Download App

संजय लीला भंसाली संग फिल्म नहीं करेंगी प्रियंका चोपड़ा

संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘‘बाजीराव मस्तानी’’ के बाद से संजय लीला भंसाली और इस फिल्म से जुड़े तीनों कलाकारों के करियर में न सिर्फ गतिरोध आया हुआ है, बल्कि इनके बीच संबंध भी आगे बढ़ नहीं पा रहे हैं. संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ भी बीच में अटकी हुई है. तो वहीं संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘‘गुस्ताखियां’’ का निर्माण भी शुरू नहीं हो पा रहा है.

फिल्म ‘‘बाजीराव मस्तानी’’ के प्रदर्शन से पहले ही संजय लीला भंसाली ने अमृता प्रीतम और साहिर लुधियानवी की प्रेम कहानी पर आधारित फिल्म ‘‘गुस्ताखियां’’ के निर्माण की घोषणा की थी. उस वक्त इस फिल्म में प्रियंका चोपड़ा और इरफान खान अभिनय कर रहे थे. मगर यह फिल्म शुरू नहीं हो पायी.

‘बाजीराव मस्तानी’ के प्रदर्शन के बाद कई तरह की मुसीबतों को हल करते हुए किसी तरह संजय लीला भंसाली ने अपनी फिल्म ‘पद्मावती’ शुरू की और इधर इरफान खान ने फिल्म ‘‘गुस्ताखियां’’ से खुद को अलग कर लिया. फिर खबर आयी कि अब फिल्म ‘‘गुस्ताखियां’’ में अभिनय करने के साथ ही प्रियंका चोपड़ा इसका सह निर्माण करेंगी.

कुछ दिनों पहले जब प्रियंका चोपड़ा अचानक अमरीका से भारत वापस आयीं, तो बौलीवुड में चर्चाएं गर्म हुईं कि प्रियंका चोपड़ा चाहती हैं कि फिल्म ‘गुस्ताखियां’ का निर्माण तुरंत शुरू हो. इसलिए इस बार वह खुद फिल्म में साहिर लुधियानवी का किरदार निभाने के लिए हीरो का चयन करेंगी. इससे लोगों को उम्मीद बंधी थी कि फिल्म ‘‘गुस्ताखियां’’ शुरू हो जाएगी. लेकिन ऐसा कुछ होने की संभावनाएं नजर नहीं आ रही है.

बौलीवुड के साथ साथ संजय लीला भंसाली के अति नजदीकी सूत्रों पर यकीन किया जाए, तो फिल्म ‘‘गुस्ताखियां’’ में साहिर लुधियानवी के किरदार को निभाने के लिए अभिषेक बच्चन के नाम पर मुहर लग गयी है, मगर इस फिल्म से प्रियंका चोपड़ा ने अपने सभी संबंध खत्म कर लिए हैं. यानी कि वह इस फिल्म का सह निर्माण नहीं करेंगी और इसमें अभिनय भी नहीं करेंगी.

सूत्रों के अनुसार अब संजय लीला भंसाली के सामने सबसे बड़ी समस्या अभिषेक बच्चन के समक्ष हीरोईन यानी कि अमृत प्रीतम के किरदार को निभाने वाली अभिनेत्री के चयन की. जब तक फिम को हीरोईन नहीं मिल जाती, तब तक इस फिल्म का भविष्य अंधकार में ही रहेगा.

सेजल शर्मा के पैर अब जमीन पर नहीं पड़ रहे, जानें क्या है वजह

वीर दास के साथ फिल्म ‘‘31 अक्टूबर’’ में अभिनय कर चर्चा बटोर चुकी अदाकारा सेजल शर्मा के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे हैं. क्योंकि उन्हे अपने समय की स्टार अदाकारा रहीं जीनत अमान और जरीना वहाब के साथ युवराज पराशर निर्मित और कपिल कौस्तुभ शर्मा निर्देशित वेब सीरीज ‘‘लव लाइफ एंड स्क्रू अप सीजन 2’’ में अभिनय करने का अवसर जो मिल गया है.

जीनत अमान व जरीना वहाब के साथ शूटिंग कर सेजल शर्मा काफी उत्साहित है. वह इस बात की चर्चा सोशल मीडिया पर भी कर रही हैं. सेजल शर्मा का मानना है कि जरीना वहाब व जीनत अमान के साथ अभिनय कर उनका एक बहुत बड़ा सपना पूरा हो गया. ‘‘सरिता’’पत्रिका से बात करते हुए सेजल शर्मा ने कहा- ‘‘मेरा सिर्फ एक सपना ही नहीं पूरा हुआ, बल्कि मेरे लिए गर्व की बात है कि मुझे जीनत अमान व जरीना वहाब के साथ काम करने का अवसर मिला. उनके साथ काम कर मैने बहुत कुछ सीखा.’’

बच्चियों से बलात्कार के मुद्दे पर समाज इतना बेबस क्यों

47 साल का एक अधेड़ व्यक्ति 4 साल की मासूम बच्ची को चौकलेट दिलाने के बहाने साइकिल पर बैठा कर ले जाए और फिर उस का बलात्कार कर के सुबूत मिटाने के लिए पत्थरों से सिर कुचलकुचल कर उसे मार दे, इस से ज्यादा वहशीपन नहीं हो सकता. पर यौनपिपासा इतनी ज्यादा बेकाबू हो जाती है कि यह खुलेआम होता है और जिन्हें हिंसक, क्रूर, अशिक्षित नहीं कहा जा सकता, उन के द्वारा होता है.

पीड़ित बच्ची उस वहशी के मित्र की बेटी थी, जिसे वह चाचाचाचा कहती होगी. उसी ने यौनपिपासा बुझाने के लिए उस का पहले बलात्कार किया और फिर इस डर से कि वह शिकायत न कर दे, पत्थरों से मारमार कर उस की हत्या कर दी.

