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तो इस वजह से गोरिल्ला ग्लास होता है इतना मजबूत

स्मार्टफोन लेने से पहले अन्य स्पेसिफिकेशन्स के साथ-साथ आजकल सभी लोग डिस्प्ले की सुरक्षा के लिए गोरिल्ला ग्लास प्रोटेक्शन पर भी ध्यान देते हैं. यह फीचर तो अब काफी आम भी हो चला है. गोरिल्ला ग्लास से फोन की स्क्रीन को सुरक्षित रखता है. लेकिन क्या आपको इस जुड़े कुछ रोचक तथ्यों के बारे में पता है? क्या आप जानते हैं की गोरिल्ला ग्लास के भी कई प्रकार होते हैं. इस खबर में हम आपको गोरिल्ला ग्लास के बारे में बताने की कोशिश करेंगे, ताकि अगली बार आप समझ पाएं की कौन सा ग्लास कितना टिकाऊ है.

जानकारों के मुताबिक – ”कोर्निंग गोरिल्ला ग्लास स्मार्टफोन्स की स्क्रीन के लिए सबसे बेहतर है. गोरिल्ला ग्लास के कई वर्जन फिलहाल मार्किट में उपलब्ध हैं. इन्हे आमतौर पर नंबर के जरिये जाना जाता है. हर नंबर के ग्लास की अलग क्षमता होती है. यही की नंबर के हिसाब से इनकी अलग-अलग क्वालिटी होती है.”

आखिर गोरिल्ला ग्लास होता क्या है?

स्मार्टफोन की स्क्रीन इतनी हार्ड नहीं होती की कहीं गिरने या लगने पर उसे टूटने से बचाया जा सके. इसके विपरीत गोरिल्ला ग्लास से बनी स्क्रीन के लिए ऐसा दावा किया जाता है की कहीं गिरने या टकराने पर भी फोन की स्क्रीन सुरक्षित रहती है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि गोरिल्ला ग्लास कठोर तरीके से बनाया जाता है. इसे कोर्निंग गोरिल्ला ग्लास इसलिए कहते हैं, क्योंकि इसे कोर्निंग नाम की कंपनी बनती है.

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गोरिल्ला ग्लास कितना स्ट्रांग होता है?

हार्डनेस को मापने का एक स्केल होता है, इस स्केल को mohs scale of hardness कहा जाता है. इस स्केल में जो सबसे ज्यादा मजबूत होगा, उसका उतना ही नंबर ज्यादा होगा. उदाहरण के लिए- हीरा सबसे कठोर धातु है. इसलिए उसे 10 नंबर मिला है. इस स्केल के अनुसार गोरिल्ला ग्लास 6.5 स्केल तक की खरोंच सहन कर सकता है. इसका मतलब गोरिला ग्लास स्क्रीन वाला फोन अगर किसी पदार्थ से टकराता है और उसकी हार्डनेस 6 या 6.5 तक होगी तो स्क्रीन पर उसका कोई असर नहीं पड़ेगा.

बाजार में 5 नंबर के ग्लास उपलब्ध : बाजार में अब तक 5 नंबर के ग्लास मौजूद हैं. इसका भी नया वर्जन पहले से बेहतर होता जाता है.

कोर्निंग गोरिल्ला ग्लास-1: इसका पहला वर्जन 2008 में आया था, वर्तमान समय में इसका 5वां नंबर/वर्जन चल रहा है.

कोर्निंग गोरिल्ला ग्लासस-2: 2012 में लौन्च हुआ यह वर्जन पहले के मुकाबले तकरीबन 20 प्रतिशत पतला था. पतला ग्लास होने की खासियत यह है की ग्लास जितना पतला होगा, उसका टाच उतना ही बेहतर काम करेगा.

कोर्निंग गोरिल्ला ग्लालस-3: इस ग्लास में Native Damage Resistant नाम की नई तकनीक का इस्तेमाल किया गया. कंपनी का दावा था की यह ग्लास नंबर 2 की तुलना में 3 गुना पतला और मजबूत था.

कोर्निंग गोरिल्ला ग्लास- 4: इसमें एक नया फीचर- स्क्रैच रेजिस्टेंट को एड किया गया था. इसमें कंपनी का दावा था की 1 मीटर की ऊंचाई से गिरने के दौरान 100 में से 80 बार आपके फोन को कोई नुकसान नहीं होगा. इसे वर्जन 3 से 4 गुना ज्यादा मजबूत बताया गया. नंबर 3 के मुकाबले इसे पतला बनाया गया.

कोर्निंग गोरिल्ला ग्लास-5: बाजार में मौजूद यह सबसे लेटेस्ट गोरिल्ला ग्लास है. कंपनी का दावा है कि यह नंबर चार से 4 गुना ज्यादा डैमेज रेसिस्टेंट, स्क्रैच रेसिस्टेंट, मजबूत और पतला है.

अब आपको गोरिल्ला ग्लास के बारे में सब समझ आ गया होगा. इससे आप स्मार्टफोन लेने से पहले देख सकते हैं की आपके फोन की स्क्रीन में कौन-सा ग्लास मौजूद है.

VIDEO : हेयरस्टाइल स्पेशल

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हौलीवुड फिल्म से प्रेरित है वरुण धवन की फिल्म ‘अक्टूबर’

जब से सुजीत सरकार निर्देशित फिल्म ‘‘अक्टूबर’’ का ट्रेलर बाजार में आया है, तब से बौलीवुड में चर्चा गर्म है कि यह फिल्म हौलीवुड की औस्कर में नोमीनेट हो चुकी फिल्म ‘‘हर’’ से प्रेरित है. वरुण धवन अभिनीत किरदार डेन के इर्दगिर्द बुनी गयी प्रेम कहानी वाली इस तरह की फिल्म अब तक बौलीवुड में नहीं आयी है.

बौलीवुड में चर्चा गर्म है कि यह कहानी पूरी तरह से हौलीवुड फिल्म ‘‘हर’’ से प्रेरित नजर आती है. फिल्म ‘‘हर’’ में एक इंसान एक युवती की आवाज पर मोहित होकर उसके प्यार में पड़ जाता है. पर फिल्म ‘अक्टूबर’ में डाक्टरी पेशे की भी कुछ बात की गयी है. फिल्मकार ने अपने तरीके से कुछ नया प्रयोग किया है.

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रहस्य में डूबा हुआ ट्रेलर

इस फिल्म का रहस्य में डूबा हुआ ट्रेलर कहता है, ‘ये एक प्रेम कहानी नहीं है, बल्कि प्रेम के बारे में कहानी है’.  ट्रेलर से पता चलता है कि वरुण और बनिता कलीग हैं. दोनों के बीच एक ऐसी घटना घटती है, जिसके बाद बनिता आईसीयू में भर्ती हो जाती है.

फिल्म में वरुण, डैन के किरदार में हैं, उनके मन में यह बात बैठी है कि अगर लड़की ने उनके बारे में पूछा तो क्यों पूछा, क्या शायद वह उन्हें प्यार करती है.

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‘अक्टूबर’ एक ऐसी दुनिया है, जिसमें एंट्री करने का साहस आज के दौर में बहुत कम ही फिल्मकार करते हैं. यह एक ऐसा रोमांटिक ड्रामा है, जिसके बारे में हमने सोचा कि राजेश, शर्मिला और शक्ति सामंत की फिल्म के बाद हम शायद ही दोबारा कभी ऐसा देख पाएं. ये फिल्म 13 अप्रैल, 2018 को रिलीज हो रही है.

जूही चतुर्वेदी लिखित व सुजीत सरकार निर्देशित रोमांटिक फिल्म ‘‘अक्टूबर’’ में वरुण धवन, बंदिता संधू व गीताजंली राव के मुख्य किरदार हैं. ‘राइजिंग सन फिल्म प्रोडक्शन’ के बैनर तले रानी लहरी व शील कुमार हैं. फिल्म के संगीतकार शांतनु मोइत्रा हैं.

गुरमीत राम रहीम : कलंक का बड़ा किरदार

दुनिया भर में प्रसिद्ध डेरा सच्चा सौदा की स्थापना 29 अप्रैल, 1948 को संत मस्ताना बलोचिस्तानी ने रूहानी संस्था के रूप में की थी. वह ‘हिज होलिनैस बेपरवाह मस्तानाजी महाराज’ के रूप में प्रसिद्ध हुए. इस डेरे का मुख्य मकसद था लोगों को धार्मिक शिक्षा देना. 18 अप्रैल, 1960 को मस्तानाजी के प्राण त्यागने के बाद 41 साल के शाह सतनाम सिंहजी को इस डेरे का मुखिया बनाया गया.

23 सितंबर, 1990 को महज 23 साल की उम्र में गुरमीत सिंह नाम के नौजवान ने डेरा की गद्दी संभाली. उस समय शाह सतनाम सिंहजी ने उन्हें नया नाम दिया था बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह. बाद में उन्होंने इस नाम के साथ ‘इंसां’ शब्द जोड़ लिया.

इस डेरे की पहले से ही काफी मान्यता थी. हरियाणा के शहर सिरसा में इस का मुख्यालय था, जहां प्रवचन सुनने के लिए हजारों अनुयायी आते थे. लेकिन गुरमीत राम रहीम सिंह के प्रमुख बनने के बाद डेरे की लोकप्रियता में जबरदस्त इजाफा हुआ. हिंदुस्तान में 46 जगहों पर इस के आश्रम स्थापित होने के अलावा अमेरिका, कनाडा, यूएई, आस्ट्रेलिया और इंग्लैंड में भी इस डेरे की शाखाएं खुल गईं.

डेरा प्रबंधकों का दावा था कि सच्चा सौदा के अनुयायियों की संख्या 6 करोड़ तक पहुंच गई थी. जो भी था, बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह को उन के अनुयायी भगवान का अवतार मानने लगे थे. सन 2015 में जारी सर्वाधिक शक्तिशाली भारतीयों की सूची में बाबा का नाम 96वें नंबर पर था.

लेकिन इस लोकप्रिय कथित ‘भगवान’ के खिलाफ डेरे की 2 साध्वियों की शिकायत पर दुष्कर्म के 2 मुकदमे दर्ज हो गए. इन मुकदमों की सुनवाई पंचकूला की सीबीआई अदालत में हो रही थी. 25 अगस्त, 2017 को अदालत में फैसला होना था कि दुष्कर्म के इन मामलों में बाबा गुरमीत राम रहीम इंसां दोषी हैं या नहीं?

अभी तक इन मुकदमों की सुनवाई वीडियो कौन्फ्रैंसिंग के जरिए हो रही थी, लेकिन 25 अगस्त को बाबा को अदालत में हाजिर होना जरूरी था. बाबा को पंचकूला आना था तो उन के अनुयायी भी पंचकूला आ सकते थे. बाबा के बरी होने पर उन के अनुयायियों से कोई खतरा नहीं था, लेकिन अगर कहीं अदालत ने बाबा को दोषी ठहरा दिया तो स्थिति तनावपूर्ण हो सकती थी. इस के लिए पुलिस का चौकस रहना जरूरी था.

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असमंजस में पुलिस

इस तरह की स्थिति से बचने के लिए पुलिस ने इलाके के असलहाधारकों को अपने हथियार थाने में जमा कराने के आदेश दे दिए. इस के बाद भी अगर किसी तरह का हंगामा होता है तो पुलिस ने उस से भी निपटने की व्यवस्था कर ली थी. हरियाणा के डीजीपी बलजीत सिंह संधू ने 20 अगस्त को ही कह दिया था कि रामपाल के मामले में बिगड़े हालात से पुलिस सबक ले चुकी है.

इसलिए इस बार स्थिति बिगड़ने नहीं दी जाएगी. अगर जरूरत पड़ी तो स्थिति से निपटने के लिए सेना भी बुलाई जा सकती है. इस बीच सिरसा स्थित डेरा के मुख्यालय पर डेरा प्रेमी इकट्ठे होने लगे थे, जिन की संख्या अब तक 20 हजार को पार कर चुकी थी. लेकिन यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही थी.

अब समस्या यह भी थी कि बाबा को सिरसा से पंचकूला किस रास्ते से ले जाया जाए. दरअसल, बाबा पर चल रहे मुकदमों में केवल दुष्कर्म वाले मुकदमों का फैसला आने वाला था. जबकि बाबा पर अन्य कई मुकदमे चल रहे हैं, जिन में 2 हत्या के भी हैं.

ये दोनों मुकदमे पत्रकार रामचंदर छत्रपति और डेरा प्रबंधन समिति के सदस्य रणजीत सिंह की हत्या के हैं. फिलहाल तय हुआ कि बाबा को सड़क मार्ग से न ला कर हवाई मार्ग से लाया जाए. इस के लिए हेलीकौप्टर की व्यवस्था तो कर ही ली गई, पंचकूला में सेक्टर-5 के परेड ग्राउंड को हेलीपैड के रूप में उपयोग करने की व्यवस्था की जाने लगी.

उधर पंचकूला में भी बाबा समर्थकों की भीड़ जुटने लगी थी. पहले यह संख्या सैकड़ों में थी. इस के बाद हजारों में हुई और फिर देखतेदेखते लाखों में पहुंच गई. इस भीड़ ने पंचकूला के ज्यादातर हिस्सों पर अपना कब्जा कर लिया था. पुलिस इन पर पैनी नजर रखे हुए थी.

पंचकूला और चंडीगढ़ में अस्थाई जेलों की व्यवस्था कर के इन लोगों की तलाशी भी ली जा रही थी. लेकिन इन लोगों से संदिग्ध जैसी कोई चीज बरामद नहीं हुई थी. इन लोगों का कहना था कि ये डेराप्रेमी हैं और अपने गुरु की एक झलक पाने के लिए यहां आए हैं. हालांकि स्थिति को देखते हुए ट्राइसिटी (मोहाली-चंडीगढ़-पंचकूला) के सभी शिक्षण संस्थान 3 दिनों के लिए बंद कर दिए गए थे.

शहर में बाबा समर्थक

पंचकूला पुलिस को लगता था कि जो भी डेरा समर्थक यहां इकट्ठा हो रहे हैं, अगर ये कोई हंगामा करते हैं तो इन्हें काबू कर लिया जाएगा. लेकिन लाखों की भीड़ देख कर पुलिस को यह असंभव सा लगने लगा. तब सेना की मदद मांगते हुए 3 दिनों के लिए वहां मोबाइल इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई. आखिर 25 अगस्त, 2017 का वह दिन आ गया, जब बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह ‘इंसां’ को आ कर पंचकूला की सीबीआई अदालत के विशेष जज जगदीप सिंह लोहान के सम्मुख पेश होना था.

पहले चर्चा थी कि बाबा हेलीकौप्टर से आएंगे, लेकिन बाद में कहा गया कि 100 से ज्यादा गाडि़यों के काफिले के साथ वह सड़क मार्ग से पंचकूला पहुंचेंगे.

सुबह 8 बजे बाबा का यह काफिला सिरसा से पंचकूला के लिए चल पड़ा. रास्ते में जगहजगह सड़क के दोनों ओर उन की एक झलक पाने के लिए उन के अनुयायी हाथ जोड़े खड़े थे.

जबकि किसी को पता नहीं था कि बाबा किस गाड़ी में हैं. काफिले में काले रंग की 4 ऐसी गाडि़यां थीं, जिन के शीशे गहरे काले रंग के थे. बिना नंबर की ये चारों गाडि़यां हूबहू एक जैसी थीं. लोगों का अनुमान था कि इन्हीं लग्जरी गाडि़यों में से किसी एक में बाबा हैं.

उम्मीद थी कि यह काफिला दोपहर एक बजे तक पंचकूला पहुंच जाएगा. लेकिन कैथल में मौजूद बाबा के अनुयायियों ने गाड़ी के आगे लेट कर काफिले को आगे बढ़ने से रोक लिया. करीब घंटे भर की जद्दोजहद के बाद किसी तरह यह काफिला वहां से आगे बढ़ पाया.

2 बजे के बाद यह काफिला पंचकूला की सीमा में घुसा तो अन्य तमाम वाहनों को रोक कर केवल उन काले रंग की चारों कारों को ही आगे जाने दिया गया. क्योंकि उन्हीं चारों कारों में से एक में बाबा थे. अदालत के गेट पर पहुंच कर उन में से भी 2 कारों को रोक लिया गया. अब केवल उन 2 कारों को ही कोर्ट परिसर में दाखिल होने दिया गया, जिन में से एक में बाबा थे और दूसरी में उन की जैड प्लस सिक्योरिटी.

ठीक ढाई बजे अदालत की काररवाई शुरू हुई. वकील और जज साहब पहले से ही अदालत में मौजूद थे. बाबा के नाम की पुकार हुई तो सिरसा से उन के साथ आई उन की मुंहबोली बेटी हनीप्रीत इंसां भी उन के साथ अदालत के अंदर आ गईं. इस के लिए उन्होंने पहले से ही विशेष अनुमति ले रखी थी.

बाबा को दोषी ठहराया

इस के बाद सक्षम जज जगदीप सिंह ने अपने फैसले के बारे में बताना शुरू किया, ‘अभियुक्त बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह पर उन की 2 साध्वियों ने दुष्कर्म के जो आरोप लगाए हैं, उस के बारे में सारी काररवाई पूरी करते हुए बहस भी हो चुकी है. इस सारी काररवाई के बाद अदालत इस नतीजे पर पहुंची है कि सीबीआई की ओर से अभियोजन पक्ष का हर पहलू, हर दलील और हर प्रमाण मजबूत है.

