों में बैठ कर पीने का इंतजाम. ज्यादातर शराब ठेकों की अपनी कैंटीन हैं, जिसे दबंग किस्म के लोग चलाते हैं. ठेकेदार को 5-7 सौ रुपए रोजाना किराया देने वाले कैंटीन संचालक माल बेचने से ज्यादा पियक्कड़ों को लूटने का काम करते हैं.

पुलिस भी सबकुछ जान कर अनजान बनी रहती है, क्योंकि पीडि़त आखिर शराबी जो ठहरा. हर थानेदार व बीट इंचार्ज को पता है कि उस के इलाके में शराब ठेकों के हालात क्या हैं, लेकिन उसे सिर्फ महीने के फिक्स नजराने से मतलब है, जनता जाए भाड़ में.

जहरीली और नकली शराब के लिए भी उत्तर प्रदेश खासा बदनाम रहा है. साल 2015 के मार्च महीने में राजधानी लखनऊ के मलिहाबाद इलाके में

50, फिर एटा जिले के अलीगंज कसबे में 39 और उस के बाद फर्रुखाबाद के मेरापुर थाने के तहत आने वाले गांव देवरा मेहसोना में 10 लोग जहरीली शराब पीने से मर गए. इस से पहले उन्नाव में जहरीली शराब पीने से तकरीबन 3 दर्जन लोग मौत के मुंह में समा गए थे.

एक तरफ आबकारी महकमा है, वहीं दूसरी तरफ मद्य निषेघ महकमा. दोनों के पास लंबाचौड़ा अमला है, मोटीमोटी तनख्वाहें हैं, सुविधा शुल्क तो बहती हुई गंगा है. लेकिन, बाहर कौन से नियम टूट रहे हैं, इस से उन्हें कुछ लेनादेना नहीं है.

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