इस से भी बड़े दुख की बात तो यह है कि इस पर भी वह खुद को शरीफ समझने की भूल करता रहा और अपनी मृत्युदंड की सजा को माफ कराने के लिए जेल के बरताव, जिस में इंदिरा गांधी ओपन विश्वविद्यालय से परीक्षा में बैठना और ड्राइंग कंपिटिशन में हिस्सा लेना शामिल है का हवाला दिया गया. यानी अपराधी इतने घृणित काम के बाद भी सूली पर चढ़ने से बचने की भरसक कोशिश ही कर रहा था.

लगभग 8 साल बाद उस की आखिरी अपील ठुकराई गई पर उसे मृत्युदंड कब मिलेगा यह तय नहीं है और हो सकता है कि उस में भी 4-5 साल लग जाएं.

जो लोग मांग करते हैं कि बलात्कार के अपराधी को तुरंत सजा दी जाए उन्हें सबक सीखना चाहिए कि कानून का पहिया अगर सही चले तो भी दंड मिलने में कई साल लग जाते हैं. आमतौर पर अपराधी जेल जाने पर समझ जाते हैं कि अदालतों में अपराध साबित करने वाले पुलिस वालों व उन के वकीलों की चूक का अकसर उन्हें लाभ मिल जाता है.

अपराधी सैशन कोर्ट के बाद हाई कोर्ट, सिंगल जज हाई कोर्ट के बाद डिविजन बैंच और हाई कोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट व कई बार सुप्रीम कोर्ट के आदेश की रिव्यू पिटिशन दायर करते रहते हैं और अपराध करने के बावजूद खुद को बेगुनाह सिद्ध करने में लगे रहते हैं. इस मामले में महाराष्ट्र के अपराधी वसंत संपत दुपरे के परिवार के पास इतनी अपीलों के लिए पैसा कहां से आया होगा यह तो नहीं मालूम, क्योंकि अपराध करने के दिन वह साइकिल पर ही मासूम बच्ची को ले गया था पर इतना साफ है कि इस तरह का अमानवीय अपराध करने के बाद भी अपराधी का परिवार उसे बचाने में वर्षों लगा रहा.

न्याय में देरी एक वजह है पर इस से भी ज्यादा बड़ी वजह समाज में अपराधी को रहने की जगह मिल जाना है. चाहे निर्भया कांड जैसा बहुचर्चित मामला हो या निठारी का सीरियल किलिंग का, अपराधी आम पीडि़त की तरह कानूनी सुरक्षा पा जाता है. कई बार यदि पीडि़ता जिंदा रह जाए, तो उस का डराधमका कर या पैसा दे कर मुंह बंद कर दिया जाता है, क्योंकि अदालतों में लगने वाले समय का दुरुपयोग गवाहों का मुंह बंद करने और पीडि़ता से ‘फैसला’ करने में करा जाता है.

बलात्कार, खासतौर पर मासूमों से, किसी तरह माफ करने लायक नहीं. यह तो शायद पाश्विक भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि पशुओं में भी ऐसा नहीं होता पर समाज की बेबसी का हाल यह है कि कागजों के पन्नों पर चाहे जितना चिल्ला लो, अंतत: जीत तरकीब वालों की ही होती है. वसंत संपत दुपरे के मामले में मृत्युदंड तो मिला, जेल मिली पर आखिरी सजा से पहले 8-10 साल तो मिल ही गए. बहुत सी गंभीर बीमारियां भी इतना समय नहीं देतीं.

नालों पर बस्तियां : कोई बताएगा आखिर ये कैसी तरक्की है

उत्तर प्रदेश राज्य की राजधानी लखनऊ में हर शहर की तरह कई गंदे नाले हैं, जिन के किनारे पीढ़ियों से लोग रह रहे हैं. हैदर कैनाल और कुकरैल नहर के किनारे रहने वालों को देखने से पता चलता है कि गंदे नालों के किनारे बने जिन मकानों को घर कहते हैं, वे केवल छत और दीवारों से घिरे होते हैं. बरसात का मौसम सब से खराब होता है.

इन घरों में रहने वाले लोग अपनी जेब के हिसाब से घर को सजाते हैं. ज्यादातर लोग कपड़े के परदे डालते हैं. ऐसे नालों से कुछ सौ मीटर से भी कम की दूरी पर पौश बाजार और रिहायशी मकान होते हैं, जो पूरी तरह चमकदमक से भरपूर होते हैं.

हैदर कैनाल के किनारे से कुछ दूर बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती का दफ्तर है, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भी दफ्तर है और राज्यपाल का राजभवन बना है.

सत्ता के गलियारे से इतना करीब होने के बाद भी लोग नाले के किनारे रहने को मजबूर हैं. आम घरों के लोग जहां खड़ा होना भी पसंद नहीं करते हैं, वहां ये लोग पीढि़यां गुजार देते हैं.

किसी भी घर में प्लास्टर नहीं है. कई घरों में खिड़की के लिए जगह जरूर छोड़ी गई है, जिस से हवा और रोशनी आती रहे, पर उस में दरवाजे नहीं लगे हैं. मकान एकमंजिला और दोमंजिला  दोनों ही तरह के बने हैं.

ज्यादातर मकान नाले के किनारे सीमेंट के खंभे दे कर बनाए गए हैं. नीचे के मकानों में बदबूदार सीलन रहती है. शौचालय में भी घर की तरह केवल दीवार और छत ही होती है. कई घरों में शौचालय होता ही नहीं है. लोग नाले के किनारे ही शौच के लिए जाते हैं.

इन घरों की औरतें देर शाम या जल्दी सुबह लोगों के जागने से पहले ही शौच कर लेती हैं. जिन घरों में शौचालय बने भी हैं, उन में भी दरवाजा नहीं होता. टाट की पट्टी या फिर कपड़े का परदा डाल कर काम चलाया जाता है.