‘दूसरी ओर बचाव पक्ष की ओर से प्रस्तुत किसी भी दलील में ऐसा कोई साक्ष्य सामने नहीं आया, जो किसी भी तरह से इस केस को कमजोर कर रहा हो. लिहाजा अभियुक्त बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह को इस केस में दोषी पाया जाता है, इसलिए उन्हें तुरंत हिरासत में लिया जाए. इस मामले में सजा 28 अगस्त, 2017 को सुनाई जाएगी. अभियुक्त को उस दिन अदालत में पेश किया जाए.’

पुलिस ने बाबा को हिरासत में लेने की व्यवस्था करते हुए उन की जैड प्लस सिक्योरिटी सुविधा को निरस्त कर दिया. अपने वकीलों और पुलिस से घिरे बाबा कोर्टरूम से बाहर आ गए. जैसे ही बाबा को दोषी ठहराए जाने की खबर समर्थकों तक पहुंची, वे बेकाबू हो गए. जाने कहां से उन के हाथों में लोहे के सरिए और तलवारें आ गईं.

उन्हीं से न केवल पेड़ों की डालें काट कर डंडे बना लिए गए, बल्कि गोलाकार चौराहों को तोड़ कर पत्थरों की व्यवस्था कर ली गई. इस के बाद शुरू हो गए दहशतभरे वहशियाना हमले. थोड़ी ही देर में आगजनी का ऐसा खौफनाक मंजर दिखाई देने लगा, जिसे पंचकूला की धरती ने इस के पहले नहीं देखा था.

मीडियावालों को भी नहीं बख्शा गया. उन पर हमला कर के उन की ओबी वैनों को उलट कर उन में आग लगा दी गई. पुलिस और सेना इस स्थिति से निपटने के लिए पहले से ही तैयार खड़ी थी. कुछ ही देर में वहां ऐसी स्थिति बन गई कि 2 दर्जन से ज्यादा लोग मारे गए तो 250 से ज्यादा लोग घायल हो गए.

इन में कुछ की हालत काफी गंभीर थी. 5 टीवी चैनलों की ओबी वैनें जलाने के अलावा 100 से अधिक अन्य वाहन जला दिए गए. इस तरह की वारदातों को अंजाम देते हुए तमाम डेरा समर्थक आसपास की कालोनियों के मकानों की दीवारें फांद कर घरों में घुस गए. एक हजार डेराप्रेमियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया.

इस के तुरंत बाद पंचकूला और आसपास के इलाकों में कर्फ्यू लगा दिया गया. आखिर क्या था साध्वियों के साथ दुष्कर्म का वह मामला, जिस में बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह को दोषी ठहराया गया था. इस के लिए हमें 15 साल पीछे जाना होगा, जब अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री थे.

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साध्वियों का मामला

24 सितंबर, 2002 को हिंदी में लिखी एक लंबीचौड़ी चिट्ठी पीएमओ में पहुंची, जिसे पढ़ कर हर कोई चौंक उठा था. उस चिट्ठी को यहां हूबहू पेश करना ही ठीक रहेगा.

सेवा में,

प्रधानमंत्री महोदय

  श्री अटल बिहारी वाजपेयी

  विषय: सच्चे सौदे वाले महाराज द्वारा सैकड़ों लड़कियों के साथ किए गए बलात्कार के मामले की जांच के संबंध में

  श्रीमान जी,

  1. मैं पंजाब की रहने वाली एक लड़की हूं. मैं डेरा सच्चा सौदा, सिरसा (हरियाणा) में साध्वी के तौर पर पिछले 5 सालों से सेवा कर रही हूं. मेरे अलावा इस डेरे में और भी सैकड़ों लड़कियां हैं, जो रोजाना 18 घंटे सेवा करती हैं, पर हमारा शारीरिक शोषण होता है. डेरे के महाराज गुरमीत सिंह हम से बलात्कार करते हैं.

मैं बीए पास हूं. मेरे मातापिता उन के अंधभक्त हैं. उन के कहने पर मैं साध्वी बनी. साध्वी बनने के 2 साल बाद महाराज गुरमीत सिंह की एक खास चेली गुरजोत रात 10 बजे मेरे पास आई और कहा कि महाराज ने मुझे अपनी गुफा में बुलाया है. मैं खुश हुई कि महाराज ने मुझे अपनी गुफा में बुलाया है और मैं पहली बार महाराज के पास जा रही हूं.

जब मैं सीढि़यां उतर कर महाराज की गुफा में दाखिल हुई तो देखा कि महाराज बैड पर बैठे हुए हैं. उन के हाथ में टीवी का रिमोट था और वह ब्लू फिल्म देख रहे थे. उन के सिरहाने बिस्तर पर एक रिवौल्वर रखी थी. यह सब देख कर मैं घबरा गई. मैं ने महाराज के इस रूप के बारे में कभी सोचा भी नहीं था.

महाराज ने टीवी बंद कर दिया और मुझे अपने पास बिठा लिया. उन्होंने मुझे पानी पिला कर कहा कि मुझे इसलिए अपने पास बुलाया है, क्योंकि वह मुझे अपने करीब समझते हैं. यह मेरा पहला अनुभव था. महाराज ने मुझे अपनी जकड़ में ले कर कहा कि वह मुझे दिल से प्यार करते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि वह मेरे साथ प्यार करना चाहते हैं. मैं उन की चेली बनने के लिए अपना तनमनधन उन्हें सौंप चुकी हूं और उन्होंने मेरी यह भेंट स्वीकार कर ली है.

जब मैं ने इस पर ऐतराज किया तो उन्होंने कहा कि इस में कोई शक नहीं कि वह रब हैं, साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि श्रीकृष्ण भी भगवान थे और उन के पास तमाम गोपियां थीं, जिन के साथ वह रासलीला रचाते थे. फिर भी लोग उन्हें भगवान मानते हैं, उन्हें कोई गलत नहीं कहता. इस में कोई हैरान होने वाली बात नहीं है.

  1. मैं इस रिवौल्वर से तुम्हें मार सकता हूं और तुम्हारी लाश भी यहीं दफन कर सकता हूं. तुम्हारे परिवार वाले मेरे पक्के भक्त हैं और उन्हें मुझ पर अंधा विश्वास है. मुझे यह अच्छी तरह पता है कि तुम्हारे परिवार वाले कभी भी मेरे खिलाफ नहीं जा सकते.
  2. सरकारों पर भी मेरा अच्छा असर है. हरियाणा और पंजाब के मुख्यमंत्री व कई केंद्रीय मंत्री मेरे यहां माथा टेकने आते हैं. वे मेरे खिलाफ कोई काररवाई नहीं कर सकते. मैं तुम्हारे परिवार वालों को नौकरियों से निकलवा सकता हूं. अपने सेवादारों से उन्हें कहीं मरवाखपवा भी सकता हूं.

हम उन की हत्या का कोई सबूत भी नहीं छोडें़गे. तुम्हें तो पता ही है कि हम ने पहले भी डेरे के मैनेजर फकीरचंद को गुंडों से मरवाया है. आज तक उस के कत्ल का कोई सुराग नहीं मिला है. डेरे की रोज 1 करोड़ रुपए की आमदनी है. हम नेता, पुलिस और यहां तक कि जज को भी खरीद सकते हैं.

  1. इतना सब कहने के बाद महाराज ने मेरे साथ जबरदस्ती की. महाराज पिछले 3 सालों से यह सब करते आ रहे हैं. हर 25-30 दिन बाद मेरी बारी आती है. मुझे यह भी पता चला है कि मुझ से पहले भी महाराज ने अपने पास जिन लड़कियों को बुलवाया है, उन के साथ भी वह यही सब करते आए हैं.

उन में से बहुत सारी लड़कियों की उम्र 35-40 साल है और वे शादी की उम्र पार कर चुकी हैं. उन के पास इस हाल में रहने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा है. इन में से कई लड़कियां काफी पढ़ीलिखी हैं, जिन के पास बीए, एमए, बीएड की डिग्रिया हैं. पर वे डेरे में नर्क भोग रही हैं, क्योंकि उन के परिवार वालों को महाराज पर अंधी श्रद्धा है.

  1. हम सफेद कपड़े पहन कर और सिर पर सफेद पटका बांध कर रहती हैं. मर्दों की तरफ देख भी नहीं सकतीं और महाराज के आदेश के मुताबिक उन से 8-10 फुट की दूरी से ही बात कर सकती हैं. हम देखने वालों को देवियां लगती हैं, पर हम वेश्याओं की जिंदगी जी रही हैं.

मैं ने कई बार इस बारे में अपने घर वालों को बताने की कोशिश कि डेरे में सब कुछ अच्छा नहीं है. पर मेरे परिवार वालों ने मुझे डांटते हुए यही समझाया कि डेरे से अच्छी जगह कोई नहीं है, क्योंकि हम महाराज की संगत में हैं. उन्होंने कहा कि मैं ने डेरे के बारे में अपने मन में गलत सोच पैदा कर ली है. घर वालों ने मुझे सद्गुरु का नाम जपने को कहा.

  1. मैं यहां मजबूर हूं कि मुझे महाराज की हर बात माननी पड़ती है. महाराज के हर हुक्म का पालन करना पड़ता है. यहां किसी लड़की को दूसरी लड़की से बात करने की इजाजत नहीं है. महाराज के आदेश के मुताबिक कोई लड़की टेलीफोन पर भी अपने घर वालों से बात नहीं कर सकती. अगर कोई लड़की डेरे की असलियत के बारे में किसी से कुछ कहती है तो उसे महाराज के आदेश के मुताबिक सजा दी जाती है.

कुछ दिनों पहले बठिंडा की एक लड़की ने महाराज की करतूतों के बारे में कुछ कह दिया था. तब अन्य चेलियों ने उस की काफी पिटाई की थी, जिस से उस की रीढ़ की हड्डी में चोट आ गई थी. हड्डी में फ्रैक्चर होने की वजह से वह बिस्तर पर पड़ गई. इस के बाद उस के पिता ने डेरे की सेवादारी छोड़ दी और बेटी को ले कर अपने घर चले गए. वह महाराज और बदनामी के डर से किसी को कुछ बता भी नहीं पा रहे हैं.

  1. इसी तरह कुरुक्षेत्र की भी एक लड़की डेरा छोड़ कर अपने घर चली गई. जब उस ने सारी कहानी अपने घर वालों को बताई तो उस के भाई ने भी डेरा छोड़ दिया. वह भी यहां सेवादार के रूप में काम करता था. संगरूर की एक लड़की डेरा छोड़ कर अपने घर गई तो डेरे के हथियारबंद सेवादार/गुंडे उस के घर गए. दरवाजा अंदर से बंद कर के उन्होंने लड़की को जान से मारने की धमकी देते हुए कहा कि कोई बात बाहर नहीं जानी चाहिए.

इसी तरह मानसा, फिरोजपुर, पटियाला और लुधियाना की भी कई लड़कियां हैं, जो डेरे के बारे में कुछ भी कहने से डर रही हैं. वे डेरा छोड़ चुकी हैं, पर महाराज के सेवादारों की धमकी के डर से वे कुछ कह नहीं पा रही हैं. इसी तरह सिरसा, हिसार, फतेहाबाद, हनुमानगढ़ और मेरठ जिलों की भी लड़कियां डेरे के गुंडों के डर से अपने साथ कई ज्यादतियों के बारे में कुछ कह नहीं पा रही हैं.

अगर मैं भी अपना नामपता बता दूं तो मेरी भी जान को खतरा है. मुझे और मेरे परिवार वालों को खत्म कर दिया जाएगा. लेकिन मैं आम लोगों को सच्चाई बताना चाहती हूं, क्योंकि अब मुझ से बरदाश्त नहीं हो रहा है. पर मुझे अपनी जान का खतरा है. अगर प्रैस या किसी और एजेंसी के जरिए जांच कराई जाए तो डेरे में रह रही 40-50 लड़कियां अपनी सच्चाई बताने को सामने आ जाएंगी.

हमारा मैडिकल भी करवाया जा सकता है कि हम कुंवारी चेलियां हैं या नहीं? इस की जांच की जाए कि हमारा कुंवारापन किस ने भंग किया है तो यह बात सामने आएगी कि महाराज राम रहीम सिंह डेरा सच्चा सौदा ने हमारी जिंदगियां बरबाद की हैं.

 एक दुखी अबला

मामले की सीबीआई जांच

यह चिट्ठी तत्कालीन प्रधानमंत्री ने पढ़ी. इस के बाद कुछ चैनलों से निकलते हुए इस की जांच सीबीआई को सौंप दी गई. जांच कर के दिसंबर, 2002 में सीबीआई ने राम रहीम के खिलाफ भादंवि की धाराओं 376, 506 एवं 509 के तहत आपराधिक मामला दर्ज कर के अपनी काररवाई शुरू कर दी.

इस के बाद डेरे की ओर से दिसंबर, 2003 में इस काररवाई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई. इस से अक्टूबर, 2004 तक मामले में स्टे लग गया. स्टे खत्म होते ही जांच में तेजी आ गई. सीबीआई ने 2 ऐसी साध्वियों को ढूंढ निकाला, जो बाबा के खिलाफ बयान देने को तैयार थीं. सीआरपीसी की धारा 164 के तहत कोर्ट में उन के बयान दर्ज करवा दिए गए.

आखिर अभियोजन पक्ष के 15 गवाहों की सूची के साथ इस केस की चार्जशीट 27 अक्तूबर, 2007 को सीबीआई की विशेष अदालत में पेश कर दी गई. बचावपक्ष की ओर से 37 गवाहों की सूची अदालत को सौंपी गई. पहले यह केस अंबाला की सीबीआई कोर्ट में चला, बाद में इस की सुनवाई पंचकूला स्थित सीबीआई कोर्ट में होने लगी.

25 जुलाई, 2017 को कोर्ट ने रोजाना सुनवाई के आदेश कर दिए. 17 अगस्त को बहस होने के बाद फैसले की तारीख 25 अगस्त, 2017 तय कर दी गई. अभी तक ज्यादातर सुनवाई वीडियो कौन्फ्रैंसिंग के जरिए हो रही थी, लेकिन 25 अगस्त को बाबा का अदालत में हाजिर होना जरूरी था.

25 अगस्त को तामझाम के साथ बाबा अदालत पहुंचे. लेकिन जैसे ही उन्हें दोषी करार दिया गया, दंगे भड़क उठे. इस बीच बाबा को एक हेलीकौप्टर से रोहतक की सुनारिया जेल ले जाया गया. उन की मुंहबोली बेटी हनीप्रीत इंसां भी उन के साथ जेल तक गईं. रात में वह सफेद रंग की कार एचआर26बी एस5426 से कुछ लोगों के साथ सिरसा लौट गईं.

इस बीच पंचकूला में हुए दंगों ने जैसे पूरे देश को अपनी चपेट में ले लिया. बस सेवा एवं रेल सेवा चरमरा गई. अनेक जगहों पर कर्फ्यू लगा दिया गया. उपद्रव में मरने वालों की संख्या 38 तक पहुंच गई. पंचकूला के डीसीपी अशोक कुमार के अलावा कोर्ट में बाबा का बैग उठा कर चलने वाले डिप्टी एडवोकेट जनरल गुरदास सिंह सलवारा को निलंबित कर दिया गया.

डेरा सच्चा सौदा पूरी तरह संदेह के दायरे में आ गया था. अटकलों का बाजार पूरी तरह गरम था. सब से बड़ी अटकल यह थी कि पंचकूला पहुंचे अनुयायियों को 1 हजार रुपए प्रतिदिन के हिसाब से वहां बुलाया गया था. भीड़ अधिक हो गई, जिस से उस में आपराधिक प्रवृत्ति के लोग घुस गए. कहा जाता है कि उन्हें 2 लाख रुपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से दिए गए. इन का काम बाबा को वहां से भगाना था.

बहरहाल, 28 अगस्त, 2017 भी आ गई, जिस दिन बाबा को सजा सुनाई जानी थी. सुरक्षा की दृष्टि से सुनारिया जेल के भीतर ही अस्थाई तौर पर अदालत बनाई गई. सजा सुनाए जाने के बारे में बाबा की ओर से कहा गया कि वह 50 वर्ष के हो चुके हैं और उन्हें हाइपरटेंशन, एक्यूट डायबिटीज व सघन कमर दर्द की शिकायत है. उन के साथ उन की वृद्ध मां भी रहती हैं, जो बुढ़ापे की कई बीमारियों से ग्रसित हैं. बाबा ने लोकसेवा में कई विश्व रिकौर्ड बनाए हैं. उन की कोशिश से तमाम स्कूल कालेज चल रहे हैं.

इन तथ्यों के आधार पर बाबा की ओर से दरख्वास्त की गई कि अदालत उन के मामले में नरमी बरतते हुए उन्हें कम से कम सजा दे. अभियोजन पक्ष की ओर से चंद शब्दों में पहले ही अदालत से अपील कर दी गई थी कि रेयर औफ रेयरेस्ट की श्रेणी में आने वाला यह एक ऐसा केस है, जिस में अभियुक्त ने शराफत, धर्म और महापुरुष का लबादा ओढ़ कर अपराध किया है. यही नहीं, उन्होंने उस अपराध को बारबार दोहराया है.