यहां रहने वाले ज्यादातर गरीब तबके के लोग होते हैं. इन में मुसलिम, हिंदू सभी धर्मों के लोग शामिल हैं. बहुत से घरों में बंगलादेशी और नेपाली मूल के लोग भी हैं.

कई परिवारों की तो दूसरी पीढ़ी यहां रह रही हैं. गंदे नाले पर बने इन्हींघर में इन के शादीब्याह समेत दूसरी तमाम रस्में पूरी होती हैं.

गरीबों का नरक

नालों के किनारे रहने वालों में ज्यादातर लोग शराब और दूसरे किस्म के नशे के शिकार होते हैं और जुआ खेल कर अपना समय बिताते हैं.

कई घरों के बच्चे जब छोटे होते हैं, तो स्कूल में पढ़ने भी जाते हैं, पर कमाई करने लायक होते ही वे स्कूल छोड़ कर कामधंधे पर लग जाते हैं.

लड़के और लड़कियों दोनों की ही कम उम्र में शादी कर दी जाती है. कम उम्र में मां बनने से जच्चाबच्चा की जान जाने का खतरा बना रहता है. सब से ज्यादा बीमारियां गंदगी से होती हैं.

ऐसे घरों में रसोईघर के नाम पर प्लास्टिक और स्टील के डब्बों में भरा कुछ सामान, बरतन और गैस के चूल्हे होते हैं, जो 5 किलोग्राम वाली गैस से चलते हैं.

कम घरों में गैस का कनैक्शन है. यहां के घरों में पानी के कम, बल्कि बिजली के कनैक्शन ज्यादा होते हैं. ज्यादातर काम जुगाड़ से चलता है.

अब बहुत ही कम घरों में खाना बनाने के लिए लकड़ी के चूल्हे या मिट्टी के तेल से चलने वाले स्टोव का इस्तेमाल होता है. जिन के घर ईंट के नहीं बने होते, वे लोग छप्पर पर प्लास्टिक की बड़ी शीट डाल कर अपने लिए छत बना लेते हैं.

मनोरंजन के लिए टैलीविजन और रेडियो सभी घरों में मिल जाता है. शुरुआत में लोग छप्पर डाल कर रहते हैं, बाद में धीरेधीरे पक्का मकान बनाने में लग जाते हैं.

पहले नाले के किनारे कहींकहीं लोग घर बना कर रहते थे, पर अब पूरे नाले के किनारे कम ही खाली जगह दिखती है, जहां रहने वाले न हों.

ज्यादातर लोगों के पास वोटर कार्ड हैं. वे वोट डालते हैं. अब वे यहां के स्थायी निवासी हो गए हैं. एकसाथ रहने के बाद भी इन में आपस में लड़ाईझगड़ा भी खूब होता है. इस की खास वजह एकदूसरे के साथ सैक्स संबंध होते हैं. सोने से ले कर नहाने तक के लिए लोगों के पास जगह की कमी होती है. ऐसे में बहुतकुछ परदे में नहीं रह पाता है.

सालों से एकसाथ रहने के बाद भी ये लोग अपनी बातें दूसरों को बताने में संकोच महसूस करते हैं. इन्हें डर होता है कि कहीं इन से रहने की यह जगह खाली न करा ली जाए.

ऐसे में ये लोग किसी न किसी लोकल नेता का हाथ पकड़ कर रखते हैं, जो इन की मदद करता है. नेता ही इन के वोटर कार्ड बनवा देते हैं, जिस के बाद ये यहां रहने के हकदार हो जाते हैं.

जब कभी कोई सरकार इन को नाले के किनारे से हटाने की बात करती है, तो लोकल नेता इस का विरोध करते हैं.

गंदे पानी के नाले हर शहर में होते हैं. इन का काम बरसात के पानी को शहर से बाहर ले जाना होता है. इन को गंदा नाला इसलिए कहते हैं, क्योंकि ये शहर के सीवर के पानी को भी बाहर ले जाते हैं.

जब शहरों का बहुत विकास नहीं हुआ था, गरीबी का लैवल ज्यादा था, ऐसे नालों के किनारे बसने वालों की तादाद कम होती थी. जैसेजैसे शहरों का विकास हो रहा है, वैसेवैसे अमीरी का लैवल बढ़ रहा है. देश में सामाजिक तरक्की हो रही है. ऐसे गंदे नालों के किनारे रहने वालों की तादाद भी बढ़ती जा रही है.

पहले जहां झोंपड़पट्टी होती थी, अब वहां पक्के मकान बन गए हैं. गंदे नाले पर कब्जा कर के बने ऐसे मकान दोहरी परेशानी झेलते हैं.

यहां बने मकानों के नीचे या आसपास बदबूदार पानी बहता रहता है, जिस में मक्खी, मच्छर और तमाम तरह के कीड़े रहते हैं, जो सेहत के लिए काफी खतरनाक होते हैं.

गंदे नालों के किनारे मकान बनने से नाले में बरसात और सीवर का पानी बहने में परेशानी होती है, जिस से शहर के बाकी हिस्सों में पानी जमा होता है.

देश के तकरीबन हर बड़े शहर की यही कहानी है. उत्तर प्रदेश, दिल्ली, मध्य प्रदेश, बिहार, मुंबई जैसे इलाकों में जहां आबादी का बोझ ज्यादा है, वहां यह परेशानी ज्यादा है.

गंदे नाले की कहानी को समझने के लिए लखनऊ की हैदर कैनाल को समझना जरूरी है.

लखनऊ के अलावा बाकी शहरों की कहानी भी बहुत मिलतीजुलती है. हैदर कैनाल राजाजीपुरम से चल कर कालीदास मार्ग से होते हुए गोमती नदी में मिलती है. यह तकरीबन 17 किलोमीटर लंबी है. इस की चौड़ाई 40 मीटर से 70 मीटर के बीच है.

पहले लखनऊ के बरसाती पानी और सीवर को इस के जरीए ही बाहर ले जाया जाता था. उस समय इस का नाम हैदर कैनाल था. इस में केवल बरसात का पानी बहता था. कुछ समय बाद इस में सीवर का गंदा पानी भी बहने लगा. तब से हैदर कैनाल की जगह यह ‘गंदा नाला’ के नाम से जाना जाने लगा.

गंदे पानी का नाला होने के बाद भी लोगों ने इस के किनारे बसना शुरू कर दिया. अब पूरे नाले के किनारे मकान, दुकान और गैराज वगैरह बन गए हैं.

बढ़ रही है आबादी

 हैदर कैनाल पर किए गए कब्जे को हटाने के लिए साल 1998 में एक योजना तैयार की गई थी. कब्जा न हो, इस के लिए उस पर सड़क बनाने का प्रस्ताव रखा गया, जिस से शहर का आवागमन आसान हो जाए और सड़क के नीचे पानी भी बहता रहे.

चारबाग से कालीदास मार्ग तक तकरीबन 9 किलोमीटर लंबी सड़क बनाने के लिए मायावती सरकार ने 6 सौ करोड़ रुपए का भारीभरकम बजट तैयार किया था.

हैदर कैनाल के किनारे तकरीबन 3 लाख लोग बसे हैं. इन को हटाना किसी भी सरकार के लिए बहुत मुश्किल काम है. ऐसे में मायावती सरकार ने हैदर कैनाल पर सदर से लाल बहादुर शास्त्री मार्ग तक तकरीबन 8 सौ मीटर लंबे नाले पर ही सड़क बनाने का काम किया.

मायावती के लिए मजबूरी यह थी कि यहीं पास में उन की पार्टी का प्रदेश हैडक्वार्टर है. उस के आसपास राजभवन और मुख्यमंत्री सचिवालय भी है.

हैदर कैनाल के बाकी हिस्से पर बसे लोगों को हटाने की हिम्मत किसी सरकार में नहीं हुई. हाल ही में उत्तर प्रदेश में जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी, तो एक बार फिर से हैदर कैनाल के ऊपर से कब्जा हटाने की बात होने लगी है.

दरअसल, योगी आदित्यनाथ की सरकार में उपमुख्यमंत्री बने डाक्टर दिनेश शर्मा पहले लखनऊ के मेयर थे. वे लखनऊ की परेशानियों से रूबरू थे. ऐसे में वे हैदर कैनाल पर से गैरकानूनी कब्जा हटाने की मुहिम में शामिल हो गए.

डाक्टर दिनेश शर्मा ने कहा कि नालों के ऊपर बने मकानों को हटाया जाएगा.  लखनऊ में यह परेशानी केवल हैदर कैनाल के सामने ही नहीं है, बल्कि बहुत सारे दूसरे नालों के किनारे भी लोग बस गए हैं. इन की तादाद कम होने के बजाय बढ़ने लगी है.

मजबूरी है बसना

आज भी देश में ऐसे लोगों की तादाद बहुत ज्यादा है, जिन के पास रहने को घर नहीं हैं. ये लोग ऐसी गंदी जगहों पर ही रहने को मजबूर हैं. शहरों में कामधंधे और रोजगार के लिए आने वाले बहुत से लोगों के पास इतना पैसा नहीं होता कि वे अच्छे मकान बना कर रह सकें.

शहरों में नंबर एक तो जमीन है ही नहीं. जहां है, वहां बहुत महंगी है. जिसे खरीद पाना हर किसी के लिए मुमकिन नहीं है.

शहर से दूर बसना ऐसे लोगों के लिए महंगा साबित होता है. ऐसे में ये लोग शहर के अंदर बहने वाले नालों के किनारे रहना शुरू कर देते हैं.

गंदे नाले के किनारे बसना बहुत ही मजबूरी का सौदा होता है. वहां रहने वाले लोगों की औसत उम्र साफ जगहों पर रहने वालों से कम होती है.

इतना ही नहीं, वे ज्यादा बीमार भी पड़ते हैं, क्योंकि साफसफाई नहीं होती. शरीर से भी कमजोर रहते हैं. यहां तक कि समय से पहले ही मौत का शिकार हो जाते हैं.

नाकाम स्वच्छता मिशन

 ऐसे लोगों के लिए साफसफाई से जुड़े मिशन बेकार की बातें होती हैं. नाले पर रहने वाले अपनी मरजी से वहां नहीं रहते, बल्कि यह उन की मजबूरी होती है.

सरकारों को ये बातें समझ नहीं आतीं. हर सरकार यह बताती है कि उस ने इतने मकान बना दिए, पर किसी सरकार ने यह नहीं बताया कि उस के समय में गंदे नाले पर रहने वालों की तादाद कितनी ज्यादा हो गई.

शहर की गरीबी और लाचारी को देखना है, तो उस शहर के गंदे नाले और उस के किनारे बसे लोगों और बस्तियों को देखना होगा.

लेकिन दुख की बात यह है कि हर सरकार यह कहती है कि गंदे नाले पर बसे लोगों को वहां से हटा दिया जाएगा, लेकिन कोई भी सरकार यह नहीं कहती कि ऐसे लोगों के लिए कहां घर बनाए जाएंगे.

सरकार की आवास योजनाएं महंगी हैं और रिश्वतखोरी से भरी होती हैं. ऐसे में बहुत से ऐलान के बाद भी गरीबों को रहने के लिए मकान नहीं मिलते.

सरकारी मकान लेने के लिए कम से कम 3 लाख से 8 लाख रुपए खर्च करने होते हैं. इस के बाद भी सरकार ऐसे मकान नहीं बना पाती, जिस से हर जरूरतमंद को घर मिल सके.