सजा के मुद्दे पर दोनों पक्षों को सुनने के बाद विद्वान सीबीआई जज जगदीप सिंह ने अपना जो फैसला सुनाया, वह इस प्रकार था—

अदालत का फैसला

अपने ही आश्रम में अपने आधीन रहने वाली 2 साध्वियों को डराधमका कर उन से दुष्कर्म करने के आरोप में दोषी गुरमीत राम रहीम सिंह इंसां को अलगअलग 10-10 सालों की कैद बामशक्कत दी जाती है.

पीडि़त युवतियों को हरजाना दिए जाने के बारे में उन्होंने कहा कि फाइल के निरीक्षण से यह बात सामने आई है कि अभियुक्त अपनी फिल्मों के प्रमोशन के लिए बारबार विदेश जाने की अदालत से अनुमति लेता रहा है. तब उसी की याचिका में यह बात भी सामने आती रही है कि फिल्म के निर्माण पर उस का करोड़ों रुपया लगा है, इसलिए विदेश जा कर इस का प्रमोशन करना उस के लिए बहुत जरूरी है. लिहाजा इस से पता चलता है कि उस के पास पैसों की कोई कमी नहीं है. इसलिए यह अदालत दोनों पीडि़ताओं को 15-15 लाख रुपए हरजाना देने का आदेश देती है.

फिलहाल अटकलों के साथसाथ बाबा की ऐसी कारगुजारियां सामने आ रही हैं, जिन से यह बात साफ हो जाती है कि डेरे के भीतर उस ने एक ऐसी सल्तनत बना रखी थी, जिस का सर्वेसर्वा अकेला वही था. देश के कानून का जैसे उसे कोई भय नहीं था.

लेकिन उसी कानून ने उसे राजमहल से जेल की कोठरी तक पहुंचा दिया. अब उस के वकील अदालत के इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील करने की तैयारी कर रहे हैं.

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डेढ़ सौ करोड़ की मालकिन शुभांगना की मौत की मिस्ट्री

“मैम साहब, दरवाजा खोलिए, मैं आप के लिए चाय लाई हूं.’’ नौकरानी टीला ने शुभांगना के कमरे का दरवाजा खटखटाते हुए कहा. कमरे से कोई आवाज नहीं आई तो टीला ने दोबारा दरवाजा खटखटाते हुए कहा, ‘‘मैम साहब, सुबह के 6 बज गए हैं, दरवाजा खोलिए.’’

इस बार भी न तो दरवाजा खुला और न ही कमरे के अंदर से हलचल की कोई आवाज आई. चिंतित हो कर टीला सोचने लगी कि मैम साहब आज उठ क्यों नहीं रही हैं? उस ने दरवाजे को धक्का दिया तो वह खुल गया. उस ने कमरे के अंदर जो देखा, उसे देख कर हैरान रह गई. शुभांगना कमरे में लगे पंखे से लटक रही थी. उसे इस हालत में देख कर उस की समझ में नहीं आया कि वह क्या करे. थोड़ी देर में होश ठिकाने आए तो उस ने चाय की ट्रे मेज पर रखी और तेजी से सीढि़यां उतरते हुए पहली मंजिल पर पहुंच कर अपने कमरे में सो रहे शुभांगना के 15-16 साल के बेटे मिहिर को झिंझोड़ कर जगाया.

मिहिर आंखें मलते हुए उनींदा सा उठा तो घबराई हुई टीला ने कहा, ‘‘बेटा, मैम साहब को पता नहीं क्या हो गया है? वह अपने कमरे में पंखे से लटकी हुई हैं.’’

टीला की बात सुन कर मिहिर चौंका. वह तेजी से कमरे से निकला और घर में लगी लिफ्ट से दूसरी मंजिल पर मम्मी के कमरे में पहुंचा. टीला भी उस के साथ थी. मिहिर ने मम्मी को पंखे से लटकी देखा तो उस की भी कुछ समझ में नहीं आया. उस ने ‘मम्मीमम्मी’ 2-3 बार आवाज लगाई. मम्मी जीवित होतीं तब तो जवाब देतीं. मिहिर रोने लगा. उसे रोता देख कर टीला भी रोने लगी. उस ने रोतेरोते ही कहा, ‘‘मेरी समझ में नहीं आ रहा कि क्या करूं?’’

‘‘मैं पापा और नानाजी को फोन करता हूं.’’ रोते हुए मिहिर ने कहा.

नाना को बताई हकीकत

इस के बाद मिहिर ने रोतेरोते नानाजी प्रेम सुराणा और पापा राजकुमार सावलानी को फोन कर के बताया कि मम्मी अपने कमरे में पंखे से लटकी हुई हैं. घर में कोई बड़ा और समझदार आदमी नहीं था. मिहिर अभी किशोर था, और टीला नौकरानी. उन की समझ में कुछ नहीं आया तो दोनों प्रेम सुराणा और राजकुमार सावलानी के आने का इंतजार करने लगे.

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कुछ ही देर में प्रेम सुराणा बेटी शुभांगना के बंगले पर पहुंच गए. वह लिफ्ट से सीधे दूसरी मंजिल पर स्थित शुभांगना के कमरे में पहुंचे. नाना को देख कर मिहिर उन से लिपट कर जोरजोर से रोते हुए बोला, ‘‘नानाजी, मम्मी को क्या हो गया है?’’

बेटी को पंखे से लटकी और नाती को इस तरह रोते देख कर प्रेम सुराणा को जैसे लकवा मार गया. मुंह से कोई शब्द नहीं निकला. उन की आंखें पथरा सी गईं. पल, दो पल बाद वह थोड़ा संयमित हुए तो उन की आंखों से भी आंसू टपक पडे़े.

यह कैसे और क्या हो गया, यह सब सोचने और समझने का समय प्रेम सुराणा के पास नहीं था. शुभांगना ने जींस और टौप पहन रखी थी, साथ ही वह पूरे गहने भी पहने हुए थी. प्रेम सुराणा ने शुभांगना के कमरे में रखी सैंटर टेबल पर टिके पैरों को पकड़ कर ऊपर उठाया और उस के गले में पड़े चुन्नी के फंदे को निकाला. उन की इस कोशिश में वह नीचे गिर पड़ी. उन्होंने शुभांगना की नब्ज टटोली तो वह शांत थी. लेकिन वह पिता थे, इसलिए उन का मन नहीं माना और वह उसे सवाई मान सिंह अस्पताल ले गए. अस्पताल के डाक्टरों ने प्राथमिक जांच के बाद शुभांगना को मृत घोषित कर दिया. प्रेम सुराणा फफकफफक कर रोने लगे. शुभांगना की मौत स्वाभाविक नहीं थी, इसलिए उन्होंने इस घटना की सूचना पुलिस को दे दी.

इंस्टीट्यूशंस की चेयरपर्सन थीं शुभांगना

यह इसी 26 अगस्त, 2017 की सुबह की बात है. शुभांगना गोखले मार्ग, जयपुर की पौश कालोनी सी स्कीम में बने अपने बंगले में रहती थी. वह राजस्थान के प्रतिष्ठित दीपशिखा एजुकेशन इंस्टीट्यूट समूह के मालिक प्रेम सुराणा की बेटी थी. वह खुद जसोदा देवी कालेजेज एंड इंस्टीट्यूशंस चलाती थी और इन इंस्टीट्यूशंस की चेयरपर्सन भी थी.

सुराणा की सूचना पर थाना अशोक नगर के एसआई कृष्ण कुमार सहयोगियों के साथ शुभांगना के बंगले पर पहुंच गए. पुलिस ने शुभांगना के कमरे से वह चुन्नी जब्त कर ली थी, जिस के फंदे में वह लटकी मिली थी. पुलिस सवाई मान सिंह अस्पताल भी गई, जहां शुभांगना की लाश को कब्जे में ले कर उस का पोस्टमार्टम करवाया. पोस्टमार्टम के बाद लाश घर वालों को सौंप दी गई.

शुभांगना की मौत जयपुर के अमीर घरानों में चर्चा का विषय बन गई. इस की वजह यह थी कि वह डेढ़, दो सौ करोड़ रुपए की संपत्ति की मालकिन थी. ऐसे में उस की इस तरह हुई मौत पर तरहतरह के सवाल उठने लगे. सब से बड़ा सवाल यह था कि शुभांगना ने फंदा लगा कर खुद जान दी या उसे मार कर इस तरह लटका कर आत्महत्या का रूप दिया गया था. कहानी आगे बढ़ने से पहले शुभांगना के बारे में जान लेना जरूरी है.

प्रेम सुराणा की बेटी शुभांगना शादी से पहले अपना नाम रुचिरा सुराणा लिखती थी. सुराणा परिवार जयपुर की पौश कालोनी बनीपार्क में रहता था. रुचिरा तब 16-17 साल की थी, जब उसे फिल्में देखने और गाने सुनने का शौक लगा. राजकुमार सावलानी बनीपार्क की सिंधी कालोनी में वीडियो लाइब्रेरी चलाता था. यह उस समय की बात है, जब फिल्में या तो थिएटर में या वीसीआर द्वारा देखी जाती थीं. वीसीआर में वीडियो कैसेट लगती थी.

राजकुमार के हाथ लगी स्वर्णमृगी

रुचिरा वीडियो कैसेट्स लेने अकसर राजकुमार की वीडियो लाइब्रेरी जाती रहती थी. धीरेधीरे रुचिरा का राजकुमार के यहां आनाजना बढ़ता गया. राजकुमार भी उस समय 18-19 साल का था. जवानी की दहलीज पर खड़ी रुचिरा की उम्र नाजुक दौर से गुजर रही थी. ऐसे में कब वह पारिवारिक और सामाजिक मर्यादाओं को ताक पर रख कर फिसल गई, किसी को पता नहीं लगा.

कहा जाता है कि नौवीं तक पढ़ा राजकुमार वीडियो लाइब्रेरी चलाने से पहले अंडे का ठेला लगाता था. लेकिन अपने नाम के अनुसार, वह खूबसूरत था. शायद यही वजह थी कि उम्र के नाजुक दौर से गुजर रही रुचिरा उस के आकर्षण में खिंचती चली गई. रुचिरा नाबालिग थी, लेकिन राजकुमार बालिग था. रुचिरा पैसे वाले बाप की बेटी थी, इसलिए राजकुमार उस से प्रेम की पींगे बढ़ाता गया. उस के मोहपाश में बंधी रुचिरा न अपना भलाबुरा सोच पाई न ऊंचनीच.

कहा जाता है कि राजकुमार ने रुचिरा को मानसिक रूप से इतना इमोशनल बना दिया था कि वह उस के कहने पर अपना सब कुछ गंवाने को तैयार थी. आखिर सारे बंधन तोड़ कर रुचिरा ने घर वालों की मर्जी के खिलाफ जा कर सन 1997 में दिल्ली जा कर आर्यसमाज मंदिर में राजकुमार सावलानी से शादी कर ली. शादी के बाद उस ने नाम बदल कर शुभांगना सावलानी रख लिया.

शुभांगना ने भले ही घर वालों की मर्जी के खिलाफ जा कर दूसरी जाति के अपनी हैसियत से कम वाले राजकुमार से शादी कर ली थी, लेकिन पिता प्रेम सुराणा ने उस का साथ नहीं छोड़ा. वह उसे पहले की तरह ही लाड़प्यार करते रहे. शुभांगना पढ़ीलिखी थी, उसे पिता के व्यवसाय की भी अच्छी समझ थी. इसलिए राजकुमार से शादी के बाद उस ने शिक्षा के क्षेत्र में अपना भाग्य आजमाया.

पिता प्रेम सुराणा से जो भी हो सका, मदद की. धीरेधीरे उस ने एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस स्थापित कर लिए. वहीं, राजकुमार ने भी अन्य व्यवसाय कर लिए. दोनों ने मेहनत से पैसा कमाया. धीरेधीरे परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी होती चली गई. इस बीच राजकुमार और शुभांगना के 2 बच्चे हुए. पहली बेटी वृद्धि, उस के बाद बेटा मिहिर.

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बढ़ता व्यवसाय

पैसा आया तो राजकुमार ने अपने छोटेमोटे धंधे छोड़ कर इंपोर्टएक्सपोर्ट का काम शुरू कर दिया. अब उस की गिनती बडे़ बिजनैसमैनों में होने लगी. प्रेम सुराणा ने शुभांगना को जयपुर के गोखले मार्ग की पौश कालोनी की सी स्कीम में एक बंगला गिफ्ट कर दिया. शुभांगना और राजकुमार बच्चों के साथ उसी बंगले में रहते थे. बाद में राजकुमार और शुभांगना ने अन्य व्यवसाय के साथ जैसलमेर में एक रिसौर्ट भी शुरू किया, लेकिन फिलहाल वह घाटे में चल रहा है.

शुभांगना और राजकुमार के जसोदा देवी कालेजेज एंड इंस्टीट्यूशंस के तहत जयपुर में 4 पौलिटैक्निक, एक बीएड, एक आईटीआई, बीबीए, बीसीए एवं पीसीडीसीए कालेज चल रहे हैं. इन के अलावा उन्होंने कई बेशकीमती फ्लैट और चलअचल संपत्तियां भी खरीदीं. राजकुमार और शुभांगना की गिनती जयपुर के धनीमानी लोगों में होने लगी थी.

शुभांगना तो बचपन से ही अमीर घर में पलीबढ़ी थी, इसलिए उसे घूमनेफिरने, पार्टियों में जाने आदि के महंगे शौक थे. पैसा आया तो शुभांगना अपने शौक पूरे करने लगी. हाईप्रोफाइल जिंदगी जीने वाली शुभांगना जयपुर में पेज थ्री का जानामाना चेहरा और सोशलाइट थी. रोजाना लाखों रुपए में खेलने वाले राजकुमार को भी महंगे शौक लग गए थे. उसे महंगी कारों का शौक था. उस के पास एक करोड़ रुपए की कीमत की जगुआर एक्सजे, 42 लाख रुपए की औडी ए4, 60 लाख रुपए की लैंड रोवर और 78 लाख की बीएमडब्ल्यू जेड 4 जैसी महंगी कारें थीं. दोनों को अकसर जयपुर में होने वाली हाईप्रोफाइल पार्टियों में देखा जाता था. राजकुमार को भी घूमनेफिरने, महंगे होटलों में एंज्वौय करने, हवाई यात्राएं करने और ऐशोआराम की जिंदगी जीना आ गया था.

राजकुमार और शुभांगना की गृहस्थी बढि़या चल रही थी. सन 2014 में दोनों गोवा घूमने गए, वहीं किसी बात को ले कर दोनों के बीच पहली बार विवाद हुआ. धीरेधीरे यह विवाद बढ़ता गया. शुभांगना ने राजकुमार के खिलाफ पुलिस में शिकायत भी की. इस के बाद शुभांगना ने तलाक का मुकदमा दायर कर दिया. 8 महीने पहले शुभांगना ने पिता द्वारा गिफ्ट किए गए बंगले पर और सीतापुरा स्थित कालेज में राजकुमार के आने पर रोक लगा दी. इस के बाद वह बंगले में बेटे मिहिर और नौकरानी टीला के साथ रहने लगी.

गोखले मार्ग पर बने जिस बंगले में शुभांगना रहती थी, वह 4 मंजिला है. इस बंगले में 3 ही लोग रहते थे. कोई मेहमान आता था तो वह भूतल पर ठहरता था. पहली मंजिल पर मिहिर रहता था. दूसरी मंजिल पर शुभांगना रहती थी. नौकरानी टीला को रहने के लिए बंगले की तीसरी मंजिल पर जगह दी गई थी. बंगले के अंदर ही ऊपरनीचे आनेजाने के लिए लिफ्ट लगी थी. शुभांगना की बेटी वृद्धि मुंबई में पढ़ रही थी, जबकि बेटा मिहिर मां के साथ रहते हुए जयपुर में ही निजी स्कूल में पढ़ता था.

शुभांगना की मौत संदिग्ध परिस्थितियों में हुई थी प्रेम सुराणा को विश्वास नहीं हो रहा था कि बेटी इस तरह आत्महत्या कर सकती है. इसलिए उन्होंने शुभांगना के पति राजकुमार पर हत्या का आरोप लगाते हुए थाना अशोक नगर पुलिस को एक तहरीर दी, जिस में तीन स्तरों पर जांच कराने की बात कही गई थी.

एक- राजकुमार शुभांगना की हत्या कर सकता है. दो- खुद के बजाय किसी अन्य व्यक्ति से हत्या करवा सकता है. तीसरी- शुभांगना को प्रताडि़त कर आत्महत्या के लिए उकसा सकता है.

पुलिस ने प्रेम सुराणा की तहरीर पर राजकुमार के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का मुकदमा दर्ज कर लिया. शुभांगना के पिता और घर के अन्य लोगों के अनुसार, शुभांगना को या तो हत्या कर के पंखे से लटकाया गया था या बेहोशी की हालत में. उन्होंने इस बारे में तर्क भी दिए.