जब तक शहरों में रहने के लिए आवास नहीं मिलेंगे, तब तक सामाजिक तरक्की की बातें बेमानी हैं. गंदे नालों पर बसने वाला तबका सरकार के चमकते दावों की पोल खोलता है.

समाज का एक बड़ा हिस्सा ऐसी जगहों पर रह रहा है, जहां पर खड़े होना भी मुश्किल होता है. नेता और अफसर बिना नाक पर कपड़ा रखे वहां ज्यादा देर तक टिक नहीं सकते हैं.

साजसज्जा के ये तरीके अपना कर घर बनाएं खुला खुला

खूबसूरत और बड़े घर की चाह हर किसी को होती है. मगर महानगरों में ऐसे घरों की चाह पूरी होनी आसान नहीं. छोटे घरों में रहने को मजबूर होना पड़ता है. मगर थोड़ी सी सूझबूझ व साजसजावट के तरीकों पर ध्यान दे कर छोटे घर में रह कर भी बड़े और हवादार घर में रहने का एहसास ले सकती हैं.

रखें घर को व्यवस्थित: आप अपने घर को जितना अधिक व्यवस्थित व साफसुथरा रखेंगी, कमरों में उतनी ही ज्यादा जगह दिखेगी. सामान करीने से रख कर और फालतू सामान को हटा कर काफी जगह खाली कर सकती हैं.

सफेद व हलके रंगों का प्रयोग करें: गहरे रंग बड़ी जगह के प्रभाव को कम कर देते हैं. इसलिए घर की दीवारों पर सफेद रंग करवाएं. फर्नीचर भी हलके रंग का खरीदें. अगर दीवारों पर सफेद रंग पसंद नहीं आता हो तो हलका हरा, गुलाबी, आसमानी, पीला आदि रंगों का चुनाव करें. पेंट एक ही रंग का करवाएं. फिर देखें कैसे कमरा बड़ा नजर आता है.

घर में सही रोशनी का चुनाव: घर में भरपूर रोशनी आने दें, क्योंकि घर में पर्याप्त रोशनी उसे उज्ज्वल और बड़ा दिखाने में मदद करती है. अपने घर में रंगों का प्रभाव दिखाने के लिए लैंप्स भी लगाएं. इस से घर आकर्षक भी दिखेगा.

मल्टीपर्पज फर्नीचर का इस्तेमाल: ऐसे फर्नीचर में निवेश करें जो बहुद्देशीय हो. इस तरह का फर्नीचर आप के कमरे को व्यवस्थित दिखाता है और जगह भी ज्यादा नजर आती है. उदाहरण के लिए किचन में ऐसी बहुद्देशीय मेज का प्रयोग किया जा सकता है, जिस में बहुत से रैक हों. इस में आप अपनी रसोई के कुछ सामान के साथसाथ दूसरी जरूरी चीजें भी एक जगह रख सकेंगी और सामान अतिरिक्त जगह भी नहीं घेरेगा.

घर में मिरर का प्रयोग: मिरर के प्रयोग से आप अपने कमरे को बड़ा होने का आभास दे सकती हैं. फोकल पौइंट का प्रयोग करें और अपने मिरर को ऐसे केंद्रित करें कि घर में गहराई का भ्रम पैदा हो. घर की खिड़की के सामने वाली दीवार पर दर्पण लगाएं. रोशनी के प्रतिबिंब के कारण आप के कमरे का क्षेत्र बड़ा दिखेगा.

स्ट्राइप्स का प्रयोग: घर के डैकोर में हलका सा फेरबदल ला कर भी घर का रूप बदल सकती हैं. उदाहरण के लिए धारीदार कारपेट्स कमरे को लंबा होने का आभास दे सकता है. इसी तरह घर के परदे आदि में स्ट्राइप्स वाली डिजाइनें घर को बड़ा दिखाती हैं.

मार्गों को ब्लौक न करें: घर के छोटे प्रवेशमार्गों, लौबियों या हौलवे में संकीर्ण कौन्सोल टेबलों के उपयोग से घर के प्रवेश स्थान के बड़े होने का आभास दे सकती हैं. मार्गों को ब्लौक न करें या प्रवेश स्थान को इतना संकीर्ण न करें कि लोगों को वहां चलने में परेशानी हो. जितनी दूर तक आप की आंखें कमरे को देख पाएंगी, कमरे के उतना ही बड़ा होने का आप को एहसास होगा.

देखें कैसे मैच के दौरान बीच मैदान में ही सो गए धोनी

भारत और श्रीलंका के बीच खेले गए तीसरे वनडे को जीतकर टीम इंडिया ने यह सीरीज भी अपने नाम कर ली. भारतीय टीम ने श्रीलंका के खिलाफ खेले गए तीसरे वनडे मुकाबले में 6 विकेट से जीत दर्ज की. जीत के हीरो रहे भारतीय ओपनर रोहित शर्मा, गेंदबाज जसप्रीत बुमराह और पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी. मैदान पर पूर्व कप्तान ने एक बार फिर साबित कर दिया कि उन्हें कैप्टन कूल का नाम क्यों दिया गया है.

दरअसल, 218 रनों के लक्ष्य का पीछा कर रही टीम इंडिया जब 44 ओवर में 4 विकेट खोकर 210 रन बना चुकी थी तभी नाराज दर्शकों ने मैदान पर बोतलें फेंकीं, जिससे मैच कुछ देर के लिए रोकना पड़ा. पहले टेस्ट में 3-0 से सफाया और फिर वनडे में लगातार तीसरी हार के बाद श्रीलंकाई फैंस आपा खो बैठे. दर्शकों के हंगामे के कारण मैच को काफी देर तक रोकना पड़ा.

बवाल बढ़ता देख दर्शकों को स्टेडियम से बाहर निकालना पड़ा. दर्शकों के इस हंगामे के बीच धोनी मैदान पर ही आराम से सो गए. उन्हें सोता देखकर कमेंटेटर भी खुद को हंसने से रोक नहीं पाए.

जिस दौरान दर्शक हंगामा कर रहे थे तब धोनी और रोहित शर्मा मैदान पर ही थे. तभी धोनी मैदान पर लेट गए और सो गए. उनकी यह तस्वीर और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है.

पिछले 2 मैचों में शानदार बल्लेबाजी कर धोनी ने अपने आलोचकों को करारा जवाब दिया है. तीसरे वनडे में भी धोनी ने नाबाद 67 रनों की पारी खेली. इस पारी में नाबाद रहने के साथ ही धोनी ने नाम कुछ अनोखे रिकार्ड जुड़ गए हैं. धोनी अब वनडे क्रिकेट में सफल लक्ष्य का पीछा करते हुए सबसे अधिक बार नाबाद रहने वाले बल्लेबाज बन गए हैं.

सबसे ज्यादा नौट आउट के रिकार्ड की भी बराबरी

धोनी ने वनडे क्रिकेट में सबसे ज्यादा बार नौट आउट रहने के रिकार्ड में चमिंडा वास और शान पोलाक की बराबरी कर ली है. धोनी अभी तक 72 बार वनडे क्रिकेट में नौट आउट पेवेलियन लौटे हैं.

आयुष्मान खुराना ने इस वजह से बंद किया कविताएं लिखना

वक्त और पैसे में बड़ी ताकत होती है. यह दोनों इतने शक्तिशाली हैं कि इंसान को बदलने पर मजबूर कर देते हैं. यूं कहें कि इंसान वक्त के साथ पैसे के मोह में खुद ही बदलता रहता है. बहुमुखी प्रतिभा के धनी आयुष्मान खुराना कभी कविताएं लिखा करते थे.उनकी कविताएं प्रकाशित नहीं हुई, मगर उनके ब्लाग में वह कविताएं मौजूद हैं. पर जब से वह अभिनय के क्षेत्र में आए हैं और अपनी फिल्मों में कुछ गीत भी गाए हैं, तब से उन्होंने कविताएं लिखना बंद कर गीत लिखना शुरू कर दिया है.

यह एक कटु सत्य है. इस बदलाव को लेकर ‘‘सरिता’’ पत्रिका से बात करते हुए खुद आयुष्मान खुराना ने कहा-‘‘पहले मैं कविताएं लिखता था, पर अब कविताएं लिखना बंद कर गीत लिखना शुरू कर दिए हैं. मुझे लगा कि दिमाग खर्च करना है, तो गीतों में करें, जहां धन ज्यादा मिलेगा. कविता तो कोई पढ़ना या सुनना नहीं चाहता. मेरे दिमाग में कुछ आता है, तो उसे मैं गीत के रूप में लिख देता हूं.’’

कुछ लोग मानते हैं कि जहां धन महत्वपूर्ण हो, वहां रचनात्मकता का ह्रास होने लगता है. मगर खुद आयुष्मान खुराना ने इस बात से असहमित जताते हुए कहा-‘‘ऐसा नहीं है. इसकी वजह यह है कि मैं संगीतकार या निर्देशक के कहने पर नहीं लिखता. मैं सिंगल गाने ज्यादा निकालता हूं, जो कि अपने लिए निकालता हूं, उनमें रचनात्मकता का आनंद होता ही है. यह काम मैं पैसे के लिए आत्मसंतुष्टि के लिए ही करता हूं. मेरी कविताएं सामाजिक मुद्दों पर हैं. पर मैं गाने हमेशा रोमांटिक ही लिखता हूं. मेरी कविताएं हिंदी व अंग्रेजी दोनों भाषाओं में मेरे ब्लाग में हैं.’’

राम रहीम के साथ भाजपा नेताओं के फोटो वायरल, दबाव में केन्द्र सरकार

बाबा राम रहीम के साथ भाजपा नेताओं के फोटो वायरल होने के बाद केन्द्र की मोदी सरकार दबाव में आ चुकी है. बाबा राम रहीम के खिलाफ साध्वी से रेप के मामले में सीबीआई कोर्ट द्वारा दोषी माने जाने के बाद बाबा के समर्थकों ने पंजाब, दिल्ली, हरियाणा में सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया. 30 लोगों की मौत और 250 से ज्यादा लोगों के घायल होने से देशभर में सरकार की आलोचना शुरू हो चुकी है. डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह के खिलाफ सोशल मीडिया पर फोटो वायरल हो गये. इसमें बाबा और भाजपा के नेताओं को साथ देखा जा रहा है. हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर भी इसमें प्रमुख हैं. ऐसे में यह साफ हो गया कि हरियाणा की सरकार ने जानबूझ कर बाबा के समर्थकों को ठीक से रोका नहीं जिससे हालात बेकाबू हो गये और सेना को बुलाना पडा.

बाबा समर्थकों ने केवल हरियाणा में ही नहीं दिल्ली और पजांब में जिस तरह से तोड़फोड़ आगजनी और हिंसक घटनायें की, उस से केन्द्र सरकार दबाव में आ गई है. भाजपा के नेताओं को समझ में नहीं आ रहा कि वह घटना पर किस तरह की प्रतिक्रिया दें. हरियाणा के मुख्यमंत्री केवल शांति व्यवस्था बनाये रखने की ही अपील कर सके. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दुःख और निंदा की. भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने बाबा का पक्ष लेते हुये कहा कि ‘राम रहीम पर सिर्फ एक महिला ने आरोप लगाया है, जबकि लाखों करोड़ों लोग उनके साथ खड़े हैं’. सोशल मीडिया पर साक्षी के बयान की निंदा के बाद भाजपा अब डैमेज कंट्रोल के प्रयास में लग गई है.