शुभांगना की मौत पर इसलिए सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि 25 अगस्त की रात करीब साढ़े 10 बजे और 26 अगस्त की सुबह 4 बजे आधेआधे घंटे तक उस की राजकुमार से मोबाइल फोन पर बात हुई थी. जबकि दोनों के बीच बातचीत बंद थी और तलाक का मुकदमा चल रहा था. घर वालों का कहना है कि शुभांगना ने अचानक राजकुमार से बात क्यों की? आरोप है कि किसी अन्य व्यक्ति ने शुभांगना के मोबाइल से राजकुमार का नंबर लगाया. एक सवाल यह भी उठ रहा है कि शुभांगना ने पार्टी वीयर और गहने पहन कर आत्महत्या क्यों की? जबकि शाम को कालेज से घर आते ही वह सामान्य कपड़े पहन लेती थी.

शुभांगना ने सीतापुरा स्थित कालेज और बंगले पर राजकुमार के आने पर रोक लगा रखी थी. इस के बावजूद घटना से पहले एक सप्ताह में वह 2 बार कालेज गया. उस की 25 अगस्त की रात 10 बज कर 6 मिनट पर कालेज आने और 26 अगस्त की सुबह 7:02 बजे बाहर जाने की एंट्री दर्ज है. इस से पहले राजकुमार 22 अगस्त को भी कालेज गया था. सवाल उठ रहा है कि घटना की रात राजकुमार कालेज क्यों गया था?

मीडिया ने केस का रंग बदला

पुलिस ने शुभांगना की मौत को आत्महत्या का सामान्य मामला मानते हुए जांच शुरू की थी. यह हाईप्रोफाइल मामला मीडिया की सुर्खियों में आया तो पुलिस ने गहराई से जांच शुरू की. पुलिस ने शुभांगना का मोबाइल फोन और डायरी जब्त कर ली है. शुभांगना डायरी लिखती थी.

टीला के अनुसार, 25 अगस्त की रात खाना खा कर शुभांगना सो गई थी. 26 अगस्त की सुबह जब वह मैम साहब के लिए चाय ले कर गई तो वह पंखें से लटकी मिलीं. शुभांगना के पड़ोसियों और कालेज स्टाफ से भी पूछताछ की गई है. पुलिस ने सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी देखी है. शुभांगना के घर के आसपास लगे कैमरों में 25 अगस्त की रात उस के घर कोई आदमी आता दिखाई नहीं दिया. शुभांगना के अपने बंगले पर 2 गार्ड भी रहते थे, पुलिस को उन से भी कोई खास जानकारी नहीं मिली.

पुलिस ने एक सितंबर को राजकुमार को थाने बुला कर सुबह से रात तक कई दौर में पूछताछ की. वकील की मौजूदगी में हुई इस पूछताछ में राजकुमार ने पुलिस को बताया कि इसी साल जुलाई में शुभांगना से उस का दोबारा संपर्क हुआ था. राजकुमार के परिचितों का कहना है कि कालेज राजकुमार संभालता था. उस के कालेज में जाने से रोक लगाने के बाद कालेज की स्थिति बिगड़ने लगी थी. तब जुलाई में शुभांगना ने उसे फोन किया था.

इस के बाद भी उस ने कई बार संपर्क किया. इस बार कालेज में उम्मीद के मुताबिक बच्चों के प्रवेश नहीं हुए थे. इस की वजह से भी वह मानसिक रूप से परेशान थी. राजकुमार ने शुभांगना को समझाया भी था. राजकुमार के मोबाइल में इस से संबंधित सबूत मौजूद बताए जाते हैं. पुलिस ने राजकुमार के 2 मोबाइल फोन जब्त किए हैं. उन में राजकुमार और शुभांगना की बातों की कुछ कौल रिकौर्डिंग हैं.

आरोपप्रत्यारोप

पता चला है कि घटना से 5-6 दिनों पहले शुभांगना ने अपने जेठ और सास को फोन कर के घर बुलाया था. मां और भाई ने राजकुमार को भी वहां बुलाया था, लेकिन वह नहीं आया.

बाद में शुभांगना उसे अपनी गाड़ी से ले कर आई थी. उस समय शुभांगना ने राजकुमार से कहा था कि पापा को उस के यहां आने का पता नहीं चलना चाहिए. शुभांगना का जयपुर के मनोचिकित्सक से इलाज चलने की भी बात कही जा रही है.

दूसरी ओर प्रेम सुराणा और शुभांगना के वकील अनिल शर्मा ने राजकुमार और उस के घर वालों पर कई तरह के आरोप लगाए हैं. प्रेम सुराणा का कहना है कि राजकुमार के कई लड़कियों, महिला कर्मचारियों और नौकरानी से संबंध थे. शुभांगना को जब इन बातों का पता चला तो उस ने राजकुमार को टोका. तब शराब के नशे में वह शुभांगना से मारपीट करने लगा.

उस ने कालेज में भी लाखों रुपए का घोटाला किया है. वह शुभांगना की जासूसी भी कराता था. उन्होंने राजकुमार पर शुभांगना की हत्या का शक जताते हुए पुलिस अधिकारियों को कुछ दस्तावेजी सबूत भी दिए हैं. इन में मौत से पहले शुभांगना की ओर से अपने वकील को भेजे गए ईमेल और वाट्सएप पर राजकुमार से हुई बातचीत के अंश शामिल हैं.

प्रेम सुराणा का कहना है कि पुलिस इस मामले में ढंग से जांच नहीं कर रही है. शुभांगना की मौत के मामले में 6 सितंबर को वह समाज के कुछ लागों को ले कर जयपुर में राजस्थान के गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया से मिले थे. तब गृहमंत्री ने उन्हें न्याय दिलाने की बात कही थी.

विवादास्पद बातें

शुभांगना के वकील अनिल शर्मा का कहना है कि 25 अगस्त की रात को राजकुमार सीतापुरा स्थित कालेज गया था. उस ने कालेज में रुकने के लिए शुभांगना को फोन किया था.

कालेज में लगे सीसीटीवी कैमरों में राजकुमार के आने की फुटेज थी, जो बाद में नष्ट कर दी गई. उन का यह भी कहना है कि राजकुमार ने शुभांगना के मोबाइल में कोई ऐप डाउनलोड कर दिया था, जिस से जब वह मोबाइल पर किसी से बात करती थी तो वह राजकुमार तक पहुंच जाती थी.

वह जब भी कालेज जाता था, तब वहां आया कैश ले जाता था. शुभांगना के फर्जी हस्ताक्षर कर के उस ने कई जगहों से कर्ज भी लिया था. कुछ दिनों पहले उस ने 90 लाख रुपए का एक फ्लैट बेचा था.

जब वह शुभांगना के साथ रहता था, तब उसे काफी परेशान करता था. कई दिनों के लिए उसे कमरे में बंद कर देता था, खाना भी नहीं देता था. मायके वालों से मिलने पर पाबंदी लगा रखी थी. शुभांगना ने ये सारी बातें वकील प्रदीप शर्मा को ईमेल और वाट्सएप पर लिख कर भेजी थीं.

दूसरी ओर राजकुमार सावलानी का कहना है कि शुभांगना ने 23 अगस्त को उसे घर पर बुलाया था. जब वह नहीं गया तो वह खुद उसे लेने आ गई. घर ले जा कर उस ने नाश्ता कराया था और एक मोबाइल फोन गिफ्ट किया था. नए नंबर ले कर फोन चालू किया, जिस पर शुभांगना के मैसेज और फोन आए थे. 25 अगस्त को जब शुभांगना के मातापिता को पता चला कि वह मुझ से बात कर रही है तो उन्होंने उसे काफी डांटाफटकारा.

शुभांगना पहले से ही मानसिक रूप से परेशान थी, वह दबाव में आ गई. 26 अगस्त की सुबह 3 बज कर 41 मिनट पर मेरे मोबाइल पर उस का मैसेज आया. मैसेज में उस ने कहा था कि ‘मुझे माफ कर दो और कालेज व रिसौर्ट चला दो.’ इस के बाद 4 बजे उस का फोन आया तो उस ने 32 मिनट तक बात की.

वह यही कहती रही कि मेरे मातापिता ने तुम्हारे साथ अच्छा नहीं किया. राजू हम दोनों साथ रहना चाहते हैं, लेकिन मेरे मातापिता नहीं चाहते कि हम साथ रहें. इसी वजह से मैं डिप्रेशन में हूं. अब मुझ से काम भी नहीं संभल रहा है. मैं ने कहा कि इस बारे में सुबह बात करेंगे. सब ठीक हो जाएगा.

राजकुमार का कथन

सुबह बेटे ने फोन कर के बुलाया, तब पता चला कि शुभांगना की मौत हो गई है. राजकुमार ने शुभांगना की मौत के लिए प्रेम सुराणा और उन के घर वालों को जिम्मेदार बताते हुए कहा कि ‘मैं ने लवमैरिज की थी, यह बात प्रेम सुराणा कभी नहीं भुला पाए. इसीलिए मुझे शुभांगना की मौत के मामले में फंसाना चाहते हैं.’

शुभांगना की मौत की जांच में लापरवाही बरतने के आरोप में 7 सितंबर को थाना अशोक नगर के थानाप्रभारी बालाराम को जयपुर पुलिस कमिश्नर संजय अग्रवाल ने लाइनजाहिर कर दिया था. इस के बाद उन्हें जयपुर रेंज में लगा दिया गया. अब उन्हें थानाप्रभारी न लगा कर नौन फील्ड में रखने के निर्देश दिए गए हैं. उन पर आरोप लगा है कि वह शुभांगना की मौत के मामले में न तो घटनास्थल पर गए और ना ही एफएसएल टीम बुलाई. उन्होंने घटनास्थल की वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी भी नहीं कराई. लाश का पोस्टमार्टम भी मैडिकल बोर्ड से नहीं कराया गया.

कथा लिखे जाने तक यह हाईप्रोफाइल मामला एक मिस्ट्री बना हुआ था. पुलिस शुभांगना की मौत का रहस्य पता लगाने की कोशिश में जुटी हुई थी. डीसीपी योगेश दाधीच के नेतृत्व में जांच चल रही है. बहरहाल अगर किसी ने अपराध किया है तो कानून उसे अवश्य सजा देगा. लेकिन वृद्धि और मिहिर को अब मां का प्यार कभी नहीं मिल पाएगा.

शुभांगना भले ही अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उस की आंखें इस दुनिया को देख रही हैं. क्योंकि पति राजकुमार और पिता प्रेम सुराणा ने उस की आंखें दान कर दी थीं. शुभांगना की आंखें जयपुर के सवाई मान सिंह अस्पताल में भर्ती 2 लोगों को प्रत्यारोपित कर दी गई थीं.

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जब सड़कों पर उतरते हैं बड़े घरों के लाडले

सेक्टर-8 की सेंट्रल रोड से होते हुए वर्णिका कुंडू सेक्टर-7 के पेट्रोल पंप के पास पहुंची तो उस के किसी दोस्त का फोन आ गया. कार को सड़क किनारे रोक कर वह फोन सुनने लगी. तभी उस ने देखा कि एक एसयूवी (स्पोर्ट्स यूटिलिटी व्हीकल) पीछे आ कर रुकी और उस में से 2 युवक उतर कर उस की कार की ओर बढ़ने लगे. सफेद रंग की यह एसयूवी गाड़ी तभी से उस का पीछा कर रही थी, जब वह सेक्टर-8 से निकली थी. तब उस ने इसे गंभीरता से नहीं लिया था.

उस रोज शुक्रवार था और तारीख थी 4 अगस्त, 2017. देर रात सवा 12 बजे वर्णिका अपनी कार से सेक्टर-8 की मार्केट से पंचकूला स्थित अपने घर जा रही थी. हरियाणा का यह शहर चंडीगढ़ से एकदम सटा है. उस जगह से घर पहुंचने में उसे 10-15 मिनट से ज्यादा का वक्त नहीं लगना था.

पहले भी वह करीबकरीब रोजाना चंडीगढ़ से पंचकूला इसी तरह अकेली जाती थी, वक्त भी यही होता था. चंडीगढ़ उसे हर तरह से सुरक्षित लगता था. लेकिन उस रात पीछे आने वाले युवकों का अलग सा अंदाज देख कर उस के मन में अनहोनी की आशंका हुई. उस ने फोन बंद कर के वहां से कार दौड़ा दी.

कार को वहां से भगाते समय उस ने फ्रंट मिरर में देखा कि उन लड़कों ने भी जल्दी से अपनी एसयूवी में बैठ कर उस की कार के पीछे दौड़ा दी. उन्हें देख कर साफ पता चल रहा था कि उन्हें एक अकेली लड़की को देख कर परेशान करने में बहुत मजा आ रहा था. वे बारबार हौर्न बजाते हुए डिपर का भी इस्तेमाल करते रहे. वर्णिका को एक बारगी लगा कि वे उस की कार में टक्कर मारेंगे. उन के हावभाव से शराब पिए होने की आशंका भी लग रही थी. साथ ही वे गलत इशारे भी कर रहे थे.

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नीली शर्ट वाले लड़के की बदमाशी

पूरी तरह चौकन्नी हो कर अपनी कर को तेज रफ्तार से भगाते हुए वर्णिका सेक्टर-26 स्थित सेंट जौन स्कूल के पास उस जगह पहुंच गई, जहां न्योन लाइट्स की काफी रोशनी थी. उसे लगा कि अगर लड़कों की नीयत ठीक न हुई तो भी वे भरपूर रोशनी में उस के साथ कोई शरारत करने की हिम्मत नहीं जुटा पाएंगे. वर्णिका ने सोचा कि वहां रुक कर उसे अपने घर वालों को सारी स्थिति बता देनी चाहिए ताकि वे लोग उसे लेने वहां आ जाएं.

लेकिन उन लड़कों को जैसे किसी तरह का कोई डर नहीं था. वर्णिका के किसी निर्णय पर पहुंचने से पहले ही उन्होंने भरपूर रोशनी में भी अपनी गाड़ी वर्णिका की कार के आगे लगा कर उसे रुकने को मजबूर कर दिया.

उन के इस कृत्य से वर्णिका बुरी तरह घबरा गई, मगर उस ने धैर्य नहीं छोड़ा. लगातार हौर्न बजाते हुए उस ने कार को रिवर्स गीयर में डाला और वहां से भागने को हुई. तभी एसयूवी में से नीली टीशर्ट पहने एक युवक उतर कर अजीब तरह से हाथपैर हिलाते हुए उस की कार के पास आ पहुंचा.

उस ने जैसे ही कार को रोकने की कोशिश की, वर्णिका ने कार रोकने के बजाए उल्टी दिशा में भगा दी और ट्रैफिक लाइट पर पहुंच कर दाईं ओर मोड़ने की कोशिश की. तभी यूएसवी उस के पास से तेजी से निकल कर घूमी और आगे आ कर उस का रास्ता रोक लिया.

वर्णिका ने होशियारी से काम लिया और कार सेक्टर-26 की ओर घुमा कर मध्यमार्ग पर ले जाने की कोशिश की. उसे यकीन था कि अगर उस की कार मध्यमार्ग पर पहुंच गई तो वह पूरी तरह सुरक्षित हो जाएगी. लेकिन यहां भी लड़कों की गाड़ी ने फिर से उस का रास्ता रोक लिया.

इस बार भी पहले वाले लड़के ने अपनी गाड़ी से उतर कर उसे कार रोकने का इशारा किया और वर्णिका की ओर भागा. वर्णिका ने अपनी कार फिर से रिवर्स गीयर में डाल कर उल्टी दिशा में दौड़ा दी. जैसेतैसे वह मध्यमार्ग पर पहुंचने में सफल हो गई. यहां से उस ने गीयर बदल कर अपनी कार पंचकूला जाने वाले रास्ते पर दौड़ा दी.

इसी बीच वर्णिका ने 100 नंबर पर पुलिस कंट्रोल रूम (पीसीआर) को फोन कर के इस मामले की जानकारी देते हुए मदद मांगी. पुलिस ने उस की सही लोकेशन पूछी और जल्दी पहुंचने का आश्वासन दिया. इस के बाद कुछ दूर तक एसयूवी नजर नहीं आई. वर्णिका को लगा कि लड़कों ने उसे फोन करते देख लिया होगा और वे समझ गए होंगे कि उस ने पुलिस को फोन कर दिया है.

अपनी समझ के मुताबिक वर्णिका यह सोच कर आश्वस्त हो गई कि उस का पीछा करने वाले लड़कों ने डर कर रास्ता बदल दिया होगा और पीछे मुड़ गए होंगे, अब एसयूवी उस के पीछे नहीं आएगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. मिनट भर का अंतराल भी नहीं हुआ था कि वह गाड़ी तेज रफ्तार से वर्णिका की कार के पीछे आती नजर आई.

उस वक्त वर्णिका करीब 6 किलोमीटर लंबी सीधी रोड पर थी. इस पूरे रास्ते भर एसयूवी निरंतर उस का पीछा करती रही. कार में सवार लड़के उसे रोकने की पूरी कोशिश कर रहे थे. यह स्थिति देख वर्णिका को अपना हौंसला पस्त होता नजर आने लगा था. उसे पुलिस का बेसब्री से इंतजार था.

वर्णिका का डर

वह सोच रही थी कि अगर वक्त रहते पुलिस ने आ कर उन लड़कों को काबू न किया और वह उन के हत्थे चढ़ गई तो पता नहीं उस का क्या होगा? इस में कोई शक नहीं था कि उस का पीछा करने वाले शोहदे थे. उन के इरादे खतरनाक भी हो सकते थे, दिमाग में उमडतीघुमड़ती इस तरह की बातें वर्णिका को परेशान करने लगी थीं. फिर अभी यह भी स्पष्ट नहीं था कि वे लोग इस तरह उस के पीछे क्यों पड़ गए थे.

जो भी था, निरंतर 5 किलोमीटर तक वर्णिका ने अपनी कार पूरी रफ्तार से भगाई. उस का पीछा करती एसयूवी भी उसी रफ्तार से उसे फौलो करती हुई उस तक पहुंचने का प्रयास कर रही थी.

घिर गई वर्णिका

पंचकूला-चंडीगढ़ को जोड़ने वाला हाऊसिंग बोर्ड चौक ज्यादा दूर नहीं रहा था. मगर वहां तक पहुंचने से पहले ही लड़कों ने अपनी गाड़ी और भी तेज रफ्तार से भगाते हुए वर्णिका की कार को घेर कर रोक लिया. इस बार भी पहले वाला युवक दौड़ता हुआ वर्णिका की कार के पास आया और उस की कर की खिड़की खोलने का प्रयास करने लगा. दरवाजे का हैंडिल मजबूती से पकड़ कर वह बारबार इस तरह झटक रहा था जैसे उसे तोड़ कर ही मानेगा.

वर्णिका के पास इस के अलावा बचाव का अन्य कोई रास्ता नहीं था कि निरंतर हौर्न बजाती गाड़ी को फिर से रिवर्स गीयर में डाल कर वहां से निकलने का प्रयास करे. उस ने ऐसा ही किया भी.

लेकिन यह सड़क सुनसान नहीं थी. उस वक्त भी वाहनों की अच्छीखासी आवाजाही जारी थी. जरा सी देर में वहां काफी वाहन एकत्र हो गए, जिस की वजह से रास्ता अवरुद्ध हो गया. वर्णिका की कार के साथसाथ लड़कों की एसयूवी भी घिर गई. लोगों को स्थिति मालूम नहीं थी. वे अपने वाहनों से निकल कर इन लोगों को बुराभला कहते हुए अपनी गाडि़यां वहां से हटाने को कहने लगे. अगर ऐसा हो जाता तो वर्णिका निश्चित रूप से उन लड़कों के हत्थे चढ़ जाती.

अभी कुछ ही पल गुजरे थे कि सायरन बजाती पीसीआर वैन वहां आ पहुंची. इस में से उतरे पुलिसकर्मियों ने दोनों युवकों को उन की एसयूवी समेत काबू कर के थाना ईस्ट पहुंचा दिया. थाने में वर्णिका से लिखित शिकायत ले कर उसे घर जाने दिया गया.

वर्णिका वरिंदर सिंह कुंडू की बेटी थी. वरिंदर सिंह कुंडू हरियाणा में 1986 बैच के आईएएस अधिकारी हैं. कुंडू साहब के बारे में मशहूर है कि अपने पद पर रहते हुए उन्होंने अपना काम पूरी ईमानदारी और कुशलता से किया और वह कभी किसी के दबाव में नहीं आए. अन्याय तो वह कभी सहन नहीं करते थे. पीडि़त व्यक्ति को न्याय दिलवाने के लिए वह बड़े से बड़े शख्स से भी टकराने को तैयार हो जाते थे.

शायद यही वजह थी कि वह अब तक 30 तबादलों का दंश झेल चुके थे, जबकि उन्हें नौकरी में आए अभी कुल  31 बरस भी नहीं हुए थे. इन दिनों वह हरियाणा सरकार के एडीशनल चीफ सेक्रेटरी के पद पर तैनात थे.

कुंडू साहब के परिवार में उन की धर्मपत्नी सुचेता कुंडू के अलावा 2 बेटियां हैं, वर्णिका एवं सत्विका. सत्विका को मार्शल आर्ट सीखने का शौक था. इस संबंध मे उस ने एक सेंटर ज्वाइन किया तो देखते ही देखते उस का पूरा परिवार ही मार्शल आर्ट सीखने लगा.

कालांतर में कुंडू साहब इस फील्ड में सेकेंड डिग्री ब्लैकबेल्ट होल्डर बन गए. उन की बेटी वर्णिका ताईक्वांडो की प्रथम श्रेणी ब्लैकबेल्ट हासिल कर चुकी थी. सुचेता पंचकूला के बालनिकेतन व बाल सदन में रहने वाले बच्चों को मार्शल आर्ट का नि:शुल्क प्रशिक्षण देती थीं. वर्तमान में पी.एस. कूंडू ताईक्वांडो फेडरेशन औफ इंडिया के अध्यक्ष हैं.

स्कूली दिनों से ही वर्णिका को गीतसंगीत का शौक था. उस का सपना था कि बड़ी हो कर वह संगीतकार बने. ग्रैजुएशन की डिग्री हासिल करने के बाद उस ने अपना एक डीजे (डिस्को जौकी) खोल लिया. बाद में वह अन्य जगहों पर भी परफौर्म करने लगी. इस क्षेत्र में वह काफी लोकप्रिय होती जा रही थी. उस का अगला लक्ष्य मुंबई था.

society

चंडीगढ़ के सेक्टर-26 में एक बार है स्विस सिटी पब, जहां उस की परफोर्मेंस बहुत पसंद की जाती है. यहां से फारिग होने में उसे अकसर रात 12 बज जाया करते थे. लेकिन रात में यहां से घर के लिए अकेले निकलने में उसे कभी कोई परेशानी नहीं हुई थी. उस की नजर में चंडीगढ़ लड़कियों के लिए पूरी तरह सुरक्षित शहर था.

लेकिन 4 अगस्त, 2017 की आधी रात में उस की यह खुशफहमी तब निराशा में बदल गई, जब उसे अकेली देख 2 शोहदों ने गुंडागर्दी कर के उस की कार रोकने की कोशिश की थी. यह वर्णिका की बहादुरी भरी होशियारी ही थी कि वह उन के हत्थे चढ़ने से बच गई थी और पुलिस उन्हें उन की गाड़ी समेत थाना ले गई थी.

वर्णिका ने पिता को बताया

बदहवासी की सी स्थिति में घर पहुंच कर वर्णिका ने अपने साथ घटी इस घटना के बारे में परिवार के सदस्यों को बताया तो उस के पिता वरिंदर सिंह कुंडू उसे साथ ले कर उसी वक्त थाना सेक्टर-26 के लिए निकल गए. उन्होंने अपने एक परिचित वकील को भी फोन कर के थाने पहुंचने को कह दिया था, ताकि पुलिस इस मामले में कोई ढिलाई न बरत सके.

इस बात का अनुमान तो सहज ही लगाया जा सकता था कि जिन लड़कों ने बिना किसी खौफ के इतनी गुंडागर्दी दिखाई थी, वे कोई छोटेमोटे अपराधी नहीं हो सकते थे. कुंडू साहब ने सोचा कि पुलिस ने अगर उन के खिलाफ काररवाई नहीं की तो उन के हौसले और बुलंद हो सकते हैं.

थाने पहुंच कर पता चला कि दोनों लड़के कोई अपराधी न हो कर बड़े घरों के लाडले थे. इन में से एक था हरियाणा भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सुभाष बराला का बेटा विकास और दूसरा उस का दोस्त आशीष. पुलिस ने दोनों के खिलाफ छेड़छाड़ और रास्ता रोकने की कोशिश के अलावा मोटर व्हीकल एक्ट के तहत मामला दर्ज कर के दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया था, मगर इन धाराओं के तहत उन्हें थाने से ही जमानत पर छोड़ा जा सकता था.

अभी तक न तो पुलिस वालों को मालूम था और न ही उन दोनों लड़कों को कि इस मामले में शिकायतकर्ता हरियाणा के एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी की बेटी थी. बाद में जब यह परिचय सामने आया तो पुलिस वालों के पैरों तले की जमीन तो सरकी ही, दोनों आरोपी भी वर्णिका को बहन कहते हुए उस के व उस के पिता के सामने गिड़गिड़ा कर माफी मांगने लगे.

इस के बाद वी.एस. कुंडू के पास क्षेत्र के नेताओं के फोन आने लगे. सभी उन पर दबाव डाल कर इस मामले में समझौता करने को कह रहे थे. पुलिस पर भी दबाव था कि समझौता नहीं हो पाया तो जितनी धाराएं लगाई गई हैं, उन से आगे मत बढ़ना और लड़कों को थाने से ही जमानत दे कर घर भेज देना.

फेसबुक की पोस्ट रंग लाई

थाने में अभी यह सब चल ही रहा था कि वर्णिका ने एक ओर बैठ कर अपने स्मार्टफोन के माध्यम से फेसबुक एकाउंट पर इस घटना के खुलासे की पोस्ट डालते हुए अंत में अपना दर्द इस तरह से उजागर कर दिया ‘मुझे नहीं मालूम था कि मेरे साथ क्या हो सकता था. आरोपी मेरा रेप कर के मेरी हत्या भी कर सकते थे. चंडीगढ़ पुलिस द्वारा तुरंत एक्शन लिए जाने के कारण मैं आरोपियों की शिकार नहीं बनी. मगर हर लड़की मेरे जैसी लकी नहीं हो सकती.’

इस के बाद वर्णिका ने चंडीगढ़ पुलिस को दिल से धन्यवाद भी दिया.

लेकिन फिलहाल मामला ज्यों का त्यों रहा. पुलिस ने दोनों लड़कों का मेडिकल करवाया, जिस में उन के शराब पीने की पुष्टि हुई. सीआरपीसी की धारा 164 के तहत ड्यूटी मजिस्टे्रेट के सामने वर्णिका के बयान भी दर्ज करवाए गए. लेकिन इस के बाद 5 अगस्त को दोपहर बाद करीब 4 बजे दोनों आरोेपियों को थाने से जमानत पर छोड़ दिया गया.

यह देख हरियाणा की पूरी अफसरशाही वर्णिका के साथ आ खड़ी हुई. इन अधिकारियों ने मामला देश के प्रधानमंत्री तक पहुंचाने की तैयारी कर ली थी. सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को ले कर अलग बहस छिड़ गई, जिस में देश भर के आईएएस अधिकारी रुचि लेते हुए अपनी टिप्पणी करने लगे.

देखतेदेखते इस मामले पर राजनीति की रंगत भी चढ़ने लगी. विरोधी पार्टियों द्वारा बराला से नैतिकता के आधार पर इस्तीफा मांगा जाने लगा. चंडीगढ़ पुलिस की पहले ही से किरकिरी हो रही थी. जमानती धाराओं में केस दर्ज कर अभियुक्तों को थाने से ही जमानत देने पर सवाल उठ रहे थे. कानून विशेषज्ञों का कहना था कि इस केस में किडनैपिंग के प्रयास की धारा 365, 511 लगनी चाहिए थी.

आखिर, चडीगढ़ का यह हाईप्रोफाइल मामला प्रधानमंत्री के नोटिस में भी आ गया, जिन्होंने इस घटना पर बेहद नाराजगी जाहिर की. प्रधानमंत्री मोदी के कहने पर पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने मामले का संज्ञान लेते हुए सुभाष बराला को दिल्ली तलब कर लिया. उन्होंने शाह के सामने जहां अपना पक्ष रखा.

बराला को भाजपा का अभयदान

दूसरी ओर हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने अपना बयान जारी करते हुए कहा कि सुभाष बराला का इस प्रकरण से कोई लेनादेना नहीं है. यह मामला चंडीगढ़ पुलिस का है, जिस में हरियाणा सरकार का कोई दखल नहीं है. इसी बीच किरण बेदी का यह बयान कई सवाल खडे़ कर गया कि पुलिस को बिना इंटरोगेशन के अपराधियों को बेल नहीं देनी चाहिए थी.

7 अगस्त को इस प्रकरण पर रोष प्रकट करने के लिए चंडीगढ़ की लड़कियों ने हाथों में बैनर ले कर मुख्य सड़कों पर प्रदर्शन किया. इन बैनर्स पर लिखा था, ‘शेम फौर चंडीगढ़’ और ‘वी डिजर्व टू बी सेफ औन रोड्स’ (हमें सड़कों पर सुरक्षा का अधिकार चाहिए) वगैरह.

अब तक की पुलिस काररवाई में यही बात सामने आ रही थी कि सीसीटीवी कैमरों को खंगालते हुए केस में कानून की अन्य किसी धारा के जोड़ने अथवा न जोड़ने पर लीगल राय ली जा रही है. 7 अगस्त को घटना का सीन भी रिक्रिएट करवाया गया. मगर पुलिस का एक्शन अभी तक वहीं का वहीं था.

देखतेदेखते यह मुद्दा न केवल गरमा गया, बल्कि घरघर की चर्चा भी बन गया. शहर के अनेक जिम्मेवार लोग लौजिक के साथ अपनीअपनी राय देने लगे. चंडीगढ़ के सीनियर एडवोकेट ए.एस. सुखीजा ने केस को ले कर अपना तर्क देते हुए कहा कि इंसान झूठ बोल सकता है, लेकिन हालातों पर अविश्वास नहीं किया जा सकता. जिस वक्त यह घटना घटी, लड़की न केवल तनाव में थी बल्कि एक तरह का जबरदस्त मानसिक आघात भी झेल रही थी.

ऐसे में उस की कार गंभीर रूप से दुर्घटनाग्रस्त हो सकती थी, जिस में उस की जान भी जा सकती थी. उसे अपनी इज्जत खोने का खतरा नजर आ रहा था, ऐसी स्थिति में वह आत्महत्या का प्रयास भी कर सकती थी.

‘आप बात कर रहे हैं अपहरण के प्रयास का केस दर्ज करने की, मेरी नजर में यह हत्या के प्रयास का मामला है. पुलिस को इसे इस तरह हलकेपन से कतई नहीं लेना चाहिए.’ एडवोकेट सुखीजा का कहना था.

राजनीतिक पैंतरा

मामला उछलते और अपना दामन दागदार होते देख सुभाष बराला ने इस प्रकरण को लेकर 8 अगस्त को पहली दफा अपना बयान दिया कि इस केस को प्रभावित करने के लिए वह किसी भी तरह से अपने राजनैतिक प्रभाव का इस्तेमाल नहीं कर रहे. वर्णिका कुंडू केस में उन के बेटे विकास के खिलाफ जो भी जरूरी कदम हैं, वो उठाए जाने चाहिए. बीजेपी बेटियों की स्वतंत्रता की बात करती है और वर्णिका उन की बेटी जैसी है.

दूसरी ओर मामला ठंडा पड़ता दिखाई नहीं दे रहा था. इस मुद्दे पर चंडीगढ़ में तो रोजाना रोष प्रदर्शन हो ही रहे थे, 9 अगस्त को रोहतक की कुंडू खाप ने वर्णिका के समर्थन में रोहतक-जींद रोड पर कई घंटे का जाम लगाया.

कई साल पहले हरियाणा के तत्कालीन डीजीपी एसपीएस राठौर के मामले में रुचिका के हक में आवाज उठा कर उसे इंसाफ दिलवाने वाले आनंद प्रकाश व उन की पत्नी मधु आनंद ने भी वर्णिका को इंसाफ दिलवाने में उस का साथ देने की घोषणा कर दी. कई जगह सुभाष बराला का पुतला जलाने की भी घटनाएं हुईं.

हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने अपना बयान जारी करते हुए साफ कह डाला कि केंद्र सरकार के इशारे पर इस मामले को रफादफा करने की कोशिश हो रही है.

9 अगस्त को सुभाष बराला ने इस प्रकरण पर बात करने के लिए एक संवाददाता सम्मेलन का आयोजन कर के पत्रकारों को बुलवाया. प्रैस कान्फ्रैंस शुरू हुए अभी कुछ ही मिनट गुजरे होंगे कि सुभाष बराला को किसी का फोन आ गया. उन्होंने फोन क्या सुना कि बिना पत्रकारों से कुछ कहे वहां से चले गए.

बाद में मालूम पड़ा कि मिनिस्ट्री औफ होम अफेयर्स से यूनियन होम सेके्रटरी राजीव महर्षि के दखल के बाद चंडीगढ़ पुलिस ने विकास बराला व उस के साथी पर दर्ज एफआईआर में किडनैपिंग की कोशिश की धारा 365, 511 का समावेश कर दिया है. साथ ही पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर के सेक्टर-26 स्थित ईस्ट थाना की हवालात में बंद कर दिया है. इसी सब की सूचना सुभाष बराला को मिली थी.

सामने आई करतूत

इस दफा पुलिस ने दोनों अभियुक्तों का 2 दिन का कस्टडी रिमांड ले कर उन से व्यापक पूछताछ की. विकास बराला कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय से एलएलबी की पढ़ाई कर रहा था और उस का दोस्त आशीष इसी साल अपनी पढ़ाई पूरी कर चुका था. दोनों का संबंध प्रभावशाली घरों से था और इन की आपस में बनती भी खूब थी.

भले ही इन युवकों पर गैरजमानती धाराएं लगा कर पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर के अदालत से इन का कस्टडी रिमांड ले लिया था, मगर पावर का नशा जैसे अभी भी उन के सिर चढ़ कर बोल रहा था. पुलिस की पूछताछ में अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को नकारते हुए दोनों ने बयान दिया कि विकास बराला को एलांते मौल से अपने जूते बदलवाने थे, जिस के लिए वह अपने दोस्त आशीष को साथ ले गया था.

बकौल विकास बराला, उन दोनों ने सेक्टर-8 की मार्केट की एक वाइन शौप से बीयर ले कर कार में बैठ कर 1-1 बोतल पी थी.

वर्णिका कुंडू को पहले से जानने की बाबत पूछने पर दोनों ने कहा कि वे उसे नहीं जानते और न ही उन लोगों ने उस का पीछा कर के उसे रोकने की कोशिश की थी. लेकिन इस बात को दोनों ने माना कि सेक्टर-7 में उन्होंने वर्णिका जैसी कार पर एक अकेली लड़की को जाते देखा था.

‘सीसीटीवी में साफ दिख रहा था कि तुम लोगों की गाड़ी वर्णिका की कार के पीछे जा रही है.’ पूछे जाने पर विकास बराला का जवाब था कि उन की गाड़ी भी हाउसिंग बोर्ड की तरफ गई थी. लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि वे लोग उस का पीछा कर रहे थे. फिर उन्होंने उस के साथ ऐसी कोई आपराधिक वारदात तो की नहीं थी.

‘मुझे और मेरे दोस्त को यूं ही बलि का बकरा बना लिया गया है. हम ने अपराध जैसा कुछ नहीं किया.’ विकास बराला ने कहा.

आधी रात में पुलिस ने इन दोनों को साथ ले जा कर क्राइम सीन दोहराया. इस से सारी असलियत सामने आ गई. थोड़ी सख्ती से की गई पूछताछ में दोनों ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. पुलिस ने इस केस में विकास बराला को मुख्य अभियुक्त और उस के दोस्त आशीष को सह अभियुक्त बनाया.

मुंह खोलना पड़ा

पुलिस की व्यापक पूछताछ में जो कुछ विकास बराला ने बताया, वह कुछ इस तरह से था—‘दरअसल किडनैपिंग हमारा मकसद किसी भी हाल में नहीं था. हम लोग अपनी गाड़ी में बैठे बीयर पी रहे थे. इतने में एक कार हमारे पास आ कर हल्की सी स्लो हो गई और उस में बैठी लड़की ने हमारी तरफ देखा.’

आशीष ने कहा, ‘लड़की देख कर गई है, गाड़ी उस के पीछे लगाओ. मैं ने गाड़ी उस कार के पीछे लगा दी. दरअसल, हम सिर्फ लड़की की शक्ल देखना चाहते थे. जानना चाहते थे कि वह जानपहचान की तो नहीं है. लड़की घबरा गई और नशे में हमें भी पता नहीं चला कि अखिर क्या हो रहा है. इस के बाद हम कभी लड़की की कार के आगे अपनी गाड़ी लगाते रहे और कभी पीछे. लड़की घबरा गई थी और नशे में होने की वजह से हमें इस का इल्म नहीं था.’

कस्टडी रिमांड की अवधि समाप्त होने पर पुलिस ने विकास और आशीष को ड्यूटी मजिस्ट्रेट गौरव दत्ता की कोर्ट पर पेश कर के न्यायिक हिरासत में बुडै़ल जेल भेज दिया गया.

28 अगस्त को दोनों अभियुक्तों की ओर से एसीजेएम बलजिंदर पाल सिंह की अदालत में जमानत की अर्जी लगाई गई. 29 अगस्त को सक्षम दंडाधिकारी ने इस टिप्पणी के साथ उन की जमानत याचिका खारिज कर दी कि उस रात इन लोगों का व्यवहार बीस्ट इन लस्ट सरीखा था.

8 सितंबर को इन की ओर से जमानत की अर्जी एडिशनल सैशन जज रजनीश कुमार शर्मा की अदालत में लगाई गई. 12 सितंबर को विद्वान एडीजे ने भी अपनी इस टिप्पणी के साथ इन अभियुक्तों को जमानत देने से इनकार कर दिया कि दोनों की हरकतें रोडसाइड रोमियो सरीखी सामने आई है.

ठीक इसी रोज एक और बात हुई. वी.एस. कुंडू पर फिर से तबादले की गाज गिरी. उन्हें एक अहम विभाग से हटा कर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग में नियुक्त कर दिया गया. 14 सितंबर को वर्णिका की जिंदगी फिर से डीजे ट्रैक पर आ गई, मतलब वह अपने काम पर लौट आई थी.

दूसरी ओर चंडीगढ़ पुलिस ने 21 सितंबर, 2017 को विकास बराला व आशीष के खिलाफ 40 गवाहों की सूची के साथ 300 पेज का चालान अदालत में पेश कर दिया था. यह चालान भादंवि की धारा 341, 354डी, 365, 511 और 34 के अलावा 185 मोटर वेहिकल एक्ट के तहत दाखिल किया गया.

बहरहाल, यह पहला मौका नहीं है जब राजनीति से जुड़े बड़े घरों के ये लाडले अपनी करतूत की वह से सलाखों के पीछे पहुंचे हैं. कतिपय उदारहण काबिलेगौर है, बाहुबली नेता अमरमणि त्रिपाठी व उन के बाहुबली बेटे व एमएलए अमनमणि त्रिपाठी दोनों ही पत्नी की हत्या के मामले में फंसे. अमरमणि जहां अपनी पत्नी की हत्या के मामले में फंसे. वहीं अमनमणि पर भी अपनी पत्नी सारा सिंह की हत्या का मुकदमा चल रहा है.

उत्तर प्रदेश के बाहुबली नेता डीपी यादव का बेटा विकास यादव नीतिश कटारा की हत्या के मामले में सजा काट रहा है. तूणमूल कांग्रेस के नेता एस.डी. सोहराब के बेटे सांबिया सोहराब पर हिट एंड रन केस में वायुसेना अधिकारी अभिमन्यु गौड़ की हत्या का आरोप लगा था.

चश्मदीदों के मुताबिक सांबिया ने शराब के नशे में अपनी औडी कार उस समय उक्त वायुसेना अधिकारी अभिमन्यु गौड़ पर चढ़ा दी थी, जब वह गणतंत्र दिवस की परेड में हिस्सा ले रहे थे.

हरियाणा जनचेतना पार्टी के फाउंडर एवं कांग्रेस के पूर्व दिग्गज नेता विनोद शर्मा के बेटे मनु शर्मा को मौडल जेसिका लाल हत्याकांड में उम्रकैद की सजा मिली थी.

स्थानीय स्तर पर कथित बड़े घरों के लाडलों की दबंगई के इस कदर मामले होते रहते हैं कि गिनती करना मुश्किल है. चिंता का विषय यही है कि क्या कभी इन की मानसिकता में बदलाव आएगा.

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मिस वर्ल्ड का खिताब मेरे लिए वन टाइम अचीवमैंट है : मानुषी छिल्लर

18 नवंबर, 2017 को चीन के सान्या में आयोजित ब्यूटी कौंटैस्ट में ‘मिस वर्ल्ड 2017’ का खिताब जब हरियाणा की मानुषी छिल्लर को मिला, तो उन की खुशी की सीमा नहीं थी. उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि उन्हें इतना बड़ा खिताब मिलेगा. अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा के बाद वे दूसरी ‘मिस वर्ल्ड’ बनी हैं. इस प्रतियोगिता में 118 देशों की सुंदरियों ने भाग लिया. मानुषी की परफौर्मैंस को देखते हुए उन्हें ‘ब्यूटी विद पर्पज’ का पुरस्कार भी मिला. वे भारत के लिए मुकुट जीतने वाली छठी सुंदरी है.

हरियाणा के रोहतक में जन्मी और दिल्ली में पलीबढ़ीं मानुषी मैडिकल की छात्रा हैं. वे बताती हैं, ‘‘मैं डाक्टर परिवार से हूं. मेरे मातापिता दिल्ली में रहते हैं और अब मैं हरियाणा में रहती हूं. वहां मैडिकल की पढ़ाई कर रही हूं. बचपन से मुझे ‘मिस इंडिया’ और डाक्टर दोनों बनने की इच्छा थी, क्योंकि मातापिता के प्रोफैशन को मैं ने बचपन से देखा है, लेकिन यह सब हकीकत में हो जाएगा पता नहीं था. ‘‘मैं कभीकभी ‘मिस इंडिया’ के शो टीवी पर देख लेती थी. मैं उन के ग्लैमर के साथसाथ उन के अंदर की खूबसूरती को भी देखने की कोशिश करती थी. जब मिस इंडिया का खिताब मुझे मिला, तो मुझे यकीन नहीं हो रहा था. इस से मेरा हौसला बढ़ गया. मुझे लगा कि मैं इस क्षेत्र में भी कुछ कर सकती हूं. ‘‘मुझे हमेशा नया काम और चुनौतियों का सामना करना पसंद रहा है. इसीलिए मैं ने पढ़ाई के साथसाथ कुचिपुड़ी नृत्य भी  सीखा है.’’

आसान न था सफर

यहां तक पहुंचने में मानुषी को काफी मेहनत करनी पड़ी. इस प्रतियोगिता की तैयारी के लिए उन्हें काफी समय देना पड़ता था. मानुषी कहती हैं, ‘‘मैडिकल के साथसाथ इस की तैयारी मुश्किल थी. पर मैं ने समय के हिसाब से तालमेल बैठाया और फिर सब हो गया. असल में ‘मिस इंडिया’ एक पर्सनैलिटी कौंटैस्ट है, जहां सुंदरता से अधिक बाकी चीजों पर ध्यान देने की जरूरत होती है. मसलन, सामान्य ज्ञान को मजबूत करना, फिटनैस को बढ़ाना होता है. ‘‘इस के अलावा बातचीत  का ढंग, सब से मिलना, उन के  साथ रहना, अपनी बातें शेयर करना आदि सब इंप्रूव करना होता है.  इस प्रतियोगिता की तैयारी के दौरान मैं काफी बुद्धिमान लोगों से मिली जिन से काफी कुछ सीखने  को मिला.’’

यादगार पल

मानुषी को जब मिस वर्ल्ड का ताज मिला तो उन के सारे भाव बाहर आ गए, क्योंकि उन के सपने की सब से सुंदर शुरूआत हो चुकी थी. उन के यहां तक पहुंचने में उन के मातापिता का बहुत सहयोग रहा. उन्हें जब भी उन की जरूरत महसूस हुई वे साथ खड़े दिखें. प्रतियोगिता के दौरान मानुषी ने कतई प्रैशर महसूस नहीं किया, क्योंकि सभी का भरोसा उन पर बहुत था. अपने अनुभव को शेयर करते हुए मानुषी कहती हैं, ‘‘यह मेरे लिए ‘वन टाइम अचीवमैंट’ है. यह प्रतियोगिता काफी कठिन होती है. हर कोई सुंदर और बुद्धिमान होता है, ऐसे में ‘मिस वर्ल्ड’ का खिताब जीतना अपनेआप में खास था.’’ मानुषी मैडिकल की पढ़ाई पूरी करने के साथसाथ महिलाओं और बच्चों के उत्थान के लिए भी काम करना चाहती है. उन के अनुसार अगर लड़कियां पढ़ीलिखी होंगी, तो परिवार और समाज दोनों का विकास होगा.

VIDEO : हेयरस्टाइल स्पेशल

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विवादों की क्वीन : कंगना रनौत

सन 1994 में अनिल कपूर, मनीषा कोइराला अभिनीत एक फिल्म आई थी ‘1942 ए लव स्टोरी.’ इस फिल्म में जावेद अख्तर का लिखा एक गाना अनिल कपूर और मनीषा कोइराला पर फिल्माया गया था,  ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा, जैसे खिलता गुलाब… जैसे शायर का ख्वाब…’ इस गाने का प्रस्तुतिकरण भी बहुत खूबसूरत था और मनीषा कोइराला भी वैसी ही लग रही थीं, जैसा गाने के शब्दों में वर्णन किया गया था.

फिल्मी दुनिया में खूबसूरत हीरोइनों की कभी कमी नहीं रही. मधुबाला, माधुरी दीक्षित और हेमा मालिनी से ले कर प्रियंका चोपड़ा, दीपिका पादुकोण और श्रद्धा कपूर तक यह सफर जारी है और आगे भी रहेगा. लेकिन पहाड़ी झरनों जैसी चंचलता, नदी की लहरों जैसी रवानगी, फूलों जैसी सुगंध के साथ बहती हवा और सुबह की बेला में चहचहाते पक्षियों की सुरीली ध्वनि में मन को जो सुकून मिलता है, कुछ ऐसी ही बात थी, मनीषा कोइराला में. मनीषा का जिक्र इसलिए, क्योंकि ऐसी ही कुछ बात कंगना रनौत में भी है. यह इत्तफाक ही है कि ये दोनों ही पहाड़ी बालाएं हैं. अगर आपने कंगना रनौत की फिल्म ‘तनु वेड्स मनु’, ‘क्वीन’ और ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ देखी हैं तो आप इस बात से जरूर सहमत होंगे.

इन फिल्मों में कंगना के अभिनय में जो चंचलता, जो रवानगी थी, उसे देख कर लगता था, जैसे यह अभिनय नहीं, बल्कि सब उन के अंदर से स्वाभाविक रूप से निकल रहा हो. कंगना रनौत खूबसूरत तो हैं ही, उन में कमाल की अभिनय क्षमता भी है. चेहरे पर चंचलता के साथसाथ भोलापन भी है. इस में भी कोई दो राय नहीं कि फिल्म इंडस्ट्री में उन्होंने अपनी जगह अपने बूते पर बनाई है. हालांकि शुरुआती दौर में उन्होंने तथाकथित रूप से कुछ लोगों को गौडफादर मान कर उन का सहारा लेने की कोशिश की, लेकिन उन्हें छल के अलावा कुछ नहीं मिला.

अगर हम कंगना के कैरियर को गौर से देखें तो समझ में आ जाएगा कि कंगना को अभिनय के लिए अच्छे मौके या अच्छी फिल्में नहीं मिलीं. हालांकि उन्हें पहचाना तो तभी से जाने लगा था, जब वह प्रियंका चोपड़ा अभिनीत मधुर भंडारकर की फिल्म ‘फैशन’ में बडे़ परदे पर आई थीं. इस फिल्म में कंगना ने दिल्ली की एक मौडल गीतांजलि नागपाल के किरदार को परदे पर हूबहू उतारने की कोशिश की थी, जिस के लिए उन्होंने सिर के बाल तक मुंडवा दिए थे. जबकि उन के घुंघराले बाल बहुत सुंदर थे. इस फिल्म के लिए कंगना को बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस का नेशनल अवार्ड मिला था.

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कंगना का कांटों भरा सफर

मौडलिंग से फिल्मों में आई कंगना के साथ सब से बड़ी परेशानी यह रही कि एक अच्छी अभिनेत्री होते हुए भी उन्हें फिल्मों में उतना और उन के स्तर का काम नहीं मिला. अलबत्ता वह विवादों में ज्यादा रहीं. इन विवादों के लिए अगर हम पूरी तरह कंगना को जिम्मेदार ठहराएं तो यह उन के साथ अन्याय होगा, क्योंकि किसी भी विवाद की जड़ में छोटी सी ही सही, कोई न कोई ऐसी वजह जरूर छिपी होती है, जो विवाद की बुनियाद बन जाती है.

23 मार्च, 1986 को जन्मी कंगना रनौत मूलत: हिमाचल प्रदेश के जिला मंडी के एक छोटे से कस्बे भांबला (सूरजपुर) की रहने वाली हैं. उन के मध्यमवर्गीय परिवार में उन की मां आशा रनौत, पिता अमरदीप रनौत, बड़ी बहन रंगोली और युवा भाई अक्षत हैं. उन की मां आशा स्कूल टीचर हैं और पिता अमरदीप बिजनैसमैन. बताते चलें, कंगना के परदादा आईएएस थे और दादा सांसद.

कंगना का बचपन सीधासादा, लेकिन खुशहाल बच्चों की तरह बीता. बावजूद इस के कि वह जिद्दी स्वभाव की थीं. शुरुआती पढ़ाई के बाद कंगना का एडमिशन चंडीगढ़ के डीएवी स्कूल में कराया गया, जहां उन्होंने विषय के रूप में इसलिए साइंस लिया, क्योंकि उन के मातापिता उन्हें डाक्टर बनाना चाहते थे.

उन की खुद की रुचि भी डाक्टर बनने में थी, लेकिन 12वीं में कैमिस्ट्री के यूनिट टेस्ट में वह फेल हो गईं और उन्होंने आल इंडिया प्री मैडिकल टेस्ट देने के बजाय अपना कैरियर किसी और फील्ड में बनाने की सोची.

पढ़ाई छोड़ कर कंगना रनौत मौडलिंग में कैरियर बनाने की सोच कर दिल्ली चली आईं. उस समय उन की उम्र महज 16 साल थी. हालांकि कंगना के मातापिता उन के इस फैसले से कतई सहमत नहीं थे. यहां तक कि उन्होंने कंगना को खर्चे के लिए पैसा देने से भी इनकार कर दिया था.

कंगना दिल्ली आ तो गईं, लेकिन उन की समझ में नहीं आ रहा था कि करें तो क्या करें. अभी वह ऊहापोह में थीं कि उन का संपर्क एलाइट मौडलिंग एजेंसी से हुआ. कंगना ने सोचा कि वह मौडलिंग में ही अपना कैरियर बनाएंगी. एजेंसी को भी उन का अंदाज और लुक्स पसंद आया. इस के बाद कंगना ने इसी एजेंसी के माध्यम से कुछ असाइनमेंट किए, लेकिन जल्दी ही इस से उन का मन ऊब गया, क्योंकि इस क्षेत्र में क्रिएटिविटी के लिए कोई खास जगह नहीं थी.

इसी के मद्देनजर कंगना का ध्यान अभिनय की ओर गया. अभिनय के लिए वह अस्मिता थिएटर ग्रुप में शामिल हो गईं, जहां डायरेक्टर अरविंद गौड़ ने उन्हें अभिनय का प्रशिक्षण दिया. उन्होंने गौड़ के थिएटर वर्कशौप में हिस्सा लेना शुरू कर दिया, साथ ही कई नाटकों में बहुत अच्छा प्रदर्शन भी किया. एक नाटक की प्रस्तुति के समय एक मेल एक्टर नहीं आ पाया तो कंगना ने अपनी भूमिका के साथसाथ उस एक्टर का भी रोल प्ले किया.

लोगों ने उन के इस अभिनय की बहुत तारीफ की. नाटकों में अभिनय के लिए तारीफ तो हो रही थी, लेकिन कंगना इस से संतुष्ट नहीं थीं. यही वजह थी कि उन्होंने मुंबई जा कर फिल्मों में अभिनय की सोची.

मुंबई बनी मंजिल

इस के बाद कंगना फिल्मों में अभिनय का निर्णय ले कर सन 2004 में मुंबई आ गईं. मुंबई में उन्होंने सब से पहले आशा चंद्रा के ड्रामा स्कूल में 4 महीने का प्रशिक्षण लिया. सच्चाई यह है कि फिल्म इंडस्ट्री में कंगना के शुरू के साल बहुत ही कठिनाइयों से भरे थे. उन के सामने एक समस्या यह भी थी कि उन की इंग्लिश बहुत अच्छी नहीं थी, जबकि हिंदी फिल्में बनाने वाले और उन में काम करने वाले ज्यादातर एक्टर अंगरेजी में बातें करते हैं.

हिंदीभाषियों को वे लोग हेयदृष्टि से देखते हैं. स्थिति यह है कि हिंदी में बोले जाने वाले डायलौग भी रोमन में लिखे जाते हैं. कंगना ने जब फिल्मों के लिए ट्राई करना शुरू किया तो यह समस्या उन के सामने भी आई. लेकिन इस पहाड़ी बाला ने उस स्थिति में भी न तो खुद को कमतर समझा और न घबरा कर अपने कदम पीछे हटाए.

कई जगहों पर कंगना का मजाक उड़ाया गया, लेकिन तब भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. संघर्ष के इन्हीं दिनों में कंगना रनौत का संपर्क आदित्य पंचोली से हुआ. आदित्य ने उन्हें अपनी पत्नी जरीना वहाब से मिलवाया. जल्दी ही यह रिश्ता पारिवारिक बन गया. कुछ समय यह संबंध टिका भी रहा, लेकिन तभी खबरें उड़ने लगीं कि आदित्य पंचोली कंगना रनौत के प्यार में पड़ गए हैं.

ऐसी खबरें फैलीं तो मीडिया ने कंगना को भी टटोला, लेकिन कंगना ने कुछ भी बोलने से मना कर दिया. इस बीच कंगना को फिल्में मिलने लगी थीं. इस के पीछे कंगना की अपनी मेहनत थी या आदित्य पंचोली की मदद, कुछ कहा नहीं जा सकता. हां, इतना जरूर है कि संघर्ष के उस दौर में कंगना के अपने भी उन के साथ नहीं थे. स्थिति यह थी कि कई बार कंगना को अचार और ब्रेड खा कर काम चलाना पड़ता था.

शुरुआत फिल्मी सफर की

बहरहाल, लंबे संघर्ष के बाद कंगना को फिल्म मिली ‘वो लम्हे’. इस फिल्म के डायरेक्टर थे मोहित सूरी. कंगना इस फिल्म में लीड रोल में थीं. उन के हीरो थे शाइनी आहूजा. यह फिल्म 29 सितंबर, 2006 को रिलीज हुई. इस फिल्म के लिए कंगना को बेस्ट फीमेल डेब्यू का जी सिने अवार्ड मिला. इस के बाद कंगना को फिल्म इंडस्ट्री में काम भी मिलने लगा और उन के आर्थिक अभाव भी खत्म होने लगे.

इस के बाद कंगना की अगली फिल्म आई ‘गैंगस्टर’. भट्ट कैंप द्वारा बनाई गई इस फिल्म में कंगना के हीरो थे इमरान खान और शाइनी आहूजा. इस फिल्म के डायरेक्टर अनुराग बसु थे. दरअसल, इस फिल्म के लिए पहले चित्रांगदा सिंह को साइन किया गया था, लेकिन किन्हीं कारणों से उन्हें रिप्लेस करना पड़ा.

28 अप्रैल, 2006 को रिलीज हुई इस फिल्म को दर्शकों का अच्छा रिस्पौंस मिला, साथ ही इस फिल्म के लिए कंगना को बेस्ट फीमेल डेब्यू का फिल्मफेयर और इसी श्रेणी में जी सिने अवार्ड मिले. गैंगस्टर के बाद फिल्म इंडस्ट्री में कंगना की अच्छी पहचान बन गई. बाद में जब सन 2007 में कंगना की फिल्म ‘लाइफ इन ए मैट्रो’ रिलीज हुई तो उन की राह के रोड़े खुदबखुद हटने लगे.

यह एक बेहतरीन फिल्म थी, जिस की सराहना भी हुई और दर्शकों ने फिल्म और कंगना के अभिनय दोनों को ही खूब पसंद किया. कंगना के लिए सब से खुशी की बात यह थी कि इस फिल्म की रिलीज के बाद उन के अपने परिवार से रिश्ते सामान्य हो गए.

सन 2008 में कंगना की मधुर भंडारकर निर्मित फिल्म ‘फैशन’ रिलीज हुई, जिस में मुख्य भूमिका प्रियंका चोपड़ा की थी. इस फिल्म के लिए कंगना को बेहतरीन अभिनेत्री के लिए नैशनल अवार्ड मिला. सन 2009 में कंगना की फिल्म ‘राज: द मिस्ट्री कंटीन्यूज’ आई, जिस में उन के हीरो थे इमरान हाशमी.

इस फिल्म में शेखर सुमन के बेटे अध्ययन सुमन की भी भूमिका थी. 23 जनवरी, 2009 को रिलीज हुई भट्ट कैंप की इस फिल्म को डायरेक्ट किया था मोहित सूरी ने. यहीं से अध्ययन सुमन और कंगना रनौत की नजदीकियां बढ़ी थीं, जो अध्ययन सुमन की असफलता या किन्हीं अन्य कारणों से वक्त के साथ खत्म हो गईं.

2010 में कंगना और रितिक रोशन की फिल्म आई ‘काइट्स’. इस फिल्म के निर्मातानिर्देशक थे रितिक के पिता राकेश रोशन. इस फिल्म में विदेशी एक्ट्रेस बारबरा मोरी भी थीं. उस समय बारबरा मोरी और रितिक रोशन के निकट संबंधों को ले कर तमाम खबरें भी आई थीं. यहां तक कहा गया था कि इन दोनों की नजदीकियों की वजह से रितिक रोशन और सुजैन खान के रिश्तों में दरार आ गई है, यह बात काफी हद तक ठीक भी थी, लेकिन बकौल कंगना रनौत रितिक रोशन की नजदीकियां उन से थीं, न कि बारबरा से.

रितिक की जिंदगी में कंगना की दस्तक

बहरहाल, जो भी रहा हो, रितिक कंगना और बारबरा मोरी की यह फिल्म सुपरफ्लौप रही थी. हां, इतना जरूर कहा जा सकता है कि इस फिल्म के बाद रितिक और सुजैन के रिश्तों में लगातार कड़वाहट आती गई, जिस का नतीजा यह निकला कि 17 साल साथ रहने वाले रितिक और सुजैन ने आपसी सहमति से 13 दिसंबर, 2013 को तलाक ले लिया और अलग हो गए.

2010 में कंगना रनौत की फिल्में ‘नौक आउट’ और ‘नो प्रौब्लम’ आईं, लेकिन फ्लौप रहीं. अलबत्ता इसी साल अजय देवगन के साथ आई उन की फिल्म ‘वंस अपौन ए टाइम इन मुंबई’ चर्चित भी रही और सफल भी. इस फिल्म में कंगना के किरदार को काफी सराहना मिली.

2011 में कंगना रनौत को अपने संघर्ष का सब से बड़ा फल मिला फिल्म ‘तनु वेड्स मनु’  के रूप में. इस में उन के हीरो थे आर. माधवन, साथ ही जिमी शेरगिल की भी बड़ी भूमिका थी. 25 फरवरी, 2011 को रिलीज हुई आनंद एल. राय निर्देशित इस फिल्म ने कंगना रनौत को अभिनय की ऊंचाई पर बैठा दिया.

बीच में कंगना की ‘गेम’, ‘डबल धमाल’ ‘रास्कल्स’, ‘तेज’ वगैरह कई फिल्में आईं, पर इन से उन्हें कोई लाभ नहीं हुआ. हां, 2013 में आई उन की फिल्म ‘शूटआउट ऐट वडाला’ जरूर ठीकठाक रही. 2013 में ही राकेश रोशन के निर्देशन में बनी फिल्म ‘कृष-3’ आई, जिस में प्रियंका चोपड़ा के साथसाथ कंगना रनौत भी हीरोइन थीं.

यह फिल्म रही तो ठीक, लेकिन 1 नवंबर, 2013 को रिलीज हुई इस फिल्म के बाद रितिक रोशन और कंगना रनौत की नजदीकियों की खबरें काफी चर्चाओं में रहीं. बताते चलें कि इस फिल्म की रिलीज के बाद ही 13 दिसंबर, 2013 को रितिक और सुजैन का तलाक हुआ था.

लेकिन सोचने वाली बात यह है कि अपने तथाकथित संबंधों को ले कर जब रितिक और कंगना रनौत के बीच ट्विटर वार छिड़ा तो सुजैन खान ने इस मामले में साथ अपने पूर्व पति रितिक रोशन का ही दिया. हालांकि खामोशी से तलाक के 2 साल बाद जब सुजैन ने पहली बार इस मुद्दे पर मुंह खोला था तो यही कहा था कि उन दोनों का रिश्ता ऐसे मोड़ पर पहुंच गया था, जहां साथ रहना संभव नहीं था.

शिखर पर कंगना

बहरहाल, सन 2014 में 7 मार्च को रिलीज हुई विकास बहल निर्देशित फिल्म ‘क्वीन’ ने कंगना रनौत को वाकई बौलीवुड की क्वीन बना दिया. इस फिल्म ने कंगना के अभिनय को इतनी ऊंचाई दी, जिस की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. फिल्म ‘क्वीन’ ने साबित कर दिया था कि कंगना रनौत ऐसी एक्ट्रैस हैं, जो पूरी फिल्म अपने कंधों पर उठा सकती हैं.

और फिर सन 2015 में आई आनंद एल. राय निर्देशित ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ ने उन के अभिनय का जो दोहरा रंग दिखाया, कोई भी उस की तारीफ किए बिना नहीं रह सकता था. इस में कंगना की दोनों भूमिकाएं चुनौतीपूर्ण थीं और उन्होंने इस चुनौती को न केवल स्वीकार किया, बल्कि बखूबी पूरा भी किया.

इस बीच आई कंगना की फ्लौप फिल्मों की बात हम नहीं करेंगे, लेकिन इसी 15 सितंबर को रिलीज फिल्म ‘सिमरन’ का जिक्र इसलिए जरूरी है, क्योंकि कमाल न दिखा पाने के बावजूद इस फिल्म में कंगना की अद्भुत अभिनय प्रतिभा को इग्नोर नहीं किया जा सकता. दरअसल, इन दिनों बौलीवुड के निर्मातानिर्देशकों को रियल कैरेक्टर वाली फिल्में बनाने का भूत चढ़ा हुआ है. इस फिल्म में सिमरन का किरदार, जोकि कंगना ने निभाया है, भारतीय मूल की एक लड़की संदीप कौर से प्रेरित है.

दरअसल, चंडीगढ़ में जन्मी संदीप कौर जब 7 साल की थी, तभी उस का परिवार कैलिफोर्निया शिफ्ट हो गया था. 19 साल की उम्र में वह वोकेशनल नर्स बन गई. एक बार उस ने अपने जीवन भर की पूरी कमाई स्टौक एक्सचेंज में लगा दी, जिस से उसे 2 लाख डौलर का फायदा हुआ.

अपना 21वां जन्मदिन मनाने संदीप अपने कजिन के साथ लास वेगास जाती है, जहां वह कैसीनो में जुआ खेलती है और कुछ हजार डौलर जीत जाती है. इस से उसे जुए की लत लग जाती है और वह पतन की राह पर उतर जाती है.

उस पर लाखों का कर्ज चढ़ जाता है और अपराधियों के चंगुल में फंस जाती है. इस के बाद संदीप कौर पुलिस और अपराधियों से बचने के लिए एक देश से दूसरे देश भागती रहती है. ‘सिमरन’ के निर्मातानिर्देशक हंसल मेहता ने कंगना रनौत को ले कर इस विषय पर फिल्म बनाई. शायद उन्हें उम्मीद रही होगी कि यह क्वीन जैसी हिट फिल्म बनेगी.

हर चुनौती स्वीकार की कंगना ने

‘सिमरन’ में कंगना ने अपने अभिनय का तो कमाल दिखा दिया, लेकिन स्क्रिप्ट की कमियों और देशी दर्शकों द्वारा ज्यादातर विदेशी कलाकारों को पसंद न किए जाने का वह क्या कर सकती थीं? बहरहाल, अब कंगना अपनी आगामी फिल्म ‘मणिकर्णिका: द क्वीन औफ झांसी’ की तैयारी में लगी हैं, जिस में उन्हें रानी लक्ष्मीबाई का किरदार निभाना है. इस के लिए उन्होंने बाकायदा घुड़सवारी की ट्रेनिंग ली है और हौर्स राइडिंग से जुड़े ट्रौटिंग, कैंटरिंग और गैलौपिंग में पूरी तरह निपुण हो चुकी हैं.

कंगना के अंदर 2 खासियत हैं, एक तो वह किसी से नहीं डरतीं और दूसरे बेबाकी से सच बोलती हैं, इस से भले ही उन्हें नुकसान क्यों न हो. एक प्रसिद्ध लेखिका की किताब के विमोचन के समय कंगना रनौत ने सब के सामने खुल कर कहा कि फिल्म इंडस्ट्री में उन का शारीरिक शोषण हुआ और यह सब करने वाला फिल्म इंडस्ट्री का ही आदमी था. हालांकि उन्होंने उस वक्त नाम नहीं बताया था. पर उन का इशारा आदित्य पंचोली की ओर था, जिन के खिलाफ कंगना ने पुलिस में मारपीट की रिपोर्ट भी लिखाई थी. क्या कोई दूसरी हीरोइन ईमानदारी से यह बात स्वीकार कर सकती है?

जहां तक बात किसी से न डरने की है तो कंगना साफ शब्दों में कहती हैं, ‘इतना संघर्ष करने और शोषण सहने के बाद भी मैं डरी तो जिंदगी भर डरती रहूंगी. ज्यादा से ज्यादा क्या होगा, मुझे फिल्म इंडस्ट्री में काम मिलना बंद हो जाएगा. कोई बात नहीं, मैं ने अपनी कमाई से मनाली में खूबसूरत घर बनाया है, वहीं रहूंगी. किताबें लिखूंगी या फिल्म डायरेक्ट करूंगी, फिर मैं क्यों डरूं?’ क्या ऐसी बात कोई दूसरी अभिनेत्री कह सकती है?

कंगना को 3 नैशनल अवार्ड मिले हैं और आधा दरजन से ज्यादा फिल्मफेयर और जी सिने अवार्ड. आज की तारीख में वह सब से ज्यादा फीस लेने वाली हीरोइन हैं. प्रियंका चोपड़ा और दीपिका पादुकोण से भी ज्यादा. बेशक वह फिल्म इंडस्ट्री की क्वीन हैं, लेकिन साथ ही विवादों की भी क्वीन हैं.

उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में कई बड़े लोगों को निशाना बनाया है, जिसे ले कर पूरी फिल्म इंडस्ट्री में खलबली मची हुई है. उन के निशाने पर रहे आदित्य पंचोली, रितिक रोशन, उन के पिता राकेश रोशन, अध्ययन सुमन और केतन मेहता, जिन से उन का रानी लक्ष्मीबाई को ले कर विवाद हुआ.

केतन मेहता से विवाद

कंगना कहती हैं, केतन मेहता ने कहा कि मैं ने उन का रानी लक्ष्मीबाई का आइडिया चुरा लिया है. रानी लक्ष्मीबाई का नाम पब्लिक डोमेन में है. ये उन का आइडिया कैसे हो गया? हां, केतन मेरे पास लक्ष्मीबाई की स्क्रिप्ट ले कर आए थे. मैं ने उन्हें कहा कि इस से बकवास स्क्रिप्ट मैं ने जिंदगी में नहीं सुनी.

इस पर केतन बोले, ‘ये मैं ने 10 साल पहले लिखी थी. अब हम इस में कुछ बदलाव करेंगे. उन्होंने सालों तक मेरे डेट्स बरबाद किए और एक पैसा नहीं दिया.’ बाद में मैं ने दूसरी फिल्म के लिए कहा. रितिक के बारे में कंगना कहती हैं, ‘उन्होंने तलाक के बाद मुझ से शादी का वादा किया था. लेकिन क्वीन की रिलीज से पहले रितिक ने ब्रेकअप कर लिया.