जिस तरह से लगातार हो रही रेल दुर्घटनाओं के बाद केन्द्र सरकार ने रेलवे के अफसरों को जिम्मेदार मानते हुये उनके खिलाफ कड़े कदम उठाये ठीक उसी तरह से केन्द्र सरकार के निर्देश पर हरियाणा के डीजीपी और होम सेक्रेटरी जैसे प्रमुख अफसरों पर कारवाई हो सकती है. केन्द्र सरकार के सामने दोतरफा मजबूरी है. एक तरफ अदालत है जो बार बार हरियाणा सरकार की प्रशासनिक व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर रही है. दूसरी तरफ केन्द्र सरकार की अपनी छवि खराब हो रही है.

बाबा राम रहीम के साथ भाजपा नेताओं के फोटो वायरल होने के बाद अब यह साफ हो गया है कि भाजपा ने विधानसभा चुनावों में बाबा की मदद ली थी, जिसके बदले उनको बहुत सारी सुविधायें दी गई. केन्द्र की सरकार ने हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को भी बदलने का मन बना चुकी है. देर सबेर मनोहर लाल खट्टर को भी वहां से हटाया जा सकता है. केन्द्र सरकार ने जिस तरह से कानून व्यवस्था को संभालने के लिये सेना का उपयोग किया उससे हरियाणा सरकार के खिलाफ उसकी नाराजगी साफ दिखती है.

हरियाणा सरकार की सबसे बड़ी कमी यह है कि वह प्रदर्शन के दौरान भीड़ को संभालने में एक के बाद एक 3 बार फेल हो चुकी है. बाबा राम रहीम प्रकरण के पहले जाट आंदोलन और बाबा रामपाल के मसले पर सरकार की पोल पहले खुल चुकी है. केन्द्र सरकार भाजपा शासित राज्यों में कानून व्यवस्था के मजबूत होने का ढिंढोरा पीटती है उसकी अब पोल खुल रही है. अपनी छवि बचाने के लिये केन्द्र सरकार हरियाणा में बड़ा प्रशासिनक और राजनीतिक उलटफेर करने का ब्लू प्रिंट तैयार कर रही है. इसके तहत पहले अफसर आर बाद में नेता बदले जायेंगे.

राम रहीम की फिल्में ऐसे कमाती थी करोड़ों रूपए

रेप केस में दोषी डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को फिल्में बनाने का भी शौक है. उन्होंने अकुल 5 फिल्में बनाई है. इन फिल्मों की कमाई को लेकर हमेशा अलग-अलग आंकड़े जारी किए गए है.

गुरमीत राम रहीम सिंह ने साल 2015 में फिल्म ‘एमएसजी: द मैसेंजर आफ गौड’ से बौलीवुड में एंट्री की थी. अपनी पहली फिल्म में वह खतरनाक स्टंट करते नजर आए थे. लेकिन फिल्म बाक्स आफिस पर कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाई. लेकिन राम रहीम ने ये दावा किया था कि उनकी फिल्म ने शानदार कलेक्शन किया है. रिपोर्ट्स की मानें तो राम रहीम ने अपनी फिल्मों की अच्छी कमाई बताने के लिए एक अनोखा तरीका अपनाया था.

फरवरी 2015 में राम रहीम ने अपनी पहली फिल्म ‘एमएसजी द मैसेंजर आफ गौड’ रिलीज की थी. इसके बारे में राम रहीम की ओर से दावा किया कि फिल्म ने 100 करोड़ रूपए से ऊपर का कलेक्शन किया था, लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ‘फिल्म ने सिर्फ 16.65 करोड़ रूपए का ही बिजनेस किया था. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ‘जब राम रहीम ने देखा की उनकी फिल्म नहीं चल रही तो उन्होंने एक साथ पूरे थिएटर की टिकेट्स खरीद लिए.’

पहली फिल्म के 7 महीने बाद राम रहीम ने दूसरी फिल्म ‘एमएसजी 2 : द मैसेंजर’ रिलीज की. राम रहीम के डेरा सच्चा सौदा की ओर से दावा किया गया कि फिल्म ने तीसरे सप्ताह तक 275 करोड़ का कारोबार किया है. इसके बाद ट्विटर पर उन्होंने जानकारी दी थी कि फिल्म का कलेक्शन 300 करोड़ रूपए पहुंच गया है, लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया था कि ‘एमएसजी 2 : द मैसेंजर’ ने सिर्फ 17 करोड़ का कलेक्शन किया.

उसके बाद 2016 में उन्होंने फिर अगली फिल्म ‘एमएसजी द वारियर लायन हार्ट’ रिलीज की. इस दौरान राम रहीम की ओर से कहा गया कि फिल्म पंजाब में हाउसफुल है, लेकिन एक अंग्रेजी वेबसाइट में बताया गया था कि फिल्म ने पहले सप्ताह में सिर्फ 5.75 करोड़ रुपए कमाए थे.

इसी साल फरवरी में फिर उनकी फिल्म ‘हिंद का नापाक को जवाब: एमएसजी लायन हार्ट-2’ रिलीज हुई. राम रहीम ने इस फिल्म को पाकिस्तान के खिलाफ हुई सर्जिकल स्ट्राइक पर बनाया था. इस फिल्म में राम रहीम भारतीय जासूस ‘शेर ए हिंद’ के रोल में दिखे.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 12 करोड़ में बनी इस फिल्म ने 14 करोड़ रुपए का कारोबार किया था, जबकि फिल्म के निर्माताओं का कहना था कि फिल्म ने 1 हफ्ते में में 100 करोड़ रुपए कमाए थे.