मैं रातरात भर रोती थी. मुझे मेंटल और इमोशनल ट्रामा हुआ था. मेरे नाम पर घटिया वाहियात मेल रिलीज किए गए, जिन्हें आज भी लोग गूगल पर चटखारे ले कर पढ़ते हैं. लेकिन जैसे ही मेरी ‘क्वीन’ हिट हुई, रितिक ने मेरे पास आ कर कहा कि उन से बड़ी गलती हो गई. मैं ने उन से कहा कि पहले अपना मन बनाओ कि मुझ से शादी करनी है या नहीं, तब बात करेंगे.

‘करन जौहर की पार्टी में रितिक ने मुझ से कहा कि सक्सेस तुम्हारे दिमाग पर चढ़ गया है. मैं ने जवाब दिया, ‘तुम बदले हो, मैं नहीं.’ ईमेल के बारे में कंगना का कहना है कि उन के एकाउंट से रितिक ने खुद को मेल भेजे. वे मेल इकट्ठे किए, फाइल बनाई, फिर सब से अच्छा वकील हायर किया कि इस लड़की से मुझे बचाओ. रितिक को पता नहीं था कि जिस फ्लौप एक्ट्रैस को वह डेट करते थे, वह ‘क्वीन’ से स्टार बन जाएगी, ‘तनु वेड्स मनु’ से सुपरस्टार. उस की इतनी बड़ी जर्नी हो जाएगी कि उन की बात कोई सुनेगा भी नहीं.

पोल खोल कर बन गई विवादों की क्वीन

कंगना ने रितिक के पिता राकेश रोशन पर भी निशाना साधा, ‘उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि मुझे एक्सपोज करेंगे. एक साल हो गया, मैं एक्सपोज होने को तैयार बैठी हूं, पर वह कुछ नहीं कर पाए.’

कंगना लंबे समय तक अध्ययन सुमन के साथ रिलेशनशिप में रहीं. अध्ययन ने उन पर आरोप लगाया कि वह उन्हें पीटती थीं, उन पर काला जादू करती थीं. कंगना ने इस का जवाब दिया, ‘अध्ययन 95 किलो के थे और मैं 49 किलो की. मैं उन की पिटाई कैसे कर सकती थी? लेकिन अब लगता है कि मुझे उसे जरूर पीटना चाहिए था.’

आदित्य पंचोली के बारे में कंगना ने बताया कि जब वह बौलीवुड में स्ट्रगल कर रही थीं तो आदित्य पंचोली के संपर्क में आई. उन्होंने मुझे एक अपार्टमेंट ले कर दिया, लेकिन वहां मेरे दोस्तों के आने पर पाबंदी थी. एक तरह से मैं हाउस अरेस्ट थी. वह मुझे पीटते थे. मैं ने उन की पत्नी जरीना वहाब से मदद मांगी. उन से कहा, ‘मैं नाबालिग हूं. आप की बेटी से बस एक साल बड़ी. यह बात मैं अपने पैरेंट्स से शेयर नहीं कर सकती.’

उन्होंने कहा, ‘अच्छा है, वह घर नहीं आते, वरना उन का गुस्सा घर में काम करने वाले नौकरों पर निकलता या घर वालों पर.’ बहरहाल, उन्होंने मुझे बदनाम किया. फिल्म इंडस्ट्री में किसी ने मेरी हैल्प नहीं की. उन्होंने मुझे इतना परेशान किया कि अनुराग बसु की फिल्म ‘लाइफ इन ए मैट्रो’ की शूटिंग के समय मुझे 15 दिन अपने औफिस में छिपा कर रखा.

कंगना ने करन जौहर को भी नहीं छोड़ा. उन्होंने करन पर भाईभतीजावाद का आरोप लगाया. हालांकि करन ने इस पर पलटवार किया. लेकिन कंगना न डरने वाली हैं और न पीछे लौटने वाली. उन्होंने दो टूक कह दिया, ‘करन जौहर होंगे बड़े फिल्ममेकर, मुझे नहीं करना उन की फिल्म में काम. उन की एक फिल्म ‘उंगली’ में काम किया था, वही नहीं चली.’

पानी में रह कर मगरमच्छ से बैर? जैसे सवाल पर कंगना कहती हैं, ‘इस का मतलब मैं डर जाऊं? पीछे हट जाऊं? नहीं यह उदाहरण ठीक नहीं रहेगा, न मेरे लिए न दूसरी लड़कियों के लिए. मैं अब इस स्टेज पर हूं कि हर मुकाबले के लिए तैयार हूं. इतने दर्द सहे, कष्ट झेले कि पत्थर बन गई हूं. अब मुझे किसी का कोई डर नहीं. जब 16 साल की उम्र में घर छोड़ते वक्त मुझे डर नहीं लगा तो अब 30 साल की उम्र में सब कुछ देखसह कर डर लगेगा? इंडस्ट्री में जो दुष्ट लोग हैं, मुझे डराते हैं, बुलिंग करते हैं, उन के सामने झुक जाना तो मौत से भी बदतर है.’

बहरहाल, कंगना ने जो बम फोड़ा है, उसे ले कर फिल्म इंडस्ट्री में ट्विटर वार जारी है. आदित्य पंचोली की ओर से उन की पत्नी जरीना वहाब मोर्चा संभाले हुए हैं तो कंगना की ओर से उन की बहन रंगोली. इस मामले में एक बात तो साफ है कि कंगना का फिल्मी सफर कांटों भरा रहा है, उन का शोषण भी हुआ. फिर भी वह शिखर तक पहुंची, यह कोई मामूली बात नहीं है. कंगना के सारे आरोपों को बेबुनियाद भी नहीं कहा जा सकता है. वैसे भी जब भविष्य का डर खत्म हो जाए तो इंसान की चिंताएं खत्म हो जाती हैं. कंगना के साथ भी ऐसा ही है.

VIDEO : ऐसे करेंगी मेकअप तो बन जाएंगी पार्टी की शान

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सैक्स का डबल मजा लेना चाहते हैं तो आज ही आजमाएं ‘डर्टी टौकिंग’

यह कहने समझने की शायद जरूरत नहीं कि सैक्स 100 मर्ज की एक दवा है, रिफ्रैसमैंट टौनिक है, एक अच्छा व्यायाम है, वगैरह वगैरह…

यों तो भारतीय समाज का एक बड़ा तबका सैक्स पर खुल कर बात नहीं पसंद करता व सैक्स आनंद की चीज है, यह तो पता होता है पर सिर्फ रात के अंधेरे में ही. कमरे की बत्तियों को बुझा कर सैक्स का लुत्फ उठाने वालों के लिए यह भले ही एक सामान्य प्रक्रिया लगती हो, पर विशेषज्ञों का मानना है कि सैक्स में नए नए प्रयोग शारीरिक सुख के साथ साथ मानसिक खुशी भी देती है.

लंबे सैक्स लाइफ के दौरान उब गए हों, कुछ नयापन चाहते हों, सैक्स संबंध के दौरान चुहूलबाजी कर उसे और भी मजेदार बनाना चाहते हों, तो डर्टी टौकिंग विद सैक्स संबंधों में गरमाहट ला देगी.

क्या है डर्टी टौकिंग

सैक्स के दौरान डर्टी टौकिंग न तो गाली है न ही ऐसी कोई बात कहनी होती है, जो सैक्स पार्टनर को बुरी लगे. सैक्स में डर्टी टौकिंग सैक्स क्रिया के दौरान साथी के अंगों को निहारना, सहलाना, हलकी छेड़छाड़ व खुल कर बातचीत करनी होती है.

कैसे बनाएं मजेदार

अगर आप को अपने प्यार भरे शब्दों के बाण से साथी को घायल करने में थोङी भी महारत हासिल है, तो डर्टी टौकिंग का कुछ इस तरह अंदाज गुदगुदी का एहसास कराएगी-

* सैक्स के दौरान कमरे की बत्तियों को जलने दें. संभव हो तो रंगीन बल्व जलाएं.

* हलका म्यूजिक चला दें. इस से मदहोशी का आलम बना रहेगा.

* एकदूसरे के अंगों को अपलक निहारें और उन की तारीफ करें.

* सैक्स के दौरान बातचीत उस पल को और हसीन बनाता है. आप चाहें तो तेज स्वर में भी बातचीत कर सकते हैं.

* अंगों का खुल कर नाम लें और बताएं कि वे आप को कितने पसंद हैं. सैक्स पार्टनर से भी ऐसा ही करने को कहें.

* इस दौरान सैक्स पार्टनर को अपनी आंखें खुली रखने के लिए बोलें.

* किचन में, बाथरूम में, बाथटब में बनाए सैक्स संबंधों को याद करें और खूब हंसें.

* कंडोम्स को ले कर भी खुल कर बात करें कि आप के सैक्स पार्टनर को कौन सी पसंद हैं.

* मार्केट में कई फ्लेवर्स व रंगों के कंडोम्स उपलब्ध हैं. उन पर खुल कर बात करिए और उन्हें आजमाइए भी.

यकीन मानिए, सैक्स की उपरोक्त क्रियाएं तनाव व भागदौड़ भरी जिंदगी से अलग ही सुकून देंगी और न सिर्फ रोमांचक लगेंगी, रिश्तों में नई जान व ताजगी का एहसास भी कराएंगी. याद रखिए कि सैक्स कुदरत का दिया एक अनमोल तोहफा है.

VIDEO : हेयरस्टाइल स्पेशल

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बचपन से चैंपियन बनने का सपना देखा था : आंचल ठाकुर

2018 में तुर्की में आयोजित ‘इंटरनैशनल स्कीइंग कंपीटिशन’ में कांस्य पदक जीतने वाली आंचल ठाकुर हिमाचल प्रदेश के मनाली शहर की रहने वाली हैं. 21 वर्षीय आंचल यह कारनामा करने वाली पहली भारतीय हैं. उन्होंने अल्पाइन एज्दर 3200 कप में इस पदक को जीत कर इतिहास रचा है. भारत में विंटर खेल को अधिक महत्त्व नहीं दिया गया. ऐसे में आंचल ने अपनी मेहनत और लगन के बल पर अपना मुकाम हासिल किया है.

आंचल ने यह मैडल स्लालम अर्थात सांप के आकार के रास्ते पर ‘स्की’ करते हुए जीता. इस खेल  का आयोजन फैडरेशन इंटरनैशनल स्की रेस (एफआईएस) करता है. इस पदक के अलावा आंचल को 2017 के नैशनल गेम्स में 2 मैडल, कई सम्मान व प्रशस्ति पत्र भी मिल चुके हैं.

ऐसे हुई शुरुआत

इस खेल की प्रेरणा कहां से मिली? पूछे जाने पर वे बताती हैं, ‘‘मेरे पिता रोशन ठाकुर अपने समय में नैशनल चैंपियन थे और मेरा बड़ा भाई हिमांशु ठाकुर भी चैंपियन है. ऐसे में मैं ने बचपन से इस खेल को नजदीक से देखा है. मैं ने 5 साल की उम्र से इस खेल को सीखना शुरू कर किया था. मैं उत्साहित हो जाती थी और थोड़ाथोड़ा करती थी. असल ट्रेनिंग 11 साल की उम्र से शुरू  की. ‘‘इस की ट्रेनिंग विंटर में ही होती है, तब तापमान-30 डिग्री होता है. ऐसे में अंदर से स्ट्रैंथ की आवश्यकता होती है. गरमियों में शारीरिक ट्रेनिंग होती है, जबकि ठंड में तकनीकी अभ्यास किया जाता है, क्योंकि इस में सही संतुलन के साथसाथ थाई मसल्स भी स्ट्रौंग होनी आवश्यक है. यह एक एडवैंचर खेल है, जिस में खूब मजा आता है.’’ शुरू में आंचल को ऊपर से नीचे उतरने में डर लगता था, पर अब नहीं. उन के हिसाब से शुरूशुरू में वे 2 हजार मीटर की हाइट के नीचे उतरती थीं. उस के बाद 4 हजार मीटर की बर्फीली पहाड़ियों से उतरने लगीं.

फिटनैस का महत्त्व

आंचल का मानना है कि महिलाएं किसी भी क्षेत्र में हों, उन का फिट रहना जरूरी है. वे परिवार की धुरी होती हैं और सब से जरूरी बात यह कि फिटनैस से आत्मविश्वास बढ़ता है. असफलता मिलने पर आंचल को मायूसियों से भी गुजरना पड़ता है. ऐसे में उन की मां उन्हें हमेशा सपोर्ट करती है. आंचल कहती हैं, ‘‘इस खेल में आक्रामकता और आत्मविश्वास से ही प्रतिद्वंद्वी को हराया जाता है. इस के लिए खिलाड़ी को शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत होने की जरूरत होती है.’’ समय मिले तो आंचल वू शु, किक बौक्सिंग, पेंटिंग, डांस आदि करती हैं. तकनीक सीखने के लिए आंचल अधिकतर स्विटजरलैंड, आस्ट्रिया और न्यूजीलैंड जाती हैं. वहां के कोचों से नईनई तकनीक सीखती है. उन्हें वहां के कोच हायर करने पड़ते हैं, जिस के लिए विंटर गेम फैडरेशन वित्तीय सहयोग करती है. आंचल 2022 में चीन के बीजिंग शहर में आयोजित होने वाली ओलिंपिक गेम्स में गोल्ड मैडल के लिए कड़ी मेहनत कर रही है. वे कहती हैं कि इस खेल में अधिक से अधिक प्लेयर्स को आना चाहिए. इस के अलावा सरकार को इस खेल को ‘प्रायौरिटी कैटेगरी’ में रखना चाहिए ताकि खिलाड़ियों को नए अवसर मिल सकें. इस से इस खेल में अधिक संख्या में खिलाड़ी आ सकेंगे.

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जीएसटी का कहर : टैक्स बुरा नहीं है पर ईस्ट इंडिया कंपनी का सा न हो

गुड्स ऐंड सर्विसेस टैक्स यानी जीएसटी, राहुल गांधी के शब्दों में गब्बर सिंह टैक्स, असल में पंडों का कुंडली टैक्स है जो हर हिंदू को जन्म से ब्रेनवाशिंग द्वारा जकड़ लेता है. केंद्र सरकार बड़ेबड़े विज्ञापन दे रही है कि वन नेशन वन टैक्स के जरिए अभूतपूर्व प्रगति होगी. दरअसल, यह वैसा ही है जैसा पंडित कहते हैं कि कुंडली बनवाओ, ग्रहदोष ठीक कराओ और जीवनभर सुख पाओ.

सरकारी टैक्स और हिंदू टैक्स में समानताएं ही समानताएं हैं. लगता है वित्त मंत्रालय में कुंडली बनाने वालों की बरात बैठी है जिन के डीएनए में ही है कि हर मानव पापी है और केवल पाखंडी कर्मकांड कर के ही वह पापों का प्रायश्चित्त कर सकता है. यही नहीं, ये कर्मकांड उसे हर रोज, हर सप्ताह, हर माह, हर वर्ष करने ही होंगे और हर बार दान, दक्षिणा, आहुतियां और सब से बड़ी बात, समय देना ही होगा. जीएसटी में कुंडली में कुंडली है और ग्रहदोष पर ग्रहदोष.

जीएसटी ऐसा है जैसा अकसर हिंदी फिल्मों में दिखता है कि विवाह का शुभमुहूर्त निकला जा रहा है और वर व वधू का मंडप में होना अनिवार्य है. जीएसटी में इस तरह के प्रावधानों का अंबार है. ईवे बिल तो हर काम पंडित से पूछ कर करने वाली प्रक्रिया जैसा है जब तक कंप्यूटर पंडा हां न कहे आप बनाबनाया सामान कहीं भेज नहीं सकते.

जीएसटी के प्रवर्तक सारे देश में गौसेवकों की तरह फैलने वाले हैं. गौसेवकों के गले में भगवा दुपट्टा होता है और हाथों में डंडे, फरसे जबकि जीएसटी सेवकों के पास कंप्यूटर टैबलेट होंगे ताकि वे पता कर सकें कि सामान आवश्यक मुहूर्त में सभी विधिविधानों के बाद कंप्यूटर पंडा की अनुमति से ही निकला है या नहीं. हर गलती पर महापाप लगेगा जिस के दंड में अपना आखिरी लंगोट तक जीएसटी पुरोहितों को देना पड़ सकता है.

व्यापारियों को इस तरह के प्रपंचों की सदियों से आदत है. राजाओं ने डकैतों, दूतों और मुख्यतया शास्त्रधारी तिलक लगाए प्रतिनिधियों की नियुक्ति कर रखी थी जो हर सौदे में अपना हिस्सा रखते थे. हर व्यापारी तिजोरी पर ‘शुभलाभ’ लिखता है तो वह अपनी कर्मठता जताने के लिए नहीं, बल्कि यह जताने के लिए कि उस ने सारे विधिविधान पूरे किए हैं. अब वह जीएसटी नंबर उसी तरह लगाएगा.

टैक्स बुरा नहीं है पर यह तैमूरी या ईस्ट इंडिया कंपनी का सा न हो. जीएसटी आज हिंदू, मुगल व ब्रिटिश तीनों हुकूमतों का सम्मिलत कहर सा बन गया है.

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