फिर राम रहीम ने ‘जट्टू इंजीनियर’ नाम से फिल्म रिलीज की. इस फिल्म में वो टीचर के तौर पर नशे के आदी ग्रामीणों में सुधार लाने का काम करते हैं. इस फिल्म के दौरान भी मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया था कि फिल्म ने 9.83 करोड़ रुपए कमाए, लेकिन राम रहीम की ओर से दावा किया गया था कि फिल्म ने 4 हफ्ते में 395 करोड़ कमाए थे.

बाबा ने फिल्मों के अलावा म्यूजिक एलबम भी बनाई

राम रहीम अपनी फिल्मों के गाने भी खुद गाते और लिखते हैं, इसके अलावा राम रहीम ने गाने की कई एलबम भी निकाली है. 2014 में हाइवे लव चार्जर नाम की एलबम काफी फेमस हुई थी. इस एलबम में गाना था आइएम द लव चार्जर, जिसे राम रहीम ने खुद गाया था.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पहले 3 दिन में ही इस एलबम की 30 लाख कापियां बिक चुकी थी. आपको बता दें कि 2013 में वह लव रब से एलबम के साथ आए और इसे भी उनके भक्तों ने खूब पसंद किया था.

स्मार्टफोन खरीदते वक्त कहीं आप भी तो नहीं करते हैं ये गलतियां

स्मार्टफोन आज एक बड़ी जरूरत बन चुकी है. बाजार में साधारण बजट से लेकर ऊंचे दामों पर एक से बढ़कर एक फीचर्स वाले स्मार्टफोन मौजूद हैं. ऐसे में टेक्नोलाजी और ढेरों विकल्प की वजह से आज इन्हें खरीदना भी एक बड़ी चुनौती है.

इनकी खरीददारी में अक्सर लोग अनजाने में बड़ी गलतियां कर जाते हैं. जिससे उन्हें नुकसान होता है. ऐसे में अगर आप भी स्मार्टफोन खरीदने का प्लान कर रहे हैं तो पढ़ें ये पूरी खबर.

सबसे पहले खरीदना

अक्सर लोग नए स्मार्टफोन के रिलीज होते ही उसे सबसे पहले खरीदने का प्लान करने लगते हैं. कई लोग तो उसके रिलीज होते ही उसकी बुकिंग आदि कर देते हैं. जबकि कई बार यह एक बड़ी गलती साबित होती है.

ऐसे में अगर आप स्मार्टफोन खरीदने जा रहे हैं तो रिलीज के बाद उसके लान्च होने तक का इंतजार करें. कंपनियां अपने मानकों के मुताबिक रिलीजिंग के 12 महीने के अंदर स्मार्टफोन उतार देती है. ऐसे में इस बीच आपको स्मार्टफोन के बारे में हर जानकारी अच्छे से मिल जाएगी.

बेहतर इंटरनल स्टोरेज

अक्सर लोग स्मार्टफोन खरीदते समय अपने वर्तमान की जरूरत को ध्यान में रखते है. वे यह भूल जाते हैं कि हो सकता दो दिन बाद उनका काम बढ़ जाए. इसलिए हमेशा याद रखें कि स्मार्टफोन लेते समय इंटरनल स्टोरेज बेहतर होना चाहिए. इंटरनल स्टोरेज कम होने से आपको डाउनलोडिंग करने से पहले कई बार सोचना होगा. इसलिए बाजार में आज 4 जीबी, 8 जीबी, 16 जीबी, 32 जीबी, 64 जीबी और 128 जीबी इंटरनल स्टोरेज वाले स्मार्टफोन मौजूद हैं.

इनबिल्ट एप

कई बार स्मार्टफोन खरीदते समय लोग उन एप पर ध्यान नहीं देते जिनकी उन्हें जरूरत होती है. आज मार्केट में गूगल का एंड्रायड, एप्पल का आईओएस, माइक्रोसाफ्ट का विंडोज मोबाइल और ब्लैकबेरी ओएस 10 जैसे कई स्मार्टफोन मौजूद हैं. जिनमें गेम से लेकर कई हाईटेक एप होने से इनकी डिमांड भी है, लेकिन कुछ चीजों में ये आज भी मात खा जाते हैं.

बहुत से ऐसे एप हैं, जो एक आम कस्टमर की जरूरत के मुताबिक नही हैं. ऐसे में अगर आप अपनी जरूरत के एप के मुताबिक स्मार्टफोन लेना चाहते हैं, तो आप ब्रांड चेंज कर सकते हैं. आज कई बड़ी कंपनियां अच्छे स्मार्टफोन बाजार में उतार चुकी है.

सर्विस न देखना

स्मार्टफोन खरीदते समय उसके कस्टमर केयर सर्विस पर ध्यान न देना बड़ी लापरवाही है. आज स्मार्टफोन कंपनियां ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए फोन सस्ते कीमत में पेश करती है. जिससे लोग उन्हें बढ़कर खरीदें, लेकिन जब फोन या उनका चार्जर खराब हो जाता है, तो मोटी रकम वसूलने में पीछे नहीं रहती है. कंपनी की कस्टमर केयर पर फोन करके पहले ही उसके चार्जर-स्क्रीन रिप्लेसमेंट की कीमत के बारे में जान लें. इसके अलावा अपने आस-पास उसके सर्विस सेंटर के बारे में भी जानकारी लें लें.

स्टोर से एसेसरीज खरीदना

स्मार्टफोन के स्टोर से उसकी एक्स्ट्रा एसेसरीज खरीदना भी आपकी गलती साबित हो सकती है. जरूरत के मुताबिक की एसेसरीज तो स्मार्टफोन के साथ होती है लेकिन कई बार वहीं से उसका केस, हेडफोन, कार चार्जर भी लोग खरीदने लगते है. जबकि ये चीजें इतनी जरूरी नहीं होती हैं कि आप एक दिन भी इनके बगैर नहीं रह सकते हैं. हकीकत ये है कि स्टोर से ये चीजें खरीदने पर काफी मंहगी पड़ती हैं.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें